PSEB 11th Class History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
नगर योजना, तकनीकी विज्ञान, कृषि तथा व्यापार के बारे में प्राप्त जानकारी के आधार पर सिन्धु घाटी के लोगों के जीवन के बारे में बताएं।
उत्तर-
सिन्धु घाटी की सभ्यता से हमारा अभिप्राय उस प्राचीन सभ्यता से है जो सिन्धु नदी की घाटी में फली-फूली। इस सभ्यता के लोगों ने नगर योजना, तकनीकी विज्ञान, कृषि तथा व्यापार के क्षेत्र में पर्याप्त प्रतिभा का परिचय दिया।

श्री के० एम० पानिक्कर के शब्दों में-“सैंधव लोगों ने उच्चकोटि की सभ्यता का विकास कर लिया था।” (“A very high state of civilization had been reached by the people of the Indus.”’) इस सभ्यता के विभिन्न पहलुओं का वर्णन इस प्रकार है :-

I. नगर योजना

1. नगर के दो भाग-मोहनजोदड़ो और हड़प्पा का घेरा चार-पांच किलोमीटर था। ये नगर मुख्यत: दो भागों में बंटे हुए थे-गढ़ी और नगर।

(क) गढ़ी-हड़प्पा की गढ़ी का आकार समानान्तर चतुर्भुज जैसा था। इसकी लम्बाई 410 मीटर और चौड़ाई 195 मीटर थी। इस सभ्यता की अन्य गढ़ियों की तरह इसकी लम्बाई उत्तर से दक्षिण की ओर थी और चौड़ाई पूरब से पश्चिम की ओर। गढ़ी का निर्माण मुख्य रूप से प्रशासकीय एवं धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता था। आवश्यकता पड़ने पर इसे सुरक्षा के लिए भी प्रयोग किया जाता था।

(ख) नगर या कस्बा-गढ़ी के नीचे कस्बे की भी चारदीवारी होती थी। कस्बे की योजना भी उत्तम थी। उसकी मुख्य सड़कें काफ़ी चौड़ी थीं। सड़कों की दिशा उत्तर से दक्षिण एवं पूरब से पश्चिम की ओर थी और यह नगर को आयताकार टुकड़ों में बांटती थीं।

2. विशाल भवन-मोहनजोदड़ो की गढ़ी में विशाल अन्न भण्डार था। हड़प्पा में यह भण्डार गढ़ी से बाहर था। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो की गढ़ी में एक सरोवर भी मिला है जो 39 फुट लम्बा, 23 फुट चौड़ा और 8 फुट गहरा था। यह उस समय का विशाल स्नानकुंड (Great Bath) था। विशाल स्नानकुंड में पानी निकट स्थित कुएं में से डाला जाता था। स्नानकुंड का फर्श पक्की ईंटों का बना हुआ था। इसमें जाने के लिए ईंटों की सीढ़ियां थीं। ऐसा अनुमान है कि इसका प्रयोग किसी महत्त्वपूर्ण धार्मिक रीति के लिए होता था।

3. निवास स्थान-मकानों के लिए पक्की ईंटों का उपयोग होता था। बड़े मकानों में रसोई, शौचघर एवं कुएं के अतिरिक्त बीस-बीस कमरे थे। परन्तु साधारण मकानों में लगभग आधा दर्जन कमरे थे। कुछ मकानों में केवल एक या दो कमरे भी थे। प्रत्येक मकान में वायु और प्रकाश के लिए दरवाजे और खिड़कियां थीं। स्नान एवं शौचालय के पानी के निकास के लिए ढकी हुई नालियों की उत्तम व्यवस्था थी।

II. तकनीकी विज्ञान

हडप्पा संस्कृति के लोगों के तकनीकी विज्ञान में काफ़ी सीमा तक एकरूपता पाई जाती है। सभी नगरों में लगभग एकसी बनावट के तांबे और कांसे के औज़ार प्रयोग में लाए जाते थे। ये औज़ार नमूने एवं बनावट में सादे थे। नगरों में कुशल शिल्पी तांबे और कांसे के कटोरे, प्याले, थालियां, मनुष्य एवं पशुओं की मूर्तियां और छोटी खिलौना बैल-गाड़ियां बनाते थे। मोहरें बनाने की कला भी अत्यन्त विकसित थी। मनके बनाने का काम भी कम उत्कृष्ट न था, विशेषकर लम्बे इन्द्रगोप (cornelian) के मनके। सिन्धु घाटी के लोगों की बढ़इगिरी में प्रवीणता की जानकारी उनके द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली आरी से मिलती है। इस आरी के दांते ऊंचे-नीचे हैं ताकि लकड़ी का बुरादा आसानी से निकल सके। सच तो यह है कि तकनीकी विज्ञान में हड़प्पा के लोग मिस्र और बेबीलोन वालों से कहीं आगे थे। इतने बड़े इलाके में फैली हुई तकनीकी समरूपता के कारण यह सभ्यता प्राचीन काल में संसार भर में अद्वितीय थी।।

सिन्धु घाटी के लोग शस्त्र निर्माण में भी निपुण थे। उनके मुख्य शस्त्र छोटी तलवार, भाला, तीर का सिरा, कुल्हाड़ी और चाकू थे। ये अधिकतर तांबे और कांसे के बने हुए थे। धातु के हथियारों के अतिरिक्त शत्रु पर वार करने के लिए पत्थर के गदा और आग में पकाई गई गोलियों का प्रयोग किया जाता था। दूर से वार करने के लिए गुलेल प्रयोग में लाई जाती थी।

III. कृषि तथा व्यापार

1. कृषि-सिन्धु नदी का क्षेत्र उपजाऊ था। अत: यहां के लोगों ने कृषि की ओर विशेष ध्यान दिया। वे मुख्यतः गेहूँ और जौ की कृषि करते थे जो उनके मुख्य खाद्यान्न थे। खाने वाली अन्य वस्तुएं दाल और खजूर थीं। तिल और सरसों का तेल भी प्रयोग में आता था। भेड़, बकरियां और मवेशी प्रमुख पालतू पशु थे। इस सभ्यता के लोगों की अति महत्त्वपूर्ण उपज कपास थी जिससे कपड़ा बनाया जाता था। इस समय दुनिया के और किसी भाग में न तो कपास का उत्पादन होता था और न ही कपड़ा बनता था। सिन्धु घाटी की सभ्यता में नहरों द्वारा सिंचाई नहीं होती थी। गहरी खुदाई करने वाले हल से वे अपरिचित थे। बाढ़ के जल से सिंचाई के लिए बांध बनाए जाते थे। हैरो जैसे यन्त्र का प्रयोग फसल बोने के लिए होता था।

2. व्यापार-सिन्धु घाटी के लोग अनेक वस्तुओं का व्यापार करते थे। व्यापार में कच्चा माल भी शामिल था और तैयार माल भी। व्यापार के लिए भार-वाहक जानवरों, पशु-गाड़ियों तथा छोटी-छोटी नौकाओं का प्रयोग किया जाता था। सिन्धु घाटी से निर्यात होने वाली वस्तुओं में सूती कपड़ा, मोती, हाथी दांत तथा हाथी दांत से बनी वस्तुओं प्रमुख थीं। लंगूर, बन्दर, मोर आदि जीव-जन्तु भी बाहर भेजे जाते थे। लोथल कस्बे से जोकि एक प्रमुख बन्दरगाह थी, मोतियों का निर्यात होता था। सिन्धु घाटी के लोगों के आयात में अनेक बहुमूल्य पदार्थ शामिल थे। वे राजस्थान, मैसूर तथा दक्षिणी भारत से सोना, चाँदी और संगमरमर मंगवाते थे। सोना तथा चाँदी अफ़गानिस्तान से भी मंगवाया जाता था। यहां से तांबा भी आता था। मध्य एशिया से हीरे, फिरोज़े आदि का आयात किया जाता था।

उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि सिन्धु घाटी की नगर योजना सिन्धु घाटी के लोगों के उच्च जीवन-स्तर की प्रतीक है। उसका तकनीकी ज्ञान मैसोपोटामिया तथा अन्य समकालीन सभ्यताओं से किसी प्रकार कम नहीं था। निःसन्देह सिन्धु घाटी के लोगों ने कृषि तथा व्यापार में भी पर्याप्त उन्नति की थी। संक्षेप में, हम जॉन मार्शल के इन शब्दों से सहमत हैं, “लोग सैधव (अच्छे बने) नगरों में निवास करते थे। उनकी संस्कृति परिपक्व थी जिसमें कला तथा कारीगरी अपने उत्कर्ष पर थी।” (“People lived in well-built cities and had a mature culture with a high standard of art and craftsmanship.”)

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता

प्रश्न 2.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के धर्म, कला, मुहरों तथा लिपि की विशेषताओं पर लेख लिखें।
उत्तर-
सिन्धु घाटी की सभ्यता प्राचीन काल में सिन्धु नदी की घाटी में फली-फूली। इस सभ्यता के लोगों ने जीवन के अन्य क्षेत्रों में विकास के साथ-साथ धर्म, कला, मुहरों तथा लिपि से सम्बद्ध नवीनता का परिचय दिया। इन नवीन तथ्यों का विस्तृत विवरण इस प्रकार है

I. धर्म

सिन्धु घाटी की सभ्यता के धर्म की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं :
1. प्रमुख देवता-सिन्धु घाटी के देवी-देवताओं का पता हमें उनकी मुहरों से लगता है। खुदाई से मिली कुछ मुहरों पर एक देवता की मूर्ति बनी हुई है जिसके तीन मुख हैं। यह चित्र चार पशुओं के साथ योग मुद्रा में दिखाया गया है। इन पशुओं में एक बैल भी है। प्रायः बैल के साथ शिवजी महाराज का नाम जुड़ा हुआ है। इसलिए सर जॉन मार्शल (Sir John Marshall) का अनुमान है कि यह शिवजी की मूर्ति है और सिन्धु घाटी के लोग शिव पूजा में विश्वास रखते थे। खुदाई में मिली मुहरों पर एक अर्द्ध-नग्न नारी भी अंकित है। उसकी कमर पर भाला और शरीर पर विशेष प्रकार का वस्त्र है। सर जॉन मार्शल ने इसे मातृ देवी कहा है। उनका विचार है कि सिन्धु घाटी के लोग मातृ देवी की पूजा किया करते थे।

2. अन्य धार्मिक विश्वास-खुदाई में लिंग तथा योनि की मूर्तियां भी मिली हैं। सिन्धु घाटी के लोग जनन शक्ति के रूप में इन मूर्तियों की पूजा करते थे। इससे यह भी स्पष्ट है कि उनका मूर्ति पूजा में विश्वास था। खुदाई से मिली कुछ मुहरों पर हाथी, बैल, बाघ आदि के चित्र मिले हैं। इस बात से यह संकेत मिलता है कि उनमें पशु-पक्षियों की पूजा प्रचलित थी। पशुओं के अतिरिक्त सिन्धु घाटी के लोग पीपल आदि वृक्षों तथा अग्नि की पूजा करते थे। उनमें सम्भवतः सांपों तथा नदियों की पूजा भी प्रचलित थी। सिन्धु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार तीन प्रकार से करते थे। कुछ लोग मुर्दो को धरती में दबा देते थे, परन्तु कुछ उन्हें जला देते थे। कई लोग मुर्दे को जला कर उनकी राख तथा अस्थियों को किसी पात्र में रखकर उसे धरती में दबा देते थे। पात्र के साथ मृतक व्यक्ति की मन पसन्द वस्तुएं भी रख दी जाती थीं।

II. कला

सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित कलाकृतियां काफ़ी उच्च स्तर की थीं। नाचती हुई मुद्रा में खड़ी लड़की की लघु कांस्य प्रतिमा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है।

वहां की मूर्तिकला के अनेक नमूने उपलब्ध हुए हैं। इनमें मानव एवं पशु दोनों की आकृतियां मिलती हैं। सिर और कंधों की टूटी हुई दाढ़ी वाले व्यक्ति की एक मूर्ति सिन्धु घाटी की कला का प्रभावशाली नमूना है।

सिन्धु घाटी की कुछ मूर्तियां पालथी मारकर बैठी हुई आकृति की हैं। इसे देव प्रतिमा समझा जाता है। वहां से कुछ पशुओं की मूर्तियां भी मिली हैं। उनमें शक्ति और वीरता झलकती है। खुदाई में एक संयुक्त पशु-मूर्ति भी मिली है जो किसी प्रकार की दैवी प्रतिमा प्रतीत होती है। एक अन्य प्रतिमा शिव के नटाज रूप का आदि स्वरूप प्रतीत होती है।
PSEB 11th Class History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता 1

पकी मिट्टी की लघु प्रतिमाएं काफ़ी संख्या में मिली हैं। इनमें पशु और मानवीय प्रतिमाएं दोनों शामिल हैं। बहुत-सी लघु प्रतिमाएं स्त्रियों की हैं। इनमें से कुछ बिस्तर नृत्य मुद्रा में खड़ी लड़की पर बच्चों के साथ या अकेली लेटी हुई दिखाई गई हैं। पशुओं की प्रतिमाओं में काफ़ी सारे पशु हैं। इनमें कूबड़ बैल, भैंसा, कुत्ता, भेड़, गैंडा, बन्दर, समुद्री कछुआ और कुछ मानवीय सिरों वाले पशु शामिल हैं। यहां गाय की कोई प्रतिमा नहीं मिली है। ठोस पहियों वाली पकी मिट्टी की बैलगाड़ियां भी मिली हैं। हड़प्पा से तांबे से बनी एक इक्कानुमा गाड़ी मिली है। मिट्टी के बर्तन प्रायः कुम्हार के चाक पर बनाए हुए हैं। उनके हाथ से बने बर्तन भी मिले हैं। सिन्धु घाटी के मिट्टी के बर्तनों में अधिकतर पर फूल, पत्ती, पक्षी और पशुओं के चित्र बने हुए हैं। अंगूठियों और चूड़ियों के अतिरिक्त वहां सोने, चांदी, तांबे, फेस, चाक पत्थर, कीमती पत्थर और शंख के बने अनेक सुन्दर मनके मिले हैं। इन मनकों को पिरो कर माला बनाई जाती थी।
दाढ़ी वाला आदमी (मोहनजोदड़ो)
PSEB 11th Class History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता 2

III. मोहरें

मोहरें प्राचीन शिल्पकला को सिन्धु घाटी की विशिष्ट देन समझी जाती हैं। केवल मोहनजोदड़ो से ही 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। ये कृतियां भले ही छोटी हैं फिर भी इन की कला इतनी श्रेष्ठ है कि इनके चित्रों में शक्ति और ओज झलकता है। इनका प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा के लिए किया जाता था। ऐसा भी विश्वास किया जाता है कि मोहरों का प्रयोग एक प्रकार का प्रतिरोधक (taboo) लगाने के लिए होता था। इन मोहरों से ऐसा भी प्रतीत होता है कि सिन्धु घाटी के समाज में विभिन्न पदवियों और उपाधियों की व्यवस्था प्रचलित थी। इन मोहरों पर पशुओं तथा मनुष्यों की आकृतियां बनी हुई हैं। पशुओं से सम्बन्धित आकृतियां बड़ी कलात्मक हैं। परन्तु मोहरों पर बनी मानवीय आकृतियां उतनी कलात्मकता से नहीं बनी हुई हैं। मोहरों के अधिकांश नमूने उनकी किसी धार्मिक महत्ता के सूचक हैं। एक आकृति के दाईं तरफ हाथी और चीता हैं, बाईं ओर गैंडा और भैंसा हैं। उनके नीचे दो बारहसिंगे या बकरियां हैं। इन ‘पशुओं के स्वामी’ को शिव का पशुपति रूप समझा जाता है। मोहरों पर पीपल के वृक्ष के बहुत चित्र मिले हैं।

IV. लिपि

सिन्धु घाटी के लोगों ने एक विशेष प्रकार की लिपि का आविष्कार किया जो चित्रमय थी। उनकी यह लिपि खुदाई में मिली मोहरों पर अंकित है। यह लिपि बर्तनों तथा दीवारों पर लिखी हुई पाई गई है। इसमें कुल 270 के लगभग वर्ण हैं। इसे बाईं से दाईं ओर लिखा जाता है। यह लिपि आजकल की तथा अन्य ज्ञात लिपियों से काफ़ी भिन्न है। इसलिए इसे पढ़ना बहुत ही कठिन है। भले ही विद्वानों ने इसे पढ़ने के लिए अथक प्रयत्न किए हैं, तो भी वे अब तक इसे पूरी तरह पढ़ नहीं पाए हैं। आज भी इसे पढ़ने के प्रयत्न जारी हैं। अतः जैसे ही इस लिपि को पढ़ लिया जाएगा, सिन्धु घाटी की सभ्यता के अनेक नए तथ्य प्रकाश में आ जाएंगे।

यदि गहनता से सिन्धु घाटी की सभ्यता का अध्ययन किया जाए तो इतिहास की अनेक गुत्थियां सुलझाई जा सकती हैं। सिन्धु घाटी का धर्म आज के हिन्दू धर्म से मेल खाता है। उनकी कला-कृतियां उत्कृष्टता लिए हुए थीं। उनकी लिपि अभी तक पढ़ी नहीं गई। इसे पढ़े जाने पर सिन्धु घाटी का चित्र अधिक स्पष्ट हो जाएगा।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज कब हुई ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज 1922 ई० में हुई।

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प्रश्न 2.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्रों के नाम बताओ।
उत्तर-
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सिन्धु घाटी की सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्र थे।

प्रश्न 3.
सिन्धु घाटी के लोगों के दो देवी-देवताओं के नाम लिखो।
उत्तर-
पशुपति शिव तथा मातृदेवी।

प्रश्न 4.
मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा आजकल किस देश में हैं ?
उत्तर-
मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा आजकल पाकिस्तान में हैं।

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प्रश्न 5.
मोहनजोदड़ो की खोज किसने की थी ?
उत्तर-
आर० डी० बैनर्जी ने।

प्रश्न 6.
हड़प्पा की खोज करने वाले व्यक्ति का नाम बताओ।
उत्तर-
दयाराम साहनी।

प्रश्न 7.
मृतकों का टीला किस स्थान के लिए प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
मोहनजोदड़ो के लिए।

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प्रश्न 8.
सिन्धु घाटी का पूजनीय पशु कौन-सा था ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी का पूजनीय पशु कुबड़ा बैल था।

प्रश्न 9.
सिन्धु घाटी के नगर मुख्य रूप से कौन-कौन से दो भागों में बंटे हुए थे ?
उत्तर-
दुर्ग और सामान्य नगर।

प्रश्न 10.
सिन्धु घाटी के धर्म की वे दो विशेषताएं बताओ जो आज भी हिन्दू धर्म का अंग हैं ।
उत्तर-
शिव-पूजा तथा पीपल-पूजा।

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2. रिक्त स्थानों की पूर्ति-

(i) ………. भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता है।
(ii) सिन्धु घाटी की सभ्यता लगभग …….. वर्ष पुरानी है।
(iii) ……… की सभ्यता सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता थी।
(iv) सिन्धु घाटी के मकान ……… ईंटों के बने हुए थे।
(v) सिन्धु सभ्यता के स्थलों की खुदाई करने वाले पुरातत्ववेत्ता सर ……….. थे।
उत्तर-
(i) सिन्धु घाटी की सभ्यता
(ii) 5,000
(iii) मैसोपोटामिया
(iv) पकी
(v) जॉन मार्शल।

3. सही/ग़लत कथन सही कथनों के लिए (√) तथा ग़लत कथनों के लिए (×) का निशान लगाएं।

(i) सिन्धु घाटी के लोग लिंग और योनि की मूर्तियों की पूजा करते थे। — (√)
(ii) सिन्धु घाटी के लोग शिलाजीत का प्रयोग मसाले के रूप में करते थे।– (×)
(iii) सिन्धु घाटी का विशाल स्नानागार हड़प्पा में मिला है। — (×)
(iv) सिन्धु घाटी के लोगों की लिपि चित्रमय थी। — (√)
(v) पंजाब में संघोल (‘लुधियाना जिले’) में सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले हैं। — (√)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
सिन्धु सभ्यता में लोथल क्या था ?
(A) एक देवता
(B) एक बन्दरगाह
(C) एक स्नानागार
(D) लेखन कला केंद्र।
उत्तर-
(C) एक स्नानागार

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प्रश्न (ii)
सिन्धु सभ्यता का कौन-सा केन्द्र आज पंजाब में स्थित है ?
(A) मोहनजोदड़ो
(B) धौलावीरा
(C) रोपड़
(D) अमरी।
उत्तर-
(C) रोपड़

प्रश्न (iii)
हरियाणा में स्थित सिन्धु सभ्यता का स्थल है ?
(A) बनावली
(B) मिताथल
(C) राखीगढ़ी
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न (iv)
सिन्धु घाटी की खुदाई में मिली नर्तकी की मूर्ति बनी हुई है ?
(A) कांसे की
(B) पीतल की
(C) सोने की
(D) तांबे की।
उत्तर-
(A) कांसे की

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प्रश्न (v)
सिन्धु घाटी की सभ्यता की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है-
(A) ऊंचे भवन
(B) सुनियोजित जल-निकासी व्यवस्था
(C) पॉलिशदार मकान
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(B) सुनियोजित जल-निकासी व्यवस्था

॥. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

विशेष नोट-विद्यार्थी प्रत्येक अध्याय में इन प्रश्नों का अध्ययन अवश्य करें। ये प्रश्न उन्हें विषय-वस्तु को बारीकी से समझने में सहायता करेंगे। साथ ही, ये वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने में उपयोगी सिद्ध होंगे।

प्रश्न 1.
सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई करवाने वाले चार व्यक्तियों के नाम बताओ।
उत्तर-
सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई करवाने वाले चार व्यक्तियों के नाम थे : आर० डी० बनर्जी, एम० एस० वत्स, दया राम साहनी तथा सर जान मार्शल।

प्रश्न 2.
वर्तमान भारत के कौन-से चार राज्य हैं, जिनमें सिन्धु घाटी की सभ्यता के केन्द्र मिले हैं ? (Sure)
उत्तर-
वर्तमान भारत के चार राज्य पंजाब (रोपड़). राजस्थान (कालीबंगन), उत्तर प्रदेश (आलमगीरपुर) तथा गुजरात में सिन्धु घाटी सभ्यता के केन्द्र मिले हैं।

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प्रश्न 3.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के कोई चार केन्द्रों के नाम बताओ जो अब पाकिस्तान में हैं।
उत्तर-
पाकिस्तान में सिन्धु घाटी सभ्यता के चार केन्द्र चन्हुदड़ो, कोटडीजी, मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा हैं।

प्रश्न 4.
हडप्पा संस्कृति का काल बताओ।
उत्तर-
हड़प्पा संस्कृति का आरम्भ 2300 ई० पू० से भी पहले हुआ और इस संस्कृति का विकास 1900 ई० पू० तक जारी रहा।

प्रश्न 5.
सिन्धु घाटी सभ्यता में किन तीन दों या आकारों की बस्तियां मिली हैं और इनमें से सबसे बड़े केन्द्र कौनसे हैं ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी की सभ्यता गांव, कस्बे तथा शहर-इन तीन दर्जी अथवा आकारों की बस्तियों में विकसित थी। इनमें सबसे बड़े केन्द्र मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा थे।

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प्रश्न 6.
हड़प्पा की गढ़ी की लम्बाई तथा चौड़ाई बताओ।
उत्तर-
हड़प्पा की गढ़ी की लम्बाई 410 मीटर चौड़ाई 195 मीटर थी।

प्रश्न 7.
विशाल स्नान-कुण्ड कहां मिला है तथा इसकी लम्बाई, चौड़ाई व गहराई क्या है ?
उत्तर-
विशाल स्नान-कुण्ड मोहनजोदड़ो की गढ़ी में मिला है। यह 39 फुट लम्बा, 23 फुट चौड़ा और 8 फुट गहरा है।

प्रश्न 8.
मकानों के भीतरी भाग की कोई चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
सिन्धु घाटी के मकान हवादार तथा पकी ईंटों से बने थे। मकानों में रसोई घर, स्नानागार तथा नालियां भी थीं।

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प्रश्न 9.
सिन्धु सभ्यता के लोगों के प्रयोग में आने वाले किन्हीं चार हथियारों के नाम लिखो।
उत्तर-
सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों के प्रयोग में आने वाले हथियारों में छोटी तलवार, भाला, तीर और चाकू थे।

प्रश्न 10.
मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़कों की दिशा क्या थी ?
उत्तर-
मोहनजोदड़ो की सड़कों की दिशा उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम की ओर थी।

प्रश्न 11.
सबसे अधिक प्रयोग की जाने वाली धातु के आधार पर सिन्धु सभ्यता को क्या नाम दिया गया है ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी में सबसे अधिक कांसे का प्रयोग होता था। इसीलिए इस सभ्यता को कांस्य युग की सभ्यता भी कहा गया है।

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प्रश्न 12.
किन्हीं चार धातुओं के नाम बताओ जिनसे सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग परिचित थे।
उत्तर-
सिन्धु घाटी के लोग सोना, चांदी, तांबा तथा कांसे की धातुओं से परिचित थे।

प्रश्न 13.
सिन्धु घाटी की दो मुख्य फसलों तथा खाद्य पदार्थों के नाम लिखो।
उत्तर-
सिन्धु घाटी की दो मुख्य फसलें गेहूँ और जौ थीं। वहां के दो खाद्य पदार्थ भी गेहूँ और जौ ही थे।

प्रश्न 14.
खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त सिन्धु घाटी की सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण उपज क्या थी और इसका क्या प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर-
खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त सिन्धु घाटी की सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण उपज कपास थी। इससे कपड़ा बनाया जाता था।

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प्रश्न 15.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोगों द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने की दो विधियां लिखो।
उत्तर-
मिट्टी के बर्तन आमतौर पर कुम्हार के चाक पर बनाए जाते थे। वे हाथ से भी बर्तन बनाते थे।

प्रश्न 16.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों पर बने चार प्रकार के नमूनों के नाम लिखो।
उत्तर-
इन चार प्रकार के नमूनों में फूल, पत्ती, पक्षी और पशुओं के चित्र सम्मिलित हैं।

प्रश्न 17.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग माला में कौन-कौन से चार प्रकार के मनके पिरोते थे ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी के लोग सोने, चांदी, तांबे तथा कांसे के मनकों को माला में पिरोते थे।

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प्रश्न 18.
सिन्धु घाटी में लोथल कस्बा कौन-से दो काम देता था ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी में लोथल कस्बा बन्दरगाह और गोदाम का काम देता था।

प्रश्न 19.
केवल मोहनजोदड़ो से प्राप्त मोहरों की संख्या बताएं। इन मोहरों का प्रयोग किस लिए किया जाता था ?
उत्तर-
मोहनजोदड़ो से 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। इनका प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा अथवा उन पर ‘सील’ लगाने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 20.
सिन्धु घाटी से प्राप्त मोहरों पर कौन-कौन से पशुओं के चित्र अंकित हैं ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी की मोहरों पर सांड, शेर, हाथी तथा बारहसिंगा के चित्र अंकित हैं।

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प्रश्न 21.
सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के प्राप्त वर्णों की संख्या तथा यह किन चार चीजों पर मिलती है ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के अब तक 270 वर्ण प्राप्त हो चुके हैं। यह लिपि फलकों, मिट्टी के बर्तनों, आलेखों और मोहरों पर लिखी है।

प्रश्न 22.
भारत तथा एशिया के चार क्षेत्र बताओ जिनके साथ इस सभ्यता के लोगों के व्यापारिक सम्बन्ध थे।
उत्तर-
भारत के दो क्षेत्र थे राजस्थान तथा मैसूर। एशिया के दो क्षेत्रों में अफगानिस्तान तथा मैसोपोटामिया के नाम लिए जा सकते हैं।

प्रश्न 23.
सिन्धु घाटी में नर्तकी की धातु की मूर्ति कहां से मिली है ? यह किस धातु की बनी है ?
उत्तर-
नर्तकी की धातु की मूर्ति मोहनजोदड़ो से मिली है। यह कांसे की बनी है।

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प्रश्न 24.
सिन्धु घाटी से निर्यात की जाने वाली चार वस्तुओं के नाम बताओ।
उत्तर-
सिन्धु घाटी से मुख्य रूप से सूती कपड़ा, मोती, हाथी दांत और इससे बनी वस्तुएं निर्यात की जाती थीं।

प्रश्न 25.
सिन्धु घाटी के लोगों के धर्म की चार विशेषताएं बताओ जो बाद के समय में भी कायम रहीं।
उत्तर-
सिन्धु घाटी के धर्म की स्थायी विशेषताओं में पशुपति शिव तथा मातृदेवी की पूजा सम्मिलित थी। वे लोग वृक्षों तथा पशुओं की भी पूजा करते थे।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हड़प्पा संस्कृति की खोज कब हुई ? इसके विस्तार का वर्णन करते हुए बताओ कि इसे हड़प्पा संस्कृति क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
हड़प्पा संस्कृति की खोज 1921 ई० में हुई। इस संस्कृति का विस्तार बहुत अधिक था। इसमें पंजाब, सिन्ध, राजस्थान, गुजरात तथा बिलोचिस्तान के कुछ भाग और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती भाग सम्मिलित थे। इस प्रकार इसका विस्तार उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पश्चिम में बिलोचिस्तान के मकरान समुद्र तट से लेकर उत्तर-पूर्व में मेरठ तक था। उस समय कोई अन्य संस्कृति इतने बड़े क्षेत्र में विकसित नहीं थी। इस संस्कृति को हड़प्पा संस्कृति का नाम इसलिए दिया जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम इस सभ्यता से सम्बन्धित जिस स्थान की खोज हुई, वह हड़प्पा था। यह स्थान अब पाकिस्तान में स्थित है।

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प्रश्न 2.
हड़प्पा संस्कृति के मुख्य केन्द्रों का वर्णन करो।
उत्तर-
हड़प्पा संस्कृति का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत था। अब तक इस संस्कृति से सम्बन्धित 1000 से भी अधिक केन्द्रों की खोज हो चुकी है। इनमें से 6 केन्द्र विशेष रूप में उल्लेखनीय हैं। ये हैं-हडप्पा, मोहनजोदडो, चन्दडो, लोथल, कालीबंगां और बनावली। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में स्थित हैं और इनमें 483 किलोमीटर की दूरी है। हड़प्पा संस्कृति के कुछ अन्य केन्द्र सुतकांगेडोर और सुरकोतड़ा हैं। ये दोनों ही समुद्रतटीय नगर हैं। गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी में हड़प्पा संस्कृति की उत्तर अवस्था के चिन्ह मिलते हैं।

प्रश्न 3.
हड़प्पा संस्कृति के लोगों के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-
हड़प्पा संस्कृति के लोगों के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है :

  • भोजन-ये लोग गेहूँ, चावल, सब्जियां तथा दूध का प्रयोग करते थे। मांस-मछली तथा अण्डे भी भोजन के अंग थे।
  • वेश-भूषा-हड़प्पा संस्कृति के लोग सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। पुरुष प्रायः धोती और शाल धारण करते थे। स्त्रियां प्राय: रंगदार और बेल-बूटों वाले वस्त्र पहनती थीं। स्त्रियां और पुरुष दोनों ही आभूषण पहनने के शौकीन थे।
  • मनोरंजन के साधन-लोगों के मनोरंजन के मुख्य साधन घरेलू खेल थे। वे प्रायः नृत्य, संगीत और चौपड़ आदि खेल कर अपना मन बहलाया करते थे। बच्चों के खेलने के लिए विभिन्न प्रकार के खिलौने थे।

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प्रश्न 4.
हडप्पा संस्कृति के लोगों के जीवन-यापन के स्त्रोतों का वर्णन करो।
अथवा
सिन्धु घाटी के लोगों के आर्थिक जीवन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-
सिन्धु घाटी के लोगों का आर्थिक जीवन अनेक व्यवसायों पर आधारित था। इन्हीं व्यवसायों द्वारा उनका जीवनयापन होता था। इन व्यवसायों का वर्णन इस प्रकार है-

  • कृषि-सिन्धु घाटी के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। वे लोग मुख्य रूप से गेहूँ, जौ, चावल और कपास की खेती करते थे। खेती के लिए वे लकड़ी के हल का प्रयोग करते थे। उन्होंने सिंचाई की बड़ी अच्छी व्यवस्था की हुई थी।
  • पशु पालन-सिन्धु घाटी के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय पशु पालन था। वे मुख्य रूप से गाय, बैल, हाथी, बकरियां, भेड़, कुत्ते आदि पशु पालते थे।
  • व्यापार-व्यापार सिन्धु घाटी के लोगों का मुख्य व्यवसाय था। नगरों में आपसी व्यापार होता था। अफ़गानिस्तान तथा ईराक के साथ भी उनकी व्यापार चलता था।
  • उद्योग-यहां के कुछ लोग छोटे-छोटे उद्योग-धन्धों में भी लगे हुए थे। मिट्टी, तांबा तथा पीतल के बर्तन बनाने में वहां के कारीगर बड़े कुशल थे। वे सोने-चांदी के सुन्दर आभूषण भी बनाते थे। ..

प्रश्न 5.
सिन्धु घाटी की सभ्यता अथवा हड़प्पा संस्कृति के कोई ऐसे तत्त्व बताओ जो आज भी भारतीय जीवन में दिखाई देते हैं।
अथवा
भारतीय सभ्यता को हड़प्पा संस्कृति की क्या देन है ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी की सभ्यता के निम्नलिखित चार तत्त्व आज भी भारतीय जीवन में देखे जा सकते हैं :

  • नगर योजना-सिन्धु घाटी के नगर एक योजना के अनुसार बसाए गए थे। नगर में चौड़ी-चौड़ी सड़कें और गलियां थीं। यह विशेषता आज के नगरों में देखी जा सकती है।
  • निवास स्थान-सिन्धु घाटी के मकानों में आज की भान्ति खिड़कियां और दरवाज़े थे। हर घर में एक आंगन, स्नान गृह तथा छत पर जाने के लिए सीढ़ियां थीं।
  • आभूषण एवं श्रृंगार-आज की स्त्रियों की भान्ति सिन्धु घाटी की स्त्रियां भी श्रृंगार का चाव रखती थीं। वे सुर्जी तथा पाऊडर का प्रयोग करती थीं और विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनती थीं। उन्हें बालियां, कड़े तथा गले का हार पहनने का बहुत शौक था।
  • धार्मिक समानता-सिन्धु घाटी के लोगों का धर्म आज के हिन्दू धर्म से बहुत हद तक मेल खाता है। वे शिव, मात देवी तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते थे। आज भी हिन्दू लोगों में उनकी पूजा प्रचलित है।

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प्रश्न 6.
सिन्धु घाटी की सभ्यता की नगर योजना की विशेषताएं क्या थीं ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी की नगर योजना उच्च कोटि की थी। इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार से है :-
1. नगर के दो भाग-मोहनजोदड़ो और हड़प्पा का घेरा चार-पांच किलोमीटर था। ये नगर मुख्यतः दो भागों में बंटे हुए थे-गढ़ी और नगर।

(क) गढ़ी- हड़प्पा की गढ़ी का आकार समानान्तर चतुर्भुज जैसा था। इसकी लम्बाई 410 मीटर और चौडाई 195 मीटर थी। गढ़ी का निर्माण मुख्य रूप से प्रशासकीय एवं धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता था। आवश्यकता पड़ने पर इसे सुरक्षा के लिए भी प्रयोग किया जा सकता था।

(ख) नगर या कस्बा-गढ़ी के नीचे कस्बे की चारदीवारी होती थी । कस्बे की योजना भी उत्तम थी। उसकी मुख्य सड़कें चौड़ी थीं। सड़कों की दिशा उत्तर से दक्षिण एवं पूरब से पश्चिम की ओर थी और नगर को आयताकार टुकड़ों में बांटती थीं।

2. विशाल भवन-मोहनजोदड़ो की गढ़ी में विशाल अन्न भण्डार था। हड़प्पा में यह भण्डार गढ़ी से बाहर था। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो की गढ़ी में एक सरोवर भी मिला है जो 39 फुट लम्बा, 23 फुट चौड़ा और 8 फुट गहरा था। यह उस समय का विशाल स्नानकुंड (Great Bath) था। इसका प्रयोग संभवतः किसी महत्त्वपूर्ण धार्मिक रीति के लिए होता था।

3. निवास स्थान-मकानों के लिए पकी ईंटों का उपयोग होता था। बड़े मकानों में रसोई, शौचघर एवं कुएं के अतिरिक्त बीस-बीस कमरे थे। परन्तु कुछ मकानों में केवल एक या दो कमरे भी थे। प्रत्येक में वायु और प्रकाश के लिए दरवाज़े और खिड़कियां थीं। गंदे पानी के निकास के लिए ढकी हुई नालियों की व्यवस्था थी।।

प्रश्न 7.
सिन्धु घाटी की सभ्यता का तकनीकी विज्ञान किस प्रकार का था ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी के लोगों के तकनीकी विज्ञान (तकनॉलोजी) में काफ़ी समरूपता थी। सभी नगरों में तांबे और कांसे के लगभग एक-जैसी बनावट वाले औजार प्रयोग में लाए जाते थे। औज़ार देखने में सादे और काम करने में अच्छे थे। नगरों में कुशल शिल्पी तांबे और कांसे के कटोरे, प्याले, थालियां, मनुष्य एवं पशुओं की मूर्तियों और छोटी खिलौना बैलगाड़ियां बनाते थे। बर्तन बनाने के लिए कुम्हार के चाक का प्रयोग किया जाता था। मुहरें बनाना अत्यन्त विकसित कला थी। मनके बनाने का काम भी कम उत्कृष्ट न था। सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों की बढ़इगिरी में प्रवीणता का पता उनके द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली आरी से चलता है। इस आरी के दांते ऊंचे-नीचे हैं ताकि लकड़ी का बुरादा आसानी से निकल सके। हड़प्पा संस्कृति के लोग नावें तथा अस्त्र-शस्त्र बनाना भी जानते थे। सच तो यह है कि सिन्धु घाटी के निवासी तकनीकी विज्ञान में मिस्र और बेबीलोन वालों से भी आगे थे।

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प्रश्न 8.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के धर्म की विशेषताएं क्या थीं ?
उत्तर-
खुदाई में एक मोहर मिली है जिस पर एक देवता की मूर्ति बनी हुई है। देवता के चारों ओर कुछ पशु दिखाए गए हैं। इनमें से एक बैल भी है। सर जॉन मार्शल का कहना है कि यह पशुपति महादेव की मूर्ति है और लोग इसकी पूजा करते थे। खुदाई में मिली एक अन्य मोहर पर एक नारी की मूर्ति बनी हुई है। इसने विशेष प्रकार के वस्त्र पहने हुए हैं। विद्वानों का मत है कि यह धरती माता (मातृ देवी) की मूर्ति है और हड़प्पा संस्कृति के लोगों में इसकी पूजा प्रचलित थी। लोग पशुपक्षियों, वृक्षों तथा लिंग की पूजा में भी विश्वास रखते थे। वे जिन पशुओं की पूजा करते थे, उनमें से कूबड़ वाला बैल, सांप तथा बकरा प्रमुख थे। उनका मुख्य पूजनीय वृक्ष पीपल था। खुदाई में कुछ तावीज़ इस बात का प्रमाण हैं कि सिन्धु घाटी के लोग अन्धविश्वासी थे और जादू-टोनों में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 9.
सिन्धु घाटी की सभ्यता की कला की क्या विशेषताएँ थीं ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों द्वारा बनी कलाकृतियां उच्चकोटि की थीं। खुदाई में एक लघु कांस्य प्रतिमा मिली है जो नृत्य की मुद्रा में है। इस मूर्ति से उन लोगों की मूर्तिकला में निपुणता का पता चलता है। यहां मूर्तियों के कई नमूने उपलब्ध हुए हैं। इनमें मानव एवं पशु दोनों की आकृतियां मिलती हैं। सिर और कंधों की टूटी हुई दाढ़ी वाले व्यक्ति की एक मूर्ति सिन्धु घाटी की कला का प्रभावशाली नमूना है। यहां की कुछ मूर्तियां पालथी मारकर बैठी हुई आकृति की हैं, जिसको कोई देव प्रतिमा समझा जाता है। यहां से प्राप्त पकी मिट्टी की लघु प्रतिमाओं की संख्या बहुत अधिक है। पशुओं की प्रतिमाओं में कूबड़ वाला बैल, भैंसा, कुत्ता, भेड़, हाथी, गैंडा, बन्दर, समुद्री कछुआ और कुछ मानवीय सिरों वाले-पशु देखे जा सकते हैं। मिट्टी के बर्तन आमतौर पर कुम्हार के चाक पर बनाए हुए हैं। हाथ से बने बर्तन भी मिले हैं। इन बर्तनों में अधिकांश पर फूलपत्ती, पक्षी और पशुओं के चित्र बने हुए हैं। अंगूठियों और चूड़ियों के अतिरिक्त यहां सोने, चांदी, तांबे, फैंस, चाक पत्थर, कीमती पत्थर और शंख बने अनेक सुन्दर मनके हैं। इन मनकों को पिरो कर माला बनाई जाती थी।

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प्रश्न 10.
सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के बारे में अब तक क्या पता चल सका है ? ।
उत्तर-
सिन्धु घाटी के लोगों ने एक विशेष प्रकार की लिपि का आविष्कार किया जो चित्रमय थी। यह लिपि खुदाई में मिली मोहरों पर अंकित है। यह लिपि बर्तनों तथा दीवारों पर लिखी हुई भी पाई गई है। इनमें 270 के लगभग वर्ण हैं। इसे बाईं से दाईं ओर लिखा जाता है। यह लिपि आजकल की तथा अन्य ज्ञात लिपियों से काफ़ी भिन्न है, इसलिए इसे पढ़ना बहुत ही कठिन है। भले ही विद्वानों ने इसे पढ़ने के लिए अथक प्रयत्न किए हैं तो भी वे अब तक इसे पूरी तरह पढ़ नहीं पाए हैं। आज भी इसे पढ़ने के प्रयत्न जारी हैं। अत: जैसे ही इस लिपि को पढ़ लिया जाएगा, सिन्धु घाटी की सभ्यता के अनेक नए तत्त्व प्रकाश में आएंगे।

प्रश्न 11.
मोहनजोदड़ो से किस प्रकार की मोहरें मिली हैं ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी से मिली मोहरें उनकी उन्नत शिल्पकला की परिचायक हैं। केवल मोहनजोदड़ो से ही 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। इनकी निर्माण कला इतनी श्रेष्ठ है कि छोटा आकार होते हुए भी इनके चित्रों में से शक्ति और ओज झलकता है। इन मोहरों का प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा अथवा उन पर ‘सील’ लगाने के लिए किया जाता है। इन पर कई प्रकार से पशु तथा मानवीय एवं अर्द्ध-मानवीय आकृतियां बनी हुई हैं। पशु आकृतियों में छोटे सींगों वाला सांड, शेर, हाथी, बारहसिंगा, खरगोश, गरुड़ आदि प्रमुख हैं। मोहरों के अधिकांश नमूने लोगों की धार्मिक महत्ता के सूचक हैं। एक आकृति के दाईं तरफ हाथी और चीता है, बाईं ओर गैंडा और भैंसा है। उनके नीचे दो बारहसिंगा या बकरियां हैं। इस पशु स्वामी को शिव का पशुपति रूप माना जाता है।

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प्रश्न 12.
इस (सिन्धु घाटी की) सभ्यता के पतन के कारण बताओ।
उत्तर-
सिन्धु घाटी की सभ्यता के पतन के अनेक कारण बताए जाते हैं :-

  • बाढ़-कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि यह सभ्यता सिन्धु नदी में बाढ़ें आने के कारण लुप्त हुई।
  • बाहरी आक्रमण-कुछ विद्वानों के अनुसार आर्यों तथा अन्य विदेशी जातियों ने यहां के लोगों पर अनेक आक्रमण किए। इन युद्धों में यहां के निवासी हार गए. और इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • वर्षा की कमी-कुछ विद्वानों का कहना है कि इस सभ्यता का अन्त वर्षा की कमी के कारण हुआ। उनका अनुमान है कि इस प्रदेश में काफ़ी लम्बे समय तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा और इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • भूकम्प-कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह सभ्यता भूकम्प आने के कारण नष्ट हुई।
  • अन्य कारण-(i) कुछ विद्वानों के विचार में इस प्रदेश में भयानक महामारियां फैली होंगी। इससे अनेक लोग मारे गए और जो लोग बचे होंगे, वे मृत्यु के भय से यह प्रदेश छोड़ गए होंगे। (ii) एक अन्य मत के अनुसार शायद सिन्धु नदी ने अपना रास्ता बदल लिया होगा जिससे इस प्रदेश की भूमि बंजर हो गई होगी। लोग इस बंजर भूमि को छोड़ कर कहीं और चले गए होंगे।

इन सब कारणों को दृष्टि में रखते हुए बी० जी० गोखले (B.G. Gokhale) ने ठीक कहा है- “मानव और प्रकृति ने सामूहिक रूप से इस सभ्यता का पूर्ण विनाश किया होगा।” (Nature and man must have combined to cause its complete annihilation.)

प्रश्न 13.
सिन्धु घाटी के लोगों के किन-से सीधे या अन्य माध्यम द्वारा सम्पर्क थे ?
उत्तर–
सिन्धु घाटी के लोगों का विश्व तथा देश के अन्य भागों के निवासियों के साथ सीधा या अन्य माध्यम से सम्पर्क था। राजस्थान, मैसूर तथा दक्षिणी भारत के लोगों के साथ उनका सीधा सम्बन्ध था। देश के इन भागों से वे संगमरमर, चांदी तथा सोना मंगवाते थे। बाहरी देशों जैसे अफ़गानिस्तान, मध्य एशिया तथा सुमेर के लोगों के साथ उनके गहरे सम्बन्ध थे। अफ़गानिस्तान से वे लोग सोना, चांदी और तांबा मंगवाते थे। मध्य एशिया से वे हरे रंग के हीरे, फिरोज़े आदि मंगवाते थे। उनके मैसोपोटामिया के लोगों के साथ भी अप्रत्यक्ष सम्बन्ध थे।

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प्रश्न 14.
सिन्धु घाटी के लोगों की व्यापारिक वस्तुओं के विषय में तुम क्या जानते हो ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी के लोग अनेक वस्तुओं का व्यापार करते थे। सिन्धु घाटी से निर्यात होने वाली वस्तुओं में सूती कपड़ा, मोती, हाथी दांत तथा हाथी दांत से बनी वस्तुएं प्रमुख थीं। लंगूर, बन्दर, मोर आदि जीव-जन्तु बाहर भी भेजे जाते थे। लोथल कस्बे से जोकि एक प्रमुख बन्दरगाह थी, मोतियों का निर्यात होता था। सिन्धु घाटी के लोगों के आयात में अनेक बहुमूल्य पदार्थ शामिल थे। वे राजस्थान, मैसूर तथा दक्षिणी भारत से सोना, चांदी और संगमरमर मंगवाते थे। सोना, चांदी तथा तांबा अफ़गानिस्तान से भी मंगवाया जाता था। मध्य एशिया से हीरे, फिरोज़े आदि का आयात किया जाता था।

प्रश्न 15.
सिन्धु घाटी के लोग किन हथियारों का प्रयोग करते थे ?
उत्तर-
सिन्धु घाटी के लोग तांबे तथा कांसे से बने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करते थे। बढ़ई का मुख्य हथियार आरी था जिसके दाँत ऊंचे-नीचे होते थे। खेती में मुख्यत: हैरो जैसे यन्त्र का प्रयोग किया जाता था। सिन्धु घाटी के लोग युद्ध-प्रिय न होने के कारण युद्ध-शस्त्रों को अधिक महत्त्व नहीं देते थे। फिर भी वे कुछ युद्ध-शस्त्र अवश्य बनाते थे। इन शस्त्रों में तांबे तथा कांसे की बनी तलवारें, बर्छियां, तीर, कुल्हाड़ियां, गुलेल और चाकू मुख्य थे। इन शस्त्रों के अतिरिक्त शत्रु पर फेंकने के लिए पत्थर के बने भालों का भी प्रयोग किया जाता था।

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प्रश्न 16.
सिन्धु घाटी की सभ्यता कब फली-फूली ? इसके निर्माता कौन थे ? इस काल में लोगों के सामाजिक जीवन का वर्णन करो।
उत्तर–
सिन्धु घाटी की सभ्यता कब पनपी, इस विषय में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि इस सभ्यता की उत्पत्ति तथा विकास 2500 ई० पू० से 1500 ई० पू० के बीच हुआ। इसके विपरीत सर जॉन मार्शल इस सभ्यता का जन्म आज से लगभग 5 हजार वर्ष पूर्व बताते हैं। प्रायः इसी मत को ठीक माना जाता है। सिन्धु घाटी के लोगों के विषय में भी इतिहासकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ विद्वान् उन्हें आर्य जाति का मानते हैं और कुछ उन्हें सुमेरियन जाति का बताते हैं। इस विषय में सबसे अधिक मान्य मत यह है कि सिन्धु घाटी में अनेक जातियों के लोग रहते थे।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
सिंधु घाटी के लोगों के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएं बताइए।
उत्तर-
सिंधु घाटी के लोगों के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं-
1. भोजन तथा वस्त्र-सिन्धु घाटी के लोग गेहूँ, चावल, दूध, खजूर तथा सब्जियों का प्रयोग करते थे। वे मांस, मछली और अण्डे भी खाते थे। कुछ घरों में सिल-बट्टे भी मिले हैं। इससे यह अनुमान लगाया गया है कि वे लोग चटनी जैसी कोई चीज़ भी खाते थे। सिन्धु घाटी के लोग सूती तथा ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र पहनते थे। वे कुर्ता, धोती और कन्धों पर शाल या दुपट्टे आदि का प्रयोग करते थे। कढ़ाई किए हुए शाल ओढ़ने का भी रिवाज था।

2. आभूषण-सिन्धु घाटी के पुरुष और स्त्रियां दोनों ही आभूषण पहनने के शौकीन थे। उस समय हार, बालियां, अंगूठी, कंगन, चूड़ियां और पांवों में कड़े पहनने का रिवाज़ था। धनी लोग सोने, चांदी तथा हाथी दांत के आभूषण पहनते थे। गरीब लोग केवल तांबे आदि के आभूषण ही प्रयोग में लाते थे। आभूषण बनाने वाले कारीगर बड़े निपुण थे। सर जॉन मार्शल लिखते हैं कि सोने-चांदी के इन आभूषणों को देखकर ऐसा लगता है जैसे “ये आज से पांच हजार साल पहले बने हए नहीं सिन्धु घाटी के आभूषण बल्कि अभी लन्दन के जौहरी बाज़ार से खरीदे गए हैं।

3. श्रृंगार-स्त्रियां काजल, सुर्जी, सुगन्धित तेल तथा दर्पण का प्रयोग करती थीं। दर्पण कांसी के बने हए होते थे। वे कई तरीकों से अपने बाल गूंथती थीं। पुरुष दाढ़ी मुंडवाते थे और कई तरह के बाल बनवाते थे। वे बालों को संवारने के लिए कंघी का प्रयोग करते थे।

4. मनोरंजन-सिन्धु घाटी के लोग नाच और गाने से अपना दिल बहलाया करते थे। उन्हें घरों में खेले जाने वाले खेल अधिक पसन्द थे। खुदाई से प्राप्त कुछ मोहरों से पता चलता है कि लोग जुआ भी खेलते थे। उनका एक खेल आधुनिक शतरंज जैसा था। बच्चों के लिए प्रत्येक घर में खिलौने हुआ करते थे। खुदाई में हिरणों तथा बारहसिंगा के सींग भी मिले हैं। इनसे यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु घाटी के लोगों को शिकार खेलने का भी चाव था।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 1 सिन्धु घाटी की सभ्यता 3

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प्रश्न 2.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के आर्थिक तथा धार्मिक जीवन का वर्णन करो।
उत्तर-
आर्थिक जीवन-सिन्धु घाटी के लोगों के आर्थिक जीवन का वर्णन इस प्रकार है :

  • कृषि–सिन्धु घाटी के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। वे गेहूँ, जौ, कपास, फल, सब्जियों आदि की खेती करते थे।
  • पशु पालन-सिन्धु घाटी के लोगों का दूसरा बड़ा व्यवसाय पशु पालना था। ये लोग गाय, बैल, भेड़, बकरियां, कुत्ते, सूअर आदि पालते थे।
  • व्यापार—यहां के लोगों का व्यापार काफ़ी उन्नत था। वे विदेशों के साथ भी व्यापार करते थे। प्रोफैसर चाइड लिखते हैं कि सिन्धु घाटी के लोगों द्वारा बनी वस्तुएं दजला और फरात की घाटी के बाजारों में बिका करती थीं। वस्तुओं को तोलने के लिए बाट थे।
  • कुटीर उद्योग-सिन्धु घाटी के कांसी तथा पीतल के बहुत सुन्दर बर्तन बनाते थे। उनके बनाए हुए खिलौने बड़े ही सुन्दर होते थे। सूत कातना, कपड़ा बुनना, आभूषण बनाना, पकी ईंटें बनाना आदि भी उनके प्रमुख उद्योग-धन्धे थे।

धार्मिक जीवन-सिन्धु घाटी के लोगों के धार्मिक जीवन का वर्णन इस प्रकार है :-

  • शिव उपासना-खुदाई में एक ऐसी मूर्ति मिली है जिसकी तीन आँखें और तीन मुँह हैं। इस मूर्ति में एक बैल का चित्र भी है। प्रायः बैल के साथ शिवजी महाराज का नाम जुड़ा हुआ है। इसलिए सर जॉन मार्शल का अनुमान है कि यह शिवजी की मूर्ति है और सिन्धु घाटी के लोग इसकी पूजा किया करते थे।
  • मातृदेवी की पूजा-खुदाई में मिली मोहरों पर एक अर्धनग्न नारी का चित्र बना हुआ है। विद्वानों का विचार है कि यह मातृदेवी की मूर्ति है और सिन्धु घाटी के लोग इसकी पूजा करते थे।
  • मूर्ति पूजा–खुदाई में शिवलिंग तथा कई मूर्तियां मिली हैं। अनुमान है कि सिन्धु घाटी के लोग इन मूर्तियों की पूजा करते थे।
  • पशु पूजा-खुदाई से मिली कुछ मोहरों पर हाथी, बैल, बाघ आदि के चित्र मिले हैं। सिन्धु घाटी के लोग इन पशुओं की भी पूजा किया करते थे।
  • जादू-टोनों में विश्वास-खुदाई में कुछ तावीज़ भी मिले हैं। इनसे यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु घाटी के लोग जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे।
  • मृतक संस्कार-सिन्धु घाटी के लोग अपने मृतकों का संस्कार तीन प्रकार से किया करते थे। कुछ लोग मुर्दो को धरती में दबा देते थे और कुछ उन्हें जला देते थे। कई लोग मुर्दो को जलाकर उनकी राख तथा अस्थियों को किसी पात्र में रखकर उसे धरती में गाढ़ देते थे।

प्रश्न 3.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के लुप्त होने के क्या कारण (पतन के कारण) बताए जाते हैं ?
उत्तर-

  • बाढ़ें–कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि सिन्धु नदी की घाटी में आने वाली बाढ़ों ने इस सभ्यता को नष्टभ्रष्ट कर दिया।
  • बाहरी आक्रमण-कुछ विद्वानों के अनुसार आर्यों तथा अन्य विदेशी जातियों ने यहां के लोगों पर अनेक आक्रमण किए। इन युद्धों में यहां के निवासी हार गए इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • वर्षा की कमी-कुछ विद्वानों का कहना है कि इस सभ्यता का अन्त वर्षा की कमी के कारण हुआ। इनका अनुमान है कि इस प्रदेश में काफी लम्बे समय तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा और इस सभ्यता का अन्त हो गया।
  • भूकम्प-कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह सभ्यता भूकम्प आने के कारण नष्ट हुई।
  • अन्य कारण-
    • कुछ विद्वानों के विचार में इस प्रदेश में भयानक महामारियां फैली होंगी। इससे अनेक लोग मारे गए और जो लोग बचे होंगे, वे मृत्यु के भय से यह प्रदेश छोड़ गए होंगे।
    • एक अन्य मत के अनुसार शायद सिन्धु नदी ने अपना रास्ता बदल लिया होगा जिससे इस प्रदेश की भूमि बंजर हो गई होगी। लोग बंजर भूमि को छोड़ कर कहीं और चले गए होंगे।

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अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1.
शारीरिक ढांचे से क्या अभिप्राय है ? हमारा शरीर दोनों टांगों पर कैसे सीधा खड़ा रहता है ?
उत्तर-
शारीरिक ढांचे (Posture) शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों की एक-दूसरे से सम्बद्ध स्थिति को बढ़िया सन्तुलित शारीरिक ढांचा कहा जा सकता है। अच्छे शारीरिक ढांचे वाले व्यक्ति के खड़े होने, बैठने, चलने और पढ़ने में स्वाभाविकता और सुन्दरता झलकती है। जब शरीर के ऊपरी अंगों का भार समान रूप से निचले अंगों पर ठीक सीधे पड़ रहा हो तो हमारा पोस्चर ठीक होगा। इससे अभिप्राय हमारे शरीर की बनावट है। यदि शरीर की बनावट देखने में सुन्दर, सीधी और स्वाभाविक लगे और इसका भार ऊपर वाले अंगों से निचले अंगों पर ठीक तरह आ जाए तो शारीरिक ढांचा ठीक होता है। परन्तु यदि उठने-बैठने, चलने और पढ़ने के समय शरीर टेढ़ा-मेढ़ा और दुखदायी प्रतीत हो तो शारीरिक ढांचा खराब होता है।
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हमारे शरीर के आगे-पीछे आवश्यकतानुसार मांसपेशियां होती हैं। ये हड्डियों को उचित स्थान पर स्थिर रखती हैं। पांवों की मांसपेशियां पांवों की शक्ल को ठीक रखती हैं और शरीर को सीधा खड़ा रखने में उचित आधार प्रदान करती हैं। टांग के अगले और पिछले भाग की मांसपेशियां टांगों को पांवों पर सीधा खड़ा रखने में सहायता करती हैं। इसी प्रकार कमर के आस-पास की मांसपेशियां शरीर के ऊपरी भाग को पीछे की ओर खींचकर रखती हैं। पेट और छाती की मांसपेशियां धड़ और सिर को अधिक पीछे नहीं जाने देतीं। इसलिए हमारा शारीरिक ढांचा मांसपेशियों की सहायता से ठीक ढंग से सीधा और स्वाभाविक रूप में रहता है।

प्रश्न 2.
बढिया शारीरिक ढांचा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
शरीर के अंगों की एक-दूसरे के सम्बन्ध में उचित स्थिति को बढ़िया शारीरिक ढांचा कहा जाता है। जब शरीर के ऊपरी अंगों का भार समान रूप में निचले अंगों पर ठीक सीधे पड़ रहा हो तो उसे हम संतुलित पोस्चर कह सकते हैं। ऊपर चित्र में बढ़िया शारीरिक ढांचा दिखाया गया है। ऐसे ढांचे में शरीर के ऊपरी अंगों का भार ठीक तरह से नीचे वाले अंगों पर पड़ रहा है। ऐसा ढांचा बैठने-उठने, सोने में सुविधाजनक और चुस्त रहता है।

प्रश्न 3.
अच्छे शारीरिक ढांचे के हमें क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
अच्छा शारीरिक ढांचा (Balanced Posture)-संतुलित शारीरिक ढांचे के मुख्य लाभ इस प्रकार हैं—

  1. अच्छा पोस्चर होने से हमें कोई शारीरिक काम करते समय कम-से-कम शक्ति लगानी पड़ती है।
  2. अच्छा पोस्चर होने से शरीर में हिलजुल आसान हो जाती है।
  3. अच्छे पोस्चर वाला व्यक्ति दूसरों को बहुत प्रभावित करता है।
  4. अच्छे पोस्चर व्यक्ति में आत्म-विश्वास पैदा करता है।
  5. अच्छा पोस्चर वाला व्यक्ति प्रत्येक काम में चुस्त और फुर्तीला होता है।

अच्छा शारीरिक ढांचा देखने में सुन्दर लगता है। हमें बैठने-उठने, दौड़ने और पढ़ने आदि में सुविधा और चुस्ती महसूस होती है। बढ़िया ढांचे में स्वास्थ्य ठीक रहता है। बढ़िया शारीरिक ढांचे में दिल, फेफड़ों और गुर्दो आदि के काम में कोई रुकावट नहीं पड़ती। अच्छे शारीरिक ढांचे की मांसपेशियों को कम ज़ोर लगाना पड़ता है।

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प्रश्न 4.
शारीरिक ढांचा कैसे कुरूप हो जाता है ? इसकी मुख्य कुरूपताओं (Deformities) के नाम लिखो।
उत्तर-
जब मांसपेशियों में परस्पर तालमेल और सन्तुलन ठीक न रहे तो हमारा शरीर आगे या पीछे की ओर झुक जाता है। मांसपेशियों की कमजोरी के कारण तथा हड्डियों के टेढ़ा-मेढ़ा होने के कारण शारीरिक ढांचे में कई तरह के दोष उत्पन्न हो जाते हैं। यदि बच्चों की आदतों की ओर विशेष ध्यान न दिया जाए तो भी शारीरिक ढांचा कुरूप हो जाता है। बड़ी आयु में किसी विशेष आदत के कारण शारीरिक ढांचा कुरूप हो सकता है। बच्चों की खुराक की ओर यदि ध्यान न दिया जाए तो भी शारीरिक ढांचा कुरूप हो जाता है। शारीरिक ढांचे की मुख्य कुरूपताएं निम्नलिखित हैं—

  1. कूबड़ का निकलना (Kyphosis)
  2. कूल्हों का आगे की ओर निकलना (Lordosis)
  3. रीढ़ की हड्डी का टेढ़ा हो जाना (Spinal Curvature)
  4. कूबड़ सहित कूल्हों का आगे निकलना (Sclerosis)
  5. घुटनों का भिड़ना (Knee Locking)
  6. पांवों का चपटे होना (Flat Foot)
  7. दबी हुई छाती (Depressed Chest)
  8. कबूतर की तरह छाती अथवा चपटी छाती (Flat Chest)
  9. टेढ़ी गर्दन (Sliding Neck)

शरीर की इन कुरूपताओं को दूर करने के लिए भिन्न-भिन्न व्यायाम करने पड़ते हैं।

प्रश्न 5.
हमारी रीढ़ की हड्डी में कुब (Kyphosis) कैसे पड़ जाता है ? इसको ठीक करने के लिए कौन-कौन से व्यायाम करने चाहिएं ?
उत्तर-
जब गर्दन और पीठ की मांसपेशियां ढीली होकर लम्बी हो जाती हैं और छाती की मांसपेशियां सिकुड़ कर छोटी हो जाती हैं तो रीढ़ की हड्डी में कूबड़ आ जाता है। इस दशा में गर्दन आगे की ओर निकल जाती है तथा सिर आगे की ओर झुका हुआ दिखाई देता है। रीढ़ की हड्डी पीछे की ओर निकल जाती है तथा कूल्हे आगे को घूम जाते हैं।
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कूबड़पन निम्नलिखित कारणों से उत्पन्न होता है (Causes of Kyphosis)—

  1. नज़र का कमज़ोर होना या ऊंचा सुनाई देना।
  2. कम रोशनी में आगे झुक कर पढ़ना।
  3. बैठने के लिए खराब किस्म का एवं निकम्मा फर्नीचर होना।
  4. कसरत न करने से मांसपेशियों का कमजोर हो जाना।
  5. तंग और गलत ढंग के कपड़े पहनना।
  6. शरीर का तेजी से बढ़ना।
  7. लड़कियों का जवान होने पर शरमा कर आगे को झुक कर चलना।
  8. आवश्यकता से अधिक झुक कर काम करने की आदत।
  9. कई धन्धों जैसे बढ़ई का आरा खींचना, माली का क्यारियों की गुड़ाई करना, दफ्तरों में फाइलों पर आंखें टिकाये रखना और दर्जी का कपड़े सीना आदि।
  10. बीमारी या दुर्घटना आदि के कारण।

कूबड़पन दूर करने की विधियां (Methods of Rectify Deformities)—
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  1. उठते-बैठते और चलते समय ठोडी थोड़ी-सी ऊपर की ओर, छाती और सिर को सीधा रखो।
  2. कुर्सी पर बैठकर पीठ बैक के साथ लगाकर तथा सिर पीछे की ओर रखकर ऊपर देखना। हाथों को पीछे पकड़ लेना चाहिए।
  3. पीठ के नीचे तकिया रखकर लेटना।
  4. दीवार से लगी सीढ़ी से लटकना, इस समय पीठ सीढ़ी की ओर होनी चाहिए।
  5. पेट के बल लेटना, हाथों पर भार डाल कर सिर और धड़ के अगले भाग को ऊपर की ओर उठाना।
  6. प्रतिदिन सांस खींचने वाली कसरतों को करना या लम्बे सांस लेना।
  7. डंड निकालना, तैरना तथा छाती के लिए अन्य कसरतें करना।
  8. एक कोने में खड़े होकर दोनों दीवारों पर एक-एक हाथ लगा कर शरीर के भार से बारी-बारी एक बाजू को कोहनी से झुकाना और सीधा करना।

इन कसरतों के अतिरिक्त शारीरिक ढांचे को ठीक रखने वाली स्वस्थ बातों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

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प्रश्न 6.
हमारी कमर के अधिक आगे निकल जाने के कारण बताओ। इस कुरूपता को दूर करने के लिए कुछ कसरतें लिखो।
उत्तर-
कई बार कूल्हों की मांसपेशियां छोटी हो जाती हैं और पेट की मांसपेशियां ढीली पड़कर लम्बी हो जाती हैं। रीढ़ की हड्डी का नीचे वाला मोड़ अधिक आगे हो जाने के कारण पेट आगे निकल जाता है। इससे सांस लेने की क्रिया में काफी बदलाव आ जाता है। इसके निम्नलिखित कारण होते हैं—

  1. छोटे बच्चों में पेट आगे निकल कर चलने की आदत
  2. छोटी उम्र में बच्चों को सन्तुलित भोजन का न मिलना।
  3. कसरत न करना।
  4. ज़रूरत से ज्यादा भोजन करना।
  5. स्त्रियों का ज्यादा बच्चे पैदा करना।

पीछे लिखे कारणों के कारण कमर आगे निकल जाती है। इस कुरूपता को दूर करने के लिए आगे लिखी कसरतें करनी चाहिएं—
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  1. सीधे खड़े होकर शरीर का ऊपरी भाग आगे झुकाना और सीधा करना चाहिए।
  2. पीठ के बल लेट कर उठना और फिर लेटना।
  3. पीठ के बल लेटकर शरीर के सिर वाले और टांगों वाले भागों को बारी-बारी ऊपर उठाना।।
  4. पीठ के बल लेटकर टांगों को धीरे-धीरे 45° तक ऊपर को उठाना तथा फिर नीचे लाना।
  5. सावधान अवस्था में खड़े होकर बार-बार पैरों को स्पर्श करना।
  6. सांस की कसरतों का अभ्यास करना।
  7. हल आसन का अभ्यास करना।

यदि ऊपर लिखी कसरतों को लगातार किया जाए तो बाहर निकली कमर ठीक हो जाती है।

प्रश्न 7.
हमारे पांव चपटे कैसे हो जाते हैं ? चपटे पांव की परख बताते हुए इसको दूर करने की कसरतें भी लिखो।
उत्तर-
चपटे पांव (Flat Foot)—जब पांवों की मांसपेशियां ढीली हो जाती हैं तो डाटें सीधी हो जाती हैं और पांव चपटा हो जाता है। इसके अतिरिक्त यदि शरीर ज्यादा भारी हो, कसरत न की जाए, गलत बनावट के जूते पहने जाएं तो भी पांव चपटे हो जाते हैं। अगर हर रोज़ लगातार काफ़ी समय तक खड़े होना पड़े या शारीरिक ढांचे सम्बन्धी ग़लत आदतें हों तो भी पांव चपटे हो जाते हैं।
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(क) ठीक पांव
(ख) चपटा पांव

चपटे पांवों की परख-थोड़ी-सी नर्म और गीली मिट्टी लो। इसे धरती पर समतल बिछा दो। इस पर पांव रखते हुए आगे की ओर चलो। यदि पांव ठीक हो तो इसके तल का निशान चित्र नं०

  1. में दिखाए गए चित्र के अनुरूप होगा परन्तु यदि पांव चपटा हो तो इसका निशान चित्र नं०
  2. के अनुरूप होगा।

व्यायाम-चपटे पांव को ठीक करने के लिए निम्नलिखित कसरतें करनी चाहिएं—
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  1. एड़ियों के भार चलना और धीरे-धीरे दौड़ना।
  2. पंजों के बल चलना और दौड़ना।।
  3. पंजों के बल साइकिल चलाना।
  4. डंडेदार सीढ़ियों पर चढ़ना-उतरना।
  5. पांव को इकट्ठा करके एड़ी और उंगलियों के सहारे चलना।
  6. नाचना।
  7. लकड़ी के तिकोने फट्टे की ढलान पर पांव रखकर चलना।

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प्रश्न 8.
छाती की हड्डियों में कौन-कौन सी कुरूपताएं आ जाती हैं ? इनको कैसे ठीक किया जा सकता है ?
उत्तर-
छाती की हड्डियों में तीन प्रकार की कुरूपताएं आ जाती हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है—

  1. दबी हुई छाती (Depressed Chest)—इस प्रकार की छाती अन्दर की ओर दबी हुई होती है।
  2. कबूतर जैसी छाती (Pigeon type Chest)-इस प्रकार की छाती की हड्डी ऊपर की ओर उभरी हुई होती है।
  3. चपटी छाती (Flat Chest)-इस प्रकार की छाती में पसलियां अधिक इधर-उधर उभरने की बजाय छाती की हड्डी के लगभग समतल होती हैं।

छाती की हड्डियों में कुरूपता के कारण—

  1. कसरत की कमी।
  2. भोजन में कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन ‘डी’ की कमी।
  3. भयानक बीमारियां।
  4. अत्यधिक आगे को झुक कर बैठना, खड़े होना या चलना आदि।

व्यायाम—

  1. डंड निकालना।
  2. प्रतिदिन सांस की कसरतों का अभ्यास करना।
  3. भुजाओं और धड़ की कसरतों का अभ्यास करना।
  4. चारा काटने वाली मशीन को हाथ से चलाकर चारा काटना।
  5. किसी चीज़ से लटक कर डंड निकालना।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित कुरूपताओं के कारण बताते हुए इनको ठीक करने वाली कसरतें भी लिखो—
(क) टेढ़ी गर्दन,
(ख) घुटनों का भिड़ना,
(ग) चपटी छाती।
उत्तर-
(क) टेढ़ी-गर्दन (Sliding Neck)-कई बार गर्दन के एक तरफ की मांसपेशियां ढीली होकर लम्बी हो जाती हैं। दूसरी ओर की मांसपेशियां सिकुड़ जाने के कारण छोटी हो जाती हैं। गर्दन एक ओर झुकी रहती है। इससे गर्दन टेढ़ी हो जाती है।
कारण (Causes) गर्दन टेढ़ी होने के निम्नलिखित मुख्य कारण होते हैं—

  1. बच्चों को छोटी उम्र में एक ओर ही लेटे रहने देना।
  2. बच्चों को प्रतिदिन एक ओर ही उठाना और कन्धे से लगाए रखना।
  3. पढ़ने का गलत ढंग अपनाना।
  4. एक ओर गर्दन झुकाकर देखने की आदत।
  5. एक आंख की नज़र का कमज़ोर होना।

दोष ठीक करने के उपाय (Remedies)—

  1. सीधी गर्दन रखकर चलने और पढ़ने की आदत डालनी चाहिए।
  2. प्रतिदिन गर्दन की कसरत करनी चाहिए।

(ख) घुटनों का भिड़ना (Knee Loebing)-छोटे बच्चों के भोजन में कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन ‘डी’ की कमी के कारण उनकी हड्डियां कमज़ोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं। उनकी टांगें शरीर का भार न सहन कर सकने के कारण घुटनों से अन्दर की ओर टेढ़ी हो जाती हैं। इस कारण बच्चों के घुटने भिड़ने लग जाते हैं। बच्चा सावधान अवस्था में खड़ा नहीं हो सकता। ऐसा बच्चा भली-भान्ति दौड़ नहीं सकता।

दोष ठीक करने के उपाय (Remedies)-इस दोष को दूर करने के लिए बच्चे को निम्नलिखित कसरतें करवानी चाहिएं—

  1. बच्चे से साइकिल चलवाना चाहिए।
  2. बच्चे को प्रतिदिन सैर करवानी चाहिए।
  3. बच्चे को सीमेण्ट या लकड़ी के घोड़े पर प्रतिदिन बिठाया जाए।

(ग) चपटी छाती (Flat Chest) चपटी छाती में पसलियां अधिक उभरने की बजाय समतल फैल जाती हैं। इस दोष के कारण श्वास-क्रिया में रुकावट आती है।
कारण (Causes)-चपटी छाती होने के निम्नलिखित कारण हैं—

  1. भोजन में कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन ‘डी’ की कमी।
  2. कसरत न करना।
  3. शारीरिक ढांचे की गन्दी आदतें, जैसे-अधिक आगे की ओर झुक कर बैठना, खड़े होना या चलना।
  4. भयानक बीमारियां।

ठीक करने के उपाय (Remedies)–यदि चपटी छाती हो तो निम्नलिखित कसरतें करनी चाहिएं—

  1. प्रतिदिन सांस की कसरतों का अभ्यास करना।
  2. डंड पेलना।
  3. चारा काटने वाली मशीन चलाना।
  4. किसी चीज़ से लटक कर डंड निकालना।
  5. भुजाओं और धड़ की कसरतों का अभ्यास आदि करना।

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प्रश्न 10.
शारीरिक ढांचे को अच्छा बनाने के लिए कुछ सेहतमन्द आदतों का वर्णन करो।
उत्तर-
शारीरिक ढांचे को अच्छा बनाने के लिए निम्नलिखित आदतें अपनानी चाहिएं—

  1. भोजन में बच्चों को आवश्यकतानुसार कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन ‘डी’ देना चाहिए।
  2. सप्ताह में एक दो बार बच्चों को नंगे शरीर धूप में बिठाकर मालिश करनी चाहिए।
  3. पढ़ते समय अच्छी रोशनी और अच्छे फर्नीचर का प्रयोग करना चाहिए।
  4. कभी-कभी बच्चों की नज़र टैस्ट करवा लेनी चाहिए।
  5. बच्चों को बैठने, उठने, चलने और पढ़ने के लिए अच्छे ढंग सिखलाने चाहिएं।
  6. पांवों के बल अधिक देर तक खड़ा नहीं होना चाहिए।
  7. प्रतिदिन सांस की कसरत का अभ्यास करना चाहिए।
  8. तंग जूते और तंग कपड़े नहीं पहनने चाहिएं।
  9. प्रतिदिन कसरत करनी चाहिए।
  10. बैठने के लिए अच्छे फर्नीचर का प्रयोग करना चाहिए।

पीछे की ओर कूबड़ को ठीक करने के व्यायाम (Exercises Related to Kyphosis)—
1. चित्त अवस्था अर्थात् पीठ के बल लेट जाएं, घुटनों को ऊपर की ओर उठाएं, ताकि पैरों के तलवे ज़मीन पर स्पर्श कर सकें। फिर दोनों हाथों को कंधों के बराबर खोलें। हथेलियां ऊपर की ओर होनी चाहिए। अपने हाथों को सिर की ओर ले जायें और हथेलियां एक-दूसरे की ओर हों। कुछ देर इस स्थिति में रहें। उसके बाद अपने हाथों को कंधों के बराबर ले आएं। इस क्रिया को आठ या दस बार दोहराएं।

2. छाती के बल लेट जायें। अपने हाथों को अपनी पीठ पर रखें। फिर अपने धड़ को ज़मीन से कुछ ऊपर उठायें। इस क्रिया को करते समय आपकी ठोड़ी अंदर की ओर हो। इस अवस्था में रुक कर इस क्रिया को आठ या दस बार करें।

3. एक छड़ी को लेकर सिर के ऊपर दोनों हाथों को काफी खुला रखते हुए हॉरीजोन्टल पोजीशन में बैठ जायें। उसके बाद छड़ी सहित दोनों, सिर व कंधों को पीछे की ओर करते हुए धीरे से नीचे की ओर ले जायें और फिर ऊपर करें। इस क्रिया को करते हुए सिर या धड़ को सीधा रखें और इस क्रिया को आठ या दस बार करें।

आगे की ओर रीढ़ की अस्थि को ठीक करने के व्यायाम (Exercises Related to Lordosis)—
1. छाती के बल लेट जायें। दोनों हाथ पीठ पर रखें। फिर कूल्हों तथा कंधों की ओर रखें। पेट पर हाथों से ऊपर की ओर जोर डालें। पीठ के नीचे के भाग को ऊपर उठाने का प्रयास करें।

2. घुटनों को आगे की ओर मोड़ें ताकि कूल्हे पीछे मुड़ सकें। इस अवस्था में कमर सीधी रखें। घुटने पैरों की दशा में ही रहने चाहिए। फिर नीचे की ओर जायें जब तक पट (Thies) ठीक समानान्तर न हो जायें। फिर सीधे खड़े हो जायें, तब इस प्रक्रिया को दोहराएं।

3. आगे की ओर लम्बा डग (style) करें। पिछले पैर का घुटना ज़मीन पर लगायें। अगला पैर घुटने के आगे रहना चाहिए। दोनों हाथ अगले वाले घुटनों पर रखें। पिछली टांग के कूल्हे आगे की ओर ले जाकर कूल्हे को सीधा रखें। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। यह क्रिया टांग बदलकर भी करें।

4. कर्सी पर पैर चौडे करके बैठ जायें और आगे की ओर झुकें। कंधे दोनों घुटनों के बीच तक ले जायें। हाथों को नीचे से कुर्सी की पीठ के नीचे तक ले जायें। कुछ देर इस स्थिति में रहें।

5. फर्श पर पीठ के बल लेट जायें। अपने कंधों की चौड़ाई के अनुसार अपने दोनों हाथों की हथेलियां फर्श पर रखें और फिर पैलविस को फर्श पर रखते हुए धड़ को ऊपर की ओर ले जायें। कुछ समय तक इस स्थिति में रहें।

6. घुटने फैलाकर बैठ जायें। दोनों पैर आपस में मिले होने चाहिए। उसके बाद आगे की ओर झुककर उंगलियों से पैरों के अंगूठों को पकड़ें। इसी अवस्था में कुछ देर फिर वापस आकर इसी प्रक्रिया को दोहराएं।

रीढ़ की अस्थि के एक ओर झुकाव को ठीक करने के व्यायाम (Exercises Related to Scoliosis)
1. छाती के बल लेट जायें। दायें बाजू को ऊपर करें फिर बायें बाजू को ऊपर करें। उसके बाद दायें बाजू को सिर के ऊपर बायीं ओर ले जायें। बायें हाथ से उसे दबाएं। बायें कूल्हे को थोड़ा-सा ऊपर की ओर ले जायें।

2. पैरों की आपसी दूरी के बराबर खड़े हो जायें। उसके पश्चात् बायीं एड़ी और कूल्हों को ऊपर उठायें। दायें बाजू को चाप के रूप में सिर के ऊपर फिर बायीं ओर ले जायें। बायें हाथ से दायें ओर वाली पसली को दबाएँ।

3. पैरों के बीच कुछ इंच की दूरी रखते हुए सीधे खड़े हो जायें। बायें हाथ की उंगलियों के पोरों को बायें कंधे पर रखें तथा शरीर के ऊपर के भाग को दायीं ओर झुकायें।
शारीरिक ढांचा और इसकी कुरूपताएं यदि रीढ़ की हड्डी का कर्व (Curve) ‘C’ के विपरीत हो। यदि ‘C’ की स्थिति के बीच न हो। यदि वक्र ‘C’ की स्थिति में हो तो दायें हाथ की उंगलियों के पोरों को दायें कंधे पर रखकर शरीर के ऊपरी भाग को दाईं ओर झुकाएं। ‘C’ वक्र की स्थिति के अनुसार इस क्रिया को कुछ समय दोहराएं।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 3 शारीरिक ढांचा और इसकी कुरूपताएं

Physical Education Guide for Class 7 PSEB शारीरिक ढांचा और इसकी कुरूपताएं Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य ने दो टांगों पर खड़े होने का ढांचा कितने समय में अपनाया ?
उत्तर-
लाखों सालों में।

प्रश्न 2.
हड्डियों के आगे-पीछे आवश्यकतानुसार क्या लगा होता है ?
उत्तर-
मांसपेशियां।

प्रश्न 3.
यदि मांसपेशि का परस्पर तालमेल और सन्तुलन ठीक न रहे तो क्या होता है ?
उत्तर-
शरीर झुक जाता है।

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प्रश्न 4.
सीधा शरीर देखने में कैसे लगता है ?
उत्तर-सुन्दर।

प्रश्न 5. शारीरिक ढांचा कितनी आयु तक अच्छा या खराब हो सकता है ?
उत्तर-
20 वर्ष तक।

प्रश्न 6.
शरीर को ठीक रखने के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
कसरत।

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प्रश्न 7.
कैसे पांव शरीर के भार को अच्छी प्रकार नहीं सम्भाल सकते ?
उत्तर-
चपटे पांव।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
शारीरिक ढांचे की परिभाषा लिखो।
उत्तर-
शारीरिक ढांचे की परिभाषा के बारे में सभी विद्वानों की एक राय नहीं है। यदि शरीर का पिंजर देखने में सुन्दर लगे और इसके ऊपर के अंगों का भार निचले अंगों पर ठीक सीधे पड़ता हो तो उसे सन्तुलित अथवा अच्छा पोस्चर कहते हैं। इस तरह के शारीरिक ढांचे की अच्छी या गन्दी स्थिति को उसके काम द्वारा ही बनाया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
छाती की हड्डियों में कौन-कौन सी कुरूपताएं आ जाती हैं ?
उत्तर-

  1. दबी हुई छाती (Depressed Chest)
  2. कबूतर जैसी छाती (Pigeon Type Chest)
  3. चपटी छाती (Flat Chest)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

महाराजा रणजीत सिंह का चरित्र एवं व्यक्तित्व (Character and Personality of Maharaja Ranjit Singh)

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह के चरित्र और शख्सीयत का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। (Explain in detail the character and personality of Maharaja Ranjit Singh)
अथवा
रणजीत सिंह का एक मनुष्य के रूप में वर्णन करें। (Describe Ranjit Singh as a man)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए। (Give a character estimate of Maharaja Ranjit Singh.)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह की एक व्यक्ति, एक सेनानी, एक शासक और एक राजनीतिज्ञ के रूप में चर्चा करें।
(Discuss Maharaja Ranjit Singh as a man, a general, a ruler and a diplomat.)
अथवा
आप रणजीत सिंह को इतिहास में क्या स्थान देंगे ? उसे शेर-ए-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
(What place would you assign to Ranjit Singh in the history ? Why is he called Sher-i-Punjab ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह की गणना न केवल भारत के अपितु विश्व के महान् व्यक्तियों में की जाती है। वह बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। वह अपने गुणों के कारण पंजाब में एक शक्तिशाली सिख साम्राज्य की स्थापना करने में सफल हुआ। उसे ठीक ही पंजाब का शेर-ए-पंजाब कहा जाता है। महाराजा रणजीत सिंह के आचरण और व्यक्तित्व का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
I. मनुष्य के रूप में
(As a Man)

1. शक्ल सूरत (Appearance)—महाराजा रणजीत सिंह की शक्ल-सूरत अधिक आकर्षक नहीं थी। उसका कद मध्यम तथा शरीर पतला था। बचपन में चेचक हो जाने के कारण उसकी एक आँख भी जाती रही थी। इसके बावजूद महाराजा के व्यक्तित्व में इतना आकर्षण था कि कोई भी भेंटकर्ता उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। उसके चेहरे से एक विशेष प्रकार की तेजस्विता झलकती थी।

2. परिश्रमी एवं सक्रिय (Hard-working and Active)-महाराजा रणजीत सिंह बहुत परिश्रमी एवं सक्रिय व्यक्ति था। वह इस बात में विश्वास रखता था कि महान् व्यक्तियों को सदैव परिश्रमी एवं सक्रिय रहना चाहिए। महाराजा सुबह से लेकर रात को देर तक राज्य के कार्यों में व्यस्त रहता था। वह राज्य के बड़े-से-बड़े कार्य से लेकर लघु-से-लघु कार्य की ओर व्यक्तिगत ध्यान देता था।

3. साहसी एवं वीर (Courageous and Brave)—महाराजा रणजीत सिंह बहुत ही साहसी एवं वीर व्यक्ति था। उसे बाल्यकाल से ही युद्धों में जाने, शिकार खेलने, तलवार चलाने और घुड़सवारी करने का बहुत शौक था। उसने अल्पायु में ही हशमत खान चट्ठा का सिर काटकर अपनी वीरता का प्रमाण प्रस्तुत किया था। वह भयंकर लड़ाइयों के समय भी बिल्कुल घबराता नहीं था अपितु युद्ध में प्रथम कतार में लड़ता था।

4. अनपढ़ किंतु बुद्धिमान (Illiterate but Intelligent)—महाराजा रणजीत सिंह की पढ़ाई में रुचि नहीं थी। फलस्वरूप वह अशिक्षित ही रहा। अशिक्षित होने पर भी वह बहुत तीक्ष्ण बुद्धि और अद्भुत स्मरण-शक्ति का स्वामी था। उसे अपने राज्य के गाँवों के हज़ारों नाम और उनकी भौगोलिक दशा मौखिक रूप से याद थे। वह जिस व्यक्ति को एक बार देख लेता था उसे वह कई वर्षों के पश्चात् भी पहचान लेता था। उसकी समझ-बूझ इतनी थी कि विदेशों से आए यात्री भी चकित रह जाते थे।

5. दयालु स्वभाव (Kind Hearted)-महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। महाराजा ने कभी भी अपने शत्रुओं के साथ भी अत्याचारपूर्ण व्यवहार नहीं किया। लाहौर के इस शासक ने जिन्हें युद्ध-भूमि में पराजित किया, न केवल गले से लगाया, बल्कि उनकी संतान को भी जागीरें तथा पुरस्कार प्रदान किए। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था। उसकी दया की कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।
प्रसिद्ध लेखक फकीर सैयद वहीदुदीन के अनुसार,
“लोक दिलों में रणजीत सिंह की लोकप्रिय तस्वीर एक विजयी नायक अथवा एक शक्तिशाली सम्राट की अपेक्षा एक दयालु पितामह के लिए अधिक छाई है। उनमें ये तीनों गुण थे, परंतु उनकी दयालुता उनकी आन-शान तथा राज्य शक्ति पीछे छोड़ आई है तथा अभी तक जीवित है।”1.

6. सिख-धर्म का श्रद्धालु अनुयायी (A devoted follower of Sikhism)-महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। वह अपनी इन विजयों के लिए धन्यवाद हेतु दरबार साहिब अमृतसर जाकर भारी चढ़ावा चढ़ाता था। वह स्वयं को गुरुघर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-एखालसा’ और दरबार को ‘दरबार खालसा जी’ कहता था। उसने सिंह साहिब की उपाधि को धारण किया था।. उसके सिक्कों पर ‘नानक सहाय’ तथा ‘गोबिंद सहाय’ शब्द अंकित थे। उसकी शाही मोहर पर ‘अकाल सहाय’ शब्द अंकित थे। महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत-से गुरुद्वारों में नवीन भवनों का निर्माण करवाया। हरिमंदिर साहिब के गुंबद पर सीने का काम करवाया। संक्षेप में कहें तो वह तन-मन से सिख धर्म का अनन्य श्रद्धालु था।

6. सहिष्णु (Tolerant) यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों का सम्मान करता था। वह धार्मिक पक्षपात तथा सांप्रदायिकता से कोसों दूर था। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख, हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उदाहरणतया उसका विदेश मंत्री फकीर अज़ीज-उद्दीन मुसलमान, प्रधानमंत्री ध्यान सिंह डोगरा और सेनापति मिसर दीवान चंद हिंदू थे। उसके राज्य में सभी धर्मों के लोगों को अपने रस्मों-रिवाज की पूरी स्वतंत्रता थी। डॉ० भगत सिंह के अनुसार,

“प्राचीन तथा मध्यकालीन भारतीय इतिहास का कोई भी शासक रणजीत सिंह की सहिष्णुता की नीति की समानता नहीं कर सकता।”2

1. “Ranjit Singh’s popular image is that of a kindly patriarch rather than that of conquering ‘ hero or a mighty monarch. He was all three, but his humanity has outlived his splendour and power.” Fakir Syed Waheeduddin, The Real Ranjit Singh (Patiala : 1981) p. 8.
2. “No ruler of ancient or medieval Indian history could match Ranjit Singh in his cosmopolitan approach.” Dr. Bhagat Singh, Life and Times of Maharaja Ranjit Singh (New Delhi : 1990) p. 337.

II. एक सेनानी तथा विजेता के रूप में
(As a General and Conqueror)
महाराजा रणजीत सिंह की गणना विश्व के महान् सेनानियों में की जाती है। उसने अपने जीवन में जितने भी युद्ध किए किसी में भी पराजय का मुख नहीं देखा। वह बड़ी से बड़ी विपदा आने पर भी नहीं घबराता था। उदाहरणतया 1823 ई० में नौशहरा की लड़ाई में खालसा सेना ने साहस छोड़ दिया था। ऐसे समय महाराजा रणजीत सिंह भाग कर युद्ध क्षेत्र में सबसे आगे पहुँचा तथा सैनिकों में नया जोश भरा।

निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह एक महान् विजेता भी था। 1797 ई० में जब रणजीत सिंह शुकरचकिया मिसल की गद्दी पर विराजमान हुआ तो उसके अधीन बहुत कम क्षेत्र था। उसने अपनी योग्यता तथा वीरता से अपने राज्य को एक साम्राज्य में बदल दिया था। उसके राज्य में लाहौर, अमृतसर, कसूर, स्यालकोट, काँगड़ा, गुजरात, जम्मू, अटक, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश समिलित थे। महाराजा की विजयों के कारण उसका साम्राज्य उत्तर में लद्दाख से लेकर दक्षिण में शिकारपुर तक और पूर्व में सतलुज नदी से लेकर पश्चिमी में पेशावर तक फैला था। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० गंडा सिंह के अनुसार, “वह (महाराजा रणजीत सिंह) भारत के महान् नायकों में से एक था।”3

III. एक प्रशासक के रूप में
(As an Administrator) : निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह एक उच्चकोटि का प्रशासक था। उसके शासन का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण था। प्रशासन चलाने के लिए महाराजा ने कई योग्य तथा ईमानदार मंत्री नियुक्त किए थे। महाराजा ने अपने राज्य को चार बड़े प्रांतों में विभक्त किया हुआ था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई मौजा अथवा गाँव थी। गाँव का प्रशासन पंचायत के हाथ होता था। प्रजा की स्थिति जानने के लिए महाराजा प्रायः भेष बदलकर राज्य के विभिन्न भागों का भ्रमण करता था। किसानों तथा निर्धनों को राज्य की ओर से विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं। परिणामस्वरूप महाराजा रणजीत सिंह के समय प्रजा बड़ी समृद्ध थी।

महाराजा रणजीत सिंह यह बात भी भली-भाँति समझता था कि साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली सेना का होना अत्यावश्यक है। वह प्रथम भारतीय शासक था जिसने अपनी सेना को यूरोपीय पद्धति का सैनिक प्रशिक्षण देना आरंभ किया। महाराजा स्वयं सेना का निरीक्षण करता था। सैनिकों का ‘हुलिया’ रखने तथा घोड़ों को ‘दागने’ की प्रथा भी आरंभ की गई। सैनिकों तथा उनके परिवारों का राज्य की ओर से पूरा ध्यान रखा जाता था। डॉ० एच० आर० गुप्ता का यह कहना बिल्कुल ठीक है, “वह भारतीय इतिहास के उत्तम शासकों में से एक था।”4

3. “Rightly he may claim to be one of the greatest heroes of India.” Dr. Ganda Singh, Maharaja Ranjit Singh, Quoted from, the Panjab Past and Present (Patiala : Oct. 1980) Vol. XIV, p. 15.
4. “He was one of the best rulers in Indian history.” Dr. H. R. Gupta, History of the Sikhs (New Delhi : 1991) Vol. 5, p. 596.

IV. एक कूटनीतिज्ञ के रूप में
(As a Diplomat)
महाराजा रणजीत सिंह एक सफल कूटनीतिज्ञ था। अपने राजनीतिक जीवन के शुरू में उसने शक्तिशाली मिसल सरदारों के सहयोग से दुर्बल मिसलों पर अधिकार किया। तत्पश्चात् उसने एक-एक करके इन शक्तिशाली मिसलों को भी अपने अधीन कर लिया। वह जिन शासकों को पराजित करता था उन्हें आजीविका के लिए जागीरें भी प्रदान करता था। इसलिए वे महाराजा का विरोध नहीं करते थे। महाराजा ने अपनी कूटनीति से जहाँदद खाँ से अटक का किला बिना युद्ध किए ही प्राप्त कर लिया था। 1835 ई० में जब अफ़गानिस्तान का शासक दोस्त मुहम्मद खाँ आक्रमण करने आया तो महाराजा ने ऐसी चाल चली कि वह लड़े बिना ही युद्ध क्षेत्र से भाग गया।

1809 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों से मित्रता करके अपने राजनीतिक विवेक का प्रमाण दिया। यह उसकी दुर्बलता नहीं अपितु उसके राजनीतिक विवेक तथा दूरदर्शिता का प्रमाण था। उत्तर-पश्चिमी सीमा नीति के संबंध में भी महाराजा ने राजनीतिक समझदारी का प्रमाण दिया। अफ़गानिस्तान पर आक्रमण न करना महाराजा की बुद्धिमत्ता का एक अन्य प्रमाण था। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० भगत सिंह के अनुसार,
“कूटनीति में उसे परास्त करना कोई सहज कार्य नहीं था।”5

5. “It was not easy to beat him in diplomacy.” Dr. Bhagat Singh, op. cit., p. 339.

V. पंजाब के इतिहास में उसका स्थान . (HIs Place in the History of the Punjab)
महाराजा रणजीत सिंह की गणना न केवल भारत अपितु विश्व के महान् शासकों में की जाती है। विभिन्न इतिहासकार महाराजा रणजीत सिंह की तुलना मुग़ल बादशाह अकबर, मराठा शासक शिवाजी, मिस्र के शासक महमत अली एवं फ्रांस के शासक नेपोलियन आदि से करते हैं। इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ इन शासकों से कहीं अधिक थीं। जिस समय महाराजा रणजीत सिंह सिंहासन पर बैठा तो उसके पास केवल नाममात्र का राज्य था। किंतु महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी योग्यता एवं कुशलता के साथ एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। ऐसा करके उन्होंने सिख साम्राज्य के स्वप्न को साकार किया। महाराजा रणजीत सिंह का शासन प्रबंध भी बहुत उच्चकोटि का था। उनके शासन प्रबंध का मुख्य उद्देश्य प्रजा की भलाई करना था। प्रजा के दुःखों को दूर करने के लिए महाराजा सदैव तैयार रहता था तथा प्रायः राज्य का भ्रमण भी किया करता था। महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उनके दरबार में सिख, हिंदू, मुसलमान, यूरोपियन इत्यादि सभी धर्मों के लोग उच्च पदों पर नियुक्त थे। महाराजा रणजीत सिंह ने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाकर उन्हें एक सूत्र में बाँधा। वह एक महान् दानी भी थे। उन्होंने अपने साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के लिए एक शक्तिशाली सेना का भी निर्माण किया। उन्होंने अंग्रेजों के साथ मित्रता स्थापित करके अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ का प्रमाण दिया। इन सभी गुणों के कारण आज भी लोग महाराजा रणजीत सिंह को ‘शेरए-पंजाब’ के नाम से स्मरण करते हैं। निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह को पंजाब के इतिहास में एक गौरवमयी स्थान प्राप्त है।
अंत में हम डॉ० एच० आर० गुप्ता के इन शब्दों से सहमत हैं,
“एक व्यक्ति, योद्धा, जरनैल, विजेता, प्रशासक, शासक तथा राजनीतिवेत्ता के रूप में रणजीत सिंह को . विश्व के महान् शासकों में उच्च स्थान प्राप्त है।”6

6. “As a man, warrior, general, conqueror, administrator, ruler and diplomat, Ranjit Singh occupies a high position among the greatest sovereigns of the world.” Dr. H.R. Gupta, op. cit., p. 596.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह का एक व्यक्ति के रूप में आप कैसे वर्णन करेंगे?
(How do you describe about Maharaja Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह की शख्सियत के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the personality of Maharaja Ranjit Singh ?)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह के चरित्र और व्यक्तित्व की तीन विशेषताएँ बताएँ।
(Mention the three characteristics of the character and personality of Maharaja Ranjit Singh.)
उत्तर-
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह शक्ल-सूरत से अधिक आकर्षक नहीं था, तथापि प्रकृति ने उसे अद्भुत स्मरण शक्ति तथा अदम्य साहस का वरदान देकर इस कमी को पूरा किया। महाराजा रणजीत सिंह का स्वभाव बड़ा दयालु था। वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करता था। उसने अपने शासनकाल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया था। महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का सच्चा सेवक था। इसके बावजूद उनका अन्य धर्मों के साथ व्यवहार बड़ा सम्मानजनक था।

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह एक दयालु शासक था । कैसे ? (Maharaja Ranjit Singh was a kind ruler. How ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। अपने शासनकाल के दौरान महाराजा रणजीत सिंह ने उन शासकों को जिन्हें युद्ध-भूमि में पराजित किया उन्हें जागीरें तथा पुरस्कार प्रदान किए। महाराजा ने अपने शासनकाल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु-दंड नहीं दिया था। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था। उसकी दया की कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।

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प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का श्रद्धालु अनुयायी था । अपने पक्ष में तर्क दीजिए।
(Maharaja Ranjit Singh was a devoted follower of Sikhism. Give arguments in your favour.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। वह अपनी विजयों को उस परमात्मा की कृपा समझता था। वह स्वयं को गुरु घर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ कहता था। वह स्वयं को ‘महाराजा’ कहलवाने के स्थान पर ‘सिंह साहिब’ कहलवाता था। महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत-से नवीन गुरुद्वारों का निर्माण करवाया। वह तन-मन-धन से सिख धर्म का अनन्य श्रद्धालु था।

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह एक धर्म-निरपेक्ष शासक थे। कैसे ?
(Maharaja Ranjit Singh was a secular ruler. How ?)
उत्तर-
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखता था। वह अपनी सहिष्णुता की नीति से विभिन्न धर्मों के लोगों के दिल जीतने में सफल रहा। उसके राज्य में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख , हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उसके राज्य में सभी धर्मों के लोगों को अपने रस्मों-रिवाजों की पूरी स्वतंत्रता थी।

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प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह का एक प्रशासक के रूप में उल्लेख कीजिए।
(Describe Maharaja Ranjit Singh as an administrator.)
अथवा
एक शासन प्रबंधक के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Maharaja Ranjit Singh as an administrator ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह सिख पंथ का महान् विजेता था तथा एक उच्चकोटि का शासक प्रबंधक था। उसने प्रशासन को कुशलता से चलाने के उद्देश्य से योग्य व ईमानदार मन्त्रियों को नियुक्त किया गया था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई मौजा अथवा गाँव थी। गाँव का प्रशासन पंचायत के हाथ में होता था। प्रजा की स्थिति जानने के लिए महाराजा भेष बदल कर राज्य का भ्रमण भी किया करता था। महाराजा रणजीत सिंह ने इसके साम्राज्य की सुरक्षा व विस्तार के लिए शक्तिशाली सेना का भी गठन किया था।

प्रश्न 6.
“महाराजा रणजीत सिंह एक महान् सेनानी एवं विजेता था।” व्याख्या करें।
(“Maharaja Ranjit Singh was a great general and conqueror.” Explain.)
अथवा
“एक सैनिक और जरनैल के रूप” में महाराजा रणजीत सिंह के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Maharaja Ranjit Singh as a Soldier and a General ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह एक महान् सेनापति एवं विजेता था। उसने अपनी योग्यता तथा वीरता से अपने राज्य को एक विशाल साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया था। उसके राज्य में लाहौर, अमृतसर, स्यिालकोट, काँगड़ा, गुजरात जम्मू, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश शामिल थे। महाराजा की विजयों के कारण उसका साम्राज्य उत्तर में लद्दाख से लेकर दक्षिण में शिकारपुर तक और पूर्व में सतलुज नदी से लेकर पश्चिम में पेशावर तक फैला हुआ था।

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प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह को शेरे-पंजाब क्यों कहा जाता है ? (Why Maharaja Ranjit Singh is called Sher-i-Punjab ?)
अथवा
आप रणजीत सिंह को इतिहास में क्या स्थान देंगे? उनको शेरे-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
(What place would you assign in History to Ranjit Singh ? Why is he called Sher-iPunjab ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह एक सफल विजेता होने के साथ-साथ वह एक कुशल प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसके शासन प्रबंध का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण करना था। महाराजा रणजीत सिंह ने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई थी। उसने सेना का पश्चिमीकरण किया। उसने अंग्रेजों के साथ मित्रता करके पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित होने से बचाए रखा। इन सभी गुणों के कारण रणजीत सिंह को शेर-ए-पंजाब कहा जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह की कोई एक विशेषता बताएँ।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह का स्वभाव बड़ा दयालु था।

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को किस घोड़े से विशेष लगाव था ?
उत्तर-
लैली।

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प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह सिख-धर्म का श्रद्धालु अनुयायी था। इसके संबंध में कोई एक प्रमाण दीजिए।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहता था।

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को क्या कहते थे ?
उत्तर-
सरकार-ए-खालसा।

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह अपने आप को क्या कह कर बुलाते थे ?
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह अपने आप को क्या कहा करता था ?
उत्तर-
सिख पंथ का कूकर।

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प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह के दरबार को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
दरबार-ए-खालसा।

प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह के एक गैर-सिख मंत्री का नाम बताएँ।
उत्तर-
फकीर अज़ीज़-उद्दीन।

प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह के दरबारी इतिहासकार का नाम बताएँ।
उत्तर-
सोहन लाल सूरी।

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प्रश्न 9.
महाराजा रणजीत सिंह को एक महान् सेनानायक क्यों माना जाता है ?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को किसी भी लड़ाई में पराजय का सामना नहीं करना पड़ा था।

प्रश्न 10.
महाराजा रणजीत सिंह एक सफल कूटनीतिज्ञ था। इसके संबंध में कोई एक प्रमाण दीजिए।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह ने अफ़गानिस्तान पर अधिकार न करके अपनी सूझ-बूझ का प्रमाण दिया।

प्रश्न 11.
पंजाब के किस शासक को शेर-ए-पंजाब के नाम से याद किया जाता है ?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को।

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प्रश्न 12.
महाराजा रणजीत सिंह को शेर-ए-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को विशाल सिख साम्राज्य तथा उत्तम शासन व्यवस्था की स्थापना की।

प्रश्न 13.
महाराजा रणजीत सिंह को पारस क्यों कहा जाता था ?
उत्तर-
क्योंकि वह अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था।

(ii) रिक्त स्थान भरें । (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह की शक्ल सूरत………नहीं थी।
उत्तर-
(आकर्षक)

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प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को सबसे अधिक……..नामक घोड़े से प्यार था।
उत्तर-
(लैली)

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह स्वयं को सिख पंथ का……..समझते थे।
उत्तर-
(कूकर)

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को……..कहते थे। .
उत्तर-
(सरकार-ए-खालसा)

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प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह अपने दरबार को………..कहते थे।
उत्तर-
(दरबार खालसा जी)

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह शराब के बहुत………थे।
उत्तर-
(शौकीन)

प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह को……….के नाम से याद किया जाता है।
उत्तर-
(शेर-ए-पंजाब)

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(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
महाराजा सिंह बड़ा मेहनती तथा फुर्तीला था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को लैली नामक घोड़े से बहुत प्यार था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह अपने आप को सिख धर्म का कूकर समझते थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहते थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह को केवल सिख धर्म के साथ प्रेम था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह शराब के साथ बहुत घृणा करते थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह न केवल एक महान् विजेता थे बल्कि एक उच्च कोटि के शासन प्रबंधक भी थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह को आज भी लोग शेर-ए-पंजाब के नाम से याद करते हैं।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह की क्या विशेषता थी ?
(i) वह बहुत परिश्रमी और सक्रिय था
(ii) उसका स्वभाव बहुत दयालु था
(iii) वह अनपढ़ किंतु बुद्धिमान था
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को किस घोड़े से विशेष लगाव था ?
(i) लैली
(ii) सैली
(iii) चेतक
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को क्या कहकर बुलाता था ?
(i) सरकार-ए-आम
(ii) सरकार-ए-खास
(iii) सरकार-ए-खालसा
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह के दरबार का सबसे प्रसिद्ध विद्वान् कौन था ?
(i) सोहन लाल सूरी
(ii) फ़कीर अज़ीजुद्दीन
(iii) राजा ध्यान सिंह
(iv) दीवान मोहकम चंद।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 5.
पंजाब के कौन-से शासक को शेरे-पंजाब के नाम से याद किया जाता है ?
(i) महाराजा रणजीत सिंह को
(ii) मझराजा दलीप सिंह को
(iii) महाराजा शेर सिंह को
(iv) महाराजा खड़क सिंह को।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह के समय ‘शाही मोहर’ पर कौन-से शब्द अंकित थे ?
(i) नानक सहाय
(ii) अकाल सहाय
(iii) गोबिंद सहाय
(iv) तेग़ सहाय।
उत्तर-
(ii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह का एक व्यक्ति के रूप में आप कैसे वर्णन करेंगे ? (How do you describe about Maharaja Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह के आचरण एवं व्यक्तित्व का वर्णन करें। (Write about the character and personality of Maharaja Ranjit Singh.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह चाहे अनपढ़ थे, परंतु वह बड़ी तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी थे। उनको हज़ारों गाँवों के नाम तथा उनकी भौगोलिक स्थिति मौखिक रूप से स्मरण थी। वह जिस व्यक्ति को एक बार देख लेते उसको कई वर्षों बाद भी पहचान लेते थे। महाराजा रणजीत सिंह का स्वभाव बड़ा दयालु था। वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करते थे। उन्होंने अपने शत्रुओं से कभी भी निर्दयतापूर्वक व्यवहार नहीं किया था। महाराजा ने अपने शासन काल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया था। महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म के सच्चे सेवक थे। वह अपना प्रतिदिन का कार्य प्रारंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनते तथा अरदास करते थे। वह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहते थे। उन्होंने नानक सहाय और गोबिंद सहाय नाम के सिक्के जारी किए। उन्होंने गुरुद्वारों को भारी दान दिया। इसके बावजूद महाराजा रणजीत सिंह का अन्य धर्मों के साथ व्यवहार रिवाज मनाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। महाराजा अन्य धर्म के लोगों को भी दिल खोल कर दान दिया करते थे।

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प्रश्न 2.
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह की छः विशेषताएँ क्या थी ? (What were the six features of Maharaja Ranjit Singh as a man ?),
उत्तर-
1. शक्ल सूरत-महाराजा रणजीत सिंह की शक्ल-सूरत अधिक आकर्षक नहीं थी। उसका कद मध्यम तथा शरीर पतला था। बचपन में चेचक हो जाने के कारण उसकी एक आँख भी जाती रही थी। परंतु महाराजा के व्यक्तित्व में इतना आकर्षण था कि कोई भी भेंटकर्ता उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।

2. परिश्रमी एवं सक्रिय—महाराजा रणजीत सिंह बहुत परिश्रमी एवं सक्रिय व्यक्ति था। महाराजा सुबह से लेकर रात को देर तक राज्य के कार्यों में व्यस्त रहता था। वह राज्य के बड़े-से-बड़े कार्य से लेकर लघु-से-लघु कार्य की ओर व्यक्तिगत ध्यान देता था।

3. साहसी एवं वीर-महाराजा रणजीत सिंह बहुत ही साहसी एवं वीर व्यक्ति था। उसे बाल्यकाल से ही युद्धों में जाने, शिकार खेलने, तलवार चलाने और घुड़सवारी करने का बहुत शौक था। वह भयंकर लड़ाइयों के समय भी बिल्कुल घबराता नहीं था अपितु युद्ध में प्रथम कतार में लड़ता था।

4. दयालु स्वभाव-महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। महाराजा ने कभी भी अपने शत्रुओं के साथ भी अत्याचारपूर्ण व्यवहार नहीं किया। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था।

5. सिख-धर्म का श्रद्धालु अनुयायी-महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। वह स्वयं को . गुरुघर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ और दरबार को ‘दरबार खालसा जी’ कहता था।

6. शिक्षा का संरक्षक-महाराजा रणजीत सिंह यद्यपि स्वयं अनपढ़ था। परंतु उसने शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक स्कूल खोले। आपने फ़ारसी, उर्दू, हिंदी तथा गुरमुखी पढ़ाने वाली संस्थाओं को अनुदान तथा जागीरें प्रदान की।

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह एक दयालु शासक था। कैसे ? (Maharaja Ranjit Singh was a kind ruler. How ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। अपने शासनकाल के दौरान महाराजा रणजीत सिंह ने सिख मिसलदारों, राजपूत राजाओं, पठान शासकों तथा अफ़गान सम्राटों को एक-एक करके विजित किया। आश्चर्य की बात यह है कि महाराजा ने कभी भी अपने शत्रुओं के साथ अत्याचारपूर्ण व्यवहार नहीं किया। उस समय काबुल तथा दिल्ली के सम्राट् जो सिंहासन के स्वामी बनते रहे, वे न केवल अन्य निकट दशा में दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ते रहे। ऐसे समय लाहौर के इस शासक ने जिन्हें युद्ध-भूमि में पराजित किया, न केवल गले से लगाया, बल्कि उनकी संतान को भी जागीरें तथा पुरस्कार प्रदान किए। महाराजा ने अपने शासनकाल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु-दंड नहीं दिया था। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था। उसकी दया की कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का श्रद्धालु अनुयायी था। अपने पक्ष में तर्क दीजिए।
(Maharaja Ranjit Singh was a devoted follower of Sikhism. Give arguments in your favour.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी की एक कलगी अपने तोशेखाने में रखी हुई थी जिसको छूना वह अपने लिए सौभाग्य मानता था। वह अपनी विजयों को उस परमात्मा की कृपा समझता था। इन विजयों के लिए धन्यवाद हेतु वह दरबार साहिब अमृतसर जाकर भारी चढ़ावा चढ़ाता था। वह स्वयं को गुरु घर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ कहता था। वह स्वयं को ‘महाराजा’ कहलवाने के स्थान पर ‘सिंह साहिब’ कहलवाता था। उसके सिक्कों पर ‘नानक सहाय’ तथा ‘गोबिंद सहाय’ के शब्द अंकित थे। उसकी शाही मोहर पर ‘अकाल सहाय’ शब्द अंकित थे। सेना में ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह’ का जय घोष किया जाता था। सरकारी कार्यों के लिए गुरु ग्रंथ साहिब के सम्मुख शपथ दिलाई जाती थी। महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत-से नवीन गुरुद्वारों का निर्माण करवाया तथा उनकी देख-रेख के लिए बड़ी-बड़ी जागीरें दीं। संक्षेप में, कहें तो वह तन-मन-धन से सिख धर्म का अनन्य श्रद्धालु था।

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह एक धर्म-निरपेक्ष शासक थे। कैसे ? (Maharaja Ranjit Singh was a Secular ruler. How ?)
उत्तर-
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखता था। वह धार्मिक पक्षपात तथा साँप्रदायिकता से कोसों दूर था। वह यह बात भली-भाँति जानता था कि एक शक्तिशाली तथा चिरस्थाई साम्राज्य की स्थापना के लिए सभी धर्मों के लोगों का सहयोग प्राप्त करना आवश्यक है। वह अपनी सहिष्णुता की नीति से विभिन्न धर्मों के लोगों के दिल जीतने में सफल रहा। उसके राज्य में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख, हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उदाहरणतया उसका विदेश मंत्री फकीर अजीज-उद्दीन मुसलमान, प्रधानमंत्री ध्यान सिंह डोगरा, वित्त मंत्री दीवान भवानी दास और सेनापति मिसर दीवान चंद हिंदू थे। इसी तरह जनरल मैतूरा, कोर्ट, गार्डनर इत्यादि यूरोपीय थे। दान देने के विषय में भी महाराजा किसी धर्म से किसी प्रकार का कोई भेद-भाव नहीं करता था। उसने हिंदू मंदिरों, मुस्लिम मस्जिदों तथा मकबरों की देख-रेख के लिए पर्याप्त धन दिया। उसके राज्य में सभी धर्मों के लोगों को अपने रस्मो-रिवाज की पूरी स्वतंत्रता थी।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह का एक प्रशासक के रूप में उल्लेख कीजिए।
(Describe Maharaja Ranjit Singh as an administrator.)
अथवा
एक शासन प्रबंधक के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Ranjit Singh as an administrator ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह एक उच्च कोटि का शासन प्रबंधक था। उसके शासन का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण था। प्रशासन में सहयोग प्राप्त करने के लिए महाराजा ने कई योग्य तथा ईमानदार मंत्री नियुक्त किए थे। प्रशासन को कुशलता से चलाने के लिए महाराजा ने अपने राज्य को चार बड़े प्रांतों में विभक्त किया हुआ था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई मौजा अथवा गाँव थी। गाँव का प्रशासन पंचायत के हाथ में होता था। महाराजा पंचायतों के कार्य में कभी हस्तक्षेप नहीं करता था। वह प्रजा हित को कभी दृष्टिविगतं नहीं होने देता था। उसने राज्य के अधिकारियों को भी यह आदेश दिया था कि वे जन हित के लिए विशेष प्रयत्न करें। प्रजा की स्थिति जानने के लिए महाराजा प्रायः भेष बदल कर राज्य का भ्रमण किया करता था। महाराजा के आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों को दंड दिया जाता था। किसानों तथा निर्धनों को राज्य की ओर से विशेष सुविधाएँ दी गई थीं। परिणामस्वरूप महाराजा रणजीत सिंह के समय में प्रजा बड़ी समृद्ध थी।

प्रश्न 7.
“महाराजा रणजीत सिंह एक महान् सेनानी एवं विजेता था।” व्याख्या करें। (“Maharaja Ranjit Singh was a great general and conqueror.” Explain.).
अथवा
“एक सैनिक और जरनैल के रूप” में महाराजा रणजीत सिंह के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Maharaja Ranjit Singh as a Soldier and a General ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपने समय का एक महान् सेनानी था। अपने जीवन में उसने जितने भी युद्ध किए, किसी में भी पराजय का मुख नहीं देखा। वह बड़ी-से-बड़ी विपदा आने पर भी नहीं घबराता था। महाराजा अपने सैनिकों के कल्याण का पूरा ध्यान रखता था। बदले में वे भी महाराजा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहते थे। महान् सेनानी होने के साथ-साथ महाराजा रणजीत सिंह एक महान् विजेता भी था। 1797 ई० में जब रणजीत सिंह शुकरचकिया मिसल की गद्दी पर विराजमान हुआ तो उसके अधीन बहुत कम क्षेत्र था। उसने अपनी योग्यता तथा वीरता से अपने राज्य को एक साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया था। उसके राज्य में लाहौर, अमृतसर, कसूर, स्यालकोट, काँगड़ा, गुजरात, जम्मू, अटक, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश सम्मिलित थे। इन प्रदेशों को अपने राज्य में सम्मिलित करने के लिए महाराजा रणजीत सिंह को कई भयंकर युद्ध लड़ने पड़े। महाराजा की विजयों के कारण उसका साम्राज्य उत्तर में लद्दाख से लेकर दक्षिण में शिकारपुर तक और पूर्व में सतलुज नदी से लेकर पश्चिम में पेशावर तक फैला हुआ था।

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प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह को शेरे पंजाब क्यों कहा जाता है ? (Why is Maharaja Ranjit Singh called Sher-i-Punjab ?)
अथवा
आप रणजीत सिंह को इतिहास में क्या स्थान देंगे ? उनको शेरे-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
(What place would you assign in history to Ranjit Singh ? Why is he called Sher-iPunjab ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह की गणना न केवल भारत अपितु विश्व के महान् शासकों में की जाती है। विभिन्न इतिहासकार महाराजा रणजीत सिंह की तुलना मुग़ल बादशाह अकबर, मराठा शासक शिवाजी, मिस्र के शासक मेहमत अली एवं फ्राँस के शासक नेपोलियन आदि से करते हैं। इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ इन शासकों से कहीं अधिक थीं। जिस समय महाराजा रणजीत सिंह सिंहासन पर बैठा तो उसके पास केवल नाममात्र का राज्य था। किंतु महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी योग्यता एवं कुशलता के साथ एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। ऐसा करके उन्होंने सिख साम्राज्य के स्वप्न को साकार किया। महाराजा रणजीत सिंह का शासन प्रबंध भी बहुत उच्चकोटि का था। उसके शासन प्रबंध का मुख्य उद्देश्य प्रजा की भलाई करना था। प्रजा के दुःखों को दूर करने के लिए महाराजा सदैव तैयार रहता था तथा प्रायः राज्य का भ्रमण भी किया करता था महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उनके दरबार में सिख, हिंदू, मुसलमान, यूरोपियन इत्यादि सभी धर्मों के लोग उच्च पदों पर नियुक्त थे। महाराजा रणजीत सिंह ने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपना कर उन्हें एक सूत्र में बाँधा। वह एक महान् दानी भी थे। उन्होंने अपने साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के लिए एक शक्तिशाली सेना का भी निर्माण किया। उन्होंने अंग्रेजों के साथ मित्रता स्थापित करके अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ का प्रमाण दिया। इन सभी गुणों के कारण आज भी लोग महाराजा रणजीत सिंह को ‘शेर-ए-पंजाब’ के नाम से स्मरण करते हैं। निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह को पंजाब के इतिहास में एक गौरवमयी स्थान प्राप्त है।

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी की एक कलगी अपने तोशेखाने में रखी हुई थी जिसको छूना वह अपने लिए सौभाग्य मानता था। वह अपनी विजयों को उस अकाल पुरख की कृपा समझता था। इन विजयों के लिए धन्यवाद हेतु वह दरबार साहिब अमृतसर जाकर भारी चढ़ावा चढ़ाता था। वह स्वयं को गुरुघर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ और दरबार को ‘दरबार खालसा जी’ कहता था। वह स्वयं को ‘महाराजा’ कहलवाने के स्थान पर ‘सिंह साहिब’ कहलवाता था। उसके सिक्कों पर ‘नानक सहाय’ तथा ‘गोबिंद सहाय’ शब्द अंकित थे। उसकी शाही मोहर पर ‘अकाल सहाय’ शब्द अंकित थे।

  1. महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था ? कोई एक उदाहरण दें।
  2. कूकर से क्या भाव है ?
  3. महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को क्या कहता था ?
  4. महाराजा रणजीत सिंह की शाही मोहर पर कौन-से शब्द अंकित थे ?
  5. महाराजा रणजीत सिंह के सिक्कों पर ………… तथा ……….. के शब्द अंकित थे।

उत्तर-

  1. वह अपना दैनिक कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ सुनता तथा अरदास करता था।
  2. कूकर से भाव है-दास एवं नौकर।
  3. महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहता था।
  4. महाराजा रणजीत सिंह की शाही मोहर पर अकाल सहाय शब्द अंकित थे।
  5. नानक सहाय, गोबिंद सहाय।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

2
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखता था। वह धार्मिक पक्षपात तथा सांप्रदायिकता से कोसों दूर था। वह यह बात भली-भाँति जानता था कि एक शक्तिशाली तथा चिरस्थाई साम्राज्य की स्थापना के लिए सभी धर्मों के लोगों का सहयोग प्राप्त करना आवश्यक है। वह अपनी सहिष्णुता की नीति से विभिन्न धर्मों के लोगों के दिल जीतने में सफल रहा। उसके राज्य में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख, हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उदाहरणतया उसका विदेश मंत्री फकीर अज़ीज-उद्दीन मुसलमान, प्रधानमंत्री ध्यान सिंह डोगरा, वित्त मंत्री दीवान भवानी दास और सेनापति मिसर दीवान चंद हिंदू थे। इसी तरह जनरल वेंतूरा, कोर्ट, गार्डनर इत्यादि यूरोपीय थे।

  1. महाराजा रणजीत सिंह एक सहनशील शासक था। कैसे ?
  2. ध्यान सिंह डोगरा कौन था ?
  3. महाराजा रणजीत सिंह का विदेश मंत्री कौन था ?
  4. दीवान भवानी दास कौन था ?
  5. महाराजा रणजीत सिंह का सेनापति ………… था।

उत्तर-

  1. वह सभी धर्मों का आदर करता था।
  2. ध्यान सिंह डोगरा महाराजा रणजीत सिंह का प्रधानमंत्री था।
  3. महाराजा रणजीत सिंह का विदेश मंत्री फ़कीर अज़ीजुद्दीन था।
  4. दीवान भवानी दास महाराजा रणजीत सिंह का वित्त मंत्री था।
  5. मिसर दीवान चंद।

महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व PSEB 12th Class History Notes

  • मनुष्य के रूप में (As a Man)-महाराजा रणजीत सिंह की शक्ल सूरत अधिक आकर्षक नहीं थी-परंतु उनके चेहरे पर एक विशेष प्रकार की तेजस्विता झलकती थी-वह बहुत ही परिश्रमी थेउन्हें शिकार खेलने, तलवार चलाने और घुड़सवारी का बहुत शौक था-वह तीक्ष्ण बुद्धि और अद्भुत स्मरण शक्ति के स्वामी थे महाराजा रणजीत सिंह अपनी दयालुता के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे-उन्हें सिख धर्म में अटल विश्वास था-महाराजा रणजीत सिंह पक्षपात तथा सांप्रदायिकता से कोसों दूर थे।
  • एक सेनानी तथा विजेता के रूप में (As a General and Conqueror)-महाराजा रणजीत सिंह की गणना विश्व के महान् सेनानियों में की जाती है-उन्होंने अपने किसी भी युद्ध में पराजय का मुख नहीं देखा था-वे अपने सैनिकों के कल्याण का पूरा ध्यान रखते थें– उन्होंने अपनी वीरता और योग्यता से अपने राज्य को एक साम्राज्य में बदल दिया-उनके राज्य में लाहौर, अमृतसर, काँगड़ा, जम्मू, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश सम्मिलित थे-उनका साम्राज्य उत्तर में लद्दाख से लेकर दक्षिण में शिकारपुर तक और पूर्व में सतलुज नदी से लेकर पश्चिम में पेशावर तक फैला था।
  • एक प्रशासक के रूप में (As an Administrator)-महाराजा रणजीत सिंह एक उच्चकोटि के प्रशासक थे-महाराजा ने अपने राज्य को चार बड़े प्रांतों में विभक्त किया हुआ था-प्रशासन की सबसे छोटी इकाई मौजा अथवा गाँव थी-गाँव का प्रबंध पंचायत के हाथ में था—योग्य तथा ईमानदार व्यक्ति मंत्री के पदों पर नियुक्त किए जाते थे किसानों तथा निर्धनों को राज्य की ओर से विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं-सैन्य प्रबंधों की ओर भी विशेष ध्यान दिया गया था-महाराजा ने अपनी सेना को यूरोपीय पद्धति का सैनिक प्रशिक्षण दिया–परिणामस्वरूप, सिख सेना शक्तिशाली तथा कुशल बन गई थी।
  • एक कूटनीतिज्ञ के रूप में (As a Diplomat)—हाराजा रणजीत सिंह एक सफल कूटनीतिज्ञ थे-अपनी कूटनीति से ही उन्होंने समस्त मिसलों को अपने अधीन किया था उन्होंने अपनी कूटनीति से अटक का किला बिना युद्ध किए ही प्राप्त किया-यह उनकी कूटनीति का ही परिणाम था कि अफ़गानिस्तान का शासक दोस्त मुहम्मद खाँ बिना युद्ध किए भाग गया-1809 ई० में अंग्रेज़ों के साथ मित्रता उनके राजनीतिक विवेक तथा दूरदर्शिता का अन्य प्रमाण था।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

Punjab State Board PSEB 10th Class Agriculture Book Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Agriculture Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

PSEB 10th Class Agriculture Guide आर्थिक विकास में कृषि का योगदान Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो शब्दों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
गाँवों में देश की कितनी जनसंख्या रहती है?
उत्तर-
दो-तिहाई से अधिक।

प्रश्न 2.
भारत में कृषि पर सीधे तौर पर निर्भर करने वाली खेतिहर जनसंख्या कितनी है ?
उत्तर-
54%.

प्रश्न 3.
भारत के कुल घरेलू आमदन का कितने प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से आता है ?
उत्तर-
वर्ष 2012-13 अनुसार 13.7%.

प्रश्न 4.
भारत में वर्ष 1950-51 में अनाज का उत्पादन पैदावार कितना था और वर्ष 2013-14 में अनाज का उत्पादन कितना हो गया?
उत्तर-
वर्ष 1950-51 में अनाज की पैदावार 51 मिलियन टन थी तथा वर्ष 2013-14 में 264 मिलियन टन हो गई।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 5.
भारत की अर्थ-व्यवस्था के कौन-से तीन क्षेत्र हैं ?
उत्तर-
कृषि, औद्योगिक तथा सेवाएं क्षेत्र।

प्रश्न 6.
विश्व व्यापार में कृषि के क्षेत्र में भारत का कौन-सा स्थान है ?
उत्तर-
दसवां।

प्रश्न 7.
चावल के निर्यात में भारत ने कौन-से देश को पीछे छोड़ दिया है ?
उत्तर-
थाइलैंड को।

प्रश्न 8.
कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर मुख्य उद्योगों के नाम लिखिए।
उत्तर-
कपड़ा उद्योग, चीनी उद्योग, पटसन उद्योग।

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प्रश्न 9.
वर्ष 2013 में कृषि से संबंधित कौन-सा अधिनियम सरकार ने पास किया है ?
उत्तर-
भोजन सुरक्षा अधिनियम।

प्रश्न 10.
भारत का कृषि व्यापार संतुलन किस तरह का है ?
उत्तर-
वर्ष 2013-14 अनुसार व्यापार संतुलन वृद्धि वाला है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
आर्थिक विकास का कृषि पर लोगों की निर्भरता से कैसा संबंध है ?
उत्तर-
कृषि पर लोगों की निर्भरता के कारण आर्थिक विकास भी अच्छा होता है। जैसे-जैसे देश का आर्थिक विकास होता है, उसकी कृषि पर निर्भरता कम होती जाती है।

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प्रश्न 2.
भारत के मुख्य कृषि निर्यात कौन-से हैं ?
उत्तर-
चाय, कॉफी, कपास, तेल, फल, सब्जियां, दालें, काजू, मसाले, चावल, गेहूँ आदि का निर्यात किया जाता है।

प्रश्न 3.
भारत के मुख्य कृषि आयात कौन-से हैं ?
उत्तर-
दालें, तेल बीज, सूखे मेवे, खाने योग्य तेल आदि।

प्रश्न 4.
कृषि से संबंधित धंधे कौन से हैं ?
अथवा
कषि से संबंधित कोई चार सहायक धन्धों के नाम लिखें।
उत्तर-
डेयरी फार्म, मुर्गी पालन, मछली पालन, सुअर पालन, पशु पालन, शहद की मक्खियाँ पालना, वन कृषि आदि कृषि संबंधी धंधे हैं।

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प्रश्न 5.
देश में अनाज का भंडार क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
कीमतों की वृद्धि के डर को काबू करने के लिए, ज़रूरतमंदों को हर माह अनाज जारी करने के लिए।

प्रश्न 6.
भोजन सुरक्षा अधिनियम में मुख्य प्रावधान क्या है ?
अथवा
भारत सरकार की ओर से वर्ष 2013 में पास किए भोजन सुरक्षा अधिनियम में मुख्य प्रावधान क्या है?
उत्तर-
देश की 75% ग्रामीण तथा 50% शहरी आबादी को 5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति माह के अनुसार अनाज उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव है।

प्रश्न 7.
रेलवे का विकास देश में कृषि विकास के साथ कैसे जुड़ा हुआ है ?
उत्तर-
कृषि उत्पाद तथा कृषि के लिए आवश्यक वस्तुओं को देश के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाने के लिए रेलवे को आय होती है तथा रेलवे का विकास तथा विस्तार होता है।

प्रश्न 8.
उन उद्योगों के नाम लिखिए जो अपने उत्पाद बेचने के लिए कृषि पर निर्भर करते हैं ?
अथवा
कृषि पर आधारित किन्हीं चार उद्योगों के नाम लिखो।
उत्तर-
ट्रैक्टर, कृषि मशीनरी, रासायनिक, खादें, नदीन नाशक, कीटनाशक आदि का प्रयोग कृषि में होता है। इन उद्योगों के उत्पाद कृषि क्षेत्र में बेचे जाते हैं।

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प्रश्न 9.
कृषि के क्षेत्र में कैसी बेरोज़गारी पायी जाती है ?
उत्तर-
कृषि के क्षेत्र में मौसमी तथा छुपी हुई बेरोज़गारी होती है।

प्रश्न 10.
खेतीबाड़ी से संबंधित धंधों से क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
कृषि सहयोगी धंधों से पौष्टिक आहार, जैसे-दुध, अण्डे, मीट, मछली, शहद आदि मिलते हैं। किसान इनसे अच्छी आय भी प्राप्त कर लेते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के पांच – छः वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
भारत के आर्थिक विकास में कषि का क्या योगदान है ?
उत्तर-
देश की कुल आबादी का दो-तिहाई भाग कृषि पर निर्भर है तथा लगभग 54% श्रमिक रोजगार के लिए सीधे रूप से कृषि के साथ जुड़े हुए हैं। वर्ष 2012-13 के दौरान कृषि क्षेत्र ने देश की कुल घरेलू आमदन में 13.7% योगदान डाला है। बहुत सारे उद्योग कृषि पर निर्भर हैं; जैसे चीनी, पटसन तथा कपड़ा उद्योग। कई उद्योगों के उत्पाद कृषि में प्रयोग किए जाते हैं। यातायात, गोदाम, दुलाई से भी देश की आर्थिकता को लाभ मिलता है। कई कृषि उत्पाद निर्यात किए जाते हैं, जिस कारण देश को डालरों में आमदन होती है। कृषि वस्तुओं के निर्यात ड्यूटी से केन्द्र सरकार को आय होती है, राज्य सरकार, भूमि लगान, सिंचाई कर से आमदन प्राप्त करती है। इनके बाजारीकरण से प्राप्त फीस भी सरकारी खज़ाने में वृद्धि करती है। इस प्रकार भारत की आर्थिकता के विकास में कृषि का बहुत योगदान है।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 2.
भारत के विदेशी व्यापार में देश की कृषि का क्या योगदान है ?
उत्तर-
भारत का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार गहरे स्तर पर कृषि से जुड़ा हुआ है। कई कृषि उत्पादों का निर्यात होता है; जैसे-चाय, कॉफी, मसाले, तेल, कपास, फल, सब्जियाँ, दालें, काजू तथा अब चावल तथा गेहूँ भी। वर्ष 2012 में भारत ने चावल के निर्यात से थाइलैंड को पीछे छोड़ कर पहला स्थान प्राप्त किया। भारत का कृषि तथा अनाज-निर्यात में दुनिया में दसवां स्थान हो गया है। कई कच्चे माल से बनी वस्तुओं सूती कपड़ों, धागों, बने वस्त्र, पटसन से बनी वस्तुओं का निर्यात होता है। वर्ष 2013-14 में भारत का कुल कृषि निर्यात 42 बिलियन डालर का था जबकि इसी वर्ष कृषि आयात केवल 17 बिलियन डालर था। इस प्रकार 2013-14 में भारत का व्यापार संतुलन 25 बिलियन डालर की वृद्धि वाला रहा।

प्रश्न 3.
देश में हरित क्रान्ति आने के क्या कारण हैं?
उत्तर-
जब देश आज़ाद हुआ तो कई दशकों तक देश को अनाज के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ा। देश के किसानों की न थकने वाली मेहनत, वैज्ञानिकों की लगातार खोजें, सुधरे बीज, कृषि मशीनरी, रासायनिक खादें, कीटनाशक दवाइयां आदि के प्रयोग से देश में हरित क्रान्ति आई है। देश में अनाज की पैदावार इतनी बढ़ गई है कि अब देश में चावल, गेहूँ तथा अन्य कृषि उत्पाद देश से निर्यात किए जा रहे हैं।

प्रश्न 4.
देश में कृषि पर निर्भरता कैसे कम की जानी चाहिए ?
उत्तर-
देश के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि कृषि पर निर्भरता कम की जाए। कृषि में मौसमी बेरोज़गार तथा छुपी बेरोज़गारी से संबंधित लोगों को उद्योग तथा सेवाओं में लगाया जाए। जैसे-जैसे देश का आर्थिक विकास होता है, कृषि पर निर्भरता घटती है तथा उद्योग तथा सेवाओं पर निर्भरता बढ़ती है।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 5.
देश में कृषि क्षेत्र के विकास से औद्योगिक विकास तथा औद्योगिक विकास से कृषि विकास कैसे संभव है ?
उत्तर-
देश में जब कृषि का विकास होगा या कृषि उत्पाद अधिक उपलब्ध होंगे। जिन के प्रयोग के लिए उद्योग स्थापित करने पड़ेंगे। देश का एक भाग जहां पर उत्पाद कम हो वहां भोजन के लिए यातायात तथा ढुलाई को आवश्यकता पड़ेगी। अधिक अनाज को संभालने के लिए गोदामों की आवश्यकता पड़ेगी। कृषि के साथ जुड़े कुछ उद्योग हैं-चीनी उद्योग, पटसन उद्योग, कपड़ा उद्योग, शैलर, तेल निकालने वाले कारखाने आदि। इस तरह कृषि विकास उद्योगों के विकास में योगदान डालेगा। परन्तु कृषि का विकास होता रहे इसलिए कृषि में कुछ उत्पादों की आवश्यकता पड़ेगी, जैसे-ट्रैक्टर उद्योग, मशीनरी, खादें कीटनाशक आदि रसायनों से संबंधित उद्योग जिनके उत्पाद कृषि में प्रयोग होते हैं। इस प्रकार औद्योगिक विकास से कृषि विकास संभव है।

Agriculture Guide for Class 10 PSEB आर्थिक विकास में कृषि का योगदान Important Questions and Answers

वस्तनिष्ठ प्रश्न

I. बहु-विकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
वर्ष 2012-13 के दौरान कृषि क्षेत्र ने देश की कुल घरेलू आमदन में …….. योगदान डाला है।
(क) 13.7 %
(ख) 15.9%
(ग) 11.5%
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 13.7 %

प्रश्न 2.
भारत में 2013-14 में अनाज की पैदावार कितनी थी ?
(क) 264 मिलियन टन
(ख) 51 मिलियन टन
(ग) 100 मिलियन टन
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 264 मिलियन टन

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 3.
भारत के मुख्य कृषि निर्यात हैं-
(क) चाय
(ख) कपास
(ग) दालें
(घ) सभी।
उत्तर-
(घ) सभी।

प्रश्न 4.
चावल के निर्यात में भारत ने कौन-से देश को पीछे छोड़ा-
(क) थाइलैंड
(ख) भूटान
(ग) अमेरिका
(घ) श्रीलंका।
उत्तर-
(क) थाइलैंड

प्रश्न 5.
वर्ष 2012 में देश में अनाज का भंडार कितना था?
(क) 82 मिलियन टन
(ख) 25 मिलियन टन
(ग) 52 मिलियन टन
(घ) 108 मिलियन टन।
उत्तर-
(क) 82 मिलियन टन

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 6.
भोजन सुरक्षा अधिनियम-2013 के अधीन एक महीने में प्रति व्यक्ति कितना अनाज़ देने का प्रावधान है ?
(क) 5 किलो
(ख) 10 किलो
(ग) 15 किलो
(घ) 20 किलो।
उत्तर-
(क) 5 किलो

II. ठीक/गलत बताएँ

1. कई प्रमुख उद्योगों को कच्चा माल कृषि से मिलता है।
2. वर्ष 2012 में भारत ने चावल का निर्यात करके थाइलैंड को पीछे छोड़ दिया है।
3. कृषि में मौसमी तथा छिपी बेरोज़गारी होती है।
4. 2013-14 में भारत का कुल कृषि निर्यात 42 बिलियन डॉलर था।
5. अनाज की उत्पादकता 2125 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर है।
उत्तर-

  1. ठीक
  2. ठीक
  3. ठीक
  4. ठीक
  5. ठीक।

III. रिक्त स्थान भरें-

1. ……………… हमारे देश की आर्थिकता की रीढ़ की हड्डी है।
2. विश्व व्यापार में कृषि के क्षेत्र में भारत का ………………… स्थान है।
3. 2012 में देश में अनाज का भंडार ……………….. टन था।
4. देश में डेयरी फार्म के धंधे में ……………….. परिवार लगे हैं।
उत्तर-

  1. कृषि
  2. दसवां
  3. 82 मिलियन
  4. 70 मिलियन।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि हमारे देश की आर्थिकता की क्या है ?
उत्तर-
रीढ़ की हड्डी।

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प्रश्न 2.
देश में डेयरी फार्म के धंधे में कितनी आबादी लगी हुई है ?
उत्तर-
70 मिलियन परिवार।

प्रश्न 3.
सेवाएं क्षेत्र में क्या-क्या आता है ?
उत्तर-
बैंक की सेवा, यातायात सुविधाएं, भंडार तथा गोदाम, बीमा, सैर-सपाटा आदि।

प्रश्न 4.
जनसंख्या के अनुसार हमारा देश दुनिया में कौन-से स्थान पर है?
उत्तर-
दूसरे स्थान पर।

प्रश्न 5.
घरों में उपभोग से सम्बन्धित कितने प्रतिशत भाग कृषि से सम्बन्धित है ?
उत्तर-
60%.

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प्रश्न 6.
अनाज की उत्पादकता कितनी है?
उत्तर-
2125 कि० ग्रा० प्रति हेक्टेयर।

प्रश्न 7.
2012 में देश में अनाज का भंडार कितना है?
उत्तर-
82 मिलियन टन।

प्रश्न 8.
एक अनुमान के अनुसार 82 करोड़ आबादी को कितना अनाज सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करवाया जाएगा?
उत्तर-
61 मिलियन टन।

प्रश्न 9.
भारत 2012 में कौन-से कृषि उत्पाद के निर्यात में पहले स्थान पर रहा?
उत्तर-
चावल के।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 10.
2013-14 में भारत का कुल कृषि का निर्यात कितना था?
उत्तर-
42 बिलियन डालर।

प्रश्न 11.
भारत में कितने प्रतिशत मज़दूर प्रत्यक्ष तौर पर कृषि में लगे हुए हैं ?
उत्तर-
54% मज़दूर प्रत्यक्ष तौर पर कृषि में लगे हुए हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि आधारित छोटे पैमाने पर कौन-से उद्योग हैं ?
उत्तर-
कृषि आधारित छोटे पैमाने पर घरेलू उद्योग-जैसे-चावल शैलर, तेल निकालना आदि।

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प्रश्न 2.
अर्थव्यवस्था में तीसरा क्षेत्र कौन-सा है? उदाहरण भी दें।
उत्तर-
अर्थव्यवस्था में तीसरा क्षेत्र-सेवाएँ क्षेत्र हैं। इसमें बैंक की सेवाएँ, यातायात सुविधाएं, भंडार के लिए गोदाम, बीमा, सैर-सपाटा आदि है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
देश अनाज की पैदावार में स्वः रोज़गार हो गया है। तुलना करके समझाएँ।
उत्तर-
वर्ष 1950-51 में अनाज की कुल पैदावार 51 मिलियन टन थी जो 2013-14 में 264 मिलियन टन हो गई है। वर्ष 2012 में देश के पास 82 मिलियन टन अनाज का भंडार था जो कि एक रिकार्ड है। इससे पता चलता है कि देश स्व:-निर्भर हो गया है।

प्रश्न 2.
देश में हरित क्रान्ति आने के कोई पांच कारण लिखें।
उत्तर-

  • देश में सिंचाई के साधनों को अधिकता में उपलब्ध होना।
  • रसायनिक खादों का प्रयोग करने से उत्पादन में वृद्धि होना।
  • अधिक उपज देने वाली किस्मों की खोज होना।
  • फसल की रोगों, कीटों, खरपतवार से सुरक्षा आसानी से होने लगी।
  • कृषि मशीनरी का अधिक प्रयोग।

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प्रश्न 3.
भारत में हरित क्रांति आने के कोई चार कारण लिखें।
उत्तर-
स्वयं करें।

आर्थिक विकास में कृषि का योगदान PSEB 10th Class Agriculture Notes

  • भारत में लगभग दो-तिहाई आबादी गांव में रहती है तथा कृषि पर निर्भर है।
  • कृषि हमारे देश की आर्थिकता की रीढ़ की हड्डी है।
  • भारत में 54% श्रमिक रोज़गार के लिए सीधे कृषि में हैं।
  • वर्ष 2012-13 के दौरान कृषि क्षेत्र ने देश की कुल घरेलू आमदन (GDP) में 13.7% योगदान डाला है।
  • देश में लगभग 70 मिलियन परिवार केवल डेयरी फार्म के व्यवसाय में लगे ।
  • कई प्रमुख उद्योगों का कच्चा माल कृषि से ही मिलता है; जैसे-कपड़ा उद्योग को कपास, चीनी उद्योग को गन्ना आदि।
  • कृषि तथा उद्योग क्षेत्र के बाद अर्थव्यवस्था का एक अन्य क्षेत्र है-सेवाएं क्षेत्र।
  • आबादी के अनुसार हमारा देश दुनिया में दूसरे नंबर पर है।
  • घरों में उपभोग का लगभग 60% भाग कृषि से संबंधित है।
  • भारत में 1950-51 में अनाज की पैदावार 51 मिलियन टन थी जो 2013-14 में | 264 मिलियन टन हो गई।
  • वर्ष 2012 में अनाज का भंडार लगभग 82 मिलियन टन था।
  • भारत सरकार ने वर्ष 2013 में भोजन सुरक्षा अधिनियम पास किया है जिस के तहत देश की 75% ग्रामीण आबादी तथा 50% शहरी आबादी को 5 कि०
  • ग्रा० प्रति व्यक्ति प्रति महीना के अनुसार अनाज देने की योजना बनाई है।
  • वर्ष 2012 में भारत ने चावल का निर्यात करके थाइलैंड को पीछे छोड़ दिया है तथा पहले स्थान पर रहा।
  • भारत का कृषि तथा अनाज के निर्यात में दुनिया में दसवां स्थान है।
  • वर्ष 2013-14 में भारत का व्यापार संतुलन 25 विलियन डालर से वृद्धि वाला था।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions History Chapter 12 स्मारक निर्माण कला Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science History Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

SST Guide for Class 7 PSEB स्मारक निर्माण कला Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षेप में उत्तर लिखें

प्रश्न 1.
उत्तरी भारत के प्रमुख मन्दिर कौन-से थे?
उत्तर-
800 से 1200 ई० तक उत्तरी भारत में अनेक मन्दिर बने। इनमें से प्रमुख मंदिर थे –
जगन्नाथ पुरी का विष्णु मन्दिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर, कोणार्क का सूर्य मन्दिर तथा माऊंट आबू का तेजपाल मन्दिर।

प्रश्न 2.
भारतीय-मुस्लिम भवन निर्माण कला की प्रमुख विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
भवन-निर्माण कला भारतीय-मुस्लिम शैली की प्रमुख विशेषताएं नीचे दी गई हैं –

  1. यह शैली तुर्क, अफ़गान तथा भारतीय शैलियों का मिश्रण थी।
  2. इस शैली में अनेक मस्जिदें तथा मकबरे बनवाये गए। नुकीले मेहराब, मीनार तथा गुम्बद इस शैली की मुख्य विशेषताएं हैं।
  3. इन भवनों की दीवारों पर पवित्र कुरान की आयतें लिखी हुई है।
  4. अलाउद्दीन खिलजी के काल में बने अलाई दरवाज़े में लाल पत्थर तथा सफ़ेद संगमरमर का प्रयोग किया गया।
  5. कई इमारतों में स्तम्भों का प्रयोग भी किया गया है।

प्रश्न 3.
दक्षिण भारत के मंदिर कौन-से थे? नाम लिखें।
उत्तर-

  1. चोल शासक राजराजा द्वारा बना राजराजेश्वर मन्दिर।
  2. राजेन्द्र प्रथम चोल द्वारा बना गंगईकोंड चोलपुरम् का मन्दिर।
  3. एलोरा में राष्ट्रकूट शासकों द्वारा बना कैलाश मन्दिर।
  4. तंजौर में स्थित बृहदेश्वर का मन्दिर।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

प्रश्न 4.
दिल्ली सल्तनत काल में बनाए गए स्मारकों की सूची बनाओ।
उत्तर-
दिल्ली के सुल्तानों ने अनेक स्मारक बनवाये। इनमें से मुख्य स्मारकों का वर्णन इस प्रकार है –
1. दास शासकों द्वारा बने स्मारक-कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में कुवत-उल-इस्लाम नाम की एक मस्जिद बनवाई। इसकी दीवारों पर कुरान की पवित्र आयतें अंकित हैं। उसने अजमेर में ‘अढ़ाई-दिन-का-झोंपड़ा’ नामक मस्जिद का निर्माण करवाया। उसने दिल्ली के समीप महरौली में कुतुबमीनार का निर्माण कार्य आरम्भ किया। परन्तु उसकी मृत्यु हो जाने के कारण यह निर्माण कार्य पूरा न हो सका। बाद में उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इस काम को पूरा करवाया। 70 मीटर ऊंची इस इमारत की पांच मंज़िलें हैं।

2. अलाउद्दीन खिलजी के काल में बने स्मारक-अलाउद्दीन खिलजी के राज्य-काल में भवन-निर्माण कला का बहुत अधिक विकास हुआ। उसके द्वारा बनवाई गई इमारतों में से ‘अलाई दरवाज़ा’ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। यह दरवाजा लाल पत्थर और सफ़ेद संगमरमर का बना हुआ है। अलाउद्दीन खिलजी ने हज़ार स्तम्भों वाला महल, एक हौज़-ए-खास तथा जमायत-खाना नामक मस्जिद भी बनवाई थी।

3. तुग़लक शासकों द्वारा बने स्मारक-(1) गियासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली में तुगलकाबाद नाम का एक नगर बनवाया। (2) मुहम्मद-बिन-तुगलक ने जहांपनाह नाम के एक नये नगर का निर्माण करवाया। (3) फिरोजशाह तुग़लक ने भी कई नये नगर बसाए। इन नगरों में फिरोजाबाद, हिसार फिरोजा तथा जौनपुर प्रमुख हैं। उसने बहुत-सी मस्जिदें, स्कूल और पुल भी बनवाए।

4. लोधी तथा सैय्यद शासकों द्वारा बने भवन-लोधी और सैय्यद सुलतानों ने मुबारक शाह और मुहम्मदशाह के मकबरे बनवाए। सिकन्दर लोधी का मकबरा, बाड़ा, गुम्बद आदि स्मारक लोधी काल में बनवाए गए थे।

प्रश्न 5.
मुग़ल बादशाह शाहजहां को भवन निर्माताओं का शहजादा क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
शाहजहां को भवन बनवाने का बड़ा चाव था। उसके द्वारा बनवाए गए सभी भवन कला और सुन्दरता की दृष्टि से विशेष स्थान रखते हैं। उसने आगरा में जहांगीर महल, रानी जोधाबाई का महल, लाल किले की मोती मस्जिद तथा ताजमहल आदि बनवाए। ताजमहल संसार के सबसे सुन्दर भवनों में से एक है। दिल्ली में यमुना तट पर उसने लाल किला बनवाया। किले में उसने दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, मोती मस्जिद तथा अन्य कई भवन बनवाए। उसने अपने बैठने के लिए हीरे-मोती से जड़ित एक सिंहासन बनवाया जिसे तख्ते-ताऊस कहते हैं। शाहजहां की इन्हीं कृतियों के कारण उसे ‘भवन निर्माण कला का राजकुमार’ कहा जाता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

(ख) निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

  1. ………… में बृहदेश्वर मन्दिर स्थित है।
  2. ………… द्वारा कुतुबमीनार का निर्माण किया गया था।
  3. मुग़ल बादशाह अकबर ने ………… को अपनी राजधानी बनाया।
  4. बुलन्द दरवाज़ा ………… में स्थित है।
  5. ताजमहल ………… द्वारा ……….. की याद में बनवाया गया था।
  6. ………… का निर्माण जहांगीर ने करवाया था।

उत्तर-

  1. तंजौर
  2. कुतुबुद्दीन ऐबक-इल्तुतमिश
  3. फतेहपुर सीकरी
  4. फतेहपुर सीकरी
  5. शाहजहाँ, अपनी बेग़म मुमताज़
  6. सिकन्दरा में अकबर के मकबरे।

(ग) निम्नलिखित प्रत्येक कथन के आगे ठीक (✓) अथवा गलत (✗) का चिन्ह लगाएं

  1. भारत में तुर्कों और अफ़गानों द्वारा भवन निर्माण कला की नई विधियों तथा नमूनों (प्रारूप) को तैयार किया गया था।
  2. चन्देल शासकों द्वारा खजुराहो में मन्दिरों का निर्माण करवाया गया था।
  3. अलाउद्दीन खिलजी ने सीरी को अपनी नई राजधानी बनाया था।
  4. मुहम्मद तुग़लक ने तुग़लकाबाद नगर को बसाया था।
  5. चोल शासकों द्वारा बनाए गए मन्दिरों में भवन निर्माण कला के द्रविड़ शैली नमूनों का प्रयोग किया। गया था।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✗)
  4. (✗)
  5. (✓)

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(घ) सही जोड़े बनाएं

नोट-पाठ्य-पुस्तक में दिए इस प्रश्न से सही मिलान नहीं किया जा सकता। इसलिए इस प्रश्न में थोड़ा-बहुत परिवर्तन किया है।

(क) – (ख)

  1. लिंगराज मन्दिर – भुवनेश्वर
  2. वृहदेश्वर मन्दिर – दिल्ली
  3. ढाई-दिन-का-झोंपड़ा – दिल्ली
  4. अदीना मस्जिद – आगरा
  5. हुमायूं का मकबरा – मालदा
  6. मोती मस्जिद – आगरा
  7. लाल किला – तंजौर
  8. ताज़ महल – अजमेर

उत्तर-

  1. लिंगराज मन्दिर – भुवनेश्वर
  2. वृहदेश्वर मन्दिर – तंजौर
  3. ढाई-दिन-का-झोंपड़ा – अजमेर
  4. अदीना मस्जिद – मालदा
  5. हुमायूं का मकबरा – दिल्ली
  6. मोती मस्जिद – आगरा
  7. लाल किला – दिल्ली
  8. ताजमहल – आगरा।

PSEB 7th Class Social Science Guide स्मारक निर्माण कला Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
संसार की सबसे बड़ी मूर्ति कौन-सी है ?
उत्तर-
कर्नाटक में श्रवणबेलगोला में स्थित गोमतेश्वर की मूर्ति संसार की सबसे बड़ी मूर्ति है।

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प्रश्न 2.
800-1200 ई० में उत्तर भारत में बने मन्दिरों की सूची बनाओ।
उत्तर-

  1. जगन्नाथ पुरी का विष्णु मन्दिर
  2. भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर
  3. कोणार्क का सूर्य मन्दिर तथा माऊंट आबू का तेजपाल मन्दिर आदि।

प्रश्न 3.
तंजौर के बृहदेश्वर मन्दिर की संक्षिप्त जानकारी दीजिए। .
उत्तर-
तंजौर में स्थित बृहदेश्वर का मन्दिर दक्षिण भारत में मन्दिर निर्माण कला का एक शानदार नमूना है। भगवान् शिवजी को समर्पित यह मन्दिर राजराजा प्रथम द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर के मुख्य द्वार को गोपुरम् कहा जाता है। इसकी ऊँचाई लगभग 94 मीटर है।

प्रश्न 4.
एलोरा के कैलाश मन्दिर पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
एलोरा का कैलाश मन्दिर राष्ट्रकूट शासकों की भवन-निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है। यह राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर का निर्माण चट्टानों को काटकर किया गया है। यह मन्दिर संसार के निर्माण-कला आश्चर्यों में से एक माना जाता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

प्रश्न 5.
मुग़ल बादशाह जहांगीर द्वारा बनवाए गए दो भवनों के नाम बताओ।
उत्तर-
मुग़ल बादशाह जहांगीर ने सिकन्दरा में अकबर का और आगरा में इतमाद-उद्-दौला का मकबरा बनवाया।

प्रश्न 6.
भवन निर्माण कला में प्रदेशिक (क्षेत्रीय) राजाओं का क्या योगदान था ?
उत्तर-
क्षेत्रीय राज्यों में बहमनी तथा विजयनगर राज्यों के नाम लिए जा सकते हैं।

  1. बहमनी शासकों ने जामा मस्जिद, चार मीनार, महमूद गवा का मदरसा आदि भवन बनवाए थे। गुलबर्गा में फिरोजशाह का मकबरा, भवन निर्माण कला का बहुत ही सुन्दर नमूना है।
  2. विजयनगर के राजाओं ने हजारा राम और विट्ठल स्वामी मन्दिर बनवाए थे।
  3. बहमनी तथा विजयनगर के शासकों के अतिरिक्त जौनपुर के शर्की शासकों ने भी महत्त्वपूर्ण स्मारक बनवाए। उनके द्वारा बनी अटाला मस्जिद बहुत ही विख्यात है।

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प्रश्न 7.
निम्न पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
(क) अकबर द्वारा बनवाये गये स्मारकों का वर्णन करें।
(ख) दक्षिणी भारत के मन्दिरों के नाम लिखें।
(ग) ताजमहल।
उत्तर-
(क) अकबर द्वारा बनवाई गई इमारतें (भवन)-अकबर को भवन निर्माण कला से बहुत ही प्रेम था। उसने बहुत-से किलें और इमारतें बनवाईं जिनमें लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है। अकबर द्वारा बनवाई गई इमारतों में जामा मस्जिद, पंच महल, दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम बहुत ही प्रसिद्ध हैं। अकबर ने गुजरात विजय के समय एक बुलन्द दरवाज़ा बनवाया। उसकी इमारतें ईरानी और हिन्दू भवन निर्माण कला के नमूनों पर बनी हैं।

(ख) दक्षिणी भारत के मन्दिरों के नाम-अभ्यास का प्रश्न 3 पढ़ें।

(ग) ताजमहल-ताजमहल मुग़ल सम्राट शाहजहां द्वारा बनवाई गई सबसे सुन्दर इमारत है। यह आगरा में यमुना नदी के तट पर बनी है। इसे शाहजहां ने अपनी प्रिय बेग़म मुमताज की याद में बनवाया था। ताजमहल का निर्माण करने के लिए लगभग 20,000 कारीगरों ने 22 साल तक काम किया था और इस पर तीन करोड़ रुपये खर्च आये थे।

ताजमहल अनेक भवन-निर्माण कलाओं का सुन्दर मिश्रण है। यह सफ़ेद संगमरमर का बना हुआ है। इसे अन्य देशों से मंगवाए गए लगभग 20 प्रकार के कीमती पत्थरों से सजाया गया है। इसकी सुन्दरता के कारण इसकी गणना संसार के सात आश्चर्यों में की जाती है।

प्रश्न 8.
शाहजहां ने ताजमहल के अतिरिक्त अन्य भी कई भवन बनवाये। उनकी संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-
शाहजहां ने ताजमहल के अतिरिक्त निम्नलिखित भवन बनवाए –
1. लाल किला-लाल किला शाहजहां द्वारा 1639 ई० में दिल्ली में, यमुना के किनारे बनवाया गया। यह लाल पत्थर का बना हुआ है। इस किले में रंग महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, शाह बुर्ज, ख्वाब-गाह आदि कई सुन्दर इमारतें स्थित हैं। इसे कीमती पत्थरों, हीरों, सोने और चांदी की वस्तुओं से सजाया गया।

2. मोती मस्जिद-मोती मस्जिद शाहजहां द्वारा आगरा के लाल किले में बनवाई गई थी। इसे बनाने में लगभग तीन लाख रुपये का व्यय हुआ था। यह मस्जिद संगमरमर की बनी हुई है।

3. मुस्समन बुर्ज़- यह बुर्ज़ भी संगमरमर का बना हुआ है। यह बहुत ही सुन्दर है। यहां से ताजमहल स्पष्ट दिखाई देता है।

4. शाहजहानाबाद-1639 ई० में शाहजहां ने शाहजहानाबाद नामक नगर की नींव रखी। इस नगर को बनाने के लिए दूर-दूर से कुशल कारीगर तथा मजदूर बुलाये गये थे।

5. जामा मस्जिद-यह भारत की बड़ी मस्जिदों में से एक है। इसे बनाने में लगभग 10 साल का समय लगा था।

6. जहांगीर का मकबरा-शाहजहां ने यह मकबरा शाहदरा (पाकिस्तान) में बनवाया था। इसे संगमरमर से सजाया गया है।

7. शाहजहां का मोर-मुकुट-यह दीवान-ए-खास में रखा हुआ है। इसे तख्ते ताऊस भी कहते हैं। यह संगमरमर का बना हुआ है। इसे बनाने में सात साल लगे थे और इस पर एक करोड़ रुपये खर्च आया था। 1739 ई० में नादिरशाह इसे अपने साथ ईरान ले गया था।
शाहजहां बाग लगवाने में भी बहुत रुचि रखता था। उसने बहुत से बाग लगवाए थे। इनमें से दिल्ली का शालीमार बाग और काश्मीर का वज़ीर बाग बहुत प्रसिद्ध हैं। कुछ बाग ताजमहल और लाल किले में भी लगाए गए थे।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

सही उत्तर चुनिए :

प्रश्न 1.
गौमतेश्वर की विश्व विख्यात मूर्ति श्रवण बेलगोला में स्थित है। बताइए यह किस राज्य में है?
(i) कर्नाटक
(ii) तमिलनाडु
(iii) आंध्र प्रदेश।
उत्तर-
(i) कर्नाटक।

प्रश्न 2.
हजार राम तथा विट्ठल स्वामी मंदिर किन शासकों ने बनवाए?
(i) विजयनगर के शासकों ने
(ii) चोल शासकों ने
(iii) राष्ट्रकूट शासकों ने।
उत्तर-
(i) विजयनगर के शासकों ने।

प्रश्न 3.
चित्र में फतेहपुर सीकरी में स्थित एक प्रसिद्ध भवन दिखाया गया है जिसे अकबर ने बनवाया था? यह किस नाम से प्रसिद्ध है?
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला 1
(i) चारमीनार
(ii) जामा मस्जिद
(iii) बुलंद दरबाज़ा।
उत्तर-
(iii) बुलंद दरवाज़ा।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

स्मारक निर्माण कला PSEB 7th Class Social Science Notes

  • 800 ई० से 1200 ई० तक बने स्मारक – 800 ई० से 1200 ई० तक अनेक सुन्दर मन्दिर बने। आबू पर्वत का तेजपाल मन्दिर, खजुराहो का महादेव मन्दिर तथा कोणार्क का सूर्य मन्दिर दर्शनीय हैं। मन्दिरों की दीवारों, छतों, स्तम्भों तथा दरवाज़ों को सुन्दर मूर्तियों से सजाया जाता था।
  • दक्षिण भारत के मन्दिर – 800 से 1200 ई० के बीच दक्षिण भारत के मन्दिरों में सबसे महत्त्वपूर्ण मन्दिर बृहदेश्वर मन्दिर है। इसका निर्माण चोल शासक राज राजा प्रथम ने कराया था। चोल शासक राजेन्द्र प्रथम का गंगईकोण्डचोलपुरम् का मन्दिर भी बहुत प्रसिद्ध है। पल्लव वंश द्वारा बनाए गए मन्दिर अपनी अनूठी सुन्दरता के लिए विख्यात हैं। ये मन्दिर चट्टान को काट कर बनाए गए हैं। इन मन्दिरों में महाबलिपुरम् का मन्दिर बहुत ही प्रसिद्ध है। पल्लव शासकों द्वारा बनवाया गया सबसे बड़ा मन्दिर कैलाशनाथ मन्दिर है।
  • सुल्तानों की भवन-निर्माण कला – तुर्क तथा अफ़गान अपने साथ भवन-निर्माण कला के नए नमूने लेकर आए थे। उनकी भवन निर्माण कला तथा भारतीय भवन-निर्माण कला के मेल से एक नई कला-शैली का आरम्भ हुआ। इस शैली में अनेक मेहराबों, गुम्बदों तथा मीनार वाली इमारतों का निर्माण हुआ। मस्जिदों, महलों, मकबरों तथा अन्य इमारतों में मेहराब, गुम्बद और मीनारों का प्रयोग किया गया।
  • सुल्तानों के भवन – दिल्ली के सुल्तानों में से कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली और अजमेर में मस्जिदें बनवाई। इल्तुतमिश ने कुतुबमीनार को पूरा करवाया। यह मीनार भारत में सबसे ऊंचा मीनार है। अलाउद्दीन खिलजी ने हज़रत निजामुद्दीन औलिया की मजार पर दिल्ली के समीप एक मस्जिद बनाई। उसने कुतुबमीनार के निकट इलाही दरवाज़ा भी बनवाया। तुग़लक वंश के समय में बनी इमारतों में से तुग़लकशाह का मकबरा बड़ी प्रसिद्ध इमारत है।
  • मुगलों के भवन – मुग़ल सम्राटों को भवन बनवाने का बड़ा चाव था। उन्होंने अनेक सुन्दर भवनों का निर्माण करवाया। अकबर के समय के भवनों में आगरे के किले में जहांगीर महल’ तथा फतेहपुर सीकरी की इमारतें विशेष प्रसिद्ध हैं। शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया ताजमहल विश्व-भर में अपनी सुन्दरता के लिए जाना जाता है। इसके अतिरिक्त उसने आगरा में मोती मस्जिद तथा दिल्ली में जामा मस्जिद और लाल किले का निर्माण करवाया।

तैराकी (Swimming) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions तैराकी (Swimming) Game Rules.

तैराकी (Swimming) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. तैराकी कुण्ड की लम्बाई = 50 मीटर
  2. कुण्ड की कम-से-कम चौड़ाई = 21 मीटर से 25 मीटर
  3. कुण्ड में पानी की गहराई = 1.8 मीटर से अधिक
  4. ब्रैस्ट स्ट्रोक में तैराक कौन-सी किक नहीं मार सकता = डालफिन किक
  5. तैराकी के अधिकारी = एक रैफ़री, एक सटारटर, टाइम कीपर प्रत्येक लेन में, समाप्ति जज प्रत्येक लेन पर
  6. टरन और स्ट्रोक के इन्सपैक्टर = प्रत्येक लेन पर
  7. रिकार्डर = एक
  8. लेन की संख्या = 8 लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 10 लेन
  9. लेन की चौड़ाई = 2.5 मी०
    स्टार्टिंग प्लेटफार्म
  10. पानी से प्लेटफार्म की ऊँचाई = 0.5 मी० से 0.75 मी०
  11.  प्लेटफार्म का दरिया (slope) = 0.50 मी० × 0.50 मी०
  12. अधिकतम ढलान = 10° से अधिक नहीं
  13. पूल के पानी का तापमान = + 20° सैल्सियस कम से कम
  14. तैराकी प्रतियोगिता = 1. फरी स्टाइल
    2. बैक स्ट्रोक
    3. ब्रैस्ट स्ट्रोक
    4. बटर फ्लाई स्ट्रोक
    5. रिले = 4 × 100 मीटर फ्री स्टाइल
    = 4 × 400 मीटर मैडले।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

तैराकी खेल की संक्षेप रूप-रेखा
(Brief outline of the Swimming Game)

  1. सभी तैराकी रेस इवेंट्स में प्रत्येक तैराक के लिए घूमते हुए पूल के सिरे के साथ शारीरिक स्पर्श करना आवश्यक होता है।
  2. तैराकी कुण्ड (Swimming Pool) की लम्बाई 50 मीटर तथा इसकी कम-से कम चौड़ाई 21 मीटर होती है।
  3. तैराकी कुण्ड में जल की गहराई 1.8 मीटर से अधिक होती है।
  4. इसमें लम्बाई में पानी के तल से 0.3 मीटर ऊपर तथा 0.8 मीटर नीचे छूट होगी।
  5. कोई भी तैराक ऐसी वस्तु का प्रयोग नहीं कर सकता या पहन नहीं सकता जिससे उसे अपनी तैराकी में गति को बढ़ाने में सहायता मिले।
  6. ब्रैस्ट स्ट्रोक तैराकी में तैराक डोल्फिन किक नहीं लगा सकता।
  7. बटर फ्लाई स्ट्रोक में दोनों भुजाओं को एक समय पानी के ऊपर आगे तथा पीछे जाना चाहिए।
  8. बैक स्ट्रोक तैराकी में पीठ की साधारण स्थिति बदलने वाला प्रतियोगी अयोग्य घोषित किया जाता है।
  9. फ्री-स्टाइल तैराकी में तैराक किसी भी ढंग से तैर सकता है।
  10. तैराकी तथा गोता लगाते समय किसी प्रकार की कोचिंग देना मना है।
  11. कोई भी तैराक रेस के इवेंट्स समय अपने शरीर पर तेल या चिकनी वस्तु नहीं मल सकता।
  12. तैराक को नियम अनुसार बनाई गई पोशाक ही पहननी चाहिए।
  13. तैराक को सदैव अपनी पंक्ति में ही तैरना चाहिए।
  14. लेन जिनकी चौड़ाई 2.5 मीटर होगी जोकि रस्सियों के साथ बनी होगी। प्रतियोगिता के समय पानी की सतह एक जैसी होगी।

प्रश्न
ओलम्पिक और अन्तर्राष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता के लिए नियुक्त अधिकारियों का वर्णन करें।
उत्तर-
तैराकी कुण्ड (Swimming Pool)—तैराकी कुण्ड की लम्बाई 50 मीटर तथा इसकी कम-से-कम चौड़ाई 21 मीटर होती है। इसमें जल की गहराई 1.8 मीटर से अधिक होती है।
तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
इसकी लम्बाई में पानी के तल से 0.3 मीटर ऊपर तथा 0.8 मीटर नीचे छूट होगी। लेन (Lane) 8 जिनकी चौड़ाई 2.5 मीटर है रस्सियों से बंधी होगी। मुकाबले के समय पानी की सतह लगातार एक-सी बिना हलचल वाली होनी चाहिए।

अधिकारी (Officials)-ओलम्पिक खेलों, विश्व चैम्पियनशिप तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिताओं के लिए निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे
रैफरी (1), स्टार्टर (1), मुख्य टाइम कीपर (3), मुख्य जज (1), समाप्ति के जज (प्रति लेन 3), टर्न के इन्सपैक्टर (प्रत्येक लेन में दोनों सिरों पर एक-एक), एनाऊंसर (2), रिकार्डर (1), क्लर्क ऑफ दी हाऊस परन्तु अन्य प्रतियोगिताओं के लिए कम-सेकम निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं—
रैफरी (1), स्टार्टर (1), टाइम कीपर (प्रति-लेन 1), समाप्ति के जज (प्रति लेन 1), टर्न तथा स्ट्रोक इन्सपैक्टर (प्रत्येक दो लेनों के लिए 1), रिकार्डर (1)।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
तैराकी प्रतियोगिता के नियम लिखें।
उत्तर-
तैराकी प्रतियोगिता के नियम
(Rules of Swimming Race)

  1. तैरते समय प्रतियोगी को बाधा डालने वाला व्यक्ति अयोग्य घोषित किया जाएगा।
  2. किसी त्रुटि (फाऊल) के कारण प्रतियोगी की सफलता की सम्भावना संकट में पड़ने की दिशा में जजों को यह अधिकार होगा कि वे उसे अगले दौरे में भाग लेने की आज्ञा दे दें। यदि त्रुटि फाइनल में हुई होगी तो उसे पुनः तैरने की आज्ञा दी जा सकती है।
  3. लौटते समय तैराकी कुण्ड अथवा मार्ग के अन्त में एक अथवा दोनों हाथों से स्पर्श करेंगे। गृह के तल से डग मारने की अनुमति नहीं।
  4. दौड़ के समय यदि प्रतियोगी तल पर खड़ा हो जाए तो उसे अयोग्य नहीं घोषित किया जाएगा, परन्तु वह चलेगा नहीं।
  5. जल-मार्ग की सारी दूरी पार करने वाला प्रतियोगी ही विजेता घोषित किया जाएगा।
  6. रिले दौड़ में जिस प्रतियोगी टीम के पांव निर्वाचित साथी के दीवार से स्पर्श से पूर्व भूमि से हट जाएंगे, वह अयोग्य घोषित किया जाएगा तब तक कि अपराधी प्रतियोगी मूल प्रारम्भ बिन्दु पर न लौट आए। प्रारम्भ प्लेटफार्म तक लौटना आवश्यक नहीं।
  7. प्रतियोगिता के समय किसी प्रतियोगी को कोई ऐसी वस्तु प्रयोग में लाने अथवा पहनने की आज्ञा नहीं होगी जोकि उसकी तैरने की गति तथा सहिष्णुता बढ़ाने में सहायता प्रदान करे।

प्रश्न
ब्रैस्ट स्ट्रोक, बटर फ्लाई स्ट्रोक, बैक स्ट्रोक और फ्री स्टाइल तैराकी क्या
उत्तर-
बटर फ्लाई स्ट्रोक-इसमें दोनों बाजू पानी की सतह के ऊपर इकट्ठे आगे से पीछे ले जाने पड़ते हैं।
मुकाबला शुरू होने पर और समाप्त होने पर छाती ऊपर दोनों कन्धे पानी की सतह पर सन्तुलित हों, पांवों की क्रियाएं इकट्ठी हों।
फ्री स्टाइल-फ्री स्टाइल तैराकी का अर्थ किस प्रकार या ढंग से तैराकी है। इससे भाव तैरने का ढंग जोकि बटर फ्लाई स्ट्रोक, ब्रैस्ट या बैक स्ट्रोक से अलग हो। फ्री स्टाइल में तैराकी कुण्ड पर और दौड़ की समाप्ति के समय तैराकी कुण्ड की दीवार हाथ से छूना ज़रूरी नहीं। वह अपने शरीर के किसी अंग से छू सकता है।
बैक स्ट्रोक-इसमें भाग लेने वाले शुरू होने वाले स्थान पर उस ओर मुंह करके हाथ कुण्ड पर रखें, पैर पानी में होने ज़रूरी हैं। कुण्ड में खड़े नहीं हो सकते।
शुरू का संकेत मिलने पर दौड़ते समय बैक से (पीठ से) तैरेंगे।

ब्रैस्ट स्ट्रोक-इससे शरीर तथा छाती सन्तुलित और दोनों कन्धे पानी की सतह के बराबर होंगे, हाथों और पांवों की क्रियाएं इकट्ठी होंगी जोकि एक लाइन में हों। छाती से दोनों हाथ इकट्ठे आगे पानी के अन्दर या ऊपर और पीछे होने चाहिएं।
टांगों की क्रिया में पांव पीछे से आगे की तरफ मुड़ें, मछली की तरह क्रिया नहीं की जा सकती। मुड़ते समय या समाप्ति पर छू दोनों हाथों से पानी के अन्दर या ऊपर ज़रूरी है। सिर का हिस्सा पानी की सतह से ऊपर रहना ज़रूरी है।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
स्कूल स्तर पर लड़के और लड़कियों के लिए तैराकी प्रतियोगिता का वर्णन करें।
उत्तर-
स्कूल स्तर पर लड़के और लड़कियों के लिए तैराकी प्रतियोगिताएं—
तैराकी प्रतियोगिताएं
तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2

PSEB 10th Class Physical Education Practical तैराकी (Swimming)

प्रश्न 1.
तैराकी प्रतियोगताएं कितने की होती हैं ?
उत्तर-
तैराकी (Swimming) तैराकी प्रतियोगिताओं में निम्नलिखित मुकाबले होंगे—
1. लड़के (Boys)—

  1. फ्री स्टाइल (Free Style)-100, 200, 400, 800, 1500 मीटर।
  2. बैक स्ट्रोक (Back Stroke)-100, 200 मीटर।
  3. ब्रैस्ट स्ट्रोक (Breast Stroke)-100, 200 मीटर।
  4. बटरफ्लाई स्ट्रोक (Butterfly Stroke)-100 मीटर।
  5. रीले (Relay) 4 × 100 मीटर की फ्री स्टाइल। 4 × 100 मीटर मेडले (ब्रैस्ट, बैक, बटरफ्लाई और फ्री स्टाइल)।

लड़कियां (Girls)—

  1. फ्री स्टाइल (Free Style)-100, 200, 400 मीटर।
  2. बैक स्ट्रोक (Back Stroke)-100 मीटर।
  3. ब्रैस्ट स्ट्रोक (Breast Stroke)-100 मीटर।
  4. बटरफ्लाई स्ट्रोक (Butterfly Stroke)-100 मीटर।
  5. रीले (Relay)-4 × 100 मीटर फ्री स्टाइल। 4 × 100 मीटर मेडले (ब्रैस्ट, बैक, बटरफ्लाई और फ्री स्टाइल)।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 2.
तैराकी प्रतियोगिता में हीटें किस प्रकार बनाई जाती हैं और फाइनल कैसे होता है ?
उत्तर-
हीटों का बनाना और फाइनल (Seeding Heats and Finals)-सारे तैराकी मुकाबलों में सैमी फाइनल और फाइनल में हीटों का निर्माण इस प्रकार होगा—

  1. ट्रायल हीट (Trial Heat) सभी तैराक जिन्हें भाग लेना है, एक परफा में उनका समय उनके नामों के सामने भरकर योग्यता कमेटी को भेज दिया जाता है। जो प्रतियोगी अपना समय नहीं भरते, उनका नाम सूची के अन्त में दर्ज किया जाता है।
  2. सबसे तेज़ तैराक को सबसे अन्तिम हीट में, उससे कम तेज़ तैराक को अन्तिम से पहले वाली हीट में। इसी तरह बाकी के तैराकों या टीमों की हीट का फैसला किया जाता है।
  3. सबसे तेज़ तैराक को सैंटर वाली लाइन दी जाती है, उससे कम तेज़ उसके दाईं तथा बाईं ओर रखे जाते हैं।

फाइनल (Finals)—जहां आरम्भिक हीटों की आवश्यकता न हो तो लाइनों का निर्माण ऊपर दिए (3) के अनुसार होगा।

प्रश्न 3.
तैराकी प्रतियोगताओं के लिए नियुक्त अधिकारियों का वर्णन करो।
उत्तर-

रैफरी 1
जज 1
स्टार्टर 1
टाइम कीपर 1
रिकार्ड कीपर 2
इंस्पैक्टर 2
स्ट्रोक जज 1

 

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 4.
तैराकी सम्बन्धी हमें कौन-कौन सी सावधानियां प्रयोग में लानी चाहिएं ?
उत्तर-
तैराकी सम्बन्धी सावधानियां निम्नलिखित हैं—

  1. नाक और मुंह में पानी भरने की हालत में एकदम बाहर आ जाओ।
  2. हवा अपनी ताकत अनुसार करो।
  3. तैराकी सीखते समय बहुत गहरे पानी में न जाओ।
  4. गोते खाने की स्थिति में आवाज़ दो।
  5. तैराकी के समय शोर मत करो।

प्रश्न 5.
तैराकी प्रतियोगिता में अंक कैसे दिए जाते हैं ?
उत्तर-
तैराकी प्रतियोगिता में निम्नलिखित ढंग द्वारा अंक दिए जाते हैं—
पहली तीन पोजीशनों को क्रमश: (5-3-1) और रिले दौड़ों में 16-6-2 के अनुसार प्वाईंट दिए जाते हैं।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 6.
तैराकी दौड़ के मुख्य नियमों का वर्णन करो।
उत्तर-
दौड़ (The Race)—

  1. किसी तैराक को बाधा नहीं पैदा करनी चाहिए।
  2. यदि फाऊल के कारण किसी प्रतियोगी की सफलता कम (मध्यम) हो जाती है तो रैफरी उसको अगले राऊंड में हिस्सा लेने का अवसर देगा। यदि फाइनल में हो तो रैफरी दूसरी बार करवाने की आज्ञा दे सकता है।
  3. सारे इवेंट्स (Events) में तैराक घूमते हुए पूल के सिरे से शरीर स्पर्श अवश्य करेगा।
  4. किसी भी प्रतियोगी को किसी ऐसी वस्तु का प्रयोग नहीं करने दिया जाएगा जिससे तैराक को गति बढ़ाने में सहायता मिले।
  5. एक तैराक को उस लेन (Lane) में दौड (Race) समाप्त करनी पड़ेगी, जिससे उसने आरम्भ की है।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
अकबर के नव राजनीतिक संकल्प के सन्दर्भ में मुग़लों की मनसबदार प्रणाली तथा जागीरदारी प्रथा की चर्चा करें।
उत्तर-
अकबर ने अपनी आवश्यकतानुसार शासन को नवीन रूप प्रदान किया। उसने स्वयं को धार्मिक नेताओं से स्वतन्त्र रखने का प्रयास किया। उसने सैनिक तथा असैनिक कार्यों के लिए मनसबदार नियुक्त किए तथा जागीर व्यवस्था को नये रूप में आरम्भ किया। इन सब का वर्णन इस प्रकार है :

I. नया राजनीतिक संकल्प-

मुग़ल प्रशासन कई प्रकार से पहले की राज्य व्यवस्थाओं से भिन्न था। अकबर के शासनकाल में राज्यतन्त्र का एक नवीन रूप उभरा। यही रूप उसके उत्तराधिकारियों के शसनकाल में भी चलता रहा। इस राज्यतन्त्र में पहला तत्त्व राजपद के नये संकल्प का था। बाबर पहले ही खलीफा का सहारा लेने की बजाय इस बात पर बल देता था कि वह तैमूर का उत्तराधिकारी है। इस तरह उसने खलीफा की काल्पनिक सत्ता समाप्त कर दी थी।

अकबर एक कदम और आगे बढ़ा। उसने राजनीतिक और सरकारी क्षेत्र में मुल्लाओं की भूमिका को बहुत घटा दिया। 1579 में उसके राज्य के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों और विद्वानों ने ‘महाज़र’ नामक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किये। इसके अनुसार अकबर को इमाम-ए-आदिल अर्थात् एक न्यायशील नेता घोषित किया गया। अकबर को अब यह अधिकार दिया गया कि कानून के व्याख्याताओं द्वारा दी गई विरोधी रायों में से किसी एक का चुनाव कर के अपनी प्रजा के हित में निर्णय अथवा फतवा दे सके। वह कुरान के अनुकूल लोगों की भलाई के लिए स्वयं ही आज्ञा जारी कर सकता था। इस घोषणा के कारण अब वह मुसलमानों के विभिन्न सम्प्रदायों के साथ-साथ सारे ग़ैर-मुसलमान लोगों से अपनी प्रजा के रूप में समान व्यवहार कर सकता था। अकबर का यह विश्वास था कि उसने ईश्वर से अपनी सत्ता प्राप्त की है और सारी जनता ईश्वर की रचना होने के नाते बादशाह के समान व्यवहार की पात्र है। उसने हिन्दुओं से जज़िया तथा तीर्थ यात्रा कर लेने बन्द कर दिए।

उसने राजपूत राजकुमारियों से विवाह किया और उन्हें मुसलमान बनाये बिना ही महलों में अन्य रानियों के बराबर सम्मान दिया। उसने कई राजपूत सरदारों को भी अधीन राजाओं का दर्जा दिया।

हर्ष के पश्चात् अकबर पहला शासक था जिसने बड़े स्तर पर सामन्त प्रथा का विधिवत प्रयोग किया। उसके राज्य में 100 से भी अधिक सामन्त थे। सभी सामन्त गैर-मुसलमान थे। वे दूसरी शक्तियों से राजनीतिक सन्धि नहीं कर सकते थे। उन्हें गद्दी पर बैठने का अधिकार भी सम्राट प्रदान करता था। सामन्त के लिए यह आवश्यक था कि वह सम्राट को वार्षिक खिराज दे। सम्राट् की आज्ञा अनुसार आवश्यकता पड़ने पर सामन्तों को अभियानों के लिए सैनिक भेजने पड़ते थे। सम्राट् की अधीनता में रहते हुए सामन्तों को यह स्वतन्त्रता थी कि वे मुग़ल साम्राज्य में मनसबदार बन सकें। यह पद अधीन शासक के पद के अतिरिक्त था। इस प्रकार सामन्त और मनसबदार के रूप में अधीन राजा का मुग़ल साम्राज्य से दोहरा नाता रहता था। उसका अपना एक राजनीतिक स्तर भी होता था तथा वह प्रशासन का भागीदार भी होता था ।

II. मनसबदारी प्रणाली-

अकबर की मनसबदारी प्रणाली का मूल उद्देश्य सैनिक संगठन में सुधार लाना था। इस उद्देश्य से हर कमाण्डर का मनसब अथवा दर्जा निश्चित किया गया। इससे उसके अधीन सैनिकों की गिनती का पता चल जाता था। मनसब दस से आरम्भ होकर दस-दस के अन्तर से बढ़ते थे ताकि घुड़सवारों की गिनती करनी सरल हो जाए तथा पदों में अन्तर का भी स्पष्ट पता चले। जब अकबर को यह पता चला कि मनसबदार निश्चित संख्या में घुड़सवार नहीं रखते तो उसने दो प्रकार के मनसब बना दिए-जात और सवार। जात के अनुसार मनसबदार का व्यक्तिगत वेतन निश्चित किया जाता था और सवार मनसब से उसके घुड़सवारों की गिनती एवं उनके लिए वेतन निश्चित हो जाता था। अतः स्पष्ट है कि घुड़सवार न रखने को केवल जात मनसब दिया जाता था। इस प्रकार ‘सिविल’ और सैनिक अफसरों में अन्तर काफ़ी सीमा तक कम हो गया। अलग-अलग समय में एक ही व्यक्ति को सिविल’ से सैनिक और सैनिक से ‘सिविल’ सेवाओं में परिवर्तित किया जा सकता था। कुछ मनसबदारों के पास दोनों ही पद थे। ऐसे मनसबदारों को तीन वर्गों में बांटा गया था। पहले वर्ग के पास सवार तथा जात मनसब बराबर थे। दूसरे वर्ग में वे मनसबदार थे जिनका सवार मनसब जात मनसब के आधे से अधिक था। तीसरे प्रकार के मनसबदारों का सवार मनसब उसके जात मनसब के आधे से भी कम था। शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल में मनसबदारी प्रणाली में कुछ परिवर्तन अवश्य किया गया, किन्तु अकबर द्वारा विकसित की गई प्रणाली में मनसबदारों का मूल अस्तित्व बना रहा।

III. जागीरदारी प्रथा-

जागीरदारी प्रथा का स्रोत मनसबदारी था। अकबर सभी मनसबदारों को नकद वेतन नहीं दे सकता था। अतः उसने मनसबदारों को यह अधिकार दिया कि वे अपने वेतन के बराबर लगान वसूल कर लें। जिस भूमि से मनसबदार को लगान वसूल करने का अधिकार मिलता था, उसे उसकी जागीर माना जाता था। जागीरदार का अधिकार उस भूमि से लिए जाने वाले कर तक ही सीमित था। जो भूमि जागीर में नहीं दी जाती थी, उसे बादशाह का खालिसा कहा जाता था। जागीरों की भान्ति खालिसा भूमि भी देश के भिन्न-भिन्न भागों में होती थी।

मनसबदार की जागीर एक ही स्थान पर नहीं होती थी। साम्राज्य की नीति के अनुसार थोड़े-थोड़े समय बाद जागीरों को स्थानान्तरित कर दिया जाता था ताकि जागीरदार स्थानीय लोगों के साथ अधिक मेल-मिलाप न बढ़ा सकें। इसका परिणाम यह निकला कि जागीरदार अधिक लगान वसूल करने की चिन्ता में रहते थे और भूमि के सुधार की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं देते थे। उनका किसानों से व्यवहार भी अच्छा नहीं होता था। अकबर के उत्तराधिकारियों के समय जैसे-जैसे मनसबदारों की गिनती बढ़ती गई वैसे-वैसे जागीरदारों को उनकी इच्छा के अनुकूल जागीरें मिलनी कठिन हो गईं। 17वीं सदी के अन्त में तो मनसबदारों को जागीर प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। औरंगजेब के समय तक साम्राज्य का 80 प्रतिशत भाग जागीरों के रूप में दिया जा चुका था।
उन्हें अपनी जागीरों से आय भी कम प्राप्त होती थी। इस तरह जागीरदारी प्रथा में संकट की स्थिति बन गई और यह पतनोन्मुख हुई। इस प्रथा का पतन अन्तत: मुग़ल साम्राज्य के पतन का कारण बना।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध

प्रश्न 2.
लगान प्रबन्ध के सन्दर्भ में मुग़ल साम्राज्य के केन्द्रीय, प्रान्तीय तथा स्थानीय प्रशासन की चर्चा करें।
उत्तर-
मुग़लों ने भारत में उच्चकोटि की शासन-प्रणाली की व्यवस्था की। इसके अधीन केन्द्रीय, प्रान्तीय, स्थानीय शासन तथा लगान प्रबन्ध का वर्णन इस प्रकार है :-

1. केन्द्रीय शासन-केन्द्रीय शासन का मुखिया स्वयं सम्राट् था। उसे असीम शक्तियां प्राप्त थीं जिन पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं था। उसे धरती पर ‘ईश्वर की छाया’ समझा जाता था। वह मुख्य सेनापति और मुख्य न्यायाधीश था। वह इस्लाम धर्म का संरक्षक तथा मुस्लिम जनता का आध्यात्मिक नेता भी था। शासन कार्यों में उसे सलाह देने के लिए एक मन्त्रिमण्डल होता था। प्रत्येक मन्त्री के पास एक अलग विभाग होता था। इसमें से कुछ प्रमुख मन्त्री ये थे-वकील या वज़ीर, दीवानए-आला, मीर बख्शी, सदर-उल-सुदूर, खान-एन्सामां तथा प्रधान काजी। सम्राट् के पश्चात् वकील या वजीर का पद सबसे बड़ा होता था। वह सम्राट् का सलाहकार था तथा अन्य विभागों की देखभाल करता था। दीवान-ए-आला वित्त मन्त्री होने के नाते सभी प्रकार के कर एकत्रित करता था। मीर बख्शी मनसबदारों का रिकार्ड रखता था।

2. प्रान्तीय शासन-मुग़लों ने अपने साम्राज्य को विभिन्न प्रान्तों में बांटा हुआ था। अकबर के शासन काल में प्रान्तों की संख्या 15 थी, जो औरंगजेब के समय में बढ़ कर 22 हो गई। प्रान्तीय शासन का मुखिया सूबेदार अथवा नाज़िम होता था। वह प्रान्त में कानून तथा व्यवस्था बनाए रखता था। वह सरकारी आज्ञाओं को भी लागू करवाता था। शासन-कार्यों में उसकी सहायता के लिए प्रान्तीय दीवान होता था। वह प्रान्त के वित्त विभाग का मुखिया होता था। वह सूबेदार के अधीन नहीं होता था। इसके अतिरिक्त बख्शी, सदर, काजी, वाकियानवीस तथा कोतवाल आदि अन्य अधिकारी थे। वे प्रान्तों में वही काम करते थे जो उनके मुखिया केन्द्र में करते थे।

3. स्थानीय शासन-मुग़लों ने शासन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रान्तों को आगे सरकारों में बांटा हुआ था। सभी प्रान्तों की सरकारों की संख्या 105 थी। फौजदार, अमल गुज़ार, वितक्ची तथा खज़ानेदार सरकार के प्रमुख अधिकारी थे। फौजदार सरकार का सैनिक तथा कार्यकारी अध्यक्ष होता था। वह सरकार में शान्ति तथा अनुशासन की व्यवस्था करता था। वह ही सम्राट के फरमानों को लागू करवाता था। अमल-गुज़ार सरकार के वित्त विभाग का मुखिया होता था। वह निम्न राजस्व अधिकारियों के कार्यों पर निगरानी रखता था और किसानों को अधिक-से-अधिक भूमि को हल तले लाने के लिए प्रेरित करता था। अमल-गुज़ार की सहायता के लिए वितिक्ची तथा पोतदार अथवा खज़ानेदार नामक दो अधिकारी होते थे। वितिक्ची राजस्व तथा उपज के आंकड़ों का रिकार्ड रखता था और कानूनगो के कार्यों का निरीक्षण करता था। पोतदार तथा खज़ानेदार कृषकों से भूमि कर एकत्रित करके कोष में रखता था। कोष की एक चाबी उसके पास होती थी और दूसरी अमलगुज़ार के अधिकार में रहती थी।

प्रत्येक सरकार को कई परगनों में बांटा गया था। परगनों के प्रमुख कर्मचारियों में शिकदार, आमिल, कानूनगो आदि के नाम लिए जा सकते थे। शिकदार परगने का कार्यपालक अधिकारी होता था। वह परगने में शान्ति तथा व्यवस्था की स्थापना करता था। परगने में फौजदारी मुकद्दमे का फैसला भी वही करता था। आमिल परगने के राजस्व विभाग का मुखिया होता था। उसके कार्य भूमिकर एकत्रित करना, दीवानी मुकद्दमों का फैसला करना तथा शान्ति स्थापना में शिकदार की सहायता करना था। आमिल की सहायता के लिए कानूनगो तथा पोतदार नामक दो अधिकारी होते थे। कानूनगो कृषकों की भूमि तथा भूमिकर सम्बन्धी सारे रिकार्ड रखता था। वह पटवारियों के कार्यों का निरीक्षण भी करता था। पोतदार परगने के किसानों से कर एकत्रित करता था। ग्राम का प्रबन्ध पंचायत के हाथों में होता था। पंचायत के मुख्य कार्यों में लोगों के झगड़ों का निपटारा करना, सफ़ाई तथा शिक्षा का प्रबन्ध करना, मेलों तथा उत्सवों का आयोजन करना आदि प्रमुख थे।

4. न्याय प्रबन्ध-मुग़ल साम्राज्य के अन्य विभागों की भान्ति न्याय प्रबन्ध भी सुव्यवस्थित था। साम्राज्य के सभी नगरों एवं मुख्य कस्बों में एक काजी और एक मुफ्ती नियुक्त किया जाता था। वे शरीअत (इस्लामी कानून) की शर्तों के अनुसार न्यायिक प्रशासन की देखभाल करते थे। मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था तथा काजी निर्णय देता था। काज़ी की कचहरी में गैर-मुसलमान भी जा सकते थे। गांवों और कस्बों में पंचायतें भी थीं जो छोटे-मोटे झगड़ों का निपटारा करती थीं। न्याय का अधिकांश कार्य पंचायत तथा काजी ही कर लेते थे। प्रान्त में सूबेदार, दीवान तथा अन्य कर्मचारियों को भी न्याय करने का अधिकार प्राप्त था, विशेष रूप से उन मामलों में जिनसे उनका सीधा सम्बन्ध था। इसी प्रकार केन्द्र में बादशाह के अतिरिक्त सदर एवं अन्य मन्त्री न्याय कार्य करते थे। शाही लश्कर के लिए नियुक्त विशेष काजी को ‘काज़ी-उल-कुजात’ कहते थे।

5. लगान प्रबन्ध-मुग़ल राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत लगान (भूमिकर) था। अकबर ने कई अनुभवों के आधार पर भूमिकर की जब्ती व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था के अनुसार कृषि अधीन सारी भूमि को नापा गया। इस नाप के लिए एक निश्चित लम्बाई का गज़ प्रयोग में लाया गया जिसे इलाही गज़ कहते थे। नाप के लिए अब रस्से के स्थान पर बांस के टुकड़ों का प्रयोग होने लगा। फिर सारी भूमि को उर्वरता के आधार पर तीन श्रेणियों में बांट कर उनकी प्रति बीघा औसत उपज का हिसाब लगाया। इस औसत उत्पादन का तीसरा भाग सरकार का हिस्सा अथवा लगान निर्धारित किया गया। इसके पश्चात् प्रत्येक फसल को दस वर्षों की कीमतों की औसत निकाल कर लगान की मात्रा नकद राशि में निश्चित की गई। इस प्रकार प्रत्येक फसल को प्रति बीघा लगान दामों में निश्चित हुआ। ऐसे सभी प्रदेशों के लिए, जहां भूमि की उर्वरता तथा जलवायु लगभग एक थे, लगान को नकद राशि में परिवर्तित करने के लिए एक ही दर निश्चित की गई जिसे ‘दस्तूर’ कहते थे। कृषक से लिए जाने वाले लगान का हिसाब इसी दर से ही लगाते थे। बोई हुई भूमि के क्षेत्र का नाप प्रत्येक फसल के लिए किया जाता था। इस व्यवस्था में साधारणतः सरकार तथा किसान दोनों को आरम्भ से ही लगान की राशि का पता चल जाता था।

कुछ स्थानों पर जब्ती के साथ कनकूत तथा बटाई भी प्रचलित थी। बटाई के अनुसार फसल का एक निश्चित भाग लगान के रूप में लिया जाता था। यह किसानों के लिए तो लाभदायक था, परन्तु सरकार को कटी फसल की सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती थी। कनकूत में ऐसी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि उसमें खड़ी फसल के आधार पर उपज का अनुमान लगा लिया जाता था। सरकार के करिन्दे बाद में लगान की दर के अनुसार सरकार का हिस्सा वसूल करते थे। प्रायः लगान की राशि निश्चित करके नकदी में उसकी उगराही होती थी। अकबर के उत्तराधिकारियों के समय लगान की दर बढ़ती चली गई तथा 17वीं सदी के अन्त में यह दर उत्पादन के तीसरे भाग से बढ़ कर लगभग आधा भाग हो गई। समय बीतने पर वार्षिक नाप भी छोड़ दिया गया और पहले वर्षों में वसूल किए लगान के आधार पर कृषक का या सारे गांव का सामूहिक लगान निश्चित किया जाने लगा। इसे नस्क कहा जाता था।

सच तो यह है कि मुग़ल सरकार का प्रशासन समय की आवश्यकता के अनुकूल था। इसलिए इसमें आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर परिवर्तन भी होते रहते थे। परन्तु प्रशासन के मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं होता था।

प्रश्न 3.
लोक कल्याण के कार्य तथा राजकीय संरक्षण का हवाला देते हुए मुग़ल काल में भवन निर्माण, चित्रकला, संगीत तथा साहित्य के क्षेत्र में हुई उन्नति पर लेख लिखें।
उत्तर-
मुग़ल काल में प्रजा हित का रूप वह नहीं था जैसा की वर्तमान कल्याणकारी राज्य में होता है। यह राजा की इच्छा पर निर्भर था कि वह प्रजा-हित के लिए क्या कुछ करता है या नहीं। फिर भी मुग़ल सम्राट् प्रजा हितकारी थे और वे सरकारी आय का कुछ भाग जनकल्याण तथा धर्मार्थ कार्यों पर व्यय करते थे। यात्रियों की सुविधा के लिए सरकार पुल और सड़कें बनवाती थी। लोगों के लिए अस्पताल और सराएं भी बनवाई जाती थीं। इनका प्रयोग सरकारी कार्यों के लिए भी होता था।

मुग़ल शासक मस्जिदों, मदरसों, सूफ़ी सन्तों तथा धार्मिक पुरुषों को संरक्षण देते थे। लोक कल्याण पर व्यय होने वाले राशि का अधिकतर भाग इन्हीं पर खर्च किया जाता था। इन्हें व्यय के लिए सरकार की ओर से कर मुफ़्त भूमि दे दी जाती थी। कुछ गैर-मुस्लिम संस्थाओं को भी सहायता मिलती थी। इनमें वैष्णव, जोगी, सिक्ख तथा पारसी संस्थाएं शामिल थीं। औरंगज़ेब के समय में भी इस सहायता पर कोई रोक न लगाई गई। अतः जब औरंगज़ेब ने कर मुक्त भूमि प्राप्त लोगों को भूमि का स्वामी घोषित किया तो गैर-मुस्लिम संस्थाएं भी अपनी-अपनी भूमि की स्वामी बन गईं। इस प्रकार की भूमि के स्वामी अब अपनी भूमि बेचने या गिरवी रखने में स्वतन्त्र थे।

भवन-निर्माण-

मुग़लकाल में एक लम्बे समय के पश्चात् देश में शान्ति स्थापित हुई। ऐसे वातावरण में जनता में अनेक कलाकार पैदा हुए। फलस्वरूप देश में सभी प्रकार की कलाओं तथा साहित्य का अद्वितीय विकास हुआ। बाबर को भवन बनवाने का बड़ा चाव था। उसके द्वारा बनवाए केवल दो भवन विद्यमान हैं-एक मस्जिद पानीपत में है और दूसरी मस्जिद रुहेलखण्ड के सम्भल नगर में है। हुमायूँ ने फतेहाबाद (जिला हिसार) में एक मस्जिद बनवाई। अकबर ने भी भवन-निर्माण कला को काफ़ी विकसित किया। उसके भवनों में फ़ारसी तथा भारतीय शैलियों का मिश्रण पाया जाता है। उसकी प्रमुख इमारतें ‘जहांगीर महल ‘हुमायूँ का मकबरा’ ‘फतेहपुर सीकरी में ‘जोधाबाई का महल’, ‘बुलन्द दरवाजा’ ‘दीवान-ए-खास’ प्रमुख हैं।

अकबर द्वारा बनाया गया ‘पंज-महल’ तथा ‘जामा मस्जिद’ भी देखने योग्य हैं। जहांगीर ने आगरा में एतमाद-उद्-दौला का मकबरा तथा सिकन्दरा में अकबर का मकबरा बनवाया। शाहजहां ने बहुत से भवनों का निर्माण करवाया। उसकी सबसे सुन्दर इमारत ‘ताजमहल’ है। उसने दिल्ली का लाल किला भी बनवाया। इसमें बने ‘दीवान-ए-खास’ तथा ‘दीवान-ए-आम’ विशेष रूप से देखने योग्य हैं। इसके अतिरिक्त उसने आगरा के दुर्ग में मस्जिद बनवाई। शाहजहां ने एक करोड़ रुपए की लागत से ‘तख्तए-ताऊस’ भी बनवाया। उसकी मृत्यु के बाद भवन निर्माण कला का विकास लगभग रुक-सा गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद साम्राज्य में अराजकता फैल गई। फलस्वरूप बाद के मुग़ल सम्राटों को इस ओर विशेष ध्यान देने का अवसर ही न मिल सका।

चित्रकला-

मुग़ल सम्राटों ने चित्रकला में भी विशेष रुचि दिखाई। बाबर को हिरात में फारस की चित्रकला का ज्ञान हुआ। उसने उसे संरक्षण प्रदान किया। उसने अपनी आत्मकथा को चित्रित करवाया। हुमायूँ फारस के दो कलाकारों को अपने साथ भारत ले आया था। ये चित्रकार ‘मीर सैय्यद अली’ तथा ‘अब्दुल समद’ थे। इन चित्रकारों ने सुप्रसिद्ध फ़ारसी ग्रन्थ ‘दास्ताने-अमीर हमजा’ को चित्रित किया। अकबर के शासनकाल में चित्रकला ने भारतीय रूप धारण कर लिया। उसने फतेहपुर सीकरी के महलों की दीवारों पर बड़े सुन्दर चित्र अंकित करवाए। ‘सांवलदास,’ ‘ताराचन्द’ ‘जगन्नाथ’ आदि अकबर के समय के प्रसिद्ध चित्रकार थे। जहांगीर की चित्रकला में बड़ी रुचि थी। वह चित्र देख कर ही उसे बनाने वाले का नाम बता दिया करता था। उसके दरबार में अनेक चित्रकार थे जिनमें आगा रज़ा, अब्दुल हसन, मुहम्मद मुराद बहुत ही प्रसिद्ध थे। जहांगीर के बाद केवल राजकुमार दारा शिकोह के प्रयत्नों से ही चित्रकला का कुछ विकास हुआ। औरंगज़ेब तो चित्रकला को प्रोत्साहन देना कुरान के विरुद्ध समझता था। उसने अपने दरबार से सभी चित्रकारों को निकाल दिया।

संगीत कला-

औरंगज़ेब को छोड़ कर सभी मुग़ल सम्राटों ने संगीत कला को भी प्रोत्साहन दिया। बाबर ने संगीत से सम्बन्धित एक पुस्तक की रचना भी की। हुमायूँ सोमवार तथा बुधवार को बड़े प्रेम से संगीत सुना करता था। उसने अपने दरबार में अनेक संगीतकारों को आश्रय दे रखा था। अकबर को संगीत-कला से विशेष प्रेम था। वह स्वयं भी उच्च कोटि का गायक था। अबुल फज़ल के अनुसार उसके दरबार में गायकों की संख्या बहुत अधिक थी। तानसेन, बाबा रामदास, बैजू बावरा तथा सूरदास उसके समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे। जहांगीर भी संगीतकारों का बड़ा आदर करता था। छः प्रसिद्ध गायक उसके दरबारी थे। शाहजहां प्रतिदिन शाम के समय संगीत सुना करता था। वह स्वयं भी एक अच्छा गायक था। उसकी आवाज़ बड़ी सुरीली थी। उसके दरबारी संगीतकारों में रामदास प्रमुख था। औरंगजेब को भी आरम्भ में गायन विद्या से काफ़ी लगाव था। परन्तु बाद में उसने अपने गायकों को दरबार से निकाल दिया । फलस्वरूप संगीत कला पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।

मुग़ल काल में फ़ारसी साहित्य ने बहुत उन्नति की। अकबर के समय का फ़ारसी का सबसे बड़ा लेखक अबुल फज़ल था।’आइन-ए-अकबरी’ और ‘अकबरनामा’ उसकी प्रमुख रचनाएं है। अकबर के समय में रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थों का अनुवाद फ़ारसी भाषा में किया गया। बाबर की आत्मकथा ‘तुजके बाबरी’ का अनुवाद भी तुर्की से फ़ारसी भाषा में किया गया। अकबर के पश्चात् जहांगीर ने अपनी आत्मकथा लिखी। इस पुस्तक का नाम ‘तुज़के जहांगीरी’ है। शाहजहां के समय में फ़ारसी में कई ऐतिहासिक ग्रन्थों की रचना हुई। इनमें से लाहौरी का ‘बादशाहनामा’ प्रमुख है। मुग़ल राजकुमारियों ने भी फ़ारसी साहित्य की उन्नति में काफ़ी योगदान दिया। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने “हुमायूँ नामा” लिखा था।

नूरजहां, मुमताज़ महल, जहांआरा, जेबूनिस्सा ने भी अनेक कविताओं की रचना की। मुग़लकाल में हिन्दी साहित्य का काफ़ी विकास हुआ। मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पद्मावत’ की रचना इसी काल में की। इस समय के कवियों में सूरदास और तुलसीदास का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सूरदास ने ‘सूरसागर’ तथा तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ नामक महान् ग्रन्थों की रचना की। इनके अतिरिक्त केशव दास, सुन्दर, भूषण आदि कवियों ने साहित्य की खूब सेवा की। . सच तो यह है कि मुगलकाल अपनी ललित कलाओं के कारण इतिहास में विशेष स्थान रखता है। आज भी ताज तथा तानसेन मुगलकाल की चरम सीमा के प्रतीक माने जाते हैं। फतेहपुर सीकरी के भवन, लाल किला, दिल्ली की जामा मस्जिद इस बात के प्रमाण हैं कि मुग़लकाल में ललित कलाओं का खूब विकास हुआ। उस समय की कला-कृतियां आज भी देश भर की शोभा हैं।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
मनसबदारी प्रथा किसने आरंभ की ?
उत्तर-
अकबर ने।

प्रश्न 2.
मुग़लकालीन कानूनगो किस प्रशासनिक स्तर का अधिकारी था ?
उत्तर-
परगने के स्तर का ।

प्रश्न 3.
बटाई से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बटाई मुग़लकाल की एक लगान प्रणाली थी ।

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प्रश्न 4.
अकबर के समय के दो प्रसिद्ध कवियों के नाम बताओ।
उत्तर-
फैजी तथा वज़ीरी।

प्रश्न 5.
मुगलकालीन जीवन का एक कार्य बताओ ।
उत्तर-
भूमिकर निर्धारित करना ।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) अकबर की मनसबदारी प्रथा का मुख्य उद्देश्य ……………. संगठन में सुधार करना था।
(ii) अकबरकालीन मुग़ल स्थापत्य कला मुख्य रूप से भारतीय तथा …………… कलाओं का समन्वय थी।
(iii) औरंगज़ेब ने ……….. में बादशाही मस्जिद का निर्माण करवाया।
(iv) सूरसागर ………… की रचना है।
(v) ………. दरवाज़ा संसार का सबसे बड़ा द्वार है।
उत्तर-
(i) सैनिक
(ii) ईरानी
(iii) लाहौर
(iv) सूरदास
(v) बुलंद ।

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3. सही/ग़लत कथन

(i) जहांगीर ने चित्रकला का संरक्षण किया। — (✓)
(ii) हुमायूं तथा अकबर को चित्रकला से प्रेम नहीं था। — (✗)
(iii) अकबर ने गैर-मुसलमानों से जज़िया तथा तीर्थ यात्रा कर लेने बंद कर दिए। — (✓)
(iv) अकबर के समय भूमि की माप के लिए शहनशाही गज़ का प्रयोग किया जाता था। — (✗)
(v) औरंगज़ेब के समय मुग़ल प्रांतों की संख्या 22 थी। — (✓)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
मुगलकाल में पटवारी रिकार्ड रखता था:
(A) जनसंख्या से संबंधित
(B) गांव से संबंधित
(C) बड़े शहरों से संबंधित
(D) राज दरबार से संबंधित ।
उत्तर-
(B) गांव से संबंधित

प्रश्न (ii)
‘माहज़र’ नामक घोषणा-पत्र जारी हुआ-
(A) अकबर के समय में
(B) बाबर के समय में
(C) जहांगीर के समय में
(D) शाहजहां के समय में ।
उत्तर-
(A) अकबर के समय में

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प्रश्न (iii)
जब्ती-व्यवस्था क्या थी ?
(A) मुगलकाल की व्यवस्था
(B) मुगलकाल की शिक्षा प्रणाली
(C) अमीरों से ज़बरदस्ती धन छीनने की व्यवस्था
(D) मुगलकाल के लगान उगाहने की एक व्यवस्था।
उत्तर-
(D) मुगलकाल के लगान उगाहने की एक व्यवस्था।

प्रश्न (iv)
मुगलकाल में प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करता था-
(A) मीर बख्शी
(B) मुख्य सदर
(C) वकील या वज़ीर
(D) मुख्य काजी ।
उत्तर-
(C) वकील या वज़ीर

प्रश्न (v)
‘मनसब’ का शाब्दिक अर्थ है-
(A) पदवी
(B) सवार
(C) जात
(D) उमरा ।
उत्तर-
(A) पदवी

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II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नायब-ए-अमीर अलमोमिनीन’ का क्या अर्थ था ?
उत्तर-
‘नायब-ए-अमीर अलमोमिनीन’ का अर्थ था : खलीफा का नायब। ।

प्रश्न 2.
‘माहज़र’ पर कब हस्ताक्षर किये गए तथा इसमें अकबर को किस रूप में पेश किया गया ?
उत्तर-
‘माहज़र’ पर 1579 ई० में हस्ताक्षर किये गये। इसमें अकबर को इमाम-ए-आदिल अर्थात् न्यायशील नेता के रूप में पेश किया गया।

प्रश्न 3.
अकबर ने गैर-मुसलमानों से लिए जाने वाले कौन-से दो कर समाप्त किए ।
उत्तर-
अकबर ने गैर-मुसलमानों से तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर लेने बन्द कर दिए।

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प्रश्न 4.
सम्राट्-सामन्त सम्बन्धों में कौन-सी दो बातें आवश्यक थीं ?
उत्तर-
सामन्त दूसरी शक्तियों के साथ राजनीतिक सन्धि नहीं कर सकते थे। उन्हें मुग़ल सम्राट को वार्षिक नजराना भी देना पड़ता था।

प्रश्न 5.
अकबर की मनसबदारी प्रथा का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
अकबर की मनसबदारी प्रथा का मुख्य उद्देश्य सैनिक संगठन में सुधार करना था।

प्रश्न 6.
अकबर ने कौन-से दो प्रकार के मनसब बना दिए ?
उत्तर-
अकबर ने ज़ात और सवार नाम के दो अलग ‘मनसब’ बना दिए।

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प्रश्न 7.
पाँच सौ से अधिक मनसब लेने वालों की गिनती किन में होती थी ? अकबर के दो प्रसिद्ध मनसबदारों के नाम बताएं।
उत्तर-
पाँच सौ से अधिक मनसब लेने वालों की गिनती शासक वर्ग में होती थी। अकबर के दो प्रसिद्ध मनसबदार अबुल फज़ल तथा बीरबल थे।

प्रश्न 8.
वेतन में जागीरदार क्या अधिकार प्राप्त करता था ?
उत्तर-
जागीरदार को वेतन के बराबर लगान वसूल करने का अधिकार प्राप्त होता था।

प्रश्न 9.
जागीर किसे कहा जाता था ?
उत्तर-
जागीर से अभिप्राय उस भूमि से था जिससे मनसबदार को लगान वसूल करने का अधिकार मिलता था।

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प्रश्न 10.
खालिसा किसे कहा जाता था ?
उत्तर-
मुग़ल काल में उस सारी भूमि को खालिसा कहते थे जिससे किसी मनसबदार को लगान वसूल करने का अधिकार मिलता था।

प्रश्न 11.
जागीरों के स्थानान्तरण का किसानों पर क्या प्रभाव पड़ता था ?
उत्तर-
इसका प्रभाव यह पड़ता था कि जागीरदारों को अधिक से अधिक लगान वसूल करने की चिन्ता रहती थी और वे जागीर की भूमि की उन्नति की ओर अधिक ध्यान नहीं देते थे।

प्रश्न 12.
औरंगज़ेब के समय तक साम्राज्य की कुल आय का कौन-सा भाग जागीरों में दिया जा चुका था ?
उत्तर-
औरंगज़ेब के समय तक साम्राज्य का 80 प्रतिशत भाग जागीरों में दिया जा चुका था।

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प्रश्न 13.
अकबर के प्रारम्भिक वर्षों में केन्द्रीय सरकार में प्रमुख पद कौन सा था और यह किसको दिया गया ?
उत्तर-
अकबर के प्रारम्भिक वर्षों में केन्द्रीय सरकार में प्रमुख पद ‘वकील’ था। यह पद तब बैरम खां को दिया गया था।

प्रश्न 14.
दीवान के दो मुख्य कार्य बताएं।
उत्तर-
दीवान का कार्य भूमिकर निर्धारित करना और भूमि कर उगाहने सम्बन्धी नियम बनाना था। वह आय का बजट भी तैयार करता था।

प्रश्न 15.
मनसबदारों तथा शाही कारखानों से सम्बन्धित दो मन्त्रियों के नाम बताएं।
उत्तर-
मनसबदारों से सम्बन्धित मन्त्री मीर बख्शी तथा शाही कारखानों से सम्बन्धित मन्त्री मीर सामां था।

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प्रश्न 16.
सदर के दो मुख्य कार्य क्या थे ?
उत्तर-
सदर का काम शैक्षणिक तथा धार्मिक संस्थाओं की देखभाल करना था। वह योग्य व्यक्तियों तथा संस्थाओं को नकद धन या लगान मुक्त भूमि देता था।

प्रश्न 17.
कौन-से तीन मन्त्रियों का कार्य क्षेत्र प्रान्तों तक फैला हुआ था ?
उत्तर-
दीवान, भीर बख्शी तथा मीर सामां का कार्य क्षेत्र प्रान्तों तक फैला हुआ था।

प्रश्न 18.
अकबर तथा औरंगजेब के समय प्रान्तों की गिनती क्या थी ?
उत्तर-
अकबर के समय प्रान्तों की संख्या 15 और औरंगजेब के समय में 22 थी।

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प्रश्न 19.
प्रान्त से अगली प्रशासकीय इकाई कौन-सी थी और यह कौन-से अधिकारी के अधीन थी ?
उत्तर-
प्रान्त से अगली इकाई ‘सरकार’ थी। ‘सरकार’ का प्रबन्ध फौजदार के अधीन था।

प्रश्न 20.
राजस्व के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई कौन-सी थी और इसका मुख्य अफसर कौन था ?
उत्तर-
राजस्व की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई परगना थी। परगना आमिल के अधीन था।

प्रश्न 21.
कानूनगो किस स्तर का अधिकारी था और इसका मुख्य कार्य क्या था ?
उत्तर-
कानूनगो परगने का अधिकारी था जो आमिल के स्तर से छोटा होता था। वह भूमि तथा लगान सम्बन्धी रिकार्ड रखता था।

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प्रश्न 22.
चौधरी (मुग़लकालीन) किन के बीच सम्पर्क सूत्र था ?
उत्तर-
चौधरी परगने एवं तप्पे (एक प्रशासनिक विभाग) के कर्मचारियों और कृषकों के बीच सम्पर्क सूत्र था।

प्रश्न 23.
पटवारी किससे सम्बन्धित रिकार्ड रखता था ?
उत्तर-
पटवारी गांव से सम्बन्धित रिकार्ड रखता था।

प्रश्न 24
कस्बे में न्याय प्रबन्ध के दो महत्त्वपूर्ण अधिकारियों के नाम तथा कार्य बताएं।
उत्तर-
कस्बों में मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था तथा काजी मुकद्दमों का निर्णय देता था।

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प्रश्न 25.
प्रान्तों और केन्द्र में न्याय देने वाले चार अधिकारियों के नाम बताएं।
उत्तर-
प्रान्तों में सूबेदार तथा दीवान को न्याय सम्बन्धी कार्य करने का अधिकार था। सदर तथा अन्य मन्त्री केन्द्र में न्याय देते थे।

प्रश्न 26.
पंचायतें कौन-से स्तरों पर झगड़ों का निपटारा करती थीं ?
उत्तर-
पंचायतें गांवों तथा कस्बों में झगड़ों का निपटारा करती थीं।

प्रश्न 27.
अकबर के समय कौन-से गज़ का प्रयोग किया जाता था और यह किस चीज़ का बना हुआ था ?
उत्तर-
अकबर के समय इलाही गज़ का प्रयोग किया जाता था। यह बांस का बना होता था।

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प्रश्न 28.
अकबर के समय उत्पादन का कौन-सा भाग लगान के रूप में निर्धारित किया गया तथा 17वीं सदी में यह दर कितनी हो गई ?
उत्तर-
अकबर के समय उत्पादन का 1/3भाग लगान के रूप में निर्धारित किया गया। 17वीं सदी में यह दर 1/2 भाग हो गई।

प्रश्न 29.
बटाई से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बटाई एक लगान प्रणाली थी। इसके अनुसार उपज का एक निश्चित भाग लगान के रूप में लिया जाता था।

प्रश्न 30.
कनकूत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
कनकूत अकबर कालीन लगान की एक प्रणाली थी जिसके अनुसार खड़ी फसल से उपज एवं लगान का अनुमान लगा लिया जाता था।

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प्रश्न 31.
नस्क से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नस्क लगान की वह व्यवस्था थी जिसके द्वारा पहले वर्षों के वसूल किए गए लगान के आधार पर सारे गांव या कृषक पर लगान निर्धारित किया जाता था।

प्रश्न 32.
अकबर के समय लगान निर्धारित करने की सबसे महत्त्वपूर्ण विधि क्या थी तथा यह किस पर आधारित थी ?
उत्तर-
अकबर के समय लगान निर्धारित करने की सबसे महत्त्वपूर्ण विधि ज़ब्ती व्यवस्था थी। इसके अन्तर्गत कृषि योग्य भूमि पर लगान निश्चित किया जाता था।

प्रश्न 33.
मुग़ल सरकार निर्माण के कौन-से चार प्रकार के कार्यों पर धन खर्च करती थी ?
उत्तर-
मुग़ल सरकार सड़कें, पुल, अस्पताल, सरायें आदि के निर्माण पर धन खर्च करती थी।

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प्रश्न 34.
धर्मार्थ में दान कौन से-दो रूपों में दिया जाता था ? …
उत्तर-
धमार्थ में दान नकद तथा लगान मुक्त भूमि के रूप में दिया जाता था।

प्रश्न 35.
मुग़ल साम्राज्य का सरंक्षण पाने वाले किन्हीं चार धर्मों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुग़ल साम्राज्य का संरक्षण पाने वाले चार धर्म इस्लाम, सिक्ख, पारसी तथा वैष्णव एवं शैव मत थे।

प्रश्न 36.
1690 के बाद धर्मार्थ में भूमि लेने वाले का उस पर किस प्रकार का अधिकार हो गया ?
उत्तर-
वह इस भूमि का स्वामी बन गया। वह इसे बेच सकता था, गिरवी रख सकता था तथा दान में दे सकता था।

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प्रश्न 37.
अकबर ने कौन-सा नया शहर बसाया तथा इसकी भवन निर्माण कला का एक शानदार नमूना बताएं ?
उत्तर-
अकबर ने फतेहपुर सीकरी नामक शहर बसाया। यहां का एक प्रसिद्ध भवन बुलन्द दरवाज़ा है।

प्रश्न 38.
आगरा का लाल किला किसने बनवाया तथा किस बादशाह ने इसका विस्तार किया ?
उत्तर-
आगरा का लाल किला अकबर ने बनवाया तथा शाहजहां ने इसका विस्तार किया।

प्रश्न 39.
हुमायूँ, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां के मकबरे किन स्थानों में हैं ?
उत्तर-
हुमायूँ, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां के मकबरे क्रमशः दिल्ली, सिकन्दरा, लाहौर तथा आगरा में हैं।

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प्रश्न 40.
औरंगजेब ने कौन-सी दो मस्जिदों का निर्माण करवाया ?
उत्तर-
औरंगज़ेब ने दिल्ली के लाल किले में ‘मोती मस्ज़िद’ तथा लाहौर में ‘बादशाही मस्जिद’ का निर्माण करवाया।

प्रश्न 41.
शाहजहां द्वारा बनवाई गई दो सुन्दर इमारतों के नाम बताएं तथा ये कौन-से नगरों में हैं ?
उत्तर-
शाहजहां ने आगरा में ताजमहल तथा दिल्ली में जामा मस्जिद नामक सुन्दर भवन बनवाये।

प्रश्न 42.
कौन-से चार मुग़ल बादशाहों ने चित्रकला का संरक्षण किया ?
उत्तर-
हुमायूँ, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां ने चित्रकला का संरक्षण किया।

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प्रश्न 43.
मुग़ल काल के चार प्रसिद्ध चित्रकारों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुग़ल काल के चार प्रसिद्ध चित्रकार जसवन्त, बसावन, उस्ताद मंसूर तथा अब्दुल समद थे।

प्रश्न 44.
मुग़ल चित्रकला का प्रभाव कौन-सी दो शैलियों पर देखा जा सकता है ?
उत्तर-
मुग़ल चित्रकला का प्रभाव राजपूत शैली और पंजाब की पहाड़ी शैली में देखा जा सकता है।

प्रश्न 45.
कौन-से तीन मुग़ल बादशाहों को संगीत सुनने का शौक था और तानसेन किसके दरबार में था ?
उत्तर-
अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां को संगीत सुनने का चाव था। तानसेन अकबर के दरबार में था।

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प्रश्न 46.
अकबर के समय फ़ारसी के तीन प्रसिद्ध कवियों के नाम बताएं।
उत्तर-
अकबरकालीन फ़ारसी के तीन कवि फैज़ी, उर्फी तथा वज़ीरी थे।

प्रश्न 47.
अकबर के समय के दो इतिहासकारों के नाम तथा उनकी रचनाएं बताएं।
उत्तर-
अकबरकालीन दो इतिहासकार थे-अबुल फजल तथा अब्दुल कादिर। अबुल फज़ल ने अकबर नामा और आइन-ए-अकबरी तथा अब्दुल कादिर ने मुन्तखब-उत्-तवारीख नामक ग्रन्थ लिखे।

प्रश्न 48.
अकबर ने संस्कृत की कौन-सी चार कृतियों का फ़ारसी में अनुवाद करवाया ?
उत्तर-
अकबर ने संस्कृत की चार कृतियों राजतरंगिणी, पंचतन्त्र, महाभारत तथा रामायण का फ़ारसी में अनुवाद करवाया।

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प्रश्न 49.
मुगलकाल में किन आठ प्रादेशिक भाषाओं का साहित्य लिखा गया ?
उत्तर-
मुगलकाल में बंगाली, उड़िया, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी, अवधी, मराठी, ब्रजभाषा आदि आठ प्रादेशिक भाषाओं में साहित्य लिखा गया।

प्रश्न 50.
मुगल राज्य व्यवस्था तथा प्रशासन की जानकारी के स्रोतों के चार प्रकारों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुग़ल राज्य व्यवस्था तथा प्रशासन की जानकारी के चार प्रकार के स्रोत हैं-अबुल फज़ल की ‘आइन-एअकबरी’, तत्कालीन कानूनी दस्तावेज़, बर्नियर का विवरण तथा प्रादेशिक साहित्य।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
‘माहज़र’ से क्या अभिप्राय था और इसका क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
माहज़र एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र था जो अकबर के समय में जारी हुआ। इस घोषणा-पत्र द्वारा अकबर को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त हुए। इस घोषणा-पत्र पर 1579 ई० में उसके राज्य के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों और विद्वानों ने हस्ताक्षर किए। इसके अनुसार अकबर को इमाम-ए-आदिल अर्थात् न्यायशील नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इस घोषणा के अनुसार अकबर को अब यह अधिकार दिया गया कि वह कानून के व्याख्याताओं द्वारा दी गई विभिन्न व्याख्याओं में से अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक को चुन सके और अपनी प्रजा को फतवा दे सके। वह कुरान के अनुकूल लोगों की भलाई के लिए स्वयं आज्ञा जारी कर सकता था। निःसन्देह इस घोषणा ने अकबर के हाथ मज़बूत कर दिये। अब वह मुसलमानों के विभिन्न सम्प्रदायों के साथ-साथ अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा से एक-सा व्यवहार कर सकता था।

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प्रश्न 2.
अकबर के अपने अधीन राजाओं के साथ किस प्रकार के सम्बन्ध थे ?
उत्तर-
अकबर का अपने अधीन राजाओं अर्थात् सामन्तों पर काफ़ी नियन्त्रण था। मुग़ल साम्राज्य के स्थानीय शासक या सामन्त दूसरी शक्तियों से राजनीतिक सन्धि नहीं कर सकते थे। उन्हें राजसिंहासन पर बैठने का अधिकार केवल सम्राट् देता था। सामन्त के लिए आवश्यक था कि वह सम्राट् को वार्षिक खिराज दे। उसे सम्राट की आज्ञा पर आवश्यकता के समय अभियानों के लिए सैनिक टुकड़ियां भेजनी पड़ती थीं। अकबर के राज्य में सामन्तों की संख्या सौ से भी अधिक थी। इनमें अधिकांश सामन्त गैर-मुस्लिम थे। सामन्तों को यह स्वतन्त्रता थी कि वे मुग़ल साम्राज्य में मनसबदार बन सकें। यह पद ‘अधीन शासक’ के पद के अतिरिक्त होता था। इस प्रकार सामन्त और मनसबदार के रूप में अधीन शासकों का मुग़ल साम्राज्य से दोहरा सम्बन्ध स्थापित हो जाता था। इस प्रकार के सम्राट-सामन्त सम्बन्धों से मुगल साम्राज्य को काफ़ी लाभ पहुंचा।

प्रश्न 3.
‘जात और सवार’ मनसबदार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
‘जात और सवार ‘ मनसब का आरम्भ अकबर ने किया था। अकबर को यह पता चला था कि मनसबदार निश्चित संख्या में घुड़सवार नहीं रखते। इसे रोकने के लिए ही उसने दो प्रकार के मनसब बना दिये : जात और सवार। जात के अनुसार मनसबदार का व्यक्तिगत वेतन निश्चित किया जाता था । परन्तु सवार मनसब से उसके घुड़सवारों की गिनती एवं उनके वेतन का पता चलता था। जो मनसबदार कोई घुड़सवार नहीं रखते थे उन्हें केवल जात मनसब ही दिया जाता था। इस प्रकार सिविल और सैनिक अफ़सरों में अन्तर काफ़ी सीमा तक कम हो गया। किसी व्यक्ति को ‘सिविल’ से सैनिक और सैनिक से सिविल सेवाओं में भी लिया जा सकता था। जिन मनसबदारों के पास दोनों पद थे, उन्हें तीन वर्गों में बांटा गया था। पहले वर्ग के सवार तथा जात मनसब समान होते थे : दूसरे वर्ग में वे मनसबदार थे जिनका सवार पब उनके जात मनसब के आधे से अधिक था। जिनका सवार मनसब जात मनसब के आधे से भी कम था, उनकी गणना तीसरे दर्जे के मनसबदारों में होती थी।

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प्रश्न 4.
जागीरदारी प्रणाली में संकट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जागीरदारी प्रणाली मुगलकालीन राज्य व्यवस्था का मुख्य अंग थी। परन्तु अकबर के उत्तराधिकारियों के समय में जागीरों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही चली गई। कहते हैं कि औरंगजेब के समय तक मुग़ल साम्राज्य का 80 प्रतिशत भाग जागीरों में बंटा हुआ था। अतः इस प्रथा में एक संकट सा उत्पन्न हो गया। अब मनसबदारों को जागीर दिए जाने के अनुमति पत्र मिल जाते थे, परन्तु उन्हें जागीर नहीं मिल पाती थी। यदि उन्हें जागीर मिल भी जाती तो उसकी आय उन्हें प्राप्त होने वाले वेतन से बहुत ही कम होती थी। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह बात मुग़ल साम्राज्य के पतन का कारण बनी।

प्रश्न 5.
मुग़ल साम्राज्य की केन्द्रीय सरकार में कौन-से मन्त्री थे और उनके मुख्य कार्य क्या थे ?
उत्तर-
केन्द्रीय सरकार में वकील के अतिरिक्त चार अन्य मुख्य मन्त्री थे। ये थे- दीवान, मीर सामां, मीर बख्शी तथा सदर। वकील का पद सभी मन्त्रियों में उच्च माना जाता था। परन्तु वह किसी भी विभाग का कार्य नहीं करता था। दीवान वित्त विभाग का मुखिया होता था। वह लगान की दर तथा लगान वसूल करने से सम्बन्धित नियम निर्धारित करता था। राज्य की वार्षिक आय-व्यय का हिसाब-किताब भी उसी के पास होता था। सैनिक विभागों के मुखिया को मीर बख्शी कहते थे। वह .सभी सैनिक कार्यों की देख-रेख करता था। वह अपने पास मनसबदारों की नियुक्ति तथा पदोन्नति के रिकार्ड रखता था। मीर सामां सरकारी कारखानों की देखभाल करता था और शाही महल की प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। न्याय एवं धर्मार्थ विभाग के मुखिया को सदर कहते थे। वह सूफियों तथा अन्य धार्मिक पुरुषों को नकदी अथवा कर मुक्त भूमि के रूप में आवश्यक सहायता देता था।

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प्रश्न 6.
मुग़लों के स्थानीय प्रशासन के मुख्य अधिकारी कौन-से थे और उनके कार्य क्या थे ?
उत्तर-
प्रत्येक प्रान्त का मुखिया एक सूबेदार होता था। प्रान्त सरकारों तथा परगनों में विभक्त था। प्रत्येक सरकार में एक फ़ौजदार था। उसकी सहायता थानेदार करते थे। फ़ौजदारों तथा थानेदारों का काम शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखना था। राजस्व की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई परगना थी जिसका मुख्य अधिकारी आमिल था। परगने में कानूनगो का पद भी बड़ा महत्त्वपूर्ण था। वह भूमि और लगान से सम्बन्धित सभी रिकार्ड रखता था। किसी-किसी प्रान्त में परगना तप्पों में बंटा होता था, जिनमें कई गाँव होते थे। प्रत्येक परगना या तप्पे में एक चौधरी होता था। वह सरकारी कर्मचारियों और कृषकों के बीच सम्पर्क सूत्र था। प्रत्येक गांव में कम-से-कम एक मुकद्दम या गांव का मुखिया होता था। उसका काम लगान की वसूली में चौधरी और अन्य कर्मचारियों की सहायता करना था। गांव से सम्बन्धित भूमि के रिकार्ड को रखने वाला कर्मचारी पटवारी कहलाता था।

प्रश्न 7.
जब्ती-व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
ज़ब्ती-व्यवस्था लगान उगाहने की एक व्यवस्था थी। अकबर ने यह व्यवस्था कई अनुभवों के बाद लागू की। इस व्यवस्था के अन्तर्गत सारी कृषि योग्य भूमि को पहले नापा गया। इस नाप के लिए एक निश्चित लम्बाई का माप या गज़ प्रयोग में लाया गया। उसे इलाही गज़ कहते थे। नाप के लिए रस्सी के स्थान पर बांस के टुकड़ों का प्रयोग किया गया क्योंकि रस्सी सूखने या गीली होने पर कम या अधिक नाप देती थी। पैमाइश के बाद भूमि को तीन भागों में बांट कर उनकी प्रति बीघा औसत उपज निकाली गई। इस औसत उत्पादन का तीसरा भाग सरकार का भाग अथवा लगान निर्धारित किया गया । इस के पश्चात् दस वर्षों की कीमतों का मध्यमान निकाल कर लगान की मात्रा नकद निश्चित की गई। अतः प्रत्येक फसल का प्रति बीघा लगान दामों में भी निश्चित किया गया। यह व्यवस्था साम्राज्य के अधिकांश भाग में लागू थी।

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प्रश्न 8.
मुग़ल शासक किस प्रकार के प्रजा हितार्थ कार्य करते थे और किस प्रकार का संरक्षण प्रदान करते थे ?
उत्तर-
मुग़ल सम्राट् प्रजा हितकारी थे और वे सरकारी आय का कुछ भाग जनकल्याण तथा धमार्थ कार्यों पर व्यय करते थे। यात्रियों की सुविधा के लिए सरकार पुल और सड़के बनवाती थी। लोगों के लिए अस्पताल और सराएं भी बनवाई जाती थीं। इनका प्रयोग सरकारी कार्यों के लिए भी होता था। मुगल शासक मस्जिदों, मदरसों, सूफ़ी सन्तों तथा धार्मिक पुरुषों को संरक्षण देते थे। लोक कल्याण पर व्यय होने वाली राशि का अधिकतर भाग इन्हीं पर खर्च किया जाता था। इन्हें व्यय के लिए सरकार की ओर से कर मुक्त भूमि दे दी जाती थी। कुछ गैर-मुस्लिम संस्थाओं को भी यह सहायता मिलती थी। इनमें वैष्णव, जोगी, सिक्ख तथा पारसी संस्थाएं शामिल थीं। औरंगज़ेब ने कर मुक्त भूमि प्राप्त लोगों को भूमि का स्वामी घोषित कर दिया था। इस प्रकार का भूमि स्वामी अब अपनी भूमि को बेचने या गिरवी रखने में स्वतन्त्र थे।

प्रश्न 9.
मुगलों की भवन निर्माण कला (Architecture) में क्या देन है ?
उत्तर-
मुग़ल काल में वास्तुकला ने बड़ी उन्नति की। मुग़ल शासकों ने अनेक भव्य महलों, दुर्गों तथा मस्जिदों का निमार्ण करवाया और बहते हुए पानी से सुसज्जित अनेक बाग लगवाये। भवन-निर्माण में सबसे पहले अकबर ने रुचि दिखाई। उसने फतेहपुर सीकरी में बुलन्द दरवाज़ा और जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। उसने आगरे का किला तथा लाहौर में भी एक दुर्ग बनवाया। अकबर के बाद शाहजहाँ ने भवन-निर्माण में रुचि ली। उसका सबसे सुन्दर भवन आगरा का ‘ताजमहल’ है। उसने दिल्ली में लाल किला और जामा मस्जिद का निर्माण भी करवाया । उसकी एक अन्य प्रसिद्ध कृति एक करोड़ की लागत से बना ‘तख्ते ताऊस’ है। उसके बाद मुग़ल काल में भवन निर्माण कला का विकास रुक गया।

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प्रश्न 10.
मुगलकाल में चित्रकला के क्षेत्र में क्या उन्नति हुई ?
उत्तर-
मुग़ल काल में चित्रकला के क्षेत्र में असाधारण उन्नति हुई। अब्दुल समद, सैय्यद अली, सांवलदास, जगन्नाथ, ताराचन्द आदि चित्रकारों ने अपनी कलाकृतियों से चित्रकला का रूप निखारा। ये सभी चित्रकार अकबर के समय के प्रसिद्ध कलाकार थे। अकबर के बाद जहांगीर ने भी कला के विकास में रुचि ली। चित्रकला में उसकी इतनी रुचि थी कि वह चित्र को देखकर उसे बनाने वाले चित्रकार का नाम बता दिया करता था। उसके दरबार में भी आगा रजा, अब्दुल हसन, मुहम्मद नादिर, मुहम्मद मुराद आदि अनेक चित्रकार थे। जहांगीर की मृत्यु के बाद केवल राजकुमार दारा शिकोह ने ही चित्रकला के विकास में थोड़ा बहुत योगदान दिया। उसके प्रयत्नों से फकीर-उल्ला, मीर हाशिम आदि चित्रकार शाहजहां के दरबार की शोभा बने। औरंगजेब के काल में चित्रकला का विकास काफ़ी सीमा तक रुक गया।

प्रश्न 11.
मुगलकाल में साहित्यिक विकास का वर्णन करो।
उत्तर-
मुग़ल काल में साहित्य के क्षेत्र में खूब विकास हुआ। बाबर और हुमायूं साहित्य प्रेमी सम्राट् थे। बाबर स्वयं अरबी तथा फ़ारसी का बहुत बड़ा विद्वान् था। उसने ‘तुजके बाबरी’ नामक ग्रन्थ की रचना की जिसे तुर्की साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। हुमायूं ने इस ग्रन्थ का अरबी भाषा में अनुवाद करवाया । उसके काल में लिखी गई पुस्तकों में ‘हुमायूंनामा’ प्रमुख है। सम्राट अकबर को भी विद्या से बड़ा लगाव था। उसके समय में लिखे गए ग्रन्थों में ‘अकबरनामा’ ‘तबकाते अकबरी’ ‘सूर सागर’ तथा ‘रामचरितमानस’ प्रमुख हैं। जायसी की ‘पद्मावत’ तथा केशव की रामचन्द्रिका की रचना भी इसी काल में हुई थी। जहांगीर ने भी साहित्य को काफ़ी प्रोत्साहन दिया। अनेक विद्वान् उसके दरबार की शोभा थे। वह स्वयं भी एक उच्चकोटि का विद्वान् था। उसने आत्मकथा लिखी थी। शाहजहां के समय अब्दुल हमीद लाहौरी एक प्रसिद्ध विद्वान् था। उसने ‘बादशाह नामा’ ग्रन्थ की रचना की थी । औरंगजेब के काल में साहित्य का विकास रुक गया।

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IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अकबर अथवा मुगलों के केन्द्रीय प्रशासन के ढांचे का वर्णन करो।
उत्तर-
अकबर एक उच्चकोटि का प्रशासक था। उसने केन्द्र को अधिक से अधिक मजबूत बनाने का प्रयास किया। उसके द्वारा प्रचलित शासन प्रणाली पूरे मुगलकाल तक जारी रही। संक्षेप में, अकबर अथवा मुगलों के केन्द्रीय प्रशासन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन निम्न प्रकार है :-

1 सम्राट-अकबर के काल में सम्राट् शासन का केन्द्र बिन्दु था। शासन की सारी शक्तियां उसी के हाथ में थीं। उसकी शक्तियों पर किसी प्रकार की कोई रोक नहीं थी। फिर भी सम्राट् अन्यायी तथा अत्याचारी तानाशाह के रूप में कार्य नहीं करता था। मुल्लाओं और मौलवियों का भी उस पर कोई प्रभाव नहीं था। वह अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि समझता था।

2 मन्त्रिपरिषद्-शासन कार्यों में सम्राट् की सहायता के लिए मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था थी। मन्त्रियों के अधिकार आज के मन्त्रियों की भान्ति अधिक विस्तृत नहीं थे। वे सम्राट की आज्ञा अनुसार काम करते थे। अतः उन्हें सम्राट का सचिव कहना अधिक उचित है। प्रधानमन्त्री का पद अन्य मन्त्रियों से ऊंचा था। सभी गम्भीर विषयों पर सम्राट् उससे सलाह लेता था। सभी मन्त्री सम्राट के प्रतिऊत्तरदायी थे। वे अपने पद पर उसी समय तक कार्य कर सकते थे जब तक सम्राट् उनसे प्रसन्न रहता था।

प्रमुख मन्त्रियों तथा उनके विभागों का वर्णन इस प्रकार है :-

  • वकील या वजीर-वह प्रधानमन्त्री के रूप में कार्य करता था। वह सम्राट को प्रत्येक विषय में परामर्श देता था।
  • दीवान-वह आय-व्यय का हिसाब-किताब रखता था। उसके हस्ताक्षर के बिना किसी रकम का भुगतान सम्भव नहीं था।
  • मीर बख्शी-उसका कार्य सैनिक तथा असैनिक कर्मचारियों को वेतन देना था।
  • मुख्य सदर-धर्म सम्बन्धी सभी कार्य सम्पन्न करना उसका मुख्य कर्त्तव्य था।
  • खान-ए-सामां-वह सम्राट और उसके परिवार के लिए आवश्यक सामान की व्यवस्था करता था।
  • मुख्य काजी-मुख्य काजी न्याय-सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करता था। सम्राट के बाद वही सबसे बड़ा न्यायाधीश था।
  • अन्य मन्त्री-उपर्युक्त मन्त्रियों के अतिरिक्त जंगलों का प्रबन्ध, डाक कार्यों, तोपखाने के प्रबन्ध आदि के लिए अलग मन्त्री होते थे। तोपखाने के मुखिया को मीर आतिश के नाम से पुकारा जाता था।

प्रश्न 2
अकबर के शासनकाल में प्रान्तीय प्रशासन का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मुग़ल साम्राज्य बहुत विस्तृत था। प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखते हुए मुग़लों ने अपने राज्य को कई प्रान्तों में बांट रखा था। अकबर के समय में इन प्रान्तों की संख्या 15 थी। प्रान्तीय शासन का आधार केन्द्रीय शासन था। प्रान्त में एक सिपहसालार अथवा नाज़िम, एत दीवान, एक बख्शी, काजी, वाकयानवीस तथा कोतवाल आदि अधिकारी होते थे। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है

1. सिपहसालार अथवा नाजिम-प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार होता था। उसकी नियुक्ति स्वयं सम्राट् द्वारा की जाती थी तथा अपने कार्यों के लिए वह केवल सम्राट के प्रति उत्तरदायी होता था। उसके कर्तव्य निम्न प्रकार थे-

  • वह अपने प्रान्त में न्याय तथा व्यवस्था का प्रबन्ध करता था।
  • यदि कोई जागीरदार अथवा अधिकारी उसकी आज्ञा की अवहेलना करता, तो वह उसे दण्ड दे सकता था।
  • वह अपने प्रान्त के लोगों के मुकद्दमों का निर्णय करता था।
  • अपने प्रान्त की प्रजा की सुविधा के लिए वह अस्पताल, सड़कें, बाग, कुएं आदि बनवाता था।
  • भूमि कर एकत्रित करने में वह दीवान-ए-आमिल तथा अन्य अधिकारियों की सहायता करता था।
  • सूबे के सैनिकों में अनुशासन बनाए रखना उसी का कर्तव्य था
  • वह इस बात का ध्यान रखता था कि प्रान्त का व्यय उसकी आय से बढ़ने न पाए।

2. प्रान्तीय दीवान-प्रान्त में सिपहसालार के बाद प्रान्तीय दीवान का नम्बर आता था। यह प्रान्त के वित्त विभाग का मुखिया था। उसकी नियुक्ति सम्राट केन्द्रीय दीवान की सिफ़ारिश से करता था। वह प्रान्त की आय-व्यय का हिसाब रखता था। माल विभाग के कर्मचारियों की निगरानी करना भी उसी का कर्त्तव्य था। वह परगनों से भूमिकर एकत्रित करता था। मास में दो बार वह केन्द्रीय दीवान को कृषकों की अवस्था के बारे में तथा एकत्रित किए हुए धन के बारे में सूचित करता था।

3. बख्शी-सम्राट् मीर बख्शी की सिफ़ारिश पर प्रान्तीय बख्शी को नियुक्ति करता था। वह प्रान्त में सेना की भर्ती करता था तथा घोड़ों को दागने का प्रबन्ध करता था। सैनिकों की पदोन्नति तथा तबदीली करवाना और उनमें अनुशासन बनाए रखना बख्शी का ही कार्य था। वह खज़ाना अधिकारी के रूप में वेतन देने का भी कार्य करता था।

4. सदर तथा काजी-प्रत्येक प्रान्त में एक सदर होता था। उसकी नियुक्ति सम्राट् मुख्य सदर की सिफ़ारिश पर करता था। वह प्रान्त के महात्माओं तथा पीर-फकीरों की सूचियां तैयार करता था तथा उन्हें अनुदान एवं छात्र-वृत्तियां दिलवाता था। धमार्थ दी गई भूमि का प्रबंध करना और उससे सम्बन्धित झगड़ों का निपटारा करना सदर का कार्य होता था। प्रान्तीय काजी प्रान्त का न्यायाधीश होता था। वह फौजदारी मुकद्दमों का निर्णय करता था।

5. वाकयानवीस-वाकयानवीस प्रान्त के गुप्तचर विभाग का मुखिया होता था। गुप्तचरों के माध्यम से वह सम्राट को प्रान्त के अधिकारियों के कार्यों के बारे में गुप्त सूचनाएं भेजता था।

6. कोतवाल-प्रान्त के बड़े-बड़े नगरों में कोतवाल की नियुक्ति की जाती थी। वह नगर में शान्ति तथा व्यवस्था का प्रबन्ध करता था। वह वेश्याओं, शराब तथा मादक वस्तुओं को बेचने वालों पर कड़ी निगरानी रखता था। वह विदेशियों की देख-रेख भी करता था। कब्रिस्तान तथा श्मशान की भूमि का ठीक प्रबन्ध करना भी उसी का कर्तव्य था।

सच तो यह है कि मुग़लों का प्रान्तीय शासन-प्रबन्ध काफ़ी कुशल था। इसमें वे सभी विशेषताएं विद्यमान् थीं जिनके कारण पूरे प्रान्त में सुव्यवस्था बनी रहे और प्रान्त केन्द्र के नियन्त्रण में रहें।

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प्रश्न 3.
मनसबदारी प्रथा से क्या अभिप्राय है ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
‘मनसब’ अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ ‘पदवी’ अथवा ‘स्थान निश्चित करना’ है, परन्तु मुगलकाल में मनसबदार से अभिप्राय उस सैनिक अथवा नागरिक कर्मचारी से लिया जाता था जो प्रशासन चलाने में सम्राट की सहायता करता था। इर्विन के अनुसार ‘मनसबदार’ मुग़ल अधिकारी का पद होता था। यह पद उस अधिकारी का राज्य में दर्जा, वेतन तथा उसका शाही दरबार में स्थान निर्धारित करता था। प्रत्येक मनसबदार को अपने मनसब के अनुसार घुड़सवार, हाथी, ऊंट, खच्चर, छकड़े आदि रखने पड़ते थे, परन्तु एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि मनसबदार को अपने मनसब की संख्या के अनुसार घुड़सवार तथा अन्य साधन रखने का अधिकार नहीं था। वह उसका केवल एक निश्चित भाग ही रखता था। यह भाग राज्य की ओर से निश्चित किया जाता था। मनसब न केवल सैनिक अधिकारियों की ही दी जाती थी बल्कि असैनिक अधिकारियों को भी सौंपी जाती थी। मनसबदारों के अतिरिक्त अमीरों की और कोई भी श्रेणी नहीं थी।

मनसबदारी प्रथा की विशेषताएं-

1. मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति तथा पद-मुक्ति-मनसबदारों की नियुक्ति स्वयं सम्राट् करता था। उनकी नियुक्ति योग्यता के आधार पर की जाती थी। भर्ती होने वाले व्यक्ति को मीर बख्शी के पास ले जाया जाता था। वह उसे सम्राट के सम्मुख पेश करता था और सम्राट् उसकी सलाह से प्रस्तुत होने वाले व्यक्ति को मनसबदार नियुक्त कर देता था। नियुक्ति होने पर उसका नाम सरकारी रजिस्टरों में दर्ज कर लिया जाता था। मनसबदारों की पदोन्नति भी सम्राट की इच्छा पर निर्भर होती थी। सम्राट् जब चाहे किसी भी मनसबदार को पद से मुक्त कर सकता था।

2. मनसबदारों की श्रेणियां-अकबर के समय में सबसे छोटा मनसबदार दस तथा सबसे बड़ा मनसबदार दस हज़ार सैनिक अपने पास रखता था। परन्तु आगे चल कर यह संख्या बीस हज़ार हो गई थी। पांच हज़ार से ऊपर की मनसब केवल राजकुमारों को अथवा उच्च कोटि के सरदारों को ही सौंपी जाती थी। राजकुमारों को छोड़कर मुगल साम्राज्य में पांच हजार या उससे अधिक सैनिकों वाले मनसबदार को ‘अमीर-उल-उमरा’ कहा जाता था। 3,000 से 4,000 वाले मनसबदार को ‘उमरा-ए-कुबर’ तथा 1,000 से 2,500 को ‘उमरा’ कहा जाता था। 20 से 1,000 मनसब वाले को केवल ‘मनसबदार’ कहा जाता था। छोटे सरकारी कर्मचारियों को मनसबदार की बजाय ऐजिनदार कहते थे।

3. मनसबदारों के पद-अकबर ने अपने शासन काल के अन्तिम वर्षों में 5,000 से नीचे के मनसबों के लिए ‘जात’ और ‘सवार’ नामक दो पद जारी किए। ये पद केवल 300 अथवा इससे ऊंचे ‘मनसब’ को दे दिए जाते थे। उदाहरण के लिए 300 सवार तथा 750 ‘जात’ परन्तु इन दोनों पदों के महत्त्व के विषय में इतिहासकारों में मतभेद पाया जाता है। ब्लैकमैन के अनुसार ‘जात से अभिप्राय सैनिकों की उस निश्चित संख्या से था जो मनसबदारों को अपने यहां रखनी पड़ती थी जबकि ‘सवार से तात्पर्य केवल घुड़सवारों की निश्चित संख्या से था। इसके विपरीत इर्विन का मत है कि ‘जात’ पद किसी मनसबदार के घुड़सवारों की वास्तविक संख्या प्रकट करता था, परन्तु ‘सवार’ एक प्रतिष्ठा का पद था जो जात द्वारा सूचित घुड़सवारों की संख्या से कुछ अधिक संख्या का परिचय देता था।

4. मनसबदारों के वेतन-मनसबदारों का वेतन उनकी श्रेणियों पर निर्भर करता था । निम्नलिखित तालिका से हमें कुछ मनसबदारों के वेतन का पता चल सकता है :-
PSEB 11th Class History Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध 1
इस वेतन में से मनसबदारों को अपने अधीन घुड़सवारों तथा घोड़ों का खर्च भी उठाना पड़ता था और सम्राट को कई प्रकार की भेटें देनी पड़ती थीं।

प्रश्न 4.
मनसबदारी प्रथा के गुण-दोषों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मनसबदारी प्रथा के गुण :

  • इस प्रथा से जागीरदारी प्रथा समाप्त हो गई और विद्रोह का भय जाता रहा । अब प्रत्येक मनसबदार को वेतन लेने के लिए सम्राट् पर निर्भर रहना पड़ता था । इसके अतिरिक्त मनसबदारों पर सम्राट का पूरा नियन्त्रण होता था । उन्हें अपने सैनिकों तथा घोड़ों को उपस्थित करने के लिए किसी भी समय कहा जा सकता था । इस प्रकार सम्राट के विरुद्ध विद्रोह की सम्भावनाएं कम हो गईं ।
  • इस प्रथा में सभी पद योग्यता के आधार पर ही दिए जाते थे । अयोग्य होने पर मनसबदारों को पदमुक्त कर दिया जाता था। इस प्रकार योग्य तथा सफल अधिकारियों के नियुक्त होने से राज्य के सभी कार्य सुचारु रूप से चलने लगे ।
  • इससे सरकार जगीरदारों को बड़ी-बड़ी जगीरें देने के कारण होने वाली आर्थिक हानि से बच गई ।
  • ज़ब्ती प्रथा के अनुसार मृत्यु के पश्चात् मनसबदारों की सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाती थी । इससे सरकार की आय में काफ़ी वृद्धि हुई ।

मनसबदारी प्रथा के दोष :-

(i) मनसबदारी प्रथा का सबसे बड़ा दोष यह था कि मनसबदार सदैव सरकार को धोखा देने की चेष्टा में रहते थे । वे घुड़सवारों की निश्चित संख्या से बहुत कम घुड़सवार अपने पास रखते थे, परन्तु सरकार से वे पूरा वेतन प्राप्त करते थे । इस भ्रष्टाचार का अन्त करने के लिए घोड़ों को दागने तथा सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा अवश्य जारी की गई, परन्तु इससे कोई विशेष लाभ न हुआ ।

(ii) मनसबदारों को भारी वेतन दिया जाता था । इस प्रकार सरकार के काफ़ी धन का अपव्यय हो जाता था । दूसरी ओर मनसबदार अधिक समृद्ध हो जाने के कारण अपने कर्तव्य का ठीक प्रकार से पालन नहीं करते थे और विलासिता में अपने धन को नष्ट करते रहते थे ।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध

प्रश्न 5.
मुग़लों के अधीन भारत में वास्तुकला के विकास का विवरण दीजिए ।
अथवा
वास्तुकला के विकास में अकबर, जहांगीर तथा शाहजहाँ के योगदान की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
मुग़ल काल में एक लम्बे समय के पश्चात् देश में शान्ति स्थापित हुई । शान्ति के कारण देश समृद्ध बना । राज्य के खजाने भर गए । ऐसे वातावरण में जनता में अनेक कलाकार पैदा हुए । सम्राटों ने कलाकारों को दरबार में आदरणीय स्थान दिया । फलस्वरूप देश में सभी प्रकार की कलाओं में नया निखार आया । कलाकारों ने धरती के सीने को भवनों से सजा दिया । संक्षेप में, इस काल में हुए वास्तुकला के विकास का वर्णन इस प्रकार है :-

1. बाबर के काल में-बाबर को भवन बनवाने का बड़ा चाव था । उसने आगरा, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर, अलीगढ़ में भवनों का निर्माण करने के लिए सैंकड़ों कारीगर लगाए थे । परन्तु उसके द्वारा बनाए हुए अधिकतर भवन अब नष्ट हो चुके हैं । इस समय उसके द्वारा बनाए गए केवल दो भवन विद्यमान हैं-एक मस्जिद पानीपत में है और दूसरी मस्जिद रुहेलखण्ड के सम्भल नगर में है।

2. हुमायूं के काल में-हुमायूं का अधिकतर समय युद्धों में गुज़रा । इसलिए वह कलाओं के विकास की ओर विशेष ध्यान न दे सका। फिर भी उसने कुछ मस्जिदों का निर्माण करवाया । उसमें एक मस्जिद फतेहाबाद (हरियाणा) में है ।

3. अकबर के काल में-अकबर ने भी भवन-निर्माण कला को काफ़ी विकसित किया । उसके भवनों में फ़ारसी तथा भारतीय शैलियों का मिश्रण पाया जाता है । आगरा के दुर्ग में जहांगीर महल’ तथा सीकरी की बहुत-सी इमारतों को देखने से ऐसा जान पड़ता है मानो इन्हें किसी राजपूत राजकुमार ने बनवाया हो । अकबर के शासनकाल के प्रथम वर्षों में दिल्ली में हुमायूं का मकबरा बना । अकबर द्वारा बनवाए नए फतेहपुर सीकरी के भवनों में जोधाबाई का महल बहुत सुन्दर है । 1576 ई० में उसने गुजरात विजय की खुशी में बुलन्द दरवाज़े का निर्माण करवाया । सीकरी में स्थित दीवान-ए-खास’ अकबर के कला-प्रेम का एक उत्तम नमूना है । अकबर द्वारा बना गया ‘पंच महल’ तथा ‘जामा मस्जिद’ भी देखने योग्य हैं ।

4. जहांगीर के काल में-जहांगीर को भवन निर्माण कला से विशेष प्रेम नहीं था । फिर भी उसके समय के दो भवन सिकन्दरा में ‘अकबर का मकबरा’ तथा आगरा में ‘एतमाद-उद्धौला का मकबरा’ कला की दृष्टि से काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं ।

5. शाहजहां के काल में-मुगल सम्राटों में शाहजहां को कला के क्षेत्र में विशेष स्थान प्राप्त है । उसने बहुत-से भवनों का निर्माण करवाया । उसकी सबसे सुन्दर इमारत ‘ताजमहल’ है । इसकी शोभा देखने वालों को चकाचौंध कर देती है । उसने दिल्ली का लाल किला बनवाया । इसमें बने ‘दीवान-ए-खास’ तथा ‘दीवान-ए-आम’ विशेष रूप से देखने योग्य हैं । शाहजहां ने आगरा के दुर्ग में मोती मस्जिद बनवाई जो भवन-निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है । शाहजहां ने एक करोड़ रुपये की लागत से ‘तख्त-ए-ताऊस’ को भी बनवाया ।

6. औरंगजेब के काल में-औरंगजेब के काल में भवन-निर्माण कला का विकास लगभग रुक गया । उसके समय में दिल्ली दुर्ग की मस्ज़िद, लाहौर की मस्ज़िद आदि कुछ इमारतों का निर्माण अवश्य हुआ, परन्तु ये सभी कला की दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं रखतीं। – औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद साम्राज्य में अराजकता फैल गई । फलस्वरूप बाद के मुग़ल सम्राटों को इस ओर ध्यान देने का अवसर ही न मिल सका ।

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न.

PSEB 10th Class Social Science Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

(1)

राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाते समय वस्तुओं तथा सेवाओं को उनकी कीमतों से गुणा किया जाता है। यदि राष्ट्रीय उत्पाद की मात्रा को चालू कीमतों से गुणा किया जाता है तो उसे चालू कीमतों पर राष्ट्रीय आय या मौद्रिक आय कहा जाता है। इसके विपरीत यदि राष्ट्रीय उत्पादन की मात्रा को किसी अन्य वर्ष (जिसे आधार वर्ष भी कहते हैं) की कीमतों से गुणा किया जाए तो जो परिणाम प्राप्त होगा उसे स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय या वास्तविक राष्ट्रीय आय कहा जाता है। कीमतों में प्राय: परिवर्तन होता रहता है। इसके फलस्वरूप वस्तुओं तथा सेवाओं की मात्रा में बिना कोई परिवर्तन हुए राष्ट्रीय आय कम या अधिक हो सकती है। एक देश की वास्तविक आर्थिक प्रगति का अनुमान लगाने के लिए विभिन्न वर्षों की राष्ट्रीय आय एक विशेष वर्ष के कीमत स्तर पर मापी जानी चाहिए। कीमतें स्थिर रहने पर वास्तविक आय में होने वाले परिवर्तन केवल वस्तुओं तथा सेवाओं में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप उत्पन्न होंगे।
(a) राष्ट्रीय आय से क्या अभिप्राय है?
(b) सकल राष्ट्रीय आय तथा शुद्ध राष्ट्रीय आय में क्या अंतर है?
उत्तर –
(a) राष्ट्रीय आय एक देश के सामान्य निवासियों की एक वर्ष में मजदूरी, ब्याज, लगान तथा लाभ के रूप में साधन आय है। यह घरेलू साधन आय और विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय का योग है।
(b) एक देश की राष्ट्रीय आय में यदि घिसावट व्यय शामिल रहता है तो उसे सकल राष्ट्रीय आय कहा जाता है। जबकि इसके विपरीत यदि राष्ट्रीय आय में घिसावट व्यय को घटा दिया जाता है तो उसे शुद्ध राष्ट्रीय आय कहा जाता हैं। अर्थात,
राष्ट्रीय आय + घिसावट व्यय = सकल राष्ट्रीय आय
राष्ट्रीय आय – घिसावट व्यय = शुद्ध राष्ट्रीय आय
‘सकल’ शब्द का प्रयोग शुद्ध शब्द की तुलना में विस्तृत अर्थों में किया जाता है।

(2)

उपभोग शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है; एक तो क्रिया के रूप में तथा दूसरे व्यय के रूप में। क्रिया के रूप में उपभोग वह क्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष संतुष्टि होती है जैसे प्यास बुझाने के लिए पानी का प्रयोग करना या भूख की संतुष्टि के लिए रोटी का प्रयोग करना। अतएव उपभोग वह क्रिया है जिसके द्वारा कोई मनुष्य अपनी आवश्यकता की संतुष्टि के लिए किसी वस्तु की उपयोगिता का प्रयोग करता है। व्यय के रूप में उपभोग से अभिप्राय उस कुल खर्चे से है जो उपभोग वस्तुओं पर किया जाता है।
राष्ट्रीय आय में से लोग अपनी आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष संतुष्टि के लिए वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए मुद्रा की जो राशि खर्च करते हैं उसे उपभोग या कुल उपभोग व्यय कहते हैं।
(a) उपभोग किसे कहते हैं? इसे प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-से हैं?
(b) उपभोग प्रवृत्ति क्या है? यह कितने प्रकार की होती है?
उत्तर-
(a) उपभोग से अभिप्राय किसी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष की अवधि में उपभोग पर किए जाने वाले कुल व्यय से लिया जाता है।
उपभोग पर कई तत्त्वों जैसे वस्तु की कीमत, आय, फैशन आदि का प्रभाव पड़ता है। परन्तु उपभोग पर सबसे अधिक प्रभाव आय का पड़ता है। साधारणतया आय के बढ़ने से उपभोग बढ़ता है। परन्तु उपभोग में होने वाली वृद्धि आय में होने वाली वृद्धि की तुलना में कम होती है।
(b) आय के विभिन्न स्तरों पर उपभोग की विभिन्न मात्राओं को प्रकट करने वाली अनुसूची को उपयोग प्रवृत्ति कहा जाता है।
PSEB 10th Class Economics Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न 1

  1. औसत उपभोग प्रवृत्ति (Average Propensity to Consume) — कुल व्यय तथा कुल आय के अनुपात को औसत उपभोग प्रवृत्ति कहा जाता है। इससे मालूम होता है कि लोग अपनी कुल आय का कितना भाग उपभोग पर खर्च करेंगे तथा कितना भाग बचाएंगे। इसे ज्ञात करने के लिए उपभोग को आय से भाग कर दिया जाता है अर्थात
    PSEB 10th Class Economics Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न 2
  2. सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume) — आय में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरूप उपभोग में होने वाले परिवर्तन के अनुपात को सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति कहते हैं।
    PSEB 10th Class Economics Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न 3

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(3)

सार्वजनिक वित्त दो शब्दों से मिलकर बना है: सार्वजनिक + वित्त। सार्वजनिक शब्द का अर्थ है जनता का समूह जिसका प्रतिनिधित्व सरकार करती है और वित्त का अर्थ है मौद्रिक साधन। अतएव सार्वजनिक वित्त से अभिप्राय किसी देश की सरकार के वित्तीय साधनों अर्थात् आय और व्यय से है। अर्थशास्त्र के जिस भाग में सरकार की आय तथा व्यय संबंधी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है उसे सार्वजनिक वित्त कहा जाता है। अतएव सार्वजनिक वित्त राजकीय संस्थानों जैसे केन्द्रीय, राज्य या स्थानीय सरकारों के मामलों का अध्ययन है। सार्वजनिक वित्त में सरकार की आय अर्थात् कर, ब्याज, लाभ आदि शामिल होते हैं। सार्वजनिक व्यय जैसे सुरक्षा, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योगों, कृषि आदि पर किया गया व्यय तथा सार्वजनिक ऋण का अध्ययन किया जाता है। समय के साथ-साथ प्रत्येक देश की सरकार के द्वारा की जाने वाली आर्थिक क्रियाओं में बहुत अधिक वृद्धि हो गई है। इसके साथ-साथ सार्वजनिक वित्त का क्षेत्र भी बहुत अधिक विस्तृत हो गया है। इसके अन्तर्गत केवल राज्य की आय और व्यय का अध्ययन ही नहीं किया जाता बल्कि विशेष आर्थिक उद्देश्यों जैसे पूर्ण रोजगार, आर्थिक विकास, आय तथा धन का समान वितरण, कीमत स्थिरता आदि से संबंधित सरकार की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन भी किया जाता है।
(a) सरकार की आय के मुख्य साधन क्या हैं?
(b) सार्वजनिक वित्त के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
(a) सरकार की आय का मुख्य साधन कर (Tax) है। कर दो प्रकार का होता है।

  1. प्रत्यक्ष कर (Direct Taxes) — प्रत्यक्ष कर वह कर होता है जो उसी व्यक्ति द्वारा पूर्ण रूप से दिया जाता है जिस पर कर लगाया जाता है। उदाहरण के लिए आय कर, उपहार कर, निगम कर, सम्पत्ति कर आदि प्रत्यक्ष कर हैं।
  2. अप्रत्यक्ष कर (Indirect Taxes) — अप्रत्यक्ष कर वह कर होता है जिन्हें सरकार को एक व्यक्ति देता है तथा इनका भार दूसरे व्यक्ति को उठाना पड़ता है। अप्रत्यक्ष कर की परिभाषा उन करों के रूप में की जाती है जो वस्तुओं तथा सेवाओं पर लगाए जाते हैं, अतः लोगों पर यह अप्रत्यक्ष रूप से लगाए जाते हैं। बिक्री कर, उत्पादन कर, मनोरंजन कर, आयात-निर्यात कर अप्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं।

(b) सार्वजनिक वित्त के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं:

  1. आय तथा सम्पत्ति का पुनः वितरण (Redistribution of Income and Wealth) — सार्वजनिक वित्त से सरकार कराधान तथा आर्थिक सहायता से आय और सम्पत्ति के बंटवारे में सुधार लाने हेतु प्रयासरत रहती है। संपत्ति और आय का समान वितरण सामाजिक न्याय का प्रतीक है जो कि भारत जैसे किसी भी कल्याणकारी राज्य का मुख्य उद्देश्य होता है।
  2. साधनों का पुनः आबंटन (Reallocation of Resources) — निजी उद्यमी सदैव यही आशा करते हैं कि साधनों का आबंटन उत्पाद के उन क्षेत्रों में किया जाए जहां ऊंचे लाभ प्राप्त होने की आशा हो। किन्तु यह भी संभव है कि उत्पादन के कुछ क्षेत्रों (जैसे शराब का उत्पादन) द्वारा सामाजिक कल्याण में कोई वृद्धि न हो। अपनी बजट संबंधी नीति द्वारा देश की सरकार साधनों का आबंटन इस प्रकार करती है जिससे अधिकतम लाभ तथा सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकें। उन वस्तुओं (जैसे शराब, सिगरेट) के उत्पादन पर भारी कर लगाकर उनके उत्पादन को निरुत्साहित किया जा सकता है। इसके विपरीत ‘सामाजिक उपयोगिता वाली वस्तुओं’ (जैसे ‘खादी’) के उत्पादन को आर्थिक सहायता देकर प्रोत्साहित किया जाता है।
  3. आर्थिक स्थिरता (Economic Stability) — बाज़ार शक्तियों (मांग तथा पूर्ति की शक्तियों) की स्वतन्त्र क्रियाशीलता के फलस्वरूप व्यापार चक्रों का समय-समय पर आना अनिवार्य होता है। अर्थव्यवस्था में तेजी और मंदी के चक्र चलते हैं। सरकार अर्थव्यवस्था को इन व्यापार चक्रों से मुक्त रखने के लिए सदैव वचनबद्ध होती है। बजट सरकार के हाथ में एक महत्त्वपूर्ण नीति अस्त्र है जिसके प्रयोग द्वारा वह अवस्फीति तथा मुद्रा स्फीति की स्थितियों का मुकाबला करती है।

(4)

प्रत्येक अल्पविकसित देश में उद्योगों, कृषि आदि अन्य क्षेत्रों का विकास तभी संभव हो सकता है, जब आधारिक संरचना पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों। आधारिक संरचना के अभाव में उद्योगों, कृषि आदि क्षेत्रों के विकास में रुकावटें उत्पन्न हो जाती हैं तथा उनकी वृद्धि दर कम हो जाती है। उदाहरण के लिए हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं कि भारत में बिजली की कमी के कारण उद्योगों तथा कृषि को कितनी हानि उठानी पड़ती है। इसी प्रकार यदि यातायाद के साधन अपर्याप्त हों तो उद्योगों को समय पर कच्चा माल नहीं मिल सकेगा तथा उनका तैयार माल बाजार में नहीं पहुंच सकेगा। अतएव आधारिक संरचना की कमी उद्योगों तथा कृषि आदि उत्पादक क्षेत्रों के विकास की दर को कम कर देती है। इसके विपरीत आधारिक संरचना की उचित उपलब्धता इनके विकास की दर को तेजी से बढ़ाने में सहायक हो सकती है।
(a) आधारिक संरचना से क्या अभिप्राय है?
(b) आर्थिक आधारिक संरचना का अर्थ बताएं। महत्त्वपूर्ण आर्थिक संरचनाएं कौन-सी हैं?
उत्तर-
(a) किसी अर्थव्यवस्था के पूंजी स्टॉक के उस भाग को जो विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करने की दृष्टि से आवश्यक होता है, आधारिक संरचना कहा जाता है।
(b) आर्थिक आधारिक संरचना से अभिप्राय उस पूंजी स्टॉक से है जो उत्पादन प्रणाली को प्रत्यक्ष सेवाएं प्रदान करता है। उदाहरणादि-देश की यातायात प्रणाली रेलवे, वायु सेवाएं, उत्पादन तथा वितरण प्रणाली के एक हिस्से के रूप में ही सेवाएं प्रदान करतें हैं। इसी प्रकार बैंकिंग प्रणाली, मुद्रा तथा पूंजी बाज़ार दूसरे हिस्से के रूप में उद्योगों तथा कृषि को वित्त प्रदान करती है। महत्त्वपूर्ण आर्थिक संरचनाएं निम्नलिखित हैं

  1. परिवहन तथा संचार
  2. विद्युत् शक्ति
  3. सिंचाई
  4. बैंकिंग तथा अन्य वित्तीय संस्थाएं।

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(5)

आधुनिक युग उपभोक्तावाद का युग है। उपभोक्ताओं के उपयोग एवं सुविधा के लिए प्रतिदिन नए उपभोक्ता पदार्थों की पूर्ति की जा रही है। नए प्रकार के खाद्य पदार्थों, नए फैशन के कपड़ों, सजावट के समान, गृहस्थी के उपयोग के लिए नए उपकरणों, परिवहन के नए साधनों, मनोरंजन के नए यन्त्रों जैसे-रंगीन टी०वी० विडियो आदि का निरन्तर आविष्कार तथा उत्पादन किया जा रहा है। इन वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए विज्ञापन तथा प्रचार का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। आज का उपभोक्ता आकर्षक विज्ञापनों तथा अनेक उत्पादकों के प्रचार के आधार पर अपने उपभोग की सामग्री का चुनाव करता है। इस संबंध में उसका कई प्रकार से शोषण किया जाता है। उपभोक्ता को इस शोषण से संरक्षण देने के लिए उपभोक्ता संरक्षण की विधि प्रारम्भ की गई है।
(a) उपभोक्ता संरक्षण से क्या अभिप्राय है?
(b) उपभोक्ता के शिक्षण का अर्थ बताएं।
उत्तर-
(a) उपभोक्ता संरक्षण से अभिप्राय है कि उपभोक्ता वस्तुओं के उपभोक्ताओं की उत्पादकों के अनुचित व्यापार व्यवहारों के फलस्वरूप होने वाले शोषण से रक्षा करना।
(b) उपभोक्ता के हितों का संरक्षण करने के लिए उन्हें शिक्षित किया जाना भी आवश्यक है। इस उद्देश्य के लिए प्रतिवर्ष देश भर में 15 से 21 मार्च तक उपभोक्ता सप्ताह (Consumer’s Week) मनाया जाता है। इसमें उपभोक्ताओं में उनके अधिकारों के बारे में जागरूकता जगाने पर विशेष जोर दिया जाता है। इस अवसर पर प्रदर्शनियों, गोष्ठियों तथा नुक्कड़ सभाओं का आयोजन किया जाता है। उनमें उपभोक्ताओं को बताया जाता है कि उन्हें मिलावट, कम तोलने जैसे अनुचित व्यापारिक गतिविधियों के बारे में क्या करना चाहिए तथा इस संबंध में उन्हें कौन-सी कानूनी सुविधाएं प्राप्त हैं।

(6)

भारत एक कृषि प्रधान देश माना जाता है क्योंकि भारत में आज भी 68 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त कर रही है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारतवासियों ने अंग्रेजों से पिछड़ी हुई कृषि अर्थव्यवस्था ही विरासत में पाई थी। महात्मा गाँधी भी कृषि को “भारत की आत्मा” मानते थे। नेहरू जी ने भी इसलिए कहा था, “कृषि को सर्वाधिक प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।” डॉ० वी०के०वी० राव ने कृषि के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था, “यदि पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत विकास के विशाल पहाड़ को लांघना है तो कृषि के लिए निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करना आवश्यक है।” प्रसिद्ध अर्थशास्त्री विद्वान् दांते वाला के अनुसार, “भारतीय अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास में कृषि क्षेत्र की सफलता देश को आर्थिक प्रगति के मार्ग की तरफ अग्रसर करती है।”
(a) कृषि से क्या अभिप्राय है?
(b) भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर-
(a) अंग्रेजी भाषा का एग्रीकल्चर शब्द लैटिन भाषा के दो शब्दों एग्री (Agri), खेत (Field) तथा कल्चर (Culture) (खेती) (Cultivation) से लिया गया है। दूसरे शब्दों में, एक खेत में पशुओं तथा फसलों के उत्पादन सम्बन्धी कला व विज्ञान को कृषि कहते हैं। अर्थशास्त्र में इस शब्द का प्रयोग खेती की क्रिया में सम्बन्धित प्रत्येक विषय में किया जाता है। कृषि का मुख्य उद्देश्य मज़दूरी पदार्थों जैसे अनाज, दूध, सब्जियाँ, दालों तथा उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन करना है।
(b) भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व निम्नलिखित है.

  1. राष्ट्रीय आय (National Income) — भारत की राष्ट्रीय आय का लगभग एक चौथाई भाग कृषि, वन आदि प्राथमिक क्रियाओं से प्राप्त होता है। योजनाकाल में राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र का योगदान विभिन्न वर्षों में 14.2 प्रतिशत से 51 प्रतिशत तक रहा है। .
  2. कृषि तथा रोज़गार (Agriculture and Employments) — भारत में कृषि रोज़गार का मुख्य स्रोत है। भारत में 70 प्रतिशत से भी ज्यादा कार्यशील जनसंख्या कृषि क्षेत्र में लगी हुई है। भारत में लगभग दो तिहाई जनसंख्या कृषि क्षेत्र पर निर्भर रहती है।
  3. कृषि तथा उद्योग (Agriculture and Industry) — कृषि क्षेत्र के द्वारा कई उद्योगों को कच्चा माल जैसेकपास, जूट, गन्ना तिलहन आदि प्राप्त होते हैं। कृषि के विकास के कारण लोगों की आय में वृद्धि होती है इसलिए वे उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं की अधिक मांग करते हैं। इसके फलस्वरूप उद्योगों के बाजार का विस्तार होता है।
  4. यातायात (Transport) — यातायात के साधनों जैसे रेलों, मोटरों, बैलगाड़ियों की आय का एक मुख्य साधन अनाज तथा अन्य कृषि पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाना ले जाना है।
  5. सरकार की आय (Government Income) — राज्य सरकारें अपनी आय का काफी भाग मालगुजारी से प्राप्त करती है। मालगुजारी राज्य सरकारों की आय का परम्परागत साधन है।

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(7)

हरित क्रान्ति दो शब्दों से मिलकर बना है-हरित + क्रान्ति। हरित शब्द का अर्थ है हरियाली तथा क्रान्ति शब्द का अर्थ है इतनी तेजी से होने वाला परिवर्तन कि सभी उसकी ओर आश्चर्य से देखते रह जाएं। इस शब्द का प्रयोग कृषि के उत्पादन के लिए किया गया है। भारत में पहली तीन योजनाओं की अवधि में अपनाए गए कृषि सुधारों के कारण 1967-68 में अनाज के उत्पादन में पिछले वर्ष (1966-67) की तुलना में लगभग 25% की वृद्धि हुई। किसी एक वर्ष में अनाज के उत्पादन में इतनी अधिक वृद्धि होना एक क्रान्ति के समान था। इस कारण अर्थशास्त्रियों ने अमाज के उत्पादन में होने वाली इस वृद्धि को हरित क्रान्ति का नाम दिया है।
(a) हरित क्रान्ति के प्रभाव बताएं।
(b) हरित क्रान्ति क्या है? इसकी विशेषताएं बताएं।
उत्तर-
(a) हरित क्रान्ति के प्रभाव निम्नलिखित रहे हैं-

  1. उत्पादन में वृद्धि (Increase in Production) — हरित क्रान्ति के फलस्वरूप 1967-68 और उसके बाद के वर्षों में फसलों के उत्पादन में बड़ी तीव्र गति से वृद्धि हुई है। 1967-68 के वर्ष जिसे हरित क्रान्ति का वर्ष कहा जाता है, में अनाज का उत्पादन बढ़कर 950 लाख टन हो गया।
  2. पूंजीवादी खेती (Capitalistic Farming) — हरित क्रान्ति का लाभ उठाने के लिए धन की बहुत अधिक आवश्यकता है। इतना धन केवल वे ही किसान खर्च कर सकते हैं जिनके पास कम-से-कम 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि हो। अतएव हरित क्रान्ति के फलस्वरूप देश में पूंजीवादी खेती को प्रोत्साहन मिला है।
  3. किसानों की समृद्धि (Prosperity of the Farmers) — हरित क्रान्ति के फलस्वरूप किसानों की अवस्था में काफी सुधार हुआ है। उनका जीवन स्तर पहले से बहुत ऊँचा हो गया है। कृषि का व्यवसाय एक लाभदायक व्यवसाय माना जाने लगा है। कई व्यवसायी इस ओर आकर्षित होने लगे हैं। देश में उपभोक्ता, वस्तुओं की मांग में वृद्धि हुई है। आवश्यकता की उच्चकोटि की वस्तुओं तथा विलासिता के पदार्थों की मांग बढ़ गई है। इसका औद्योगिक विकास पर भी उचित प्रभाव पड़ा है।
  4. खाद्यान्न के आयातों में कमी (Reduction in Imports of Food Grains) — हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में खाद्यान्न के आयात पहले की अपेक्षा कम होने लगे हैं।

(b) हरित क्रान्ति से अभिप्राय कृषि उत्पादन विशेष रूप से गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में होने वाली उस भारी वृद्धि से है जो कृषि में अधिक उपज वाले बीजों के प्रयोग की नई तकनीक अपनाने के कारण सम्भव हुई।
विशेषताएं-

  1. भारत में 1968 का वर्ष हरित क्रान्ति का वर्ष था।
  2. इसमें “पंत” कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर ने कई किस्मों के बीजों के माध्यम से एक सराहनीय सहयोग दिया।
  3. हरित क्रान्ति लाने में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान नई दिल्ली का भी सहयोग सराहनीय है।
  4. भारत में इस क्रान्ति को लाने का श्रेय डॉ० नोरमान वरलोग तथा एम०एन० स्वामीनाथन को जाता है।

(8)

भारत जैसे अल्पविकसित देशों की आर्थिक प्रगति के लिए औद्योगीकरण एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। उद्योगों के विकास द्वारा ही आय, उत्पादन तथा रोजगार की मात्रा को बढ़ाकर भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में वृद्धि की जा सकती है। स्वतन्त्रता से पहले भारत में उद्योगों का बहुत ही कम विकास हुआ था, परन्तु आजादी के बाद सरकार ने देश के औद्योगिक विकास को बहुत अधिक महत्त्व दिया। इसके फलस्वरूप देश में कई उद्योग स्थापित किए गए तथा पुराने उद्योगों की उत्पादन क्षमता तथा कुशलता में भी वृद्धि की गई। भारतीय पंचवर्षीय योजनाओं में भी उद्योगों के विकास को काफी महत्त्व दिया गया है।
(a) औद्योगिक विकास का महत्त्व स्पष्ट करें।
(b) उद्योग किस प्रकार सन्तुलित अर्थव्यवस्था के निर्माण में सहायक है?
उत्तर-
(a)

  1. रोज़गार (Employment) — औद्योगीकरण के फलस्वरूप नए-नए उद्योगों का निर्माण होता है। देश के लाखों बेरोजगारों को इन उद्योगों में काम मिलने लगता है। इससे बेरोज़गारी कम होती है।
  2. आत्म निर्भरता (Self Sufficiency) — उद्योगों के विकास से देश की आवश्यक वस्तुएं देश में ही उत्पन्न होने लगेंगी। उनके लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो जाएगी। इस प्रकार भारत कई वस्तुओं व सामान में आत्म निर्भर हो जाएगा। .
  3. राष्ट्रीय आय में वृद्धि (Increase in National Income) — भारत में औद्योगीकरण से प्राकृतिक साधनों का उचित प्रयोग हो सकेगा। इससे उत्पादन तथा व्यापार बढ़ेगा, राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी तथा लोगों की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ेगी।
  4. राष्ट्रीय प्रतिरक्षा के लिए जरूरी (Essential for National Defence) — औद्योगीकरण से देश में लोहा, इस्पात, रसायन, हवाई जहाज़, सुरक्षा आदि कई उद्योगों की स्थापना हो जाएगी। इन उद्योगों का देश की प्रतिरक्षा के लिए बहुत महत्त्व है, क्योंकि इन उद्योगों से युद्ध के लिए बहुत सामान तैयार किया जाता है।
  5. भूमि पर जनसंख्या के दबाव में कमी (Less pressure of population on Land) — भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर करती है। इसके फलस्वरूप खेती काफी पिछड़ी हुई है। उद्योगों के विकास के कारण कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम हो जाएगा। इससे कृषि जोतों का आकार बढ़ेगा व खेती की अधिक उन्नति हो सकेगी।

(b) भारत की अर्थव्यवस्था असन्तुलित है, क्योंकि देश की अधिकतर जनसंख्या व पूंजी कृषि में लगी हुई है। कृषि में अनिश्चितता है। औद्योगीकरण से अर्थव्यवस्था सन्तुलित होगी तथा कृषि की अनिश्चितता कम हो जाएगी।

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(9)

“कुटीर उद्योग वह उद्योग हैं जो पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से परिवार के सदस्यों की सहायता से एक पूर्णकालीन या अंशकालीन व्यवसाय के रूप में चलाया जा सकता है।” इस प्रकार के उद्योग, अधिकतर कारीगर अपने घरों में ही चलाते हैं। मशीनों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। ये उद्योग प्रायः स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इन उद्योगों को परिवारों के सदस्य ही चलाते हैं। मज़दूरी पर लगाए गए श्रमिकों का प्रयोग बहुत कम होता है। इनमें पूंजी बहुत कम लगती है। इन उद्योगों के अधिकतर गाँवों में स्थित होने से उन्हें ग्रामीण उद्योग भी कहा जाता है।
(a) कुटीर व लघु उद्योगों में क्या अन्तर है?
(b) कुटीर उद्योगों की समस्याएं क्या होती हैं?
उत्तर-
(a)

  1. कुटीर उद्योग प्रायः गाँवों में होते हैं जबकि लघु उद्योग अधिकतर शहरों में होते हैं।
  2. कुटीर उद्योग सामान्यत: स्थानीय माँग की पूर्ति करते हैं जबकि लघु उद्योग शहरी एवं अर्द्ध शहरी क्षेत्रों के लिए माल पैदा करते हैं। अत: उत्पादन का बाजार विस्तृत होता है।
  3. कुटीर उद्योग में परिवार के व्यक्ति ही काम करते हैं जबकि लघु उद्योग में भाड़े के श्रमिकों से काम लिया जाता है।
  4. कुटीर उद्योगों में सामान्य औज़ारों से उत्पादन होता है तथा पूंजी बहुत कम खर्च होती है जबकि लघु उद्योग शक्ति से चलते हैं तथा नियोजित पूंजी भी अधिक खर्च होती है।
  5. कुटीर उद्योग में परम्परागत वस्तुओं का उत्पादन जैसे चटाई, जूते आदि बनाए जाते हैं जबकि लघु उद्योग में आधुनिक वस्तुओं जैसे-रेडियो, टेलीविज़न और इलैक्ट्रॉनिक सामान आदि का उत्पादन किया जाता है।

(b)

  1. कच्चे माल तथा शक्ति की समस्या (Problem of Raw Material and Power) — इन उद्योग धन्धों को कच्चा माल उचित मात्रा में नहीं मिल पाता तथा जो माल मिलता है उसकी किस्म बहुत घटिया होती है और उसका मूल्य भी बहुत अधिक देना पड़ता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इन उद्योगों को बिजली तथा कोयले की कमी रहती है।
  2. वित्त की समस्या (Problem of Finance) — भारत में इन उद्योगों को ऋण उचित मात्रा में नहीं मिल पाता है। उन्हें वित्त के लिए साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता है जो ब्याज की ऊँची दर लेते हैं।
  3. बिक्री सम्बन्धी कठिनाई (Problems of Marketing) — इन उद्योगों को अपनामाल उचित मूल्य एवं मात्रा में बेचने के लिए काफी कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। जैसे इन उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की बाहरी दिखावट अच्छी नहीं होती है।
  4. उत्पादन के पुराने तरीके (Old Methods of Production) — इन उद्योगों में अधिकतर उत्पादन के पुराने ढंग भी अपनाए जाते हैं। पुराने औज़ार जैसे-तेल निकालने की हानियाँ अथवा कपड़ा बुनने के लिए हथकरघा ही प्रयोग में लाया जाता है। इसके फलस्वरूप उत्पादन की मात्रा में कमी होती है तथा वस्तु घटिया किस्म की तैयार होती है। इन वस्तुओं की बाजार में मांग कम हो जाती है।

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(10)

भारत के आर्थिक विकास में बड़े पैमाने के उद्योगों का बहुत महत्त्व है। उद्योगों में निवेश की गई स्थायी पूँजी का अधिकतर भाग बड़े उद्योगों में ही निवेश किया गया है। देश के औद्योगिक उत्पादन का बड़ा भाग इन्हीं उद्योगों से प्राप्त होता है।
(a) बड़े उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए।
(b) बड़े उद्योगों का देश के औद्योगिकीकरण में महत्त्व बताएं।
उत्तर-
(a)

  1. आधारभूत उद्योग (Basic Industries) — आधारभूत उद्योग वे उद्योग हैं, जो कृषि तथा उद्योगों को आवश्यक इन्पुट्स प्रदान करते हैं। इनके उदाहरण हैं-स्टील, लोहा, कोयला, उर्वरक तथा बिजली।।
  2. पूंजीगत वस्तु उद्योग (Capital Goods Industries) — पूंजीगत उद्योग वे उद्योग हैं जो कृषि तथा उद्योग के लिए मशीनरी और यन्त्रों का उत्पादन करते हैं। इनमें मशीनें, मशीनी औजार, ट्रैक्टर, ट्रक आदि शामिल किए जाते हैं।
  3. मध्यवर्ती वस्तु उद्योग (Intermediate Goods Industries) — मध्यवर्ती वस्तु उद्योग वे उद्योग हैं जो उन वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जिनका दूसरी वस्तु के उत्पादन के लिए प्रयोग किया जाता है। इनके उदाहरण हैं टायर्स, मोबिल ऑयल आदि।
  4. उपभोक्ता वस्तु उद्योग (Consumer Goods Industries) — उपभोक्ता वस्तु उद्योग वे उद्योग हैं जो उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन, करते हैं। इनमें शामिल हैं चीनी, कपड़ा, कागज़ उद्योग आदि।

(b)

  1. पूंजीगत तथा आधारभूत वस्तुओं का उत्पादन (Production of Capitalistic and Basic Goods) — देश के औद्योगिकीकरण के लिए पूंजीगत वस्तुओं जैसे मशीनों, यन्त्रों तथा आधारभूत वस्तुओं जैसे इस्पात, लोहे, रासायनिक पदार्थों आदि का बहुत अधिक महत्त्व है। इन पूंजीगत तथा आधारभूत वस्तुओं का उत्पादन बड़े उद्योगों द्वारा ही सम्भव है।
  2. आर्थिक आधारित संरचना (Economic Infrastructure) — औद्योगिकीकरण के लिए आर्थिक संरचना अर्थात् यातायात के साधन, बिजली, संचार व्यवस्था आदि की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। यातायात के साधनों जैसे रेलवे के इन्जनों तथा डिब्बों, ट्रकों, मोटरों, जहाजों आदि का उत्पादन बड़े पैमाने के उद्योगों द्वारा ही किया जा सकता है।
  3. अनुसन्धान तथा उच्च तकनीक (Research and High Techniques) — किसी देश के औद्योगिकीकरण के लिए अनुसन्धान तथा उच्च तकनीक का बहुत महत्त्व है। इनके लिए बहुत अधिक मात्रा में धन तथा योग्य अनुसन्धानकर्ताओं की आवश्यकता होती है। बड़े पैमाने के उद्योग ही अनुसन्धान तथा योग्य अनुसन्धानकर्ताओं के लिए आवश्यक धन का प्रबन्ध कर सकते हैं।
  4. उत्पादकता में वृद्धि (Increase in Productivity) — बड़े पैमाने के उद्योगों में निवेश बहुत मात्रा में होने के कारण प्रति इकाई पूंजी बहुत अधिक होती है। इससे प्रति इकाई उत्पादकता में भारी वृद्धि होती है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

Punjab State Board PSEB 6th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Social Science Geography Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

SST Guide for Class 6 PSEB मानचित्र – हमारे सहायक Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
मानचित्र किसे कहते हैं?
उत्तर-
किसी चपटे तल पर पूरी पृथ्वी अथवा उसके किसी एक भाग का खींचा गया रूप मानचित्र कहलाता है। मानचित्र एक पैमाने के अनुसार खींचा जाता है। इस पैमाने को मानचित्र का पैमाना कहते हैं।

प्रश्न 2.
ग्लोब किसे कहते हैं?
उत्तर-
पृथ्वी के मॉडल (नमूने) को ग्लोब कहते हैं। इसके बीच एक कील होती है। इस कील का उत्तरी सिरा उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी सिरा दक्षिणी ध्रुव को दर्शाता है। ग्लोब के बीचों-बीच पूर्व-पश्चिम दिशा की ओर जाती हुई रेखा को भूमध्य रेखा कहते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक 1

प्रश्न 3.
मानचित्र और ग्लोब में क्या अन्तर है?
उत्तर-
मानचित्र और ग्लोब में निम्नलिखित अन्तर हैं –
मानचित्र

  1. मानचित्र पृथ्वी के धरातल या उसके किसी भाग का एक चित्र होता है जिसे एक पैमाने के अनुसार बनाया जाता है।
  2. मानचित्र पर महासागर तथा महाद्वीपों की आकृति तथा आकार सही-सही नहीं दिखाए जा सकते हैं।
  3. इसमें प्रतीकों का प्रयोग किया जाता हैं।

ग्लोब

  1. ग्लोब पृथ्वी का छोटा प्रतिरूप होता है।
  2. ग्लोब पर महासागरों तथा महाद्वीपों की आकृति तथा आकार बिल्कुल सही दिखाए जा सकते हैं।
  3. इसमें प्रतीकों का प्रयोग नहीं किया जाता है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 4.
मानचित्र क्यों तैयार किये जाते हैं? इनका महत्त्व बताओ।
उत्तर-
मानचित्र पृथ्वी से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने के लिए बनाये जाते हैं । ये हमारे लिए बहुत ही उपयोगी हैं। इनका अग्रलिखित महत्त्व है –

  1. ये हमें किसी स्थान, देश अथवा महाद्वीप की जानकारी देते हैं।
  2. महत्त्वपूर्ण नगरों के गाइड मानचित्र तैयार किए जाते हैं। ये लोगों को भिन्न-भिन्न स्थान ढूंढ़ने में सहायता करते हैं।
  3. मानचित्र से हम किन्हीं दो स्थानों के बीच की दूरी का पता लगा सकते हैं।
  4. ये हमें व्यापारिक केन्द्रों, सड़कों एवं रेलमार्गों, नदियों तथा भौतिक लक्षणों की जानकारी देते हैं।
  5. सरकार को प्रशासन चलाने के लिए मानचित्रों की आवश्यकता होती है।
  6. मानचित्र सेना के लिए भी बहुत उपयोगी होते हैं।

सच तो यह है कि मानचित्र भूगोल के भिन्न-भिन्न तथ्यों का अध्ययन करने में हमारी सहायता करते हैं।

प्रश्न 5.
भिन्न-भिन्न मानचित्रों की सूची बनाओ।
उत्तर-
मानचित्र निम्नलिखित कई प्रकार के होते हैं –

  1. भौतिक मानचित्र,
  2. ऐतिहासिक मानचित्र,
  3. वितरण मानचित्र,
  4. स्थलाकृति मानचित्र,
  5. एटलस मानचित्र तथा
  6. दीवार मानचित्र।

प्रश्न 6.
मानचित्रों के आवश्यक तत्त्व कौन-से हैं और क्यों?
उत्तर-
मानचित्रों के आवश्यक तत्त्व दूरी, दिशा तथा प्रमाणिक चिन्ह हैं। ये तत्त्व इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि इनके बिना मानचित्र को पढ़ना और समझना कठिन है। वास्तव में ये तत्त्व मानचित्र की भाषा हैं। इनकी सहायता से ही हम किसी मानचित्र से उचित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 7.
प्रमाणिक चिन्हों का चार्ट बनाओ।
उत्तर-
मानचित्र में कुछ विशेष तत्त्वों को दर्शाने के लिए चिन्ह निश्चित किए गए हैं। इन्हें प्रमाणिक चिन्ह कहते हैं। कुछ प्रमाणिक चिन्ह निम्नांकित हैं –

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक 2

PSEB 6th Class Social Science Guide मानचित्र – हमारे सहायक Important Questions and Answers

कम से कम शब्दों में उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी के धरातलीय रूप दर्शाने वाले मानचित्र क्या कहलाते हैं?
उत्तर-
धरातलीय अथवा भौतिक मानचित्र।

प्रश्न 2.
ऐतिहासिक मानचित्रों द्वारा क्या दर्शाया जाता है? एक उदाहरण दें।
उत्तर-
ऐतिहासिक तथ्य जैसे सभ्यताओं का विस्तार।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 3.
पुस्तक के रूप में दिए गए मानचित्र क्या कहलाते हैं?
उत्तर-
एटलस मानचित्र।

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आप किसी क्षेत्र का भौगोलिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं? इसलिए आपको निम्न में से क्या चाहिए होगा?
(क) उस क्षेत्र का मानचित्र
(ख) वहाँ के लोगों की संख्या
(ग) वहाँ के लोगों की शारीरिक बनावट
उत्तर-
(क) उस क्षेत्र का मानचित्र,

प्रश्न 2.
आपके पास एक वस्तु मानचित्र है। यह निम्न में क्या दर्शाएगा?
(क) प्राकृतिक तथा मानस द्वारा निर्मित स्थल आकृतियां।
(ख) ऐतिहासिक लड़ाइयां एवं सभ्यताओं का विस्तार।
(ग) फसलों, खनिजों, आदि का प्रादेशिक विभाजन अथवा वितरण।
उत्तर-
(ग) फसलों, खनिजों आदि का प्रादेशिक विभाजन अथवा वितरण।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

सही (✓) या गलत (✗) कथन

  1. एटलस मानचित्र बड़े पैमाने पर आधारित होते हैं।
  2. स्थल आकृति मानचित्रों पर मानव-निर्मित आकृतियां दर्शायी जाती हैं।
  3. मानचित्र एक पैमाने के अनुसार समतल सतह पर खींचा जाता है।

उत्तर-

  1. (✗)
  2. (✓)
  3. (✓)

रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. फ़सलों तथा खनिजों का वितरण ……. मानचित्रों द्वारा दर्शाया जाता है।
  2. ग्लोब पृथ्वी की तरह …………. आकार का होता है
  3. मानचित्र के प्रमाणिक ………….. चिन्ह होते हैं।

उत्तर-

  1. विभाजन संबंधी,
  2. गोल,
  3. आकृति।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रेखाचित्र किसे कहते हैं?
उत्तर-
पृथ्वी पर वास्तविक दूरियों को मापे बिना कल्पना से बनाया गया चित्र रेखाचित्र कहलाता है।

प्रश्न 2.
दिक्सूचक यंत्र का आविष्कार सबसे पहले किस देश में हुआ था?
उत्तर-
चीन में।

प्रश्न 3.
दिग्बिन्दु किसे कहते हैं?
उत्तर-
चारों मुख्य दिशाओं को दिग्बिन्दु कहते हैं। उत्तर, दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम चार मुख्य दिशाएँ हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 4.
जलीय भागों को दिखाने के लिए किस रंग का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
नीले रंग का।

प्रश्न 5.
पृथ्वी तथा मानचित्र पर दूरी के अनुमान को दर्शाने वाला पैमाना क्या कहलाता है?
उत्तर-
रैखिक पैमाना।

प्रश्न 6.
छोटे पैमाने का मानचित्र क्या होता है?
उत्तर-
जब किसी छोटे मानचित्र में एक बड़े क्षेत्र को दर्शाया जाता है तो उसे छोटे पैमाने का मानचित्र कहते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 7.
बड़े पैमाने के मानचित्र का एक महत्त्व बताओ।
उत्तर-
ऐसे मानचित्र में विस्तृत जानकारी दी जा सकती है।

प्रश्न 8.
मानचित्र में प्रतीकों तथा रंगों का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
प्रतीकों तथा रंगों की सहायता से मानचित्र को पढ़ना सरल हो जाता है।

प्रश्न 9.
पृथ्वी के धरातलीय रूप दर्शाने वाले मानचित्र क्या कहलाते हैं?
उत्तर–
धरातलयीय अथवा भौतिक मानचित्र ।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 10.
ऐतिहासिक मानचित्रों द्वारा क्या दर्शाया जाता है? एक उदाहरण दें।
उत्तर-
ऐतिहासिक तथ्य जैसे सभ्यताओं का विस्तार।

प्रश्न 11.
पुस्तक के रूप में दिए गए मानचित्र क्या कहलाते हैं?
उत्तर-
एटलस मानचित्र।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आजकल ग्लोब को प्रयोग करना अधिक सुविधाजनक हो गया है। कैसे?
उत्तर-
पहले ग्लोब को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना कठिन था। परन्तु आजकल ऐसे ग्लोब आ गये हैं जिन्हें मोड़कर कहीं भी ले जाया जा सकता है, आवश्यकता पड़ने पर इन्हें गुब्बारे की तरह फुलाया जा सकता हैं। कुछ ऐसे ग्लोब भी हैं जिनमें पर्वत, पठारों तथा मैदानों को उनकी ऊँचाई के अनुसार दर्शाया गया है। इस ऊँचाई को हम हाथ से छू कर अनुभव कर सकते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 2.
मापक या पैमाने के आधार पर मानचित्र कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण दीजिए ह्य
उत्तर-
मापक या पैमाने के आधार पर मानचित्र दो प्रकार के होते हैं-बड़े पैमाने के मानचित्र तथा छोटे पैमाने के मानचित्र। किसी गाँव या नगर का मानचित्र बड़े पैमाने का मानचित्र होता है। इसके विपरीत किसी देश, महाद्वीप अथवा पूरे विश्व का मानचित्र छोटे पैमाने के मानचित्र का उदाहरण है।

प्रश्न 3.
विषयक मानचित्रों से क्या अभिप्राय है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
कुछ मानचित्र किसी विशेष लक्षण की जानकारी देते हैं। ऐसे मानचित्रों को विषयक मानचित्र कहते हैं। उदाहरण के लिए वर्षा के वितरण, सड़कों के जाल अथवा खनिजों के वितरण को दर्शाने वाले मानचित्र विषयक मानचित्र कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
मानचित्र ग्लोब की तरह शुद्ध क्यों नहीं हो सकते?
उत्तर-
ग्लोब पर महाद्वीपों तथा महासागरों की आकृति को सही-सही दिखाया जा सकता है। ग्लोब पर दूरियाँ एवं दिशाएँ भी बिल्कुल सही दिखाई जा सकती हैं। इसके विपरीत मानचित्र पर ऐसा सम्भव नहीं है। इसका कारण यह है कि हमारी पृथ्वी गोल है जबकि मानचित्र चपटी सतह पर बनाये जाते हैं। किसी गोल आकृति को पूरी तरह से चपटा करना असम्भव है। इसलिए मानचित्र ग्लोब की तरह शुद्ध नहीं होते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

प्रश्न 5.
बड़े मापक (पैमाना) और छोटे मापक (पैमाना) के मानचित्रों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
बड़े मापक और छोटे मापक के मानचित्र –
छोटा मापक

  1. छोटे मापक के मानचित्र किसी महाद्वीप या देश के मानचित्र होते हैं।
  2. इनमें अधिक ब्योरे नहीं दिखाए जा सकते हैं।

बड़ा मापक

  1. बड़े मापक के मानचित्र देश या क्षेत्र के किसी विशेष भाग को प्रदर्शित करते हैं।
  2. इनमें अधिक ब्योरे दिखाए जा सकते हैं।

प्रश्न 6.
उन परिस्थितियों को सूचीबद्ध कीजिए जिनमें ग्लोब मानचित्र से कहीं अधिक उपयोगी है।
उत्तर-
ग्लोब निम्नलिखित परिस्थितियों में मानचित्र से अधिक उपयोगी होता है –

  1. पृथ्वी की सही आकृति देखने के लिए।
  2. महासागरों के आकार तथा ध्रुवों की स्थिति जानने के लिए।
  3. पृथ्वी की दैनिक तथा वार्षिक गतियों को समझने के लिए।
  4. अक्षांश रेखाओं तथा देशान्तर रेखाओं के जाल का सही रूप देखने के लिए।

प्रश्न 7.
ग्लोब की क्या कमियाँ हैं?
उत्तर-
ग्लोब में निम्नलिखित कमियाँ होती हैं –

  1. ग्लोब का प्रयोग केवल पूरी पृथ्वी की जानकारी प्राप्त करने के लिए ही किया जा सकता है।
  2. ग्लोब को मानचित्र की तरह दीवार पर नहीं लटकाया जा सकता।
  3. ग्लोब को पुस्तकों में नहीं दिया जा सकता।
  4. ग्लोब पर पैमाने की सहायता से दो स्थानों के बीच की दूरी नहीं मापी जा सकती।
  5. ग्लोब पर विभिन्न प्रदेशों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जा सकता।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न-
भिन्न-भिन्न प्रकार के मानचित्रों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-
मानचित्र कई प्रकार के होते हैं। इसका कारण यह है कि इनका उपयोग अलग-अलग तरह से किया जाता है। कुछ मुख्य मानचित्रों का वर्णन निम्नलिखित है –

1. भौतिक मानचित्र-ये मानचित्र किसी देश अथवा महाद्वीप के भौतिक लक्षणों की जानकारी देते हैं। इनमें पर्वत, पठार, मैदान आदि भू-आकारों को भिन्न-भिन्न रंगों से दिखाया जाता है।

2. ऐतिहासिक मानचित्र-ये मानचित्र सभ्यताओं के विस्तार, महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों तथा यात्राओं आदि का अध्ययन करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

3. विभाजन संबंधी मानचित्र-इन मानचित्रों में फसलों, खनिजों, जनसंख्या आदि के विभाजन को दर्शाया जाता है। इन्हें वस्तु-मानचित्र भी कहा जाता है।

4. स्थलाकृति मानचित्र-इनमें प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित आकृतियां दर्शाई जाती हैं। सड़कों तथा रेलमार्गों के मानचित्र इसी प्रकार के मानचित्र हैं। ये मानचित्र प्रत्येक देश के सर्वे विभाग की ओर से तैयार किये जाते हैं।

5. एटलस मानचित्र-ये मानचित्र छोटे पैमाने पर बनाए जाते हैं और इन्हें एक पुस्तक के रूप में बांधा जाता है। विद्यार्थियों के लिए ये मानचित्र बहुत ही उपयोगी होते हैं।

6. दीवार मानचित्र-ये एटलस मानचित्रों से बड़े होते हैं। ये किसी को पढ़ाने अथवा समझाने के लिए उपयोग में लाये जाते हैं।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 4 मानचित्र – हमारे सहायक

मानचित्र – हमारे सहायक PSEB 6th Class Social Science Notes

  • ग्लोब – पृथ्वी के प्रतिरूप (मॉडल) को ग्लोब कहते हैं।
  • मानचित्र – पृथ्वी के धरातल या उसके किसी भाग का किसी चपटी सतह पर एक पैमाने के अनुसार प्रदर्शन, मानचित्र कहलाता है।
  • कम्पास – यह दिशाएं ज्ञात करने का एक साधारण यंत्र है।
  • पैमाना – मानचित्र एक निश्चित पैमाने के अनुसार बनाया जाता है। मानचित्र में दिए गए पैमाने के अनुसार पृथ्वी के किन्हीं दो स्थानों की दूरी ज्ञात की जाती है।
  • रेखाचित्र – पृथ्वी पर वास्तविक दुरियों को मापे बिना कल्पना से बनाया गया चित्र रेखाचित्र कहलाता है।
  • मापचित्र – मापचित्र बड़े पैमाने पर बनाया गया वह रेखाचित्र है जिसमें विस्तृत विवरण दिया गया हो।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 22 प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 22 प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 22 प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रथम ऐंग्लो-सिरव युद्ध के कारण (Causes of the First Anglo-Sikh War)

प्रश्न 1.
अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के कारणों का वर्णन करें।
(Describe the causes of the First Anglo-Sikh War between British and Sikhs.)
अथवा
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के क्या कारण थे ?
(What were the causes of First Anglo-Sikh War ?)
अथवा
प्रथम ऐंग्लो सिख युद्ध के कारणों का वर्णन करें।
(Describe the causes of First Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
अंग्रेज़ों ने महाराजा रणजीत सिंह के समय ही पंजाब का घेराव आरंभ कर दिया था। उन्होंने जानबूझ कर ऐसी नीतियाँ अपनाईं जिनका अंत प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के रूप में हुआ। इस युद्ध के प्रमुख कारणों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—

1. अंग्रेजों की पंजाब का घेरा डालने की नीति (British Policy of Encircling the Punjab) अंग्रेज़ दीर्घकाल से पंजाब को अपने अधीन करने के स्वप्न ले रहे थे। 1809 ई० में अंग्रेज़ों ने रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की संधि करके उसे सतलुज पार के क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोक दिया था। 1835-36 ई० में अंग्रेज़ों ने शिकारपुर पर अधिकार कर लिया। 1835 ई० में अंग्रेजों ने फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में अंग्रेज़ों ने फिरोजपुर में सैनिक छावनी स्थापित कर ली। इसी वर्ष अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह को सिंध की ओर बढ़ने से रोक दिया। अतः पंजाब को हड़प करना अब कुछ ही दिनों की बात रह गई थी। इस कारण अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य युद्ध को टाला नहीं जा सकता था।

2. पंजाब में फैली अराजकता (Anarchy in the Punjab) जून, 1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में अराजकता फैल गई थी। सिंहासन की प्राप्ति के लिए षड्यंत्रों का एक नया दौर आरंभ हुआ। 1839 ई० से लेकर 1845 ई० के 6 वर्ष के समय के दौरान पंजाब में पाँच सरकारें बदलीं। डोगरों ने अपने षड्यंत्रों द्वारा महाराजा रणजीत सिंह के वंश को बर्बाद कर दिया। अंग्रेजों ने इस स्वर्ण अवसर का उचित लाभ उठाया।

3. प्रथम अफ़गान युद्ध में अंग्रेजों की पराजय (Defeat of the British in the First Afghan War)-अंग्रेज़ों को प्रथम बार अफ़गानिस्तान के साथ हुए प्रथम युद्ध (1839-42 ई०) में पराजय का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में हुए भारी विनाश के कारण अंग्रेजों के मान-सम्मान को भारी आघात पहुंचा। अंग्रेज़ अपनी अफगानिस्तान में हुई पराजय के अपयश को किसी अन्य विजय से धोना चाहते थे। यह विजय उन्हें पंजाब में ही मिल सकती थी, क्योंकि उस समय पंजाब की स्थिति बहुत डावांडोल थी।

4. अंग्रेज़ों का सिंध विलय (Annexation of Sind by the British)-सिंध का भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्व था। अत: 1843 ई० में अंग्रेजों ने सिंध पर अधिकार कर लिया। क्योंकि सिख सिंध को अपने साम्राज्य में शामिल करना चाहते थे, इसलिए सिखों एवं अंग्रेजों के परस्पर संबंधों में तनाव और बढ़ गया।

5. अंग्रेजों की सैनिक तैयारियां (Military Preparations of the Britishers)-1844 ई० में लॉर्ड हार्डिंग ने गवर्नर जनरल का पद संभालने के पश्चात् सिखों के विरुद्ध जोरदार सैनिक तैयारियाँ आरंभ कर दी थीं। उसने कर्नल रिचमंड के स्थान पर लड़ाकू स्वभाव वाले मेजर ब्रॉडफुट को उत्तर-पश्चिमी सीमा का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया। लॉर्ड ग्रफ़ जोकि अंग्रेज़ी सेना का कमांडर-इन-चीफ था, ने अंबाला में अपना हेड क्वार्टर स्थापित कर लिया था। मार्च, 1845 ई० में देश के अन्य भागों से और सेनाएँ फिरोज़पुर, लुधियाना तथा अंबाला में भेजी गईं। इन सैनिक तैयारियों के कारण सिखों एवं अंग्रेजों के बीच परस्पर खाई और बढ़ गई।

6. मेजर ब्रॉडफुट की नियुक्ति (Appointment of Major Broadfoot)-नवंबर, 1844 ई० में मेजर ब्रॉडफुट को मिस्टर क्लार्क के स्थान पर लुधियाना का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया गया। वह सिखों का घोर शत्रु था। वह यह विचार लेकर पंजाब की सीमा पर आया था कि अंग्रेज़ों ने सिखों के साथ युद्ध करने का निर्णय कर लिया है। डॉक्टर फौजा सिंह के अनुसार,
“ब्रॉडफुट की लुधियाना में पोलिटिकल एजेंट के रूप में नियुक्ति एक और सोची-समझी चाल थी जोकि पंजाब में शीघ्र आरंभ होने वाले युद्ध को सामने रखकर की गई थी।”1
ब्रॉडफुट ने बहुत-सी ऐसी कार्यवाइयां की जिनके कारण सिख अंग्रेजों के विरुद्ध भड़क उठे।

7 लाल सिंह व तेजा सिंह द्वारा लड़ाई के लिए उकसाना (Incitement for War by Lal Singh & Teja Singh)-जवाहर सिंह की मृत्यु के बाद लाल सिंह को लाहौर सरकार का नया वज़ीर नियुक्त किया गया। उसने अपने भाई तेजा सिंह को सेनापति के पद पर नियुक्त किया। ये दोनों पहले ही गुप्त रूप से अंग्रेजों से मिले हुए थे। उस समय सिख सेना की शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी। वे चाहते थे कि सिखों की इस शक्तिशाली सेना को अंग्रेजों के साथ लड़वाकर इसे दुर्बल कर दिया जाए। ऐसा करने पर ही वे अपने पदों पर बने रह पाएँगे। इस कारण उन्होंने सिख सेना को अंग्रेजों के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया। उनके भड़काने पर सिख सेना ने 11 दिसंबर, 1845 ई० को सतलुज नदी को पार किया। अंग्रेज़ इसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे। अत: 13 दिसंबर, 1845 ई० को गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने सिख सेना पर यह दोष लगाते हुए युद्ध की घोषणा कर दी कि उसने अंग्रेज़ी क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया है।

1. “The appointment of Broadfoot as political agent at Ludhiana was also a calculated move made with an eye on the fast approaching war with the Punjab.” Dr. Fauja Singh, After Ranjit Singh (New Delhi : 1982) p. 136.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 22 प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम

युद्ध की घटनाएँ तथा परिणाम (Events and Results of the War)

प्रश्न 2.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध की मुख्य घटनाएँ क्या थीं ? इस युद्ध के क्या परिणाम निकले ? संक्षेप में वर्णन करें।
(What were the main events of the First Anglo-Sikh War ? Briefly explain the consequences of this War.)
अथवा
पहले आंग्ल-सिख युद्ध की मुख्य घटनाओं और नतीजों का अध्ययन कीजिए। (Study the main events and results of the First Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
अंग्रेजों की कुटिल नीतियों के कारण विवश होकर सिख सैनिकों को 11 दिसंबर, 1845 ई० को सतलुज नदी को पार करना पड़ा। अंग्रेज़ इसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे। लॉर्ड हार्डिंग ने सिखों पर आक्रमण का दोष लगाया और 13 दिसंबर, 1845 ई० को युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध के दूरगामी प्रभाव पड़े। प्रथम आंग्लसिख युद्ध की घटनाओं एवं परिणामों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित अनुसार है—
I. युद्ध की घटनाएँ (Events of the War)

1. मुदकी की लड़ाई (Battle of Mudki)—अंग्रेज़ों तथा सिखों में पहली महत्त्वपूर्ण लड़ाई 18 दिसंबर, 1845 ई० को मुदकी नामक स्थान पर लड़ी गई थी। इस लड़ाई में सिख सैनिकों की संख्या 5,500 थी और उनका नेतृत्व लाल सिंह कर रहा था। दूसरी ओर अंग्रेज़ सेना की संख्या 12,000. थी और उनका नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था। सिख सेना ने अंग्रेजों के ऐसे दाँत खट्टे किए कि उनमें अफरा-तफरी मच गई। यह देखकर लाल सिंह अपने कुछ सैनिकों को साथ लेकर युद्ध क्षेत्र से भाग गया। परिणामस्वरूप सिख सेना पराजित हुई। प्रसिद्ध इतिहासकार सीता राम कोहली के अनुसार,
“मुदकी की लड़ाई ने अंग्रेजों के इस बढ़ रहे विश्वास को गलत प्रमाणित कर दिया कि सिखों का सामना करना कोई मुश्किल कार्य नहीं है।”2

2. फिरोजशाह की लड़ाई (Battle of Ferozeshah)-सिखों और अंग्रेजों में दूसरी प्रसिद्ध लड़ाई फिरोज़शाह में 21 दिसंबर, 1845 ई० को लड़ी गई। इसमें अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व ह्यूग गफ़, जॉन लिटलर तथा लॉर्ड हार्डिंग कर रहे थे। सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह एवं तेजा सिंह कर रहे थे। इस लड़ाई में सिखों ने अंग्रेज़ों के ऐसे छक्के छुड़ाए कि एक बार तो उन्हें नानी याद आ गई। अंग्रेजों ने बिना शर्त शस्त्र फेंकने के संबंध में विचार करना आरंभ किया। ठीक उस समय लाल सिंह और तेजा सिंह ने गद्दारी की तथा अपने सैनिकों को लेकर रणभूमि से भाग गए। इस प्रकार विजित हुई खालसा सेना सेनापतियों की गद्दारी के कारण पराजित हुई। जनरल हैवलाक का कहना था कि,
“इस प्रकार की एक और लड़ाई साम्राज्य को हिला देगी।”3

3. बद्दोवाल की लड़ाई (Battle of Baddowal)-लाहौर दरबार के निर्देश पर रणजोध सिंह, 10,000 सैनिकों को साथ लेकर लुधियाना से 18 मील दूर स्थित बद्दोवाल पहुँचा। 21 जनवरी, 1846 ई० को बद्दोवाल के स्थान पर हुई इस लड़ाई में सिख बहुत वीरता से लड़े। सिखों ने अंग्रेजों के शस्त्र तथा खाद्य सामग्री भी लूट ली। अंग्रेज़ हार कर लुधियाना की ओर भाग गए।

4. अलीवाल की लड़ाई (Battle of Aliwal) रणजोध सिंह अपने सैनिकों को साथ लेकर अलीवाल की ओर चल पड़ा। अलीवाल में सिख अभी अपने मोर्चे लगा रहे थे कि अचानक 28 जनवरी, 1846 ई० के दिन हैरी स्मिथ के अधीन अंग्रेज़ी सेना ने सिखों पर आक्रमण कर दिया। यह लड़ाई बहुत भयानक थी। रणजोध सिंह की गद्दारी के कारण इस लड़ाई में अंग्रेजों की विजय हुई।

5. सभराओं की लड़ाई (Battle of Sobraon)—सभराओं की लड़ाई सिखों एवं अंग्रेजों के प्रथम युद्ध की अंतिम लड़ाई थी। इस लड़ाई से पूर्व 30,000 सिख सैनिक सभराओं पहुँच चुके थे। लाल सिंह तथा तेजा सिंह सिख सेना का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेजी सेना की कुल संख्या 15,000 थी। लॉर्ड ह्यूग गफ़ तथा लॉर्ड हार्डिंग इस सेना का नेतृत्व कर रहे थे। 10 फरवरी, 1846 ई० वाले दिन अंग्रेज़ों ने सिख सेना पर आक्रमण कर दिया। ठीक इसी समय पूर्व निर्मित योजनानुसार लाल सिंह और तेजा सिंह मैदान से भाग गए। फलस्वरूप सिख सेना बिखरने लग पड़ी। ऐसे अवसर पर सरदार शाम सिंह अटारीवाला आगे आए। उनकी बहादुरी और कुशलता देखकर अंग्रेज़ भी हैरान रह गए। शाम सिंह अटारीवाला की शहीदी के कारण सिख सेना का साहस टूट गया। इस प्रकार अंततः इस लड़ाई में अंग्रेज़ विजयी रहे। एच० एस० भटिया एवं एस० आर० बक्शी के अनुसार, “सभराओं की लड़ाई प्रत्येक पक्ष से निर्णायक थी।”4

2. “The battle of Mudki served to dispel a notion that had gained credence with the British that the Sikhs were no great force to be reckoned with.” S.R. Kohli, Sunset of the Sikh Empire (Bombay : 1967) pp. 107-108.
3. “Another such action will shake the Empire.” General Havelock.
4. “The battle of Sobraon was decisive in every respect.” H.S. Bhatia and S.R. Bakshi, Encyclopaedic History of the Sikhs and Sikhism (New Delhi : 1999) Vol. IV, p. 174.

II. युद्ध के परिणाम । (Results of the War)
अंग्रेज़ों एवं सिखों के मध्य हुए प्रथम युद्ध के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी- सरकार तथा लाहौर दरबार के मध्य १ मार्च, 1846 ई० को ‘लाहौर की संधि’ हुई।

लाहौर की संधि (Treaty of Lahore)
अंग्रेज़ों एवं सिखों के मध्य हुई लाहौर की संधि की मुख्य शर्ते निम्नलिखित थीं—

  1. अंग्रेज़ी सरकार और महाराजा दलीप सिंह तथा उसके उत्तराधिकारियों में सदैव शाँति तथा मित्रता बनी रहेगी।
  2. लाहौर के महाराजा ने सतलुज दरिया के दक्षिण में स्थित सभी प्रदेशों पर सदा के लिए अपना अधिकार छोड़ना स्वीकार कर लिया।
  3. महाराजा ने सतलुज और ब्यास नदियों के मध्य सभी मैदानी और पर्वतीय क्षेत्र एवं दुर्ग अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिए।
  4. अंग्रेज़ों ने युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 1.50 करोड़ रुपए की बड़ी राशि की माँग की। इतनी राशि लाहौर सरकार के कोष से नहीं मिल सकती थी। इसलिए एक करोड़ रुपए के बदले कश्मीर और हज़ारा के क्षेत्र अंग्रेजों को दे दिए।
  5. लाहौर राज्य की पैदल सेना की संख्या 20,000 और घुड़सवार सेना की संख्या 12,000 निश्चित कर दी गई।
  6. जब कभी आवश्यकता हो, अंग्रेज़ी सेनाएँ बिना किसी बाधा के लाहौर राज्य में से गुज़र सकेंगी। .
  7. महाराजा ने वचन दिया कि वह अंग्रेजों की स्वीकृति के बिना किसी अंग्रेज़, यूरोपियन तथा अमेरिकन को नौकर नहीं रखेगा।
  8. अंग्रेजों ने दलीप सिंह को लाहौर का महाराजा, रानी जिंदां को महाराजा का संरक्षक तथा लाल सिंह को प्रधानमंत्री स्वीकार कर लिया।
  9. अंग्रेज़ सरकार लाहौर राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी, परंतु जहाँ कहीं आवश्यक होगा, परामर्श देगी।
  10. अंग्रेज़ सरकार की आज्ञा के बिना लाहौर सरकार अपनी सीमाओं में परिवर्तन नहीं करेगी।

पूरक संधि (Supplementary Treaty)
लाहौर की संधि के दो दिन पश्चात् ही अर्थात् 11 मार्च, 1846 ई० को इस संधि में कुछ अतिरिक्त शर्ते सम्मिलित की गईं। इन शर्तों का विवरण निम्नलिखित है—

  1. लाहौर के नागरिकों की समुचित सुरक्षा के लिए 1846 ई० के अंत तक अंग्रेजों की पर्याप्त सेना लाहौर में ही रहेगी।
  2. लाहौर का दुर्ग और शहर पूरी तरह अंग्रेज़ी सेना के अधिकार में होगा। लाहौर. सरकार सैनिकों के आवास की व्यवस्था करेगी तथा उन सैनिकों का सारा खर्च देगी।
  3. दोनों सरकारें अपनी सीमाएँ निर्धारित करने के लिए शीघ्र ही अपने-अपने कमिश्नर नियुक्त करेंगी।

भैरोवाल की संधि (Treaty of Bhairowal)
अंग्रेज़ी सरकार ने लाहौर दरबार के साथ 16 दिसंबर, 1846 ई० को एक नयी संधि की। यह संधि इतिहास में भैरोवाल की संधि के नाम से विख्यात है। इस संधि की मुख्य शर्ते निम्नलिखिप्त थीं—

  1. अंग्रेज़ी सरकार लाहौर सरकार के सभी विभागों की देख-रेख के लिए ब्रिटिश रेजीडेंट नियुक्त करेगी।
  2. जब तक महाराजा दलीप सिंह नाबालिग रहेगा, राज्य की शासन-व्यवस्था एक कौंसिल ऑफ़ रीजैंसी द्वारा चलाई जाएगी। इसके 8 सदस्य होंगे।
  3. महारानी जिंदां को शासन-प्रबंध से पृथक् कर दिया गया तथा उसे 12 लाख रुपए वार्षिक पेंशन दी गई।
  4. महाराजा की रक्षा करने तथा देश में शाँति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश सेना लाहौर में रहेगी।
  5. यदि गवर्नर जनरल राजधानी की सुरक्षा के लिए आवश्यक समझे तो ब्रिटिश सैनिक लाहौर राज्य के किसी भी दुर्ग अथवा सैनिक छावनी पर अधिकार कर सकेंगे।
  6. ब्रिटिश सेना के खर्च के लिए लाहौर राज्य ब्रिटिश सरकार को 22 लाख रुपए प्रति वर्ष देगा।
  7. इस संधि की शर्ते महाराजा दलीप सिंह के वयस्क होने तक अर्थात् 4 सितंबर, 1854 ई० तक लागू रहेंगी। प्रसिद्ध लेखक डॉ० जी० एस० छाबड़ा का कहना है,

“इस प्रकार भैरोवाल की संधि ने सिख शक्ति की मृत्यु की घंटी बजी दी तथा इस संधि ने अंग्रेज़ों को । पंजाब का वास्तविक शासक बना दिया।”5

5. “The Treaty of Bhairowal thus rang the death knell of the Sikh power and it made the British the real masters of the Punjab.” Dr. G.S. Chhabra, Advanced History of the Punjab (Jalandhar : 1972) Vol. 2, p. 269.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 22 प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम

प्रथम ऐंग्लो-सिरव युद्ध के कारण तथा परिणाम (Causes and Results of the First Anglo-Sikh War)

प्रश्न 3.
अंग्रेजों तथा सिखों के बीच प्रथम युद्ध के कारण एवं परिणाम बताएँ।
(Discuss the causes and results of the First Anglo-Sikh War.)
अथवा
प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के कारणों तथा परिणामों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
(Briefly describe the causes and results of the First Anglo-Sikh War.)
अथवा
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के कारणों और परिणामों का वर्णन करें।
(Describe the causes and results of the First Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
अंग्रेज़ों ने महाराजा रणजीत सिंह के समय ही पंजाब का घेराव आरंभ कर दिया था। उन्होंने जानबूझ कर ऐसी नीतियाँ अपनाईं जिनका अंत प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के रूप में हुआ। इस युद्ध के प्रमुख कारणों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—

1. अंग्रेजों की पंजाब का घेरा डालने की नीति (British Policy of Encircling the Punjab) अंग्रेज़ दीर्घकाल से पंजाब को अपने अधीन करने के स्वप्न ले रहे थे। 1809 ई० में अंग्रेज़ों ने रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की संधि करके उसे सतलुज पार के क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोक दिया था। 1835-36 ई० में अंग्रेज़ों ने शिकारपुर पर अधिकार कर लिया। 1835 ई० में अंग्रेजों ने फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में अंग्रेज़ों ने फिरोजपुर में सैनिक छावनी स्थापित कर ली। इसी वर्ष अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह को सिंध की ओर बढ़ने से रोक दिया। अतः पंजाब को हड़प करना अब कुछ ही दिनों की बात रह गई थी। इस कारण अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य युद्ध को टाला नहीं जा सकता था।

2. पंजाब में फैली अराजकता (Anarchy in the Punjab) जून, 1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में अराजकता फैल गई थी। सिंहासन की प्राप्ति के लिए षड्यंत्रों का एक नया दौर आरंभ हुआ। 1839 ई० से लेकर 1845 ई० के 6 वर्ष के समय के दौरान पंजाब में पाँच सरकारें बदलीं। डोगरों ने अपने षड्यंत्रों द्वारा महाराजा रणजीत सिंह के वंश को बर्बाद कर दिया। अंग्रेजों ने इस स्वर्ण अवसर का उचित लाभ उठाया।

3. प्रथम अफ़गान युद्ध में अंग्रेजों की पराजय (Defeat of the British in the First Afghan War)-अंग्रेज़ों को प्रथम बार अफ़गानिस्तान के साथ हुए प्रथम युद्ध (1839-42 ई०) में पराजय का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में हुए भारी विनाश के कारण अंग्रेजों के मान-सम्मान को भारी आघात पहुंचा। अंग्रेज़ अपनी अफगानिस्तान में हुई पराजय के अपयश को किसी अन्य विजय से धोना चाहते थे। यह विजय उन्हें पंजाब में ही मिल सकती थी, क्योंकि उस समय पंजाब की स्थिति बहुत डावांडोल थी।

4. अंग्रेज़ों का सिंध विलय (Annexation of Sind by the British)-सिंध का भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्व था। अत: 1843 ई० में अंग्रेजों ने सिंध पर अधिकार कर लिया। क्योंकि सिख सिंध को अपने साम्राज्य में शामिल करना चाहते थे, इसलिए सिखों एवं अंग्रेजों के परस्पर संबंधों में तनाव और बढ़ गया।

5. अंग्रेजों की सैनिक तैयारियां (Military Preparations of the Britishers)-1844 ई० में लॉर्ड हार्डिंग ने गवर्नर जनरल का पद संभालने के पश्चात् सिखों के विरुद्ध जोरदार सैनिक तैयारियाँ आरंभ कर दी थीं। उसने कर्नल रिचमंड के स्थान पर लड़ाकू स्वभाव वाले मेजर ब्रॉडफुट को उत्तर-पश्चिमी सीमा का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया। लॉर्ड ग्रफ़ जोकि अंग्रेज़ी सेना का कमांडर-इन-चीफ था, ने अंबाला में अपना हेड क्वार्टर स्थापित कर लिया था। मार्च, 1845 ई० में देश के अन्य भागों से और सेनाएँ फिरोज़पुर, लुधियाना तथा अंबाला में भेजी गईं। इन सैनिक तैयारियों के कारण सिखों एवं अंग्रेजों के बीच परस्पर खाई और बढ़ गई।

6. मेजर ब्रॉडफुट की नियुक्ति (Appointment of Major Broadfoot)-नवंबर, 1844 ई० में मेजर ब्रॉडफुट को मिस्टर क्लार्क के स्थान पर लुधियाना का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया गया। वह सिखों का घोर शत्रु था। वह यह विचार लेकर पंजाब की सीमा पर आया था कि अंग्रेज़ों ने सिखों के साथ युद्ध करने का निर्णय कर लिया है। डॉक्टर फौजा सिंह के अनुसार,
“ब्रॉडफुट की लुधियाना में पोलिटिकल एजेंट के रूप में नियुक्ति एक और सोची-समझी चाल थी जोकि पंजाब में शीघ्र आरंभ होने वाले युद्ध को सामने रखकर की गई थी।”1
ब्रॉडफुट ने बहुत-सी ऐसी कार्यवाइयां की जिनके कारण सिख अंग्रेजों के विरुद्ध भड़क उठे।

7. लाल सिंह व तेजा सिंह द्वारा लड़ाई के लिए उकसाना (Incitement for War by Lal Singh & Teja Singh)-जवाहर सिंह की मृत्यु के बाद लाल सिंह को लाहौर सरकार का नया वज़ीर नियुक्त किया गया। उसने अपने भाई तेजा सिंह को सेनापति के पद पर नियुक्त किया। ये दोनों पहले ही गुप्त रूप से अंग्रेजों से मिले हुए थे। उस समय सिख सेना की शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी। वे चाहते थे कि सिखों की इस शक्तिशाली सेना को अंग्रेजों के साथ लड़वाकर इसे दुर्बल कर दिया जाए। ऐसा करने पर ही वे अपने पदों पर बने रह पाएँगे। इस कारण उन्होंने सिख सेना को अंग्रेजों के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया। उनके भड़काने पर सिख सेना ने 11 दिसंबर, 1845 ई० को सतलुज नदी को पार किया। अंग्रेज़ इसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे। अत: 13 दिसंबर, 1845 ई० को गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने सिख सेना पर यह दोष लगाते हुए युद्ध की घोषणा कर दी कि उसने अंग्रेज़ी क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया है।

1. “The appointment of Broadfoot as political agent at Ludhiana was also a calculated move made with an eye on the fast approaching war with the Punjab.” Dr. Fauja Singh, After Ranjit Singh (New Delhi : 1982) p. 136.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 22 प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम

प्रश्न 4.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के कारण, घटनाएँ तथा परिणामों का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Discuss in brief the causes, events and results of the First Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
अंग्रेज़ों ने महाराजा रणजीत सिंह के समय ही पंजाब का घेराव आरंभ कर दिया था। उन्होंने जानबूझ कर ऐसी नीतियाँ अपनाईं जिनका अंत प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के रूप में हुआ। इस युद्ध के प्रमुख कारणों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—

1. अंग्रेजों की पंजाब का घेरा डालने की नीति (British Policy of Encircling the Punjab) अंग्रेज़ दीर्घकाल से पंजाब को अपने अधीन करने के स्वप्न ले रहे थे। 1809 ई० में अंग्रेज़ों ने रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की संधि करके उसे सतलुज पार के क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोक दिया था। 1835-36 ई० में अंग्रेज़ों ने शिकारपुर पर अधिकार कर लिया। 1835 ई० में अंग्रेजों ने फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में अंग्रेज़ों ने फिरोजपुर में सैनिक छावनी स्थापित कर ली। इसी वर्ष अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह को सिंध की ओर बढ़ने से रोक दिया। अतः पंजाब को हड़प करना अब कुछ ही दिनों की बात रह गई थी। इस कारण अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य युद्ध को टाला नहीं जा सकता था।

2. पंजाब में फैली अराजकता (Anarchy in the Punjab) जून, 1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में अराजकता फैल गई थी। सिंहासन की प्राप्ति के लिए षड्यंत्रों का एक नया दौर आरंभ हुआ। 1839 ई० से लेकर 1845 ई० के 6 वर्ष के समय के दौरान पंजाब में पाँच सरकारें बदलीं। डोगरों ने अपने षड्यंत्रों द्वारा महाराजा रणजीत सिंह के वंश को बर्बाद कर दिया। अंग्रेजों ने इस स्वर्ण अवसर का उचित लाभ उठाया।

3. प्रथम अफ़गान युद्ध में अंग्रेजों की पराजय (Defeat of the British in the First Afghan War)-अंग्रेज़ों को प्रथम बार अफ़गानिस्तान के साथ हुए प्रथम युद्ध (1839-42 ई०) में पराजय का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में हुए भारी विनाश के कारण अंग्रेजों के मान-सम्मान को भारी आघात पहुंचा। अंग्रेज़ अपनी अफगानिस्तान में हुई पराजय के अपयश को किसी अन्य विजय से धोना चाहते थे। यह विजय उन्हें पंजाब में ही मिल सकती थी, क्योंकि उस समय पंजाब की स्थिति बहुत डावांडोल थी।

4. अंग्रेज़ों का सिंध विलय (Annexation of Sind by the British)-सिंध का भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्व था। अत: 1843 ई० में अंग्रेजों ने सिंध पर अधिकार कर लिया। क्योंकि सिख सिंध को अपने साम्राज्य में शामिल करना चाहते थे, इसलिए सिखों एवं अंग्रेजों के परस्पर संबंधों में तनाव और बढ़ गया।

5. अंग्रेजों की सैनिक तैयारियां (Military Preparations of the Britishers)-1844 ई० में लॉर्ड हार्डिंग ने गवर्नर जनरल का पद संभालने के पश्चात् सिखों के विरुद्ध जोरदार सैनिक तैयारियाँ आरंभ कर दी थीं। उसने कर्नल रिचमंड के स्थान पर लड़ाकू स्वभाव वाले मेजर ब्रॉडफुट को उत्तर-पश्चिमी सीमा का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया। लॉर्ड ग्रफ़ जोकि अंग्रेज़ी सेना का कमांडर-इन-चीफ था, ने अंबाला में अपना हेड क्वार्टर स्थापित कर लिया था। मार्च, 1845 ई० में देश के अन्य भागों से और सेनाएँ फिरोज़पुर, लुधियाना तथा अंबाला में भेजी गईं। इन सैनिक तैयारियों के कारण सिखों एवं अंग्रेजों के बीच परस्पर खाई और बढ़ गई।

6. मेजर ब्रॉडफुट की नियुक्ति (Appointment of Major Broadfoot)-नवंबर, 1844 ई० में मेजर ब्रॉडफुट को मिस्टर क्लार्क के स्थान पर लुधियाना का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया गया। वह सिखों का घोर शत्रु था। वह यह विचार लेकर पंजाब की सीमा पर आया था कि अंग्रेज़ों ने सिखों के साथ युद्ध करने का निर्णय कर लिया है। डॉक्टर फौजा सिंह के अनुसार,
“ब्रॉडफुट की लुधियाना में पोलिटिकल एजेंट के रूप में नियुक्ति एक और सोची-समझी चाल थी जोकि पंजाब में शीघ्र आरंभ होने वाले युद्ध को सामने रखकर की गई थी।”1
ब्रॉडफुट ने बहुत-सी ऐसी कार्यवाइयां की जिनके कारण सिख अंग्रेजों के विरुद्ध भड़क उठे।

7. लाल सिंह व तेजा सिंह द्वारा लड़ाई के लिए उकसाना (Incitement for War by Lal Singh & Teja Singh)-जवाहर सिंह की मृत्यु के बाद लाल सिंह को लाहौर सरकार का नया वज़ीर नियुक्त किया गया। उसने अपने भाई तेजा सिंह को सेनापति के पद पर नियुक्त किया। ये दोनों पहले ही गुप्त रूप से अंग्रेजों से मिले हुए थे। उस समय सिख सेना की शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी। वे चाहते थे कि सिखों की इस शक्तिशाली सेना को अंग्रेजों के साथ लड़वाकर इसे दुर्बल कर दिया जाए। ऐसा करने पर ही वे अपने पदों पर बने रह पाएँगे। इस कारण उन्होंने सिख सेना को अंग्रेजों के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया। उनके भड़काने पर सिख सेना ने 11 दिसंबर, 1845 ई० को सतलुज नदी को पार किया। अंग्रेज़ इसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे। अत: 13 दिसंबर, 1845 ई० को गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने सिख सेना पर यह दोष लगाते हुए युद्ध की घोषणा कर दी कि उसने अंग्रेज़ी क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया है।

1. “The appointment of Broadfoot as political agent at Ludhiana was also a calculated move made with an eye on the fast approaching war with the Punjab.” Dr. Fauja Singh, After Ranjit Singh (New Delhi : 1982) p. 136.

I. युद्ध की घटनाएँ (Events of the War)
1. मुदकी की लड़ाई (Battle of Mudki)—अंग्रेज़ों तथा सिखों में पहली महत्त्वपूर्ण लड़ाई 18 दिसंबर, 1845 ई० को मुदकी नामक स्थान पर लड़ी गई थी। इस लड़ाई में सिख सैनिकों की संख्या 5,500 थी और उनका नेतृत्व लाल सिंह कर रहा था। दूसरी ओर अंग्रेज़ सेना की संख्या 12,000. थी और उनका नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था। सिख सेना ने अंग्रेजों के ऐसे दाँत खट्टे किए कि उनमें अफरा-तफरी मच गई। यह देखकर लाल सिंह अपने कुछ सैनिकों को साथ लेकर युद्ध क्षेत्र से भाग गया। परिणामस्वरूप सिख सेना पराजित हुई। प्रसिद्ध इतिहासकार सीता राम कोहली के अनुसार,
“मुदकी की लड़ाई ने अंग्रेजों के इस बढ़ रहे विश्वास को गलत प्रमाणित कर दिया कि सिखों का सामना करना कोई मुश्किल कार्य नहीं है।”2

2. फिरोजशाह की लड़ाई (Battle of Ferozeshah)-सिखों और अंग्रेजों में दूसरी प्रसिद्ध लड़ाई फिरोज़शाह में 21 दिसंबर, 1845 ई० को लड़ी गई। इसमें अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व ह्यूग गफ़, जॉन लिटलर तथा लॉर्ड हार्डिंग कर रहे थे। सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह एवं तेजा सिंह कर रहे थे। इस लड़ाई में सिखों ने अंग्रेज़ों के ऐसे छक्के छुड़ाए कि एक बार तो उन्हें नानी याद आ गई। अंग्रेजों ने बिना शर्त शस्त्र फेंकने के संबंध में विचार करना आरंभ किया। ठीक उस समय लाल सिंह और तेजा सिंह ने गद्दारी की तथा अपने सैनिकों को लेकर रणभूमि से भाग गए। इस प्रकार विजित हुई खालसा सेना सेनापतियों की गद्दारी के कारण पराजित हुई। जनरल हैवलाक का कहना था कि,
“इस प्रकार की एक और लड़ाई साम्राज्य को हिला देगी।”3

3. बद्दोवाल की लड़ाई (Battle of Baddowal)-लाहौर दरबार के निर्देश पर रणजोध सिंह, 10,000 सैनिकों को साथ लेकर लुधियाना से 18 मील दूर स्थित बद्दोवाल पहुँचा। 21 जनवरी, 1846 ई० को बद्दोवाल के स्थान पर हुई इस लड़ाई में सिख बहुत वीरता से लड़े। सिखों ने अंग्रेजों के शस्त्र तथा खाद्य सामग्री भी लूट ली। अंग्रेज़ हार कर लुधियाना की ओर भाग गए।

4. अलीवाल की लड़ाई (Battle of Aliwal) रणजोध सिंह अपने सैनिकों को साथ लेकर अलीवाल की ओर चल पड़ा। अलीवाल में सिख अभी अपने मोर्चे लगा रहे थे कि अचानक 28 जनवरी, 1846 ई० के दिन हैरी स्मिथ के अधीन अंग्रेज़ी सेना ने सिखों पर आक्रमण कर दिया। यह लड़ाई बहुत भयानक थी। रणजोध सिंह की गद्दारी के कारण इस लड़ाई में अंग्रेजों की विजय हुई।

5. सभराओं की लड़ाई (Battle of Sobraon)—सभराओं की लड़ाई सिखों एवं अंग्रेजों के प्रथम युद्ध की अंतिम लड़ाई थी। इस लड़ाई से पूर्व 30,000 सिख सैनिक सभराओं पहुँच चुके थे। लाल सिंह तथा तेजा सिंह सिख सेना का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेजी सेना की कुल संख्या 15,000 थी। लॉर्ड ह्यूग गफ़ तथा लॉर्ड हार्डिंग इस सेना का नेतृत्व कर रहे थे। 10 फरवरी, 1846 ई० वाले दिन अंग्रेज़ों ने सिख सेना पर आक्रमण कर दिया। ठीक इसी समय पूर्व निर्मित योजनानुसार लाल सिंह और तेजा सिंह मैदान से भाग गए। फलस्वरूप सिख सेना बिखरने लग पड़ी। ऐसे अवसर पर सरदार शाम सिंह अटारीवाला आगे आए। उनकी बहादुरी और कुशलता देखकर अंग्रेज़ भी हैरान रह गए। शाम सिंह अटारीवाला की शहीदी के कारण सिख सेना का साहस टूट गया। इस प्रकार अंततः इस लड़ाई में अंग्रेज़ विजयी रहे। एच० एस० भटिया एवं एस० आर० बक्शी के अनुसार, “सभराओं की लड़ाई प्रत्येक पक्ष से निर्णायक थी।”4

2. “The battle of Mudki served to dispel a notion that had gained credence with the British that the Sikhs were no great force to be reckoned with.” S.R. Kohli, Sunset of the Sikh Empire (Bombay : 1967) pp. 107-108.
3. “Another such action will shake the Empire.” General Havelock.
4. “The battle of Sobraon was decisive in every respect.” H.S. Bhatia and S.R. Bakshi, Encyclopaedic History of the Sikhs and Sikhism (New Delhi : 1999) Vol. IV, p. 174.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 22 प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के मुख्य कारणों का संक्षिप्त ब्योरा दें।
(Give a brief description of the main causes of the First Anglo-Sikh War.)
अथवा
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के कोई तीन कारण बताएँ।
(Briefly describe the three main causes of the First Anglo-Sikh War.)
अथवा
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के लिए उत्तरदायी किन्हीं तीन कारणों की चर्चा कीजिए। (Describe any three causes responsible for the First Anglo-Sikh War.)
उत्तर-

  1. पंजाब को अपने अधीन करने के लिए अंग्रेजों ने पंजाब को चारों ओर से घेरा डालना आरंभ कर दिया था।
  2. महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई थी।
  3. अंग्रेज़ पंजाब पर विजय प्राप्त करके अफ़गानिस्तान में हुई अपनी बदनामी को दूर करना चाहते थे।
  4. सिखों के नेता लाल सिंह और तेजा सिंह खालसा फ़ौज को अंग्रेजों के साथ लड़वा कर इसे कमज़ोर करना चाहते थे।
  5. 1844 ई० में मेजर ब्राडफुट की नियुक्ति ने अग्नि में घी डालने का कार्य किया।

प्रश्न 2.
मुदकी की लड़ाई पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a brief note on the battle of Mudki.)
उत्तर-
अंग्रेज़ों तथा सिखों में पहली महत्त्वपूर्ण लड़ाई 18 दिसंबर, 1845 ई० को मुदकी नामक स्थान पर लड़ी गई थी। इस लड़ाई में सिख सैनिकों का नेतृत्व लाल सिंह कर रहा था। दूसरी ओर अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था। अंग्रेज़ों का विचार था कि वह सिख सेना को सहजता से हरा देंगे, परंतु सिख सेना ने अंग्रेजों के ऐसे दाँत खट्टे किए कि उनमें हफरा-तफरी मच गई। यह देखकर लाल सिंह युद्ध क्षेत्र से भाग गया। अतः सिख सेना की पराजय हुई।

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प्रश्न 3.
फिरोज़शाह अथवा फेरूशहर की लड़ाई के संबंध में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the battle of Ferozshah or Pherushahar ?)
उत्तर-
21 दिसंबर, 1845 ई० को फिरोजशाह अथवा फेरूशहर नामक स्थान पर सिखों तथा अंग्रेजों के मध्य एक ज़बरदस्त लड़ाई हुई। इस लड़ाई में अंग्रेजों के सैनिकों का नेतृत्व लॉर्ड हग गफ़, जान लिटलर और लॉर्ड हार्डिंग जैसे अनुभवी सेनापति कर रहे थे। दूसरी ओर सिख सैनिकों का नेतृत्व लाल सिंह तथा तेजा सिंह जैसे देशद्रोही तथा विश्वासघाती कर रहे थे। उनके द्वारा की गई गद्दारी के कारण सिख सेना की पराजय हुई।

प्रश्न 4.
सभराओं की लड़ाई के संबंध में एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a brief note on the battle of Sobraon.)
उत्तर-
सभराओं की लड़ाई सिखों तथा अंग्रेजों के मध्य लड़े जाने वाले प्रथम युद्ध की अंतिम लड़ाई थी। यह लड़ाई 10 फरवरी, 1846 ई० को लड़ी गई थी। अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यग गफ़ तथा लॉर्ड हार्डिंग कर रहे थे। दूसरी ओर सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह तथा तेजा सिंह कर रहे थे। इस लड़ाई में शाम सिंह अटारीवाला ने अपनी वीरता से अंग्रेज़ों के खूब दाँत खट्टे किए। इस लड़ाई के अंत में सिखों को हार का सामना करना पड़ा।

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प्रश्न 5.
लाहौर की संधि (9 मार्च, 1846 ई०) पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। [Write a brief note on the Treaty of Lahore (9 March, 1846.)] .
अथवा
लाहौर की संधि के विषय में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the Treaty of Lahore ?)
अथवा
1846 ई० की लाहौर की संधि की कोई पाँच धाराएँ लिखें। (Write any five conditions of the Treaty of Lahore of 1846.)
उत्तर-

  1. अंग्रेज़ी सरकार तथा महाराजा दलीप सिंह तथा उसके उत्तराधिकारियों में सदैव मित्रता बनी रहेगी।
  2. लाहौर के महाराजा ने सतलुज दरिया के दक्षिण में स्थित सभी प्रदेशों पर सदा के लिए अपना अधिकार छोड़ दिया।
  3. महाराजा ने सतलुज और ब्यास नदियों के मध्य सभी क्षेत्र एवं दुर्ग अंग्रेज़ों को सुपुर्द कर दिए।
  4. अंग्रेजों ने युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 1.50 करोड़ रुपए की बड़ी राशि की माँग की।
  5. अंग्रेजों ने दलीप सिंह को लाहौर का महाराजा, रानी जिंदां को महाराजा का संरक्षक तथा लाल सिंह को प्रधानमंत्री स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 6.
भैरोवाल की संधि के संबंध में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the Treaty of Bhairowal ?) ..
अथवा
भैरोवाल की संधि पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
(Write a short note on the Treaty of Bhairowal.)
अथवा
भैरोवाल की संधि की मुख्य शर्ते लिखें। (Write the main clauses of the Treaty of Bhairowal.)
उत्तर-
भैरोवाल की संधि अंग्रेज़ों तथा लाहौर दरबार के मध्य 16 दिसंबर, 1846 ई० को की गई थी। इस संधि के अनुसार लाहौर दरबार का प्रशासन चलाने के लिए एक ब्रिटिश रेज़िडेंट नियुक्त किया गया। रेज़िडेंट की सहायता के लिए आठ सदस्यीय परिषद् बनाई गई। रानी जिंदां को शासन व्यवस्था से अलग कर उसकी वार्षिक पेंशन निश्चित कर दी गई। महाराजा की सुरक्षा तथा राज्य में शांति के लिए एक ब्रिटिश सेना रखने का निर्णय किया गया। भैरोवाल की संधि द्वारा अंग्रेजों ने पंजाब को काफ़ी शक्तिहीन बना दिया।

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प्रश्न 7.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के प्रभावों का अध्ययन कीजिए। (Study in brief the results of First Anglo-Sikh War.)
अथवा
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के परिणामों का संक्षिप्त विवरण दें।
(Give in brief the results of First Anglo-Sikh War.)
अथवा
प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के क्या परिणाम निकले ?
(What were the results of the First Anglo-Sikh War?)
उत्तर-

  1. लाहौर के महाराजा ने सतलुज दरिया के दक्षिण में स्थित सभी प्रदेशों पर सदा के लिए अपना अधिकार छोड़ना स्वीकार कर लिया।
  2. अंग्रेजों ने युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 1.50 करोड़ रुपये की माँग की।
  3. अंग्रेजों ने दलीप सिंह को लाहौर का महाराजा, रानी जिंदां को महाराजा का संरक्षक तथा लाल सिंह को प्रधानमंत्री स्वीकार कर लिया।
  4. भैरोवाल की संधि के अनुसार यह निर्णय लिया गया कि अंग्रेजी सरकार लाहौर सरकार के सभी विभागों की देख-रेख के लिए ब्रिटिश रेज़िडेंट नियुक्त करेगी।
  5. महारानी जिंदां को शासन प्रबंध से अलग कर दिया गया तथा उसकी 17 लाख रुपए सालाना पैंशन लगा दी गई।

प्रश्न 8.
शाम सिंह अटारीवाला पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a brief note on Sham Singh Attariwala.)
उत्तर-
शाम सिंह अटारीवाला सिख पंथ के एक महान् योद्धा थे। 18 वर्ष की आयु में शाम सिंह अटारीवाला भी महाराजा रणजीत की सेना में शामिल हो गए। अंग्रेजों तथा सिखों के मध्य हुई 10 फरवरी, 1846 ई० को सभराओं की लड़ाई में शाम सिंह अटारीवाला ने भी भाग लिया। लाल सिंह और तेजा सिंह जो सिख सेना का नेतृत्व कर रहे थे। अचानक लड़ाई के मैदान में से भाग गए। ऐसे अवसर पर सरदार शाम सिंह अटारीवाला सत् श्री अकाल के जयकार गुंजाते हुए शत्रु पर टूट पड़े। अंत में वह लड़ते-लड़ते शहीद हो गए।

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प्रश्न 9.
पहले अंग्रेज़-सिख युद्ध के पीछे अंग्रेजों ने पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल क्यों नहीं किया ?
(Why the British did not annex the Punjab to their empire after the First Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-

  1. यदि पंजाब को उस समय अंग्रेज़ी साम्राज्य में सम्मिलित करने की घोषणा कर दी जाती तो सिख सैनिक अंग्रेजों की सिरदर्दी का बहुत बड़ा कारण बन सकते थे।
  2. अंग्रेज़ चाहते थे कि पंजाब अंग्रेज़ी राज्य तथा अफ़गानिस्तान के मध्य मध्यवर्ती राज्य का काम देता रहे।
  3. पंजाब को नियंत्रण में रखने के लिए अंग्रेज़ों को भारी संख्या में अंग्रेज़ सैनिक पंजाब में रखने पड़ते। इनसे अंग्रेजों के खर्च में काफ़ी वृद्धि हो जाती।
  4. गवर्नरजनरल का मत है कि पंजाब प्रांत आर्थिक रूप से अंग्रेजों के लिए लाभप्रद सिद्ध नहीं हो सकेगा।
  5. पंजाब को शक्ति की अपेक्षा दुर्बलता का स्रोत समझा जाता था।

प्रश्न 10.
प्रथम अंग्रेज़-सिख युद्ध में सिखों की हार के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए।
(Write main reasons of the defeat of the Sikhs in the First Anglo-Sikh War.).
उत्तर-

  1. प्रथम अंग्रेज़-सिख युद्ध में सिखों की हार का सबसे मुख्य कारण लाल सिंह और तेजा सिंह की गद्दारी थी।
  2. सिख सेना में जो यूरोपियन अधिकारी भर्ती किए हुए थे। वे सिख राज्य के सभी भेद अंग्रेज़ों को देते रहे।
  3. उस समय अंग्रेज़ संसार की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति के साथ संबंध रखते थे।
  4. अंग्रेज़ों के साधन सिखों की तुलना में बहुत अधिक थे।
  5. अंग्रेजों के सेनापतियों को युद्धों का बहुत अनुभव था।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
महाराजा दलीप सिंह किस का पुत्र था ?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह।

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह ने कब-से-कब तक शासन किया ?
उत्तर-
1843 ई० से 1849 ई० तक।

प्रश्न 3.
प्रथम तथा द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध के समय पंजाब का महाराजा कौन था ?
उत्तर-
महाराजा दलीप सिंह।

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प्रश्न 4.
लाल सिंह कौन था ?
उत्तर-
लाहौर दरबार का प्रधानमंत्री।

प्रश्न 5.
तेजा सिंह कौन था ?
उत्तर-
खालसा सेना का सेनापति।

प्रश्न 6.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध कब लड़ा गया ?
अथवा
अंग्रेजों एवं सिखों के मध्य प्रथम युद्ध कब हुआ?
अथवा
अंग्रेजों की सिखों के साथ पहली लड़ाई कब हुई ?
उत्तर-
1845-46 ई०।

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प्रश्न 7.
प्रथम ऐंग्लो सिख युद्ध के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था ?
उत्तर-
लॉर्ड हार्डिंग।

प्रश्न 8.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के लिए उत्तरदायी कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर-
अंग्रेजों ने पंजाब का चारों ओर से घेराव आरंभ कर दिया था।

प्रश्न 9.
मुदकी की लड़ाई कब हुई थी ?
उत्तर-
18 दिसंबर, 1845 ई०।

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प्रश्न 10.
फिरोजशाह अथवा फेरूशहर की लड़ाई कब हुई थी ?
उत्तर-
21 दिसंबर, 1845 ई०

प्रश्न 11.
सभराओं की लड़ाई कब लड़ी गई थी ?
उत्तर-
10 फरवरी, 1846 ई०।

प्रश्न 12.
सभराओं की लड़ाई में बहादुरी से लड़ता हुआ सिखों का कौन-सा सेनापति शहीद हुआ था?
उत्तर-
शाम सिंह अटारीवाला।

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प्रश्न 13.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध किस लड़ाई से समाप्त हुआ था ?
उत्तर-
सभराओं की लड़ाई।

प्रश्न 14.
अंग्रेजों तथा सिखों के मध्य प्रथम युद्ध में पराजय किसकी हुई थी?
उत्तर-
सिखों की।

प्रश्न 15.
अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य पहला युद्ध किस संधि के साथ समाप्त हुआ था?
उत्तर-
लाहौर की संधि।

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प्रश्न 16.
लाहौर की संधि कब की गई थी ?
उत्तर-
9 मार्च, 1846 ई०।

प्रश्न 17.
भैरोवाल की संधि कब हुई थी ?
उत्तर-
16 दिसंबर, 1846 ई० को।

प्रश्न 18.
भैरोवाल की संधि की एक मुख्य शर्त क्या थी ?
उत्तर-
लाहौर दरबार के सारे विभागों की देख-रेख एक ब्रिटिश रेजिडेंट करेगा।

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प्रश्न 19.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने कश्मीर किसे दे दिया ?
उत्तर-
गुलाब सिंह।

प्रश्न 20.
पहले ऐंग्लो-सिख युद्ध में सिखों की पराजय का मुख्य कारण कौन-सा था ?
उत्तर-
उनके नेताओं द्वारा किया गया विश्वासघात।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मौत के पश्चात् पंजाब का महाराजा…………………..बना।
उत्तर-
(खड़क सिंह)

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प्रश्न 2.
अंग्रेजों ने सिंध पर………में कब्जा कर लिया।
उत्तर-
(1843 ई०)

प्रश्न 3.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध………में हुआ।
उत्तर-
(1845-46 ई०)

प्रश्न 4.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पंजाब का महाराजा………था।
उत्तर-
(दलीप सिंह)

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प्रश्न 5.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय खालसा और फौज का सेनापति………..था।
उत्तर-
(तेजा सिंह)

प्रश्न 6.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय लाहौर दरबार का प्रधान मंत्री………था।
उत्तर-
(लाल सिंह)

प्रश्न 7.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय अंग्रेज़ी फौज का सर्वोच्च कमांडर……………था।
उत्तर-
(लार्ड ह्यूग गफ़)

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प्रश्न 8.
मुदकी की लड़ाई………….को हुई।
उत्तर-
(18 दिसंबर, 1845 ई०)

प्रश्न 9.
फिरोजशाह की लड़ाई………….को हुई।
उत्तर-
(21 दिसंबर, 1845 ई०)

प्रश्न 10.
सभराओं की लड़ाई………….को हुई।
उत्तर-
(10 फरवरी, 1846 ई०)

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प्रश्न 11.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध का अंत…………की लड़ाई से हुआ।
उत्तर-
(सभराओं)

प्रश्न 12.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध………….की संधि के साथ समाप्त हुआ।
उत्तर-
(लाहौर)

प्रश्न 13.
भैरोवाल की संधि…………..को हुई।
उत्तर-
(16 दिसंबर, 1846 ई०)

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(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध 1947 ई० में हुआ।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पंजाब का महाराजा शेर सिंह था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 3.
लॉर्ड हार्डिंग, ऐलन ब्रो के बाद गवर्नर जनरल बना।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 4.
लार्ड ह्यूग गफ़ प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय अंग्रेज़ी सेना का कमांडर-इन-चीफ़ था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय लाल सिंह खालसा फ़ौज का सेनापति था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय लाल सिंह लाहौर दरबार में प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 7.
मुदकी की लड़ाई 21 दिसंबर, 1845 ई० को हुई।।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 8.
फिरोजशाह की लड़ाई 21 दिसंबर, 1845 ई० को हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 9.
अलीवाल की लड़ाई 21 जनवरी, 1846 ई० को हुई थी।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 10.
अलीवाल की लड़ाई में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व हैरी स्मिथ ने किया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 11.
सभराओं की लड़ाई 10 फरवरी, 1846 ई० को लड़ी गई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
सभराओं की लड़ाई में सिख विजयी रहे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 13.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध भैरोवाल की संधि के साथ समाप्त हुआ।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 14.
अंग्रेज़ी सरकार व लाहौर दरबार के मध्य लाहौर की संधि 9 मार्च, 1846. ई० को हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 15.
अंग्रेज़ों व सिखों के मध्य भैरोवाल की संधि 16 दिसंबर, 1846 ई० को हुई।
उत्तर-
ठीक

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(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
प्रथम तथा द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध के समय पंजाब का महाराजा कौन था ?
(i) महाराजा दलीप सिंह
(ii) महाराजा रणजीत सिंह
(iii) महाराज खड़क सिंह
(iv) महाराजा शेर सिंह।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 2.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था ?
(i) लॉर्ड डलहौज़ी
(ii) लॉर्ड हार्डिंग
(iii) लॉर्ड रिपन
(iv) लॉर्ड डफरिन।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 3.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध कब लड़ा गया ?
(i) 1839-40 ई० में
(ii) 1841-42 ई० में ।
(iii) 1843-44 ई० में
(iv) 1845-46 ई० में।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 4.
लाल सिंह लाहौर दरबार में किस पद पर नियुक्त थे?
(i) विदेश मंत्री
(ii) प्रधानमंत्री
(iii) मुख्य सेनापति
(iv) दीवान।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 5.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय लाल सिंह कौन था?
(i) सेनापति
(ii) महाराजा
(iii) प्रधानमंत्री
(iv) विदेश मंत्री।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 6.
अंग्रेज़ों ने सिंध पर कब अधिकार कर लिया था ?
(i) 1842 ई० में
(ii) 1843 ई० में
(iii) 1844 ई० में
(iv) 1845 ई० में।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 7.
गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने सिखों के साथ युद्ध की घोषणा कब की ?
(i) 1848 ई०
(ii) 1849 ई०
(iii) 1865 ई०
(iv) 1845 ई०।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 8.
प्रथम तथा द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय अंग्रेजी सेना का कमांडर-इन-चीफ कौन था ?
(i) लॉर्ड ह्यूग मफ़
(ii) लॉर्ड डफरिन
(iii) मेजर ब्रॉडफुट
(iv) रॉबर्ट कस्ट।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 9.
मुदकी की लड़ाई कब लड़ी गई ?
(i) 12 दिसंबर, 1844 ई०
(ii) 12 दिसंबर, 1845 ई०
(iii) 18 दिसंबर, 1845 ई०
(iv) 18 दिसंबर, 1846 ई०
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 10.
फिरोजशाह की लड़ाई कब की गई थी ?
(i) 18 दिसंबर, 1845 ई०
(ii) 19 दिसंबर, 1845 ई०
(iii) 20 दिसंबर, 1845 ई०
(iv) 21 दिसंबर, 1845 ई०
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 11.
सभराओं की लड़ाई कब लड़ी गई ?
(i) 21 दिसंबर, 1845 ई०
(ii) 10 फरवरी, 1846 ई०
(iii) 15 फरवरी, 1846 ई०
(iv) 10 फरवरी, 1847 ई०
उत्तर-
(i)

प्रश्न 12.
अंग्रेजों और सिखों में प्रथम युद्ध कौन-सी संधि के साथ समाप्त हुआ ?
(i) लाहौर की संधि
(ii) अमृतसर की संधि
(iii) भैरोवाल की संधि
(iv) त्रिपक्षीय संधि।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 13.
लाहौर की संधि कब हुई थी ?
(i) 10 फरवरी, 1845 ई०
(ii) 10 फरवरी, 1846 ई०
(iii) 7 मार्च, 1846 ई०
(iv) 9 मार्च, 1846 ई०।।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 14.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने कश्मीर किसको दे दिया?
(i) गुलाब सिंह को
(ii) ध्यान सिंह को
(iii) हीरा सिंह को
(iv) हरी सिंह को।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 15.
भैरोवाल की संधि कब हुई थी ?
(i) 9 मार्च, 1846 ई०
(ii) 11 मार्च, 1846 ई०
(iii) 16 दिसंबर, 1846 ई०
(iv) 26 दिसंबर, 1846 ई०।
उत्तर-
(iii)

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Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के कारणों की व्याख्या कीजिए। (Give a description of the causes of the First Anglo-Sikh War.)
अथवा
पहले ऐंग्लो-सिख युद्ध के छः मुख्य कारण क्या थे ?
(What were the six main causes of First Anglo-Sikh War ?) :
अथवा
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के कोई छः कारण बताएँ।
(Briefly describe any six main causes of the First Anglo-Sikh War.)
अथवा
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के लिए उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिए। (Discuss the causes responsible for the First Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
1. अंग्रेजों की पंजाब का घेरा डालने की नीति –अंग्रेज़ दीर्घकाल से पंजाब को अपने अधीन करने के स्वप्न ले रहे थे। 1809 ई० में अंग्रेजों ने रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की संधि करके उसे सतलुज पार के क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोक दिया था। 1835-36 ई० में अंग्रेजों ने शिकारपुर पर अधिकार कर लिया। 1835 ई० में अंग्रेजों ने फिरोज़पुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में अंग्रेजों ने फिरोज़पुर में सैनिक छावनी स्थापित कर ली। इस कारण अंग्रेजों तथा सिखों के मध्य युद्ध को टाला नहीं जा सकता था।

2. पंजाब में फैली अराजकता-जून, 1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में अराजकता फैल गई थी। सिंहासन की प्राप्ति के लिए षड्यंत्रों का एक नया दौर आरंभ हुआ। 1839 ई० से लेकर 1845 ई० के 6 वर्ष के समय के दौरान पंजाब में पाँच सरकारें बदलीं। डोगरों ने अपने षड्यंत्रों द्वारा महाराजा रणजीत सिंह के वंश को बर्बाद कर दिया। अंग्रेजों ने इस स्वर्ण अवसर का उचित लाभ उठाया।

3. प्रथम अफ़गान युद्ध में अंग्रेजों की पराजय-अंग्रेजों को प्रथम बार अफ़गानिस्तान के साथ हुए प्रथम युद्ध (1839-42 ई०) में पराजय का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में हुए भारी विनाश के कारण अंग्रेज़ों के मान-सम्मान को भारी आघात पहुँचा। अंग्रेजों ने अपने यश को पुनः प्राप्त करने के उद्देश्य से अपना रुख पंजाब की ओर किया । क्योंकि उस समय पंजाब की स्थिति बहुत डावाँडोल थी।

4. अंग्रेज़ों का सिंध पर अधिकार-सिंध का भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्व था। अतः 1843 ई० में अंग्रेज़ों ने सिंध पर अधिकार कर लिया। क्योंकि सिख सिंध को अपने साम्राज्य में शामिल करना चाहते थे, इसलिए सिखों एवं अंग्रेजों के परस्पर संबंधों में तनाव और बढ़ गया।

5. अंग्रेजों की सैनिक तैयारियाँ-लॉर्ड हार्डिंग ने 1844 ई० में गवर्नर-जनरल का पद संभालने के पश्चात् सिखों के विरुद्ध जोरदार सैनिक तैयारियाँ आरंभ कर दी। अंग्रेज़ी सेना ने पंजाब को चारों तरफ से घेराव करना शुरू कर दिया था। इसने स्थिति को और अधिक विस्फोटक बना दिया था।

6. मेजर ब्रॉडफुट की नियुक्ति-नवंबर, 1844 ई० में मेजर ब्रॉडफुट को मिस्टर क्लार्क के स्थान पर लुधियाना का पोलिटिकल एजेंट नियुक्त किया गया। वह सिखों का घोर शत्रु था। ब्रॉडफुट ने बहुत-सी ऐसी कार्यवाइयाँ की जिनके कारण सिख अंग्रेजों के विरुद्ध भड़क उठे।

प्रश्न 2.
मुदकी की लड़ाई पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a brief note on the battle of Mudki.)
उत्तर-
अंग्रेज़ों तथा सिखों में पहली महत्त्वपूर्ण लड़ाई 18 दिसंबर, 1845 ई० को मुदकी नामक स्थान पर लड़ी गई थी। इस लड़ाई में सिख सैनिकों की संख्या 5,500 थी और उनका नेतृत्व लाल सिंह कर रहा था। दूसरी ओर अंग्रेज सेना की संख्या 12,000 थी और उनका नेतृत्व लॉर्ड ह्यग गफ़ कर रहा था। अंग्रेजों का विचार था कि वह सिख सेना को सहजता से हरा देंगे, परंतु सिख सेना ने अंग्रेजों के ऐसे दाँत खट्टे किए कि उनमें अफरा-तफरी मच गई। यह देखकर लाल सिंह घबरा गया। वह तो सिख सेना को मरवाने आया था, परंतु यहाँ तो इसके विपरीत बात हो रही थी। यह देख कर लाल सिंह अपने कुछ सैनिकों को साथ लेकर युद्ध क्षेत्र से भाग गया। सिख सेना फिर भी अंग्रेज़ों का वीरता से सामना करती रही, परंतु सेनापति के बिना और अल्पसंख्या के कारण अंततः उसकी पराजय हुई। यह विजय अंग्रेज़ों को बहुत महँगी पड़ी क्योंकि इस लड़ाई में उनके कई प्रसिद्ध योद्धा मारे गये थे।

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प्रश्न 3.
फिरोजशाह अथवा फेरूशहर की लड़ाई के संबंध में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the battle of Ferozshah or Pherushahar ?)
उत्तर-
21 दिसंबर, 1845 ई० को फिरोज़शाह अथवा फेरूशहर नामक स्थान पर सिखों तथा अंग्रेजों के मध्य एक ज़बरदस्त लड़ाई हुई। इस लड़ाई में अंग्रेजों की सैनिक संख्या 17 हज़ार थी और उनके पास 69 तोपें थीं। उनका नेतृत्व लॉर्ड ह्यग गफ़, जान लिटलर और लॉर्ड हार्डिंग जैसे अनुभवी सेनापति कर रहे थे। दूसरी ओर सिख सैनिकों की संख्या 25-30 हज़ार थी और उनके पास 100 तोपें थीं। सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह तथा तेजा सिंह जैसे देश-द्रोही तथा विश्वासघाती कर रहे थे। इस लड़ाई में सिखों ने अंग्रेजों के ऐसे छक्के छुड़ाए कि उन्हें नानी स्मरण हो आई। वे बिना शर्त सिखों के आगे समर्पण करने के बारे विचार करने लगे, परंतु भाग्य अंग्रेज़ों के साथ था। लाल सिंह और तेजा सिंह की गद्दारी के कारण अंतत: 22 दिसंबर को सिख सेना की पराजय हुई।

प्रश्न 4.
सभराओं की लड़ाई के संबंध में एक नोट लिखें। (Write a note on the battle of Sobraon.)
उत्तर-
सभराओं की लड़ाई सिखों तथा अंग्रेज़ों के मध्य लड़े जाने वाले प्रथम युद्ध की अंतिम लड़ाई थी जो 10 फरवरी, 1846 ई० को लड़ी गई थी। इस लड़ाई के लिए सिखों तथा अंग्रेजों ने विशाल तैयारियाँ की थीं। अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यग गफ़, लॉर्ड हार्डिंग तथा कई अन्य अनुभवी सेनापति कर रहे थे। दूसरी ओर सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह तथा तेजा सिंह कर रहे थे। इन दोनों गद्दारों ने लड़ाई से पूर्व ही अंग्रेज़ों को महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ दे दी थीं। इस निर्णायक लड़ाई में शाम सिंह अटारीवाला ने अपनी वीरता से अंग्रेजों के खूब दाँत खट्टे किए। दूसरी ओर लाल सिंह तथा तेजा सिंह युद्ध क्षेत्र से भाग निकले और जाते-जाते सतलुज नदी पर बनाए किश्तियों के पुल को भी तोड़ गए। इस कारण सिखों की भारी क्षति हुई और आखिर इस लड़ाई में उनकी पराजय हुई।

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प्रश्न 5.
लाहौर की संधि (9 मार्च, 1846 ई०) पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। [Write a brief note on the Treaty of Lahore (9 March, 1846.)]
उत्तर-
अंग्रेज़ों एवं सिखों के मध्य हुए प्रथम युद्ध के परिणामस्वरूप अंग्रेजी सरकार तथा लाहौर दरबार के मध्य 9 मार्च, 1846 ई० को एक संधि हुई। यह संधि इतिहास में ‘लाहौर की संधि’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस संधि की मुख्य शर्ते ये थीं—

  1. अंग्रेज़ी सरकार तथा महाराजा दलीप सिंह तथा उसके उत्तराधिकारियों में सदैव शाँति तथा मित्रता बनी रहेगी।
  2. लाहौर के महाराजा ने अपने और अपने उत्तराधिकारी की ओर से सतलुज दरिया के दक्षिण में स्थित सभी प्रदेशों पर सदा के लिए अपना अधिकार छोड़ना स्वीकार कर लिया।
  3. महाराजा ने सतलुज और ब्यास नदियों के मध्य सभी मैदानी और पर्वती क्षेत्र एवं दुर्ग अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिए।
  4. अंग्रेजों ने युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 1.50 करोड़ रुपए की बड़ी राशि की माँग की।
  5. लाहौर राज्य की सेना घटा कर पैदल सेना की संख्या 20,000 और घुड़सवार सेना की संख्या 12,000 निश्चित कर दी गई।
  6. जब कभी आवश्यकता हो अंग्रेज़ी सेनाएँ बिना किसी बाधा के लाहौर में से गुज़र सकेंगी।
  7. अंग्रेजों ने दलीप सिंह को लाहौर का महाराजा, रानी जिंदां को महाराजा की संरक्षिका तथा लाल सिंह को प्रधानमंत्री स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 6.
भैरोवाल की संधि के संबंध में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the Treaty of Bhairowal ?)
अथवा
भैरोवाल की संधि पर एक नोट लिखिए। (Write a note on the Treaty of Bhairowal.)
उत्तर-
यह संधि अंग्रेजों तथा लाहौर दरबार के मध्य 16 दिसंबर, 1846 ई० को की गई थी। इस संधि के अनुसार लाहौर दरबार का प्रशासन चलाने के लिए एक ब्रिटिश रेजीडेंट नियुक्त किया गया। महारानी जिंदां को राज परिवार से अलग करके उनकी डेढ़ लाख रुपए वार्षिक पेंशन निश्चित कर दी गई। रेजीडेंट की सहायता के लिए आठ सदस्यीय परिषद् बनाई गई। महाराजा की सुरक्षा तथा राज्य में शांति बनाए रखने के लिए एक ब्रिटिश सेना रखने का निर्णय किया गया। इस सेना के व्यय के लिए लाहौर दरबार ने अंग्रेजों को 22 लाख रुपए वार्षिक देना मान लिया। इस संधि की शर्ते महाराजा दलीप सिंह के वयस्क होने तक अर्थात् 4 सितंबर, 1854 ई० तक लागू रहनी थीं। भैरोवाल की संधि द्वारा अंग्रेजों ने यद्यपि पंजाब पर अधिकार नहीं किया था, परंतु इसे काफ़ी शक्तिहीन बना दिया था। वास्तव में अंग्रेज़ पंजाब के शासक बन गए थे और सिखों का शासन नाममात्र ही रह गया था।

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प्रश्न 7.
प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के क्या परिणाम निकले ?
(What was the results of First Anglo-Sikh War ?)
अथवा
प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के क्या प्रभाव पड़े ?
(What were the effects of First Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। यह युद्ध 1846 ई० को लाहौर की संधि के अनुसार समाप्त हुआ। इस संधि के अनुसार—

  1. लाहौर के महाराजा ने अपने और अपने उत्तराधिकारियों की ओर से सतलुज दरिया के दक्षिण में स्थित सभी प्रदेशों पर सदा के लिए अपना अधिकार छोड़ना स्वीकार कर लिया।
  2. अंग्रेजों ने युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 1.50 करोड़ रुपये की माँग की।
  3. लाहौर राज्य की सेना घटाकर पैदल सेना. 20,000 और घुड़सवार सेना 12,000 निश्चित कर दी गई।
  4. जब कभी आवश्यकता हो, अंग्रेज़ी सेनाएँ बिना किसी बाधा के लाहौर राज्य में से गुज़र सकेंगी।
  5. अंग्रेज़ों ने दलीप सिंह को लाहौर का महाराजा, रानी जिंदां को महाराजा की संरक्षिका तथा लाल सिंह को प्रधानमंत्री स्वीकार कर लिया।

16 दिसंबर, 1846 ई० को भैरोवाल की संधि के अनुसार यह निर्णय लिया गया कि

  1. अंग्रेजी सरकार लाहौर सरकार के सभी विभागों की देख-रेख के लिए ब्रिटिश रेजीडेंट नियुक्त करेगी।
  2. जब तक महाराजा दलीप सिंह नाबालिग रहेगा (अर्थात् सितंबर, 1854 ई० तक) राज्य की शासन-व्यवस्था आठ सरदारों की एक कौंसिल ऑफ रीजैंसी द्वारा चलाई जाएगी।
  3. महारानी जिंदां को शासन-प्रबंध से पृथक् कर दिया तथा यह निर्णय हुआ कि उसे 17 लाख रुपए वार्षिक पेंशन दी जाएगी।

प्रश्न 8.
शाम सिंह अटारीवाला पर एक नोट लिखें। (Write a note on Sham Singh Attariwala.)
उत्तर-
शाम सिंह अटारवाला सिख पंथ के एक महान् योद्धा थे। वह अमृतसर के अटारी गाँव के निवासी थे। उनके पिता सरदार निहाल सिंह महाराजा रणजीत सिंह की सेवा में थे। 18 वर्ष की आयु में शाम सिंह अटारीवाला महाराजा की सेना में भर्ती हुए। वह महाराजा रणजीत सिंह के अनेक सैनिक अभियानों में सम्मिलित हुए थे। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब में व्याप्त अराजकता के कारण तथा अंग्रेजों द्वारा पंजाब को हड़पने के लिए किए जाने वाले प्रयासों के कारण शाम सिंह के मन को गहरा आघात लगा। वह पंजाब की स्वतंत्रता को कायम रखना चाहते थे। 1845 ई० के अंत में अंग्रेज़ों तथा सिखों में प्रथम युद्ध आरंभ हो गया। 10 फरवरी, 1846 ई० को अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य सभराओं की लड़ाई में शाम सिंह अटारीवाला ने भी भाग लिया। लाल सिंह एवं तेजा सिंह की गद्दारी के कारण सिख सेना बिखरने लग पड़ी। ऐसे अवसर पर सरदार शाम सिंह अटारीवाला के नेतृत्व में खालसा सेना ने तलवारें निकाल लीं और सत् श्री अकाल के जयकार गुंजाते हुए शत्रु पर टूट पड़े। उन्होंने बहुतसे अंग्रेज़ी सैनिकों को यमलोक पहुँचा दिया। उनकी बहादुरी देखकर अंग्रेज़ भी हैरान रह गए। अंत में वह लड़तेलड़ते शहीद हो गए।

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प्रश्न 9.
पहले आंग्ल-सिख युद्ध के पीछे अंग्रेजों ने पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल क्यों नहीं किया ?
(Why the British did not annex the Punjab to their empire after the First Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-
अंग्रेजों ने यद्यपि सभराओं की लड़ाई में सिखों को हरा दिया था, परंतु अभी भी खालसा सेना के कई हजार सैनिक शस्त्रों सहित पंजाब में कई स्थानों पर विद्यमान थे। यदि पंजाब को उस समय अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित करने की घोषणा कर दी जाती तो ये सैनिक अंग्रेजों की सिरदर्दी का एक बड़ा कारण बन सकते थे। पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित न करने का दूसरा बड़ा कारण यह था कि अंग्रेज़ चाहते थे कि पंजाब अंग्रेजी राज्य तथा अफ़गानिस्तान के मध्य मध्यवर्ती राज्य का काम देता रहे। यदि अंग्रेज़ पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में शामिल कर लेते तो उनकी सीमाएँ अफ़गानिस्तान तक बढ़ जातीं। इससे अंग्रेजों के लिए नई समस्याएँ उत्पन्न हो जातीं। अंग्रेज़ इन समस्याओं से निपटने के लिए अभी तैयार नहीं थे। इसके अतिरिक्त पंजाब को नियंत्रण में रखने के लिए अंग्रेजों को भारी संख्या में अंग्रेज़ सैनिक पनाब में रखने पड़ते। इससे अंग्रेजों के खर्च में काफ़ी वृद्धि हो जाती। गवर्नर-जनरल का मत था कि पंजाब प्रांत आर्थिक रूप से अंग्रेजों के लिए लाभप्रद सिद्ध नहीं हो सकता। वह पंजाब को शक्ति की अपेक्षा दुर्बलता का स्रोत समझता था।

प्रश्न 10.
प्रथम अंग्रेज़-सिख युद्ध में सिखों की हार के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए। (Write main reasons of the defeat of the Sikhs is the First Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
1. प्रथम अंग्रेज़-सिख युद्ध में सिखों की हार का सबसे मुख्य कारण लाल सिंह और तेजा सिंह की गद्दारी थी। लाल सिंह प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त था जबकि तेजा सिंह मुख्य सेनापति के रूप में कार्य कर रहा था। ये दोनों नेता अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अंग्रेजों के साथ जा मिले। कहावत है कि जब जहाज़ का चालक ही अपने जहाज़ को तबाह करने के लिए तैयार हो जाए तो उस जहाज़ का डूबना निश्चित है। कुछ ऐसी ही हालत सिख सेना की हुई। यद्यपि वे इस समूचे युद्ध के दौरान बहुत वीरता और उत्साह से लड़े, परंतु नेताओं की गद्दारी उन्हें ले डूबी।

2. सिख सेना में जो यूरोपियन अधिकारी भर्ती हुए थे, वे गुप्त रूप से अंग्रेजों के साथ मिले हुए थे। वे सिख राज्य के सभी भेद अंग्रेजों को देते रहे।

3. इनके अतिरिक्त उस समय अंग्रेज़ संसार की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति के साथ संबंध रखते थे। स्वाभाविक रूप में उनके साधन सिखों की तुलना में बहुत अधिक थे। (iv) अंग्रेज़ों के सेनापतियों को युद्धों का बहुत अनुभव था। वे ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के लिए पूरी ईमानदारी तथा लगन के साथ लड़े। ऐसी स्थिति में सिखों की पराजय अनिवार्य थी।

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Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
1842 ई० में लॉर्ड आकलैंड के स्थान पर लॉर्ड एलिनब्रो को भारत का नया गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया। लॉर्ड एलिनब्रो अफ़गानिस्तान की पराजय से हुई अंग्रेजों की बदनामी को दूर करना चाहता था। इसलिए उसने सिंध पर अधिकार करने का निर्णय किया। यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। सिंध के अमीर चाहे अंग्रेजों के पक्के वफ़ादार थे, परंतु एलिनब्रो ने उन पर झूठे दोष लगाकर सिंध के विरुद्ध लड़ाई की घोषणा कर दी। 1843 ई० में अंग्रेज़ों ने सिंध पर अधिकार कर लिया। क्योंकि सिख सिंध को अपने साम्राज्य में शामिल करना चाहते थे, इसलिए सिखों एवं अंग्रेज़ों के परस्पर संबंधों में कड़वाहट और बढ़ गई।

  1. लॉर्ड एलिनब्रो कौन था ?
  2. लॉर्ड एलिनब्रो भारत का गवर्नर-जनरल कब बना ?
    • 1812 ई०
    • 1822 ई०
    • 1832 ई०
    • 1842 ई०
  3. अंग्रेज़ सिंध पर अधिकार क्यों करना चाहते थे ?
  4. अंग्रेजों ने सिंध पर अधिकार कब कर लिया था ?
  5. अंग्रेजों द्वारा सिंध पर अधिकार का क्या परिणाम निकला ?

उत्तर-

  1. लॉर्ड एलिनब्रो भारत का गवर्नर-जनरल था।
  2. 1842 ई०।
  3. क्योंकि सिंध भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्वपूर्ण था।
  4. अंग्रेजों ने 1843 ई० में सिंध पर अधिकार कर लिया था।
  5. अंग्रेजों के द्वारा सिंध पर अधिकार के कारण अंग्रेजों तथा सिखों के संबंधों में तनाव आ गया था।

2
सिखों और अंग्रेज़ों में दूसरी प्रसिद्ध लड़ाई फिरोज़शाह अथवा फेरूशहर में 21 दिसंबर, 1845 ई० को लड़ी गई। यह स्थान मुदकी से 10 मील की दूरी पर स्थित है। अंग्रेज़ इस लड़ाई के लिए पूर्ण रूप से तैयार थे। उन्होंने फिरोज़पुर, अंबाला तथा लुधियाना से अपनी सेनाओं को फिरोज़शाह पर आक्रमण करने के लिए बुला लिया था। इस लड़ाई में अंग्रेजों के सैनिकों की संख्या 17,000 थी। अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व सुप्रसिद्ध एवं अनुभवी सेनापति लॉर्ड ह्यूग गफ़, जॉन लिटलर तथा लॉर्ड हार्डिंग कर रहे थे। सिख सैनिकों की संख्या 25,000 से 30,000 के लगभग थी। सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह एवं तेजा सिंह कर रहे थे। अंग्रेज़ों को यह पूरा विश्वास था कि सिख सेनापतियों की गद्दारी के कारण वे इस लड़ाई को सरलता से विजित कर लेंगे, परंतु सिखों ने अंग्रेजों के ऐसे छक्के छुड़ाए कि एक बार तो उन्हें भारत में अंग्रेजी साम्राज्य डावाँडोल होता दिखाई दिया।

  1. फिरोजशाह की लड़ाई कब हुई ?
  2. लॉर्ड ह्यूग गफ़ कौन था ?
  3. फिरोजशाह की लड़ाई में सिख सेना का नेतृत्व किसने किया था ?
  4. फिरोजशाह की लड़ाई में अंग्रेजों के सैनिकों की संख्या ………. थी।
  5. फिरोजशाह की लड़ाई में किसकी हार हुई ?

उत्तर-

  1. फिरोजशाह की लड़ाई 21 दिसंबर, 1845 ई० में हुई।
  2. लॉर्ड ह्यूग गफ़ अंग्रेज़ों का प्रधान सेनापति था।
  3. फिरोज़शाह की लड़ाई में सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह तथा तेजा सिंह ने किया था।
  4. 17000
  5. फिरोजशाह की लड़ाई में सिखों की हार हुई।

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3
सभराओं की लड़ाई सिखों एवं अंग्रेजों के प्रथम युद्ध की अंतिम लड़ाई थी। यह लड़ाई 10 फरवरी, 1846 ई० को लड़ी गई थी। इस लड़ाई से पूर्व 30,000 सिख सैनिक सभराओं पहुँच चुके थे। उन्होंने अंग्रेजों का डटकर सामना करने के लिए मोर्चे तैयार करने आरंभ कर दिए थे। लाल सिंह तथा तेजा सिंह, जोकि सिख सेना का नेतृत्व कर रहे थे, क्षणक्षण के समाचार अंग्रेजों को पहुंचा रहे थे। सिख सेना का सामना करने के लिए अंग्रेजों ने भी खूब तैयारी की थी। इस लड़ाई में अंग्रेजी सेना की कुल संख्या 15,000 थी। लॉर्ड ह्यूग गफ़ तथा लॉर्ड हार्डिंग इस सेना का नेतृत्व कर रहे थे। 10 फरवरी, 1846 ई० वाले दिन अंग्रेजों ने सिख सेना पर आक्रमण कर दिया। सिख सेना की जवाबी कार्यवाई के
कारण अंग्रेज़ी सेना को पीछे हटना पड़ा। ठीक इसी समय पूर्व निर्मित योजनानुसार पहले लाल सिंह और फिर तेजा सिंह मैदान से भाग गए। तेजा सिंह ने भागने से पहले बारूद से भरी नावें डुबो दी तथा साथ ही पुल को भी तोड़ दिया।

  1. पहले ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय कौन-सी लड़ाई अंग्रेजों तथा सिखों के मध्य अंतिम लड़ाई थी ?
  2. सभराओं की लड़ाई कब हई थी ?
  3. सभराओं की लड़ाई में अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व ……….. तथा …………. ने किया था।
  4. सभराओं की लड़ाई में किसकी हार हुई ?
  5. सभराओं की लड़ाई में किस सिख नेता ने अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए थे ?

उत्तर-

  1. सभराओं की लड़ाई अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य अंतिम लड़ाई थी।
  2. सभराओं की लड़ाई 10 फरवरी, 1846 ई० को हुई थी।
  3. लॉर्ड ह्यूग गफ़, लॉर्ड हार्डिंग।
  4. सभराओं की लड़ाई में सिखों की हार हुई।
  5. सभराओं की लड़ाई में सरदार शाम सिंह अटारीवाला ने अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए।

प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध : कारण एवं परिणाम PSEB 12th Class History Notes

  • प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के कारण (Causes of the First Anglo-Sikh War)—अंग्रेज़ों ने पंजाब को अपने अधीन करने के लिए उसके इर्द-गिर्द घेरा डालना आरंभ कर दिया था-पंजाब की डावांडोल राजनीतिक स्थिति भी अंग्रेजों को निमंत्रण दे रही थी-1843 ई० में अंग्रेजों के सिंध अधिकार से परस्पर संबंधों में कड़वाहट और बढ़ गई-अंग्रेजों ने जोरदार सैनिक तैयारियाँ आरंभ कर दी थींलुधियाना के नवनियुक्त पोलिटिकल एजेंट मेजर ब्रॉडफुट ने अनेक ऐसी कारवाइयां कीं जिससे सिख भड़क उठे-लाहौर के नये वज़ीर लाल सिंह ने भी सिख सेना को अंग्रेज़ों के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया था।
  • युद्ध की घटनाएँ (Events of the War)-सिखों तथा अंग्रेज़ों के मध्य हुए प्रथम युद्ध की प्रमुख घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है—
    • मुदकी की लड़ाई (Battle of Mudki)-यह लड़ाई 18 दिसंबर, 1845 ई० को लड़ी गई थीइसमें सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह तथा अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था इस लड़ाई में लाल सिंह की गद्दारी के कारण सिख सेना पराजित हुई।
    • फिरोजशाह की लड़ाई (Battle of Ferozeshah)—यह लड़ाई 21 दिसंबर, 1845 ई० को लड़ी गई थी-इस लड़ाई में एक स्थिति ऐसी भी आई कि अंग्रेजों ने बिना शर्त शस्त्र फेंकने का विचार कियापरंतु लाल सिंह की गद्दारी के कारण सिखों को पुनः हार का सामना करना पड़ा।
    • बद्दोवाल की लड़ाई (Battle of Baddowal)-बद्दोवाल की लड़ाई रणजोध सिंह के नेतृत्व में 21 जनवरी, 1846 ई० को हुई-इस लड़ाई में अंग्रेज़ों को हार का सामना करना पड़ा।
    • अलीवाल की लड़ाई (Battle of Aliwal)-अलीवाल की लड़ाई 28 जनवरी, 1846 ई० को हुई—इसमें अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व हैरी स्मिथ कर रहा था-रणजोध सिंह की गद्दारी के कारण सिख इस लड़ाई में हार गए।
    • सभराओं की लड़ाई (Battle of Sobraon)-सभराओं की लड़ाई सिखों एवं अंग्रेजों के मध्य प्रथम युद्ध की अंतिम लड़ाई थी-इसमें सिख सेना का नेतृत्व लाल सिंह तथा तेजा सिंह और अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ तथा लॉर्ड हार्डिंग कर रहे थे-यह लड़ाई 10 फरवरी, 1846 ई० को हुई-लाल सिंह और तेजा सिंह ने इस लड़ाई में पुनः गद्दारी की इस लड़ाई में शाम सिंह अटारीवाला ने अपनी बहादुरी के कारनामे दिखाए -अंततः इस लड़ाई में अंग्रेज़ विजयी रहे।
  • युद्ध के परिणाम (Results of the War) इस युद्ध के परिणामस्वरूप लाहौर दरबार और अंग्रेज़ी सरकार के मध्य 9 मार्च, 1846 ई० को ‘लाहौर की संधि’ हुई-इसके अनुसार लाहौर के महाराजा ने सतलुज दरिया के दक्षिण में स्थित सभी प्रदेशों पर हमेशा के लिए अपना अधिकार छोड़ दिया-युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में अंग्रेज़ों ने 1.50 करोड़ रुपए की मांग की-अंग्रेजों ने दलीप सिंह को लाहौर का महाराजा, रानी जिंदां को उसका संरक्षक तथा लाल सिंह को प्रधानमंत्री मान लिया -16 दिसंबर, 1846 को हुई ‘भैरोवाल की संधि’ से अंग्रेजों ने राज्य की शासन व्यवस्था कौंसिल ऑफ़ रीजेंसी के हवाले कर दी-महारानी जिंदां को शासन प्रबंध से अलग कर दिया गया।