PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो! Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 12 हमारी भी सुनो! (2nd Language)

हमारी भी सुनो! अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਗੇਂਦ = गेंद
  • ਗੱਪਸ਼ਪ = गपशप
  • ਦੁਰਘਟਨਾ = दुर्घटना
  • ਸੜਕ = सड़क
  • ਬੱਤੀ = बत्ती
  • ਬੁੱਤ = बुत
  • ਸਦਉਪਯੋਗ = सदुपयोग
  • ਦੁਰਉਪਯੋਗ = दुरुपयोग

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਰਸਤਾ = पथ
  • ਮੋਟਰ ਗੱਡੀ = मोटर गाड़ी
  • ਖਤਰਾ = जोखिम
  • ਅੱਖਾਂ = आँखों
  • ਇੰਤਜਾਰ = प्रतीक्षा
  • ਸੁਰਖਿਆ = सुरक्षा
  • ਖੱਬੇ = बाएं
  • मॅने = दाएं

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) प् + र = प्र = प्रयोग
क् + ष = क्ष = सुरक्षा
दु + र् = दुर् = दुर्घटना
ज + य = ज्य = ज्यादा

(ख) न् + न = न्न = चुन्नू-मुन्नू
ल् + ल = ल्ल = उल्लंघन
त् + त = त्त = बत्ती

हमारी भी सुनो! शब्दार्थ Meaning

  • दुःख = कष्ट, तकलीफ
  • उल्लंघन = नियम को तोड़ना
  • जोखिम = खतरा
  • दुर्घटना = बुरी घटना
  • दुरुपयोग = बुरा उपयोग
  • सदुपयोग = अच्छा उपयोग
  • इशारा = संकेत
  • अनदेखा = बिना देखे
  • बुत = मूर्ति की तरह जड़
  • प्रतीक्षा = इन्तज़ार

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

बताओ

प्रश्न 1.
चुन्नू-मुन्नू को चोट कैसे लगी?
उत्तर :
गेंद खेलते समय मोटर गाड़ी से टकरा जाने के कारण चुन्नू-मुन्नू को चोट लगी।

प्रश्न 2.
लाल बत्ती हमें क्या संकेत देती है?
उत्तर :
लाल बत्ती हमें रुकने का संकेत देती है।

प्रश्न 3.
पीली बत्ती पर हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर :
पीली बत्ती पर हमें चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
हरी बत्ती का क्या अर्थ है?
उत्तर :
हरी बत्ती चलने का संकेत देती है।

प्रश्न 5.
हमें सड़क कैसे पार करनी चाहिए?
उत्तर :
सड़क हमेशा पहले बाईं ओर देखकर फिर दाईं ओर देखकर पार करनी चाहिए।

प्रश्न 6.
सड़क पर काली-सफेद धारियाँ क्यों बनी होती हैं?
उत्तर :
सड़क पर काली-सफेद धारियाँ पैदल चलने वालों के लिए बनी होती हैं। इसे ज़ेबरा क्रासिंग कहते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

सही मिलान करो

काली-सफेद धारियाँ – रुकना
पीली बत्ती – चलना
हरी बत्ती – तैयार रहना
लाल बत्ती – पैदल सड़क पार करना
उत्तर :
काली-सफ़ेद धारियाँ – पैदल सड़क पार करना।
पीली बत्ती – तैयार रहना।
हरी बत्ती – चलना।
लाल बत्ती – रुकना।

पढ़ो, समझो और लिखो

आज = कल
दाएँ = बाएँ
सुख = दुःख
चलना = रुकना
ऊपर = नीचे
सदुपयोग = दुरुपयोग
खड़ा = बैठा
काली = सफेद
उत्तर :
उपरोक्त शब्दों के विपरीतार्थक शब्द उनके सामने दिए गए हैं। विद्यार्थी उन्हें याद करके लिखें।

समझो

कालिमा = काला
लालिमा = लाल
पीतिमा = पीला
हरीतिमा = हरा

रचनात्मक कौशल
बच्चे ज़ेबरा लाइनों, लाल, पीली और हरी बत्ती का चित्र बनायें तथा उनमें रंग भरें।

इन्हें अपनायें

(1) हमेशा सड़क के बाईं ओर चलें।
(2) सड़क के निकट गेंद न खेलें।
(3) सड़क हमेशा दाएँ-बाएँ देखकर पार करनी चाहिए।
(4) पैदल चलते समय सड़क हमेशा काली-सफेद धारियों, जिन्हें ज़ेबरा लाइनें कहा जाता है, से पार करनी चाहिए।
(5) लाल बत्ती होने पर रुकना चाहिए।
(6) पीली बत्ती होने पर चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।
(7) हरी बत्ती होने पर चलना चाहिए।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

हमारी भी सुनो! बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘टिंउलात’ का हिन्दी अर्थ : इंतर/अंतर/प्रतीक्षा/परीक्षा
उत्तर :
प्रतीक्षा

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘अधां’ का हिन्दी अर्थ है : अंखी/आँखें/आँहें/आटी
उत्तर :
आँखें

प्रश्न 3.
लाल बत्ती क्या संकेत देती है ?
(i) रुकने
(ii) चलने
(iii) दौड़ने
(iv) भगाने।
उत्तर :
(i) रुकने

प्रश्न 4.
हरी बत्ती क्या संकेत देती है?
(i) रुकने
(ii) चलने
(iii) फिरने
(iv) दौड़ने।
उत्तर :
(i) चलने

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

प्रश्न 5.
अगर ‘आज’-कल है तो सदुपयोग है
(i) परसो
(ii) दुरुपयोग।
(iii) सच्चा
(iv) अच्छोपयोग।
उत्तर :
(ii) दुरुपयोग

प्रश्न 6.
अगर ‘ऊपर-नीचे है तो ‘काली’ है
(i) सफेद
(ii) कालिया
(iii) कलुआ
(iv) सफेदा।
उत्तर :
(i) सफेद।

हमारी भी सुनो! Summary in Hindi

सड़क पर पाये जाने वाले रास्ते और ट्रैफिक बत्तियाँ आपस में बातें करते हैं। कालिमा पैदल पथ को बताती है कि लोग उसका प्रयोग लापरवाही से करते हैं। आज ही सुबह चुन्नू-मुन्नू को चोट लग गई। वे गेंद खेलते-खेलते मोटरगाड़ी से टकरा गए। पैदलपथ ने कहा कि बच्चे मानते ही नहीं।

उन्हें मेरे साथ ही चलना चाहिए। हम लोगों की सेवा के लिए हैं पर लोग हमारा दुरुपयोग करते हैं। उनकी बातें सुनकर लालिमा और पीतिमा और हरीतिमा ने भी अपनी-अपनी राम कहानी सुनाई कि किस तरह लोग उनकी अनदेखी करते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो! 1

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

उनकी बातें सुनकर जेबरा ने कहा कि यदि पैदल चलने वाले उसी से सड़क पार करें और वाहन चालक उससे पहले बनी सफेद लकीर पर वाहन रोक दें तो पैदल चलने वालों को असुविधा न हो। इस पर कालिमा ने कहा कि लोगों को सदा मेरी बायीं ओर ही चलना चाहिए।

पैदलपथ ने कहा कि यदि लोग हमारी बातों को मानेंगे तो दुर्घटना नहीं होगी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 11 साहसी दीपा Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 11 साहसी दीपा (2nd Language)

साहसी दीपा अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिन्दी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਲੜਕੀ = लड़की
  • ਨੌਕਰੀ = नौकरी
  • ਸਹੇਲੀ = सहेली
  • ਨਦੀ = नदी
  • ਬਹਾਦੁਰ = बहादुर
  • ਮਗਰਮੱਛ = मगरमच्छ

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिन्दी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिन्दी शब्दों को लिखो :

  • ਬਾਰ੍ਹਾਂ = बारह
  • ਜੀਉਂਦੇ = जीवित
  • ਪ੍ਰਸੰਸਾ = सराहना।
  • ਇਨਾਮ = पुरस्कार

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) च् + छ = च्छ = अच्छा, मगरमच्छ
न् + य = न्य = धन्यवाद
ल् + द = ल्द = जल्दी
स् + क = स्क = पुरस्कार

बताओ

प्रश्न 1.
दीपा कैसी लड़की थी?
उत्तर :
दीपा साहसी लड़की थी।

प्रश्न 2.
दीपा नदी के किनारे क्या कर रही थी?
उत्तर :
दीपा नदी के किनारे कपड़े धो रही थी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

प्रश्न 3.
‘बचाओ-बचाओ’ की आवाजें किसने लगाईं?
उत्तर :
बचाओ-बचाओ’ की आवाजें हरीश ने लगाईं।

प्रश्न 4.
दीपा की सहेली ने उसे नदी में कूदने से मना क्यों किया?
उत्तर :
पानी में तेजी से बढे आ रहे मगरमच्छ को देखकर दीपा की सहेली ने दीपा को पानी में कूदने से मना किया।

प्रश्न 5.
दीपा ने रवि को डूबने से कैसे बचाया?
उत्तर :
दीपा झट से पानी में कूद गई और रवि को पानी से निकाल कर बाहर ले आई। इस प्रकार उसने रवि को डूबने से और मगरमच्छ से बचाया।

प्रश्न 6.
दीपा को कौन-सा पुरस्कार, कब मिला?
उत्तर :
दीपा को वीरता का पुरस्कार 26 जनवरी को मिला।

वाक्य पूरे करो

होशियार किनारे मगरमच्छ बहादुर धन्यवाद वीरता पुरस्कार।

  1. दीपा ………………………. और ………………………. लड़की थी।
  2. नदी में ………………………. था।
  3. दीपा रवि को ………………………. पर ले आई।
  4. रवि और हरीश के माता-पिता ने दीपा का ………………………. किया।
  5. दीपा को 26 जनवरी के दिन ………………………. मिला।

उत्तर :

  1. दीपा बहादुर और होशियार लड़की थी।
  2. नदी में मगरमच्छ था।
  3. दीपा रवि को किनारे पर ले आई।
  4. रवि और हरीश के माता-पिता ने दीपा का धन्यवाद किया।
  5. दीपा को 26 जनवरी के दिन वीरता पुरस्कार मिला।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

वाक्य बनाओ

  1. हिम्मत,
  2. धन्यवाद,
  3. बहादुरी,
  4. पुरस्कार,
  5. ठान लेना,
  6. हिम्मत बंधाना,
  7. एक न मानना,
  8. खाली हाथ लौटना,
  9. अपना-सा मुँह लेकर रह जाना।

उत्तर :

  1. हिम्मत-वह बहुत हिम्मत करके मेरे पास आया।
  2. धन्यवाद-मुख्याध्यापक ने अतिथि का धन्यवाद किया।
  3. मगरमच्छ-मगरमच्छ पानी में रहता है।
  4. पुरस्कार-दीपा को उसकी बहादुरी पर वीरता पुरस्कार मिला।
  5. ठान लेना-मैंने इस प्रतियोगिता को जीतने की ठान ली है।
  6. एक न मानना-वह अपने माता-पिता की एक नहीं मानता, अपने मन की करता है।
  7. हिम्मत बँधाना-दीपा ने हरीश को हिम्मत बँधाई।
  8. खाली हाथ लौटना-मगरमच्छ को खाली हाथ लौटना पड़ा।
  9. अपना सा मुँह लेकर रह जाना-मगरमच्छ शिकार हाथ से निकलते देखकर अपना सा मुँह लेकर रह गया।

पढ़ो, समझो और लिखो

साल = वर्ष
लड़की = बालिका
किनारा = तट
जीवित – ज़िन्दा
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के पर्यायवाची शब्द सामने दर्शाये गए हैं। विद्यार्थी इन पर्याय-शब्दों को स्मरण रखें।

लिंग बदलो

  1. माता = ……………………….
  2. लड़की = ……………………….

उत्तर :

  1. माता = पिता।
  2. लड़की = लड़का।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

समझो

गाँव = शहर
घर = बाहर
डूबना = तैरना
वीर = कायर
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द उनके सामने लिखे गए हैं। विद्यार्थी इन्हें समझकर कण्ठस्थ कर लें।

इनसे नये शब्द बनाओ

  1. च्छ
  2. न्य
  3. स्क
  4. ल्द

उत्तर :

  1. च्छ = स्वच्छ।
  2. न्य = अन्य।
  3. स्क= पुरस्कार।
  4. ल्द = जल्द।

रचनात्मक अभिव्यक्ति

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा 1
चित्र देखकर नीचे दिए गए शब्दों की सहायता से वाक्य पूरे करो

साहसी दुकान दीवाली पटाखों आग बच्चा बचा

…………………………………. का त्योहार है। बाज़ार में …………………………………. की दुकानें सजी हुई हैं। एक दुकान में अचानक …………………………………. लग गई है। एक …………………………………. आग में फँस गया है। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है। एक बालिका उसे जान पर खेलकर …………………………………. रही है। वह …………………………………. बालिका है।
उत्तर :
दीवाली का त्योहार है। बाज़ार में पटाखों की दुकानें सजी हुई हैं। एक दुकान में अचानक आग लग गई है। एक बच्चा आग में फँस गया है। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है। एक बालिका उसे जान पर खेलकर बचा रही है। वह साहसी बालिका है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

साहसी दीपा बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
दीपा कैसी लड़की थी?
(i) साहसी
(i) निडर
(iii) योगी
(iv) सुंदर।
उत्तर :
(i) साहसी

प्रश्न 2.
दीपा नदी किनारे क्या कर रही थी?
(i) कपड़े धो रही थी
(ii) कपड़े सिल रह थे
(iii) खेल रही थी
(iv) सो रही थी।
उत्तर :
(i) कपड़े धो रही थी

प्रश्न 3.
‘ठान लेना’ का अर्थ है
(i) पक्का इरादा
(ii) पक्की बात
(iii) पक्के लोग
(iv) पक्की रस्सी।
उत्तर :
(i) पक्का इरादा

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

प्रश्न 4.
अगर ‘गाँव’-शहर है तो ‘घर ………………………………. है।
(i) बाहर
(ii) बाह्य
(iii) बाहरी
(iv) बाहु।
उत्तर :
(i) बाहर।

साहसी दीपा Summary in Hindi

पाठ का सार माधोपुर गाँव में दीपा नामक लड़की रहती थी। उसकी आयु बारह वर्ष की थी। उसके पिता शहर में नौकरी करते थे और माँ घर में बीमार रहती थी। दीपा बड़ी बहादुर लड़की थी। सारे घर के कामकाज करती और नदी में कपड़े धोने भी जाती थी।

एक दिन दीपा अपनी सहेली के साथ नदी के किनारे कपडे धो रही थी और थोड़ी ही दूरी पर रवि और हरीश नदी में नहा रहे थे। नहाते-नहाते रवि नदी में डूबने लगा तो हरीश ने उसे बचाने की कोशिश की और सहायता के लिए चिल्लाने लगा।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा 2

उसकी आवाज़ सुनकर दीपा उसकी सहायता के लिए दौड़ी तो उसकी सहेली ने उसे मना कर दिया क्योंकि उसने देखा कि पानी में मगरमच्छ रवि की ओर चला आ रहा था। लेकिन दीपा ने इसकी परवाह नहीं की और पानी में कूद गई। उसने जल्दी से रवि को पकड़ा और किनारे पर ले आई।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

इस प्रकार उसने रवि को मगरमच्छ से बचा लिया। इतने में दीपा की सहेली रवि और हरीश के माता-पिता को ले आई। अपने बच्चों को सुरक्षित देखकर वे बहुत खुश हुए और दीपा का धन्यवाद किया। गाँव के सभी लोगों ने भी दीपा के साहस की सराहना की।

दीपा की बहादुरी पर उसे 26 जनवरी को पुरस्कार दिया गया।

साहसी दीपा शब्दार्थ Meanings

  • होशियार = सावधान, चौकस
  • कोशिश = प्रयास, यत्न
  • मगरमच्छ = गहरे जल में पाया जाने वाला बहुत बड़ा, भीषण एवं हिंसक जंतु, घड़ियाल
  • चंगुल = हाथ की उँगलियों के मोड़ने से बनी मुद्रा, पकड़, काबू
  • धन्यवाद = कृतज्ञता
  • सराहना = प्रशंसा प्रकट करने का शब्द
  • पुरस्कार = इनाम

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 10 जन्म दिन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 10 जन्म दिन (2nd Language)

जन्म दिन अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਜਨਮਦਿਨ = जन्मदिन
  • ਸਹਿਪਾਠੀ = सहपाठी
  • ਅਨਾਥ ਆਸ਼ਰਮ = अनाथाश्रम
  • ਮੋਮਬੱਤੀ = मोमबत्ती
  • ਗੁਬਾਰੇ = गुब्बारे
  • ਕੋਕ = केक
  • ਛੁੱਟੀ = छुट्टी
  • ਹਲਵਾ = हलवा

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਭੈਣ = बहन
  • ਧੰਨਵਾਦ = धन्यवाद
  • ਨਾਚ = नृत्य
  • ਤਾੜੀਆਂ = तालियाँ
  • ਵਿਦਾਇਗੀ = अलविदा
  • ਹੌਸਲਾ = उत्साह

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) न् + म = न्म = जन्म
स् + व = स्व = स्वागत
क् + र = क्र = आइसक्रीम
र् + वी = र्वी = चार्वी
स् + त = स्त = बिस्तर, दोस्त, मस्ती
न् + द = न्द = सुन्दर
र् + टी = र्टी = पार्टी
स् + क = स्क = स्कूल
न् + य = न्य = धन्यवाद
त् + स = त्स = उत्साहित
म् + ह + म्ह = तुम्हारा

(ख) श् + र = श्र = आश्रम

(ग) म् + म = म्म= मम्मी
ब् + ब + ब्ब = गुब्बारा
त् + य + त्य = नृत्य
ट् + ट + ट्ट = छुट्टी

किसने कहा

प्रश्न 1.
“चार्वी बेटी उठो! आज तुम्हारा जन्मदिन है।”
उत्तर :
चार्वी की माँ ने कहा है।

प्रश्न 2.
“अनाथाश्रम जाकर बच्चों को मिठाई भी तो बाँटनी है।”
उत्तर :
चावी के पापा ने कहा है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

प्रश्न 3.
“तुम्हारे जन्मदिन के लिए केक और हलवा मैंने अपने हाथों से बनाया है।”
उत्तर :
चा की माँ ने कहा है।

प्रश्न 4.
“सात मोमबत्तियों को बुझा दो और आठवीं मोमबत्ती को जलती रहने दो।”
उत्तर :
चावी की माँ ने कहा है।

बताओ

प्रश्न 1.
चार्वी क्यों खुश है?
उत्तर :
चार्वी इसलिए खुश है क्योंकि आज उसका जन्मदिन है।।

प्रश्न 2.
चार्वी की बहन का क्या नाम है?
उत्तर :
चार्वी की बहन का नाम एलीका है।

प्रश्न 3.
चार्वी को जन्मदिन की बधाई सबसे पहले किसने दी?
उत्तर :
चार्वी को जन्मदिन की बधाई सबसे पहले माँ ने दी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

प्रश्न 4.
चार्वी और एलीका ने जन्मदिन की क्या-क्या तैयारी की?
उत्तर :
चार्वी और एलीका ने सारे घर को गुब्बारों और झिलमिलाती झंडियों से सजा दिया।

प्रश्न 5.
चार्वी ने अपना जन्मदिन कैसे मनाया?
उत्तर :
चार्वी ने अपने जन्मदिन पर अनाथाश्रम जाकर बच्चों को मिठाई बॉटी, स्कूल में सहपाठियों को टाफियाँ बाँटी फिर घर पर पार्टी में केक काटा और सभी को केक, हलवा, गुलाब जामुन और समोसे खिलाए।

पढ़ो, समझो और लिखो।

(क) टॉफी = टॉफियाँ
झंडी = झंडियाँ
मिठाई = मिठाइयाँ
मोमबत्ती = मोमबत्तियाँ
ताली = तालियाँ
सहेली = सहेलियाँ
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के बहुवचन रूप सामने दर्शाए गए हैं।

(ख) माता = पिता
बहन = भाई
मामा = मामी
बेटा – बेटी
चाचा = चाची
नाना = नानी
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के विपरीत लिंगी शब्द सामने दर्शाये गए हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

अन्तर समझो

(क) थोड़ी देर [में] मेहमान आते ही होंगे।
आज [मैं] टॉफियाँ लेकर स्कूल जाऊँगी।
[उसने] नयी पोशाक पहनी।
चार्वी [उन] का धन्यवाद कर रही थी।
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्द युग्म शब्द कहलाते हैं।

इनसे नये शब्द बनाओ
क्र, श्र
उत्तर :
(i) क्र = क्रम, विक्रय।
(ii) ‘f = बर्फी, सर्दी।
(ii) श्र = श्रम, विश्राम।

रचनात्मक कौशल
जन्मदिन से संबंधित चित्र बनाओ और उसमें अलग-अलग रंग भरो।

रचनात्मक अभिव्यक्ति

  1. आज मेरा …………………………………. है।
  2. मैंने नयी …………………………………. पहनी है।
  3. मेरे माता-पिता …………………………………. लाये हैं।
  4. मैंने सबके साथ मिलकर …………………………………. काटा।
  5. सभी ने मिलकर …………………………………. गाया।

उत्तर :

  1. आज मेरा जन्मदिन है।
  2. मैंने नयी पोशाक पहनी है।
  3. मेरे माता-पिता उपहार लाए हैं।
  4. मैंने सबके साथ मिलकर केक काटा।
  5. सभी ने मिलकर गाना गाया।

अध्यापन निर्देश

  1. अध्यापक बच्चों को जन्मदिन की भाँति घर में होने वाले समारोहों को मिलकर मनाने की ओर प्रेरित करे। स्कूल में होने वाले समारोहों में सभी बच्चे मिलजुल कर काम करें। जिससे उनमें यह भावना विकसित हो कि खुशी के अवसर मिलजुल कर मनाने से मन खुश रहता है, सहयोग की भावना उत्पन्न होती है तथा किसी से भी कोई वस्तु लेते/ देते समय वे उसका धन्यवाद अवश्य करें।
  2. ‘र’ व्यंजन को संयुक्त करने के विभिन्न रूप पाठ संख्या 3 में समझाए गये हैं। अध्यापक उनका बार बार अभ्यास करवाये।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

जन्म दिन बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘मठमरिठ’ का हिन्दी अर्थ है : जन्म दिवस/जन्मदिन/जन्मपत्री/जन्मीपत्र
उत्तर :
जन्मदिन

प्रश्न 2.
‘टॉफी’-टाफियाँ है तो मोमबत्ती है :
(i) मोमबत्तियाँ
(ii) मोमबत्ती
(iii) मोमबत्तीय
(iv) मोम की बत्तिया।
उत्तर :
(i) मोमबत्तियाँ,

प्रश्न 3.
‘ताली’-तालियाँ है तो मिठाई है
(i) मीठा
(ii) मिठावाला
(iii) मिठाइयाँ
(iv) मिठाइयों।
उत्तर :
(iii) मिठाइयाँ।

जन्म दिन Summary in Hindi

आज चार्वी का जन्मदिन है। अभी वह सो ही रही थी कि उसके माता-पिता और बहन ने उसे जगाकर जन्मदिन की बधाई दी। माँ से उसने कहा कि वह आज स्कूल में अपने सहपाठियों के लिए टॉफियाँ ले जाएगी। माँ ने उसे पहले अनाथाश्रम में बच्चों को मिठाई बाँटने को कहा।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन 1

स्कूल जाकर चार्वी ने अपने सहपाठियों को टाफियाँ बाँटीं। उसके घर आने पर उसके जन्मदिन की पार्टी मनाने की तैयारियाँ होने लगीं। समय पर चार्वी के रिश्तेदार, मेहमान और दोस्त आ गए। आज चार्वी का आठवाँ जन्म दिन था। उसने केक काटा। सब ने तालियाँ बजाकर उसे जन्मदिन की बधाई दी।

पार्टी में सब ने खूब मौज मस्ती की। उन्हें आज का दिन सदा याद रहेगा।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

जन्म दिन शब्दार्थ :

  • सहपाठी = साथ पढ़ने वाला
  • उपहार = तोहफा
  • अनाथाश्रम = वह स्थान जहाँ बिना माँ-बाप के बच्चे रखे जाते हैं।
  • मेहमान = अतिथि
  • नृत्य = नाच
  • अलविदा = विदा होते समय कहा जाने वाला एक पद- अच्छा, अब चलते हैं।
  • धन्यवाद = कृतज्ञता प्रकट करने का एक शब्द

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

Punjab State Board PSEB 12th Class Religion Book Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Religion Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
जैन धर्म के आरंभ के बारे आप क्या जानते हैं ? वर्णन करो। (What do you know about the origin of Jainism ? Explain.)
उत्तर-
जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। इसका साधुओं वाला मार्ग और योग की रीतियों का आरंभ हड़प्पा काल में से ढूँढा जा सकता है। वैदिक साहित्य में जैन आचार्यों का वर्णन मिलता है। इससे पता चलता है कि जैन धर्म उस समय प्रचलित था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार ऋषभनाथ जो कि उनका पहला तीर्थंकर था वह पहला व्यक्ति था जिससे मनुष्य की सभ्यता का आरंभ हुआ। इस तरह सभ्यता के आरंभ के समय पर ही जैन धर्म मौजूद था।
जैन शब्द संस्कृत के शब्द जिन से निकला है जिससे भाव है विजेता। विजेता से भाव उस व्यक्ति से है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को जीत लिया हो। जैन धर्म को आरंभ में निरग्रंथ के नाम से जाना जाता है। निरग्रंथ से भाव था बंधनों से रहित अथवा मुक्त। जैन आचार्यों को तीर्थंकर भी कहा जाता है। तीर्थंकर से भाव है पुल बनाने वाला अथवा संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन दर्शन को अर्हत दर्शन भी कहा जाता है। अर्हत से भाव है पूजनीय। जैन धर्म को मानने वाले जैनी कहलाते हैं। जैन 24 तीर्थंकरों में विश्वास रखते हैं। इनके नाम ये हैं:—

  1. ऋषभनाथ
  2. अजित
  3. संभव
  4. अभिनंदन
  5. सुमति
  6. पद्मप्रभु
  7. सुपार्श्व
  8. चंद्रप्रभु
  9. पुष्पदंत
  10. शीतल
  11. श्रेयांसम
  12. वासुपूज्य
  13. विमल
  14. अनंत
  15. धर्म
  16. शाँति
  17. कुंथ
  18. अरह
  19. मल्लि
  20. मुनिसुव्रत
  21. नामि
  22. नेमि
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर

जैनी ऋषभनाथ को जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार उनका जन्म अयोध्या में हुआ। उन्होंने कई वर्षों तक राज्य किया। बाद में उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया और स्वयं संसार त्याग कर तपस्या में लग गये। अंत में उनको ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस ज्ञान के बारे लोगों को उपदेश दिया। इस तरह वह पहले तीर्थंकर कहलाये। ऋषभनाथ के बाद होने वाले 21 तीर्थंकरों को ऐतिहासिक बताना संभव नहीं है, परंतु जैनियों की पवित्र अनुश्रुतियों में इनका वर्णन आता है। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24वें तीर्थंकर महावीर ऐतिहासिक व्यक्ति थे। स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊंट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

स्वामी महावीर ने इन चार असूलों में एक और असूल जोड़ा जिसको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वामी महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि सुधारक थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 2.
(क) जैन धर्म में कुल कितने तीर्थंकर हुए हैं ?
(ख) भगवान् महावीर के जीवन पर प्रकाश डालें।
[(a) Give the total number of Tirthankaras in Jainism.
(b) Throw light on the life of Lord Mahavira.]
अथवा
महावीर की माता का क्या नाम था ? भगवान् महावीर के जन्म से पहले उनकी माता को कितने स्वप्न आए थे? भगवान महावीर के जीवन पर एक नोट लिखें।
(Give the name of Mahavir as mother. How many dreams Lord Mehavira’s mother had before giving birth to Mahavira ? Write a note on the life of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म में कितने तीर्थंकर हुए हैं ? 24वें तीर्थंकर के जीवन पर नोट लिखें।
(Give the number of Tirthankaras in Jainism. Write a note on the life of 24th Tirthankara.)
अथवा
भगवान् महावीर जैन धर्म के कौन से तीर्थंकर थे ? उनके जीवन के संबंध में जानकारी दें।
(What was Lord Mahavira’s number among Jain Tirthankaras ? Write about Mahavira’s life.)
उत्तर-
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर के जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ 1
LORD MAHAVIRA

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

प्रश्न 3.
जैन धर्म के आरंभ तथा विकास के बारे में प्रकाश डालें। (Discuss the origin and development of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। इसका साधुओं वाला मार्ग और योग की रीतियों का आरंभ हड़प्पा काल में से ढूँढा जा सकता है। वैदिक साहित्य में जैन आचार्यों का वर्णन मिलता है। इससे पता चलता है कि जैन धर्म उस समय प्रचलित था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार ऋषभनाथ जो कि उनका पहला तीर्थंकर था वह पहला व्यक्ति था जिससे मनुष्य की सभ्यता का आरंभ हुआ। इस तरह सभ्यता के आरंभ के समय पर ही जैन धर्म मौजूद था।
जैन शब्द संस्कृत के शब्द जिन से निकला है जिससे भाव है विजेता। विजेता से भाव उस व्यक्ति से है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को जीत लिया हो। जैन धर्म को आरंभ में निरग्रंथ के नाम से जाना जाता है। निरग्रंथ से भाव था बंधनों से रहित अथवा मुक्त। जैन आचार्यों को तीर्थंकर भी कहा जाता है। तीर्थंकर से भाव है पुल बनाने वाला अथवा संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन दर्शन को अर्हत दर्शन भी कहा जाता है। अर्हत से भाव है पूजनीय। जैन धर्म को मानने वाले जैनी कहलाते हैं। जैन 24 तीर्थंकरों में विश्वास रखते हैं। इनके नाम ये हैं:—

  1. ऋषभनाथ
  2. अजित
  3. संभव
  4. अभिनंदन
  5. सुमति
  6. पद्मप्रभु
  7. सुपार्श्व
  8. चंद्रप्रभु
  9. पुष्पदंत
  10. शीतल
  11. श्रेयांसम
  12. वासुपूज्य
  13. विमल
  14. अनंत
  15. धर्म
  16. शाँति
  17. कुंथ
  18. अरह
  19. मल्लि
  20. मुनिसुव्रत
  21. नामि
  22. नेमि
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर

जैनी ऋषभनाथ को जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार उनका जन्म अयोध्या में हुआ। उन्होंने कई वर्षों तक राज्य किया। बाद में उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया और स्वयं संसार त्याग कर तपस्या में लग गये। अंत में उनको ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस ज्ञान के बारे लोगों को उपदेश दिया। इस तरह वह पहले तीर्थंकर कहलाये। ऋषभनाथ के बाद होने वाले 21 तीर्थंकरों को ऐतिहासिक बताना संभव नहीं है, परंतु जैनियों की पवित्र अनुश्रुतियों में इनका वर्णन आता है। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24वें तीर्थंकर महावीर ऐतिहासिक व्यक्ति थे। स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊंट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

स्वामी महावीर ने इन चार असूलों में एक और असूल जोड़ा जिसको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वामी महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि सुधारक थे।

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 4.
जैन धर्म की बुनियाद नैतिक शिक्षाएँ हैं चर्चा करो।
(“Ethical teachings are the foundation of Jainism.” Discuss.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं के विषय में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की बुनियादी शिक्षाओं के विषय में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण जानकारी दीजिए।
(Describe in brief but meaningful the basic teachings of Jainism.)
अथवा
“नैतिक मूल्य जैन धर्म का आधार हैं।” प्रकाश डालिए।
(“Moral values are the basis of Jainism.” Elucidate.)
अथवा
जैन सदाचार पर एक विस्तृत नोट लिखो।
(Write a detailed note on Jain Ethics. )
अथवा
जैन धर्म के सदाचारक गुणों संबंधी जानकारी दो। (Discuss the Ethical values of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं की चर्चा करो।
(Discuss the main teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं संबंधी जानकारी दो। (Give information about moral teachings of Jainism.)
अथवा
भगवान् महावीर की नैतिक शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की शिक्षाओं के बारे में बताएँ।
(Write the teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक कीमतों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the Ethical values of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए। (Discuss about the Ethical teachings of Jainism.)
अथवा
भगवान् महावीर की मूल शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the basic teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की मुख्य सदाचारक कीमतें कौन-सी हैं ? प्रकाश डालें। (What were the main Ethical values of Jainism ? Elucidate.)
अथवा
जैन धर्म की सदाचारक शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म की अथवा महावीर जी की मुख्य नैतिक शिक्षाओं ने भारतीय संस्कृति को एक ऐसी देन दी जिस पर हमें आज भी गर्व है। जैन धर्म ने लोगों को त्रि-रत्न, अहिंसा, शुद्ध आचरण और आपसी भाइचारे का पाठ पढ़ाया। इसने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। इसका यज्ञों, बलियों, वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में कोई विश्वास नहीं था। इसने मनुष्य को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। निस्संदेह जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं ने भारतीय समाज को एक नई दिशा देने का एक महान् कार्य किया।—

1. त्रि-रत्न (Tri-Ratna)-जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त करना है। इसको प्राप्त करने के लिए जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्रि-रत्नों पर चलना अति ज़रूरी है। ये तीन रत्न हैं-सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों, नौ सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यह तीर्थंकरों के उपदेशों के गहरे अध्ययन से प्राप्त होता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। आत्मा द्वारा प्राप्त ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और वह ज्ञान जो इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होता है उसको परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। ज्ञान की पाँच किस्में हैं, जिनके नाम इस तरह हैं-मति ज्ञान, श्रुति ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनपर्याय ज्ञान और केवल्य ज्ञान। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। सच्चा आचार वह है जिसकी शिक्षा जैन धर्म देता है। ये तीनों रत्न साथ-साथ चलते हैं। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंजिल तक नहीं पहुँचा सकती। उदाहरण के तौर पर जैसे एक दीये को प्रकाश देने के लिए उसमें तेल, बाती और आग का होना ज़रूरी है। यदि इसमें से एक भी वस्तु की कमी हो तो वह प्रकाश नहीं दे सकता।

2. अहिंसा (Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत जोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है, सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैनी लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये। बी० एन० लूनीया के अनुसार,
“अहिंसा जैन धर्म की आधारशिला है।”1

3. नौ सच्चाइयाँ (Nine Truths)-जैन दर्शन नौ सच्चाइयों की शिक्षा देता है। ये सच्चाइयाँ हैं(1) जीव-जैन दर्शन में आत्मा को जीव कहा गया है। यह चेतन सुरूप है। यह शरीर के कर्मों के अच्छे-बुरे फल भुगतता है और आवागमन के चक्र में पड़ता है। (2) अजीव-यह जंतु पदार्थ है। यह निर्जीव है और इनमें समझ नहीं होती। इनकी दो श्रेणियाँ हैं रूपी और अरूपी। (3) पुण्य-यह अच्छे कर्मों का नतीजा है। इसके नौ साधन हैं। (4) पाप-यह जीव के बंधन का मुख्य कारण है। इसके परिणामस्वरूप घोर सज़ायें मिलती हैं। (5) अशर्व-यह वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है। कर्म 8 किस्मों के होते हैं। (6) संवर-कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को संवर कहते हैं। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं। (7) बंध-इससे भाव बंधन है। यह जीव (आत्मा) का पुदगल (परमाणु) से मेल है। बंध के लिए पाँच कारण जिम्मेवार हैं। (8) निर्जर-इस से भाव है दूर भगाना। यह कर्मों को नष्ट करने और जला देने का कार्य करता है। (9) मोक्ष-इसमें जीव कर्मों के जंजाल से मुक्त हो जाता है। यह पूर्ण शाँति की अवस्था है जिसमें हर तरह के दुःखों से छुटकारा प्राप्त हो जाता है।

4. कर्म सिद्धांत (Karma Theory)-जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस सिद्धांत के अनुसार, “जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसे बीजोगे वैसा काटोगे, यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा, किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा।” जैसे ही हमारे मन में कोई अच्छा या बुरा विचार आता है वह तुरंत जीव (आत्मा) से उसी तरह जुड़ जाता है, जैसे तेल लगे हुए शरीर में धूलि कण चिपक जाते हैं। ये कर्म आठ प्रकार के हैं-(1) ज्ञानवर्णीय कर्म-यह आत्मा के ज्ञान को रोकते हैं। (2) दर्शनवर्णीय कर्म-यह आत्मा की इच्छा शक्ति को रोकते हैं। (3) वैदनीय कर्म-ये सुख-दुःख उत्पन्न करने वाले कर्म हैं। (4) मोहनीय कर्म-ये आत्मा को मोह माया में फंसाने वाले कर्म हैं। (5) आयु कर्मये कर्म मनुष्य की आय को निर्धारित करते हैं। (6) नाम कर्म-ये कर्म मनुष्य की आय को निर्धारित करते हैं। (7) गोत्र कर्म-ये व्यक्ति के गोत्र और समाज में उसके ऊँचे या नीचे स्थान को निर्धारित करते हैं। (8) अंतरीय कर्म-ये अच्छे कर्म को रोकने वाले कर्म हैं।
कर्मों के कारण मनुष्य आवागमन के चक्रों में फंसा रहता है। कर्मों का नाश करके ही मनुष्य इससे छुटकारा प्राप्त कर सकता है।

5. अनेकांतवाद (The Doctrine of Manyness)-अनेकांतवाद जैन दर्शन का एक अनोखा दार्शनिक सिद्धांत है। अनेकांत शब्द किसी भी पदार्थ के अनेक धर्मों या गुणों का संकेत करता है। इसका भाव यह है कि जिस वस्तु का ज्ञान हमें जिस रूप में होता है, उसी वस्तु का ज्ञान किसी अन्य व्यक्ति को किसी और रूप में हो सकता है। उदाहरणतया जैसे एक बच्चे को उसकी माँ पुत्र समझती है, बहन भाई समझती है, दादी पोता समझती है, नानी दोहता समझती है और बच्चे उसको अपना मित्र समझते हैं। कहने से.भाव यह है कि हर पदार्थ अनेकांत या अनेक गुणों वाला है। इसी कारण हर पदार्थ के बारे में हमारा ज्ञान आंशिक होता है। इसको स्यादवाद कहा जाता है। यह अनेकांतवाद का दूसरा रूप है।

6. पाँच अणुव्रत अथवा महाव्रत (Five Annuvartas or Mahavartas)-जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में पाँच अणुव्रतों अथवा महाव्रतों की पालना करनी चाहिए। इनके अनुसार (i) मनुष्य को सदा अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए। (ii) उसको हमेशा सत्य बोलना चाहिए। (iii) उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो। (iv) उसको अपने पास धन नहीं रखना चाहिए। (v) उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
इनमें से पहले चार सिद्धांतों का प्रचलन पार्श्वनाथ ने किया जबकि पाँचवां सिद्धांत महावीर जी ने शामिल किया। डॉक्टर के० सी० सौगानी के अनुसार,
“इन पाँच अणुव्रतों का पालन व्यक्तिगत और सामाजिक उन्नति लाने में सहायक है।’2

7. शुद्ध आचरण (Good Character) स्वामी महावीर ने शुद्ध आचरण को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने कहा कि हमें चोरी, झूठ, चुगली, लालच आदि बुराइयों से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। मनुष्य को पापी से नहीं, बल्कि पाप से नफरत करनी चाहिए।

8. चौबीस तीर्थंकरों की पूजा (Worship of Twenty Four Tirthankaras) जैन धर्म को मानने वाले अपने 24 तीर्थंकरों को देवते मान कर उनकी पूजा करते हैं। उनका विश्वास है कि तीर्थंकरों में पक्का विश्वास रखने से मनुष्य को निर्वाण की प्राप्ति होती है।

9. समानता में विश्वास (Belief in Equality)-जैन धर्म समानता के सिद्धांत में विश्वास रखता है। इसके अनुसार सारे मनुष्य बराबर हैं। इसलिए मनुष्यों को अमीर-गरीब, ऊँच-नीच आदि का भेदभाव नहीं करना चाहिए।

10. यज्ञों, बलियों आदि में अविश्वास (Disbelief in Yajnas and Sacrifices etc.)—जैन धर्म यज्ञों, बलियों और अन्य झूठे रीति-रिवाजों को एक अन्य ढोंग मात्र ही बताता है। उनके अनुसार कोई भी मनुष्य धर्म के बाह्य दिखावे से निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए जैन धर्म के लोगों को इन अंध-विश्वासों से दूर रहने को कहा।

11. वेदों और संस्कृत भाषा में अविश्वास (Disbelief in Vedas and Sanskrit Language)-स्वामी महावीर जी हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ-वेदों में कोई विश्वास नहीं रखते थे। उनका कहना था कि वेदों की रचना ईश्वरीय ज्ञान से नहीं हुई। इसलिए वेदों के मंत्रों को पढ़ना बिल्कुल व्यर्थ है। वह संस्कृत भाषा की पवित्रता में भी विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने सारी भाषाओं को पवित्र माना। उन्होंने अपने उपदेशों का प्रचार उस समय में प्रचलित अर्धमगधी भाषा में किया।

12. ईश्वर में अविश्वास (Disbelief in God)-जैन धर्म ईश्वर की उपस्थिति में विश्वास नहीं रखता है। इसके अनुसार ईश्वर संसार की रचना, इसकी पालना और समाप्ति करने वाला नहीं है। निर्वाण प्राप्त करने के लिए ईश्वर की कोई जरूरत नहीं है। मनुष्य की आत्मा ही उसकी महान् शक्ति है। मनुष्य सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करके निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है।

13. निर्वाण (Nirvana) ‘महावीर जी के अनुसार मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। जैनमत में निर्वाण से भाव आवागमन के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है। निर्वाण प्राप्ति के बाद मनुष्य का इस संसार में जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है और उसको स्थाई शाँति मिलती है।

1. “Ahimsa is the sheet anchor of Jainism.” B.N. Luniya, Life and Culture in Ancient India (Agra : 1982) p. 162.
2. “The observance of these five vows is capable of bringing about individual as well as social progress.” Dr. K.C. Sogani, Jainism (Patiala : 1986) p. 65.

प्रश्न 5.
भगवान् महावीर का जीवन तथा प्रसिद्ध शिक्षाएँ बताएँ।
(Describe the life and important teachings of Bhagwan Mahavira.)
उत्तर-
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर के जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 6.
जैन धर्म में त्रि-रत्न से क्या अभिप्राय है ? चर्चा करें।
(What is meant by three Jewels in Jainism ? Discuss.)
अथवा
‘त्रि-रत्न’ की व्याख्या करो और बताओ कि यह किस धर्म से संबंधित है ? (Explain Tri-Ratna and tell to which religion, do they belong.)
अथवा
जैन मत के तीन हीरों की व्याख्या करें।
(Explain the three Jewels of Jainism.).
अथवा
जैन धर्म के त्रि-रत्नों के बारे में चर्चा करो।
(Discuss the Tri-Ratnas of Jainism.)
उत्तर-
जैन दर्शन के सिद्धांतों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पहले जीव (आत्मा) शुद्ध रूप में होता है। बाद में यह कार्मिक पदार्थों के कारण दूषित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को घोर दुःखों का सामना करना पड़ता है। यदि कार्मिक पदार्थों का नाश कर दिया जाये तो व्यक्ति इस भवसागर से पार उतर सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। जैन दर्शन मोक्ष प्राप्ति को मनुष्य के जीवन का सबसे ऊँचा उद्देश्य मानता है। कोई भी व्यक्ति बिना किसी जाति, लिंग, धर्म, वर्ग या आयु पर इस मार्ग पर चल सकता है। इस मार्ग पर चलने के लिए जैन धर्म में त्रि-रत्न निर्धारित किये गये हैं। ये त्रि-रत्न हैं-(1) सच्चा विश्वास (2) सच्चा ज्ञान (3) सच्चा आचार। ये त्रि-रत्न मोक्ष प्राप्ति के तीन भिन्न-भिन्न मार्ग नहीं हैं, बल्कि एक मार्ग के तीन साथ-साथ चलने वाले रास्ते हैं। यदि इनमें से एक की भी कमी हो तो व्यक्ति अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति ने अपने मकान की छत पर जाना हो तो उसको सीढ़ी लगानी पड़ेगी और यदि इस सीढ़ी के सिरे पर लगे दो और बीच में लगे डंडों में से एक चीज़ की भी कमी हो तो व्यक्ति किसी भी स्थिति में ऊपर नहीं पहुँच सकता। त्रि-रत्नों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित है—

1. सच्चा विश्वास (Right Belief)-जैन दर्शन के त्रि-रत्नों में सच्चा विश्वास नामक रत्न को पहला अथवा प्रमुख स्थान दिया गया है। क्योंकि यदि व्यक्ति में सच्चा विश्वास न हो तो वह सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार कभी प्राप्त नहीं कर सकता। सच्चा विश्वास से भाव यह है कि जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, उसे 24 जैन तीर्थंकरों, नौ महान् सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में पक्की श्रद्धा होनी चाहिए। जैन शास्त्रों के अनुसार सच्चा विश्वास तभी पूरा हो सकता है यदि संबंधित व्यक्ति 8 अंगों को धारण करे। ये 8 अंग हैं—

  • जैन धर्म के सिद्धांतों के बारे कोई शंका नहीं होनी चाहिए।
  • सांसारिक वस्तुओं से कोई प्यार नहीं होना चाहिए।
  • शरीर में चाहे अनगिनत बुराइयाँ हैं, परंतु इसके प्रति कोई तिरस्कार की भावना नहीं होनी चाहिए।
  • गलत मार्ग की ओर कोई झुकाव नहीं होना चाहिए।
  • पवित्र व्यक्तियों की प्रशंसा की जानी चाहिए, परंतु दूसरे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जानी चाहिए।
  • जो व्यक्ति धर्म की राह से भटक गये हों उनको ठीक मार्ग दर्शाना चाहिए।
  • धार्मिक व्यक्तियों का पूरा आदर किया जाना चाहिए।
  • जैन सिद्धांतों के प्रचार के लिए पूरे यत्न करने चाहिए।

सच्चा विश्वास किसी भी व्यक्ति द्वारा तब ही प्राप्त किया जा सकता है यदि वह तीन प्रकार के अंध-विश्वासों और आठ प्रकार के घमंडों से दूर रहे। तीन तरह के अंध-विश्वास ये हैं—

  • पहाड़ पर चढ़कर, नदी में नहाकर या आग पर चल कर अपने आप को पवित्र समझना।
  • झूठे देवी-देवताओं में विश्वास करना।
  • झूठे तपस्वियों का सत्कार करना।

आठ प्रकार के घमंड ये हैं—

  • ज्ञान का घमंड
  • पूजा का घमंड
  • परिवार का घमंड
  • जाति का घमंड
  • शक्ति का घमंड
  • दौलत का घमंड
  • तप का घमंड
  • सुंदर शरीर का घमंड।

सच्चा विश्वास हमारे लिए समृद्धि तथा मोक्ष का आधार तैयार करता है।

2. सच्चा ज्ञान (Right Knowledge)-सच्चा विश्वास ही सच्चे ज्ञान की आधारशिला है। इस कारण सच्चा विश्वास और सच्चे ज्ञान के मध्य गहरा संबंध है। सच्चा ज्ञान वह है जो जैन शास्त्रों में दिया गया है। जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करना चाहता है उसके लिए सच्चे ज्ञान को प्राप्त करना अति ज़रूरी है। यह ज्ञान बाहर से नहीं आता बल्कि जीव पर पड़े कर्म पदार्थों के पर्दे को दूर हटाने से उत्पन्न हो जाता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। वह ज्ञान जो आत्मा द्वारा सीधा प्राप्त किया जाता है प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है और वह ज्ञान जो इंद्रियों के रास्ते से प्राप्त होता है परोक्ष ज्ञान कहलाता है।
जैनी ज्ञान को पाँच तरह का बताते हैं—

  • मति ज्ञान-यह ज्ञान इंद्रियों द्वारा प्राप्त किया जाता है और यह सीमित होता है।
  • श्रुती ज्ञान-यह ज्ञान शास्त्रों को पढ़ने और या सुनने से प्राप्त होता है। इससे भूत, वर्तमान और भविष्य संबंधी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह ज्ञान भी इंद्रियों के द्वारा जाना जा सकता है।
  • अवधि ज्ञान-दूर के समय या स्थान के बारे जो ज्ञान आत्मा के द्वारा होता है उसको अवधि ज्ञान कहते हैं।
  • मनपर्याय ज्ञान-यह वह ज्ञान है जिस द्वारा व्यक्ति किसी दूसरे के मन के विचारों को जान सकता है। यह ज्ञान भी आत्मा द्वारा होता है।
  • कैवल्य ज्ञान-यह पूर्ण सच्चा ज्ञान है। इसको परमार्थिक ज्ञान भी कहा जाता है। इस ज्ञान को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को सिद्ध कहा जाता है।

ज्ञान दोष तीन तरह से पैदा होता है—

  • इंद्रियों की गलती के कारण।
  • गलत अध्ययन के कारण।
  • अस्पष्ट दृष्टिकोण के कारण।

जैसे दूध की भारी मात्रा में थोड़ा-सा खट्टा डाल दिया जाये तो वह सारे दूध को खट्टा कर देता है। ठीक उसी तरह यदि व्यक्ति द्वारा प्राप्त ज्ञान में थोड़ा-सा भी दोष आ जाये तो वह सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।

3. सच्चा आचार (Right Conduct)-मोक्ष को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति के लिए सच्चा विश्वास और सच्चा ज्ञान होने के बाद सच्चा आचार का होना अति ज़रूरी है। व्यक्ति का सच्चा आचार ही जीव के कार्मिक पदार्थों का नाश करता है और उसके लिए मोक्ष का मार्ग तैयार करता है। सच्चे आचार पर चलने के लिए जैन धर्म में कुछ नियम निर्धारित किये गये हैं। ये नियम यद्यपि समान रूप में आम लोगों और जैन मुनियों पर लागू होते हैं परंतु उन पर सख्ती का अंतर है । जैन मुनियों को इन नियमों की सख्ती से पालना करनी पड़ती है जबकि आम लोगों को कुछ छूट दी गई है। इन नियमों को पाँच महाव्रत या पाँच अणुव्रत कहा जाता है इनके अनुसार—

  • मनुष्य को कभी किसी जीव को दु:ख नहीं देना चाहिए और उसको अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए।
  • उसको सदा सत्य बोलना चाहिए। उसके बोल मीठे और हितकारी होने चाहिए।
  • उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो।
  • उसको सांसारिक वस्तुओं से मोह नहीं करना चाहिए।
  • उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

ऊपरलिखित त्रि-रत्नों पर चलने के कारण जीव के कर्म पदार्थ धीरे-धीरे नष्ट होने शुरू हो जाते हैं और वह अपने परम उद्देश्य मोक्ष को प्राप्त करता है। अंत में हम प्रसिद्ध लेखक जे० पी० सुधा के इन शब्दों से सहमत हैं,
“जैनियों के अनुसार सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार जो त्रि-रत्नों के तौर पर जाने जाते हैं उस मार्ग का निर्धारण करते हैं जो जीव अपने अंदर कार्मिक पदार्थों को आने से रोकते हैं और व्यक्ति को आवागमन के बंधनों से मुक्त करते हैं।”3

3. “According to the three jewels of right faith, right knowledge and right conduct, known as Triratna constitute the path which prevents fresh Karmic matter from entering the soul and frees the individual from the bonds of rebirth.” J.P. Sudha, Religions in India (New Delhi : 1978) p. 211.

प्रश्न 7.
जैन धर्म में अहिंसा पर नोट लिखें। (Write a note on Ahimsa (non-violence) of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत के बारे में प्रकाश डालें।
(Throw light on the Jain principle of Ahimsa.)
अथवा
अहिंसा से क्या भाव है ? जैन धर्म में इसका क्या महत्त्व है ? (What is meant by Ahimsa ? What is its importance in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत पर नोट लिखें।
(Write a note on the concept of Ahimsa in Jainism.)
उत्तर-
1. अहिंसा से अभिप्राय (Meaning of Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा की नीति को जितना महत्त्व दिया गया है उतना विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं दिया गया। यदि अहिंसा को जैन धर्म की आधारशिला कह दिया तो इसमें कोई अतिकथनी नहीं होगी। अहिंसा से अभिप्राय है किसी भी जीवित चीज़ को कोई कष्ट न देना। जीवित जीवों को कस के बाँधने, उनको मारने-पीटने, उनकी हिम्मत से अधिक भार जोतने, उनको खुराक और पानी से वंचित रखने में जैन धर्म में मनाही है। इनके अतिरिक्त उनको अपने भोजन के लिए मारना बिल्कुल अनुचित है।
जैन दर्शन के अनुसार वृक्षों और पत्थरों आदि में भी जान होती है। इसलिए हमें उनको भी किसी किस्म का दु:ख नहीं देना चाहिए। आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना जीवन प्यारा है, सभी सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सभी जीने की इच्छा रखते हैं।” इसलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है।

2. दो प्रकार की हिंसा (Two types of Ahimsa)-हिंसा दो प्रकार की होती है-विचार या मन से हिंसा और कर्म से भाव शारीरिक और बाहरी हिंसा। बाहरी हिंसा के व्यवहार में आने से पहले मनुष्य के विचारों में हिंसा आती है। जब मनुष्य के मन में आवेग उठते हैं और इन आवेगों के प्रति विचार उत्पन्न होते हैं तो व्यक्ति पाप करता है और हिंसा का दोषी बन जाता है। मनुष्य संसार के लालचों में फंसकर अपनी काम वासना को पूरा करने के लिए , किसी को धोखा देने के लिए, किसी से अपना बदला लेने के लिए हिंसा करता है। जब इससे संबंधित विचार व्यक्ति के मन में आते हैं तो वह पहले अपनी आत्मा को दूषित करता है। वह यहाँ ही बस नहीं करता और बाद में बाहरी हिंसा के द्वारा दूसरों को दुःख पहुँचाता है और स्वयं भी दुःखी होता है। हिंसा को रोकने के लिए व्यक्ति का अपने विचारों को शुद्ध करना ज़रूरी है। महावीर ने अपने शिष्यों को शिक्षा देते हुए कहा, “हे श्रमणो, पहले अपने आप से युद्ध करो और आत्म शुद्धि की ओर कदम बढ़ाओ। बाहरी युद्ध से कुछ नहीं होगा।”

3. अहिंसा जीवन का एक मार्ग (Ahimsa is a way of Life)-जैन दर्शन में अहिंसा को जीवन का एक मार्ग कहा गया है। किसी भी व्यक्ति द्वारा अहिंसा के प्रति प्रतिज्ञा का पूरी तरह पालन तभी संभव है यदि उसको हिंसा की किस्मों और रूपों के बारे में पूर्ण ज्ञान हो। जैनी सूत्रों में 108 प्रकार की हिंसा का वर्णन मिलता है जिन्हें चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहले वर्ग में हिंसा तीन स्तर की है। हिंसा व्यक्ति स्वयं कर सकता है, यह दूसरों से करवाई जा सकती है और यह उसकी अपनी सहमति के द्वारा की जा सकती है। व्यक्ति मन, वाणी और शरीर द्वारा हिंसा कर सकता है। दूसरे वर्ग में तीन स्तरीय हिंसा नौ स्तरीय बन जाती है क्योंकि यह मन, वाणी और शरीर रूपी तीन साधनों में प्रत्येक साधन द्वारा की जा सकती है। तीसरे वर्ग में नौ स्तरीय हिंसा सताईस स्तरीय बन जाती है क्योंकि हिंसा की तीन स्थितियाँ हैं, भाव हिंसा के बारे में सोचना, हिंसा के लिए तैयारी करना और फिर उस को व्यावहारिक रूप देना। चौथे वर्ग में सत्ताईस स्तरीय हिंसा 108 स्तरीय हिंसा बन जाती है क्योंकि यह चार मनोवेगों में से किसी न किसी से उत्तेजित होती है।

4. हिंसा से बचने के साधन (Ways to Escape Ahimsa)-हिंसा के सभी रूपों में किसी से बचना आसान नहीं है। फिर भी जैनी अपने जीवन में इनसे बचने के लिए अनेक नियमों का पालन करते हैं। वे नंगे पाँव चलते हैं ताकि कोई कीड़ा उनके पाँवों के नीचे आकर मर न जाये। वे मुँह पर पट्टी बाँध कर रखते हैं ताकि कोई कीटपतंगा सांस से उनके अंदर न चला जाए। इस उद्देश्य से वे पानी छान कर पीते हैं और सूर्य ढलने के बाद भोजन नहीं करते। जैनी ज्यादातर व्यापार का धंधा करते हैं और खेतीबाड़ी बिल्कुल नहीं करते क्योंकि उनका विचार है कि खेतीबाड़ी करते समय अनेक जीवों की हत्या हो जाती है।
जैन धर्म में व्यक्ति के मन में हिंसा के विचारों को उभरने से रोकने के लिए शराब और दूसरी नशीली वस्तुओं के सेवन, माँस खाने और युद्ध करने की मनाही है। नशीली वस्तुओं का प्रयोग करने से हमारे अंदर काम वासना और अन्य कई वासनाएँ उत्तेजित होती हैं। इनसे पाप की भावना और हिंसा उत्पन्न होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति लापरवाही में ही हिंसा कर देता है। माँस का प्रयोग करने पर इसलिए पाबंदी लगाई गई है ताकि मनुष्य पशुओं और पक्षियों को अपने भोजन के लिए न मारे और न ही वह हिंसा का भागीदार बने। युद्ध के दौरान व्यक्ति अपने दुश्मनों को मार कर बहुत बहादुरी का काम समझता है परंतु जैन दर्शन के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मारना बिल्कुल अयोग्य है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

ऊपरलिखित विवरण से स्पष्ट है कि जैन धर्म में अन्य नियमों के मुकाबले अहिंसा के सिद्धांत पर अधिक बल दिया गया है। डॉक्टर ज्योति प्रसाद जैन का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“अहिंसा का जीवन सारी नैतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बुराइयों का राम बाण इलाज है। अहिंसा सर्वोच्च धर्म है और जहाँ अहिंसा है वहाँ जीत है।”4

4. “The Ahimstic way of life is the sure panacea for all moral, social, economic and political ills. Ahimsa is the highest religion, and where there is Ahimsa, there is victory.” Dr. Jyoti Prasad Jain, Religion and Culture of the Jains (New Delhi : 1983) p. 101.

प्रश्न 8.
जैन धर्म की नौ सच्चाइयों से क्या भाव है ? इनका संक्षेप वर्णन करो। (What is meant by Nine Truths of Jainism ? Explain briefly.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तत्त्व कौन से हैं ? चर्चा करें।
(Which are the nine tatvas in Jainism ? Discuss.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तथ्यों पर एक नोट लिखो।
(Write a note on nine tatvas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तत्त्वों से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
(What do we learn from nine tatvas of Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म के नौ रत्नों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the Nine Rattans of Jainism.)
उत्तर-
नौ सच्चाइयों अथवा तत्त्वों को जैन दर्शन में केंद्रीय स्थान प्राप्त है। वह व्यक्ति जो निर्वाण प्राप्त करने का चाहवान है उसके लिए इन नौ सच्चाइयों के बारे जानकारी होना अति जरूरी है। ये नौ सच्चाइयाँ हैं—
(i) जीव
(ii) अजीव
(iii) पुण्य ”
(iv) पाप
(v) आश्रव
(vi) बंध
(vii) संवर
(viii) निर्जर
(ix) मोक्ष।

दिगंबर संप्रदाय के अनुसार सात सच्चाइयाँ हैं । वे पाप और पुण्य को अलग नहीं मानते। उनके अनुसार ये अश्रव और बंध में शामिल हैं। इन सच्चाइयों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. जीव (Jiva)-जीव शब्द का अर्थ है आत्मा। यह चेतन तथ्य है। जैन दर्शन में जीव दो प्रकार के हैं। इनको सांसारिक जीव और मुक्त जीव कहा जाता है। सांसारिक जीव को बंधन जीव भी कहते हैं। यह जीव आवागमन के चक्र में रहता है और अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है और अपने अच्छे बुरे फल भुगतता है। मुक्त जीव वह जीव है जो पुनर्जन्म से रहित है। यह जीव अनंत ज्ञान वाला, अनंत शक्ति वाला और अनंत गुणों वाला होता है। यह जीव कर्मों के जाल से मुक्त होता है।

2. अजीव (Ajiva)-अजीव से भाव उन जड़ पदार्थों से है जिनमें चेतना नहीं होती जैसे पुस्तक, कागज़, मेज़ और स्याही आदि। उदाहरण के तौर पर ऊँट के शरीर में जीव फैल कर ऊँट जितना बड़ा हो जाता है और कीड़ी के शरीर में सिकुड़ कर कीड़ी जितना हो जाता है। यह जीव तब नहीं दिखाई देता है परंतु शरीर की क्रियाओं के आधार पर इसकी उपस्थिति का ज्ञान हो जाता है। परंतु जब शरीर का अंत हो जाता है तो जीव लोप हो जाता है। जीव जिस शरीर को धारण करता है वह उस के आकार का ही हो जाता है। अजीव दो प्रकार के होते हैं रूपी और अरूपी । रूपी वह हैं जो दिखाई देते हैं जैसे कुर्सी, पैन, घड़ा आदि। अरूपी वह हैं जो दिखाई नहीं देते जैसे समय, चिंता और खुशी आदि। जैन दर्शन में अजीवों के पाँच अचेतन तत्त्व बताए गए हैं। इनका संक्षेप वर्णन निम्नलिखित है

  • पुदगल (Pudgala)-पुदगल से भाव पदार्थ या परमाणु है। यह पुदगल रूप, स्पर्श, रस और गंध-चार गुणों वाले होते हैं। अग्नि के पुदगल रूप गुण वाले, वायु के पुदगल स्पर्श गुण वाले, जल के पुदगल रस गुण वाले और पृथ्वी के पुदगल गंध गुण वाले होते हैं। पुदगलों के दो रूप माने गए हैं-अणु रूप वाले और स्कंध रूप वाले। अणु रूप वाले पुदगल जीवों के भोग के लायक नहीं होते हैं जबकि स्कंध रूप वाले होते हैं। पुदगलों को सारे भौतिक जगत् की रचना का मूल आधार माना जाता है।
  • धर्म (Dharma) यह तत्त्व जीव और पुदगलों में गति पैदा करता है और उनके आपसी सहयोग में सहायक माना जाता है। जैसे मछली की गति के लिए पानी की ज़रूरत अति आवश्यक है ठीक उसी प्रकार जीवों और पुदगलों की गति के लिए धर्म की ज़रूरत अति आवश्यक है। धर्म के बिना गति पैदा नहीं हो सकती।
  • अधर्म (Adharma)-इसका स्वरूप और कार्य धर्म से बिल्कुल उल्ट है। यह जीवों की ओर पुदगलों की गति में रुकावट पैदा करता है। परंतु अधर्म को धर्म का विरोधी नहीं समझा जाता। अधर्म के द्वारा गति में पाई गई रुकावट जीव के आराम के लिए सहायक मानी गई है।
  • आकाश (Akasha)-आकाश से भाव वह स्थान है जिसमें जीव, मुदगल, धर्म और अधर्म सारे विस्तार वाले तत्त्व रहते हैं। इन तत्त्वों के आधार पर ही आकाश की उपस्थिति का अनुमान किया जाता है। जैन दर्शन के अनुसार आकाश दो प्रकार के हैं-लोकाकाश और अलोकाकाश। लोकाकाश उस आकाश को कहा गया है जिस भाग में भौतिक लोक की स्थिति है और उससे ऊपर जो आकाश है उसको अलोकाकाश कहा गया है।
  • काल (Kala)-काल से भाव समय है। यह विस्तार वाला तत्त्व नहीं है। इसकी उपस्थिति का ज्ञान अनुमान के द्वारा प्राप्त होता है। काल को जगत् के परिवर्तन का मूल कारण माना गया है। भूत, वर्तमान, भविष्य से काल का संबंध है। काल को आदि और अंत वाला तत्त्व कहा जाता है।

3. पुण्य (Punya)-पुण्य वह कर्म है जो अच्छे अमलों से कमाये जाते हैं। पुण्य कमाने के अलग-अलग ढंग हैं। भूखे को खाना देना, प्यासे को पानी पिलाना, नंगे को कपड़ा देना, हाथों से सेवा करनी, मीठा बोलना आदि पुण्य के काम हैं, पुण्य को मानने के 42 साधन हैं। अच्छी सेहत, आर्थिक समृद्धि, प्रसिद्धि, अच्छा वैवाहिक जीवन, अच्छे रिश्तेदारों और दोस्तों का मिलना, अच्छी पढ़ाई और उच्च पदवियों पर नियुक्ति आदि अच्छे पुण्यों का ही नतीजा है। पुण्य को आत्मा का सहायक माना जाता है क्योंकि इससे खुशी प्राप्त होती है।

4. पाप (Papa)-पाप को जीव के बंधन का मुख्य कारण माना जाता है। जीवों को मारना, झूठ, चोरी, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, धोखा, नशा और दुश्मनी आदि सब पापों के भार में वृद्धि करते हैं। पापियों को घोर सजाएँ . मिलती हैं। आपने देखा होगा कि एक ही घर में पैदा हुए दो सगे भाइयों के जीवन में भारी अंतर होता है। एक ऊँची पदवी पर सुशोभित होता है और उसको प्रसिद्धि प्राप्त होती है। दूसरा दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है, चोरियाँ करता है और बदनामी कमाता है। ऐसा क्यों होता है ? जैन दर्शन के अनुसार ऐसा व्यक्ति के पुण्य और पाप कमाने का कारण होता है। पापी मनुष्य कभी भी सुखी नहीं हो सकता और उसको अपने जीवन में घोर संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा भी तड़पती रहती है। जैन सूत्रों के अनुसार पापों के 82 अलग-अलग परिणाम निकलते हैं।

5. आशरव (Asrava) ब्रह्मांड में अनगिनत सूक्ष्म अणु (कार्मिक पदार्थ) घूमते रहते हैं जिनको आत्मा अपने अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार अपनी ओर खींचती है। इस अंदर आने की कारवाई को आश्व कहते हैं। मनुष्य के कर्म आत्मा में उसी तरह शामिल होते हैं जैसे एक सुराख के रास्ते से नाव में पानी। कर्म जीव के बंधन का एक मुख्य कारण है। कर्म जड़ हैं। इसलिए आप जीव में प्रवेश नहीं करते, वे मन, वचन और शरीर की सहायता से जीव में प्रवेश करते हैं। कर्म दो प्रकार के हैं शुभ और अशुभ। यदि शुभ कर्म जीव में प्रवेश होंगे तो उसको सुख की प्राप्ति होगी और यदि कर्म अशुभ होंगे तो जीव को कष्ट होगा। इसलिए कर्मों का शुभ अथवा अशुभ होना व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।

6. बंध (Bandha)-जब कर्म पदार्थ का पर्दा जीव के शुद्ध स्वरूप पर पड़ जाता है तो वह दूषित हो जाता है। यह जीव के बंधन का कारण बनता है। जैन दर्शन के अनुसार इस दिशा की ओर ले जाने वाले पाँच कारण हैं।

  • मिथ्या दर्शन-इससे भाव गलत विश्वास है।
  • आवृत्ति-इससे भाव है प्रतिज्ञा की कमी।
  • प्रसाद-इससे भाव है लापरवाही।
  • काश्य-इससे भाव है काम वासना।
  • योग-इससे भाव है शरीर, मन और बोल की प्रक्रिया।
    बंध चार प्रकार के हैं—
  • प्रकृति-जीव से जुड़े कर्म पदार्थों का स्वरूप।
  • स्थिति-कर्म पदार्थ जीव से कितने समय के लिए जुड़े हैं।
  • अनुभाग-कर्म पदार्थ सख्त चरित्र के हैं या नर्म चरित्र के। (घ) प्रदेश जीव-जीव से जुड़े कर्म पदार्थों में अणुओं की संख्या।
    कर्मों के जाल में फंस कर जीव का व्यावहारिक रूप नष्ट हो जाता है और वह बंधन में फंस जाता है। इस कारण वह बार-बार जन्म लेता है और शरीर रूपी कैद भोगता है।

7. संवर (Sanvara)—योग क्रिया के द्वारा कर्म पदार्थ जीव की ओर खींचे आते हैं। मोक्ष प्राप्त करने के लिए इस क्रिया को रोकना अति ज़रूरी है। इसको संवर कहते हैं। इसको आश्व निरोध भी कहते हैं, जिससे भाव है कर्मों का हमारे अंदर प्रवेश करने से रुक जाना। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं। इनमें आत्म संयम, शुभ विचार, लोभ, मोह, अहंकार, क्रोध और पापों से परहेज़ आदि शामिल हैं। इस कारण जीव के इर्द-गिर्द एक ऐसी ऊँची दीवार बन जाती है जिसके अंदर कर्म पदार्थों का दाखिल होना असंभव है। जैसे एक तालाब में जिस नाली के द्वारा पानी जा रहा है उसको रोकना संभव है ठीक उसी प्रकार कर्म पदार्थों को संवर के द्वारा जीव में प्रवेश करने से रोकना संभव है।

8. निर्जर (Nirjara)-निर्जर से भाव कर्म पदार्थों को जीव से दूर हटाना है। यह जीव के द्वारा संचित कर्मों को नष्ट करने का एक मुख्य साधन है। संवर द्वारा जीव में कर्मों के बढ़ने और प्रवेश को रोका जाता है। परंतु पुराने कर्मों को जिन का जीव के भीतर आश्व हो गया है निर्जर के द्वारा नाश किया जा सकता है। निर्जर में तपस्या शामिल है। तपस्या अग्नि की तरह कर्म पदार्थों के इकट्ठे हुए ढेर को जला कर राख कर देती है। इसी प्रकार जब जीव पर से कर्म पदार्थों का पड़ा पर्दा हट जाता है तो उसका शुद्ध स्वरूप प्रकट हो जाता है। जैसे बिलौर के सामने काला कपड़ा रखने से वह काला नज़र आने लग जाता है। परंतु जब कपड़ा हटा लिया जाता है तो उसकी अपनी चमक दुबारा प्रकट हो जाती है।

9. मोक्ष (Moksha)-जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण को प्राप्त करना है। इसमें जीव कर्मों के सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है। कर्मों की समाप्ति से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए संवर और निर्जर आवश्यक है। कर्मों के बंधन को तोड़ने के लिए जैनी तीन सद्गुणों के पालन की सिफ़ारिश करते हैं, जिनको त्रि-रत्न कहा जाता है। ये हैं सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। मोक्ष जीव की प्राप्ति की सर्वोच्च अवस्था है। जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर लेता है उसको सिद्ध कहते हैं । सिद्ध पुरुष जन्म, मृत्यु, सुख और दुःख से दूर है। वह ब्रह्मांड में चिरंजीवी शाँति प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 9.
जैन धर्म के पाँच महाव्रतों के महत्त्व का उल्लेख करें। (Describe the importance of Five Mahavartas in Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच महाव्रतों के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the Five Mahavartas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म में पाँच महाव्रतों का क्या महत्त्व है ? प्रकाश डालिए।
(What is the importance of Five Mahavartas in Jainism ? Elucidate.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच अणुव्रतों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the Five Anuvartas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच अणुव्रतों का क्या महत्व है ? प्रकाश डालें।
(What is the importance of Five Anuvartas of Jainism ? Elucidate.) ।
उत्तर-
जैन धर्म में पाँच महाव्रतों को विशेष स्थान प्राप्त है। इन नियमों की पालना करनी प्रत्येक जैनी के लिए आवश्यक है। ये नियम बहुत कठोर हैं। ये नियम जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए बनाए गए थे। गृहस्थियों के लिए ये नियम इतने कठोर नहीं थे। इनके लिए बनाए गए नियमों को पाँच अणुव्रत (Five Anuvartas) कहा जाता है। इन पाँच महाव्रतों या अणुव्रतों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. अहिंसा (Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैन लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये। बी० एन० लूनीया के अनुसार,
“अहिंसा जैन धर्म की आधारशिला है।”5

2. सत्य (Satya)-जैन धर्म में सत्य बोलने पर बहुत बल दिया गया है। हमें हमेशा सत्य और मीठे वचन बोलने चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति दूसरे के मन को मोह लेता है। झूठ बोलने से आत्मा को दुःख होता है। झूठ बोलने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता। वास्तव में झूठ बोलने से कलह-क्लेश बढ़ता है और इसका अंत नहीं होता। विवश होकर अंत में व्यक्ति को सत्य मानना ही पड़ता है। झूठ के परिणाम हमेशा बुरे ही होते हैं। हमें किसी के डर के कारण, लालच के कारण अथवा हंसी-मज़ाक में भी झूठ नहीं बोलना चाहिए। इसलिए हमें हमेशा सोच-समझ कर बोलना चाहिए। गुस्सा आने पर शांत बने रहना चाहिए। जैन धर्म में इस बात पर भी बल दिया गया है कि हमें किसी पर भी झूठा आरोप नहीं लगाना चाहिए। हमें किसी के साथ भी धोखा नहीं करना चाहिए। हमें किसी को भी गलत परामर्श देकर उसे मार्ग से विचलित नहीं करना चाहिए। झूठ बोलकर किसी का रिश्ता तय नहीं करना चाहिए। पंचायत अथवा किसी भी और स्थान पर झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए। झूठ ही हिंसा को जन्म देता है। सत्य अहिंसा का आधार है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

3. अस्तेय (Asteya)—जैन धर्म में अस्तेय को बहुत महत्त्व दिया गया है। अस्तेय का भाव है चोरी न करना। जैन धर्म में चोरी का अर्थ बहुत विशाल है। किसी की वस्तु चुरा लेनी एक सीधा अपराध है, लेकिन जैन धर्म में उसको चोरी ही माना गया है जो कोई भी व्यक्ति किसी द्वारा भूली हुई वस्तु का प्रयोग भी करता है। हमें किसी की वस्तु उसके मालिक की आज्ञा के बिना नहीं लेनी चाहिए। हमें किसी के घर में भी बिना आज्ञा के प्रवेश नहीं करना चाहिए। गुरु की स्वीकृति के बिना भिक्षा में प्राप्त अनाज को ग्रहण नहीं करना चाहिए। बिना स्वीकृति के हमें किसी के घर निवास नहीं करना चाहिए। यदि घर में रहने की स्वीकृति मिले तो उसकी आज्ञा के बिना उसकी वस्तु को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जैन धर्म के अनुसार चोरी के दो प्रकार हैं। ये हैं-सूक्ष्म चोरी और स्थूल चोरी। सूक्ष्म चोरी उसको कहते हैं जिस में मनुष्य अपने परिवार के हित के लिए संयम स्वभाव से काम करता है। जैसे जंगल में लकड़ी और फल आदि प्राप्त करना। समाज और कानून की नज़रों में जिस चोरी को दंड योग्य माना जाता है उसको स्थूल चोरी कहा जाता है। मिलावट करनी, चोर की सहायता करनी, चोरी का माल खरीदना, कम मापदंड करना, लोगों से धोखे के सा. अधिक ब्याज प्राप्त करने को स्थूल चोरी कहा जाता है। एक बार चोरी करने वाला मनुष्य ग़रीब घर में जन्म लेता है बार-बार चोरी करने वाला मनुष्य अगले जन्म में गुलाम के रूप में जन्म लेगा।

4. अपरिग्रह (Aparigraha) जैन धर्म में अपरिग्रह महाव्रत को बहुत महत्ता दी गई है। अपरिग्रह से भाव है सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह न रखना। ये सामान्य देखने में आता है कि गृहस्थी लोग आवश्यक वस्तुओं को आवश्यकता से ज्यादा इकट्ठा करते हैं। जीवन की आवश्यक वस्तुओं को इकट्ठा करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन वस्तुओं का आवश्यकता से अधिक भंडार इकट्ठा करना वास्तव में अन्य लोगों के अधिकार को मारना है। जितनी अधिक वस्तुओं को इकट्ठा करने की आकांक्षा बढ़ेगी उतना ही मन अशांत रहेगा। ऐसा मनुष्य कभी भी मोक्ष प्राप्त – * कर सकता। आवश्यकता से ज्यादा संपत्ति इकट्ठा करना भी एक अनुचित कर्म है। जैन साधुओं को आवप्रगकता से अधिक भोजन करने, कपड़े पहनने और बिस्तर आदि रखने की मनाही है। इस महाव्रत की पालना करने वाला व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है।

5. ब्रह्मचर्या (Brahmacharya)—जैन धर्म में ब्रह्मचर्या महाव्रत को विशेष महत्त्व प्राप्त है। इससे भाव है काम वासना से दूर रहना। जैन साधुओं के लिए इस सम्बन्धी कठोर नियम बनाए गए हैं। उनके लिए ये आवश्यक कि वे किसी स्त्री की ओर न देखें, उनसे बातें न करें, किसी भी स्त्री के साथ भूतकाल में बिताए समय को याद न करें। ऐसे किसी घर में न जाए जहाँ कोई स्त्री अकेली रहती हो। शुद्ध और थोड़ा भोजन खाना चाहिए। इस तरह जैन साधवियों के लिए भी नियम निश्चित हैं। उनके लिए किसी पुरुष के साथ बातचीत करने और उनके बारे में सोचने की मनाही है। ग्रहस्थियों के लिए केवल अपनी स्त्री का साथ करना ही ब्रह्मचर्या है। जैन धर्म में काम को वास्तव में जीवन को समाप्त करने वाला रोग माना गया है।
उपरोक्त पाँच महाव्रतों की पालना करने वाला व्यक्ति संयमी बन जाता है और निर्वाण अथवा मोक्ष प्राप्त करता है। डॉ० के० सी० सोगानी के अनुसार,
“इन पाँच महाव्रतों की पालना व्यक्तिगत और सामाजिक उन्नति के लिए सहायक है।”6

5. “Ahimsa is the sheet anchor of Jainism.” B.B. Luniya, Life and Culture in Ancient India (Agra : 1982) p. 162.
6. “The observance of these five rows is capable of bringing about individual as well as social progress.”: Dr. K.C. Sogani, op. cit., p, 65.

प्रश्न 10.
प्रमुख जैन संप्रदायों के बारे में जानकारी दें।
(Write about the main sects in Jainism.)
उत्तर-
जैनी अनेक संप्रदायों में बंटे हुए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख संप्रदायों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार—

1. अजीविक (The Ajivika)-इस संप्रदाय का संस्थापक गोशाल था। वह स्वामी महावीर का शिष्य था और 6 वर्षों के पश्चात् उनसे अलग हो गया था। यह संप्रदाय अपने नियति (किस्मत) के विशेष सिद्धांत के लिए प्रसिद्ध है। इसके अनुसार हर वस्तु की किस्मत पहले से ही निश्चित है। इस को मनुष्य के यत्नों के द्वारा बदला नहीं जा सकता। गोशाल के द्वारा प्रचारित धर्म भारत में 13वीं शताब्दी तक प्रफुल्लित रहा और बाद में लोप हो गया।

2. दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय (The Digambara and Shvetambra Sects)-जैन धर्म के सब संप्रदायों में से दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के समय मगध में भयंकर अकाल पड़ा था। इसलिए भद्रबाहु जो जैनी भिक्षुकों का नेता था अपने साथ बहुत सारे भिक्षुओं को लेकर मैसूर (कर्नाटक) चला गया। जो भिक्षुक मगध में रह गये थे उन्होंने स्थूलभद्र को अपना मुखिया चुन लिया। इन भिक्षुकों ने पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया और अपने साहित्य को एक नया रूप दिया। इस साहित्य को उन्होंने अंग का नाम दिया। इसके अतिरिक्त इन भिक्षुओं ने नंगे रहने की प्रथा को त्याग दिया और सफ़ेद कपड़े पहनने शुरू कर दिये। 12 वर्षों के पश्चात् जब भद्रबाहु अपने अन्य भिक्षुकों के साथ दुबारा मगध आया तो उसने स्थूलभद्र द्वारा किए गए परिवर्तनों को स्वीकार न किया। परिणामस्वरूप जैनी दो संप्रदायों दिगंबर और श्वेतांबर में बाँटे गए। दिगंबर से भाव था नग्न रहने वाले और श्वेतांबर से भाव था सफ़ेद वस्त्र पहनने वाले। इन दोनों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं—

  • दिगंबर संप्रदाय वाले नंगे रहते थे जबकि श्वेतांबर जाति वाले सफ़ेद वस्त्र पहनते थे।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेती। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  • दिगंबर संप्रदाय वाले स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं देते। दूसरी ओर श्वेतांबर संप्रदाय वाले स्त्रियों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाते। उनका कहना था कि 19वीं तीर्थंकर मल्ली एक स्त्री थी। दिगंबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वाले यह मानते हैं कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। उनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम प्रियादर्शना था।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का यह मत है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की ज़रूरत नहीं रहती जबकि श्वेतांबर मत वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  • दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय वालों का धार्मिक साहित्य अलग-अलग है।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज होती हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को कपड़े पहनाये जाते हैं और उनको गहनों से सजाया जाता है।

3. लोक संप्रदाय (Lonka Sect)-इस संप्रदाय का मुखिया लोंक सा था। वह अहमदाबाद का रहने वाला था। 1474 ई० में एक जैनी साधु ज्ञान जी ने कुछ धार्मिक जैनी ग्रंथों का उतारा करने के लिए लोक सा को कहा। इन ग्रंथों को पढ़ते समय लोंक सा ने देखा कि मूर्ति पूजा का वर्णन कहीं भी नहीं आया जबकि जैनी कई सदियों से मूर्ति पूजा करते आ रहे थे। इसलिए उसने जैन धर्म में प्रचलित मूर्ति पूजा का खंडन किया। इससे जैनियों में एक बड़ा विवाद शुरू हो गया ? भानाजी लोंक सा के मत से सहमत हुआ और इस तरह वह लोंक सा संप्रदाय का पहला आचार्य बना।

4. स्थानकवासी (Sthanakvasi)-इस संप्रदाय का संस्थापक वीराजी था। वह सूरत का रहने वाला था। इस नए संप्रदाय का नाम स्थानकवासी इसलिए पड़ा क्योंकि इस संप्रदाय के साधु मंदिरों की जगह मठों में रहते थे। वे बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करते थे। वे मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्राओं में विश्वास नहीं रखते थे।

5. तेरा पंथ (Terapanth)-इंस संप्रदाय के संस्थापक मारवाड़ के भीखनजी थे। इसकी स्थापना 1706 ई० में की गई थी। इस संप्रदाय के तेरह धार्मिक नियम थे जिस कारण इस संप्रदाय का नाम तेरा पंथ पड़ा। यह संप्रदाय भी मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता। यह तप और अनुशासन पर बहुत ज़ोर देता है।

6. तारना पंथ (Taranapanina)-इस पंथ की स्थापना स्वामी तारना ने ग्वालियर में की थी। इस पंथ को मानने वाले मूर्ति पूजा, धर्म के बाहरी दिखावे और जाति भेदों के विरुद्ध हैं। उनके अपने अलग मंदिर हैं जिनमें मूर्तियाँ ही नहीं बल्कि पवित्र धार्मिक ग्रंथों की पूजा भी की जाती है।

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प्रश्न 11.
जैन मत के प्रमुख संप्रदाय कौन से हैं ? उनके मध्य समानताएँ तथा भिन्नताएँ स्पष्ट करें।
(What are the main sects in Jainism ? Explain their similarities and differences.)
अथवा
जैन धर्म के फिरके दिगंबर और श्वेतांबर के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the sects Digambara and Shvetambra of Jainism.)
उत्तर-
दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय (The Digambara and Shvetambra Sects)-जैन धर्म के सब संप्रदायों में से दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के समय मगध में भयंकर अकाल पड़ा था। इसलिए भद्रबाहु जो जैनी भिक्षुकों का नेता था अपने साथ बहुत सारे भिक्षुओं को लेकर मैसूर (कर्नाटक) चला गया। जो भिक्षुक मगध में रह गये थे उन्होंने स्थूलभद्र को अपना मुखिया चुन लिया। इन भिक्षुकों ने पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया और अपने साहित्य को एक नया रूप दिया। इस साहित्य को उन्होंने अंग का नाम दिया। इसके अतिरिक्त इन भिक्षुओं ने नंगे रहने की प्रथा को त्याग दिया और सफ़ेद कपड़े पहनने शुरू कर दिये। 12 वर्षों के पश्चात् जब भद्रबाहु अपने अन्य भिक्षुकों के साथ दुबारा मगध आया तो उसने स्थूलभद्र द्वारा किए गए परिवर्तनों को स्वीकार न किया। परिणामस्वरूप जैनी दो संप्रदायों दिगंबर और श्वेतांबर में बाँटे गए। दिगंबर से भाव था नग्न रहने वाले और श्वेतांबर से भाव था सफ़ेद वस्त्र पहनने वाले। इन दोनों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं—

  1. दिगंबर संप्रदाय वाले नंगे रहते थे जबकि श्वेतांबर जाति वाले सफ़ेद वस्त्र पहनते थे।
  2. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेती। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  3. दिगंबर संप्रदाय वाले स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं देते। दूसरी ओर श्वेतांबर संप्रदाय वाले स्त्रियों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाते। उनका कहना था कि 19वीं तीर्थंकर मल्ली एक स्त्री थी। दिगंबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  4. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वाले यह मानते हैं कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। उनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम प्रियादर्शना था।
  5. दिगंबर संप्रदाय वालों का यह मत है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की ज़रूरत नहीं रहती जबकि श्वेतांबर मत वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  6. दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय वालों का धार्मिक साहित्य अलग-अलग है।
  7. दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज होती हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को कपड़े पहनाये जाते हैं और उनको गहनों से सजाया जाता है।

प्रश्न 12.
जैन संघ की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो। (Explain the salient features of Jain Sangha.)
अथवा
जैन धर्म के संघ-अनुशासन के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the Sangha discipline of Jainism.)
उत्तर-
जैन संघ की स्थापना स्वामी महावीर जी ने पावा नगर में की थी। इसने जैन धर्म के प्रसार में प्रशंसनीय योगदान दिया।

1. सदस्य (Member)-जैन संघ में चार प्रकार के लोग शामिल होते हैं जिनको भिक्षु और भिक्षुणियाँ तथा श्रावक और श्राविका कहा जाता था। भिक्षु और भिक्षुणियाँ वे थे जिन्होंने संसार का त्याग कर दिया था। श्रावक और श्राविका वे थे जो गृहस्थी का जीवन व्यतीत करते थे।

2. दीक्षा (Initiation)—जो व्यक्ति संघ में शामिल होना चाहता था उसको अपने माता-पिता और संरक्षक से आज्ञा लेनी पड़ती थी। इसके बाद वह अपना मुंडन करके, स्नान करके, सफ़ेद कपड़े पहन के भिक्षा का बर्तन लेकर किसी प्रमुख जैन आचार्य के पास जा कर दीक्षा लेता था। इस संस्कार को निष्कर्म संस्कार कहते थे। स्त्रियाँ भी जैन संघ में शामिल हो सकती थीं। जैन संघ के दरवाज़े सभी जातियों के लिए खुले थे। केवल अधर्मी व्यक्तियों को संघ में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी।

3. अनुशासित जीवन (Disciplined Life)-दीक्षा प्राप्त करने के बाद भिक्षु-भिक्षुणियों को बहुत अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। उनको पाँच महाव्रतों, अहिंसा, सुनित, अस्तेय, अपरिगृह और ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था। उनको मन, वचन और शरीर से किसी को भी हिंसा पहुँचाने की मनाही थी। उनको झूठ बोलने, चोरी करने, अपने पास संपत्ति रखने, सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग करने, जूते, छाता, पलंग और कुर्सी आदि का प्रयोग करने, बिना आज्ञा किसी के घर जाने, गृहस्थी के बर्तनों में भोजन करने, अधिक खाने, रात हो जाने के बाद भोजन करने, किसी की निंदा करने, किसी स्त्री के साथ बातचीत करने, जिस घर में स्त्री हो वहाँ ठहरने आदि की सख्त मनाही थी। गृहस्थी व्यक्तियों को भी यद्यपि इन नियमों का पालन करने के लिए कहा गया है, परंतु उन पर इतनी सख्ती लागू नहीं की गई थी।

4. प्रतिदिन जीवन (Daily Life)-प्रत्येक भिक्षु अथवा भिक्षुणी अपने रोज़ाना जीवन को 8 भागों में बाँटता था। इनमें 4 भाग धार्मिक ग्रंथों की पढ़ाई के लिए, 2 तप के लिए, 1 खाने के लिए और 1 आराम करने के लिए निश्चित होता था। वे अपना भोजन प्रतिदिन माँग कर खाते थे। उनको एक से अधिक घर से भिक्षा लेने की मनाही थी। जैन संघ के सारे सदस्य वर्षा के चार महीनों में एक स्थान पर रह कर जैन धर्म का प्रचार करते थे। बाकी के आठ महीने वे अलग-अलग स्थानों पर जा कर जैन धर्म के प्रचार में व्यतीत करते थे।

5. जैन संघ का मुखिया (Chief of the Jain Sangha)-जैन संघ का मुखिया आचार्य कहलाता था। वह संघ के सारे भिक्षुओं पर नियंत्रण रखता था। केवल उसी को ही दीक्षा देने, संघ का सदस्य बनाने अथवा किसी को सज़ा देने का अधिकार था। इस पदवी के लिए बहुत ही सुलझे हुए और उच्च चरित्र के व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था। स्त्रियों के अपने अलग संघ होते थे। इसके प्रमुख को प्रवर्तिनी कहा जाता था। उसका प्रमुख कार्य जैन संघ में अनुशासन स्थापित रखना था।

6. जैन संघ की भूमिका (Role of Jain Sangha)-जैन संघ ने भारत में जैन धर्म को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन संघ में सम्मिलित होने वाले भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों ने जैन धर्म के प्रसार के लिए कोई प्रयास शेष नहीं छोड़ा। प्रसिद्ध लेखक एस० सी० रैचौधरी के अनुसार,

“वास्तव में जैन संघ के प्रयासों के कारण जैन धर्म ने भारत की भूमि में अपनी गहरी जड़ें बना लीं तथा यह आज भी कायम हैं।”7

7. “In fact, it is mainly due to their efforts that Jainism took root into Indian soil and still survives,” S.C. Raychoudhary, History of Ancient India (Delhi : 2006) p. 107.

प्रश्न 13.
जैन धर्म ग्रंथों की भाषा क्या है ? जैन धर्म ग्रंथों के बारे में प्रारंभिक जानकारी दें।
(What is the language of Jain scriptures ? Give preliminary information about Jain scriptures.)
अथवा
जैन धर्म ग्रंथों के बारे में प्रारंभिक जानकारी दें।
(Give preliminary information about the major Jain scriptures.)
अथवा
जैन मत के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों की जानकारी दो। (Give information about the prominent scriptures of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथों के बारे में आप क्या जानते हो ?
(What do you know about the prominent scriptures of Jainism ?)
अथवा
प्रमुख जैन धार्मिक ग्रंथों पर प्रकाश डालें।
(Throw light on the prominent Jain scriptures.)
उत्तर-
जैनियों ने अनेक धार्मिक ग्रंथों की रचना की। इनमें से जो ग्रंथ हमें आज उपलब्ध हैं उनकी संख्या 45 है। ये सारे ग्रंथ जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के साथ संबंधित हैं। ये ग्रंथ प्राकृत अथवा अर्ध मगधी जो उस समय लोगों की बोलचाल की आम भाषा थी में लिखे गए हैं। इन ग्रंथों को गुजरात में वल्लभी के स्थान पर 5वीं शताब्दी में लिखित रूप दिया गया। इनको एक प्रसिद्ध जैनी साधु देवरिद्धी ने संपूर्ण किया। इन ग्रंथों को 6 वर्गों में बाँटा गया है। इनके नाम हैं—
(1) 12 अंम
(2) 12 उपांग
(3) 10 प्राकिरण
(4) 6 छेदसूत्र
(5) 4 मूलसूत्र
(6) 2 विविध पुस्तकें।
इनका संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. 12 अंग (The Twelve Angas)-जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंगों को सब से अधिक पवित्र समझा जाता है। इन अंगों के नाम और उनका संक्षेप वर्णन इस प्रकार है

  • आचारांग सूत्र-इसमें जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियमों का वर्णन किया गया है। इसमें महावीर के जीवन का भी वर्णन मिलता है।
  • सूत्रक्रितांग- इसमें कर्म और अहिंसा के सिद्धांतों के बारे में और नरक के दु:खों के बारे में वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त इसमें विरोधी धर्मों के सिद्धांतों का खंडन इस उद्देश्य से किया गया है ताकि जैनियों का अपने धर्म में पक्का विश्वास रहे।
  • स्थानांग-इसमें जैन धर्म के अलग-अलग विषयों के बारे जानकारी दी गई है।
  • समवायांग-इसमें जैन सिद्धांतों का संख्यात्मक ढंग से वर्णन किया गया है।
  • भगवती सूत्र-इसको जैन धार्मिक साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ समझा जाता है। इसमें जैन सिद्धांतों का प्रश्न-उत्तर रूप में वर्णन किया गया है। ये प्रश्न स्वामी महावीर के प्रमुख शिष्य गौतम इंद्रभूति द्वारा पूछे गये थे और इनका उत्तर स्वामी महावीर ने स्वयं दिया था।
  • ज्ञात धर्म कथा-इसमें जैन धर्म से संबंधित प्रसिद्ध कथाओं का वर्णन मिलता है। इन कथाओं को उदाहरणों सहित समझाया गया है।
  • उपासकदशा-इसमें स्वामी महावीर के समय के 10 उन अमीर व्यक्तियों की कहानियाँ दी गई हैं जो महावीर के शिष्य बन गए थे और जिन्होंने कठोर तपस्या के बाद मोक्ष प्राप्त किया।
  • अंतक्रिदशा-इसमें उन जैन मुनियों के जीवन का वर्णन मिलता है जिन्होंने कठोर तप के बाद मोक्ष प्राप्त किया।
  • अनउत्तरोपपातिक-इसमें भी कुछ जैन मुनियों के जीवन का वर्णन मिलता है।
  • प्रश्न व्याकरण- इसमें पाँच महाव्रतों और पाँच अणुव्रतों का वर्णन किया गया है।
  • विपाकसूत्र-इसमें अच्छे या बुरे कर्मों से मिलने वाले फलों का वर्णन किया गया है।
  • दृष्टिवाद-यह अंग अब लोप हो चुका है। अन्य ग्रंथों में से इस अंग से संबंधित मिलते विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि इसमें विभिन्न सिद्धांतों का संक्षेप वर्णन किया गया था।

2. 12 उपांग (The Twelve Upangas)-प्रत्येक अंग का एक-एक उपांग है। इनमें मिथिहासिक कथाओं का अधिक वर्णन मिलता है। इनसे ज्योतिष, भूगोल और ब्रह्मांड आदि के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। कहीं-कहीं ऐतिहासिक घटनाओं का भी जिक्र आता है। 12 उपांगों में राज्य प्रश्नीय नामक उपांग सब से अधिक प्रसिद्ध है। इसमें जैन मुनी केश और पायोस नामक राजा के मध्य हुई वार्तालाप का विवरण लिखा हुआ है।

3. 10 प्राकिरण (The Ten Prakirans)-इनमें जैन धर्म से संबंधित विभिन्न विषयों को पद्य रूप में लिखा गया है। इनसे स्वामी महावीर के जीवन और उसके उपदेशों संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

4. 6 छेदसूत्र (The Six Chhedasutras)-इनमें जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के आचार से संबंधित नियमों का वर्णन किया गया है। छेदसूत्रों में कल्पसूत्र को सबसे प्रसिद्ध माना जाता है। इसकी रचना भद्रबाह ने की थी। इसमें स्वामी महावीर की जीवन कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

5. 4 मूलसूत्र (The Four Mulasutras)-4 मूलसूत्रों को जैनी साहित्य में बहुमूल्य समझा जाता है। इनमें जैन धर्म से संबंधित कथाओं और उनसे मिलने वाली शिक्षा, जैन संघ के नियमों और कुछ जैन मुनियों के जीवन तथा उनके उपदेशों के बारे जानकारी प्राप्त होती है। ये सारे मूलरूप में लिखे गये हैं। मूलसूत्रों में उत्तर अध्ययन नामक सूत्र को सबसे महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।

6. 2 विविध पुस्तकें (Two Miscellaneous Texts)—इनमें नंदीसूत्र और अनुयोगद्वार नामक पुस्तकें शामिल हैं। ये एक प्रकार से विश्वकोष हैं। इनमें जैन धर्म की विभिन्न शाखाओं, धार्मिक सिद्धांतों, अर्थशास्त्र और काम शास्त्र के विषयों के संबंध में जानकारी दी गई है।

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प्रश्न 14.
जैन धर्म का भारतीय सभ्यता को क्या योगदान है ? (What is the Legacy of Jainism to Indian Civilization ?)
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं कि जैन धर्म बौद्ध धर्म की तरह उन्नत हो सका परंतु फिर भी इसने भारत में सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी गहरी छाप छोड़ी।।

1. सामाजिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Social Field) सामाजिक क्षेत्र में जैनियों ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। छठी शताब्दी में हिंदू धर्म में जाति प्रथा बड़ी कठोर हो गई थी। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से सख्त नफ़रत करते थे। शूद्र जाति के लोगों के साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया जाता था। महावीर ने जाति प्रथा का ज़ोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने अपने धर्म में प्रत्येक धर्म से संबंधित लोगों को शामिल किया। उन्होंने लोगों में आपसी भाईचारे और बराबरी का प्रचार किया। परिणामस्वरूप वह लोगों में फैली आपसी घृणा को काफी सीमा तक दूर करने में सफल हुए। इस प्रकार जैनियों ने भारतीय समाज को एक नया रूप दिया।

2. धार्मिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Religious Field)-धार्मिक क्षेत्र में भी जैनियों का योगदान बहुत प्रशंसनीय था। जैन धर्म ने लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। जैन धर्म में फ़िजूल के रीति-रिवाजों, यज्ञों और बलियों आदि के लिए कोई स्थान नहीं था। जैन धर्म के यत्नों के कारण धार्मिक क्षेत्र में फैले बहुत सारे अंध-विश्वासों का अंत हो गया। जैन धर्म की बढ़ती हुई प्रसिद्धि को देखकर हिंदू धर्म के नेताओं ने अपने धर्म को सुरजीत करने के उद्देश्य से अपने धर्म में आवश्यक सुधार किए।

3. सांस्कृतिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Cultural Field)—सांस्कृतिक क्षेत्र में भी जैन धर्म का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण था। जैन धर्म के सिद्धांतों ने अपने ग्रंथ प्राकृत, गुजराती, हिंदी, मराठी, कन्नड़ और तामिल भाषाओं में लिखे। परिणामस्वरूप इन क्षेत्रीय भाषाओं को बहुत उत्साह मिला। इन ग्रंथों में यद्यपि धर्म से संबंधित बातें लिखी गई हैं पर फिर भी इनसे हमें उस समय की भारत की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इस कारण इन जैनी ग्रंथों को भारतीय इतिहास का एक अमूल्य स्रोत माना जाता है। जैनियों ने कई प्रभावशाली और प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इन मंदिरों में कई बहुत मनमोहक मूर्तियाँ रखी जाती थीं। राजस्थान में माऊँट आबू और कर्नाटक में श्रावण बेलगोला में बने जैनियों के मंदिर अपनी भूवन निर्माण कला के कारण न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त जैनियों ने भारत में कई प्रसिद्ध स्तूपों का निर्माण भी करवाया।

4. लोक कल्याण के क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Field of Public Welfare)-स्वामी महावीर ने अपने शिष्यों को समाज सेवा का उपदेश दिया था। इसी कारण जैनमत वालों ने लोगों की सहायता के लिए बहुत सी धर्मशालाएँ बनाईं। शिक्षा के प्रचार के लिए शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की, मनुष्यों और पशुओं के इलाज के लिए कई अस्पताल खुलवाए और कई अन्य लोक कल्याण के कार्य भी किए। जैनियों द्वारा स्थापित की गई कई शिक्षा संस्थाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। उनके द्वारा खोले गए अस्पतालों में आज भी ग़रीब रोगियों का मुफ्त इलाज होता है और जानवरों की देखभाल की जाती है।

5. राजनीतिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Political Field) जैन मत में अहिंसा के सिद्धांत पर बहुत ज़ोर दिया जाता था। इसने लोगों को शांतमयी जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप कई राजाओं ने लड़ाई में हिस्सा लेना बंद कर दिया ताकि निर्दोष लोगों का खून न बहाया जाये। वे शांतिप्रिय बन गए। इसी कारण भारत में काफी समय तक शाँति और खुशहाली का वातावरण रहा परंतु दूसरी ओर इसका भारतीय राजनीति पर कुछ बुरा प्रभाव भी पड़ा। युद्धों में भाग न लेने के कारण भारतीय सेना कमजोर हो गई। परिणामस्वरूप वह बाद में होने वाले विदेशी आक्रमणों का डट कर मुकाबला न कर सकी। इसी कारण भारतीयों को सैंकड़ों वर्षों तक गुलामी का जीवन व्यतीत करना पड़ा।

समूचे रूप में हम यह कह सकते हैं कि जैनियों ने भारतीय समाज को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया। अंत में हम डॉक्टर वी० ए० मंगवी के इन शब्दों से सहमत हैं,
“वास्तव में भारत में जैनियों की सबसे प्रमुख विशेषता भारतीय संस्कृति को दिया गया उनका बहुमूल्य योगदान का रिकार्ड है। उनकी सीमित एवं थोड़ी जनसंख्या को देखते हुए जैनियों ने जो योगदान भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को दिया वह वास्तव में महान् है।”8

8. “In fact, the most outstanding characteristic of Jainism in India is their very impressive record of contributions to Indian culture in comparison with the limited and small population of Jains, the achievements of Jains in enriching the various aspects of Indian culture are re great.” Dr. V.A. Sangve, Aspects of Jaina Religion (New Delhi: 1990) p. 98.

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तीर्थंकर से क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Tirthankara ?)
उत्तर-
जैन आचार्यों को तीर्थंकर कहा जाता है। तीर्थंकर से अभिप्राय है संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। पहले तीर्थंकर का नाम ऋषभनाथ था। 23वां तीर्थंकर पार्श्वनाथ था। वह स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले हुए। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर थे। उनको जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनके समय में जैन धर्म ने अद्वितीय विकास किया।

प्रश्न 2.
पार्श्वनाथ। (Parshvanatha.)
उत्तर-
पार्श्वनाथ जैन धर्म का 23वां तीर्थंकर था। उसकी मुख्य शिक्षाएँ यह थीं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊँट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 3.
स्वामी महावीर। (Lord Mahavira.)
उत्तर-
स्वामी महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ। आपके पिता जी का नाम सिद्धार्थ तथा माता जी का नाम त्रिशला था। महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था। महावीर की शादी एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से हुई। महावीर ने 30 वर्षों की आयु में गृह त्याग दिया था। उन्होंने 12 वर्ष तक घोर तपस्या के पश्चात् ज्ञान प्राप्त किया। आपने 30 वर्षों तक अपने ज्ञान का प्रसार किया। राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथला, विदेह तथा अंग उनके प्रसिद्ध प्रचार केंद्र थे। 527 ई० पू० उन्होंने पावा में निर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 4.
भगवान महावीर की शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए। (Discuss about the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
स्वामी महावीर की शिक्षाएँ। (Teachings of Lord Mahavira.)
उत्तर-
स्वामी महावीर ने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों पर चलने के लिए कहा। उन्होंने कठोर तप, अहिंसा तथा उच्च आचरण पर जोर दिया। वह समानता, आवागमन तथा कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। वह ईश्वर, यज्ञों, बलियों, वेद तथा संस्कृत में विश्वास नहीं रखते थे। उनके अनुसार प्रत्येक जैनी को अपने जीवन में पाँच महाव्रतों की पालना करनी चाहिए। उनके अनुसार मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है।

प्रश्न 5.
त्रि-रत्न। (Tri-Ratna.)
अथवा
त्रि-रत्न क्या हैं ? (What is Tri-Ratna ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी ने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों पर चलने के लिए कहा। ये त्रि-रत्न थे-सच्ची श्रद्धा, सच्चा ज्ञान तथा शुद्ध आचरण। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तथा इनको व्यर्थ के रीति-रिवाज़ों में विश्वास नहीं रखना चाहिए। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। इनमें से किसी एक ही अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती।

प्रश्न 6.
अहिंसा। (Ahimsa.)
उत्तर-
जैन धर्म में अहिंसा की नीति को जितना महत्त्व दिया गया है, उतना विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं दिया गया। अगर अहिंसा को जैन धर्म की आधारशिला कहा जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं होगा। अहिंसा से अभिप्राय है कि किसी भी जैव वस्तु को कष्ट न देना। जैन दर्शन के अनुसार मनुष्यों और पशुओं के अतिरिक्त वृक्षों तथा पत्थरों में भी आत्मा का निवास होता है। इस कारण हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी उद्देश्य से जैनी नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और सूर्य छिपने के पश्चात् भोजन नहीं करते।

प्रश्न 7.
स्वामी महावीर की शिक्षा के अनुसार एक जैन भिक्षु को कैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता था ? (According to the teachings of Lord Mahavira how a Jaina monk led his life ?)
उत्तर-

  1. स्वामी महावीर की शिक्षा के अनुसार जैन भिक्षुओं को बहुत स्वच्छ जीवन व्यतीत करना पड़ता था।
  2. प्रत्येक भिक्षु को पाँच प्रतिज्ञाओं की पालना करनी पड़ती थी।
  3. प्रत्येक भिक्षु को सदैव सत्य बोलना चाहिए। उनको अहिंसा की नीति की पालना करनी पड़ती थी।
  4. प्रत्येक भिक्षु के लिए आवश्यक था कि उनकी वेशभूषा और खाना-पीना बिल्कुल सादा हो।

प्रश्न 8.
स्वामी महावीर जी की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन के लिए क्या महत्त्व था ?
(What was the importance of the teachings of Lord Mahavira in the life of a common man ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी की शिक्षाएँ साधारण मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण थीं। भगवान् महावीर ने अपने धर्म में बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वर्ग के लोगों को शामिल किया। इससे समाज में प्रचलित परस्पर घृणा बहुत सीमा तक दूर हुई और लोगों में परस्पर बंधुत्व एवं प्रेम-भाव बढ़ गया। स्वामी महावीर जी ने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। साधारण लोग भी इन परंपराओं के विरुद्ध थे। इसलिए उनके हृदयों पर स्वामी महावीर जी की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। स्वामी महावीर जी ने लोगों को समाज सेवा का उपदेश दिया।

प्रश्न 9.
स्वामी महावीर ने कौन-सी धार्मिक तथा सामाजिक बुराइयों का खंडन किया ? (Which religious and social evils were condemned by Lord Mahavira ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर ने यज्ञों, बलियों, पुरोहितवाद तथा धर्म के बाहरी दिखावों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। वह मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे। उनको वेदों तथा संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं था। वह जाति प्रथा तथा समाज में प्रचलित अन्य रूढ़िवादी विचारों के घोर विरोधी थे। उन्होंने इन रीतियों को एक ढोंग बताया तथा कहा कि कोई भी व्यक्ति इनका पालन करने से निर्वाण को प्राप्त नहीं कर सकता।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 10.
दिगंबर। (Digambaras.)
उत्तर-
दिगंबर जैनियों का एक प्रमुख संप्रदाय है। दिगंबर से अभिप्राय है नग्न रहने वाले। इस संप्रदाय के भिक्षु नग्न रहते हैं। इस संप्रदाय को मानने वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं, लेतीं। उन्हें जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं दी जा सकती। इस संप्रदाय का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। इनका अपना अलग साहित्य है।

प्रश्न 11.
श्वेतांबर। (Svetambaras.)
उत्तर-
श्वेतांबर जैन धर्म का एक प्रमुख संप्रदाय है। श्वेतांबर से अभिप्राय है सफेद वस्त्र धारण करने वाले। इस कारण इस संप्रदाय के लोग सफेद वस्त्र पहनते हैं। इस संप्रदाय के लोगों का कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में ही मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। वे स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा देते थे। उनका कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। इस संप्रदाय का अपना अलग साहित्य है।

प्रश्न 12.
जैन धर्म भारत में लोकप्रिय क्यों नहीं हो सका ? (Why could not Jainism become popular in India ?)
उत्तर-
जैन धर्म की शिक्षाएँ यद्यपि सरल थीं, परंतु कई कारणों से यह धर्म लोगों में लोकप्रिय न हो सका। पहला, जैन धर्म वालों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया। दूसरा, जैन धर्म को बौद्ध धर्म की भाँति राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका। तीसरा, जैन धर्म वाले कठोर तप, शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में विश्वास रखते थे। इसके अतिरिक्त उनका अहिंसा में आवश्यकता से अधिक विश्वास था। जन सामान्य के लिए इन नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। चौथा, बौद्ध धर्म के सिद्धांत सरल थे। परिणामस्वरूप लोगों ने जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म को अपनाना आरंभ कर दिया।

प्रश्न 13.
जैन संघ के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Jain Sangha ?)
उत्तर-
जैन संघ की स्थापन स्वामी महावीर जी ने की थी। इसमें शामिल होने वाले प्रत्येक भिक्षु तथा भिक्षुणियों को अपने माता-पिता और संरक्षक से आज्ञा लेनी पड़ती थी। उनको बहुत अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। जैन संघ के सारे सदस्य वर्षा के चार महीनों को छोड़कर बाकी समय अलग-अलग स्थानों पर जाकर धर्म प्रचार करने में व्यतीत करते थे। जैन संघ का मुखिया आचार्य कहलाता था। स्त्रियों के अपने अलग संघ होते थे।

प्रश्न 14.
जैन मत की देन। (Legacy of Jainism.)
अथवा
जैन मत का प्रभाव। (Effects of Jainism.)
उत्तर-
जैन मत ने भारतीय सभ्यता को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य देन दी। उन्होंने परस्पर भ्रातृत्व तथा समानता का प्रचार किया। जैन मत ने लोगों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। जैन धर्म के विद्वानों ने अनेक भाषाओं में अपने ग्रंथ लिखे। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओं को उत्साह मिला। जैनियों ने अनेक प्रभावशाली तथा प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इस कारण भारतीय भवन निर्माण कला को एक नया उत्साह मिला। जैन धर्म ने शांति का संदेश दिया।

प्रश्न 15.
स्वामी पार्श्वनाथ पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on Lord Parshvanatha.)
उत्तर-
स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊँट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

प्रश्न 16.
स्वामी महावीर पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के महत्त्व को दर्शाइए।
(Describe the importance of 24th Tirthankar of Jainism.)
उत्तर-
स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। उन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनका जन्म 599 ई० पू० वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ। उनके पिता जी का नाम सिद्धार्थ तथा माता जी का नाम त्रिशला था। महावीर का बचपन का नाम वर्द्धमान था। वे शुरू से ही बहुत विचारशील थे। वे सांसारिक कार्यों में बहुत कम रुचि लेते थे। महावीर की शादी एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से की गई। उनके घर एक पुत्री ने जन्म लिया जिसका नाम प्रियदर्शना अथवा अनोजा रखा गया। महावीर ने 30 वर्षों की आयु में गृह त्याग दिया था। उन्होंने 12 वर्ष तक घोर तपस्या के पश्चात् ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने लोगों में फैले अंधकार को दूर करने के लिए अपने ज्ञान का प्रसार किया। राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथला, विदेह तथा अंग उनके प्रसिद्ध प्रचार केंद्र थे। महावीर ने त्रि-रत्न अहिंसा, कठिन तप, शुद्ध आचरण आदि पर बल दिया। वह यज्ञों, बलियों, वेदों, संस्कृत भाषा तथा ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते थे। 527 ई० पू० उन्होंने पावा में निर्वाण प्राप्त किया। निस्संदेह जैन धर्म के विकास में उनका योगदान बहुमूल्य था।

प्रश्न 17.
भगवान महावीर की शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss about the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
स्वामी महावीर की शिक्षाएँ का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Discuss briefly the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की मुख्य शिक्षाएँ क्या थीं?
(What were the main teachings of Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the pre-eminent teaching of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म का आधार उसकी नैतिक कीमतें हैं। संक्षिप्त चर्चा करें।
(The base of Jainism is their Ethical values. Discuss in brief.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक कीमतों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the moral-values of Jainism.)
अथवा
नैतिक कीमतें जैन धर्म में प्रमुख हैं। चर्चा कीजिए।
(Moral values are supreme in Jainism. Discuss.)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी की शिक्षाएँ अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली थीं। उनके अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त करना है। अतः उन्होंने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों—

  1. सच्ची श्रद्धा,
  2. सच्चा ज्ञान,
  3. और शुद्ध आचरण पर चलने के लिए कहा।

वे कठोर तप में विश्वास रखते थे। वे अहिंसा पर बहुत ज़ोर देते थे। उनके अनुसार मनुष्य और पशुओं के अतिरिक्त हमें पेड़-पौधों और पक्षियों आदि को भी कष्ट नहीं देना चाहिए। वे आवागमन और कर्म सिद्धांतों में विश्वास रखते थे। उन्होंने समानता व आपसी भाईचारे का प्रचार किया। उन्होंने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उन्होंने हिंदू धर्म में फैले झूठे रीति-रिवाजों और यज्ञों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। वे वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने अपना प्रचार लोगों की साधारण भाषा में किया। वे परमात्मा के अस्तित्व में भी विश्वास नहीं रखते थे। उनका कथन था कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। अतः उसे ईश्वर की सहायता की आवश्यकता नहीं है। जैसा मनुष्य कर्म करेगा उसे वैसा ही फल प्राप्त होगा। वे तीर्थंकरों की उपासना में विश्वास रखते थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 18.
त्रि-रत्न से क्या भाव है ? इसका क्या महत्त्व है ? (What is meant by Tri-Ratnas ? What is its importance ?)
अथवा
त्रि-रत्न से क्या भाव है ?
(What is meant by Tri-Ratnas ?)
अथवा
आप त्रि-रत्न के बारे में क्या जानते हैं ? (What do you understand by Tri-Ratna ?)
अथवा
जैन धर्म के तीन रत्नों का उल्लेख करें। (Write about the Tri-Ratnas of Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त करना है। इसको प्राप्त करने के लिए जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्रि-रत्नों पर चलना अति ज़रूरी है। ये तीन रत्न हैंसच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों, नौ सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यह तीर्थंकरों के उपदेशों के गहरे अध्ययन से प्राप्त होता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। आत्मा द्वारा प्राप्त ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और वह ज्ञान जो इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होता है उसको परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। सच्चा आचार वह है जिसकी शिक्षा जैन धर्म देता है। ये तीनों रत्न साथ-साथ चलते हैं। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती। उदाहरण के तौर पर जैसे एक दीये को प्रकाश देने के लिए उसमें तेल, बाती और आग का होना ज़रूरी है। यदि इसमें से एक भी वस्त की कमी हो तो वह प्रकाश नहीं दे सकता।

प्रश्न 19.
जैन धर्म में अहिंसा का क्या महत्त्व है ? (What is the importance Ahimsa in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के महत्त्व का वर्णन करें।
(Explain the importance of Ahimsa in Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारंग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है, सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों .और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैनी लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये।

प्रश्न 20.
जैन धर्म की नौ सच्चाइयों पर नोट लिखो। (Write a short note on the Nine Truths of the Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के नौ-तत्त्वों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the Nine Tatvas of Jainism.)
उत्तर-
जैन दर्शन नौ सच्चाइयों की शिक्षा देता है। ये सच्चाइयाँ हैं—

  1. जीव-जैन दर्शन में आत्मा को जीव कहा गया है। यह चेतन सुरूप है। यह शरीर के कर्मों के अच्छे-बुरे फल भुगतता है और आवागमन के चक्र में पड़ता है।
  2. अजीव-यह जंतु पदार्थ है। यह निर्जीव है और इनमें समझ नहीं होती। इनकी दो श्रेणियाँ हैं रूपी और अरूपी।
  3. पुण्य-यह अच्छे कर्मों का नतीजा है। इसके नौ साधन हैं।
  4. पाप-यह जीव के बंधन का मुख्य कारण है। इसके परिणामस्वरूप घोर सजायें मिलती हैं।
  5. अशर्व-यह वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है। कर्म 8 किस्मों के होते हैं।
  6. संवर-कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को संवर कहते हैं। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं।
  7. बंध-इससे भाव बंधन है। यह जीव (आत्मा) का पुदगल (परमाणु) से मेल है। बंध के लिए पाँच कारण जिम्मेवार हैं।
  8. निर्जर-इस से भाव है दूर भगाना। यह कर्मों को नष्ट करने और जल देने का कार्य करता है।
  9. मोक्ष-इसमें जीव कर्मों के जंजाल से मुक्त हो जाता है। यह पूर्ण शाँति की अवस्था है जिसमें हर तरह के दुःखों से छुटकारा प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 21.
जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of Karma Theory in Jain Philosophy ?)
अथवा
जैन धर्म का कार्य सिद्धांत के बारे में क्या विचार है ? (What is meant by Karma Theory of Jainism ?)
उत्तर-
जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस सिद्धांत के अनुसार, “जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बीजोगे वैसा काटोगे, यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा, किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा।” जैसे ही हमारे मन में कोई अच्छा या बुरा विचार आता है वह तुरंत जीव (आत्मा) से उसी तरह जुड़ जाता है, जैसे तेल लगे हुए शरीर से धूलि कण चिपक जाते हैं। ये कर्म आठ प्रकार के हैं-

  1. ज्ञानवर्णीय कर्म- यह आत्मा के ज्ञान को रोकते हैं।
  2. दर्शनवीय कर्म- यह आत्मा की इच्छा शक्ति को रोकते हैं।
  3. वैदनीय कर्म-ये सुख-दुःख उत्पन्न करने वाले कर्म हैं।
  4. मोहनीय कर्म-ये आत्मा को मोह माया में फंसाने वाले कर्म हैं।
  5. आयु कर्म-ये कर्म मनुष्य की आयु को निर्धारित करते हैं।
  6. नाम कर्म-ये कर्म मनुष्य के व्यक्तित्व को निर्धारित करते हैं।
  7. गोत्र कर्म-ये व्यक्ति के गोत्र और समाज में उसके ऊँचे या नीचे स्थान को निर्धारित करते हैं।
  8. अंतरीय कर्म-ये अच्छे कर्म को रोकने वाले कर्म हैं।

प्रश्न 22.
जैन धर्म में जीव एवं अजीव से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Jiva and Ajiva in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में जीव से क्या अभिप्राय है?
(What is meant by Jiva in Jainism ?)
उत्तर-
1. जीव-जीव शब्द का अर्थ है आत्मा। यह चेतन तथ्य है। जैन दर्शन में जीव दो प्रकार के हैं। इनको सांसारिक जीव और मुक्त जीव कहा जाता है। सांसारिक जीव को बंधन जीव भी कहते हैं। यह जीव आवागमन के चक्र में रहता है और अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है और अपने अच्छे बुरे फल भुगतता है। मुक्त जीव वह जीव है जो पुनर्जन्म से रहित है। यह जीव अनंत ज्ञान वाला, अनंत शक्ति वाला और अनंत गुणों वाला होता है। यह जीव कर्मों के जाल से मुक्त होता है।

2. अजीव-अजीव से भाव उन जड़ पदार्थों से है जिनमें चेतना नहीं होती जैसे पुस्तक, कागज़, मेज़ और स्याही आदि। उदाहरण के तौर पर ऊँट के शरीर में जीव फैल कर ऊँट जितना बड़ा हो जाता है और कीड़ी के शरीर में सिकुड़ कर कीड़ी जितना हो जाता है । यह जीव तब नहीं दिखाई देता है परंतु शरीर की क्रियाओं के आधार पर इसकी उपस्थिति का ज्ञान हो जाता है। परंतु जब शरीर का अंत हो जाता है तो जीव लोप हो जाता है। जीव जिस शरीर को धारण करता है वह उस के आकार का ही हो जाता हैं।

प्रश्न 23.
जैन धर्म में पाप एवं पुण्य से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Papa and Punya in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में पाप से क्या अभिप्राय है ?
(What is meant by Paap in the Jainism ?)
उत्तर-
1. पाप-पाप को जीव के बंधन का मुख्य कारण माना जाता है। जीवों को मारना, झूठ, चोरी, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, धोखा, नशा और दुश्मनी आदि सब पापों के भार में वृद्धि करते हैं। पापियों को घोर सजायें मिलती हैं। आपने देखा होगा कि एक ही घर में पैदा हुए दो सगे भाइयों के जीवन में भारी अंतर होता है। एक ऊँची पदवी पर सुशोभित होता है और उसको प्रसिद्धि प्राप्त होती है। दूसरा दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है, चोरियाँ करता है और बदनामी कमाता है। ऐसा क्यों होता है ? जैन दर्शन के अनुसार ऐसा व्यक्ति के पुण्य और पाप कमाने का कारण होता है। पापी मनुष्य कभी भी सुखी नहीं हो सकता और उसको अपने जीवन में घोर संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा भी तड़पती रहती है। जैन सूत्रों के अनुसार पापों के 82 अलगअलग परिणाम निकलते हैं।

2. पुण्य-पुण्य वह कर्म है जो अच्छे अमलों से कमाये जाते हैं। पुण्य कमाने के अलग-अलग ढंग हैं। भूखे को खाना देना, प्यासे को पानी पिलाना, नंगे को कपड़ा देना, हाथों से सेवा करनी, मीठा बोलना आदि पुण्य के काम हैं, पुण्य को मानने के 42 साधन हैं। अच्छी सेहत, आर्थिक समृद्धि, प्रसिद्धि, अच्छा वैवाहिक जीवन, अच्छे रिश्तेदारों और दोस्तों का मिलना, अच्छी पढ़ाई और उच्च पदवियों पर नियुक्ति आदि अच्छे पुण्यों का ही नतीजा है। पुण्य को आत्मा का सहायक माना जाता है क्योंकि इससे खुशी प्राप्त होती है।

प्रश्न 24.
महावीर जी की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन के लिए क्या महत्त्व था ? (What was the importance of Mahavira’s teachings in the life of a common man ?)
उत्तर-
महावीर जी की शिक्षाएँ साधारण मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण थीं। उस समय हिंदू धर्म में जाति प्रथा बहुत कठोर हो गई थी। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों से घृणा करते थे। भगवान महावीर ने अपने धर्म में _बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वर्ग के लोगों को शामिल किया। इससे समाज में प्रचलित परस्पर घृणा बहुत सीमा तक दूर हुई और लोगों में परस्पर बंधुत्व एवं प्रेम-भाव बढ़ गया। महावीर जो ने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। साधारण लोग भी इन परंपराओं के विरुद्ध थे। इसलिए उनके हृदयों पर महावीर जी की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। महावीर जी की अहिंसा नीति के कारण लोगों को युद्ध से घृणा हो गई और वे शाँति को पसंद करने लगा। महावीर जी ने लोगों को समाज सेवा का उपदेश दिया। परिणामस्वरूप जैन मत वालों ने लोगों की सहायता के लिए बहुत-सी धर्मशालाएँ बनवाईं। शिक्षा प्रचार के लिए शिक्षा संस्थाएँ और मनुष्यों एवं पशुओं की चिकित्सा के लिए अस्पताल खोले।

प्रश्न 25.
महावीर की शिक्षा के अनुसार एक जैन भिक्षु को कैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता था ?
(What type of life a Jain monk had to lead according to the teachings of Mahavira ?)
उत्तर-
महावीर की शिक्षा के अनुसार जैन भिक्षुओं को बहुत स्वच्छ जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक भिक्षु को पाँच प्रतिज्ञाओं की पालना करनी पड़ती थी।

  1. प्रत्येक भिक्षु को सदैव सत्य बोलना चाहिए।
  2. उसको अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए।
  3. उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो।
  4. उसको अपने पास धन नहीं रखना चाहिए।
  5. उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

इनके अतिरिक्त भिक्षु के लिए आवश्यक था कि उनकी वेश-भूषा और खाना-पीना बिल्कुल सादा हो। उनके लिए छाता और सुगंध देने वाली वस्तुओं के प्रयोग करने पर प्रतिबंध था। भिक्षु के लिए किसी स्त्री से बातचीत करने पर भी प्रतिबंध था। उनको सदैव मीठे वचन बोलने के लिए कहा गया था जिससे किसी को दुःख न पहुँचे। उनको इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता था कि उनके चलने से या खान-पीने में किसी जीव की हत्या न हो।

प्रश्न 26.
दिगंबर और श्वेतांबर पर एक नोट लिखें। (Write a note on Digambara and Svetambara.)
अथवा
दिगंबर तथा श्वेतांबर से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you understand by Digambara and Svetambara ?)
उत्तर-
जैन धर्म के सभी संप्रदायों में से दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदायों को प्रमुख स्थान प्राप्त है। दिगंबर से अभिप्राय था नग्न रहने वाले तथा श्वेतांबर से अभिप्राय था श्वेत (सफ़ेद) वस्त्र धारण करने वाले। इन दोनों संप्रदायों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित अनुसार थे—

  1. दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी नग्न रहते हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं।
  2. दिगंबर संप्रदाय स्त्रियों को जैन संघ में सम्मिलित होने की आज्ञा नहीं देता जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वाले ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाते।
  3. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियां तब एक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेतीं। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कथन है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  4. दिगंबर संप्रदाय वालों का यह कथन है कि स्वामी महावीर जी ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वालों का यह कथन है कि स्वामी महावीर जी ने विवाह करवाया था तथा उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम प्रियदर्शना था।
  5. दिगंबर संप्रदाय वालों का कथन है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  6. दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदायों का साहित्य भी अलग-अलग है।
  7. दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को वस्त्र पहनाए जाते हैं तथा उन्हें गहनों से सुसज्जित किया जाता है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 27.
जैन धर्म भारत में लोकप्रिय क्यों नहीं हो सका ? (Why could not Jainism become popular in India ?)
उत्तर-
जैन धर्म की शिक्षाएँ यद्यपि सरल थीं, परंतु कई कारणों से यह धर्म लोगों में लोकप्रिय न हो सका। पहला, जैन धर्म वालों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया। किसी भी धर्म की सफलता के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक होता है। दूसरा, जैन धर्म को बौद्ध धर्म की भाँति राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका। यह सही है कि बिंबिसार, अजातशत्रु और खारवेल जैसे शासकों ने जैन धर्म को अपना संरक्षण दिया, परंतु वे बौद्ध धर्म की भाँति जैन धर्म को प्रगति के शिखर तक पहुँचाने में विफल रहे। तीसरा, जैन धर्म वाले कठोर तप, शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में विश्वास रखते थे। इसके अतिरिक्त उनका अहिंसा में आवश्यकता से अधिक विश्वास था। वे मुँह पर पट्टी बाँधते थे, नंगे पाँव चलते थे और पानी छान कर पीते थे ताकि किसी जीव की मृत्यु न हो जाए। वे वृक्षों और पत्थरों को भी प्राणवान् मानते थे। इसलिए इन्हें कष्ट देना भी पाप समझा जाता था। वे बीमार पड़ने पर औषधि का भी प्रयोग नहीं करते थे। जन सामान्य के लिए इन नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। चौथा, जैन धर्म के लोकप्रिय न होने का एक कारण यह भी था कि उस समय बौद्ध धर्म के सिद्धांत भी बहुत सरल थे। परिणामस्वरूप लोगों ने जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म को अपनाना आरंभ कर दिया। पाँचवां, समय के साथ-साथ जैन लोगों ने हिंदू धर्म के कई सिद्धांतों को अपना लिया। परिणामस्वरूप वे अपने अलग अस्तित्व को न बनाए रख सके।

प्रश्न 28.
जैन स्रोत। (The Jaina Sources.)
उत्तर-
जैन स्रोत प्राचीन भारत के इतिहास पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। जैनियों ने अनेक ग्रंथों की रचना की। ये ग्रंथ प्राकृत अथवा अर्द्ध मगधी जो उस समय लोगों की बोलचाल की आम भाषा थी में लिखे गए हैं। जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंशों को सबसे महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र समझ जाता है। इनमें महावीर के जीवन तथा जैन धर्म के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है। जैन धर्म के 12 उपांग भी हैं। इनमें अधिकाँश मिथिहासिक कथाओं का वर्णन मिलता है। जैन धर्म के 10 प्राकिरणों से महावीर के जीवन एवं उसके उपदेशों संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। 6 छेदसूत्रों में जैन भिक्षु एवं भिक्षुणियों के नियमों का वर्णन किया गया है। जैनी साहित्य में 4 मूलसूत्रों को बहुमूल्य समझा जाता है। इनसे जैन धर्म से संबंधित कथाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है।

प्रश्न 29.
जैन मत की भारतीय सभ्यता को क्या देन है ? (What is the legacy of Jainism to the Indian Civilization ?)
उत्तर-
जैन मत ने भारतीय सभ्यता को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य देन दी। महावीर ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने अपने धर्म में प्रत्येक जाति से संबंधित लोगों को शामिल किया। उन्होंने परस्पर भ्रातृत्व तथा समानता का प्रचार किया। परिणामस्वरूप समाज में फैली घृणा को काफ़ी सीमा तक दूर किया जा सका। जैन मत ने लोगों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। इसके प्रयत्नों के कारण लोगों में फैले बहुत-से धार्मिक अंध-विश्वासों का अंत हो गया। जैन धर्म की बढ़ती हुई प्रसिद्धि को देख कर हिंदू धर्म के नेताओं ने इसमें आवश्यक सुधार किए। जैन धर्म के विद्वानों ने अनेक भाषाओं में अपने ग्रंथ लिखे। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओं को उत्साह मिला। ये ग्रंथ भारतीय इतिहास के बहुमूल्य स्रोत हैं। जैनियों ने अनेक प्रभावशाली तथा प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इस कारण भारतीय भवन निर्माण कला को एक नया उत्साह मिला। जैन धर्म ने लोगों के कल्याण के लिए अनेक धर्मशालाएँ, शौक्षिक संस्थाएँ तथा अस्पतालों आदि की स्थापना की जो आज भी जारी हैं। जैन धर्म ने शाँति का संदेश दिया। यह युद्धों के विरुद्ध था। इसका भारतीय राजनीति पर बुरा प्रभाव पड़ा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1. ‘जैन’ शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-विजेता।

प्रश्न 2. जैन धर्म को आरंभ में क्या नाम दिया गया था ?
उत्तर-निग्रंथ।

प्रश्न 3. निग्रंथ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-बंधनों से मुक्त।

प्रश्न 4. जैन आचार्यों को किस अन्य नाम से जाना जाता था ?
उत्तर-तीर्थंकर।

प्रश्न 5. तीर्थंकर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-संसार के भवसागर से पार कराने वाला गुरु।

प्रश्न 6. जैन धर्म में कुल कितने तीर्थंकर हुए हैं ?
उत्तर-24 तीर्थंकर।।

प्रश्न 7. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का क्या नाम था ?
अथवा
जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम बताओ।
उत्तर-ऋषभदेव।

प्रश्न 8. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर कौन थे ?
उत्तर-पार्श्वनाथ।

प्रश्न 9. स्वामी पार्श्वनाथ जैन धर्म के कौन-से तीर्थंकर थे ?
उत्तर-23वें।

प्रश्न 10. स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर-बनारस में।

प्रश्न 11. स्वामी पार्श्वनाथ के पिता जी कौन थे ?
उत्तर- बनारस के राजा अश्वसेन।

प्रश्न 12. स्वामी पार्श्वनाथ ने जब अपना घर त्याग दिया उस समय उनकी आयु कितनी थी ?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 13. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त किया ?
उत्तर-83 दिनों के।

प्रश्न 14. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने सिद्धांतों का प्रचलन किया ?
उत्तर-स्वामी पार्श्वनाथ ने चार सिद्धांतों का प्रचलन किया।

प्रश्न 15. स्वामी पार्श्वनाथ के सिद्धांतों को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-चातुर्याम।

प्रश्न 16. स्वामी पार्श्वनाथ का कोई एक सिद्धांत बताएँ।
उत्तर-कभी झूठ न बोलो।

प्रश्न 17. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने वर्ष प्रचार किया ?
उत्तर-स्वामी पार्श्वनाथ ने 70 वर्ष प्रचार किया।

प्रश्न 18. स्वामी पार्श्वनाथ ने कब निर्वाण प्राप्त किया?
उत्तर-777 ई० पू०।

प्रश्न 19. जैन धर्म का संस्थापक कौन था और वह कितना तीर्थंकर था ?
उत्तर-जैन धर्म का संस्थापक स्वामी महावीर था और वह 24वां तीर्थंकर था।

प्रश्न 20. जैन धर्म का अंतिम तीर्थंकर कौन था ?
अथवा
जैन धर्म का 24वां तीर्थंकर कौन था ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी।

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प्रश्न 21. जैन धर्म के पहले व आखिरी तीर्थंकर का नाम बताएँ।
उत्तर-जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम ऋषभदेव था तथा आखिरी तीर्थंकर का नाम स्वामी महावीर था।

प्रश्न 22. स्वामी महावीर जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर-599 ई० पू० कुंडग्राम में।

प्रश्न 23. स्वामी महावीर जी का जन्म कहाँ हुआ ?
उत्तर-कुंडग्राम में।

प्रश्न 24. स्वामी महावीर जी के पिता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-सिद्धार्थ।

प्रश्न 25. स्वामी महावीर जी की माता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-त्रिशला।

प्रश्न 26. भगवान् महावीर जी के जन्म से पूर्व उनकी माता को कितने स्वप्न आए थे ?
उत्तर-14.

प्रश्न 27. स्वामी महावीर जी का आरंभिक नाम क्या था ?
उत्तर-वर्धमान।

प्रश्न 28. स्वामी महावीर जी का संबंध किस कबीले के साथ था ?
उत्तर-जनत्रिका।

प्रश्न 29. स्वामी महावीर जी का विवाह किसके साथ हुआ ?
उत्तर-यशोदा से।

प्रश्न 30. स्वामी महावीर जी की पुत्री का क्या नाम था ?
उत्तर-प्रियदर्शना।

प्रश्न 31. घर त्याग के समय स्वामी महावीर जी की आयु कितनी थी?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 32. स्वामी महावीर जी ने कितने वर्षों तक कठोर तप किया ?
उत्तर-12 वर्ष।

प्रश्न 33. स्वामी महावीर जी ने कौन-सी आयु में ज्ञान प्राप्त किया ?
उत्तर-42 वर्ष की।

प्रश्न 34. कैवल्य ज्ञान से क्या भाव है ?
उत्तर-सर्वोच्च सत्य।

प्रश्न 35. स्वामी महावीर जी ने कितने वर्षों तक प्रचार किया ?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 36. स्वामी महावीर जी के कोई दो प्रसिद्ध प्रचार केंद्रों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. राजगृह
  2. वैशाली।

प्रश्न 37. स्वामी महावीर जी ने कब निर्वाण प्राप्त किया?
उत्तर-527 ई० पू०।

प्रश्न 38. स्वामी महावीर जी ने कहाँ निर्वाण प्राप्त किया था ?
उत्तर-पावा में।

प्रश्न 39. स्वामी महावीर जी ने जब निर्वाण प्राप्त किया तब उनकी आयु क्या थी ?
उत्तर-72 वर्ष।

प्रश्न 40. जैन धर्म की बुनियादी कीमतें किसने निर्धारित की ?
उत्तर-स्वामी महाबीर जी ने।

प्रश्न 41. जैन धर्म की कोई एक प्रमुख शिक्षा बताएँ।
उत्तर-जैन धर्म अहिंसा में विश्वास रखता था।

प्रश्न 42. त्रिरत्न किस धर्म के साथ संबंधित है ?
उत्तर-जैन धर्म के साथ।

प्रश्न 43. जैन धर्म के तीन रत्न कौन-से हैं ?
अथवा
जैन धर्म के त्रिरत्नों के नाम बताएँ।
अथवा
जैन धर्म के तीन रत्न क्या हैं ?
उत्तर-

  1. सत्य-श्रद्धा
  2. सत्य-ज्ञान
  3. सत्य-आचरण।

प्रश्न 44. जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का सिद्धांत किसने प्रचलित किया ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी ने।

प्रश्न 45. जैन धर्म दर्शन में कितने तत्त्व माने गए हैं ?
उत्तर-9.

प्रश्न 46. जैन धर्म की कोई दो सच्चाइयाँ बताएँ।
उत्तर-

  1. पाप
  2. पुण्य।

प्रश्न 47. जैन दर्शन में आत्मा को क्या कहा गया है ?
उत्तर-जीव।

प्रश्न 48. जैन दर्शन में अजीव की कौन-सी दो श्रेणियाँ हैं ?
उत्तर-

  1. रूपी
  2. अरूपी

प्रश्न 49. जैन दर्शन में कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को क्या कहते हैं ?
उत्तर-संवर।

प्रश्न 50. जैन धर्म में अशर्व के क्या अर्थ है ?
उत्तर-वह प्रक्रिया जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है।

प्रश्न 51. जैन धर्म में पुदगल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-परमाणु।

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प्रश्न 52. जैन धर्म के अनुसार कर्म कितनी प्रकार के हैं ?
उत्तर-8 प्रकार के।

प्रश्न 53. जैन धर्म के किसी एक प्रकार के कर्म का नाम बताएँ।
उत्तर-ज्ञानवर्णनीय कर्म।

प्रश्न 54. जैन धर्म में जीव से क्या भाव है ?
उत्तर-आत्मा।

प्रश्न 55. जैन धर्म में अजीव से क्या भाव है ?
उत्तर-जड़ पदार्थ।

प्रश्न 56. जैन दर्शन में कितनी प्रकार की हिंसा का वर्णन मिलता है ?
उत्तर-108 प्रकार की।

प्रश्न 57. जैन दर्शन में पुण्य को मानने के कितने साधन हैं ?
उत्तर-42.

प्रश्न 58. जैन दर्शन के अनुसार पाप के कितनी प्रकार के परिणाम निकलते हैं ?
उत्तर-82 प्रकार के।

प्रश्न 59. अनेकांतवाद का सिद्धांत किस धर्म के साथ संबंधित है ?
उत्तर-जैन धर्म के साथ।

प्रश्न 60. जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में कितने अणुव्रतों की पालना करनी चाहिए ?
उत्तर-पाँच अणुव्रतों की।

प्रश्न 61. जैन धर्म में निर्वाण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-आवागमन के चक्र से मुक्ति।

प्रश्न 62. जैन धर्म को नास्तिक धर्म क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-क्योंकि यह धर्म ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता।

प्रश्न 63. अजीविक संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-गौशाल।

प्रश्न 64. अजीविक संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत क्या था ?
उत्तर-इस संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत नियति (किस्मत) था।

प्रश्न 65. जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय कौन-से हैं ?
उत्तर-जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों के नाम दिगंबर एवं श्वेतांबर है।

प्रश्न 66. दिगंबर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-दिगंबर से अभिप्राय है नग्न रहने वाला।

प्रश्न 67. श्वेतांबर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-श्वेतांबर से अभिप्राय है श्वेत वस्त्र धारण करने वाला।

प्रश्न 68. लोंक सा कौन था ?
उत्तर-लोक सा लोंक संप्रदाय का मुखिया था।

प्रश्न 69. स्थानकवासी संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-वीराजी।

प्रश्न 70. तेरा पंथ का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-भीखनजी।

प्रश्न 71. जैन संघ में कितनी तरह के लोग शामिल होते हैं ?
उत्तर-चार तरह के।

प्रश्न 72. जैन संघ में किन्हें सम्मिलित होने की आज्ञा नहीं थी ?
उत्तर- अधर्मी व्यक्तियों को।

प्रश्न 73. जैन धर्म में सम्मिलित होने वाले स्त्री एवं पुरुषों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-

  1. भिक्षुणियाँ
  2. भिक्षु।

प्रश्न 74. जैन धर्म ग्रंथों की भाषा क्या है ?
उत्तर-प्राकृत अथवा अर्ध मगधी।

प्रश्न 75. जैन धर्म में सर्वाधिक पवित्र पुस्तकें कौन-सी हैं ?
उत्तर-12 अंग।

प्रश्न 76. जैन धर्म के किसी एक अंग का नाम बताएँ।
उत्तर-आचारांग सूत्र।

प्रश्न 77. जैन धर्म के किस ग्रंथ में जैन भिक्षुओं से संबंधित नियम दिए गए हैं ?
उत्तर-आचारांग सूत्र में।

प्रश्न 78. जैन धर्म में कितने उपांग हैं ?
उत्तर-12 उपांग।

प्रश्न 79. कल्पसूत्र की रचना किसने की थी ?
उत्तर-भद्रबाहू ने।

प्रश्न 80. कल्पसूत्र का विषय क्या है ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी का जीवन।

प्रश्न 81. जैन धर्म में कितने छेदसूत्र हैं ?
उत्तर-जैन धर्म में 6 छेदसूत्र हैं।

प्रश्न 82. जैन धर्म से संबंधित मूलसूत्र कितने हैं ?
उत्तर-4.

प्रश्न 83. जैन धर्म के दिगंबर से संबंधित कितनी पुस्तकें उपलब्ध हैं ?
उत्तर-4.

प्रश्न 84. दिगंबर संप्रदाय से संबंधित एक पुस्तक का नाम बताएँ।
उत्तर-पर्थमानु योग।

नोट-रिक्त स्थानों की पूर्ति करें—

प्रश्न 1. जैन धर्म को आरंभ में ………….. के नाम से जाना जाता था।
उत्तर-निग्रंथ

प्रश्न 2. जैन धर्म में कुल ………. तीर्थंकर थे।।
उत्तर-24

प्रश्न 3. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम ………… था।
उत्तर-ऋषभनाथ

प्रश्न 4. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर …………… थे।
उत्तर- पार्श्वनाथ

प्रश्न 5. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर …………… थे।
उत्तर-स्वामी महावीर

प्रश्न 6. स्वामी महावीर का जन्म ……….. में हुआ।
उत्तर-599 ई०पू०

प्रश्न 7. स्वामी महावीर की माता जी का नाम ………. था।
उत्तर-त्रिशला

प्रश्न 8. स्वामी महावीर के जन्म से पहले उनकी माता जी को ………… स्वप्न आए थे।
उत्तर-14

प्रश्न 9. स्वामी महावीर जी की पुत्री का नाम ………. था।
उत्तर-प्रियदर्शना

प्रश्न 10. ज्ञान प्राप्ति के समय स्वामी महावीर जी की आयु ………. थी।
उत्तर-42 वर्ष

प्रश्न 11. स्वामी महावीर जी ने ………. में निर्वाण प्राप्त किया।
उत्तर-527 ई० पू०

प्रश्न 12. जैन धर्म ……….. रत्नों में विश्वास रखता है।
उत्तर-तीन

प्रश्न 13. जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का सिद्धांत ………. ने प्रचलित किया।
उत्तर-स्वामी महावीर

प्रश्न 14. जैन धर्म ………… सच्चाइयों में विश्वास रखता है।
उत्तर-नौ

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प्रश्न 15. जैन धर्म के अनुसार ………. वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने आंतरिक कर्मों को संचित करती रहती है।
उत्तर-अशर्व

प्रश्न 16. जैन धर्म ………. प्रकार के कर्मों में विश्वास रखता है।
उत्तर-आठ

प्रश्न 17. अनेकांतवाद को ………… के नाम से भी जाना जाता है।
उत्तर-स्यादवाद

प्रश्न 18. जैन धर्म ………… महाव्रतों में विश्वास रखता है।
उत्तर-पाँच

प्रश्न 19. जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च उद्वेश्य …………. प्राप्त करना है।
उत्तर-निर्वाण

प्रश्न 20. जैन धर्म के अनुसार पुदगल से भाव ……….. है।
उत्तर-परमाणु

प्रश्न 21. अजीविक संप्रदाय का संस्थापक ………… था।
उत्तर-गौशाल

प्रश्न 22. अजीविक संप्रदाय ……….. के सिद्धांत में विश्वास रखता था।
उत्तर-नियति

प्रश्न 23. ………. संप्रदाय वाले श्वेत वस्त्र धारण करते थे।
उत्तर-श्वेतांबर

प्रश्न 24. लोक संप्रदाय का संस्थापक ………. था।
उत्तर-लोक सा

प्रश्न 25. तेरा पंथ संप्रदाय का संस्थापक ……….. था।
उत्तर-भीखनजी

प्रश्न 26. जैन धर्म का संस्थापक ……….. कहलाता था।
उत्तर-आचार्य

प्रश्न 27. जैन धर्म ………… अंगों में विश्वास रखता है।
उत्तर-12

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा ग़लत चुनें—

प्रश्न 1. जैन धर्म कुल 20 तीर्थंकरों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 2. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम विमल था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 3. स्वामी पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 4. स्वामी पार्श्वनाथ को 23 दिनों के कठिन तप के पश्चात् ज्ञान प्राप्त हुआ था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 5. स्वामी पार्श्वनाथ की शिक्षा को चातुरयाम कहते हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 6. स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 7. स्वामी महावीर का जन्म 567 ई०पू० में हुआ था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 8. स्वामी महावीर जी के बचपन का नाम वर्धमान था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 9. स्वामी महावीर जी की माता का नाम महामाया था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 10. ज्ञान प्राप्ति के समय स्वामी महावीर जी की उनकी आयु 42 वर्ष थी।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 11. स्वामी महावीर जी ने पावा में निर्वाण प्राप्त किया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 12. जैन धर्म त्रि-रत्नों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 13. जैन धर्म अहिंसा में विश्वास नहीं रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 14. जैन धर्म के अनुसार तत्व नौ प्रकार के हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 15. जैन धर्म तीन प्रकार के कर्मों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 16. जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में पाँच अनुव्रतों की पालना करनी चाहिए।
उत्तर-ठीक

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प्रश्न 17. जैन धर्म के अनुसार मानवीय जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 18. जैन धर्म के अनुसार सच्चा विश्वास सच्चे ज्ञान की आधारशिला है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 19. जैन धर्म के अनुसार ज्ञान पाँच प्रकार का होता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 20. जैन धर्म के अनुसार हिंसा आठ प्रकार की होती है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 21. जैन धर्म में जीव शब्द का अर्थ है ‘आत्मा’।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 22. जैन धर्म के अनुसार पुण्य प्राप्त करने के 42 साधन हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 23. जैन धर्म के अनुसार कर्म को रोकने की 57 विधियां हैं। .
उत्तर-ठीक

प्रश्न 24. जैन धर्म चार महाव्रतों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 25. अजीविक संप्रदाय किस्मत के सिद्धांत में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 26. तारना संप्रदाय का संस्थापक भीखनजी था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 27. स्थानकवासी संप्रदाय का संस्थापक वीराजी था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 28. जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंगों को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
उत्तर-ठीक

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर चनें—

प्रश्न 1.
जैन धर्म कुल कितने तीर्थंकरों में विश्वास रखता है ?
(i) 20
(ii) 23
(iii) 24
(iv) 25
उत्तर-
(iii) 24

प्रश्न 2.
जैन धर्म का पहला तीर्थंकर कौन था ?
(i) पार्श्वनाथ
(ii) महावीर
(iii) विमल
(iv) ऋषभनाथ।
उत्तर-
(iv) ऋषभनाथ।

प्रश्न 3.
जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर कौन थे ?
(i) विमल
(ii) अनंत
(iii) ऋषभनाथ
(iv) पार्श्वनाथ।
उत्तर-
(iv) पार्श्वनाथ।

प्रश्न 4.
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर कौन थे ?
(i) अभिनंदन
(ii) महावीर
(iii) पुष्पदंत
(iv) अजित।
उत्तर-
(ii) महावीर

प्रश्न 5.
स्वामी महावीर जी का जन्म कब हुआ ?
(i) 566 ई० पू०
(ii) 567 ई० पू०
(iii) 569 ई० पू०
(iv) 599 ई० पू०।
उत्तर-
(iv) 599 ई० पू०।

प्रश्न 6.
स्वामी महावीर जी का जन्म कहाँ हुआ ?
(i) लुंबिनी में
(ii) कुंडग्राम में
(iii) कुशीनगर में
(iv) कपिलवस्तु में।
उत्तर-
(ii) कुंडग्राम में

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 7.
स्वामी महावीर जी के पिता जी का नाम क्या था ?
(i) सिद्धार्थ
(ii) राहुल
(iii) वर्धमान
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i) सिद्धार्थ

प्रश्न 8.
स्वामी महावीर जी की माता जी का नाम क्या था ?
(i) त्रिशला
(ii) यशोधरा
(iii) महामाया
(iv) प्रजापति गौतमी।
उत्तर-
(i) त्रिशला

प्रश्न 9.
स्वामी महावीर जी के जन्म से पूर्व उनकी माता जी को कितने स्वप्न आए थे ?
(i) 8
(ii) 10
(iii) 12
(iv) 14.
उत्तर-
(iv) 14.

प्रश्न 10.
स्वामी महावीर जी के बचपन का नाम क्या था ?
(i) वर्धमान
(ii) सिद्धार्थ
(ii) राहुल
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i) वर्धमान

प्रश्न 11.
स्वामी महावीर जी की ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी आयु कितनी थी ?
(i) 20 वर्ष
(ii) 30 वर्ष
(iii) 35 वर्ष
(iv) 42 वर्ष।
उत्तर-
(iv) 42 वर्ष।

प्रश्न 12.
स्वामी महावीर जी को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुई थी ?
(i) जरिमबिक गाँव
(ii) बौद्ध गया
(ii) वैशाली
(iv) कुंडग्राम।
उत्तर-
(i) जरिमबिक गाँव

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में कौन-सा स्वामी महावीर जी का प्रचार केंद्र नहीं था ?
(i) राजगृह
(ii) वैशाली
(iii) अंग
(iv) पुरुषपुर।
उत्तर-
(iv) पुरुषपुर।

प्रश्न 14.
स्वामी महावीर जी को कहाँ निर्वाण प्राप्त हुआ था ?
(i) विदेह
(ii) अंग
(iii) राजगृह
(iv) पावा।
उत्तर-
(iv) पावा।

प्रश्न 15.
स्वामी महावीर जी की निर्वाण प्राप्ति के समय उनकी आयु कितनी थी ?
(i) 60 वर्ष
(ii) 62 वर्ष
(iii) 72 वर्ष
(iv) 80 वर्ष।
उत्तर-
(iii) 72 वर्ष

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म त्रि-रत्नों में विश्वास रखता था ?
(i) बौद्ध धर्म
(ii) जैन धर्म
(iii) ईसाई धर्म
(iv) पारसी धर्म।
उत्तर-
(ii) जैन धर्म

प्रश्न 17.
जैन धर्म कितनी सच्चाइयों में विश्वास रखता है ?
(i) 3
(i) 5
(iii) 7
(iv) 9.
उत्तर-
(iv) 9.

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 18.
जैन धर्म जीव के बंधन का मुख्य कारण किसे मानते हैं ?
(i) पाप
(ii) पुण्य
(iii) मोक्ष
(iv) अजीव।
उत्तर-
(i) पाप

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से कौन-सी स्वामी महावीर जी की शिक्षा नहीं है ?
(i) वह अहिंसा में विश्वास रखते थे
(ii) वह कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे ।
(iii) वह समानता में विश्वास रखते थे
(iv) वह ईश्वर में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
(iv) वह ईश्वर में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 20.
जैन धर्म कितने अनुव्रतों में विश्वास रखता है ?
(i) 3
(ii) 5
(iii) 7
(iv) 9.
उत्तर-
(ii) 5

प्रश्न 21.
जैन धर्म के अनुसार हिंसा कितने प्रकार की होती है ?
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) 5.
उत्तर-
(i) 2

प्रश्न 22.
कौन-सा तत्व जीव और पुदगल के मध्य गति पैदा करता है ?
(i) पुदगल
(ii) धर्म
(iii) अधर्म
(iv) पाप।
उत्तर-
(ii) धर्म

प्रश्न 23.
अजीविक संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
(i) गोशाल
(ii) स्वामी महावीर
(iii) वीराजी
(iv) भीखनजी।
उत्तर-
(i) गोशाल

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में से कौन जैन धर्म के साथ संबंधित संप्रदाय नहीं हैं ?
(i) दिगंबर
(ii) श्वेतांबर
(iii) लोंक
(iv) महायान।
उत्तर-
(iv) महायान।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 25.
निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म जैन धर्म के साथ संबंधित नहीं है ?
(i) दीपवंश
(ii) कल्पसूत्र
(iii) भगवती सूत्र
(iv) आचारंग सूत्र।
उत्तर-
(i) दीपवंश

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 9 तितली रानी (कविता) (2nd Language)

तितली रानी (कविता) अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਤਿਤਲੀ = तितली
  • ਬਸੰਤ = बसंत
  • ਰੰਗੋਲੀ = रंगोली
  • ਗਿਆਨੀ = सयानी
  • ਨਾਨੀ = नानी
  • ਪਰੀ = परी

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਖੰਭ = पंख
  • ਵਨ-ਸੁਵੰਨੀ = रंग-बिरंगी
  • ਰੁੱਤ = ऋतु
  • ਹੱਥ = हाथ
  • ਸਪਨਾ = स्वप्न
  • ਸੁਨਹਿਰਾ/ਸੋਨਾ = स्वर्ण

पढ़ो, समझो और लिखो

स् + व = स्व, प् + न = प्न = स्वप्न
स् + व + र् + ण = स्व र्ण

कविता की पंक्तियाँ पूरी करो :

(1) रंग-बिरंगी ………………………………..,
पंखों पर ………………………………..।

(2) रुत बसंत में ………………………………..,
गीत खुशी के ………………………………..।
उत्तर :
(1) रंग-बिरंगी जिसकी चोली।
पंखों पर जिसके रंगोली।

(2) रुत बसन्त में आती तितली,
गीत खुशी के गाती तितली।

बताओ

प्रश्न 1.
तितली के पंख कैसे होते हैं?
उत्तर :
तितली के पंख रंग-बिरंगे होते हैं।

प्रश्न 2.
तितली किस ऋतु में दिखाई देती है?
उत्तर :
तितली वसन्त ऋतु में दिखाई देती है।

प्रश्न 3.
नानी किसकी कहानी सुनाया करती थी?
उत्तर :
नानी स्वर्ण परी की कहानी सुनाया करती थी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

तुक मिलाओ

  1. चोली = रंगोली
  2. सजाती = ………………………………..
  3. इठलाती = ………………………………..
  4. आती = ………………………………..

उत्तर :

  1. चोली = रंगोली।
  2. सजाती = शर्माती।
  3. इठलाती = लुभाती।
  4. आती = गाती।

वाक्य बनाओ

  1. रंग-बिरंगी
  2. बसंत
  3. कहानी
  4. सयानी

उत्तर :

  1. रंग-बिरंगी-लाल किला रंगबिरंगी रोशनी से सजा हुआ था।
  2. बसन्त-बसन्त में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं।
  3. कहानी-नानी माँ ने हमें कहानी सुनाई।
  4. सयानी-रानी अब सयानी हो गई है।

रचनात्मक कौशल

तितली को उड़ते हुए देखो। तितली का चित्र बनाओ। उसमें रंग भरो।

अध्यापन निर्देश

1. अध्यापक गीत एवं अभिनय प्रणाली द्वारा कविता का सस्वर गायन करवाए। बच्चों के मन में प्राकृतिक वस्तुओं के प्रति प्रेम जागृत करे।
2. पाठ में ‘ऋतु’ को बोलचाल की भाषा में ‘रुत’ कहा गया है।
3. अध्यापक बच्चों को सभी ऋतुओं का ज्ञान देते हुए विशेष रूप से ऋतुराज बसंत ऋतु’ के बारे में बताये।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

तितली रानी (कविता) बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘उिँउली’ का हिन्दी अर्थ है : चितली/तितली/पुतली/नेतरी
उत्तर :
तितली

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘व’ का हिन्दी अर्थ है : हल्की/हाथी/हाथ/हाथों
उत्तर :
हाथ

प्रश्न 3.
तितली के पंख कैसे होते हैं?
(i) रंग
(ii) बिरंगे
(iii) रंग-बिरंगे
(iv) बेरंग।
उत्तर :
(iii) रंग-बिरंगे

प्रश्न 4.
नानी किसकी कहानी सनाया करती थी?
(i) स्वर्ण की
(ii) परी की
(iii) स्वर्ण – परी की
(iv) राक्षस की।
उत्तर :
(iii) स्वर्ण-परी की

प्रश्न 5.
चोली से तुकबन्दी करते हुए शब्द मिलाएँ।
सही पर गोला लगाओ।
(i) रंगोली
(ii) तुली
(iii) कुली
(iv) टुली।
उत्तर :
(i) रंगोली

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

प्रश्न 6.
‘इठलाती’ से तुकबन्दी करते हुए शब्द मिलाएं।
(i) जीती
(ii) लुभाती
(iii) पत्री
(iv) छत्री।
उत्तर :
(ii) लुभाती।

तितली रानी (कविता) Summary in Hindi

1. तितली रानी, तितली रानी,
अपने घर को बड़ी सयानी।
रंग-बिरंगी जिसकी चोली,
पंखों पर जिसके रंगोली।
फूलों पर उड़ती-इठलाती,
बच्चों को यह बहुत लुभाती॥

शब्दार्थ :

  • सयानी = समझदार।
  • चोली = वस्त्र।।
  • इठलाती = गर्व करती।
  • लुभाती = अच्छी लगती है।

सरलार्थ-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कविता ‘तितली रानी’ से ली गई हैं। उसमें कवि तितली की सुन्दरता का वर्णन करते हुए कहता है कि तितली रानी अपने घर के लिए बहुत समझदार है। उसके रंग-बिरंगे पंख हैं। ऐसा लगता है जैसे उसके पंखों पर किसी ने रंगदार रंगोली सजा दी है। फूलों पर यह इठलाती हुई उड़ती जाती है। बच्चों को भी यह बहुत अच्छी लगती है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता) 1

2. आँखों में यह स्वप्न सजाती,
हाथ लगाने से शर्माती।
रुत बसन्त में आती तितली,
गीत खुशी के गाती तितली।
कभी कहा करती थी नानी,
स्वर्ण परी की एक कहानी।
तितली रानी, तितली रानी,
अपने घर को बड़ी सयानी॥

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

शब्दार्थ :

  • स्वप्न = सपने।
  • शर्माती = लज्जाती।
  • रुत = ऋतु, मौसम।
  • खुशी = प्रसन्नता।
  • स्वर्ण-परी = सुनहरी परी।
  • सयानी = समझदार।

सरलार्थ-
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि तितली की सुन्दरता की प्रशंसा करते हुए कहता है कि यह सुन्दरतितली अपनी आँखों में सुन्दर सपने सजाती है। हाथलगाने से वह शरमा जाती है। जब बसन्त ऋतु आतीहै तब यह तितली प्रसन्नता से भर कर खुशी के गीत गाती है। कवि कहता है कि कभी हमें नानी सुनहरीपरी की एक कहानी सुनाती थी। तितली को देखकरहमें लगता है कि यही वह सुनहरी परी है। तितलीरानी, अपने घर के लिए बड़ी समझदार है।

तितली रानी (कविता) शब्दार्थ Meanings

  • रंगोली = अलग-अलग रंगों का मेल, त्योहार आदि पर रंगीन बुरादे से फर्श पर की जाने वाली चित्रकारी
  • स्वप्न = सपना
  • रुत = ऋतु
  • लुभाना = मोहित करना
  • स्वर्ण = सोना

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 8 मेहनत Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 8 मेहनत (2nd Language)

मेहनत अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਮਿੱਟੀ = मिट्टी
  • ਚੌਥਾ = चौथा
  • ਪ੍ਰਤੀਯੋਗਿਤਾ = प्रतियोगिता
  • ਪਹਿਲਾ = पहला
  • ਕਣੁ = कण
  • ਰੋਟੀ = रोटी

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिन्दी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिन्दी शब्दों को लिखो :

  • ਸਕੂਲ = पाठशाला
  • ਵਿਹੜਾ = आँगन
  • ਕੀੜੀਆਂ = चींटियाँ
  • ਲਾਈਨ = कतार

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) ध् + य = ध्य = ध्यान
स् + थ = स्थ = स्थान
म् + ब = म्ब = लम्बी
च् + छ =च्छ = अच्छा

(ख) ट् + ट = ट्ट, ट्ट = मिट्टी
ट् + ठ = ट्ठ, ट्ट = इकट्ठा

(ग) न् + न = न्न = प्रसन्न

(घ) त् + र = त्र = छात्रा
र + स = र्स = रिहर्सल

बताओ

प्रश्न 1.
रानी उदास क्यों हो गई?
उत्तर :
रानी खेल प्रतियोगिता के फाइनल रिहर्सल में चौथे स्थान पर आई थी। इसी कारण वह उदास हो गई।

प्रश्न 2.
दादी माँ ने उसे आँगन में क्या दिखाया?
उत्तर :
दादी माँ ने उसे आँगन में चींटियों की लम्बी कतार दिखाई जो अपने बिल में से निकल कर रोटी के टुकड़े के छोटे-छोटे कणों को खींचकर अपने बिल की ओर ले जा रही थीं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत

प्रश्न 3.
दादी माँ ने बिल को कैसे बंद किया?
उत्तर :
दादी माँ ने बिल को गीली मिट्टी से बन्द कर दिया।

प्रश्न 4.
चींटियाँ किस प्रकार चल रहीं थी?
उत्तर :
चींटियाँ कतार में चल रही थीं।

प्रश्न 5.
रानी ने चींटियों से क्या प्रेरणा ली?
उत्तर :
रानी ने चींटियों से प्रेरणा ली कि यदि हिम्मत न हारे, निरन्तर मेहनत करें तो व्यक्ति सफलता अवश्य पाता है।

पढ़ो और समझो

(क) उदास = खुश
अन्दर = बाहर
गीली = सूखी
आगे = पीछे
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द उनके सामने लिखे गए हैं। विद्यार्थी इन्हें कण्ठस्थ कर लें।

(ख) चींटी = चींटियाँ
रानी = रानियाँ
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के बहुवचन रूप सामने दर्शाए गए हैं।

(ग) छात्रा = छात्र
रानी = राजा
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के पुँल्लिंग रूप दर्शाए गए हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत

अन्तर समझो

(क) रानी आज उदास है।
चींटियाँ मेहनत करती हैं।

(ख) चींटियाँ रोटी के कणों को बिल की ओर ला रहीं थीं।
रानी और दादी माँ आँगन में गईं।
उत्तर :
उपरोक्त वाक्यों में (क) भाग में (है) और ( हैं) तथा (ख) भाग में ( ओर) और (और) शब्द युग्म शब्द हैं।

अध्यापन निर्देश :

इस पाठ का उद्देश्य बच्चों में परिश्रम का गुण विकसित करना है। चींटियों से प्रेरणा लेकर मेहनत के बल पर निरन्तर आगे बढ़ सकते हैं। यह भावना बच्चों के मन में जाग्रत करें। ‘पढ़ो, समझो और लिखो’ शीर्षक के अन्तर्गत दो तरह के संयुक्ताक्षर सिखाये गये हैं। अध्यापक बच्चों को बताये कि (क) में दिये गये व्यंजनों को खड़ी पाई (लकीर) हटाकर संयुक्त किया गया है। जबकि (ख) के व्यंजनों के नीचे हलन्त लगाकर संयुक्त किया गया है। अध्यापक इनके दोनों रूपों से बच्चों को अवगत करवाये। (ग) में एक ही व्यंजन के दो रूपों (एक आधा और एक पूरा) का ज्ञान दिया गया है। (घ) में ‘र’ व्यंजन के संयुक्त रूप दिये गये हैं।

रचनात्मक अभिव्यक्ति

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत 1
चित्र को देखकर दिए गए शब्दों की सहायता से वाक्य पूरे करो :

  • मेहनत
  • रस
  • मधुमक्खियाँ
  • शहद
  • छत्ता
  • फूलों

पेड़ पर मधुमक्खियों का ……………………………… लगा हुआ है। पेड़ के आस-पास ……………………………… के कुछ पौधे लगे हुए हैं। फूलों पर ……………………………… मँडरा रही हैं। वे फूलों से ……………………………… चूस रही हैं। इसी रस से वे ……………………………… बनाती हैं। शहद को बनाने में उन्हें बहुत ……………………………… करनी पड़ती है।
उत्तर :
पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा हुआ है। पेड़ के आस-पास फूलों के कुछ पौधे लगे हुए हैं। फूलों पर मधुमक्खियाँ मंडरा रही हैं। वे फूलों से रस चूस रही हैं। इसी रस से वे शहद बनाती हैं। शहद को बनाने में उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत

मेहनत बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘भिटी’ का हिन्दी अर्थ है : माटा/मिट्टी/मीठी/मोटा
उत्तर :
मिट्टी

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘टी’ का हिन्दी अर्थ है : मोटी/खोटी/रोटी/छोटी।
उत्तर :
रोटी

प्रश्न 3.
चींटी-चींटिया है तो ‘रानी’ …………………………………….. है।
(i) रानियाँ
(ii) राने
(iii) राणे
(iv) राणी।
उत्तर :
(ii) रानियां

प्रश्न 4.
अगर ‘राजा’ का रानी है तो लड़का’ का है-
(i) लड़की
(ii) लडकी
(iii) लड़ाके
(iv) लढकी।
उत्तर :
(i) लड़की।

मेहनत Summary in Hindi

रानी आज बहुत उदास थी। कल उसकी पाठशाला में खेल-प्रतियोगिता होने जा रही थी, वह कितने ही दिनों से इसकी तैयारी कर रही थी परन्तु जब इसकी फाइनल रिहर्सल हुई तो वह उसमें चौथा स्थान ही प्राप्त कर सकी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत 2

उसे उदास देखकर उसकी दादी माँ ने उदासी का कारण पूछा तो रानी ने उन्हें सब कुछ बता दिया। दादी माँ ने उसकी बात ध्यान से सुनी और फिर उसे अपने साथ आँगन में ले गई। वहाँ उन्होंने रानी को चींटियों की एक लम्बी कतार दिखाई जो रोटी के टुकड़े को खींचकर अपने बिल की ओर ले जा रही थी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत 3

दादी माँ ने कहा, “देखो ये चींटियाँ कितनी मेहनत से यह टुकडा लेकर अपने बिल में ले जा रही हैं।

अब देखो क्या होता है ?” इतना कहकर उन्होंने उनके बिल को गीली मिट्टी से बन्द कर दिया।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत 4

रानी ने देखा कि चींटियों ने उस गीली मिट्टी से भी अपने लिए रास्ता बना लिया था और अपने कार्य में जुट गईं थीं। रानी समझ गई कि हिम्मत न हारने और लगातार मेहनत करने से ही सफलता मिलती है। वह उठी और बाहर पार्क में जाकर प्रतियोगिता की तैयारी में जी-जान से जुट गई और अगले दिन की प्रतियोगिता में उसने पहला स्थान पाया।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 8 मेहनत

मेहनत शब्दार्थ Meanings

  • प्रतियोगिता = होड़
  • नन्ही = छोटी
  • रिहर्सल = ठीक ढंग और समय से पहले काम का अभ्यास
  • कण = छोटा टुकड़ा
  • आँगन = घर की सीमा में आने वाला व खुला स्थान जिसे घर के कामें के लिए उपयोग में लाया  जाता है।
  • कतार = पंक्ति , लाइन
  • बिल = ज़मीन में बनाया हुआ छेद

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति तथा जंगली जीवन

Punjab State Board PSEB 9th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 1a भारत : आकार व स्थिति Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 1a भारत : आकार व स्थिति

SST Guide for Class 9 PSEB भारत : आकार व स्थिति Textbook Questions and Answers

(क) नक्शा कार्य (Map Work) :

प्रश्न 1.
भारत के रेखाचित्र में भरें(i) कुदरती वनस्पति के कोई 3 किस्म के क्षेत्र। (ii) किसी पांच राज्यों में राष्ट्रीय पार्क। (iii) पंजाब की सुरक्षित जलगाहें (पंजाब के रेखाचित्र में)।
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी MBD Map Master की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 2.
निम्न दी गई तस्वीरों में वृक्ष पहचान कर वनस्पति की प्रकार बताएं।
PSEB 9th Class Social Science Guide भारत आकार व स्थिति Important Questions and Answers (1)
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 3.
अपने क्षेत्र के 10 वृक्षों, 5 जानवरों तथा 5 पक्षियों की तस्वीरें चार्ट पर लगाकर नाम लिखें।
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी स्वयं करें।

(ख) निम्न के उत्तर एक शब्द से एक वाक्य में दें:

  1. पौधे ………. की ……….. से ………… विधि द्वारा अपना भोजन तैयार करते हैं।
  2. पंजाब का ………… फीसदी क्षेत्र वनों के अधीन है जो कि ……….. वर्ग किलोमीटर है।
  3.  …………. मंडल में वनस्पति उगती है और ……… की प्रकार ……… पर असर डालती है।

उत्तर-

  1. सूर्य, किरणें, फोटोसिंथेसिस
  2. 6.07%, 3058.
  3. जीव, मिट्टी, वनस्पति।

प्रश्न 4.
पृथ्वी का वो कौन-सा मंडल है जिसमें जीवन है :
(i) वायु मंडल
(ii) थल मंडल
(iii) जल मंडल
(iv) जीव मंडल।
उत्तर-
(iv) जीव मंडल में।

प्रश्न 5.
इनमें से कौन-से जिले में सबसे अधिक वन मिलते हैं ?
(i) मानसा
(ii) रूपनगर
(iii) अमृतसर
(iv) बठिंडा।
उत्तर-
(ii) रूपनगर में।

प्रश्न 6.
चिंकारा कौन-से जानवर की प्रकार है ?
उत्तर-
चिंकारा एक छल्लेदार सींगों वाला हिरन है।

प्रश्न 7.
बीड़ क्या होती है ?
उत्तर-
कुछ क्षेत्रों में घनी वनस्पति होती थी तथा इसके छोटे बड़े टुकड़ों को बीड़ कहते हैं।

प्रश्न 8.
उप उष्ण झाड़ीदार वनस्पति में मिलती घास का नाम लिखें।
उत्तर-
यहां लंबी प्रकार का घास-सरकंडा मिलता है।

प्रश्न 9.
पंजाब के कुल क्षेत्रफल का कितने फीसदी क्षेत्र वनों के अधीन है ?
उत्तर-
6.07%.

प्रश्न 10.
झाड़ियां व कांटेदार वनस्पति वाले क्षेत्रों में कौन-से जानवर मिलते हैं ?
उत्तर-
यहां ऊंट, शेर, बब्बर शेर, खरगोश, चूहे इत्यादि मिलते हैं।

(ग) इन प्रश्नों के संक्षेप उत्तर दें :

प्रश्न 1.
फलोरा व फौना क्या है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
किसी विशेष क्षेत्र में मिलने वाले पौधों के लिए फलोरा शब्द प्रयोग किया जाता है। उस क्षेत्र के पौधे उस क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, वर्षा इत्यादि पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार किसी क्षेत्र में मिलने वाले जानवरों की प्रजातियों को फौना कहा जाता है। प्रत्येक क्षेत्र में मिलने वाले जानवरों की प्रजातियां भी अलग-अलग होती हैं।

प्रश्न 2.
वनों की रक्षा क्यों आवश्यक है, लिखें।
उत्तर-

  1. वन जलवायु पर नियंत्रण रखते हैं। सघन वन गर्मियों में तापमान को बढ़ने से रोकते हैं तथा सर्दियों में तापमान को बढ़ा देते हैं।
  2. सघन वनस्पति की जड़ें बहते हुए पानी की गति को कम करने में सहायता करती हैं। इससे बाढ़ का प्रकोप कम हो जाता है। दूसरे जड़ों द्वारा रोका गया पानी भूमि के अंदर समा लिए जाने से भूमिगत जल-स्तर (Water-table) ऊंचा उठ जाता है। वहीं दूसरी ओर धरातल पर पानी की मात्रा कम हो जाने से पानी नदियों में आसानी से बहता रहता है।
  3. वृक्षों की जड़ें मिट्टी की जकड़न को मज़बूत किए रहती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं।
  4. वनस्पति के सूखकर गिरने से जीवांश के रूप में मिट्टी को हरी खाद मिलती है।
  5. हरी-भरी वनस्पति बहुत ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। इससे आकर्षित होकर लोग सघन वन क्षेत्रों में यात्रा, शिकार तथा मानसिक शांति के लिए जाते हैं। कई विदेशी पर्यटक भी वन-क्षेत्रों में बने पर्यटन केंद्रों पर आते हैं। इससे सरकार को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  6. सघन वन अनेक उद्योगों के आधार है। इनमें से कागज़, लाख, दियासिलाई, रेशम, खेलों का सामान, प्लाईवुड, गोंद, बिरोजा आदि उद्योग प्रमुख हैं।

प्रश्न 3.
सदाबहार वनों की विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. सदाबहार वनों के सभी पत्ते एक साथ नहीं झड़ते तथा हमेशा हरे रहते हैं।
  2. यह वन गर्म तथा नमी वाले क्षेत्रों में मिलते हैं जहां पर 200 सैंटीमीटर से अधिक वर्षा होती है।
  3. सदाबहार वनों के पेड़ 60 मीटर या उससे ऊंचे भी जा सकते हैं।
  4. यह वन घने होने के कारण एक छतरी (Canopy) बना लेते हैं। जहां से कई बार तो सूर्य की किरणें धरातल तक नहीं पहुंच पातीं।
  5. पेड़ों के नीचे बहुत-से छोटे-छोटे पौधे उग जाते हैं तथा आपस में उलझ जाते हैं जिस कारण इनमें निकलना मुश्किल होता है।

प्रश्न 4.
पंजाब की प्राकृतिक वनस्पति से जान-पहचान करवाएं।
उत्तर-
इस समय पंजाब के कुल क्षेत्रफल का केवल 6.07% हिस्सा ही वनों के अंतर्गत आता है। इसका काफी बड़ा भाग मनुष्यों द्वारा उगाया जा रहा है। पंजाब की प्राकृतिक वनस्पति को कई भागों में बांटा जा सकता है

  1. हिमालय प्रकार की सीधी शीत उष्ण वनस्पति
  2. उपउष्ण झाड़ीदार पर्वतीय वनस्पति
  3. उपउष्ण झाड़ीदार वनस्पति वनस्पति
  4. उष्ण शुष्क पतझड़ी वनस्पति
  5. उष्ण कांटेदार वनस्पति।

प्रश्न 5.
आंवला, तुलसी तथा सिनकोना के क्या लाभ हो सकते हैं, लिखें।
उत्तर-

  1. आंवला-आंवला विटामिन सी से भरा होता है तथा यह व्यक्ति की पाचन शक्ति को ठीक करने में सहायता करता है। आंवला कब्ज, शूगर तथा खांसी को दूर करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
  2. तुलसी-अगर किसी को बुखार, खांसी या जुकाम हो जाए तो तुलसी काफी लाभदायक होती है।
  3. सिनकोना-सिनकोना के पौधे की छाल को कुनीन बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है जिसे मलेरिया ठीक करने के लिए दिया जाता है।

(घ) निम्नलिखित प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दें:

प्रश्न 1.
प्राकृतिक वनस्पति मानव समाज के फेफड़े होते हैं, कैसे ?
उत्तर-
इसमें कोई शंका नहीं है कि प्राकृतिक वनस्पति मानवीय समाज के फेफड़े होते हैं। अग्रलिखित बिंदुओं से यह स्पष्ट हो जाएगा

  1. जंगल बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ते हैं तथा कार्बन-डाइऑक्साइड का प्रयोग करते हैं। यह ऑक्सीजन जानवरों तथा मनुष्यों को जीवन देती है।
  2. जंगल पृथ्वी में मौजूद पानी के स्तर को ऊंचा करने में काफी सहायता करते हैं।
  3. जंगल के पेड़ों में मौजूद पानी सूर्य की गर्मी के कारण वाष्प बनकर उड़ता रहता है जो वायु के तापमान को कम करने में सहायता करता है।
  4. जंगलों में बहुत-से जीव रहते हैं तथा उन्हें भोजन तथा रहने का स्थान जंगल में ही मिलता है।
  5. हमारे वातावरण को सुंदर तथा स्वस्थ बनाने में भी जंगल काफी सहायक होते हैं।
  6. पवन की गति को कम करने, ध्वनि प्रदूषण को कम करने तथा सूर्य में चमक को कम करने में जंगल काफी सहायता करते हैं।
  7. वृक्ष की जड़ें मिट्टी के कणों को पकड़ कर रखती हैं जिस कारण जंगलों से भूमि क्षरण नहीं होती।
  8. वर्षा करवाने में भी जंगल काफी सहायक होते हैं।
  9. जंगलों से हम कई प्रकार की लकड़ी प्राप्त करते हैं।
  10. जंगलों के कारण ही कई प्रकार के उद्योगों का विकास हो पाया है।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक वनस्पति को कौन-से भौगोलिक तत्त्व प्रभावित करते हैं ?
उत्तर-
अलग-अलग क्षेत्रों में बहुत-सी भौगोलिक विभिन्नताएं होती हैं जिस कारण वहां की प्राकृतिक वनस्पति भी अलग-अलग होती है। इस कारण प्राकृतिक वनस्पति को कई तत्त्व प्रभावित करते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है

  1. भूमि अथवा धरातल (Land on Relief)-किसी भी क्षेत्र की भूमि का वनस्पति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। मैदानों, पर्वतों, डैल्टा इत्यादि की वनस्पति एक समान नहीं हो सकती। भूमि के स्वभाव का वनस्पति पर प्रभाव पड़ता है। ऊंचे पर्वतों पर लंबे वृक्ष मिलते हैं परंतु मैदानों पर पर्णपाती (Deciduous) वृक्ष मिलते हैं।
  2. मृदा (Soil)-मृदा पर ही वनस्पति पैदा होती है। अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग प्रकार की मिट्टी मिलती है, जो अलग-अलग प्रकार की वनस्पति का आधार है। जैसे कि मरुस्थल में रेतली मिट्टी मिलती है जिस कारण वहां पर कांटेदार झाड़ियां मिलती हैं। नदियों के डैल्टे पर बढ़िया प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। पर्वतों की ढलानों पर मिट्टी की परत गहरी होती है जिस कारण वहां पर लंबे पेड़ मिलते हैं।
  3. तापमान (Temperature) वनस्पति की विविधता तथा विशेषता तापमान तथा वायु की नमी पर निर्भर करती है। हिमालय पर्वत की ढलानों तथी दक्षिणी पठार के पर्वतों पर 915 मीटर की ऊंचाई से ऊपर तापमान में नयी वनस्पति के उगने तथा बढ़ने को प्रभावित करती है। इस कारण वहां की वनस्पति मैदानी क्षेत्रों से अलग होती है।
  4. सूर्य की रोशनी (Sunlight) किसी भी क्षेत्र में कितनी सूर्य की रोशनी आती है, इस पर भी वनस्पति निर्भर करती है। किसी भी स्थान पर कितनी सूर्य की रोशनी आएगी यह वहां की अक्षांश रेखाओं (Parallels of Latitudes) तथा भूमध्य रेखा से दूरी, समुद्र तल से ऊंचाई तथा ऋतु पर निर्भर करता है। गर्मियों में अधिक रोशनी मिलने के कारण वृक्ष तेजी से बढ़ते हैं।
  5. वर्षा (Rainfall)-जिन क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है वहां पर सदाबहार वन मिलते हैं। वह घने भी होते हैं। परंतु वहां कम वर्षा होती है जहां पर पर्णपाती वन (Deciduous Forests) मिलते हैं। जहां पर बहुत ही कम वर्षा होती है, जैसे कि मरुस्थल, वहां पर जंगल भी काफी कम या न के समान होते हैं। इस प्रकार वर्षा की मात्रा पर भी वनस्पति का प्रकार निर्भर करता है।

प्रश्न 3.
भारतीय जंगलों को जलवायु के आधार पर बांटें व वृक्षों के नाम भी लिखें।
उत्तर-
भारतीय जंगलों को जलवायु के आधार पर कई भागों में विभाजित किया जा सकता है जिसका वर्णन इस प्रकार है

  1. उष्ण सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)-इस प्रकार के वन मुख्य रूप से अधिक वर्षा (200 सें०मी० से अधिक) वाले भागों में मिलते हैं। इसलिए इन्हें बरसाती वन भी कहते हैं। ये वन अधिकतर पूर्वी हिमालय के तराई प्रदेश पश्चिमी घाट, पश्चिमी अंडमान, असम, बंगाल तथा ओडिशा के कुछ भागों में पाए जाते हैं। इन वनों में पाए जाने वाले मुख्य वृक्ष महोगनी, ताड़, बांस, रबड़, चपलांस, मैचोलश तथा कदंब हैं।
  2. पतझड़ी अथवा मानसूनी वन (Tropical Deciduous or Monsoon Forests)-पतझड़ी या मानसूनी वन भारत के उन प्रदेशों में मिलते हैं जहां 100 से 200 सें.मी. तक वार्षिक वर्षा होती है। भारत में ये मुख्य रूप से हिमालय के निचले भाग, छोटा नागपुर, गंगा की घाटी, पश्चिमी घाट की पूर्वी ढलानों तथा तमिलनाडु क्षेत्र में पाए जाते हैं। इन वनों में पाए जाने वाले मुख्य वृक्ष सागवान, साल, शीशम, आम, चंदन, महुआ, ऐबोनी, शहतूत तथा सेमल हैं। गर्मियों में ये वृक्ष अपनी पत्तियां गिरा देते हैं, इसलिए इन्हें पतझड़ी वन भी कहते हैं।
  3. झाड़ियां या कांटेदार जंगल (The Scrubs and Thorny Forest)-इस प्रकार के वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वार्षिक वर्षा का मध्यमान 20 से 60 सें० मी० तक होता है। भारत में ये वन राजस्थान, पश्चिमी हरियाणा, दक्षिणपश्चिमी पंजाब और गुजरात में पाए जाते हैं। इन वनों में रामबांस, खैर, पीपल, बबूल, थोअर और खजूर के वृक्ष प्रमुख हैं।
  4. ज्वारीय वन (Tidal Forests)-ज्वारीय वन नदियों के डेल्टाओं में पाए जाते हैं। यहां की मिट्टी भी उपजाऊ होती है और पानी भी अधिक मात्रा में मिल जाता है। भारत में इस प्रकार के वन महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि के डेल्टाई प्रदेशों में मिलते हैं। यहां की वनस्पति को मैंग्रोव अथवा सुंदर वन भी कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में ताड़, कैंस, नारियल इत्यादि के वृक्ष भी मिलते हैं।
  5. पर्वतीय वन (Mountains Forests) – इस प्रकार को वनस्पति हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों तथा दक्षिण में नीलगीर की पहाड़ियों पर पायी जाती हैं। इस वनस्पति में वर्षा की मात्रा तथा ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ अंतर आता है। कम ऊंचाई पर सदाबहार वन पाये जाते हैं, तो अधिक ऊंचाई पर केवल घास तथा कुछ फूलदार पौधे ही मिलते हैं।

PSEB 9th Class Social Science Guide भारत आकार व स्थिति Important Questions and Answers (2)

प्रश्न 4. पंजाब की प्राकृतिक वनस्पति के वर्गीकरण पर प्रकाश डालें।
उत्तर-पंजाब के अलग-अलग भागों में धरातल, जलवायु तथा मिट्टी की प्रकार अलग-अलग होने के कारण यहां अलग-अलग प्रकार की वनस्पति मिलती है तथा इनका वर्णन इस प्रकार है

1. हिमालय प्रकार की आर्द्र शीत-उष्ण वनस्पति (Himalayan Type Moist Temperate Vegetation)पंजाब के पठानकोट की धार कलां तहसील में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। पंजाब के इस हिस्से में वर्षा भी अधिक होती है तथा यह पंजाब के अन्य भागों से ऊंचाई पर भी स्थित है। यहां कई प्रकार के वृक्ष मिल जाते हैं जैसे कि कम ऊंचाई वाले चील के वृक्ष, शीशम, शहतूत, पहाड़ी बबूल, आम इत्यादि।

2. उप उष्ण चील वनस्पति (Sub Tropical Pine Vegetation)—पंजाब के कई जिलों की कई तहसीलों में इस प्रकार की वनस्पति मिलती है जैसे कि पठानकोट जिले की पठानकोट तहसील तथा होशियारपुर जिले की मुकेरियां, दसूहा तथा होशियारपुर तहसीलें। यहां चील के वृक्ष काफी कम मिलते हैं तथा उनकी प्रकार भी बढ़िया नहीं होती। यहां शीशम, खैर, शहतूत तथा अन्य कई प्रकार के वृक्ष पाए जाते हैं।

3. उप उष्ण झाड़ीदार पर्वतीय वनस्पति (Sub Tropical Scrub Hill Vegetation)-होशियारपुर तथा रूपनगर ज़िलों के पूर्वी भागों तथा पठानकोट जिले के बाकी बचे भागों में इस प्रकार की वनस्पति मिलती है। इस क्षेत्र में आज से चार-पांच सदियों पहले तक काफी घने जंगल मिलते हैं परंतु काफी अधिक वृक्षों की कटाई, जानवरों के चरने, जंगलों की आग तथा भूमि-क्षरण के कारण यहां की वनस्पति झाड़ीदार हो गई है। यहां कई प्रकार के वृक्ष मिलते हैं जैसे कि शीशम, खैर, बबूल, शहतूत, बकायन, नीम, सिंबल, बांस, अमलतास इत्यादि। यहां लंबी घास भी उगती है जिसे सरकंडा कहते हैं जिसे रस्सियों तथा कागज़ बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

4. उष्ण-शुष्क पतझड़ी वनस्पति (Tropical Dry Deciduous Vegetation)-पंजाब के शुष्क तथा गर्म क्षेत्रों में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। कंडी क्षेत्र के मैदान, पंजाब के लहरदार तथा ऊंचे नीचे मैदान तथा मध्यवर्तीय मैदानों में इस प्रकार की वनस्पति मिलती है। किसी समय यहां पर घनी वनस्पति हुआ करती थी। आज भी घनी वनस्पति के कुछ छोटे बड़े टुकड़े मिल जाते हैं जिन्हें बीड़, झंगीया झिड़ी के नाम से पुकारा जाता है। एस०ए०एस० नगर तथा पटियाला के क्षेत्रों में भी घने वृक्षों वाले क्षेत्र मिलते हैं जिन्हें बीड़ कहा जाता है। बीड़ भादसों, छत्तबीड़, बीड़ भुन्नरहेड़ी, बीड़ मोती बाग इत्यादि इनमें प्रमुख हैं। यहां नीम, टाहली, बरगद, पीपल, आम, बबूल, निम्ब इत्यादि के वृक्ष मिलते हैं। यहां सफैदा तथा पापुलर के पेड़ भी लगाए जाते हैं।

5. उष्ण कांटेदार वनस्पति (Tropical Thorny Vegetation)—पंजाब के कई क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां कम वर्षा होती है तथा वहां इस प्रकार की वनस्पति मिलती है। बठिंडा, मानसा, फाजिलका के कई भागों, फिरोजपुर तथा फरीदकोट के मध्य दक्षिण भागों में कांटेदार वनस्पति मिलती है। यहां के कई क्षेत्रों में तो वनस्पति है ही नहीं। कांटेदार झाड़ियां, थोहर (Cactus), शीशम, जण्ड, बबूल इत्यादि वृक्ष यहां पर मिलते हैं।

प्रश्न 5.
जंगली जीवन व उसकी सुरक्षा विधियों पर विस्तार से लिखें।
उत्तर-
वनस्पति की तरह ही हमारे देश में जीव-जंतुओं की काफी विभिन्नता है। भारत में इनकी 89000 प्रजातियां मिलती हैं। देश के ताज़ा तथा खारे पानी में 2500 से अधिक प्रकार की मछलियां मिलती हैं। इस प्रकार पक्षियों की भी 2000 से ऊपर प्रजातियां पाई जाती हैं। हमारे वनों में काफी महत्त्वपूर्ण पशु-पक्षी मिलते हैं। परंतु अफसोस की बात है कि पक्षियों तथा जानवरों की अनेक प्रजातियां देश में से लुप्त हो चुकी हैं। इस कारण जंगली जीवों की रक्षा करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक है। मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए वनों को काट कर तथा जानवरों का शिकार करके एक दुखद स्थिति उत्पन्न कर दी है। आज गैंडा, चीता, बंदर, शेर इत्यादि काफी कम संख्या में मिलते हैं।

इस कारण प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह जंगली जीवों की रक्षा करे।
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जंगली जीवों की सुरक्षा विधियां-

  1. वैसे तो सरकार ने कई राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभ्यारण्य बनाए हैं परंतु और राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभ्यारण्य बनाए जाने की आवश्यकता है।
  2. वन्य जीवों के शिकार पर कठोर पाबंदी लगाई जानी चाहिए तथा इस पाबंदी को कठोरता से लागू किया जाना चाहिए।
  3. राष्ट्रीय उद्यानों तथा वन्य जीव अभ्यारण्यों में जीवों के खाने का उचित प्रबंध होना चाहिए।
  4. जो प्रजातियां खत्म होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं उन्हें संभालने तथा बचाने की तरफ विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
  5. जंगलों तथा राष्ट्रीय उद्यानों में शिकारियों तथा चरवाहों को दाखिल होने की आज्ञा नहीं दी जानी चाहिए।
  6. अभ्यारण्यों तथा राष्ट्रीय उद्यानों में जीवों के लिए मैडिकल सुविधाएं भी होनी चाहिए ताकि किसी बिमारी होने की स्थिति में उन्हें बचाया जा सके।
  7. बड़े स्तर पर प्रशासकीय निर्णय लिए जाने चाहिए ताकि इन्हें बचाने के निर्णय जल्दी लिए जा सकें। 8. आम जनता में जंगली जीवों को संभालने के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए सैमीनार करवाए जाने चाहिए।

PSEB 9th Class Social Science Guide भारत : आकार व स्थिति Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
किसी क्षेत्र में मौजूद सभी प्राणियों को ……… कहा जाता है।
(क) फौना
(ख) फलौरा
(ग) वायुमंडल
(घ) जलमंडल।
उत्तर-
(क) फौना

प्रश्न 2.
भारतीय जंगल सर्वेक्षण विभाग का हैडक्वाटर कहां पर है ?
(क) मंसूरी
(ख) देहरादून
(ग) दिल्ली
(घ) नागपुर।
उत्तर-
(ख) देहरादून

प्रश्न 3.
इनमें से कौन-सा तत्त्व प्राकृतिक वनस्पति की भिन्नता के लिए उत्तरदायी है ?
(क) भूमि
(ख) मिट्टी
(ग) तापमान
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
उष्ण सदाबहार वन के पत्ते हमेशा ………….. रहते हैं।
(क) हरे
(ख) पीले
(ग) झड़ते
(घ) लाल।
उत्तर-
(क) हरे

प्रश्न 5.
कौन-से जंगलों के वृक्ष 60 मीटर या उससे ऊपर जा सकते हैं ?
(क) उष्ण पतझड़ी जंगल
(ख) उष्ण सदाबहार जंगल
(ग) ज्वारीय जंगल
(घ) कांटेदार जंगल।
उत्तर-
(ख) उष्ण सदाबहार जंगल

प्रश्न 6.
इनमें से कौन-सा वृक्ष हमें कोणधारी जंगलों में मिलता है ?
(क) स्परूस
(ख) चील
(ग) फर
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 7.
घनी वनस्पति के छोटे-बड़े टुकड़ों को पंजाब में क्या कहते हैं ?
(क) झांगी
(ख) झिड़ी
(ग) बीड़
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 8.
पंजाब का कितना क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति के अंतर्गत आता है ?
(क) 5.65%
(ख) 3.65%
(ग) 4.65%
(घ) 6.65%.
उत्तर-
(ख) 3.65%

प्रश्न 9.
पंजाब के किस जिले में सबसे अधिक प्राकृतिक वनस्पति है ?
(क) बठिंडा
(ख) पटियाला
(ग) रूपनगर
(घ) फरीदकोट।
उत्तर-
(ग) रूपनगर

प्रश्न 10.
पंजाब के जंगलात विभाग में लगभग …… लोग कार्य कर रहे हैं।
(क) 5500
(ख) 6500
(ग) 7500
(घ) 8500.
उत्तर-
(ख) 6500

प्रश्न 11.
भारत में सबसे बड़ा स्तनधारी प्राणी कौन-सा है ?
(क) हाथी
(ख) गैंडा
(ग) हिप्पो
(घ) जिराफ।
उत्तर-
(क) हाथी

प्रश्न 12.
……….. भारत का राष्ट्रीय पक्षी है।
(क) कबूतर
(ख) मोर
(ग) कोयल
(घ) फलैमिंगो।
उत्तर-
(ख) मोर

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

  1. भारत में ………. राष्ट्रीय उद्यान तथा ……… वन्यजीव अभ्यारण्य बनाए गए हैं।
  2.  ………. विटामिन सी से भरपूर होता है।
  3. ……… की गुठलियां शूगर कंट्रोल करने के लिए प्रयोग की जाती हैं।
  4. नीम को संस्कृत में ……… कहा जाता है।
  5. पृथ्वी पर जीवन के चार मंडल-जीव मंडल, …………. , ………….. तथा वायु मंडल के कारण ही संभव है।
  6. मनुष्य के चारों मंडलों का एक-दूसरे पर निर्भर होना ही ……………… कहलाता है।

उत्तर-

  1. 103, 544
  2. आंवला
  3. जामुन
  4. सर्व रोग निवारक
  5. थलमंडल, जलमंडल
  6. ईको सिस्टम।

सही/ग़लत:

  1. जंगली जीव सुरक्षा कानून 1972 में बना था।
  2. किसी क्षेत्र की संपूर्ण वनस्पति को फलौरा कहते हैं।
  3. भारत की प्राकृतिक वनस्पति को आठ श्रेणियों में बांटा गया है।
  4. ऊष्ण पतझड़ी वनस्पति में वृक्ष सारा साल हरे-भरे रहते हैं।
  5. भारत का 21.53% हिस्सा ही जंगलों के अंतर्गत आता है।
  6. ज्वारी जंगल नमकीन पानी में रह सकते हैं।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✗)
  4. (✗)
  5. (✓)
  6. (✓)

अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी के चार मंडल कौन-से हैं ?
उत्तर-
थलमंडल, वायुमंडल, जलमंडल तथा जीवमंडल।

प्रश्न 2.
जीव मंडल क्या है ?
उत्तर-
जीव मंडल पृथ्वी का वह मंडल है जिसमें कई प्रकार के जीव रहते हैं।

प्रश्न 3.
फौना (Fauna) क्या है ?
उत्तर-
किसी भी क्षेत्र में किसी समय पर रहने वाले सभी प्राणियों को फौना कहा जाता है।

प्रश्न 4.
फ्लौरा (Flora) क्या है ?
उत्तर-
किसी क्षेत्र या समय में मौजूद संपूर्ण वनस्पति को फलौरा कहा जाता है।

प्रश्न 5.
ईकोसिस्टम कैसे बनता है ?
उत्तर-
किसी क्षेत्र में प्राणियों तथा पौधों की एक-दूसरे पर निर्भर प्रजातियां ईकोसिस्टम का निर्माण करती है।

प्रश्न 6.
प्राकृतिक वनस्पति क्या होती है ?
उत्तर-
वह वनस्पति जो स्वयं तथा बिना किसी मानवीय प्रभाव के उत्पन्न होती है उसे प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्राकृतिक वनस्पति कौन-से तत्त्वों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति भूमि, मृदा, तापमान, सूर्य की रोशनी का समय, वर्षा इत्यादि पर निर्भर करती है।

प्रश्न 8.
ऊंचे पहाड़ों पर कौन-से वक्ष उगते हैं ?
उत्तर-
ऊंचे पहाड़ों पर चील तथा स्परूस के वृक्ष उगते हैं।

प्रश्न 9.
कौन-सी मिट्टी में बहुत घनी वनस्पति उत्पन्न होती है ?
उत्तर-
डैल्टाई मिट्टी में बहुत घनी वनस्पति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 10.
प्रकाश संश्लेषण क्या होता है ?
उत्तर-
पौधों की सूर्य की रोशनी से भोजन तैयार करने की विधि को प्रकाश संश्लेषण कहा जाता है।

प्रश्न 11.
भारतीय वनस्पति को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
भारतीय वनस्पति को पांच श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

प्रश्न 12.
उष्ण सदाबहार जंगलों की एक विशेषता बताएं।
उत्तर-
यहां वृक्षों के पत्ते एक साथ नहीं झड़ते जिस कारण यह संपूर्ण वर्ष हरे ही रहते हैं।

प्रश्न 13.
ऊष्ण सदाबहार जंगल किन क्षेत्रों में मिलते हैं ?
उत्तर-
जो भाग गर्म तथा नम होते हैं तथा जहां वार्षिक 200-300 सैंटीमीटर वर्षा होती है।

प्रश्न 14.
कौन से जंगलों को वर्षा वन कहा जाता है ?
उत्तर-
ऊष्ण सदाबहार वनों को वर्षा वन कहा जाता है।

प्रश्न 15.
ऊष्ण सदाबहार वनों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ?
उत्तर-
महोगनी, रोज़वुड, ऐबोनी, बांस, शीशम, रबड़, सिनकोना, मैगवोलिया इत्यादि।

प्रश्न 16.
सिनकोना वृक्ष की छाल कहाँ पर प्रयोग की जाती है ?
उत्तर-
सिनकोना वृक्ष की छाल कुनीन की दवा बनाने के लिए प्रयोग की जाती है।

प्रश्न 17.
ऊष्ण सदाबहारी वन किन प्रदेशों में मिलते हैं ?
उत्तर-
पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढलानों, उत्तर-पूर्व भारत की पहाड़ियों, तमिलनाडु तट, पश्चिमी बंगाल के कुछ हिस्से, ओडिशा, अंडेमान निकोबार, लक्षद्वीप।

प्रश्न 18.
ऊष्ण पतझड़ी वन कितनी वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं ?
उत्तर-
70 से 200 सैंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में।

प्रश्न 19.
ऊष्ण पतझड़ी जंगलों की एक विशेषता बताएं।
उत्तर-
इन जंगलों में ऋतु के हिसाब से पत्ते झड़ते हैं।

प्रश्न 20.
ऊष्ण पतझड़ी जंगल कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
दो प्रकार-नम तथा शुष्क पतझड़ी जंगल।

प्रश्न 21.
नम पतझड़ी जंगल कितनी वर्षा वाले क्षेत्रों में होते हैं ?
उत्तर-
100 से 200 सैंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में।

प्रश्न 22.
नम पतझड़ी जंगल कहां पर मिलते हैं ?
उत्तर-
उत्तर-पूर्वी राज्यों में, पश्चिमी घाट, ओडिशा, छत्तीसगढ़ के कुछ भागों में।

प्रश्न 23.
नम पतझड़ी जंगलों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ?
उत्तर-
साल, टीक, देओदार, संदलवुड, शीशम, खैर इत्यादि।

प्रश्न 24.
शुष्क पतझड़ी जंगलों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ? ।
उत्तर-
पीपल, टीक, नीम, सफ़ेदा, साल इत्यादि।

प्रश्न 25.
झाड़ियां तथा कांटेदार जंगल कहां पर मिलते हैं ?
उत्तर-
यह जंगल उन क्षेत्रों में मिलते हैं जहां 70 सैंटीमीटर से कम वर्षा होती है।

प्रश्न 26.
झाड़ियां तथा कांटेदार जंगल कौन-से राज्यों में मिलते हैं ?
उत्तर-
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश इत्यादि।

प्रश्न 27.
कौन-सी नदियों के डैल्टा में ज्वारी जंगल होते हैं ?
उत्तर-
गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी।

प्रश्न 28.
सुंदरवन क्या है ?
उत्तर-
गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के डैल्टा क्षेत्र में मिलने वाले जंगलों को सुंदरवन कहा जाता है क्योंकि यहां सुंदरी वृक्ष काफी मिलते हैं।

प्रश्न 29. पर्वतीय जंगलों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ?
उत्तर-चील, स्परूस, दियार, फर, ओक, अखरोट इत्यादि।

प्रश्न 30.
पर्वतीय जंगलों में कौन-से जानवर मिलते हैं ?
उत्तर-
हिरन, याक, बर्फ में रहने वाला चीता, बारासिंगा, भालू, जंगली भेड़ें, बकरियां इत्यादि।

प्रश्न 31.
पंजाब में कौन-सी मृदाएं मिलती हैं ?
उत्तर-
जलोढ़ी मृदा, रेतली मृदा, चिकनी मृदा, दोमट मृदा, पर्वतीय मृदा तथा खारी मृदा।

प्रश्न 32.
अंग्रेजों ने प्राकृतिक वनस्पति को बचाने के लिए क्या किया ?
उत्तर-
उन्होंने जंगलों की हदबंदी की तथा पशुओं के चरने पर रोक लगाई।

प्रश्न 33.
पंजाब में कौन-से प्रकार की वनस्पति मिलती है ?
उत्तर-
हिमालय प्रकार की आई शोत ऊष्ण वनस्पति, उप ऊष्णू चील वनस्पति, उप ऊष्ण झाड़ेदार पर्वतीय वनस्पति, ऊष्ण खुष्क पतझड़ी वनस्पति तथा ऊष्ण कांटेदार वनस्पति।

प्रश्न 34.
बीड़ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
मैदानों में घनी वनस्पति के कुछ छोटे-बड़े टुकड़े मिलते हैं जिन्हें बीड़ कहा जाता है।

प्रश्न 35.
पंजाब का कितना क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति के अंतर्गत आता है ?
उत्तर-
केवल 6.07%।

प्रश्न 36.
पंजाब के किस जिले में प्राकृतिक वनस्पति सबसे अधिक है ?
उत्तर-
रूपनगर जिले में – 37.19%.

प्रश्न 37.
जंगलों का एक महत्त्व बताएं।
उत्तर-
वृक्ष कार्बन-डाइऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन छोड़ते हैं जो मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक है।

प्रश्न 38.
जंगली जीवन क्या होता है ?
उत्तर-
प्राकृतिक अरण्यों अर्थात् वनों में मौजूद जानवरों, पक्षियों तथा कीड़े-मकौड़े इत्यादि को जंगली जीवन कहा जाता है।

प्रश्न 39.
हमारे देश में जानवरों की कितनी प्रजातियां रहती हैं ?
उत्तर-
हमारे देश में जानवरों की 89,000 प्रजातियां रहती हैं जो विश्व के जानवरों की प्रजातियों का 6.5% बनता है।

प्रश्न 40.
भारतीय जंगलों में मिलने वाले जानवरों के नाम लिखें।
उत्तर-
हाथी, गैंडे, बारासिंगा, शेर, बंदर, लंगूर, लोमड़ी, मगरमच्छ, घड़ियाल, कछुए इत्यादि।

प्रश्न 41.
किस जानवर को ‘बर्फ का बैल’ कहा जाता है ?
उत्तर-
याक को।

प्रश्न 42.
कस्तूरी किस जानवर से प्राप्त होती है ?
उत्तर-
कस्तूरी थम्मन नामक हिरन से प्राप्त होती है।

प्रश्न 43.
भारत में पक्षियों की कितनी प्रजातियां रहती हैं ?
उत्तर-
लगभग 2000 प्रजातियां।

प्रश्न 44.
शीत ऋतु में भारत आने वाले कुछ प्रवासी पक्षियों के नाम लिखें।
उत्तर-
साइबेरियाई सास, ग्रेटर फलैमिंगो, स्टालिंग, रफ्फ, रोज़ी पैलीकन, आमटील इत्यादि।

प्रश्न 45.
जंगली जीवों के लिए भारतीय बोर्ड कब तथा क्यों स्थापित किया गया था ?
उत्तर-
1972 में ताकि लोगों को जंगली जानवरों को संभालने के लिए जागृत किया जा सके।

प्रश्न 46.
आरक्षित जीव मंडल क्या है ?
उत्तर-
यह बहुउद्देशीय सुरक्षित क्षेत्र हैं जिनका कार्य ईकोसिस्टम में प्रवृत्ति की अनेकता को संभाल कर रखता है।

प्रश्न 47.
बिल को क्यों प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
बिल को कब्ज तथा दस्त ठीक करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 48.
सर्पगंधा को क्यों प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
रक्त प्रवाह में सुधार करने के लिए।

लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवमंडल पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
पृथ्वी के चार मंडल होते हैं तथा उनमें से जीव मंडल ऐसा मंडल है जहां कई प्रकार के जीव रहते हैं। यह एक जटिल क्षेत्र है जहां पर बाकी तीन मंडल आपस में मिलते हैं। क्योंकि इस मंडल में जीवन मौजूद है, इस कारण इसका हमारे जीवन में काफी महत्त्व है। इसमें बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव से लेकर हाथी जैसे बड़े जीव रहते हैं। सभी प्रकार के जीवों को दो भागों में विभाजित किया जाता है तथा वह हैं-वनस्पति जगत् तथा प्राणी जगत्। वनस्पति जगत् को फ्लौरा कहा जाता है जिसमें प्रत्येक प्रकार की वनस्पति आ जाती है। प्राणी जगत् को फौना कहा जाता है जिसमें जीव मंडल में मौजूद सभी प्राणी आ जाते हैं।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक वनस्पति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग क्यों होती है ?
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होती है क्योंकि प्राकृतिक वनस्पति को अलगअलग भौगोलिक तत्त्व प्रभावित करते हैं। किसी स्थान पर जिस प्रकार के भौगोलिक तत्त्व होंगे, वहां उस प्रकार की वनस्पति ही उत्पन्न होगी। प्राकृतिक वनस्पति को कई तत्त्व प्रभावित करते हैं जैसे कि:

  1. भूमि (Land)
  2. मृदा (Soil)
  3. तापमान (Temperature)
  4. वर्षा (Rainfall)
  5. सूर्य की रोशनी का समय (Duration of Sunlight)।

प्रश्न 3.
ऊष्ण सदाबहार जंगलों की विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. ऊष्ण सदाबहार जंगल वह क्षेत्र होते हैं जहां 200 सैंटीमीटर से अधिक वर्षा होती है।
  2. वृक्षों के पत्ते इकट्ठे नहीं झड़ते जिस कारण यह संपूर्ण वर्ष हरे रहते हैं।
  3. यह घने जंगल गर्म तथा नम क्षेत्रों में मिलते हैं।
  4. इन जंगलों के वृक्ष 60 मीटर से भी ऊंचे हो जाते हैं तथा घने होने के कारण यह एक छतरी (Canopy) बना लेते हैं। इस कारण कई स्थानों पर सूर्य की रोशनी भूमि तक भी नहीं पहुंच पाती।
  5. महोगनी, रोज़वुड, ऐबोनी, बांस, शीशम, सिनकोना रबड़ इत्यादि इस क्षेत्र में मिलने वाले वृक्ष हैं।
  6. यह पश्चिमी घाट की ढलानों, उत्तर पूर्वी भारत की पहाड़ियों, पश्चिमी बंगाल तथा ओडिशा के कुछ भागों, लक्षद्वीप तथा अंडमान निकोबार में मिलते हैं।

प्रश्न 4.
ऊष्ण पतझड़ी अथवा मानसूनी जगलों की कुछ विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. ऊष्ण पतझड़ी जंगल उन क्षेत्रों में होते हैं जहां 70 से 200 सैंटीमीटर तक वर्षा होती है।
  2. इन जंगलों के वृक्षों के पत्ते मौसम के अनुसार झड़ते हैं जो गर्मियों में लगभग छ: से आठ हफ्तों के बीच होता है।
  3. यह जंगल दो प्रकार के होते हैं-नम पतझड़ी जंगल (100 से 200 सैंटीमीटर वर्षा) तथा शुष्क पतझड़ी जंगल (70-100 सैंटीमीटर वर्षा)।
  4. यहां टीक, संदलवुड, साल, शीशम, देओदार, खैर, पीपल, नीम, टीक, सफैदा इत्यादि वृक्ष उगते हैं।
  5. यह सदाबहार जंगलों की तरह घने तो नहीं होते परंतु फिर भी काफी घने होते हैं।

प्रश्न 5.
पंजाब में मिलने वाली मिट्टियों (मृदाओं) के नाम बताएं।
उत्तर-
पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों में मिट्टी के कई प्रकार मिलते हैं जिनके नाम निम्नलिखित हैं :

  1. जलोढ़ या दरियाई मिट्टी (Alluvial or River Soil)
  2. रेतली मिट्टी (Sandy Soil)
  3. चिकनी मिट्टी (Clayey Soil)
  4. दोमट मिट्टी (Loamy Soil)
  5. पर्वतीय मिट्टी अथवा कंडी की मिट्टी (Hill Soil or Kandi Soil)
  6. सोडिक अथवा ख़ारी मिट्टी. (Sodic and Saline Soil)।

प्रश्न 6.
अंग्रेजों ने प्राकृतिक वनस्पति को बचाने के लिए कौन-से प्रयास किए ?
उत्तर-
वृक्षों की लगातार कटाई के कारण, पशुओं के चरने तथा कानूनों की कमी के कारण पंजाब में वनस्पति का क्षेत्र काफी तेजी से कम हो रहा था। इस कारण अंग्रेजों ने वनस्पति को बचाने के लिए कुछ प्रयास किए जैसे कि :

  1. जंगलों की हदबंदी की गई तथा जंगलों को कई भागों में विभाजित किया गया।
  2. जंगलों में पशुओं के चरने पर रोक लगा दी गई ताकि प्राकृतिक वनस्पति बची रह सके।
  3. कृषि को बढ़ाने के लिए अतिरिक्त वनस्पति को साफ किया गयाँ तथा भूमि को कृषि योग्य बनाया गया। इससे अधिक अनाज पैदा करके जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति की गई।

प्रश्न 7.
भारत के जंगली जीवन पर एक नोट लिखें।
उत्तर-
जो जंगली जीव, पक्षी तथा कीड़े-मकौड़े, प्राकृतिक आरण्य अर्थात् जंगलों में रहते हैं, उन्हें जंगली जीवन कहा जाता है। भारत में कई प्रकार की प्राकृतिक स्थितियों के मिलने के कारण तथा मिट्टी के प्रकार के अंतर होने के कारण यहां कई प्रकार के प्राकृतिक आरण्य मिलते हैं। इस कारण यहां जंगली जीवन भी कई प्रकार का मिलता है। भारत में 89,000 से अधिक जानवरों की प्रजातियां मिलती हैं जोकि संसार में मिलने वाले जानवरों की प्रजातियों का लगभग 6.5% बनता है। इस प्रकार हमारे देश में पक्षियों की 2000 प्रजातियां, मछलियों की 2546 प्रजातियां, रेंगने वाले जीवों की 458 प्रजातियां तथा कीड़े-मकौड़ों की 60,000 से भी अधिक प्रजातियां मिल जाती हैं।

प्रश्न 8.
भारत में सर्दियों में कौन-से प्रवासी पक्षी आते हैं ?
उत्तर-
सर्दियों में कई अन्य देशों से प्रवासी पक्षी हमारे देश में आते हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं :

  1. ग्रेटर फलैमिंगो
  2. साइबेरिआई सारस
  3. काले पंखों वाली स्टिलट
  4. आम ग्रीन सारक
  5. रफ़ल
  6. रोज़ी पैलीकन
  7. लांगबिल्ड।
  8. आम टील
  9. गढ़वाल।

प्रश्न 9.
भारत में गर्मियों में आने वाले प्रवासी पक्षियों के नाम लिखें।
उत्तर-
भारत में गर्मियों में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी आते हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं :

1. ब्लु चीकड बी ईटर
2. कूम्ब डक
3. कुकु (कोयल)
4. ब्लु टेल्ड बी ईटर
5. युरेशियन गोलफन ओरीओल
6. एशियन कोयल।
7. ब्लैक क्राऊनड नाइट हैरोन।

प्रश्न 10.
जंगली जीवों को बचाने के सरकारी प्रयासों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. 1952 में सरकार ने जंगली जीवों के लिए भारतीय बोर्ड का गठन किया जिसका कार्य सरकार को जीवों को संभालने की सलाह देना, लोगों को जंगली जानवरों को संभालने के लिए जागृत करना तथा जंगली जीव अभ्यारण्य इत्यादि का निर्माण करना है।
  2. 1972 में जंगली जीव सुरक्षा कानून बनाया गया ताकि खत्म होने की कगार तक पहुंच चुके जंगली जीवों की संभाल तथा उनका शिकारियों से बचाव किया जा सके।
  3. देश में कई आरक्षित जीव मंडल (Biosphere Reserves) का निर्माण किया गया ताकि जानवरों की अनेकता को संभाल कर रखा जा सके। अब तक 18 आरक्षित जीव मंडल बनाए जा चुके हैं।
  4. जंगली जीवों को बचाने के लिए तथा उन्हें संभालने के लिए देश में 103 राष्ट्रीय उद्यान तथा 555 जंगली जीव अभ्यारण्य बन चुके हैं जहां शिकार करना गैर कानूनी है।

प्रश्न 11.
हमारी प्राकृतिक वनस्पति का वास्तव में प्राकृतिक न रहने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
हमारी प्राकृतिक वनस्पति वास्तव में प्राकृतिक नहीं रही। यह केवल देश के कुछ ही भागों में दिखाई पड़ती है। अन्य भागों में इसका बहुत बड़ा भाग या तो नष्ट हो गया है या फिर नष्ट हो रहा है। इसके निम्नलिखित कारण हैं

  1. तेजी से बढ़ती हुई हमारी जनसंख्या
  2. परंपरागत कृषि विकास की प्रथा
  3. चरागाहों का विनाश या अति चराई
  4. ईंधन व इमारती लकड़ी के लिए वनों का अंधाधुंध कटाव
  5. विदेशी पौधों में बढ़ती हुई संख्या।

प्रश्न 12.
देश के वन क्षेत्र का क्षेत्रीय तथा राज्यों के स्तर पर वर्णन कीजिए।
उत्तर-
देश के विकास तथा वातावरण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए देश की कम-से-कम 33 प्रतिशत भूमि पर वन अवश्य होने चाहिएं। परंतु भारत की केवल 22.7 प्रतिशत भूमि ही वनों के अधीन है। राज्यों के स्तर पर इसका वितरण बहुत ही असमान है, जो निम्नलिखित ब्योरे से स्पष्ट है-

  1. त्रिपुरा (59.6%), हिमाचल प्रदेश (48.1%), अरुणाचल प्रदेश (45.8%), मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ (32.9%) तथा असम (29.3%) में अपेक्षाकृत अधिक वन क्षेत्र हैं।
  2. पंजाब (2.3%), राजस्थान (3.6%), गुजरात (8.8%), हरियाणा (12.1%), पश्चिमी बंगाल (12.5%) तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 15% से भी कम भूमि वनों के अधीन है।
  3. केंद्रीय शासित प्रदेशों में अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में सबसे अधिक (94.6%) तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सबसे कम (2.1%) वन क्षेत्र हैं।

PSEB 9th Class Social Science Guide भारत आकार व स्थिति Important Questions and Answers (4)

प्रश्न 13.
पतझड़ या मानसूनी वनस्पति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
वह वनस्पति जो ग्रीष्म ऋतु के शुरू होने से पहले अधिक वाष्पीकरण को रोकने के लिए अपने पत्ते गिरा देती है, पतझड़ या मानसून की वनस्पति कहलाती है। इस वनस्पति को वर्षा के आधार पर आई व आर्द्र-शुष्क दो उपभागों में बांटा जा सकता है।

  1. आई पतझड़ वन-इस तरह की वनस्पति उन चार बड़े क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां पर वार्षिक वर्षा 100 से 200 से० मी० तक होती है।
    इन क्षेत्रों में पेड़ कम सघन होते हैं परंतु इनकी ऊंचाई 30 मीटर तक पहुंच जाती है। साल, शीशम, सागौन, टीक, चंदन, जामुन, अमलतास, हलदू, महुआ, शारबू, ऐबोनी, शहतूत इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। .
  2. शुष्क पतझड़ी वनस्पति-इस प्रकार की वनस्पति 50 से 100 सें. मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है।
    इसकी लंबी पट्टी पंजाब से आरंभ होकर दक्षिण के पठार के मध्यवर्ती भाग के आस-पास के क्षेत्रों तक फैली हुई है। बबूल, बरगद, हलदू यहां के मुख्य वृक्ष हैं।

प्रश्न 14.
पूर्वी हिमालय में किस प्रकार की वनस्पति मिलती है ?
उत्तर-
पूर्वी हिमालय में 4000 किस्म के फूल और 250 किस्म की फर्न मिलती है। यहां की वनस्पति पर ऊंचाई के बढ़ने से तापमान और वर्षा में आए अंतर का गहरा प्रभाव पड़ता है।

  1. यहां 1200 मीटर की ऊंचाई तक पतझड़ी वनस्पति के मिश्रित वृक्ष अधिक मिलते हैं।
  2. यहां 1200 से लेकर 2000 मीटर की ऊंचाई तक घने सदाबहार वन मिलते हैं। साल और मैंगनोलिया इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। इनमें दालचीनी, अमूरा, चिनोली तथा दिलेनीआ के वृक्ष भी मिलते हैं। .
  3. यहां पर 2000 से 2500 मीटर की ऊंचाई तक तापमान कम हो जाने के कारण शीतोष्ण प्रकार (Temperate type) की वनस्पति पाई जाती है। इसमें ओक, चेस्टनट, लॉरेल, बर्च, मैपल तथा ओलढर जैसे चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष मिलते हैं।

प्रश्न 15.
प्राकृतिक वनस्पति के अंधाधुंध कटाव से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक वनस्पति की अंधाधुंध कटाई की गई है। इस कटाई से हमें निम्नलिखित हानियां हुई हैं

  1. प्राकृतिक वनस्पति की कटाई से वातावरण का संतुलन बिगड़ गया है।
  2. पहाड़ी ढलानों और मैदानी क्षेत्रों के वनस्पति विहीन होने के कारण बाढ़ व मृदा अपरदन की समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं।
  3. पंजाब के उत्तरी भागों में शिवालिक पर्वतमालाओं के निचले भाग में बहने वाले बरसाती नालों के क्षेत्रों में वनकटाव से भूमि कटाव की समस्या के कारण बंजर जमीन में वृद्धि हुई है।
  4. मैदानी क्षेत्रों का जल-स्तर भी प्रभावित हुआ है जिससे कृषि को सिंचाई की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

प्रश्न 16.
मिट्टी कटाव के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मिट्टी का कटाव मुख्य रूप से दो कारणों से होता है-

  1. भौतिक क्रियाओं द्वारा तथा मानव क्रियाओं द्वारा। आज के समय में मानव क्रियाओं से मिट्टियों के कटाव की प्रक्रिया बढ़ती जा रही है।
  2. भौतिक तत्त्वों में उच्च तापमान, बर्फीले तूफान, तेज़ हवाएं, मूसलाधार वर्षा तथा तीव्र ढलानों की गणना होती है। ये मिट्टियों के कटाव के प्रमुख कारक हैं। मानवीय क्रियाओं में जंगलों की कटाई, पशुओं की बेरोकटोक चराई, स्थानांतरी कृषि की दोषपूर्ण पद्धति, खानों की खुदाई आदि तत्त्व आते हैं।

प्रश्न 17.
शुष्क पतझड़ी वनस्पति पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
इस प्रकार की वनस्पति 50 से 100 से० मी० से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है।
क्षेत्र-इसकी एक लंबी पट्टी पंजाब से लेकर हरियाणा, दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, काठियावाड़, दक्षिण के पठार के मध्यवर्ती भाग के आस-पास के क्षेत्रों में फैली हुई है।
प्रमुख वृक्ष-इस वनस्पति में शीशम या टाहली, बबूल, बरगद, हलदू जैसे वृक्ष प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें चंदन, महुआ, सीरस तथा सागवान जैसे कीमती वृक्ष भी मिलते हैं। ये वृक्ष प्रायः गर्मियां शुरू होते ही अपने पत्ते गिरा देते हैं।

प्रश्न 18.
वन्य प्राणियों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य क्यों है ?
उत्तर-
हमारे वनों में बहुत-से महत्त्वपूर्ण पशु-पक्षी पाए जाते हैं। परंतु खेद की बात यह है कि पक्षियों और जानवरों की अनेक जातियां हमारे देश से लुप्त हो चुकी हैं। अत: वन्य प्राणियों की रक्षा करना हमारे लिए बहुत आवश्यक है। मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए वनों को काटकर तथा जानवरों का शिकार करके दुःखदायी स्थिति उत्पन्न कर दी है। आज गैंडा, चीता, बंदर, शेर और सारंग नामक पशु-पक्षी बहुत ही कम संख्या में मिलते हैं। इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह वन्य प्राणियों की रक्षा करे।

प्रश्न 19.
हमारे जीवन में पशुओं का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
हमारे देश में विशाल पशु धन पाया जाता है, जिन्हें किसान अपने खेतों पर पालते हैं। पशुओं से किसान को गोबर प्राप्त होता है, जो मृदा की उर्वरता को बनाए रखने में उसकी सहायता करता है। पहले किसान गोबर को ईंधन के रूप में प्रयोग करते थे, परंतु अब प्रगतिशील किसान गोबर को ईंधन और खाद दोनों रूपों में प्रयोग करते हैं। खेत में गोबर को उर्वरक के रूप में प्रयोग करने से पहले वे उससे गैस बनाते हैं जिस पर वे खाना बनाते हैं और रोशनी प्राप्त करते हैं। पशुओं की खालें बड़े पैमाने पर निर्यात की जाती हैं। पशुओं से हमें ऊन प्राप्त होती है।

प्रश्न 20.
वन्य जीवों के संरक्षण पर एक संक्षेप टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
वन्य जीवों का संरक्षण-भारत में विभिन्न प्रकार के वन्य जीव पाए जाते हैं। उनकी उचित देखभाल न होने से जीवों की कई एक जातियां या तो लुप्त हो गई हैं या लुप्त होने वाली हैं। इन जीवों के महत्त्व को देखते हुए अब इनकी सुरक्षा और संरक्षण के उपाय किये जा रहे हैं। नीलगिरि में भारत का पहला जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किया गया। यह कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल के सीमावर्ती क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसकी स्थापना 1986 में की गई थी। नीलगिरि के पश्चात् 1988 ई० में उत्तराखंड (वर्तमान) में नंदा देवी का जीव आरक्षित क्षेत्र बनाया गया। उसी वर्ष मेघालय में तीसरा ऐसा ही क्षेत्र स्थापित किया गया। एक और जीव आरक्षित क्षेत्र अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह में स्थापित किया गया है। इन जीव आरक्षित क्षेत्रों के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात तथा असम में भी जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए हैं।

दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
“देश में उष्ण सदाबहार वनस्पति से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक का क्रम मिलता है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर-
भारत की वनस्पति में व्यापक विविधता देखने को मिलती है। इसका मुख्य कारण है-देश में पाई जाने वाली विविध प्रकार की जलवायु दशाएं तथा धरातलीय असमानता। केवल पर्वतीय क्षेत्रों में ही ऊंचाई के साथ-साथ एक के बाद एक वनस्पति क्षेत्र पाए जाते हैं। यहां उष्ण सदाबहार वनस्पति से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक देखने को मिलती है। निम्नलिखित विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाएगी-

  1. शिवालिक श्रेणियों के वन-हिमालय की गिरिपाद शिवालिक श्रेणियों में ऊष्ण कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन पाए जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से इन वनों का सबसे महत्त्वपूर्ण वृक्ष साल हैं। यहां पर बांस भी बहुत होता है।
  2. 1200 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले वन-समुद्र तल से 1200 से लेकर 2000 मीटर तक की ऊंचाई पर घने सदाबहार वन पाए जाते हैं। इन वनों में सदा हरित चौड़ी पत्ती वाले साल तथा चेस्टनट के वृक्ष सामान्य रूप में मिलते हैं। ऐश तथा बीच इन वनों के अन्य वृक्ष हैं।
  3. 2000 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर पाये जाने वाले वन-समुद्र तल से 2000 से लेकर 2500 मीटर की ऊंचाई तक शीतोष्ण कटिबंध के शंकुधारी वन पाए जाते हैं। इन वनों में मुख्य रूप से बीच, चीड़, सीडर, सिल्वर, फ़र तथा स्परूस के वृक्ष मिलते हैं। हिमालय की आंतरिक श्रेणियों में तथा अपेक्षाकृत शुष्क भागों में देवदार का वृक्ष भलीभांति पनपता है।
  4. 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर पाये जाने वाले वन-समुद्र तल से 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर अल्पाइन वन पाये जाते हैं। सिल्वर, फ़र, चीड़, भुर्ज (बर्च) तथा जूनिपर (हपूशा) इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। इसके पश्चात् अल्पाइन वनों का स्थान झाड़ियां, गुल्म तथा घास-भूमियां ले लेती हैं।
    दक्षिणी पठार के पहाड़ी भागों में भी पर्वतीय वनस्पति मिलती है। यहां के नीलगिरि पर्वतीय क्षेत्रों में 200 सें० मी० से अधिक वर्षा होती है। इसी कारण यहां पर चौड़े-पत्तों वाले सदाबहार वन 1800 मीटर तक की ऊंचाई पर मिल जाते हैं। दक्षिण भारत में इनको ‘शोला वन’ कहा जाता है। इनमें जामुन, मैचीलस, मैलियोसोमा, सैलटिस आदि प्रमुख वृक्ष हैं। परंतु 1800 से 3000 की ऊंचाई पर शीतोष्ण कोणधारी वनस्पति मिलती है। इसमें सिल्वर, फर, चीड़, बर्च, पीला चम्पा जैसे वृक्ष मिलते हैं। इससे अधिक ऊंचाई पर छोटी-छोटी घास मिलती है।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक वनस्पति (वनों) के लाभों का वर्णन करो।
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति से हमें कई प्रत्यक्ष तथा परोक्ष लाभ होते हैं।
प्रत्यक्ष लाभ-प्राकृतिक वनस्पति से होने वाले प्रत्यक्ष लाभों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. वनों से हमें कई प्रकार की लकड़ी प्राप्त होती है, जिसका प्रयोग इमारतें, फ़र्नीचर, लकड़ी-कोयला इत्यादि बनाने में होता है। इसका प्रयोग ईंधन के रूप में भी होता है।
  2. खैर, सिनकोना, कुनीन, बहेड़ा व आंवले से कई प्रकार की औषधियां तैयार की जाती हैं।
  3. मैंग्रोव, कंच, गैंबीअर, हरड़, बहेड़ा, आंवला और बबूल इत्यादि के पत्ते, छिलके व फलों को सूखाकर चमड़ा रंगने का पदार्थ तैयार किया जाता है।
  4. पलाश व पीपल से लाख, शहतूत से रेशम, चंदन से तुंग व तेल और साल से धूपबत्ती व बिरोज़ा तैयार किया जाता है।

परोक्ष लाभ-प्राकृतिक वनस्पति से हमें निम्नलिखित परोक्ष लाभ होते हैं-

  1. वन जलवायु पर नियंत्रण रखते हैं। सघन वन गर्मियों में तापमान को बढ़ने से रोकते हैं तथा सर्दियों में तापमान को बढ़ा देते हैं।
  2. सघन वनस्पति की जड़ें बहते हुए पानी की गति को कम करने में सहायता करती हैं। इससे बाढ़ का प्रकोप कम हो जाता है। दूसरे जड़ों द्वारा रोका गया पानी भूमि के अंदर समा लिए जाने से भूमिगत जल-स्तर (Water-table) ऊंचा उठ जाता है। वहीं दूसरी ओर धरातल पर पानी की मात्रा कम हो जाने से पानी नदियों में आसानी से बहता रहता है।
  3. वृक्षों की जड़ें मिट्टी की जकड़न को मज़बूत किए रहती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं।
  4. वनस्पति के सूखकर गिरने से जीवांश के रूप में मिट्टी को हरी खाद मिलती है।
  5. हरी-भरी वनस्पति बहुत ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। इससे आकर्षित होकर लोग सघन वन क्षेत्रों में यात्रा, शिकार तथा मानसिक शांति के लिए जाते हैं। कई विदेशी पर्यटक भी वन-क्षेत्रों में बने पर्यटन केंद्रों पर आते हैं। इससे सरकार को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  6. सघन वन अनेक उद्योगों के आधार हैं। इनमें से कागज़, लाख, दियासिलाई, रेशम, खेलों का सामान, प्लाईवुड, गोंद, बिरोज़ा इत्यादि उद्योग प्रमुख हैं।

प्रश्न 3.
भारतीय मिट्टियों की किस्मों एवं विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
भारत में कई प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं। इनके गुणों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है-

  1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) भारत में जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदान, राजस्थान, गुजरात तथा दक्षिण के तटीय मैदानों में सामान्य रूप से मिलती है। इसमें रेत, गाद तथा मृत्तिका मिली होती है। जलोढ़ मिट्टी दो प्रकार की होती हैखादर तथा बांगर।
    जलोढ़ मिट्टियां सामान्यतः सबसे अधिक उपजाऊ होती हैं। इन मिट्टियों में पोटाश, फॉस्फोरस अम्ल तथा चूना पर्याप्त मात्रा में होता है। परंतु इनमें नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है।-
  2. काली अथवा रेगड़ मिट्टी (Black Soil)—इस मिट्टी का निर्माण लावा के प्रवाह से हुआ है। यह मिट्टी कपास की फसल के लिए बहुत लाभदायक है। अतः इसे कपास वाली मिट्टी भी कहा जाता है। इस मिट्टी का स्थानीय नाम ‘रेगड़’ है। यह मिट्टी दक्कन ट्रैप प्रदेश की प्रमुख मिट्टी है। यह पश्चिम में मुंबई से लेकर पूर्व में अमरकंटक पठार, उत्तर में गुना (मध्य प्रदेश) और दक्षिण में बेलगाम तक त्रिभुजाकार क्षेत्र में फैली हुई है।
    काली मिट्टी नमी को अधिक समय तक धारण कर सकती है। इस मृदा में लौह, पोटाश, चूना, एल्यूमीनियम तथा मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है। परंतु नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा जीवांश की मात्रा कम होती है।
  3. लाल मिट्टी (Red Soil)-इस मिट्टी का लाल रंग लोहे के रवेदार तथा परिवर्तित चट्टानों में बदल जाने के कारण होता है। इसका विस्तार तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, दक्षिणी बिहार, झारखंड, पूर्वी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों में है। लाल मिट्टी में नाइट्रोजन तथा चूने की कमी, परंतु मैग्नीशियम, एल्यूमीनियम तथा लोहे की मात्रा अधिक होती है।।
  4. लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil) इस मिट्टी में नाइट्रोजन, चूना तथा पोटाश की कमी होती है। इसमें लोहे तथा एल्यूमीनियम ऑक्साइड की मात्रा अधिक होने के कारण इसका स्वभाव तेज़ाबी हो जाता है। इसका विस्तार विंध्याचल, सतपुड़ा के साथ लगे मध्य प्रदेश, ओडिशा पश्चिमी बंगाल की बैसाल्टिक पर्वतीय चोटियों, दक्षिणी महाराष्ट्र तथा उत्तर-पूर्व में शिलांग के पठार के उत्तरी तथा पूर्वी भाग में है।
  5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)—इस मिट्टी का विस्तार पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में अरावली पर्वतों तक है। यह राजस्थान, दक्षिणी पंजाब व दक्षिणी हरियाणा में फैली हुई है। इसमें घुलनशील नमक की मात्रा अधिक होती है। परंतु इसमें नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की बहुत कमी होती है। इसमें 92% रेत व 8% चिकनी मिट्टी का अंश होता है। इसमें सिंचाई की सहायता से बाजरा, ज्वार, कपास, गेहूं, सब्जियां आदि उगाई जा रही हैं।
  6. खारी व तेजाबी मिट्टी (Saline & Alkaline Soil)—यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब के दक्षिणी भागों में छोटे-छोटे टुकड़ों में मिलती है। खारी मिट्टियों से सोडियम भरपूर मात्रा में मिलता है। तेज़ाबी मिट्टी में कैल्शियम व नाइट्रोजन की कमी होती है। इसी लवणीय मिट्टी को उत्तर प्रदेश में औसढ़’ या ‘रेह’, पंजाब में ‘कल्लर’ या ‘थुड़’ तथा अन्य भागों में ‘रक्कड़’ कार्ल और ‘छोपां’ मिट्टी भी कहा जाता है।
  7. पीट एवं दलदली मिट्टी (Peat & Marshy Soil)-इसका विस्तार सुंदरवन डेल्टा, उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र, तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तटवर्ती भाग, मध्यवर्ती बिहार तथा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में है। इसका रंग जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण काला तथा तेजाबी स्वभाव वाला होता है। जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण कहीं-कहीं इसका रंग नीला भी है।
  8. पर्वतीय मिट्टी (Mountain Soil)—इस मिट्टी में रेत, पत्थर तथा बजरी की मात्रा अधिक होती है। इसमें चूना कम लेकिन लोहे की मात्रा अधिक होती है। यह चाय की खेती के लिए अनुकूल होती है। इसका विस्तार असम, लद्दाख, लाहौल-स्पीति, किन्नौर, दार्जिलिंग, देहरादून, अल्मोड़ा, गढ़वाल व दक्षिण में नीलगिरि के पर्वतीय क्षेत्र में है।

प्रश्न 4.
भारत में पाये जाने वाले वन्य प्राणियों का वर्णन करो।
उत्तर-
वनस्पति की भांति ही हमारे देश के जीव-जंतुओं में भी बड़ी विविधता है। भारत में इनकी 81,000 जातियां पाई जाती हैं। देश के ताज़े और खारे पानी में 2500 जातियों की मछलियां मिलती हैं। इसी प्रकार यहां पर पक्षियों की भी 2000 जातियां पाई जाती हैं। मुख्य रूप से भारत के वन्य प्राणियों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. हाथी-हाथी राजसी ठाठ-बाठ वाला पशु है। यह ऊष्ण आर्द्र वनों का पशु है। यह असम, केरल तथा कर्नाटक के जंगलों में पाया जाता है। इन स्थानों पर भारी वर्षा के कारण बहुत घने वन मिलते हैं।
  2. ऊंट-ऊंट गर्म तथा शुष्क मरुस्थलों में पाया जाता है।
  3. जंगली गधा-जंगली गधे कच्छ के रण में मिलते हैं।
  4. एक सींग वाला गैंडा-एक सींग वाले गैंडे असम और पश्चिमी बंगाल के उत्तरी भागों के दलदली क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  5. बंदर-भारत में बंदरों की अनेक जातियां मिलती हैं। इनमें से लंगूर सामान्य रूप से पाया जाता है। पूंछ वाला बन्दर (मकाक) बड़ा ही विचित्र जीव है। इसके मुंह पर चारों ओर बाल उगे होते हैं जो एक प्रभामण्डल के समान दिखाई देते हैं।
  6. हिरण-भारत में हिरणों की अनेक जातियां पाई जाती हैं। इनमें चौसिंघा, काला हिरण, चिंकारा तथा सामान्य हिरण प्रमुख हैं। यहां हिरणों की कुछ अन्य जातियां भी मिलती हैं। इनमें कश्मीरी बारहसिंघा, दलदली मृग, चित्तीदार मृग, कस्तूरी मृग तथा मूषक मृग उल्लेखनीय हैं।
  7. शिकारी जंतु-शिकारी जंतुओं में भारतीय सिंह का विशिष्ट स्थान है। अफ्रीका के अतिरिक्त यह केवल भारत में ही मिलता है। इसका प्राकृतिक आवास गुजरात में सौराष्ट्र के गिर वनों में है। अन्य शिकारी पशुओं में शेर, तेंदुआ, लामचिता (क्लाउडेड लियोपार्ड) तथा हिम तेंदुआ प्रमुख हैं।
  8. अन्य जीव-जंतु-हिमालय की श्रृंखलाओं में भी अनेक प्रकार के जीव-जंतु रहते हैं। इनमें जंगली भेड़ें तथा पहाड़ी बकरियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भारतीय जंतुओं में भारतीय मोर, भारतीय भैंसा तथा नील गाय प्रमुख हैं। भारत सरकार कुछ जातियों के जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए विशेष प्रयत्न कर रही है।

प्राकृतिक वनस्पति तथा जंगली जीवन Notes

  • पृथ्वी के चार मंडल – पृथ्वी एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन मौजूद है। इसके चार मंडल हैं थलमंडल, वायुमंडल, जलमंडल तथा जीवमंडल। जीवमंडल में कई प्रकार के जीव रहते हैं। किसी क्षेत्र में मौजूद सभी प्राणियों को फौना तथा वनस्पति को फलौरा कहा जाता है।
  • प्राकृतिक वनस्पति – मनुष्य में हस्तक्षेप के बिना उगने वाली वनस्पति को प्राकृतिक वनस्पति कहा जाता है। यह स्वयं ही अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार विकसित हो जाती है।
  • प्राकृतिक वनस्पति के लिए उत्तरदायी तत्व – किसी भी क्षेत्र की प्राकृतिक वनस्पति के लिए कई प्रकार के भौगोलिक तत्व उत्तरदायी होते हैं जैसे कि भूमि, मिट्टी, तापमान, सूर्य की रोशनी, वर्षा इत्यादि।
  • पौधों की विविधता – भारत की प्राकृतिक वनस्पति में वन, घास-भूमियां तथा झाड़ियां सम्मिलित हैं। भारत में पौधों की 45,000 जातियां पाई जाती हैं।
  • वनस्पति प्रदेश – हिमालय प्रदेश को छोड़कर भारत के चार प्रमुख वनस्पति क्षेत्र हैं-उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन, उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन, कंटीले वन और झाड़ियां तथा ज्वारीय वन|
  • पर्वतीय प्रदेशों में वनस्पति की पेटियां – पर्वतीय प्रदेशों में उष्णकटिबंधीय वनस्पति से लेकर ध्रुवीय वनस्पति तक सभी प्रकार की वनस्पति बारी-बारी से मिलती है। ये सभी पेटियां केवल छ: किलोमीटर की ऊंचाई में ही समाई हुई हैं।
  • जीव-जंतु – हमारे देश में जीव-जंतुओं की लगभग 89000 जातियां मिलती हैं। देश के ताज़े और खारे पानी में 2546 प्रकार की मछलियां पाई जाती हैं। यहां पक्षियों की भी 2,000 जातियां हैं।
  • जैव-विविधता की सुरक्षा और संरक्षण – जैव सुरक्षा के उद्देश्य से देश में 103 राष्ट्रीय उद्यान, 544 वन्य प्राणी अभ्यारण्य तथा 177 प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) बनाए गए हैं।
  • मृदा (मिट्टी) – मूल शैलों के विखंडित पदार्थों से मिट्टी बनती है। तापमान, प्रवाहित जल, पवन इत्यादि तत्त्व इसके विकास में सहायता करते हैं।
  • पंजाब की मृदाएं – पंजाब में कई प्रकार की मृदाएं या मिट्टियां पाई जाती हैं जैसे कि जलोढ मिट्टी, चिकनी मिट्टी, दोमट मिट्टी, पर्वतीय मिट्टी, सोडिक और खारी मिट्टी इत्यादि।
  • पंजाब की प्राकृतिक वनस्पति – पंजाब में कई प्रकार की मिट्टी मिलने के कारण यहां पर कई प्रकार की वनस्पति भी मिल जाती है जैसे कि हिमालय प्रकार की आर्द्र शीत उष्ण वनस्पति, उपउष्णचील वनस्पति, उपउष्ण झाड़ीदार पर्वतीय वनस्पति, उष्ण शुष्क पतझड़ी वनस्पति तथा उष्ण कांटेदार वनस्पति।
  • जंगलों का महत्त्व – जंगलों का हमारे लिए काफी महत्त्व है जैसे कि जंगलों से हमें लकड़ी मिलती है, जंगल वर्षा करवाने तथा भूमि क्षरण को रोकते हैं, यह हमें आक्सीजन देते हैं, यह हमारे वातावरण को स्वस्थ बनाते हैं इत्यादि।
  • प्रवासी पक्षी – हमारे देश में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी भी आते हैं जैसे कि साइबेरिआई सारस, आमटील, गड़वाल, स्टालिंग, कुंब डक, ऐशियाई कोयल इत्यादि।
  • औषधिक पौधे – हमारे देश में बहुत-से ऐसे पौधे मिलते हैं जो दवाइयां बनाने में सहायता करते हैं जैसे कि आंवला, सर्पगंधा, तुलसी, नीम, चंदन, बिल, जामुन इत्यादि।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 14 हस्तशिल्प तथा उद्योग

Punjab State Board PSEB 8th Class Social Science Book Solutions History Chapter 14 हस्तशिल्प तथा उद्योग Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Social Science History Chapter 14 हस्तशिल्प तथा उद्योग

SST Guide for Class 8 PSEB हस्तशिल्प तथा उद्योग Textbook Questions and Answers

I. नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखें :

प्रश्न 1.
भारत के लघु (छोटे) उद्योगों के पतन के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर-

  1. इन उद्योगों के मुख्य संरक्षक देशी रियासतों के राजा, उनके परिवार के सदस्य तथा उनके अधिकारी और कर्मचारी थे। जब देशी रियासतों की समाप्ति शुरू हो गई तो पुराने उद्योगों को स्वाभाविक रूप से धक्का लगा।
  2. भारत के लघु उद्योगों में बनी वस्तुएं नई श्रेणी के लोगों को पसन्द नहीं थीं। वे अंग्रेज़ों के प्रभाव में थे। अत: इन्हें यूरोप की वस्तुएं भारत की वस्तुओं की अपेक्षा अधिक अच्छी लगती थीं।

प्रश्न 2.
भारत के लघु उद्योगों के द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का मूल्य अधिक क्यों होता था ? .
उत्तर-
भारत के लघु उद्योगों द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का मूल्य इसलिए अधिक होता था, क्योंकि इन्हें तैयार करने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता था।

प्रश्न 3.
भारत में सूती कपड़े का प्रथम उद्योग कब तथा कहां स्थापित हुआ ?
उत्तर-
भारत में सूती कपड़े का प्रथम उद्योग (कारखाना) 1853 ई० में मुम्बई में स्थापित हुआ।

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प्रश्न 4.
भारत में पहला पटसन उद्योग कब तथा कहां लगाया गया ?
उत्तर-
भारत में पहला पटसन उद्योग 1854 ई० में सीरमपुर (बंगाल) में लगाया गया।

प्रश्न 5.
भारत में कॉफी का पहला बाग कब तथा कहां लगाया गया ?
उत्तर-
भारत में कॉफी का पहला बाग 1840 ई० में दक्षिण भारत में लगाया गया।

प्रश्न 6.
चाय का पहला बाग कब तथा कहां लगाया गया ?
उत्तर-
चाय का पहला बाग़ 1852 ई० में असम में लगाया गया।

प्रश्न 7.
19वीं सदी में लघु उद्योगों के पतन के बारे में लिखें।
उत्तर-
भारत में अंग्रेजी शासन की स्थापना से पहले भारत के गांव आत्म-निर्भर थे। गांवों के लोग जैसे कि लोहार, जुलाहे, किसान, बढ़ई, चर्मकार, कुम्हार आदि मिलकर गांव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुएं तैयार कर लेते थे। उनकी दस्तकारियां या लघु उद्योग उनकी आय के साधन होते थे। परन्तु अंग्रेज़ी शासन की स्थापना होने के कारण गांवों के लोग भी अंग्रेज़ी कारखानों में तैयार की गई वस्तुओं का उपयोग करने लगे क्योंकि वे बढ़िया एवं सस्ती होती थीं। अतः भारत के नगरों एवं गांवों के लघु उद्योगों का पतन होने लगा और कारीगर (शिल्पकार) बेकार हो गये।

प्रश्न 8.
आधुनिक भारतीय उद्योगों के महत्त्व के बारे में लिखें।
उत्तर-
भारत में आधुनिक उद्योगों के विकास से आर्थिक एवं सामाजिक जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े। इसके परिणामस्वरूप समाज में दो श्रेणियों का जन्म हुआ-पूंजीपति तथा मज़दूर। पूंजीपति मजदूरों का अधिक-से-अधिक शोषण करने लगे। वे मजदूरों से अधिक-से-अधिक काम ले कर कम-से-कम पैसे देते थे। अत: सरकार ने मजदूरों की दशा सुधारने के लिए फैक्टरी-एक्ट पास किये। औद्योगिक विकास होने के कारण कई नये नगरों का निर्माण भी हुआ। ये नगर आधुनिक जीवन एवं संस्कृति के केन्द्र बने।

प्रश्न 9.
नील उद्योग पर नोट लिखें।
उत्तर-
अंग्रेजों को इंग्लैंड में अपने कपड़ा उद्योग के लिए नील की आवश्यकता थी। अतः उन्होंने भारत में नील की खेती को बढ़ावा दिया। इसका आरम्भ 18वीं शताब्दी के अन्त में बिहार तथा बंगाल में हुआ। नील के अधिकतर बड़े-बड़े बाग यूरोप वालों ने लगाए, जहां भारतीयों को काम पर लगाया गया। 1825 में नील की खेती के अधीन 35 लाख बीघा भूमि थी। परन्तु 1879 ई० में नकली नील तैयार होने के कारण नील की खेती में कमी आने लगी। परिणामस्वरूप 1915 ई० तक नील की खेती के अधीन केवल 3-4 लाख बीघा जमीन ही रह गई।

प्रश्न 10.
कोयले की खानों पर नोट लिखें।
उत्तर-
भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित सभी नये कारखाने कोयले से चलते थे। रेलों के लिए भी कोयला चाहिए था। इसलिए कोयला खानों में से कोयला निकालने की ओर विशेष ध्यान दिया गया। 1854 ई० में बंगाल के रानीगंज जिले में कोयले की केवल 2 खानें थीं। परन्तु 1880 तक इनकी संख्या 56 तथा 1885 तक 123 हो गई।

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें:

1. देशी रियासतों के राजा महाराजा …………. उद्योगों द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का प्रयोग करते थे।
2. नई पीढ़ी के लोग लघु उद्योगों द्वारा तैयार किए गए माल को ………… नहीं करते थे।
3. सभी नए कारखाने ……………. से चलते थे।
उत्तर-

  1. लघु
  2. पसंद
  3. कोयले।।

III. प्रत्येक वाक्य के सामने ‘सही’ (✓) या ‘गलत’ (✗) का चिन्ह लगाएं:

1. भारतीय नगरों एवं गांवों के लघु उद्योगों के पतन से कारीगर बेकार हो गए। – (✓)
2. इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति 19वीं सदी में आई। – (✗)
3. मशीनों द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का दाम अधिक होता था। – (✗)
4. 18वीं सदी में भारत का कच्चा माल इंग्लैंड जाने लगा। – (✓)

IV. सही जोड़े बनाएं :

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 14 हस्तशिल्प तथा उद्योग 1
उत्तर-

  1. टी (चाय) कंपनी
  2. सेरमपुर (बंगाल)
  3. रानीगंज।

PSEB 8th Class Social Science Guide हस्तशिल्प तथा उद्योग Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Multiple Choice Questions)

सही विकल्प चुनिए :

प्रश्न 1.
कॉफी का पहला बाग़ कब लगाया गया ?
(i) 1834 ई०
(ii) 1839 ई०
(iii) 1840 ई०
(iv) 1854 ई०।
उत्तर-
1840 ई०

प्रश्न 2.
भारत में नील उद्योग कहां से शुरू हुआ ?
(i) बिहार तथा बंगाल
(ii) कर्नाटक तथा तमिलनाडु
(iii) पंजाब तथा हरियाणा
(iv) मध्य भारत।
उत्तर-
बिहार तथा बंगाल

प्रश्न 3.
भारत में पटसन उद्योग का पहला कारखाना कब लगाया गया ?
(i) 1820 ई०
(ii) 1824 ई०
(iii) 1834 ई०
(iv) 1854 ई०।
उत्तर-
1854 ई० ।

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अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
अंग्रेजी शासन की स्थापना से पहले आर्थिक दृष्टि से गांवों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर-
अंग्रेजी शासन की स्थापना से पहले गांव आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर थे।

प्रश्न 2.
भारतीय दस्तकारों द्वारा बनी वस्तुएं मशीनों द्वारा बनी वस्तुओं का मुकाबला क्यों न कर सकीं ?
उत्तर-
भारतीय दस्तकारों द्वारा बनी वस्तुएं मशीनों द्वारा बनी वस्तुओं का मुकाबला इसलिए न कर सकी क्योंकि मशीनी वस्तुएं साफ़ तथा सुन्दर होने के साथ-साथ सस्ती भी थीं।

प्रश्न 3.
नई श्रेणी के लोगों को भारत के लघु उद्योगों द्वारा बनी वस्तुएं क्यों पसन्द नहीं थीं ?
उत्तर-
क्योंकि वे पश्चिमी-सभ्यता के प्रभाव में थे।

प्रश्न 4.
पटसन उद्योग में क्या-क्या वस्तुएं बनाई जाती थीं ?
उत्तर-
टाट तथा बोरियां।

प्रश्न 5.
भारत के कॉफी उद्योग को हानि क्यों पहंची ?
उत्तर-
भारत की कॉफी का मुकाबला ब्राज़ील की कॉफी से था जो बहुत अच्छी थी। इसलिए भारत के कॉफी उद्योग को हानि पहुंची।

प्रश्न 6.
भारत में अंग्रेज़ी काल में विकसित किन्हीं छः आधुनिक उद्योगों के नाम बताओ।
उत्तर-

  • सूती कपड़ा उद्योग
  • पटसन उद्योग
  • कोयला उद्योग
  • नील उद्योग
  • चाय
  • कॉफी।

प्रश्न 7.
फैक्टरी एक्ट क्यों पास किए गए ?
उत्तर-
फैक्टरी एक्ट मज़दूरों की दशा सुधारने के लिए पास किए गए।

प्रश्न 8.
आदि मानव अपने आप को गर्म रखने के लिए किस चीज़ से बने वस्त्र पहनता था ?
उत्तर-
पशुओं की खाल से बने वस्त्र।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में कपड़ा बुनने का विकास कैसे हुआ ? खुदाइयों से कपड़े की बुनाई के बारे में क्या प्रमाण मिले हैं ?
उत्तर-
आदि मानव अपने आप को गर्म रखने के लिए पशुओं की खाल से बने कपड़े पहनता था। कताई एवं बुनाई . की खोज इसके बहुत समय पश्चात् हुई थी। ऐसा माना जाता है कि भारत में जुलाहों ने कपड़ा तैयार करने के लिए सबसे पहले घास के रेशों का उपयोग किया था। तत्पश्चात् उन्होंने इस पर नमूने बनाने और करघे पर धागों का उपयोग करना सीखा। समय बीतने पर रेशों और नमूनों में और अधिक सुधार हुआ।

प्रमाण-प्राचीन वस्तुओं का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों को मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा की खुदाइयों से सूत की कताई तथा रंगदार सूती कपड़े के अवशेष मिले हैं। इस के अतिरिक्त उन्हें कश्मीर में कई स्थानों की खुदाई से चरखे, दरियां आदि प्राप्त हुए हैं। इनसे संकेत मिलता है कि लगभग 4,000 साल.पूर्व लोग कपड़ा बुनना जानते थे।

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प्रश्न 2.
भारत में कपड़ा उद्योग का पतन क्यों हुआ ? इसे नया जीवन कैसे मिला ?
उत्तर-
भारतीय कपड़े संसार-भर में प्रसिद्ध थे। यूरोप के व्यापारी कपड़े एवं मसालों का व्यापार करने के लिए ही भारत में आये थे। उन्होंने भारत में सूती कपड़े के कारखाने लगाए थे। इन उद्योगों में साधारण हथकरघों की अपेक्षा अधिक कपड़े का उत्पादन किया जाता था। परन्तु इंग्लैंड में औद्योगिक क्रान्ति आने के कारण भारत में कपड़ा-व्यापार का पतन आरम्भ हो गया। परन्तु 20वीं शताब्दी में महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में भारत में फिर से हाथ से बुने सूती एवं – रेशमी कपड़े तैयार किये जाने लगे, जिससे भारतीय कपड़ा-उद्योग पुनः अस्तित्व में आया।
सरकार की नई आर्थिक नीति से भी कपड़ा-उद्योग ने पहले से कहीं अधिक उन्नति की। सरकार ने कपड़े का आयात-निर्यात करने के लिए बहुत-सी सुविधाएं प्रदान की।

प्रश्न 3.
अंग्रेज़ी काल में भारत में पटसन उद्योग पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
पटसन उद्योग में मुख्य रूप से टाट तथा बोरियां बनाई जाती थीं। इस उद्योग पर यूरोप के लोगों का अधिकार था। इस उद्योग का पहला कारखाना 1854 ई० में सीरमपुर (बंगाल) में लगाया गया। इसके बाद भी पटसन उद्योग के अधिकतर कारखाने बंगाल में ही लगाये गए। 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक इन कारखानों की संख्या 36 हो गई थी।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में लघु उद्योगों के पतन के कारणों का वर्णन करें।
उत्तर-
भारत में लघु-उद्योगों के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

1. भारत की देशी रियासतों की समाप्ति-अंग्रेजों ने बहुत-सी भारतीय रियासतों को समाप्त कर दिया था। इस कारण लघु उद्योगों को बहुत हानि पहुंची क्योंकि इन रियासतों के राजा-महाराजा तथा उनके परिवार के सदस्य लघु उद्योगों द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का उपयोग करते थे।

2. भारतीय लघु उद्योगों द्वारा तैयार वस्तुओं का महंगा होना-भारतीय लघु उद्योगों द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का मूल्य अधिक होता था, क्योंकि उन्हें तैयार करने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता था। दूसरी ओर मशीनों द्वारा तैयार की गई वस्तुओं का मूल्य कम होता था। अत: लोग लघु उद्योगों द्वारा तैयार की गई वस्तुओं को नहीं खरीदते थे। परिणामस्वरूप भारतीय लघु उद्योगों का पतन आरम्भ हो गया।

3. मशीनी वस्तुओं की सुन्दरता-इंग्लैंड के कारखानों में मशीनों द्वारा तैयार वस्तुएं भारत के लघु उद्योगों द्वारा तैयार वस्तुओं की अपेक्षा अधिक साफ तथा सुन्दर होती थीं। अतः भारतीय लोग मशीनों द्वारा तैयार वस्तुओं को अधिक पसन्द करते थे। यह बात भारत के लघु उद्योगों के पतन का कारण बनी।

4. नई श्रेणी के लोगों की रुचि-नई श्रेणी के लोगों पर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव था। दूसरे, मशीनों द्वारा तैयार वस्तुएं बहुत साफ और सुन्दर होती थीं। अतः नई पीढ़ी के लोग लघु उद्योगों द्वारा तैयार वस्तुओं को पसन्द नहीं करते थे।

5. भारत से कच्चा माल इंग्लैंड भेजना-18वीं शताब्दी में यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति आई। इसके कारण वहां बहुत बड़े-बड़े कारखाने स्थापित किये गये। इन कारखानों में माल तैयार करने के लिए कच्चे माल की बहुत आवश्यकता थी, जिसे इंग्लैंड का कच्चा माल पूरा न कर सका। इस कारण भारत का कच्चा माल इंग्लैंड भेजा जाने लगा। इससे भारतीय कारीगरों के पास कच्चे माल की कमी हो गई। फलस्वरूप देश के लघु उद्योग पिछड़ गये।

प्रश्न 2.
प्रमुख आधुनिक भारतीय उद्योगों का वर्णन करें।
उत्तर-
अंग्रेजी शासन के समय भारत में बहुत-से नये उद्योगों की स्थापना हुई जिनमें प्रमुख उद्योग निम्नलिखित थे
1. सूती कपड़ा उद्योग-भारत में सूती कपड़े का पहला उद्योग (कारखाना) 1853 ई० में मुम्बई में लगाया गया। इसके पश्चात् 1877 ई० में कपास उगाने वाले बहुत से क्षेत्रों जैसे कि अहमदाबाद, नागपुर आदि में कपड़ा मिलें स्थापित की गईं। 1879 ई० तक भारत में लगभग 59 सूती कपड़ा मिलें स्थापित की जा चुकी थीं। जिनमें लगभग 43,000 लोग काम करते थे। 1905 ई० में कपड़ा मिलों की संख्या 206 हो गई थी। इनमें लगभग 1,96,000 मजदूर काम करते थे।

2. पटसन का उद्योग-पटसन का उद्योग बोरियां तथा टाट बनाने का काम करता था। इस उद्योग पर यूरोप के लोगों का अधिकार था। इस उद्योग का पहला कारखाना 1854 ई० में सैरमपुर अथवा सीरमपुर (बंगाल) में खोला गया। इसके बाद भी पटसन उद्योग के सबसे अधिक कारखाने बंगाल प्रान्त में ही खोले गये। 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक इन कारखानों की संख्या 36 हो गई थी।

3. कोयले की खानें-भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित सभी नये कारखाने कोयले से चलते थे। रेलों के लिए भी कोयला चाहिए था। इसलिए कोयला खानों में से कोयला निकालने की ओर विशेष ध्यान दिया गया। 1854 ई० में बंगाल के रानीगंज जिले में कोयले की केवल 2 खानें थीं। परन्तु 1880 तक इनकी संख्या 56 तथा 1885 तक 123 हो गई।

4. नील उद्योग-अंग्रेजों को इंग्लैंड में अपने कपड़ा उद्योग के लिए नील की आवश्यकता थी। अत: उन्होंने भारत में नील की खेती को बढ़ावा दिया। इसका आरम्भ 18वीं शताब्दी के अन्त में बिहार तथा बंगाल में हुआ। नील के अधिकतर बड़े-बड़े बाग यूरोप वालों ने लगाए, जहां भारतीयों को काम पर लगाया गया। 1825 में नील की खेती के अधीन 35 लाख बीघा भूमि थी। परन्तु 1879 ई० में नकली नील तैयार होने के कारण नील की खेती में कमी आने लगी। परिणामस्वरूप 1915 ई० तक नील की खेती के अधीन केवल 3-4 लाख बीघा जमीन ही रह गई।

5. चाय-1834 ई० में असम में एक कम्पनी की स्थापना की गई। 1852 ई० में अंग्रेजों ने असम में चाय का पहला बाग लगाया। 1920 ई० तक चाय की खेती लगभग 7 लाख एकड़ भूमि में होने लगी। उस समय 34 करोड़ पाऊंड मूल्य की चाय भारत से बाहर के देशों में भेजी जाती थी। तत्पश्चात् कांगड़ा तथा नीलगिरि की पहाड़ियों में भी चाय के बाग लगाए गए।

6. कॉफी-कॉफी का पहला बाग़ 1840 ई० में दक्षिण भारत में लगाया गया। तत्पश्चात् मैसूर, कुर्ग, नीलगिरि और मालाबार क्षेत्रों में भी कॉफी के बाग लगाये गये। ब्राज़ील की कॉफी के साथ इसका मुकाबला होने के कारण इस उद्योग को बहुत हानि पहुंची।

7. अन्य उद्योग-19वीं शताब्दी के अन्त से लेकर 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक बहुत से नये कारखाने स्थापित किये गये। इनमें लोहा-इस्पात, चीनी, कागज, दियासलाई बनाने और चमड़ा रंगने के कारखाने प्रमुख थे।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 14 हस्तशिल्प तथा उद्योग

हस्तशिल्प तथा उद्योग PSEB 8th Class Social Science Notes

  • भारत के लघु उद्योग – भारत प्राचीनकाल से ही अपने लघु उद्योगों के लिए जाना जाता रहा है। परन्तु अंग्रेज़ी काल में इन उद्योगों का पतन हो गया।
  • लघु-उद्योगों के पतन के कारण – (1) देशी रियासतों की समाप्ति (2) मशीनी माल का साफ़-सुथरा तथा सस्ता होना (3) नई श्रेणी के लोगों को मशीनी माल पसन्द होना, लघु उद्योगों में तैयार माल का महंगा होना, भारत से कच्चा माल इंग्लैंड में भेजा जाना आदि।
  • आधुनिक उद्योगों की स्थापना – अंग्रेज़ी काल में स्थापित नए (आधुनिक) उद्योग थे-सूती कपड़ा, पटसन, कोयला, चाय, कॉफ़ी, लौह-इस्पात, दियासलाई आदि।
  • फैक्टरी एक्ट्स – नये उद्योगों में मजदूरों का शोषण होने लगा। उनकी दशा सुधारने के लिए सरकार ने
    फैक्टरी एक्ट्स पास किये।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

Punjab State Board PSEB 9th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

SST Guide for Class 9 PSEB पंजाब : जलतन्त्र Textbook Questions and Answers

(क) नक्शा कार्य (Map Work):

प्रश्न 1.
पंजाब के रेखाचित्र में दिखाएं :
(i) रावी, ब्यास, सतलुज तथा घग्गर
(ii) कोई चार नहरें
(iii) कोई चार चो।
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी MBD Map Master की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 2.
नदियों का प्रदूषण कैसे रोका जाए, इस विषय पर कक्षा में अध्यापक से चर्चा करें।
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी स्वयं करें।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

प्रश्न 3.
अपने समीप नदी या नहर में हो रहे प्रदूषण के लिए अध्यापक व अधिकारियों को सूचना दें।
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी स्वयं करें।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3a भारत : जलप्रवाह

(ख) निम्न वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर दें:

प्रश्न 1.
कौन-सी नदी का उद्गम स्थान मान सरोवर के पास रक्षताल झील है ?
(i) घग्गर
(ii) ब्यास
(iii) सतलुज
(iv) ब्रह्मपुत्र।
उत्तर-
(iii) सतलुज।

प्रश्न 2.
पंजाब में कितनी नदियां हैं-
(i) तीन
(ii) चार
(iii) पाँच
(iv) आठ।
उत्तर-(i) तीन।

प्रश्न 3.
रणजीत सागर अथवा थीन डैम का निर्माण कौन-सी नदी पर हुआ है ?
(i) ब्यास
(ii) रावी
(iii) सतलुज
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(ii) रावी।

प्रश्न 4.
भंगी और बाशा चोअ कौन-से जिले में पड़ते हैं ?
(i) फिरोज़पुर
(ii) गुरदासपुर
(iii) होशियारपुर
(iv) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(iii) होशियारपुर।

प्रश्न 5.
कौन-सा कथन गलत है और कौन-सा सही है
(i) रावी, ब्यास व सतलुज बारामारसी नदियां हैं।
(ii) काली बेई व पावर्ती, ब्यास की सहायक नदियां हैं।
(iii) प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप वर्षा का जल है। .
(iv) पंजाब में 10 हैडवर्क्स तथा 20,786 किलोमीटर नहरें हैं।
उत्तर-

  1. सही,
  2. सही,
  3. सही,
  4. गलत।

प्रश्न 6.
बिस्त दोआब में बिस्त से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
ब्यास तथा सतलुज दरियाओं के पहले शब्दों ‘बि’ तथा ‘सत’ को मिला. कर बिस्त शब्द बना है।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

प्रश्न 7.
हरीके झील से राजस्थान को पानी ले जाने वाली दो नहरें कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर-
राजस्थान फीडर नहर जिसे इंदिरा गांधी कमांड नहर भी कहा जाता है।

प्रश्न 8.
पंजाब की कौन-सी नहर हरियाणा को जल प्रदान करती है ?
उत्तर-
घग्गर नदी।

प्रश्न 9.
अपर बारी दोआब नहर का स्त्रोत क्या है ?
उत्तर-
माधोपुर हैडवर्कस।

प्रश्न 10.
पौंग डैम का निर्माण कौन-सी नदी पर किया गया है ?
उत्तर-
ब्यास दरिया।

(ग) प्रश्नों के संक्षेप उत्तर दें:

प्रश्न 1.
ब्यास व रावी की सहायक नदियों की सारणी बनाएं।
उत्तर-
व्यास-ब्यास की सहायक नदियां हैं-सुकन्तरी, पार्वती, सोहां, उहल तथा काली बेईं।
रावी-ऊज, सक्की किरन नाला रावी की प्रमुख नदियां हैं।

प्रश्न 2.
चोअ क्या होते हैं ? किन्हीं चार के नाम लिखें।
उत्तर-
चोअ छोटी मौसमी नदियां होती हैं जो वर्षा की ऋतु में पानी से पूर्णतया भर जाती हैं। बहुत सी चौएं कटारधार तथा सोलहासिंगी पहाड़ियों से शुरू होती हैं। पंजाब के कण्डी क्षेत्र में बहुत सी मौसमी चौएं हैं। बाणा चोअ, टोसां चोअ, बलाचौर चोअ, गढ़शंकर चोअ, नरियाला चोअ, मैली चोअ इत्यादि कुछ प्रमुख चौ हैं।

प्रश्न 3.
पंजाब के नदी, नहरों के प्रदूषण से अवगत करवायें।
उत्तर-
जब पानी में अनावश्यक वस्तुएं मिला दी जाती हैं जिस से पानी प्रयोग करने लायक नहीं रहता, इसे जल प्रदूषण कहते हैं। इसमें कोई शंका नहीं है कि पंजाब की सभी नदियों तथा नहरों में काफ़ी अधिक जल प्रदूषण है। भारत सरकार के कई विभागों तथा मन्त्रालयों का भी मानना है कि पंजाब की नहरों में काफ़ी अधिक जल प्रदूषण है तथा इनमें खतरनाक ज़हर भर रहा है। यह ज़हर पानी की सहायता से हमारी भोजन प्रणाली में पहुँच रहा है तथा लोग इससे खतरनाक बिमारियों का शिकार हो रहे हैं। उदाहरण के लिए बुड्ढा नाला पूर्णतया तेजाबी हो चुका है। हमें सभी नदियों को बचाने की आवश्यकता है ताकि हम पानी के साथ-साथ अपने जीवन को बचा कर रख सकें।

(घ) निम्न प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दें

प्रश्न 1.
सतलुज नदी, उस पर बनाये डैमों तथा उसकी सहायक नदियों की जानकारी दें।
उत्तर-
सतलुज नदी तिब्बत में 4630 मीटर की ऊँचाई पर स्थित मानसरोवर झील से रक्षताल नामक स्थान से शुरू होता है। जब यह हिमालय पर्वत को पार कर रहा होता है तो गहरी खाइयां बनाता है। सतलुज मैदानों में भाखड़ा में दाखिल होता है तथा यहां ही भाखड़ा डैम बनाया गया है। नंगल से सतलुज दरिया दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ता है तथा जब यह रोपड़ पहुँचता है तो इसमें सुआं, सरसा नदियां, मौसमी चोअ मिल जाते हैं। फिरोजपुर जिले में यह हरीके पत्तण से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुलेमानकी नामक स्थान से पाकिस्तान में चला जाता है। सतलुज दरिया पर भाखड़ा बाँध के साथ-साथ कोटला बाँध, नाथपा झाखड़ी तथा नंगल बाँध भी बनाए गए हैं। सुआं, ब्यास तथा चिट्टी बेईं सतलुज की सहायक नदियां हैं। मक्खु में गिद्दड़ पिण्डी तथा चिट्टी बेईं सतलुज में मिल जाती है। सतलुज दरिया पर कई बाँधों के साथ-साथ रोपड़ तथा हरीके हैडवर्क्स भी बनाए गए हैं।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

प्रश्न 2.
पंजाब के नहर प्रबन्ध के विषय में लिखें। इससे कृषि को क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
पंजाब की अधिकतर जनता कृषि या इससे संबंधित कार्यों में लगी हुई है तथा पंजाब में ही 1960 के दशक में हरित क्रान्ति की शुरूआत हुई। हरित क्रान्ति में सिंचाई की बहुत बड़ी भूमिका थी क्योंकि किसान फसलों की सिंचाई के लिए केवल वर्षा पर निर्भर नहीं रह सकता। इस कारण पंजाब ने समय-समय पर अपनी नहरी व्यवस्था को काफी विकसित किया। पंजाब में 14500 किलोमीटर लंबी नहरें तथा 5 हैडवर्क्स हैं। यहां 10 नहरें भी हैं जिनके नाम हैंसरहिन्द नहर, अपर बारी दोआब नहर, बिस्त दोआब नहर, भाखड़ा मेन लाइन नहर, फिरोज़पुर/सरहिन्द फीडर प्रबन्ध, कश्मीर नहर, मक्खु, नहर, शाह नहर, राजस्थान फीडर तथा बीकानेर नहर। इन 10 नहरों में से 8 नहरों का वर्णन इस प्रकार है-

नहर उत्पात का स्थान लंबाई
1. भाखड़ा मेन लाइन नंगल बैराज 161.36 कि०मी०
2. राजस्थान फीडर हरीके हैडवर्क्स 149.53 कि०मी०
3. सरहिन्द फीडर II हरीके हैडवर्क्स 136.53 कि०मी०
4. सरहिन्द रोपड़ हैडवर्क्स 59.44 कि०मी०
5. बिस्त दोआब रोपड़ हैडवर्क्स 43.00 कि०मी०
6. अपर बारी दोआब माधोपुर हैडवर्क्स 42.35 कि०मी०
7. पूर्वी नहर हुसैनीवाला हैडवर्क्स 8.02 कि०मी०
8. शाह नहर मुकेरियां हाईडल चैनल 2.23 कि०मी०

कृषि को लाभ-इस नहरी व्यवस्था से पंजाब की कृषि को काफी लाभ हुआ जिसका वर्णन इस प्रकार है-

  1. इन नहरों से पंजाब की कृषि को सारा साल पानी मिलता रहता है।
  2. सिंचाई के साधन बढ़ने से किसान साल में दो या अधिक फसलें उगाने में सफल हो गए हैं।
  3. अधिक फसलें उगाने से किसानों को काफ़ी फायदा हुआ है तथा उनकी आय भी बढ़ गई है।
  4. दरियाओं तथा नहरों पर डैम बना कर पानी को रोका गया ताकि वर्षा न होने की स्थिति में किसानों तक पानी पहुँचाया जा सके।
  5. डैमों से बिजली तैयार की गई जिससे उद्योगों तथा घरों को 24 घण्टे बिजली प्राप्त हुई।

प्रश्न 3.
पंजाब के चोअ और रौअ कौन-कौन से हैं ? विस्तत नोट लिखें।
उत्तर-
चौएं छोटी छोटी वर्षा पर आधारित तथा मौसमी नदियां होती हैं जो वर्षा के मौसम में पानी से भर जाती हैं। पंजाब में एक कण्डी क्षेत्र है जहां बहुत-सी चौएं मौजूद हैं। इनमें से कई चौओं का जन्म कटारधार तथा सेलासिंगी की पहाड़ियों में होता है। जब वर्षा आती है तो इन चौओं में पानी भर जाता है। पंजाब सरकार ने इनमें से कई चौओं को बंद करने में सफलता प्राप्त कर ली है तथा इनमें आने वाले वर्षा के पानी को कृषि अथवा अन्य कार्यों के लिए प्रयोग किया जा रहा है।

होशियारपुर जिले के दक्षिण पश्चिम में 93 चौएं मौजूद हैं जिनमें से बहुत से काली बेईं तथा चिट्टी बेईं में जाकर मिल जाते हैं। होशियारपुर में बहुत से चौएं हैं जिनमें कुछ काफी प्रमुख हैं जैसे कि टोसां चौ, बणा चौ, गढ़शंकर चौ, बलाचौर चौ, मैली चौ, नरियाला चौ, नंगल शहीदां चौ, गोंदपुर चौ, दसूहा चौ इत्यादि। इन पर नियन्त्रण रखने के लिए पंजाब सरकार ने कण्डी क्षेत्र विकास (Kandi Area Development) को भी शुरू किया है। पंजाब में कुछ बरसाती नाले भी हैं जैसे कि पटियाला की राव, जैंतिया देवी की रौ, बुड्ढ़ा नाला इत्यादि।

PSEB 9th Class Social Science Guide पंजाब : जलतन्त्र Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

प्रश्न 1.
पंजाब कौन-से दो शब्दों से मिलकर बना है ?
(क) पंज + आब
(ख) पंजा + आहब
(ग) पंज + अहाब
(घ) पं + जाहब।
उत्तर-
(क) पंज + आब

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

प्रश्न 2.
अब पंजाब में कितने दरिया हैं ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर-
(ख) तीन

प्रश्न 3.
इनमें से कौन-सा मौसमी दरिया है ?
(क) घग्गर
(ख) सकी किरन
(ग) काली बेई
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
इनमें से कौन-सा बारहमासी दरिया है ?
(क) रावी
(ख) ब्यास
(ग) सतलुज
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
रणजीत सागर डैम किस दरिया पर बना है ?
(क) रावी
(ख) सतलुज
(ग) ब्यास
(घ) चिनाब।
उत्तर-
(क) रावी

प्रश्न 6.
पौंग डैम किस दरिया पर बना है ?
(क) रावी
(ख) सतलुज
(ग) ब्यास
(घ) जेहलम।
उत्तर-
(ग) ब्यास

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

प्रश्न 7.
होशियारपुर में कितने चौएं हैं ?
(क) 70
(ख) 93
(ग) 84
(घ) 54.
उत्तर-
(ख) 93

रिक्त स्थान की पूर्ति करें (Fill in the Blanks)

1. सन् …………. में भारत तथा पाकिस्तान के विभाजन का सबसे बड़ा नुकसान …….. को हुआ।
2. रावी, ब्यास तथा सतलुज ……….. दरिया हैं।
3. रणजीत सागर डैम का कार्य ………… में पूर्ण हुआ था।
4. सुकन्तरी ………. की प्रमुख सहायक नदी है।
5. ………… किसी समय सरस्वती नदी का हिस्सा थी।

उत्तर-

  1. 1947, पंजाब,
  2. बारहमासी,
  3. 2001,
  4. ब्यास,
  5. घग्गर

सही/ग़लत (True/False)

1. जेहलम, चिनाब तथा सिन्धु पाकिस्तान वाले पंजाब में रह गए।
2. रावी ककझ मंझ नाम के स्थान पर पाकिस्तान में प्रवेश करता है।
3. रणजीत सागर डैम से 1600 वाट बिजली उत्पन्न होती है।
4. ब्यास दरिया पर पौंग डैम बनाया गया है।
5. रावी दरिया से राजस्थान फीडर नहर निकाली गई है।

उत्तर-

अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न।।

प्रश्न 1.
पंजाब शब्द का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
पंजाब शब्द दो शब्दों ‘पंज-आब’ से मिलकर बना है जिसका अर्थ है पाँच दरियाओं की धरती।

प्रश्न 2.
1947 के पश्चात् कौन-से दरिया पंजाब में रह गए।
उत्तर-
सतलुज, रावी तथा ब्यास।

प्रश्न 3.
1947 के पश्चात् कौन-से दरिया पाकिस्तान वाले पंजाब में चले गए ?
उत्तर-
जेहलम, चिनाब तथा सिन्धु।

प्रश्न 4.
बारहमासी दरिया कौन-से होते हैं ?
उत्तर-
वह दरिया जिनमें सम्पूर्ण वर्ष पानी रहता है उन्हें बारहमासी दरिया कहते हैं।

प्रश्न 5.
बारहमासी दरियाओं में सम्पूर्ण वर्ष पानी कहां से आता है ?
उत्तर-
बारहमासी दरियाओं में पहाड़ों से पिघली बर्फ का पानी सम्पूर्ण वर्ष आता रहता है।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

प्रश्न 6.
पंजाब के कुछ मौसमी दरियाओं के नाम लिखो।
उत्तर-
घग्गर, काली बेईं, चिट्टी बेईं, ऊज, चक्की खड्ड, स्वात इत्यादि।

प्रश्न 7.
किन्हीं दो अवशेषी दरियाओं के नाम लिखें।
उत्तर-
बुड्डा नाला तथा सक्की किरन नाला।

प्रश्न 8.
रावी दरिया का जन्म कहां पर होता है ?
उत्तर-
रावी दरिया कुल्लू की पहाड़ियों में स्थित रोहतांग दर्रे के उत्तर में 4116 मीटर की ऊंचाई से शुरू होता है।

प्रश्न 9.
रावी दरिया पर कौन-सा डैम बनाया गया है तथा इसमें से कौन-सी नहर निकाली गई है ?
उत्तर-
रावी दरिया पर रणजीत सागर डैम बनाया गया है तथा इससे अपर बारी दोआब नहर निकाली गई है।

प्रश्न 10.
रावी दरिया पर कौन-से हैडवर्क्स बनाए गए हैं ?
उत्तर-
शाहपुर कण्डी के नज़दीक धाना या बसन्तपुर, कटारधार, माधोपुर हैडवर्क्स तथा माधोपुर ब्यास लिंक पर कठुआ फीडर।

प्रश्न 11.
रणजीत सागर डैम के बारे में बताएं।
उत्तर-
यह रावी दरिया पर बनाया गया डैम है जिससे 600 मेगावाट बिजली पैदा होती है। यह 1981 में शुरू हुआ था तथा मार्च 2011 में इसका कार्य पूर्ण हुआ था।

प्रश्न 12.
ब्यास दरिया कहां से निकलता है ?
उत्तर-
ब्यास दरिया ब्यास कुण्ड से निकलता है जो हिमाचल प्रदेश में रोहतांग दर्रे के पास 4060 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

प्रश्न 13.
व्यास दरिया पर कौन-से डैम बनाए गए हैं ?
उत्तर-
हिमाचल प्रदेश में पंडोह तथा पंजाब में पौंग डैम।

प्रश्न 14.
ब्यास से कौन सी नहर निकाली गई है ?
उत्तर-
ब्यास से राजस्थान फीडर नहर निकाली गई है जिसे इंदिरा गांधी कमांड नहर का नाम भी दिया गया है।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

प्रश्न 15.
ब्यास की सहायक नदियों के नाम लिखें।
उत्तर–
पार्वती, सुकन्तरी, सौहां, उम्मन तथा काली बेईं।

प्रश्न 16.
सतलुज दरिया कहां पर शुरू होता है ?
उत्तर-
सतलुज दरिया तिब्बत में मानसरोवर झील के नज़दीक स्थित रक्षताल से शुरू होता है।

प्रश्न 17.
सतलुज दरिया कहां पर पाकिस्तान में प्रवेश करता है ?
उत्तर-
सतलुज दरिया फिरोज़पुर में सुलेमान की नामक स्थान से पाकिस्तान में प्रवेश करता है।

प्रश्न 18.
सतलुज दरिया पर कौन-से डैम बनाए गए हैं ?
उत्तर-
नाथपा झाखड़ी, नंगल डैम, कौटला डैम।

प्रश्न 19.
घग्गर किस प्रकार की नदी है ?
उत्तर-
घग्गर दक्षिणी पंजाब में बहने वाली एक मौसमी नदी है ।

प्रश्न 20.
घग्गर कहां से निकलती है ?
उत्तर-
घग्गर नदी सिरमौर की पहाड़ियों से निकलती है।

प्रश्न 21.
पंजाब के किस क्षेत्र में बहुत से चोअ मिलते हैं ?
उत्तर-
कण्डी क्षेत्र में।

प्रश्न 22.
चोअ क्या होता है ?
उत्तर-
चोअ एक छोटी सी नदी होती है जो वर्षा के मौसम में पानी से भर जाती है।

प्रश्न 23.
पंजाब के किस जिले में बहुत से चोअ हैं ?
उत्तर-
होशियारपुर जिले में।

प्रश्न 24.
पंजाब की नहरों की लंबाई बताएं।
उत्तर-
पंजाब की नहरों की लंबाई 14500 किलोमीटर है।

प्रश्न 25.
पंजाब की सबसे लंबी नहर कौन-सी है ?
उत्तर-
भाखड़ा मेन लाइन जिसकी लंबाई 161.36 किलोमीटर है।

प्रश्न 26.
कौन-सा दरिया किसी समय सरस्वती नदी का सहायक होता था ?
उत्तर-
घग्गर दरिया किसी समय सरस्वती नदी का सहायक होता था।

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब : जलतन्त्र

लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाब के जलतन्त्र के बारे में बताएं।
उत्तर-
पंजाब दो शब्द ‘पंज’ तथा ‘आब’ से मिलकर बना है जिसका अर्थ है पाँच दरियाओं की धरती। पंजाब में 1947 से पहले कई दरिया होते थे परन्तु देशों के विभाजन के कारण जेहलम, चिनाब, सिन्धु तथा बहुत सी नदियां पाकिस्तान में चली गईं। अब पंजाब में केवल तीन दरिया रावी, ब्यास तथा सतलुज ही हैं। यह तीनों दरिया बारहमासी हैं जिनमें पहाड़ों की बर्फ पिघलने के कारण सारा साल पानी रहता है। यहां बहुत से मौसमी दरिया भी हैं जैसे कि घग्गर, ऊज, काली बेईं, चिट्टी बेईं, स्वान, नूरपुर बेदी चोअ इत्यादि। यहां अवशेषी दरिया, जैसे कि बुड्ढा नाला तथा सक्की किरन नाला भी मिलते हैं।
PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 3b पंजाब जलतन्त्र 1

प्रश्न 2.
रावी की सहायक नदियों के बारे में बताएं।
उत्तर-
जब रावी दरिया माधोपुर पहुँचता है तो इसमें कई सहायक नदियां आकर मिल जाती हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ऊज नदी है। इसके साथ ही सक्की किरन नाला रावी के साथ-साथ चलता है तथा भारत और पाकिस्तान की सरहद पर इसमें मिल जाता है। रावी दरिया पर चार हैडवर्क्स भी बनाए गए हैं जिनके नाम हैं माधोपुर ब्यास लिंक पर कठुआ फीडर, शाहपुर कण्डी के नज़दीक धाना या बसन्तपुर, माधोपुर हैडवर्क्स तथा कटारधार।

प्रश्न 3.
ब्यास दरिया की सहायक नदियों के बारे में बताएं।
उत्तर-
सुकन्तरी-उग्मन, पारबती, काली बेईं तथा सौहां ब्यास की कुछ सहायक नदियां हैं। तलवाड़ा पहुँच कर सौहां ब्यास में मिल जाती हैं। हरीके के नज़दीक काली बेईं होशियारपुर तथा कपूरथला से होते हुए ब्यास में मिल जाती है। ब्यास दरिया पर पौंग डैम तथा पंडोह डैम को भी बनाया गया है।

प्रश्न 4.
घग्गर पर एक नोट लिखें।
उत्तर-
पंजाब में काफी पहले सरस्वती नदी बहती थी तथा घग्गर भी उसका ही हिस्सा थी। परन्तु अब घग्गर एक मौसमी नदी है जो दक्षिण पंजाब में बहती है। यह सिरमौर की पहाड़ियों से निकलती है। मुबारकपुर नाम के स्थान पर यह मैदानी इलाकों में आ जाती है। इसके पश्चात् यह पटियाला, घनौर तथा हरियाणा के इलाकों को पार करती हैं। इसके पश्चात् यह राजस्थान के रेगिस्तान में जाकर खत्म हो जाती है।

दीर्घ उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-रावी दरिया पर एक नोट लिखें।
उत्तर-रावी पंजाब का एक बारहमासी दरिया है जिसमें सारा साल पानी रहता है क्योंकि पहाड़ों की बर्फ पिघलने के कारण इसमें लगातार पानी आता रहता है। रावी दरिया कुल्लू की पहाड़ियों में रोहतांग दर्रे के उत्तर से शुरू होता है जिसकी ऊंचाई 4116 मीटर है। रावी दरिया अपने आरंभिक स्थान (Place of Origin) से लगातार बहते हुए धौलाधार तथा पीर पंजाल की पहाड़ियों को पार करता है तथा वहां बनी हुई गतॊ (Depressions) से बहते हुए चम्बा तथा डलहौजी को पार करता है। पठानकोट में माधोपुर नाम के स्थान पर यह मैदानों में प्रवेश कर जाता है। रावी के ऊपर रणजीत सागर डैम तथा थीन डैम बनाए गए हैं तथा इनके लिए माधोपुर हैडवर्क्स बनाया गया है। यहां से अपर बारी दोआब नहर भी निकाली गई है। इसके पश्चात् रावी दरिया पठानकोट, गुरदासपुर तथा अमृतसर जिलों में से निकलता है। यह भारत व पाकिस्तान की सरहद निश्चित करता है। कलझ मंझ नाम के स्थान पर यह पाकिस्तान में चला जाता है। पाकिस्तान में यह सिधानी नाम के स्थान पर चिनाब में मिल जाता है। ऊज नदी तथा सक्की किरन वाला रावी की प्रमुख सहायक नदियां हैं।

पंजाब : जलतन्त्र PSEB 9th Class Geography Notes

  • पंजाब-पंजाब को पाँच दरियाओं की धरती कहा जाता है। समय के साथ-साथ पंजाब का कई बार विभाजन हुआ तथा अब इसमें केवल तीन दरिया रावी, ब्यास तथा सतलुज ही रह गए हैं। यह तीनों दरिया सम्पूर्ण वर्ष पानी से भरे रहते हैं।
  • पंजाब का जलतन्त्र-पंजाब में तीन प्रकार के दरिया हैं-बारहमासी दरिया, मौसमी दरिया तथा अवशेषी दरिया।
  • रावी दरिया-रावी दरिया रोहतांग दर्रे के उत्तर की तरफ 4116 मीटर की ऊंचाई पर शुरू होता है। इसके ऊपर रणजीत सागर डैम तथा थीन डैम के लिए माधोपुर हैड वर्कस को बनाया गया है। इसकी कई सहायक नदियां भी हैं जिनमें ऊज नदी सबसे महत्त्वपूर्ण है।
  • ब्यास नदी-ब्यास दरिया हिमाचल प्रदेश के नज़दीक 4060 मीटर की ऊंचाई पर ब्यास कुण्ड से शुरू होता है। यह पंजाब में 160 किलोमीटर का फासला तय करके सतलुज में मिल जाता है। इससे ही राजस्थान फीडर नहर निकाली गई है जो राजस्थान के एक बड़े हिस्से की पानी की आवश्यकताएं पूर्ण करती है।
  • सतलुज-सतलुज मानसरोवर झील के नज़दीक रक्षताल से निकलता है। इस पर भाखड़ा डैम बनाया गया है। यह फिरोजपुर जिले में से पाकिस्तान में चला जाता है।
  • घग्गर-घग्गर एक मौसमी नदी है जो सिरमौर की पहाड़ियों में से निकल कर पटियाला, घनौर तथा हरियाणा में से होते हुए राजस्थान के रेगिस्तान में खत्म हो जाती है।
  • पंजाब की नहरी व्यवस्था-पंजाब में काफी विकसित नहरी व्यवस्था है जिसमें 5 हैडवर्क्स तथा 14500 किलोमीटर लंबी नहरें हैं।3

PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य

Punjab State Board PSEB 9th Class Physical Education Book Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Physical Education Chapter 1 शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य

PSEB 9th Class Physical Education Guide शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य Textbook Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य क्या है ?
उत्तर-
शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के लिए ऐसा वातावरण प्रदान करना है जो उसके शरीर, दिमाग तथा समाज के लिए लाभदायक हो।

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा क्या है ?
उत्तर-
शारीरिक शिक्षा बच्चे के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए शारीरिक कार्यक्रम द्वारा, शरीर, मन तथा आत्मा को पूर्णता की ओर ले जाती है।

प्रश्न 3.
शारीरिक शिक्षा के कोई दो उद्देश्यों के नाम लिखो।
उत्तर-
(1) शारीरिक विकास (2) मानसिक विकास।

PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य

प्रश्न 4.
व्यक्ति और समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा के कोई दो योगदानों के नाम लिखें।
उत्तर-
(1) खाली समय का उचित प्रयोग, (2) जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक, 3. सामाजिक भावना।

प्रश्न 5.
खेल के मैदान में आप कौन-कौन से शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य ग्रहण करते हो ? किसी दो के नाम लिखें।
उत्तर-
(1) सहनशीलता, (2) अनुशासन, (3) चरित्र विकास ।

प्रश्न 6.
खेलें व्यक्ति में कैसे गुण विकसित करती हैं ?
उत्तर-
नेतृत्व के गुण।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा का क्या लक्ष्य है ?
(What is the aim of Physical Education ?)
उत्तर-
शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य (Aim of Physical Education)-शारीरिक शिक्षा साधारण शिक्षा की भान्ति उच्च मंजिल पर पहुंचने के लिए शिक्षा प्रदान करती है।
सुप्रसिद्ध शारीरिक शिक्षा शास्त्री जे० एफ० विलिअम्ज (J.F. Williams) का कहना है .. कि यदि हमें शारीरिक शिक्षा की मंजिल प्राप्त करनी है तो यह हमारा उद्देश्य होना चाहिए। शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य एक कुशल तथा योग्य नेतृत्व देना तथा ऐसी सुविधाएं प्रदान करना है जो किसी एक व्यक्ति या समुदाय को कार्य करने का अवसर दें तथा ये सभी क्रियाएं शारीरिक रूप से सम्पूर्ण, मानसिक रूप से उत्तेजक तथा सन्तोषजनक तथा सामाजिक रूप से निपुण हों। इसके अनुसार व्यक्ति के लिए केवल उन्हीं क्रियाओं का चयन करना चाहिए जो शारीरिक रूप से लाभदायक हों।

प्रत्येक व्यक्ति केवल वे क्रियाएँ करे जो शरीर को तेज़ करने वाली हों तथा उसकी चिन्तन शक्ति बढ़ाने वाली हों। खेलों में कुछ उलझनें तथा प्रतिबन्ध इस प्रकार लगाये जाते हैं कि व्यक्ति का दिमाग ताज़ा रहे और उसे मानसिक सन्तोष मिले। इन क्रियाओं को समाज का समर्थन भी प्राप्त होना चाहिए। इसके अतिरिक्त समाज के अन्य सदस्य भी इन्हें आदर की दृष्टि से देखें। . संक्षेप में, समूचे तौर पर शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति के लिए ऐसा वातावरण प्रदान करना है जो उसके शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक पक्ष के लिए उपयोगी हो। इस प्रकार व्यक्ति का सर्वपक्षीय विकास (All-round Development) ही शारीरिक शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य है।

प्रश्न 2.
खाली समय का उचित प्रयोग किस प्रकार किया जा सकता है ? संक्षेप में लिखो।
(How can Leisure time be usefully spent ? Describe in brief.)
उत्तर-
किसी ने ठीक ही कहा है कि “खाली मन शैतान का घर होता है।” (“An idle brain is a devil’s workshop.”) यह प्रायः देखा भी जाता है कि बेकार आदमी को शरारतें ही सूझती हैं। कई बार तो वह ऐसे गलत काम करने लगता है जो सामाजिक तथा नैतिक दृष्टि से उचित नहीं ठहराये जा सकते। इसका कारण यह है कि उसके पास फालतू समय तो है परन्तु उसके पास इसे व्यतीत करने का ढंग नहीं है। फालतू समय का उचित प्रयोग न होने के कारण उसका दिमाग कुरीतियों में फंस जाता है और कई बार अनेक उलझनों में उलझ कर रह जाता है जिनसे बाहर निकलना उसके वश से बाहर होता है।

यदि व्यक्ति इस फालतू समय का सदुपयोग जानता हो तो वह जीवन में उच्च शिखरों को छू सकता है। संसार के अनेक आविष्कार उन व्यक्तियों ने किये जो फालतू समय को कुशल ढंग से व्यतीत करने की कला से परिचित थे। इस प्रकार संसार के अनेक आविष्कार फालतू समय की ही देन हैं।।

यदि बच्चों के फालतू समय व्यतीत करने के लिए कोई उचित प्रबन्ध न हो तो वे बुरी आदतों का शिकार हो जाएंगे। इस प्रकार वे समाज पर बोझ बनने के साथ-साथ इसके लिए कलंक भी बन जाएंगे। इसलिए उनके फालतू समय के उचित प्रयोग की अच्छी व्यवस्था करनी चाहिए। स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों या नगरपालिकाओं या सरकार को अच्छे खेल के मैदानों तथा खेलों के सामान का पूरा प्रबन्ध करना चाहिए ताकि बच्चे खेलों में भाग लेकर अपने खाली समय का उचित प्रयोग कर सकें। इस प्रकार हम देखते हैं कि फालतू समय के प्रभावशाली उपयोग का सर्वोत्तम साधन खेलें हैं।

PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य

प्रश्न 3.
‘खेलें अच्छे नेता बनाती हैं।’ कैसे ?
(Games make good Leader. How ?)
अथवा
खेलें एक अच्छे नेता के गुण कैसे पैदा करती हैं?
(How sports produce the qualities of a good Leader ?)
उत्तर-
खेलें व्यक्ति में अच्छे नेतृत्व के गुण विकसित करती हैं। शारीरिक शिक्षा का क्षेत्र अत्यधिक विशाल है। खेलों में एक खिलाड़ी को अनेक ऐसे अवसर मिलते हैं जब उसे टीम के कप्तान, सैक्रेटरी, रैफरी या अम्पायर की भूमिका निभानी पड़ती है। इन परिस्थितियों में वह अपनी योग्यता के अनुसार आचरण करता है। एक कप्तान के रूप में वह अपनी टीम के खिलाड़ियों को समय-समय पर निर्देश देकर उन्हें उचित ढंग से तथा पूर्ण विश्वास के साथ खेलने की प्रेरणा देता है। एक रैफरी या अम्पायर के रूप में वह निष्पक्ष रूप से उचित निर्णय देता है। सैक्रेटरी के रूप में वह टीम का ठीक ढंग से गठन एवं संचालन करता है। इस प्रकार उसमें एक सफल और अच्छे नेता के गुण विकसित हो जाते हैं।

एक नेता में अच्छे चारित्रिक गुणों का होना आवश्यक है। उसमें आज्ञा-पालन, समय की पाबन्दी, सभी के साथ समान व्यवहार, प्रेम, सहानुभूति, सहनशीलता आदि गुण प्रचुर मात्रा में होने चाहिएं। ये सभी गुण वह खेल के मैदान से ग्रहण कर सकता है। एक नेता को अपने आस-पास के लोगों के साथ सद्भावना से रहना चाहिए। खेलें उसमें यह गुण विकसित करती हैं। जब एक खिलाड़ी अन्य स्थानों के खिलाड़ियों के साथ मिल-जुल कर खेलता है, वह उनके स्वभाव तथा सभ्यता के साथ भली-भान्ति परिचित हो जाता है। उसमें उनके प्रति सद्भावना उत्पन्न हो जाती है। यह सद्भावना ही एक नेता का महत्त्वपूर्ण गुण है।

नेता को चुस्त और फुर्तीला होना चाहिए। खेलों में भाग लेने से व्यक्ति में चुस्ती और स्फूर्ति आती है। इस प्रकार खेलें अच्छे नेताओं के निर्माण में विशेष योगदान देती हैं।

बड़े स्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा के मुख्य उद्देश्य कौन-कौन से हैं ?
(Describe the main objectives of Physical Education.)
उत्तर-
शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Physical Education)किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले उसके उद्देश्य निर्धारित कर लेना आवश्यक है। बिना उद्देश्य के किया गया काम छाछ को मथने के समान है। उद्देश्य निश्चित कर लेने से
हमारे यत्नों को प्रोत्साहन मिलता है और उस काम को करने में लगाई गई शक्ति व्यर्थ नहीं जाती है। आज तो शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य की जानकारी प्राप्त करना और भी ज़रूरी हो गया है क्योंकि अब तो स्कूलों में एक विषय (Subject) के रूप में इसका अध्ययन किया जाता है।

साधारणतया शारीरिक शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • शारीरिक वृद्धि एवं विकास (Physical Growth and Development)
  • मानसिक विकास (Mental Development) (3) सामाजिक विकास (Social Development)
  • चरित्र निर्माण या नैतिक विकास (Formation of Character or Moral Development)
  • नाड़ियों और मांसपेशियों में समन्वय (Neuro-muscular Co-ordination )
  • बीमारियों से बचाव (Prevention of Diseases)

1. शारीरिक वृद्धि एवं विकास (Physical Growth and Development)अच्छा, सफल तथा सुखद जीवन व्यतीत करने के लिए सुदृढ़, सुडौल तथा स्वस्थ शरीर का होना परमावश्यक है। हमारे शरीर का निर्माण मज़बूत हड्डियों से हुआ है। इसमें काम करने वाले सभी अंग उचित रूप से अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। शरीर के अंगों के सुचारु रूप से कार्य करते रहने से शरीर का निरन्तर विकास होता है। इसके विपरीत इनके भलीभान्ति काम न करने से शारीरिक विकास भी रुक जाता है। इस प्रकार शारीरिक प्रफुल्लता के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शारीरिक शिक्षा सुखद वातावरण जुटाती है।
PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य 1

2. मानसिक विकास (Mental Development)- शारीरिक विकास के साथसाथ मानसिक विकास की भी आवश्यकता है। शारीरिक शिक्षा ऐसी क्रियाएं प्रदान करती हैं जो व्यक्ति के मस्तिष्क को उत्तेजित करती हैं। उदाहरणस्वरूप, बास्केटबाल के खेल में एक टीम के खिलाड़ियों को विरोधी टीम के खिलाड़ियों से गेंद (बॉल) को बचा कर रखना होता है तथा इसके साथ-साथ अपना लक्ष्य भी देखना पड़ता है । अपनी शक्ति का अनुमान लगा कर बॉल को ऊपर लगी बास्केट में भी डालना होता है। कोई भी खिलाड़ी जो शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट है, परन्तु मानसिक रूप में विकसित नहीं है, कभी भी अच्छा खिलाड़ी नहीं बन सकता है। शारीरिक शिक्षा मानसिक विकास के लिए उचित वातावरण प्रदान करती है। इसलिए खेलों में भाग लेने वाले व्यक्ति का शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास भी हो जाता है।

प्रायः शारीरिक रूप से अस्वस्थ तथा मानसिक रूप से सुस्त व्यक्ति बहुत ही भावुक हो जाते हैं। वे जीवन की साधारण समस्याओं को हंसी-हंसी में सुलझा लेने के स्थान पर उनमें उलझ कर रह जाते हैं। वे अपनी खुशी, गम, पसन्द तथा नफ़रत को आवश्यकता से कहीं अधिक महत्त्व देने लगते हैं और वे अपना कीमती समय तथा शक्ति व्यर्थ ही गंवा देते हैं। इस प्रकार कोई महान् सफलता प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। शारीरिक शिक्षा इन भावनाओं पर नियन्त्रण पाने की कला सिखाती है।

3. सामाजिक विकास (Social Development) शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को अपने इर्द-गिर्द के लोगों के साथ सद्भावना से रहने की शिक्षा प्रदान करती है। जब एक व्यक्ति विभिन्न स्थानों के खिलाड़ियों के साथ मिल कर खेलता है तो सामाजिक विकास का अच्छा वातावरण पनपता रहता है। प्रत्येक खिलाड़ी अन्य खिलाड़ियों के स्वभाव, रीति-रिवाज, पहनावा, सभ्यता तथा संस्कृति से भली-भान्ति परिचित हो जाता है। कई बार दूसरों की अच्छी बातें तथा गुण ग्रहण कर लिए जाते हैं। देखने में आता है कि यूनिवर्सिटी, राज्यीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर खेल मुकाबलों का आयोजन किया जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य लोगों में प्रेम तथा आदर की भावनाएं विकसित करना होता है।

4. चरित्र-निर्माण अथवा नैतिक विकास (Character Formation or Moral Development)-खेल का मैदान चरित्र-निर्माण की पाठशाला है। इसका कारण यह है कि खेल के मैदान में ही व्यक्ति खेल के नियमों को निभाते हैं। यहीं से वे अच्छा जीवन व्यतीत करने की कला सीखते हैं तथा सुलझे हुए इन्सान बन जाते हैं। खेल खेलते समय यदि रैफरी कोई ऐसा निर्णय दे देता है जो उन्हें पसन्द नहीं तो भी वे खेल जारी रखते हैं और कोई अभद्र व्यवहार नहीं करते। खेल के मैदान में ही आज्ञा-पालन, अनुशासन, प्रेम तथा दूसरों से सहयोग आदि के गुण सीखे जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का चरित्र-निर्माण और नैतिक विकास होता है।

5. नाड़ियों और मांसपेशियों में समन्वय (Neuro-muscular Coordination)-हमारी प्रतिदिन की क्रियाओं को समुचित ढंग से पूर्ण करना अनिवार्य है ताकि नाड़ियों और मांसपेशियों में समन्वय पैदा हो। शारीरिक शिक्षा इनमें समन्वय पैदा करने में सहायता देती है।

6. बीमारियों से बचाव (Prevention from Diseases) शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को बीमारी से बचाना भी है। बहुत-सी बीमारियां अज्ञानता के कारण लग जाती हैं। शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य बच्चों की बीमारियों के कारणों का ज्ञान देना है। वे इन कारणों से बच कर स्वयं भी बीमारियों से बच सकते हैं।

अन्त में, हम कह सकते हैं कि शारीरिक शिक्षा मनुष्य के सर्वपक्षीय विकास के लिए, नागरिकता के लिए, मानवीय भावनाओं के निर्माण तथा राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत ही उपयोगी है।

प्रश्न 2.
हॉकी के खेल के मैदान में आप कौन-कौन से शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य ग्रहण करते हो ?
(What are the objectives of Physical Education that one acquires in the game of Hockey ?)
उत्तर-
हॉकी का मैदान भी एक तरह की पाठशाला है जहां से विद्यार्थी शारीरिक शिक्षा के अनेक गुण ग्रहण करता है जिनसे वह जीवन में उन्नति के उच्च शिखर को छूता है और जीवन का हर पक्ष से भरपूर आनन्द उठाता है। हॉकी के क्रीड़ा-क्षेत्र में हम शारीरिक शिक्षा के निम्नलिखित गुणों को ग्रहण करते हैं –

1. सहनशीलता (Toleration) खेल के मैदान में हम सहनशीलता का पाठ पढ़ते हैं। वैसे तो सभी खिलाड़ी चाहते हैं कि जीत उनकी टीम की ही हो। परन्तु कई बार लाख चाहने पर भी विरोधी टीम विजयी हो जाती है। ऐसी स्थिति में पराजित टीम के खिलाड़ी दिल छोड़ कर नहीं बैठ जाते बल्कि अपना मनोबल ऊंचा रखते हैं। वे हार-जीत को एक ही समान समझते हैं। इस प्रकार खेल के मैदान से विद्यार्थियों को सहनशीलता की व्यावहारिक ट्रेनिंग मिलती है।

2. अनुशासन (Discipline)-खेल के मैदान में खिलाड़ी अनुशासन में रहने की कला सीखते हैं। उन्हें पता चलता है कि अनुशासन ही सफलता की कुंजी है। वे खेल में भाग लेते समय अनुशासन का पालन करते हैं। वे अपने कप्तान की आज्ञा मानते हैं तथा रैफरी के निर्णयों को सहर्ष स्वीकार करते हैं। खेल में पराजय को सामने स्पष्ट शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य देखते हुए भी वे कोई ऐसा अभद्र व्यवहार नहीं करते जिससे कोई उन्हें अनुशासनहीन – कह सके।

3. चरित्र विकास (Character Development) हॉकी के खेल में भाग लेने से विद्यार्थियों में सहयोग, प्रेम, सहनशीलता, अनुशासन आदि गुणों का विकास होता है जिनसे उनके चरित्र का विकास होता है। इस खेल में भाग लेने से उनमें सहयोग की भावना विकसित होती है। वे निजी हितों को समूचे हितों पर न्योछावर कर देते हैं।

4. व्यक्तित्व का विकास (Development of Personality) हॉकी के खेल में भाग लेने से विद्यार्थियों में कुछ ऐसे गुण विकसित हो जाते हैं, जिनसे उनके व्यक्तित्व का विकास हो जाता है। उनमें सहयोग तथा सहनशीलता आदि गुण विकसित होते हैं तथा उनका शरीर सुन्दर एवं आकर्षक बन जाता है। ये सभी अच्छे व्यक्तित्व के चिन्ह हैं।

5. अच्छे नागरिक बनाना (Creation of Good Citizens)-हॉकी के मैदान में खिलाड़ी में कर्त्तव्य-पालन, आज्ञा पालन, सहयोग, सहनशीलता आदि गुण विकसित हो जाते हैं जो उन्हें एक अच्छा नागरिक बनने में पर्याप्त सहायता पहुंचाते हैं। वे नागरिकता के सभी कर्तव्यों का भली-भान्ति पालन करते हैं। इस प्रकार हॉकी का मैदान अच्छे नागरिकों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

6. सहयोग (Co-operation) हॉकी के खेल में भाग लेने वाला खिलाड़ी प्रत्येक खिलाड़ी का कहना मानता है। वह अपना विचार दूसरों पर बलात् लागू नहीं करवाता है, अपितु अपने विचार विनिमय के द्वारा खेल के मैदान में संयुक्त विचारधारा बनाता है। इस प्रकार सहयोग की भावना उत्पन्न होती है।

7. राष्ट्रीय भावना (National Spirit)-हॉकी का मैदान एक ऐसा स्थान है जहां हम बिना धर्म और वर्ग के आधार पर भाग ले सकते हैं। कोई भी खिलाड़ी खेल के मैदान में से किसी खिलाड़ी को धर्म के आधार पर टीम से बाहर नहीं निकाल सकता। इस प्रकार . खेल के मैदान में समानता और राष्ट्रीय एकता की भावना पैदा होती है।

8. आत्म-विश्वास की भावना (Self-Confidence) हॉकी के खेल के मैदान में खिलाड़ियों में आत्म-विश्वास की भावना पैदा होती है। जैसे, वह विजय-पराजय को एक समान समझता है। वही खिलाड़ी खेल के मैदान में सफल होता है जो धैर्य
और विश्वास के साथ खेले। इससे सिद्ध होता है कि हॉकी के खेल के द्वारा खिलाड़ियों में आत्म-विश्वास की भावना पैदा होती है।

9. विजय-पराजय को समान समझने की भावना (Spirit of giving equal importance to Victory of Defeat) हॉकी के खेल के द्वारा खिलाड़ियों में विजय-पराजय को एक समान समझने की भावना पैदा होती है।

हमें कभी भी विरोधी टीम का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए या विजय की प्रसन्नता में पागल नहीं होना चाहिए। पराजित टीम को सदैव प्रोत्साहन देना चाहिए। यदि उसकी पराजय होती है तो उसे निराश और उत्साहहीन नहीं होने देना चाहिए अपितु उसका हौसला बढ़ाना चाहिए।

10. त्याग की भावना (Spirit of Sacrifice)-हॉकी के खेल के मैदान में त्याग की भावना अत्यावश्यक है। जब हम खेल में भाग लेते हैं तो हम अपने स्कूल, प्रान्त, क्षेत्र और सारे राष्ट्र के लिए अपने हित का त्याग करके उसकी विजय का श्रेय राष्ट्र को देते हैं। अत: यह सिद्ध होता है कि खेलें सदैव त्याग चाहती हैं। – ड्यूक ऑफ़ विलिंग्टन ने नेपोलियन को वाटरलू (Waterloo) के युद्ध में पराजित करने के पश्चात् कहा था, “वाटरलू का युद्ध एटन और हैरो के खेल के मैदानों में जीता गया।” (“The Battle of Waterloo was won at the playing-fields of Eton and Harrow.”)
इससे यह सिद्ध होता है कि खेलें अच्छे नेता पैदा करने में सहायक होती हैं।

PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य

शारीरिक शिक्षा-इसके गुण एवं उद्देश्य PSEB 9th Class Physical Education Notes

  • .शारीरिक शिक्षा-शारीरिक क्रियाओं से हमें जो अनुभव प्राप्त होता है, उसे शारीरिक शिक्षा कहते हैं।
  • शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य-मनुष्य का सर्वोन्मुखी विकास ही शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य है।
  • शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य-शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास ही शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य हैं।
  • खेल के मैदान में शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य-खेल के मैदान से सहनशीलता, अनुशासन और चरित्र का विकास होता है।
  • खाली समय का उचित प्रयोग-खेलों में भाग लेने से बच्चे खाली समय का उचित प्रयोग करते हैं जिससे उनमें बुरी आदतें नहीं पनपती हैं।
  • खेलों के नेतृत्व का गुण-एक नेता में अच्छे चारित्रिक गुणों का होना आवश्यक है और ये खेलें मनुष्य में नेतृत्व के गुण पैदा करती हैं।