PSEB 10th Class SST Solutions Civics उद्धरण संबंधी प्रश्न

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Civics उद्धरण संबंधी प्रश्न.

PSEB 10th Class Social Science Solutions Civics उद्धरण संबंधी प्रश्न

Class 10th Civics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(1)

प्रत्येक देश की सरकार समाज में कानून की व्यवस्था और शांति स्थापित करती है। इस कार्य को सरकार कानूनों के निर्माण और व्यवस्था की स्थापना करके करती है। परन्तु सरकार अपनी इच्छा के अनुसार कानून बनाकर मनमानी नहीं कर सकती। देश की सरकार को संविधान मौलिक कानून के अनुसार ही कार्य करने होते हैं। इस प्रकार संविधान देश के प्रशासन और राज्य प्रबन्ध को निर्धारित करने वाले नियमों का मूल स्रोत होता है और यह शक्ति के दुरुपयोग पर प्रतिबन्ध लगाता है। जहाँ यह सरकार के अंगों के परस्पर और नागरिक के साथ सम्बन्धों को निर्धारित करता है, वहाँ यह सरकार द्वारा शक्ति के दुरुपयोग पर रोक भी लगाता है।

(a) संविधान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
संविधान एक मौलिक कानूनी दस्तावेज़ या लेख होता है जिसके अनुसार देश की सरकार अपना कार्य करती

(b) प्रस्तावना में वर्णित कोई तीन उद्देश्यों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
संविधान की प्रस्तावना में भारतीय शासन प्रणाली के स्वरूप तथा इसके बुनियादी उद्देश्यों को निर्धारित किया गया है। ये उद्देश्य निम्नलिखित हैं —
(1) भारत एक प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य होगा।
(2) सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिले।
(3) नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्राप्त होगी।
(4) कानून के सामने सभी नागरिक समान समझे जाएंगे।
(5) लोगों में बन्धुत्व की भावना को बढ़ाया जाए ताकि व्यक्ति की गरिमा बढ़े और राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को बल मिले।

(2)

अधिकार और कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। अन्य शब्दों में कर्तव्यों के बिना अधिकारों का कोई अस्तित्व नहीं। अतः सारे देशों ने संविधान में अपने नागरिकों के अधिकारों के साथ-साथ उनके मौलिक कर्त्तव्य भी अंकित किये हैं। भारतीय संस्कृति में सदा ही अधिकारों के स्थान पर कर्तव्यों पर अधिक बल दिया गया है। मूल संविधान में नागरिकों के कर्तव्यों की व्यवस्था नहीं की गई थी। 1976 में संविधान के बयालीसवें संशोधन द्वारा नया अध्याय IV A में नागरिकों के दस कर्तव्य निर्धारित किये गए हैं। सन् 2002 में संविधान के 86वें संशोधन द्वारा एक नया कर्तव्य जोड़ा गया है।

(a) भारतीय संविधान में नागरिकों के कर्त्तव्यों को कब और क्यों जोड़ा गया?
उत्तर-
मूल संविधान में नागरिकों के कर्तव्यों की व्यवस्था नहीं की गई थी। इन्हें 1976 में (संविधान के 42वें संशोधन द्वारा) संविधान में सम्मिलित किया गया।

(b) भारतीय नागरिकों के तीन कर्त्तव्य बताएं।
उत्तर-
भारतीय नागरिकों के कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं —

  1. संविधान का पालन करना तथा इसके आदर्शों, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना।
  2. भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष को प्रोत्साहित करने वाले आदर्शों का सम्मान तथा पालन करना।
  3. भारत की प्रभुसत्ता, एकता एवं अखण्डता की रक्षा करना।
  4. भारत की रक्षा के आह्वान पर राष्ट्र की सेवा करना।
  5. धार्मिक, भाषायी, क्षेत्रीय अथवा वर्गीय विभिन्नताओं से ऊपर उठ कर भारत के सभी लोगों में परस्पर मेलजोल और बन्धुत्व की भावना का विकास करना।
  6. सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना और इसे बनाए रखना।
  7. वनों, झीलों, नदियों, वन्य जीवन तथा प्राकृतिक वातावरण की रक्षा करना।
  8. वैज्ञानिक स्वभाव, मानवतावाद, अन्वेषण और सुधार की भावना का विकास करना।
  9. सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना और हिंसा का त्याग करना।

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(3)

लोकतांत्रिक शासन प्रणाली सबसे उत्तम समझी जाती है। वर्तमान समय में संसार के बहुत से देशों ने लोकतांत्रिक शासन को अपनाया हुआ है और यह बहुत लोकप्रिय हो चुकी है। इसके बावजूद लोकतांत्रिक शासन प्रणाली प्रत्येक देश में पूर्ण रूप से सफल नहीं हुई।
लोकतन्त्र की सफलता के लिए प्रत्येक नागरिक अच्छे आचरण वाला, चेतन तथा बुद्धिमान सुशिक्षित, विवेकशील तथा समझदार, उत्तरदायी तथा सार्वजनिक मामलों में रुचि लेने वाला होना चाहिए। समाज में अच्छे तथा योग्य नेता, सामाजिक और आर्थिक समानता तथा निष्पक्ष प्रैस तथा न्यायपालिका, अच्छे राजनैतिक संगठित दल और नागरिकों में सहनशक्ति तथा सहयोग का होना लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक शर्ते हैं। जे.एस. मिल के अनुसार लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए लोगों में लोकतांत्रिक शासन को नियमित करने की इच्छा और उसे चलाने की योग्यता, लोकतन्त्र की रक्षा के लिए सदा प्रयत्नशील रहना और नागरिकों में अधिकारों की रक्षा और कर्तव्यों के पालन की इच्छा बेहद आवश्यक है।

(a) लोकतन्त्र से आप क्या समझते हो?
उत्तर-
लिंकन के अनुसार, लोकतन्त्र लोगों का, लोगों के लिए, लोगों द्वारा शासन होता है।

(b) लोकतन्त्र को सफल बनाने की तीन शर्ते लिखिए।
उत्तर-
हमारे देश में लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए हमें निम्नलिखित उपाय करने चाहिएं

  1. शिक्षा का प्रसार-सरकार को शिक्षा के प्रसार के लिए उचित कदम उठाने चाहिएं। गांव-गांव में स्कूल खोलने चाहिए, स्त्री शिक्षा का उचित प्रबन्ध किया जाना चाहिए तथा प्रौढ़ शिक्षा को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  2. पाठ्यक्रमों में परिवर्तन-देश के स्कूलों तथा कॉलजों के पाठ्यक्रमों में परिवर्तन लाना चाहिए। बच्चों को राजनीति शास्त्र से अवगत कराना चाहिए। शिक्षा केन्द्रों में प्रजातान्त्रिक सभाओं का निर्माण करना चाहिए। जिनमें बच्चों को चुनाव तथा शासन चलाने का प्रशिक्षण मिल सके।
  3. चुनाव-प्रणाली में सुधार-देश में ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि चुनाव एक ही दिन में सम्पन्न हो जाएं और उनके परिणाम भी उसी दिन घोषित हो जाएं।
  4. न्याय-प्रणाली में सुधार-देश में न्यायधीशों की संख्या में वृद्धि की जानी चाहिए ताकि मुकद्दमों का निपटारा जल्दी हो सके। निर्धन व्यक्तियों के लिए सरकार की ओर से वकीलों की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  5. समाचार-पत्रों की स्वतन्त्रता-देश में समाचार-पत्रों को निष्पक्ष विचार प्रकट करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए।
  6. आर्थिक विकास-सरकार को नये-नये उद्योगों की स्थापना करनी चाहिए। उसे लोगों के लिए अधिक-सेअधिक रोज़गार जुटाने चाहिएं। ग्रामों में कृषि के उत्थान के लिए उचित पग उठाने चाहिएं।

(4)

लोकतन्त्र और लोकमत के गहरे सम्बन्ध को समझने के लिये यह जान लेना आवश्यक है कि लोकमत, लोकतन्त्र का आधार होता है। आज का युग लोकतन्त्र का युग है और लोकतन्त्र सदैव लोगों के कल्याण हेतु चलाया जाता है। इसके अतिरिक्त सही अर्थों में लोकमत, लोकतांत्रिक सरकार की आत्मा होता है क्योंकि लोकतांत्रिक सरकार अपनी सारी शक्ति जनमत से ही प्राप्त करती है और इसी के आधार पर कायम रहती है। ऐसी सरकार का हमेशा यह प्रयत्न रहता है कि लोकमत उनके पक्ष में रहे भाव उसके विरुद्ध न जाये। इस प्रकार हम लोकमत को कल्याणकारी सरकार की आत्मा भी कह सकते हैं। इसके अतिरिक्त लोकतांत्रिक सरकार में सरकार को राह पर चलाने के लिए जाग्रत जनमत की बहुत आवश्यकता है।

(a) लोकमत से आपका क्या भाव है?
उत्तर-
लोकमत से हमारा अभिप्राय जनता की राय अथवा मन से है।

(b) (लोकतंत्र में) लोकमत की भूमिका बताओ।
उत्तर-
लोकमत अथवा जनमत लोकतान्त्रिक सरकार की आत्मा होता है, क्योंकि लोकतान्त्रिक सरकार अपनी शक्ति लोकमत से ही प्राप्त करती है। ऐसी सरकार का सदा यह प्रयत्न रहता है कि लोकमत उनके पक्ष में रहे। इसके अतिरिक्त लोकतन्त्र लोगों का राज्य होता है। ऐसी सरकार जनता की इच्छाओं और आदेशों के अनुसार कार्य करती है। प्रायः यह देखा गया है कि आम चुनाव काफ़ी लम्बे समय के पश्चात् होते हैं जिसके फलस्वरूप जनता का सरकार से सम्पर्क टूट जाता है और सरकार के निरंकुश बन जाने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है। इससे लोकतन्त्र का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। ऐसी अवस्था में जनमत लोकतान्त्रिक सरकार की सफलता का मूल आधार बन जाता है।

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(5)

प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और मंत्रिमण्डल में एक कड़ी की भूमिका निभाता है। मंत्रिमण्डल के निर्णयों को राष्ट्रपति को अवगत कराना उसका संवैधानिक कर्तव्य है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से किसी भी विभाग सम्बन्धी सूचना प्राप्त कर सकता है। यदि कोई मंत्री राष्ट्रपति से मिलना चाहता है या परामर्श लेना चाहता है तो वह ऐसा प्रधानमंत्री के द्वारा ही कर सकता है। संक्षेप में वह राष्ट्रपति और मंत्रिमण्डल के सदस्यों में मध्यस्थ का कार्य करता है।
प्रधानमंत्री लोकसभा का नेता माना जाता है। प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में लोकसभा इसके नेतृत्व की इच्छा करती है। प्रधानमंत्री की इच्छा के विपरीत लोकसभा कुछ भी नहीं कर सकती क्योंकि उसे लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है। वह लोकसभा में सरकार की नीतियों और निर्णयों की घोषण करता है। अक्ष्यक्ष प्रधानमंत्री के परामर्श से सदन का कार्यक्रम निश्चित करता है।

(a) प्रधानमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है?
उत्तर-
राष्ट्रपति संसद् में बहुमत प्राप्त करने वाले दल के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है।

(b) प्रधानमंत्री के किन्हीं तीन महत्त्वपूर्ण कार्यों (शक्तियों) का वर्णन करो।
उत्तर-
इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रधानमन्त्री मन्त्रिमण्डल का धुरा होता है।

  1. वह मन्त्रियों की नियुक्ति करता है और वही उनमें विभागों का बंटवारा करता है।
  2. वह जब चाहे प्रशासन की कार्यकुशलता के लिए मन्त्रिमण्डल का पुनर्गठन कर सकता है। इसका अभिप्राय यह है कि वह पुराने मन्त्रियों को हटा कर नए मन्त्री नियुक्त कर सकता है। वह मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है। यदि प्रधानमन्त्री त्याग-पत्र दे दे तो पूरा मन्त्रिमण्डल भंग हो जाता है।
  3. यदि कोई मन्त्री त्याग-पत्र देने से इन्कार करे तो वह त्याग-पत्र देकर पूरे मन्त्रिमण्डल को भंग कर सकता है। पुनर्गठन करते समय वह उस मन्त्री को मन्त्रिमण्डल से बाहर रख सकता है। इसके अतिरिक्त वह मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करता है और उनकी तिथि, समय तथा स्थान निश्चित करता है।

(6)

संविधान के अनुसार यदि राज्यपाल राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट दे या राष्ट्रपति को किसी भरोसेमन्द सूत्रों से यह सूचना मिले कि राज्य सरकार संवैधानिक ढंग से नहीं चल रही तो वह राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकता है। ऐसी घोषणा के उपरान्त राष्ट्रपति राज्य की मंत्रि परिषद् को बर्खास्त कर देता है और विधान सभा को भंग कर सकता है या स्थगित कर सकता है राष्ट्रपति शासन के अधीन राज्यपाल राज्य का वास्तविक कार्याध्यक्ष बन जाता है भाव वह केन्द्रीय सरकार के एजेन्ट के रूप में कार्य करता है। संवैधानिक ढाँचा फेल होने पर राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति के पास होती हैं और वैधानिक शक्तियाँ संसद को प्राप्त हो जाती हैं।

(a) राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है?
उत्तर-
राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा पांच वर्ष के लिए की जाती है।

(b) संवैधानिक संकट की घोषणा का राज्य प्रशासन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
राज्य में संवैधानिक संकट की स्थिति में राज्यपाल की सलाह पर राष्ट्रपति राज्य में संवैधानिक आपात्काल की घोषणा कर सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि सम्बद्ध राज्य की विधानसभा को भंग अथवा निलम्बित कर दिया जाता है। राज्य की मन्त्रिपरिषद् को भी भंग कर दिया जाता है। राज्य का शासन राष्ट्रपति अपने हाथ में ले लेता है। इसका अर्थ यह है कि कुछ समय के लिए राज्य का शासन केन्द्र चलाता है। व्यवहार में राष्ट्रपति राज्यपाल को राज्य का प्रशासन चलाने की वास्तविक शक्तियां सौंप देता है। विधानमण्डल की समस्त शक्तियां अस्थाई रूप से केन्द्रीय संसद् को प्राप्त हो जाती हैं।

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(7)

भारत ने गुट निरपेक्षता को अपनी विदेश नीति का मूल सिद्धान्त बनाया है। जब भारत आजाद हुआ तब सारा विश्व दो गुटों में बँटा हुआ था-रूस और एंग्लो-अमरीकन गुट। भारत की विदेश नीति के निर्माता पंडित नेहरू ने अनुभव किया कि राष्ट्र के निर्माण हेतु भारत को शक्ति-गुटों के संघर्ष से दूर रहना चाहिए। इसलिए पंडित नेहरू ने गुट निरपेक्ष नीति को अपनाया-गुट निरपेक्षता का अर्थ है कि प्रतियोगी शक्ति-गुटों से जानबूझ कर अलग रहना, किसी देश के प्रति वैर-विरोध का भाव न रखना और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का गुण के आधार पर निर्णय करना तथा स्वतन्त्र नीति अपनाना। भारत के प्रयत्नों के फलस्वरूप गुट-निरपेक्ष आन्दोलन समूचे विश्व में एक शक्तिशाली तथा प्रभावशाली आन्दोलन बन गया है।

(a) भारत की परमाणु नीति क्या है?
उत्तर-
भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है। परंतु हमारी विदेश नीति शांतिप्रियता पर आधारित है। इसलिए भारत की परमाणु नीति का आधार शांतिप्रिय लक्ष्यों की प्राप्ति करना और देश का विकास करना है। वह किसी पड़ोसी देश को अपनी परमाणु शक्ति के बल पर दबाने के पक्ष में नहीं है। हमने स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध की स्थिति में भी हम परमाणु शक्ति का प्रयोग करने की पहल नहीं करेंगे।

(b) गुट-निरपेक्ष नीति का अर्थ और भारत का इसे अपनाने का क्या कारण है?
उत्तर-
गुट-निरपेक्ष नीति भारतीय विदेश नीति के मूल सिद्धान्तों में से एक है।
गुट-निरपेक्षता का अर्थ-गुट-निरपेक्षता का अर्थ है सैनिक गुटों से अलग रहना। इसका यह भाव नहीं है कि हम अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति दर्शक बने रहेंगे बल्कि गुण के आधार पर निर्णय लेने का प्रयास करेंगे। हम अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहेंगे। भारत द्वारा गुट-निरपेक्ष नीति अपनाने का कारण-भारत की स्वतन्त्रता के समय विश्व दो मुख्य शक्ति गुटोंऐंग्लो-अमरीकन शक्ति गुट और रूसी शक्ति गुट में बंटा हुआ था। विश्व की सारी राजनीति इन्हीं गुटों के गिर्द घूम रही थी और दोनों में शीत युद्ध चल रहा था। नव स्वतन्त्र भारत इन शक्ति गुटों के संघर्ष से दूर रह कर ही उन्नति कर सकता था। इसीलिए पं० नेहरू ने गुट-निरपेक्षता को विदेश नीति का आधार स्तम्भ बनाया।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग

Punjab State Board PSEB 7th Class Physical Education Book Solutions Chapter 5 योग Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Physical Education Chapter 5 योग

PSEB 7th Class Physical Education Guide योग Textbook Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1.
‘योग’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
योग शब्द संस्कृत के ‘युज’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है मिलाना। साधारण शब्दों में योग का अर्थ मनुष्य को परमात्मा से मिलाना है अर्थात् वह विज्ञान जो हमें परमात्मा से मिलने का मार्ग दिखाता है उसे योग कहते हैं।

प्रश्न 2.
ऋषि पतंजली के अनुसार योग क्या है ?
उत्तर-
योग का उद्देश्य एकता, मिलाप और प्रेम है। मनुष्य का मन चंचल होने के कारण हर समय भटकता रहता है जो कभी रुक नहीं सकता। योग की मदद से मन को नियंत्रित कर सकते हैं। महर्षि पतंजली के अनुसार मन की वृत्तियों को रोकना ही योग है।
विभिन्न विद्वानों ने ‘योग’ को इस प्रकार परिभाषित किया है—
डॉ० राधाकृष्ण के अनुसार, “योग वह मार्ग है जो व्यक्ति को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।”
श्री रामचरण के अनुसार, “योग व्यक्ति के तन को स्वास्थ्य, मन को शान्ति व आत्मा को चैन प्रदान करता है।”

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प्रश्न 3.
योग की कोई एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
डॉ० राधाकृष्ण के अनुसार, “योग वह मार्ग है जो व्यक्ति को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।”

प्रश्न 4.
‘आसन’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
आसन प्राचीन यौगिक अभ्यास है जिससे प्राणायाम, ध्यान और समाधि का आधार तैयार होता है। आसन’ शब्द संस्कृत भाषा के शब्द ‘अस’ से लिया गया है जिसका मतलब है बैठने की कला। ऋषि पतंजली द्वारा “योग सूत्र में आसन का अर्थ व्यक्ति की उस स्थिति से है जिसमें वह अधिक-से-अधिक समय आसानी से बैठ सके।”

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प्रश्न 5.
आसन कितने प्रकार के होते हैं। विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर-

  1. उपचार के लिए आसन-इन आसनों में मांसपेशियों में खिंचाव उत्पन्न होता है और अनेक कुरूपताओं का उपचार किया जा सकता है।
  2. साधना के लिए आसन-इन आसनों में शरीर को एक स्थिति में रख कर लम्बे समय तक बैठकर ध्यान केन्द्रित किया जाता है।
  3. आराम के लिए आसन-इन आसनों का मुख्य उद्देश्य शरीर को आराम देना होता है और लेटकर किए जाते हैं। इन आसनों से शारीरिक व मानसिक थकावट दूर होती है।

प्रश्न 6.
योग सिर्फ एक ईलाज की विधि है-इस धारणा के बारे में अपने विचार लिखिए।
उत्तर-
1. क्या योग एक विशेष धर्म से सम्बन्धित है-भारत में योग प्राचीन समय में ऋषि-मुनियों द्वारा आरम्भ किया गया है। इसलिए आम लोग इसे हिन्दू धर्म सम्बन्धित मानते हैं और योग केवल हिन्दुओं के लिए है। यह धारणा बिल्कुल गलत है। योग को किसी भी धर्म को मानने वाला अपना सकता है क्योंकि योग तो एक किस्म का शारीरिक व्यायाम है जिसका किसी धर्म से लेना-देना नहीं।

2. क्या योग केवल पुरुषों के लिए है-कुछ लोग मानते हैं कि योग करने वाले व्यक्ति को कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है और योग केवल पुरुष ही कर सकते हैं। योग स्त्रियों के लिए नहीं है। सच्चाई यह है कि योग के लिए कोई कठोर नियम नहीं है और योग स्त्रियों के लिए भी उतना लाभदायक है जितना पुरुषों के लिए लाभदायक है।

3. क्या योग केवल रोगियों के लिए है-योग से कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। इसलिए कई लोग यह सोचते हैं कि योग केवल इलाज के लिए है और रोगियों के लिए है। यह धारणा गलत है क्योंकि कोई भी स्वस्थ मनुष्य योग कर सकता है और शरीर को बीमारियों से बचा सकता है।

4. क्या योग सिर्फ संन्यासियों के लिए है-ऋषि मुनि प्राचीन काल में योग का अभ्यास जंगलों में रह कर किया करते थे। आज भी कुछ लोग सोचते हैं योग करने के लिए मनुष्य को घर छोड़ना पड़ता है। एक गृहस्थी के लिए योग करना ठीक नहीं जोकि बिल्कुल गलत है। सच्चाई तो यह है कि योग घर में रहकर भी कर सकते हैं।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग

Physical Education Guide for Class 7 PSEB योग Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
योग के बारे में अपने शब्दों में लिखें ।
उत्तर-
योग शब्द संस्कृत के ‘युज’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है मिलाना, मिलाप और प्रेम। योग के द्वारा व्यक्ति का परमात्मा से मेल।

प्रश्न 2.
महर्षि पतंजली के अनुसार योग के बारे में लिखें।
उत्तर-
महर्षि पतंजली के अनुसार मन की वृत्तियों को रोकना अथवा उनको नियंत्रित करना ही योग है।

प्रश्न 3.
योग सम्बन्धी कोई एक भ्रामक धारणा लिखें।
उत्तर-
योग किसी विशेष धर्म से सम्बन्धित नहीं है।

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प्रश्न 4.
आसन क्या है ?
उत्तर-
ऋषि पतंजली के अनुसार आसन का अर्थ व्यक्ति की उस स्थिति से है जिसमें वह अधिक-से-अधिक समय आसानी से बैठ सके।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न-
आसनों के कोई तीन सिद्धान्त लिखें।
उत्तर-

  1. आसन करने के लिए आयु व लिंग का ध्यान रखना ज़रूरी है। बच्चों को अधिक कठोर आसन नहीं करने चाहिए, जिनसे उनकी शारीरिक वृद्धि प्रभावित हो।
  2. आसन करते समय अधिक ज़ोर नहीं लगाना चाहिए। आसन करते समय शरीर सहज, स्थिर व आरामदायक स्थिति में रहना चाहिए।
  3. आसन का अभ्यास करते समय शरीर को धीरे-धीरे मोड़ना चाहिए। आसन करते समय एक दम झटका नहीं देना चाहिए।

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बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न-
आसन के सिद्धान्त विस्तार से लिखें।
उत्तर-
आसन करने वाले व्यक्ति को कुछ सिद्धान्तों का पालन करना पड़ता है। इन सिद्धान्तों का पालन करने से हम आसनों से पूरा लाभ ले सकते हैं। ये सिद्धान्त इस प्रकार हैं

  1. आसन करते समय मांसपेशियों में तनाव पैदा होना ज़रूरी है। तनाव से लचक पैदा होती है।
  2. आसन करते समय आयु और लिंग का ध्यान रखना आवश्यक है। बच्चों को कठोर आसन नहीं करने चाहिए जिससे उनके शरीर की वृद्धि में रुकावट न आ जाए। लड़कियों को मयूरासन अधिक नहीं करना चाहिए।
  3. आसन करते समय अधिक ज़ोर नहीं लगाना चाहिए। आसन करते समय शरीर सहज, स्थिर व आरामदायक स्थिति में रहना चाहिए।
  4. आसन का अभ्यास करते समय शरीर को धीरे-धीरे मोड़ना चाहिए। आसन करते समय जरक अथवा झटका नहीं लगाना चाहिए।
  5. आसन हमेशा प्रगति के सिद्धान्त के अनुसार करने चाहिए। पहले आसान आसन करने चाहिए। उसके पश्चात् कठिन आसनों का अभ्यास करना चाहिए।
  6. गर्भवती महिलाओं को और हृदय रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को कठिन आसन नहीं करने चाहिए।
  7. आसन करने वाला स्थान साफ और शांत होना चाहिए। सुबह का समय आसन करने के लिए सबसे उच्च माना जाता है।
  8. आसन खाना खाने के चार घण्टे बाद या निराहार रह कर करने चाहिए।

प्रश्न 4.
आसन क्या है ?
उत्तर-
ऋषि पतंजली के अनुसार आसन का अर्थ व्यक्ति की उस स्थिति से है जिसमें वह अधिक-से-अधिक समय आसानी से बैठ सके।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न-
आसनों के कोई तीन सिद्धान्त लिखें।
उत्तर-

  1. आसन करने के लिए आयु व लिंग का ध्यान रखना ज़रूरी है। बच्चों को अधिक कठोर आसन नहीं करने चाहिए, जिनसे उनकी शारीरिक वृद्धि प्रभावित हो।
  2. आसन करते समय अधिक ज़ोर नहीं लगाना चाहिए। आसन करते समय शरीर सहज, स्थिर व आरामदायक स्थिति में रहना चाहिए।
  3. आसन का अभ्यास करते समय शरीर को धीरे-धीरे मोड़ना चाहिए। आसन करते समय एक दम झटका नहीं देना चाहिए।

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बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न-
आसन के सिद्धान्त विस्तार से लिखें।
उत्तर-
आसन करने वाले व्यक्ति को कुछ सिद्धान्तों का पालन करना पड़ता है। इन सिद्धान्तों का पालन करने से हम आसनों से पूरा लाभ ले सकते हैं। ये सिद्धान्त इस प्रकार

  1. आसन करते समय मांसपेशियों में तनाव पैदा होना ज़रूरी है। तनाव से लचक पैदा होती है।
  2. आसन करते समय आयु और लिंग का ध्यान रखना आवश्यक है। बच्चों को कठोर आसन नहीं करने चाहिए जिससे उनके शरीर की वृद्धि में रुकावट न आ जाए। लड़कियों को मयूरासन अधिक नहीं करना चाहिए।
  3. आसन करते समय अधिक ज़ोर नहीं लगाना चाहिए। आसन करते समय शरीर सहज, स्थिर व आरामदायक स्थिति में रहना चाहिए।
  4. आसन का अभ्यास करते समय शरीर को धीरे-धीरे मोड़ना चाहिए। आसन करते समय जरक अथवा झटका नहीं लगाना चाहिए।
  5. आसन हमेशा प्रगति के सिद्धान्त के अनुसार करने चाहिए। पहले आसान आसन करने चाहिए। उसके पश्चात् कठिन आसनों का अभ्यास करना चाहिए।
  6. गर्भवती महिलाओं को और हृदय रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को कठिन आसन नहीं करने चाहिए।
  7. आसन करने वाला स्थान साफ और शांत होना चाहिए। सुबह का समय आसन करने के लिए सबसे उच्च माना जाता है।
  8. आसन खाना खाने के चार घण्टे बाद या निराहार रह कर करने चाहिए।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 2 धरातल

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 2 धरातल Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science Geography Chapter 2 धरातल

SST Guide for Class 10 PSEB धरातल Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित में से प्रत्येक प्रश्न का एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
भारत की प्रमुख भौतिक इकाइयों के नाम लिखिए।
उत्तर-
भारत की प्रमुख भौतिक इकाइयां हैं-(i) हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, (ii) उत्तरी विशाल मैदान, (iii) प्रायद्वीपीय पठार का क्षेत्र, (iv) तटीय मैदान, (v) भारतीय द्वीप।

प्रश्न 2.
हिमालय पर्वत श्रेणी का आकार कैसा है?
उत्तर-
हिमालय पर्वत श्रेणी का आकार एक उत्तल चाप (Convex Curve) जैसा है।

प्रश्न 3.
ट्रांस हिमालय की प्रमुख चोटियों के नाम बताइए।
उत्तर-
ट्रांस हिमालय की मुख्य चोटियां हैं-माऊंट के (K2), गाडविन ऑस्टिन, हिडन पीक, ब्राड पीक, गैशरबूम, राकापोशी तथा हरमोश।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 2 धरातल

प्रश्न 4.
बृहत् हिमालय में 8000 मीटर से अधिक ऊंची चोटियां कौन-कौन सी हैं?
उत्तर-
बृहत् हिमालय की 8000 मीटर से अधिक ऊंची चोटियां हैं-माऊंट एवरेस्ट (8848 मीटर), कंचन जंगा (8598 मीटर), मकालू (8481 मीटर), धौलागिरी (8172 मीटर), मनायशू, चोंउज, नागापर्वत तथा अन्नपूर्णा।

प्रश्न 5.
भारत की युवा एवं प्राचीन पर्वत मालाओं के नाम बताइए।
उत्तर-
हिमालय पर्वत भारत के युवा पर्वत हैं और यहां के प्राचीन पर्वत अरावली, विन्ध्याचल, सतपुड़ा आदि हैं।

प्रश्न 6.
देश में रिफ्ट या दरार घाटियां कहां मिलती हैं?
उत्तर-
भारत में दरार घाटियां प्रायद्वीपीय पठार में पाई जाती हैं।

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प्रश्न 7.
डेल्टा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
नदी द्वारा अपने मुहाने पर बने स्थल-रूप को डेल्टा कहते हैं।

प्रश्न 8.
भारत के मुख्य डेल्टाई क्षेत्रों के नाम बताओ।
उत्तर-
भारत के प्रमुख डेल्टाई क्षेत्र हैं-गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा क्षेत्र, गोदावरी नदी डेल्टा क्षेत्र, कावेरी नदी डेल्टा क्षेत्र, कृष्णा नदी डेल्टा क्षेत्र तथा महानदी का डेल्टा क्षेत्र।

प्रश्न 9.
हिमालय पर्वत के दरों के नाम बताइए।
उत्तर-
हिमालय पर्वत में पाये जाने वाले मुख्य दरै हैं-बुरजिल, जोझीला, लानक ला, चांग ला, खुरनक ला, बाटा खैपचा ला, शिपकी ला, नाथु ला, तत्कला कोट इत्यादि।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 2 धरातल

प्रश्न 10.
लघु हिमालय की मुख्य पर्वत श्रेणियों के नाम बताइए।
उत्तर-
लघु हिमालय की पर्वत श्रेणियां हैं-(i) कश्मीर में पीर पंजाल तथा नागा टिब्बा, (ii) हिमाचल में धौलाधार तथा कुमाऊं, (iii) नेपाल में महाभारत, (iv) उत्तराखण्ड में मसूरी, (v) भूटान में थिम्पू।

प्रश्न 11.
लघु हिमालय में स्थित स्वास्थ्यवर्धक घाटियों के नाम बताइए।
उत्तर-
लघु हिमालय के मुख्य स्वास्थ्यवर्धक स्थान शिमला, श्रीनगर, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग तथा चकराता हैं।

प्रश्न 12.
देश की प्रमुख ‘दून’ घाटियों के नाम बताइए।
उत्तर-
देश की मुख्य दून घाटियां हैं-देहरादून, पतली दून, कोथरीदून, ऊधमपुर, कोटली आदि।

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प्रश्न 13.
हिमालय क्षेत्र की पूर्वी किनारे वाली प्रशाखाओं (Eastern off shoots) के नाम बताइए।
उत्तर-
हिमालय की प्रमुख पूर्वी श्रेणियां पटकोई बम्म, गारो, खासी, जयन्तिया तथा त्रिपुरा की पहाड़ियां हैं।

प्रश्न 14.
उत्तर के विशाल मैदानों में नदियों द्वारा निर्मित प्रमुख भू-आकृतियों के नाम बताइए।
उत्तर-
उत्तरी मैदानों में नदियों द्वारा निर्मित भू-आकार हैं-जलोढ़ पंख, जलोढ़ शंकु, सर्पदार मोड़, दरियाई सीढ़ियां, प्राकृतिक बांध तथा बाढ़ के मैदान।।

प्रश्न 15.
ब्रह्मपुत्र के मैदानों का आकार (Size) क्या है?
उत्तर-
ब्रह्मपुत्र का मैदान 640 किलोमीटर लम्बा तथा 90 से 100 किलोमीटर तक चौड़ा है।

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प्रश्न 16.
अरावली पर्वत श्रेणी का विस्तार कहां से कहां तक है तथा इसकी सबसे ऊंची चोटी का नाम क्या है?
उत्तर-
अरावली पर्वत श्रेणी दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई है। इसकी सबसे ऊंची चोटी का नाम गुरु शिखर (1722 मीटर) है।

प्रश्न 17.
पश्चिमी घाट की ऊंची चोटियों के नाम बताओ।
उत्तर-
पश्चिमी घाट की ऊंची चोटियां हैं-वाणुला माला (2339 मी०), कुदरमुख (1894 मी०), पुष्पगिरी (1714 मी०), कालसुबाई (1646 मी०) इत्यादि।

प्रश्न 18.
पूर्वी घाट की दक्षिणी पहाड़ियों के नाम बताइए।
उत्तर-
जवद्दी (Jawaddi), गिन्गी, शिवराई, कौलईमाला, पंचमलाई, गोंडुमलाई इत्यादि पूर्वी घाट की दक्षिणी पहाड़ियां हैं।

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प्रश्न 19.
अन्नाई मुदी की पर्वत गांठ पर कौन-कौन सी पर्वत श्रेणियां आकर मिलती हैं?
उत्तर-
कार्डमम या ईलामी (Elami), अन्नामलाई तथा पलनी।

प्रश्न 20.
दक्षिणी पठार के पहाड़ी भागों पर कौन-कौन से रमणीय स्थान ( हिल स्टेशन) हैं?
उत्तर-
दोदाबेटा, ऊटाकमुंड, पलनी तथा कोडाईकनाल।

प्रश्न 21.
उत्तर-पूर्वी तटवर्ती मैदान के उप-भागों के नाम बताओ।
उत्तर-
उत्तर-पूर्वी तटीय मैदान के उप-भाग हैं- (i) उड़ीसा के मैदान, (ii) उत्तरी सरकार।

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प्रश्न 22.
अरब सागर में मिलने वाले द्वीपों के नाम बताओ।
उत्तर-
अरब सागर में स्थित उत्तरी द्वीपों को अमीनदिवी (Aminodivi), मध्यवर्ती द्वीपों को लक्काद्वीप तथा दक्षिणी भाग को मिनीकोय कहा जाता है।

प्रश्न 23.
देश के तट के समीप द्वीपों के नाम बताओ।
उत्तर-
देश के तट के समीप सागर, शोरट, न्युमूर, भासरा, मंढापस, ऐलिफैंटा, दीव (Diu) आदि द्वीप मिलते हैं।

प्रश्न 24.
देश का दक्षिणी बिन्द कहां स्थित है?
उत्तर-
देश का दक्षिणी बिन्दु ग्रेट निकोबार के इंदिरा प्वाइंट (Indira Point) पर स्थित है।

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II. निम्नलिखित प्रश्नों का संक्षिप्त उत्तर दो —

प्रश्न 1.
हिमालय पर्वत माला एवं दक्षिण के पठार के बीच क्या कुछ समानताएं पायी जाती हैं?
उत्तर-
हिमालय पर्वत तथा दक्षिण के पठार में निम्नलिखित समानताएं पायी जाती हैं

  1. हिमालय पर्वत का निर्माण दक्षिणी पठार की उपस्थिति के कारण हुआ है।
  2. प्रायद्वीपीय पठार की पहाड़ियां, भ्रंश घाटियां तथा अपभ्रंश हिमालय पर्वत श्रृंखला से आने वाले दबाव के कारण बनी है।
  3. हिमालय पर्वतों की भान्ति दक्षिणी पठार में भी अनेक खनिज पदार्थ पाये जाते हैं।
  4. इन दोनों भौतिक भागों में वन पाये जाते हैं जो देश में लकड़ी की मांग को पूरा करते हैं।

प्रश्न 2.
क्या हिमालय पर्वत अभी भी युवा अवस्था में है?
उत्तर-
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि हिमालय पर्वत अभी भी युवा अवस्था में है। इनकी उत्पत्ति नदियों द्वारा टैथीज सागर में बिछाई गई तलछट से हुई है। बाद में इसके दोनों ओर स्थित भूखण्डों के एक-दूसरे की ओर खिसकने से तलछट में मोड़ पड़ गया जिससे हिमालय पर्वतों के रूप में ऊपर उठ आए। आज भी ये पर्वत ऊंचे उठ रहे हैं। इसके अतिरिक्त इन पर्वतों का निर्माण देश के अन्य पर्वतों की तुलना में काफ़ी बाद में हुआ। अतः हम कह सकते हैं कि हिमालय पर्वत अभी भी अपनी युवा अवस्था में हैं।

प्रश्न 3.
बृहत् हिमालय की धरातलीय विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
महान् हिमालय पश्चिम में सिन्धु नदी की घाटी से लेकर उत्तर-पूर्व में ब्रह्मपुत्र की दिहांग घाटी तक फैला हुआ है। इसकी मुख्य धरातलीय विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है-

  1. यह देश की सबसे लम्बी तथा रची पर्वत श्रेणी है। इसमें ग्रेनाइट तथा नीस जैसी परिवर्तित रवेदार चट्टानें मिलती
  2. इसकी चोटियां बहुत ऊंची हैं। संसार की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माऊंट एवरेस्ट (8848 मीटर) इसी पर्वत श्रृंखला में स्थित है। यहां की चोटियां सदा बर्फ से ढकी रहती हैं।
  3. इसमें अनेक रे हैं जो पर्वतीय मार्ग जुटाते हैं।
  4. इसमें काठमाण्डू तथा कश्मीर जैसी महत्त्वपूर्ण घाटियां स्थित हैं।

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प्रश्न 4.
उत्तरी विशाल मैदानी भाग में किस-किस जलोढ़ी मैदान का निर्माण हुआ है?
उत्तर-
उत्तरी विशाल मैदान में निम्नलिखित जलोढ़क मैदानों का निर्माण हुआ है —

  1. खादर के मैदान,
  2. बांगर के मैदान,
  3. भाबर के मैदान,
  4. तराई के मैदान,
  5. बंजर मैदान।

प्रश्न 5.
थार मरुस्थल पर एक संक्षिप्त भौगोलिक लेख लिखो।
उत्तर-
थार मरुस्थल पंजाब तथा हरियाणा के दक्षिणी भागों से लेकर गुजरात के रण ऑफ़ कच्छ तक फैला हुआ है। यह मरुस्थल समतल तथा शुष्क है। अरावली पर्वत श्रेणी इसकी पूर्वी सीमा बनाती है। इसके पश्चिम में अन्तर्राष्ट्रीय सीमा लगती है। यह लगभग 640 कि० मी० लम्बा तथा 300 कि० मी० चौड़ा है। अति प्राचीन काल में यह क्षेत्र समुद्र के नीचे दबा हुआ था। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि यह मरुस्थल किसी समय उपजाऊ रहा होगा। परन्तु वर्षा की मात्रा बहुत कम होने के कारण आज यह क्षेत्र रेत के बड़े-बड़े टीलों में बदल गया है।

प्रश्न 6.
स्थिति के आधार पर भारतीय द्वीपों को कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-
स्थिति के अनुसार भारत के द्वीपों को दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता है-तट से दूर स्थित द्वीप तथा तट के निकट स्थित द्वीप।

  1. तट से दूर स्थित द्वीप-इन द्वीपों की कुल संख्या 230 के लगभग है। ये समूहों में पाये जाते हैं। दक्षिणी-पूर्वी अरब सागर में स्थित ऐसे द्वीपों का निर्माण प्रवाल भित्तियों के जमाव से हुआ है। इन्हें लक्षद्वीप कहते हैं। अन्य द्वीप क्रमशः अमीनदिवी, लक्काद्वीप तथा मिनीकोय के नाम से प्रसिद्ध हैं। बंगाल की खाड़ी में तट से दूर स्थित द्वीपों के नाम हैं-अण्डमान द्वीप समूह, निकोबार, नारकोडम तथा बैरन आदि।
  2. तट के निकट स्थित द्वीप-इन द्वीपों में गंगा के डेल्टे के निकट स्थित सागर, शोरट, ह्वीलर, न्युमूर आदि द्वीप शामिल हैं। इस प्रकार के अन्य द्वीप हैं-भासरा, दीव, बन, ऐलिफंटा इत्यादि।

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प्रश्न 7.
तटवर्ती मैदानों की देश को क्या महत्त्वपूर्ण देन है ?
उत्तर-
तटीय मैदानों की देश को निम्नलिखित देन है —

  1. तटीय मैदान बढ़िया किस्म के चावल, खजूर, नारियल, मसालों, अदरक, लौंग, इलायची आदि की कृषि के लिए विख्यात हैं।
  2. ये मैदान अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अग्रणी हैं।
  3. इन मैदानों से समस्त देश में बढ़िया प्रकार की समुद्री मछलियां भेजी जाती हैं।
  4. तटीय मैदानों में स्थित गोआ, तमिलनाडु तथा मुम्बई के समुद्री बीच पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं।
  5. देश में प्रयोग होने वाला नमक पश्चिमी तटीय मैदानों में तैयार किया जाता है।

प्रश्न 8.
हिमालय क्षेत्रों का देश के विकास में योगदान बताइए।
उत्तर-
हिमालय क्षेत्रों का देश के विकास में निम्नलिखित योगदान है —

  1. वर्षा-हिन्द महासागर से उठने वाली मानसून पवनें हिमालय पर्वत से टकरा कर खूब वर्षा करती हैं। इस प्रकार यह उत्तरी मैदान में वर्षा का दान देता है। इस मैदान में पर्याप्त वर्षा होती है।
  2. उपयोगी नदियां-उत्तरी भारत में बहने वाली गंगा, यमुना, सतलुज, ब्रह्मपुत्र आदि सभी मुख्य नदियां हिमालय पर्वत से ही निकलती हैं। ये नदियां सारा साल बहती हैं। शुष्क ऋत में हिमालय की बर्फ इन नदियों को जल देती है।
  3. फल तथा चाय-हिमालय की ढलानें चाय की खेती के लिए बड़ी उपयोगी हैं। इनके अतिरिक्त पर्वतीय ढलानों पर फल भी उगाए जाते हैं।
  4. उपयोगी लकडी-हिमालय पर्वत पर घने वन पाये जाते हैं। ये वन हमारा धन हैं। इनसे प्राप्त लकड़ी पर भारत के अनेक उद्योग निर्भर हैं। यह लकड़ी भवन निर्माण कार्यों में भी काम आती है।
  5. अच्छे चरागाह-हिमालय पर हरी-भरी चरागाहें मिलती हैं। इनमें पशु चराये जाते हैं।
  6. खनिज पदार्थ-इन पर्वतों में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ पाए जाते हैं।

प्रश्न 9.
प्रायद्वीपीय पठार देश के अन्य भागों को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर-

  1. प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन गोंडवाना लैंड का भाग है। इसी से निकलने वाली नदियों ने पहले हिमालय का निर्माण किया और फिर हिमालय तथा अपने यहां से बहने वाली नदियों के तलछट से विशाल उत्तरी मैदानों का निर्माण किया।
  2. प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर घाटों पर बने जल-प्रपात तटीय मैदानों को सिंचाई के लिए जल तथा औद्योगिक विकास के लिए बिजली देते हैं।
  3. यहां के वन देश के अन्य भागों में लकड़ी की मांग को पूरा करते हैं।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट करें(i) तराई और भाबर, (ii) बांगर और खादर।
उत्तर-

  1. तराई और भाबर–भाबर वे मैदानी प्रदेश होते हैं जहां नदियां पहाड़ों से निकलते ही तुरन्त मैदानी प्रदेश .में प्रवेश करती हैं और अपने साथ लाए रेत, कंकड़, बजरी, पत्थर आदि का यहां निक्षेप करती हैं। भाबर क्षेत्र में नदियां भूमि तल पर बहने की बजाए भूमि के नीचे बहती हैं। जब भाबर मैदानों की भूमिगत नदियां पुनः भूमि पर उभरती हैं, तो ये दलदली क्षेत्रों का निर्माण करती हैं। शिवालिक पहाड़ियों के समानान्तर फैली इस आर्द्र तथा दलदली भूमि की पट्टी को तराई प्रदेश कहते हैं। यहां घने वन भी पाये जाते हैं तथा जंगली जीव जन्तु भी अधिक संख्या में मिलते हैं।
  2. बांगर और खादर-उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल में बहने वाली नदियों में प्रत्येक वर्ष बाढ़ आ जाती है और वे अपने आस-पास के क्षेत्रों में मिट्टी की नई परतें बिछा देती हैं। बाढ़ से प्रभावित इस तरह के मैदानों को खादर के मैदान कहा जाता है। – बांगर वह ऊंची भूमि होती है जो बाढ़ के पानी से प्रभावित नहीं होती और जिसमें चूने के कंकड़-पत्थर अधिक मात्रा में मिलते हैं। इसे रेह तथा कल्लर भूमि भी कहते हैं।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दें —

प्रश्न 1.
भारत को धरातलीय आधार पर विभिन्न भागों में बांटो तथा किसी एक भाग का विस्तार से वर्णन करो।
उत्तर-
धरातल के आधार पर भारत को हम पाँच भौतिक विभागों में बांट सकते हैं —

  1. हिमालय पर्वतीय क्षेत्र
  2. विशाल उत्तरी मैदान
  3. प्रायद्वीपीय पठार का क्षेत्र
  4. तट के मैदान
  5. भारतीय द्वीप।

इनमें से हिमालय पर्वतीय क्षेत्र का वर्णन इस प्रकार है —
हिमालय पर्वतीय क्षेत्र-हिमालय पर्वत भारत की उत्तरी सीमा पर एक चाप के रूप में फैले हैं। पूर्व से पश्चिम तक इसकी लम्बाई 2400 कि० मी तथा चौड़ाई 240 से 320 कि० मी० तक है।
ऊंचाई के आधार पर हिमालय पर्वतों को निम्नलिखित पाँच उपभागों में बांटा जा सकता है —

  1. ट्रांस हिमालय-इस विशाल पर्वत-श्रेणी का अधिकांश भाग तिब्बत में होने के कारण इसे तिब्बती हिमालय भी कहा जाता है। इसकी कुल लम्बाई 970 कि० मी० तथा चौड़ाई (किनारों पर) 40 किमी० है। इन पर्वतों की औसत ऊंचाई 6100 मी० है। माऊंट K2 तथा गॉडविन ऑस्टिन (8611 मी०) इन पर्वतों की सबसे ऊंची चोटियां हैं।
  2. महान् हिमालय-यह भारत की सबसे लम्बी तथा ऊंची पर्वत-श्रेणी है। इसकी लम्बाई 2400 कि० मी० तथा चौड़ाई 100 से 200 कि० मी० तक है। इसकी औसत ऊंचाई 6000 मीटर है। संसार की सबसे ऊंची चोटी माऊंट एवरेस्ट (8848 मी०) इसी पर्वत श्रेणी में स्थित है।
  3. लघु-हिमालय-इसे मध्य हिमालय भी कहा जाता है। इसकी औसत ऊंचाई 3500 मी० से लेकर 5000 मी० तक है। इस पर्वत श्रेणी की ऊंची चोटियां शीत ऋतु में बर्फ से ढक जाती हैं। यहां शिमला, श्रीनगर, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग, चकराता आदि स्वास्थ्यवर्धक स्थान पाये जाते हैं।
  4. बाह्य हिमालय-इस पर्वत श्रेणी को शिवालिक श्रेणी, उप-हिमालय तथा दक्षिणी हिमालय के नाम से भी पुकारा जाता है। इन पर्वतों के दक्षिण में कई झीलें पायी जाती थीं। बाद में इनमें मिट्टी भर गई और इन्हें दून (Doon) (पूर्व में इन्हें द्वार (Duar) कहा जाता है) कहा जाने लगा। इनमें देहरादून, पतलीदून, कोथरीदून, ऊधमपुर, कोटली आदि शामिल हैं।
  5. पहाड़ी शाखाएं-हिमालय पर्वतों की दो शाखाएं हैं-पूर्वी शाखाएं तथा पश्चिमी शाखाएं।
    पूर्वी शाखाएं-इन शाखाओं को पूर्वांचल भी कहा जाता है।
    इन शाखाओं में ढ़फा बुम, पटकाई बुम, गारो, खासी, जैंतिया तथा त्रिपुरा की पहाड़ियां सम्मिलित हैं।
    पश्चिमी शाखाएं-उत्तर-पश्चिम में पामीर की गांठ से हिमालय की दो उपशाखाएं बन जाती हैं। एक शाखा पाकिस्तान की साल्ट रेंज, सुलेमान तथा किरथर होते हुए दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर तक पहुंचती है। दूसरी शाखा अफ़गानिस्तान में स्थित हिम्दुकुश तथा कॉकेशस पर्वत श्रेणी से जा मिलती है।

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प्रश्न 2.
हिमालय की उत्पत्ति एवं बनावट पर लेख लिखो और बताइए कि क्या हिमालय अभी भी बढ़ रहे हैं?
उत्तर-
हिमालय की उत्पत्ति तथा बनावट का वर्णन इस प्रकार है —
उत्पत्ति-जहां आज हिमालय है, वहां कभी टैथीज (Tythes) नाम का सागर लहराता था। यह दो विशाल भू-खण्डों से घिरा एक लम्बा और उथला सागरं था। इसके उत्तर में अंगारा लैंड और दक्षिण में गोंडवानालैंड नाम के दो भू-खण्ड थे। लाखों वर्षों तक इन दो भू-खण्डों का अपरदन होता रहा। अपरदित पदार्थ अर्थात् कंकड़, पत्थर, मिट्टी, गाद आदि टैथीज सागर में जमा होते रहे। ये दो विशाल भू-खण्ड धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर खिसकते रहे। सागर में जमी मिट्टी आदि की परतों में मोड़ (वलय) पड़ने लगे। ये वलय द्वीपों की एक श्रृंखला के रूप में उभर कर पानी की सतह से ऊपर आ गये। कालान्तर में विशाल वलित पर्वत श्रेणियों का निर्माण हुआ, जिन्हें हम आज हिमालय के नाम से पुकारते हैं।
बनावट-हिमालय पर्वतीय क्षेत्र एक उत्तल चाप (Convex Curve) जैसा दिखाई देता है जिसका मध्यवर्ती भाग नेपाल की सीमा तक शुकी हुआ है। इसके उत्तर-पश्चिमी किनारे सफ़ेद कोह, सुलेमान तथा किरथर की पहाड़ियों द्वारा अरब सागर में पहुंच जाते हैं। इसी प्रकार के उत्तर-पूर्वी किनारे टैनेसरीम पर्वत श्रेणियों के माध्यम से बंगाल की खाड़ी तक पहुंच जाते हैं।
हिमालय पर्वतों की दक्षिणी ढाल भारत की ओर है। यह ढाल बहुत ही तीखी है। परन्तु इसकी उत्तरी ढाल साधारण है। यह चीन की ओर है। दक्षिणी ढाल के अधिक तीखा होने के कारण इस पर जल-प्रपात तथा तंग नदी-घाटियां पाई जाती हैं।
ऊंचाई की दृष्टि से हिमालय की पर्वत श्रेणियों को पांच उपभागों में बांटा जा सकता है-

  1. ट्रांस हिमालय,
  2. महान् हिमालय,
  3. लघु हिमालय,
  4. बाह्य हिमालय तथा
  5. पहाड़ी शाखाएं।

हिमालय पर्वत की मुख्य विशेषता यह है कि ये आज भी ऊंचे उठ रहे हैं।

प्रश्न 3.
पश्चिमी एवं पूर्वी तटीय मैदानों की तुलना करो।
उत्तर-
पश्चिमी तथा पूर्वी तटीय मैदानों की आपसी तुलना इस प्रकार की जा सकती है —

पश्चिमी मैदान पूर्वी मैदान
(1) इनके पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में पश्चिमी घाट की पहाड़ियां हैं। (1) पूर्वी तट के मैदानों के पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा | पश्चिम में पूर्वी घाट की पहाड़ियां हैं।
(2) इन मैदानों की लम्बाई 1500 कि० मी० और चौड़ाई 30 से 80 कि० मी० है। इन मैदानों में डेल्टाई निक्षेप का अभाव है। (2) इन मैदानों की लम्बाई 2000 कि० मी० है और इनकी औसत चौड़ाई 150 कि० मी० है। ये अपेक्षाकृत अधिक चौड़े हैं तथा इनमें जलोढ़ मिट्टी का निक्षेप है।
(3) पश्चिमी मैदानों को धरातलीय विस्तार के आधार पर चार भागों में बांटते हैं-गुजरात का तटीय मैदान, कोंकण का तटीय मैदान, मालाबार तट का मैदान, केरल का मैदान। (3) पूर्वी तटीय मैदान के दो भाग हैं-उत्तरी तटीय मैदान तथा दक्षिण तटीय मैदान। उत्तरी मैदान को उत्तरी सरकार या गोलकुण्डा या काकीनाडा भी कहते हैं। दक्षिण तटीय मैदान को कोरोमण्डल तट भी कहते है।
(4) इन मैदानों में नर्मदा तथा ताप्ती नदियां बहती हैं। ये डेल्टा बनाने की बजाए ज्वारनदमुख बनाती है। (4) इस मैदान की प्रमुख नदियां महानदी, कावेरी, गोदावरी | तथा कृष्णा हैं।
(5) पश्चिमी मैदान में ग्रीष्म काल में वर्षा होती है। यह वर्षा दक्षिण-पश्चिम पवनों के कारण होती है। (5) इस मैदान में शरद् ऋतु में वर्षा होती है। यह वर्षा | उत्तर-पूर्वी पवनों के कारण होती है।

 

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प्रश्न 4.
देश के उत्तरी विशाल मैदानों के आकार, जन्म एवं क्षेत्रीय विभाजन का वर्णन करो।
उत्तर-
भारत के उत्तरी विशाल मैदानों के आकार, जन्म तथा क्षेत्रीय विभाजन का वर्णन इस प्रकार है —
आकार-रावी नदी से लेकर गंगा नदी के डैल्टे तक इस मैदान की कुल लम्बाई लगभग 2400 कि० मी० तथा चौड़ाई 100 से 500 कि० मी० तक है। समुद्र तल से इसकी औसत ऊंचाई 180 मी० के लगभग है। अनुमान है कि इसकी गहराई 5 कि० मी० से लेकर 32 कि० मी० तक है। इसका कुल क्षेत्रफल 7.5 लाख वर्ग कि० मी० है।
जन्म-भारत का उत्तरी मैदान उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में विशाल प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियों द्वारा बहाकर लाई हुई मिट्टी से बना है। लाखों, करोड़ों वर्ष पहले भू-वैज्ञानिक काल में उत्तरी मैदान के स्थान पर टैथीज नामक एक सागर लहराता था। इस सागर से विशाल वलित पर्वत श्रेणियों का निर्माण हुआ, जिन्हें हम हिमालय के नाम से पुकारते हैं। हिमालय की ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ उस पर नदियां तथा अनाच्छादन के दूसरे कारक सक्रिय हो गए। इन कारकों ने पर्वत प्रदेश का अपरदन किया और यह भारी मात्रा में गाद ला-ला कर टैथीज सागर में जमा करने लगे। सागर सिकुड़ने लगा। नदियां जो मिट्टी इसमें जमा करती रहीं, वह बारीक पंक जैसी थी। इस मिट्टी को जलोढ़क कहते हैं। अतः टैथीज सागर के स्थान पर जलोढ़ मैदान अर्थात् उत्तरी मैदान का निर्माण हुआ।
क्षेत्रीय विभाजन-उत्तरी विशाल मैदान को निम्नलिखित चार क्षेत्रों में बांटा जा सकता है —

  1. पंजाब हरियाणा का मैदान- इस मैदान का निर्माण सतलुज, रावी, ब्यास तथा घग्घर नदियों द्वारा लाई गई मिट्टियों से हुआ है। इसमें बारी दोआब, बिस्त दोआब, मालवा का मैदान तथा हरियाणा का मैदान शामिल है।
  2. थार मरुस्थल का मैदान-पंजाब तथा हरियाणा के दक्षिणी भागों से लेकर गुजरात में स्थित कच्छ की रण तक के इस मैदान को थार मरुस्थल का मैदान कहते हैं।
  3. गंगा का मैदान-गंगा का मैदान उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल में स्थित है।
  4. ब्रह्मपुत्र का मैदान-इसे असम का मैदान भी कहा जाता है। यह असम की पश्चिमी सीमा से लेकर असम के अति उत्तरी भाग सादिया (Sadiya) तक लगभग 640 किलोमीटर तक फैला हुआ है।

प्रश्न 5.
प्रायद्वीपीय पठार का विस्तार एवं धरातलीय रचना क्या है ? ढलान को आधार मानकर इसके उपभागों का विवरण दें।
उत्तर-
प्रायद्वीपीय पठार उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वत से लेकर उत्तर-पूर्व में शिलांग के पठार तक फैला हुआ है। दक्षिण में यह त्रिकोणीय आकार में कन्याकुमारी तक विस्तृत है। इस कठोर भू-भाग ने भारत के धरातलीय भाग का 50% भाग अपनी लपेट में लिया हुआ है। इसका क्षेत्रफल 16 लाख वर्ग कि० मी० है और इसकी औसत ऊंचाई 600 से 900 मीटर तक है।
रचना-प्रायद्वीपीय पठार का जन्म कई करोड़ वर्ष पूर्व प्रीकैम्बरीअन काल में हुआ। यह लावा के ठण्डा होने से बना है। इसकी पर्वत श्रेणियों तथा पठारी भागों में नाईस, क्वार्टज़ तथा संगमरमर जैसी कठोर शैलें पाई जाती हैं।
विभाजन-इसके उत्तरी भाग को मालवा का पठार तथा दक्षिण भाग को दक्कन का पठार कहते हैं। दक्कन के पठार की ढाल दक्षिण पूर्व से उत्तर-पूर्व की ओर है। ___ मालवा का पठार-मालवा के पठार में बनास, चम्बल, केन तथा बेतवा नदियां बहती हैं। इसमें खनिज पदार्थ अधिक मात्रा में मिलते हैं। इसकी औसत ऊंचाई 900 मीटर है। पारसनाथ (1365 मीटर) यहां की सबसे ऊंची चोटी है। मालवा के पठार में पाई जाने वाली तीन श्रेणियां हैं-अरावली श्रेणी, विन्ध्याचल श्रेणी, सतपुड़ा श्रेणी।
दक्कन का पठार-इसकी औसत ऊंचाई 300 से 900 मीटर तक है। इसके धरातल को मौसमी नदियों ने कांटछांट कर सात स्पष्ट भागों में बांटा हुआ है-महाराष्ट्र का टेबल लैंड, दंडकारणय-छत्तीसगढ़ क्षेत्र, तेलंगाना का पठार, कर्नाटक का पठार, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, दक्षिणी पहाड़ी समूह । पश्चिमी घाट की ऊंचाई 1200 मीटर और पूर्वी घाट की 500 मीटर है। दक्षिण भारत की सभी महत्त्वपूर्ण नदियां पश्चिमी घाट से निकलती हैं। पश्चिमी और पूर्वी घाट जहां जाकर मिलते हैं, उन्हें नीलगिरि पर्वत कहते हैं। इन पर्वतों की सबसे ऊंची चोटी दोदावेटा है, जो 2637 मीटर ऊंची है।
सच तो यह है कि प्रायद्वीपीय पठार खनिज पदार्थों का भण्डार है और इसका भारत की आर्थिकता में बड़ा महत्त्व है।

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प्रश्न 6.
हिमालय व प्रायद्वीपीय पठार के धरातली लक्षणों की तुलना करें व अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर-
हिमालय तथा प्रायद्वीपीय पठार की तुलना भूगोल की दृष्टि से बड़ी रोचक है।

  1. बनावट-हिमालय तलछटी शैलों से बना है और यह संसार का सबसे युवा पर्वत है। इसकी ऊंचाई भी सबसे अधिक है। इसकी औसत ऊंचाई 5100 मीटर है।
    इसके विपरीत प्रायद्वीपीय पठार का जन्म आज से 50 करोड़ वर्ष पूर्व प्रिकैम्बरीअन महाकाल में हुआ था। ये आग्नेय शैलों से निर्मित हुआ है। इस पठार की औसत ऊंचाई 600 से 900 मीटर तक है।
  2. विस्तार-हिमालय जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ है। इसके पूर्व में पूर्वी श्रेणियां और पश्चिम में पश्चिमी श्रेणियां हैं। पूर्वी श्रेणियों में खासी, गारो, जयन्तिया तथा पश्चिमी श्रेणियों में हिन्दुकुश तथा किरथर श्रेणियां पाई जाती हैं। हिमालय के पांच भाग हैं-ट्रांस हिमालय, महान् हिमालय, लघु हिमालय, बाह्य हिमालय तथा पहाड़ी शाखाएं।
    इस के विपरीत प्रायद्वीपीय पठार के दो भाग हैं-मालवा का पठार तथा दक्कन का पठार। ये अरावली पर्वत से लेकर शिलांग के पठार तक तथा दक्षिण में कन्याकुमारी तक फैला हुआ है। इसमें पाई जाने वाली प्रमुख पर्वत श्रेणियां हैंअरावली पर्वत श्रेणी, विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी तथा सतपुड़ा पर्वत श्रेणी।
    इसके अतिरिक्त यहां पूर्वी घाट की पहाड़ियां, पश्चिमी घाट की पहाड़ियां तथा नीलगिरि पर्वत आदि पाये जाते हैं।
  3. नदियां-हिमालय से निकलने वाली नदियां बर्फीले पर्वतों से निकलने के कारण सारा साल बहती हैं। प्रायद्वीपीय पठार की नदियां बरसाती नदियां हैं। शुष्क ऋतु में इनमें पानी का अभाव हो जाता है।
  4. आर्थिक महत्त्व-प्रायद्वीपीय पठार में अनेक प्रकार के खनिज पाये जाते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पर नोट लिखो(क) विन्ध्याचल, (ख) सतपुड़ा, (ग) अरावली पर्वत, (घ) सप्तक पठार (ङ) नीलगिरि।
उत्तर-
(क) विन्ध्याचल-विन्ध्याचल पर्वत श्रेणियों का पश्चिमी भाग लावे से बना है। इसका पूर्वी भाग कैमूर तथा भानरेर की श्रेणियां कहलाता है। इसकी दक्षिणी ढलानों के पास नर्मदा नदी बहती है।
(ख) सतपुड़ा-सतपुड़ा की पहाड़ियां नर्मदा नदी के दक्षिण किनारे के साथ-साथ पूर्व में महादेव तथा मैकाल की पहाड़ियों के सहारे बिहार में स्थित छोटा नागपुर की पहाड़ियों तक जा पहुंचती हैं। इसकी मुख्य चोटियां हैं-धूपगढ़ (1350 मी०) तथा अमरकंटक (1127 मी०) ! इस पर्वत श्रेणी की औसत ऊँचाई 1120 मी० है।
(ग) अरावली पर्वत-अरावली पर्वत श्रेणी दिल्ली से गुजरात तक 725 कि० मी० की लम्बाई में फैला हुआ है। इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम है और यहां अब पहाड़ियों के बचे-खुचे टुकड़े ही रह गये हैं। इसकी सबसे ऊंची चोटी माऊंट आबू (1722 मी०) है।
(घ) सप्तक पठार-पश्चिम में अरावली पर्वत, उत्तर में बुन्देलखण्ड तथा बघेलखण्ड, पूर्व में छोटा नागपुर, राजमहल की पहाड़ियां तथा शिलांग के पठार तक और दक्षिण की ओर सतपुड़ा की पहाड़ियों तक घिरा हुआ पठार मालवा का पठार कहलाता है। इसका शीर्ष शिलांग के पठार पर है। इस पठार की उत्तरी सीमा अवतल चाप की तरह है। इस पठार में बनास, चम्बल, केन तथा बेतवा नामक नदियां बहती हैं। इसकी औसत ऊंचाई 900 मी० है। पारसनाथ तथा नैत्रहप्पाट इसकी मुख्य चोटियां हैं। इसकी तीन पर्वत श्रेणियां हैं- अरावली पर्वत श्रेणी, विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी तथा सतपुड़ा पर्वत श्रेणी।।
(ङ) नीलगिरि-पश्चिमी घाट की पहाड़ियां तथा पूर्वी घाट की पहाड़ियां दक्षिण में जहां जाकर आपस में मिलती हैं, उन्हें दक्षिणी पहाड़ियां या नीलगिरि की पहाड़ियां कहते हैं। इन्हें नीले पर्वत भी कहते हैं। इनकी औसत ऊंचाई 1220 मी० है।

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प्रश्न 8.
“क्या भारत के अलग-अलग भौतिक अंश आज़ाद इकाइयां हैं तथा एक-दूसरे के पूरक हैं ?” व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं कि भारत की भिन्न-भिन्न भौतिक इकाइयां एक-दूसरे की पूरक हैं। वे देखने में अलग अवश्य लगते हैं, परन्तु उनका अस्तित्व अलग नहीं है। यदि हम उनके जन्म और उनके मिलने वाले प्राकृतिक भण्डारों का अध्ययन करें तो स्पष्ट हो जायेगा कि वे पूरी तरह एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
(क) जन्म-

  1. हिमालय पर्वत का जन्म ही प्रायद्वीपीय पठार के अस्तित्व में आने के पश्चात् हुआ है।
  2. उत्तरी मैदानों का जन्म उन निक्षेपों से हुआ है, जिनके लिए प्रायद्वीपीय पठार तथा हिमालय पर्वत की नदियां उत्तरदायी हैं।
  3. प्रायद्वीपीय पठार की पहाड़ियां, दरार घाटियां तथा अपभ्रंश हिमालय के दबाव के कारण ही अस्तित्व में आए हैं।
  4. तटीय मैदानों का जन्म प्रायद्वीपीय घाटों की मिट्टी से हुआ है।

(ख) प्राकृतिक भण्डार-

  1. हिमालय पर्वत बर्फ का घर है। इसकी नदियां जल प्रपात बनाती हैं और इनसे जो बिजली बनाई जाती है, उसका उपयोग पूरा देश करता है।
  2. भारत के विशाल मैदान उपजाऊ मिट्टी के कारण पूरे देश के लिए अन्न का भण्डार है। इसमें बहने वाली गंगा नदी सारे भारत को प्रिय है।
  3. प्रायद्वीपीय पठार में खनिजों का खज़ाना दबा पड़ा है। इसमें लोहा, कोयला, तांबा, अभ्रक, मैंगनीज़ आदि कई प्रकार के खनिज दबे पड़े हैं, जो देश के विकास के लिए अनिवार्य हैं।
  4. तटीय मैदान देश को चावल, मसाले, अदरक, लौंग, इलायची जैसे व्यापारिक पदार्थ प्रदान करते हैं।
    सच तो यह है कि देश की भिन्न-भिन्न इकाइयां एक दूसरे की पूरक हैं और ये देश के आर्थिक विकास में अपना विशेष योगदान देती हैं।

IV. भारत के नक्शे पर दिखाएं:

1. कराकोरम, जस्कर, कैलाश, पीरपंजाल और शिवालिक पर्वतीय श्रेणियां।
2. कोरोमंडल, कोंकण और मालाबार तटवर्ती हिस्से।
3. थाल घाट, भोर घाट और पाल घाट के रास्ते।
4. जाजीला, नाथुला, जलेपला तथा शिपकी ला दरे।
5. माऊंट आबू, दार्जिलिंग, शिमला, पर्यटन केंद्र।
6. माऊंट एवरेस्ट, नन्दा देवी, कंचनजंगा, माऊँट गाडविन, असटिन।
उत्तर-
विद्यार्थी अध्यापक की सहायता से स्वयं करें।

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PSEB 10th Class Social Science Guide धरातल Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
भारत के प्रायद्वीपीय भाग को देश की प्राकृतिक बनावट का केन्द्र क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
इसका कारण यह है कि भारत के प्रायद्वीपीय भाग ने देश के सम्पूर्ण धरातल के निर्माण में योगदान दिया है।

प्रश्न 2.
हिमालय का क्या अर्थ है?
उत्तर-
हिमालय का अर्थ है-हिम (बर्फ) का घर।

प्रश्न 3.
ट्रांस हिमालय को ‘तिब्बत हिमालय’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
इसका कारण यह है कि ट्रांस हिमालय का अधिकतर भाग तिब्बत में है।

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प्रश्न 4.
ट्रांस हिमालय की औसत ऊंचाई कितनी है?
उत्तर-
ट्रांस हिमालय की औसत ऊंचाई 6100 मीटर है।

प्रश्न 5.
दून किसे कहते हैं?
उत्तरं-
‘दून’ बाह्य हिमालय में स्थित वे झीलें हैं जो मिट्टी से भर गई हैं।

प्रश्न 6.
हिमालय की पूर्वी शाखाओं की किन्हीं दो प्रमुख ऊंची चोटियों के नाम बताओ।
उत्तर-
दफा बम्म (4578 मी०) तथा सारामती (3926 मी०) हिमालय की पूर्वी शाखाओं की दो प्रमुख चोटियां हैं।

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प्रश्न 7.
विश्व की सबसे ऊंची पर्वत चोटी कौन-सी है?
उत्तर-
माऊंट एवरेस्ट।

प्रश्न 8.
माऊंट एवरेस्ट समुद्रतल से कितनी ऊंची है?
उत्तर-
8848 मी०।

प्रश्न 9.
ब्रह्मपुत्र के मैदान की लम्बाई तथा चौड़ाई बताओ।
उत्तर-
इस मैदान की लम्बाई 640 किलोमीटर और चौड़ाई 90 से 100 किलोमीटर तक है।

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प्रश्न 10.
भारत के प्रायद्वीपीय पठार का शीर्ष बिन्दु कौन-सा है?
उत्तर-
कन्याकुमारी।

प्रश्न 11.
नागपुर के पठार की कोई एक विशेषता लिखो।
उत्तर-
लावे से बना यह पठार कटा-फटा है।

प्रश्न 12.
पश्चिमी घाट के दरों के नाम लिखो।
उत्तर-
थाल घाट, भोर घाट तथा पाल घाट पश्चिमी घाट के दरें हैं।

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प्रश्न 13.
जोग झरना कहां है और यह कितना ऊंचा है?
उत्तर-
जोग झरना शरावती नदी पर है जिसकी ऊंचाई 250 मीटर है।

प्रश्न 14.
चिलका झील कितनी लम्बी है?
उत्तर-
चिलका झील 70 कि० मी० लम्बी है।

प्रश्न 15.
अण्डमान तथा निकोबार द्वीप समूह में कितने-कितने द्वीप हैं?
उत्तर-
अण्डमान द्वीप समूह में 120 तथा निकोबार द्वीप समूह में 18 द्वीप सम्मिलित हैं।

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प्रश्न 16.
कौन-सी नदी भारतीय विशाल पठार के दो भागों के बीच सीमा बनाती है?
उत्तर-
नर्मदा।

प्रश्न 17.
भारत के प्रमुख द्वीप समूह कौन-कौन से हैं और ये कहां स्थित हैं?
उत्तर-
(i) भारत के प्रमुख द्वीप समूह अण्डमान तथा निकोबार और लक्षद्वीप हैं।
(ii) ये क्रमशः बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में स्थित हैं।

प्रश्न 18.
हिमालय पर्वतों की उत्पत्ति किस सागर से हुई है?
उत्तर-
टैथीज़।

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प्रश्न 19.
हिमालय पर्वत किस प्रकार के पर्वत हैं?
उत्तर-
युवा मोड़दार।

प्रश्न 20.
हिमालय का अधिकतर भाग कहां फैला है?
उत्तर-
हिमालय का अधिकतर भाग तिब्बत में फैला है।

प्रश्न 21.
ट्रांस हिमालय की मुख्य अथवा पृथ्वी की दूसरी सबसे ऊंची चोटी कौन-सी है?
उत्तर-
गॉडविन आस्टिन तथा माऊंट K2 ट्रांस हिमालय अथवा पृथ्वी की दूसरी सबसे ऊंची चोटियां हैं।

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प्रश्न 22.
भारत की सबसे लंबी और ऊंची पर्वत श्रृंखला है?
उत्तर-
बृहत् हिमालय।

प्रश्न 23.
हिमालय की कौन-सी श्रेणी शिवालिक कहलाती है?
उत्तर-
बाह्य हिमालय।

प्रश्न 24.
भारत के उत्तरी विशाल मैदान की रचना में किस-किस जल प्रवाह प्रणाली का योगदान रहा है?
उत्तर-
भारत के उत्तरी विशाल मैदान की रचना में सतलुज, ब्रह्मपुत्र तथा गंगा जल प्रवाह प्रणालियों का योगदान है।

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प्रश्न 25.
रावी और ब्यास के मध्य भाग को क्या कहा जाता है?
उत्तर-
बिस्त दोआब।

प्रश्न 26.
भारत का कौन-सा भू-भाग त्रिभुजाकार है?
उत्तर-
प्रायद्वीपीय पठार।

प्रश्न 27.
अरावली पर्वत श्रेणी की माऊंट आबू की सबसे ऊंची चोटी कौन-सी है?
उत्तर-
गुरु शिखर।

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प्रश्न 28.
गोआ से मंगलौर तक का समुद्री तट क्या कहलाता है?
उत्तर-
मालाबार तट।

प्रश्न 29.
कोंकण तट कहां से कहां तक फैला है?
उत्तर-
कोंकण तट दमन से गोआ तक फैला है।

प्रश्न 30.
भारत का कौन-सा भू-भाग सभी प्रकार के खनिजों का विशाल भंडार है?
उत्तर-
प्रायद्वीपीय पठार।

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. ट्रांस हिमालय की लम्बाई ……………. मीटर है।
  2. दफा बम्म तथा …………. हिमालय की पूर्वी शाखाओं की प्रमुख चोटियां हैं।
  3. ……………… विश्व की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है।
  4. भारतीय प्रायद्वीपीय पठार का शीर्ष बिन्दु ……………… है।
  5. थाल घाट, भोर घाट तथा …………. पश्चिमी घाट के रॆ हैं।
  6. चिल्का झील ………… कि०मी० लम्बी है। ।
  7. …………. नदी भारतीय विशाल पठार के दो भागों के बीच सीमा बनाती है।
  8. …………… हिमालय भारत की सबसे लम्बी और ऊंची पर्वत श्रृंखला है।
  9. मालाबार तट का विस्तार गोआ से ………… तक है।
  10. छत्तीसगढ़ का मैदान ………….. द्वारा बना है।

उत्तर-

  1. 6100
  2. सारामती,
  3. माऊंट ऐवरेस्ट,
  4. कन्याकुमारी,
  5. पाल घाट,
  6. 70,
  7. नर्मदा,
  8. बृहत्,
  9. मंगलौर,
  10. महानदी।

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
माऊंट एवरेस्ट की ऊंचाई है —
(A) 9848 मी०
(B) 7048 मी०
(C) 8848 मी०
(D) 6848 मी।
उत्तर-
(C) 8848 मी०

प्रश्न 2.
जोग झरना कहां है?
(A) गंगा नदी पर
(B) शरावती नदी पर
(C) यमुना नदी पर
(D) चिनाब नदी पर।
उत्तर-
(B) शरावती नदी पर

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प्रश्न 3.
हिमालय का अधिकतर भाग फैला है —
(A) भारत में
(B) नेपाल में
(C) तिब्बत में
(D) भटान में।
उत्तर-
(C) तिब्बत में

प्रश्न 4.
हिमालय पर्वतों की उत्पत्ति हुई है —
(A) टैथीज़ सागर से
(B) अंध महासागर से
(C) हिंद महासागर से
(D) खाड़ी बंगाल से।
उत्तर-
(A) टैथीज़ सागर से

प्रश्न 5.
रावी और व्यास के मध्य भाग को कहा जाता है —
(A) बिस्त दोआब
(B) प्रायद्वीपीय पठार
(C) चज दोआब
(D) मालाबार दोआब।
उत्तर-
(A) बिस्त दोआब

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प्रश्न 6.
भारत का त्रिभुजाकार भू-भाग कहलाता है —
(A) बृहत् हिमालय
(B) भोर घाट
(C) बिस्त दोआब
(D) प्रायद्वीपीय पठार।
उत्तर-
(D) प्रायद्वीपीय पठार।

प्रश्न 7.
अरावली पर्वत श्रेणी में माऊंट आबू की सबसे ऊंची चोटी है —
(A) K2
(B) गाडविन आस्टिन
(C) गुरु शिखर
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(C) गुरु शिखर

प्रश्न 8.
कोंकण तट का विस्तार है —
(A) दमन से गोआ तक
(B) मुम्बई से गोआ तक
(C) दमन से बंगलौर तक
(D) मुम्बई से दमन तक।
उत्तर-
(A) दमन से गोआ तक

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प्रश्न 9.
पश्चिमी घाट की प्रमुख चोटी है —
(A) गुरु शिखर
(B) वाणुलामाला
(C) कोंकण शिखर
(D) माऊंट K2
उत्तर-
(B) वाणुलामाला

प्रश्न 10.
सतलुज, ब्रह्मपुत्र तथा गंगा जल प्रवाह प्रणालियों से बना मैदान कहलाता है —
(A) दक्षिणी विशाल मैदान
(B) पूर्वी विशाल मैदान
(C) उत्तरी विशाल मैदान
(D) तिब्बत का मैदान।
उत्तर-
(C) उत्तरी विशाल मैदान

प्रश्न 11.
अण्डेमान द्वीप समूह में कुल कितने द्वीप हैं?
(A) 120
(B) 150
(C) 18
(D) 130
उत्तर-
(A) 120

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प्रश्न 12.
निकोबार द्वीप समूह में कुल कितने द्वीप हैं —
(A) 30
(B) 18
(C) 28
(D) 20
उत्तर-
(B) 18

IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/ग़लत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं —

  1. ट्रांस हिमालय को तिब्बत हिमालय भी कहा जाता है।
  2. हिमालय के अधिकतर स्वास्थ्यवर्धक स्थान बृहत् हिमालय में स्थित हैं।
  3. उत्तरी विशाल मैदान की रचना में कावेरी तथा कृष्णा नदियों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
  4. पश्चिम घाट में थाल घाट, भोर घाट तथा पाल घाट नामक स्थित हैं।
  5. विश्व की सबसे अधिक वर्षा मसीनरम (Mansynram) में होती है।

उत्तर-

  1. (✓),
  2. (✗),
  3. (✓),
  4. (✓),
  5. (✓)

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V. उचित मिलान

  1. जोग झरना — कन्याकुमारी
  2. भारत में हिमालय की सबसे लम्बी और ऊंची शृंखला — बिस्त दोआब
  3. भारतीय प्रायद्वीपीय पठार का शीर्ष बिन्दु — शरावती नदी
  4. रावी और व्यास का मध्य भाग — बृहत् हिमालय।

उत्तर-

  1. जोग झरना — शरावती नदी,
  2. भारत में हिमालय की लम्बी और ऊंची श्रृंखला — बृहत् हिमालय
  3. भारतीय प्रायद्वीपीय पठार का शीर्ष बिन्दु — कन्याकुमारी,
  4. रावी और व्यास का मध्य भाग — बिस्त दोआब।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
हिमालय पर्वत की चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर-

  1. ये पर्वत भारत के उत्तर में स्थित हैं। ये एक चाप की तरह कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक फैले हुए हैं। संसार का कोई भी पर्वत इनसे अधिक ऊंचा नहीं है। इनकी लम्बाई 2400 किलोमीटर और चौड़ाई 240 से 320 किलोमीटर तक है।
  2. हिमालय पर्वत की तीन समानान्तर शृंखलाएं हैं। उत्तरी श्रृंखला सबसे ऊंची है तथा दक्षिणी श्रृंखला सबसे कम ऊंची है। इन शृंखलाओं के बीच बड़ी उपजाऊ घाटियां हैं।
  3. इन पर्वतों की मुख्य चोटियां ऐवरेस्ट, नागा पर्वत, गाडविन ऑस्टिन, नीलगिरि, कंचनजंगा आदि हैं। ऐवरेस्ट संसार की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है। इसकी ऊंचाई 8848 मीटर है।
  4. हिमालय की पूर्वी शाखाएं भारत तथा म्यनमार की सीमा बनाती हैं। हिमालय की पश्चिमी शाखाएं पाकिस्तान में हैं। इनके नाम सुलेमान तथा किरथर पर्वत हैं। इन शाखाओं में खैबर तथा बोलान के दर्रे स्थित हैं।

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प्रश्न 2.
भारत के मध्यवर्ती विशाल मैदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। भारत की अर्थव्यवस्था में इनका क्या महत्त्व है?
उत्तर-भारत का मध्यवर्ती विशाल मैदान हिमालय पर्वत के साथ-साथ पश्चिम से पूर्व तक फैला हुआ है। इसका विस्तार राजस्थान से असम तक है। इसके कुछ पश्चिमी रेतीले भाग को छोड़कर शेष सारा मैदान बहुत ही उपजाऊ है। इनका निर्माण नदियों द्वारा बहाकर लाई गई जलोढ़ मिट्टी से हुआ है। इसलिए इसे जलोढ़ मैदान भी कहते हैं। इस मैदान की लम्बाई 2400 किलोमीटर तथा चौड़ाई 100 किलोमीटर से 500 किलोमीटर तक है। इसे चार भागों में बांटा जा सकता है-

  1. पंजाब-हरियाणा का मैदान,
  2. थार मरुस्थलीय मैदान,
  3. गंगा का मैदान,
  4. ब्रह्मपुत्र का मैदान। भारत की आर्थिक समृद्धि का आधार यही विशाल मैदान है। यहां नाना प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। इसके पूर्वी भागों में खनिज पदार्थों के विशाल भण्डार विद्यमान हैं।

प्रश्न 3.
भारत के पश्चिमी तथा पूर्वी तटीय मैदानों की तुलना करो।
उत्तर-

पश्चिमी तटीय मैदान पूर्वी तटीय मैदान
(1) ये मैदान पश्चिमी घाट तथा अरब सागर के बीच स्थित हैं। (1) ये मैदान पूर्वी घाट तथा खाड़ी बंगाल के बीच स्थित हैं।
(2) ये मैदान बहुत ही असमतल एवं संकुचित हैं। (2) ये मैदान अपेक्षाकृत समतल एवं चौड़ा है।
(3) इस मैदान में कई ज्वारनदमुख और लैगून हैं। (3) इस मैदान में कई नदी डेल्टा हैं।

 

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प्रश्न 4.
किन्हीं चार बातों के आधार पर प्रायद्वीपीय पठार तथा उत्तर के विशाल मैदानों की तुलनात्मक समीक्षा कीजिए।
उत्तर-
(1) उत्तर के विशाल मैदानों का निर्माण जलोढ़ मिट्टी से हुआ है जबकि प्रायद्वीपीय पठार का निर्माण प्राचीन ठोस चट्टानों से हुआ है।
(2) उत्तर के विशाल मैदानों की समुद्र तल से ऊंचाई प्रायद्वीपीय पठार की अपेक्षा बहुत कम है।
(3) विशाल मैदानों की नदियां हिमालय पर्वत से निकलने के कारण सारा वर्ष बहती हैं। इसके विपरीत पठारी भाग की नदियां केवल बरसात के मौसम में ही बहती हैं।
(4) विशाल मैदानों की भूमि उपजाऊ होने के कारण यहां गेहूं, जौ, चना, चावल आदि की कृषि होती है। दूसरी ओर पठारी भाग में कपास, बाजरा तथा मूंगफली की कृषि की जाती है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पर नोट लिखो —
1. पश्चिमी घाट
2. पूर्वी घाट।
उत्तर-
1. पश्चिमी घाट- यह दक्षिणी पठार की प्रमुख पर्वत श्रेणी है। यह पर्वत श्रेणी पश्चिमी तट के साथ-साथ ताप्ती नदी से कन्याकुमारी तक फैली हुई है। इसकी सबसे ऊंची चोटी (2,339 मी०) वाणु ला माला है। इस घाट में थाल घाट, भोर घाट और पाल घाट नामक तीन दर्रे भी हैं।
2. पूर्वी घाट-ये घाट उत्तर में महानदी घाटी से लेकर दक्षिण में नीलगिरि पहाड़ियों तक दक्षिणी पठार के पूर्वी किनारों पर लगभग 800 किलोमीटर लम्बे और 500 मीटर ऊँचे हैं। इसकी सबसे ऊंची चोटी महेन्द्रगिरि (1,500 मीटर) है।

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प्रश्न 6.
ट्रांस हिमालय से क्या भाव है?
उत्तर-
ट्रांस हिमालय (Trans Himalayas)-हिमालय पर्वत की विशाल श्रेणियाँ भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित पामीर की गाँठ (Pamir’s Knot) से उत्तर-पूर्वी दिशा के समानान्तर फैली हुई हैं। इसका अधिकतर भाग तिब्बत में है। इसलिए इन्हें ‘तिब्बत हिमालय’ भी कहा जाता है। इनकी कुल लम्बाई 970 किलोमीटर और चौड़ाई (दोनों किनारों पर) 40 किलोमीटर है परन्तु इसका केन्द्रीय भाग 222 किलोमीटर के लगभग चौड़ा हो जाता है। इनकी औसत ऊँचाई 6100 मीटर है। इसकी मुख्य पर्वतीय श्रेणियाँ जस्कर, कराकोरम, लद्दाख और कैलाश हैं। यह पर्वतीय क्षेत्र बहुत ऊँची एवं मोड़दार चोटियों तथा विशाल हिमानियों (Glaciers) के लिए प्रसिद्ध है। माऊंट K2 इस क्षेत्र की सबसे ऊँची एवम् पृथ्वी की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है।

प्रश्न 7.
बृहत् हिमालय के नाम, स्थिति तथा आकार का वर्णन करो।
उत्तर-
बृहत् हिमालय का वर्णन इस प्रकार है

  1. नाम-हिमालय क्षेत्र के इस भाग को हिमाद्रि, आन्तरिक हिमालय या केन्द्रीय हिमालय भी कहा जाता है।
  2. स्थिति-यह उप-भाग पश्चिम में सिन्धु नदी के गहरे गॉर्ज (Gorge) से लेकर उत्तर-पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी की दिहांग घाटी तक फैली हुई देश की सबसे लम्बी और ऊँची पर्वत श्रृंखला है। इसमें ग्रेनाइट, शिस्ट एवं नाईस जैसी प्राचीन महाकल्प की चट्टानें मिलती हैं।
  3. आकार-इस पर्वत श्रेणी की लम्बाई 2400 किलोमीटर और औसत ऊँचाई 6000 मीटर है। इसकी चौड़ाई 100 से 200 किलोमीटर तक है।

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प्रश्न 8.
लघु हिमालय पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
लघु हिमालय-लघु हिमालय को हिमाचल या मध्य हिमालय भी कहा जाता है। इस की औसत ऊँचाई… 3500 मीटर से लेकर 5000 मीटर तक है। इन श्रेणियों की पहाड़ियाँ 60 से 80 किलोमीटर की चौड़ाई में मिलती है।

  1. श्रेणियाँ-जम्मू-कश्मीर में पीर पंजाल व नागा टिब्बा, हिमाचल में धौलाधार, नेपाल में महाभारत, उत्तराखण्ड में मसूरी और भूटान में थिम्पू इस पर्वतीय भाग की मुख्य पर्वत श्रेणियां हैं।
  2. घाटियाँ-इस भाग में कश्मीर घाटी के कुछ भाग, कांगड़ा घाटी, कुल्लू घाटी, भागीरथी घाटी व मन्दाकिनी घाटी जैसी लाभकारी व स्वास्थ्यवर्द्धक घाटियाँ मिलती हैं।
  3. स्वास्थ्यवर्द्धक स्थान-इस क्षेत्र में शिमला, श्रीनगर, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग, चकराता आदि प्रमुख स्वास्थ्य वद्धक व रमणीय केन्द्र है।

प्रश्न 9.
बाह्य हिमालय पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
बाह्य हिमालय को शिवालिक श्रेणी, उप-हिमालय और दक्षिणी हिमालय के नाम से भी पुकारा जाता है। ये पर्वत श्रेणियाँ लघु हिमालय के समानान्तर दक्षिण में पूर्व से पश्चिम की तरफ फैली हुई हैं। इनकी औसत ऊँचाई 900 से 1200 मीटर तथा चौड़ाई 15 से 50 किलोमीटर तक है। इस क्षेत्र का निर्माण टरशरी युग में हुआ था। इस क्षेत्र में लम्बी व गहरी तलछटी चट्टानें मिलती हैं जिनकी रचना चिकनी मिट्टी, रेत, पत्थर, स्लेट आदि के निक्षेपों द्वारा हुई है जो हिमालय से अपरदन द्वारा इन क्षेत्रों में जमा किया जाता रहा है। इस भाग की प्रसिद्ध घाटियां देहरादून, पतलीदून, कोथरीदून, छोखम्भा, उधमपुर तथा कोटली हैं।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 2 धरातल

प्रश्न 10.
हिमालय की पूर्वी तथा पश्चिमी शाखाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. पूर्वी शाखाएँ-इन शाखाओं को पूर्वांचल (Purvanchal) भी कहते हैं। अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्म’ नदी की दिहांग गॉर्ज से लेकर ये श्रृंखलाएँ भारत और म्यनमार (बर्मा) की सीमा बनाती हुई दो भागों में बंट जाती है

  1. गंगा-ब्रह्मपुत्र द्वारा निर्मित शाखाएं बंगलादेश के मैदानों तक पहुंचती हैं जिसमें दफा बम्म, पटकोई बाम, गारी, खांसी, जयन्तिया व त्रिपुरा की पहाड़ियाँ आती हैं।
  2. ये शाखाएं पटकोई बम्म से शुरू होकर नागा पर्वत, बरेल, लुशाई से होती हुई इरावदी के डेल्टे तक पहुंचती है। हिमालय की इन पूर्वी शाखाओं में दफा बम्म (4578 मीटर) और सारामती (3926 मीटर) प्रमुख ऊँची चोटियों हैं।

2. पश्चिमी शाखाएँ-उत्तर-पश्चिम में पामीर की गाँठ से हिमालय श्रेणियों की आगे दो उप-शाखाएँ बन जाती है। एक शाखा पाकिस्तान के मध्य में से सॉल्ट रेन्ज, सुलेमान व किरथर होती हुई दक्षिणी-पश्चिमी दिशा में अरब सागर तक पहुँचती है। दूसरी शाखा अफ़गानिस्तान से होकर हिन्दुकुश तथा कॉकेशस पर्वत की श्रृंखला से जा मिलती है।

प्रश्न 11.
उत्तरी विशाल मैदानों की चार धरातलीय विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
उत्तरी विशाल मैदानों की चार प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं —

  1. समतल मैदान-सम्पूर्ण उत्तरी भारतीय मैदान समतल और सपाट है। इसमें मीलों तक कंकड़-पत्थर दिखाई नहीं पड़ता।
  2. नदियों का जाल-इस सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र में दरियाओं व नदनालों (Choes) का जाल सा बिछा हुआ है। इसके साथ दोआब के क्षेत्रों का निर्माण होता है। पंजाब राज्य का नाम भी पाँच नदियों के बहने के कारण तथा एकसार मिट्टी जमा होने के कारणं पंज-आब से पडा है।
  3. भं-आकार नदियों द्वारा जमा मिट्टियों से निर्मित मैदान जिसमें जलोढ़ पंखे, जलोढ़ीय शंकुओं, सर्प समान घुमाव, दरियाई सीढ़ियाँ, प्राकृतिक बन्ध, बाढ़ के मैदान जैसे भू-आकार देखने को मिलते हैं।
  4. मैदानी तलछट इन मैदानों के तलछट में चिकनी मिट्टी (clay), बालू, दोमट और सिल्ट ज्यादा मोटाई में मिलती है। चिकनी मिट्टी अर्थात् पाण्डु मिट्टी नदियों के मुहानों के समीप अधिक मिलती है और ऊपरी भागों में बालू की मात्रा में वृद्धि होती जाती है।

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प्रश्न 12.
उत्तरी विशाल मैदानों में पाये जाने वाले चार जलोढ़क मैदानों का वर्णन करो।
उत्तर-
उत्तरी विशाल मैदोनों में पाये जाने वाले चार जलोढ़क मैदानों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. खादर के मैदान-उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिमी बंगाल की नदियों में हर साल बाढ़ों के आने के कारण मृदा की नई तहें बिछ जाती हैं। इन नदियों के आस-पास बाढ़ वाले क्षेत्रों को खादर के मैदान कहा जाता है।
  2. बांगर के मैदान-ये वे ऊँचे मैदानी क्षेत्र हैं जहाँ पर बाढ़ का पानी नहीं पहुंच पाता। यहाँ की पुरानी तलछटों में चूने के कंकड़ अधिक मात्रा में मिलते हैं।
  3. भाबर के मैदान-उत्तर भारत में जब दरिया शिवालिक के पहाड़ी प्रदेशों को छोड़कर समतल प्रदेश में प्रवेश करते हैं तो ये अपने साथ लाई बाल, कंकड़, बजरी, पत्थर व बट्टे आदि के जमाव द्वारा जिन मैदानों का निर्माण करते हैं, उसे भाबर के मैदान कहा जाता है। ऐसे मैदानी क्षेत्रों में छोटी-छोटी नदियों का पानी अक्सर धरती के नीचे बहता है।
  4. तराई के मैदान जब भाबर क्षेत्रों में अलोप हुई नदियों का पानी पुनः धरातल पर निकल आता है तब पानी के इकट्ठे हो जाने के कारण दलदली क्षेत्र (Marshy Lands) बन जाते हैं। इसमें गर्मी व नमी के कारण सघन वन उत्पन्न हो जाते हैं और जंगली जीव-जन्तुओं की भरमार हो जाती है।

प्रश्न 13.
पंजाब-हरियाणा मैदान की चार विशेषताएं लिखो।
उत्तर-

  1. यह मैदान सतलुज, रावी, ब्यास व घग्घर नदियों द्वारा लाई गई मिट्टियों के जमाव के कारण बना है। 1947 में भारत व पाकिस्तान के बीच अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के बन जाने के कारण इसका अधिकतर भाग पाकिस्तान में चला गया है।
  2. पाकिस्तान सीमा से लेकर यमुना नदी तक इसकी लम्बाई पूर्वी और दक्षिण-पश्चिम दिशा में 500 किलोमीटर तथा उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पश्चिम में 640 किलोमीटर है।
  3. इस मैदान के उत्तरी भाग 300 मीटर तक ऊँचे हैं और दक्षिण पूर्वी भागों की ओर यह ऊँचाई 200 मीटर रह जाती है।
  4. इस उपजाऊ मैदान का क्षेत्रफल 1.75 लाख वर्ग किलोमीटर है।

प्रश्न 14.
ब्रह्मपुत्र के मैदान पर एक भौगोलिक टिप्पणी लिखो।
उत्तर-
ब्रह्मपुत्र के मैदान को असम का मैदान भी कहा जाता है। यह असम की पश्चिमी सीमा से लेकर असम के सुदूर उत्तर-पूर्व में सादिआ (Sadiya) तक फैला हुआ है। यह लगभग 640 किलोमीटर लम्बा और 90 से 100 किलोमीटर तक चौड़ा है। इसमें ब्रह्मपुत्र, सेसिरी, दिबांग और लोहित नदियों द्वारा हिमालय पर्वत और इसके आस-पास की पहाड़ी शाखाओं से मृदा लाकर जमा की गई है। इस तंग मैदान में लगभग प्रत्येक वर्ष बाढ़ों के कारण नवीन तलछटों का निक्षेप होता रहता है। इस मैदान का ढलान उत्तर-पूर्वी तथा पश्चिम की ओर है।

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छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
गंगा के मैदान के विभिन्न भौगोलिक पक्षों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर-
गंगा के मैदान के मुख्य भौगोलिक पक्षों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. स्थिति-यह मैदान उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिमी बंगाल राज्यों में स्थित है। यह पश्चिम में यमुना, पूर्व में बंगलादेश की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा, उत्तर में शिवालिक तथा दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार के उत्तरी विस्तार के मध्य फैला हुआ है।
  2. नदियाँ-इस मैदान में गंगा, यमुना, घागरा, गण्डक, कोसी, सोन, बेतवा तथा चम्बल नदियां बहती हैं।
  3. भू-आकारीय नाम-गंगा के तराई वाले उत्तरी क्षेत्रों में बनी दलदली पेटियों को ‘कौर’ (caur) कहा जाता है। इसकी दक्षिणी सीमा में बड़े-बड़े खड्ड (Ravines) मिलते हैं जिन्हें ‘जाला’ व ‘ताल’ (Jala & Tal) अथवा बंजर भूमि कहते हैं। इसके अतिरिक्त समस्त मैदान में पुरानी जमीं बांगर और नई बिछी खादर की जलोढ़ पट्टियों को ‘खोल’ (Khols) कहा जाता है। गंगा और यमुना दोआब में पवनों के निक्षेप द्वारा निर्मित बालू के टीलों को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद तथा बिजनौर जिलों में ‘भूर’ (Bhur) के नाम से जाना जाता है।
  4. ढलान तथा क्षेत्रफल-गंगा के मैदान की ढलान पूर्व की ओर है। 5. विभाजन-ऊँचाई के आधार पर गंगा के मैदानों को अग्रलिखित तीन उप-भागों में विभाजित किया जा सकता है —
    1. ऊपरी मैदान-इन मैदानों को गंगा-यमुना दोआब भी कहते हैं। इनके पश्चिम में यमुना नदी है तथा 100 मीटर की ऊँचाई तक मध्यम ढाल वाले क्षेत्र इसकी पूर्वी सीमा बनाते हैं। रुहेलखण्ड तथा अवध का मैदान भी इन्हीं मैदानों में सम्मिलित है।
    2. मध्यवर्ती मैदान-इस मैदान को बिहार के मैदान या मिथिला (Mithila) मैदान भी कहते हैं, जिसकी ऊँचाई लगभग 50 से 100 मीटर के बीच है। यह घागरा नदी से लेकर कोसी नदी तक 35,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।
    3. निचले मैदान-गंगा के ये मैदानी भाग समुद्र तल से लगभग 50 मीटर ऊंचे हैं। ये राजमहल तथा गारो पर्वत श्रेणियों के मध्य एक समतल डेल्टाई क्षेत्र बनाते हैं। इसके उत्तर में तराई पट्टी के द्वार (Duar) मिलते हैं तथा दक्षिण में विश्व का सबसे बड़ा सुन्दरवन डेल्टा स्थित है।

प्रश्न 2.
पश्चिमी तटीय मैदानों का उसके उपभागों सहित विस्तृत विवरण दीजिए।
उत्तर-
पश्चिमी तटीय मैदान अरब सागर और पश्चिमी घाट के मध्य, उत्तर से दक्षिण की ओर फैले हुए हैं। ये लगभग 1500 किलोमीटर की लम्बाई तथा 30 से 80 किलोमीटर की चौड़ाई में विस्तृत संकरे मैदान हैं। इनका ढलान दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम की ओर है। मैदानों को धरातलीय विशेषताओं के आधार पर चार प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है —
(1) गुजरात तट, (2) कोंकण तट, (3) मालाबार तट, (4) केरल का मैदान।

  1. गुजरात तट-इस तटवर्ती मैदानी भाग में साबरमती, माही, लुनी, बनास, नर्मदा, ताप्ती आदि नदियों के तलछट के जमाव से कच्छ तथा काठियावाड़ के प्रायद्वीपीय मैदान और सौराष्ट्र के लम्बवत् मैदानों का निर्माण हुआ है। कच्छ का क्षेत्र अभी भी दलदली तथा समुद्र तल से नीचा है। काठियावाड़ के प्रायद्वीपीय भाग में लावा युक्त गिर पर्वतीय श्रेणियाँ भी मिलती हैं। यहाँ की गिरनार पहाड़ियों में स्थित गोरखनाथ चोटी (1117 मीटर) की ऊंचाई सबसे अधिक है। गुजरात का यह तटवर्ती मैदान 400 किलोमीटर लम्बा तथा 200 किलोमीटर चौड़ा है। इसकी औसत ऊँचाई 300 मीटर है।
  2. कोंकण तट-दमन से लेकर गोआ तक का मैदान कोंकण तट कहलाता है। इसके अधिकतर तटवर्ती भागों में धसने की क्रिया होती रहती है। इसीलिए इस 500 किलोमीटर लम्बे मैदान की पट्टी की चौड़ाई 50 से 80 किलोमीटर तक रह जाती है। इस मैदानी भाग में तीव्र समुद्री लहरों द्वारा बनी संकरी खाड़ियां, आन्तरिक कटाव (Coves) और समुद्री बालू में बीच (Beach) आदि भू-आकृतियां मिलती हैं। थाना की संकरी खाड़ी में प्रसिद्ध मुम्बई द्वीप स्थित है।
  3. मालाबार तट-यह गोआ से लेकर मंगलौर तक लगभग 225 किलोमीटर लम्बा तथा 24 किलोमीटर चौड़ा मैदान है। इसे कर्नाटक का तटवर्ती मैदान भी कहते हैं। यह उत्तर की ओर संकरा परन्तु दक्षिण की ओर चौड़ा है। कई स्थानों पर इसका विस्तार कन्याकुमारी तक भी माना जाता है। इस मैदान में मार्मागोआ, मान्ढवी तथा शेरावती नदियों के समुद्री जल में डूबे हुए मुहाने (Estuaries) मिलते हैं। ..
  4. केरल के मैदान-मंगलौर से लेकर कन्याकुमारी तक 500 किलोमीटर लम्बे, 10 किलोमीटर चौड़े तथा 300 मीटर ऊँचे भाग केरल के मैदान कहलाते हैं। इन में बहुत-सी झीलें (Lagoons) तथा काईल (Kayals) पाये जाते हैं। यहाँ पर वैम्भानद (Vembanad) और अष्टमुदई (Astamudi) झीलों वाले क्षेत्रों में नौकाओं का व्यापारिक स्तर पर प्रयोग होता है।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 2 धरातल

धरातल PSEB 10th Class Geography Notes

  1. भारत का धरातल-भारत का धरातल एक समान नहीं है। इसके उत्तर में हिमालय पर्वत तथा उसकी नदियों द्वारा बने विस्तृत मैदान हैं। देश का दक्षिणी भाग एक पठारीय प्लेट है जो प्राचीन चट्टानों से बना है।
  2. भारत के भौतिक भाग-धरातल के अनुसार भारत को पाँच भागों में बांटा जा सकता है-(1) हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, (2) उत्तरी विशाल मैदान, (3) प्रायद्वीपीय पठार का क्षेत्र (4) तटीय मैदान (5) भारतीय द्वीप।
  3. हिमालय पर्वतीय क्षेत्र- बर्फ से ढका रहने वाला यह पर्वतीय क्षेत्र एक विशाल दीवार की तरह पूर्व में अरुणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में कश्मीर तक फैला हुआ है। ये संसार के सबसे ऊंचे पर्वत हैं। इनकी लम्बाई 2400 किलोमीटर तथा चौड़ाई 240 से 320 किलोमीटर तक है।
  4. उत्तरी विशाल मैदान-ये मैदान हिमालय पर्वत और दक्षिणी पठार के बीच फैले हुए हैं। ये मैदान नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से बने हैं और ये अत्यंत ही उपजाऊ हैं।
  5. प्रायद्वीपीय पठार- यह पठारी भाग भारत का सबसे प्राचीन भाग है जो पहाड़ियों से घिरा है। यह आग्नेय चट्टानों से बना है।
  6. तटीय मैदान-ये मैदान पूर्वी और पश्चिमी घाट के साथ-साथ फैले हुए हैं। पूर्वी तट के मैदान पश्चिमी तट के मैदानों से चौड़े हैं।
  7. भारतीय द्वीप-बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में अनेक भारतीय द्वीप हैं। ये समूहों के रूप में मिलते हैं। इनमें से लक्षद्वीप समूह तथा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह प्रमुख हैं।
  8. जल प्रवाह अथवा नदियां-जल प्रवाह का अर्थ है-नदियां। भारत की नदियों को दो भागों में बांटा जा सकता है-उत्तरी भारत की नदियां और दक्षिण भारत की नदियां। उत्तरी भारत की नदियां सारा साल बहती हैं, परन्तु दक्षिणी भारत की नदियां केवल वर्षा ऋतु में ही बहती हैं।

PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Practical बटन लगाना और काज बनाना Notes.

PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बटन हमेशा किस कपड़े पर लगाना चाहिए ?
उत्तर-
बटन हमेशा दोहरे कपड़े पर लगाना चाहिए।

प्रश्न 2.
कमीज़ वाले बटनों में कितने छिद्र होते हैं ?
उत्तर-
कमीज़ वाले बटनों में दो या चार छिद्र होते हैं।

प्रश्न 3.
काज किस प्रकार के कपड़ों पर बनाना चाहिए ?
उत्तर-
काज हमेशा दोहरे कपड़ों पर बनाना चाहिए।

PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना

प्रश्न 4.
धागा कहाँ लपेटना चाहिए ?
उत्तर-
धागा डंडी के आस-पास लपेटना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बटन लगाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
बटन लगाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. सभी बटनों की डंडी बनानी ज़रूरी है। डंडी के साथ बटन कपड़े के नीचे से ऊँचा रहता है। इससे बटन बंद करना आसान होता है और बटन के नीचे का कपड़ा नहीं घिसता।
  2. डंडी के आस-पास भी धागा लपेटना चाहिए ताकि काज के साथ रगड़ खाकर जल्दी टूट न जाए।
  3. जहाँ तक संभव हो टाँके बटन के छिद्र की सीध में ही होना चाहिए।
  4. बटन सफ़ाई और मज़बूती से लगाए जाने चाहिए।
  5. बटन हमेशा दोहरे कपड़े पर लगाना चाहिए।

PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना

प्रश्न 2.
कमीज़ में दो छिद्रों वाले बटन कैसे लगाते हैं ?
उत्तर-
कमीज़ में दो छिद्रों वाले बटन लगाने के लिए बटन को अपनी जगह पर ही रखते हैं और छिद्र में से सूई कपड़े के नीचे से निकालते हैं और दूसरे छिद्र में डालकर कपड़े के नीचे ले जाते हैं। इस तरह तीन, चार, पाँच टाँके लगाने के बाद डंडी बनाते हैं।

प्रश्न 3.
कमीज़ में चार छिद्रों वाले बटन कैसे लगाते हैं ?
उत्तर-
कमीज़ में चार छिद्रों वाले बटनों को क्रॉस (×) बनाकर सीधी लाइनों में या चौरस शक्ल के टाँके लगाकर बनाते हैं। धागे को छेदों से इतनी बार निकालते हैं कि छिद्र भर जाए। बाद में डंडी बनाकर धागे को नीचे ले जाते हैं और एक बखिए का टाँका लगाकर कपड़े की दो तहों में से सूई निकालकर धागा तोड़ देते हैं।

PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
काज बनाने की विधि का सचित्र वर्णन करो।
उत्तर-
1. काज हमेशा दोहरे कपड़े पर बनाना चाहिए। जिस जगह पर काज बनाना हो वहाँ बटन के आकार के अनुसार पेंसिल का निशान लगाना चाहिए, फिर ब्लेड से या छोटी कैंची से वहाँ काट देना चाहिए। उतना ही काटना चाहिए जिसमें बटन जरा मुश्किल से निकल सके। अधिक खुले काज में से बटन अपने आप निकल जाते हैं।
PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना 1
चित्र 5.1 काज बनाना

2. पतली लम्बी सूई में धागा डालते हैं। धागे को गाँठ नहीं लगाते हैं।

3. सूई को काज के बाएँ किनारे से ले जाते हैं और कपड़े की ऊपर वाली तह के बीच से दो-तीन धागे को लेकर सूई निकालते हैं। धागे का 14″ किनारा छोड़कर धागा खींच लेते हैं। इसे ” धागे के पहले कुछ टाँकों में दबा देते हैं।

4. काटे हुए किनारे का काज टाँका बनाते हैं।
PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना 2
चित्र 5.2 काज बनाना
चित्र 5.3 काज बनाना

5. काज का गोल किनारा बनाने के लिए किनारे के साथ-साथ 9 या 7 सीधे टाँके लगाते हैं। बीच वाला टाँका कटाव के बिल्कुल मध्य में होना चाहिए। टाँकों की लम्बाई बराबर होनी चाहिए और किनारा गोल बनाना चाहिए।
PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना 3
चित्र 5.4 काज बनाना

6. काटे गए दूसरे किनारे पर काज टाँका बनाते हैं।

7. किनारे पर पहुँच कर सूई पहले टाँके की गाँठ में डालते हैं और आखिरी टाँके के सिरे से निकालते हैं। पहले और आखिरी टाँके एक सिरे से दूसरे सिरे तक 9 या 7 टाँके काज टाँके की सीध में बनाते हैं। इन टाँकों की गिनती गोलाई वाले टाँकों के बराबर होनी चाहिए।
PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना 4
चित्र 5.5 काज बनाना
चित्र 5.6 काज बनना
PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना 5
चित्र 5.7 काज बनाना
चित्र 5.8 काज बनना

8. सूई को उल्टी तरफ़ ले जाते हैं और पिछली तरफ़ के टाँकों में से धागा निकालते हैं और तोड़ देते हैं। पिछली तरफ़ से टाँके भी सामने के भाग की तरफ़ एक समान और एक सीध में रखते हैं।

PSEB 8th Class Home Science Practical बटन लगाना और काज बनाना

बटन लगाना और काज बनाना PSEB 8th Class Home Science Notes

  • बटन हमेशा दोहरा कपड़ों पर लगाना चाहिए।
  • कमीज़ वाले बटनों में दो या चार छिद्र होते हैं।
  • काज हमेशा दोहरे कपड़े पर बनाना चाहिए।
  • कपड़े में कटाव उतना ही होना चाहिए जिसमें से बटन ज़रा मुश्किल से निकल सके।
  • काज का गोल किनारा बनाने के लिए किनारे के साथ-साथ 9 से 7 सीधे टाँके लगाते हैं।

PSEB 10th Class SST Solutions Civics Chapter 5 भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Civics Chapter 5 भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science Civics Chapter 5 भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र

SST Guide for Class 10 PSEB भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द/एक पंक्ति (1-15 शब्दों) में लिखो

प्रश्न 1.
भारत की विदेश नीति का एक मूल सिद्धान्त लिखो।
उत्तर-

  1. गुट-निरपेक्षता की नीति में विश्वास।
  2. पंचशील के सिद्धान्तों में विश्वास।
  3. संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण विश्वास।
  4. साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध। (कोई एक लिखें)

प्रश्न 2.
पंचशील से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
अप्रैल, 1954 को भारत के प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू और चीन के प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई ने जो पांच सिद्धान्त स्वीकार किए। उन्हें सामूहिक रूप से पंचशील कहते हैं।

प्रश्न 3.
गुट-निरपेक्षता की नीति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
गुट-निरपेक्षता की नीति से अभिप्राय सैनिक गुटों से अलग रहने की नीति से है।

PSEB 10th Class SST Solutions Civics Chapter 5 भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र

प्रश्न 4.
भारत और संयुक्त राज्य में सम्बन्ध बिगड़ने का एक मुख्य कारण लिखो।
उत्तर-
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में सम्बन्ध बिगड़ने का एक मुख्य कारण यह है कि अमेरिका पाकिस्तान को सैनिक सहायता देता रहता है।

प्रश्न 5.
भारत की परमाणु नीति क्या है?
उत्तर-
भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है। परंतु हमारी विदेश नीति शांतिप्रियता पर आधारित है। इसलिए भारत की परमाणु नीति का आधार शांतिप्रिय लक्ष्यों की प्राप्ति करना और देश का विकास करना है। वह किसी पड़ोसी देश को अपनी परमाणु शक्ति के बल पर दबाने के पक्ष में नहीं है। हमने स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध की स्थिति में भी हम परमाणु शक्ति का प्रयोग करने की पहल नहीं करेंगे।

प्रश्न 6.
सुरक्षा परिषद् में स्थायी और अस्थायी सदस्य कितने हैं?
उत्तर-
सुरक्षा परिषद् 5 सदस्य स्थायी तथा 10 सदस्य अस्थायी हैं।

PSEB 10th Class SST Solutions Civics Chapter 5 भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र

प्रश्न 7.
संयुक्त राष्ट्र का जन्म कब हुआ और कितने देश इसके मूल सदस्य थे?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र का जन्म 24 अक्तूबर, 1945 ई० को हुआ। इसके मूल सदस्य 51 देश थे।

(ख) निम्नलिखित की व्याख्या करो

  1. विश्व शान्ति में भारत की भूमिका
  2. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)
  3. निःशस्त्रीकरण (Disarmament)
  4. महासभा (General Assembly)
  5. भारत-चीन सम्बन्धों में तनाव का मूल कारण।

उत्तर-

  1. भारत ने विश्व-शान्ति को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित कार्य किए
    (क) गुट-निरपेक्षता की नीति पर चलते हुए भारत ने सदा आक्रामक शक्तियों की निन्दा की।
    (ख) भारत ने संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से शान्ति सेनाओं के लिए सैनिक भेजे तथा निःशस्त्रीकरण का समर्थन किया।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में कुल 15 न्यायाधीश होते हैं। इसका मुख्य कार्यालय हेग [Hague, हालैण्ड में है। इसका मुख्य कार्य राष्ट्रों के आपसी झगड़ों का निर्णय करना है।
  3. निःशस्त्रीकरण से अभिप्राय शस्त्रों की होड़ को कम करना है। हमने आरम्भ से ही घातक शस्त्रों का विरोध किया है क्योंकि ये विश्व-शान्ति के लिए सदा खतरा रहे हैं।
  4. महासभा-यह एक तरह से संयुक्त राष्ट्र की संसद् है। इसमें प्रत्येक सदस्य राष्ट्र के पांच प्रतिनिधि होते हैं।
  5. भारत-चीन सम्बन्धों में तनाव का मूल कारण-भारत-चीन सम्बन्धों में तनाव का मूल कारण दोनों देशों में सीमा विवाद है। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके इस विवाद को और गहन बना दिया।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में लिखो

प्रश्न 1.
पंचशील के सिद्धान्तों का वर्णन करें।
उत्तर-
29 अप्रैल, 1954 को भारत के प्रधानमन्त्री पण्डित नेहरू और चीन के प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई की दिल्ली में संयुक्त वार्ता हुई। इस वार्ता में उन्होंने आपसी सम्बन्धों को पांच सिद्धान्तों के अनुसार ढालने का निर्णय लिया। इन्हीं पांच सिद्धान्तों को ‘पंचशील’ कहा जाता है। ये पांच सिद्धान्त निम्नलिखित हैं

  1. परस्पर प्रभुसत्ता और एकता का आदर।
  2. एक-दूसरे पर आक्रमण न करना।
  3. एक-दूसरे के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना।
  4. समानता और परस्पर सहयोग।
  5. शान्तिमय सह-अस्तित्व। पंचशील का मुख्य उद्देश्य विश्व शान्ति को बनाये रखना और मानव जाति को युद्धों के विनाश से बचाना है। चीन के पश्चात् संसार के अन्य देशों ने पंचशील को मान्यता प्रदान की। आज पंचशील भारतीय विदेश नीति का आधार स्तम्भ है।

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प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्ष नीति का अर्थ और भारत का इसे अपनाने का क्या कारण है?
उत्तर-
गुट-निरपेक्ष नीति भारतीय विदेश नीति के मूल सिद्धान्तों में से एक है।
गुट-निरपेक्षता का अर्थ-गुट-निरपेक्षता का अर्थ है सैनिक गुटों से अलग रहना। इसका यह भाव नहीं है कि हम अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति दर्शक बने रहेंगे बल्कि गुण के आधार पर निर्णय लेने का प्रयास करेंगे। हम अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहेंगे।

भारत द्वारा गुट-निरपेक्ष नीति अपनाने का कारण-भारत की स्वतन्त्रता के समय विश्व दो मुख्य शक्ति गुटोंऐंग्लो-अमरीकन शक्ति गुट और रूसी शक्ति गुट में बंटा हुआ था। विश्व की सारी राजनीति इन्हीं गुटों के गिर्द घूम रही थी और दोनों में शीत युद्ध चल रहा था। नव स्वतन्त्र भारत इन शक्ति गुटों के संघर्ष से दूर रह कर ही उन्नति कर सकता था। इसीलिए पं० नेहरू ने गुट-निरपेक्षता को विदेश नीति का आधार स्तम्भ बनाया।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र के छ: अंगों में से एक है। यह संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका के समान है। इसके कुल 15 सदस्य हैं। इनमें से पांच स्थायी सदस्य और दस अस्थायी सदस्य हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, रूस, चीन और फ्रांस इसके स्थायी सदस्य हैं। इन्हें वीटो का अधिकार है। वीटो से अभिप्राय यह है कि यदि इनमें से कोई भी एक सदस्य किसी प्रस्ताव का विरोध करता है तो वह प्रस्ताव रद्द हो जाता है। सुरक्षा परिषद् के मुख्य कार्य हैं

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बनाए रखना।
  2. राष्ट्रों के परस्पर झगड़ों को शान्तिपूर्वक सुलझाना।
  3. महासचिव के पद के लिए सिफ़ारिश करना।
  4. संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए नए राष्ट्रों की सिफ़ारिश करना।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र में भारत की भूमिका संक्षेप में लिखो।
उत्तर-
भारत संयुक्त राष्ट्र के 51 मूल सदस्यों में से एक है। आरम्भ से ही भारतीय नेताओं ने इस महान् संस्था में अपनी आस्था रखी है और इस देश ने निम्नलिखित ढंग से संयुक्त राष्ट्र के कार्यों में क्रियाशील भूमिका निभाई है

  1. भारत ने अन्य देशों के साथ मिलकर 1950 में उप-निवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध महासभा में प्रस्ताव पास करवाया।
  2. भारत ने मिस्र, कांगो, कोरिया तथा हिन्द-चीन के देशों में हुए युद्धों में संयुक्त राष्ट्र के शान्ति प्रयासों में सहयोग दिया।
  3. नस्ली भेदभाव और रंगभेद के सन्दर्भ में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध आवाज़ उठाई और उसके विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध में भाग लिया।
  4. भारत ने संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से प्रत्येक उस देश के विरुद्ध आवाज़ उठाई जिसने मानव अधिकारों का उल्लंघन करने का प्रयास किया।
  5. विश्व में आतंकवाद की समाप्ति की प्रक्रिया में भारत संयुक्त राष्ट्र के साथ है।

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प्रश्न 5.
भारत और संयुक्त राष्ट्र अमरीका के परस्पर सम्बन्धों का संक्षेप में नोट लिखो।
उत्तर-
भारत का संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धान्तों में पूर्ण विश्वास है। हमने संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक अंग और विशेष एजेंसियों के कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत संयुक्त राष्ट्र को विश्व-शान्ति का रक्षक मानता है। इसलिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सैनिक सहायता प्रत्येक सम्भव ढंग से की है। भारत ने सदा संयुक्त राष्ट्र में इस बात पर जोर दिया है कि वह राजनीतिक मामलों तक ही अपने को सीमित न करे, बल्कि मानव की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याओं को सुलझाने का भी प्रयास करे। ऐसी समस्याओं को सुलझाने में भारत ने संयुक्त राष्ट्र को आर्थिक सहायता और पूरा सहयोग दिया है। 22 दिसम्बर, 1994 को भारतीय संसद् के दोनों सदनों ने एक प्रस्ताव पास कर संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत की वचनबद्धता को दोहराया है।

प्रश्न 7.
भारत पाकिस्तान सम्बन्ध तथा इनके बीच तनाव के मुख्य तीन कारणों पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
भारत-पाक सम्बन्ध आरम्भ से ही तनावपूर्ण तथा शत्रुतापूर्ण रहे हैं। इनके बीच तनाव का मुख्य कारण
कश्मीर समस्या है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। परन्तु पाकिस्तान इस प्रदेश पर अपना दावा जताता रहता है। 1999 में पाकिस्तान तथा भारत के बीच कारगिल युद्ध के कारण तनाव और अधिक बढ़ गया। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान, सीमा पार से भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। ये एक अच्छे पड़ोसी के लक्षण नहीं हैं। भारत आज भी पाकिस्तान से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है और इसके लिए प्रयास कर रहा है। परन्तु यह तभी सम्भव हो सकता है, जब पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद को समाप्त करे और युद्ध-विराम की शर्तों का पालन करें।

PSEB 10th Class Social Science Guide भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

1. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का एक कारण बताइए।
उत्तर-
पाकिस्तान कश्मीर पर अपना दावा जताता रहता है, जबकि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।
अथवा
पाकिस्तान द्वारा विदेशी सहायता से शस्त्रों का भण्डार भी दोनों देशों के मध्य तनाव का एक कारण है।

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प्रश्न 2.
भारत की वर्तमान विदेश नीति के संस्थापक कौन थे?
उत्तर-
पं० जवाहर लाल नेहरू।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति का एक मूल सिद्धान्त बताओ।
उत्तर-
गुट निरपेक्षता।

प्रश्न 4.
पंचशील के सिद्धान्तों को कब अपनाया गया?
उत्तर-
29 अप्रैल, 1954 को।

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प्रश्न 5.
पंचशील का समझौता किन दो नेताओं के बीच हुआ?
उत्तर-
पंचशील का समझौता भारत के प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू तथा चीन के प्रधानमन्त्री चाउ-एन-लाई के बीच हुआ।

प्रश्न 6.
पंचशील के सिद्धान्तों को संयुक्त राष्ट्र की महासभा में मान्यता कब दी गई?
उत्तर-
14 दिसम्बर, 1959 को।

प्रश्न 7.
संयुक्त राष्ट्र की महासभा में पंचशील के सिद्धान्तों को मान्यता देने वाले देशों की संख्या कितनी थी?
उत्तर-
82.

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प्रश्न 8.
सार्क (दक्षेस) की स्थापना कब हुई?
उत्तर-
7 दिसम्बर, 1985 को।

प्रश्न 9.
‘दक्षेस’ का पूरा नाम क्या है?
उत्तर-
दक्षेस का पूरा नाम है दक्षिण-एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन।

प्रश्न 10.
भारत ने पोखरन (राजस्थान) में परमाणु धमाका (प्रयोग) कब किया?
उत्तर-
1974 में।

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प्रश्न 11.
भारत ने राष्ट्रमण्डल की सदस्यता कब ग्रहण की थी?
उत्तर-
17 मई, 1945 को।

प्रश्न 12.
आजकल राष्ट्रमण्डल के सदस्यों की संख्या कितनी है?
उत्तर-
49.

प्रश्न 13.
भारत के दो पड़ोसी देशों के नाम बताओ जो परमाणु शक्ति सम्पन्न हैं।
उत्तर-
चीन तथा पाकिस्तान।

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प्रश्न 14.
भारत की स्वतन्त्रता के समय विश्व कौन-कौन से दो शक्ति गुटों में बंटा हुआ था?
उत्तर-
भारत की स्वतन्त्रता के समय विश्व ऐंग्लो-अमेरिकन शक्ति गुट तथा रूसी शक्ति गुट में बंटा हुआ था।

प्रश्न 15.
द्वितीय विश्वयुद्ध कब-से-कब तक चला?
उत्तर-
द्वितीय विश्वयुद्ध 1939 से 1945 तक चला।

प्रश्न 16.
संयुक्त राष्ट्र का चार्टर कब और कहां स्वीकार किया गया?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र का चार्टर सानफ्रांसिसको में 26 जून, 1945 को स्वीकार किया गया।

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प्रश्न 17.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई?
उत्तर-
24 अक्तूबर, 1945 को।

प्रश्न 18.
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर को कितने देशों के प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया?
अथवा
स्थापना के समय संयुक्त राष्ट्र के कितने सदस्य थे?
उत्तर-
51.

प्रश्न 19.
आज (2017) संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की लगभग संख्या कितनी है?
उत्तर-
195.

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प्रश्न 20.
संयुक्त राष्ट्र के स्थायी सदस्यों ( 5) को क्या विशेषाधिकार प्राप्त हैं?
उत्तर-
वीटो।

प्रश्न 21.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में कुल कितने न्यायाधीश होते हैं?
उत्तर-
15.

प्रश्न 22.
संयुक्त राष्ट्र के सचिवालय के अध्यक्ष को क्या कहा जाता है?
उत्तर-
महासचिव।

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प्रश्न 23.
भारत ने महासभा में दक्षिणी अफ्रीका द्वारा नस्ली भेदभाव का त्याग करने संबंधी प्रस्ताव कब पेश किया?
उत्तर-
1962 में।

प्रश्न 24.
संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने मानव अधिकारों की सर्वव्यापी घोषणा कब की?
उत्तर-
10 दिसम्बर, 1948 को।

प्रश्न 25.
भारत की श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र की सभा में प्रथम महिला प्रधान कब चुनी गई?
उत्तर-
1954 में।

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प्रश्न 26.
बांग्लादेश कब और किस युद्ध के परिणामस्वरूप बना?
उत्तर-
बांग्लादेश 1971 में भारत-पाक युद्ध के परिणामस्वरूप बना।

प्रश्न 27.
भारत ने किस परमाणु सन्धि पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया है?
उत्तर-
परमाणु अप्रसार संधि ।

प्रश्न 28.
चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना कब हुई?
उत्तर-
1949 में।

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प्रश्न 29.
भारत-चीन युद्ध कब हुआ?
उत्तर-
1962 में।

प्रश्न 30.
नेहरू-लियाकत अली समझौता कब हुआ?
उत्तर-
1960 में।

प्रश्न 31.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापक देशों के नाम बताइए।
उत्तर-
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापक राष्ट्र हैं-भारत, युगोस्लाविया तथा मिस्री

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प्रश्न 32.
सुरक्षा परिषद् का एक महत्त्वपूर्ण कार्य बताओ।
उत्तर-
विश्व शान्ति और सुरक्षा में योगदान देना।

प्रश्न 33.
मानव अधिकारों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
मनुष्य की सामाजिक प्रकृति में निहित अधिकारों को मानव अधिकार कहते हैं।

प्रश्न 34.
निःशस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
मानव जाति को सर्वनाश से बचाने के लिए।

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II. रिक्त स्थानों की पर्ति

  1. सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या ………..
  2. सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्यों की संख्या ………… है।
  3. संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म …………… को हुआ।
  4. संयुक्त राष्ट्र के मूला सदस्यों की संस्था :……….. थी।
  5. भारत की वर्तमान विदेश नीति के संस्थापक …………… थे।
  6. आज संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राष्ट्रों की संख्या ……….. है।
  7. संयुक्त राष्ट्र में निषेधाधिकार अथवा वीटो का अधिकार संस्था के ………….. सदस्यों को प्राप्त है।
  8. भारत-चीन युद्ध………… में हुआ।

उत्तर-

  1. 5,
  2. 10;
  3. 24 अक्टूबर, 1945,
  4. 51,
  5. पं० जवाहरलाल नेहरू,
  6. 195,
  7. स्थायी,
  8. 1962।

III. बहुविकल्पीय

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन-सा सिद्धान्त भारत की विदेश नीति का नहीं है?
(A) परमाणु शस्त्रों में वृद्धि
(B) संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण विश्वास
(C) पंचशील के सिद्धांतों में विश्वास
(D) साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध ।
उत्तर-
(A) परमाणु शस्त्रों में वृद्धि

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन-सा संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य नहीं है?
(A) रूस
(B) चीन
(C) भारत
(D) संयुक्त राज्य अमेरिका।
उत्तर-
(C) भारत

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प्रश्न 3.
बंगलादेश की स्थापना कब हुई?
(A) 1969
(B) 1971
(C) 1973
(D) 1975
उत्तर-
(B) 1971

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा देश परमाणु शक्ति है?
(A) भारत
(B) चीन
(C) पाकिस्तान
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में कुल न्यायाधीश हैं
(A) 15
(C) 11
(B) 10
(D) 25
उत्तर-
(A) 15

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IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/गलत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में छः स्थायी सदस्य देश हैं।
  2. भारत सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य है।
  3. 26 जनवरी, 1950 को पंचशील के सिद्धान्तों को अपनाया गया।
  4. भारत ने राष्ट्रमण्डल की सदस्यता 17 मई, 1945 को ग्रहण की।
  5. भारत पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने में विश्वास रखता है।

उत्तर-

  1. (✗),
  2. (✗),
  3. (✗),
  4. (✓),
  5. (✓).

V. उचित मिलान

  1. गुट-निरपेक्षता — भारत, यूगोस्लाविया तथा मित्र
  2. महासचिव — चीन, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान
  3. गुट-निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक राष्ट्र — भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धान्त
  4. भारत के पड़ोसी राष्ट्र — संयुक्त राष्ट्र के सचिवालय का अध्यक्ष

उत्तर-

  1. गुट-निरपेक्षता — भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धान्त,
  2. महासचिव — संयुक्त राष्ट्र के सचिवालय का अध्यक्ष,
  3. गुट-निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक राष्ट्र — भारत, यूगोस्लाविया तथा मिस्र,
  4. भारत के पड़ोसी राष्ट्र — चीन, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान।

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छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
अब भारत को सुरक्षा की अधिक आवश्यकता क्यों है? दो तर्क दें।
उत्तर-
प्राचीन काल में भारत की सीमाओं की रक्षा करना अपेक्षाकृत सरल था। उत्तर में स्थित हिमालय एक दीवार का कार्य करता था। दक्षिण में समुद्र भारत की रक्षा करता था। परन्तु अब न तो ऊंचे पर्वत और न ही विशाल समुद्र देश की रक्षा में कोई योगदान दे सकते हैं। आज विज्ञान की उन्नति के कारण पहाड़ और समुद्र बाधा नहीं रहे। इसलिए भारत की सीमाओं की रक्षा करना आवश्यक हो गया है। दूसरे, कुछ पड़ोसी देशों से हमारे अच्छे सम्बन्ध नहीं हैं। हमें उनसे अपनी रक्षा करनी है। इसलिए भारत को सुरक्षा की अधिक आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र के किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण अंगों के नाम लिखें। प्रत्येक अंग का एक महत्त्वपूर्ण कार्य बताइए।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र के चार महत्त्वपूर्ण अंग हैं-साधारण सभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् तथा अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय।
कार्य —

  1. साधारण सभा सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्यों का चुनाव करती है।
  2. सुरक्षा परिषद् अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा की व्यवस्था करती है।
  3. आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् मानव जाति की आर्थिक स्थिति सुधारने का प्रयास करती है।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय सदस्य राष्ट्रों के बीच झगड़ों पर विचार करता है।

प्रश्न 3.
भारत-पाक सम्बन्धों में सुधार के कुछ उपाय बताओ।
उत्तर-
भारत-पाक सम्बन्धों में दोनों देशों के सामान्य हितों को बढ़ावा देकर निश्चित रूप से सुधार लाया जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित पग उठाने होंगे —

  1. दोनों देशों में व्यापार सम्बन्धों को मजबूत बनाया जाए।
  2. दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक आदान-प्रदान किया जाए।
  3. दोनों देशों में खेल–सम्बन्धों को सुदृढ़ किया जाए। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि ये उपाय तभी सफल हो सकते हैं, जब पाकिस्तान आतंकवाद का दामन छोड़ें।

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प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई थी? इसके उद्देश्य बताइए।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को हुई। इसके आरम्भिक सदस्यों की संख्या 51 थी। परन्तु आज इनकी संख्या 195 हो गई है। भारत इसके आरम्भिक सदस्यों में से एक है।
उद्देश्य-संयुक्त राष्ट्र का अपना संविधान है, जिसे चार्टर कहते हैं। चार्टर में संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इसमें इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि इन उद्देश्यों की पूर्ति किस प्रकार की जाएगी। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं —

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा की स्थापना करना।
  2. राष्ट्रों के बीच अच्छे सम्बन्धों को बढ़ावा देना। ये सम्बन्ध समानता तथा आपसी सहयोग पर आधारित होंगे।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना।

प्रश्न 5.
I.L.O., UNESCO, F.A.O. तथा W.H.0. के पूरे नाम लिखो। इनमें से किन्हीं दो संगठनों के कार्य लिखो।
उत्तर-
I.L.O., UNESCO, F.A.O. तथा W.H.O. संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट समितियां हैं।

  1. I.L.O. — इसका पूरा नाम अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organisation) है। इसका कार्य श्रमिकों के काम की दशाओं में सुधार लाना है। यह संगठन इस बात का भी प्रयास करता है कि श्रमिकों को कुछ न्यूनतम अधिकार प्राप्त हों।
  2. UNESCO — इसका पूरा नाम संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (The U.N. Educational, Scientific and Cultural Organisation) है। यह संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के बीच वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
  3. F.A.O. — इसका पूरा नाम खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agricultural Organisation) है। विश्वभर में यह कृषि के विकास तथा खाद्यान्न पूर्ति के कार्य करता है।
  4. W.H.O. — इसका पूरा नाम विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) है। विश्व भर में स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्य इसका विशेष उत्तरदायित्व है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त नोट लिखो
(क) सार्क
(ख) निषेधाधिकार।
उत्तर-
(क) सार्क-सार्क का पूरा नाम है-दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन। हिन्दी में इसका संक्षिप्त नाम है-दक्षेस। यह दक्षिण एशिया के विकासशील देशों का संगठन है। इसके प्रमुख सदस्य भारत, पाकिस्तान, बांग्ला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका तथा मालदीव हैं। इन देशों की संस्कृति तथा आर्थिक समस्याओं में कई समानताएं पाई जाती हैं। इन्हीं समानताओं के कारण ही ये राष्ट्र आपस में संगठित हुए हैं। ये आपसी सहयोग से अपना विकास करना चाहते हैं।
(ख) निषेधाधिकार-निषेधाधिकार (वीटो) सुरक्षा परिषद् के 5 स्थायी सदस्यों (संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस तथा चीन) को प्राप्त है। सुरक्षा परिषद् के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर इन पांचों सदस्यों की सहमति होना अनिवार्य है। यदि इनमें से एक भी सदस्य किसी निर्णय का विरोध करता है, तो उस निर्णय को रद्द माना जाता है।

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प्रश्न 7.
भारत की विदेश नीति की छः विशेषताएं बताइए।
उत्तर-
भारत की विदेश नीति की निम्नलिखित छ: विशेषताएं हैं —

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा के लिए प्रयास करना।
  2. उपनिवेशों की जनता के लिए आत्म-निर्णय के अधिकार का समर्थन करना।
  3. जातिवाद का विरोध करना।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से निपटारा करना।
  5. संयुक्त राष्ट्र तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ सहयोग करना।
  6. गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण करना तथा विश्व के सैनिक गुटों से दूर रहना।

प्रश्न 8.
भारत-चीन सम्बन्धों के सकारात्मक पहलू बताओ।
उत्तर-

  1. सीमा विवाद को आपसी बातचीत द्वारा हल करने का प्रयास किया जा रहा है।
  2. एक समझौते के अनुसार दोनों देश आपस में आर्थिक सहयोग तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने पर वचन बद्ध हैं।
  3. विश्व शांति सम्मेलनों में दोनों देशों के प्रतिनिधि एक-दूसरे का भरोसा जीतने का प्रयास करते रहते हैं।

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भारत की विदेश नीति तथा संयुक्त राष्ट्र PSEB 10th Class Civics Notes

  • विदेश नीति का अर्थ तथा उद्देश्य-विदेश नीति से अभिप्राय उस नीति से है जो कोई देश दूसरे देशों के प्रति तथा प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति अपनाता है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की प्रतिरक्षा तथा विश्व शान्ति को बनाए रखना है।
  • भारत की विदेश नीति के आधार-भारत की विदेशी नीति का मुख्य आधार गुटनिरपेक्षता है। इसका अर्थ है कि भारत विश्व के सैनिक गुटों से दूर रहता है। हमारी विदेश नीति के आधार हैं-संयुक्त राष्ट्र से सहयोग तथा पड़ोसी राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के आरम्भिक सदस्य भारत, यूगोस्लाविया तथा मिस्र थे। भारत के प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो तथा मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर ने गुट-निरपेक्षता की नीति का समर्थन किया। परन्तु आज इस नीति को अपनाने वाले देशों की संख्या बहुत अधिक हो गई है और इस नीति ने एक शक्तिशाली आन्दोलन का रूप धारण कर लिया है। इसी कारण गुट-निरपेक्ष देशों के समूह को ‘तृतीय विश्व’ या ‘तीसरी दुनिया’ कह कर पुकारा जाता है।
  • भारत तथा उसके पड़ोसी देश-हमारे मुख्य पड़ोसी देश पाकिस्तान, चीन, बांग्ला देश तथा श्रीलंका हैं। हमारे अन्य पड़ोसी भृटान, नेपाल तथा बर्मा (म्यनमार) हैं। भारत इनके साथ अच्छे सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। परन्तु इनके साथ हमारे सम्बन्धों के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं।
  • भारत तथा पाकिस्तान-पाकिस्तान के साथ हमारे सम्बन्ध कभी भी सद्भावनापूर्ण नहीं रहे। इसके मुख्य कारण हैं-प्रथम, भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है, जबकि पाकिस्तान एक इस्लामी राज्य है। द्वितीय, कश्मीर के मामले पर दोनों देशों में मतभेद हैं।
  • भारत तथा चीन-1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण के पश्चात् भारत-चीन सम्बन्धों में कटुता आ गई। आज सीमा पर चीन की घुसपैठ के प्रयासों के कारण दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है।
  • भारत-बांग्ला देश सम्बन्ध-दोनों देशों में सीमावाद, बांग्ला शरणार्थियों की भारत में घुसपैठ की समस्या तथा फरक्का बांध की समस्या तनाव के कारण थे। परन्तु 1996 में गंगा जल के बंटवारे पर हुए समझौते के पश्चात् दोनों देशों में सहयोग की आशा बढ़ गई।
  • पंचशील-पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने विश्व शान्ति के लिए पांच सिद्धान्त बनाए। इसे पंचशील का नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य पड़ोसी देशों के बीच सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ाना है ताकि उनकी प्रभुसत्ता और अखण्डता बनी रहे।
  • भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका-भारत के साथ अमेरिका के सम्बन्धों में उतार-चढ़ाव आता रहा है। तनाव का एक मुख्य कारण है–भारत द्वारा “परमाणु अप्रसार” सन्धि पर हस्ताक्षर न करना, क्योंकि यह सन्धि भेदभावपूर्ण है। फिर भी संयुक्त राज्य अमेरिका भारत को आर्थिक सहायता देने वाला प्रमुख देश है।
  • भारत और रूस-रूस के साथ भारत के सम्बन्ध सदा ही अच्छे रहे हैं। यह देश भारत को हर पक्ष में सहयोग देता रहा है। हमारी स्वतन्त्रता तथा हमारे आर्थिक विकास में रूस का अत्यधिक योगदान रहा है।
  • संयुक्त राष्ट्र-संयुक्त राष्ट्र की स्थापना (24 अक्तूबर, 1945) युद्धों को रोकने तथा विश्व शान्ति बनाए रखने के लिए हुई। इसके छ: अंग तथा इसकी विशिष्ट समितियां विश्व-शान्ति, जनकल्याण तथा पिछड़े राष्ट्रों के आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
  • भारत तथा संयुक्त राष्ट्र भारत की संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों में पूरी आस्था है। इसलिए भारत की विदेश नीति का एक लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र को विश्व शान्ति की स्थापना तथा विवादों को आपसी बातचीत द्वारा सुलझाने में समर्थन देना भी है। इस प्रकार भारत संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से विश्व शान्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

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अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1.
खेलों में लगने वाली चोटों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
ब्राजील में सन 2014 में विश्व कप फुटबाल में ब्राजील विश्व कप जीतने का मुख्य दावेदार था। ब्राजील की टीम पूरे जोश के साथ सभी विरोधी टीमों को पराजित करती हुई विश्व चैम्पियनशिप जीतने की ओर बढ़ रही थी कि अचानक एक मैच में ब्राजील के होनहार खिलाड़ी ‘नेमार’ की रीढ़ की हड्डी में चोट लग गई जिसके कारण नेमार अगले मैचों में खेल नहीं सका और आने वाले दोनों मैच ब्रा हार गया। इस प्रकार ब्राजील विश्व कप विजेता होने से चूक गया।

कोई भी कार्य करते समय मनुष्य के जीवन में चोट लगने का भय बना रहता है। थोड़ी-सी असावधानी से चोट लग सकती है। इस तरह खिलाड़ियों को भी खेल के मैदान में चोटें लगती रहती हैं। खिलाड़ी जितनी मर्जी सावधानी का प्रयोग करे पर उस को चोट लग ही जाती है। खेल के मैदान में लगने वाली चोटें, कामकाज में लगने वाली चोटों से भिन्न होती हैं। यदि खिलाड़ी तैयारी और सावधानी से खेल के मैदान में उतरता है तो उसे दूसरे खिलाड़ियों की उपेक्षा कम चोटें लगती हैं। प्रत्येक खिलाड़ी के खेल जीवन में कोई-नकोई चोट अवश्य लगती है। साधारण चोट लगने पर एक-दो दिन में ठीक हो जाता है परन्तु गम्भीर चोट लगने पर खिलाड़ी कई दिन मैदान से दूर रहता है और खेल पाने में अमसर्थ होता है। कई चोटों के कारण खेलने योग्य भी नहीं रहता। खेल के मैदान में खिलाड़ियों को लगने वाली चोटें खेल चोटें (Sports Injuries) कहलाती हैं।

प्रश्न 2.
प्रत्यक्ष चोटें क्या होती हैं?
उत्तर-
प्रत्यक्ष चोटें (Exposed Injuries)-इस प्रकार की चोटें खिलाड़ियों को आम लगती रहती हैं। इस प्रकार की चोटें शरीर के किसी बाहर के भाग पर लगती हैं और इन्हें देखा जा सकता है। खेलते समय गिरने या किसी बाहर की वस्तु से टकराने के कारण चोट लगती है। इन चोटों को कई भागों में बांटा जा सकता है।

1. रगड़ (Abrasion)-इस प्रकार की चोट में त्वचा का ऊपरी अथवा भीतरी भाग छिल जाता है। खेल मैदान में खिलाड़ी के गिरने के कारण लगती है। इस प्रकार की चोट से त्वचा का बाहरी भाग छिल जाता है और रक्त बहने लगता है। रगड़ लगने वाले स्थान पर मिट्टी आदि पड़ने के कारण संक्रमण हो सकता है। इस प्रकार की चोट के घाव को अच्छी तरह साफ करके उस पर मरहम पट्टी कर देनी चाहिए।

2. त्वचा का फटना (Incision)-कई बार खेल में खिलाड़ी अपने विरोधी से टकरा जाते हैं। खिलाड़ी को कुहनी, घुटना या कोई तीखा भाग टकराने से खिलाड़ी की त्वचा फट जाती है। खिलाड़ी को इस प्रकार की चोट किसी कठोर वस्तु के टकराने से लगती है। खिलाड़ी की त्वचा कट जाती है और उससे रक्त बहने लगता है। कट गहरा होने के कारण रक्त तेज़ी से बहता है। इसके उपचार के लिए घाव को साफ करके पट्टी करनी चाहिए।

3. गहरा घाव (Punctured Wound)-खेल में यह चोट गंभीर होती है। यह चोट खेल के समय किसी नोकीली वस्तु के लगने के कारण होती है जैसे जैवेलिन या कीलों वाले स्पाइक्स की कीलें लगने के कारण होती है। इस चोट में खिलाड़ी को गहरा घाव लगता है और रक्त अधिक मात्रा में निकलने लगता है। इस प्रकार की चोट लगने के कारण शीघ्र खिलाड़ी को डाक्टर के पास ले जाना चाहिए।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 4 खेल में लगने वाली चोटें व उनका इलाज

प्रश्न 3.
अप्रत्यक्ष चोटें किन्हें कहते हैं ?
उत्तर-
अप्रत्यक्ष (परोक्ष) चोटें (Unexposed Injuries) इस प्रकार की चोटें शरीर के बाहरी भाग में दिखाई नहीं देतीं। इन्हें भीतरी चोटें भी कहा जा सकता है। इस प्रकार की चोटें मांसपेशियों अथवा जोड़ों पर लगती हैं। इनका मुख्य कारण मांसपेशियों व जोड़ों पर अधिक दबाव या तनाव होता है। इस प्रकार की चोट में खिलाड़ी को तीव्र दर्द होता है और ठीक होने में समय लग जाता है।

प्रश्न 4.
जोड़ का उत्तरना तथा हड्डी के टूटने में क्या अन्तर है?
उत्तर-
इस चोट में जोड़ के ऊपर अधिक दबाव पड़ने के कारण अथवा झटका लगने के कारण हड्डी जोड़ से बाहर आ जाती है जिससे जोड़ गति करना बंद कर देता है और खिलाड़ी खेलने में असमर्थ हो जाता है। किसी पोल, मेज से टकराने अथवा गिरते समय जोड़ के अधिक मुड़ जाने के कारण यह चोट लग सकती है।

जब चोट लगने के कारण हड्डी के दो टुकड़े हो जाते हैं, उसे हड्डी का टूटना कहते हैं। हड्डी का टूटना गम्भीर चोट है। इसमें खिलाड़ी को बहुत दर्द होता है और ठीक होने में भी काफी समय लगता है। हड्डी टूटने के बहुत प्रकार हैं-इनमें कुछ साधारण व कुछ गम्भीर प्रकार की टूटन है। खेल के मैदान में सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल न करने के कारण ये चोटें लग सकती हैं।

जोड़ का उत्तरना हड्डी का टूटना
(1) जोड़ का आकार बदल जाता है। (1) हड्डी का आकार बदल जाता है।
(2) अंग की गतिशीलता बंद हो जाती है। (2) हड्डी टूटने वाले स्थान पर तेज़ दर्द होने लगता है।
(3) चोट वाले स्थान पर तीव्र दर्द लगती है। (3) हड्डी के हिलाने पर आवाज़ आने होता है।
(4) जोड़ पर सूजन आ जाती है। (4) हड्डी टूटने वाला अंग कार्य करना बन्द कर देता है।

 

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प्रश्न 5.
मोच क्या है ? इसके कारण, लक्षण तथा ईलाज के बारे में लिखिए।
उत्तर-
मोच जोड़ों की चोट है। इस चोट में जोड़ों को बांधने वाले तन्तु टूट जाते हैं या फट जाते हैं। खेल के मैदान में दौड़ते समय खिलाड़ी का संतुलन बिगड़ने के कारण अथवा जोड़ों के अधिक मुड़ने के कारण खिलाड़ी के जोड़ों पर दबाव पड़ जाता है और जोड़ के तन्तुओं में खिंचाव आ जाता है। इसे मोच कहते हैं।
लक्षण-

  1. चोट वाले स्थान पर तीव्र दर्द होता है।
  2. चोट वाले जोड़ पर सूजन आ जाती है।
  3. चोट वाले स्थान का रंग लाल हो जाता है।
  4. चोट वाले जोड़ को हिलाने से खिलाड़ी को तीव्र दर्द होता है।

उपचार-चोट लगने के स्थान पर शीघ्र बर्फ लगनी चाहिए। इससे जोड़ में बह रहा रक्त बंद हो जाता है। बर्फ मलने से चोट वाले स्थान पर सूजन कम हो जाती है। चोट लगने के पश्चात् 24 घण्टे बर्फ की टकोर करनी चाहिए और चोट पर मालिश नहीं करनी चाहिए। न ही गर्म सेक देना चाहिए। जोड़ को सहारा देने के लिए पट्टी बांध लेनी चाहिए। चोट ठीक होने के पश्चात् जोड़ को हल्का व्यायाम करना चाहिए। इससे चोट ठीक होने में काफी समय लग सकता है।

प्रश्न 6.
खेलों में लगने वाली चोटों के मुख्य कारण कौन से हैं ?
उत्तर-

  1. अपर्याप्त जानकारी
  2. उचित प्रशिक्षण का अभाव
  3. असावधानी
  4. ठीक तरह से शरीर न गर्माने के कारण
  5. खेल मैदान का सही न होना।।

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Physical Education Guide for Class 7 PSEB खेल में लगने वाली चोटें व उनका इलाज Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खेल के मैदान में क्या नहीं होना चाहिए ?
उत्तर-
कंकर, कांच के टुकड़े और पत्थर आदि।

प्रश्न 2.
मैदान की सीमा रेखा के निकट क्या नहीं होना चाहिए ?
उत्तर-
तार अथवा दीवार।

प्रश्न 3.
खेलों का सामान कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
अन्तर्राष्ट्रीय स्टैण्डर्ड का बहुत बढ़िया।

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प्रश्न 4.
कौन-सी भावना से खेल नहीं खेलना चाहिए ?
उत्तर-
बदले की।

प्रश्न 5.
खेल का मैदान कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
समतल।

प्रश्न 6.
खेलों में चोट लगने के दो कारण लिखें।
उत्तर-

  1. अपर्याप्त जानकारी
  2. उचित प्रशिक्षण का अभाव।

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प्रश्न 7.
खेल चोटें कितने प्रकार की होती हैं ?
उत्तर-
खेल चोटें दो प्रकार की होती हैं—

  1. प्रत्यक्ष चोटें
  2. अप्रत्यक्ष चोटें।

प्रश्न 8.
मोच क्या है ?
उत्तर-
मोच में जोड़ों को बांधने वाले तन्तु टूट जाते हैं।

प्रश्न 9.
खिंचाव क्या है ?
उत्तर-
यह चोट शरीर की भारी मांसपेशियों पर लगती है और मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है।

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प्रश्न 10.
हड्डी का उतरना क्या है ?
उत्तर-
जोड़ के ऊपर अधिक दबाव पड़ने के कारण हड्डी जोड़ से बाहर आ जाती है।

प्रश्न 11.
हड्डी का टूटना क्या है ?
उत्तर-
चोट लगने के कारण हड्डी के दो टुकड़े हो जाने को हड्डी का टूटना कहा जाता

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हड्डी के उतरने के लक्षण लिखें।
उत्तर-

  1. जोड़ का आकार बदल जाता है।
  2. अंग की गतिशीलता बंद हो जाती है।
  3. चोट वाले स्थान पर तीव्र दर्द होता है।
  4. जोड़ पर सूजन आ जाती है।

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प्रश्न 2.
हड्डी के टूटने के लक्षण लिखें।
उत्तर-

  1. हड्डी का आकार बदल जाता है।
  2. हड्डी टूटने वाले स्थान पर तेज़ दर्द होने लगता है।
  3. हड्डी के हिलाने पर आवाज़ आने लगती है।
  4. हड्डी टूटने वाला अंग कार्य करना बन्द कर देता है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खेल में लगने वाली चोटों के भिन्न-भिन्न कारण लिखो।
उत्तर-
खेलों में खिलाड़ियों के चोट लगने के कई कारण हो सकते हैं जो इस प्रकार—
1. अपर्याप्त जानकारी-खेलों के नियम, खेल सामग्री के बारे में खिलाड़ी को पूरी जानकारी होनी चाहिए। कई बार खिलाड़ी को खेल सामग्री की जानकारी नहीं होती जिससे उसे चोट लग सकती है।

2. उचित प्रशिक्षण का अभाव-खेलों में बढ़िया प्रदर्शन के लिए अच्छा प्रशिक्षण ज़रूरी है। यदि प्रशिक्षण के बिना खिलाड़ी खेलता है तो उसके शरीर में शक्ति, गति व लचक की कमी के कारण चोट लग सकती है।

3. असावधानी-“सावधानी हटी और दुर्घटना घटी” खेल के मैदान में थोडी-सी लापरवाही से चोट लग सकती है। यदि खिलाड़ी खेल नियमों का पालन नहीं करता तो भी चोटें लग सकती हैं।

4. ठीक तरह से शरीर न गर्माने के कारण-खेल के अनुसार गर्माना ज़रूरी है जिससे खिलाड़ी की मांसपेशियां खेल के दबाव को सहन कर सकें। यदि खिलाड़ी शरीर को पूर्ण रूप से गर्माता नहीं तो उसकी मांसपेशियों में खिंचाव आ सकता है।

5. खेल के मैदान का सही न होना-खेलते समय मैदान समतल होना आवश्यक है। मैदान में गड्ढे, तीखी चीजें, कांच, कील बिखरे होने के कारण खिलाड़ी को चोट लग सकती है। अतः खेलने से पहले खेल मैदान की जांच कर लेनी चाहिए।

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प्रश्न 2.
खिंचाव क्या होता है ? उसके लक्षण और उपचार लिखो।
उत्तर-
यह मांसपेशियों की चोट है और शरीर की भारी मांसपेशियों पर लगती है। इसमें खिलाड़ियों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिससे वहां तेज दर्द होने लगता है। खिलाड़ी चलने, फिरने, दौड़ने में अमसर्थ हो जाता है। इस चोट के कई कारण हो सकते हैं। थकावट, शरीर को अच्छी तरह से गर्माना, मांसपेशियों पर अधिक तनाव।
लक्षण-

  1. चोट वाले स्थान पर तीव्र पीड़ा होती है।
  2. खिलाड़ी को दौड़ने, चलने में कठिनाई होती है।
  3. चोट वाले स्थान पर सूजन आ जाती है।
  4. खिलाड़ी की मुद्रा (Posture) में बदलाव आ जाता है।

उपचार-चोट के पश्चात् खिलाड़ी को अति शीघ्र मैदान से बाहर कर देना चाहिए और आराम से लिटा देना चाहिए। चोट वाले स्थान पर बर्फ लगानी चाहिए और 48 घण्टे तक बर्फ लगाते रहना चाहिए। तीसरे दिन गुनगुने पानी की टकोर करनी चाहिए। उसके पश्चात् ठण्डे पानी की टकोर करनी चाहिए। चौथे और पांचवें दिन तक इस प्रक्रिया को दोहराते रहना चाहिए। जब तक चोट पूर्ण रूप से ठीक न हो खेलना नहीं चाहिए।

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प्रश्न 3.
हड्डी का टूटना (Fracture) क्या होता है ? उसके लक्षण और उपचार बताएं।
उत्तर-
जब चोट लगने के कारण हड्डी के दो टुकड़े हो जाते हैं, उसे हड्डी का टूटना कहते हैं।
हड्डी का टूटना गम्भीर चोट है। इसमें खिलाड़ी को बहुत दर्द होता है और ठीक होने में भी काफी समय लगता है। हड्डी टूटने के बहुत प्रकार हैं-इनमें कुछ साधारण व कुछ गम्भीर प्रकार की टूटन है। खेल के मैदान में सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल न करने के कारण ये चोटें लग सकती हैं।
लक्षण-

  1. जहां हड्डी टूटी हो उसका आकार बदल जाता है।
  2. टूटी हड्डी के स्थान पर तीव्र दर्द होता है।
  3. हड्डी के हिलाने पर ‘चर-चर’ की आवाज़ आती है।
  4. चोटिल अंग कार्य नहीं कर सकता।

उपचार–हड्डी टूटी होने पर खिलाड़ी को चोट वाले स्थान पर हड्डी को लकड़ी अथवा लोहे की पट्टियों द्वारा सहारा देना चाहिए। जहां चोट लगी हो उसे हिलाना नहीं चाहिए। रक्त बहने पर रक्त रोकना चाहिए। खिलाड़ी को शीघ्र डाक्टरी सहायता दिलानी चाहिए। जिसे एक्सरे करके चोट द्वारा टूटी हड्डी का पता लगाया जा सके। डाक्टरी परामर्श के अनुसार इलाज करना चाहिए और पूरी तरह ठीक होने तक खिलाड़ी पूर्ण रूप से आराम करते रहना चाहिए।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

Punjab State Board PSEB 6th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Social Science Geography Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

SST Guide for Class 6 PSEB पृथ्वी के परिमण्डल Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
थलमण्डल किसे कहते हैं?
उत्तर-
थलमण्डल से अभिप्राय पृथ्वी के भूमि वाले भाग से है। इसे धरातल अथवा भू-पर्पटी भी कहते हैं। इसका निर्माण विभिन्न प्रकार की शैलों से हुआ है। इसकी औसत मोटाई 60 किलोमीटर है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के प्रमुख भू-रूपों के नाम लिखो।
उत्तर-
पृथ्वी पर मुख्य रूप से तीन प्रकार के भू-रूप पाये जाते हैं। इनके नाम हैं – पर्वत, पठार तथा मैदान।

प्रश्न 3.
पृथ्वी के सभी परिमण्डल एक-दूसरे को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर-
पृथ्वी के सभी परिमण्डल आपस में जुड़े हुए हैं। ये एक-दूसरे के अस्तित्व का आधार हैं। किसी एक परिमण्डल का सन्तुलन बिगड़ने से अन्य परिमण्डलों का सन्तुलन बिगड़ जाता है। उदाहरण के लिए, अधिक पेड़-पौधे काटने से जैवमण्डल में असन्तुलन पैदा हो जाता है। इसका प्रभाव वायुमण्डल पर पड़ता है और वह प्रदूषित हो जाता है। इससे वर्षा में कमी आती है, जिसका जलमण्डल पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

प्रश्न 4.
पर्वत-श्रेणी किसे कहते हैं?
उत्तर-
अपने आस-पास के धरातल से ऊंचे उठे भू-भाग को पर्वत कहते हैं। इनका ऊपरी सिरा नुकीला होता है। पर्वत प्रायः एक समूह के रूप में पाए जाते हैं। पर्वतों के समूह को पर्वत-श्रेणी कहते हैं।

प्रश्न 5.
विश्व के प्रसिद्ध पठारों के नाम बताओ।
उत्तर-

  1. भारत का दक्षिणी पठार
  2. उत्तरी अमेरिका का अपलेशियन पठार
  3. मध्य अफ्रीका का पठार तथा
  4. तिब्बत का पठार।

प्रश्न 6.
वायुमण्डल जीवन प्रणाली को जीने में कैसे सहायता करता है?
उत्तर-
वायुमण्डल जीवन प्रणाली को जीवित रखने में निम्नलिखित ढंग से सहायता करता है –

  1. इससे ऑक्सीजन लेकर जीव साँस लेते हैं।
  2. यह पृथ्वी पर एक कम्बल का काम करता है और सूर्य के ताप का ठीक रूप में वितरण करता है। इसके कारण पृथ्वी का कोई स्थान इतना अधिक गर्म अथवा ठंडा नहीं होता कि वहाँ जीवित न रहा जा सके।
  3. वायुमण्डल से प्राप्त नाइट्रोजन गैस से पेड़-पौधों की वृद्धि होती है जिनसे मनुष्य को भोजन मिलता है।
  4. वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड लेकर हरे पेड़-पौधे अपना भोजन बनाते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

प्रश्न 7.
मेज़ भू-रूप किसे और क्यों कहते हैं?
उत्तर-
पठार को मेज़ भू-रूप कहा जाता है। इसका कारण यह है कि इसका ऊपरी सिरा मेज़ की तरह चपटा होता है।

प्रश्न 8.
जलमण्डल का मनुष्य के लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर-
जलमण्डल में महासागर, सागर, झीलें, नदियां आदि शामिल हैं। इनका मनुष्य के लिए निम्नलिखित महत्त्व है –

  1. जलमण्डल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव है। इसका कारण यह है कि मनुष्य, जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे जल के बिना जीवित नहीं रह सकते।
  2. जलमण्डल वर्षा लाने में सहायता करता है जिससे वायुमण्डल ठंडा होता है।
  3. जलमण्डल में मछलियां मिलती हैं जिनसे मनुष्य को भोजन मिलता है।
  4. जलमण्डल में नौका-परिवहन होता है। इससे व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
  5. जलमण्डल से हमें नमक प्राप्त होता है।

प्रश्न 9.
महाद्वीप किसे कहते हैं?
उत्तर-
थल के वे बड़े भाग जो तीनों अथवा चारों ओर से जल से घिरे होते हैं, महाद्वीप कहलाते हैं।

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प्रश्न 10.
पृथ्वी पर कितने महाद्वीप हैं? इनके नाम लिखो। सबसे बड़ा महाद्वीप कौन-सा है?
उत्तर-
पृथ्वी पर कुल सात महाद्वीप हैं। इनके नाम हैं –

  1. एशिया
  2. अफ्रीका
  3. यूरोप
  4. उत्तरी अमेरिका
  5. दक्षिणी अमेरिका
  6. ऑस्ट्रेलिया
  7. अंटार्कटिका।

इनमें से एशिया सबसे बड़ा महाद्वीप है।

प्रश्न 11.
महासागरों के नाम बताओ। यह भी बताओ कि ग्लोब पर महासागरों को किस रंग से दर्शाया जाता है?
उत्तर-
संसार में चार महासागर हैं। इनके नाम हैं –

  1. प्रशान्त महासागर
  2. अंध महासागर
  3. हिन्द महासागर
  4. आर्कटिक महासागर।

ग्लोब पर महासागरों ह्यको नीले रंग से दर्शाया जाता है।

प्रश्न 12.
जीवमण्डल किसे कहते हैं? इसके बारे में संक्षिप्त जानकारी दो।।
उत्तर-
जीवमण्डल धरातल का वह सीमित क्षेत्र है, जहाँ भूमि, जल और वायु एकदूसरे के सम्पर्क में आते हैं। यह पृथ्वी की सतह से कुछ नीचे पानी में तथा पृथ्वी की सतह से कुछ ऊपर वायु तक फैला हुआ है। यहाँ जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पाई जाती हैं। अतः यहां विभिन्न प्रकार के जीव और पेड़-पौधे पाये जाते हैं। जीवमण्डल को दो भागों में बांटा जाता है-प्राणी जगत् तथा वनस्पति जगत्। प्राणी जगत् में मनुष्य तथा अन्य जीव-जन्तु शामिल हैं। वनस्पति जगत् में पेड़-पौधे आते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

प्रश्न 13.
उत्तरी गोलार्द्ध को ‘थल या पृथ्वी गोलार्द्ध’ और दक्षिणी गोलार्द्ध को ‘जल गोलार्द्ध’ क्यों कहते हैं?
उत्तर-
उत्तरी गोलार्द्ध का अधिकतर भाग थल है। इस भाग में जल का विस्तार कम है। इसके विपरीत दक्षिणी गोलार्द्ध का अधिकतर भाग जल से घिरा है। इस गोलार्द्ध में थल का विस्तार कम है। इसी कारण उत्तरी गोलार्द्ध को थल गोलार्द्ध अथवा पृथ्वी-गोलार्द्ध तथा दक्षिणी गोलार्द्ध को जल गोलार्द्ध कहा जाता है।

प्रश्न 14.
मनुष्य को जीवमण्डल का प्रमुख प्राणी होने के कारण किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-
जीवमण्डल का प्रमुख प्राणी होने के नाते मनुष्य को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  1. बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाई जानी आवश्यक है। ऐसा करके ही जैवमण्डल के तत्त्वों पर दबाव को कम किया जा सकता है तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।
  2. प्राकृतिक साधनों का सावधानी से प्रयोग करना चाहिए ताकि जैवमण्डल को साफ़-सुथरा रखा जा सके।
  3. मनुष्य को ‘जियो और जीने दो’ का नियम अपनाना चाहिए। तभी पृथ्वी पर मानव-जीवन बना रह सकता है।

II. रिक्त स्थान भरो

  1. ………… सबसे छोटा महाद्वीप है।
  2. ………… दूसरे नंबर पर सबसे बड़ा महाद्वीप है।
  3. आर्कटिक सागर ने ……….. ध्रुव को चारों ओर से घेरा हुआ है।
  4. दक्षिणी महासागर ने ………… महाद्वीप को घेरा हुआ है।
  5. पृथ्वी का 2/3 भाग ………… ने घेरा हुआ है।
  6. ………… महाद्वीप को सफ़ेद महाद्वीप कहते हैं।
  7. ……….. परिमण्डल को तीनों परिमण्डल प्रभावित करते हैं।

उत्तर-

  1. ऑस्ट्रेलिया
  2. अफ्रीका
  3. उत्तरी
  4. अंटार्कटिक
  5. जीव।
  6. जल
  7. अंटार्कटिक

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III. निम्नलिखित का मिलान करो

  1. महाद्वीप – आर्कटिक
  2. भू-रूप – जीवमण्डल
  3. जीवन – अंटार्कटिक
  4. महासागर – पठार

उत्तर-

  1. महाद्वीप – अंटार्कटिक
  2. भू-रूप – पठार
  3. जीवन – जीवमण्डल
  4. महासागर – आर्कटिक।

PSEB 6th Class Social Science Guide पृथ्वी के परिमण्डल Important Questions and Answers

कम से कम शब्दों में उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी का कौन-सा परिमंडल वायु तथा जल दोनों में फैला हुआ है?
उत्तर-
जीव मंडल।

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प्रश्न 2.
कौन-सा महासागर एशिया और आस्ट्रेलिया को उत्तरी अमेरिका से अलग करता है?
उत्तर-
प्रशांत महासागर।

प्रश्न 3.
एशिया और यूरोप को कौन-सी पर्वतमाला अलग करती है?
उत्तर-
यूराल।

बह-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दिया गया चित्र निम्नलिखित में से क्या दर्शाता है?
PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल 1
(क) जीवमंडल की गैसें।
(ख) ग्लोबल वार्मिंग की गैसें।
(ग) वायुमंडल की गैसें ।
उत्तर-
(ग) वायुमंडल की गैसें

प्रश्न 2.
निम्न में से किस महासागर ने धरती का ½ भाग घेरा हुआ है?
(क) प्रशांत महासागर
(ख) अंध महासागर
(ग) हिन्द महासागर।
उत्तर-
(क) प्रशांत महासागर।

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सही (✓) या गलत (✗) कथन

  1. दक्षिणी अमरीका महाद्वीप पानामा नहर द्वारा उत्तरी अमरीका से जुड़ा है।
  2. आस्ट्रेलिया सबसे बड़ा महाद्वीप है।
  3. आर्कटिक महासागर ने दक्षिणी ध्रुव को घेरा हुआ है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✗)
  3. (✗)

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर सर्वप्रथम जीवन का विकास किस परिमण्डल में हुआ था?
उत्तर-
जल परिमण्डल में।

प्रश्न 2.
एशिया महाद्वीप को कौन-कौन से तीन महासागरों नेश्वेरा हुआ है?
उत्तर-
हिन्द महासागर, प्रशान्त महासागर तथा आर्कटिक महासागर।

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प्रश्न 3.
एशिया महाद्वीप की सबसे ऊंची पर्वत चोटी का नाम बताओ।
उत्तर-
माऊंट एवरेस्ट।

प्रश्न 4.
एशिया महाद्वीप का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश कौन-सा है?
उत्तर-
चीन।

प्रश्न 5.
महासागरों में सबसे गहरा स्थान कौन-सा है?
उत्तर-
मैरियाना खाई, 11022 मीटर गहरी।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

प्रश्न 6.
सबसे बड़ा महाद्वीप कौन-सा है?
उत्तर-
एशिया।

प्रश्न 7.
उस महाद्वीप का नाम बताओ जहाँ मनुष्य स्थायी रूप से नहीं बसे हैं।
उत्तर-
अंटार्कटिका।

प्रश्न 8.
उस महासागर का नाम बताओ जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है।
उत्तर-
हिन्द महासागर।

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प्रश्न 9.
वायुमण्डल की कौन-सी गैस जीवनदायिनी गैस समझी जाती है?
उत्तर-
ऑक्सीजन।

प्रश्न 10.
पृथ्वी पर जल और थल का बँटवारा बताएँ।
उत्तर-
पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग जल है। इसका थल भाग केवल 29 प्रतिशत है।

प्रश्न 11.
महासागर किसे कहते हैं?
उत्तर-
महाद्वीपों को एक-दूसरे से अलग करने वाले जल के बड़े-बड़े भागों को महासागर कहते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

प्रश्न 12.
सबसे बड़े महासागर का नाम बताएँ।
उत्तर-
संसार का सबसे बड़ा महासागर शांत (प्रशांत) महासागर है।

प्रश्न 13.
वे कौन-से महाद्वीप हैं जो थल से आपस में जुड़े हुए हैं?
उत्तर-

  1. एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका और
  2. उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका थल द्वारा आपस में जुड़े हुए हैं।

प्रश्न 14.
कौन-सा महाद्वीप बर्फ से ढका रहता है?
उत्तर-
अंटार्कटिका महाद्वीप बर्फ से ढका रहता है।

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प्रश्न 15.
आयु के अनुसार पर्वत कौन-कौन से दो प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
युवा तथा प्राचीन।

प्रश्न 16.
समान्तर श्रेणियों के युवा पर्वतों का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
हिमालय पर्वत।

प्रश्न 17.
दो प्राचीन पर्वतों के नाम बताइए।
उत्तर-
आल्पस तथा हिमालय।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

प्रश्न 18.
द्वीप किसे कहते हैं?
उत्तर-
वह छोटा सा भू-भाग जो चारों ओर से जल से घिरा हो, द्वीप कहलाता है।

प्रश्न 19.
भारत को उपमहाद्वीप क्यों कहा जाता है? .
उत्तर-
भारत एशिया महाद्वीप का भाग है। परन्तु यह तीन ओर से पानी से घिरा हुआ है। इसलिए भारत को उपमहाद्वीप कहा जाता है।

प्रश्न 20.
सागर और खाड़ी में अन्तर बताओ।
उत्तर-
सागर-सागर महासागरों के छोटे जल भाग हैं। खाड़ी-कुछ सागर दूर थल भाग में प्रवेश कर गए हैं। इन्हें खाड़ी कहते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल

प्रश्न 21.
पृथ्वी का कौन-सा परिमंडल वायु तथा जल दोनों में फैला हुआ है?
उत्तर-
जीव मंडल।

प्रश्न 22.
कौन-सा महासागर एशिया और आस्ट्रेलिया को उत्तरी अमेरिका से अलग करता है?
उत्तर-
प्रशांत महासागर।

प्रश्न 23.
एशिया और यूरोप को कौन-सी पर्वतमाला अलग करती है?
उत्तर-
यूराल।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रशान्त महासागर की तीन विशेषताएँ बताओ।
उत्तर-

  1. प्रशान्त महासागर सबसे बड़ा महासागर है। इसका क्षेत्रफल सभी महासागरों के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक है।
  2. यह अन्य महासागरों की अपेक्षा अधिक गहरा है। विश्व का सबसे गहरा स्थान मैरियाना खाई इसी में स्थित है।
  3. इसके एक ओर एशिया और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप हैं तथा दूसरी ओर उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप हैं।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
पृथ्वी को चारों ओर से घेरे वायु के आवरण को वायुमण्डल कहते हैं। यह धरातल से लगभग 1600 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला हुआ है। वायुमण्डल में ऊँचाई के साथ-साथ वायु विरल होती जाती है।

प्रश्न 3.
वायुमण्डल की भिन्न-भिन्न गैसें कौन-सी हैं? ऊँचाई के साथ इनके अनुपात में क्या परिवर्तन आ जाता है?
उत्तर-
वायुमण्डल की भिन्न-भिन्न गैसें निम्नलिखित हैं –
नाइट्रोजन = 78 प्रतिशत
ऑक्सीजन = 21 प्रतिशत
आरगन = 0.91 प्रतिशत
कार्बन डाइऑक्साइड = 0.03 प्रतिशत।
पृथ्वी से 5-6 किलोमीटर की ऊँचाई तक गैसों के अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होता, परन्तु इससे ऊपर जाने पर वायु में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। बहुत अधिक ऊँचाई पर वायु में केवल हाइड्रोजन और हीलियम गैसें मिलती हैं।

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प्रश्न 4.
महाद्वीप अथवा स्थलमण्डल का महत्त्व बताओ।
उत्तर-
महाद्वीप स्थलमण्डल के भाग हैं। इनका निम्नलिखित महत्त्व है –

  1. स्थल भाग पर खेती-बाड़ी की जाती है।
  2. यह मनुष्यों तथा कई जीव-जन्तुओं को आवास प्रदान करता है।
  3. स्थल भाग को खोद कर मूल्यवान् खनिज पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं।
  4. स्थलमण्डल कई प्रकार की मानवीय क्रियाओं का आधार है।

प्रश्न 5.
पर्वत और पठार में अन्तर बताओ।
उत्तर-
पर्वत-पर्वत धरातल के वे भू-भाग हैं जो आस-पास के क्षेत्र से ऊँचे उठे होते हैं। इनके शिखर तीखे तथा ढाल तेज़ होते हैं। अधिकांश भूगोलवेत्ताओं के अनुसार पर्वत की ऊँचाई 600 मीटर से अधिक होनी चाहिए।

पठार-पठार भी धरातल के ऊँचे उठे भाग होते हैं, परन्तु इनका शिखर विस्तृत तथा सपाट होता है। इनकी ऊँचाई और विस्तार भी अलग-अलग होता है।

प्रश्न 6.
मैदान से क्या अभिप्राय है? संक्षिप्त वर्णन करो।
उत्तर-
भूतल के निचले प्रदेश मैदान कहलाते हैं। ये लगभग समतल और लक्षणहीन होते हैं। समुद्र तल से इनकी ऊँचाई 300 मीटर से भी कम होती है। संसार के अधिकांश मैदानों का निर्माण नदियों के निक्षेप से हुआ है।

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प्रश्न 7.
कौन-कौन से महाद्वीप दोनों गोलार्डों में फैले हैं?
उत्तर-
अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका और अंटार्कटिका दोनों ही गोलार्डों में स्थित हैं। इनका कुछ भाग उत्तरी गोलार्द्ध में तथा शेष भाग दक्षिणी गोलार्द्ध में है।

प्रश्न-कारण बताओ
प्रश्न 8.
(क) पृथ्वी एक अद्वितीय ग्रह है।
उत्तर-सूर्य के आठ ग्रह हैं जिनमें से पृथ्वी भी एक है, परन्तु पृथ्वी एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन पाया जाता है। इसलिए पृथ्वी को अद्वितीय ग्रह कहते हैं।

प्रश्न 8.
(ख) यूरोप और एशिया को यूरेशिया भी कहते हैं।
उत्तर-यूरोप और एशिया को कोई भी महासागर अलग नहीं करता। इसी कारण इन दोनों महाद्वीपों के नामों को मिलाकर इन्हें यूरेशिया भी कहते हैं। यह इन दोनों महाद्वीपों का सामूहिक नाम है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संसार में कितने महाद्वीप हैं? उनका संक्षिप्त वर्णन करो।
उत्तर-
संसार में कुल सात महाद्वीप हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –

1. एशिया-यह संसार का सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह एक ओर यूरोप महाद्वीप से जुड़ा है। इसलिए इन दोनों महाद्वीपों को यूरेशिया के नाम से भी पुकारते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 5 पृथ्वी के परिमण्डल 2

2. यूरोप-यह संसार के समृद्ध महाद्वीपों में से एक है। इसका विस्तार केवल उत्तरी गोलार्द्ध में है।

3. अफ्रीका-यह संसार का दूसरा बड़ा महाद्वीप है। इसे स्वेज़ नहर एशिया से अलग करती है। यह महाद्वीप दोनों गोलार्डों में फैला हुआ है।

4. उत्तरी अमेरिका-इस महाद्वीप का विस्तार उत्तरी गोलार्द्ध में है।

5. दक्षिणी अमेरिका-यह महाद्वीप अफ्रीका महाद्वीप की भाँति दोनों गोलार्डों में फैला है, परन्तु इसका अधिकतर विस्तार दक्षिणी गोलार्द्ध में है।

6. ऑस्ट्रेलिया-यह संसार का सबसे छोटा महाद्वीप है। इसका विस्तार केवल . दक्षिणी गोलार्द्ध में ही है।

7. अंटार्कटिका-इस महाद्वीप का विस्तार भी केवल दक्षिणी गोलार्द्ध में ही है। इसका क्षेत्रफल यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के सम्मिलित क्षेत्रफल से भी अधिक है। यह सदा बर्फ से ढका रहता है।

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प्रश्न 2.
महासागर से क्या अभिप्राय है? संक्षिप्त वर्णन करो।
उत्तर-
धरातल के विस्तृत जलीय भाग, जिन्हें महाद्वीप एक-दूसरे से अलग करते हैं, महासागर कहलाते हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –

1. प्रशान्त महासागर-यह संसार का सबसे बड़ा और गहरा महासागर है। इसका क्षेत्रफल संसार के सभी महासागरों के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक है। संसार की सबसे गहरी खाई, मैरियाना इसी महासागर में है। यह खाई 11022 मीटर गहरी है।

2. अन्ध महासागर-यह संसार का दूसरा बड़ा महासागर है। इसका क्षेत्रफल प्रशान्त महासागर से लगभग आधा है।

3. हिन्द महासागर-विस्तार की दृष्टि से यह संसार का तीसरा बड़ा महासागर है। संसार में यही एकमात्र ऐसा महासागर है जिसका नाम किसी देश (भारत) के नाम पर रखा गया है।

4. आर्कटिक-यह संसार का चौथा बड़ा महासागर है। इसका अधिकांश भाग सारा साल बर्फ से जमा रहता है। इसलिए इसे उत्तरी हिम महासागर भी कहते हैं।

5. दक्षिणी महासागर-दक्षिणी गोलार्द्ध में अंध महासागर, प्रशांत महासागर तथा हिंद महासागर आपस में मिल जाते हैं। इस विशाल महासागर को दक्षिणी महासागर कहते हैं। इस महासागर ने अंटार्कटिक महासागर को चारों ओर से घेरा हुआ है।

प्रश्न 3.
पृथ्वी के स्थल भाग की प्रमुख आकृतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पृथ्वी का सारा स्थल भाग समतल नहीं है। यह कहीं कम ऊँचा है, तो कहीं अधिक ऊँचा। इस दृष्टि से स्थल को तीन प्रमुख भागों में बाँट सकते हैं –
1. पहाड़ या पर्वत
2. पठार
3. मैदान।

1. पहाड़ या पर्वत-अपने आस-पास के क्षेत्र से ऊँचे उठे भू-भाग पर्वत कहलाते हैं। इनकी ऊँचाई 600 मीटर से अधिक होती है। इनकी ढाल प्रायः खड़ी या तीव्र होती है। रचना के अनुसार पर्वत चार प्रकार के होते हैं-वलित पर्वत, ज्वालामुखी पर्वत, ब्लॉक पर्वत तथा अवशिष्ट पर्वत। वलित पर्वत तलछटी शैलों में बल पड़ने के कारण बनते हैं और ज्वालामुखी पर्वतों का निर्माण लावे से होता है। ब्लॉक पर्वत धरती में दरार (भ्रंश) पड़ने से बनते हैं। अवशिष्ट पर्वत वे प्राचीन पर्वत हैं जो अपरदन के कारण कम ऊँचे रह गए हैं।

2. पठार-पठार सामान्य रूप से ऊँचे उठे वे भू-भाग हैं जो ऊपर से लगभग समतल होते हैं। ये प्रायः मेज़ या टेबल की आकृति के होते हैं। इसलिए इन्हें टेबल लैण्ड भी कहा जाता है। इनका एक से अधिक किनारा खड़ी ढाल बनाता है। पठार मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं-अंतरापर्वतीय पठार, विच्छेदित पठार, गिरिपदीय अथवा लावा पठार। अन्तरापर्वतीय पठार वे पठार होते हैं जो दो या दो से अधिक पर्वत श्रेणियों से घिरे होते हैं। विच्छेदित पठार नदियों के काँट-छाँट से बनते हैं। गिरिपदीय पठार पहाड़ों की तलहटी में स्थित होते हैं।

3. मैदान-धरातल के सबसे अधिक समतल भाग मैदान कहलाते हैं। इनकी समुद्रतल से ऊँचाई 300 मीटर से कम होती है। बनावट के अनुसार मैदान तीन प्रकार के होते हैं-नदी घाटी मैदान, सरोवरी मैदान तथा तटीय मैदान।

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पृथ्वी के परिमण्डल PSEB 6th Class Social Science Notes

  • महाद्वीप – समुद्र तल से ऊपर उठा पृथ्वी का विशाल भूखण्ड।
  • महासागर – पृथ्वी के स्थल भाग को घेरे हुए विस्तृत जलीय भाग।
  • पृथ्वी-एक जलीय ग्रह – पृथ्वी को जल की अधिकता के कारण जलीय ग्रह कहा जाता है।
  • मैरियाना – महासागरों में सबसे गहरी खाई ।
  • एशिया – संसार का सबसे बड़ा महाद्वीप।
  • पर्वत – पृथ्वी का वह क्षेत्र जो आस-पास के क्षेत्र से बहुत ऊँचा उठा हो।
  • पठार – आस-पास की भूमि से सीधा उठा हुआ विस्तृत और समतल भू-भाग।
  • प्रशान्त महासागर – सबसे बड़ा महासागर ।
  • वायुमण्डल – पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए वायु का आवरण।
  • जैवमण्डल – वह संकीर्ण पट्टी जहां पृथ्वी के तीनों परिमण्डल (थल, जल और वायु) एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 गर्भावस्था

Punjab State Board PSEB 10th Class Home Science Book Solutions Chapter 9 गर्भावस्था Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 गर्भावस्था

PSEB 10th Class Home Science Guide गर्भावस्था Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
गर्भावस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
गर्भावस्था गर्भ धारण करने से लेकर जन्म तक के समय को कहा जाता है जोकि साधारणतया 280 दिन का होता है। परन्तु कई बार कई कारणों से यह समय कमसे-कम 190 तथा अधिक-से-अधिक 330 दिन भी हो सकता है। बच्चे के वि स की दृष्टि से यह समय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस समय एक अण्डकोश से ही वह पूर्ण मानवीय जीव के रूप में विकसित होता है।

प्रश्न 2.
गर्भ के समय को हम कितने तथा कौन-से भागों में बांट सकते हैं?
उत्तर-
गर्भ धारण से लेकर जन्म तक की अवस्था को गर्भावस्था कहा जाता है। हम इस समय को तीन भागों में बांट सकते हैं। गर्भ समय में बच्चा एक अण्डकोश से पूर्ण मानवीय जीव के रूप में विकसित होता है।

  1. अण्डे की अवस्था (Ovum Stage) समय-गर्भधारण से दो सप्ताह तक
  2. एम्ब्रियो की अवस्था (Embryo Stage) समय-दूसरे सप्ताह से शुरू होकर दूसरे महीने के अन्त तक।
  3. भ्रूण की अवस्था (Foetus Stage) समय-तीसरे माह से आरम्भ होकर बच्चे के जन्म तक।

प्रश्न 3.
अण्डे की अवस्था से आप क्या समझते हैं तथा यह कितनी देर की होती है?
उत्तर-
अण्डे की अवस्था (ओवम अवस्था) का समय गर्भ आरम्भ होने से दो सप्ताह तक गिना जाता है। इस काल के दौरान इसमें कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं आता। इस समय के दौरान यह अपनी जर्दी पर जीवित रहता है। इस समय यह फैलोपियन ट्यूब से बच्चेदानी में पहुंचता है तथा अपने आपको बच्चेदानी की दीवार के साथ जोड़कर मां के आहार पर निर्भर हो जाता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 गर्भावस्था

प्रश्न 4.
भ्रूण की पूर्व अवस्था से आप क्या समझते हैं तथा यह कितनी देर की होती है?
उत्तर-
यह अवस्था गर्भ के दूसरे सप्ताह से आरम्भ होकर दूसरे माह के अंत तक चलती है। पहले माह में एम्ब्रियो में रक्त पहुंचाने के लिए छोटी-छोटी रगें बनती हैं। इस काल में बच्चे के शारीरिक विकास में बहुत तीव्र गति से वृद्धि होती है। इस अवस्था के अन्त में एम्ब्रियो मानवीय जीव का रूप धारण कर लेता है।

प्रश्न 5.
प्लेसैंटा क्या होता है?
उत्तर-
जहां अण्डा अपने आपको बच्चेदानी से जोड़ देता है वहां पर ही प्लेसेंटा बनने लग जाता है तथा होने वाले बच्चे को मां के शरीर से खुराक पहुंचाता है। यह एक ओर बच्चेदानी तथा दूसरी ओर बच्चे की नाभिनाल से जुड़ा होता है।

प्रश्न 6.
नाभिनाल से आप क्या समझते हैं? गर्भ के दौरान इसका क्या कार्य है?
अथवा
नाभिनाल क्या है?
उत्तर-
नाभिनाल एक ओर एम्ब्रियो के पेट की दीवार से तथा दूसरी ओर प्लेसैंटा से जुड़ा होता है। यह रस्सी की बनावट का होता है। गर्भ के अन्त तक यह 10 से 20 इंच तक हो जाता है। नाभिनाल द्वारा एम्ब्रियो का मल-मूत्र छनकर प्लेसैंटा द्वारा मां के रक्त की नलियों में चला जाता है तथा मां के शरीर द्वारा बाहर आ जाता है।

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प्रश्न 7.
ऐमनियोटिक सैक का गर्भ समय क्या कार्य होता है?
उत्तर-
ऐमनियोटिक सैक एम्ब्रियो के समय बढ़ता है। यह एक थैली जैसा होता है। इसमें एक लेसदार तरल पदार्थ होता है जिसमें बच्चा रहता है। यह तरल पदार्थ बच्चे को चोट लगने से बचाता है।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 8.
भ्रूण के बढ़ने से किन-किन सहायक अंगों का ढांचा तैयार होता है?
अथवा
एम्ब्रियो के बढ़ने में कौन-कौन से सहायक अंग काम करते हैं? बताएं।
अथवा
एम्ब्रियो के बढ़ने से कौन-कौन से सहायक अंग बन जाते हैं?
उत्तर-
गर्भ अवस्था दौरान एम्ब्रियो के बढ़ने का समय दूसरे सप्ताह से लेकर दूसरे माह के अन्त तक होता है। पहले माह में एम्ब्रियो में रक्त पहुंचाने वाली छोटी-छोटी नसों का विकास होता है, इस दौरान बच्चे की वृद्धि तेज़ी से होती है। इस समय दौरान एम्ब्रियो मानवीय जीव का रूप धारण कर लेता है। एम्ब्रियो के अपने बढ़ने के साथसाथ इस समय दौरान विशेष सहायक अंगों का ढांचा भी तैयार हो जाता है जिसको प्लेसैंटा, नाभिनाल तथा ऐमनियोटिक सैक कहा जाता है। यह विशेष ढांचा पैदा होने तक बच्चे को खुराक पहुंचाने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 9.
भ्रूण की अवस्था कितनी लम्बी होती है तथा इस दौरान भ्रूण में क्याक्या परिवर्तन आते हैं?
उत्तर-
गर्भ की तीसरी तथा सबसे लम्बी अवस्था भ्रूण की होती है। यह तीसरे माह से आरम्भ होकर बच्चे के जन्म तक चलती है। इस अवस्था में नए अंग नहीं बनते परन्तु एम्ब्रियो अवस्था के समय के बने हुए अंगों का विकास होता है। तीसरे माह तक भ्रूण की लम्बाई तीन इंच हो जाती है। पांचवें माह तक बच्चे के सभी अंग मनुष्य की तरह विकास करने लगते हैं। मां को पेट में बच्चे की हरकत अनुभव होने लगती है। सातवें माह में बच्चा पूरा मानवीय जीव के रूप में होता है। इसकी चमड़ी लाल होती है। जन्म के समय तक बच्चे की लम्बाई 19-20 इंच हो जाती है तथा साधारण बच्चे का भार 7 पौंड के लगभग होता है।

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प्रश्न 10.
कौन-कौन से कारक भ्रूण की वृद्धि पर प्रभाव डालते हैं ?
उत्तर-
इस प्रश्न के उत्तर के लिए देखें प्रश्न नम्बर 12 में से भ्रूण की वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक वाला भाग लिखें।

प्रश्न 11.
गर्भ के समय की आम तकलीफें कौन-कौन सी होती हैं?
अथवा
गर्भ के समय की तीन तकलीफों के बारे में बताओ।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 12.
गर्भावस्था के दौरान भ्रूण की अवस्था से आप क्या समझते हो ? भ्रूण की वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
भ्रूण की अवस्था-गर्भ की तीसरी तथा सबसे लम्बी अवस्था भ्रूण की होती है। यह तीसरे माह से आरम्भ होकर बच्चे के जन्म तक चलती है। इस अवस्था में नए अंग नहीं बनते, परन्तु एम्ब्रियो की अवस्था के समय बने हुए अंगों का विकास होता है। तीसरे माह तक भ्रूण की लम्बाई तीन इंच हो जाती है। गर्भ की इस अवस्था में पांचवें माह तक भीतर के सभी अंग बड़े मनुष्य के समान ही बनने लगते हैं तथा मां अपने शरीर में बच्चे की हरकतें अनुभव करने लगती है। सातवें माह तक बच्चा पूरा मानवीय जीव के रूप में आ जाता है। जन्म के समय बच्चे की लम्बाई 19-20 इंच तथा भार 7 पौंड के लगभग हो जाता है।
भ्रूण की वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक जन्म के समय प्रत्येक बच्चे की लम्बाई तथा भार अलग-अलग होता है। इसके बहुतसे कारण हैं जो गर्भावस्था के समय बच्चे के विकास पर प्रभाव डालते हैं-

  1. मां का पोषण – गर्भावस्था दौरान बच्चे को भोजन मां से मिलता है। मां की खुराक का प्रभाव भ्रूण के विकास पर पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि मां आवश्यकता अनुसार सन्तुलित भोजन ले ताकि बच्चे को खुराक के सभी आवश्यक तत्त्व मिल जाएं।
  2. मां-बाप की आयु – खोज द्वारा यह बात सिद्ध हो चुकी है कि बच्चे को जन्म देने के लिए मां की सबसे अच्छी आयु 21 से 35 वर्ष तक है। इससे बड़ी या छोटी आयु की मां ऐसे बच्चों को जन्म देती है जिनमें कई कमियां रह सकती हैं।
  3. मां का स्वास्थ्य – मां के स्वास्थ्य का भ्रूण की वृद्धि से सीधा सम्बन्ध है। यदि मां किसी छूत की बीमारी से पीड़ित हो या किसी भयानक बीमारी की पकड़ में हो तो बच्चा अन्धा, गूंगा या बहरा हो सकता है तथा रोगी भी। मां के एड्स या एच० आई० वी० पोज़ीटिव का शिकार होने पर यह रोग बच्चे में भी जा सकता है जिसका अभी तक कोई इलाज नहीं।
  4. नशीले पदार्थों का सेवन-यदि गर्भावस्था के समय मां सिगरेट, शराब आदि का सेवन करे तो बच्चा मानसिक तौर पर रोगी हो सकता है तथा उसके दिल की धड़कन भी सामान्य बच्चों से तीव्र होती है।
  5. माता-पिता का दृष्टिकोण-यदि मां गर्भावस्था में बच्चे के लिंग प्रति ज्यादा चिन्ताग्रस्त रहे तो बच्चे की शारीरिक तथा मानसिक स्थिति पर प्रभाव पड़ता है, उसका विकास रुक जाता है तथा बच्चे में जन्म के साथ ही शारीरिक तथा मानसिक विकार पैदा हो जाते हैं।
  6. आर० एच० तत्त्व – जिस मनुष्य में आर० एच० तत्त्व होता है उसको आर० एच० पोज़ीटिव (RH+) कहते हैं। जिसमें यह तत्त्व नहीं होता उसको आर० एच० नैगिटिव (RH) कहते हैं। यदि मां तथा पिता के आर० एच० मेल न खाते हों तो सम्भव है कि बच्चे तथा मां का आर० एच० तत्त्व अलग हो सकता है। आर० एच० तत्त्व अलग होने पर रक्त में लाल कण नष्ट होने के कारण बच्चा अनीमिया का शिकार हो सकता है या जन्म के तुरन्त पश्चात् मर भी सकता है। इसलिए गर्भ धारण करने से पूर्व आदमी तथा औरत को अपने आर० एच० तत्त्व की जांच करवा लेनी चाहिए।
  7. एक्स-रे (X-Rays) – गर्भावस्था दौरान कई बार एक्सरे करवाना पड़ सकता है। यदि बार-बार एक्स-रे करवाना पड़े तो गर्भपात हो सकता है या बच्चे में शारीरिक तथा मानसिक विकार भी पैदा हो सकते हैं। एक्स-रे के प्रभाव से बच्चे मन्द बुद्धि या अंगहीन भी पैदा हो सकते हैं। इसलिए केवल आवश्यकता पड़ने पर ही एक्स-रे करवाना चाहिए।

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प्रश्न 13.
गर्भावस्था को कितने भागों में बांटा जा सकता है? इस दौरान क्याक्या परिवर्तन आते हैं?
उत्तर-
गर्भ धारण से लेकर बच्चे के जन्म तक के समय को गर्भावस्था कहा जाता है। यह समय साधारणतया 280 दिनों का होता है। यह समय बच्चे के विकास की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस समय दौरान ही बच्चा एक कोश से पूर्ण मानवीय जीव के रूप में विकसित होता है।
गर्भावस्था के इस समय को हम तीन भागों में बांट सकते हैं

  1. अण्डे की अवस्था (Ovum Stage)
  2. एम्ब्रियो की अवस्था (Embryo Stage)
  3. भ्रूण की अवस्था (Foetus Stage)।

1. अण्डे की अवस्था (Ovum Stage)—यह समय गर्भ आरम्भ होने से दो सप्ताह तक गिना जाता है। इस समय में उपजाऊ अण्डा ज्यादा नहीं बदलता क्योंकि उसको खुराक सातवें माह में बच्चा पूरा मानवीय जीव के रूप में होता है। इसकी चमड़ी लाल होती है। भ्रूण एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है कि यदि बच्चा किसी कारण वक्त से पहले पैदा हो जाए तो उसके बचने की सम्भावना होती है। परन्तु ऐसा बच्चा कमजोर होता है।

जन्म के समय बच्चे की लम्बाई 19 से 20 इंच तथा एक साधारण बच्चे का भार लगभग 7 पौंड या इससे अधिक होता है।
पहुंचाने का बाहरी साधन अभी तक नहीं बना होता तथा यह अपनी जर्दी पर ही जीवित रहता है। इसी समय ही फैलोपियन ट्यूब से गर्भ स्थान या बच्चेदानी में जाता है। इसका नया जीवन आरम्भ होने के दस दिन से चौदह दिनों के अन्दर अपने आपको गर्भ स्थान की दीवार से जोड़ लेता है तथा मां के आहार पर निर्भर हो जाता है।

2. एम्ब्रियो (भ्रूण की प्रथम अवस्था) की अवस्था (Embryo Stage)—यह अवस्था गर्भ के दूसरे सप्ताह से शुरू होकर दूसरे माह के अन्त तक चलती है। पहले माह में एम्ब्रियो में रक्त पहुंचाने के लिए छोटी-छोटी रगें बन जाती हैं। इस समय पैदा होने वाले बच्चे के शारीरिक विकास में बहुत तेजी से वृद्धि होती है। इस अवस्था में एम्ब्रियो की लम्बाई डेढ़ से दो इंच तथा भार 2-3 औंस हो जाता है। इस अवस्था के अन्त में एम्ब्रियो मानवीय जीव का रूप धारण कर लेता है तथा चेहरे के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण अंग बन जाते हैं। आंखें, नाक, कान, होंठ उभरे हुए दिखाई देने लग पड़ते हैं। टांगें तथा बाहों का विकास आरम्भ हो जाता है। हाथों तथा पैरों की उंगलियां बनने लग पड़ती हैं तथा बाहरी लिंग अंग भी मामूली से दिखाई देने लग पड़ते हैं।
एम्ब्रियो के बढ़ने के साथ-साथ इस दौरान एक विशेष ढांचा भी तैयार हो जाता है जिसको सहायक अंग (प्लेसैंटा, नाभिनाल तथा ऐमनियोटिक सैक) कहा जाता है। यह विशेष ढांचा पैदा होने तक बच्चे को खुराक पहुंचाने के लिए आवश्यक है।
सहायक अंग

  1. प्लेसैंटा-जहां अण्डा बच्चेदानी की दीवार से अपने आपको जोड़ लेता है वहीं प्लेसैंटा बनने लग जाता है। प्लेसैंटा ही होने वाले बच्चे को मां के शरीर से खुराक पहुंचाता है। क्योंकि यह एक ओर बच्चेदानी तथा दूसरी ओर से जुड़ा होता है।
  2. नाभिनाल-नाभिनाल एक ओर एम्ब्रियो के पेट की बाहरी दीवार से तथा दूसरी ओर प्लेसेंटा से जुड़ी होती है। यह रस्सी जैसा होता है। गर्भ के अन्त तक नाभि नाल एक पुरुष के अंगूठे की मोटाई जितनी हो जाती है तथा इसकी लम्बाई 10 इंच से 20 इंच तक हो जाती है। नाभिनाल द्वारा एम्ब्रियो का मलमूत्र छनकर प्लेसैंटा द्वारा मां के रक्त की नलियों में चला जाता है तथा मां के शरीर द्वारा बाहर आ जाता है।
  3. ऐमनियोटिक सैक-तीसरा अंग जो एम्ब्रियो के समय बढ़ता है, ऐमनियोटिक सैक या थैली है। यह थैली प्लेसैंटा से जुड़ी होती है तथा बीच में एक लेसदार तरल पदार्थ होता है जिसमें बच्चा रहता है। यह तरल पदार्थ बच्चे को चोट लगने से बचाता है।

3. भ्रूण की अवस्था (Foetus Stage)-गर्भ की तीसरी तथा सबसे लम्बी अवस्था भ्रूण होती है। यह तीसरे माह से आरम्भ होकर बच्चे के जन्म तक चलती है। इस अवस्था में नये अंग नहीं बनते परन्तु एम्ब्रियो की अवस्था समय बने हुए अंगों का विकास होता है। तीसरे माह तक भ्रूण की लम्बाई लगभग तीन इंच हो जाती है। गर्भ की इस अवस्था में पांचवें माह तक भीतर के सभी अंग बड़े मनुष्य के समान ही बनने लग पड़ते हैं तथा मां अपने शरीर में बच्चे की हरकतें अनुभव करने लग पड़ती है। पांचवें माह में ही बच्चे के दिल की धड़कन की आवाज़ ऊंची हो जाती है।

Home Science Guide for Class 10 PSEB गर्भावस्था Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गर्भ अवस्था कितने दिनों की होती है?
उत्तर-
280 दिनों की।

प्रश्न 2.
गर्भ अवस्था कितने भागों में बांट सकते हैं?
उत्तर-
तीन भागों में।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 गर्भावस्था

प्रश्न 3.
गर्भ अवस्था के तीन भागों के नाम बताएं।
उत्तर-
अण्डे की अवस्था, एम्ब्रियो की अवस्था, भ्रूण की अवस्था।

प्रश्न 4.
अण्डे की अवस्था का समय गर्भ शुरू होने से कितने सप्ताह तक होता है?
उत्तर-
दो सप्ताह तक।

प्रश्न 5.
एम्ब्रिया अवस्था कितनी देर की होती है?
उत्तर-
गर्भ समय के दूसरे सप्ताह से दूसरे महीने के अन्त तक।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 गर्भावस्था

प्रश्न 6.
नाभिनाल की लम्बाई बताएं।
उत्तर-
10 से 20 इंच।

प्रश्न 7.
जन्म समय तक बच्चे की लम्बाई कितनी हो जाती है?
उत्तर-
19-20 इंच।

प्रश्न 8.
प्रायः जन्म के समय बच्चे का भार कितना होता है?
उत्तर-
7 पौंड।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 गर्भावस्था

प्रश्न 9.
बच्चे को जन्म देने के लिए मां की उचित आयु क्या है?
उत्तर-
21 से 35 तक।

प्रश्न 10.
गर्भ समय बार-बार एक्सरे करवाने की क्या हानि है?
उत्तर-
इससे गर्भपात हो सकता है।

प्रश्न 11.
एम्ब्रियो के सहायक अंग बताओ।
उत्तर-
प्लेसैंटा, नाभिनाल, एमनियोटिक सैक।

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प्रश्न 12.
भ्रूण अवस्था का समय बताओ।
अथवा
गर्भ अवस्था की कौन-सी अवस्था सब से लम्बी होती है?
उत्तर-
गर्भ समय के तीसरे माह से जन्म समय तक।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गर्भ के समय की कोई दो तीन तकलीफों के बारे में बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 2.
गर्भवती स्त्री की पीठ और मांस-पेशियों में दर्द क्यों होता है?
उत्तर–
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 3.
ऐमनियोटिक सैक क्या है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 4.
गर्भ के समय नशीले पदार्थों का सेवन क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 5.
गर्भ के समय दिल क्यों मितलाता है तथा पीठ में दर्द क्यों रहता है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 6.
भ्रूण की वृद्धि पर मां-बाप की आयु का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 7.
गर्भ के समय औरत के शरीर पर खुजली क्यों होती है तथा छाले क्यों पड़ जाते हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 8.
अण्डे, एम्ब्रियो तथा भ्रूण की अवस्था के बारे में बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 9.
भ्रूण की अवस्था के बारे में बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 10.
R.H. कारक में क्या जानते हैं?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 11.
एम्ब्रियो के विकास में कौन-कौन से सहायक अंग काम करते हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गर्भावस्था से क्या अभिप्राय है? इस दौरान गर्भवती औरत को कौन-सी साधारण तकलीफें हो सकती हैं?
अथवा
गर्भावस्था में कौन-कौन से दुःख होते हैं, विस्तार में बताओ।
अथवा
गर्भवती स्त्री को कौन-से कष्टों से निकलना पड़ता है?
उत्तर-
गर्भ धारण से लेकर बच्चे के जन्म तक मां के पेट के अन्दर बच्चे की अवस्था को गर्भावस्था कहते हैं। साधारणतया यह समय 280 दिन का होता है पर कई बार मां को किसी बीमारी या अन्य कारण से यह समय कम होकर 190 दिन भी हो सकता है तथा अधिक-से-अधिक 330 दिन। इस दौरान बच्चे का विकास एक अण्डकोश से लेकर एक पूर्ण मानवीय जीव के रूप में होता है। इस काल का प्रभाव जीवन भर रहता है। गर्भावस्था को तीन भागों में बांटा जा सकता है

  1. अण्डे की अवस्था (Ovum Stage)
  2. एम्ब्रियो की अवस्था (Embryo Stage)
  3. भ्रूण की अवस्था (Foetus Stage)।

गर्भवती औरत की तकलीफें-गर्भावस्था की तकलीफें सभी औरतों को नहीं होतीं। कई औरतें गर्भ के पूरे 9 माह पूरे आराम से गुज़ार लेती हैं। पर कई औरतों को पूरे 9 माह कोई-न-कोई तकलीफ रहती है। गर्भ समय होने वाली साधारण तकलीफें निम्नलिखित हैं

  1. जी मितलाना-यह अधिकतर सुबह के समय होता है परन्तु कई बार किसी समय भी हो सकता है जिससे खाने को मन नहीं करता। आम तौर पर यह तकलीफ गर्भ के पहले तीन महीने ही होती है। इस तकलीफ का होना गर्भ की प्राकृतिक अवस्था समझा जाता है। इसको मार्निंग सिकनैस भी कहा जाता है। इसको खुराक तथा आराम से ठीक किया जा सकता है। बिस्तर से उठने से पूर्व हल्की नींबू वाली चाय तथा मीठा बिस्कुट खाने से आराम मिलता है।
  2. कब्ज़-गर्भ के दौरान औरतों को कब्ज़ की शिकायत साधारण हो जाती है। उसकी रोज़ाना खुराक, कसरत तथा शौच जाने की आदत इस तरह हो कि उसको कब्ज़ न हो। साधारणतया पानी अधिक पीने तथा सन्तुलित भोजन लेने से यह शिकायत दूर हो जाती है। नाश्ते में फल तथा रूक्षांश वाले पदार्थ तथा फल विशेषकर सेब खाने से कब्ज़ की शिकायत दूर होती है।
  3. दिल की जलन तथा बदहजमी – गर्भ के महीनों में कई बार मां को दिल की जलन अनुभव होती है जिससे बदहजमी हो जाती है। इसका दिल से कोई सम्बन्ध नहीं पर यह जलन पाचन प्रणाली में होती है। ज्यादा मसालेदार, तली हुई, ज्यादा घी वाली तथा गैस वाली चीज़ों से परहेज़ करने से इस तकलीफ से छुटकारा पाया जा सकता है।
  4. सिर चकराना तथा बेहोश होना-गर्भवती औरत का ज्यादा काम करना, बहुत सुबह उठना, बहुत देर तक खड़े होने से या ज्यादा चलने से सिर चकराने लग पड़ता है तथा खून का दबाव कम हो जाने से कई बार बेहोश भी हो जाती है। यदि सिर चकराने लगे या बेहोशी-सी अनुभव हो तो पैरों तथा शरीर के स्तर से सिर नीचा करके लेट जाएं। घबराहट या सिर चकराने की स्थिति में एक गिलास ठण्डा नींबू पानी पी लेना चाहिए।
  5. पैरों की सूजन – गर्भ के अन्तिम महीनों में कई बार गर्भवती मां के पैर सूज जाते हैं। यह तकलीफ विशेषकर गर्मी के महीनों में होती है। यह एक प्राकृतिक अवस्था समझी जाती है तथा बच्चा पैदा होने के बाद अपने आप पहली अवस्था में आ जाते हैं। आराम करते समय पैर तथा टांगें शरीर से ऊंचे रखने से इस स्थिति में सुधार आता है।
  6. योनि में से खून बहना-यदि कभी गर्भवती स्त्री की योनि में से खून निकलने लग जाए तो उसको अपने पैर ऊँचे करके लेटना चाहिए तथा डॉक्टर की सलाह जल्दी लेनी चाहिए। ज्यादा खून निकलने से कई बार गर्भपात हो जाता है या बच्चा समय से पहले पैदा हो जाता है। जब तक डॉक्टर की सहायता न पहुंचे, कोई दवाई नहीं लेनी चाहिए।
  7. शरीर पर खारिश होना – कभी-कभी गर्भवती स्त्री को शरीर पर खारिश होने लग जाती है। इसके बारे में डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। सुबह नहाने के पानी में थोड़ा-सा मीठा सोडा पाने से भी लाभ होता है जो योनि के आसपास किसी किस्म की खारिश हो तो डॉक्टर को बताकर इलाज करवाना चाहिए।
  8. चमड़ी पर धब्बे पड़ने – कई औरतों के मुंह पर भूरे धब्बे पड़ जाते हैं। गर्भ की अन्तिम स्थिति में कई बार औरतों के बाल ज्यादा खुष्क रहते हैं तथा झड़ने लग पड़ते हैं। इस के बारे में ज्यादा चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। बच्चा पैदा होने के पश्चात् यह अपने आप प्राकृतिक अवस्था में आ जाते हैं। बालों को रोज़ कंघी करनी चाहिए तथा तेल की मालिश सिर तथा बालों के लिये लाभदायक है।
  9. पीठ तथा पट्ठों में दर्द – गर्भ के अन्तिम दिनों में पीठ, पट्ठों तथा टांगों में दर्द होना साधारण बात है। बच्चेदानी के बढ़ने से फेफड़ों तथा टांगों पर ज्यादा भार पड़ता है। बच्चा शरीर में हरकत करके अपनी स्थिति तथा जगह बदलता है तो दर्द होती है। यह दर्द कम एड़ी वाली चप्पल पहनने तथा आराम करने से कम हो जाती है। यदि अन्तिम दिनों में पीठ में इस प्रकार की दर्द हो जैसे मासिक धर्म के दिनों में होती है तो डॉक्टर को जल्दी बुलाना चाहिए। यह बच्चा होने समय की दर्द हो सकती है।
  10. कुछ अन्य तकलीफें- उपरोक्त गर्भ की तकलीफों के अतिरिक्त कुछ अन्य तकलीफें जैसे सिर दर्द, नज़र में कमज़ोरी, मुंह तथा हाथों पर सूजन, बुखार, अचानक शरीर के किसी अंग विशेषकर पीठ, टांगों तथा पेट में दर्द, ज्यादा उल्टियां आना, योनि में से ज़ोर से पानी निकलना तथा रुक-रुक कर सांस आना आदि हो सकती हैं।

इनमें से यदि कोई भी तकलीफ हो तो डॉक्टर की सलाह तुरन्त लेनी चाहिए क्योंकि इनके प्रति लापरवाही करने से कई बार खतरा भी हो सकता है। थोड़े-थोड़े समय के पश्चात् डॉक्टर को दिखाने से इन तकलीफों को रोका जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. रिक्त स्थान भरें

  1. गर्भ अवस्था …………………. दिनों की होती है।
  2. ………………. होने वाले बच्चे को मां के शरीर से आहार पहुंचाता है।
  3. नाडु की लम्बाई ………… होती है।
  4. गर्भ अवस्था को ………………. भागों में बांटा गया है।
  5. अण्डे की अवस्था को ………… भी कहा जाता है।

उत्तर-

  1. 280,
  2. प्लेसैंटा,
  3. 10-20 इंच,
  4. तीन,
  5. ओवम अवस्था ।

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II. ठीक/ग़लत बताएं

  1. गई अवस्था सामान्यत: 280 दिन की होती है।
  2. एम्ब्रियों की अवस्था गर्भ-धारण से दूसरे सप्ताह से शुरु होती है।
  3. जन्म के समय बच्चे की लम्बाई 19-20 ईंच होती है।
  4. नाडु की लम्बाई 10-20 इंच होती है।
  5. जन्म समय बच्चे का भार 4 पौंड होता है।

उत्तर-

  1. ठीक,
  2. ठीक,
  3. ठीक,
  4. ठीक,
  5. ग़लत।

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एम्ब्रियो के सहायक अंग हैं
(क) प्लेसैंटा
(ख) नाडु
(ग) एमनियोटीकसैक
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

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प्रश्न 2.
नाडु की लम्बाई होती है
(क) 10-20 ईंच
(ख) 30 ईंच
(ग) 30-40 ईंच
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 10-20 ईंच

प्रश्न 3.
भ्रूण अवस्था का समय है
(क) गर्भ समय से तीसरे महीने से
(ख) पहला सप्ताह
(ग) दूसरे सप्ताह से
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) गर्भ समय से तीसरे महीने से

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गर्भावस्था PSEB 10th Class Home Science Notes

  • गर्भ धारण से लेकर बच्चे के जन्म तक की अवस्था को गर्भावस्था कहा जाता है।
  • गर्भावस्था के तीन भाग होते हैं।
  • भ्रूण अवस्था सबसे लम्बी होती है।
  • प्लेसैंटा द्वारा बच्चा मां के शरीर से खुराक प्राप्त करता है।
  • एम्ब्रियो अवस्था में ही सहायक अंगों का ढांचा तैयार हो जाता है।
  • मां के स्वास्थ्य तथा खुराक का बच्चे के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
  • बच्चे की गर्भावस्था के स्वास्थ्य का जीवन भर स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है।
  • गर्भावस्था में मां द्वारा किए गये नशीले पदार्थों के सेवन का बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • गर्भ धारण से पहले पुरुष तथा औरत को आर०एच० तत्त्व की जांच करवा लेनी चाहिए।

गर्भ धारण से लेकर जन्म तक के समय को गर्भावस्था कहा जाता है। यह समय साधारणतया 280 दिनों का होता है। यह काल बच्चे के विकास की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस काल का प्रभाव जीवन भर रहता है। इसी समय दौरान बच्चा एक अण्डकोश से पूर्ण मानवीय जीव के रूप में विकसित होता है।

PSEB 8th Class Home Science Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई Notes.

PSEB 8th Class Home Science Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हाथ से सिलाई करने के लिए कपड़े के टुकड़े को कैसे पकड़ना चाहिए ?
उत्तर-
हाथ से सिलाई करने के लिए कपड़े के टुकड़े को बराबर करके पकड़ना चाहिए।

प्रश्न 2.
पक्की सिलाई कैसे की जाती है ?
उत्तर-
पक्की सिलाई के लिए तीन सादा टाँकों के पश्चात् एक बखिया टाँका लिया जाता है।

प्रश्न 3.
कपड़े की पूरी और बढ़िया सिलाई के लिए कौन-सा टाँका व्यवहार में लेना चाहिए ?
उत्तर-
कपड़े की पूरी और बढ़िया सिलाई के लिए बखिया टाँका व्यवहार में लेना चाहिए।

PSEB 8th Class Home Science Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सादी सिलाई आप कैसे करोगे ?
उत्तर-
यह सिलाई सबसे आसान है। इसका प्रयोग कपड़े के टुकड़ों को स्थाई रूप से जोड़ने के लिए किया जाता है। इसमें टाँके की लम्बाई कपड़े की मोटाई पर निर्भर करती है। पतले कपड़े पर छोटा टाँका लगाया जाता है। यह दाईं ओर से शुरू की जाती है। इसमें पहला और अन्तिम टाँका बखिया का लिया जाता है। सूई को थोड़ा-थोड़ा स्थान छोड़कर कपड़े के ऊपर-नीचे निकाला जाता है। पक्की सिलाई के लिए तीन सादा टाँकों के पश्चात् एक बखिया टाँका लिया जाता है।
PSEB 8th Class Home Science Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई 1
चित्र 4.1 सादी सिलाई

PSEB 8th Class Home Science Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई

प्रश्न 2.
फ्रैंच सिलाई आप कैसे करोगे ?
उत्तर-
इस सिलाई को दोहरी या चोर सिलाई भी कहते हैं। कपड़ों के सिरों से धागे निकालने से रोकने के लिए सबसे पहले कपड़े के दोनों भागों को उल्टी तरफ एक-दूसरे । के ऊपर दोनों सिरे मिलाकर रखते हैं। सिरों से लगभग 1/8″ की दूरी से सादा टाँका लगाते हैं। अब उन्हीं सिरों को उल्टा कर इस तरह मोड़ देते हैं कि सिलाई किए गए सिरों की पट्टी अन्दर की तरफ़ कपड़ों के बीच में आ जाए और उधड़ रहे धागों के अन्दर छिपा दिया जाता है। धागों को छिपाने के बाद ली गई पट्टी पर उल्टी तरफ़ से हाथ की सादी या बखिया टाँका प्रयोग करके सिलाई की जाती
PSEB 8th Class Home Science Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई 2
चित्र 4.2 फ्रैंच सिलाई
है। यह सिलाई मर्दाना कमीजों पर की जाती है। यह सिलाई बढ़िया, बारीक, महँगे, रेशमी और बनावटी रेशों वाले कपड़ों पर की जाती है।

PSEB 8th Class Home Science Practical हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई

हाथ से सादी सिलाई और फ्रैंच सिलाई PSEB 8th Class Home Science Notes

  • हाथ से सिलाई करने के लिए कपड़े के टुकड़े को बराबर करके पकड़ना चाहिए।
  • पक्की सिलाई के लिए तीन सादा टाँकों के पश्चात् एक बखिया टाँका लिया जाता है।
  • प्रायः कपड़े की पूरी और बढ़िया सिलाई के लिए बखिया टाँका व्यवहार में लेना चाहिए।
  • फ्रैंच सिलाई को दोहरी या चोर सिलाई भी कहते हैं।
  • फ्रैंच सिलाई पुरुषों की कमीज़ों पर की जाती है। यह सिलाई बढ़िया, बारीक, महँगे रेशमी और बनावटी रेशों वाले कपड़ों पर की जाती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
किस विचारक ने समाजशास्त्र तथा मानवविज्ञान को जुड़वा बहनें माना है ?
उत्तर-
एल० क्रोबर (L. Kroeber) ने समाजशास्त्र तथा मानवविज्ञान को जुड़वा बहनें माना है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्रियों तथा अर्थशास्त्रियों द्वारा अध्ययन किये जाने वाले कुछ विषयों के नाम बताइये।
उत्तर-
पूँजीवाद, औद्योगिक क्रान्ति, मज़दूरी के संबंध, विश्वव्यापीकरण इत्यादि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनका दोनों समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र अध्ययन करते हैं।

प्रश्न 3.
मानवविज्ञान के अध्ययन के कोई दो क्षेत्र बताइये।
उत्तर-
भौतिक मानव विज्ञान तथा सांस्कृतिक मानव विज्ञान।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र किसे कहते हैं ?
उत्तर-
समाज के विज्ञान को समाजशास्त्र कहा जाता है। समाजशास्त्र में समूहों, संस्थाओं, संगठन तथा समाज के सदस्यों के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है तथा यह अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से होता है। साधारण शब्दों में समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजनीति विज्ञान राज्य तथा सरकार का विज्ञान है। यह मुख्य रूप से उन सामाजिक समूहों का अध्ययन करता है जो राज्य की स्वयं की सत्ता में आते हैं। इसके अध्ययन का मुद्दा शक्ति, राजनीतिक व्यवस्थाएं, राजनीतिक प्रक्रियाएं, सरकार के प्रकार तथा कार्य, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध, संविधान इत्यादि होते हैं।

प्रश्न 3.
शारीरिक मानवविज्ञान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भौतिक मानवविज्ञान, मानवविज्ञान की ही एक शाखा है जो मुख्य रूप से मनुष्य के उद्भव तथा उद्विकास, उनके वितरण तथा उनके प्रजातीय लक्षणों में आए परिवर्तनों का अध्ययन करती है। यह आदि मानव के शारीरिक लक्षणों का अध्ययन करके प्राचीन तथा आधुनिक संस्कृतियों को समझने का प्रयास करती है।

प्रश्न 4.
सांस्कृतिक मानवविज्ञान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सांस्कृतिक मानव विज्ञान, मानव विज्ञान की वह शाखा है जो संस्कृति के उद्भव, विकास तथा समय के साथ-साथ उसमें आए परिवर्तनों का अध्ययन करती है। मानवीय समाज की अलग-अलग संस्थाएं किस प्रकार सामने आईं, उनका अध्ययन भी मानव विज्ञान की यह शाखा करती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र किसे कहते हैं ?
उत्तर-
अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों से संबंधित है। यह हमारे पास मौजूद संसाधनों तथा कम हो रहे संसाधनों को संभाल कर रखने के ढंगों के बारे में बताता है। यह कई क्रियाओं जैसे कि उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा लेन-देन से भी संबंधित है।

प्रश्न 6.
इतिहास किसे कहते हैं ?
उत्तर-
इतिहास बीत गई घटनाओं का अध्ययन करने वाला विज्ञान है। यह तारीखों, स्थानों, घटनाओं तथा संघर्ष का अध्ययन है। यह मुख्य रूप से पिछली घटनाओं तथा समाज पर उन घटनाओं के पड़े प्रभावों से संबंधित है। इतिहास को पिछले समय का माइक्रोस्कोप, वर्तमान का राशिफल तथा भविष्य का टैलीस्कोप भी कहते हैं।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र तथा राजनीति विज्ञान के मध्य कोई दो अन्तर बताइये।
उत्तर-

  • समाजशास्त्र समाज तथा सामाजिक संबंधों का विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान राज्य तथा सरकार का विज्ञान है।
  • समाजशास्त्र संगठित, असंगठित तथा अव्यवस्थित समाजों का अध्ययन करता है जबकि राजनीति विज्ञान केवल राजनीतिक तौर पर संगठित समाजों का अध्ययन करता है।
  • समाजशास्त्र का विषयक्षेत्र बहुत बड़ा अर्थात् असीमित है जबकि राजनीति विज्ञान का विषय क्षेत्र बहुत ही सीमित है।
  • समाजशास्त्र एक साधारण विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान एक विशेष विज्ञान है।
  • समाजशास्त्र मनुष्य का सामाजिक मनुष्यों के तौर पर अध्ययन करता है जबकि राजनीति विज्ञान मनुष्यों का राजनीतिक मनुष्यों के तौर पर अध्ययन करता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र तथा इतिहास के बीच क्या संबंध है ? दो बिन्द बताइये।
उत्तर-
इतिहास मानवीय समाज के बीत चुके समय का अध्ययन करता है। यह आरंभ से लेकर अब तक मानवीय समाज का क्रमवार वर्णन करता है। केवल इतिहास पढ़कर ही पता चलता है कि समज, इसकी संस्थाएं, संबंध, रीति रिवाज इत्यादि कैसे उत्पन्न हुए। इसमें विपरीत समाजशास्त्र वर्तमान का अध्ययन करता है। इसमें सामाजिक संबंधों, परंपराओं, संस्थाओं, रीति रिवाजों, संस्कृति इत्यादि का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार समाजशास्त्र वर्तमान समाज की संस्थाओं, अलग-अलग संबंधों इत्यादि का अध्ययन करता है। अगर हम दोनों विज्ञानों का संबंध देखें तो इतिहास प्राचीन समाज के प्रत्येक पक्ष अध्ययन करता है तथा समाजशास्त्र उस समाज के वर्तमान पक्ष का अध्ययन करता है। दोनों विज्ञानों को अपना अध्ययन करने के लिए एक दूसरे की सहायता लेनी पड़ती है क्योंकि एक-दूसरे की सहायता किए बिना यह अपना कार्य नहीं कर सकते।

प्रश्न 3.
समाजशास्त्र तथा मानव विज्ञान के मध्य संबंधों की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
मानव विज्ञान को अपनी संस्कृति व सामाजिक क्रियाओं को समझने के लिए समाजशास्त्र की मदद लेनी पड़ती है, मानव वैज्ञानिकों ने आधुनिक समाज के ज्ञान के आधार पर कई परिकल्पनाओं का निर्माण किया है। इसके आधार पर प्राचीन समाज का अध्ययन अधिक सुचारु रूप से किया जाता है। संस्कृति प्रत्येक समाज का एक हिस्सा होती है। बिना संस्कृति के हम किसी समाज बारे सोच भी नहीं सकते। यह सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए मानव विज्ञान को सामूहिक स्थिरता को पैदा करने वाले सांस्कृतिक व सामाजिक तत्त्वों के साथ-साथ उन तत्त्वों का अध्ययन भी करता है जो समाज में संघर्ष व विभाजन पैदा करते हैं।

प्रश्न 4.
समाजशास्त्र किस प्रकार अर्थशास्त्र से संबंधित है ? संक्षेप में बताइये।
उत्तर-
किसी भी आर्थिक समस्या का हल करने के लिए हमें सामाजिक तथ्य का भी सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए बेकारी की समस्या के हल के लिए अर्थशास्त्र केवल आर्थिक कारणों का पता लगा सकता है परन्तु सामाजिक पक्ष इसको सुलझाने के बारे में विचार देता है कि बेकारी की समस्या का मुख्य कारण सामाजिक कीमतों की गिरावट है। इस कारण आर्थिक क्रियाएं सामाजिक अन्तक्रियाओं का ही परिणाम होती हैं इनको समझने के लिए अर्थशास्त्र को समाजशास्त्र का सहारा लेना पड़ता है।

कई प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक क्षेत्र के अध्ययन के पश्चात् सामाजिक क्षेत्र का अध्ययन किया। समाजशास्त्र ने जब सामाजिक सम्बन्धों के टूटने या समाज की व्यक्तिवादी दृष्टि क्यों है का अध्ययन करना होता है तो उसे अर्थशास्त्र की सहायता लेनी पड़ती है। जैसे अर्थशास्त्र समाज में पैसे की बढ़ती आवश्यकता इत्यादि जैसे कारणों को बताता है। इसके अतिरिक्त कई सामाजिक बुराइयां जैसे नशा करना भी मुख्य कारण से आर्थिक क्षेत्र से ही जुड़ा हुआ है। इन समस्याओं को समाप्त करने के लिए समाजशास्त्र को अर्थशास्त्र का सहारा लेना पड़ता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के मध्य सम्बन्ध की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
मनोविज्ञान, समाजशास्त्रियों को आधुनिक उलझे समाज की समस्याओं को सुलझाने में मदद देता है। मनोविज्ञान प्राचीन व्यक्तियों का अध्ययन करके समाजशास्त्री को आधुनिक समाज को समझने में मदद करता है। इस प्रकार समाजशास्त्री को मनो वैज्ञानिक द्वारा एकत्रित की सामग्री पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस तरह मनोविज्ञान का समाजशास्त्र को काफी योगदान है।

मनोविज्ञान को व्यक्तिगत व्यवहार के अध्ययन करने के लिए समाजशास्त्र की विषय-वस्तु की ज़रूरत पड़ती है। कोई भी व्यक्ति समाज से बाहर नहीं रह सकता इसी कारण अरस्तु ने भी मनुष्य को एक सामाजिक पशु कहा है। मनोवैज्ञानिक को मानसिक क्रियाओं को समझने के लिए उसकी सामाजिक स्थितियों का ज्ञान प्राप्त करना ज़रूरी हो जाता है। इस प्रकार व्यक्तिगत व्यवहार को जानने के लिए समाजशास्त्र की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र तथा राजनीति विज्ञान किस प्रकार अन्तर्सम्बन्धित हैं ? संक्षेप में समझाइये।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान में जब भी कानून बनाते हैं तो सामाजिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है, क्योंकि यदि सरकार कोई भी कानून बिना सामाजिक स्वीकृति के बना देती है तो लोग आन्दोलन की राह पकड़ लेते हैं। ऐसे में समाज के विकास में रुकावट पैदा हो जाती है। इस कारण राजनीतिक विज्ञान को समाजशास्त्र पर निर्भर रहना पड़ता है।

किसी भी समाज में बिना नियन्त्रण के विकास नहीं होता। राजनीति विज्ञान द्वारा समाज पर नियन्त्रण बना रहता है। बहु विवाह की प्रथा, सती प्रथा, विधवा विवाह इत्यादि जैसी सामाजिक बुराइयां जो समाज की प्रगति के लिए रुकावट बन गई हैं, को समाप्त करने के लिए राजनीति विज्ञान का सहारा लेना पड़ा है। इस प्रकार समाज में परिवर्तन लाने के लिए हमें राजनीति विज्ञान से मदद लेनी पड़ती है।

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र तथा मानव विज्ञान के मध्य अन्तरों की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
1. समाजशास्त्र आधुनिक समाज की आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था, कला आदि का अध्ययन अपने ही ढंग से करता है अर्थात् यह केवल सामाजिक आकार, सामाजिक संगठन व विघटन का अध्ययन करता है। परन्तु सामाजिक मानव-विज्ञान की विषय-वस्तु किसी एक समाज की राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक संगठन, धर्म, कला आदि प्रत्येक वस्तु का अध्ययन करता है व यह सम्पूर्ण समाज की पूर्णता का अध्ययन करता है।

2. मानव विज्ञान अपने आप को समस्याओं के अध्ययन तक सीमित रखता है। परन्तु समाजशास्त्र भविष्य तक भी पहुंचता है।

3. समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों से सम्बन्धित है व मानव विज्ञान समाज की सम्पूर्णता से सम्बन्धित होता है। इस प्रकार दोनों समाज शास्त्र के अध्ययन क्षेत्र में ही आते हैं।

4. समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र काफ़ी विशाल है जबकि मानव विज्ञान का विषय क्षेत्र काफ़ी सीमित है क्योंकि यह समाजशास्त्र का ही एक हिस्सा है।

5. समाजशास्त्र आधुनिक, सभ्य तथा जटिल समाजों का अध्ययन करता है जबकि मानव विज्ञान प्राचीन तथा अनपढ़ समाजों का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 8.
समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र के मध्य अन्तरों की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-

  • समाजशास्त्र समाज के अलग-अलग हिस्सों का वर्णन करता है व अर्थशास्त्र समाज के केवल आर्थिक हिस्से का अध्ययन करता है।
  • समाजशास्त्र की इकाई दो या दो से अधिक व्यक्ति होते हैं परन्तु अर्थशास्त्र की इकाई मनुष्य व उसके आर्थिक हिस्से के अध्ययन से है। .
  • समाजशास्त्र में ऐतिहासिक, तुलनात्मक विधियों का प्रयोग होता है जबकि अर्थशास्त्र में निगमन व आगमन विधि का प्रयोग किया जाता है।
  • समाजशास्त्र व अर्थशास्त्र के विषय क्षेत्र में भी अन्तर होता है। समाजशास्त्र समाज के अलग-अलग हिस्सों का चित्र पेश करता है। इस कारण इसका क्षेत्र विशाल होता है परन्तु अर्थशास्त्र केवल समाज के आर्थिक हिस्से का अध्ययन करने तक सीमित होता है। इस कारण इसका विषय क्षेत्र सीमित होता है।

प्रश्न 9.
समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के मध्य अंतर कीजिए।
उत्तर-

  • मनोविज्ञान मनुष्य के मन का अध्ययन करता है तथा समाजशास्त्र समूह से संबंधित है।
  • मनोविज्ञान का दृष्टिकोण व्यक्तिगत है जबकि समाजशास्त्र का दृष्टिकोण सामाजिक है।
  • मनोविज्ञान में प्रयोगात्मक विधि का प्रयोग होता है जबकि समाजशास्त्र में तुलनात्मक विधि का प्रयोग होता है।
  • समाजशास्त्र मानवीय व्यवहार के सामाजिक पक्ष का अध्ययन करता है जबकि मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार के मनोवैज्ञानिक पक्ष का अध्ययन करता है।
  • समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र काफ़ी विशाल है जबकि मनोविज्ञान का विषय क्षेत्र काफ़ी सीमित है।

प्रश्न 10.
समाजशास्त्र तथा इतिहास के मध्य अन्तरों की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
1. इतिहास में सामाजिक इतिहास की नई शाखा का विकास, समाजशास्त्र के कई संकल्पों, विचारों व विधियों आदि को अपने अध्ययन क्षेत्र में शामिल कर लिया है। इस प्रकार इतिहासकार को कई तरह की समस्याओं को सुलझाने में समाजशास्त्र से मदद मिलती है।

2. समाजशास्त्र व इतिहास में अलग-अलग विधियों को इस्तेमाल किया जाता है। समाजशास्त्र में तुलनात्मक विधि का प्रयोग किया जाता है तो वहां इतिहास में वर्णनात्मक विधि का।

3. दोनों विज्ञान की विश्लेषण की इकाइयों में भिन्नता है। समाजशास्त्र की विश्लेषण की इकाई मानवीय समूह है परन्तु इतिहास मानव के कारनामों के अध्ययन पर बल देता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र कैसे अन्य सामाजिक विज्ञानों से भिन्न है ? किसी दो पर विस्तार से चर्चा कीजिए।
उत्तर-
व्यक्ति का जीवन कई दिशाओं से सम्बन्धित है। जब समाजशास्त्र को किसी भी समाज का अध्ययन करना हो तो उसको अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान इत्यादि से भी सहायता लेनी पड़ती है। जैसे अर्थ वैज्ञानिक उत्पादन, वितरण, उपभोग इत्यादि सम्बन्धी बताता है, इतिहास हमें प्राचीन घटनाओं का ज्ञान देता है, इत्यादि। समाजशास्त्र इनकी सहायता से विस्तारपूर्वक अध्ययन योग्य हो जाती है। इसलिए इसे सभी सामाजिक विज्ञानों की मां भी कहते इसके अतिरिक्त समाजशास्त्र के विषय प्रति अलग-अलग समाजशास्त्रियों की अलग-अलग धारणाएं हैं, जैसे कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार यह एक स्वतन्त्र विज्ञान है और दूसरे विद्वानों के अनुसार यह शेष सामाजिक विज्ञानों का मिश्रण है। हरबर्ट स्पैंसर जैसे समाजशास्त्रियों ने यह बताया है कि समाजशास्त्र संपूर्ण तौर पर बाकी सामाजिक विज्ञानों से अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें सभी सामाजिक विज्ञानों के विषय वस्तु को अध्ययन हेतु प्रयोग किया जाता है। मैकाइवर ने अपनी पुस्तक ‘समाज’ में इस बात का जिक्र किया है कि हम इन सभी सामाजिक विज्ञानों को बिल्कुल एक-दूसरे से अलग करके अध्ययन नहीं कर सकते। इन विद्वानों के अनुसार, समाजशास्त्र की अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं अपितु यह शेष विज्ञानों का मिश्रण है।

कई समाजशास्त्री इसको एक स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं। जैसे गिडिंग्स, वार्ड कहते हैं कि समाज शास्त्र को अपने विषय क्षेत्र को समझने हेतु समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों पर आधारित होना पड़ता है परन्तु जब यह सम्पूर्ण समाज का अध्ययन करता है तो इसे बाकी सामाजिक विज्ञानों के विषय-क्षेत्र का अध्ययन करने की आवश्यकता पड़ती है।

बार्स (Barmes) के अनुसार, “समाजशास्त्र न तो दूसरे सामाजिक विज्ञानों की रखैल है और न ही दासी अपितु उनकी बहन है।”

इस तरह हम देखते हैं कि दूसरा कोई भी सामाजिक विज्ञान सामाजिक संस्थाओं, प्रक्रियाओं, सम्बन्धों इत्यादि का अध्ययन नहीं करता केवल समाजशास्त्र इनका अध्ययन करता है। इस प्रकार समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का सम्पूर्ण अध्ययन करता है। इसकी अपनी विषय-वस्तु है। समाज के जिन भागों का अध्ययन समाज-विज्ञान करता है उनका अध्ययन दूसरे सामाजिक विज्ञान नहीं करते।

उपरोक्त वर्णन से हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि यदि समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के लिए दूसरे सामाजिक विज्ञानों की सहायता लेता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह सहायता लेनी ही जानता है पर देनी नहीं। दे तो वो सकता है यदि हम इस बात को स्वीकार लें कि इसकी अपनी विषय-वस्तु भी है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि किसी भी सामाजिक समस्या का हल ढूंढ़ना हो तो अकेले किसी भी सामाजिक विज्ञान के लिए सम्भव नहीं कि वह ढूंढ़ सके। यदि समस्या आर्थिक क्षेत्र से सम्बन्धित है तो केवल अर्थशास्त्री ही नहीं उस समस्या का हल ढूंढ़ सकते, अपितु दूसरे सामाजिक विज्ञानों की सहायता भी हमें लेनी पड़ती है। इसीलिए यह सभी सामाजिक विज्ञान (Social Sciences) एक-दूसरे से सम्बन्धित भी हैं परन्तु इनकी विषय-वस्तु अलग भी है।

(i) समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में अंतर (Difference between Sociology Economics)-

समाज शास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित भी हैं और अलग भी। इसलिए दोनों के सम्बन्धों और अन्तरों को जानने से पूर्व हमारे लिए यह आवश्यक है कि पहले हम यह जान लें कि समाज शास्त्र और अर्थशास्त्र के क्या अर्थ हैं।

साधारण शब्दों में, मनुष्य जो भी आर्थिक क्रियाएं करता है, अर्थशास्त्र उनका अध्ययन करता है। अर्थशास्त्र यह बताता है कि मनुष्य अपनी न खत्म होने वाली इच्छाओं की पूर्ति अपने सीमित स्रोतों के साथ कैसे करता है। मनुष्य अपनी आर्थिक इच्छाओं की पूर्ति पैसा करता है। इसीलिए पैसों के उत्पादन, वितरण और उपभोग से सम्बन्धित मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन भी अर्थ की विज्ञान करता है। इस प्रकार इस व्याख्या में पैसे को अधिक महत्त्व दिया गया है पर आधुनिक अर्थशास्त्री पैसे की जगह पर मनुष्य को अधिक महत्त्व देते हैं।

समाजशास्त्र मानव संस्थाओं, सम्बन्धों, समूहों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों, कीमतों, आपसी सम्बन्धों, सम्बन्धों की व्यवस्था, विचारधारा और उनमें होने वाले परिवर्तनों और परिणामों का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र समाज का अध्ययन करता है जो कि सामाजिक सम्बन्धों का जाल है। – मनुष्य की प्रत्येक आर्थिक क्रिया व्यक्तियों की अन्तक्रियाओं का परिणाम होती है। इसके साथ-साथ आर्थिक क्रियाएं, सामाजिक क्रियाओं और सामाजिक व्यवस्था पर भी प्रभाव डालती हैं। इसलिए सामाजिक व्यवस्था सम्बन्धी जानने हेतु आर्थिक संस्थाओं के बारे में पता होना आवश्यक है और आर्थिक क्रियाओं सम्बन्धी पता करने के लिए सामाजिक अन्तक्रियाओं का पता होना आवश्यक है।

समाजशास्त्र का अर्थशास्त्र को योगदान (Contribution of Sociology to Economics)-अर्थशास्त्र व्यक्ति को यह बताता है कि कम साधन होने के साथ वह किस प्रकार अपनी अनगिनत इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है। अर्थशास्त्री व्यक्ति का कल्याण तभी कर सकता है यदि उसे सामाजिक परिस्थितियों का पूरा ज्ञान हो परन्तु इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए वह समाजशास्त्र से सहायता लेता है।

अतः ऊपर दी गई चर्चा से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि अर्थशास्त्री समाजशास्त्रियों की सहायता के बिना कुछ भी नहीं कर सकते। कुछ भी नहीं से अर्थ है समाज में न तो प्रगति ला सकते हैं और न ही अपनी समस्याओं का हल ढूंढ़ सकते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि अर्थशास्त्री अपने क्षेत्र के अध्ययन के लिए समाज शास्त्रियों पर निर्भर हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मनुष्य की प्रत्येक आर्थिक क्रिया, सामाजिक अन्तक्रिया का परिणाम होती है। इसीलिए मनुष्य की प्रत्येक आर्थिक क्रिया को उसके सामाजिक सन्दर्भ में रखकर ही समझा जा सकता है। इसीलिए समाज के आर्थिक विकास के लिए या समाज के लिए कोई आर्थिक योजना बनाने के लिए, उस समाज के सामाजिक पक्ष के पता होने की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार अर्थशास्त्र समाजशास्त्र पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र का समाजशास्त्र को योगदान (Contribution of Economics to Sociology)-समाज शास्त्र भी अर्थशास्त्र से बहुत सारी सहायता लेता है। आधुनिक समाज में आर्थिक क्रियाओं ने समाज के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है। कई प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों मैक्स वैबर, कार्ल मार्क्स, दुर्थीम और सोरोकिन इत्यादि ने आर्थिक क्षेत्र के अध्ययन के बाद सामाजिक क्षेत्र का अध्ययन किया। जब भी समाज में समय-समय पर आर्थिक कारणों में परिवर्तन आया तो उनका प्रभाव हमारे समाज पर ही हुआ। समाजशास्त्री ने जब यह अध्ययन करना होता है कि हमारे समाज में सामाजिक सम्बन्ध क्यों टूट रहे हैं या समाज में व्यक्ति का व्यक्तिवादी दृष्टिकोण क्यों हो रहा है तो इसका अध्ययन करने के लिए वह समाज की आर्थिक क्रियाओं पर नज़र डालता है तो यह महसूस करता है कि जैसे-जैसे समाज में पैसे की आवश्यकता बढ़ती जा रही है लोग अधिकाधिक सुविधाओं वाली चीजें प्राप्त करने के पीछे लग जाते हैं।

उसके साथ समाज का दृष्टिकोण भी पूंजीपति हो रहा है। प्रत्येक व्यक्ति को समाज में जीने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ रही है। इसी कारण संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और व्यक्तियों की दृष्टि भी व्यक्तिवादी हो जाती है। इसके अतिरिक्त और भी कई प्रकार की सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करने के लिए उसको अर्थशास्त्र की सहायता लेनी पड़ती है। उदाहरण के लिए नशा करने जैसी सामाजिक समस्या ही ले लो। इस समस्या ने जवान पीढ़ी को काफ़ी कमज़ोर बना दिया है। इस समस्या का मुख्य कारण आर्थिक है क्योंकि जैसे-जैसे लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल करके (स्मगलिंग इत्यादि) आवश्यकता से अधिक पैसा कमा लेते हैं तब वह पैसों का दुरुपयोग करने लग जाते हैं। अत: यह नशे के दुरुपयोग जैसी बुरी सामाजिक समस्या, जोकि समाज को खोखला कर रही है, से बचने के लिए हमें ग़लत साधनों से पैसे कमाने पर निगरानी रखनी चाहिए जिससे कि दहेज प्रथा, नशे का प्रयोग, जुआ खेलना आदि बुरी सामाजिक समस्याओं का अन्त किया जा सके। इन समस्याओं को खत्म करने के लिए समाजशास्त्र अर्थशास्त्र पर निर्भर रहता है।

आजकल के समय में बहुत सारे आर्थिक वर्ग, जैसे मज़दूर वर्ग, पूंजीपति वर्ग, उपभोक्ता और उत्पादक वर्ग सामने आए हैं। इसलिए इन वर्गों और उनके सम्बन्धों को समझने के लिए यह आवश्यक है कि समाजशास्त्र इन वर्गों के सामाजिक सम्बन्धों को समझे। इन आर्थिक सम्बन्धों को समझने के लिए उसे अर्थ विज्ञान की सहायता लेनी ही पड़ती है।

समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में अंतर (Difference between Sociology & Economics)-समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में जहां इतना गहरा सम्बन्ध पाया जाता है और यह भी पता चलता है कि कैसे यह दोनों विज्ञान एक-दूसरे के नियमों व परिणामों का खुलकर प्रयोग करते हैं। इन दोनों विज्ञानों में भिन्नता भी पाई जाती है, जो निम्नलिखित अनुसार है-

1. विषय क्षेत्र (Scope)-समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के विषय-क्षेत्र में भी अन्तर है। समाजशास्त्र समाज के अलग-अलग भागों का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है। इसलिए समाजशास्त्र का क्षेत्र विशाल है, परन्तु अर्थशास्त्र केवल समाज के आर्थिक हिस्से के अध्ययन तक ही सीमित है, इसीलिए इसका विषय क्षेत्र सीमित है।

2. सामान्य और विशेष (General & Specific) समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है क्योंकि यह उन सब प्रकार के सामाजिक प्रकटनों का अध्ययन करता है जो हरेक समाज के हरेक भाग से सम्बन्धित नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज से सम्बन्धित हैं। परन्तु अर्थशास्त्र एक विशेष विज्ञान है, क्योंकि इसका सम्बन्ध आर्थिक क्रियाओं तक सीमित है।

3. दृष्टिकोण में अन्तर (Different Points of View)-समाजशास्त्र का कार्य समाज में पाई गई सामाजिक क्रियाओं को समझना है, सामाजिक समस्याओं आदि का अध्ययन करना है। इसलिए इसका दृष्टिकोण सामाजिक है। दूसरी ओर अर्थशास्त्री का सम्बन्ध व्यक्ति की पदार्थ खुशी से है जैसे अधिकाधिक पैसा कैसे कमाना है, उसका विभाजन कैसे करना है और उसका प्रयोग कैसे करना है आदि। इसीलिए इसका दृष्टिकोण आर्थिक है।

4. इकाई के अध्ययन में अन्तर (Difference in Study of Unit)-समाजशास्त्र की इकाई समूह है। वह समूह में रह रहे व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करता है। परन्तु दूसरी ओर अर्थशास्त्री व्यक्ति के आर्थिक पक्ष के अध्ययन से सम्बन्धित होता है। इसीलिए इसकी इकाई व्यक्ति है।

(ii) समाजशास्त्र तथा राजनीतिक विज्ञान में अंतर (Difference between Sociology and Political Science)-

राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र का आपस में बहत गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से अन्तरसम्बन्धित हैं। प्लैटो और अरस्तु के अनुसार, राज्य और समाज के अर्थ एक ही हैं। बाद में इनके अर्थ अलग कर दिए गए और राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध केवल राज्य के कार्यों से सम्बन्धित कर दिया गया। इसी समय 1850 ई० के बाद समाज शास्त्र ने भी अपने विषय-क्षेत्र को कांट-छांट करके अपना अलग विषय-क्षेत्र बना लिया और अपने आपको राज्य से अलग कर लिया।

इस विज्ञान में राज्य की उत्पत्ति, विकास, राज्य का संगठन, सरकार के शासनिक प्रबन्ध की व्यवस्था और इसके साथ सम्बन्धित संस्थाओं और उनके कार्यों का अध्ययन किया जाता है। यह व्यक्ति के राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित समूह और संस्थाओं का अध्ययन करता है। संक्षेप में, हम यह कह सकते हैं कि राजनीति विज्ञान में केवल संगठित सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

राजनीति विज्ञान मनुष्य के राजनीतिक जीवन और उससे सम्बन्धित संस्थाओं का अध्ययन करता है। यह राज्य की उत्पत्ति, विकास, विशेषताओं, राज्य के संगठन, सरकार, उसकी शासन प्रणाली, राज्य से सम्बन्धित संस्थाओं का अध्ययन करता है। इस प्रकार राजनीति विज्ञान केवल राजनीतिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है। दूसरी ओर समाजशास्त्र समाज सम्बन्धों, सम्बन्धों के अलग-अलग स्वरूपों, समूहों, प्रथाओं, प्रतिमानों, संरचनाओं, संस्थाओं, इनके अन्तर्सम्बन्धों, रीति-रिवाजों, रूढ़ियों, परम्पराओं का अध्ययन करता है।

जहां राजनीति विज्ञान, राजनीति अर्थात् राज्य और सरकार का अध्ययन करता है, दूसरी ओर, समाजशास्त्र सामाजिक निरीक्षण की प्रमुख एजेंसियों में राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन करता है। ये दोनों विज्ञान समूचे समाज का अध्ययन करते हैं। समाजशास्त्र ‘राज्य’ को एक राजनीतिक संस्था के रूप में देखता है और राजनीति विज्ञान उस राज्य को संगठन और कानून के रूप में देखता है। मैकाइवर और पेज के अनुसार ‘समाज’ और ‘राज्य’ का दायरा एक नहीं और न ही दोनों का विस्तार साथ-साथ हुआ है। अपितु राज्य की स्थापना समाज में कुछ विशेष उद्देश्यों की प्राप्ति करने के लिए हुई है। . रॉस (Ross) के अनुसार, “राज्य अपनी पुरानी अवस्था में राजनीतिक अवस्था से अधिक सामाजिक संस्था थी। यह सत्य है कि राजनीतिक तथ्यों का ज्ञान सामाजिक तथ्यों में ही है। इन दोनों विज्ञानों में अन्तर केवल इसीलिए है कि इन दोनों विज्ञानों के क्षेत्र की विशालता अध्ययन के लिए विशेष होती है, बल्कि इसीलिए नहीं है कि इनमें कोई स्पष्ट विभाजन रेखा है।” __ऊपर दी गई परिभाषाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि राजनीतिक विज्ञान का सम्बन्ध समाज में पाई जाने वाली संस्थाओं, सरकार और संगठनों का अध्ययन करने से है जबकि समाजशास्त्र का सम्बन्ध समाज का अध्ययन करने से है परन्तु राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र समूचे समाज का ही हिस्सा है जिसका समाजशास्त्र अध्ययन करता है। इस प्रकार इन दोनों विज्ञानों में अन्तर-निर्भरता भी पाई जाती है।

समाजशास्त्र का राजनीति विज्ञान को योगदान (Contribution of Sociology to Political Science)राजनीति विज्ञान में मानव को राजनीतिक प्राणी माना जाता है पर यह नहीं बताया जाता कि वह राजनीतिक कैसे और कब बना। यह सब पता करने के लिए राजनीति विज्ञान समाज शास्त्र की सहायता लेता है। यदि राजनीतिक विज्ञान समाजशास्त्र के सिद्धान्तों की सहायता ले तो मनुष्य से सम्बन्धित उसके अध्ययनों को बहुत सरल और सही बनाया जा सकता है। राजनीति विज्ञान जब अपनी नीतियां बनाता है तो उसको सामाजिक कीमतों और आदर्शों को मुख्य रखना पड़ता है।

राजनीति विज्ञान को सामाजिक परिस्थितियों का ध्यान रखकर ही कानून बनाना पड़ता है। हमारी सामाजिक परम्पराएं, संस्कृति, प्रथाएं समाज के सदस्यों पर नियन्त्रण रखने हेतु और समाज को संगठित तरीके से चलाने के लिए बनाई जाती हैं परन्तु जब इनको सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है तो यह कानून बन जाती हैं।

जब सरकार समाज की बनाई हुई उन प्रथाओं को, जो समूह द्वारा भी प्रमाणित होती हैं, को नज़र-अंदाज कर देती है तो ऐसी स्थिति में समाज विघटन के पथ पर चला जाता है। इससे समाज के विकास में भी रुकावट आ जाती है। राजनीति विज्ञान को सामाजिक परिस्थितियों की या प्रथाओं इत्यादि की जानकारी प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्र पर निर्भर रहना पड़ता है। समाज में हम कानून का सहारा लेकर समस्याओं का हल ढूंढ सकते हैं। अतः, उपरोक्त विवरण से यह काफ़ी हद तक स्पष्ट हो जाता है कि राजनीतिक विज्ञान को अपने क्षेत्र में अध्ययन करने के लिए समाजशास्त्र की बहुत आवश्यकता पड़ती है। इसी के साथ समाज की तरक्की, विकास और संगठन आदि भी बना रहता है। इस उपरोक्त विवरण का अर्थ यह नहीं कि समाजशास्त्र ही राजनीति विज्ञान की सहायता करता है अपितु राजनीति विज्ञान की भी समाजशास्त्र में बहुत ज़रूरत रहती है।

राजनीति विज्ञान का समाजशास्त्र को योगदान (Contribution of Political Science to Sociology)यदि समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान को कुछ देता है तो उससे बहुत कुछ लेता भी है। समाजशास्त्र भी राजनीति विज्ञान पर निर्भर करता है और उससे मदद लेता है।

किसी भी समाज की बिना नियन्त्रण के कल्पना ही नहीं की जा सकती। समाजशास्त्र की इस शाखा को राजनीति समाजशास्त्र भी कहते हैं। यदि देखा जाए तो समाज या सामाजिक जीवन को असली जीवन ही राजनीति विज्ञान से प्राप्त हुआ है। समाज की प्रगति, संगठन, संस्थाओं, प्रक्रियाओं, परम्पराओं, संस्कृति तथा सामाजिक सम्बन्धों आदि पर आधारित है। यदि हम प्राचीन समाज का ज़िक्र करें, जब राजनीतिक विज्ञान की पूर्णतया शुरुआत नहीं हुई थी, तब व्यक्ति. की ज़िन्दगी काफ़ी सरल थी परन्तु फिर भी उस सरल जीवन पर अनौपचारिक नियन्त्रण था। धीरे-धीरे समाज जैसे-जैसे विकसित होता गया, वैसे-वैसे हमें कानून की आवश्यकता महसूस होने लगी। उदाहरण के लिए, जब भारत में जाति प्रथा विकसित थी, तब कुछ जातियों के लोगों की स्थिति समाज में अच्छी थी, वह समाज को अपने ही ढंग से चलाते थे। दूसरी ओर जिन व्यक्तियों की स्थिति जाति प्रथा में निम्न थी वे जाति के बनाए हुए नियमों से बहुत तंग थे। जाति प्रथा के बनाए जाने का मुख्य कारण समाज में सन्तुलन कायम करना था। जब राजनीति विज्ञान ने अपनी जड़ें मज़बूत कर ली तो उसने लोगों पर कानून द्वारा नियन्त्रण करना शुरू कर दिया। जो प्रथाएं समाज के लिए एक बुराई बन गई थीं और लोग भी उनको समाप्त करना चाहते थे तो कानून ने वहां अपने प्रभाव से लोगों को मुक्त करवाया क्योंकि इस कानून ने सभी लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार करना ठीक समझा और लोगों ने भी इसका सम्मान किया। इसके अतिरिक्त समय-समय पर समाज में वहमों-भ्रमों के आधार पर कई ऐसी प्रथाएं लोगों द्वारा कायम हुई थीं जिन्होंने समाज को अन्दर ही अन्दर से खोखला कर दिया था। इन प्रथाओं को समाप्त करना समाजशास्त्र के वश का काम नहीं था। इसीलिए उसने राजनीति विज्ञान का सहारा लिया।

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि चाहे समस्या राजनीतिक हो या सामाजिक, हमें दोनों की इकट्ठे सहायता की आवश्यकता पड़ती है। समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान दोनों ही समाज के अध्ययन से यद्यपि अलग-अलग दृष्टिकोण से जुड़े हुए हैं, परन्तु फिर भी इनकी समस्याएं समाज से सम्बन्धित हैं। इसीलिए इनमें काफ़ी अन्तर-निर्भरता होती है।

समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान में अन्तर (Difference between Sociology & Political Science)—यदि समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे पर निर्भर हैं तो उनमें कुछ अन्तर भी हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

(1) समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है और राजनीति विज्ञान एक विशेष विज्ञान है। समाज शास्त्र समाज में पाए जाने वाले व्यक्ति के हर पक्ष के अध्ययन से सम्बधित होता है। इसमें सामाजिक प्रक्रियाओं, परम्पराओं, सामाजिक नियन्त्रण आदि सब आ जाते हैं अर्थात् .समाजशास्त्र, उन सब प्रकार के प्रपंचों का अध्ययन करता है, जोकि हर प्रकार की मानवीय क्रियाओं से सम्बन्धित होते हैं। यह सम्पूर्ण समाज का अध्ययन करता है। इसीलिए सामान्य विज्ञान है परन्तु दूसरी ओर राजनीति विज्ञान व्यक्ति के जीवन के राजनीतिक हिस्से का अध्ययन करता है, अर्थात् उन क्रियाओं का अध्ययन करता है, जहां मनुष्य, सरकार या राज्य द्वारा दी गई रक्षा और अधिनिम प्राप्त करता है। इसीलिए यह विशेष विज्ञान है।

(2) समाजशास्त्र एक सकारात्मक विज्ञान है और राजनीति विज्ञान एक आदर्शवादी विज्ञान है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध राज के स्वरूप से भी होता है। इसमें समाज द्वारा प्रमाणित नियमों को भी स्वीकारा जाता है। परन्तु समाजशास्त्र काफ़ी स्वतन्त्र रूप में अध्ययन करता है, अर्थात् इसकी दृष्टि निष्पक्षता वाली होती है।

(3) राजनीति विज्ञान व्यक्ति को एक राजनीतिक प्राणी मानकर ही अध्ययन करता है परन्तु समाजशास्त्र इससे भी सम्बन्धित होता है कि व्यक्ति किस तरह और क्यों राजनीतिक प्राणी बना ?

(4) समाजशास्त्र असंगठित और संगठित सम्बन्धों समुदायों आदि का अध्ययन करता है क्योंकि इसमें चेतन और अचेतन प्रक्रियाओं दोनों का अध्ययन किया जाता है। परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल संगठित सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है और इसमें चेतन प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। राज्य के चार तत्त्व जनसंख्या, निश्चित स्थान, सरकार, प्रभुत्व इसमें आ जाते हैं। यह चारों तत्त्व चेतन प्रक्रियाओं से सम्बन्धित हैं। समाजशास्त्र क्यों और कैसे राजनीतिक विषय बना।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र और इतिहास में संबंधों पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
इतिहास और समाजशास्त्र दोनों मानव समाज का अध्ययन करते हैं। इतिहास आदिकाल से लेकर अब तक मानवीय समाज की प्रमुख घटनाओं की सूची तैयार करता है और उन्हें कालक्रम के आधार पर संशोधित करके मानवीय जीवन की एक कहानी प्रस्तुत करता है। समाजशास्त्र और इतिहास दोनों मानवीय समाज का अध्ययन करते हैं। वास्तविकता में समाज शास्त्र की उत्पत्ति इतिहास से हुई है। समाजशास्त्र में ऐतिहासिक विधियों का प्रयोग किया जाता है जो इतिहास से ली गई हैं।

इतिहास मानव समाज के बीते हुए समय का अध्ययन करता है। यह आदिकाल से लेकर अब तक के मानवीय समाज का कालबद्ध वर्णन तैयार करता है। इतिहास केवल ‘क्या था’ का ही वर्णन नहीं करता अपितु ‘कैसे हुआ’ का भी विश्लेषण करता है। इसलिए इतिहास पढ़ने से हमें पता चलता है कि समाज किस तरह पैदा हुआ, इसमें सम्बन्ध, संस्थाएं, रीति-रिवाज कैसे आए। इस प्रकार इतिहास हमारे भूतकाल से सम्बन्धित है कि भूतकाल में क्याक्या हुआ, क्यों और कैसे हुआ।

इसके विपरीत समाजशास्त्र वर्तमान के मानवीय समाज का अध्ययन करता है। इसमें सामाजिक सम्बन्धों, उनके स्वरूपों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं, संस्थाओं आदि का अध्ययन होता है। इसके साथ-साथ समाजशास्त्र में मानवीय संस्कृति, संस्कृति के अलग-अलग स्वरूपों का भी अध्ययन किया जाता है। इस तरह समाजशास्त्र वर्तमान समाज के अलग-अलग सम्बन्धों, संस्थाओं इत्यादि का अध्ययन करता है।

दोनों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि इतिहास बीते हुए समाज के प्रत्येक पहलू का अध्ययन करता है और समाजशास्त्र उसी कार्य को वर्तमान में आगे बढ़ाते हैं।

इतिहास का समाजशास्त्र को योगदान (Contribution of History to Sociology)- समाजशास्त्र इतिहास द्वारा दी गई सामग्री का प्रयोग करता है। मानवीय समाज पुराने समय से चले आ रहे सामाजिक सम्बन्धों का जाल है जिसे समझने के लिए किसी-न-किसी समय पूर्व-काल में जाना पड़ता है। जीवन की उत्पत्ति, ढंग, सारा कुछ अतीत का भाग है। इनका अध्ययन करने के लिए समाजशास्त्री को इतिहास की सहायता लेनी ही पड़ती है क्योंकि इतिहास से ही सामाजिक तथ्यों का ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए वर्तमान को समझने के लिए इतिहास की आवश्यकता पड़ती है।

समाज शास्त्र में तुलनात्मक विधि का प्रयोग अलग-अलग संस्थाओं की तुलना करने के लिए किया जाता है। इस तरह करने के लिए ऐतिहासिक सामग्री की आवश्यकता पड़ती है। दुर्थीम द्वारा किए गए ‘सामाजिक तथ्य’ में भी इतिहास द्वारा दी गई सूचनाओं का प्रयोग किया गया है। वास्तविकता में तुलनात्मक विधि का प्रयोग करने वाले समाजशास्त्रियों को इतिहास की सहायता लेनी ही पड़ती है।

अलग-अलग सामाजिक संस्थाएं एक दूसरे को प्रभावित करती रहती हैं। इन प्रभावों के कारण ही इनमें परिवर्तन आते रहते हैं। इन परिवर्तनों को देखने के लिए दूसरी संस्थाओं के प्रभाव को देखना आवश्यक हो जाता है। ऐतिहासिक सामग्री इन सबको समझने में सहायता करती है।

समाजशास्त्र का इतिहास को योगदान (Contribution of Sociology to History)- इतिहास भी समाजशास्त्र की सामग्री का प्रयोग करता है। आधुनिक इतिहास ने समाजशास्त्र के कई संकल्पों को अपने अध्ययन क्षेत्र में शामिल किया है। इसलिए सामाजिक इतिहास नाम की नयी शाखा का निर्माण हुआ है। सामाजिक इतिहास किसी राजा का नहीं, अपितु किसी संस्था के क्रमिक विकास अथवा किसी कारण से हुए परिवर्तनों का अध्ययन करता है। इस प्रकार इतिहास जो चीज़ पहले फिलॉसफी से उधार लेता था, अब वह समाजशास्त्र से उधार लेता

अन्तर (Differences) –
1. दृष्टिकोण में अन्तर (Difference of point of view)-दोनों एक ही विषय सामग्री का अलग-अलग दृष्टिकोणों से अध्ययन करते हैं। इतिहास युद्ध का वर्णन करता है लेकिन समाजशास्त्र उन घटनाओं का अध्ययन करता है जो युद्ध का कारण बनीं। समाजशास्त्री उन घटनाओं का सामाजिक ढंग के साथ अध्ययन करता है। इस तरह इतिहास पुराने ज़माने पर बल देता है और समाजशास्त्र वर्तमान के ऊपर बल देता है।

2. विषय क्षेत्र में अन्तर (Difference of subject matter)-समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र इतिहास के विषय क्षेत्र से ज्यादा व्यापक है क्योंकि इतिहास कुछ विशेष घटनाओं का या नियमों का अध्ययन करता है जबकि समाजशास्त्र साधारण घटनाओं का या नियमों से अध्ययन करता है। इतिहास सिर्फ यह बताता है कि कोई घटना क्यों हुई, पर समाजशास्त्र अलग-अलग घटनाओं के अन्तर्सम्बन्धों के बीच रुचि रखता है और फिर घटनाओं के कारण बताने की कोशिश करता है।

3. विधियों में अन्तर (Difference of methods) समाजशास्त्र में तुलनात्मक विधि का प्रयोग होता है जबकि इतिहास में विवरणात्मक विधि का प्रयोग होता है। इतिहास किसी घटना का वर्णन करता है और उसके विकास के अलग-अलग पड़ावों (stages) का अध्ययन करता है, जिसके लिए वर्णन विधि ही उचित है। इसके विपरीत समाजशास्त्र किसी घटना के अलग-अलग देशों और अलग-अलग समय में मिलने वाले स्वरूपों का अध्ययन करके उस घटना में होने वाले परिवर्तनों के नियमों को स्थापित करता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इतिहास और समाजशास्त्र की विधियों में भी काफ़ी अन्तर पाया जाता है।

4. इकाई में अन्तर (Difference in Unit)-समाजशास्त्र के विश्लेषण की इकाई मानवीय समाज और समूह है जबकि इतिहास मानव के कारनामों या कार्यों के अध्ययन पर बल देता है।

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प्रश्न 3.
राजनीतिक वैज्ञानिकों के लिए समाजशास्त्रीय समझ क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
राजनीतिक विज्ञान और समाजशास्त्र का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से अन्तरसम्बन्धित हैं। प्लैटो और अरस्तु के अनुसार, राज्य और समाज के अर्थ एक ही हैं। बाद में इनके अर्थ अलग कर दिए गए और राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध केवल राज्य के कार्यों से सम्बन्धित कर दिया गया। इसी समय 1850 ई० के बाद समाजशास्त्र ने भी अपने विषय-क्षेत्र को कांट-छांट करके अपना अलग विषय-क्षेत्र बना लिया और अपने आपको राज्य से अलग कर दिया।

इस विज्ञान में राज्य की उत्पत्ति, विकास, राज्य का संगठन, सरकार के शासनिक प्रबन्ध की प्रणाली और इसके साथ सम्बन्धित संस्थाओं और उनके कार्यों का अध्ययन किया जाता है। यह व्यक्ति के राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित समूह और संस्थाओं का अध्ययन करता है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि राजनीति विज्ञान में केवल संगठित सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

राजनीति विज्ञान मानव के राजनीतिक जीवन और उससे सम्बन्धित संस्थाओं का अध्ययन करता है। यह राज्य की उत्पत्ति, विकास, विशेषताओं, राज्य के संगठन, सरकार, उसकी शासन प्रणाली, राज्य से सम्बन्धित संस्थाओं का अध्ययन करता है। इस प्रकार राजनीति विज्ञान केवल राजनीतिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है।

दूसरी ओर, समाजशास्त्र समाज सम्बन्धों, सम्बन्धों के अगल-अलग स्वरूपों, समूहों, प्रथाओं, प्रतिमानों, संरचनाओं, संस्थाओं, इनके अन्तर्सम्बन्धों, रीति-रिवाजों, रूढ़ियों, परम्पराओं का अध्ययन करता है।

जहां राजनीति विज्ञान राजनीति अर्थात् राज्य और सरकार का अध्ययन करता है, दूसरी ओर समाजशास्त्र सामाजिक निरीक्षण की प्रमुख एजेंसियों में राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन करता है। यह दोनों विज्ञान समूचे समाज का अध्ययन करते हैं। समाजशास्त्र ‘राज्य’ को एक राजनीतिक संस्था के रूप में देखता है और राजनीतिक विज्ञान उसी राज्य को संगठन और कानून के रूप में देखता है।

समाजशास्त्र का राजनीति विज्ञान को योगदान (Contribution of Sociology to Political Science)राजनीति विज्ञान में मानव को राजनीतिक प्राणी माना जाता है पर यह नहीं बताया जाता कि वह राजनीतिज्ञ कैसे कब बना। यह सब पता करने के लिए राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र की सहायता लेता है। यदि राजनीतिक विज्ञान समाजशास्त्र के सिद्धान्तों की सहायता ले तो मनुष्य से सम्बन्धित उसके अध्ययनों को बहुत सरल और सही बनाया जा सकता है। यदि राजनीति विज्ञान जब अपनी नीतियां बनाता है तो उसको सामाजिक कीमतों और आदर्शों को मुख्य रखना पड़ता है।

राजनीति विज्ञान को सामाजिक परिस्थितियों का ध्यान रखकर ही कानून बनाना पड़ता है। हमारी सामाजिक परम्पराएं, संस्कृति, प्रथाएं समाज के सदस्यों पर नियन्त्रण रखने के हेतु और समाज को संगठित तरीके से चलाने के लिए बनाई जाती हैं परन्तु जब इनको सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है तो यह कानून बन जाती हैं।

जब सरकार समाज की बनाई हुई उन प्रथाओं को, जो समूह द्वारा भी प्रमाणित होती हैं, को नज़र-अंदाज कर देती है तो ऐसी स्थिति में समाज विघटन के पथ पर चला जाता है। इससे समाज के विकास में भी रुकावट आ जाती है। राजनीति विज्ञान को सामाजिक परिस्थितियों की या प्रथाओं इत्यादि की जानकारी प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्र पर निर्भर रहना पड़ता है। समाज में हम कानून का सहारा लेकर समस्याओं का हल ढूंढ सकते हैं। अतः उपरोक्त विवरण से यह काफ़ी हद तक स्पष्ट हो जाता है कि राजनीतिक विज्ञान को अपने क्षेत्र में अध्ययन ‘ करने के लिए समाज शास्त्र की बहुत आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान समाजशास्त्र को कैसे प्रभावित करता है ?
उत्तर-
समाजशास्त्र और मनोविज्ञान, दोनों का आपस में गहरा सम्बन्ध होता है। यह दोनों ही विज्ञान मानव के व्यवहार का अध्ययन करते हैं। क्रैच एंड क्रैचफील्ड ने अपनी पुस्तक ‘सोशल साईकोलोजी’ में बताया “सामाजिक मनोविज्ञान समाज में व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करता है।
संक्षेप में हम देखते हैं कि समाजशास्त्र का अर्थ सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करना है और मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के मानसिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है। अब हम सामाजिक मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ देखेंगे।

सामाजिक मनोविज्ञान का अर्थ (Meaning of Social Psychology)-सबसे पहली बात तो इस सम्बन्ध में यह कही जाती है कि यह व्यक्तिगत व्यवहार का अध्ययन करता है अर्थात् समाज का जो प्रभाव उसके मानसिक भाग पर पड़ता है, उसका अध्ययन किया जाता है। व्यक्तिगत व्यवहार के अध्ययन को समझने के लिए, वह उसकी सामाजिक परिस्थितियों को नहीं देखता अपितु तन्तु ग्रन्थी प्रणाली के आधार पर करता है।

मानसिक प्रक्रियाओं जिनका अध्ययन सामाजिक मनोविज्ञान करता है; यह है मन, प्रतिक्रिया, शिक्षा, प्यार, नफरत, भावनाएं इत्यादि। मनोविज्ञान इन सामाजिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।

हम यह कह सकते हैं कि सामाजिक प्रकटन के वैज्ञानिक अध्ययन का आधार मनोवैज्ञानिक है और इनका हम सीधे तौर पर ही निरीक्षण कर सकते हैं। अतः इस तरह हम यह विश्लेषण करते हैं कि ये दोनों विज्ञान एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अब हम इस सम्बन्धी चर्चा करेंगे कि इन दोनों विज्ञानों की आपस में एक-दूसरे को देन है और इन दोनों में पाए गए नज़दीकी सम्बन्धों के आधार पर मनोविज्ञान की नई शाखा का जन्म हुआ, जो है सामाजिक मनोविज्ञान।

मनोविज्ञान का समाजशास्त्र को योगदान (Contribution of Psychology to Sociology) समाज शास्त्र में हम सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं। सामाजिक सम्बन्धों को समझने हेतु व्यक्ति के व्यवहार को समझना आवश्यक है क्योंकि मानव की मानसिक और शारीरिक आवश्यकताएं दूसरे व्यक्ति के साथ सम्बन्धों को प्रभावित करती हैं।

मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति मानव की इन मानसिक प्रक्रियाओं, विचारों, मनोभावों इत्यादि का सूक्ष्म अध्ययन करती है। समाजशास्त्र की व्यक्ति को या समाज के व्यवहारों को समझने हेतु मनोविज्ञान की आवश्यकता ज़रूर पड़ती है। ऐसा करने के लिए मनोविज्ञान की शाखा सामाजिक मनोविज्ञान सहायक होती है जो मनुष्य को सामाजिक स्थितियों में रखकर उनके अनुभवों, व्यवहारों और उनके व्यक्तित्व का अध्ययन करती है।

समाजशास्त्री यह भी कहते हैं कि समाज में होने वाले परिवर्तनों को समझने के लिए मनोवैज्ञानिक आधार बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाज को समझने के लिए व्यक्ति के व्यवहार को समझना आवश्यक है और यह काम मनोविज्ञान का है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions) :

प्रश्न 1.
पुस्तक Das Capital के लेखक कौन हैं ?
(A) वैबर
(B) दुर्थीम
(C) मार्क्स
(D) स्पैंसर।
उत्तर-
(C) मार्क्स।

प्रश्न 2.
इनमें से किसके साथ अर्थशास्त्र का सीधा सम्बन्ध नहीं है ?
(A) उपभोग
(B) धार्मिक क्रियाएं
(C) उत्पादन
(D) वितरण।
उत्तर-
(B) धार्मिक क्रियाएं।

प्रश्न 3.
समाजशास्त्र का इतिहास को क्या योगदान है ?
(A) इतिहास समाजशास्त्र की सामग्री का प्रयोग करता है
(B) इतिहास ने समाजशास्त्र के कई संकल्पों को अपने क्षेत्र में शामिल किया है
(C) सामाजिक इतिहास किसी संस्था के क्रमिक विकास तथा परिवर्तनों का अध्ययन करता है
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 4.
यह शब्द किसके हैं ? “समाज व्यक्ति का विस्तृत रूप है।” .
(A) मैकाइवर
(B) अरस्तु
(C) वैबर
(D) दुर्थीम।
उत्तर-
(B) अरस्तु।

III. सही/गलत (True/False) :

1. तारा विज्ञान प्राकृतिक विज्ञान है।
2. अर्थशास्त्र सामाजिक समस्याओं को समझाने में समाजशास्त्र की सहायता लेता है।
3. अरस्तु को राजनीति विज्ञान का जन्मदाता माना जाता है।
4. विज्ञान को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है।
5. राजनीति विज्ञान का दृष्टिकोण सामाजिक होता है।
6. अर्थशास्त्र में आगमन व निगमन विधियों का प्रयोग होता है।
7. अर्थशास्त्र उत्पादन, उपभोग तथा विभाजन से संबंधित होता है।
उत्तर-

  1. सही,
  2. सही,
  3. सही,
  4. गलत,
  5. गलत,
  6. सही,
  7. सही।

IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Word/line Question Answers) :

प्रश्न 1.
यदि समाजशास्त्र वर्तमान की तरफ देखता है तो इतिहास…………..की तरफ देखता है।
उत्तर-
यदि समाजशास्त्र वर्तमान की तरफ देखता है तो इतिहास भूत की तरफ देखता है।

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प्रश्न 2.
मानवशास्त्र …………से सम्बन्ध रखता है।
उत्तर-
मानवशास्त्र मानव के विकास एवं वृद्धि से सम्बन्ध रखता है।

प्रश्न 3.
मानवशास्त्र का कौन-सा हिस्सा समाजशास्त्र से सम्बन्धित है ?
उत्तर-
मानवशास्त्र का हिस्सा, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मानव विज्ञान समाजशास्त्र से सम्बन्धित है।

प्रश्न 4.
समाज किसके साथ बनता है ?
उत्तर-
समाज व्यक्तियों के साथ बनता है।

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प्रश्न 5.
इतिहास किसके अध्ययन पर बल देता है ?
उत्तर-
इतिहास मनुष्य के कारनामों के अध्ययन पर बल देता है।

प्रश्न 6.
प्राकृतिक विज्ञान की कोई उदाहरण दें।
उत्तर-
रसायन विज्ञान, पौधा विज्ञान, भौतिक विज्ञान इत्यादि सभी प्राकृतिक विज्ञान हैं।

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र को क्या समझने के लिए इतिहास पर निर्भर रहना पड़ता है ?
उत्तर-
समाजशास्त्र को आधुनिक समाज को समझने के लिए इतिहास पर निर्भर रहना पड़ता है।

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प्रश्न 8.
इतिहास किस प्रकार का विज्ञान है ?
उत्तर-
इतिहास मूर्त विज्ञान है।

प्रश्न 9.
अर्थशास्त्र किस चीज़ को समझने के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेता है ?
उत्तर-
अर्थशास्त्र सामाजिक समस्याओं को समझने के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेता है।

प्रश्न 10.
इतिहास में कौन-सी विधि का प्रयोग होता है ?
उत्तर-
इतिहास में विवरणात्मक विधि का प्रयोग होता है।

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प्रश्न 11.
अर्थशास्त्र किससे सम्बन्धित है ?
उत्तर-
अर्थशास्त्र, उत्पादन, उपभोग तथा विभाजन से सम्बन्धित है।

प्रश्न 12.
सभी सामाजिक विज्ञान एक-दूसरे के क्या होते हैं ?
उत्तर-
सभी सामाजिक विज्ञान एक-दूसरे के अनुपूरक तथा प्रतिपूरक होते हैं।

प्रश्न 13.
राजनीति शास्त्र का जन्मदाता………….को माना जाता है।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र का जन्मदाता अरस्तु को माना जाता है।

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प्रश्न 14.
किताब ‘अर्थशास्त्र’ का लेखक………था।
उत्तर-
किताब अर्थशास्त्र का लेखक कौटिल्य था।

प्रश्न 15.
राजनीति शास्त्र किस प्रकार की घटनाओं का अध्ययन करता है ?
उत्तर-
राजनीति शास्त्र केवल राजनीतिक घटनाओं का अध्ययन करता है।

प्रश्न 16.
शास्त्र को हम कितने भागों में बांट सकते हैं?
उत्तर-
शास्त्र को हम दो भागों में बांट सकते हैं-प्राकृतिक शास्त्र तथा सामाजिक शास्त्र।

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प्रश्न 17.
प्राकृतिक शास्त्र क्या होते हैं ?
उत्तर-
प्राकृतिक शास्त्र वे शास्त्र होते हैं, जो जीव वैज्ञानिक घटनाओं से तथा प्राकृतिक घटनाओं से सम्बन्धित होते हैं जैसे रसायन शास्त्र, भौतिक शास्त्र, वनस्पति शास्त्र इत्यादि।

प्रश्न 18.
सामाजिक शास्त्र क्या होते हैं ?
उत्तर-
सामाजिक शास्त्र में वे शास्त्र शामिल किए जाते हैं जो मानवीय समाज से सम्बन्धित घटनाओं, प्रक्रियाओं, विधियों इत्यादि से सम्बन्धित हों जैसे अर्थशास्त्र, मनोशास्त्र, मानवशास्त्र।

प्रश्न 19.
समाजशास्त्र में इतिहास से सम्बन्धित किस नई शाखा का विकास हुआ है?
उत्तर-
समाज शास्त्र में इतिहास से सम्बन्धित नई शाखा ऐतिहासिक समाजशास्त्र का निर्माण हुआ है।

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प्रश्न 20.
इतिहास क्या होता है?
उत्तर-
इतिहास आदि काल से लेकर आज तक मानवीय समाज की प्रमुख घटनाओं की सूची तैयार करता है तथा उन्हें कालक्रम के आधार पर संशोधित करके मानवीय जीवन की एक कहानी प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 21.
बार्स ने समाजशास्त्र और सामाजिक शास्त्रों के सन्दर्भ में क्या शब्द कहे थे?
उत्तर-
बार्स ने कहा था कि, “समाजशास्त्र न तो दूसरे सामाजिक शास्त्रों की रखैल है तथा न ही दासी बल्कि उनकी बहन है।”

अति लघु उतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विज्ञानों का विभाजन।
उत्तर-
विज्ञान में हम सिद्धांतों तथा विधियों को ढूंढ़ते हैं। इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है तथा वह हैं:(i) प्राकृतिक विज्ञान (ii) सामाजिक विज्ञान।

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प्रश्न 2.
प्राकृतिक विज्ञान।
उत्तर-
प्राकृतिक विज्ञान वह विज्ञान होता है जिसका संबंध प्रकृति तथा जैविक घटना से होता है, जिनका संबंध, तथ्यों, सिद्धांतों इत्यादि को ढूंढ़ने का प्रयास करता है। जैसे भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान।

प्रश्न 3.
सामाजिक विज्ञान।
उत्तर-
यह विज्ञान होते हैं जो मानवीय समाज से संबंधित तथ्यों, सिद्धांतों इत्यादि की खोज करते हैं। इसमें सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है जैसे अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, मानव विज्ञान इत्यादि।

प्रश्न 4.
इतिहास।
उत्तर-
इतिहास मानवीय समाज के बीते हुए समय का अध्ययन करता है। यह बीते हुए समय की घटनाओं तथा इनके आधार पर ही सामाजिक जीवन की विचारधारा को समझने तथा उसे समझाने का प्रयास करता है।

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प्रश्न 5.
आर्थिक संस्थाएं।
उत्तर-
आर्थिक संस्थाएं मनुष्य के आर्थिक क्षेत्र का अध्ययन करती हैं। इसमें धन का उत्पादन, वितरण तथा उपभोग किस ढंग से किया जाना चाहिए, इन सबका अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ।
उत्तर-
शब्द समाज शास्त्र अंग्रेजी भाषा के शब्द Sociology का हिन्दी रूपांतर है। Socio का अर्थ है समाज तथा Logos का अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार समाज के विज्ञान को समाजशास्त्र का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 7.
राजनीति विज्ञान।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान राज्य की उत्पत्ति, विकास, विशेषताओं इत्यादि से लेकर राज्य के संगठन, सरकार की शासन व्यवस्था इत्यादि से संबंधित सभाओं, संस्थाओं तथा उनके कार्यों का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 8.
समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में प्रयोग होने वाली विधियाँ।
उत्तर-
समाजशास्त्र में ऐतिहासिक विधि (Historical Method), तुलनात्मक विधि (Comparative method) का प्रयोग किया जाता है। अर्थशास्त्र में आगमन विधि तथा निगमन विधि का प्रयोग किया जाता है।

लघु उतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राकृतिक विज्ञान।
उत्तर-
प्राकृतिक विज्ञान वह होता है जिसका सम्बन्ध प्राकृतिक व जैविक घटनाओं से होता है जिनसे यह सम्बन्धित तथ्यों, सिद्धान्तों, इत्यादि को ढूंढने का यत्न करते हैं जैसे भौतिक विज्ञान, राजनीतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, तारा विज्ञान, जीव विज्ञान इत्यादि।

प्रश्न 2.
सामाजिक विज्ञान।
उत्तर-
यह विज्ञान वह विज्ञान होते हैं जो मानवीय समाज का सम्बन्धित तथ्यों, सिद्धान्तों आदि की खोज करते हैं। इसमें सामाजिक जीवन की वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। जैसे अर्थ विज्ञान, राजनीतिक विज्ञान, मानव विज्ञान, समाजशास्त्र इत्यादि।

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प्रश्न 3.
समाजशास्त्र बाकी सामाजिक विज्ञान से कैसे सम्बन्धित है ?
उत्तर-
सभी सामाजिक विज्ञान में विषय क्षेत्र का अंतर नहीं बल्कि दृष्टिकोण में ही केवल अंतर होता है परन्तु सभी सामाजिक विज्ञान केवल मानवीय समाज का ही अध्ययन करते हैं जिस कारण हम समाजशास्त्र को इन बाकी सामाजिक विज्ञानों से अलग नहीं कर सकते। जैसे अर्थशास्त्र, आर्थिक समस्याओं से चाहे सम्बन्धित है परन्तु ये समस्याएं समाज का ही एक हिस्सा है। किसी भी समस्या का हल ढूंढ़ने के लिए बाकी विज्ञानों का भी सहारा लेना पड़ता है।

प्रश्न 4.
इतिहास।
उत्तर-
इतिहास मानवीय समाज के भूतकाल का अध्ययन करता है। यह बीते हुए समय की घटनाओं तथा इनके आधार पर ही सामाजिक ज़िन्दगी की विचारधारा को समझने का यत्न करता है। इस प्रकार यह “क्या था” व “किस से हुआ” दोनों अवस्थाओं का विश्लेषण करता है। इस प्रकार इतिहास के द्वारा हमें मानवीय इतिहास के सामाजिक संगठन, रीति-रिवाजों, परम्पराओं इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र व इतिहास कैसे एक-दूसरे से अलग होते हैं ?
उत्तर-
ये दोनों सामाजिक विज्ञान एक ही विषय सामग्री का अलग-अलग दृष्टिकोण से अध्ययन करते हैं। इतिहास कुछ विशेष घटनाओं का अध्ययन करता है जबकि समाजशास्त्र साधारण घटनाओं में नियमों की खोज करता है व इनके अन्तर्सम्बन्धों का वर्णन करता है। समाजशास्त्र में तुलनात्मक विधि व इतिहास में विवरणात्मक विधि का प्रयोग किया जाता है। समाजशास्त्र मानवीय समूह का विश्लेषण करता है परन्तु इतिहास मानव के कारनामों के अध्ययन पर जोर देता है। इतिहास का सम्बन्ध भूतकाल की घटनाओं से है जबकि समाजशास्त्र समाज से ही अपना सम्बन्ध रखता है।

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प्रश्न 6.
समाजशास्त्र इतिहास पर आधारित।
उत्तर-
समाजशास्त्र को आधुनिक समाज को समझने के लिए प्राचीन समाज का सहारा लेना पड़ता है। इतिहास से ही इसके प्राचीन समाज के सामाजिक तत्त्व प्राप्त होते हैं। तुलनात्मक विधि का प्रयोग करने के लिए भी इतिहास से प्राप्त सामग्री की आवश्यकता पड़ती है जिस कारण समाजशास्त्र को इस पर आधारित होना पड़ता है। अलगअलग सामाजिक संस्थाएं जिनमें एक-दूसरे के प्रभाव के कारण परिवर्तन होता है तो इस परिवर्तन को समझने के लिए ऐतिहासिक सामग्री ही हमारी मदद करती है। ऐतिहासिक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की एक ऐसी शाखा है जिसके द्वारा सामाजिक परिस्थितियों को समझा जा सकता है।

प्रश्न 7.
मानव विज्ञान।
उत्तर-
मानव विज्ञान का अंग्रेजी रूपान्तर दो यूनानी शब्दों (Two Greeks Words) से मिलकर बना है Anthropo का अर्थ है मनुष्य व logy का अर्थ है विज्ञान अर्थात् मनुष्य का विज्ञान। इस विज्ञान का विषय बहुत विशाल है जिस कारण हम इसे तीन भागों में बांटते हैं

  • शारीरिक मानव विज्ञान (Physical Anthropology)-इसमें मानव के शारीरिक लक्षणों का अध्ययन किया जाता है, जिसमें मनुष्य की उत्पत्ति, विकास व नस्लों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • पूर्व ऐतिहासिक पुरासरी विज्ञान (Pre-historic Archedogy)-इस शाखा में मनुष्य के प्राथमिक इतिहास की खोज की जाती है जिस के लिए हमें कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता जैसे खण्डहरों की खुदाई आदि करके।
  • सामाजिक व सांस्कृतिक मानव विज्ञान (Social And Cultural Anthropology)-इसमें सम्पूर्ण मानवीय समाज का पूरा अध्ययन किया जाता है। सामाजिक मानव विज्ञान में आदिम (Primitive) समाज का अध्ययन किया जाता है अर्थात् गांव, कबीले, इत्यादि।

प्रश्न 8.
आर्थिक संस्थाएं।
उत्तर-
आर्थिक संस्थाओं को सामाजिक संस्थाओं से अलग नहीं किया जा सकता। आर्थिक संस्थाएं मनुष्य के आर्थिक क्षेत्र का अध्ययन करती हैं। इसमें धन का उत्पादन, वितरण व उपभोग किस ढंग से किया जाना चाहिए इसका वर्णन किया जाता है। अर्थ विज्ञान, आर्थिक सम्बन्धों व उनसे पैदा होने वाले संगठनों, संस्थाओं व समूहों का अध्ययन करता है। आर्थिक घटनाएं सामाजिक ज़रूरतों द्वारा ही निर्धारित होती हैं।

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प्रश्न 9.
मनोविज्ञान।
उत्तर-
मनोविज्ञान व्यक्तिगत का अध्ययन करता है व यह व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं व व्यवहार को समझने के लिए तन्तु ग्रन्थी प्रणाली द्वारा ही करता है। इसमें यादादश्त बुद्धि, योग्यताएं, हमदर्दी इत्यादि आती है। इसमे मानव से सम्बन्धित तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है। इसके अध्ययन का केन्द्र बिन्दु व्यक्ति होता है। इसी कारण यह व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करता है।

प्रश्न 10.
राजनीति विज्ञान।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान राज्य की उत्पत्ति, विकास, विशेषताओं इत्यादि से लेकर राज्य के संगठन, सरकार की शासन प्रणाली आदि से सम्बन्धित सभाओं, संस्थाओं तथा उनके देश का अध्ययन करता है। इसके द्वारा राजनीतिक शक्ति व सत्ता को व्यक्त किया जाता है।

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V. बड़े उत्तरों वाले प्रश्न :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में सम्बन्ध स्थापित करें।
उत्तर-
समाज शास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित भी हैं और अलग भी। इसलिए दोनों के सम्बन्धों और अन्तरों को जानने से पूर्व हमारे लिए यह आवश्यक है कि पहले हम यह जान लें कि समाज शास्त्र और अर्थशास्त्र के क्या अर्थ हैं।

साधारण शब्दों में, मनुष्य जो भी आर्थिक क्रियाएं करता है, अर्थशास्त्र उनका अध्ययन करता है। अर्थशास्त्र यह बताता है कि मनुष्य अपनी न खत्म होने वाली इच्छाओं की पूर्ति अपने सीमित स्रोतों के साथ कैसे करता है। मनुष्य अपनी आर्थिक इच्छाओं की पूर्ति पैसा करता है। इसीलिए पैसों के उत्पादन, वितरण और उपभोग से सम्बन्धित मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन भी अर्थ की विज्ञान करता है। इस प्रकार इस व्याख्या में पैसे को अधिक महत्त्व दिया गया है पर आधुनिक अर्थशास्त्री पैसे की जगह पर मनुष्य को अधिक महत्त्व देते हैं।

समाजशास्त्र मानव संस्थाओं, सम्बन्धों, समूहों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों, कीमतों, आपसी सम्बन्धों, सम्बन्धों की व्यवस्था, विचारधारा और उनमें होने वाले परिवर्तनों और परिणामों का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र समाज का अध्ययन करता है जो कि सामाजिक सम्बन्धों का जाल है। – मनुष्य की प्रत्येक आर्थिक क्रिया व्यक्तियों की अन्तक्रियाओं का परिणाम होती है। इसके साथ-साथ आर्थिक क्रियाएं, सामाजिक क्रियाओं और सामाजिक व्यवस्था पर भी प्रभाव डालती हैं। इसलिए सामाजिक व्यवस्था सम्बन्धी जानने हेतु आर्थिक संस्थाओं के बारे में पता होना आवश्यक है और आर्थिक क्रियाओं सम्बन्धी पता करने के लिए सामाजिक अन्तक्रियाओं का पता होना आवश्यक है।

समाजशास्त्र का अर्थशास्त्र को योगदान (Contribution of Sociology to Economics)-अर्थशास्त्र व्यक्ति को यह बताता है कि कम साधन होने के साथ वह किस प्रकार अपनी अनगिनत इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है। अर्थशास्त्री व्यक्ति का कल्याण तभी कर सकता है यदि उसे सामाजिक परिस्थितियों का पूरा ज्ञान हो परन्तु इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए वह समाजशास्त्र से सहायता लेता है।

अतः ऊपर दी गई चर्चा से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि अर्थशास्त्री समाजशास्त्रियों की सहायता के बिना कुछ भी नहीं कर सकते। कुछ भी नहीं से अर्थ है समाज में न तो प्रगति ला सकते हैं और न ही अपनी समस्याओं का हल ढूंढ़ सकते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि अर्थशास्त्री अपने क्षेत्र के अध्ययन के लिए समाज शास्त्रियों पर निर्भर हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मनुष्य की प्रत्येक आर्थिक क्रिया, सामाजिक अन्तक्रिया का परिणाम होती है। इसीलिए मनुष्य की प्रत्येक आर्थिक क्रिया को उसके सामाजिक सन्दर्भ में रखकर ही समझा जा सकता है। इसीलिए समाज के आर्थिक विकास के लिए या समाज के लिए कोई आर्थिक योजना बनाने के लिए, उस समाज के सामाजिक पक्ष के पता होने की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार अर्थशास्त्र समाजशास्त्र पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र का समाजशास्त्र को योगदान (Contribution of Economics to Sociology)-समाज शास्त्र भी अर्थशास्त्र से बहुत सारी सहायता लेता है। आधुनिक समाज में आर्थिक क्रियाओं ने समाज के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है। कई प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों मैक्स वैबर, कार्ल मार्क्स, दुर्थीम और सोरोकिन इत्यादि ने आर्थिक क्षेत्र के अध्ययन के बाद सामाजिक क्षेत्र का अध्ययन किया। जब भी समाज में समय-समय पर आर्थिक कारणों में परिवर्तन आया तो उनका प्रभाव हमारे समाज पर ही हुआ। समाजशास्त्री ने जब यह अध्ययन करना होता है कि हमारे समाज में सामाजिक सम्बन्ध क्यों टूट रहे हैं या समाज में व्यक्ति का व्यक्तिवादी दृष्टिकोण क्यों हो रहा है तो इसका अध्ययन करने के लिए वह समाज की आर्थिक क्रियाओं पर नज़र डालता है तो यह महसूस करता है कि जैसे-जैसे समाज में पैसे की आवश्यकता बढ़ती जा रही है लोग अधिकाधिक सुविधाओं वाली चीजें प्राप्त करने के पीछे लग जाते हैं।

उसके साथ समाज का दृष्टिकोण भी पूंजीपति हो रहा है। प्रत्येक व्यक्ति को समाज में जीने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ रही है। इसी कारण संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और व्यक्तियों की दृष्टि भी व्यक्तिवादी हो जाती है। इसके अतिरिक्त और भी कई प्रकार की सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करने के लिए उसको अर्थशास्त्र की सहायता लेनी पड़ती है। उदाहरण के लिए नशा करने जैसी सामाजिक समस्या ही ले लो। इस समस्या ने जवान पीढ़ी को काफ़ी कमज़ोर बना दिया है। इस समस्या का मुख्य कारण आर्थिक है क्योंकि जैसे-जैसे लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल करके (स्मगलिंग इत्यादि) आवश्यकता से अधिक पैसा कमा लेते हैं तब वह पैसों का दुरुपयोग करने लग जाते हैं। अत: यह नशे के दुरुपयोग जैसी बुरी सामाजिक समस्या, जोकि समाज को खोखला कर रही है, से बचने के लिए हमें ग़लत साधनों से पैसे कमाने पर निगरानी रखनी चाहिए जिससे कि दहेज प्रथा, नशे का प्रयोग, जुआ खेलना आदि बुरी सामाजिक समस्याओं का अन्त किया जा सके। इन समस्याओं को खत्म करने के लिए समाजशास्त्र अर्थशास्त्र पर निर्भर रहता है।

आजकल के समय में बहुत सारे आर्थिक वर्ग, जैसे मज़दूर वर्ग, पूंजीपति वर्ग, उपभोक्ता और उत्पादक वर्ग सामने आए हैं। इसलिए इन वर्गों और उनके सम्बन्धों को समझने के लिए यह आवश्यक है कि समाजशास्त्र इन वर्गों के सामाजिक सम्बन्धों को समझे। इन आर्थिक सम्बन्धों को समझने के लिए उसे अर्थ विज्ञान की सहायता लेनी ही पड़ती है।

समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में अंतर (Difference between Sociology & Economics)-समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में जहां इतना गहरा सम्बन्ध पाया जाता है और यह भी पता चलता है कि कैसे यह दोनों विज्ञान एक-दूसरे के नियमों व परिणामों का खुलकर प्रयोग करते हैं। इन दोनों विज्ञानों में भिन्नता भी पाई जाती है, जो निम्नलिखित अनुसार है-

1. विषय क्षेत्र (Scope)-समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के विषय-क्षेत्र में भी अन्तर है। समाजशास्त्र समाज के अलग-अलग भागों का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है। इसलिए समाजशास्त्र का क्षेत्र विशाल है, परन्तु अर्थशास्त्र केवल समाज के आर्थिक हिस्से के अध्ययन तक ही सीमित है, इसीलिए इसका विषय क्षेत्र सीमित है।

2. सामान्य और विशेष (General & Specific) समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है क्योंकि यह उन सब प्रकार के सामाजिक प्रकटनों का अध्ययन करता है जो हरेक समाज के हरेक भाग से सम्बन्धित नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज से सम्बन्धित हैं। परन्तु अर्थशास्त्र एक विशेष विज्ञान है, क्योंकि इसका सम्बन्ध आर्थिक क्रियाओं तक सीमित है।

3. दृष्टिकोण में अन्तर (Different Points of View)-समाजशास्त्र का कार्य समाज में पाई गई सामाजिक क्रियाओं को समझना है, सामाजिक समस्याओं आदि का अध्ययन करना है। इसलिए इसका दृष्टिकोण सामाजिक है। दूसरी ओर अर्थशास्त्री का सम्बन्ध व्यक्ति की पदार्थ खुशी से है जैसे अधिकाधिक पैसा कैसे कमाना है, उसका विभाजन कैसे करना है और उसका प्रयोग कैसे करना है आदि। इसीलिए इसका दृष्टिकोण आर्थिक है।

4. इकाई के अध्ययन में अन्तर (Difference in Study of Unit)-समाजशास्त्र की इकाई समूह है। वह समूह में रह रहे व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करता है। परन्तु दूसरी ओर अर्थशास्त्री व्यक्ति के आर्थिक पक्ष के अध्ययन से सम्बन्धित होता है। इसीलिए इसकी इकाई व्यक्ति है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान के सम्बन्धों की चर्चा करो।
अथवा
समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान में क्या सम्बन्ध है ? अन्तरों सहित स्पष्ट करो।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र का आपस में बहत गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से अन्तरसम्बन्धित हैं। प्लैटो और अरस्तु के अनुसार, राज्य और समाज के अर्थ एक ही हैं। बाद में इनके अर्थ अलग कर दिए गए और राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध केवल राज्य के कार्यों से सम्बन्धित कर दिया गया। इसी समय 1850 ई० के बाद समाज शास्त्र ने भी अपने विषय-क्षेत्र को कांट-छांट करके अपना अलग विषय-क्षेत्र बना लिया और अपने आपको राज्य से अलग कर लिया।

इस विज्ञान में राज्य की उत्पत्ति, विकास, राज्य का संगठन, सरकार के शासनिक प्रबन्ध की व्यवस्था और इसके साथ सम्बन्धित संस्थाओं और उनके कार्यों का अध्ययन किया जाता है। यह व्यक्ति के राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित समूह और संस्थाओं का अध्ययन करता है। संक्षेप में, हम यह कह सकते हैं कि राजनीति विज्ञान में केवल संगठित सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

राजनीति विज्ञान मनुष्य के राजनीतिक जीवन और उससे सम्बन्धित संस्थाओं का अध्ययन करता है। यह राज्य की उत्पत्ति, विकास, विशेषताओं, राज्य के संगठन, सरकार, उसकी शासन प्रणाली, राज्य से सम्बन्धित संस्थाओं का अध्ययन करता है। इस प्रकार राजनीति विज्ञान केवल राजनीतिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है। . दूसरी ओर समाजशास्त्र समाज सम्बन्धों, सम्बन्धों के अलग-अलग स्वरूपों, समूहों, प्रथाओं, प्रतिमानों, संरचनाओं, संस्थाओं, इनके अन्तर्सम्बन्धों, रीति-रिवाजों, रूढ़ियों, परम्पराओं का अध्ययन करता है।

जहां राजनीति विज्ञान, राजनीति अर्थात् राज्य और सरकार का अध्ययन करता है, दूसरी ओर, समाजशास्त्र सामाजिक निरीक्षण की प्रमुख एजेंसियों में राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन करता है। ये दोनों विज्ञान समूचे समाज का अध्ययन करते हैं। समाजशास्त्र ‘राज्य’ को एक राजनीतिक संस्था के रूप में देखता है और राजनीति विज्ञान उस राज्य को संगठन और कानून के रूप में देखता है। मैकाइवर और पेज के अनुसार ‘समाज’ और ‘राज्य’ का दायरा एक नहीं और न ही दोनों का विस्तार साथ-साथ हुआ है। अपितु राज्य की स्थापना समाज में कुछ विशेष उद्देश्यों की प्राप्ति करने के लिए हुई है। . रॉस (Ross) के अनुसार, “राज्य अपनी पुरानी अवस्था में राजनीतिक अवस्था से अधिक सामाजिक संस्था थी। यह सत्य है कि राजनीतिक तथ्यों का ज्ञान सामाजिक तथ्यों में ही है। इन दोनों विज्ञानों में अन्तर केवल इसीलिए है कि इन दोनों विज्ञानों के क्षेत्र की विशालता अध्ययन के लिए विशेष होती है, बल्कि इसीलिए नहीं है कि इनमें कोई स्पष्ट विभाजन रेखा है।”

ऊपर दी गई परिभाषाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि राजनीतिक विज्ञान का सम्बन्ध समाज में पाई जाने वाली संस्थाओं, सरकार और संगठनों का अध्ययन करने से है जबकि समाजशास्त्र का सम्बन्ध समाज का अध्ययन करने से है परन्तु राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र समूचे समाज का ही हिस्सा है जिसका समाजशास्त्र अध्ययन करता है। इस प्रकार इन दोनों विज्ञानों में अन्तर-निर्भरता भी पाई जाती है।

समाजशास्त्र का राजनीति विज्ञान को योगदान (Contribution of Sociology to Political Science)राजनीति विज्ञान में मानव को राजनीतिक प्राणी माना जाता है पर यह नहीं बताया जाता कि वह राजनीतिक कैसे और कब बना। यह सब पता करने के लिए राजनीति विज्ञान समाज शास्त्र की सहायता लेता है। यदि राजनीतिक विज्ञान समाजशास्त्र के सिद्धान्तों की सहायता ले तो मनुष्य से सम्बन्धित उसके अध्ययनों को बहुत सरल और सही बनाया जा सकता है। राजनीति विज्ञान जब अपनी नीतियां बनाता है तो उसको सामाजिक कीमतों और आदर्शों को मुख्य रखना पड़ता है।

राजनीति विज्ञान को सामाजिक परिस्थितियों का ध्यान रखकर ही कानून बनाना पड़ता है। हमारी सामाजिक परम्पराएं, संस्कृति, प्रथाएं समाज के सदस्यों पर नियन्त्रण रखने हेतु और समाज को संगठित तरीके से चलाने के लिए बनाई जाती हैं परन्तु जब इनको सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है तो यह कानून बन जाती हैं।

जब सरकार समाज की बनाई हुई उन प्रथाओं को, जो समूह द्वारा भी प्रमाणित होती हैं, को नज़र-अंदाज कर देती है तो ऐसी स्थिति में समाज विघटन के पथ पर चला जाता है। इससे समाज के विकास में भी रुकावट आ जाती है। राजनीति विज्ञान को सामाजिक परिस्थितियों की या प्रथाओं इत्यादि की जानकारी प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्र पर निर्भर रहना पड़ता है। समाज में हम कानून का सहारा लेकर समस्याओं का हल ढूंढ सकते हैं। अतः, उपरोक्त विवरण से यह काफ़ी हद तक स्पष्ट हो जाता है कि राजनीतिक विज्ञान को अपने क्षेत्र में अध्ययन करने के लिए समाजशास्त्र की बहुत आवश्यकता पड़ती है। इसी के साथ समाज की तरक्की, विकास और संगठन आदि भी बना रहता है। इस उपरोक्त विवरण का अर्थ यह नहीं कि समाजशास्त्र ही राजनीति विज्ञान की सहायता करता है अपितु राजनीति विज्ञान की भी समाजशास्त्र में बहुत ज़रूरत रहती है।

राजनीति विज्ञान का समाजशास्त्र को योगदान (Contribution of Political Science to Sociology)यदि समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान को कुछ देता है तो उससे बहुत कुछ लेता भी है। समाजशास्त्र भी राजनीति विज्ञान पर निर्भर करता है और उससे मदद लेता है।

किसी भी समाज की बिना नियन्त्रण के कल्पना ही नहीं की जा सकती। समाजशास्त्र की इस शाखा को राजनीति समाजशास्त्र भी कहते हैं। यदि देखा जाए तो समाज या सामाजिक जीवन को असली जीवन ही राजनीति विज्ञान से प्राप्त हुआ है। समाज की प्रगति, संगठन, संस्थाओं, प्रक्रियाओं, परम्पराओं, संस्कृति तथा सामाजिक सम्बन्धों आदि पर आधारित है। यदि हम प्राचीन समाज का ज़िक्र करें, जब राजनीतिक विज्ञान की पूर्णतया शुरुआत नहीं हुई थी, तब व्यक्ति. की ज़िन्दगी काफ़ी सरल थी परन्तु फिर भी उस सरल जीवन पर अनौपचारिक नियन्त्रण था। धीरे-धीरे समाज जैसे-जैसे विकसित होता गया, वैसे-वैसे हमें कानून की आवश्यकता महसूस होने लगी। उदाहरण के लिए, जब भारत में जाति प्रथा विकसित थी, तब कुछ जातियों के लोगों की स्थिति समाज में अच्छी थी, वह समाज को अपने ही ढंग से चलाते थे। दूसरी ओर जिन व्यक्तियों की स्थिति जाति प्रथा में निम्न थी वे जाति के बनाए हुए नियमों से बहुत तंग थे। जाति प्रथा के बनाए जाने का मुख्य कारण समाज में सन्तुलन कायम करना था।

जब राजनीति विज्ञान ने अपनी जड़ें मज़बूत कर ली तो उसने लोगों पर कानून द्वारा नियन्त्रण करना शुरू कर दिया। जो प्रथाएं समाज के लिए एक बुराई बन गई थीं और लोग भी उनको समाप्त करना चाहते थे तो कानून ने वहां अपने प्रभाव से लोगों को मुक्त करवाया क्योंकि इस कानून ने सभी लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार करना ठीक समझा और लोगों ने भी इसका सम्मान किया। इसके अतिरिक्त समय-समय पर समाज में वहमों-भ्रमों के आधार पर कई ऐसी प्रथाएं लोगों द्वारा कायम हुई थीं जिन्होंने समाज को अन्दर ही अन्दर से खोखला कर दिया था। इन प्रथाओं को समाप्त करना समाजशास्त्र के वश का काम नहीं था। इसीलिए उसने राजनीति विज्ञान का सहारा लिया।

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि चाहे समस्या राजनीतिक हो या सामाजिक, हमें दोनों की इकट्ठे सहायता की आवश्यकता पड़ती है। समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान दोनों ही समाज के अध्ययन से यद्यपि अलग-अलग दृष्टिकोण से जुड़े हुए हैं, परन्तु फिर भी इनकी समस्याएं समाज से सम्बन्धित हैं। इसीलिए इनमें काफ़ी अन्तर-निर्भरता होती है।

समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान में अन्तर (Difference between Sociology & Political Science)—यदि समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे पर निर्भर हैं तो उनमें कुछ अन्तर भी हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

(1) समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है और राजनीति विज्ञान एक विशेष विज्ञान है। समाज शास्त्र समाज में पाए जाने वाले व्यक्ति के हर पक्ष के अध्ययन से सम्बधित होता है। इसमें सामाजिक प्रक्रियाओं, परम्पराओं, सामाजिक नियन्त्रण आदि सब आ जाते हैं अर्थात् .समाजशास्त्र, उन सब प्रकार के प्रपंचों का अध्ययन करता है, जोकि हर प्रकार की मानवीय क्रियाओं से सम्बन्धित होते हैं। यह सम्पूर्ण समाज का अध्ययन करता है। इसीलिए सामान्य विज्ञान है परन्तु दूसरी ओर राजनीति विज्ञान व्यक्ति के जीवन के राजनीतिक हिस्से का अध्ययन करता है, अर्थात् उन क्रियाओं का अध्ययन करता है, जहां मनुष्य, सरकार या राज्य द्वारा दी गई रक्षा और अधिनिम प्राप्त करता है। इसीलिए यह विशेष विज्ञान है।

(2) समाजशास्त्र एक सकारात्मक विज्ञान है और राजनीति विज्ञान एक आदर्शवादी विज्ञान है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध राज के स्वरूप से भी होता है। इसमें समाज द्वारा प्रमाणित नियमों को भी स्वीकारा जाता है। परन्तु समाजशास्त्र काफ़ी स्वतन्त्र रूप में अध्ययन करता है, अर्थात् इसकी दृष्टि निष्पक्षता वाली होती है।

(3) राजनीति विज्ञान व्यक्ति को एक राजनीतिक प्राणी मानकर ही अध्ययन करता है परन्तु समाजशास्त्र इससे भी सम्बन्धित होता है कि व्यक्ति किस तरह और क्यों राजनीतिक प्राणी बना ?

(4) समाजशास्त्र असंगठित और संगठित सम्बन्धों समुदायों आदि का अध्ययन करता है क्योंकि इसमें चेतन और अचेतन प्रक्रियाओं दोनों का अध्ययन किया जाता है। परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल संगठित सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है और इसमें चेतन प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। राज्य के चार तत्त्व जनसंख्या, निश्चित स्थान, सरकार, प्रभुत्व इसमें आ जाते हैं। यह चारों तत्त्व चेतन प्रक्रियाओं से सम्बन्धित हैं। समाजशास्त्र क्यों और कैसे राजनीतिक विषय बना।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

प्रश्न 3.
समाजशास्त्र और मानव विज्ञान के सम्बन्धों की चर्चा करो।
अथवा
समाजशास्त्र और मानव विज्ञान अलग होते हुए भी एक-दूसरे के पूरक हैं। स्पष्ट करो।
उत्तर-
समाजशास्त्र की उत्पत्ति का स्रोत इतिहास है जबकि मानव विज्ञान की उत्पत्ति का स्रोत जीव-विज्ञान है। यदि इन दोनों की विधियों, विषय-क्षेत्र को देखें तो यह अलग-अलग हैं, पर इन दोनों का सम्बन्ध बहुत गहरा है। इन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। यह अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक-दूसरे से सहायता लेते रहते हैं। इन दोनों को समझने हेतु इन दोनों की विषय-सामग्री की ओर देखें तो इन दोनों के रिश्तों को समझने में आसानी होगी।

समाजशास्त्र आधुनिक समाज का अध्ययन है। समाजशास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक संस्थाओं, सामाजिक समूहों और उनके अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ-साथ समाजशास्त्र में संस्कृति के अलग-अलग भागों, समाज में मिलने वाली कई प्रकार की संस्थाओं का भी अध्ययन किया जाता है।

मानव विज्ञान (Anthropology) दो यूनानी शब्दों को मिलाकर बना है। Anthropos, जिसका अर्थ है ‘मनुष्य’ और ‘Logies’ जिसका अर्थ है ‘विज्ञान’। इस प्रकार इसका शाब्दिक अर्थ है ‘मानव विज्ञान’। मानव विज्ञान मनुष्य का विज्ञान है। मानव विज्ञान मनुष्य विज्ञान, मनुष्य की उत्पत्ति और विकास के भौतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक . . दृष्टिकोण का अध्ययन है।।

मानव विज्ञान का विषय और क्षेत्र काफ़ी विशाल है। इसलिए इसे तीन भागों में बांटा गया है।
1. भौतिक मानव विज्ञान (Physical Anthropology)- मानव विज्ञान की यह शाखा मानव के शारीरिक लक्षणों का अध्ययन करती है जिनसे मनुष्य की उत्पत्ति और विकास हुआ।

2. पूर्व-ऐतिहासिक पुरासरी विज्ञान (Pre-Historical Archeology)-इसमें मनुष्य के इतिहास की खोज करना है जिनके बारे में कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता है। पुराने खण्डहरों की खुदाई करके, हड्डियों, पुरानी वस्तुओं से उस समय के बारे में पता लगाया जाता है। इन भौतिक सबूतों के आधार पर मनुष्य की उत्पत्ति, उसके विकास, संस्कृति इत्यादि के ऊपर रोशनी डाली जाती है। इस प्रकार यह पुराने समय के मनुष्य की संस्कृति को ढूंढ़ता

3. सामाजिक और सांस्कृतिक मानव विज्ञान (Social and Cultural Anthropology)- यह मानवीय समाज का पूर्णतया से अध्ययन करता है। यह एक समाज की आर्थिक, राजनीतिक, पारिवारिक व्याख्या, धर्म, कला, विश्वासों इत्यादि प्रत्येक चीज़ का अध्ययन करता है। इसमें प्राचीन और आधुनिक समाज में उनके समकालीन ढांचों, संस्थाओं और व्यवहारों का विश्लेषणात्मक और तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।

सामाजिक मानव विज्ञान वाली मानव विज्ञान की शाखा समाजशास्त्र से काफ़ी सम्बन्धित है जबकि समाज शास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों, उनके स्वरूपों, संस्थाओं, समूहों और प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इन दोनों विज्ञानों के उद्देश्य एक-दूसरे से काफ़ी मिलते-जुलते हैं। इसीलिए यह दोनों विज्ञान एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं।

उपरोक्त लिखे विवरण से स्पष्ट है कि मानव विज्ञान में आदिम समाज का अध्ययन किया जाता है। आदिम समाज का अर्थ उन समूहों से है जो छोटे-से भौगोलिक क्षेत्र में, कम संख्या में रहते थे और जिनका बाह्य दुनिया से कम सम्बन्ध था और जो साधारण तकनीक का प्रयोग करते हैं। संक्षेप में, सामाजिक मानव विज्ञान सम्पूर्ण समाज का पूर्णता से अध्ययन करता है।

मानव विज्ञान की समाज शास्त्र को देन (Contribution of Anthropology to Sociology)- समाज शास्त्र मानव विज्ञान के अध्ययन का काफ़ी लाभ उठाता है। भौतिक मानव विज्ञान जो समूहों और नस्लों का ज्ञान उपलब्ध करवाता है, उसे समाजशास्त्री अलग-अलग संस्थाओं और व्यवस्थाओं को समझने के लिए प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त समाजशास्त्रियों ने सामाजिक स्तरीकरण को प्रजातीय आधार पर समझने की कोशिश की है। इसके अतिरिक्त मानव विज्ञान यह भी बताता है कि आदिम समाज की संस्थाएं, व्यवस्था और संगठन बहुत सरल थे जिसकी सहायता से समाजशास्त्र आज के समाज को समझ सका है। मानव विज्ञान ने धर्म की उत्पत्ति की सामग्री समाजशास्त्र को दी है। इस प्रकार आदिम समाज का अध्ययन जो कि मानव विज्ञान का विषय वस्तु है। उसमें समाज शास्त्र की दिलचस्पी काफ़ी बढ़ गई है। वास्तविकता में समाजशास्त्र की प्रमुख शाखा सामाजिक उत्पत्ति और कुछ नहीं, अपितु सामाजिक मानव विज्ञान है। समाजशास्त्र ने तो कुछ संकल्प, जैसे-सांस्कृतिक क्षेत्र, सांस्कृतिक गुण, सांस्कृतिक जटिलता, सांस्कृतिक पीड़ा इत्यादि मानव विज्ञान से उधार लिये हैं और इनका प्रयोग समाजशास्त्रियों के लिए काफ़ी लाभदायक सिद्ध हुआ है। तभी तो समाजशास्त्र में एक नयी शाखा सांस्कृतिक समाजशास्त्र का विकास हुआ है।

समाजशास्त्र का मानव विज्ञान को योगदान (Contribution of Sociology to Anthropology)केवल समाजशास्त्र ही नहीं, अपितु मानव विज्ञान भी समाजशास्त्र की सहायता लेता है। मानव विज्ञान को संस्कृति की उत्पत्ति और विकास के लिए सामाजिक अन्तक्रियाओं और सम्बन्धों को समझना पड़ता है जो समाजशास्त्र के क्षेत्र में आते हैं। संस्कृति के बिना कोई समाज नहीं हो सकता और इसकी उत्पत्ति अन्तक्रियाओं और सम्बन्धों पर निर्भर करती है।

समाजशास्त्र का एक दूसरा योगदान मानव विज्ञान को यह है कि मानव विज्ञान ने आधुनिक समाज के ज्ञान के आधार पर कई परिकल्पनाओं का निर्माण करके आदिम समाज का अध्ययन किया है, जिनसे मानव विज्ञान को अपनी विषय सामग्री समझने में काफ़ी सहायता मिली है।

मानव विज्ञान ने समाजशास्त्र के कुछ विषयों, संकल्पों और विधियों को अपने क्षेत्र में शामिल करके अपनी विषय सामग्री को सम्बोधित किया है। मानव विज्ञान ने सामूहिक एकता को उत्पन्न करने वाले सांस्कृतिक और सामाजिक तथ्यों के साथ-साथ और तथ्यों का भी अध्ययन किया है जिनके कारण संघर्ष की आदत मानव में आई।

समाजशास्त्र और मानव विज्ञान में अन्तर (Difference between Sociology & Anthropology)-
1. समाजशास्त्र और मानव विज्ञान की विषय-वस्तु में भी अन्तर डाला गया है। समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों, संगठन, संरचना, सामाजिक व्यवस्था इत्यादि का अध्ययन करता है और मानव विज्ञान सम्पूर्ण समाज के अध्ययन से अपने आपको सम्बन्धित रखता है अर्थात् कि इसमें समाज की धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि भाव के हर पक्ष का अध्ययन करता है। इसीलिए इसे सामाजिक विरासत का विज्ञान भी कहा जाता है क्योंकि इसके द्वारा ही संस्कृति संभाल कर रखी जाती है।

2. मानव विज्ञान उन संस्कृतियों का अध्ययन करता है, जो छोटी और स्थिर होती हैं। परन्तु समाजशास्त्र उन संस्कृतियों का अध्ययन करता है जो विशाल और परिवर्तनशील होती हैं। इस आधार पर हम देखते हैं कि मानव विज्ञान तेजी से विकसित होता है और समाजशास्त्र से बढ़िया समझा जाता है।

3. मानव विज्ञान और समाजशास्त्र दोनों अलग-अलग विज्ञान हैं। मानव विज्ञान प्राचीन समय में पाए गए मानव और उसकी संस्कृति का अध्ययन करता है परन्तु समाजशास्त्र इसी विषय वस्तु को आधुनिक व्यवस्था से सम्बन्धित रखकर अध्ययन करता है।
इस प्रकार समाजशास्त्र भविष्य तक भी ले जाता है परन्तु दूसरी ओर मानव विज्ञान समस्याओं के अध्ययन तक अपने आपको सीमित रखता है।

4. समाजशास्त्र और मानव विज्ञान दोनों में अध्ययन की अलग-अलग विधियां प्रयोग की जाती हैं। मानव विज्ञान में अवलोकन, आगमन आदि विधियों का प्रयोग किया जाता है। समाजशास्त्र सर्वेक्षण, प्रश्नावली, अनुसूची, आंकड़ों आदि पर आधारित है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

प्रश्न 4.
समाजशास्त्र का मनोविज्ञान को क्या योगदान है ? दोनों विज्ञानों के बीच अंतरों का भी वर्णन करें।
उत्तर-
समाजशास्त्र का मनोविज्ञान को योगदान (Contribution of Sociology to Psychology)मनोविज्ञान को मानव के व्यवहार को समझने हेतु समाजशास्त्र पर निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि मनुष्य के व्यवहार को समाज की संस्कृति प्रभावित करती है और संस्कृति सम्बन्धी आवश्यक जानकारी समाजशास्त्र देता है।

मानव एक सामाजिक प्राणी है। पशुओं के स्थान पर मानव अपने मां-बाप और समाज पर अधिक निर्भर करता है। समाज में रहते हुए उसमें समाजीकरण की प्रक्रिया के कारण कई गुणों का विकास होता है। प्रत्येक समाज में रहने के कुछ नियम होते हैं। यह नियम व्यक्ति समाज में रहकर सीख सकता है और इन नियमों का पीढी दर पीढी विकास होता है और परिवर्तन भी होता रहता है। प्रत्येक संस्कृति एक व्यक्तित्व बनाती है और यह व्यक्तित्व बचपन के सांस्कृतिक अनुभवों का परिणाम होता है। मनोविज्ञान के लिए मानव के व्यवहार और मानसिक क्रियाओं को समझने के लिए आवश्यक है कि वह उनका सामाजिक वातावरण में ज्ञान प्राप्त करे जिसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व बनता है। यह सब विषय समाजशास्त्र के क्षेत्र में आते हैं। इसीलिए इस प्रकार के ज्ञान के लिए मनोविज्ञान को समाजशास्त्र पर निर्भर रहना पड़ता है।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि दोनों विज्ञान एक-दूसरे पर अन्तर्निर्भर ही नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक भी हैं। दोनों में से कोई भी एक विज्ञान दूसरे के क्षेत्र में जाए बिना अपने विशेष विषय का पूर्ण तौर पर अध्ययन नहीं कर सकता। जिस प्रकार मनोविज्ञान को मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं की वास्तविकता को समझने के लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान पर निर्भर रहना पड़ता है, उसी प्रकार सामाजिक व्यवहारों, सम्बन्धों और अन्तक्रियाओं सम्बन्धी सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्री को मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों पर निर्भर होना पड़ता है।

समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में अन्तर (Difference between Sociology & Psychology) –
1. दृष्टिकोण में अन्तर (Difference in Outlook)-मनोविज्ञान के अनुसार मानव के व्यवहार का आधार । मन और चेतना है जबकि समाजशास्त्र के अनुसार सामाजिक आधार मानव का समूह में रहने का स्वभाव है। इस प्रकार मनोविज्ञान का दृष्टिकोण व्यक्तिगत और समाजशास्त्र का दृष्टिकोण सामाजिक है।

2. अध्ययन विधियों में अन्तर (Difference in Methods)—मनोविज्ञान में अधिकतर प्रयोगात्मक विधि का प्रयोग किया जाता है, जिसका कि समाजशास्त्र में काफ़ी कम प्रयोग होता है। समाजशास्त्र में ऐतिहासिक विधि, तुलनात्मक विधि, संगठनात्मक कार्यात्मक विधि इत्यादि का अधिकतर प्रयोग होता है।

3. विषय-सामग्री में अन्तर (Difference in subject matter)-मनोविज्ञान एक ही व्यक्ति की अलगअलग क्रियाओं के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता है जबकि समाजशास्त्र अनेकों व्यक्तियों में होने वाले सम्बन्धों का अध्ययन करता है।

4. इकाई में अन्तर (Difference in Unit)-मनोविज्ञान में हमेशा एक व्यक्ति का अध्ययन किया जाता है जबकि समाजशास्त्र में कम-से-कम दो व्यक्तियों का अध्ययन किया जाता है।

इस प्रकार उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि दोनों विज्ञानों में कोई भी पूर्ण रूप से स्वतन्त्र नहीं है। दोनों एक-दूसरे की सहायता कर रहे हैं। एक-दूसरे के बिना यह नहीं रह सकते। अपनी पहचान बनाए रखने के लिए इनको एकदूसरे की सहायता करनी और लेनी ही पड़ती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध

समाजशास्त्र का अन्य समाज विज्ञानों से संबंध PSEB 11th Class Sociology Notes

  • प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कई पक्ष होते हैं जैसे कि आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक इत्यादि। इस प्रकार समाजशास्त्र को समाज के अलग-अलग पक्षों का अध्ययन करने के लिए अलग-अलग सामाजिक विज्ञानों की सहायता लेनी पड़ती है।
  • समाजशास्त्र चाहे अलग-अलग सामाजिक विज्ञानों से कुछ सामग्री उधार लेता है परन्तु वह उन्हें भी अपनी सामग्री प्रयोग करने के लिए देता है। इस प्रकार अन्य सामाजिक विज्ञान अपने अध्ययन के लिए समाजशास्त्र पर निर्भर होते हैं।
  • समाजशास्त्र तथा राजनीति विज्ञान गहरे रूप से अन्तर्सम्बन्धित हैं। समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है तथाराजनीति विज्ञान समाज के एक पक्ष का विज्ञान है जिसमें राज्य तथा सरकार प्रमुख हैं। दोनों विज्ञान एक दूसरे पर निर्भर करते हैं जिस कारण इनमें बहुत ही गहरा रिश्ता है। परन्तु इनमें बहुत से अंतर भी पाए जाते हैं।
  • इतिहास अतीत की घटनाओं का अध्ययन करता है जबकि समाजशास्त्र वर्तमान घटनाओं का अध्ययन करता है। दोनों विज्ञान मानवीय समाज का अध्ययन अलग-अलग पक्ष से करते हैं। इतिहास की जानकारी समाजशास्त्र प्रयोग करता है तथा समाजशास्त्र की सामग्री इतिहासकार प्रयोग करते हैं। इस कारण यह एक दूसरे पर निर्भर करते हैं परन्तु इनमें काफी अंतर भी होते हैं।
  • समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में भी काफ़ी गहरा रिश्ता है क्योंकि आर्थिक संबंध सामाजिक संबंधों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। हमारे सामाजिक संबंध आर्थिक संबंधों से निश्चित रूप से प्रभावित होते हैं। इस प्रकार यह अन्तर्सम्बन्धित होते हैं। दोनों विज्ञान एक-दूसरे से सहायता लेते तथा देते भी हैं।
  • समाजशास्त्र का मनोविज्ञान से भी काफी गहरा रिश्ता है। मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का अध्ययन करता है तथा मनुष्य का अध्ययन आवश्यक है। इस प्रकार दोनों विज्ञान अपने अध्ययनों में एक दूसरे की सहायता लेते हैं तथा एक दूसरे पर निर्भर करते हैं।
  • मानव विज्ञान से भी समाजशास्त्र का गहरा रिश्ता है। मानव विज्ञान पुरातन समाज का अध्ययन करता है तथा समाजशास्त्र वर्तमान समाज का। दोनों विज्ञानों को एल० क्रोबर (Kroeber) ने जुड़वा बहनों (Twin Sisters) का नाम दिया है। मानव वैज्ञानिक अध्ययनों से समाजशास्त्री काफी सामग्री उधार लेते हैं। इस प्रकार मानव विज्ञान भी समाजशास्त्र की सहायता पुरातन मानवीय समाज को समझने के लिए करता है।
  • सांस्कृतिक मानव विज्ञान (Cultural Anthropology)—मानव विज्ञान की वह शाखा जो मनुष्यों के बीच सांस्कृतिक अंतरों का अध्ययन करती हैं।
  • पुरातत्त्व (Archaeology)—यह पुरातन समय की मानवीय क्रियाओं का ज़मीन के अंदर से मिली वस्तुओं की सहायता से अध्ययन करती है। .
  • राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology)-समाजशास्त्र की वह शाखा जो यह अध्ययन करती है कि किस प्रकार बहुत-सी सामाजिक शक्तियां इकट्ठे होकर राजनीतिक नीतियों को प्रभावित करती हैं।
  • भौतिक मानव विज्ञान (Physical Anthropology)-मानव विज्ञान की वह शाखा जो मनुष्यों के उद्भव, उनमें आए परिवर्तनों तथा वातावरण से अनुकूलता करने के उसके तरीकों के बारे में बताती है।
  • सामाजिक मनोविज्ञान (Social Psychology)-वह वैज्ञानिक अध्ययन जिसमें इस बात का अध्ययन किया जाता है कि किस प्रकार लोगों के विचार तथा व्यवहार अन्य लोगों की मौजूदगी से प्रभावित होते हैं।