PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 2 खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप

Punjab State Board PSEB 9th Class Physical Education Book Solutions Chapter 2 खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Physical Education Chapter 2 खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप

PSEB 9th Class Physical Education Guide खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप Textbook Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खेलों के कोई दो लाभ लिखो।
उत्तर-

  1. स्वास्थ्य प्रदान करती हैं
  2. सुडौल शरीर।

प्रश्न 2.
एक स्पोर्ट्समैन कैसा व्यवहार करता है ? दो पंक्तियां लिखो।
उत्तर-

  1. पराजय को बड़ी शान से स्वीकार करे।
  2. प्रत्येक टीम को बराबर समझता हो।

प्रश्न 3.
खिलाड़ी के कोई दो गुण लिखें।
उत्तर-

  1. सहयोग की भावना
  2. सहनशीलता।

PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 2 खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप

प्रश्न 4.
विजय-पराजय को समान समझने की भावना को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-
खिलाड़ी का गुण।

प्रश्न 5.
आज्ञा देने और मानने की योग्यता किस प्रकार आती है ?
उत्तर-
खेलों में भाग लेने से।

प्रश्न 6.
आत्मविश्वास की भावना और उत्तरदायित्व की भावना खिलाड़ी को क्या बनाती है ?
उत्तर-
अच्छा सामाजिक प्राणी।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
एक स्पोर्ट्समैन के लिए कौन-सी व्यवहार प्रणाली स्वीकृत है ? (What system of behaviour is accepted by a sportsman ?)
उत्तर-
स्पोर्ट्समैन के लिए व्यवहार प्रणाली (System of behaviour for a sportsman) विश्व के सारे खिलाड़ी (स्पोर्ट्समैन) निम्नलिखित प्रणाली को मानते हैं और इसी के अनुसार व्यवहार करना अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं। इसके अनुसार व्यवहार प्रणाली की मुख्य बातें इस प्रकार हैं –

  1. अधिकारियों के निर्णय ठीक और अन्तिम होते हैं।
  2. खेलों के नियम वास्तव में अच्छे पुरुषों की सन्धि होते हैं।
  3. टीमों के लिए जान तोड़ कर साफ़-सुथरा खेलना ही सब से बड़ा आश्वासन है।
  4. पराजय को बड़ी शान से लो।
  5. जीत को बड़े सहज ढंग से स्वीकार करो।
  6. दूसरों के अच्छे गुणों का सम्मान करने से मान मिलता है।
  7. पराजय या बुरे खेल के लिए बहाने ढूंढ़ना ठीक नहीं।
  8. किसी राष्ट्र या टीम को उसके व्यवहार के अनुसार सम्मान दिया जाता है।
  9. बाहर से आई हुई टीमों का सम्मान होना चाहिए।
  10. प्रत्येक टीम को बराबर समझा जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
दर्शक किस प्रकार अच्छे स्पोर्ट्समैन बन सकते हैं ? (How can the spectators become good sportsmen ?)
उत्तर-
दर्शकों में अच्छे स्पोर्ट्समैन बनने के लिए निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है –

  1. वे अच्छे खेल की प्रशंसा और उसको उत्साहित करने में बाधा न बनें।
  2. यदि निर्णायक उनकी इच्छा के विरुद्ध निर्णय दे दे तो उसके विरुद्ध बुरे शब्दों का प्रयोग न करें।
  3. वे जिस टीम का पक्ष ले रहे हों यदि वह कमजोर है या अयोग्य है तो उसकी जीत देखना न चाहें क्योंकि खेल में अच्छी टीम ही विजय की पात्र है।
  4. वे अपने साथी दर्शकों से केवल इसलिए न झगड़ें क्योंकि वे विरोधी टीम का समर्थन करते हैं।
  5. वे जिस टीम का पक्ष ले रहे हैं यदि वह हार रही है तो अभद्र व्यवहार का प्रदर्शन न करें जैसे खेल के मैदान में कूड़ा-कर्कट, पत्थर आदि फेंक कर खेल रुकवाना ताकि खेल में हार-जीत का फैसला ही न हो।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खेलों के लाभों या गुणों का वर्णन करें। (Describe the Values of Sports.)
उत्तर-
खेलों के गुण (Values of Sports)-खेलों में व्यक्ति का आकर्षण उनके गुणों के कारण है। आजकल खेलों पर अधिक बल दिए जाने के निम्नलिखित कारण हैं-

1. स्वास्थ्य प्रदान करती हैं (Sound Health)-स्वास्थ्य एक अमूल्य देन है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है । स्वस्थ व्यक्ति से दारिद्रय, आलस्य तथा थकावट कोसों दूर रहती है। खेलें स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। खिलाड़ी के भागने दौड़ने तथा उछलने-कूदने से शरीर के सभी अंग हरकत करते हैं। दिल, फेफड़े, पाचक अंग आदि सारे अंग सुचारु रूप से कार्य करने लगते हैं। मांसपेशियों में ताकत और लचक बढ़ जाती है। जोड़ भी लचकदार हो जाते हैं और शरीर स्फूर्तिवान हो जाता है। इस प्रकार खेलों से स्वास्थ्य में सुधार होता है।

2. सुडौल शरीर (Sound Body)-खेलों में भाग लेते हुए खिलाड़ी को भागना पड़ता है, उछलना पड़ता है, कूदना पड़ता है, जिससे उसका शरीर सुडौल हो जाता है। कद ऊंचा हो जाता है। शरीर पर कपड़े खूब सजते हैं, जिससे उसके व्यक्तित्व को चार चांद लग जाते हैं। मांसपेशियों और सूक्ष्म नाड़ियों का तालमेल भी खेलों द्वारा ही पैदा होता है। इससे खिलाड़ी की चाल-ढाल आकर्षक हो जाती है । इस प्रकार खेलें व्यक्ति का रूप निखारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करती हैं।

3. संवेगों का सन्तुलन (Full Control on Emotions)—संवेगों का सन्तुलन सफल जीवन के लिए अत्यावश्यक है। यदि इन पर नियन्त्रण न रखा जाए तो क्रोध, उदासी तथा घमण्ड मनुष्य को चक्कर में डाल कर उसके व्यक्तित्व को नष्ट कर देते हैं। खेलें मनुष्य का मन जीवन की उलझनों से परे हटाती हैं, उसका मन प्रसन्न करती हैं तथा उसे संवेगों पर काबू पाने में सफल बनाती हैं। इस दिशा में खेलों द्वारा उत्पन्न स्पोर्ट्समैनशिप की भावना काफ़ी सहायक सिद्ध होती है।

PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 2 खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप

4. सतर्क बुद्धि का विकास (Development of Sound Reason)—मनुष्य को जीवन में कदम-कदम पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए सतर्क बुद्धि का विकास खेलों के द्वारा ही हो सकता है। खेल के समय खिलाड़ी को प्रत्येक पल किसी-न-किसी समस्या का सामना करना पड़ता है । अड़चन या समस्या को उसी समय शीघ्रातिशीघ्र हल करना पड़ता है। हल ढूंढने में तनिक देरी हो जाने पर सारे खेल का पासा उल्ट सकता है। इस प्रकार के वातावरण में प्रत्येक खिलाड़ी हर समय किसी-न-किसी समस्या के समाधान में लगा रहता है। उसे अपनी समस्याओं को स्वयं हल करने का अवसर मिलता रहता है। इस तरह उस में सतर्क बुद्धि का विकास होता है।

5. चरित्र का विकास (Development of Character)-चरित्रवान् व्यक्ति का सब जगह सम्मान होता है। वह लोभ-लालच में नहीं फंसता। खेल के समय विजयपराजय के लिए खिलाड़ियों को कई बार प्रलोभन दिए जाते हैं। अच्छा खिलाड़ी भूलकर भी इस जाल में नहीं फंसता तथा अपने विरोधी पक्ष के हाथों नहीं बिकता। यदि कोई खिलाड़ी भूल कर लालच में आकर अपने पक्ष से विश्वासघात करता है तो खिलाड़ियों तथा दर्शकों की नज़र में गिर जाता है। ऐसा खिलाड़ी बाद में पछताता है। एक अच्छा खिलाड़ी कभी भी छल-कपट का सहारा नहीं लेता। खेल के दर्शकों के सम्मुख होने तथा रैफरी के निरीक्षण में होने के कारण प्रत्येक खिलाड़ी कम-से-कम फाऊल खेलने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार खेलें मनुष्य में कई चारित्रिक गुणों का विकास करती हैं।

6. इच्छा शक्ति प्रबल करती हैं (Development of Strong Wil-power) – खेलें इच्छा शक्ति को प्रबल करती हैं। परिणामस्वरूप खिलाड़ी अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दत्तचित्त होकर प्रयत्न करते हैं और भावी जीवन में सफलता उनके कदम चूमती है। खेलों में खिलाड़ी एक-चित्त होकर खेलता है। उसके सम्मुख उसका उद्देश्य जीत प्राप्त करना होता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह अपनी सारी शक्ति लगा देता है और प्रायः सफल भी हो जाता है। जीवन के श्रेयों की प्राप्ति ही उसके लिए यही आदत बन जाती है। इस प्रकार खेलें इच्छा शक्ति को प्रबल करती हैं।

7. भ्रातृत्व की भावना का विकास (Development of Brotherhood) खेलों द्वारा भ्रातृत्व की भावना का विकास होता है। इसका कारण यह है कि खिलाड़ी सदैव ग्रुपों में खेलता है तथा ग्रुप के नियम के अनुसार व्यवहार करता है। यदि उसकी कोई आदत ग्रुप आदत के अनुकूल नहीं होती तो उसे उसका त्याग करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त ग्रुप में खेलने वालों का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ता है। उनका एक-दूसरे से प्रेम-पूर्ण तथा भाइयों जैसा व्यवहार हो जाता है। इस प्रकार उनका जीवन भ्रातृत्व के आदर्शों के अनुसार ढल जाता है तथा समाज में वे सम्मान प्राप्त करते हैं।

8. आत्म-अभिव्यक्ति (Self-expression)-खेलें व्यक्तियों को आत्म-अभिव्यक्ति अर्थात् स्वयं को खुल कर प्रकट करने के अवसर प्रदान करती हैं। खेल के मैदान में खिलाड़ी खुल कर अपने गुणों तथा कौशल को दर्शकों के समक्ष प्रकट करता है। इस गुण का विकास केवल क्रीड़ा-क्षेत्र में ही सम्भव है, अन्यत्र नहीं।

9. नेतृत्व (Leadership) खेलों का अच्छा नेतृत्व करने वाले में नेतृत्व के गुणों का विकास हो जाता है। एक अच्छा नेता अपने देश के नाम को चार चांद लगा देता है। इसके विपरीत एक बुरा अथवा अयोग्य नेता देश की नाव को मंझदार में फंसा देता है। खेल के मैदान से ही हमें अनुशासनबद्ध, आत्म-संयमी, आत्म-त्यागी तथा मिलजुलकर देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले सैनिक व अफसर प्राप्त होते हैं। इसीलिए तो ड्यूक ऑफ़ विलिंगटन ने नेपोलियन को वाटरलू (Waterloo) की लड़ाई में परास्त करने के बाद कहा, “वाटरलू की लड़ाई ऐटन तथा हैरो के क्रीड़ा-क्षेत्र में जीती गई।” (“The Battle of Waterloo was won at the playing-fields of Eton and Harrow.”)

10. फालतू समय का प्रयोग (Proper Use of Leisure Time) दिन भर काम करने के पश्चात् भी काफ़ी समय बच जाता है। इसलिए आज की मुख्य समस्या है कि इस फालतू समय का किस प्रकार प्रयोग किया जाए ? यदि हम इस फालतू समय का सदुपयोग न करेंगे तो इस समय में शरारतें ही सूझेंगी क्योंकि एक बेकार आदमी का दिमाग़ शैतान का घर होता है। इस फालतू समय को ठीक ढंग से गुज़ारने के लिए खेलें हमारी सहायता करती हैं। खेलों में भाग लेकर न केवल फालतू समय का ही उचित प्रयोग होता है वरन् इसके साथ शारीरिक विकास भी होता है।

11. जातीय भेदभाव मिटता है और अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ता है (Free from Casteism and Development of International Understanding) खेलें जातीय भेदभाव को मिटाती हैं जो कि देश की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा होता है। प्रत्येक टीम में विभिन्न जातियों के खिलाड़ी होते हैं। उनके एक साथ मिलने-जुलने तथा टीम के लिए एक जान होकर संघर्ष करने की भावना के कारण जात-पात की दीवारें गिर जाती हैं और उनका जीवन विशाल दृष्टिकोण वाला हो जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में एक देश के खिलाड़ी दूसरे देशों के खिलाड़ियों से खेलते हैं तथा उनसे मिलते-जुलते हैं। इससे उनमें मैत्री की भावना बढ़ जाती है। अतः खेलें अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने में भी सहायक होती हैं।

12. प्रतियोगिता तथा सहयोग की भावना (Spririt of Competition and Cooperation)-प्रतियोगिता ही प्रगति का आधार है और सहयोग महान् उपलब्धियों का साधन है। प्रतियोगिता तथा सहयोग की भावनाएं प्रत्येक मनुष्य में होती हैं। इनके विकास द्वारा ही समुदाय, समाज तथा देश प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। इन भावनाओं का विकास खेलों द्वारा ही होता है। हॉकी, फुटबाल, क्रिकेट आदि खेलों की टीमों में खूब मुकाबला होता है। मैच जीतने के लिए टीमें ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देती हैं, परन्तु मैच जीतने के लिए सभी खिलाड़ियों के सहयोग की भी आवश्यकता होती है क्योंकि किसी भी एक खिलाड़ी के प्रयत्नों से मैच नहीं जीता जा सकता। अत: प्रतियोगिता तथा सहयोग की भावनाओं का विकास करने के लिए खेलें बहुत उपयोगी हैं।

13. अनुशासन की भावना (Spirit of Discipline)-खेल का मैदान एक ऐसा स्थान है जहां खिलाड़ी अनुशासन में रहते हैं और अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। हम कह सकते हैं कि खेलों द्वारा व्यक्ति या खिलाड़ी खेल के नियमों के अनुशासन में रह कर अनुशासन में रहने का आदी हो जाता है। इस प्रकार हमें अनुशासन खेलों द्वारा प्राप्त होता है।

14. सहनशीलता (Tolerance) खेलों द्वारा खिलाड़ियों के मन में सहनशीलता पैदा होती है, क्योंकि खेलों द्वारा हम एक-दूसरे के विचार सुनते हैं और अपने विचार उन्हें बताते हैं। हम में मेल-मिलाप बढ़ता है और सहनशीलता की भावना पैदा होती है।

15. अच्छी नागरिकता (Good Citizenship) खेलों द्वारा खिलाड़ियों में एक अच्छे नागरिक के गुण पैदा होते हैं क्योंकि खिलाड़ी आपस में मिल कर खेलते हैं। नियमों, कर्त्तव्यों, अनुशासन में रहना आदि गुणों के कारण खिलाड़ी अच्छे नागरिक बन जाते हैं।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि खेलें व्यक्ति में सहयोग, भ्रातृत्व, नेतृत्व, समन्वय आदि सद्गुणों का विकास करती हैं और उसे अच्छे नागरिक बनने में सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 2.
स्पोर्ट्समैनशिप से क्या अभिप्राय है ? एक स्पोर्ट्समैन में कौन-कौन से गुण होने चाहिएं ?
(What do you understand by Sportsmanship ? What should be the qualities of a good Sportsman ?)
उत्तर-
स्पोर्ट्समैनशिप का अर्थ (Meaning of Sportsmanship)—जहां भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के अनेक शब्द अच्छी तरह से अपना लिए गए हैं, वहीं स्पोर्ट्समैनशिप और स्पोर्ट्समैन भी खेलों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण शब्द हैं। स्पोर्ट्समैनशिप (Sportsmanship) एक अच्छे खिलाड़ी की वह भावना या वह विशेषता है, या ऐसे कहें कि वह स्पिरिट है जिसके आधार पर कोई भी खिलाड़ी खेल के मैदान में आरम्भ से लेकर अन्त तक बड़ी योग्यता से भाग लेता है। स्पोर्ट्समैनिशप अच्छे गुणों का वह समूह है, जिनका होना एक खिलाड़ी के लिए जरूरी समझा जाता है। जैसे कि एक खिलाड़ी के लिए जरूरी है कि वह शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से भरपूर, अनुशासनबद्ध, अच्छा सहयोगी, चुस्त और अपनी टीम के कैप्टन की आज्ञा का पालन करने वाला हो। वास्तव में इस तरह के गुणों का समूह ही स्पोर्ट्समैनशिप कहलाता है।

स्पोट्र्समैनशिपया खिलाड़ी के गुण (Qualities of Sportsman) -एक स्पोर्ट्समैन या खिलाड़ी में निम्नलिखित गुणों का होना ज़रूरी है-

1. अनुशासन की भावना (Spirit of Discipline)-स्पोर्ट्समैन का सबसे बड़ा और मुख्य गुण है नियम से अनुशासन में बन्धकर कार्य करना। वास्तविक स्पोर्ट्समैन वही कहा जा सकता है जो खेल आदि के सारे नियमों का पालन बड़े अच्छे ढंग से करे और अनुशासनबद्ध हो ।

2. सहनशीलता (Tolerance)-सहनशीलता स्पोर्ट्समैनशिप के गुणों में एक बहत ही महत्त्वपूर्ण गुण है। खेल में कई प्रकार के अवसर आते हैं। अपनी विजय प्राप्त होने से बहुत प्रसन्नता होती है और पराजित हो जाने से उदासी के बादल घेर लेते हैं। परन्तु स्पोर्ट्समैन वही है, जो विजयी होने पर भी पराजित टीम या खिलाड़ी को प्रसन्नता से उत्साहित करे और स्वयं पराजित हो जाने पर भी विजयी को पूर्ण सम्मान के साथ बधाई दे।

3. सहयोग की भावना (Spirit of Co-operation)-स्पोर्ट्समैन में तीसरा गुण सहयोग की भावना का होना है। खेल के मैदान में यह सहयोग की भावना ही है जो टीम के विभिन्न खिलाड़ियों को इकट्ठे रखती है और वे एक होकर अपनी विजय के लिए संघर्ष करते हैं। दूसरे शब्दों में, स्पोर्ट्समैन अपने कोच, कैप्टन, खिलाड़ियों और विरोधी टीम के साथ सहयोग की भावना रखता है। ___4. विजय-पराजय को समान समझने की भावना (No Difference between Defeat or Victory) खेल में हर एक अच्छा खिलाड़ी विजय प्राप्त करने की अनथक चेष्टा करता है और उसके लिए प्रत्येक सम्भव ढंग प्रयुक्त करता है। परन्तु उसे स्पोर्ट्समैन तभी कहा जा सकता है जब वह केवल विजय के उद्देश्य के साथ न खेले बल्कि उसका उद्देश्य अच्छे खेल का प्रदर्शन करना हो। यदि इसी मध्य सफलता उसके पग चूमती है तो उसे पागल होकर विरोधी टीम या खिलाड़ी का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए और यदि उसे पराजय का सामना करना पड़ता है तो उसे उत्साहहीन नहीं होना चाहिए। वह खेल में विजयी होने पर भी पराजित खिलाड़ियों को हीन समझने की बजाये अपने समान समझता है।

खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप PSEB 9th Class Physical Education Notes 1
चित्र-स्पोर्ट्समैन विजयी होते हुए पराजित खिलाड़ियों को समान समझते हुए

5. आज्ञा देने और मानने की योग्यता (Ability of Obedience and Order)स्पोर्ट्समैन के लिए इस ज़रूरी है कि आज्ञा देने और आज्ञा मानने की योग्यता रखता हो। कई बार यह देखा गया है कि खिलाड़ी कुछ कारणों से आपे से बाहर होकर स्वयं को ठीक समझ कर खेल में अपने कैप्टन की आज्ञा का पालन नहीं करते और मनमानी करने लगते हैं। वे सच्चे अर्थों में स्पोर्ट्समैन नहीं होते हैं।

6. त्याग की भावना (Spirit of Sacrifice)-स्पोर्ट्समैन में त्याग की भावना बहुत ज़रूरी है। एक टीम में खिलाड़ी केवल अपने लिए नहीं खेलता बल्कि उसका मुख्य उद्देश्य समस्त टीम को विजय दिलाने का होता है। इससे प्रकट होता है कि खिलाड़ी निजी हित को त्याग देता है। बस यही स्पोर्ट्समैन का एक साथ महत्त्वपूर्ण गुण है। एक दूसरे पक्ष से भी एक स्पोर्ट्समैन अपने लिए तो खेलता ही है, साथ-साथ अपने स्कूल, प्रान्त, क्षेत्र और समस्त राष्ट्र के लिए भी वह अपनी विजय का श्रेय अपने राष्ट्र और अपने देश को देता है।

7. भ्रातृत्व की भावना (Spirit of Brotherhood) स्पोर्ट्समैन का यह गुण भी कोई कम महत्त्व नहीं रखता। एक स्पोर्ट्समैन खेल में जाति-पाति, धर्म, रंग, सभ्यता और संस्कृति आदि को एक ओर रखकर प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक जैसा ही व्यवहार करता

8. प्रतियोगिता की भावना (Spirit of Competition) एक अच्छे स्पोर्ट्समैन में प्रतियोगिता की भावना का होना भी आवश्यक है । इसी भावना से प्रेरित होकर वह खेल के मैदान में अन्य खिलाड़ियों से बाज़ी ले जाने के लिए ऐडी-चोटी का जोर लगा देता है। वास्तव में सारी प्रगति का रहस्य प्रतियोगिता की भावना में ही छुपा हुआ है, परन्तु यह हर प्रकार के द्वेष से मुक्त होनी चाहिए।

9. समय पर कार्य करने की भावना (Spirit of Punctuality) स्पोर्ट्समैन किसी भी खेल में समय का पूर्ण सम्मान करते हुए प्रत्येक अवसर का पूर्ण लाभ उठाता है।
खेल में एक-एक सैकिण्ड महत्त्वपूर्ण होता है। ज़रा-सी असावधानी विजय को पराजय में और सावधानी पराजय को विजय में परिवर्तित कर देती है।

10. चुस्त और फुर्तीले रहने की भावना (Spirit of Active and Alertness)स्पोर्ट्समैन प्रत्येक खेल में हर समय चुस्ती और फुर्तीलेपन से ही कार्य करता है। वह किसी भी अवसर को अपने हाथ से जाने नहीं देता।

PSEB 9th Class Physical Education Solutions Chapter 2 खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप

11. आत्म-विश्वास की भावना (Spirit of Self-Confidence)-वास्तव में आत्म-विश्वास स्पोर्ट्समैन का महत्त्वपूर्ण गुण है। बिना आत्म-विश्वास के खेलना सम्भव नहीं है। खेल में प्रत्येक खिलाड़ी को अपनी योग्यता पर विश्वास होता है और वह प्रत्येक कार्य बहुत धैर्य और विश्वास से करता है। 1974 में तेहरान में हुई सातवीं एशियाई खेलों में जापान का सबसे अधिक स्वर्ण, रजत तथा कांस्य पदक प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त करने का एकमात्र कारण जापानी खिलाड़ियों का आत्म-विश्वास था। 1978 में बैंकाक में एशियाई खेलों में जापानियों ने पहला स्थान ही प्राप्त किया। इसी प्रकार ही जापान ने 1982 की नौवीं एशियाई खेलों में, जो दिल्ली में हुई थीं, प्रथम स्थान प्राप्त

किया और अपने आत्म-विश्वास को स्थिर रखा है। स्पोर्ट्समैन सदैव प्रसन्न, सन्तुष्ट, शान्त और स्वस्थ दिखाई देता है जिससे उसका आत्म-विश्वास प्रकट होता है।

12. उत्तरदायित्व की भावना (Spirit of Responsibility)-स्पोर्ट्समैन के लिए यह ज़रूरी है कि उसमें उत्तरदायित्व की भावना हो। खिलाड़ी को कभी गैर-उत्तरदायित्व से या लापरवाही से काम नहीं करना चाहिए। उसकी ज़रा-सी एक गलती से टीम हार सकती है। इसलिए खिलाड़ी को उत्तरदायित्व को सम्मुख रखकर खेलना चाहिए।

13. नये नियमों की जानकारी (Knowledge of New Rules)-स्पोर्ट्समैन को नये-नये नियमों की जानकारी होनी चाहिए। हर वर्ष खेलों के लिए नए कानून और नियम बनाए जाते हैं। स्पोर्ट्समैन को इनकी जानकारी होनी आवश्यक है।
संक्षेप में, हम यह कह सकते हैं कि स्पोर्ट्समैन एक इकाई नहीं, अपितु कई अच्छे तत्त्वों से मिलकर बना एक गुलदस्ता है तथा एक स्पोर्ट्समैन में अनुशासन, सहनशीलता, आत्म-विश्वास, त्याग, सहयोग आदि के गुणों का होना अत्यावश्यक है।

खेलों के गुण तथा स्पोर्ट्समैनशिप PSEB 9th Class Physical Education Notes

  • खेलों के गुण-शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास, सहयोग की भावना और सहनशीलता खेलों द्वारा हमें मिलती है।
  • स्पोर्ट्समैनशिप–यह उन सभी अच्छे गुणों का सुमेल है जिसका खिलाड़ी में होना आवश्यक माना जाता है।
  • खिलाड़ी में अनुशासन की भावना, स्वस्थ और मानसिक रूप में प्रफुल्लित, अच्छा सहयोगी और चुस्ती आदि गुण उसमें विराजमान होने चाहिए।
  • स्पोर्ट्समैन एक दूत-स्पोर्ट्समैन अन्तर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में अपने देश का प्रतिनिधित्व करता है और विदेश में ऐसा कोई काम नहीं करता जिससे अपने देश का नुकसान हो।
  • स्पोर्ट्समैन का व्यवहार–प्रत्येक टीम को एक जैसा समझता है और अपनी पराजय को शान से स्वीकार करता है।
  • खेलों से लाभ-शरीर स्वस्थ रहता है और रोगों से छुटकारा मिलता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

Punjab State Board PSEB 9th Class Home Science Book Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Home Science Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

PSEB 9th Class Home Science Guide भोजन के कार्य और पोषण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भोजन से आप क्या समझते हो ?
उत्तर-
शरीर को नीरोग तथा स्वस्थ रखने वाला कोई भी ठोस, तरल अथवा अर्द्ध-ठोस पदार्थ जिसको शरीर द्वारा निगला, पचाया तथा शोषित किया जाता है, को भोजन कहते हैं।

प्रश्न 2.
पौष्टिक तत्त्वों से आप क्या समझते हो ?
उत्तर-
शरीर की वृद्धि के लिए, ऊर्जा प्रदान करने के लिए तथा शरीर में चलती रासायनिक क्रियाओं को नियन्त्रण में रखने के लिए तथा शरीर के हर सैल की बनावट, रचना के लिए जिन तत्त्वों की ज़रूरत होती है, को पौष्टिक तत्त्व कहते हैं।

प्रश्न 3.
भोजन में कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व होते हैं ?
उत्तर-
भोजन में पानी, प्रोटीन, चर्बी, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन तथा खनिज आदि पौष्टिक तत्त्व होते हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

प्रश्न 4.
हड्डियों में कौन-से खनिज पदार्थ अधिक होते हैं ?
उत्तर-
हड्डियों में कैल्शियम तथा फॉस्फोरस खनिज पदार्थ होते हैं। दूध, राजमांह, मेथी, मछली आदि में इनकी काफ़ी मात्रा होती है।

प्रश्न 5.
विटामिन को रक्षक तत्त्व क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
एन्जाइम शारीरिक तापमान पर ही जोड़-तोड़ क्रियाएं करवाते हैं। इन एन्जाइमों के संश्लेषण तथा क्रियाशीलता के लिए विटामिन तथा खनिज पदार्थ आवश्यक होते हैं। यह बीमारियों से भी शरीर को बचाते हैं। इसलिए विटामिन को रक्षक तत्त्व कहा जाता है।

प्रश्न 6.
शरीर में कितने प्रतिशत खनिज पदार्थ होते हैं ?
उत्तर-
शरीर में 4% खनिज पदार्थ होते हैं। यह हैं-कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटाशियम, सोडियम, क्लोरीन, आयोडीन, सल्फर, तांबा, जिंक, कोबाल्ट, मैंग्नीज़, लोहा तथा मोलिब्डेनम आदि।

प्रश्न 7.
भोजन की ऊर्जा कैसे मापी जाती है ?
उत्तर-
शरीर को कई काम करने पड़ते हैं जैसे-खाने का पाचन, दिल का धड़कना, सांस लेना, दिमाग का हर समय काम करना, भागना-दौड़ना आदि। इन सभी कामों के लिए शरीर को ऊर्जा की ज़रूरत होती है। यह ऊर्जा भोजन से प्राप्त होती है।
ऊर्जा को किलो कैलोरी में मापा जाता है परन्तु पोषण विज्ञान में इसे कैलोरी ही कहा जाता है।

प्रश्न 8.
1 ग्राम प्रोटीन तथा 1 ग्राम वसा में कितनी कैलोरी होती है ?
उत्तर-
एक किलोग्राम पानी के तापमान में एक डिग्री सैल्सियस की वृद्धि करने के लिए जितने ताप की ज़रूरत होती है, उसे कैलोरी कहा जाता है।
एक ग्राम चर्बी में 9 कैलोरी तथा एक ग्राम प्रोटीन में 4 कैलोरी ऊर्जा होती है।

प्रश्न 9.
भोजन का शरीर में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन-सा है ?
उत्तर-
भोजन के कार्य हैं-शरीर को ऊर्जा प्रदान करना, शरीर की वृद्धि तथा टूटेफूटे तन्तुओं की मरम्मत, शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण, रोगों से बचाव, तापमान सन्तुलित रखना आदि। __ शरीर को ऊर्जा प्रदान करना भोजन का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है। वास्तव में अन्य सभी कार्य ऊर्जा के कारण ही होते हैं।

प्रश्न 10.
भोजन का मनोवैज्ञानिक कार्य कौन-सा है ?
उत्तर-
अच्छे भोजन से मानसिक सन्तुष्टि मिलती है। जब मन खुश हो तो भोजन अच्छा लगता है तथा खाने को भी मन करता है तथा जब कोई चिन्ता हो तो वही भोजन बुरा लगता है। कई बार बच्चे को अच्छा काम करने जैसे अच्छे नम्बर आदि प्राप्त किये हों तो इनाम के रूप में आइसक्रीम अथवा पेस्ट्री आदि दी जाती है। इससे बच्चे को मानसिक सन्तुष्टि तथा खुशी प्राप्त होती है तथा इसी तरह दण्ड के रूप में इन चीजों की मनाही की जाती है। इस तरह भोजन मानसिक स्वास्थ्य ठीक रखने का कार्य भी करता है।

प्रश्न 11.
भोजन का सामाजिक महत्त्व क्या है ?
उत्तर-
भोजन का सामाजिक महत्त्व-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते हुए वह अपने सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश करता है। इन सम्बन्धों को स्थापित करने के लिए भोजन भी एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसको अनेकों खुशी के मौकों पर परोसा जाता है तथा इसके अतिरिक्त किसी को घर पर बुलाना जैसे किसी नए पड़ोसी अथवा नव-विवाहित जोड़े को खाने पर बुलाकर उनसे मेल-जोल बढ़ाया जाता है। संयुक्त भोजन एक ऐसा वातावरण बना देता है जिसमें सभी आपसी भेदभाव भुलाकर इकट्ठे बैठते हैं। धार्मिक उत्सवों पर लंगर अथवा प्रसाद देने की प्रथा (रीति) भी भाइचारे की भावना पैदा करती है। इसी तरह किसी व्यक्ति को स्वागत का अनुभव करवाने के लिए अथवा रुखस्त करते समय भी उसे बढ़िया भोजन द्वारा सम्मानित किया जाता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

प्रश्न 12.
शारीरिक रूप में स्वस्थ व्यक्ति की क्या पहचान है ?
उत्तर-
शारीरिक रूप में स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जिसका –

  1. सुडौल शरीर होता है।
  2. भार आयु तथा कद के अनुसार होता है।
  3. वृद्धि पूर्ण होती है।
  4. चमड़ी साफ़ तथा आंखें चमकदार होती हैं।
  5. सांस में से बदबू नहीं आती।
  6. बाल चमकदार तथा बढ़िया बनावट वाले होते हैं।
  7. शरीर के सभी अंग ठीक काम करते हैं।
  8. भूख तथा नींद भी ठीक होती है।

प्रश्न 13.
रेशे (फोक) का हमारे शरीर में क्या कार्य है ?
उत्तर-
रेशे के कार्य –
रेशे शरीर से मल को बाहर निकालने में मदद करते हैं।

प्रश्न 14.
भोजन के कार्य के अनुसार भोजन का वर्गीकरण कैसे करोगे ?
उत्तर-
कार्य के अनुसार भोजन का वर्गीकरण-शरीर में कार्य के अनुसार भोजन को तीन मुख्य समूहों में बांटा गया है –

  1. ऊर्जा देने वाला भोजन-इसमें कार्बोहाइड्रेट्स तथा चर्बी पौष्टिक तत्त्व होते हैं।
  2. शरीर की बनावट के लिए भोजन-इसमें प्रोटीन होते हैं।
  3. रक्षक भोजन-इसमें खनिज पदार्थ तथा विटामिन होते हैं।

प्रश्न 15.
ऐसे दो भोजन पदार्थों के नाम बताओ जिनमें प्रोटीन अधिक होती है ?
उत्तर-
सोयाबीन, मांह साबुत, बकरे का मांस, पनीर, बादाम, मूंग, मसर, खोया, मछली आदि में अधिक मात्रा में प्रोटीन होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 16.
भोजन, पौष्टिक तत्त्व और पोषण विज्ञान के बारे बताओ।
उत्तर-
भोजन-भोजन मनुष्य की प्राथमिक ज़रूरतों में सबसे महत्त्वपूर्ण ज़रूरत है। वह पदार्थ जिन्हें खाने से शरीर को ऊर्जा तथा शक्ति मिलती है, उन्हें भोजन कहा जाता है। यह पदार्थ ठोस, अर्द्ध-ठोस तथा तरल रूप में भी हो सकते हैं। भोजन जीवित प्राणियों के शरीर के लिए ईंधन (Fuel) का कार्य करता है। भोजन ऊर्जा तथा शक्ति प्रदान करने के साथ-साथ शरीर की वृद्धि में भी सहायक होता है। इससे ही खून का निर्माण होता है। इसलिए मनुष्य का भोजन ऐसा होना चाहिए जिसमें शरीर की तंदरुस्ती के लिए सभी अनिवार्य तत्त्व मौजूद हों।

पौष्टिक तत्त्व-पौष्टिक तत्त्व भोजन का एक अंग हैं। यह विभिन्न रासायनिक तत्त्वों का मिश्रण होते हैं। इनकी शरीर को काफ़ी मात्रा में ज़रूरत होती है। यह रासायनिक तत्त्व हमारे शरीर में पाचन क्रिया में पाचन रसों द्वारा साधारण रूप में तबदील हो जाते हैं। यह तत्त्व पचने के पश्चात् आवश्यकतानुसार सभी अंगों में पहुंचकर उन्हें पोषण देते हैं।
निम्नलिखित विभिन्न पौष्टिक तत्त्व हैं –

  1. प्रोटीन (Protein)
  2. कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)
  3. चर्बी (Fats)
  4. विटामिन (Vitamins)
  5. खनिज लवण (Minerals)
  6. पानी (Water)
  7. रुक्षांश (Roughage)।

पोषण विज्ञान-पोषण विज्ञान से हमें पता चलता है कि पौष्टिक तत्त्व कौन-से भोजन पदार्थों से मिल सकते हैं तथा सामान्य मिलने वाले तथा सस्ते भोजन पदार्थों से इन्हें कैसे प्राप्त किया जा सकता है ताकि पौष्टिक तत्त्वों की कमी से होने वाली बीमारियों से बच जा सके।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

प्रश्न 17.
पोषण सम्बन्धी विज्ञान से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर-
पोषण विज्ञान हमें बताता है कि ठीक स्वास्थ्य के लिए कौन-से पौष्टिक तत्त्वों की शरीर को कितनी मात्रा में ज़रूरत है तथा कहां से प्राप्त होते हैं।

  1. कौन-से खाद्य पदार्थों से पौष्टिक तत्त्व प्राप्त किये जा सकते हैं।
  2. इनकी कमी से शरीर पर क्या बुरा प्रभाव होगा।
  3. इन तत्त्वों की लगभग तथा कितने अनुपात में शरीर को ज़रूरत है।
  4. इस ज्ञान के आधार पर भोजन सम्बन्धी अच्छी आदतें कैसे बनानी हैं।

प्रश्न 18.
शरीर की वृद्धि और विकास के लिए भोजन के किन पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
विभिन्न शारीरिक प्रक्रियाओं के संयोजन में पुराने तथा घिसे हुए तन्तु टूटते रहते हैं। टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत भोजन करता है। भोजन शरीर में नष्ट हुए तन्तुओं के स्थान पर नए तन्तु भी बनाता है। इस कार्य के लिए प्रोटीन, खनिज तथा पानी आवश्यक तत्त्व हैं। यह तत्त्व हमें दूध तथा दूध से बनी चीजें, मूंगफली, दालें, हरी सब्जियां, मांस, मछली आदि से प्राप्त होते हैं। मानवीय शरीर छोटी-छोटी कोशिकाओं का ही बना हुआ है। जैसे जैसे आयु बढ़ती है शरीर में नए तन्तु लगातार बनते रहते हैं जो शरीर की वृद्धि तथा विकास करते हैं। नए तन्तुओं के निर्माण के लिए भोजन पदार्थों की विशेष ज़रूरत होती है। इसलिए प्रोटीन युक्त भोजन पदार्थ आवश्यक होते हैं।

प्रश्न 19.
ऊर्जा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
शरीर को शक्ति तथा ऊर्जा प्रदान करना-जैसे मशीन को कार्य करने के लिए शक्ति की ज़रूरत है जो बिजली, कोयले अथवा पेट्रोल से प्राप्त की जाती है वैसे ही मानवीय शरीर को जीवित रहने तथा कार्य करने के लिए शक्ति की ज़रूरत पड़ती है जो भोजन से प्राप्त की जाती है। शरीर की विभिन्न प्रतिक्रियाओं के लिए शक्ति आवश्यक है जो भोजन ही प्रदान करता है। भोजन हमारे शरीर में ईंधन की तरह जल कर ऊर्जा पैदा करता है। पर यह शरीर की गर्मी को स्थिर रखता है ताकि शरीर का तापमान अधिक बड़े तथा घटे नहीं।

शरीर के लिए आवश्यक शक्ति का अधिकतर भाग कार्बोज़ तथा चर्बी वाले भोजन पदार्थों से प्राप्त होता है। कार्बोहाइड्रेट हमें स्टार्च, शर्करा तथा सैलूलोज़ से प्राप्त होते हैं। वनस्पति, मक्खन, घी, तेल, मेवे तथा चर्बी युक्त खाने वाले पदार्थ ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं। प्रोटीन से भी ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। पर यह बहुत महंगा स्रोत होता है। ऊर्जा को कैलोरी में मापा जाता है। विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों से प्राप्त कैलोरी की मात्रा इस तरह है –

(i) 1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट – 4 कैलोरी
(ii) 1 ग्राम चर्बी – 9 कैलोरी
(iii) 1 ग्राम प्रोटीन – 4 कैलोरी

विभिन्न कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए ऊर्जा की ज़रूरत अलग-अलग होती है। जैसे कि मानसिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की ऊर्जा की ज़रूरत एक शारीरिक कार्य करने वाले व्यक्ति की ऊर्जा से कम होती है। इसी तरह विभिन्न शारीरिक दशाओं में भी ऊर्जा की ज़रूरत बदल जाती है। जैसे कि बच्चा पैदा करने वाली औरत अथवा दूध पिलाने वाली मां को अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है।

प्रश्न 20.
भोजन के शारीरिक कार्य कौन-से हैं ? किसी दो के बारे लिखें।
उत्तर-
भोजन के कार्य हैं-शरीर को ऊर्जा प्रदान करना, शरीर की वृद्धि तथा टूटेफूटे तन्तुओं की मरम्मत, शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण, रोगों से बचाव, तापमान सन्तुलित रखना आदि।

(i) शरीर को नीरोग रखना-भोजन शरीर को शक्ति प्रदान करता है तथा यह शक्ति मनुष्य को रोगों से संघर्ष करने के योग्य बनाती है। भोजन में कई पदार्थ कच्चे ही खाए जाते हैं। इनमें ऐसे पौष्टिक तत्त्व होते हैं जो शरीर की रक्षा करते हैं। इन्हें सुरक्षात्मक भोजन तत्त्व कहा जाता है। यह तत्त्व विशेषकर खनिज, लवण तथा विटामिनों से प्राप्त होते हैं। यदि भोजन में इनमें से एक अथवा एक से अधिक तत्त्वों की कमी हो जाये तो स्वास्थ्य खराब हो जाता है तथा शरीर बीमारी का शिकार हो जाता है। यह तत्त्व फल, सब्जियां, दूध, मांस, कलेजी तथा मछली से प्राप्त होता है।

(ii) शारीरिक प्रक्रियाओं को नियमित करना-बढ़िया भोजन अच्छी सेहत के लिए बहुत आवश्यक है। शरीर की आन्तरिक क्रियाएं जैसे रक्त प्रवाह, श्वास क्रिया, पाचन शक्ति, शरीर के तापमान को स्थिर रखना आदि को नियमित रखने के लिए भोजन की ज़रूरत होती है। यदि यह आन्तरिक क्रियाएं नियमित न रहें तो हमारा शरीर अनेकों रोगों से पीड़ित हो सकता है। कार्बोज़ के अतिरिक्त अनेकों पौष्टिक तत्त्व मिलकर शारीरिक प्रक्रियाओं को नियमित करते हैं।
चर्बी युक्त पदार्थों में आवश्यक चर्बी अम्ल (Fatty acid), प्रोटीन, विटामिन, खनिज तथा पानी आदि यह कार्य करते हैं।

प्रश्न 21.
भोजन शारीरिक कार्य के अतिरिक्त हमारे शरीर में अन्य कौन-कौन से कार्य करता है ?
उत्तर-
मनोवैज्ञानिक कार्य-शारीरिक कार्यों के अतिरिक्त भोजन मनोवैज्ञानिक कार्य भी करता है। इसके द्वारा कई भावनात्मक ज़रूरतों की पूर्ति होती है। भोजन के पौष्टिक होने के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि वह पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान करे। इसके अतिरिक्त घर में जब गृहिणी परिवार अथवा मेहमानों को बढ़िया भोजन परोसती है तो परिणामस्वरूप वह उसकी प्रशंसा करते हैं तथा गृहिणी को प्रशंसा से आनन्द प्राप्त होता है जो उसके मानसिक विकास के लिए बहुत आवश्यक है।

सामाजिक तथा धार्मिक कार्य-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते हुए वह अपने सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश करता है। इन सम्बन्धों को स्थापित करने के लिए भोजन भी एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसको अनेकों खुशी के अवसरों पर परोसा जाता है तथा इसके अतिरिक्त किसी को घर पर बुलाना जैसे किसी नए पड़ोसी अथवा नवविवाहित जोड़े को खाने पर बुलाकर उनसे मेल-जोल बढ़ाया जाता है। धार्मिक उत्सवों पर लंगर अथवा प्रसाद देने की प्रथा (रीति) भी भाईचारे की भावना पैदा करती है। इसी तरह किसी व्यक्ति को स्वागत का अनुभव करवाने के लिए अथवा रुखस्त करते समय भी उसे बढ़िया भोजन द्वारा सम्मानित किया जाता है। संयुक्त भोजन एक ऐसा वातावरण बना देता है जिसमें सभी आपसी भेदभाव भुला कर इकट्ठे बैठते हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 22.
हमारे शरीर के लिए कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व आवश्यक हैं ? जल और रेशे हमारे शरीर में क्या कार्य करते हैं ? ।
उत्तर-
निम्नलिखित विभिन्न पौष्टिक तत्त्व आवश्यक हैं –

  1. प्रोटीन (Protein)
  2. कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)
  3. चर्बी (Fats)
  4. विटामिन (Vitamins)
  5. खनिज लवण (Minerals)
  6. पानी (Water)
  7. रुक्षांश (Roughage)|

पानी-पानी में कोई कैलोरी नहीं होती पर शरीर की लगभग सभी प्रक्रियाओं में पानी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पानी के बिना हम थोड़े दिन भी जीवित नहीं रह सकते। यह शरीर के सभी तरल पदार्थों में होता है। रक्त में 90% पानी होता है। पाचक रसों में भी काफ़ी मात्रा पानी की ही होती है। इस तरह पानी विभिन्न पदार्थों को शरीर में एक से दूसरे स्थान पर ले जाने में सहायक है जैसे कि हार्मोन्ज़ भोजन के पाचन के पश्चात् पदार्थ तथा बाहर निकलने वाले पदार्थों को एक से दूसरे स्थान पर ले जाना आदि। पानी शरीर की बनावट तथा शरीर का तापमान नियमित रखने में भी आवश्यक है।

पानी को हम पानी के रूप अथवा पेय पदार्थ अथवा अन्य भोजन पदार्थों द्वारा प्राप्त करते हैं।

रुक्षांश-रुक्षांश भोजन का ऐसा हिस्सा है जो हमारी पाचन प्रणाली में पचाया नहीं जा सकता। यह पौधों से मिलने वाले भोजन पदार्थ जैसे फल, सब्जियां तथा अनाजों में होता है। यह शरीर में से मल को बाहर निकालने में सहायता करता है।

प्रश्न 23.
भोजन हमारे शरीर में क्या-क्या कार्य करता है ?
उत्तर-
भोजन के कार्य हैं-शरीर को ऊर्जा प्रदान करना, शरीर की वृद्धि तथा टूटेफूटे तन्तुओं की मरम्मत, शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण, रोगों से बचाव, तापमान सन्तुलित रखना आदि।

1. शरीर को नीरोग रखना-भोजन शरीर को शक्ति प्रदान करता है तथा यह शक्ति मनुष्य को रोगों से संघर्ष करने के योग्य बनाती है। भोजन में कई पदार्थ कच्चे ही खाए जाते हैं। इनमें ऐसे पौष्टिक तत्त्व होते हैं जो शरीर की रक्षा करते हैं। इन्हें सुरक्षात्मक भोजन तत्त्व कहा जाता है। यह तत्त्व विशेषकर खनिज, लवण तथा विटामिनों से प्राप्त होते हैं। यदि भोजन में इनमें से एक अथवा एक से अधिक तत्त्वों की कमी हो जाये तो स्वास्थ्य खराब हो जाता है तथा शरीर बीमारी का शिकार हो जाता है। यह तत्त्व फल, सब्जियां, दूध, मांस, कलेजी तथा मछली से प्राप्त होता है।

2. शारीरिक क्रियाओं को नियमित करना-बढ़िया भोजन अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। शरीर की आन्तरिक क्रियाएं जैसे रक्त प्रवाह, श्वास क्रिया, पाचन शक्ति, शरीर के तापमान को स्थिर रखना आदि को नियमित रखने के लिए भोजन की ज़रूरत होती है। यदि यह आन्तरिक क्रियाएं नियमित न रहें तो हमारा शरीर अनेकों रोगों से पीड़ित हो सकता है। कार्बोज़ के अतिरिक्त अनेकों पौष्टिक तत्त्व मिलकर शारीरिक प्रक्रियाओं को नियमित करते हैं।
चर्बी युक्त पदार्थों में आवश्यक चर्बी अम्ल (Fatty acid), प्रोटीन, विटामिन, खनिज तथा पानी आदि यह कार्य करते हैं।

3. शारीरिक कोशिकाओं का निर्माण करना तथा तन्तुओं की मरम्मत-करना विभिन्न शारीरिक प्रक्रियाओं के संयोजन में पुराने तथा घिसे हुए तन्तु टूटते रहते हैं। टूटीफूटी कोशिकाओं की मरम्मत भोजन करता है। भोजन शरीर में नष्ट हुए तन्तुओं के स्थान पर नए तन्तु भी बनाता है। इस कार्य के लिए प्रोटीन, खनिज तथा पानी आवश्यक तत्त्व हैं। यह तत्त्व हमें दूध से बनी चीज़ों, मूंगफली, दालें, हरी सब्जियों, मांस, मछली आदि से प्राप्त होते हैं। मानवीय शरीर छोटी-छोटी कोशिकाओं का ही बना हुआ है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है शरीर में नए तन्तु लगातार बनते रहते हैं जो शरीर की वृद्धि तथा विकास करते हैं। नए तन्तुओं के निर्माण के लिए भोजन पदार्थों की विशेष ज़रूरत होती है। इसलिए प्रोटीन युक्त भोजन पदार्थ आवश्यक होते हैं।

4. शरीर को शक्ति तथा ऊर्जा प्रदान करना-जैसे मशीन को कार्य करने के लिए शक्ति की ज़रूरत है जो बिजली, कोयले अथवा पेटोल से प्राप्त की जाती है वैसे ही मानवीय शरीर को जीवित रहने तथा कार्य करने के लिए शक्ति की ज़रूरत पड़ती है जो भोजन से प्राप्त की जाती है। शरीर की विभिन्न प्रतिक्रियाओं के लिए शक्ति आवश्यक है जो भोजन ही प्रदान करता है। भोजन हमारे शरीर में ईंधन की तरह जल कर ऊर्जा पैदा करता है। पर यह शरीर की गर्मी को स्थिर रखता है ताकि शरीर का तापमान अधिक बढ़े तथा घटे नहीं।

शरीर के लिए आवश्यक शक्ति का अधिकतर भाग कार्बोज़ तथा चर्बी वाले भोजन पदार्थों से प्राप्त होता है। कार्बोहाइड्रेट हमें स्टार्च, शर्करा, तथा सैलूलोज़ से प्राप्त होते हैं। वनस्पति, मक्खन, घी, तेल, मेवे तथा चर्बी युक्त खाने वाले पदार्थ ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं। प्रोटीन से भी ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। पर यह बहुत महंगा स्रोत होता है। ऊर्जा के ताप को कैलोरी में मापा जाता है। विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों से प्राप्त कैलोरी की मात्रा इस तरह है –

(i) 1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट – 4 कैलोरी
(ii) 1 ग्राम चर्बी – 9 कैलोरी
(iii) 1 ग्राम प्रोटीन – 4 कैलोरी।

विभिन्न कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए ऊर्जा की ज़रूरत अलग-अलग होती है। जैसे कि मानसिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की ऊर्जा की ज़रूरत एक शारीरिक कार्य करने वाले व्यक्ति की ऊर्जा से कम होती है। इसी तरह विभिन्न शारीरिक दशाओं में भी ऊर्जा की ज़रूरत बदल जाती है। जैसे कि बच्चा पैदा करने वाली औरत अथवा दूध पिलाने वाली मां को अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है।

5. शरीर का तापमान संतुलित करना-प्रत्येक मौसम में हमारे शरीर का तापमान नियमित रहता है। गर्मियों में हमें पसीना आता है। पसीना सूखने पर वाष्पीकरण से ठण्ड पैदा होती है जिससे शरीर का तापमान नियमित रहता है। विभिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न ढंगों से क्रिया करने का संकेत दिमाग से आता है जिसके लिये ऊर्जा की आवश्यकता होती है तथा यह ऊर्जा हमें भोजन से ही प्राप्त होती है। पानी शरीर का तापमान नियमित रखने के लिये अति महत्त्वपूर्ण है।

6. मनोवैज्ञानिक कार्य-शारीरिक कार्यों के अतिरिक्त भोजन मनोवैज्ञानिक कार्य भी करता है। इसके द्वारा कई भावनात्मक ज़रूरतों की पूर्ति होती है। भोजन के पौष्टिक होने के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि वह पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान करे। इसके अतिरिक्त घर में जब गृहिणी परिवार अथवा मेहमानों को बढ़िया भोजन परोसती है तो परिणामस्वरूप वह उसकी प्रशंसा करते हैं तथा गृहिणी को प्रशंसा से आनन्द प्राप्त होता है जो उसके आन्तरिक विकास के लिए बहुत आवश्यक है।

7. सामाजिक तथा धार्मिक कार्य-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते हुए वह अपने सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश करता है। इन सम्बन्धों को स्थापित करने के लिए भोजन भी एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसको अनेकों खुशी के अवसरों पर परोसा जाता है तथा इसके अतिरिक्त किसी को घर पर बुलाना जैसे किसी नए पड़ोसी अथवा नव-विवाहित जोड़े को खाने पर बुलाकर उनसे मेल-जोल बढ़ाया जाता है। धार्मिक उत्सवों पर लंगर अथवा प्रसाद देने की प्रथा (रीति) भी भाईचारे की भावना पैदा करती है। इसी तरह किसी व्यक्ति को स्वागत का अनुभव करवाने के लिए अथवा रुखस्त करते समय भी उसे बढ़िया भोजन द्वारा सम्मानित किया जाता है। संयुक्त भोजन एक ऐसा वातावरण बना देता है जिसमें सभी आपसी भेदभाव भुलाकर इकट्ठे बैठते हैं।

प्रश्न 24.
भोजन के शारीरिक कार्य क्या हैं ? और इनके लिए किन-किन पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता है ?
उत्तर-
भोजन के शारीरिक कार्य-

भोजन समूह पौष्टिक तत्त्व कार्य
1. ऊर्जा देने वाले भोजन

(i) अनाज तथा जड़ वाली सब्जियां।

(ii) शक्कर तथा गुड़, तेल, घी तथा मक्खन।

कार्बोहाइड्रेट तथा चर्बी ऊर्जा प्रदान करना
2. शरीर की बनावट तथा वृद्धि के लिए भोजन

(i) दूध तथा दूध से बने पदार्थ

(ii) मांस, मछली तथा अण्डे

(iii) दालें तथा

(iv) सूखे मेवे।

प्रोटीन शरीर की वृद्धि तथा टूटे फूटे तन्तुओं की मरम्मत करने के लिए
3. रक्षक भोजन

(i) पीले तथा संतरी रंग के फल

(ii) हरी सब्जियां

(iii) अन्य फल तथा सब्ज़ियां।

विटामिन तथा खनिज पदार्थ बीमारियों से शरीर की रक्षा करना तथा शारीरिक क्रियाओं को कण्ट्रोल करना।

Home Science Guide for Class 9 PSEB भोजन के कार्य और पोषण Important Questions and Answers

रिक्त स्थान भरें

  1. शरीर में ………………… प्रतिशत खनिज पदार्थ होते हैं।
  2. पानी शरीर के ……………. को नियमित करता है।
  3. ऊर्जा को ……………….. में मापा जाता है।
  4. रक्त में …………………. पानी होता है।
  5. राइबोफ्लेबिन ……………… में घुलनशील है।

उत्तर-

  1. 4%
  2. तापमान
  3. किलो कैलोरी
  4. 90%
  5. पानी।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
एक 65 किलोग्राम भार वाले पुरुष के शरीर में कितना प्रोटीन होता है ?
उत्तर-
11 किलोग्राम।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर में कितने प्रतिशत जल है ?
उत्तर-
70%

प्रश्न 3.
कार्बोज़ तथा वसा का क्या कार्य है ?
उत्तर-
ऊर्जा प्रदान करना।

प्रश्न 4.
वसा में घुलनशील एक विटामिन बताएं।
उत्तर-
विटामिन ए।

प्रश्न 5.
विटामिन तथा खनिज पदार्थों को कैसे तत्त्व कहा जाता है ?
उत्तर-
रक्षक तत्त्व।

ठीक/ग़लत बताएं

  1. हमारे शरीर में 70% पानी होता है।
  2. विटामिन बी (B) पानी में अघुलनशील है।
  3. दूध में प्रोटीन, विटामिन तथा कैल्शियम होता है।
  4. पानी से शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है।
  5. प्रोटीन शरीर की मुरम्मत करने के काम आता है।
  6. खनिज पदार्थ तथा विटामिन रक्षक भोजन है।

उत्तर-

  1. ठीक
  2. ग़लत
  3. ठीक
  4. ग़लत,
  5. ठीक
  6. ठीक।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वस्थ व्यक्ति के लिए ठीक तथ्य नहीं हैं –
(A) शरीर सुडौल होता है
(B) भूख तथा नींद कम होती है
(C) भार, आयु तथा लम्बाई अनुसार होता है
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(B) भूख तथा नींद कम होती है

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

प्रश्न 2.
ठीक तथ्य हैं –
(A) शरीर में 4% खनिज पदार्थ होते हैं
(B) एक ग्राम चर्बी में 9 कैलोरी ऊर्जा होती है
(C) सोयाबीन में अधिक प्रोटीन होता है
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(D) सभी ठीक।

प्रश्न 3.
शरीर में ………………….. तथा रक्त में ………………….. पानी होता है –
(A) 70%, 90%
(B) 90%, 70%
(C) 100%, 100%
(D) 70%, 20%.
उत्तर-
(D) 70%, 20%

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एस्कीमो आदि की मुख्य खुराक क्या है ?
उत्तर-
इनकी मुख्य खुराक मांस, मछली तथा अण्डा है।

प्रश्न 2.
यदि ठीक भोजन न खाया जाये तो इसका हमारे शरीर पर क्या प्रभाव होगा ?
उत्तर-
भोजन तथा स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध है। यदि ठीक भोजन न खाया जाये तो हमारे शरीर की रोगाणुओं से लड़ने की शक्ति में कमी आ जाती है जिस कारण हमें कोई भी बीमारी आसानी से हो सकती है। शरीर की कार्य करने की क्षमता भी कम हो जाती है।

प्रश्न 3.
दूध के पौष्टिक गुणों के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
दूध में प्रोटीन, विटामिन तथा कैल्शियम होता है जिस कारण इसमें पौष्टिक गुण होते हैं।

प्रश्न 4.
भोजन किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
जिस खाद्य पदार्थ को खाने से शरीर को ऊर्जा तथा शक्ति मिलती है, उसे भोज कहा जाता है।

प्रश्न 5.
पौष्टिक तत्त्व क्या हैं ?
उत्तर-
भोजन के रासायनिक तत्त्वों के मिश्रण को पौष्टिक तत्त्व कहा जाता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

प्रश्न 6.
कौन-से भोजन पदार्थों से शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है ?
उत्तर-
घी, तेल, मेवे, दालों तथा चर्बी युक्त पदार्थों से शरीर को ऊर्जा मिलती है।

प्रश्न 7.
शरीर के निर्माण के लिए कौन-से भोजन पदार्थ आवश्यक हैं ?
उत्तर-
दूध तथा दूध से बने पदार्थ, साबुत दालें, मांस, अण्डे आदि।

प्रश्न 8.
कौन-से भोजन पदार्थ शरीर को सुरक्षित रखते हैं ?
उत्तर-
फल, सब्जियां तथा पानी शरीर को सुरक्षित रखते हैं।

प्रश्न 9.
शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्त्वों के नाम लिखो।
उत्तर-
प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, चर्बी, विटामिन, खनिज पदार्थ, रुक्षांश तथा पानी आवश्य पौष्टिक तत्त्व हैं।

प्रश्न 10.
पोषण क्या होता है ?
उत्तर-
यह एक ऐसी परिस्थिति है जो शरीर को विकसित करती है तथा बनाये रखती है।

प्रश्न 11.
भोजन शरीर के लिए क्या कार्य करता है ?
उत्तर-

  1. शारीरिक क्रियाओं को चालू तथा नीरोग रखता है।
  2. मनोवैज्ञानिक कार्य।
  3. सामाजिक कार्य।

प्रश्न 12.
शरीर में ऊर्जा कैसे पैदा होती है ?
उत्तर-
शरीर में ऊर्जा कार्बन यौगिकों के ऑक्सीकरण से पैदा होती है।

प्रश्न 13.
कौन-से पौष्टिक तत्त्वों से ऊर्जा पैदा होती है ?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट्स, चर्बी तथा प्रोटीन से ऊर्जा पैदा होती है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

प्रश्न 14.
शरीर में कौन-से तत्त्व कम मात्रा में आवश्यक हैं ?
उत्तर-
कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक, विटामिन आदि शरीर को कम मात्रा में आवश्यक हैं।

प्रश्न 15.
एक 65 किलो के पुरुष के शरीर में पानी, प्रोटीन, कैल्शियम, तांबा तथ थाइयोमिन की कितनी मात्रा होती है ?
उत्तर-
पानी – 40 किलोग्राम
प्रोटीन – 11 किलोग्राम
कैल्शियम – 1200 ग्राम
तांबा – 100-150 मिलिग्राम
थाइयोमिन – 25 मिलिग्राम।

प्रश्न 16.
65 किलो के पुरुष के शरीर में चर्बी, लोहा, आयोडीन तथा विटामिन सी कितनी मात्रा में होते हैं ?
उत्तर-
चर्बी – 9 किलोग्राम
लोहा — 3-4 ग्राम
आयोडीन – 25-50 मिलिग्राम
विटामिन सी – 5 ग्राम।

प्रश्न 17.
हमारे शरीर में पानी की मात्रा कितनी होती है ?
उत्तर-
हमारे शरीर में पानी 70% होता है।

प्रश्न 18.
रक्त बनाने के लिए कौन-से तत्त्वों की ज़रूरत होती है ?
उत्तर-
रक्त बनाने के लिए लोहा तथा प्रोटीन की ज़रूरत होती है।

प्रश्न 19.
गर्मियों में शरीर का तापमान कैसे नियमित रहता है ?
उत्तर-
गर्मियों में पसीना आता है तथा पसीने के वाष्पीकरण से ठण्डक पैदा होती है। इससे शरीर का तापमान नियमित रहता है।

प्रश्न 20.
सर्दियों में शरीर का तापमान कैसे नियमित रहता है ?
उत्तर-
सर्दियों में शरीर द्वारा काफ़ी ऊर्जा पैदा की जाती है जिससे शरीर का तापमान नियमित रहता है।

प्रश्न 21.
मानसिक पक्ष से कौन-सा व्यक्ति ठीक होता है ?
उत्तर-
मानसिक पक्ष से वह व्यक्ति ठीक होता है जिसे –

  1. अपने गुणों तथा अवगुणों के बारे में पता हो।
  2. जो चिंता अथवा किसी प्रकार के तनाव से मुक्त हो।
  3. जो चौकस तथा फुर्तीला हो।
  4. जो समझदार तथा सीखने वाला हो।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

प्रश्न 22.
सामाजिक रूप में सन्तुष्ट व्यक्ति कौन होता है ?
उत्तर–
सामाजिक रूप में सन्तुष्ट व्यक्ति वह होता है –

  1. जो अपने इर्द-गिर्द के लोगों को साथ लेकर चलता है।
  2. जो अच्छे तौर तरीके तथा शिष्टाचार अपनाता है।
  3. जो दूसरों की मदद करने में खुशी महसूस करता है।
  4. जो समाज तथा परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेवारी समझता है।

प्रश्न 23.
विटामिन कितनी प्रकार के होते हैं, विस्तारपूर्वक लिखो।
उत्तर-
विटामिन दो तरह के होते हैं –
(i) पानी में घलनशील विटामिन ‘सी’ तथा ‘बी’ ग्रप के विटामिन जैसे कि थायामिन. राइबोफ्लेबिन, निकोटिनिक अम्ल, पिरडॉक्सिन, फौलिक अम्ल तथा विटामिन बी,, पानी में घुलनशील हैं।
(ii) चर्बी में घुलनशील विटामिन-विटामिन ‘ए’, ‘डी’ तथा ‘के’ चर्बी में घुलनशील हैं।

प्रश्न 24.
सबसे अधिक प्रोटीन, चर्बी, खनिज पदार्थ, कार्बोज़, कैल्शियम तथा लोहा, ऊर्जा कौन-से भोजन पदार्थों में होते हैं ?
उत्तर-
प्रोटीन – सोयाबीन (43.2 ग्राम)
चर्बी – मक्खन (81 ग्राम)
खनिज पदार्थ – सोयाबीन (4.6 ग्राम)
कार्बोज़ – गुड़ (95 ग्राम)
कैल्शियम – खोया (956 मिलिग्राम)
लोहा – सरसों (16.3 मिलिग्राम)
ऊर्जा – मक्खन (किलो कैलोरी)
यह मात्रा 100 ग्राम भोजन पदार्थ के लिए है।

प्रश्न 25.
पानी का शरीर में कार्य बतायें।
उत्तर–
पानी के कार्य –
(i) पानी विभिन्न पदार्थों को शरीर में एक से दूसरे स्थान पर ले जाने का कार्य करता है।
(ii) पानी शरीर के तापमान को नियमित करता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन के कार्य और पोषण

भोजन के कार्य और पोषण PSEB 9th Class Home Science Notes

  • सभी जीवित प्राणियों को भोजन की ज़रूरत होती है।
  • पोषण विज्ञान से हमें यह पता चलता है कि कौन-से भोजन पदार्थों में कौन-से पौष्टिक तत्त्व होते हैं।
  • शरीर में ऊर्जा कार्बन यौगिकों से पैदा होती है।
  • डण्डी को नीरोग तथा स्वस्थ रखने वाला कोई भी ठोस, तरल अथवा अर्द्ध-ठोस खाद्य पदार्थ जिसको शरीर द्वारा निगला, पचाया तथा शोषित किया जाता है, को भोजन कहते हैं।
  • भोजन के शारीरिक काम हैं-शरीर को ऊर्जा देना, शरीर की वृद्धि, टूटे-फूटे तन्तुओं की मुरम्मत, शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण, रोगों से बचाव, शरीर का तापमान नियमित करना आदि।
  • भोजन मनोवैज्ञानिक, सामाजिक तथा धार्मिक कार्य भी करता है।
  • पौष्टिक तत्त्व वह रासायनिक पदार्थ हैं जो हमें भोजन से मिलते हैं तथा शरीर की विभिन्न जोड़-तोड़ क्रियाओं के लिए ऊर्जा का साधन हैं तथा शरीर के सैलों की रचना तथा बनावट के लिए ज़रूरी हैं।
  • पौष्टिक तत्त्व हैं-प्रोटीन, चर्बी, खनिज पदार्थ, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा पानी।
  • पोषण विज्ञान में ऊर्जा को कैलोरी में मापा जाता है।
  • 1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा चर्बी में बारी-बारी 4,4 तथा 9 कैलोरी ऊर्जा होती है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
प्रजातन्त्र क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
(What is democracy ? Explain.)
उत्तर-
लोकतन्त्र का अर्थ (Meaning of Democracy)-आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। संसार के अधिकांश देशों में प्रजातन्त्र को अपनाया गया है। अधिकांश साम्यवादी देशों में साम्यवादी दल की तानाशाही समाप्त करके लोकतन्त्र की स्थापना की गई है। प्रजातन्त्र का अर्थ है वह शासन प्रणाली जिसमें राज्य की सत्ता प्रजा अर्थात् जनता के हाथ में हो। अरस्तु ने इसे बहुतन्त्र या शुद्ध जनतन्त्र (Polity) कहा है और इसे ही सर्वोत्तम शासन बताया है। यह ग्रीक भाषा के दो शब्दों डिमोज (Demos) और क्रेटिया (Cratia) से मिल कर बना है। डिमोज का अर्थ है ‘लोक’ और क्रेटिया का अर्थ है शक्ति या ‘सत्ता’। इसलिए डैमोक्रेसी का शाब्दिक अर्थ वह शासन है जिसमें शक्ति या सत्ता लोगों के हाथों में हो। दूसरे शब्दों में, प्रजातन्त्र सरकार का अर्थ है प्रजा का शासन।
लोकतन्त्र की मुख्य परिभाषाएं निम्नलिखित हैं-

  • प्रो० डायसी (Prof. Dicey) का कहना है कि, “प्रजातन्त्र ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें शासक वर्ग समाज का अधिकांश भाग हो।” (“Democracy is a form of government in which the governing body is comparatively a large fraction of the entire nation.”)
  • प्रो० सीले (Prof. Seeley) के विचारानुसार, “प्रजातन्त्र ऐसा शासन है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति भाग लेता है।” (“Democracy is a government in which everyone has a share.”)
  • ग्रीक लेखक हैरोडोटस (Herodotus) का कहना है कि, “प्रजातन्त्र ऐसा शासन है जिसमें सर्वोच्च सत्ता समस्त जाति को प्राप्त हो।” (“Democracy is that form of government in which the supreme power of the State is in the hands of the community as a whole.”)
  • प्रजातन्त्र की बहुत ही सरल, सुन्दर तथा लोकप्रिय परिभाषा अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन (Abraham Lincoln) ने इस प्रकार दी है कि, “प्रजातन्त्र जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा सरकार है।” (“Democracy is a government of the people, by the people and for the people.”)

उपर्युक्त परिभाषाओं के फलस्वरूप हम यह कह सकते हैं कि प्रजातन्त्र एक ऐसी सरकार को कहा जाता है जिसमें जनता को राजसत्ता का अन्तिम स्रोत समझा जाता है और जनता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या अपने प्रतिनिधियों द्वारा सरकार के कार्यों में भाग लेती हो, परन्तु श्री गुरमुख निहाल सिंह के शब्दों के अनुसार न तो जनता तथा न ही उसमें से अधिक संख्या शासन का संचालन कर सकती है और न ही उनमें शासन करने की योग्यता और निपुणता होती है। जिस बात की जनता से प्रजातन्त्र में मांग की जाती है वह है योग्य प्रतिनिधियों का चुनाव करना, शासन तथा प्रबन्ध की नीतियों सम्बन्धी उचित और अनुचित का निर्णय करना-शासन तथा उसके चलाने के लिए अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के कार्यों के सम्बन्ध में सावधान रहना आदि।

प्रजातन्त्र की विशेषताएं (Characteristics of Democracy)-प्रजातन्त्र की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  • जनता की प्रभुसत्ता-प्रजातन्त्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और जनता ही शक्ति का स्रोत होती है।
  • जनता का शासन-प्रजातन्त्र में शासन जनता द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर चलाया जाता है। प्रजातन्त्र में प्रत्येक निर्णय बहुमत से लिया जाता है।
  • जनता का हित-प्रजातन्त्र में शासन जनता के हित के लिए चलाया जाता है।
  • समानता-समानता प्रजातन्त्र का मूल आधार है। प्रजातन्त्र में प्रत्येक मनुष्य को समान समझा जाता है। जन्म, जाति, शिक्षा, धन आदि के आधार पर मनुष्यों में भेद-भाव नहीं किया जाता। सभी मनुष्यों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। कानून के सामने सभी व्यक्ति समान होते हैं।
  • शासन में भाग लेने का अधिकार-प्रजातन्त्र में प्रत्येक नागरिक को शासन में भाग लेने का अधिकार प्राप्त होता है।
  • स्वतन्त्रता-सभी नागरिकों को स्वतन्त्रता के अधिकार प्राप्त होते हैं। प्रत्येक नागरिक को वोट देने का अधिकार, चुने जाने का अधिकार, सरकार की आलोचना करने का अधिकार, अपने विचार प्रकट करने का अधिकार इत्यादि प्राप्त होते हैं।
  • कानून के समक्ष समानता-प्रजातन्त्र में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होता। कानून के सामने सभी व्यक्ति समान होते हैं।
  • सरकार की आलोचना करने का अधिकार-प्रजातन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को सरकार की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त होता है।
  • मौलिक अधिकार-प्रजातन्त्र में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं जिनकी रक्षा न्यायाधीशों द्वारा की जाती है।
  • स्वतन्त्र न्यायपालिका-प्रजातन्त्र में स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है ताकि लोगों के अधिकारों की रक्षा की जा सके और सरकार को तानाशाही बनने से रोका जा सके।
  • राजनीतिक दल-बिना राजनीतिक दलों के प्रजातन्त्र को सफल नहीं बनाया जा सकता। लोकतन्त्र का आधार जनमत होता है और राजनीतिक दल जनमत को संगठित करते हैं। जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है वह दल शासन चलाता है और अन्य दल विरोधी दल के रूप में कार्य करते हैं।
  • धर्म-निरपेक्षता-प्रजातन्त्रीय राज्य का धर्म-निरपेक्ष होना आवश्यक है जिसमें किसी विशेष धर्म को विशेष स्थिति प्राप्त नहीं होनी चाहिए तथा सभी धर्मों के लोगों को पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए।
  • वयस्क मताधिकार-प्रजातन्त्रीय सरकार में वयस्क मताधिकार लागू किया जाता है। प्रजातन्त्र में मताधिकार प्राप्त करते समय जन्म, जाति, रंग, नसल, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र के गुणों और दोषों की व्याख्या करें। (Discuss the merits and demerits of democracy.)
उत्तर-
प्रजातन्त्र के गुण (Merits of Democracy)-
प्रजातन्त्र में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं
1. यह सर्वसाधारण के हितों की रक्षा करता है (It Safeguards the Interest of the Common Man)प्रजातन्त्र की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें राज्य के किसी विशेष वर्ग के हितों की रक्षा न करके समस्त जनता के हितों की रक्षा की जाती है। प्रजातन्त्र में शासक सत्ता को एक अमानत मानते हैं और उसका प्रयोग सार्वजनिक कल्याण के लिए किया जाता है। इसीलिए अब्राहम लिंकन ने कहा था, प्रजातन्त्र जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा सरकार है।

2. यह जनमत पर आधारित है (It is based on Public Opinion)—प्रजातन्त्र शासन जनमत पर आधारित है अर्थात् शासन जनता की इच्छानुसार चलाया जाता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को निश्चित अवधि के लिए चुनकर भेजती है। यदि प्रतिनिधि जनता की इच्छानुसार शासन नहीं चलाते तो उन्हें दोबारा नहीं चुना जाता है। इस शासन प्रणाली में सरकार जनता की इच्छाओं की ओर विशेष ध्यान देती है।

3. यह समानता के सिद्धान्त पर आधारित है (It is based on the Principal of Equality)—प्रजातन्त्र में सभी नागरिकों को समान माना जाता है। किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म, लिंग के आधार पर कोई विशेष अधिकार नहीं दिए जाते। प्रत्येक वयस्क को बिना भेदभाव के मतदान, चुनाव लड़ने तथा सार्वजनिक पद प्राप्त करने का समान अधिकार प्राप्त होता है। सभी मनुष्यों को कानून के सामने समान माना जाता था।

4. यह स्वतन्त्रता तथा बन्धुता पर आधारित है (It is based on Liberty and Fraternity)—प्रजातन्त्र सरकार में नागरिकों को जितनी स्वतन्त्रता प्राप्त होती है उतनी अन्य किसी सरकार से प्राप्त नहीं होती। नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए जाते हैं ताकि नागरिक अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें। चूंकि प्रजातन्त्र में स्वतन्त्रता तथा समानता का वातावरण होता है, इसलिए नागरिकों में बन्धुता की भावना उत्पन्न होती है। एक नागरिक दूसरे को भाई समझता है और वे परस्पर सहयोग से कार्य करते हैं।

5. स्थायी तथा उत्तरदायी शासन (Stable and Responsible Government)—प्रजातन्त्र में शासन जनमत पर आधारित होता है। इसलिए शासन में शीघ्रता से परिवर्तन नहीं आ पाता है। स्थायी शासन के साथ-साथ सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। सरकार सदा जनमत के अनुसार कार्य करती है। सरकार जनता की नौकर होती है और जिस तरह नौकर का कर्त्तव्य अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना होता है, उसी तरह प्रजातन्त्र में शासकों का कर्तव्य जनता की इच्छाओं की पूर्ति करना होता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

6. दृढ़ तथा कुशल शासन-व्यवस्था (Strong and Efficient Government)—प्रजातन्त्र में शासन दृढ़ तथा कुशल होता है। प्रजातन्त्र में शासकों को जनता का समर्थन प्राप्त होता है, जिस कारण वे अपने निर्णयों को दृढ़ता से लागू करते हैं। शासकों पर जनता का नियन्त्रण होता है और वे अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इससे शासक अधिक कुशलता से कार्य करते हैं।

7. जनता को राजनीतिक शिक्षा मिलती है (People get Political Education)-प्रजातन्त्र में नागरिकों को अन्य शासन प्रणालियों की अपेक्षा अधिक राजनीतिक शिक्षा मिलती है। प्रजातन्त्र में चुनावों में प्रत्येक राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार करते हैं और अपनी नीतियों की घोषणा करते हैं। देश की समस्याओं को जनता के सामने रखा जाता है और प्रत्येक राजनीतिक दल इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने सुझाव जनता के सामने पेश करते हैं। जनता को इस तरह राजनीतिक शिक्षा मिलती है और साधारण नागरिक भी शासन में रुचि लेने लगता है।

8. क्रान्ति का डर नहीं (No fear of Revolution)—प्रजातन्त्र में क्रान्ति की सम्भावना बहुत कम होती है। प्रजातन्त्र में सरकार जनता की इच्छानुसार कार्य करती है। वास्तव में जनता ही शासन नीतियों को निर्धारित करती है। यदि सरकार जनता की इच्छाओं के अनुसार शासन न चलाए तो जनता सरकार को बदल सकती है। इससे क्रान्ति की सम्भावना नहीं रहती है।

9. यह देशभक्ति या राष्ट्रीय एकता की भावना में वृद्धि करता है (It promotes the spirit of patriotism and national unity)-प्रजातन्त्र जनता में देश भक्ति तथा राष्ट्रीय एकता की भावना उत्पन्न करती है। प्रजातन्त्र में जनता यह समझती है कि यह सरकार उनकी अपनी है, इसलिए उन्हें इसको पूरा सहयोग देना चाहिए। जनता राष्ट्र को अपना राष्ट्र समझती है और देश की रक्षा के लिए बड़े-से-बड़ा बलिदान करने को तैयार रहती है।
प्रजातन्त्र में सभी नागरिकों को समान अधिकार तथा स्वतन्त्रताएं प्राप्त होती हैं। सभी नागरिकों को शासन में भाग लेने का पूरा अवसर दिया जाता है इससे नागरिकों में बन्धुता की भावना उत्पन्न होती है जिससे राष्ट्रीय एकता का विकास होता है।

10. यह राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करता है (It builds National Character)-जे० एस० मिल के मतानुसार प्रजातन्त्र की मुख्य विशेषता जनता के चरित्र को सुन्दर तथा स्वच्छ बनाना है। प्रजातन्त्र जनता का अपना शासन होता है जिससे मनुष्यों में आत्मनिर्भरता, निर्भीकता तथा स्वावलम्बन के गुणों को बढ़ावा मिलता है। स्वतन्त्रता तथा स्वशासन से न केवल मनुष्य का चरित्र-निर्माण होता है बल्कि इससे राष्ट्रीय चरित्र का भी निर्माण होता है।

11. व्यक्ति के जीवन का पूर्ण विकास (Fullest Development of the Individual)-राज्य का उद्देश्य व्यक्ति के जीवन का विकास करना है और इस उद्देश्य की पूर्ति प्रजातन्त्र में ही हो सकती है। इसका कारण यह है कि शासन प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति को अधिक-से-अधिक अधिकार और स्वतन्त्रता प्राप्त होती है जिनका प्रयोग करके वह अपनी इच्छानुसार अपने जीवन का सर्वोत्तम विकास कर सकता है। यह बात अन्य किसी शासन-प्रणाली में सम्भव नहीं

12. उदारवादी सरकार (Liberal Government)—प्रजातन्त्र में सरकार उदारवादी होती है जिस कारण देश की बदलती परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक सुधार सम्भव हो सकते हैं।

13. कला, विज्ञान तथा संस्कृति में अधिक वृद्धि (Better progress in Art, Science and Literature)प्रजातन्त्र में कला, विज्ञान तथा संस्कृति का अच्छा विकास होता है क्योंकि नागरिकों को किसी प्रकार के प्रतिबन्धों के अधीन काम नहीं करना पड़ता।

14. संकटकाल में प्रजातन्त्र सरकार सर्वोत्तम होती है (In time of Emergency, Democratic Government is the Best)-दो महायुद्धों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि संकटकाल में प्रजातन्त्र सरकार तानाशाही से अधिक अच्छी है। तानाशाही में शासन की शक्ति एक व्यक्ति के पास होती है और जनता को शासन के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं होती जिसका परिणाम यह होता है कि यदि संकटकाल में शासक की मृत्यु हो जाए तो जनता हतोत्साहित हो जाती है। द्वितीय महायुद्ध में हिटलर और मुसोलिनी के हट जाने से जर्मनी और इटली की ऐसी ही दशा हुई। परन्तु प्रजातन्त्र में यदि एक नेता किसी कारण हट जाता है तो अन्य नेता शासन की बागडोर सम्भाल लेता है। सरकार जनता के सहयोग एवं समर्थन से बड़े-से-बड़े संकट का मुकाबला कर सकती है।

15. सभी शासन प्रणालियों में उत्तम (Best among all fiilms of Governments)-प्रजातन्त्र अन्य शासन प्रणालियों से उत्तम है क्योंकि लोकतन्त्र में सभी व्यक्तियों की ३-छाओं की ओर ध्यान दिया जाता है। इस सम्बन्ध में लावेल (Lowell) ने लिखा है, “एक पूर्ण लोकतन्त्र में कोई भी यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसे अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिला।”

प्रजातन्त्र के दोष (Demerits of Democracy) –

प्रजातन्त्र में जहां अनेक गुण पाए जाते हैं वहां दूसरी ओर इसमें अनेक दोष भी पाए जाते हैं। प्रजातन्त्र में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

1. यह अज्ञानियों, अयोग्य तथा मूों का शासन है (It is the Government of Ignorant, Incapable and Fools)-प्रजातन्त्र को अयोग्यता की पूजा (Cult of Incompetence) बताया जाता है। इसका कारण यह है कि जनता में अधिकतर व्यक्ति अज्ञानी, अयोग्य तथा मूर्ख होते हैं। सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) का कहना है, “प्रजातन्त्र अज्ञानी और बुद्धिहीन व्यक्तियों का शासन है।”

2. यह गुणों के स्थान पर संख्या को अधिक महत्त्व देता है (It gives Importance of Quantity rather than to Quality)-प्रजातन्त्र में गुणों की अपेक्षा संख्या को अधिक महत्त्व दिया जाता है। प्रजातन्त्र में प्रत्येक निर्णय बहुमत से किया जाता है। यदि किसी विषय को 50 मूर्ख ठीक कहें और 49 बुद्धिमान ग़लत कहें तो मूों की बात मानी जाएगी। समाज में मूल् तथा अज्ञानियों की संख्या अधिक होने के कारण उनके प्रतिनिधियों को ही बहुमत प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रजातन्त्र में बहुमत के शासन को मूल् का शासन भी कहा जा सकता है।

3. यह उत्तरदायी शासन नहीं है (It is not a Responsible Government)—प्रजातन्त्र सैद्धान्तिक तौर पर उत्तरदायी शासन है, परन्तु व्यवहार से यह अनुत्तरदायी है। वास्तव में प्रजातन्त्र में नागरिक चुनाव वाले दिन ही सम्प्रभु होते हैं। चुनाव से पहले बड़े-बड़े नेता साधारण नागरिक के पास वोट मांगने आते हैं, परन्तु चुनाव के पश्चात् वे जनता की इच्छाओं की परवाह नहीं करते। जनता अपने प्रतिनिधियों का अगले चुनाव से पहले कुछ नहीं बिगाड़ सकती, जिससे प्रतिनिधि जनता की इच्छाओं के प्रति लापरवाह हो जाते हैं।

4. राजनीतिक दलों के अवगुण (Defects of Political Parties)—प्रजातन्त्र में राजनीतिक दलों के सभी अवगुण आ जाते हैं। राजनीतिक दलों का नागरिकों के चरित्र तथा राष्ट्रीय चरित्र का बुरा प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक दल अपने सदस्यों से वफादारी की मांग करते हैं जिससे उनकी स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है। राजनीतिक दल एकता को भी नष्ट करते हैं क्योंकि सारा देश उतने भागों में बंट जाता है जितने राजनीतिक दल होते हैं।

5. यह बहुत खर्चीला है (It is Highly Expensive)—प्रजातन्त्र शासन प्रणाली बहुत खर्चीली है। प्रजातन्त्र में निश्चित अवधि के पश्चात् संसद् के सदस्यों का चुनाव होता है। प्रजातन्त्र में आम चुनावों के प्रबन्ध पर बहुत धन खर्च हो जाता है। मन्त्रियों के वेतन और भत्तों पर जनता का बहुत-सा धन खर्च होता रहता है। मन्त्री देश के धन को बिना सोचे-समझे खर्च करते रहते हैं।

6. यह अमीरों का शासन है (It is a Government of the Rich)—प्रजातन्त्र कहने में तो प्रजा का शासन है परन्तु कस्तव में अमीरों का शासन है। चुनाव लड़ने के लिए धन की आवश्यकता होती है। चुनावों में लाखों रुपये खर्च होते हैं। इसलिए या तो अमीर व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकते हैं या उनकी सहायता से ही चुनाव लड़ा जा सकता है। राजनीतिक दल भी चुनाव लड़ने के लिए पूंजीपतियों से पैसा लेते हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

7. बहुमत की तानाशाही (Dictatorship of Majority)-प्रजातन्त्र में प्रत्येक निर्णय बहुमत से किया जाता है जिस कारण प्रजातन्त्र में बहुमत की तानाशाही की स्थापना हो जाती है। मन्त्रिमण्डल उसी दल का बनता है जिस दल को विधानमण्डल में बहुमत प्राप्त होता है। जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है वह अगले चुनाव तक मनमानी करता है।

8. यह वास्तव में बहुमत का शासन नहीं है (In Reality it is not a Rule of Majority)-आलोचकों का कहना है कि प्रजातन्त्र वास्तव में बहुमत का शासन नहीं है। यह देखा गया है कि अधिकतर व्यक्ति शासन में रुचि नहीं लेते और न ही अपने मत का प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त जो दल सरकार बनाता है उसके समर्थन में डाले गए वोट कुल डाले गए वोटों का बहुमत नहीं होता।

9. यह राष्ट्र की सांस्कृतिक तथा वैज्ञानिक उन्नति को रोकता है (It Checks the Cultural and Scientific Development of the Nation)—प्रजातन्त्र में राजनीति पर बहुत ज़ोर दिया जाता है पर साहित्य, कला, विज्ञान आदि की उन्नति की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। ____10. अस्थायी तथा कमज़ोर शासन (Unstable and Weak Government)-जिन देशों में बहु-दलीय प्रणाली होती है वहां पर सरकारें जल्दी-जल्दी बदलती हैं। बहु-दलीय प्रणाली के अन्तर्गत किसी भी दल को बहुमत प्राप्त न होने के कारण मिली-जुली सरकार बनायी जाती है जो किसी भी समय टूट सकती है। मिली-जुली सरकार अस्थायी होने के कारण कमज़ोर भी होती है।

11. नैतिकता का स्तर गिर जाता है (The Standard of Morality is Lowered Down)-राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए झूठ, बेईमानी तथा रिश्वतखोरी का सहारा लेते हैं। चुनाव जीतने के पश्चात् मन्त्री सभी साधनों से अधिक-से-अधिक धन इकट्ठा करने का प्रयत्न करते हैं। इस तरह प्रजातन्त्र में नैतिकता का महत्त्व बहुत कम हो जाता

12. संकटकाल का मुकाबला करने में कमज़ोर (It is weak in time of Emergency)—किसी भी संकट का सामना करने के लिए एकता और शक्ति की ज़रूरत होती है। संकटकाल के समय निर्णय शीघ्र लेने होते हैं और उन्हें दृढ़तापूर्वक लागू करना आवश्यक होता है। परन्तु प्रजातन्त्र में निर्णय शीघ्र नहीं लिए जाते और न ही दृढ़ता से लागू किए जाते हैं। तानाशाही सरकारें संकटकाल का मुकाबला प्रजातन्त्र की अपेक्षा अधिक अच्छी प्रकार कर सकती हैं।

13. प्रजातन्त्र एक कल्पना है (Democracy is a Myth)—प्रजातन्त्र को कई लेखक व्यावहारिक नहीं मानते और उसे केवल कल्पना कहते हैं। उनका कहना है कि जनता को शासन में भाग लेने का अधिकार वास्तविक नहीं होता। केवल वयस्कों को ही वोट देने का अधिकार मिलता है और चुनाव के बाद बहुमत दल अपनी मनमानी करता है, मतदाताओं को कोई नहीं पूछता।

14. समातना का सिद्धान्त अप्राकृतिक है (Principle of Equality is Unnatural)—प्रजातन्त्र का मुख्य आधार समानता का सिद्धान्त है। परन्तु आलोचना के अनुसार समानता अप्राकृतिक है। प्रकृति ने सभी मनुष्यों को समान पैदा नहीं किया। जब प्रकृति ने सभी मनुष्यों को समान नहीं बनाया तो, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समानता कैसे स्थिर रह सकती है।

15. राजनीति एक व्यवसाय बन जाता है (Politics becomes a Profession)-प्रजातन्त्र में राजनीतिज्ञों का बोलबाला रहता है और उनका एक अलग वर्ग बन जाता है। ये लोग जनता को जोशीले भाषणों और झूठे वायदों से अपने पीछे लगा लेते हैं। आम व्यक्ति चालाक और स्वार्थी राजनीतिज्ञों की बातों में आ जाते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)-प्रजातन्त्र के लाभ भी हैं और दोष भी। परन्तु दोषों के होते हुए भी इस प्रणाली को आजकल सर्वोत्तम माना जाता है। यही एक शासन प्रणाली है जिस में लोगों को व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, राजनीतिक अधिकार, समानता, शासन की आलोचना करने और उसे प्रभावित करने का अवसर तथा अपने जीवन का विकास करने का अवसर सबसे अधिक मिलता है। मेजिनी का कथन है कि प्रजातन्त्र में, “सबसे अधिक बुद्धिमान और श्रेष्ठ व्यक्तियों के नेतृत्व में सर्वसाधारण की प्रगति सर्वसाधारण के द्वारा होती है।”

प्रश्न 3.
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र से क्या अभिप्राय है ? प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की विशेष संस्थाओं की विवेचना करें।
(What do you understand by direct democracy ? Discuss the special institutions of direct democracy.)
उत्तर-
प्रजातन्त्र के दो रूप हैं-

  1. प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र तथा
  2. अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र।

1. प्रत्यक्ष या शुद्ध प्रजातन्त्र (Direct or Pure Democracy)-प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र ही प्रजातन्त्र का शुद्ध या वास्तविक रूप है। जब जनता स्वयं कानून बनाए, राजनीति को निश्चित करे तथा सरकारी कर्मचारियों पर नियन्त्रण रखे, उस व्यवस्था को प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कहते हैं। समय-समय पर समस्त नागरिकों की सभा एक स्थान पर बुलाई जाती है
और उनमें सार्वजनिक मामलों पर विचार होता है तथा शासन सम्बन्धी प्रत्येक बात का निर्णय होता है। प्राचीन समय में ऐसे प्रजातन्त्र विशेष रूप से यूनान और रोम में विद्यमान थे, परन्तु आधुनिक युग में बड़े-बड़े राज्य हैं जिनकी जनसंख्या भी बहुत अधिक होती है और भू-भाग भी लम्बा-चौड़ा है। नागरिकों की संख्या भी पहले से अधिक हो गई है। आज प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र सम्भव नहीं है। रूसो (Rousseau) प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का ही पुजारी था। इसलिए तो उसने कहा कि इंग्लैंड के लोग केवल चुनाव वाले दिन ही स्वतन्त्र होते हैं।

2. अप्रत्यक्ष या प्रतिनिधि प्रजातन्त्र (Indirect or Representative Democracy)-अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में प्रभुत्व शक्ति जनता के पास होती है, परन्तु जनता उसका प्रयोग स्वयं न करके अपने प्रतिनिधियों द्वारा करती है। अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधि चुन लेती है और वे प्रतिनिधि जनता की इच्छानुसार कानून बनाते तथा शासन करते हैं। इन प्रतिनिधियों का चुनाव एक निश्चित अवधि के लिए होता है। भारत में ये प्रतिनिधि पांच वर्ष के लिए चुने जाते हैं। ब्लंटशली (Bluntschli) के शब्दों में, “प्रतिनिधि प्रजातन्त्र का यह नियम है, कि जनता अपने अधिकारियों द्वारा शासन करती है और प्रतिनिधियों द्वारा कानून का निर्माण करती है तथा प्रशासन पर नियन्त्रण रखती है।”

प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की संस्थाएं (Institutions of Direct Democracy)—प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र पूर्ण रूप से लागू करना तो आज के युग में सम्भव नहीं, परन्तु अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र के दोषों को कम करने के लिए कुछ देशों में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की कुछ संस्थाएं अपनाई गई हैं। इसके लिए स्विट्ज़रलैंड बड़ा प्रसिद्ध है। स्विट्ज़रलैंड को प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का घर (Home of Direct Democracy) कहा जाता है। इन संस्थाओं द्वारा नागरिकों को कानून बनवाने और संसद् के कानूनों को लागू होने से रोकने का अधिकार दिया जाता है। स्विट्ज़रलैण्ड के कुछ कैंटनों (Cantons) में समस्त मतदाता एक स्थान पर एकत्र होकर कानून आदि बनाते हैं तथा सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं। परन्तु समस्त देशों में ऐसा सम्भव नहीं। प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की आधुनिक संस्थाएं कुछ देशों में मिलती हैं जैसे प्रस्तावाधिकार (Initiative), जनमत संग्रह (Referendum), प्रत्यावर्तन या वापसी (Recall) तथा लोकमत संग्रह (Plebiscite), इनका सविस्तार वर्णन दिया जाता है-

1. प्रस्तावाधिकार (Initiative)-इसके द्वारा मतदाताओं को अपनी इच्छा के अनुसार कानून बनाने का अधिकार होता है। यदि मतदाताओं की एक निश्चित संख्या किसी कानून को बनवाने की मांग करे तो संसद् अपनी इच्छा से उस मांग को रद्द नहीं कर सकती। यदि संसद् उस प्रार्थना के अनुसार कानून बना दे तो सबसे अच्छी बात है। यदि संसद् उस मांग से सहमत न हो तो वह समस्त जनता की राय लेती है और यदि मतदाता बहुमत से उस मत का समर्थन कर दें तो संसद् को वह कानून बनाना ही पड़ता है। स्विट्ज़रलैंड में एक लाख मतदाता कोई भी कानून बनाने के लिए संसद् को कह सकते हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

2. जनमत संग्रह (Referendum)—जनमत संग्रह द्वारा संसद् के बनाए हुए कानून लोगों के सामने रखे जाते हैं। वे कानून तभी पास हुए समझे जाते हैं यदि मतदाताओं का बहुमत उनके पक्ष में हो, नहीं तो वह कानून रद्द हो जाता है। इस प्रकार यदि संसद् कोई ऐसा कानून बना भी दे जिसे जनता अच्छा न समझती हो तो उसे लागू होने से रोक सकती है। स्विट्ज़रलैण्ड में यह नियम है कि कानूनों को लागू करने से पहले जनता की राय ली जाती है। वहां पर जनमतसंग्रह दो प्रकार के होते हैं-(i) अनिवार्य जनमत संग्रह (Compulsory Referendum) तथा (ii) ऐच्छिक जनमत संग्रह (Optional Referendum) । महत्त्वपूर्ण कानून लागू होने से पहले जनमत संग्रह के लिए भेजा जाता है। यदि बहुमत कैन्टनों में तथा कुल मतदाताओं का बहुमत उनके पक्ष में हो तो, उसे लागू कर दिया जाता है अन्यथा वह कानून रद्द हो जाता है। ऐच्छिक जनमत संग्रह में संसद् की इच्छा होती है कि वह साधारण कानून को लागू होने से पहले जनता की राय के लिए भेजे या न भेजे । ऐसा साधारण कानून पर होता है। परन्तु यदि 50,000 मतदाता इस बात की मांग करें कि कानून पर जनमत-संग्रह कराया जाए तो वह कानून भी जनता की राय के लिए अवश्य भेजा जाता है। ऐसे कानून पर जब बहुमत का समर्थन मिल जाए तभी वह लागू होता है। रूस में ऐच्छिक जनमत-संग्रह का सिद्धान्त अपनाया गया है। 23 अप्रैल, 1993 को रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसीन ने अपनी आर्थिक सुधार नीतियों के पक्ष में जनमत-संग्रह करवाया और लोगों ने भारी बहुमत से उनके पक्ष में मतदान किया।

3. वापसी (Recall)-इस नियम द्वारा जनता को अपने प्रतिनिधि अवधि समाप्त होने से पहले भी वापस बुलाने और दूसरा प्रतिनिधि चुन कर भेजने का अधिकार दिया जाता है। इस अधिकार द्वारा मतदाताओं की एक निश्चित संख्या अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का प्रस्ताव रख सकती है। इससे प्रतिनिधियों पर मतदाताओं का स्थायी प्रभाव बना रहता है और वे कभी भी उनकी इच्छा की अवहेलना नहीं कर सकते। अमेरिका के कुछ राज्यों तथा स्विट्जरलैंड में यह नियम लागू है।

4. लोकमत संग्रह (Plebiscite)-लोकमत संग्रह राजनीतिक प्रश्न पर होता है। कानूनों पर जनता की राय जनमतसंग्रह कहलाती है। पाकिस्तान यह मांग करता है कि कश्मीर में लोकमत-संग्रह कराया जाए कि वहां के लोग भारत में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में ? 1935 में लोकमत-संग्रह के आधार पर ही सार (Saar) को जर्मनी में मिलाया गया। उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्तों (N.W.F.P.) को भी पाकिस्तान में लोकमत संग्रह के आधार पर ही मिलाया गया था। लोकमत-संग्रह का एक अन्य रूप भी है जिसे मतसंख्या (Opinion Poll) कहते हैं। सन् 1967 में गोवा, दमन और दियू में यह जानने के लिए कि वहां के लोग संघीय क्षेत्र ही चाहते हैं या महाराष्ट्र अथवा गुजरात में मिलना चाहते हैं। लोकमत संग्रह करवाया गया और लोगों ने संघीय क्षेत्र में बने रहने की ही इच्छा व्यक्त की।

निष्कर्ष (Conclusion)—प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की संस्थाएं देखने में बहुत अच्छी प्रतीत होती हैं। ये संस्थाएं अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र के कुछ दोषों को दूर करती हैं। परन्तु सभी देशों में इन संस्थाओं का संचालन ठीक नहीं हो सकता। इनका सफलतापूर्वक प्रयोग तो ऐसे राज्यों में हो सकता है जो छोटे हों और जहां लोग पढ़े-लिखे हों।

प्रश्न 4.
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र के बीच अन्तर बताइए।
(Distinguish between Direct and Indirect Democracy.)
उत्तर-
आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। प्रजातन्त्र एक सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली मानी जाती है। प्रजातन्त्र एक ऐसी सरकार को कहा जाता है जिसमें जनता को राजसत्ता का अन्तिम स्रोत समझा जाता है। प्रजातन्त्र जनता की, जनता के लिए और जनता के द्वारा सरकार है।
प्रजातन्त्र के दो रूप हो सकते हैंप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र (Direct Democracy)-प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता प्रत्यक्ष रूप में शासन में भाग लेती है।
अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र (Indirect Democracy)-अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में शासन जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा चलाया जाता है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र के बीच अन्तर को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में लोग स्वयं शासन में प्रत्यक्ष रूप में भाग लेते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में शासन जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के द्वारा चलाया जाता है।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को शासक समझता है, जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में केवल प्रतिनिधि ही शासक समझते जाते हैं।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता स्वयं कानून के निर्माण में भाग लेती है। इसलिए जनता अपने ही बनाए गए कानूनों का अधिक पालन करती है जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता स्वयं कानून निर्माण में भाग लेने के कारण कानूनों के पालन की मात्रा इतनी अधिक नहीं होती।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र की अपेक्षा जनता को अधिक राजनीति शिक्षण प्राप्त होता है।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र जनता की प्रभुसत्ता पर आधारित है। प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में ही जनता अपनी इच्छा को ठीक ढंग से प्रकट कर सकती है। अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधियों द्वारा अपनी इच्छा को ठीक ढंग से प्रकट नहीं कर सकती और न ही अपनी सत्ता का ठीक ढंग से प्रयोग कर सकती है।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में मतदाताओं का अपने प्रतिनिधियों के साथ समीप का सम्बन्ध बना रहता है, परन्तु अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र में चुनाव के पश्चात् प्रायः यह समाप्त हो जाता है।
  • प्रत्यक्ष लोकतन्त्र में राजनीतिक दलों का महत्त्व इतना अधिक नहीं होता जितना कि अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र में राजनीतिक दलों का महत्त्व होता है।
  • यद्यपि प्रत्यक्ष लोकतन्त्र अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र की अपेक्षा अधिक लोकतन्त्रीय होता है, परन्तु प्रत्यक्ष लोकतन्त्र जनसंख्या और आकार की दृष्टि से बड़े-बड़े राज्यों में व्यावहारिक नहीं है जबकि अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र एक व्यावहारिक व्यवस्था है।

प्रश्न 5.
उन शर्तों का उल्लेख कीजिए जो प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक हैं। (Describe the conditions which are necessary for the success of Democracy.)
अथवा
प्रजातन्त्र की सफलता के लिए किन-किन स्थितियों का होना आवश्यक है ? आपके विचार में भारत में वे कहां तक मौजूद हैं ?
(What conditions are necessary for the successful working of Democracy ? In your opinion, how far do they exist in India ?)
उत्तर-
प्रजातन्त्र शासन व्यवस्था सबसे उत्तम मानी जाती है, परन्तु वास्तव में यह ऐसा शासन है जो प्रत्येक देश में सफल नहीं हो सकता। यदि उपयुक्त वातावरण में लागू किया जाए तो इसके लाभ हैं, नहीं तो इसका बुरा परिणाम निकल सकता है। इसकी सफलता के लिए एक विशेष वातावरण चाहिए। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् बहुत-से देशों ने लोकतन्त्र शासन को अपनाया, परन्तु इसमें से कई देशों में यह प्रणाली अधिक देर तक न चल पाई। इसका प्रमुख कारण यह था कि इन देशों में वह वातावरण और परिस्थितियां उपस्थित नहीं थीं जो कि प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। लोकतन्त्र के सफलतापूर्वक काम के लिए निम्नलिखित परिस्थितियों का होना आवश्यक समझा जाता है-

1. जागरूक नागरिकता (Englihtened Citizenship)-जागरूक नागरिकता प्रजातन्त्र की सफलता की पहली शर्त है। निरन्तर देख-रेख ही स्वतन्त्रता की कीमत है। (Eternal vigilance is the price of liberty.) नागरिक अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने चाहिएं। सार्वजनिक मामलों पर हर नागरिक को सक्रिय भाग लेना चाहिए। राजनीतिक समस्याओं और घटनाओं के प्रति सचेत रहना चाहिए। राजनीतिक चुनाव में बढ़-चढ़ कर भाग लेना चाहिए आदि-आदि।

2. प्रजातन्त्र से प्रेम (Love for Democracy)—प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों के दिलों में प्रजातन्त्र के लिए प्रेम होना चाहिए। बिना प्रजातन्त्र के प्रेम के प्रजातन्त्र कभी सफल नहीं हो सकता।

3. शिक्षित नागरिक (Educated Citizens)—प्रजातन्त्र की सफलता के लिए शिक्षित नागरिकों का होना आवश्यक है। शिक्षित नागरिक प्रजातन्त्र शासन की आधारशिला है। शिक्षा से ही नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान होता है। शिक्षित नागरिक शासन की जटिल समस्याओं को समझ सकते हैं और उनको सुलझाने के लिए सुझाव दे सकते हैं।

4. स्थानीय स्व-शासन (Local Self-Government) प्रजातन्त्र की सफलता के लिए स्थानीय स्वशासन का होना आवश्यक है। स्थानीय संस्थाओं के द्वारा नागरिकों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलता है। ब्राइस (Bryce) का कहना है कि लोगों में स्वतन्त्रता की भावना स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के बिना नहीं आ सकती। स्थानीय शासन को प्रशासनिक शिक्षा की आरम्भिक पाठशाला कहा जाता है। लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) प्रजातन्त्र की सफलता के लिए स्थानीय स्वशासन को सर्वोत्तम स्कूल और गारंटी बताता है।

5. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा (Protection of Fundamental Rights)-प्रजातन्त्र में लोगों को कई तरह के मौलिक अधिकार दिए जाते हैं जिनके द्वारा वे शासन में भाग ले सकते हैं और अपने जीवन का विकास कर सकते हैं। इन अधिकारों की सुरक्षा संविधान द्वारा की जानी चाहिए ताकि कोई व्यक्ति या शासन उनको कम या समाप्त करके प्रजातन्त्र को हानि न पहुंचा सके।

6. आर्थिक समानता (Economic Equality)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आर्थिक समातना का होना अति आवश्यक है। लॉस्की (Laski) के कथनानुसार, “आर्थिक समानता के अभाव में राजनीतिक स्वतन्त्रता निरर्थक है।” राजनीतिक प्रजातन्त्र केवल एक हास्य का विषय बन जाता है यदि इससे पहले आर्थिक, प्रजातन्त्र को स्थापित न किया जाए। लोगों को वोट डालने के अधिकार से पहले पेट भर भोजन मिलना चाहिए।

7. सामाजिक समानता (Social Equality)—प्रजातन्त्र की सफलता के लिए सामाजिक समानता की भावना का होना आवश्यक है। समाज में धर्म, जाति, रंग आदि के आधार पर भेद-भाव नहीं होना चाहिए।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

8. प्रेस की स्वतन्त्रता (Freedom of Press)—प्रेस को प्रजातन्त्र का पहरेदार (Watchdog of Democracy) कहा गया है। समाचार-पत्र सरकार की आलोचना करने के साथ-साथ लोगों को राजनीति की भी जानकारी देते हैं और उनको देश में होने वाली सभी घटनाओं से सूचित भी करते हैं। इन समाचार-पत्रों पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए, नहीं तो लोगों को ठीक जानकारी नहीं मिल सकेगी और सरकार की आलोचना भी न हो सकेगी।

9. आपसी सहयोग की भावना (Spirit of Mutual Co-operation)—वैसे तो सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में लोगों के आपसी सहयोग की आवश्यकता होती है, परन्तु लोकतन्त्र में इस भावना का विशेष महत्त्व है। यदि लोगों में फूट और एक-दूसरे के प्रति असहयोग की भावना होगी, तो प्रजातन्त्र शासन प्रणाली की सफलता असम्भव है।

10. सहनशीलता (Toleration)-लोगों के अन्दर सहनशीलता की भावना का होना भी प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक समझा जाता है। यदि लोगों में सहनशीलता की भावना न होगी तो वे शान्ति से एक-दूसरे की बात न सुनकर आपस में लड़ते-झगड़ते रहेंगे।

11. सुसंगठित राजनीतिक दल (Well-Organised Political Parties)-दलों का संगठन जाति, धर्म, प्रान्त के आधार पर न होकर आर्थिक तथा राजनीतिक आधारों पर होना चाहिए। जो दल आर्थिक तथा राजनीतिक आधारों पर संगठित होते हैं उनका उद्देश्य देश का हित होता है। यदि देश में दो दल हों तो बहुत अच्छा है। इंग्लैंड तथा अमेरिका में प्रजातन्त्र की सफलता का मुख्य कारण इन देशों की दो दलीय प्रणाली है।

12. विवेकी और ईमानदार नेता (Wise and Honest Leaders)-नेताओं को जनता का नेतृत्व करने में विवेक और ईमानदारी से काम लेना चाहिए। यदि नेता स्वार्थी और विवेकहीन होंगे तो नाव मंझधार में फंस जाएगी और प्रजातन्त्र असफल हो जाएगा। “प्रजातन्त्र में नेता ऐसे होने चाहिएं जो दृढ़ निर्णय ले सकें और जो वास्तविक योग्यता, असाधारण कार्य सम्पदा वाले और महान् चरित्रवान् हों।”

13. शान्ति और सुरक्षा (Peace and Order)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए देश में शान्ति और सुरक्षा का वातावरण होना आवश्यक है। जिस देश में अशान्ति की व्यवस्था रहती है वहां पर नागरिक अपने व्यक्तित्व का विकास करने का प्रयत्न नहीं करते। युद्धकाल में न तो चुनाव हो सकते हैं और न ही नागरिकों को अधिकार तथा स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। इसलिए प्रजातन्त्र की सफलता के लिए शान्ति की व्यवस्था का होना आवश्यक है।

14. न्यायपालिका की स्वतन्त्रता (Independence of Judiciary)—प्रजातन्त्र को सफल बनाने में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता भी आवश्यक है। स्वतन्त्र न्यायपालिका लोगों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखती है और लोग अपने अधिकारों का स्वतन्त्रता से प्रयोग कर सकते हैं।

15. लिखित संविधान (Written Constitution)-कुछ विद्वानों का विचार है कि प्रजातन्त्र की सफलता के लिए लिखित संविधान का होना भी आवश्यक है। लिखित संविधान में सरकार की शक्तियों का स्पष्ट वर्णन होता है जिसके कारण सरकार जनता पर अत्याचार नहीं कर सकती। जनता को भी सरकार की सीमाओं का पता होता है।

16. स्वतन्त्र चुनाव (Independent Election)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि देश में चुनाव निष्पक्ष रूप से करवाये जाएं।

17. लोगों का उच्च नैतिक चरित्र (High Moral Character of the People)-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए लोगों का चरित्र बड़ा उच्च होना भी आवश्यक है। लोग ईमानदार, निःस्वार्थी, देश-भक्त तथा नागरिकता के गुणों से ओत-प्रोत होने चाहिएं।

18. सेना का अधीनस्थ स्तर (Subordinate Status of Army)-देश की सेना को सरकार के असैनिक अन्य (Civil Power) के अधीन रखा जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो सेना प्रजातन्त्रात्मक संस्थाओं की सबसे बड़ी विरोधी सिद्ध होगी।

19. स्वस्थ जनमत (Sound Public Opinion)-प्रजातन्त्रात्मक सरकार जनमत पर आधारित होती है, जिस कारण प्रजातन्त्र की सफलता के लिए स्वस्थ जनमत होना अति आवश्यक है।

20. अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व (Representation of Minorities) प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। यदि अल्पसंख्यकों को संसद् में प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता तो सदैव असन्तुष्ट रहेंगे। मिल (Mill) का कहना है कि “प्रजातन्त्र के लिए यह आवश्यक है कि अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।”

क्या ये शर्ते भारत में विद्यमान हैं ? (Are these Conditions Present in India ?) –

यह प्रश्न बहुत-से लोगों के मन में उत्पन्न होता है कि क्या भारत में प्रजातन्त्र की सफलता के लिए उचित वातावरण है ? भारतवर्ष में प्रजातन्त्र की स्थापना के इतने वर्षों बाद भी बहुत-से लोगों का विचार है कि भारत प्रजातन्त्र के लिए उपर्युक्त नहीं है। जिन लोगों को इसमें सन्देह है कि भारत में प्रजातन्त्र सफल नहीं हो सकता है, उनका कहना है कि भारत में प्रजातन्त्र की सफलता के लिए उचित वातावरण नहीं है। भारतवर्ष में निम्नलिखित परिस्थितियों का अभाव है-

  1. सचेत नागरिकता का अभाव- भारत के नागरिक शासन में रुचि नहीं लेते और न ही अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करते हैं।
  2. अशिक्षित नागरिक-भारत के अधिकतर नागरिक अनपढ़ तथा गंवार हैं। अशिक्षित नागरिक चालाक नेताओं की बातों में आकर अपने मत का प्रयोग करके गलत प्रतिनिधियों को चुन लेते हैं।
  3. उच्च नैतिक स्तर का अभाव-भारत के नागरिकों का नैतिक स्तर ऊंचा नहीं है। आज कोई भी कार्य रिश्वत और सिफारिश के बिना नहीं होता है।
  4. आर्थिक असमानता-देश का धन कुछ ही लोगों के हाथ में एकत्रित है। लाखों बेरोजगार हैं जिन्हें दो समय भर पेट भोजन भी नहीं मिलता। गरीब व्यक्ति अपनी वोट को बेच देते हैं।
  5. सामाजिक असमानता–छुआछूत अभी व्यवहार में पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुई। जात-पात का बहुत बोलबाला है।
  6. बहु-दलीय प्रणाली-भारत में बहुत-से दल विद्यमान हैं। रोज किसी नए दल की स्थापना हो जाती है। कई दल धार्मिक आधार पर संगठित हैं। कई दल हिंसात्मक साधनों में विश्वास करते हैं। बहु-दलीय प्रणाली के कारण केन्द्र में सरकारें बड़ी तेजी से बदलती रहती हैं। भारत में मई, 1996 से अप्रैल, 1999 तक बहु-दलीय प्रणाली के कारण चार प्रधानमन्त्रियों को त्याग-पत्र देना पड़ा।
  7. चुनावों में हिंसा-चुनावों में हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, जो लोकतन्त्र के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।

इन सब बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में प्रजातन्त्र का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। इसलिए कुछ लोगों का विचार है कि भारत में प्रजातन्त्र को समाप्त करके तानाशाही की स्थापना करनी चाहिए।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

इसमें कोई शक नहीं कि भारत में वे सब बातें नहीं है जो प्रजातन्त्र को सफल बनाने में सहायक हैं, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रजातन्त्र को समाप्त कर दिया जाए। भारत सरकार ने आरम्भ से ही ऐसे कार्य करने शुरू कर दिए हैं जिससे उचित वातावरण उत्पन्न हो जाए। शिक्षा के प्रचार की ओर विशेष ध्यान दिया गया। आर्थिक समानता को लाने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं अपनाई गई हैं। स्वशासन की स्थापना की गई है। पिछले सोलह आम चुनावों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय जनता अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों को समझती है। भारतीय जनता में अब जाग्रति आ चुकी है। हमारे देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू ने लोकतन्त्र को सफल बनाने के लिए बहुत प्रयत्न किया। श्री लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के हमले के समय देश का बहुत अच्छा नेतृत्व किया।

भारत में अब तक 16 आम चुनाव हो चुके हैं। भारत में प्रत्येक आम चुनाव ने सिद्ध कर दिया कि भारतीय जनता लोकतन्त्र में पूरी-पूरी श्रद्धा रखती है। भारत में प्रजातन्त्र के विकास और प्रगति के बारे में कोई शंका निराधार नहीं होगी। पाकिस्तान के साथ हुए 1965 और 1971 के युद्धों ने सिद्ध कर दिया कि भारतीय प्रजातन्त्र बहुत सबल है। भारतीय जनता में राजनीतिक परिपक्वता (Political Maturity) को देखते हुए कई विदेशी विद्वानों ने भी भारतीय प्रजातन्त्र के अच्छे स्वास्थ्य की गवाही दी है।

नि:संदेह भारतीय जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करना जानती है और प्रजातन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक शर्ते हैं। अन्त में, हम नि:संकोच यह कह सकते हैं कि भारत में लोकतन्त्रीय परम्पराओं की नींव दृढ़ होती जा रही है।

प्रश्न 6.
आप किस प्रकार की सरकार को समग्रवादी या अधिनायकवादी सरकार कहेंगे ? उदाहरण दें।
(Which government would you call a totalitarian government ? Give examples.)
अथवा अधिनायकवाद या तानाशाही क्या है ? संक्षेप में व्याख्या करें।
(What is dictatorship ? Explain briefly.)
उत्तर-
यद्यपि आधुनिक युग को प्रजातन्त्र का युग कहा जाता है, परन्तु वास्तविकता यह है कि यह युग अधिनायकतन्त्र का युग बनता जा रहा है। यह सत्य है कि सुन्दर व उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रजातन्त्र का होना अनिवार्य है, परन्तु आज संसार के कई देशों में तानाशाही पाई जाती है। लेटिन अमेरिका, अफ्रीका व एशिया के कई देशों में अधिनायकतन्त्र व्यवस्थाओं का बोलबाला है।

अधिनायकतन्त्र का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and definition of Dictatorship)-तानाशाही में शासन की सत्ता एक व्यक्ति में निहित होती है। अधिनायक अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है और वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। वह तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक शासन की शक्ति उसके हाथ में रहती है।

फोर्ड (Ford) ने तानाशाही की परिभाषा देते हुए कहा है, “तानाशाही राज्य के अध्यक्ष के द्वारा गैर कानूनी शक्तियां प्राप्त करना है।” (“Dictatorship is the assumption of extra legal authority by the Head of state.”Ford).

न्यूमैन (Newman) ने तानाशाही की परिभाषा करते हुए लिखा है कि, “तानाशाही एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का वह शासन है जिन्होंने राज्य में सत्ता पर नियन्त्रण कर लिया है। वह उस सत्ता का उपभोग बिना किसी रोक से करते हैं।”

अल्फ्रेड (Alfred) ने अधिनायकतन्त्र की बड़ी सुन्दर और व्यापक परिभाषा यों दी है : “अधिनायकतन्त्र उस एक व्यक्ति का शासन है जिसने स्तर और स्थिति को पैतृक अधिकार से प्राप्त न करके शक्ति या स्वीकृति सम्भवतः दोनों के मिश्रण द्वारा प्राप्त किया हो। उसके पास निरंकुश प्रभुसत्ता का होना अनिवार्य है अर्थात् यह समस्त राजनीतिक सत्ता का स्रोत है और उस सत्ता पर सीमा नहीं होनी चाहिए। वह शक्ति का प्रयोग कानून के द्वारा नहीं बल्कि स्वेच्छापूर्ण ढंग से आदेशों द्वारा करता है। अन्ततः उसकी सत्ता किसी निश्चित कार्यकाल तक सीमित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इस प्रकार की सीमा निरंकुश शासन से मेल नहीं खाती है।”

अल्फ्रेड की तानाशाही की परिभाषा के विश्लेषण से निम्नलिखित बातें मालूम होती हैं-

  1. यह एक व्यक्ति का शासन है।
  2. यह शक्ति या स्वीकृति या दोनों के मिश्रण पर आधारित होती है।
  3. किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।
  4. तानाशाह की शक्तियां असीमित होती हैं।
  5. तानाशाह शासन को कानून की बजाय आदेश के अनुसार चलाता है।
  6. तानाशाही की अवधि निश्चित नहीं होती।

प्रथम महायुद्ध के पश्चात् प्रजातन्त्र शासन के विरुद्ध ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि अनेक देशों में तानाशाही की स्थापना हुई। रूस में साम्यवादी दल की तानाशाही स्थापित हो गई। जर्मनी में हिटलर ने अपनी तानाशाही स्थापित कर ली और इटली में मुसोलिनी ने फासिस्ट पार्टी के आधार पर अपनी तानाशाही को स्थापित कर लिया।

आधुनिक तानाशाही के लक्षण (Features of Modern Dictatorship)-

आधुनिक तानाशाही के निम्नलिखित लक्षण हैं-

1. राज्य की निरंकुशता (Absoluteness of the State)-आधुनिक तानाशाही में राज्य निरंकुशवादी होते हैं। तानाशाही सरकार की शक्तियां असीमित होती हैं। जिन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। हिटलर और मुसोलिनी का कहना था, “सब कुछ राज्य के अन्दर है, राज्य के बाहर कुछ भी नहीं तथा राज्य के ऊपर कुछ भी नहीं है।”

राज्य सर्वशक्ति-सम्पन्न होता है। तानाशाही सरकार जो चाहे कर सकती है। जनता को सरकार का विरोध करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

2. राज्य साध्य है और व्यक्ति एक साधन है (State is an End and individual is a Means) तानाशाही में राज्य को साध्य तथा व्यक्ति को साधन माना जाता है। तानाशाही के समर्थकों का कहना है कि राज्य के हित में ही नागरिक का हित है। अतः नागरिकों का कर्त्तव्य है कि वे राज्य की आज्ञाओं का पालन करें और राज्य के हित के लिए अपना बलिदान करने के लिए सदा तैयार रहें।

3. राज्य और समाज में कोई अन्तर नहीं किया जाना (No distinction is made between State and Society)-आधुनिक तानाशाही में राज्य और समाज में कोई अन्तर नहीं माना जाता। आधुनिक तानाशाही के समर्थकों के अनुसार राज्य को व्यक्ति के प्रत्येक क्षेत्र को नियमित करने तथा उसके प्रत्येक कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार
है।

4. राजनीतिक दल का अभाव या एकदलीय (Either Partyless or One Party System)-अधिनायकतन्त्र में या तो कोई भी राजनीतिक दल नहीं होता जैसा कि पाकिस्तान में अयूब खां और याहिया खां के समय में था या फिर एक दल होता है। तानाशाही में एक दल का शासन होता है। जर्मनी में नाजी पार्टी तथा इटली में फासिस्ट पार्टी का शासन था। चीन में साम्यवादी दल का शासन है। अतः तानाशाही राज्यों में विरोधी दल का निर्माण नहीं किया जा सकता।

5. एक नेता का गुण-गान (Glorification of one Leader)-तानाशाही में एक पार्टी का शासन होता है, . पार्टी के नेता को ही देश का नेता माना जाता है। नेता को दूसरे व्यक्तियों से श्रेष्ठ माना जाता है। नेता में पूर्ण विश्वास किया जाता है और उसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना जाता है। उसकी सत्ता का कोई विरोध नहीं कर सकता। इस प्रकार तानाशाही में एक पार्टी, एक नेता तथा एक प्रोग्राम होता है।

6. अधिकारों और स्वतन्त्रताओं का न होना (Absence of Rights and Liberties) तानाशाही में नागरिकों को अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं से वंचित कर दिया जाता है। यदि नागरिकों को अधिकार दिए भी जाते हैं तो वे नाममात्र के होते हैं। तानाशाही में नागरिकों को जो अधिकार प्राप्त हैं वे वास्तव में अधिकार नहीं होते क्योंकि उनके अधिकार तानाशाह की दया पर निर्भर करते हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

7. कार्यकाल निश्चित नहीं होता (Term not Fixed)-अधिनायक का कार्यकाल निश्चित नहीं होता। जब तक वह अपनी सैनिक शक्ति को बनाए रखेगा वह अपने पद पर आसीन रह सकता है।

8. हिंसा तथा शक्ति में विश्वास (Faith in Violence and Force)-आधुनिक तानाशाही शक्ति पर आधारित है। तानाशाही शासन शान्ति तथा अहिंसा के स्थान पर युद्ध तथा हिंसात्मक साधनों में विश्वास करते हैं।

9. साम्राज्यवादी नीति (Imperialistic Policy) तानाशाही साम्राज्यवादी नीति में विश्वास करते हैं। तानाशाह शक्ति के बल पर अपने राज का विस्तार करने के पक्ष में है।

10. प्रेस तथा रेडियो पर नियन्त्रण (Control over Press and Radio) तानाशाही में प्रेस तथा रेडियो पर नियन्त्रण होता है। प्रेस तथा रेडियो का प्रयोग सरकार की नीतियों का प्रसार करने के लिए किया जाता है।

11. अन्तर्राष्ट्रीयवाद का विरोध (Opposed to Internationalism) आधुनिक तानाशाह अन्तर्राष्ट्रीयवाद में विश्वास नहीं करते। तानाशाह प्रत्येक समस्या का समाधान शक्ति के आधार पर करना चाहते हैं। 1965 ई० में पाकिस्तान ने कश्मीर को शक्ति द्वारा हड़पना चाहा। 1962 में साम्यवादी चीन ने भारत पर आक्रमण करके भारत के एक विस्तृत भाग पर कब्जा कर लिया।

12. धर्म के विरुद्ध (Hostile to Religion)—सर्वशक्तिमान राज्य धर्म के विरुद्ध होता है। साम्यवादी देशों में धर्म को ‘जनता के लिए अफीम’ माना जाता है।

13. जातीयता (Racialism)-तानाशाही अपनी जाति को अन्य जातियों के मुकाबले में श्रेष्ठ मानते हैं और इसका प्रचार भी करते हैं। जर्मनी के लोग अपने आप को संसार के सब लोगों से श्रेष्ठ मानते थे। मुसोलिनी ने अपनी जाति की श्रेष्ठता का प्रचार किया था।

प्रश्न 7.
अधिनायकवादी सरकार के गुण एवं दोषों की व्याख्या करें। (Describe the merits and demerits of Dictatorship.)
उत्तर-
अधिनायकवाद अथवा तानाशाह के गुण-तानाशाही में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-
1. दृढ़ तथा स्थिर शासन (Strong and Stable Government) तानाशाही का प्रमुख गुण यह है कि इस शासन व्यवस्था में शासन दृढ़ तथा स्थिर होता है। शासन की सब शक्तियां एक ही व्यक्ति में निहित होती हैं और शक्ति के आधार पर ही तानाशाही सरकार स्थापित की जाती है। तानाशाह अपनी पदवी के लिए किसी पर निर्भर नहीं करता। उसे चुनाव लड़ने नहीं पड़ते और न ही वह किसी के प्रति उत्तरदायी होता है। वह एक बार जो संकल्प कर लेता है उसी पर दृढ़ रहता है। शासन में स्थिरता आती है जिससे शासन की नीति में निरन्तरता बनी रहती है।

2. शासन में कुशलता (Efficiency in Administration)-तानाशाह ऊंचे पदों पर योग्य व्यक्तियों को नियुक्त करता है और शासन में से घूसखोरी, लाल फीताशाही (Red Tapism) तथा पक्षपात को समाप्त करता है। वह आवश्यकता के अनुसार निर्णय ले सकता है। इस प्रकार तानाशाह शीघ्र ही निर्णय लेकर शासन की नीति को जल्दी लागू करता है और शासन में कुशलता आती है।

3. संकटकाल के लिए उचित सरकार (Suitable Government in time of Emergency) तानाशाही सरकार संकटकाल के लिए उचित है। शासन की समस्त शक्तियां तानाशाह में केन्द्रित होती हैं। निर्णय शीघ्र हो सकते हैं और उन निर्णयों को दृढ़ता से लागू किया जा सकता है।

4. नीति में एकरूपता (Consistent Policy) तानाशाही में नीति में एकरूपता रहती है। जब तक एक तानाशाही सत्ता में रहता है तब तक नीति में एकरूपता बनी रहती है। तानाशाह प्रायः अपनी नीतियों में परिवर्तन नहीं करते क्योंकि ऐसा करना उन के हित में नहीं होता।

5. राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण (Building of National Character)-अधिनायकतन्त्र में शिक्षा प्रणाली में सुधार करके नवयुवकों में देशभक्ति, आत्मत्याग तथा बलिदान की भावनाएं भरी जाती हैं। अधिनायकतन्त्र में राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण पर बहुत अधिक जोर दिया जाता है।

6. उचित नियमों पर आधारित (It is based on sound Principles)-तानाशाही इस उचित नियम पर आधारित है कि प्रत्येक शासन चलाने के योग्य नहीं है। योग्य व्यक्ति ही देश का शासन चला सकते हैं। तानाशाही में योग्य व्यक्तियों को ही उचित पदों पर नियुक्त किया जाता है। तानाशाही में तानाशाह सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति होता है, जो जनता का नेतृत्व करता है।

7. प्रशासन खर्चीला नहीं है (Administration is not Costly)-प्रजातन्त्र में चुनावों पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं और राज्यों में दर्जनों मन्त्री, गवर्नर, सैंकड़ों संसद् सदस्य होते हैं जबकि तानाशाही में एक व्यक्ति का शासन होता है। तानाशाही में चुनाव नहीं होते जिसमें करोड़ों रुपयों की बचत होती है।

8. राष्ट्र का सम्मान बढ़ता है (National Prestige is Enhanced)-तानाशाही व्यवस्था में शक्तिशाली सरकार
की स्थापना की जाती है जिससे राष्ट्र की शक्ति बढ़ती है और शक्ति की वृद्धि से राष्ट्र का सम्मान बढ़ता है। हिटलर ने जर्मनी की प्रतिष्ठा को बढ़ाया और मुसोलिनी ने इटली की खोई हुई प्रतिष्ठा को फिर से कायम किया। साम्यवादी क्रान्ति के बाद सोवियत संघ ने अपने राज्य का अत्यधिक विकास किया था क्योंकि वहां साम्यवादी दल की तानाशाही पाई जाती थी।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

9. सामाजिक तथा उत्सर्धक विकास (Social aod Economic Progress).- तानाशाही में देश की सामाजिक तथा आर्थिक उन्नत बहुत होती है । तानाशाही जनता क आर्थिक विकास की ओर विशेष ध्यान देता है और देश को आत्मनिर्भर बनाने का यह करता है। कृषि वियोग, साहिरक कला आदि क्षेत्रों में बहुत उन्नति होती है।

10. राष्ट्रीय एकता (National Solidarity)-तानाशाही में शासक का लोगों पर और लोगों के हर पक्ष पर पूर्ण नियन्त्रण होता है। लोगों को चुनाव, भाषण आदि सम्वनी अधिकार नहीं मिलते। ये अधिकार लोगों में किसी हद तक फूट आदि के कारण बन जाते हैं। दूसरे तानाशाह युद्ध का वातावरण बनाए रखते हैं। इन सब बातों से देश के लोगों में आपसी एकता और देशभवित की भावना प्रकण्ड हो अन्दा है।

तानाशाही शासन के दोष (Demerits Of Dictattirship)-

तानाशाही में अनेक गुण के होते हुए भी इस शास:: :: गली का अच्छा नहीं समझा जाता। तानाशाह व्यवस्था में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

  • यह शक्ति और हिंसा पर आधारित है (It is based on Force and Violence) तानाशाही शासन शक्ति पर आधारित होता है। इसमें शक्ति और हिंसात्मक साधनों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। वास्तव में राज्य का आधार शक्ति न हो कर जनता की इच्छा होनी चाहिए। जो शासनवता की इच्छा पर निर्भर करता है वही स्थिर हो सकता
  • व्यक्ति को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता (No Importance is given to the Individual) तानाशाही में व्यक्ति को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। तानाशाही में राज्य को साध्य तथा व्यक्ति को साधन माना जाता है। शासन का उद्देश्य व्यक्ति का विकास न होकर राज्य का विकास करना होता है।
  • नागरिकों को अधिकार तथा स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होती (No rights and Liberties to the Citizens)तानाशाही में नागरिकों को अधिकार तथा स्वतन्त्रताएं प्राप्त नहीं होतीं। अधिकारों के बिना व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता ! इस शासन-व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को समाप्त कर दिया जाता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीयता का विरोध करता है (It opposes Internationalism)-आज का युग अन्तर्राष्ट्रीयता का युग है। एक देश दूसरे देश के सहयोग पर निर्भर करता है, परन्तु तानाशाही व्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीयता में विश्वास नहीं करती। मुसोलिनी तथा हिटलर ने लीग ऑफ नेशन्ज़ (League of Nations) को असफल बनाने के भरसक प्रयत्न किए। इस प्रकार तानाशाही अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए खतरा है।
  • विस्तार की नीति (Policy of Expansion) तानाशाही साम्राज्यवाद में विश्वास करती है। तानाशाह सदैव राज्य के विस्तार की नीति को अपनाता है। मुसोलिनी कहा करता था—“इटली का विस्तार करो या मिट जाओ।” विस्तार की नीति से युद्धों का उदय होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि तानाशाह सदैव युद्ध में लगे रहते हैं।
  • निर्बल उत्तराधिकारी (Weak Successors)—यह आवश्यक नहीं कि तानाशाह का उत्तराधिकारी योग्य और बुद्धिमान् हो। इतिहास से पता चलता है कि बुद्धिमान् तानाशाह के उत्तराधिकारी अयोग्य और निर्बल ही हुए हैं। मुसोलिनी और हिटलर के पश्चात् इटली तथा जर्मनी को कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं मिल सका।
  • क्रान्ति का डर (Fear of Revolution)-तानाशाह शक्ति के ज़ोर पर शासन चलाता है और अपने प्रतिद्वन्द्वियों को कुचल डालता है। तानाशाह के विरोधियों को शासन बदलने के लिए क्रान्ति का सहारा लेना पड़ता है।
  • चरित्र के विकास में बाधा (It hinders the development of Character) तानाशाही में लोगों में आत्मनिर्भरता की भावना का अभाव होता है। उनका धैर्य कम हो जाता है और उनकी सार्वजनिक मामलों में रुचि कम हो जाती है। इससे उनके चरित्र के निर्माण में बाधा उत्पन्न होती है जिससे उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता।
  • यह नागरिकों में उदासीनता उत्पन्न करता है (It creates a feelins of apathy among the Citizens)- तानाशाही में शासन की सत्ता एक काका के पास केन्द्रित होती है। साधारण जनता को शासन से दूर रखा जाता है, जिससे जनता में शासन के प्रति उदासीनत उत्पन्न हो जाती है अतः वे राज्य के कार्यों में रुचि लेना बन्द कर देते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)-तानाशाही के गुणों तथा अवगुणों के अध्ययन के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि तानाशाही सरकार संकटकाल के लिए तथा आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए अच्छी सरकार है। परन्तु स्थायी रूप में यह शासन प्रणाली अच्छी नहीं है। तानाशाही प्रजातन्त्र का विकल्प नहीं हो सकता। प्रजातन्त्रीय सरकार के मुकाबले में तानाशाही सरकार दोषपूर्ण है, क्योंकि इसमें व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को नष्ट किया जाता है। आज का युग तानाशाही का युग नहीं है। इसलिए संसार के अधिकांश देशों में प्रजातन्त्र को अपनाया गया है।

प्रश्न 8.
लोकतान्त्रिक और अधिनायकतन्त्रीय सरकारों में क्या अन्तर है ? उदाहरण सहित समझाइए।
(What is the distinction between a D mocratic and an authoritarian Governacht? Give example.)
अथवा
यदि तुम से प्रजातन्त्र और तानाशाही में से एक को चनन को कहा जाmissing तो किस चुनोगे ? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।
(If you were to choose between Democracy and Dictatorship which one would you prefer? Give arguments to support your answer.)
उत्तर-
प्रथम महायुद्ध के पश्चात् इटली तथा जर्मनी से प्रनारान्त्रिक सरकारों को समाप्त करके मुसोलिनी तथा हिटलर ने तानाशाही को स्थापित किया। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् चीन, युगोस्लाविया, बुल्गारिया, रूमानिया, हंगरी, पोलैंड इत्यादि साम्यवादी देशों में साम्यवादी दल की तानाशाही स्थापित की गई। परन्तु अब रूमानिया, पोलैंड, युगोस्लाविया, हंगरी, रूस आदि देशो में बहु-दलीय पद्धति को अपनाया गया है। चीन, क्यूबा, उत्तरी कोरिया आदि देशों में साम्यवादी दल की तानाशाही ही पाई जाती है।

परन्तु संसार के अधिकांश देशों में प्रजातन्त्रीय सरकारें पाई जाती हैं । इंग्लैण्ड, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, स्विट्ज़रलैण्ड, जापान तथा भारत इत्यादि महान् देशों में प्रजातन्त्र को ही अपनाया गया है। 1989 में अनेक साम्यवादी देशों में साम्यवादी दल की तानाशाही समाप्त करके बहु-दलीय लोकतन्त्र को अपनाया गया है। यहां तक कि साम्यवाद के आधार स्तम्भ सोवियत संघ का विघटन होने के बाद वहां भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाया गया है। प्रजातन्त्र तथा तानाशाही शासन एक-दूसरे के विरोधी हैं। दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं। प्रजातन्त्र और तानाशाही शासन में तुलनः ऋना बड़ा ही मनोरंजक है। यदि मुझे प्रजातन्त्र और तानाशाही में से एक चुनने को कहा जाए तो मैं प्रजातन्त्र को करूंगा। इन दोनों में अन्तर करने पर हम देखते हैं कि अग्र कारणों से लोकतन्त्र को तानाशाही की अपेक्षा अधिक किया जाता है

प्रजातन्त्र (Democracy) –

  • जनता का शासन-प्रजातन्त्र जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए शासन है। प्रजातन्त्र में जनता स्वयं प्रत्यक्ष तौर पर अथवा अपने प्रतिनिधियों के द्वारा शासन में भाग लेती है।
  • जनमत पर आधारित-प्रजातन्त्र जनमत पर आधारित है।
  • सरकार को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा बदला जा सकता है-जनता जिस सरकार को पसन्द नहीं करती, उसे चुनावों में हटा दिया जाता है। प्रजातन्त्र में निश्चित अवधि के पश्चात् चुनाव करवाए जाते हैं, जिससे नागरिकों को सरकार बदलने का अवसर प्राप्त हो जाता है।
  • व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास-प्रजातन्त्र में व्यक्ति को महत्त्व दिया जाता है। राज्य का उद्देश्य करना न होकर राज्य का विकास करना होता है। राज्य साध्य तथा व्यक्ति साधन होता है।
  • व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर बल-प्रजातन्त्र में नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • समानता पर आधारित-सभी नागरिकों को शासन में भाग लेने का समान अधिकार प्राप्त होता है और कानून के सामने भी नागरिकों को समान माना जाता है।
  • शान्ति तथा व्यवस्था में विश्वास-प्रजातन्त्र शान्ति तथा व्यवस्था में विश्वास रखता है। प्रजातन्त्र हिंसात्मक साधनों को अनुचित मानता है।
  • साम्राज्यवाद के विरुद्ध-प्रजातन्त्र साम्राज्यवाद के विरुद्ध है। प्रजातन्त्र का विश्वास है कि प्रत्येक राष्ट्र को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए अर्थात् प्रत्येक राष्ट्र का राज्य होना चाहिए।
  • प्रत्येक निर्णय तर्क तथा वाद-विवाद से लिया जाता है-प्रजातन्त्र में प्रत्येक निर्णय पर पहुंचने से पहले वाद-विवाद होता है और फिर निर्णय किया जाता है।
  • सरकार की आलोचना का अधिकार-प्रजातन्त्र में जनता को सरकार की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त होता है।
  • दलों का होना अनिवार्य-प्रजातन्त्र में कम-से- कम दो दल अवश्य होते हैं। बिना राजनीतिक दलों के प्रजातन्त्र को सफल नहीं बनाया जा सकता।
  • राज्य और सरकार में भेद-प्रजातन्त्र में राज्य और सरकार में भेद किया जाता है। सरकार राज्य का एक अंग होती है। सरकार की शक्तियां सीमित होती हैं। सरकार अपनी शक्तियां जनता से प्राप्त करती है।
  • सरकार का उत्तरदायित्त्व-प्रजातन्त्र में सरकार अपने सब कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होती है और विशेष कर संसदीय शासन प्रणाली में विधानमण्डल के प्रति भी उत्तरदायी होती है।

तानाशाही (Dictatorship) –

  •  एक व्यक्ति अथवा एक पार्टी का शासन तानाशाही के शासन की सत्ता एक व्यक्ति में केन्द्रित होती है। साधारण जनता को शासन में भाग लेने का अधिकार प्राप्त नहीं होता।
  • शक्ति पर आधारित तानाशाही का आधार निरंकुश शक्ति है।
  • सरकार को केवल क्रान्ति द्वारा बदला जा सकता है-तानाशाही में सरकार को केवल विद्रोह अथवा क्रान्ति के द्वारा ही बदला जा सकता है। सरकार को शान्तिपूर्ण ढंग से नहीं बदला जा सकता, क्योंकि इस शासन-व्यवस्था में चुनाव की कोई व्यवस्था नहीं होती।
  • राज्य का विकास-तानाशाही में राज्य को महत्त्व दिया जाता है। प्रजातन्त्र में राज्य का उद्देश्य व्यक्तियों का विकास व्यक्तियों के व्यक्तित्व का विकास करना होता है।
  • अधिकार व स्वतन्त्रताएं नाममात्र की तानाशाही में नागरिकों को अधिकार तथा स्वतन्त्रताएं नाममात्र की ही प्राप्त होती हैं। तानाशाही में नागरिकों के कर्त्तव्य पर बहुत बल दिया जाता है।
  • समानता के सिद्धान्त को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता-तानाशाही में कुछ व्यक्तियों को श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को शासन में भाग लेने का अधिकार प्राप्त नहीं होता।
  • युद्ध तथा हिंसा में विश्वास-तानाशाही युद्ध तथा हिंसा में विश्वास रखता है। तानाशाह का विश्वास है कि प्रत्येक समस्या का समाधान शक्ति द्वारा किया जा सकता है।
  • साम्राज्यवाद में विश्वास-तानाशाह विस्तार की नीति में विश्वास रखता है। तानाशाही में यह नारा लगाया जाता है कि “विस्तार करो या मिट जाओ।” तानाशाही अन्तर्राष्ट्रीयता का विरोध करता है।
  • वाद-विवाद का कोई महत्त्व नहीं- तानाशाही में वाद-विवाद से काम नहीं किया जाता। तानाशाह बिना किसी की सलाह लिए भी निर्णय कर लेता है।
  • सरकार की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता-तानाशाही में किसी को सरकार की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता।
  • कोई दल नहीं अथवा एक दल-तानाशाही में या तो दल होता ही नहीं और यदि होता है तो केवल एक दल। तानाशाह उसी दल का नेता होता है।
  • राज्य और सरकार में कोई भेद नहीं-तानाशाह को ही राज्य तथा सरकार माना जाता है। राज्य की समस्त शक्तियां तानाशाह के पास होती हैं और उस पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं होता।
  • अनुत्तरदायित्व सरकार-तानाशाही में शासक जनता अथवा विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। शासक अपनी मनमानी कर सकता है और शासक पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं होता है।

कौन-सी प्रणाली सबसे अधिक अच्छी है (Which of them is better ?)-दोनों प्रणालियों के गुणों और दोषों को सम्मुख रखते हुए यह कहा जा सकता है कि प्रजातन्त्र अधिक अच्छी प्रणाली है। इस प्रणाली में व्यक्ति को व्यक्ति ही समझा जाता है, पशु नहीं। व्यक्ति के विकास और उत्थान के लिए आवश्यक वातावरण केवल प्रजातन्त्र में ही मिल सकता है। अनेक साम्यवादी देशों में बहु-दलीय लोकतन्त्र की स्थापना हो जाना लोकतन्त्र की श्रेष्ठता को ही साबित करता है।

इसमें शक नहीं कि प्रजातन्त्र के कई दोष भी हैं परन्तु ये दोष प्रजातन्त्र शासन प्रणाली के अपने नहीं हैं बल्कि लोगों में कुछ आवश्यक गुणों के अभाव से उत्पन्न होते हैं। अनुभव इस बात को स्पष्टतया सिद्ध करता है कि जिन देशों में ये आवश्यक गुण और परिस्थितियां जितनी अधिक विद्यमान होती हैं, प्रजातन्त्र उतना ही सफलतापूर्वक काम करता है। इंग्लैण्ड में राजतन्त्रीय ढांचे के होते हुए भी लोकतन्त्रीय प्रणाली बड़े अच्छे ढंग से कार्य कर रही है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकतन्त्र का अर्थ बताओ।
उत्तर-
आधुनिक युग लोकतन्त्र का युग है। लोकतन्त्र ग्रीक भाषा के दो शब्दों डिमोस (Demos) और क्रेटिया (Cratia) से मिलकर बना है। डिमोस का अर्थ है लोग और क्रेटिया का अर्थ है ‘शक्ति’ या ‘सत्ता’। इस प्रकार डेमोक्रेसी का शाब्दिक अर्थ वह शासन है जिसमें शक्ति या सत्ता लोगों के हाथ में हो। दूसरे शब्दों में लोकतन्त्र सरकार का अर्थ है प्रजा का शासन।

  • प्रो० डायसी का कहना है कि, “प्रजातन्त्र ऐसी शासन प्रणाली है, जिसमें शासक वर्ग समाज का अधिकांश भाग हो।”
  • प्रो० सीले के अनुसार, “प्रजातन्त्र ऐसा शासन है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति भाग लेता है।”
  • लोकतन्त्र की बहुत सुन्दर, सरल तथा लोकप्रिय परिभाषा अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राह्म लिंकन ने इस प्रकार दी है कि, “प्रजातन्त्र जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा सरकार है।”

प्रश्न 2.
लोकतन्त्र की चार विशेषताएं लिखें।
उत्तर-
लोकतन्त्र की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • जनता की प्रभुसत्ता-प्रजातन्त्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और जनता ही शक्ति का स्रोत होती है।
  • जनता का शासन-प्रजातन्त्र में शासन जनता द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर चलाया जाता है। प्रजातन्त्र में प्रत्येक निर्णय बहुमत से लिया जाता है।
  • जनता का हित-प्रजातन्त्र में शासन जनता के हित के लिए चलाया जाता है।
  • समानता-समानता प्रजातन्त्र का मूल आधार है। प्रजातन्त्र में प्रत्येक मनुष्य को समान समझा जाता है। जन्म, जाति, शिक्षा, धन आदि के आधार पर मनुष्यों में भेद-भाव नहीं किया जाता। सभी मनुष्यों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। कानून के सामने सभी व्यक्ति समान होते हैं।

प्रश्न 3.
प्रजातन्त्र के चार गुण लिखें।
उत्तर-
प्रजातन्त्र में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं

  • यह सर्वसाधारण के हितों की रक्षा करता है-प्रजातन्त्र की यह सब से बड़ी विशेषता है कि इसमें राज्य के किसी विशेष वर्ग के हितों की रक्षा न करके समस्त जनता के हितों की रक्षा की जाती है।
  • यह जनमत पर आधारित है-प्रजातन्त्र शासन जनमत पर आधारित है अर्थात् शासन जनता की इच्छानुसार चलाया जाता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को निश्चित अवधि के लिए चुनकर भेजती है। यदि प्रतिनिधि जनता की
    इच्छानुसार शासन नहीं चलाते तो उन्हें दोबारा नहीं चुना जाता है। इस शासन प्रणाली में सरकार जनता की इच्छाओं की ओर विशेष ध्यान देती है।
  • यह समानता के सिद्धान्त पर आधारित है-प्रजातन्त्र में सभी नागरिकों को समान माना जाता है। किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म, लिंग के आधार पर कोई विशेष अधिकार नहीं दिए जाते। प्रत्येक वयस्क को बिना भेदभाव के मतदान, चुनाव लड़ने तथा सार्वजनिक पद प्राप्त करने का समान अधिकार प्राप्त होता है। सभी मनुष्यों को कानून के सामने समान माना जाता है।
  • जनता को राजनीतिक शिक्षा मिलती है-प्रजातन्त्र में नागरिकों को अन्य शासन प्रणालियों की अपेक्षा अधिक राजनीतिक शिक्षा मिलती है।

प्रश्न 4.
लोकतन्त्र के चार दोष लिखें।
उत्तर-
जहां एक ओर लोकतन्त्र में इतने गुण पाए जाते हैं वहीं दूसरी ओर इसमें निम्नलिखित अवगुण भी पाए जाते हैं-

  • यह अज्ञानियों, अयोग्य तथा मूल् का शासन है-प्रजातन्त्र को अयोग्यता की पूजा बताया जाता है। इसका कारण यह है कि जनता में अधिकांश व्यक्ति अयोग्य, मूर्ख, अज्ञानी तथा अनपढ़ होते हैं।
  • यह गुणों के स्थान पर संख्या को अधिक महत्त्व देता है-प्रजातन्त्र में गुणों की अपेक्षा संख्या को अधिक महत्त्व दिया जाता है। यदि किसी विषय को 60 मूर्ख ठीक कहें और 59 बुद्धिमान् ग़लत कहें तो मूों की ही बात को माना जाएगा। इस प्रकार लोकतन्त्र में मूल् का शासन होता है।
  • यह उत्तरदायी शासन नहीं है-वास्तव में प्रजातन्त्र अनुत्तरदायी शासन है। इसमें नागरिक केवल चुनाव वाले दिन ही सम्प्रभु होते हैं । परन्तु चुनावों के पश्चात् नेता जानते हैं कि जनता उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती अतः वे अपनी मनमानी करते हैं।
  • बहुमत की तानाशाही-प्रजातन्त्र में प्रत्येक निर्णय बहुमत से किया जाता है, जिस कारण प्रजातन्त्र में बहुमत की तानाशाही की स्थापना हो जाती है।

प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र किसे कहते हैं ?
उत्तर-
प्रत्यक्ष या शुद्ध प्रजातन्त्र-प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र ही प्रजातन्त्र का वास्तविक रूप है। जब जनता स्वयं कानून बनाए, राजनीति को निश्चित करे तथा सरकारी कर्मचारियों पर नियन्त्रण रखे, उस व्यवस्था को प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कहते हैं। समय-समय पर समस्त नागरिकों की सभा एक स्थान पर बुलाई जाती है और उसमें सार्वजनिक मामलों पर विचार होता है तथा शासन-सम्बन्धी प्रत्येक बात का निर्णय होता है। प्राचीन समय में ऐसे प्रजातन्त्र विशेष रूप से यूनान और रोम में विद्यमान थे, परन्तु आधुनिक युग में बड़े-बड़े राज्य हैं जिनकी जनसंख्या भी बहुत अधिक है और भू-भाग भी बड़ा है। नागरिकों की संख्या भी पहले से अधिक हो गई है। अतः प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र सम्भव नहीं है। रूसो प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र का ही पुजारी था इसीलिए उसने कहा है कि इंग्लैंड के लोग केवल चुनाव वाले दिन ही स्वतन्त्र होते हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

प्रश्न 6.
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की संस्थाओं के नाम लिखें और किन्हीं दो का वर्णन करें।
उत्तर-
प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की संस्थाएं कुछ देशों में मिलती हैं जैसे प्रस्तावाधिकार, जनमत संग्रह, प्रत्यावर्तन या वापसी, लोकमत संग्रह आदि।

1. प्रस्तावाधिकार-इसके द्वारा मतदाताओं को अपनी इच्छा के अनुसार कानून बनाने का अधिकार होता है। यदि मतदाताओं की एक निश्चित संख्या किसी कानून को बनवाने की मांग करे तो संसद् अपनी इच्छा से उस मांग को रद्द नहीं कर सकती। यदि संसद् उस प्रार्थना के अनुसार कानून बना दे तो सबसे अच्छी बात है। यदि संसद् उस मांग से सहमत न हो तो वह समस्त जनता की राय लेती है और यदि मतदाता बहुमत से उस मत का समर्थन कर दें तो संसद् को वह कानून बनाना ही पड़ता है। स्विट्ज़रलैंड में 1,00,000 मतदाता कोई भी कानून बनाने के लिए संसद् को कह सकते हैं।

2. जनमत संग्रह-जनमत संग्रह द्वारा संसद् के बनाए हुए कानून लोगों के सामने रखे जाते हैं। वे कानून तभी पास हुए समझे जाते हैं यदि मतदाताओं का बहुमत उनके पक्ष में हो, नहीं तो वह कानून रद्द हो जाता है। इस प्रकार यदि संसद् कोई ऐसा कानून बना भी दे जिसे जनता अच्छा न समझती हो तो जनता उसे लागू होने से रोक सकती है। स्विट्जरलैंड में यह नियम है कि कानूनों को लागू करने से पहले जनता की राय ली जाती है। रूस में ऐच्छिक जनमतसंग्रह का सिद्धान्त अपनाया गया है।

प्रश्न 7.
आधुनिक युग में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र क्यों नहीं सम्भव है ?
उत्तर-
आधुनिक युग में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र सम्भव नहीं है। इसका कारण यह है कि आधुनिक राज्य आकार और जनसंख्या दोनों ही दृष्टियों में विशाल है। भारत, चीन, अमेरिका, रूस आदि देशों की जनसंख्या करोड़ों में है। इन देशों में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र को अपनाना सम्भव नहीं है। भारत में जनमत-संग्रह करवाना आसान कार्य नहीं है और न ही प्रस्तावाधिकार या उपक्रमण (Initiative) द्वारा जनता की इच्छानुसार कानून बनाए जा सकते हैं। भारत में आम चुनाव करवाने पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और चुनाव व्यवस्था पर बहुत अधिक समय लगता है। अतः प्रत्यक्ष लोकतन्त्र की संस्थाओं को लागू करना सम्भव नहीं है। आधुनिक युग में लोकतन्त्र का अर्थ लोगों द्वारा अप्रत्यक्ष शासन ही है।

प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में चार अन्तर लिखें।
उत्तर-
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र के बीच अन्तर को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में लोग स्वयं शासन में प्रत्यक्ष रूप में भाग लेते हैं जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में शासन जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के द्वारा चलाया जाता है।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को शासक समझता है जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में केवल प्रतिनिधि ही शासक समझे जाते हैं।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता स्वयं कानून के निर्माण में भाग लेती है। इसलिए जनता अपने ही बनाए गए कानूनों का अधिक पालन करती है जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता के स्वयं कानून निर्माण में भाग लेने के कारण कानूनों के पालन की मात्रा इतनी अधिक नहीं होती।
  • प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र की अपेक्षा जनता को अधिक राजनीतिक शिक्षण मिलता है।

प्रश्न 9.
प्रजातन्त्र की सफलता के लिए किन्हीं चार आवश्यक शर्तों का वर्णन करें।
उत्तर-
लोकतन्त्र के सफलतापूर्वक काम करने के लिए निम्नलिखित परिस्थितियों का होना आवश्यक समझा जाता है-

  • जागरूक नागरिक-जागरूक नागरिकता प्रजातन्त्र की सफलता की पहली शर्त है। निरन्तर देख-रेख ही स्वतन्त्रता की कीमत है। नागरिक अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने चाहिएं।
  • प्रजातन्त्र से प्रेम-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों के दिलों में प्रजातन्त्र के लिए प्रेम होना चाहिए। बिना प्रजातन्त्र से प्रेम के प्रजातन्त्र कभी सफल नहीं हो सकता।
  • शिक्षित नागरिक-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए शिक्षित नागरिकों का होना आवश्यक है। शिक्षित नागरिक प्रजातन्त्र शासन की आधारशिला हैं। शिक्षा से ही नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कर्त्तव्यों का ज्ञान होता है।
  • स्थानीय स्वशासन-प्रजातन्त्र की सफलता के लिए स्थानीय स्वशासन का होना आवश्यक है। स्थानीय संस्थाओं के द्वारा नागरिकों को शासन में भाग लेने का अवसर मिलता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

प्रश्न 10.
अधिनायकवाद या तानाशाही का अर्थ एवं परिभाषा लिखें।
उत्तर-
तानाशाही में शासन की सत्ता एक व्यक्ति में निहित होती है। अधिनायक अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है और वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। वह तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक शासन की शक्ति उसके हाथों में रहती है।
फोर्ड ने तानाशाही की परिभाषा देते हुए कहा है, “तानाशाही राज्य के अध्यक्ष द्वारा गैर-कानूनी शक्ति प्राप्त करना है।”
अल्फ्रेड ने अधिनायकतन्त्र की बड़ी सुन्दर और विस्तृत परिभाषा इस प्रकार दी है, “अधिनायकतन्त्र उस व्यक्ति का शासन है जिसने स्तर और स्थिति के पैतृक अधिकार से प्राप्त न करके शक्ति या स्वीकृति सम्भवतः दोनों के मिश्रण से प्राप्त किया हो। उसके पास निरंकुश प्रभुसत्ता का होना अनिवार्य है अर्थात् वह समस्त राजनीतिक सत्ता का स्रोत है और उस सत्ता पर सीमा नहीं होनी चाहिए। वह शक्ति का प्रयोग कानून के द्वारा नहीं स्वेच्छापूर्ण ढंग से आदेशों द्वारा करता है। अन्ततः उसकी सत्ता किसी निश्चित कार्यकाल तक सीमित नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस प्रकार की सीमा निरंकुश शासन से मेल नहीं खाती है।”

प्रश्न 11.
आधुनिक तानाशाही की चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
आधुनिक तानाशाही की निम्नलिखित चार विशेषताएं हैं-

  • राज्य की निरंकुशता-आधुनिक तानाशाही में राज्य निरंकुशवादी होते हैं। तानाशाही सरकार की शक्तियां असीमित हैं जिन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता।
  • राज्य साध्य है और व्यक्ति एक साधन है-तानाशाही में राज्य को साध्य तथा व्यक्ति को साधन माना जाता है। तानाशाही के समर्थकों का कहना है कि राज्य के हित में ही नागरिक का हित है। अत: नागरिकों का कर्तव्य है कि वे राज्य की आज्ञाओं का पालन करें और राज्य के हित के लिए अपना बलिदान करने के लिए सदा तैयार रहें।
  • राज्य और समाज में कोई अन्तर नहीं किया जाता-आधुनिक तानाशाही में राज्य और समाज में कोई अन्तर नहीं माना जाता। आधुनिक तानाशाही के समर्थकों के अनुसार राज्य को व्यक्ति के प्रत्येक क्षेत्र को नियमित करने तथा उसके प्रत्येक कार्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
  • अधिकारों और स्वतन्त्रताओं का न होना-तानाशाही में नागरिकों को अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं से वंचित कर दिया जाता है।

प्रश्न 12.
तानाशाही के चार गुण लिखो।।
उत्तर-
तानाशाही में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं –

  • दृढ़ तथा स्थिर शासन-तानाशाही का प्रथम गुण यह है कि इससे शासन में स्थिरता आती है। वह एक बार जो संकल्प कर लेता है उसी पर दृढ़ रहता है, इससे शासन में स्थिरता और नीतियों में निरन्तरता आती है।
  • शासन में कुशलता-तानाशाह ऊंचे पदों पर योग्य व्यक्तियों को नियुक्त करता है और शासन में घूसखोरी, लाल फीताशाही तथा पक्षपात को समाप्त करता है। वह आवश्यकता के अनुसार निर्णय लेता है। इस प्रकार तानाशाह शीघ्र ही निर्णय लेकर शासन की नीतियों को लागू करता है जिससे शासन में कार्यकुशलता आती है।
  • संकटकाल के लिए उचित सरकार-तानाशाही सरकार संकटकाल के लिए उचित है। शासन की समस्त शक्तियां तानाशाह में केन्द्रित होती हैं। निर्णय शीघ्र ही ले लिए जाते हैं और उन निर्णयों को कठोरता एवं दृढ़ता से लागू किया जाता है।
  • नीति में एकरूपता-तानाशाही में नीति में एकरूपता बनी रहती है।

प्रश्न 13.
तानाशाही के कोई चार दोष लिखो।
उत्तर-
तानाशाही में अनेक गुणों के होते हुए भी इस शासन प्रणाली को अच्छा नहीं समझा जाता। इसमें निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

  • यह शक्ति और हिंसा पर आधारित है-तानाशाही शासन शक्ति पर आधारित होता है। इसमें शक्ति और हिंसात्मक साधनों को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
  • व्यक्ति को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता-तानाशाही में व्यक्ति को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। तानाशाही में राज्य को साध्य तथा व्यक्ति को साधन माना जाता है। शासन का उद्देश्य व्यक्ति का विकास न होकर राज्य का विकास करना होता है।
  • नागरिकों को अधिकार तथा स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होती-तानाशाही में नागरिकों को अधिकार तथा स्वतन्त्रताएं प्राप्त नहीं होतीं। अधिकारों के बिना व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता। इस शासन व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को समाप्त कर दिया गया है।
  • विस्तार की नीति-तानाशाही विस्तार की नीति अर्थात् साम्राज्यवाद में विश्वास करती है।

प्रश्न 14.
लोकतन्त्र तथा तानाशाही में कोई चार अन्तर बताएं।
उत्तर-
लोकतन्त्र तथा तानाशाही में निम्नलिखित मुख्य अन्तर पाए जाते हैं
प्रजातन्त्र

  • जनता का शासन-प्रजातन्त्र जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए शासन है। प्रजातन्त्र में जनता स्वयं प्रत्यक्ष तौर पर अथवा अपने प्रतिनिधियों के द्वारा शासन में भाग लेती है।
  • जनमत पर आधारित-प्रजातन्त्र जनमत पर आधारित है।
  • सरकार को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा बदला जा सकता है-जनता जिस सरकार को पसन्द नहीं करती, उसे चुनावों में हटा दिया जाता है।
  • व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास-प्रजातन्त्र में राज्य का उद्देश्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व का विकास करना होता है।

तानाशाही

  • एक व्यक्ति अथवा एक पार्टी का शासन तानाशाही के शासन की सत्ता एक व्यक्ति में केन्द्रित होती है। साधारण जनता को शासन में भाग लेने का
    अधिकार प्राप्त नहीं होता।
  • शक्ति पर आधारित-तानाशाही का आधार निरंकुश शक्ति है।
  • सरकार को केवल क्रान्ति द्वारा बदला जा सकता है-तानाशाही में सरकार को केवल विद्रोह अथवा क्रान्ति के द्वारा ही बदला जा सकता है।
  • राज्य का विकास-तानाशाही राज्य में राज्य का उद्देश्य व्यक्तियों का विकास करना न होकर राज्य का विकास करना होता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

प्रश्न 15.
यदि आपको प्रजातन्त्र व राजतन्त्र में चयन करने के लिए कहा जाए तो आप किस सरकार को पसन्द करेंगे ? अपने मत के समर्थन में चार तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर-
यदि मुझे प्रजातन्त्र और राजतन्त्र में चयन करने के लिए कहा जाए तो मैं प्रजातन्त्र को पसन्द करूंगा। प्रजातन्त्र को पसन्द करने के कई कारण हैं, जिनमें महत्त्वपूर्ण कारण इस प्रकार हैं-

  • प्रजातन्त्र जनता का अपना शासन है। शासन जनता के हित में चलाया जाता है जबकि राजतन्त्र में एक व्यक्ति का शासन होता है।
  • प्रजातन्त्र में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं, परन्तु राजतन्त्र में ऐसा अनिवार्य नहीं।
  • प्रजातन्त्र में चुनाव होते हैं जिससे लोगों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है, परन्तु राजतन्त्र में जनता को राजनीतिक शिक्षा नहीं मिलती।
  • प्रजातन्त्र में लोगों को अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होती है, जबकि राजतन्त्र में ऐसा नहीं होता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकतन्त्र से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
आधुनिक युग लोकतन्त्र का युग है। लोकतन्त्र ग्रीक भाषा के दो शब्दों डिमोस (Demos) और क्रेटिया (Cratia) से मिलकर बना है। डिमोस का अर्थ है लोग और क्रेटिया का अर्थ है ‘शक्ति’ या ‘सत्ता’। इस प्रकार डेमोक्रेसी का शाब्दिक अर्थ वह शासन है जिसमें शक्ति या सत्ता लोगों के हाथ में हो। दूसरे शब्दों में लोकतन्त्र सरकार का अर्थ है प्रजा का शासन।

प्रश्न 2.
प्रजातन्त्र (लोकतंत्र) की कोई दो परिभाषाएं दें।
उत्तर-

  1. प्रो० सीले के अनुसार, “प्रजातन्त्र ऐसा शासन है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति भाग लेता है।”
  2. लोकतन्त्र की बहुत सुन्दर, सरल तथा लोकप्रिय परिभाषा अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने इस प्रकार दी है कि, “प्रजातन्त्र जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा सरकार है।”

प्रश्न 3.
लोकतन्त्र की दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. जनता की प्रभुसत्ता– प्रजातन्त्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और जनता ही शक्ति का स्रोत होती है।
  2. जनता का शासन-प्रजातन्त्र में शासन जनता द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर चलाया जाता है। प्रजातन्त्र में प्रत्येक निर्णय बहुमत से लिया जाता है।

प्रश्न 4.
अधिनायकवाद या तानाशाही का अर्थ लिखें।
उत्तर-
तानाशाही में शासन की सत्ता एक व्यक्ति में निहित होती है। अधिनायक अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है और वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। वह तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक शासन की शक्ति उसके हाथों में रहती है।

प्रश्न 5.
आधुनिक तानाशाही की दो विशेषताएं बताओ।
उत्तर-

  • राज्य की निरंकुशता-आधुनिक तानाशाही में राज्य निरंकुशवादी होते हैं।
  • राज्य साध्य है और व्यक्ति एक साधन है-तानाशाही में राज्य को साध्य तथा व्यक्ति को साधन माना जाता है। तानाशाही के समर्थकों का कहना है कि राज्य के हित में ही नागरिक का हित है। अत: नागरिकों का कर्तव्य है कि वे राज्य की आज्ञाओं का पालन करें और राज्य के हित के लिए अपना बलिदान करने के लिए सदा तैयार रहें।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

प्रश्न 6.
तानाशाही के दो गुण लिखो।
उत्तर-

  • दृढ़ तथा स्थिर शासन-तानाशाही का प्रथम गुण यह है कि इससे शासन में स्थिरता आती है। शासन की समस्त शक्तियां एक ही व्यक्ति के हाथों में केन्द्रित होती हैं।
  • शासन में कुशलता-तानाशाह शीघ्र ही निर्णय लेकर शासन की नीतियों को लागू करता है जिससे शासन में कार्यकुशलता आती है।

प्रश्न 7.
तानाशाही के कोई दो दोष लिखो।
उत्तर-

  • यह शक्ति और हिंसा पर आधारित है-तानाशाही शासन शक्ति पर आधारित होता है। इसमें शक्ति और हिंसात्मक साधनों को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
  • व्यक्ति को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता-तानाशाही में व्यक्ति को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। तानाशाही में राज्य को साध्य तथा व्यक्ति को साधन माना जाता है। शासन का उद्देश्य व्यक्ति का विकास न होकर राज्य का विकास करना होता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. प्रजातन्त्र का क्या अर्थ है ?
उत्तर-प्रजातन्त्र का अर्थ है वह शासन प्रणाली जिसमें राज्य की सत्ता प्रजा अर्थात् जनता के हाथ में हो।

प्रश्न 2. प्रजातन्त्र (Democracy) किन दो शब्दों से मिलकर बना है ?
उत्तर-

  1. डिमोस (Demos)
  2. एवं क्रेटिया (Cratia)।

प्रश्न 3. डिमोस (Demos) और क्रेटिया (Cratia) का क्या अर्थ है ?
उत्तर-डिमोस का अर्थ है, लोक और क्रेटिया का अर्थ है शक्ति या सत्ता। इसलिए डेमोक्रेसी का शाब्दिक अर्थ वह शासन है, जिसमें शक्ति या सत्ता लोगों के हाथों में हो।

प्रश्न 4. प्रजातन्त्र की कोई एक परिभाषा दें।
उत्तर-अब्राहिम लिंकन के अनुसार, “प्रजातन्त्र जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा सरकार है।”

प्रश्न 5. प्रजातन्त्र की कोई एक विशेषता लिखें।
उत्तर-प्रजातन्त्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और जनता ही शक्ति का स्रोत होती है।

प्रश्न 6. किस देश में प्रजातन्त्र नहीं पाया जाता है?
उत्तर-चीन में प्रजातन्त्र नहीं पाया जाता ।

प्रश्न 7. एक पार्टी का शासन किसकी विशेषता है?
उत्तर-एक पार्टी का शासन तानाशाही की विशेषता है।

प्रश्न 8. तानाशाही शासन का एक लक्षण लिखें।
उत्तर-तानाशाही शासन में राज्य निरंकुश होता है।

प्रश्न 9. तानाशाही का कोई एक रूप लिखें।
उत्तर-सैनिक राज तानाशाही का एक रूप है।

प्रश्न 10. किसी एक तानाशाही शासन का नाम लिखें।
उत्तर-हिटलर एक तानाशाही शासक था।

प्रश्न 11. मुसोलिनी ने किस देश में अपनी तानाशाही स्थापित की ?
उत्तर-मुसोलिनी ने इटली में अपनी तानाशाही स्थापित की।

प्रश्न 12. हिटलर ने किस देश में अपनी तानाशाही स्थापित की?
उत्तर-हिटलर ने जर्मनी में अपनी तानाशाही स्थापित की।

प्रश्न 13. अंग्रेजी भाषा का ‘डैमोक्रेसी’ (Democracy) शब्द किस से लिया गया है?
उत्तर-यूनानी भाषा के शब्द डीमास (Demos) और क्रेटीआ (Cratia) से लिया गया है।

प्रश्न 14. आजकल कौन-सा लोकतन्त्र अधिक प्रचलित है?
उत्तर-आजकल प्रतिनिधि लोकतन्त्र अधिक प्रचलित है।

प्रश्न 15. प्रत्यक्ष लोकतन्त्र (Direct Democracy) शासन किसे कहते हैं?
उत्तर-लोग देश के शासन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेते हैं, उसे प्रत्यक्ष लोकतन्त्र कहते हैं।

प्रश्न 16. प्रजातन्त्र में किस प्रकार का शासन होता है?
उत्तर-प्रजातन्त्र में जनता का शासन होता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

प्रश्न 17. भारत में मतदान करने की कम-से-कम आयु कितनी है?
उत्तर-भारत में मतदान करने की कम-से-कम आयु 18 वर्ष है।

प्रश्न 18. प्रजातन्त्र का एक गुण लिखें।
उत्तर-प्रजातन्त्र में सर्वसाधारण के हितों की रक्षा की जाती है।

प्रश्न 19. प्रजातन्त्र का एक दोष लिखें।
उत्तर-प्रजातन्त्र में गुणों के स्थान पर संख्या को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

प्रश्न 20. स्विट्ज़रलैण्ड में कितने मतदाता एक कानून बनाने के लिए संसद् को कह सकते हैं?
उत्तर-स्विट्ज़रलैण्ड में एक लाख मतदाता एक कानून बनाने के लिए संसद् को कह सकते हैं।

प्रश्न 21. स्विट्जरलैण्ड में कितने मतदाता इस बात की मांग कर सकते हैं, कि किसी कानून पर जनमत संग्रह कराया जाए।
उत्तर-स्विट्ज़रलैण्ड में 50000 मतदाता इस बात की मांग कर सकते हैं, कि किसी कानून पर जनमत संग्रह कराया जाए।

प्रश्न 22. प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र में कोई एक अन्तर लिखें।
उत्तर-प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में लोग स्वयं शासन में प्रत्यक्ष रूप में भाग लेते हैं, जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में शासन जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता है।

प्रश्न 23. भारत में प्रजातन्त्र की असफलता का क्या कारण है?
उत्तर-सचेत नागरिकता का अभाव।

प्रश्न 24. अधिनायकतन्त्र का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर-अधिनायकतन्त्र में नीति में एकरूपता बनी रहती है।

प्रश्न 25. अधिनायक तन्त्र का कोई एक दोष लिखें।
उत्तर-अधिनायक तन्त्र हिंसा पर आधारित होता है।

प्रश्न 26. प्रजातन्त्र एवं अधिनायकतन्त्र में कोई एक अन्तर लिखें।
उत्तर-प्रजातन्त्र जनता का शासन है, जबकि अधिनायक तन्त्र एक व्यक्ति या एक पार्टी का शासन है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. ……………. शासन जनमत पर आधारित है।
2. प्रजातन्त्र में सभी नागरिकों को …………… माना जाता है।
3. प्रजातन्त्र स्वतन्त्रता एवं …………… पर आधारित है।
4. आलोचकों द्वारा प्रजातन्त्र को ………….. की पूजा बताया गया है।
5. ………….. को प्रत्यक्ष लोकतन्त्र का घर कहा जाता है।
उत्तर-

  1. प्रजातन्त्र
  2. समान
  3. बन्धुता
  4. अयोग्यता
  5. स्विट्ज़रलैण्ड।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को शासक समझता है, जबकि अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में केवल प्रतिनिधि ही शासक समझे जाते हैं।
2. प्रजातन्त्र की सफलता के लिए नागरिकों की जागरूकता आवश्यक नहीं है।
3. तानाशाही में शासन की सत्ता एक व्यक्ति में निहित होती है।
4. तानाशाह की शक्तियां सीमित होती हैं।
5. तानाशाही की अवधि निश्चित नहीं होती।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
अधिनायकतन्त्र उस एक व्यक्ति का शासन है, जिसने अपने स्तर और स्थिति को पैतृक अधिकार से प्राप्त न करके शक्ति या स्वीकृति, सम्भवतः दोनों के मिश्रण द्वारा प्राप्त किया हो।” किसका कथन है ?
(क) अरस्तु
(ख) प्लेटो
(ग) अल्फ्रेड
(घ) ग्रीन।
उत्तर-
(ग) अल्फ्रेड

प्रश्न 2.
अधिनायकतन्त्र के गुण हैं
(क) स्थिर शासन
(ख) नीति में एकरूपता
(ग) संकटकाल के लिए उचित
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3.
अधिनायकतन्त्र के दोष हैं
(क) हिंसा पर आधारित
(ख) क्रान्ति का डर
(ग) अधिकारों का अभाव
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 14 सरकारों के रूप-प्रजातन्त्र एवं अधिनायकवादी सरकारें

प्रश्न 4.
प्रजातन्त्र एवं अधिनायकतन्त्र में अन्तर है
(क) प्रजातन्त्र जनता का शासन है, जबकि अधिनायकतन्त्र एक व्यक्ति या एक पार्टी का शासन है।
(ख) प्रजातन्त्र जनमत पर आधारित होता है, जबकि अधिनायकतन्त्र जनमत पर आधारित नहीं होता।
(ग) प्रजातन्त्र में लोगों को अधिकार प्राप्त होते हैं, जबकि अधिनायकतन्त्र में नहीं।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था

Punjab State Board PSEB 9th Class Home Science Book Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Home Science Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था

PSEB 9th Class Home Science Guide पारिवारिक साधनों की व्यवस्था Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
पारिवारिक साधनों से आप क्या समझते हो?
उत्तर-
पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए परिवार में उपलब्ध साधनों का प्रयोग किया जाता है। इन साधनों को दो भागों में बांटा गया है –
(i) मानवीय साधन (ii) भौतिक साधन।
दैनिक कार्यों में मौजूद साधनों का प्रयोग किया जाता है अथवा साधनों के प्रयोग से भी कार्य किया जाता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था

प्रश्न 2.
पारिवारिक साधनों का वर्गीकरण कैसे किया जा सकता है ?
उत्तर-
साधनों का वर्गीकरण दो भागों में किया जा सकता है –(i) मानवीय साधन (ii) गैर-मानवीय अथवा भौतिक साधन।
(i) मानवीय साधन हैं-कुशलता, ज्ञान, शक्ति, दिलचस्पी, मनोवृत्ति तथा रुचियां आदि।
(ii) भौतिक साधन हैं-समय, धन, सामान, जायदाद, सुविधाएं आदि।

प्रश्न 3.
मानवीय साधन कौन-से हैं ?
उत्तर-
यह वे साधन हैं जो मानव के अन्दर होते हैं। ये हैं-योग्यताएं, कुशलता, रुचियां, ज्ञान, शक्ति, समय, दिलचस्पी, मनोवृत्ति आदि।

प्रश्न 4.
भौतिक साधन कौन-से हैं ?
उत्तर-
गैर-मानवीय अथवा भौतिक साधन हैं-धन, समय, जायदाद, सुविधाएं आदि।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था

लघु उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 5.
समय और शक्ति की व्यवस्था से आप क्या समझते हो ?
उत्तर-
समय ऐसा साधन है जो कि सभी के लिए समान होता है। जब किसी कार्य को करने की शक्ति तथा समय का प्रयोग किया जाता है तो थकावट महसूस होती है। इसलिए समय तथा शक्ति दोनों साधनों को सही ढंग से प्रयोग करना चाहिए ताकि कार्य भी हो जाये तथा थकावट भी ज़रूरत से ज्यादा न हो तथा दोनों की बचत भी हो जाये।

प्रश्न 6.
पारिवारिक साधनों की क्या विशेषताएं होती हैं ?
उत्तर-

  1. यह साधन सीमित होते हैं।
  2. साधन उपयोगी होते हैं तथा इनका प्रयोग कई रूपों में किया जा सकता है।
  3. साधनों का प्रभावशाली प्रयोग किसी भी व्यक्ति के जीवन स्तर को प्रभावित करता
  4. सभी साधनों का उचित प्रयोग परस्पर सम्बन्धित होता है तथा इस तरह उद्देश्यों की पूर्ति होती है।
  5. इन साधनों के उचित प्रयोग से हमारी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

प्रश्न 7.
पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर–
पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले तत्त्व हैं –
परिवार का आकार तथा रचना, जीवन-स्तर, घर की स्थिति, परिवार के सदस्यों की शिक्षा, गृह निर्माता की कुशलता तथा योग्यता, ऋतु, आर्थिक स्थिति आदि।

प्रश्न 8.
योजना बनाकर समय और शक्ति के व्यय को कैसे कम किया जा सकता है ?
उत्तर-
योजना बनाकर कार्य किया जाये तो समय तथा शक्ति के खर्च को कम किया जा सकता है। योजना बनाने से पहले सारे कार्यों की सूची बनाई जाती है। इस तरह यह पता लगाया जाता है कि कौन-सा कार्य किस समय तथा कौन-से सदस्य द्वारा किया जाना है। योजना में अपने व्यक्तिगत कार्यों तथा मनोरंजन के लिए भी समय रखा जाता है। योजनाबद्ध ढंग से कार्य करने से रोज़ एक जैसी शक्ति का प्रयोग होता है। इस तरह अधिक थकावट भी नहीं होती। योजनाएं दैनिक कार्यों के अतिरिक्त साप्ताहिक तथा वार्षिक कार्यों के लिए भी तैयार की जाती हैं। इस तरह समय तथा शक्ति के खर्च को घटाया जा सकता है।

प्रश्न 9.
निर्णय लेने की प्रक्रिया से आप क्या समझते हो ?
उत्तर-
निर्णय अथवा फैसला लेने की प्रक्रिया को गृह-प्रबन्ध का अभिन्न अंग माना गया है। निर्णय लेने की क्रिया से अभिप्राय है किसी समस्या के हलें के लिए विभिन्न विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव करना। किसी भी तरह का निर्णय लेने के लिए निम्नलिखित चरणों में से गुजरना पड़ता है –

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था 1

प्रश्न 10.
निर्णय लेने से पूर्व सोच-विचार करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
जब परिवार में कोई समस्या आ जाये तो उसके हल के लिए सोच-विचार करके ही निर्णय लेना चाहिए। प्रत्येक समस्या के हल के लिए कई विकल्प होते हैं। विभिन्न विकल्पों की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए तथा प्रत्येक विकल्प कई तत्त्वों का समूह होता है। इनमें से कई तत्त्व समस्या के हल के लिए सहायक होते हैं तथा कई नहीं, कई कम सहायक होते हैं तथा कई अधिक सहायक होते हैं। इसलिए इन तत्त्वों की जानकारी प्राप्त करनी तथा कई स्थितियों में आपको किसी अन्य अनुभवी व्यक्ति की सलाह भी लेनी पड़ती है ताकि ठीक विकल्प का चुनाव हो सके। जैसे मनोरंजन की समस्या के लिए कई विकल्प हैं जैसे सिनेमा जाना, कोई खेल खरीदना अथवा टेलीविज़न खरीदना। इन सभी विकल्पों के बारे में जानकारी लेना तथा फिर एक उपयुक्त विकल्प जैसे कि टेलीविज़न का चुनाव किया जाता है। क्योंकि यह एक लम्बे समय तक चलने वाला मनोरंजन का साधन है। इसके साथ परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए मनोरंजन के कार्यक्रम मिल सकते हैं। इसलिए इन सभी तत्त्वों को ध्यान में रखकर सभी विकल्पों के बारे में सोच-समझकर ही निर्णय लेना चाहिए।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था

प्रश्न 11.
सही निर्णय गृह व्यवस्था में कैसे उपयोगी होता है ?
उत्तर-
सही निर्णय लिए जाएं तो समय, शक्ति, धन आदि की बचत हो सकती है। यदि घर की व्यवस्था सोच-समझकर तथा सही निर्णय न लेकर की जाए तो घर अस्त-व्यस्त हो जाता है। घर के सदस्यों में मेल-मिलाप नहीं रहता। कोई भी कार्य समय पर नहीं होता तथा मानसिक तथा शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस तरह सही निर्णय घर की व्यवस्था में बड़ा लाभदायक होता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 12.
पारिवारिक साधन मानवीय उद्देश्यों को प्राप्त करने में कैसे सहायक होते हैं ? इन्हें प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर-
परिवार के लिए उपलब्ध साधन, पारिवारिक लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों की पूर्ति करने में सहायक होते हैं। दैनिक कार्यों में मौजूद साधनों का प्रयोग किया जाता है अथवा साधनों के प्रयोग से भी कार्य किया जाता है। साधनों के सफल प्रयोग को कई तत्त्व प्रभावित करते हैं –

  1. परिवार का आकार तथा रचना-जिन परिवारों में छोटे बच्चे अथवा बुजुर्ग होते हैं वहां गृहिणी को अधिक कार्य करना पड़ता है। परन्तु बच्चे बड़े होकर गृहिणी की मदद करने लग जाते हैं, तथा कई बुजुर्ग भी घर के काम-काज में मदद कर देते हैं।
  2. जीवन-स्तर-सादा जीवन व्यतीत करने वालों के लक्ष्य आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं।
  3. घर की स्थिति-यदि घर, स्कूल अथवा कॉलेज, मार्कीट आदि के निकट हो तो आने-जाने का काफ़ी समय तथा शक्ति बच जाती है। यदि घर बड़ी सड़क के नज़दीक हो तो धूल-मिट्टी काफ़ी आती है तथा सफ़ाई पर काफ़ी समय नष्ट हो जाता है।
  4. आर्थिक स्थिति-यदि अधिक आय हो तो घर में नौकर रखे जा सकते हैं तथा कई कार्य बाहर से भी करवाये जा सकते हैं। यदि आय कम हो तो गृहिणी को सभी कार्य स्वयं ही करने पड़ते हैं।
  5. परिवार के सदस्यों की शिक्षा-पढ़े-लिखे लोग आधुनिक साधनों का प्रयोग करके अपनी शक्ति तथा समय की काफ़ी बचत कर लेते हैं। जैसे एक पढ़ी-लिखी गृहिणी वाशिंग मशीन तथा मिक्सी आदि का अधिक प्रयोग करेगी जबकि अनपढ़ लोग पुराने परम्परागत साधनों तथा रिवाजों पर ही निर्भर रहते हैं।
  6. ऋतु बदलना-गांवों में बिजाई-कटाई के समय कार्य अधिक करना पड़ता है और समय कम। शहरों में ऋतु बदलने पर गर्म-ठण्डे कपड़ों आदि को निकालना तथा रखना आदि कार्य बढ़ जाते हैं।
  7. गृह निर्माता की कुशलता तथा योग्यताएं-एक कुशल गृहिणी अपनी योग्यता से समय तथा शक्ति की बचत कर सकती है।

प्रश्न 13.
समय और शक्ति पारिवारिक साधन कैसे हैं ? योजना बनाकर इनके व्यय को कैसे कम किया जा सकता है ?
उत्तर-
समय सभी के लिए ही बराबर होता है। एक दिन में 24 घण्टे होते हैं। परन्तु शक्ति सभी के पास एक जैसी नहीं होती तथा आयु के साथ-साथ इसमें अन्तर पड़ता रहता है। जब कोई कार्य किया जाता है तो समय तथा शक्ति दोनों खर्च होते हैं। योजना बनाकर कार्य किया जाये तो इन दोनों की बचत की जा सकती है। एक समझदार गृहिणी को समय तथा शक्ति के खर्च को घटाने के लिए योजना बनाने में कोई मुश्किल नहीं आती। योजना को लिखकर बनाना चाहिए तथा योजना में लचीलापन होना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर इसको बदला जा सके। सभी कार्यों की सूची बनाने के पश्चात् योजना बनानी चाहिए। यह भी तय कर लेना चाहिए कि इनमें से कौन-से कार्य किस सदस्य ने तथा कब करने हैं। दैनिक कार्यों के अतिरिक्त साप्ताहिक तथा वार्षिक कार्यों की भी योजना बना लेनी चाहिए। अधिक भारी कार्य के पश्चात् हल्के कार्य को स्थान देना चाहिए ताकि अधिक थकावट न हो। योजना में अपने व्यक्तिगत तथा मनोरंजन के कार्यों के लिए भी समय रखना चाहिए। योजना इस तरह बनाएं कि प्रतिदिन ज़रूरी कार्यों तथा मनोरंजन के कार्यों में लगभग एक जैसी शक्त्रि व्यय हो। इस तरह योजनाबद्ध तरीके से कार्य करके शक्ति तथा समय दोनों की बचत हो जाती है।

Home Science Guide for Class 9 PSEB पारिवारिक साधनों की व्यवस्था क्षेत्र Important Questions and Answers

रिक्त स्थान भरें

  1. पारिवारिक साधनों को …………………….. भागों में बांटा जाता है।
  2. मानवीय साधन, मानव के …………………….. होते हैं।
  3. पारिवारिक साधन …………………………. होते हैं।
  4. ………………………… में ही मनुष्य को मानसिक सन्तुष्टि मिलती है।
  5. साधन हमारी …………………………… की पूर्ति करते हैं।

उत्तर-

  1. दो,
  2. अन्दर,
  3. सीमित,
  4. घर,
  5. इच्छाओं।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
गृह निर्माता का कर्त्तव्य आमतौर पर कौन निभाता है ?
उत्तर-
गृहिणी।

प्रश्न 2.
सीमित साधनों के द्वारा कार्य बढ़िया कैसे हो सकता है ?
उत्तर-
अच्छी व्यवस्था द्वारा।

प्रश्न 3.
समय को कितने भागों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर-
तीन।

ठीक/ग़लत बताएं

  1. साधन दो प्रकार के होते हैं-मानवीय, भौतिक।
  2. साधन असीमित होते हैं।
  3. साधनों का उचित प्रयोग करके हम अपनी इच्छायों की पूर्ति करते हैं।
  4. समय ऐसा साधन है जो कि सभी के पास बराबर होता है।
  5. परिवार का आकार तथा रचना पारिवारिक साधनों को प्रभावित नहीं करती।
  6. सही निर्णय घर की व्यवस्था के लिए लाभदायक है।

उत्तर-

  1. ठीक
  2. ग़लत
  3. ठीक
  4. ठीक
  5. ग़लत
  6. ठीक।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले कारक हैं –
(A) परिवार का आकार
(B) घर की स्थिति
(C) ऋतु
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(D) सभी ठीक

प्रश्न 2.
निम्न में ठीक हैं –
(A) जब किसी कार्य को करने के लिए समय तथा शक्ति का प्रयोग होता है तो थकावट महसूस होती है
(B) साधन सीमित हैं
(C) सही निर्णय लेने से समय, शक्ति, धन आदि की बचत हो सकती है
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(D) सभी ठीक

प्रश्न 3.
ठीक तथ्य है
(A) साधन असीमित होते हैं
(B) साधनों की उपयोगिता नहीं होती
(C) धन भौतिक साधन है
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(C) धन भौतिक साधन है

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 3 पारिवारिक साधनों की व्यवस्था

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
योजना बनाने के अतिरिक्त गृहिणी को कौन-सी अन्य बातों का ज्ञान होना चाहिए जिससे समय तथा शक्ति बच सकती हो ?
उत्तर-

  1. सभी चीज़ों को अपने स्थान पर रखो ताकि ज़रूरत पड़ने पर वस्तु को ढूंढने में समय नष्ट न हो।
  2. काम करने के लिए सामान अच्छा तथा ठीक हालत में होना चाहिए।
  3. काम करने वाली जगह पर रोशनी का ठीक प्रबन्ध होना चाहिए।
  4. काम करने के सुधरे तरीकों का प्रयोग करना चाहिए।
  5. घर के सभी सदस्यों की मदद लेनी चाहिए। यदि फिर भी कार्य तथा आय के साधन ठीक हों तो कार्य बाहर से भी करवाया जा सकता है।
  6. काम करने वाली जगह की ऊंचाई अथवा वस्तुओं के हैण्डल ऐसे हों कि कन्धों पर अधिक भार न पडे।

प्रश्न 2.
मूल्यांकन करने से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
कुछ देर किसी योजना के अनुसार कार्य करते रहने के पश्चात् देखा जाता है कि नियत लक्ष्य प्राप्त हो रहे हैं, अथवा नहीं। यदि लक्ष्य प्राप्त न हो रहे हों तो योजना में फेरबदल किया जाता है तथा इस तरह अपनी योजना का मूल्यांकन किया जाता है ताकि नियत लक्ष्यों की पूर्ति हो सके।

प्रश्न 3.
मानवीय साधन कौन-से हैं ?
उत्तर-
यह वे साधन हैं जो मानव के अन्दर होते हैं। ये हैं-योग्यताएं, कुशलता, रुचियां, ज्ञान, शक्ति, समय, दिलचस्पी, मनोवृत्ति आदि।
इन साधनों का उचित प्रयोग करके गृह प्रबन्ध बढ़िया ढंग से किया जा सकता है। किसी कार्य को करने की योग्यता तथा कुशलता हो तो कार्य में रुचि तथा दिलचस्पी स्वयं पैदा हो जाती है। नए उपकरणों तथा मशीन आदि के बारे में ज्ञान हो तो समय तता शक्ति की बचत हो जाती है। घर के सदस्यों की शक्ति भी एक मानवीय साधन है।

प्रश्न 4.
भौतिक साधन कौन-से हैं और गृह व्यवस्था के लिए कैसे लाभदायक है ?
उत्तर-
गैर-मानवीय अथवा भौतिक साधन हैं-धन, समय, जायदाद, सुविधाएं आदि। इन सभी के उचित प्रयोग से गृह-व्यवस्था ठीक ढंग से की जा सकती है तथा परिवार के उद्देश्यों तथा ज़रूरतों की पूर्ति की जा सकती है।

पारिवारिक साधनों की व्यवस्था PSEB 9th Class Home Science Notes

  • परिवार के उद्देश्यों तथा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपलब्ध साधनों की सहायता ली जाती है।
  • पारिवारिक साधनों को दो भागों में बांटा गया है –
    (i) मानवीय साधन (ii) भौतिक साधन।
  • कार्य करने की कुशलता, ज्ञान, शक्ति, समय, दिलचस्पी, मनोवृत्ति तथा रुचियां आदि मानवीय साधन हैं।
  • धन, सामान, जायदाद, सुविधाएं आदि ग़ैर-मानवीय अथवा भौतिक साधन हैं।
  • समय ऐसा साधन है जो सभी के लिए बराबर होता है।
  • समय को तीन भागों में बांटा जा सकता है-कार्य, विश्राम, नींद आदि।
  • विभिन्न व्यक्तियों में शक्ति भी अलग-अलग होती है तथा एक ही व्यक्ति में सारी उम्र एक जैसी शक्ति नहीं रहती।
  • जब किसी कार्य को करने के लिए समय तथा शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो थकावट अनुभव होती है।
  • परिवार का आकार तथा रचना, जीवन स्तर, घर की स्थिति, आर्थिक स्थिति, परिवार के सदस्यों की शिक्षा, गृह निर्माता की कुशलता तौँ योग्यताएं, ऋतु बदलने से कार्य आदि पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले तत्त्व हैं।
  • योजनाबद्ध तरीके से कार्य करके समय तथा शक्ति के खर्च को कम किया जा सकता है।
  • रोज़ाना कार्यों के अतिरिक्त साप्ताहिक तथा वार्षिक कार्यों की भी योजना बनानी चाहिए।
  • यदि घर की आय के साधन ठीक हों तो घर के कार्य बाहर से करवाकर भी समय तथा शक्ति का बचाव किया जा सकता है।
  • जब किसी योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाता है तो कुछ देर पश्चात् पता लग जाता है कि नियत लक्ष्यों की पूर्ति हो रही है अथवा नहीं।
  • यदि उद्देश्यों की पूर्ति न हो रही हो तो अपनी योजना में परिवर्तन कर लेना चाहिए ताकि आगे के लिए उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।
  • ठीक निर्णय लिए जाएं तो कार्य अच्छी तरह तथा आसानी से हो जाते हैं।
  • घर का प्रबन्धक अथवा गृहिणी सोच-समझकर निर्णय न करे तो घर अस्त-व्यस्त हो जाता है।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 30 सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव

Punjab State Board PSEB 8th Class Social Science Book Solutions Civics Chapter 30 सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Social Science Civics Chapter 30 सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव

SST Guide for Class 8 PSEB सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित खाली स्थान भरो :

1. भारत एक ……… राज्य है।
2. भारत में मानव अधिकार कमीशन ……….. की रक्षा करता है।
3. बुढ़ापा, दुर्घटना तथा बेकारी के समय मिलने वाली सुविधा को ………… कहा जाता है।
4. गांवों को लिंक सड़कों के साथ …………. योजना के अन्तर्गत जोड़ा जा रहा है।
5. स्कूलों में दोपहर का खाना ………. योजना के अन्तर्गत दिया जा रहा है।
उत्तर-

  1. कल्याणकारी
  2. मानव अधिकारों
  3. सामाजिक सुरक्षा
  4. प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क
  5. मिड डे मील।

II. निम्नलिखित वाक्यों पर ठीक (✓) या गलत (✗) का निशान लगाओ :

1. जन उपयोगी सेवाओं से लोगों का जीवन स्तर ऊंचा हुआ है। – (✓)
2. अच्छी शिक्षा तथा सेहत की सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार की बुनियादी ज़िम्मेदारी नहीं है। – (✗)
3. आज भारत में सामाजिक व आर्थिक असमानताएं समाप्त हो चुकी हैं। – (✗)
4. भारत में ‘कार्य का अधिकार’ मौलिक अधिकार है। – (✗)
5. पंजाब के सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य नहीं है। – (✓)

III. विकल्प वाले प्रश्न :

प्रश्न 1.
मिड-डे-मील स्कीम के अंतर्गत किस श्रेणी तक मुफ्त खाना दिया जाता है ?
(क) पांचवीं
(ख) आठवीं
(ग) दसवीं
(घ) पहली से आठवीं तक।
उत्तर-
पहली से आठवीं तक।

प्रश्न 2.
आज तक भारत में कितनी पंचवर्षीय योजनाएं लागू हो चुकी हैं ?
(क) 5
(ख) 12
(ग) 13
(घ) 14
उत्तर-
12

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 30 सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दें:

प्रश्न 1.
जन-उपयोगी सेवाएं किसको कहते हैं ?
उत्तर-
सरकार द्वारा लोगों को रेलों, सड़कों, टेलीफोन, टेलीविज़न, कम्प्यूटर आदि की सुविधाएं दी गई हैं। इन्हें जन-उपयोगी सेवाएं कहते हैं। इनका उद्देश्य लोगों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाना है।

प्रश्न 2.
सामाजिक समानता से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
सामाजिक समानता का अर्थ है-सामाजिक स्तर पर लोगों का बराबर होना। दूसरे शब्दों में समाज में किसी प्रकार की ऊंच-नीच न हो। रंग, जाति, नसल, जन्म, धनी, निर्धन आदि के आधार पर कोई भेदभाव न हो।

प्रश्न 3.
सामाजिक सुरक्षा क्या है ?
उत्तर-
सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है, बुढ़ापे, दुर्घटना, बेकारी आदि की स्थिति में नागरिकों की सहायता करना। शारीरिक रूप से अपाहिज बच्चों को आवश्यक सहायता देना भी सामाजिक सुरक्षा में शामिल है। सामाजिक सुरक्षा सामाजिक विकास के लिए बहुत ज़रूरी है।

प्रश्न 4.
कोई दो मानवीय अधिकार लिखो।
उत्तर-
(1) जीवन का अधिकार, (2) स्वतन्त्रता का अधिकार, (3) समानता का अधिकार, (4) मानवीय गौरव का अधिकार।
नोट-विद्यार्थी कोई दो लिखें।

V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में दें:

प्रश्न 1.
सरकार की सामाजिक क्रियाओं के प्रभाव लिखें।
उत्तर-
सरकार की सामाजिक क्रियाओं से लोगों का सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक विकास अवश्य हुआ है। सरकार ने भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाई है। फिर भी देश में सच्चे अर्थों में सामाजिक समानता नहीं आ सकी। आज भी कई सामाजिक वर्गों की स्थिति दयनीय है।

प्रश्न 2.
सरकार के सामाजिक और नैतिक सुधारों पर नोट लिखें।
उत्तर-
सरकार द्वारा सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए स्त्रियों की दशा सुधारने की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इनके लिए व्यावसायिक तथा शैक्षिक संस्थान खोले गये। उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार की व्यावसायिक शिक्षा दी गई ताकि वे मुसीबत के समय अपने बच्चों का पालन-पोषण स्वयं कर सकें। इससे उन्हें अपने अन्य पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने तथा अपने परिवार की आर्थिक दशा सुधारने में भी सहायता मिली।

सरकार द्वारा नशीले पदार्थों के प्रयोग, छुआछूत, बाल-विवाह, दहेज प्रथा तथा भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए गए। व्यावहारिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का विकास करने के लिए भी विशेष पग उठाए गए। सरकार द्वारा ये सभी कार्य लोगों की भलाई अर्थात् जनकल्याण के लिए किये गए।

प्रश्न 3.
सामाजिक सुरक्षा की ज़रूरत क्यों है ?
उत्तर-
सामाजिक सुरक्षा से अभिप्राय के विकास के रूप में सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। भारत एक कल्याणकारी राज्य है। कल्याणकारी राज्य का यह कर्त्तव्य होता है कि वह अपने नागरिकों को बेकारी, दुर्घटना, बुढ़ापे अथवा किसी अन्य संकट के समय आवश्यक सहायता प्रदान करे । बच्चों के विकास के लिए बाल भवन खोले जाएं। यहाँ बच्चों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था हो। उन्हें कलात्मक रुचियां बढ़ाने की शिक्षा भी दी जाए। विशेष ज़रूरतों वाले अर्थात् शारीरिक रूप से अपंग बच्चों के लिए विशेष शिक्षा संस्थाएं खोली जाएं। ऐसे कार्यों द्वारा ही सामाजिक सुरक्षा को विश्वसनीय बनाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
भारत में मानवीय अधिकारों की रक्षा हेतु सरकार के यत्न लिखें।
उत्तर-
मानव अधिकारों को कार्य रूप देना सरकार की एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक क्रिया है। इसके लिए 28 सितंबर 1993 को राष्ट्रीय मानवीय अधिकार आयोग स्थापित किया गया। दिसम्बर 1993 में इस आयोग को कानूनी रूप प्रदान किया गया। इस आयोग को मानवीय अधिकारों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

PSEB 8th Class Social Science Guide सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Multiple Choice Questions)

सही जोड़े बनाइए:

1. पंचवर्षीय योजनाएं – बूढ़ों, बेसहारों की सहायता
2. सामाजिक सुरक्षा – रेलों, सड़कों आदि की सुविधा
3. मानवीय अधिकार – देश का सर्वपक्षीय विकास
4. जन उपयोगी सेवाएं – जीवन का अधिक
उत्तर-

  1. देश का सर्वपक्षीय विकास
  2. बूढ़ों,बेसहारों की सहायता
  3. जीवन का अधिकार
  4. रेलों, सड़कों आदि की सुविधा।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 30 सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए सरकार द्वारा किए गए कोई दो कार्य बताओ।
उत्तर-

  1. उनके लिए व्यावसायिक तथा शैक्षिक संस्थान खोले गए।
  2. उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार की व्यावसायिक शिक्षा दी गई ताकि वे स्वयं आजीविका कमा सकें।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय मानवीय अधिकार आयोग कब और किस प्रकार अस्तित्व में आया ? .
उत्तर-
राष्ट्रीय मानवीय अधिकार आयोग की स्थापना 28 सितम्बर, 1993 को की गई है। यह आयोग मानवीय अधिकार सुरक्षा अध्यादेश द्वारा स्थापित किया गया। इस अध्यादेश को संसद् द्वारा दिसम्बर, 1993 में कानून का रूप दिया गया।

सरकार द्वारा नशीले पदार्थों के प्रयोग, छुआछूत, बाल-विवाह, दहेज प्रथा तथा भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए गए। व्यावहारिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का विकास करने के लिए भी विशेष पग उठाए गए।
सरकार द्वारा ये सभी कार्य लोगों की भलाई अर्थात् जनकल्याण के लिए किये गए।

प्रश्न 3.
सामाजिक सुरक्षा की ज़रूरत क्यों है ?
उत्तर-
सामाजिक सुरक्षा से अभिप्राय के विकास के रूप में सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। भारत एक कल्याणकारी राज्य है। कल्याणकारी राज्य का यह कर्त्तव्य होता है कि वह अपने नागरिकों को बेकारी, दुर्घटना, बुढ़ापे अथवा किसी अन्य संकट के समय आवश्यक सहायता प्रदान करे। बच्चों के विकास के लिए बाल भवन खोले जाएं। यहाँ बच्चों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था हो। उन्हें कलात्मक रुचियां बढ़ाने की शिक्षा भी दी जाए। विशेष जरूरतों वाले अर्थात् शारीरिक रूप से अपंग बच्चों के लिए विशेष शिक्षा संस्थाएं खोली जाएं। ऐसे कार्यों द्वारा ही सामाजिक सुरक्षा को विश्वसनीय बनाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
भारत में मानवीय अधिकारों की रक्षा हेतु सरकार के यत्न लिखें।
उत्तर-
मानव अधिकारों को कार्य रूप देना सरकार की एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक क्रिया है। इसके लिए 28 सितंबर 1993 को राष्ट्रीय मानवीय अधिकार आयोग स्थापित किया गया। दिसम्बर 1993 में इस आयोग को कानूनी रूप प्रदान किया गया। इस आयोग को मानवीय अधिकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

सही जोड़े बनाइए:

1. पंचवर्षीय योजनाएं – बूढ़ों, बेसहारों की सहायता
2. सामाजिक सुरक्षा – रेलों, सड़कों आदि की सुविधा
3. मानवीय अधिकार – देश का सर्वपक्षीय विकास
4. जन उपयोगी सेवाएं – जीवन का अधिक
उत्तर-

  1. देश का सर्वपक्षीय विकास
  2. बूढ़ों,बेसहारों की सहायता
  3. जीवन का अधिकार
  4. रेलों, सड़कों आदि की सुविधा।

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए सरकार द्वारा किए गए कोई दो कार्य बताओ।
उत्तर-

  • उनके लिए व्यावसायिक तथा शैक्षिक संस्थान खोले गए।
  • उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार की व्यावसायिक शिक्षा दी गई ताकि वे स्वयं आजीविका कमा सकें।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय मानवीय अधिकार आयोग कब और किस प्रकार अस्तित्व में आया ?
उत्तर-
राष्ट्रीय मानवीय अधिकार आयोग की स्थापना 28 सितम्बर, 1993 को की गई है। यह आयोग मानवीय अधिकार सुरक्षा अध्यादेश द्वारा स्थापित किया गया। इस अध्यादेश को संसद् द्वारा दिसम्बर, 1993 में कानून का रूप दिया गया।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता के पश्चात् देश की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति में सुधार की जरूरत क्यों महसूस की गई ? इस उद्देश्य से क्या कदम उठाए गए ?
उत्तर-
भारत शताब्दियों तक परतन्त्र रहा था। इसके कारण भारत सामाजिक तथा आर्थिक रूप से बुरी तरह टूट चुका था। इसलिए देश की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति में सुधार लाने की ज़रूरत महसूस की गई। इस उद्देश्य से निम्नलिखित पग उठाए गए.

  • मौलिक अधिकारों में समानता के अधिकार को शामिल किया गया।
  • देश की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति को मज़बूत बनाने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं शुरू की गईं।
  • विदेश नीति में गुट-निरपेक्षता का सिद्धान्त अपनाया गया।
  • भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाने का उद्देश्य निर्धारित किया गया।

प्रश्न 2.
सामाजिक क्षेत्र में जन-उपयोगी सेवाओं की क्या भूमिका है ?
उत्तर-
सामाजिक क्षेत्र में जन-उपयोगी सेवाओं का विशेष महत्त्व है। सामाजिक जीवन का विकास करने के लिए सरकार द्वारा लोगों को रेलों, सड़कों, टेलीफोन, टेलीविज़न, कम्प्यूटर इत्यादि की सुविधाएं प्रदान की गईं। इन जन उपयोगी सेवाओं का उद्देश्य लोगों के दैनिक जीवन के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाना था। भारत को विकसित देशों की तुलना में लाना भी सरकार का मुख्य उद्देश्य था। इसलिए सरकार ने योजनाओं का निर्माण किया। तकनीकी कृषि, चिकित्सा, शिक्षा तथा कला सम्बन्धी शैक्षिक संस्थाओं की व्यवस्था की गई। इसके अतिरिक्त गांवों तथा कस्बों में पीने के पानी तथा बिजली का प्रबन्ध किया गया। गांवों तथा सड़कों का निर्माण भी किया गया ताकि उन्हें शहरों से जोड़ा जा सके।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 30 सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव

प्रश्न 3.
मौलिक अधिकारों का लोगों पर क्या प्रभाव है ? .
उत्तर-
सरकार ने समाज में स्वतन्त्रता तथा समानता को बढ़ावा देने के लिए विशेष पग उठाए हैं। इस उद्देश्य से भारतीय संविधान में स्वतन्त्रता तथा समानता के मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है। इन्हें लागू करने के लिए विशेष कानून भी बनाए गए हैं। इन अधिकारों से लोगों का सर्वपक्षीय विकास अवश्य हुआ है, परन्तु समाज में सच्चे अर्थों में समानता नहीं लाई जा सकी। आज भी कई सामाजिक वर्गों की स्थिति दयनीय है। उनके लिए आज भी सार्वजनिक कुओं तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों का प्रयोग करना निषेध है। उन्हें मन्दिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इस प्रकार आज भी स्वतन्त्रता तथा समानता के अधिकारों का लाभ जरूरतमन्द लोगों को नहीं मिल पाता। इसके लिए और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

सामाजिक क्षेत्र में सरकार के प्रयत्न तथा इनका प्रभाव PSEB 8th Class Social Science Notes

  • भारत एक कल्याणकारी राज्य – भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, ताकि देश को सामाजिक तथा आर्थिक रूप से मज़बूत बनाया जा सके।
  • सामाजिक असमानता को दूर करना – इस उद्देश्य से संविधान में स्वतन्त्रता तथा समानता के मौलिक अधिकार शामिल किए गए हैं। छुआछूत को अवैध घोषित कर दिया गया है।
  • जन-उपयोगी सेवाएं – लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए यातायात तथा संचार सेवाओं का विस्तार किया गया है। इसके साथ-साथ कृषि, चिकित्सा, कला आदि से सम्बन्धित शिक्षा संस्थाओं का विस्तार किया गया है।
  • सामाजिक सुरक्षा – लोगों को बुढ़ापे, दुर्घटना, बेकारी आदि की स्थिति में सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई है।
  • मानव अधिकार – मुख्य मानव अधिकार हैं-जीवन का अधिकार, स्वतन्त्रता का अधिकार, समानता का अधिकार तथा मानवीय गौरव का अधिकार। इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना की गई है।

PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती)

Punjab State Board PSEB 8th Class Agriculture Book Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Agriculture Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती)

PSEB 8th Class Agriculture Guide खुम्बों की काश्त (खेती) Textbook Questions and Answers

(अ) एक-दो शब्दों में उत्तर दें—

प्रश्न 1.
खुम्बों की दो उन्नत किस्मों के नाम बताएं।
उत्तर-
बटन खुम्ब, पराली खुम्ब, शिटाकी खुम्ब।

प्रश्न 2.
खुम्बें किन रोगों से पीड़ित लोगों के लिए लाभदायक हैं?
उत्तर-
शूगर तथा ब्लड प्रैशर

प्रश्न 3.
सर्द ऋतु की खम्बों की वर्ष में कितनी फसलें प्राप्त की जा सकती हैं?
उत्तर-
बटन खुम्ब की दो, ढींगरी की तीन तथा शिटाकी की एक फसल ली जा सकती है।

प्रश्न 4.
खुम्बों के पालन के लिए बनाई जाने वाली खाद की ढेरियों की ऊंचाई अधिक-से-अधिक कितने फुट रखनी चाहिएं?
उत्तर–
पाँच फुट।

प्रश्न 5.
तैयार खाद को पेटियों में खुम्बें भरते समर गली-सड़ी रूड़ी व रेतीली मिट्टी में क्या अनुपात होता है?
उत्तर-
गले-सडे गोबर की खाद तथा रेतली मिट्टी में 4 : 1 का अनुपात होना चाहिए।

प्रश्न 6.
खुम्बों को मक्खियों से बचाने के लिए किस औषधि का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर-
नूवान (डाइक्लोरोवेस)।

PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती)

प्रश्न 7.
मक्खियों से बचाने के लिये दवाई छिड़कने के कितने घण्टे उपरांत तक खुम्बें नहीं तोड़नी चाहिए?
उत्तर-
48 घण्टे।

प्रश्न 8.
खुम्बें उगाने के लिए प्रति क्यारी कितने बीज की आवश्यकता पड़ती है ?
उत्तर-
300 ग्राम।

प्रश्न 9.
पंजाब में वर्तमान समय में कितनी खुम्बें पैदा हो रही हैं ?
उत्तर-
वार्षिक लगभग 45000-48000 टन

प्रश्न 10.
खाद तैयार करते समय कितनी पल्टियां दी जाती हैं?
उत्तर-
सात।

प्रश्न 11.
बढ़िया खाद तैयार करने की pH कितनी होती है ?
उत्तर-
7.0 से 8.0

(आ) एक-दो वाक्यों में उत्तर दें—

प्रश्न 1.
खुम्बों से कौन-कौन से भोजन तत्त्व प्राप्त होते हैं ?
उत्तर-
कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहा, पोटाश, खनिज पदार्थ तथा विटामिन सी आदि काफ़ी मात्रा में प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 2.
खुम्बें पालने के लिए किन वस्तुओं की आवश्यकता होती है?
उत्तर-
भूसा, गेहूँ की छान (चोकर), किसान खाद, युरिया, सुपरफास्फेट, मिऊरेट आफ पोटाश, जिप्सम, गामा बी० सी०-20 ई, फ्यूराडान, सीरा आदि तथा खुम्बों का बीज (स्पान)।

प्रश्न 3.
खुम्बें पालने के लिए खाद की ढेरी को बार-बार मिलाना क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
ऐसा करने से ढेर का बाहर का हिस्सा अंदर और बीच का हिस्सा बाहर आ जाता है। कम्पोस्ट बनाने वाले जीवाणुओं को ताज़ी हवा मिल जाती है तथा अच्छी खाद बन जाती है।

प्रश्न 4.
खुम्बों के लिए तैयार खाद में संशोधन कैसे किया जा सकता है?
उत्तर-
खुम्बों का बीज बोने से पहले तैयार की खाद में बाविस्टन 50% घुलनशील 20 मिलीग्राम प्रतिलीटर के हिसाब से मिला देनी चाहिए। इसके लिए एक क्विंटल खाद में 20 ग्राम बाविस्टन काफ़ी है जो चार पेटियों के लिए पर्याप्त है।

प्रश्न 5.
केसिंग करने का क्या लाभ है ? केसिंग मिट्टी कैसे तैयार की जाती है?
उत्तर-
केसिंग खुम्बों को वातावरण प्रदान करती है। खेत की गली-सड़ी रूड़ी तथा रेतीली मिट्टी को 4:1 के अनुपात में मिलाने से या चावलों की सड़ी हुई भूसी तथा गोबर की सलरी को 1:1 के अनुपात में मिलाने से केसिंग मिश्रण बनाया जाता है।

प्रश्न 6.
पंजाब में कौन-कौन सी खुम्बों की सिफ़ारिश की है? उनके तकनीकी नाम भी लिखें।
उत्तर-
पंजाब के वातावरण में खुम्बों की पाँच किस्मों की कृषि की जाती है।
यह किस्में हैं-बटन खुम्ब (Button Mushroom), ढींगरी खुम्ब (Oyster Mushroom), शिटाकी (Shitake), पराली खुम्ब (Chinese Mushroom) तथा मिल्की खुम्ब (Milky Mashroom)

प्रश्न 7.
खाद तैयार करने के लिए पल्टियों का विवरण देते हुए बतलाएं कि इसके लिए क्या कुछ चाहिए?
उत्तर-
खाद तैयार करने के लिए निम्नलिखित अनुसार पल्टियां दी जाती हैं—

पलटना ढेर लगाने से तत्त्व मिलाना कितने दिन बाद तत्व मिलाना
पहली बार 4 सीरा
दूसरी बार 8
तीसरी बार 12 जिप्सम
चौथी बार 15
पांचवीं बार 18 फूराडान
छठी बार 21
सातवीं बार 24 गामा बी० एच० सी०

इस प्रकार सात बार पलटियां दी जाती हैं। पहले 4-4 दिन के बाद तीन बार तथा फिर 3-3 दिनों के बाद। इसके लिए सीरा, जिप्सम, फुराडान, गामा वी० एच०. सी० की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 8.
केसिंग मिश्रण को विषाणु रहित करने का ढंग लिखें।
उत्तर-
रेत तथा गली-सड़ी रूड़ी की खाद को गीला करके इसके ऊपर 4-5% फार्मलीन का छिड़काव किया जाता है। प्रति क्विंटल मिट्टी के हिसाब से इसमें 20 ग्राम फुराडान डाल दिया जाता है तथा 48 घण्टों के लिए इसको तिरपाल या बोरी से ढक दिया जाता है। प्रयोग से पहले हिला कर फार्मालीन को उड़ा दिया जाता है। इस तरह केसिंग मिश्रण जर्म रहित हो जाता है।

PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती)

प्रश्न 9.
खुम्बों की कृषि के लिए बढ़िया खाद की पहचान कैसे की जाती है?
उत्तर-
खाद की पहचान उसके रंग, गंध तथा नमी से की जाती है। इसका रंग काला भूरा हो जाता है तथा अमोनिया की गंध आनी बंद हो जाती है तथा इसमें 65-72% नमी होती है तथा इसकी पी० एच० का मूल्य 7.0 से 8.0 होता है। इस तरह खाद तैयार होती है।

प्रश्न 10.
एक वर्ग मीटर में खुम्बों की कितनी उपज प्राप्त की जाती है?
उत्तर-
एक वर्ग मीटर में से 8-12 किलो खुम्ब का उत्पादन मिल जाता है।

(इ) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दें—

प्रश्न 1.
खुम्बों का हमारे भोजन में क्या महत्त्व है?
उत्तर-
खुम्बें सारी दुनिया में भोजन के रूप में प्रयोग की जाती हैं। इसमें भोज्य तत्त्व ज्यादा मात्रा में होने के कारण यह शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखने में सहायक होती है। खुम्बों में प्रोटीन बहुत ज़्यादा मात्रा में होती है, जो आसानी से हज्म हो जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें पोटाश, कैल्शियम, लोहा, फॉस्फोरस, खनिज पदार्थ तथा विटामिन सी० भी भरपूर मात्रा में होते हैं। इनमें कार्बोहाइड्रेट तथा चिकनाहट की मात्रा कम होती है। इसलिए शूगर तथा ब्लडप्रैशर के मरीजों के लिए खुम्बें काफ़ी लाभदायक हैं।

प्रश्न 2.
सर्द ऋतु की खुम्बों को उगाने के लिए खाद की ढेरी बनाने की विधि बताएं।
उत्तर-
भूसे को पक्के फर्श पर बिछाकर इस पर पानी छिड़क दें तथा 48 घण्टे तक भूसे को खुले ढेर की तरह पड़ी रहने दें। साफ़ की गई खादों का बुरादा मिलाकर थोड़ा गीला कर दें। 24 घण्टे बाद इसे गीली भूसे पर मिश्रित छान बिखेर दें। इस मिश्रण को इकट्ठा करके लकड़ी के तख्तों की सहायता से 5 × 5 × 5 फुट, ऊंचे, लंबे व चौड़े ढेर बनाएं। इन ढेरों की ऊंचाई और चौड़ाई 5 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 3.
खुम्बों (मशरूम) के मंडीकरण (विपणन) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
खुम्बों को काटकर या खींचकर न तोड़ें। परन्तु खुम्ब को अंगुलियों के बीच लेकर धीरे से मरोड़ें तथा दिन में एक बार खुलने से पहले ज़रूर तोड़ लें। ऐसा करते समय छोटी-छोटी बटन खुम्बों को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। खुम्ब को तोड़ने के दौरान उसकी डंडी के मिट्टी वाले हिस्से को काटकर साफ़ कर दें।
इन तोड़ी खुम्बों को बारीक छिद्र वाले प्लास्टिक के लिफाफों में पैक करें। हर लिफाफे में 250 ग्राम ताज़ी खुम्ब भरें। इन खुम्बों को मंडी में बेचने के लिए भेजा जाता है। खुम्बों को धूप तथा छाया में प्राकृतिक ढंग से सुखाकर बे-मौसमी बिक्री के लिए स्टोर करके रख लें।

प्रश्न 4.
खुम्बों का बीज (Spawn) क्या होता है और बोआई पेटियों में कैसे की जाती है?
उत्तर-
पेटियों को ढंग से लगाना-पेटियों को एक-दूसरी पर टिकाकर खेती का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है। पंक्तियों में रखी पेटियों का अन्तर 2-2 फुट तथा पेटियों में ऊपर-नीचे रखी ट्रेओं में फासला 1 फुट होना चाहिए। ऐसा करते समय छोटी-छोटी बटन खुम्बों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। निकालने के बाद खुम्बों की डंडी का मिट्टी वाला भाग काट देना चाहिए तथा साफ़ कर लेना चाहिए।
PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती) 1
चित्र-वटन मशरूम

प्रश्न 5.
‘बटन मशरूम’ की कृषि के लिए कौन-कौन से पड़ाव हैं उनके विषय में लिखें।
उत्तर-
बटन खुम्ब की खेती के पड़ाव—

1. खाद की तैयारी के लिए वस्तुएं-भूसा 300 किलो, गेहूँ का चोकर 15 किलोग्राम, किसान खाद 9 किलोग्राम, यूरिया, सुपरफास्फेट, म्यूरेट आफ पोटाश तीनों खाद 3-3 किलोग्राम प्रत्येक, जिपस्म 30 किलोग्राम, गामा वी० सी० 20 ई 60 मिलीलीटर, सीरा 5 किलोग्राम, फूराडान 3 जी 150 ग्राम।।

2. ढेरी बनाना-भूसे को पक्के फर्श पर बिछाकर इस पर पानी छिड़क दें तथा 48 घण्टे तक भूसे को खुले ढेर की तरह पड़ी रहने दें। साफ़ की गई खादों का बुरादा मिलाकर थोड़ा गीला कर दें। 24 घण्टे बाद इसे गीली भूसे पर मिश्रित छान बिखेर दें। इस मिश्रण को इकट्ठा करके लकड़ी के तख्तों की सहायता से 5 × 5 × 5 फुट, ऊंचे, लंबे व चौड़े ढेर बनाएं। इन ढेरों की ऊंचाई और चौड़ाई 5 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए।

3. खाद के ढेरों को हिलाना-ढेर को मिलाने के लिए हर बार ऊपरी सिरे से चारों तरफ कुछ पानी छिड़का कर अच्छी तरह मिलाएं तथा कुछ और पानी डाल दें। इससे ढेर का बाहर का हिस्सा अंदर तथा बीच का हिस्सा बाहर आ जाएगा। कम्पोस्ट बनाने वाले जीवाणुओं को भी ताजा हवा मिल जाती है। हर बार ढेर को दोबारा बनाने के लिए इस ढंग का प्रयोग करें। ढेर को तीन बार हर चौथे दिन हिलाकर इसमें सीरा, जिप्सम, फ्यूराडान तथा गामा वी० एच० सी० को क्रमवार पहली, तीसरी, पाँचवीं तथा सातवीं बार हिलाने पर मिला दें। 24 दिन बाद 300 किलोग्राम भूसे से पूरी तरह तैयार की गई यह खाद 100 × 150 × 18 सें० मी० आकार की 20-25 पेटियां भरने के लिए काफ़ी है। जब खाद का रंग काला-भूरा हो जाए तथा अमोनिया की बदबू आनी बंद हो जाए तब इसमें 65-72% नमी होती है और खाद तैयार हो जाती है। पी० एच० 7.0 से 8.0 होती है।

4. खाद की सुधाई-खुम्बों का बीज बोने से पहले तैयार की गई खाद में बाविस्टन 50% घुलनशील 20 मिग्रा० प्रति लिटर के हिसाब से मिला देनी चाहिए। इसलिए एक क्विटल खाद में 20 ग्राम बाविस्टन का बुरादा काफ़ी है जो चार पेटियों के लिए काफ़ी है।

5. पेटियां भरना तथा खम्बें बोना-खाद के ढेर को बिखेर कर कुछ देर के लिए ठंडा होने दें, खुम्बों के बीज (स्पान) को बोतलों से निकालें तथा दो परतों में खुम्बें बोने वाले ढंग का प्रयोग करते हुए खाद पर बीज बिखेर कर पेटियों में बीज दें। फिर इस पर खाद की मोटी परत डालें तथा बाकी हिस्सा इस पर बिखेर कर खाद में मिला देना चाहिए। पेटियों पर गीला अखबार और कागज़ रख देना चाहिए। 2-3 सप्ताह के अन्दर खुम्बों के बीज से कपास की पेटियों जैसे सफेद रेशों से 80-100% पेटियां भर जाती हैं।

6. पेटियां मिट्टी से ढकना-बाद में 80-100% (माइसीलियम) से भरी ट्रे को 4 : 1 के अनुपात वाले खाद तथा रेतली मिट्टी या 1 : 1 अनुपात वाले चावलों की सड़ी हुई भुसी
और गोबर गैस की सलरी के मिश्रण से एकसार ढक देना चाहिए। इस मिश्रण को केसिंग मिश्रण कहते हैं । ढकने से पहले इसे 4-5% फार्मलीन के घोल से रोग रहित करें।

7. केसिंग मिश्रण को कीटाणु रहित करना-रेत मिली गली-सड़ी गोबर की खाद को गीला कर दें। इस पर 4-5% फार्मलीन का छिड़काव करें। प्रति क्विंटल केसिंग मिट्टी के हिसाब में 20 ग्राम फ्यूराडान डालें। बाद में इसे तिरपाल या बोरियों में 48 घण्टों के लिए ढक दें ताकि फार्मलीन अच्छी तरह उड़ जाए।

8. ट्रे को ढांपने का ढंग-खुम्बों के बीज बोने के 2-3 सप्ताह के बाद पेटियों से अख़बार के कागज़ उतार देने चाहिएं तथा माइसीलियम से भरी खाद को एक से डेढ़ इंच मोटी रोग रहित की गई मिट्टी की तह से ढक देना चाहिए।

9. पेटियों को ढंग से लगाना-पेटियों को एक-दूसरी पर टिकाकर खेती का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है। पंक्तियों में रखी पेटियों का अन्तर 2-2 फुट तथा पेटियों में ऊपर-नीचे रखी ट्रेओं में फासला 1 फुट होना चाहिए। ऐसा करते समय छोटी-छोटी बटन खुम्बों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। निकालने के बाद खुम्बों की डंडी का मिट्टी वाला भाग काट देना चाहिए तथा साफ़ कर लेना चाहिए।
PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती) 1
चित्र-वटन मशरूम

  1. खुम्ब का उगना-पेटियों को मिट्टी से ढकने से 2-3 सप्ताह बाद खुम्ब निकलने लगती हैं तथा 2-3 दिन में तोड़ने के लिए तैयार हो जाती है।
  2. उत्पादन-एक वर्गमीटर स्थान से एक मौसम में लगभग 8-12 किलोग्राम ताज़ी खुम्बें प्राप्त हो जाती हैं।

Agriculture Guide for Class 8 PSEB खुम्बों की काश्त (खेती) Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
दो-तीन सप्ताह में खुम्बों के बीज तैयार माइसीलियम से कितने फीसदी ढेर भर जाते हैं?
उत्तर-
80-100 प्रतिशत

प्रश्न 2.
लिफाफों में कितनी खुम्बें डालकर बेचने के लिए भरी जा सकती हैं ?
उत्तर-
250 ग्राम।

PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती)

प्रश्न 3.
खुम्बों के बीजों को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
खुम्बों के बीजों को स्पान कहते हैं।

प्रश्न 4.
खुम्बों में कौन-से खुराकी तत्त्व कम मात्रा में होते हैं?
उत्तर-
खुम्बों में कार्बोहाइड्रेट्स तथा चिकनाहट कम मात्रा में होती है।

प्रश्न 5.
गर्मी के मौसम में बोयी जाने वाली खुम्बों की कौन-सी किस्म तथा उनकी कितनी फसलें ली जा सकती हैं?
उत्तर-
गर्मी के मौसम में बोयी जाने वाली किस्म पराली वाली खुम्ब है। इससे चार फसलें ली जाती हैं।

प्रश्न 6.
तीन सौ किलो भूसे से तैयार खाद कितनी पेटियों के लिए काफ़ी है?
उत्तर-
100 × 150 × 18 सेमी० आकार की 20-25 पेटियों के लिए यह खाद काफ़ी है।

प्रश्न 7.
तैयार हो चुकी खाद की पहचान क्या है?
उत्तर-
जब खाद का रंग काला-भूरा हो जाए तथा अमोनियम की बदबू खत्म हो जाए तब खाद तैयार होती है।

प्रश्न 8.
किसी एक रोग का नाम बताएं जिसके लिए खुम्बें लाभदायक हैं।
उत्तर-
ब्लॅड प्रैशर।

प्रश्न 9.
सर्दियों में खुम्बों की कितनी फसलें ले सकते हैं ?
उत्तर-
सर्दियों में सफ़ेद बटन खुम्बों की दो फसलें ले सकते हैं।

प्रश्न 10.
सर्दियों में खुम्बों की फसलें कब बोयी जाती हैं ?
उत्तर-
सर्दियों में खुम्बें अक्तूबर से अप्रैल तक बोयी जाती हैं।

प्रश्न 11.
खुम्बों के लिए खाद मिलाकर तैयार करने के लिए कौन-से पदार्थ चाहिए?
उत्तर-
सीरा, जिप्सम, फ्यूराडान, गामा तथा बी० एच० सी० आदि पदार्थों की ज़रूरत है |

प्रश्न 12.
एक वर्गमीटर के लिए कितने बीजों की आवश्यकता है?
उत्तर-
एक वर्गमीटर के लिए 300 ग्राम बीजों की आवश्यकता है।

प्रश्न 13.
एक वर्गमीटर में खुम्बों का कितना उत्पादन हो सकता है ?
उत्तर-
एक वर्गमीटर स्थान में एक मौसम में 8-12 किलोग्राम ताजी खुम्बों का उत्पादन प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 14.
गर्मी में मिल्की खुम्बों की कितनी फसलें हो सकती हैं?
उत्तर-
गर्मियों में मिल्की खुम्बों की तीन फसलें हो सकती हैं।

प्रश्न 15.
पंजाब में खुम्बों की खेती कितने स्थानों पर की जाती है?
उत्तर-
400 स्थानों पर।

प्रश्न 16.
बटन खुम्ब की फसलें लेने का समय बताओ।
उत्तर-
सितम्बर से मार्च तक दो फसलें।

प्रश्न 17.
ढींगरी की फसल लेने का समय बताओ।
उत्तर-
अक्तूबर से मार्च तक तीन फसलें।

प्रश्न 18.
शिटाकी खुम्ब लेने का समय बताओ।
उत्तर-
शिटाकी की एक फसल सितम्बर से मार्च तक।

प्रश्न 19.
पंजाब में कौन-सी खुम्ब की खेती सब से अधिक की जाती है?
उत्तर-
बटन खुम्ब की।

प्रश्न 20.
तीन क्विटल रूड़ी खाद के लिए खुम्ब का कितना बीज चाहिए?
उत्तर-
3 किलो स्पान।

प्रश्न 21.
खुम्ब के बीज कहां से प्राप्त किए जा सकते हैं ?
उत्तर-
पंजाब एग्रीकल्चरल यूनीवर्सिटी के माइक्रो बायलोजी विभाग से।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खुम्बों की खेती के समय बीज को पेटियों में कैसे भरा जाता है?
उत्तर-
खाद के ढेर को हिलाकर कुछ समय के लिए ठंडा होने दें। खुम्बों (स्पान) को बोतलों से निकालें तथा तहों में खुम्बें बोने वाले ढंग का प्रयोग करने पर बीज बिखेर कर पेटियों में बो दें। फिर इस पर खाद की मोटी परत डालें तथा शेष भाग इसमें बिखेर कर खाद में मिला देना चाहिए। पेटियों पर गीला अख़बार, कागज़ रख देना चाहिए।

प्रश्न 2.
ढींगरी की खेती के लिए लिफाफे भरने की क्या विधि है?
उत्तर-
लिफाफों को 3 इंच तक भूसे से भर लें तथा इस पर चुटकी जितना खुम्ब बीज बिखेर दें। फिर इस पर 2-2 इंच भुसा और डाल दें तथा खुम्बों का बीज बिखेर दें तथा लिफाफे पूरी तरह से भर लें। लिफाफे के मुँह को किसी पतली रस्सी से बांध देना चाहिए तथा निचले कोनों में कट लगा दें ताकि वायु और पानी बाहर निकल जाए। इन लिफाफों को अच्छी रोशनी वाले कमरे में रखें। 3-4 सप्ताह बाद जब छोटी खुम्बों में अंकुरण दिखाई दे तो प्लास्टिक के लिफाफे काट दें तथा पानी डाल दें ताकि भुसा गीला रहे।

PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती)

प्रश्न 3.
खुम्बें तोड़ते हुए किस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-
खुम्बों को काटकर या खींचकर न तोड़ें। परन्तु खुम्ब को अंगुलियों के बीच लेकर धीरे-धीरे मरोड़ें तथा दिन में एक बार खुलने से पहले ज़रूर तोड़ लें।

प्रश्न 4.
खुम्बों को कौन-सा कीट हानि पहुंचाता है ? इससे बचाव की विधि बताएं।
उत्तर-
खुम्बों की मवखी इसे नुकसान पहुंचाती है। जब खुम्बों की मक्खियां खुम्ब घर की खिड़कियों के शीशे, दीवार या छतों पर नज़र आने लग जाएं तो 30 मिलीलिटर नूवान (डाइक्लोरोवेस) 100 ई०सी० (डब्ल्यू० पी०) 100 घन मीटर स्थान पर छिड़काव करें। इसके बाद दरवाजे व खिड़कियां दो घण्टों के लिए बंद कर दें तथा छिड़काव के 48 घण्टे बाद तक खुम्बें नहीं तोड़नी चाहिएं। क्यारियों में सीधा छिड़काव न करें।

प्रश्न 5.
फसल के क्षेत्र में वृद्धि करने के लिए क्या किया जाता है ?
उत्तर-
पेटियों को एक-दूसरे के ऊपर टिकाकर खेती का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है। पंक्तियों में रखी पेटियों का अन्तर 2-2 फुट होना चाहिए तथा पेटियों में ऊपर-नीचे रखी ट्रे का अन्तर एक फुट होना चाहिए।

बड़े उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-
पराली वाली खुम्बें कैसे उगाई जाती हैं ?
उत्तर-

  1. ज़रूरी वस्तुएं-ताज़ी पराली (एक साल से ज्यादा पुरानी नहीं होनी चाहिए), बांस की छड़ियां तथा खुम्बों का बीज स्पान।
  2. ढंग-सूखी पराली की 1-1.5 किलोग्राम भार की पूलियां बना लेनी चाहिएं। इनके दोनों सिरों को बांध दें तथा बढ़े हुए भाग को काटकर बराबर कर दें। पराली की पूलियों को 16 से 20 घण्टों तक साफ़ पानी में भिगो कर रखें। पूलियों को ढलान वाले स्थान पर रखें ताकि हवा, पानी निकल जाए। खुम्ब घर में एक फुट दूरी पर रखी बांस की छड़ियों पर पांच पूलियों की पहली तह पर खुम्बों का बीज चुटकियों से बिखेर दें। इस तरह 22 पूलियों से एक वर्ग मीटर की एक क्यारी बन जाती है। फसलों के लिए स्थान बढ़ाने के लिए एक दूसरी पर भी क्यारियों बनाई जा सकती हैं। एक क्यारी के लिए 300 ग्राम बीज काफ़ी है।
  3. बीज बिखेरना-एक क्यारी के लिए 300 ग्राम बीज की ज़रूरत होती है। हर तह में एक सार बीज डालने चाहिएं।
  4. सिंचाई-बिजाई से 2-3 दिन बाद पानी डालना शुरू कर देना चाहिए। कमरों में हवा का आना ज़रूरी नहीं है, परन्तु बाद में खुली हवा की ज़रूरत होती है।
  5. खुम्बों का उगाना-बीज डालने के 7-9 दिन बाद खुम्बों के छोटे-छोटे दाने दिखाई देने लग जाते हैं। दसवें दिन यह तोड़ने योग्य हो जाते हैं। यह चार चक्करों में 15-20 दिन तक अंकुरित होती रहती हैं। इस मौसम की खुम्बों की एक महीने में एक बार फसल ली जा सकती है। इस तरह आखिरी अप्रैल से अगस्त तक चार फसलें प्राप्त हो जाती हैं।
  6. लिफाफों में डालना-मंडी भेजने से पहले छोटे-छोटे छिद्र वाले हर लिफाफे में 200 ग्राम खुम्बें डालकर लिफाफे बंद कर लें। इस मौसम की खुम्बों को धूप या छाया में रखकर प्रकृति रूप से भी सुखाया जा सकता है।
  7. उत्पादन-22 किलोग्राम सूखी पराली की एक क्यारी में बताए गए समय दौरान 2.5-3 किलोग्राम ताज़ी खुम्बें मिल जाती हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

ठीक/गलत

  1. खम्बें उगाने के लिए प्रति क्यारी 300 ग्राम बीज की आवश्यकता है।
  2. अच्छी खाद तैयार करने के लिए pH का मान 7.0 से 8.0 होना चाहिए ।
  3. सर्दी ऋतु की बटन खुम्बों की सिंतबर से मार्च तक दो फसलें प्राप्त हो जाती

उत्तर-

बहुविकल्पीय

प्रश्न 1.
खुम्बों की किस्म है
(क) बटन खुम्ब
(ख) पराली खुम्ब
(ग) शिटाकी खुम्ब
(घ) सभी ठीक
उत्तर-
(घ) सभी ठीक

प्रश्न 2.
खाद तैयार करने के लिए कौन-से तत्त्व मिलाये जाते हैं ?
(क) सीरा
(ख) जिप्सम
(ग) फूराडान
(घ) सभी ठीक
उत्तर-
(घ) सभी ठीक

PSEB 8th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खुम्बों की काश्त (खेती)

प्रश्न 3.
प्लास्टिक के लिफाफों में कितनी खुम्बें भरी जाती हैं. ?
(क) 50 ग्राम
(ख) 250 ग्राम
(ग) 500 ग्राम
(घ) 100 ग्राम।
उत्तर-
(ख) 250 ग्राम

रिक्त स्थान भरें

  1. खुम्बों को मक्खियों से बचाव के लिए …………… का छिड़काव किया जाता
  2. खुम्बों के बीज को ………… कहते हैं।

उत्तर-

  1. नूवान,
  2. स्पान

खुम्बों की काश्त (खेती) PSEB 8th Class Agriculture Notes

  • पंजाब में खुम्बों की खेती लगभग 400 स्थानों पर की जाती है।
  • पंजाब में वार्षिक कुल 45000-48000 टन ताज़ी खुम्बें पैदा की जाती हैं।
  • खुम्बों में कई खुराकी तत्त्व होते हैं; जैसे-प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहा, पोटाश, खनिज पदार्थ तथा विटामिन-सी।
  • इसमें कार्बोहाइड्रेट्स तथा चिकनाई की मात्रा कम होती है। इसलिए ब्लड प्रैशर तथा शूगर के मरीजों के लिए खुम्बें लाभदायक हैं।
  • पंजाब के वातावरण अनुसार खुम्बों की पांच किस्में हैं-बटन खुम्ब, ढींगरी खुम्ब, शिटाकी खुम्ब, पराली खुम्ब मिल्की खुम्ब।
  • शीत ऋतु की बटन खुम्बों से सितम्बर से मार्च तक दो फसलें प्राप्त की जा सकती हैं।
  • ढींगरी की तीन फसलें अक्तूबर से मार्च तक तथा शिटाकी की एक फसल सितम्बर से मार्च तक ली जा सकती है।
  • खाद के ढेर को हर चौथे दिन हिलाएं तथा इसमें सीरा, जिप्सम, लिंडेन व फूराडान की धूल क्रमवार पहली, तीसरी, पांचवीं, छठी तथा सातवीं बार हिलाने पर मिलाएं।
  • एक वर्गमोटर स्थान के लिए 300 ग्राम बीज का प्रयोग करना चाहिए।
  • गर्म ऋतु की पराली खुम्ब की अप्रैल से अगस्त तक चार फसलें तथा मिल्की खुाब की अप्रैल से अक्तूबर तक तीन फसलें ली जा सकती हैं।
  • खेत की गली-सड़ी रूड़ी तथा रेतीली मिट्टी को 4:1 के अनुपात में मिलाने से या चावलों की सड़ी हुई भूसी तथा गोबर की सलरी को 1:? के अनुगत में मिलाने से केसिंग मिश्रण बनाया जाता है।
  • केसिंग मिश्रण को कीटाणु रहित करने के लिए 4-5% फार्मली छिडकाव करें।
  • खुम्बों का मक्खियों से बचाव के लिए नूवान (डाइक्लोरोले) का छिड़काव करें तथा छिड़काव के 48 घंटे बाद तक खुम्बें न तोड़ें।
  • खुम्बों के बीज को स्पान कहते हैं।
  • दो-तीन सप्ताह में खुम्बों के बीज से तैयार कपास के कोपलों जैसे सफ़ेद रेशे (माइसीलियम) से 80-100 प्रतिशत तक पेरी भर जाती है।
  • एक वर्ग मीटर से 8-12 किलो खुम्भ मिल जाती है।
  • बारीक छेद वाले प्लास्टिक के लिफाफों में 250 ग्राम ताज़ी खुम्बें भरनी चाहिएं।
  • प्रति किलोग्राम के लिए बटन खुम्ब उगाने का खर्चा 38.44 रुपए तथी ढींगरी खुम्ब उगाने के लिए 31.84 रुपए खर्चा आता है।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 29 सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव

Punjab State Board PSEB 8th Class Social Science Book Solutions Civics Chapter 29 सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Social Science Civics Chapter 29 सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव

SST Guide for Class 8 PSEB सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव Textbook Questions and Answers

I. खाली स्थान भरें :

1. सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक न्याय देने का वायदा ………. में किया गया है।
2. प्रस्तावना भारतीय नागरिकों को …………. न्याय देने का वायदा करती है।
3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद ……… से ……… धार्मिक स्वतन्त्रता दी गई है।
4. भारत में लगभग ………….. से ज्यादा जातियां हैं।
5. भारतीय संविधान में ………… भाषाओं को मान्यता दी गई है।
6. मण्डल कमीशन की स्थापना ………… में की गई थी।
7. मण्डल कमीशन ने भारत में ………… अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों की पहचान की है
उत्तर-

  1. प्रस्तावना
  2. सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक
  3. 25, 28
  4. 3,000
  5. 22
  6. 1978
  7. 3743.

II. निम्नलिखित वाक्यों में ठीक (✓) या गलत (✗) का निशान लगाओ :

1. सामाजिक असमानताएँ लोकतन्त्रीय सरकार को प्रभावित नहीं करती हैं। – (✗)
2. भारत में आज 54% लोग अनपढ़ है। – (✗)
3. हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। – (✓)
4. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण आज भी लागू है। – (✓)
5. 73वीं और 74वीं शोध गांवों और शहरी स्वै-शासन का प्रबन्ध करती है। – (✓)
6. आज भारतीय समाज में सामाजिक असमानताएं खत्म हो रही हैं। – (✓)

III. विकल्प वाले प्रश्न :

प्रश्न 1.
“भारत में जाति सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल है।” ये शब्द किसने कहे ?
(क) महात्मा गांधी
(ख) पं० जवाहर लाल नेहरू
(ग) श्री जय प्रकाश नारायण
(घ) डॉ० बी० आर० अंबेडकर।
उत्तर-
श्री जय प्रकाश नारायण

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 28 सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव

प्रश्न 2.
भारतीयों को सामाजिक न्याय देने के लिए संविधान में कौन-सा मौलिक अधिकार दर्ज किया गया ?
(क) स्वतन्त्रता का अधिकार
(ख) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(ग) समानता का अधिकार
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
समानता का अधिकार

प्रश्न 3.
‘पढ़ो सारे बढ़ो सारे’ यह किस का सिद्धान्त (Motto) है ?
(क) राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान
(ख) सर्वशिक्षा अभियान
(ग) राष्ट्रीय साक्षरता मिशन
(घ) पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड।
उत्तर-
सर्वशिक्षा अभियान

प्रश्न 4.
सरकारी नौकरियों में आरक्षण किनके लिए लागू है ?
(क) अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए
(ख) केवल पिछड़ी श्रेणियों के लिए
(ग) केवल गरीब लोगों के लिए
(घ) अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़ी श्रेणियों के लिए।
उत्तर-
अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में दो :

प्रश्न 1.
सामाजिक असमानताओं से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
हमारे समाज में जाति, सम्प्रदाय, भाषा आदि के नाम पर अनेक असमानताएं पाई जाती हैं। इन्हें सामाजिक असमानता का नाम दिया जाता है। स्वतन्त्रता से पूर्व समाज में अनुसूचित जातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों को सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं था। अतः स्वतन्त्रता के पश्चात् सरकार ने सामाजिक समानता लाने के लिए विशेष पग उठाए। इसी उद्देश्य से संविधान में समानता के अधिकार का समावेश किया गया। इसके अनुसार किसी से ऊँच-नीच, धनी, निर्धन, रंग, नस्ल, जाति, जन्म, धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हो सकता। छुआछूत को अवैध घोषित कर दिया गया है। इसका अनुसरण करने वालों को कानून द्वारा दण्ड दिया जा सकता है।

प्रश्न 2.
जातिवाद और छुआछूत से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जातिवाद-भारतीय समाज जाति के नाम पर भिन्न-भिन्न वर्गों में बंटा है। इन वर्गों में ऊंच-नीच पाई जाती है। इसे जातिवाद कहते हैं।
छुआछूत-भारत में कुछ पिछड़ी जातियों के लोगों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। कुछ लोग उन्हें छूना भी पाप समझते हैं। इस प्रथा को छुआछूत कहा जाता है।

प्रश्न 3.
अनपढ़ता (निरक्षरता) किसको कहते हैं ?
उत्तर-
अनपढ़ता का अर्थ है-लोगों का पढ़ा-लिखा न होना। ऐसे लोगों को स्वार्थी राजनेता आसानी से पथभ्रष्ट कर देते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग एक तिहाई लोग अनपढ़ हैं।

प्रश्न 4.
भाषावाद से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
भाषावाद का अर्थ है-भाषा के नाम पर समाज का बंटवारा। भारत में सैंकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। भाषा के आधार पर लोग बंटे हुए हैं। कई लोग अन्य भाषाएं बोलने वाले लोगों को अच्छा नहीं समझते। भाषा के आधार पर ही राज्यों (प्रांतों) का गठन किया गया है। अब भी भाषाओं के आधार पर कई भागों में नये प्रान्तों के . गठन की मांग की जा रही है। भाषा के आधार पर लोगों में वर्ग बने हुए हैं। लोग राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा प्रान्तीय भाषा तथा संस्कृति को प्राथमिकता देते हैं।

प्रश्न 5.
आरक्षण का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
भारत में कुछ जातियां बहुत ही पिछड़ी हुई हैं क्योंकि इनका अन्य जातियों द्वारा शोषण होता रहा है। इन्हें अनुसूचित जातियों की संज्ञा दी गई है। इनके उत्थान के लिए लोकसभा, विधानसभा तथा नौकरियों में स्थान आरक्षित हैं। इसे आरक्षण कहा जाता है। 1978 में गठित किये गये मण्डल आयोग द्वारा अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के अतिरिक्त अन्य पिछड़े वर्गों के लिये जनसंख्या के अनुसार सीटें आरक्षित किये जाने का सुझाव दिया गया था, परन्तु इस रिपोर्ट को आज तक भी लागू नहीं किया जा सका। समय-समय पर लोकसभा तथा विधान सभाओं में स्त्रियों के लिए भी एक तिहाई सीटें आरक्षित किये जाने की मांग होती रही है। वास्तव में भारत में आज भारतीय राजनीतिक प्रणाली को जाति की राजनीति प्रभावित कर रही है। श्री जय प्रकाश नारायण ने ठीक ही कहा था कि भारत में जाति सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल है।

प्रश्न 6.
क्या मैला ढोने की प्रक्रिया बंद हो गई है ?
उत्तर-
मैला ढोने की प्रथा एक घृणापूर्ण प्रथा थी। यह समाज में शताब्दियों से चली आ रही थी। इसके अनुसार एक जाति के लोगों को दूसरों का मल-मूत्र सिर पर उठा कर बाहर फेंकना पड़ता था। मैला ढोने वाली जाति के लोगों को अछूत माना जाता था। प्रत्येक व्यक्ति उनसे घृणा करता था। समय के परिवर्तन के साथ इस बुराई को समाप्त करना आवश्यक था। समय-समय पर सरकारें इसको बन्द करने पर विचार करती रहीं। अब कानून के अनुसार सिर पर मैला ढोने की यह प्रथा बन्द कर दी गई है। इसके विरुद्ध दण्ड देने के कानून का प्रावधान कर दिया गया है।

प्रश्न 7.
अनपढ़ता का लोकतन्त्र पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
अनपढ़ता एक बहुत बड़ा अभिशाप है। इसके लोकतन्त्र पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं :

  • अनपढ़ता बहुत सी बुराइयों की जड़ है। इसी बुराई के कारण ही बेकारी, धार्मिक संकीर्णता, रूढ़िवाद, अन्धविश्वास, हीनता, क्षेत्रीयता, जातिवाद आदि भावनाएं उत्पन्न होती हैं।
  • अनपढ़ व्यक्ति एक अच्छा नागरिक भी नहीं बन सकता। स्वार्थी राजनीतिज्ञ अनपढ़ व्यक्तियों को आसानी से पथभ्रष्ट कर देते हैं। इस प्रकार अनपढ़ता लोकतन्त्र के मार्ग में बाधा डालती है।

PSEB 8th Class Social Science Guide सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Multiple Choice Questions)

सही जोड़े बनाइए :

1. छुआछूत कानूनी अपराध घोषित – 1979
2. मंडल आयोग का गठन – 1955
3. समानता का अधिकार – संविधान के अनुच्छेद 25 से 28
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार – संविधान के अनुच्छेद 14 से 18.
उत्तर-

  1. 1955
  2. 1979
  3. संविधान के अनुच्छेद 14 से 18
  4. संविधान के अनुच्छेद 25 से 28.

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान में सम्मिलित तीन सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त कौन-से हैं जो सामाजिक समानता को सुनिश्चित करते हैं ?
उत्तर-
समानता, स्वतन्त्रता तथा धर्म-निरपेक्षता।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 28 सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सभी नागरिकों को कौन-कौन से तीन प्रकार के न्याय प्रदान करने की बात कही गई है?
उत्तर–
सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक।

प्रश्न 3.
सामाजिक असमानताओं के कोई चार प्रकार लिखिए।
उत्तर-

  1. साम्प्रदायिकता
  2. जातिवाद तथा छुआछूत
  3. भाषावाद
  4. अनपढ़ता।

प्रश्न 4.
भारतीय लोकतंत्र की कोई दो समस्याएं लिखो।
उत्तर-

  1. भारत में अधिकतर लोग निरक्षर हैं।
  2. साम्प्रदायिकता तथा भाषावाद भारतीय लोकतंत्र की सफलता में बाधा डालते हैं।

प्रश्न 5.
छुआछूत को कानूनी अपराध क्यों घोषित किया गया है ?
उत्तर-
छुआछूत एक अमानवीय प्रथा है। यह सफल लोकतन्त्र के मार्ग की बहुत बड़ी बाधा है। इसी कारण छुआछूत को कानूनी अपराध घोषित किया गया है।

प्रश्न 6.
सरकार द्वारा अनपढ़ता को समाप्त करने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं ?
उत्तर-
हमारी सरकार द्वारा अनपढ़ता को समाप्त करने के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। देश भर में सर्व शिक्षा अभियान चलाया जा रहा है। आठवीं कक्षा तक निःशुल्क शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है। शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या में वृद्धि की गई है। शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है।

प्रश्न 7.
संविधान में कितनी भाषाओं को कानूनी मान्यता प्रदान की गई है ? किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई है?
उत्तर-
संविधान में 22 भाषाओं को कानूनी मान्यता प्रदान की गई है। हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी गई है।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में साम्प्रदायिक असमानता पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
साम्प्रदायिकता सामाजिक असमानता का पहला रूप है। भारत में अनेक धर्म हैं। भिन्न-भिन्न धर्मों के कुछ लोगों में धार्मिक कट्टरता पाई जाती है जो साम्प्रदायिकता को जन्म देती है। परिणामस्वरूप साम्प्रदायिकता सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन का एक अंग बन चुकी है। इसी धार्मिक कड़वाहट के कारण ही 1947 में भारत को दो भागों में बांट दिया गया था। यह भी धार्मिक कट्टरता का ही परिणाम है कि देश में साम्प्रदायिक दंगे होते रहते हैं। यही कड़वाहट भारतीय राजनीति में भी है। धर्म के नाम पर वोट मांगे जाते हैं और लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया जाता है। परिणामस्वरूप देश में समय-समय पर धार्मिक तनाव का वातावरण पैदा हो जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक लोगों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। इसके अनुसार सभी धर्मों को समान माना गया है। लोगों को किसी भी धर्म को अपनाने, मानने तथा प्रचार करने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 2.
मैला ढोने की प्रथा क्या थी ? इसे क्यों समाप्त कर दिया गया है ?
उत्तर-
मैला ढोने की प्रथा एक घृणापूर्ण प्रथा थी। यह समाज में शताब्दियों से चली आ रही थी। इसके अनुसार एक जाति के लोगों को दूसरों का मल-मूत्र सिर पर उठा कर बाहर फेंकना पड़ता था।

मैला ढोने वाली जाति के लोगों को अछूत माना जाता था। प्रत्येक व्यक्ति उनसे घृणा करता था। समय के परिवर्तन के साथ इस बुराई को समाप्त करना आवश्यक था। समय-समय पर सरकारें इसको बन्द करने पर विचार करती रहीं। अब कानून के अनुसार सिर पर मैला ढोने की यह प्रथा बन्द कर दी गई है। इसके विरुद्ध दण्ड देने के कानून का प्रावधान कर दिया गया है।

प्रश्न 3.
भारत के सीमान्त ग्रुपों (समूहों) की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-
सीमान्त ग्रुप हमारे समाज के वे समूह हैं जो सामाजिक तथा आर्थिक कारणों से एक लम्बे समय तक पिछड़े रहे हैं। इन समूहों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

  1. अनुसूचित जातियां-अनुसूचित जातियों की कोई स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा नहीं है। हम इतना कह सकते हैं कि इन जातियों का सम्बन्ध उन लोगों से है जिनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता रहा है।
  2. अनुसूचित कबीले-अनुसूचित कबीलों की भी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। ये भी समाज के शोषित कबीले हैं। पिछड़ा होने के कारण ये समाज से अलग-थलग होकर रह गए।
  3. पिछड़ी श्रेणियां- इन्हें भी संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है। वास्तव में ये समाज का कमजोर वर्ग है। मण्डल आयोग के अनुसार देश की कुल जनसंख्या का 5.2% भाग पिछड़ी श्रेणियां हैं।
  4. अल्पसंख्यक-अल्पसंख्यक धार्मिक या भाषा की दृष्टि से वे लोग हैं जिनकी अपने धर्म या सम्प्रदाय में संख्या कम है।

प्रश्न 4.
साम्प्रदायिक असमानता के प्रभाव वर्णित करें।
उत्तर-
साम्प्रदायिक असमानता के मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  1. राजनीतिक दल धर्म के आधार पर संगठित होते हैं।
  2. धर्म पर आधारित कई दबाव समूह भारतीय लोकतन्त्र को प्रभावित करते हैं।
  3. साम्प्रदायिकता भारतीय जनजीवन में हिंसा को बढावा दे रही है।
  4. मन्त्रिपरिषद् के निर्माण में धर्म विशेष को महत्त्व दिया जाता है।
  5. साम्प्रदायिकता लोगों को निष्पक्ष मतदान करने से रोकती है।

PSEB 8th Class Social Science Solutions Chapter 28 सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव

प्रश्न 5.
जातिवादी असमानता का अर्थ बताते हुए इसके प्रभाव लिखो।
उत्तर-
जातिवादी असमानता- भारत में तीन हज़ार से भी अधिक जातियों के लोग रहते हैं। इनमें जाति के नाम पर ऊंच-नीच पाई जाती है। इसे जातिवादी असमानता कहते हैं। इस असमानता के कारण कुछ जातियों के लोगों को सार्वजनिक कुओं का प्रयोग नहीं करने दिया जाता। उन्हें मन्दिरों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भी जाने से रोका जाता है। जाति के नाम पर राजनीति होती है तथा विभिन्न राजनीतिक दल जाति के नाम पर लोगों की भावनाओं को भड़काते रहते हैं।

प्रभाव-

  1. राजनीतिक दलों का निर्माण जाति के आधार पर हो रहा है।
  2. चुनाव के समय जाति के नाम पर वोट मांगे जाते हैं।
  3. अनुसूचित जातियों को विशेष सुविधायें प्रदान करने की व्यवस्था ने समाज का जातिकरण कर दिया है।
  4. जाति के कारण छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथा को बढ़ावा मिलता है।
  5. कई बार जाति संघर्ष तथा हिंसा का कारण बनती है।
  6. जाति पर आधारित दबाव समूहों का निर्माण होता है जो लोकतन्त्र पर बुरा प्रभाव डालते हैं।

प्रश्न 6.
क्या छुआछूत एक अमानवीय प्रथा है ? स्पष्ट करो।
उत्तर-
इसमें कोई सन्देह नहीं कि छुआछूत एक अमानवीय प्रथा है। इस प्रथा के कारण भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग का शताब्दियों से शोषण होता रहा है। उनसे घृणा की जाती रही है। यहां तक कि उन्हें छूना भी पाप समझा जाता रहा है। छुआछूत के प्रभावों से यह स्पष्ट हो जायेगा कि यह वास्तव में ही एक अमानवीय प्रथा है।

प्रभाव :

  1. छुआछूत की प्रथा सामाजिक असमानता को जन्म देती है।
  2. छुआछूत से लोगों में हीन भावना पैदा होती है।
  3. यह प्रथा हिंसा को जन्म देती है।
  4. बहुत-से लोगों को राजनीतिक शिक्षा नहीं मिलती।
  5. छुआछूत के कारण लोगों को राजनीति में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इन सब बातों को देखते हुए भारतीय संविधान द्वारा छुआछूत को कानूनी अपराध घोषित कर दिया गया है।

प्रश्न 7.
भाषावाद के क्या प्रभाव होते हैं ?
उत्तर-

  1. भाषा के आधार पर नये राज्यों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
  2. भाषा के आधार पर ही राजनीतिक दलों का गठन हो रहा है।
  3. भाषा के आधार पर ही आन्दोलन चल रहे हैं।
  4. भाषा क्षेत्रवाद तथा साम्प्रदायिकता को उत्साहित करती है।
  5. भाषा के आधार पर लोगों में भेदभाव तथा हिंसा उत्पन्न होती है।
  6. भाषावाद मतदान को प्रभावित करता है।

सामाजिक असमानताएं-सामाजिक न्याय तथा प्रभाव PSEB 8th Class Social Science Notes

  • भारतीय संविधान तथा समानता – में कई सिद्धान्त सम्मिलित किये गए हैं। इन सिद्धान्तों में समानता, स्वतन्त्रता तथा धर्म-निरपेक्षता मुख्य हैं। ये सिद्धान्त सामाजिक समानता को सुनिश्चित बनाते हैं।
  • संविधान की प्रस्तावना – भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान के आरम्भ में दी गई है। इसमें स्पष्ट रूप से अंकित है-‘हम भारत के लोग भारत में एक सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्र स्थापित करने के लिए, सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय प्रदान करने के लिए वचनबद्ध हैं।’
  • सामाजिक असमानता – भारत का समाज कई आधारों पर विभिन्न वर्गों में बंटा हुआ है। इसे सामाजिक असमानता कहते हैं।
  • सामाजिक असमानता के प्रकार – भारत में कई प्रकार की सामाजिक असमानता पाई जाती है। इनमें से मुख्य हैं: जातिवाद, छुआछूत, साम्प्रदायिकता, भाषावाद तथा अनपढ़ता।
  • आरक्षण – भारत में अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा स्त्रियों के लिए विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं में सीटें आरक्षित हैं। सरकारी नौकरियों में भी उनके लिए स्थान निश्चित हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव

Punjab State Board PSEB 9th Class Home Science Book Solutions Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव

PSEB 9th Class Home Science Guide मनुष्य के विकास के पड़ाव Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य के विकास के कितने पड़ाव होते हैं? नाम बताओ।
उत्तर-
मानवीय विकास के निम्नलिखित पड़ाव हैं —

  1. बचपन
  2. किशोरावस्था
  3. बालिग
  4. बुढ़ापा।

प्रश्न 2.
बचपन को कितनी अवस्थाओं में बांटा जा सकता है?
उत्तर-बचपन को निम्नलिखित अवस्थाओं में बांटा जाता है–

  1. जन्म से दो वर्ष तक
  2. दो से तीन वर्ष तक
  3. तीन से छः वर्ष का बच्चा
  4. छ: से किशोरावस्था तक।

प्रश्न 3.
कितने महीने का बच्चा बिना सहारे खड़ा होने लगता है?
उत्तर-
9 माह का बच्चा बिना सहारे के खड़ा होने लगता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव

प्रश्न 4.
किस उमर में बच्चे का शारीरिक विकास बहुत तेज़ गति से होता है?
उत्तर-
2 से 3 वर्ष के बच्चे की शारीरिक तौर पर वृद्धि तेज़ी से होती है। शारीरिक विकास के साथ ही उसका सामाजिक विकास इस समय बड़ी तेजी से होता है।

प्रश्न 5.
कितनी आयु का बच्चा कानूनी रूप से वयस्क समझा जाता है?
उत्तर-
पहले 21 वर्ष के बच्चे को बालिग समझा जाता था परन्तु अब 18 वर्ष के बच्चे को बालिग समझा जाता है जबकि 20 वर्ष की आयु तक उसका शारीरिक विकास होता रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 6.
किशोरावस्था के दौरान लड़कों में किस प्रकार के परिवर्तन आते हैं?
उत्तर-

  1. किशोरावस्था में लड़कों की दाड़ी तथा मूंछ फूटनी आरम्भ हो जाती है।
  2. उनकी टांगें-बांहें अधिक लम्बी हो जाती हैं तथा आवाज़ फटती है। उनके लिए यह अनोखी बात होती है।
  3. उनके गले की हड्डी बाहर को उभर आती है।
  4. लड़के स्वयं को बड़ा समझने लगते हैं तथा उनसे माता-पिता की ओर से लगाई गई पाबन्दियां बर्दाश्त नहीं होती।
  5. वह कभी बड़ों की तरह तथा कभी बच्चों की तरह बर्ताव करने लगते हैं।
  6. किशोरावस्था में लड़के अधिक भावुक हो जाते हैं।
  7. अपने शरीर में आए जिस्मानी परिवर्तनों के बारे उनमें जानने की इच्छा पैदा होती है।

प्रश्न 7.
किशोरावस्था के दौरान माता-पिता के उनके बच्चों के प्रति क्या कर्त्तव्य हैं?
उत्तर-

  1. बच्चों को लिंग शिक्षा सम्बन्धी पूरी जानकारी देनी चाहिए। बच्चों को एड्स जैसी जानलेवा बीमारी तथा नशों के बुरे परिणामों के बारे में भी जानकारी देनी चाहिए।
  2. किशोर बच्चों से माता-पिता के मित्रों वाले सम्बन्ध होने बहुत आवश्यक हैं ताकि बच्चा बिना परेशानी अपनी शारीरिक तथा मानसिक परेशानी उनके साथ साझी कर सके तथा मां-बाप द्वारा दिये सुझावों का पालन कर सके।
  3. मां-बाप तथा अध्यापकों को किशोरों से अपना व्यवहार एक जैसा रखना चाहिए। किसी हालत में उन्हें छोटा तथा कभी बड़ा कहकर उनके मन में उलझन पैदा नहीं करनी चाहिए। इस तरह उसे यह समझ नहीं आता कि वह वास्तव में बड़ा हो गया है या अभी छोटा ही है।
  4. माता-पिता को भी इस अवस्था में अपने बच्चे के प्रति पूर्ण विश्वास वाला तथा हिम्मत वाला व्यवहार करना चाहिए ताकि उनका सर्वपक्षीय विकास ठीक ढंग से हो सके।
    अपनी ऊर्जा (शक्ति) खर्च करने के लिए कई प्रकार की रुचियों में रुझाने के लिए समय मिलना चाहिए जैसे खेल-कूद, कहानी पढ़ना, गाना-बजाना आदि।

प्रश्न 8.
प्रौढ़ावस्था में मनुष्य के सामाजिक कर्त्तव्य क्या होते हैं?
उत्तर-

  1. मनुष्य इस आयु में सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुसार अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करता है।
  2. मनुष्य उचित व्यवसाय का चुनाव करता है तथा अपने जीवन साथी का चुनाव करके घर बसा लेता है।
  3. बच्चे पालता है, दुनियादारी निभाता है, माता-पिता, छोटे बहन-भाइयों तथा अन्य रिश्तेदारों की जिम्मेवारी सम्भालता है।

प्रश्न 9.
बच्चा और बूढ़ा एक समान क्यों कहा जाता है? संक्षेप में लिखो।
उत्तर-
वृद्धावस्था में मनुष्य का शरीर कमजोर हो जाता है। उसके लिए चलना, फिरना, उठना, बैठना कठिन हो जाता है। आँखों से दिखाई देना तथा कानों से सुनना कम हो जाता है। ज्ञानेन्द्रियां अपना कार्य करना बन्द कर देती हैं। कई रंगों की पहचान नहीं कर सकते तथा कइयों को अंधराता हो जाता है।
इस तरह वृद्धों को विशेष देखभाल की ज़रूरत पड़ती है। जैसे छोटे बच्चों को होती है। इसीलिए बच्चे तथा वृद्ध को एक जैसा कहा जाता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव

प्रश्न 10.
स्कूल बच्चे के सामाजिक और मानसिक विकास में सहायक होता है। कैसे?
उत्तर-
स्कूल में बच्चे अपने साथियों से पढ़ना तथा खेलना तथा कई बार बोलना भी सीखते हैं। इस तरह उनमें सहयोग की भावना पैदा होती है। बच्चा जब अपने स्कूल का कार्य करता है तो उसमें ज़िम्मेदारी का बीज बो दिया जाता है। जब वह अध्यापक का कहना मानता है तो उसमें बड़ों के प्रति आदर की भावना पैदा होती है।
बच्चा स्कूल में अपने साथियों से कई नियम सीखता है तथा कई अच्छी आदतें सीखता है जो आगे चलकर उसके व्यक्तित्व को उभारने में सहायक हो सकती हैं।

प्रश्न 11.
किशोरावस्था में लड़के और लड़कियों में होने वाले परिवर्तनों का तुलनात्मक वर्णन करो।
उत्तर-

किशोर लड़के किशोर लड़कियां
(1) इस आयु में लड़कों की दाढ़ी तथा आने लगती हैं। (1) लड़कियों को माहवारी आने लगती मूंछे है।
(2) उनका शरीर बेढंगा (टांगें, बाजू लम्बी होने होना) हो जाता है तथा आवाज़ फटने लगती है। (2) इनके विभिन्न अंगों पर चर्बी जमा लगती है तथा कई आन्तरिक बदलाव जैसे दिल तथा फेफड़ों के आकार में वृद्धि होती है।
(3) इस आयु में लड़कों को खेल, पढ़ाई, कम्प्यूटर, समाज सेवा आदि सीखने पर जोर देना चाहिए। (3) लड़कियों को पढ़ाई, कढ़ाई, कम्प्यूटर, स्वैटर बुनना, संगीत, पेंटिंग आदि ज़ोर सीखने पर देना चाहिए।

प्रश्न 12.
प्रारम्भिक वर्षों में माता-पिता बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में किस प्रकार योगदान डालते हैं?
उत्तर-
बच्चे के व्यक्तित्व को बनाने में माता-पिता का बड़ा योगदान होता है क्योंकि बच्चा जब अभी छोटा ही होता है तभी माता-पिता की भूमिका उसकी ज़िन्दगी में आरम्भ हो जाती है। बच्चे के प्रारम्भिक वर्षों में बच्चे को भरपूर प्यार देना, उस द्वारा किये प्रश्नों के उत्तर देना, बच्चे को कहानियां सुनाना आदि से बच्चे का व्यक्तित्व उभरता है तथा माता-पिता इसमें काफ़ी सहायक होते हैं।

प्रश्न 13.
बच्चों को टीके लगवाने क्यों ज़रूरी हैं ? बच्चों को कौन-से टीके किस आयु में लगवाने चाहिएं? और क्यों?
उत्तर-
बच्चों को कई खतरनाक जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए उन्हें टीके लगाये जाते हैं। इन टीकों का सिलसिला जन्म के पश्चात् आरम्भ हो जाता है। बच्चों को 2 वर्ष की आयु तक चेचक, डिप्थीरिया, खांसी, टिटनस, पोलियो, हेपेटाइटस, बी०सी०जी० तथा टी०बी० आदि के टीके लगवाये जाते हैं। छ: वर्ष में बच्चों को कई टीकों की बूस्टर डोज़ भी दी जाती है।

प्रश्न 14.
बच्चे में 3 से 6 वर्ष की आयु तक होने वाले विकास का वर्णन करो।
उत्तर-
इस आयु में बच्चे की शारीरिक वृद्धि तेजी से होती है तथा उसकी भूख कम हो जाती है। वह अपना कार्य स्वयं करना चाहता है।
बच्चे को रंगों तथा आकारों का ज्ञान हो जाता है तथा उसकी रुचि ड्राईंग, पेंटिंग, ब्लॉक्स से खेलने तथा कहानियां सुनने की ओर अधिक हो जाती है।
बच्चा इस आयु में प्रत्येक बात की नकल करने लग जाता है।

प्रश्न 15.
दो से तीन वर्ष के बच्चे में होने वाले भावनात्मक विकास सम्बन्धी जानकारी दो।
उत्तर-
इस आयु के दौरान बच्चा मां की सभी बातें नहीं मानना चाहता। ज़बरदस्ती करने पर वह ऊंची आवाज़ में रोता है, ज़मीन पर लोटता है, तथा हाथ-पैर मारने लगता है। कई बार वह खाना-पीना भी छोड़ देता है। माता-पिता को ऐसी हालत में चाहिए कि उसको न डांटें परन्तु जब वह शांत हो जाए तो उसे प्यार से समझाना चाहिए।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 16.
किशोरावस्था के दौरान लिंग शिक्षा देना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
किशोरावस्था आने पर बच्चों के शरीर में कई तरह के परिवर्तन आते हैं। उनके प्रजनन अंगों का विकास होता है। लड़कियों को माहवारी आने लगती है। शरीर के विभिन्न अंगों पर चर्बी जमा होनी आरम्भ हो जाती है। किशोरावस्था में बच्चे में विरोधी लिंग के प्रति आकर्षण पैदा हो जाता है। बच्चों को इन सभी परिवर्तनों की जानकारी नहीं होती तथा वह यह जानकारी अपने दोस्तों-मित्रों से हासिल करने की कोशिश करते हैं अथवा ग़लत किताबें पढ़ते हैं तथा अपने मन में ग़लत धारणाएं बना लेते हैं। वैसे तो हमारे समाज में लड़केलड़कियों के मिलने के अवसर कम ही होते हैं परन्तु कई बार यदि उन्हें इकट्ठे रहने का मौका मिल जाये तो इसके ग़लत परिणाम भी निकल सकते हैं।
इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि किशोरों को माता-पिता तथा अध्यापक अच्छी तरह लिंग शिक्षा प्रदान करें। उनके साथ स्वयं मित्रों वाला व्यवहार करें तथा उनकी समस्याओं को समझें तथा सुलझाएं ताकि उन्हें ग़लत संगति में जाने से रोका जा सके। उन्हें एड्स जैसी भयानक बीमारी की भी जानकारी देनी चाहिए।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव

प्रश्न 17.
बच्चों से मित्रतापूर्वक व्यवहार रखने से उनमें कौन-से सद्गुण विकसित होते हैं? विस्तारपूर्वक लिखो।
उत्तर-
बच्चे के व्यक्तित्व तथा भावनात्मक विकास में माता-पिता के प्यार तथा मित्रतापूर्वक व्यवहार की बड़ी महत्ता है। माता-पिता के प्यार से बच्चे को यह विश्वास हो जाता है कि उसकी प्राथमिक ज़रूरतें उसके माता-पिता पूरी करेंगे। माता-पिता की ओर से बच्चे द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर देने पर बच्चे का दिमागी विकास होता है। उसे स्वयं पर विश्वास होने लगता है। माता-पिता द्वारा बच्चे को कहानियां सुनाने पर उसका मानसिक विकास होता है। कई बार बच्चा मां का कहना नहीं मानना चाहता तथा ज़बरदस्ती करने पर गुस्सा होता है। ऊँची आवाज़ में रोता है, हाथ-पैर मारता है तथा ज़मीन पर लोटने लग जाता है। ऐसी हालत में बच्चे को डांटना नहीं चाहिए तथा शांत होने पर उसे प्यार से माता-पिता द्वारा समझाया जाना चाहिए कि वह ऐसे ग़लत करता है। इस तरह बच्चे को पता चल जाता है कि माता-पिता उससे किस तरह के व्यवहार की उम्मीद करते हैं।

बच्चे से दोस्ताना व्यवहार रखने पर बच्चों को अपनी समस्याओं का हल ढूँढने के लिए ग़लत रास्तों पर नहीं चलना पड़ता अपितु उनमें यह विश्वास पैदा होता है कि माता-पिता उसे सही मार्ग बताएंगे।

वह ग़लत संगति से बच जाता है। उसमें अच्छी रुचियां जैसे ड्राईंग, पेंटिंग, संगीत. अच्छी किताबें पढ़ना आदि पैदा होती हैं। वह अपनी शक्ति का प्रयोग अच्छे कार्यों में करता है। इस तरह वह एक अच्छा व्यक्तित्व बन कर उभरता है।

प्रश्न 18.
वृद्धावस्था में पैसे के साथ प्यार क्यों बढ़ जाता है?
उत्तर-
वृद्धावस्था मनुष्य की ज़िन्दगी का अन्तिम पड़ाव होता है। इस पड़ाव पर पहुंच कर अलग-अलग मानवों पर अलग-अलग प्रभाव होता है। कई तो अभी भी ऐसे हँसमुख तथा स्वस्थ रहते हैं तथा कई हर समय यही सोचते हैं कि वह बूढ़े हो गये हैं, अब उन्हें और भी कई बीमारियां लग जाएंगी तथा वह और भी बूढ़े हो जाते हैं। इस उम्र में कमजोरी तो आती है जोकि मानसिक तथा शारीरिक दोनों तरह की होती है। कइयों की नेत्र ज्योति घट जाती है। कई बार ज्ञानेन्द्रियां कमजोर हो जाती हैं। दाँत टूट जाते हैं। शरीर काम नहीं कर सकता : कइयों की रंगों को पहचानने की शक्ति कम हो जाती है तथा कइयों को अंधराता हो जाता है। परन्तु ऐसी हालत में भी मनुष्य यह चाहता है कि वह आर्थिक पक्ष से रिश्तेदारों का मोहताज न हो, उसके पास अपने पैसे हों तथा उसकी स्वतन्त्रता को कोई फर्क न पड़े। धन तो अब वह कमा नहीं सकता इसलिए वह प्रत्येक पैसे को खर्च करते समय कई बार सोचता है। इस तरह वृद्धावस्था में धन के प्रति उसका मोह बढ़ जाता है। वृद्धावस्था में नींद भी कम आती है, कानों से कम सुनाई देता है। सांसारिक वस्तुओं से प्यार कम हो जाता है तथा परमात्मा की ओर ध्यान बढ़ जाता है।

Home Science Guide for Class 9 PSEB मनुष्य के विकास के पड़ाव Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

रिक्त स्थान भरें-

  1. प्रौढ़ावस्था के . ……………… पड़ाव हैं।
  2. महीने का बच्चा स्वयं खड़ा हो सकता है।
  3. ……………… वर्ष के बच्चे बालिग हो जाते हैं।
  4. छः वर्ष में बच्चों को …………………. डोज़ भी दी जाती है।
  5. ………………… वर्ष में बच्चा सीढ़ियां चढ़-उतर सकता है।

उत्तर-

  1. दो,
  2. 10,
  3. 18,
  4. टीकों की बूस्टर,
  5. दो।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
कितने माह का बच्चा बिना सहारे के बैठ सकता है?
उत्तर-
9 माह का।

प्रश्न 2.
प्रौढ़ावस्था की पहली अवस्था कब तक होती है?
उत्तर-
40 वर्ष तक।

प्रश्न 3.
कितनी आयु में लड़कियों के फेफड़ों की वृद्धि पूर्ण हो जाती है?
उत्तर-
17 वर्ष।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव

प्रश्न 4.
औरतों में माहवारी किस आयु में बंद हो जाती है?
उत्तर-
45 से 50 वर्ष।

ठीक/ग़लत बताएं

  1. 2 वर्ष में बच्चा सीढ़ियां चढ़-उतर सकता है।
  2. वृद्ध अवस्था का प्रभाव सभी पर एक जैसा होता है।
  3. स्कूल में बच्चे का मानसिक तथा सामाजिक विकास होता है।
  4. 9 महीने का बच्चा सहारे के बिना खड़ा हो सकता है।
  5. 6 वर्ष का होने पर बच्चे को कई टीकों के बूस्टर डोज़ दिए जाते हैं।
  6. किशोर अवस्था में लड़कों की दाड़ी तथा मूंछ निकलनी शुरू हो जाती है।

उत्तर-

  1. ठीक,
  2. ग़लत,
  3. ठीक,
  4. ठीक,
  5. ठीक,
  6. ठीक।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कितनी देर का बच्चा स्वयं उठ कर खड़ा हो सकता है –
(A) 6 माह का
(B) 1 वर्ष का
(C) 3 महीने का
(D) 8 महीने का।
उत्तर-
(B) 1 वर्ष का

प्रश्न 2.
कानूनी रूप में बच्चा कितनी आयु में वयस्क हो जाता है –
(A) 15 वर्ष
(B) 20 वर्ष
(C) 18 वर्ष
(D) 25 वर्ष।
उत्तर-
(C) 18 वर्ष

प्रश्न 3.
कौन-सा तथ्य ठीक है –
(A) किशोरावस्था में लड़के अधिक भावुक हो जाते हैं।
(B) बच्चे तथा वृद्ध को एक समान कहा जाता है।
(C) किशोर अवस्था को तूफानी तथा दबाव वाली अवस्था माना गया है।
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(D) सभी ठीक।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जन्म से दो वर्ष तक के बच्चे में सामाजिक तथा भावनात्मक विकास के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
इस आयु का बच्चा जिन आवाज़ों को सुनता है, उनका मतलब समझने की कोशिश करता है। वह प्यार तथा क्रोध की आवाज़ को समझता है। वह अपने आस-पास के लोगों को पहचानना आरम्भ कर देता है। जब बच्चे को अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा पूरा लाड़-प्यार मिलता है तथा उसकी प्राथमिक आवश्यकताएं पूरी की जाती हैं तो उसे विश्वास हो जाता है कि उसकी ज़रूरतें उसके माता-पिता पूरी करेंगे। उसका इस तरह भावनात्मक तथा सामाजिक विकास आरम्भ हो जाता है।

प्रश्न 2.
दो से तीन वर्ष के बच्चे के विकास बारे तम क्या जानते हो?
उत्तर-
शारीरिक विकास-2 से 3 वर्ष के बच्चे की शारीरिक तौर पर वृद्धि तेज़ी से होती है। शारीरिक विकास के साथ ही उसका सामाजिक विकास इस समय बड़ी तेजी से होता है। __मानसिक विकास-इस आयु का बच्चा नई चीजें सीखने की कोशिश करता है। वह पहले से अधिक बातें समझना आरम्भ कर देता है। वह अपने आस-पास के बारे में कई प्रकार के प्रश्न पूछता है। इस समय माता-पिता का कर्तव्य है कि वह बच्चे के प्रश्नों के उत्तर ज़रूर दें। बच्चे को प्यार से पास बिठा कर कहानियां सुनाने से उसका मानसिक विकास होता है।

सामाजिक विकास-इस आय में बच्चे को दूसरे बच्चों की मौजूदगी का अहसास होने लग जाता है। अपनी मां के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों से भी प्यार करने लगता है। अब वह अपने कार्य जैसे भोजन करना, कपड़े पहनना, नहाना, बुट पालिश करना आदि स्वयं ही करना चाहता है।
भावनात्मक विकास-इस आयु में बच्चा मां की सभी बातें नहीं मानना चाहता। ज़बरदस्ती करने पर वह ऊँची आवाज़ में रोता, हाथ-पैर मारता तथा ज़मीन पर लेटने लगता है। कई-कई बार खाना-पीना भी छोड़ देता है। गुस्से की अवस्था में बच्चे को डांटना नहीं चाहिए तथा जब वह शांत हो जाये तो प्यार से उसे समझाना चाहिए। इस तरह बच्चे में मातापिता के प्रति प्यार तथा विश्वास की भावना पैदा होती है तथा उसे यह अहसास होने लगता है कि उसके माता-पिता उससे किस तरह के व्यवहार की उम्मीद रखते हैं।

प्रश्न 3.
तीन से छः वर्ष के बच्चे के विकास के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
शारीरिक विकास- इस आयु में बच्चे की वृद्धि तेज़ी से होती है परन्तु उसको भूख कम लगती है। वह परिवार के बड़े सदस्यों के साथ बैठकर वही भोजन खाना चाहता है जो वे खाते हैं। बच्चे के शारीरिक विकास के लिए बच्चे की खुराक में दूध, अण्डा, पनीर तथा अन्य प्रोटीन वाले भोजन पदार्थ अधिक मात्रा में शामिल करने चाहिएं। बच्चा धीरे-धीरे अपना कार्य करने लगता है तथा उसे जहां तक हो सके अपने काम स्वयं करने देने चाहिएं। इस तरह वह आत्म-निर्भर बनता है।
मानसिक विकास- इस आयु के बच्चे में ड्राईंग, पेंटिंग, ब्लॉक्स से खेलना तथा कहानियां सुनने आदि में रुचि पैदा होती है। उसे रंगों तथा आकारों का भी ज्ञान हो जाता है।
सामाजिक तथा भावनात्मक विकास-बच्चा जब दूसरे बच्चों से मिलता-जुलता है उसमें सहयोग की भावना पैदा होती है। बच्चा इस आयु में प्रत्येक बात की नकल करता है इसलिए जहां तक हो सके उसके सामने कोई ऐसी बात न करो जिसका उसके मन पर बुरा प्रभाव पड़े जैसे सिग्रेट पीना।

प्रश्न 4.
किशोरावस्था में लड़कियों में आने वाले परिवर्तनों के बारे में बताओ।
उत्तर-

  1. इस आयु में लड़कियों को माहवारी आने लगती है। क्योंकि उन्हें इसके कारण का पता नहीं होता, कई बार वे घबरा जाती हैं।
  2. इस आयु में लड़कियां अधिक समझदार हो जाती हैं तथा कई बार पढ़ाई में भी तेज़ हो जाती हैं।
  3. इस आयु में लड़कियां जल्दी भावुक हो जाती हैं। कई बार छोटी-सी बात पर रोने लगती हैं। उदास तथा नाराज़ भी रहने लगती हैं।
  4. वह अपनी आलोचना नहीं सहन कर सकतीं तथा शीघ्र रुष्ट हो जाती हैं।
  5. इस आयु में जागते ही सपने देखना आरम्भ कर देती हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 10 मनुष्य के विकास के पड़ाव

प्रश्न 5.
किशोरावस्था क्या है तथा इसमें होने वाले विकास के बारे में बताओ।
उत्तर-
जब लड़कों की मस फूटती है तथा लड़कियों को माहवारी आने लगती है, इसको किशोरावस्था कहते हैं। यह एक ऐसा पड़ाव है जब बच्चा न तो बच्चों में गिना जाता है न ही बालिगों में। उसमें शारीरिक परिवर्तन आने के साथ-साथ बच्चे की ज़िम्मेदारियां, फर्ज़ तथा दूसरों से रिश्तों में भी परिवर्तन आता है।
इसके दो भाग होते हैं-प्राथमिक तथा बाद की किशोरावस्था।

शारीरिक विकास-इस आयु में शारीरिक परिवर्तनों की गति कम हो जाती है तथा प्रजनन अंगों का विकास होता है। इस पड़ाव पर लड़कियां अपना कद पूरा कर लेती हैं तथा शरीर के विभिन्न अंगों पर चर्बी जमा होनी आरम्भ हो जाती है। बाह्य परिवर्तनों के साथ-साथ शरीर में कुछ आन्तरिक परिवर्तन भी होते हैं जैसे पाचन प्रणाली में पेट का आकार लम्बा हो जाता है तथा आंतों की लम्बाई तथा चौड़ाई भी बढ़ती है। पेट तथा आंतों की मांसपेशियां मज़बूत हो जाती हैं। जिगर का भार भी बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त किशोरावस्था में दिल की वृद्धि भी तेजी से होती है। 17,18 वर्ष की आयु तक इसका भार जन्म के भार से 12 गुणा बढ़ जाता है। श्वास प्रणाली में 17 वर्ष की आयु में लड़कियों के फेफड़ों की वृद्धि पूर्ण हो जाती है। इस आयु में प्रजनन अंगों तथा उनसे सम्बन्धित गलैंड्स का भी तेजी से विकास होता है तथा अपना कार्य करना आरम्भ कर देता हैं।

भावनात्मक तथा मानसिक विकास-कई मनोवैज्ञानिक किशोरावस्था को तूफानी तथा दबाव (Storm and Stress) वाली अवस्था मानते हैं। इसमें भावनाएं बड़ी तीव्र तथा बेकाबू हो जाती हैं परन्तु जैसे-जैसे आयु बढ़ती है भावनात्मक व्यवहार में परिवर्तन आता है। इस आयु में बच्चे को बच्चे की तरह समझने से भी वह गुस्सा मनाते हैं। वह अपना गुस्सा चुप रह कर अथवा ऊँची आवाज़ में नाराज़ करने वाली की आलोचना करते हैं। इसके अतिरिक्त जो बच्चे उससे पढ़ाई में अथवा व्यवहार के तौर पर बढ़िया हों उनके प्रति ईर्ष्यालु हो जाते हैं। परन्तु धीरे-धीरे इन सभी भावनाओं पर बच्चा काबू पाना सीखता है। वह सभी के सामने अपना क्रोध ज़ाहिर नहीं कर सकता। पूरे भावनात्मक विकास वाला बच्चा अपने व्यवहार को स्थिर रखता है। इस अवस्था के दौरान बच्चे की सामाजिक दिलचस्पी तथा व्यवहार पर हम उमर मित्रों का अधिक प्रभाव पड़ता है। इस अवस्था में बच्चे की मनोरंजक, शैक्षणिक, धार्मिक तथा फैशन प्रति नई रुचियां विकसित होती हैं । किशोरावस्था में बच्चे में विपरीत लिंग प्रति आकर्षण भी पैदा हो जाता है तथा वह इस कम्पनी में आनन्द महसूस करता है। इस अवस्था का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि बच्चों का व पारिवारिक रिश्तों प्रति लगाव कम होना आरम्भ हो जाता है। बच्चा अपने व्यक्तित्व तथा अस्तित्व प्रति अधिक चेतन हो जाता है। सामाजिक वातावरण के अनुसार बच्चा अपने व्यक्तित्व के विकास तथा अस्तित्व जताने की कोशिश करता है परन्तु कई बार घर के हालात तथा आर्थिक कारण उसके उद्देश्यों की पूर्ति में रुकावट बन जाते हैं। इन परिस्थितियों में कई बार बच्चा हार जाने तथा घटियापन के अहसास का शिकार हो जाता है तथा बच्चे का व्यवहार साधारण नहीं रहता तथा व्यक्तित्व के विकास प्रक्रिया में बिगाड़ पैदा हो जाता है।

प्रश्न 6.
बुढ़ापे की क्या खास विशेषताएं हैं?
उत्तर-
बुढ़ापे की कुछ विशेषताएं हैं जो इसे मानवीय ज़िन्दगी की एक विलक्षण अवस्था बनाती हैं। इस आयु में शारीरिक तथा मानसिक कमज़ोरी आने लगती है इस आयु में बुजुर्गों की पाचन शक्ति, चलना-फिरना, बीमारियां सहने की शक्ति, सुनने तथा देखने की शक्ति घट जाती है। इसके साथ बालों का सफ़ेद होना, चमड़ी पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। बुर्जुगों की शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन उनके सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन (Adjustment) को प्रभावित करती हैं। इन परिवर्तनों का बुजुर्गों की बाह्य दिखावट, कपड़े पहनने, मनोरंजन, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ता है।
इस आयु में मनुष्य सामाजिक ज़िम्मेदारी से धीरे-धीरे पीछे हटता जाता है तथा उसकी धार्मिक गतिविधियों में वृद्धि होती है। इस आयु में व्यक्ति को बहुत सारी बीमारियां भी आ घेरती हैं जिनसे छुटकारा पाने के लिए उसकी निर्भरता परिवार पर बढ़ जाती है । इस अवस्था में परिवार के सदस्यों का बुजुर्गों प्रति व्यवहार बुजुर्गों के लिए खुशी अथवा उदासी का कारण बनता है। बुजुर्गों में एकांकीपन, परिवार पर बोझ, सामाजिक सम्मान घटने का अहसास मानसिक परेशानी का कारण बन जाता है।
जीवन के अन्तिम पड़ाव पर पहुंचते हुए बुजुर्ग सभी प्राथमिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए एक छोटे बच्चे की तरह पूर्णतः परिवार पर निर्भर हो जाता है। इस अवस्था दौरान कई बार बुजुर्गों में बच्चों वाली आदतें उत्पन्न हो जाती हैं।

प्रश्न 7.
जन्म से दो वर्ष तक होने वाले शारीरिक विकास के पड़ावों का वर्णन करो।
उत्तर-
जन्म से दो वर्ष के दौरान होने वाले शारीरिक विकास निम्नलिखित अनुसार हैं

  1. 6 हफ्ते की आयु तक बच्चा मुस्कुराता है तथा किसी रंगीन वस्तु की ओर टिकटिकी लगाकर देखता है।
  2. 3 महीने की आयु तक बच्चा चलती-फिरती वस्तु से अपनी आँखों को घुमाने लगता है।
  3. 6 महीने का बच्चा सहारे से तथा 8 महीने का बच्चा बिना सहारे के बैठ सकता है। (4) 9 महीने का बच्चा सहारे के बिना खड़ा हो सकता है।
  4. 10 महीने का बच्चा स्वयं खड़ा हो सकता है तथा सरल, सीधे शब्द जैसे-काका, पापा, मामा, टाटा आदि बोल सकता है।
  5. 1 वर्ष का बच्चा स्वयं उठकर खड़ा हो सकता है तथा उंगली पकड़कर अथवा स्वयं चलने लगता है।
  6. 11 वर्ष का बच्चा बिना किसी सहारे के चल सकता है तथा 2 वर्ष में बच्चा सीढ़ियों पर चढ़ सकता है।

प्रश्न 8.
बच्चों को टीकों की बूस्टर दवा कब दिलाई जाती है?
उत्तर-
छ: वर्ष का होने पर बच्चे को कई टीकों के बूस्टर डोज़ दिए जाते हैं ताकि उन्हें कई जानलेवा बीमारियों से बचाया जा सके।

मनुष्य के विकास के पड़ाव PSEB 9th Class Home Science Notes

  • मानवीय जीवन का आरम्भ बच्चे के मां के गर्भ में आने से होता है।
  • मानवीय विकास के विभिन्न पड़ाव होते हैं जैसे ; बचपन, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था तथा वृद्धावस्था।
  • बच्चा जन्म से लेकर दो वर्ष तक बेचारा-सा तथा दूसरों पर निर्भर होता है।
  • 12 वर्ष का बच्चा स्वयं चल सकता है तथा 2 वर्ष में बच्चा सीढ़ियां चढ़-उतर सकता है।
  • दो वर्ष के बच्चों को कई प्रकार की बीमारियों से बचाने के लिए टीके लगाए जाते हैं।
  • दो से तीन वर्ष का बच्चा नई चीजें सीखने की कोशिश करता है।
  • छ: वर्ष तक बच्चे की,खाने, पीने, सोने, टट्टी-पेशाब तथा शारीरिक सफ़ाई की आदतें पक्की हो जाती हैं।
  • स्कूल में बच्चे का मानसिक तथा सामाजिक विकास होता है।
  • जब लड़कों की मस फूटती है तथा लड़कियों को माहवारी आने लग जाती है तो इस आयु को किशोसवस्था कहते हैं।
  • किशोरों के माता-पिता का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने बच्चों को लिंग शिक्षा सही ढंग से दें।
  • इस आयु में बच्चे स्वयं को बालिग समझने लगते हैं।
  • पहले बच्चे कानूनी तौर पर 21 वर्ष की आयु पर बालिग हो जाते थे तथा अब 18 वर्ष की आयु के बच्चे को कानूनी तौर पर बालिग करार दे दिया जाता है।
  • प्रौढ़ावस्था के दो पड़ाव हैं। 40 वर्ष तक पहली तथा 40 से 60 वर्ष की पिछली प्रौढ़ावस्था।
  • 45 से 50 वर्ष की आयु में औरतों को माहवारी बन्द हो जाती है।
  • वृद्धावस्था के प्रत्येक व्यक्ति पर अलग-अलग प्रभाव होता है।
  • वृद्धावस्था में नींद कम आती है तथा दाँत खराब होने के कारण भोजन ठीक तरह नहीं खाया जा सकता।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान

Punjab State Board PSEB 9th Class Home Science Book Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Home Science Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान

PSEB 9th Class Home Science Guide वस्त्र धोने के लिए सामान Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
वस्त्र धोने में प्रयोग होने वाले सामान को कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-

  1. स्टोर करने के लिए सामान
  2. वस्त्र धोने के लिए सामान
  3. वस्त्र सुखाने के लिए सामान
  4. वस्त्र इस्तरी करने के लिए सामान।

प्रश्न 2.
वस्त्र संग्रह करने के लिए हमें क्या-क्या सामान चाहिए?
उत्तर-
इसके लिए हमें अलमारी, लांडरी बैग अथवा गंदे वस्त्र रखने के लिए टोकरी की ज़रूरत होती है। मर्तबान तथा प्लास्टिक के डिब्बे भी आवश्यक होते हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान

प्रश्न 3.
वस्त्र धोने के लिए हम पानी कहां से प्राप्त करते हैं?
उत्तर-
वस्त्र धोने के लिए वर्षा का पानी, दरिया का पानी, चश्मे का पानी तथा कुएं आदि स्रोतों से पानी प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
हल्के और भारी पानी में क्या अन्तर है?
उत्तर

भारी पानी हल्का पानी
(1) इसमें अशुद्धियां होती हैं। (1) इसमें अशुद्धियां नहीं होती।
(2) इसमें साबुन की झाग नहीं बनती। (2) इसमें आसानी से साबुन की झाग बन जाती है।

प्रश्न 5.
भारी पानी को हल्का कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर-
भारी पानी को उबाल कर तथा चूने के पानी से मिलाकर हल्का बनाया जा सकता है अथवा फिर कास्टिक सोडा अथवा सोडियम बाइकार्बोनेट से प्रक्रिया करके इसको हल्का बनाया जाता है।

प्रश्न 6.
स्थाई और अस्थाई भारी पानी में क्या अन्तर हैं ?
उत्तर-

अस्थाई भारी पानी स्थाई भारी पानी
(1) इसमें कैल्शियम तथा मैग्नीशियम क्लोराइड तथा सल्फेट घुले होते हैं। (1) इसमें कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के लवण होते हैं।
(2) इसको उबालकर तथा चूने के पानी से मिलाकर हल्का बनाया जाता है। (2) कास्टिक सोडा अथवा सोडियम बाइ-कार्बोनेट से प्रक्रिया करके छानकर इसको हल्का बनाया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 7.
वस्त्रों की धुलाई में पानी का क्या महत्त्व है?
उत्तर-

  1. पानी को विश्वव्यापी घोलक कहा जाता है। इसलिए वस्त्रों पर लगे दाग तथा मिट्टी आदि पानी में घुल जाते हैं तथा वस्त्र साफ़ हो जाते हैं।
  2. पानी वस्त्र को गीला करके अन्दर तक चला जाता है तथा उसको साफ़ कर देता है।

प्रश्न 8.
पानी के स्त्रोत के आधार पर पानी का वर्गीकरण कैसे करोगे?
उत्तर-
पानी के स्रोत के आधार पर पानी का वर्गीकरण निम्नलिखित ढंग से किया जा सकता है

  1. वर्षा का पानी-यह पानी का सबसे शुद्ध रूप होता है। यह हल्का पानी होता है, परन्तु हवा की अशुद्धियां इसमें घुली होती हैं। इसको वस्त्र धोने के लिये प्रयोग किया जा सकता है।
  2. दरिया का पानी-पहाड़ों की बर्फ पिघल कर दरिया बनते हैं। जैसे-जैसे यह पानी मैदानी इलाकों में आता रहता है इसमें अशुद्धियों की मात्रा बढ़ती रहती है तथा पानी गंदा सा हो जाता है। यह पानी पीने के लिए ठीक नहीं होता, परन्तु इससे वस्त्र धोए जा सकते हैं।
  3. चश्मे का पानी-धरती के नीचे इकट्ठा हुआ पानी किसी कमज़ोर स्थान से बाहर निकल आता है, इसको चश्मा कहते हैं। इस पानी में कई खनिज लवण घुले होते हैं इसको कई बार दवाई के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। वस्त्र धोने के लिए यह पानी ठीक है।
  4. कुएँ का पानी-धरती को खोदकर जो पानी बाहर निकलता है वह पानी पीने के लिए ठीक होता है। इसको कुएँ का पानी कहते हैं। इससे वस्त्र धोए जा सकते हैं।
  5. समुद्र का पानी-इस पानी में काफ़ी अधिक अशुद्धियां होती हैं। यह पीने के लिए तथा वस्त्र धोने के लिए भी ठीक नहीं होता।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान

प्रश्न 9.
वस्त्र धोने के लिए पानी के अतिरिक्त अन्य कौन-कौन सा सामान चाहिए?
उत्तर-
वस्त्र धोने के लिए पानी के अतिरिक्त साबुन, टब, बाल्टियां, चिल्मचियां, मग, रगड़ने वाला ब्रुश तथा फट्टा, पानी गर्म करने वाली देग, वस्त्र धोने वाली मशीन, सक्शन वाशर आदि सामान ज़रूरत होती है।

प्रश्न 10.
वस्त्र सुखाने के लिए क्या-क्या सामान चाहिए? महानगरों और फ्लैटों में रहने वाले लोग वस्त्र कैसे सखाते हैं?
उत्तर-
वस्त्रों को सुखाने के लिए प्राकृतिक धूप तथा हवा की ज़रूरत होती है। परन्तु अन्य सामान जिसकी ज़रूरत होती है, वह है

  1. रस्सी अथवा तार,
  2. क्लिप तथा हैंगर
  3. वस्त्र सुखाने वाला रैक,
  4. वस्त्र सुखाने के लिए बिजली की कैबिनेट।

बड़े शहरों में फ्लैटों में रहने वाले लोग कपड़ों को सुखाने के लिए रैकों का प्रयोग करते हैं। ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन की सहायता भी ली जा सकती है।

प्रश्न 11.
वस्त्र सुखाने के लिए क्या-क्या सामान चाहिए? हमारे देश में वस्त्र सुखाने के लिए कौन-सा ढंग अपनाया जाता है?
उत्तर-
वस्त्र धोने के लिए सामान-देखें प्रश्न 10 का उत्तर।
हमारे देश में साधारणतः घर खुले से होते हैं। छतों अथवा चौबारों पर जहां धूप आती हो रस्सियां अथवा तारों को ठीक ऊंचाई पर बांधकर इन पर वस्त्र सुखाने के लिए लटकाये जाते हैं।
बड़े शहरों में जहां घर खुले नहीं होते तथा लोग फ्लैटों में रहते हैं, वस्त्रों को रैकों पर सुखाया जाता है।
आजकल वाशिंग मशीनों का प्रयोग तो हर कहीं होने लगा है। इनके साथ भी वस्त्र सुखाये जा सकते हैं।

प्रश्न 12.
वस्त्रों को इस्तरी करना क्यों ज़रूरी है और कौन-कौन से सामान की आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर-
वस्त्र धोकर जब सुखाये जाते हैं, इनमें कई सिलवटें पड़ जाती हैं तथा वस्त्र की दिखावट बुरी-सी हो जाती है। कपड़ों को प्रैस करके इनकी सिलवटें आदि तो निकल ही जाती हैं साथ ही वस्त्र में चमक भी आ जाती है तथा वस्त्र साफ़-सुथरा लगता है।
वस्त्र प्रैस करने के लिए निम्नलिखित सामान की ज़रूरत पड़ती है
बिजली अथवा कोयले से चलने वाली प्रैस, प्रेस करने के लिए फट्टा आदि।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 13.
धुलाई के लिए प्रयोग होने वाले सही सामान के चयन से समय और श्रम की बचत कैसे होती है?
उत्तर-
धुलाई के लिए प्रयोग होने वाला सामान इस तरह है

  1. स्टोर करने के लिए सामान
  2. वस्त्र धोने के लिए सामान
  3. वस्त्र सुखाने के लिए सामान
  4. वस्त्र प्रैस करने के लिए सामान।

जब धोने वाले वस्त्र पहले ही इकट्ठे करके एक अल्मारी अथवा टोकरी आदि में रखे जाएं जो कि धोने वाले स्थान के नज़दीक रखी हो तो वस्त्र धोते समय सारे घर से विभिन्न कमरों से पहले वस्त्र इकट्ठे करने का समय बच जाता है। यह आदत गृहिणी को सारे घर के सदस्यों को डालनी चाहिए कि जो भी धोने वाला कपड़ा हो उसे इस काम के लिए बनाई अलमारी अथवा टोकरी में रखें।

घर में साबुन, डिटर्जेंट, नील, ब्रुश आदि आवश्यक सामान पहले ही मौजूद होना चाहिए। इस तरह नहीं होना चाहिए कि उधर से वस्त्र धोने आरम्भ कर लिये जाएं तथा बाद में पता चले घर में तो साबुन अथवा कोई अन्य आवश्यक सामान नहीं है। इस तरह समय तथा मेहनत दोनों नष्ट होते हैं।

धोने के लिए पानी भी हल्का ही प्रयोग करना चाहिए क्योंकि भारी पानी में साबुन की झाग नहीं बनती तथा वस्त्र अच्छी तरह नहीं निखरते। इसलिए पानी को गर्म करके अथवा अन्य तरीके से पानी को हल्का बना लेना चाहिए। वस्त्र सुखाने का भी ठीक प्रबन्ध होना चाहिए। रस्सियों आदि को अच्छी तरह बांधना चाहिए तथा कपड़ों पर क्लिप आदि लगा लेने चाहिए ताकि हवा चले तो वस्त्र उड़ न जाएं। यदि रैक हैं तो इन्हें पहले ही खोल लेना चाहिए। इस तरह विभिन्न आवश्यक सामान पहले ही इकट्ठा किया हो तो समय तथा मेहनत की त्चत हो जाती है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान

प्रश्न 14.
वस्त्र धुलाई के समान को किन-किन भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-
स्टोर करने के लिए सामान-

  1. अलमारी-धोने वाले कमरे के नज़दीक अलमारी होनी चाहिए जिसमें साबुन, नील, मावा, रीठे, दाग उतारने वाला सामान आदि होना चाहिए।
  2. लाऊण्डरी बैग अथवा वस्त्र रखने के लिए टोकरी-इसमें घर के गंदे वस्त्र रखे जाते हैं।
  3. मर्तबान तथा प्लास्टिक के डिब्बे-रीठे, दाग उतारने का सामान, नील, डिटर्जेंट आदि इनमें रखा जाता है।

वस्त्र धोने के लिए सामान-

  1. पानी-पानी एक विश्वव्यापी घोलक है। इसमें सभी तरह की मैल घुल जाती है तथा इस तरह इसका कपड़ों की धुलाई में महत्त्वपूर्ण स्थान है। पानी को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है। वर्षा का पानी, दरिया का पानी, चश्मे का पानी, कुएँ के पानी का प्रयोग वस्त्र धोने के लिए किया जा सकता है।
  2. साबुन-वस्त्र धोने के लिए कई सफ़ाईकारी पदार्थ, साबुन तथा डिटर्जेंट मिलते हैं। वस्त्र साफ़ करने में इनका बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है।
  3. टब तथा बाल्टियां- इनमें वस्त्र भिगोकर रखे, धोये तथा खंगाले जाते हैं। यह लोहे, प्लास्टिक अथवा पीतल के होते हैं। इनमें नील देने, रंग देने तथा मावा देने का भी कार्य किया जाता है।
    PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान (1)
  4. चिल्मचियां तथा मग-इनमें नील, मावा आदि देने का कार्य किया जाता है। यह प्लास्टिक, तामचीनी तथा पीतल आदि के होते हैं।
  5. लकड़ी का चम्मच तथा डण्डा-इससे नील अथवा मावा घोलने का कार्य किया जाता है। चद्दरें, खेस आदि को डण्डे अथवा थापी से पीट कर साफ़ किया जाता है।
  6. हौदी-धुलाई वाले कमरे में पानी की टूटी के नीचे सीमेंट की हौदी बनी हई होनी चाहिए। इससे काम आसान हो जाता है। हौदी के दोनों ओर सीमेंट अथवा लकड़ी के फट्टे लगे होने चाहिएं ताकि धोकर वस्त्र इन पर रखे जा सकें। इनकी ढलान हौदी की ओर होनी चाहिए।
  7. रगड़ने वाला ब्रुश तथा फट्टा-प्लास्टिक के ब्रुशों का प्रयोग वस्त्र के अधिक मैले हिस्से को रगड़कर मैल उतारने के लिए किया जाता है। फट्टा लकड़ी, स्टील अथवा जस्त का बना होता है। इस पर रखकर वस्त्र को रगड़कर मैल निकाली जाती है।
    PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान (2)
  8. गर्म पानी-वस्त्र धोने के लिए या तो बिजली के बायलर में पानी गर्म किया जाता है या फिर आग के सेक से बर्तन में डालकर पानी गर्म किया जाता है।
  9. वस्त्र धोने वाली मशीन-इससे समय तथा. शक्ति दोनों की बचत होती, अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार इसको खरीदा जा सकता है।
  10. सक्शन वाशर-भारी, ऊनी, कम्बल, साड़ियां तथा अन्य वस्त्र इसके प्रयोग से आसानी से धोए जा सकते हैं।
    PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान (3)

वस्त्र सुखाने के लिए सामान — वस्त्रों को धोने के पश्चात् साधारणतः प्राकृतिक धूप तथा हवा में सुखाया जाता है। अन्य आवश्यक सामान इस तरह हैं —

  1. रस्सी अथवा तार-रस्सी को अथवा तार को खींचकर खूटियों तथा खम्बों में बांधा जाता है। रस्सी नायलॉन, सन अथवा सूत की हो सकती है। जंग रहित लोहे की तार भी हो सकती है।
  2. क्लिप तथा हैंगर-वस्त्र तार पर लटका कर क्लिप लगा दी जाती है ताकि हवा चलने पर वस्त्र नीचे गिरकर खराब न हो जाएं। बढ़िया किस्म के वस्त्र हैंगर में डालकर सुखाए जा सकते हैं।
  3. वस्त्र सुखाने वाले रैक-बरसातों में अथवा बड़े शहरों में जहां लोग फ्लैटों में रहते हैं वहां रैकों पर वस्त्र सुखाये जाते हैं । यह एल्यूमीनियम अथवा लकड़ी के हो सकते हैं। इन्हें फोल्ड करके सम्भाला भी जा सकता है।
    PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान (4)
  4. वस्त्र सुखाने के लिए बिजली की कैबिनेट-विकसित देशों में प्रायः इसका प्रयोग होता है। खासकर जहां अधिक ठण्ड अथवा वर्षा होती है उन देशों में इनका प्रयोग साधारण है।
    इनके अतिरिक्त ऑटोमैटिक वाशिंग मशीनों से भी वस्त्र सुखाये जा सकते हैं।
    PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान (5)

वस्त्र प्रैस करने वाला सामान —

  1. प्रेस-वस्त्र प्रैस करने के लिए बिजली अथवा कोयले वाली प्रेस का प्रयोग किया जाता है। प्रैस लोहे, पीतल तथा स्टील की मिलती है।
  2. प्रैस करने वाला फट्टा — यह लकड़ी का होता है, फट्टे के स्थान पर बैंच अथवा मेज आदि का भी प्रयोग किया जा सकता है । इस पर एक कम्बल बिछा कर ऊपर पुरानी चादर बिछा लेनी चाहिए।
    PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 11 वस्त्र धोने के लिए सामान (6)

प्रश्न 15.
वस्त्र धोने के लिए पानी कहां से प्राप्त किया जा सकता है और क्यों? कैसा पानी वस्त्र धोने के लिए उपयुक्त नहीं और क्यों?
उत्तर-
देखो प्रश्न 8 का उत्तर।
समुद्र के पानी का प्रयोग वस्त्र धोने के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें बहुत सारी अशुद्धियां मिली होती हैं।

Home Science Guide for Class 9 PSEB वस्त्र धोने के लिए सामान Important Questions and Answers

वस्तुनिक प्रश्न

रिक्त स्थान भरें-

  1. पानी घोलक है।
  2. हल्के पानी में …………….. की झाग शीघ्र बनती है।
  3. …………….. पानी में बहुत-सी अशुद्धियां होती हैं।
  4. स्रोत के आधार पर पानी को …………………. किस्मों में बांटा गया है।
  5. ……………… भारी पानी में कैल्शियम क्लोराइड होता है।

उत्तर-

  1. यूनिवर्सल,
  2. साबुन,
  3. समुद्र के,
  4. पांच,
  5. स्थायी।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारे पानी में कौन-से लवण होते हैं?
उत्तर-
कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के लत्रण।

प्रश्न 2.
स्वाद के अनुसार पानी कितने प्रकार का है?
उत्तर-
दो प्रकार का।

प्रश्न 3.
फ्लैटों में रहने वाले लोग कपड़े कहां सुखाते हैं?
उत्तर-
रैकों में।

प्रश्न 4.
साबुन को क्या कहा जाता है?
उत्तर-
सफाईकारी।

प्रश्न 5.
बिजली की कैबिनेट का प्रयोग कपड़े सुखाने के लिए किन देशों में हो रहा
उत्तर-
विकसित देशों में।

ठीक ग़लत बताएं

  1. लांडरी बैग में धोने वाले कपड़े एकत्र किए जाते हैं।
  2. पानी एक विश्वव्यापी घोलक है।
  3. पानी दो प्रकार का होता है हल्का तथा भारी।
  4. हल्के पानी में साबुन की झाग नहीं बनती।
  5. समुद्र का पानी पीने के लिए तथा कपड़े धोने के लिए ठीक नहीं होता।
  6. कपड़ों को धूप में सुखाना ठीक है।

उत्तर-

  1. ठोक,
  2. ठीक,
  3. ठीक,
  4. ग़लत,
  5. ठीक,
  6. ठीक।

बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धुलाई के लिए प्रयोग होने वाला सामान है
(A) स्टोर करने वाला
(B) कपड़े धोने वाला
(C) कपड़े सुखाने वाला
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(D) सभी ठीक।

प्रश्न 2.
कपड़े धोने के लिए सामान है
(A) पानी
(B) साबुन
(C) टब, बाल्टियां
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(D) सभी ठीक।

प्रश्न 3.
ठीक तथ्य हैं
(A) फ्लैटों में रहने वाले रैकों पर कपड़े सुखाते हैं
(B) धूप में कपड़े सुखाना अच्छा है
(C) समुद्र के पानी से कपड़े नहीं धो सकते
(D) सभी ठीक।
उत्तर-
(D) सभी ठीक।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धोबी को वस्त्र देने के क्या नुकसान हैं?
उत्तर-

  1. धोबी कई बार वस्त्र साफ़ करने के लिए ऐसी विधियों का प्रयोग करता है जिससे वस्त्र जल्दी फट जाते हैं अथवा फिर कमजोर हो जाते हैं।
  2. कई बार वस्त्रों के रंग खराब हो जाते हैं।
  3. छूत की बीमारियां होने का भी डर रहता है।
  4. धोबी से वस्त्र धुलाना महंगा पड़ता है।

प्रश्न 2.
जल चक्र क्या है?
उत्तर-
प्राकृतिक रूप में पानी कुओं, चश्मों, दरियाओं तथा समुद्रों में से मिलता है। धरती पर सूर्य की धूप से यह पानी भाप बनकर उड़ जाता है तथा वायुमण्डल में जलवाष्प के रूप में इकट्ठा होता रहता है तथा बादलों का रूप धारण कर लेता है। जब यह भारी हो जाते हैं तो वर्षा, ओलों तथा बर्फ के रूप में पानी दुबारा धरती पर आ जाता है। यह पानी शुरू से दरियाओं द्वारा होता हुआ समुद्र में मिल जाता है। तथा यह चक्र इसी तरह चलता रहता है।

प्रश्न 3.
स्वादानुसार पानी का वर्गीकरण कैसे किया गया है?
उत्तर-
स्वादानुसार पानी दो तरह का होता है-

  1. मीठा अथवा हल्का पानी-इस पानी का स्वाद मीठा होता है।
  2. खारा पानी-यह पानी स्वाद में नमकीन-सा होता है।

प्रश्न 4.
पानी का वर्गीकरण अशुद्धियों के अनुसार किस प्रकार किया गया है?
उत्तर-
अशुद्धियों के अनुसार पानी दो प्रकार का है

  1. हल्का पानी-इसमें अशुद्धियां नहीं होतीं तथा यह पीने में स्वादिष्ट होता है। इसमें साबुन की झाग भी शीघ्र बनती है।
  2. भारी पानी-इसमें कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के लवण घुले होते हैं। यह साबुन से मिलकर झाग नहीं बनाता। यह भी दो तरह का होता है अस्थाई भारी पानी तथा स्थाई भारी पानी।

प्रश्न 5.
वस्त्र धोने के लिए थापी अथवा डण्डे का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए? वस्त्र धोने वाला फट्टा क्या होता है?
उत्तर-
थापी का अधिक प्रयोग किया जाये तो कई बार वस्त्र फट जाते हैं, वस्त्र धोने वाला फट्टा स्टील अथवा लकड़ी का बना होता है। इस पर रखकर वस्त्रों को साबुन लगाकर रगड़ा जाता है। इस तरह वस्त्र से मैल उतर जाती है।

प्रश्न 6.
आप वस्त्र सुखाने के लिए लोहे के तार का प्रयोग करोगे अथवा नाइलॉन की रस्सी का?
उत्तर-
वैसे तो दोनों का प्रयोग किया जा सकता है परन्तु लोहे की तार को जंग लग जाता है जिससे वस्त्र पर दाग पड़ जाते हैं। इसलिए नाइलॉन की रस्सी अधिक उपयुक्त रहेगी।

वस्त्र धोने के लिए सामान PSEB 9th Class Home Science Notes

  • घर में वस्त्र कपड़े धोने के लिए कई तरह का सामान चाहिए।
  • वस्त्र धोने का सामान अपनी आर्थिक हालत अनुसार तथा आवश्यकतानुसार ही लो।
  • लाऊण्डरी बैग में धोने वाले वस्त्र इकट्ठे किये जाते हैं।
  • पानी एक विश्वव्यापी घोलक है, इसमें साधारणतः प्रत्येक प्रकार की मैल घुल जाती है।
  • पानी प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्रोत हैं। वर्षा, दरिया, कुएं, चश्मे तथा समुद्र का पानी।
  • समुद्र का पानी वस्त्र धोने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
  • पानी दो तरह का होता है-हल्का तथा भारी।
  • हल्के पानी में साबुन की झाग शीघ्र बनती है।
  • भारी पानी स्थाई तथा अस्थाई दो तरह का होता है। अस्थाई भारे पानी को उबाल कर हल्का किया जा सकता है।
  • साबुनों को सफ़ाईकारी कहा जाता है। यह चर्बी तथा खारों के मिश्रण से बनता
  • टब, बाल्टियां, चिल्मचियां आदि का प्रयोग नील देने, मावा देने, वस्त्र भिगोने, खंगालने आदि के लिए किया जाता है।
  • फ्लैटों में रहने वाले लोग वस्त्र सुखाने के लिए रैकों का प्रयोग करते हैं।
  • विकसित देशों में वस्त्र सुखाने के लिए बिजली की कैबिनेट का प्रयोग किया जाता है।
  • वस्त्र को साफ़-सुथरी, चमकदार, सिलवट रहित दिखावट प्रदान करने के लिए इस्तरी किया जाता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

Punjab State Board PSEB 9th Class Home Science Book Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Home Science Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

PSEB 9th Class Home Science Guide घरेलू सफ़ाई Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
घर की सफाई में किस प्रकार का सामान प्रयोग में आता है ?
उत्तर-
घर की सफाई के लिए पांच प्रकार के सामान का प्रयोग होता हैपोचा तथा पुराने कपड़े, झाड़ तथा ब्रुश, बर्तन, सफाई के लिए साबुन तथा अन्य प्रतिकारक, सफाई करने वाले यन्त्र।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

प्रश्न 2.
सफाई करने के कौन-कौन से ढंग हैं ?
उत्तर-
सफाई विभिन्न ढंगों से की जाती है जैसे-झाड़ तथा ब्रुश से, पानी से धोना, कपड़े से झाड़कर पोंछना, बिजली की मशीन (वैक्यूम क्लीनर) से।

प्रश्न 3.
दैनिक सफाई और मासिक सफाई में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
दैनिक सफाई-प्रतिदिन की जाने वाली सफाई को दैनिक सफाई कहते हैं। रोजाना सफाई में प्रत्येक कमरे में झाड़-पोचा लगाया जाता है।
मासिक सफाई- यह सफाई महीने बाद तथा महीने में एक बार की जाती है। जैसेरसोई तथा अल्मारियों की सफाई आदि।

प्रश्न 4.
वैक्यूम क्लीनर कैसा उपकरण है ?
उत्तर-
यह एक बिजली से चलने वाली मशीन है। जब इसको बिजली से जोड़कर सफाई करने वाले स्थान पर चलाया जाता है तो सारी मिट्टी आदि इसके अन्दर खींची जाती है तथा एक थैली में इकट्ठी हो जाती है। यह मशीन प्रयोग करने से धूल नहीं उड़ती तथा सफाई भी अच्छी तरह से हो जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 5.
घर की सफाई क्यों ज़रूरी होती है ?
उत्तर-

  1. सफाई करने से घर साफ तथा सुन्दर लगता है जो कि गृहिणी की सुघड़ता का सूचक होता है।
  2. गन्दे घर की हवा दूषित होती है जिसमें सांस लेने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सफाई करने से घर की हवा भी साफ हो जाती है।
  3. अधिक समय गन्दा रखने से घर का सामान जल्दी खराब हो जाता है। गन्दी जगह पर बैठने को किसी का मन नहीं करता।
  4. गन्दे घर में कई प्रकार के कीटाणु, मक्खी, मच्छर आदि पैदा होते हैं जो कई तरह की बीमारियां फैलाते हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

प्रश्न 6.
घर की सफाई करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
घर की सफाई के समय ध्यान में रखने योग्य महत्त्वपूर्ण बातें

  1. घर के सभी सदस्यों को घर की सफाई के प्रति दिलचस्पी होनी चाहिए। क्योंकि सदस्यों को घर की सफाई के दौरान सभी सदस्यों का सहयोग अनिवार्य होता है।
  2. सफाई करने से पहले योजना बना लेनी चाहिए क्योंकि बिना योजना से की जाने वाली सफाई में अधिक समय खराब होता है।
  3. सफाई करते समय ज़रूरत का सारा सामान एक जगह पर इकट्ठा कर लेना चाहिए।
  4. सफाई के साधनों का प्रयोग करने के पश्चात् उन्हें फिर से साफ करके रख लेना चाहिए ताकि वह दोबारा प्रयोग में लाए जा सके जैसे पॉलिश करने के पश्चात् ब्रुश मिट्टी के तेल से साफ करके सम्भाल लेना चाहिए ताकि वह दोबारा प्रयोग किया जा सके।
  5. सफाई करते समय ठीक प्रकार की सामग्री का प्रयोग करना चाहिए। इससे सफाई भी ठीक ढंग से होती है तथा समय तथा शक्ति की भी बचत होती है।
  6. सफाई सही ढंग तथा ध्यान से करनी चाहिए। लापरवाही से की गई सफाई घर को साफ बनाने के स्थान पर और भी बदसूरत बना देती है।

प्रश्न 7.
घर की सफाई करने के लिए कौन-कौन सा सामान चाहिए ?
उत्तर-
घर की सफाई के लिए सामान का विवरण इस प्रकार है –

  1. पोचा तथा पुराने कपड़े-दरवाजे, खिड़कियां झाड़ने के लिए चारों तरफ से उलेडा हुआ मोटा कपड़ा चाहिए। फर्श की सफाई के लिए खद्दर, टाट, खेस के टुकड़े को पोचे के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। पॉलिश करने तथा चीज़ों को चमकाने के लिए फ्लालेन आदि जैसे कपड़े की ज़रूरत है। शीशे की सफाई के लिए पुराने सिल्क के कपड़े का प्रयोग किया जा सकता है।
  2. झाड़ तथा ब्रश-विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग ब्रश मिल जाते हैं। कालीन तथा दरी साफ करने के लिए सख्त ब्रुश, बोतलें साफ करने के लिए लम्बा तथा नर्म ब्रुश, रसोई की हौदी साफ करने के लिए छोटा पर साफ ब्रुश, फर्श साफ करने के लिए तीलियों का ब्रुश आदि । इसी तरह सूखा कूड़ा इकट्ठा करने के लिए नर्म झाड़ तथा फर्शों की धुलाई के लिए बांसों वाला झाड़ आदि मिल जाते हैं।
  3. सफाई के लिए बर्तन-रसोई में सब्जियों आदि के छिलके डालने के लिए ढक्कन वाला डस्टबिन तथा अन्य कमरों में प्लास्टिक के डिब्बे अथवा टोकरियां रखनी चाहिएं। इन्हें रोज़ खाली करके दोबारा इनके स्थान पर रख देना चाहिए।
  4. सफाई के लिए साबुन आदि-सफाई करने के लिए साबुन, विम सोडा, नमक, सर्फ, पैराफिन आदि की ज़रूरत होती है। दाग-धब्बे दूर करने के लिए नींबू, सिरका, हाइड्रोक्लोरिक तेज़ाब आदि की ज़रूरत होती है। कीटाणु समाप्त करने के लिए फिनाइल तथा डी० डी० टी० आदि की ज़रूरत होती है।
  5. सफाई करने वाले उपकरण-वैक्यूम क्लीनर एक ऐसा उपकरण है जिससे फर्श, सोफे, गद्दियां आदि से धूल तथा मिट्टी साफ की जा सकती है। यह बिजली से चलता है।

प्रश्न 8.
सफाई करने के कौन-कौन से ढंग हैं ?
उत्तर-
सफाई विभिन्न ढंगों से की जा सकती है जैसे-झाड़ तथा ब्रुश -से, पानी से धोकर, कपड़े से झाड़ कर पोंछना, बिजली की मशीन से।
सीमेंट, चिप्स, पत्थर आदि वाले फर्श की सफाई झाड से की जाती है जबकि घास तथा कालीन के लिए तीलियों वाला झाड़ का प्रयोग किया जाता है।
बाथरूम तथा रसोई को रोज़ धोकर साफ किया जाता है।
घर के साजो-सामान पर पड़ी धूल-मिट्टी को कपड़े से झाड़-पोंछ कर साफ किया जाता
है।

प्रश्न 9.
सफाई करने के लिए क्या बिजली की कोई मशीन है ? यदि हां, तो कौन-सी और कैसे प्रयोग में लाई जाती है ?
उत्तर-
बिजली से चलने वाली सफाई मशीन वैक्यूम क्लीनर है। इससे फर्श, पर्दे, दीवारें, सोफा, दरियां, फर्नीचर, कालीन आदि साफ किये जा सकते हैं।
यह एक ऊंचे हैण्डल वाली मोटर है। इसमें एक थैली लगी होती है। जब इसको चलाया जाता है तो सारी मिट्टी इसमें चली जाती है। यह मिट्टी थैली में इकट्ठी हो जाती है। सफाई कर लेने के पश्चात् थैली को उतार कर झाड़ लिया जाता है। इस मशीन के प्रयोग से मिट्टी नहीं उड़ती तथा सफाई भी अच्छी होती है।

प्रश्न 10.
सफाई करने के लिए कौन-कौन से झाड़ और ब्रुश की ज़रूरत पड़ती
उत्तर-

1. ब्रुश-सफाई के लिए कई तरह के ब्रुशों का प्रयोग किया जाता है। ब्रुश खरीदने के लिए एक विशेष बात का ध्यान रखें कि उसे किस चीज़ की सफाई के लिए प्रयोग करना है। कालीन तथा दरी साफ करने के लिए सख्त ब्रुश, रसोई की हौदी साफ करने के लिए छोटा परन्तु सख्त ब्रुश, दीवारें साफ करने के लिए नर्म ब्रुश, फर्श को साफ करने के लिए तीलियों का ब्रुश, बोतलें साफ करने के लिए लम्बा तथा नर्म ब्रुश, छोटी वस्तुएं साफ करने के लिए दांतों वाले ब्रुश, फर्श से काई उतारने के लिए तारों वाले सख्त ब्रुश की ज़रूरत होती है। फर्नीचर की पॉलिश करने के लिए नर्म ब्रुश का प्रयोग किया जाता है। दीवारों पर सफेदी करने के लिए मूंजी की कूची तथा दरवाजे, खिड़कियां तथा अल्मारियों को पेंट अथवा पॉलिश करने के लिए 1½ इंच वाले तथा दीवारों पर पेंट अथवा डिस्टैंपर करने के लिए तीन-चार इंच वाले ब्रुशों की ज़रूरत पड़ती है। बाथरूम में फ्लशों को साफ करने के लिए विशेष प्रकार के गोल, नर्म ब्रुश प्रयोग किये जाते हैं। दीवारों से जाले उतारने के लिए भी लम्बी डण्डी वाले ब्रुश होते हैं।

2. झाड़-घर को तथा घर के और सामान को साफ करने के लिए विभिन्न प्रकार के झाड़ प्रयोग में लाये जाते हैं। सूखा कूड़ा इकट्ठा करने के लिए नर्म जैसे झाड़ तथा फर्शों की धुलाई के लिए अथवा घास पर फेरने के लिए तीलियों वाले मोटे बांस के झाड़ की ज़रूरत होती है। सफाई करने के लिए कई बार खजूर तथा नारियल के पत्तों के झाड़ भी प्रयोग किये जाते हैं। आजकल बाज़ार में लम्बे डंडे वाले झाड़ नुमा ब्रुश भी मिल जाते हैं जिनसे खड़ेखड़े फर्शों की सफाई की जाती है।

प्रश्न 11.
घर में सफाई की व्यवस्था कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
घर में सफाई की व्यवस्था को पांच भागों में बांटा जा सकता है :

  1. दैनिक सफाई
  2. साप्ताहिक सफाई
  3. मासिक सफाई
  4. वार्षिक सफाई
  5. विशेष अवसर पर सफाई।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

प्रश्न 12.
दैनिक सफाई से आप क्या समझते हो ? इसके क्या लाभ हैं? .
उत्तर-
दैनिक सफाई दैनिक सफाई में वे कार्य शामिल किये जाते हैं जो प्रतिदिन किये जाते हैं। इसके कई लाभ हैं। दैनिक सफाई करने से कोई भी सामान अधिक गन्दा नहीं होता। यदि बहुत गन्दे सामान को साफ करना हो तो समय, शक्ति तथा धन भी अधिक खर्च होता है। परन्तु प्रतिदिन करने से बिल्कुल अनुभव नहीं होता। दैनिक सफाई सुबह ही करनी चाहिए। क्योंकि रात को सारा गरदा, मिट्टी चीजों पर जम जाती है। इसलिए साफ करना कठिन होता है। दैनिक सफाई के लिए बहुत योजनाबन्दी की ज़रूरत नहीं पड़ती क्योंकि यह सभी कार्य करने की आदत ही बन चुकी होती है। यह सारे कार्य या तो गृहिणी स्वयं करती है अथवा फिर परिवार के सदस्यों की सहायता ली जाती है तथा कई बार नौकरों से करवाए जाते हैं।

दैनिक सफाई के लिए सबसे पहले परदे पीछे करके कांच की खिड़कियां खोल देनी चाहिएं जिससे ताजा हवा तथा रोशनी घर में आ सके। फिर कमरों की चादरें झाड कर बिछा दें। बिखरे हुए सामान को अपनी-अपनी जगह पर रखें। फिर कमरों में रखे कूडेदानों को खाली करके सभी कमरों, बरामदे तथा आंगन में झाड़ लगाओ। फिर कपड़ा लेकर मेज़, कुर्सियां, टेबल तथा अन्य कमरों में पड़े सामान की झाड़-पोंछ करनी चाहिए। झाड़-पोचा करते समय कपड़ा ज़ोर से पटक कर न मारें, इस तरह करने से धूल एक स्थान से उड़कर दूसरी जगह पड़ जाती है तथा चीजें टूटने का भी डर रहता है। इसके पश्चात् कोई मोटा कपड़ा जैसे पुराना तौलिया आदि लेकर, बाल्टी में पानी लेकर, कपड़ा गीला करके सभी कमरों में पोचा लगाना चाहिए। भिन्न-भिन्न सामान को ठीक करके टिकाने पर रखा जाता है। इस तरह पूरा घर साफ-सुथरा हो जाता है। यदि घर में कहीं कच्ची जगह है तो पहले वहां हल्का सा पानी का छिड़काव कर लेना चाहिए ताकि झाड़ लगाने पर अधिक मिट्टी न उड़े।

प्रश्न 13.
दैनिक तथा साप्ताहिक सफाई में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
दैनिक सफाई-दैनिक सफाई में वह कार्य शामिल हैं जो रोज़ किये जाते हैं।
साप्ताहिक सफाई-यह सफाई सप्ताह के बाद तथा सप्ताह में एक बार की जाती है।
साप्ताहिक सफाई के अन्तर्गत किये जाने वाले कार्य समय सीमित होने के कारण गृहिणी के लिए यह सम्भव नहीं कि वह घर की प्रत्येक चीज़ को रोज़ साफ करे। वैसे ही कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनकी रोज़ाना सफाई की ज़रूरत नहीं होती। इसलिए ऐसे सारे कार्य जैसे चादरों, गिलाफों अथवा सोफे के कपड़ों को रोजाना बदलने की ज़रूरत नहीं होती। इसलिए ऐसे कार्य जैसे कालीन की सफाई, गिलाफ, फ्रिज की सफाई, रसोई की शैल्फ तथा गैस स्टोव की सफाई, रसोई घर के डिब्बों की सफाई, बाथरूम की बाल्टियां, मग तथा साबुनदानी आदि की सफाई साप्ताहिक सफाई में ही आते हैं।

इसके अतिरिक्त यदि गृहिणी के पास समय हो तो कपड़ों वाली अल्मारियों को साफ किया जा सकता है जिससे ज़रूरत पड़ने पर सामान आसानी से ढूंढा जा सकता है। साप्ताहिक सफाई में घर के सभी कमरों, बरामदों आदि से जाले उतारने बहुत ज़रूरी हैं। गृहिणी को यह योजना बनाकर (जबानी अथवा लिखित) रखनी चाहिए कि इस सप्ताह के कार्य कौन-से हैं।

प्रश्न 14.
वार्षिक सफाई और विशेष अवसर पर सफाई कैसे की जाती है ?
उत्तर-

  1. वार्षिक सफाई वार्षिक सफाई, रोज़ाना, साप्ताहिक तथा मासिक सफाई से अधिक विस्तृत होती है। यह कम-से-कम छ:-सात दिन का कार्य होता है। इस कार्य में समय, शक्ति तथा धन भी अधिक खर्च होता है। इसलिए इस कार्य के लिए गृहिणी को पूरी योजनाबन्दी करनी चाहिए। परिवार के अलग-अलग नौकरों तथा सदस्यों को भी कार्य बांटे जाते हैं। घर का सारा सामान एक तरफ करके विस्तृत रूप में सफाई की जाती है ताकि घर से धूल-मिट्टी तथा कीड़े-मकौड़े समाप्त हो सकें। इस सफाई के दौरान घर के टूटे-फूटे सामान की मुरम्मत, पॉलिश तथा अनावश्यक सामान को भी निकाला जाता है। कीड़े-मकौड़े समाप्त करने के लिए घर में सफेदी भी कराई जानी चाहिए। पेटियों तथा अल्मारियों आदि के सामान को धूप लगवानी चाहिए
  2.  विशेष अवसरों तथा त्योहारों के लिए सफाई-हमारे देश में त्योहारों तथा विशेष अवसरों पर घर की सफाई की जाती है। जैसे दीवाली पर घर में सफेदी करवाई जाती है तथा साथ ही घर की सफाई भी की जाती है। यदि परिवार में किसी बच्चे का विवाह हो तो वार्षिक सफाई वाली सभी क्रियाएं की जाती हैं। पर कई अवसर ऐसे होते हैं जब घर का कुछ हिस्सा ही साफ करके सजाया जाता है। जैसे कि जन्म दिन को मनाने के समय अथवा किसी परिवार को खाने पर बुलाने के मौके पर केवल ड्राईंग रूम की ही खास सफाई की जाती है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 15.
घर की सफाई गृहिणी की सुघड़ता का सूचक है। कैसे ?
उत्तर-
एक साफ-सुथरा तथा सजा हुआ घर गृहिणी की सूझ-बूझ तथा कुशलता का प्रत्यक्ष रूप है। इसलिए सफाई निम्नलिखित बातों के कारण भी महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. सफाई न करने से घर की हवा दूषित हो जाती है जिसमें सांस लेने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  2. गन्दे स्थान पर मक्खियां-मच्छर तथा अन्य कई रोग पैदा करने वाले कीटाणु भी अधिक बढ़ते हैं जो बीमारियों की,जड़ हैं।
  3. गन्दे घर में बैठकर काम करने को दिल नहीं करता। यहां तक कि आस-पड़ोस के लोग भी गन्दगी देखकर घर आना पसन्द नहीं करते।
  4. सफाई करने से घर सजा हुआ दिखाई देता है। यदि सफाई न की जाये तो घर की प्रत्येक वस्तु पर मिट्टी, धूल तथा कूड़ा-कर्कट इकट्ठा हो जाता है जिससे घर गन्दा होने के साथ-साथ घर का सामान भी खराब होना आरम्भ हो जाता है।
  5. साफ-सुथरे सजे हुए घर से गृहिणी की समझदारी का पता चलता है। घर के अन्य कार्यों में से घर की सफाई एक महत्त्वपूर्ण कार्य है।

प्रश्न 16.
घर की सफाई कैसे की जाती है और इसके लिए क्या सामान आवश्यक है ?
उत्तर-
सफाई विभिन्न ढंगों से की जा सकती है जैसे-झाड़ तथा ब्रुश से, पानी से धोकर, कपड़े से झाड़कर पोंछना, बिजली की मशीन से।
सीमेंट, चिप्स तथा पत्थर आदि वाली फर्श की सफाई फूल झाड़ से की जाती है जबकि घास तथा कालीन के लिए तीलियों वाला झाड़ प्रयोग किया जाता है।
गुसलखाना तथा रसोई आदि को रोज़ धोकर साफ किया जाता है। घर के साजो-सामान पर पड़ी धूल-मिट्टी को कपड़े से झाड़-पोंछ कर साफ किया जाता है।
घर की सफाई के लिए सामान का विवरण इस प्रकार है –

  1. पोचा तथा पुराने कपड़े-दरवाजे, खिड़कियां झाड़ने के लिए चारों तरफ से उलेड़ा हुआ मोटा कपड़ा चाहिए। फर्श की सफाई के लिए खद्दर, टाट, खेस के टुकड़े पोचे के तौर पर प्रयोग किए जाते हैं। पॉलिश करने तथा चीज़ों को चमकाने के लिए फलालेन आदि जैसे कपड़े की ज़रूरत है। कांच की सफाई के लिए पुराने सिल्क के कपड़े का प्रयोग किया जा सकता है।
  2. झाड़ तथा बुश-विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग ब्रुश मिल जाते हैं। कालीन तथा दरी साफ करने के लिए सख्त ब्रुश, बोतलें साफ करने के लिए लम्बा तथा नर्म ब्रुश, रसोई की हौदी साफ करने के लिए छोटा पर साफ ब्रुश, फर्श साफ करने के लिए तीलियों का ब्रुश आदि। इसी तरह सूखा कूड़ा इकट्ठा करने के लिए नर्म झाड़ तथा फर्शों की धुलाई के लिए बांसों वाला झाड़ आदि मिल जाते हैं।
  3. सफाई के लिए बर्तन-रसोई में सब्जियों आदि के छिलके डालने के लिए ढक्कन वाला डस्टबिन तथा अन्य कमरों में प्लास्टिक के डिब्बे अथवा टोकरियां रखनी चाहिएं। इन्हें रोज़ खाली करके दोबारा इनके स्थान पर रख देना चाहिए।
  4. सफाई के लिए साबुन आदि-सफाई करने के लिए साबुन, विम सोडा, नमक, सर्फ, पैराफिन आदि की ज़रूरत होती है। दाग-धब्बे दूर करने के लिए नींबू, सिरका, हाइड्रोक्लोरिक तेज़ाब आदि की ज़रूरत होती है। कीटाणु समाप्त करने के लिए फिनाइल तथा डी० डी० टी० आदि की ज़रूरत होती है।
  5. सफाई करने वाले उपकरण-वैक्यूम क्लीनर एक ऐसा उपकरण है जिससे फर्श, सोफे, गद्दियां आदि से धूल तथा मिट्टी झाड़ी जा सकती है। यह बिजली से चलता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

प्रश्न 17.
घर की सफाई की व्यवस्था कैसे और किस आधार पर की जाती है ?
उत्तर-
गृहिणी हर रोज़ सारे घर की सफाई नहीं कर सकती क्योंकि यह थका देने वाला कार्य है। इसलिए इस कार्य को करने के लिए सूझ-बूझ से योजना बनाई जाती है। गृहिणी अपनी सुविधा के अनुसार सफाई कर सकती है। घर की सफाई की व्यवस्था को पांच भागों में बांटा जा सकता है –

  1. रोज़ाना सफाई
  2. साप्ताहिक सफाई
  3. मासिक सफाई
  4. वार्षिक सफाई
  5. विशेष अवसरों पर सफाई।

1. रोज़ाना अथवा दैनिक सफाई-रोज़ाना सफाई से हमारा अभिप्राय उस सफाई से है जो घर में रोज़ की जाती है। इसलिए गृहिणी का यह मुख्य कर्त्तव्य है कि वह घर के उठने-‘ बैठने, पढ़ने-लिखने, सोने के कमरे, रसोई घर, आंगन, बाथरूम, बरामदा तथा लैटरिन की हर रोज़ सफाई करें। रोजाना सफाई में साधारणतः इधर-उधर बिखरी चीज़ों को ठीक तरह लगाना, फर्नीचर को झाड़ना-पोंछना, फर्श पर झाड़ लगाना, गीला पोचा लगाना आदि आते हैं।

2. साप्ताहिक सफाई-एक अच्छी गृहिणी को घर के रोज़ाना जीवन में अनेक कार्य करने पड़ते हैं। इसलिए यह सम्भव नहीं कि वह एक ही दिन में घर की पूरी सफाई कर सके। समय की कमी के कारण घर में जो चीजें हर रोज़ साफ नहीं की जातीं उन्हें सप्ताह में अथवा पन्द्रह दिनों में एक बार अवश्य साफ कर लेना चाहिए। अगर ऐसा न किया गया तो दरवाजों तथा दीवारों की छतों पर जाले इकट्ठे हो जायेंगे। दरवाज़ों तथा खिड़कियों के शीशों, फर्नीचर की सफाई, बिस्तर झाड़ना तथा धूप लगवाना, अल्मारियों की सफाई तथा दरी, कालीन को झाड़ना तथा धूप लगवाना आदि कार्य सप्ताह में एक बार अवश्य किये जाने चाहिएं।

3. मासिक सफाई-जिन कमरों अथवा वस्तुओं की सफाई सप्ताह में एक बार न हो सके, उन्हें महीने में एक बार जरूर साफ करना चाहिए। साधारणत: सारे महीने की खाद्यसामग्री एक बार ही खरीदी जाती है। इसलिए भण्डार गृह में रखने से पहले भण्डार घर को अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर ही उसमें खाद्य सामग्री रखी जानी चाहिए। मासिक सफाई के अन्तर्गत अनाज, दालों, अचार, मुरब्बे तथा मसाले आदि को धूप लगवानी चाहिए। अल्मारी के जाले, बल्बों के शेड आदि भी साफ करने चाहिएं।

4. वार्षिक सफाई-वार्षिक सफाई का अभिप्राय वर्ष में एक बार सारे घर की पूरी तरह सफाई करना है। वार्षिक सफाई के अन्तर्गत घर में सफेदी करना, टूटे स्थानों की मरम्मत, दरवाजों, खिड़कियों तथा दहलीज़ों की मरम्मत तथा सफाई तथा रंग-रोगन करवाना, फर्नीचर तथा अन्य सामान की मरम्मत, वार्निश, पॉलिश आदि आती है। कमरों में से सारे सामान को हटाकर चूना, पेंट अथवा डिस्टैंपर करवाना सफाई के पश्चात् फर्श को रगड़ कर धोना तथा दागधब्बे हटाना, सफाई के पश्चात् सारे सामान को दोबारा व्यवस्थित करना वार्षिक कार्य है। इस प्रकार की सफाई से कमरों को नवीन रूप प्रदान होता है। रज़ाई, गद्दों को खोलकर रुई साफ करवाना, धुनाई आदि भी वर्ष में एक बार किया जाता है।

हमारे देश में जब वर्षा ऋतु समाप्त हो जाती है, दशहरे अथवा दीवाली के समय वार्षिक सफाई की जाती है, लीपने-पोचने तथा पॉलिश करवाने से सुन्दरता तो बढ़ती ही है, रोग फैलाने वाले कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं । इसलिए स्वास्थ्य के पक्ष में भी एक बार घर की पूरी सफाई आवश्यक है।

5. विशेष अवसरों तथा त्योहारों के लिए सफाई -हमारे देश में त्योहारों तथा विशेष अवसरों पर घर की सफाई की जाती है। जैसे दीवाली पर घर में सफेदी करवाई जाती है तथा साथ ही घर की सफाई भी की जाती है। यदि परिवार में किसी बच्चे को विवाह हो तो भी वार्षिक सफाई वाली सभी क्रियाएं की जाती हैं। पर कई अवसर ऐसे होते हैं जब घर का कुछ भाग ही साफ करके सजाया जाता है जैसे कि जन्म दिन को मनाने के समय अथवा किसी परिवार को खाने पर बुलाने के अवसर पर केवल ड्राईंग-रूम की ही खास सफाई की जाती है।

Home Science Guide for Class 9 PSEB घरेलू सफ़ाई Important Questions and Answers

रिक्त स्थान भरें

  1. रसोई तथा अल्मारियों की सफ़ाई ………… ….. सफ़ाई है।
  2. घर के सभी सदस्यों की …………………. के प्रति रुचि होनी चाहिए।
  3. सूखा कूड़ा एकत्र करने के लिए …………………. झाड़ का प्रयोग करें।
  4. पॉलिश करने के लिए तथा चीज़ों को चमकाने के लिए …………………. कपड़े का प्रयोग करें।

उत्तर-

  1. मासिक
  2. सफ़ाई
  3. नर्म
  4. फलालेन या लिनन।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
शीशे को चमकाने के लिए कैसे कपड़े का प्रयोग ठीक रहता है ?
उत्तर-
सिल्क।

प्रश्न 2.
चांदी की सफाई के लिए पॉलिश का नाम बताएं।
उत्तर-
सिल्वो।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

प्रश्न 3.
सबसे पहले किस कमरे की सफाई करनी चाहिए ?
उत्तर-
खाना बनाने वाले कमरे की।

प्रश्न 4.
फ्रिज़ को कब साफ़ करना चाहिए ?
उत्तर-
सप्ताह में एक बार।

ठीक/ग़लत बताएं

  1. घर की सफ़ाई के प्रति घर के सभी सदस्यों की रुचि होनी चाहिए।
  2. मासिक सफ़ाई महीने बाद की जाती है।
  3. स्नानागृह को महीने बाद धोना चाहिए न कि प्रतिदिन।
  4. बिजली से चलने वाली सफ़ाई वाली मशीन है माइक्रोवेव।
  5. धूल के कण, गंदगी का प्राकृतिक कारण है।
  6. पेंट वाली लकड़ी को प्रतिदिन झाड़न वाले कपड़े से पोंछे।

उत्तर-

  1. ठीक
  2. ठीक
  3. ग़लत
  4. ग़लत
  5. ठीक
  6. ठीक।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव विकार है –
(A) कफ़
(B) थूक
(C) पसीना
(D) सभी।
उत्तर-(D) सभी।

प्रश्न 2.
ठीक तथ्य हैं –
(A) गंदे घर में बैठ कर कार्य करने का मन नहीं करता
(B) साफ़ सुन्दर सजे हुए घर से गृहिणी की सूझबूझ का पता चलता है
(C) सप्ताह वाली सफ़ाई सप्ताह में एक बार की जाती है
(D) सभी ठीक।
उत्तर-(D) सभी ठीक।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

प्रश्न 3.
सफ़ाई के लिए प्रयोग वाला सामान है –
(A) झाड़
(B) बिजली की मशीन
(C) ब्रश
(D) सभी ठीक।
उत्तर-(D) सभी ठीक।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दैनिक सफ़ाई में क्या-क्या कार्य करने आवश्यक होते हैं ?
उत्तर-
दैनिक सफ़ाई में निम्नलिखित कार्य आवश्यक रूप से करने होते हैं –

  1. घर के सारे कमरों के फ़र्श, खिड़कियां, दरवाजे, मेज़ तथा कुर्सी की झाड़-पोंछ करना।
  2. घर में रखे कडेदान आदि की सफाई करना।
  3. शौचालय तथा स्नानघर आदि की सफाई करना।
  4. रसोई में काम आने वाले बर्तनों की सफ़ाई तथा रख-रखाव।

प्रश्न 2.
घर में गन्दगी होने के मुख्य कारण क्या हैं ?
उत्तर-

  1. प्राकृतिक कारण-धूल के कण, वर्षा और बाढ़ के पानी के बहाव के कारण आने वाली गन्दगी, मकड़ी के जाले, पक्षियों और अन्य जीवों द्वारा फैलाई गन्दगी।
  2. मानव विकार-मल-मूत्र, कफ, थूक, खांसी, पसीना तथा बालों का झड़ना।
  3. घरेलू कार्य-खाद्य पदार्थों की सफ़ाई से निकलने वाली गन्दगी, साग-सब्जी, फ़ल आदि के छिलके, खाने वाली वस्तुएं, बर्तन आदि का धोना, कपड़ों की धुलाई, साबुन की झाग, मैल, नील, स्टार्च, रद्दी कागज़ के टुकड़े, सिलाई से निकलने वाले कपड़ों के टुकड़े, कताई की रूई तथा उसका झाड़न आदि।

प्रश्न 3.
दैनिक सफ़ाई क्यों आवश्यक है ? तथा घर की सफ़ाई कैसे करनी चाहिए ?
उत्तर-
दैनिक सफ़ाई से हमारा अभिप्राय उस सफ़ाई से है जो घर में रोजाना की जाती है। इसलिए गृहिणी का कर्तव्य है कि वह घर के उठने-बैठने, पढ़ने-लिखने, सोने के कमरे, रसोई, आंगन, बाथरूम, बरामदा तथा शौचालय की प्रतिदिन सफ़ाई करे। दैनिक सफ़ाई के अन्तर्गत साधारणतः इधर-उधर बिखरी हुई वस्तुओं को ठीक तरह टिकाना, फर्नीचर को झाड़ना-पोंछना, फ़र्श पर झाड़ करना, गीला पोछा करना आदि आते हैं।

प्रश्न 4.
शौचालय, बाथरूम में फिनाइल क्यों छिड़कायी जाती है.?
उत्तर-
शौचालय, बाथरूम को रोजाना फिनाइल से धोना चाहिए तथा इन्हें खुली हवा लगनी चाहिए। नहीं तो यह मक्खी, मच्छर के घर बन जाएंगे। जिससे कई प्रकार की बीमारियां हो सकती हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 4 घरेलू सफ़ाई

प्रश्न 5.
घर में फर्नीचर की पॉलिश कैसे तैयार की जाती है ?
उत्तर-
फर्नीचर की पॉलिश तैयार करने के लिए अलसी का तेल दो हिस्से, तारपीन का तेल-एक हिस्सा, सिरका एक हिस्सा, मैथिलेटिड स्पिरिट-एक हिस्सा लेकर मिला लो। इस तरह पॉलिश तैयार हो जाती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फर्नीचर की देखभाल कैसे की जाती है ?
उत्तर-
लकड़ी के फर्नीचर को नर्म साफ़ कपड़े से साफ़ किया जाता है क्योंकि कठोर ब्रुश का प्रयोग करने से लकड़ी पर खरोंचें पड़ सकती हैं। लकड़ी को गीला नहीं करना चाहिए। फर्नीचर की लकड़ी को पेंट अथवा पॉलिश की जाती है। पेंट तथा पॉलिश को विभिन्न विधियों से अलग किया जाता है।

पॉलिश की लकड़ी की सम्भाल-इसको प्रतिदिन नर्म कपड़े से साफ़ करना चाहिए। अधिक गन्दी होने की सूरत में साबुन वाले पानी से धोकर फ्लालेन के कपड़े से पोंछ लेना चाहिए। कम गन्दी लकड़ी को साफ़ करने के लिए आधे लीटर गुनगुने पानी में दो बड़े चम्मच सिरके के मिलाकर घोल तैयार किया जाता है। इस घोल में गीला करके फ्लालेन के कपड़े से फर्नीचर को साफ़ करो। यदि फर्नीचर की लकड़ी की पॉलिश काफ़ी खराब हो गई हो अथवा चमक घट जाए तो मैन्शन पॉलिश अथवा क्रीम का प्रयोग करके सफ़ाई की जाती है। सनमाइका लगे फर्नीचर को साफ़ करना आसान होता है। इसको गीले कपड़े से पोंछा जा सकता है तथा दाग उतारने के लिए साबुन का प्रयोग किया जा सकता है।

पेंट की हई लकडी-पेंट वाली लकडी प्रतिदिन झाडने वाले कपड़े से पोंछो। यदि ज़रूरत हो तो कुछ दिनों के पश्चात् साबुन वाले गुनगुने पानी तथा फ्लालेन के कपड़े से इसे साफ़ करो। कोनों को अच्छी तरह साफ़ किया जाता है। अधिक गन्दे हिस्सों को साफ़ करने के लिए साफ़ ब्रुश प्रयोग करो। पेंट से चिकनाहट के दाग उतारने के लिए पानी में थोड़ी पैराफिन मिला ली जाती है परन्तु पैराफिन का अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाए तो पेंट खराब हो जाता है।

कपड़ा चढ़ा हुआ फर्नीचर-इसको रोज़ सूखे कपड़े से झाड़ना चाहिए। कभी-कभी गर्म कपड़े साफ़ करने वाले ब्रुश से साफ़ करो। रैक्सिन अथवा चमड़े वाले फर्नीचर को रोज़ गीले कपड़े से साफ़ करो। चिकनाहट के दाग उतारने के लिए कपड़े को साबुन वाले गुनगुने पानी से भिगो कर रगड़ो। कभी-कभी थोड़ा सा अलसी का तेल कपड़े पर लगाकर चमड़े के फर्नीचर पर रगड़ने से चमड़ा मुलायम रहता है तथा दरारें नहीं पड़तीं।

घरेलू सफ़ाई PSEB 9th Class Home Science Notes

  • गन्दे घर का घर के सदस्यों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा कई प्रकार की बीमारियां फैल सकती हैं।
  • गन्दे घर में कई तरह के कीटाणु, मक्खी-मच्छर आदि पैदा होते हैं तथा बीमारियां फैलाते हैं।
  • सफाई सही ढंग से करनी चाहिए। लापरवाही तथा बिना ढंग से सफाई की जाये तो साफ होने के स्थान पर घर और भी बदसूरत हो जायेगा।
  • सफाई के लिए प्रयोग में आने वाला सामान पांच प्रकार का होता है –
    पोचा तथा पुराने कपड़े, झाड़ तथा ब्रुश, बर्तन, सफाई करने वाले यन्त्र, सफाई के लिए साबुन तथा अन्य प्रतिकारक।
  • सफाई करने के कई ढंग हैं –
    झाड़ तथा ब्रुश से, पानी से धोकर, कपड़े से झाड़कर पोंछना, बिजली की मशीन (वैक्यूम क्लीनर) से।
  • लकड़ी के फर्नीचर को नर्म, साफ कपड़े से साफ करना चाहिए।
  • घर की व्यवस्था को पांच भागों में बांटा जा सकता है –
    रोज़ाना सफाई, साप्ताहिक सफाई, मासिक सफाई, वार्षिक सफाई, विशेष अवसर पर सफाई।