PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 9 महासागर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 9 महासागर

PSEB 11th Class Geography Guide महासागर Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में दीजिए-

प्रश्न (i)
जलमंडल धरती की सतह का कितने प्रतिशत भाग घेरता है ?
उत्तर-
71%.

प्रश्न (ii)
धरती को नीला ग्रह क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
धरती पर जल के अधिक होने के कारण।

प्रश्न (iii)
समुद्रों की गहराई को कैसे मापा जाता है ?
उत्तर-
सॉनिक डैप्थ रिकार्डर द्वारा।

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प्रश्न (iv)
प्लैक्टन किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जीव-जंतुओं के गले सड़े अंश।

प्रश्न (v)
हिंद महासागर की एक गहरी खाई (Trench) का नाम लिखें।
उत्तर-
सुंडा खाई। (Sunda Trench)।

प्रश्न (vi)
विश्व के सबसे बड़े महासागर का नाम क्या है ?
उत्तर-
प्रशांत महासागर।

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प्रश्न (vii)
ऐगुल्लास धारा (Agulhas Current) कौन-से महासागर की धारा है ?
(क) हिंद महासागर
(ख) अंध महासागर
(ग) आर्कटिक महासागर
(घ) शांत महासागर।
उत्तर-
(क) हिंद महासागर।

प्रश्न (vii)
प्रशांत महासागर की सबसे गहरी खाई (Deepest Trench) का नाम क्या है ?
उत्तर-
मेरिआना।

प्रश्न (ix)
हिंद महासागर की औसत गहराई कितनी है ?
उत्तर-
3960 मीटर।

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प्रश्न (x)
प्रशांत महासागर के किनारे किन पाँच महाद्वीपों को छूते हैं ?
उत्तर-

  1. उत्तरी अमेरिका
  2. दक्षिणी अमेरिका
  3. एशिया
  4. आस्ट्रेलिया
  5. अंटार्कटिका।

प्रश्न (xi)
सुनामी लहरें क्या होती हैं ?
उत्तर-
महासागर के धरातल पर भूकंप के कारण बहुत ऊंची लहरें उठती हैं, जिन्हें सुनामी. कहते हैं।

प्रश्न (xii)
तापमान अक्षांश और गहराई बढ़ने से कम होता है, क्यों ?
उत्तर-
भूमध्य रेखा पर पूरा वर्ष सूर्य की किरणें लंब रूप में पड़ती हैं और इसलिए वहाँ तापमान अधिक होता है, परंतु ध्रुवीय क्षेत्रों में तापमान कम होता है। गहराई के बढ़ने से तापमान कम हो जाता है। 200 मीटर की गहराई पर तापमान 15.9°C रहता है परंतु 1000 मीटर की गहराई पर केवल 5°C हो जाता है।

प्रश्न (xiii)
भूमध्य रेखा के नज़दीक गर्मी की ऋतु में खुले महासागर का औसत तापमान क्या होता है ?
उत्तर-
26° C.

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प्रश्न (xiv)
क्या गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) गर्म जल की धारा है ?
उत्तर-
हाँ, यह गर्म जल की धारा है।

प्रश्न (xv)
अल्बेडो (Albedo) की परिभाषा दें।
उत्तर-
सूर्य की किरणों के परिवर्तन को अल्बेडो कहते हैं।

प्रश्न (xvi)
खारापन (लवणता) क्या होता है ?
उत्तर-
खारेपन से अभिप्राय समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा है।

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प्रश्न (xvii)
निम्नलिखित अक्षांशों में से सबसे अधिक खारापन कहाँ होगा ?
(क) 10°A – 15°N
(ख) 15°N – 40°N
(ग) 60°S – 70°S.
उत्तर-
(ख) 15°N – 40°N पर सबसे अधिक खारापन होगा।

प्रश्न (xviii)
महासागरों के जल का खारापन नापने की इकाई क्या है ?
(क) 10 ग्राम
(ख) 1000 ग्राम
(ग) 100 ग्राम।
उत्तर-
(ख) 1000 ग्राम।

प्रश्न (xix)
सागरीय लवणता को कौन-से तत्त्व प्रभावित करते हैं ?
उत्तर-
(i) हिंद महासागर संसार का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है, जोकि तीन तरफ से स्थल भागों (अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया) से घिरा हुआ है। इसका विस्तार 20° पूर्व से लेकर 115° पूर्व तक है। इसकी औसत गहराई 4000 मीटर है। यह सागर उत्तर में बंद है और दक्षिण में अंध महासागर और प्रशांत महासागर से मिल जाता है।
(ii) समुद्री पहाड़ियाँ (Ridges)—इस महासागर में कई पहाड़ियाँ मिलती हैं-

(क) मध्यवर्ती पहाड़ी (Mid Indian Ridge) कन्याकुमारी से लेकर अंटार्कटिका महाद्वीप तक 75° पूर्व देशांतर के साथ-साथ स्थित है। इसके समानांतर पूर्वी हिंद पहाड़ी और पश्चिमी हिंद पहाड़ियाँ स्थित हैं। दक्षिण में ऐमस्ट्रडम-सेंट पॉल पठार स्थित है।
(ख) अफ्रीका के पूर्वी सिरे पर स्कोटा छागोश पहाड़ी।
(ग) हिंद महासागर के पश्चिम में मैडगास्कर और प्रिंस ऐडवर्ड पहाड़ियाँ और कार्ल्सबर्ग पहाड़ियाँ स्थित हैं।

(ii) सागरीय बेसिन (Ocean Basin)-कई पहाड़ियों (Ridges) के कारण हिंद महासागर कई छोटे-छोटे बेसिनों में बँट गया है, जैसे-खाड़ी बंगाल, अरब सागर, सोमाली बेसिन, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का बेसिन और दक्षिणी हिंद बेसिन।

(iv) समुद्री निवाण (Ocean Deeps)—इस सागर में समुद्री निवाण बहुत कम हैं। सबसे अधिक गहरा स्थान सुंडा खाई (Sunda Trench) के निकट प्लैनट निवाण है, जोकि 4076 फैदम गहरा है।

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(v) सीमावर्ती सागर (Marginal Sea)-हिंद महासागर में अधिकतर सीमावर्ती सागर उत्तर की ओर हैं, जो इस प्रकार हैं-

(क) लाल सागर (Red Sea)
(ख) खाड़ी सागर (Persian Gulf)
(ग) अरब सागर (Arabian Sea)
(घ) खाड़ी बंगाल (Bay of Bengal)
(ङ) मोज़म्बिक चैनल (Mozambique Strait)
(च) अंडमान सागर (Andaman Sea)।

(vi) द्वीप (Islands)

(क) श्रीलंका और मैलागासी जैसे बड़े द्वीप
(ख) अंडमान-निकोबार, जंजीबार, लक्षद्वीप और मालदीव,
(ग) मारीशस और रीयूनियन जैसे ज्वालामुखी द्वीप।

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प्रश्न (xx)
अंतर स्पष्ट करें-लवणता/तापमान।
उत्तर-
लवणता उस अनुपात को कहते हैं, जो घुले हुए पदार्थों के भार और समुद्री जल के भार में होती है। महासागरीय जल के तापमान पर महासागरों की गतियाँ निर्भर करती हैं। महासागरीय जल के तापमान का प्रमुख स्रोत सूर्य की गर्मी है।

2. निम्नलिखित को परिभाषित करें-

प्रश्न (i)
महाद्वीपीय ढलान।
उत्तर-
महाद्वीपीय शैल्फ से आगे महासागर की ओर तीखी ढलान को महाद्वीपीय ढलान कहते हैं।

प्रश्न (ii)
सपाट पर्वत (Guyots) और सागरीय पर्वत (Sea Mount)।
उत्तर-
सपाट शिखर वाली पहाड़ियों को. सपाट पर्वत कहते हैं। 1000 मीटर से अधिक ऊँची पहाड़ियों को समुद्री पर्वत कहते हैं।

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प्रश्न (iii)
जल चक्र।
उत्तर-
समुद्री जल के वाष्पीकरण द्वारा वायुमंडल और जल पर पानी के चक्र में घूमने को जल चक्र कहा जाता है।

प्रश्न (iv)
गहरे मैदान (Abyssal Plains) और महाद्वीपीय ढलान (Continental Slopes)।
उत्तर-
महाद्वीपीय शैल्फ से आगे महासागर की ओर तीखी ढलान को महाद्वीपीय ढलान कहते हैं। महाद्वीपीय ढलान से आगे समतल मैदान (3000 से 6000 मीटर तक) को गहरा सागरीय मैदान कहते हैं।

प्रश्न (v)
महासागरीय धाराएँ।
उत्तर-
महासागर के एक भाग से दूसरे भाग की ओर एक विशेष दिशा में लगातार प्रवाह को महासागरीय धाराएँ कहते हैं।

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प्रश्न (vi)
सागरीय धाराएँ क्यों पैदा होती हैं ? कोई चार कारण विस्तार से लिखें।
उत्तर-
समुद्र विज्ञान (Oceanography)—महासागरों का अध्ययन प्राचीन काल से ही होता चला आ रहा है। महासागरों की परिक्रमा, ज्वारभाटे की जानकारी आदि ईसा से कई वर्ष पूर्व ही प्राप्त थी। जलवायु, समुद्री मार्गों, जीवविज्ञान आदि पर प्रभाव के कारण समुद्री विज्ञान भौतिक भूगोल में एक विशेष स्थान रखता है।

समुद्र विज्ञान दो शब्दों Ocean + Graphy के मेल से बना है। इस प्रकार इस विज्ञान में महासागरों का वर्णन होता है। एम०ए०मोरमर (M.A. Mormer) के अनुसार, “समुद्र विज्ञान महासागरों की आकृति, स्वरूप, पानी और गतियों का अध्ययन है।” (Oceanography is the study of the Science of Oceans-its form, nature, waters and movements.)। मोंक हाऊस के अनुसार, “समुद्र विज्ञान महासागरों के भौतिक और जैव गुणों का अध्ययन है।” (Oceanography is the study of a wide range of Physical and biological phenomena of oceans.)

I डब्ल्यू० फ्रीमैन (W. Freeman) के अनुसार, “समुद्र विज्ञान भौतिक भूगोल का वह भाग है, जो पानी की गतियों
और मूल शक्तियों का अध्ययन करता है। इस अध्ययन में ज्वारभाटा, धाराओं, तट रेखाओं, समुद्री धरातल और जीवों का अध्ययन शामिल होता है।”

महासागर-विस्तार (Ocean-Extent)-पृथ्वी के तल पर जल में डूबे हुए भाग को जलमंडल (Hydrosphere) कहते हैं। जलमंडल में महासागर, सागर, खाड़ियाँ, झीलें आदि सभी जल-स्रोत आ जाते हैं। सौर-मंडल में पृथ्वी ही एक-मात्र ग्रह है, जिस पर जलमंडल मौजूद है। इसी कारण पृथ्वी पर मानव-जीवन संभव है।

पृथ्वी के लगभग 71% भाग पर जलमंडल का विस्तार है। इसलिए इसे जल-ग्रह (Watery Planet) कहते हैं। अंतरिक्ष से पृथ्वी का रंग नीला दिखाई देता है, इसलिए इसे नीला ग्रह (Blue Planet) भी कहते हैं।

धरातल पर जलमंडल लगभग 3,61,059,000 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं जोकि पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्रफल का 71% भाग है।
उत्तरी गोलार्द्ध का 61% भाग और दक्षिणी गोलार्द्ध का 81% भाग महासागरों द्वारा घिरा हुआ है। उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का विस्तार अधिक है, इसलिए इसे (Water Hemisphere) भी कहते हैं। जल और थल का विभाजन प्रति ध्रुवीय (Antipodal) है। उत्तरी ध्रुव की ओर चारों तरफ आर्कटिक महासागर स्थित है और दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका महाद्वीप द्वारा घिरा हुआ है ।

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जलमंडल का क्षेत्रफल (Area of Hydrosphere) ब्रिटिश भूगोल वैज्ञानिक जॉन मरें (John Murray) ने जलमंडल का क्षेत्रफल 3626 लाख वर्ग किलोमीटर बताया है । महासागरों में प्रमुख प्रशांत महासागर, अंधमहासागर, हिंद महासागर और आर्कटिक महासागर हैं । प्रशांत महासागर सबसे बड़ा महासागर है, जो जलमंडल के 45.1% भाग पर फैला हुआ है ।

Areas of Different Oceans

Ocean — Area (Sq. K.m.)
प्रशांत महासागर — 16,53, 84,000
अंध महासागर — 8,22,17,000
हिंद महासागर — 7,34,81,000
आर्कटिक महासागर –1,40,56,000

महासागरों की औसत गहराई 3791 मीटर है। स्थल मंडल की अधिकतम ऊँचाई एवरेस्ट चोटी (Everest Peak) है, जोकि समुद्र तल से 8848 मीटर ऊँची है। जलमंडल की अधिकतम गहराई 11,033 मीटर, फिलीपीन देश के निकट प्रशांत महासागर की मेरियाना खाई में चैलंजर निवाण (Challeger Deep) में है। इस प्रकार यदि संसार के सबसे ऊँचे शिखर ऐवरेस्ट को प्रशांत महासागर की मेरियाना खाई में डुबो दिया जाए, तो उसके शिखर पर 2000 मीटर से अधिक पानी होगा।

प्रश्न (vii)
अंध महासागर की कोई दो गर्म पानी की धाराओं की व्याख्या करें।
उत्तर-

  • फ्लोरिडा गर्म पानी की धारा-यह धारा दक्षिणी-पूर्वी (यू०एस०ए०) तट से होते हुए चलती है, जोकि फ्लोरिडा की धारा के नाम से जानी जाती है। ..
  • नॉर्वे की गर्म पानी की धारा-अंध महासागर के पूर्वी हिस्से में पहुँचकर (North Atlantic Drift) उत्तरी अटलांटिक धारा दो हिस्सों में बाँटी जाती है, उत्तर की ओर मुड़ा हुआ हिस्सा नॉर्वे के तटों के साथ-साथ होता हुआ आर्कटिक (Arctic) सागर में जा मिलता है, जो नॉर्वे की गर्म पानी की धारा के नाम से जाना जाता है।

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प्रश्न (viii)
न्यूफाउंडलैंड में धुंध होने के कारण क्या हैं ? कारण बताएं।
उत्तर-
न्यूफाउंडलैंड के निकट खाड़ी की गर्म धारा और लैब्रेडोर की ठंडी धाराएँ आपस में मिलती हैं। इनके प्रभाव से धुंध पैदा हो जाती है और जहाज़ों के आने-जाने में रुकावट पैदा होती है।

प्रश्न (ix)
महासागरीय धाराओं और ज्वारभाटा में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-
महासागरों में एक विशेष दिशा में लगातार प्रवाह को महासागरीय धाराएँ कहते हैं। जबकि सागरीय जल के समय के अनुसार उतार-चढ़ाव को ज्वारभाटा कहते हैं।

प्रश्न (x)
गहराई के साथ समुद्री तापमान में बदलाव क्यों आता है ? ताप-परतों के बारे में बताएँ।
उत्तर-
गहराई के साथ-साथ समुद्री जल का तापमान कम होता जाता है। सूर्य की किरणें 100 फैदम तक ही पानी को गर्म करती हैं। पहली परत 500 मीटर तक होती है। दूसरी परत 500-1000 मीटर तक होती है, जिसे थर्मोक्लाईन कहते हैं। इससे अधिक गहराई पर तापमान कम होना शुरू होने लगता है।

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प्रश्न (xi)
सागरीय धाराओं का तापमान पर क्या प्रभाव होता है ?
उत्तर-
धाराओं से ऊपर बहने वाली पवनें अपने साथ गर्मी या सर्दी ले जाती हैं। गर्म धाराओं के प्रभाव से निकट के क्षेत्र में तापमान ऊँचा हो जाता है और जलवायु सम हो जाती है। (Warm currents raises and cold currents lowers the temprature)। ठंडी धाराओं के कारण सर्दी की ऋतु आरंभ हो जाती है।

प्रश्न (xii)
महासागरीय जल के तापमान वितरण के ऊपर प्रभाव डालने वाले तत्त्वों के बारे में विस्तार से लिखें।
उत्तर-
1. विस्तार और आकार (Shape and Size)—यह त्रिभुज (A) आकार का महासागर पृथ्वी के 30% भाग पर फैला हुआ है। इसकी औसत गहराई 5000 मीटर है। उत्तर में यह बेरिंग समुद्र और आर्कटिक महासागर द्वारा बंद है। प्रशांत महासागर भूमध्य रेखा पर लगभग 16000 कि०मी० चौड़ा है।

2. समुद्री पहाड़ियाँ (Ridges)—प्रशांत महासागर में पहाड़ियों (Ridges) की कमी है। इसके कुछ भागों में पठारों के रूप में उठे हुए चबूतरे पाए जाते हैं। प्रमुख उभार इस प्रकार हैं –

  • हवाई उभार, जोकि लगभग तीन हज़ार कि०मी० लंबा है।
  • अल्बेट्रोस पठार, जोकि लगभग 1500 कि०मी० लंबा है।
  • इस सागर में अनेक उभार (Swell), ज्वालामुखी पहाड़ियाँ और प्रवाल भित्तियाँ पाई जाती हैं।

3. सागरीय बेसिन (Ocean Basin)-प्रशांत महासागर में कई प्रकार के बेसिन मिलते हैं, जो छोटी-छोटी पहाड़ियों (Ridges) द्वारा एक-दूसरे से अलग हैं। प्रमुख बेसिन इस प्रकार हैं –

  • ऐलुशीयन बेसिन
  • फिलिपीन बेसिन
  • फिज़ी बेसिन
  • पूर्वी ऑस्ट्रेलिया का बेसिन
  • प्रशांत अंटार्कटिका बेसिन।

4. सागरीय निवाण (Ocean Deeps)—इस महासागर में लगभग 32 निवाण मिलते हैं, जिनमें से अधिक Trenches हैं। इस सागर के निवाण (Deeps) और खाइयाँ (Trenches) अधिकतर इसके पश्चिमी भाग में हैं। इस सागर में सबसे गहरा स्थान मैरियाना खाई (Mariana Trench) है, जिसकी गहराई 11022 मीटर है। इसके अलावा ऐलुशीयन खाई, क्यूराइल खाई, जापान खाई, फिलीपाइन खाई, बोनिन खाई, मिंडानो टोंगा खाई और एटाकामा खाई प्रसिद्ध सागरीय निवाण हैं, जिनकी गहराई 7000 मीटर से भी अधिक है।

5. सीमवर्ती सागर (Marginal Seas)—प्रशांत महासागर में अधिकतर सीमावर्ती सागर पश्चिमी भागों में मिलते हैं। इसके पूर्वी भाग में कैलीफोर्निया की खाड़ी और अलास्का की खाड़ी है। शेष महत्त्वपूर्ण सागर पश्चिमी भाग में हैं(i) बेरिंग सागर (Bering Sea) (ii) पीला सागर (Yellow Sea) (iii) ओखोत्सक सागर (Okhotsk Sea) (iv) जापान सागर (Japan Sea) (v) चीन सागर (China Sea)।

6. द्वीप (Islands)—प्रशांत महासागर में लगभग 20 हज़ार द्वीप पाए जाते हैं। प्रमुख द्वीप ये हैं-

  • ऐलुशियन द्वीप और ब्रिटिश कोलंबिया द्वीप।
  • महाद्वीपीय द्वीप, जैसे-क्यूराईल द्वीप, जापान द्वीप समूह, फिलीपाइन द्वीप, इंडोनेशिया द्वीप और न्यूज़ीलैंड द्वीप।
  • ज्वालामुखी द्वीप जैसे-हवाई द्वीप।
  • प्रवाल द्वीप, जैसे-फिजी द्वीप।

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प्रश्न (xiii)
लहरें (तरंगें) क्या होती हैं ?
उत्तर-
पवनों के प्रभाव से महासागरीय तल का जल ऊँचा-नीचा होता है, जिन्हें लहरें कहते हैं।

प्रश्न (xiv)
सुनामी लरहें (तरंगें) क्या होती हैं और इनके कारण होने वाली तबाही के बारे में एक नोट लिखें।
उत्तर–
महासागर के धरातल पर भूकंप के कारण बहुत ऊँची लहरें उठती हैं, जिन्हें सुनामी कहते हैं। ये लहरें बहुत विनाशकारी होती हैं। इन सुनामी लहरों के कारण सन् 2004 में दक्षिणी भारत में जान और माल का बहुत नुकसान हुआ था।

प्रश्न (xv)
लहरों की लंबाई क्या होती है ? .
उत्तर-
महासागरों में लहरों के कारण जल ऊँचा-नीचा होता रहता है, जिन्हें तरंगें या लहरें कहते हैं। लहरों के ऊपरी भाग को शिखर (Crest) और निचले भाग को गर्त (Trough) कहते हैं। इस शिखर और गर्भ के बीच की लंबाई को लहर की लंबाई कहते हैं।

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प्रश्न (xvi)
लहर की ऊँचाई क्या होती है ?
उत्तर-
लहर के निचले हिस्से गर्त (Trough) से लेकर लहर के शिखर तक की ऊँचाई को लहर की ऊँचाई कहते हैं।

प्रश्न (xvi)
लहरों और पवनों का आपसी संबंध बताएँ। लहरों की गति देखने के लिए किस फॉर्मूले का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
महासागरों का जल हवा की दिशा के साथ लहरों के रूप में गतिशील होता है। जल के ऊपर उठने और नीचे आने की क्रिया को लहर कहते हैं। लहरों को मापने के लिए नीचे लिखे फार्मूले का प्रयोग किया जाता है।
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प्रश्न (xvii)
Surge की परिभाषा लिखें।
उत्तर-
जब कोई लहर समुद्र-तट की ओर आती है, तो उसे Swash या Surge कहते हैं। यह लहर हानिकारक होती है।

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प्रश्न (xix)
ज्वारभाटा कब आता है ?
उत्तर-
समुद्र का जल नियमित रूप से दिन में दो बार (24 घंटे में) ऊपर उठता है और नीचे आता है। इसे ज्वारभाटा कहते हैं।

प्रश्न (xx)
ज्वार दिन में कितनी बार आता है और इनका आपसी अंतर (Magnitude) क्या होता है ?
उत्तर-
प्रत्येक स्थान पर ज्वार 12 घंटे 26 मिनट के बाद आता है। हर रोज़ ज्वार पिछले दिन की तुलना में देर से आता है।

प्रश्न (xxi)
एक औसतन ज्वार की ऊँचाई कितनी होती है ?
उत्तर-
0.55 मीटर।

प्रश्न (xxii)
अंतर स्पष्ट करेंऊँचा ज्वार (Spring Tide) और छोटा ज्वार (Neap Tide)
उत्तर-
ऊँचा ज्वार (Spring Tide)-सबसे ऊँचे ज्वार को ऊँचा ज्वार कहते हैं। यह हालत अमावस्या (New Moon) और पूर्णिमा (Full Moon) को होती है।
छोटा ज्वार (Neap Tide)-अमावस्या के सात दिन बाद या पूर्णिमा के सात दिन बाद ज्वार की ऊँचाई दूसरे दिनों की तुलना में नीची रह जाती है। इसे छोटा ज्वार कहते हैं। इस हालत को शुक्ल और कृष्ण पक्ष की अष्टमी कहते हैं, जब चाँद आधा (Half Moon) होता है।

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3. विस्तार से दें-

प्रश्न (i)
महासागरीय बेसिन (Ocean Basin) क्या होता है ? विस्तार से लिखें।
उत्तर-
महासागरीय बेसिन (Ocean Basin)-समुद्री धरातल के ऊँचे-नीचे भाग को महासागरीय बेसिन कहते हैं। इसके फर्श पर पठार, टीले, घाटियाँ और खाइयाँ मिलती हैं। महासागरीय बेसिन को नीचे लिखे प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है-

1. महाद्वीपीय शैल्फ (Continental Shelf)-समुद्री किनारे के साथ समुद्री हिस्से को महाद्वीपीय शैल्फ कहा जाता है। महाद्वीपीय शैल्फ समुद्री किनारों से लेकर समुद्रों के नीचे उस सीमा तक फैले हुए होते हैं, जहाँ से समुद्र की गहराई शुरू होती है। महाद्वीपीय शैल्फ की औसत गहराई 100 फैदम (Fathom) तक मानी जाती है, परंतु कई बार यह अधिक भी हो सकती है। इसकी ढलान बहुत कम होने के कारण यह समतल ही नज़र आती है।

विस्तार-महासागरों के 7.5% भाग (260 लाख वर्ग किलोमीटर) पर महाद्वीपीय शैल्फों का विस्तार है। इसका सबसे अधिक विस्तार अंधमहासागर (13.3%) में है। इसकी औसत चौड़ाई 67 किलोमीटर और गहराई लगभग 72 फैदम होती है। आर्कटिक सागर के तट पर इसका विस्तार 1000 किलोमीटर से भी अधिक है।

उत्पत्ति-महाद्वीपीय शैल्फ की उत्पत्ति के बारे में विचारकों के नीचे लिखे विचार हैं-

  • कुछ विचारकों के अनुसार महाद्वीपीय शैल्फ वास्तव में स्थल का बढ़ा हुआ रूप होता है। समुद्र तल के ऊपर उठ जाने से या स्थल भाग के नीचे धंस जाने से महाद्वीपीय शैल्फ की रचना हुई।
  • यह भी माना जाता है कि सागरीय अपरदन से भी इनकी रचना हुई।
  • नदियों, लहरों, वायु आदि द्वारा तलछट के निक्षेप से भी इनका निर्माण हुआ।

महत्त्व-महाद्वीपीय शैल्फ मनुष्य के लिए काफी लाभदायक है। इन प्रदेशों में मछलियों के भंडार होते हैं। यहाँ तेल और गैस का उत्पादन होता है। यहाँ समुद्री जीवों और वनस्पति की अधिकता होती है।

2. महाद्वीपीय ढलान (Continental Slope) समुद्री फ़र्श का यह भाग महाद्वीपीय शैल्फ के समाप्त होने पर शुरू होता है और गहरे समुद्री मैदान तक जारी रहता है। दूसरे शब्दों में महाद्वीपीय ढलान महाद्वीपीय शैल्फ और गहरे समुद्री मैदान के बीच का भाग होता है। इस भाग की गहराई 100 फैदम से लेकर 2000 फैदम तक मानी जाती है। (भाव 200 मीटर से 4000 मीटर तक)। इसका कुल विस्तार 8.5% क्षेत्रफल पर है। इसका सबसे अधिक विस्तार अंध महासागर में है, जो कि 72.4% होता है। इस ढाल का औसत कोण 4° होता है, परंतु स्पेन के निकट यह कोण 36° होता है। इस ढाल की मुख्य रूप से पाँच किस्में हैं –

  • कैनियन द्वारा कटे हुए ढाल।
  • पहाड़ियों और बेसिन वाला मंद ढाल।
  • दरार के कारण टूटा हुआ ढाल।
  • सीढ़ीदार ढाल।
  • समुद्री टीलों वाला ढाल।

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3. गहरा समुद्री मैदान (Deep Sea Plain)-महाद्वीपीय ढलान से निचले चौड़े और समतल क्षेत्र को गहरे समुद्री मैदान कहा जाता है। इनकी औसत गहराई 3000 से लेकर 6000 मीटर तक होती है। कुल महासागर में इसका विस्तार 7.7% है। इसका सबसे अधिक विस्तार प्रशांत महासागर में है। इन मैदानों की ढाल 1/1000 से भी कम होती है। इन मैदानों के ऊपर कई भू-दृश्य पाए जाते हैं, जैसे—समुद्री पहाड़ियाँ (Ridges), समुद्री टीले (Sea Mounts) आदि। इस भाग में अधिकतर मरे हुए जानवरों के अवशेष, हड्डियाँ, खोल और कीचड़ आदि पाए जाते हैं। समुद्री निवाण (Ocean Deeps)—समुद्री मैदानों में पाए जाने वाले सबसे गहरे हिस्सों को समुद्री निवाण कहा जाता है। इनका क्षेत्रफल बहुत कम और ढलान बहुत अधिक तीखी होती है।

4. समुद्री निवाण (Ocean Deeps) आमतौर पर द्वीप श्रृंखलाओं के निकट, ज्वालामुखी पर्वतों और भूकंप वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। कुल महासागरों के 7% भाग पर समुद्री निवाण पाए जाते हैं। विश्व के कुल सागरों में 57 खाइयाँ हैं, जिनमें से 32 प्रशांत महासागर में, 19 अंधमहासागर में और 6 हिंद महासागर में हैं। इन खाइयों की नीचे लिखी विशेषताएं है-

  • ये महासागरों के किनारे के साथ-साथ पाई जाती हैं।
  • ये अधिकतर ज्वालामुखी क्षेत्रों में होती हैं।
  • ये द्वीप श्रृंखलाओं की चाप के साथ-साथ मिलती हैं।

5. समुद्री कटक, घाटियाँ, पठार और ज्वालामुखी पहाड़ियाँ (Ocean Ridges, Valleys, Plateaus and Volcano Hills)-समुद्रों में कई स्थानों पर समुद्री कटक, घाटियाँ, पठार और ज्वालामुखी पहाड़ियाँ पाई जाती हैं। उदाहरण के लिए अंध-महासागर में मध्यवर्ती कटक (Mid-Atlantic Ridge) ग्रीनलैंड से लेकर अंटार्कटिक तक फैली हुई है।

प्रश्न (ii)
पंजाब की जलगाहों के विषय में जानकारी दें और इनका प्रदूषण रोकने के लिए सुझाव दें।
उत्तर-
पंजाब के दो जलगाह नीचे लिखे हैं-
1. हरीके पत्तन जलगाह-यह जलगाह बहुत गहरी और बड़ी, जल की आर्द्रभूमि है, जो पंजाब के तरनतारन जिले में स्थित है। 1953 ई० में हरीके के स्थान पर सतलुज नदी के पानी को बांधकर इस जलगाह को बनाया गया था। यहाँ सतलुज और ब्यास नदियों का संगम होता है। यह जलगाह मनुष्य द्वारा बनाई गई है, जोकि 4100 हैक्टेयर के क्षेत्र में तीन जिलों तरनतारन, फिरोजपुर और कपूरथला में फैली हुई है।

2. कांजली जलगाह-पंजाब के कपूरथला जिले की यह जलगाह 1870 ई० में सिंचाई के उद्देश्य से बनाई गई थी। यह जलगाह काली बेंई जोकि ब्यास नदी में से निकलती है, के बहाव को बाँधकर बनाई गई थी। इस जलगाह को 2002 ई० में रामसर समझौते के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व वाली जलगाहों वाला दर्जा दिया गया था।

इनके प्रदूषण की रोकथाम के लिए जरूरी सुझाव-इन जलगाहों में फैंके गए कूड़ा-कर्कट के कारण प्रदूषण होता है। यह कूड़ा-कर्कट पानी के ऊपर तैरता रहता है इसलिए इन जलगाहों को प्रदूषण से बचाने के लिए इनमें कूड़ाकर्कट न फेंका जाए।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

प्रश्न (iii)
महासागरीय जल के तापमान वितरण पर प्रभाव डालने वाले तत्त्वों के बारे में विस्तार से लिखें।
उत्तर-
सागरों का जल, तापमान का एक उत्तम संचालक होता है, इसलिए थल की तुलना में जल देर से गर्म होता है और देर से ठंडा होता है। सागरीय जल का तापमान सभी स्थानों पर एक-समान नहीं होता। सागरीय जल का अलगअलग तापमान नीचे लिखी बातों पर निर्भर करता है-

1. भूमध्य रेखा से दूरी-भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें पूरा वर्ष सीधी पड़ती हैं, इसलिए भूमध्यवर्ती सागरों में तापमान अधिक होता है और पूरा वर्ष एक-समान रहता है। भूमध्य रेखा के ऊपर यह तापमान 26°C के लगभग होता है। 70° अक्षांश पर सागरीय जल का तापमान 5°C पाया जाता है। इसी प्रकार उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में तापमान कम हो जाता है।

2. प्रचलित पवनें-जब स्थायी पवनें चलती हैं, तो सागरों की सतह के जल को गतिशील बना देती हैं। एक स्थान से हिले हुए जल का स्थान लेने के लिए निचला जल ऊपर आ जाता है। इसे Upwelling of Water कहते हैं। इसके फलस्वरूप सागरों के तापमान पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

3. सागरीय धाराओं का प्रभाव-सागरीय धाराएँ जिस क्षेत्र से आती हैं, उसका जल अपने साथ ले आती हैं। यदि कोई सागरीय धारा भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर चल रही हो, तो स्वाभाविक तौर पर ध्रुवों का जल जब भूमध्यरेखीय धाराओं के संपर्क में आएगा, तो उसका तापमान भी बढ़ जाएगा। जो धारा ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर चलती है, तो उसका तापमान कम हो जाएगा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सागरीय धाराएँ सागरों के तापमान पर गहरा प्रभाव डालती हैं। खाड़ी की गर्म धारा पश्चिमी यूरोप के तापमान को 5°C तक बढ़ा देती है परन्तु लैबरेडोर की ठंडी धारा तापमान को 0°C तक कम कर देती है।

4. खारेपन की मात्रा-सागरों का खारापन भी सागरीय जल के तापमान को प्रभावित करता है। सागरों का जल जितना अधिक खारा होगा, उतना ही तापमान अधिक होगा। जितना खारापन कम होगा, उतना ही तापमान कम होगा।

5. थल-मंडलों का प्रभाव-उष्ण-कटिबंध में स्थल द्वारा घिरे हुए सागरों का तापमान अधिक होता है, परंतु शीत कटिबंध में कम होता है।

6. समुद्र की गहराई-समुद्र की गहराई बढ़ने से तापमान कम होता जाता है। ऊपरी सतह से लेकर 1800 मीटर की गहराई तक सागरीय जल का तापमान 15°C से कम होकर 20°C तक रह जाता है। 1800 से 4000 मीटर की गहराई तक यह तापमान 2°C से कम होकर 1.6°C रह जाता है।

प्रश्न (iv)
अलग-अलग सागरों में खारेपन की मात्रा को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्र का पानी हमेशा खारा होता है। सागरीय जल के 1000 ग्राम पानी में लगभग 35 ग्राम नमक घुला हुआ होता है। खारेपन की यह मात्रा भिन्न-भिन्न सागरों में भिन्न-भिन्न होती है। खारेपन की यह भिन्नता नीचे लिखे तत्त्वों पर निर्भर करती है-

1. ताजे जल की पूर्ति (Supply of Fresh Water) ताज़े पानी की अधिकता से सागरों में खारेपन की मात्रा कम हो जाती है। साफ़ जल की पूर्ति कई साधनों द्वारा होती है। भूमध्यरेखीय खंड में अधिक वर्षा के कारण सागरीय जल में खारेपन की मात्रा कम होती है, इसलिए कर्क रेखा और मकर रेखा के आसपास खारेपन की मात्रा अधिक होती है। ध्रुवीय प्रदेशों में हिम (बर्फ) के पिघलने से साफ़ जल प्राप्त होता रहता है, जिससे खारापन कम हो जाता है। बड़ी नदियों के मुहानों पर खारापन कम होता है।

2. वाष्पीकरण (Evaporation)—जिन महासागरों में वाष्पीकरण अधिक होता है, उनका जल अधिक खारा होगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वाष्पीकरण की क्रिया द्वारा सागरीय-जल वाष्प बनकर ऊपर उठता है और बाकी बचे जल में खारेपन की मात्रा बढ़ जाती है। अधिक तापमान, वायु की तीव्रता और शुष्कता के कारण सागरों में खारापन अधिक होता है। कर्क रेखा और मकर रेखा के निकट अधिक वाष्पीकरण के कारण खारापन अधिक होता है। कम तापमान और कम वाष्पीकरण के कारण खारापन कम हो जाता है।

3. पवनों की दिशा (Wind Direction) यदि एक ही दिशा से तेज़ गति वाली पवनें दूसरी दिशा की ओर चल रही हों, तो वे सागरों की सतह का जल भी अपने साथ बहाकर ले जाती हैं, जिस कारण सागरों में खारेपन की मात्रा परिवर्तित होती रहती है। नीचे उतरती पवनों के कारण अधिक वाष्पीकरण और अधिक खारापन होता है।

4. सागरीय जल की गति (Movement of the Sea Water) सागरों के जल की गति द्वारा भी खारेपन पर प्रभाव पड़ता है। सागरों का जल गतिशील होने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता है और अपने मूल गुणों को भी बहाकर ले जाता है। यदि मूल जल में खारेपन की मात्रा अधिक होगी, तो नए स्थान का खारापन अधिक हो जाएगा। दूसरी तरफ अधिक ताज़ा जल नए स्थान का खारापन कम कर देता है।

5. समुद्री धाराएँ (Currents)-खुले सागरों में धाराएँ एक भाग से दूसरे भाग तक जल ले जाती हैं । गर्म धाराएँ खारेपन की मात्रा को बढ़ा देती हैं, जबकि ठंडी धाराओं के साथ खारेपन की मात्रा कम हो जाती है।

6. समुद्री जल की मिश्रण क्रिया (Mixing of Water)–ज्वारभाटा, लहरें और धाराएँ समुद्री जल को दूर दूर तक बहाकर ले जाती हैं। जल के इस मिश्रण से स्थानीय रूप में खारापन बढ़ जाता है या कम हो जाता है।

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प्रश्न (v)
समुद्री धाराएँ क्या होती हैं ? ये किस प्रकार पैदा होती हैं ? उदाहरण भी दें।
उत्तर-
समुद्री धाराएँ (Ocean Currents)-समुद्र के एक भाग से दूसरे भाग की ओर, एक विशेष दिशा में पानी के लगातार प्रवाह को समुद्री धाराएँ कहते हैं (Regular Movement of water from one part of the ocean to another is called an ocean current)। समुद्री धाराओं में पानी नदियों के समान आगे बढ़ता है। इनके किनारे स्थिर पानी वाले होते हैं। इन्हें समुद्री नदियाँ भी कहते हैं (An ocean current is like a river in the ocean)।

धाराओं के पैदा होने के कारण (Causes)—समुद्री धाराओं के पैदा होने के प्रमुख कारण नीचे लिखे हैं-

1. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)- हवा अपनी अपार शक्ति के कारण पानी को गति देती है। धरातल पर चलने वाली स्थायी पवनें (Planetary winds) लगातार एक ही दिशा में चलने के कारण धाराओं को जन्म देती हैं। संसार की प्रमुख धाराएँ स्थायी पवनों की दिशा के अनुसार चलती हैं (Ocean currents are wind determined)। मौसमी पवनें (Seasonal Winds) भी धाराओं की दिशा और उत्पत्ति में सहायक होती हैं।

उदाहरण (Examples)-

  • व्यापारिक पवनें (Trade Winds)—इनके द्वारा उत्तरी और दक्षिणी भूमध्य रेखीय धाराएँ (Equatorial Currents) पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं।
  • पश्चिमी पवनें (Westerlies)-इनके प्रभाव से खाड़ी की धारा (Gulf Stream) और क्यूरोशियो (Kuroshio) धारा पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है।

2. तापमान की भिन्नता (Difference in Temperature)-गर्म पानी हल्का होकर फैलता है और उसकी ऊँचाई बढ़ जाती है। ठंडा पानी भारी होने के कारण नीचे बैठ जाता है। कम ताप के कारण ठंडा पानी सिकुड़कर भारी हो जाता है। इस प्रकार समुद्र के पानी की सतह बराबर नहीं रहती और धाराएँ चलती हैं।

3. खारेपन में भिन्नता (Difference in Salinity)–अधिक खारा पानी भारी होने के कारण तल के नीचे की ओर बहता है। कम खारा पानी हल्का होने के कारण तल पर ही बहता है।

उदाहरण (Examples)

(क) भूमध्य सागर के अधिक खारे पानी की धारा तल के नीचे अंध महासागर की ओर चलती है।
(ख) बाल्टिक सागर (Baltic Sea) से कम खारे पानी की धारा तल पर उत्तरी सागर (North sea) की ओर बहती है।

4. वाष्पीकरण और वर्षा की मात्रा (Evaporation and Rainfall)-अधिक वाष्पीकरण से पानी भारी और अधिक खारा हो जाता है और तल की ओर नीचा हो जाता है, परंतु वर्षा अधिक होने से पानी हल्का हो जाता है और उसका तल ऊँचा हो जाता है। इस प्रकार ऊँचे तल से निचले तल की ओर धाराएँ चलती हैं।

5. धरती की दैनिक गति (Rotation)-फैरल के सिद्धान्त (Ferral’s law) के अनुसार धाराएँ उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं। धरती की गति के कारण धाराओं का प्रवाह गोल आकार का बन जाता है।
उदाहरण (Examples)–धाराओं का चक्र उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की दिशा के अनुकूल (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anti-Clockwise) चलता है।

6. तटों का आकार (Shape of Coasts)-तटों का आकार धाराओं के मार्ग में रोक पैदा कर देता है। समुद्री जल तटों से टकराकर धाराओं के रूप में बहने लगता है। धाराएँ तट के सहारे मुड़ जाती हैं। यदि थल प्रदेश न होते, तो धरती के आस-पास एक महान् भूमध्य रेखीय धारा (Great Equatorial Current) चलती।

उदाहरण (Examples)-

(क) ब्राज़ील के नुकीले तट पर सेन-रॉक अंतरीप (Cape san-Rocque) से टकराकर भूमध्य रेखीय धारा ब्राजील की धारा के रूप में बहती है।

(ख) महाद्वीपों की खाड़ियों वाले तटों पर पानी की अधिक मात्रा इकट्ठी हो जाती है। जिस प्रकार मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Maxico) से फ्लोरिडा (Florida) की धारा।

7. ऋतु परिवर्तन (Change of Season) मौसम के अनुसार पवनों की दिशा में परिवर्तन होने के कारण धाराओं की दिशा भी बदल जाती है।
उदाहरण (Examples)-हिंद महासागर में गर्मी की ऋतु में S.W. Monsoon Drift और सर्दी की ऋतु में N.E. Monsoon Drift बहती है।

प्रश्न (vi)
अंध महासागर की धाराओं का वर्णन करें और पड़ोसी देशों पर उनके प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
अंध महासागर की धाराएँ (Currents of the Atlantic Ocean)-अंध महासागर स्पष्ट रूप से उत्तरी और दक्षिणी अंध महासागर के दो भागों में बंटा हुआ है। दोनों भागों में धाराओं का प्रभाव-क्रम एक समान है। उत्तरी अंध महासागर में धाराएँ घड़ी की सुइयों की दिशा (Clockwise) में चक्र पूरा करती हैं, परंतु दक्षिणी अंध महासागर में घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा (Anti-clockwise) में चक्र पूरा करती हैं। अंध महासागर की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं-

1. उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा (North Equatorial Current)—यह गर्म जल की धारा है, जो भूमध्य रेखा के उत्तर में व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है। इस धारा का जल मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Maxico) में इकट्ठा हो जाता है।

2. खाड़ी की धारा (Gulf Stream Current)-उत्पत्ति (Origin)—यह धारा मैक्सिको की खाड़ी में एकत्रित जल द्वारा पैदा होती है, इसीलिए इसे खाड़ी की धारा कहते हैं । यह धारा उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट के साथ-साथ उत्तर की ओर न्यूफाउंडलैंड (New Foundland) तक बहती है। यह गर्म जल की धारा है, जो एक नदी के समान तेज़ चाल से बहती है। इसका रंग नीला होता है। यह लगभग 1 कि०मी० गहरी, 50 कि०मी० चौड़ी है और इसकी गति 8 कि०मी० प्रति घंटा है।

शाखाएँ और क्षेत्र (Branches and Area)—यह धारा 40° उत्तरी अक्षांश के निकट पश्चिमी पवनों (Westerlies) के प्रभाव से पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती है। इसकी मुख्य धारा यूरोप की ओर बहती है, जिसे उत्तरी अटलांटिक प्रवाह (North Atlantic Drift) कहते हैं। यह एक धीमी धारा है, जिसे पश्चिमी पवनों के कारण पश्चिमी पवन प्रवाह (West Wind Drift) भी कहते हैं । यूरोप के तट पर यह धारा कई शाखाओं में बँट जाती है। ब्रिटेन का चक्कर लगाती हुई एक शाखा नॉर्वे के तट को पार करके आर्कटिक सागर में स्पिट्ज़बर्जन (Spitsbergen) तक पहुँच जाती है, जहाँ इसे नार्वेजियन (Norwegian) धारा कहते हैं।

प्रभाव (Effects) –

  • यह एक गर्म जल धारा है, जो ठंडे अक्षांशों में गर्म जल पहुँचाती है।
  • यह धारा पश्चिमी यूरोप को गर्मी प्रदान करती है। यूरोप में सर्दी की ऋतु में साधारण से ऊँचा तापमान इसी धारा की देन है।
  • पश्चिमी यूरोप की सुहावनी जलवायु इस धारा की देन है, इसलिए इसे यूरोप की जीवन रेखा (Life line of Europe) भी कहते हैं।
  • पश्चिमी यूरोप की बंदरगाहें सर्दी की ऋतु में नहीं जमतीं और व्यापार के लिए खुली रहती हैं।
  • इस धारा के ऊपर से निकलने वाली पश्चिमी पवनें (westerlies) यूरोप में बहुत वर्षा करती हैं।

3. कनेरी की धारा (Canary Current)-यह ठंडे जल की धारा है, जो स्पेन, पुर्तगाल और अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी भागों पर कनेरी द्वीप के निकट से गुज़रती है। दैनिक गति के प्रभाव से उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट का कुछ जल दक्षिण की ओर मुड़कर भूमध्य रेखा की ओर निकलता है। इसके प्रभाव से सहारा (Sahara) मरुस्थल शुष्क रहता है।

4. लैबरेडोर की धारा (Labrador Current)—यह ठंडे पानी की धारा है, जो आर्कटिक सागर (Arctic Ocean) से उत्तरी अंध-महासागर की ओर बहती है। यह धारा बैफिन खाड़ी (Bafin Bay) से निकलकर कनाडा के तट के साथ बहती हुई न्यूफाउंडलैंड तक आ जाती है। यहाँ यह खाड़ी की धारा के साथ मिल जाती है, जिससे घना कोहरा पैदा होता है। इसकी एक शाखा सेंट लारेंस (St. Lawrence) घाटी में दाखिल होती है, जो कई महीने बर्फ से जमी रहती है।

प्रभाव (Effects)-

  • ये प्रदेश बर्फ से ढके रहने के कारण अनुपजाऊ हैं।
  • इस ठंडी धारा के कारण इस प्रदेश के तट की बंदरगाहें सर्दी की ऋतु में जम जाती हैं और व्यापार बंद हो जाता है।
  • ये धाराएँ अपने साथ आर्कटिक सागर पर बर्फ की बड़ी-बड़ी चट्टानें ले आती हैं। कोहरे के कारण जहाज़ इन हिमशैलों से टकराकर दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं।

5. दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा (South Equatorial Current)—यह धारा भूमध्य रेखा के दक्षिण में भूमध्य रेखा के समानांतर बहती है। व्यापारिक पवनों के प्रभाव से यह पूर्व से पश्चिम की दिशा में बहती है। यह गर्म जल की धारा है, जो अफ्रीका की गिनी की खाड़ी (Gulf of Guinea) से आरम्भ होकर ब्राज़ील के (Brazil) तट तक बहती है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर 1

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

प्रश्न (vii)
किसी देश की जलवायु और व्यापार पर समुद्री धाराओं के प्रभाव का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्री धाराओं का प्रभाव (Effects of Ocean Currents) समुद्री धाराएँ निकट के क्षेत्रों के मानवीय जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं। धाराओं का यह प्रभाव कई प्रकार से होता है
1. जलवायु पर प्रभाव (Effects on Climate)-

  • जलवायु (Climate)-जिन तटों पर गर्म या ठंडी धाराएँ चलती हैं, वहाँ की जलवायु क्रमशः गर्म या ठंडी हो जाती है।
  • तापमान (Temperature)-धाराओं के ऊपर बहने वाली पवनें अपने साथ गर्मी या सर्दी ले जाती हैं। गर्म धाराओं के प्रभाव से तटीय प्रदेशों का तापमान अधिक हो जाता है और जलवायु सम हो जाती है (Warm currents raise and cold temperature lower the temperature of the neighbouring areas) I OST धारा के कारण सर्दी की ऋतु में तापमान बहुत कम हो जाता है और जलवायु विषम और कठोर हो जाती है।

उदाहरण (Examples)-

(i) लैबरेडोर (Labrador) की ठंडी धारा के प्रभाव से कनाडा का पूर्वी तट और क्यूराईल (Kurile) की ठंडी धारा के प्रभाव से साइबेरिया का पूर्वी तट सर्दी ऋतु में बर्फ से जमा रहता है।

(ii) खाड़ी की गर्म धारा के प्रभाव से ब्रिटिश द्वीप समूह और नॉर्वे के तट के भागों का तापमान उच्च रहता है और पानी सर्दी की ऋतु में भी नहीं जमता। जलवायु सुहावनी और सम रहती है।

(iii) वर्षा (Rainfall)-गर्म धाराओं के निकट के प्रदेशों में अधिक वर्षा होती है परंतु ठंडी धाराओं के निकट के प्रदेशों में कम वर्षा होती है। गर्म धाराओं के ऊपर बहने वाली पवनों में नमी धारण करने की शक्ति बढ़ जाती है, पर ठंडी धाराओं के संपर्क में आकर पवनें ठंडी हो जाती हैं और वे अधिक नमी धारण नहीं कर सकतीं।

उदाहरण (Examples)-

  • उत्तर-पश्चिमी यूरोप में खाड़ी की गर्म धारा के कारण और जापान के पूर्वी तट पर क्यूरोशियो की गर्म धारा के कारण अधिक वर्षा होती है।
  • संसार के प्रमुख मरुस्थलों के तटों के नज़दीक ठंडी धाराएँ बहती हैं, जैसे सहारा तट पर कनेरी धारा, कालाहारी तट पर बेंगुएला धारा, ऐटेकामा तट पर पेरू की धारा।

(iv) धुंध की उत्पत्ति (Fog)-गर्म और ठंडी धाराओं के मिलने से धुंध और कोहरा पैदा हो जाता है। गर्म धारा के ऊपर की हवा ठंडी हो जाती है। उसके जलकण सूर्य की किरणों का रास्ता रोककर कोहरा पैदा कर देते हैं।
उदाहरण (Examples)-खाड़ी की गर्म धारा और लैबरेडोर की गर्म धारा के ऊपर की हवा के मिलने से न्यूफाऊंडलैंड (New Foundland) के निकट धुंध पैदा हो जाती है।

(v) तूफ़ानी चक्रवात (Cyclones)-गर्म और ठंडी धाराओं के मिलने से गर्म हवा बड़े वेग से ऊपर उठती है और तेज़ तूफानी चक्रवातों को जन्म देती है।

2. व्यापार पर प्रभाव (Effects on Trade)-

(i) बंदरगाहों का खुला रहना (Open Sea-ports)-ठंडे प्रदेशों में गर्म धाराओं के प्रभाव से सर्दियों में बर्फ नहीं जमती और बंदरगाह व्यापार के लिए सारा साल खुले रहते हैं, परंतु ठंडी धाराओं के निकट का तट बर्फ से जमा रहता है। ठंडी धाराएँ व्यापार में रुकावट डालती हैं।

उदाहरण (Examples)–

  • खाड़ी की धारा के कारण नॉर्वे और ब्रिटिश द्वीप समूह की बंदरगाहें पूरा वर्ष खुली रहती हैं, परंतु हॉलैंड, फिनलैंड और स्वीडन की बंदरगाहें समुद्र का पानी जम जाने के कारण सर्दी की ऋतु में बंद हो जाती हैं।
  • लैबरेडोर की ठंडी धारा के कारण पूर्वी कनाडा और सेंट लॉरेंस घाटी (St. Lawrance Valley) की बंदरगाहें तथा क्यूराईल की ठंडी धारा के कारण व्लाडिवॉस्टक (Vladivostok) की बंदरगाहें सर्दी की ऋतु में जम जाती हैं।

(ii) समुद्री मार्ग (Ocean Routes)-धाराएँ जल-मार्ग को निर्धारित करती हैं। ठंडे सागरों से ठंडी धाराओं के साथ बहकर आने वाले हिम-शैल (Icebergs) जहाज़ों का बहुत नुकसान करते हैं। इनको ध्यान में रखकर समुद्री मार्ग निर्धारित किए जाते हैं।

(iii) जहाजों की गति पर प्रभाव (Effect on the velocity of the Ships)-प्राचीन काल में धाराओं का बादबानी जहाज़ों की गति पर प्रभाव पड़ता था। धाराओं के अनुकूल दिशा में चलने से उनकी गति बढ़ जाती थी, परंतु विपरीत दिशा में जाने से उनकी चाल कम हो जाती थी। आजकल भाप से चलने वाले जहाज़ों (Steam Ships) की गति पर धाराओं का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

(iv) समुद्र के जल की शुद्धि-धाराओं के कारण समुद्र का जल गतिशील, शुद्ध और साफ रहता है। धाराएँ तट पर जमा पदार्थ दूर बहाकर ले जाती हैं और समुद्र तट गंदे होने से बचे रहते हैं।

(v) दुर्घटनाएँ-कोहरे और धुंध के कारण दृश्यता (visibility) कम हो जाती है। आमतौर पर जहाज़ों के डूबने और टकराने की दुर्घटनाएं होती रहती हैं।

3. समुद्री जीवों पर प्रभाव (Effects on Marine life)-
समुद्री जीवों का भोजन (Plankton)-धाराएँ समुद्री जीवों की प्राण हैं। ये अपने साथ अनेकों गली-सड़ी वस्तुएँ (plankton) बहाकर ले आती हैं। ये पदार्थ मछलियों के भोजन का आधार हैं।

प्रश्न (viii)
महासागरीय धाराओं के प्रभाव लिखें।
उत्तर-
महासागरीय जल में खारापन (Salinity of Ocean Water)-
महासागरीय जल सदा खारा होता है, परंतु यह कहीं कम खारा और कहीं अधिक खारा होता है। सागर के इस खारेपन को ही महासागरीय खार या जल की लवणता कहा जाता है। यह खारापन महासागरीय जल में पाए जाने वाले नमक के कारण होता है। प्रसिद्ध सागर वैज्ञानिक मरे (Murray) के अनुसार प्रति घन किलोमीटर जल में 4/4 करोड़ टन नमक होता है। यदि महासागरीय जल के कुल नमक को बिछाया जाए, तो संपूर्ण पृथ्वी पर लगभग 150 मीटर मोटी परत बन जाएगी।

महासागरों का औसत खारापन (Average Salinity of Ocean)-
खुले महासागरों के जल में पाए जाने वाले लवणों के घोल को खारापन कहते हैं। (The total Salt Content of Oceans is Called Salinity.) । सागरीय जल का औसत खारापन 35 ग्राम प्रति हजार अर्थात् 35% होता है। खुले महासागरों में 1000 ग्राम जल में लगभग 35 ग्राम नमक होता है। ऐसे जल के खारेपन को 35 ग्राम प्रति हज़ार (Thirty five per thousand) कहा जाता है क्योंकि खारेपन को प्रति हज़ार ग्राम में ही दर्शाया जाता है।

महासागरों में खारेपन के कारण (Origin of Salinity in the Ocean)-
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद जब महासागरों की रचना हुई तो उस समय पृथ्वी के अधिकतर नमक इस जल में घुल गए। इसके बाद स्थलों से आने वाली अनगिनत नदियाँ अपने साथ घोल के रूप में नमक महासागरों में निक्षेप कर रही हैं, जिससे महासागरों में खारेपन की वृद्धि होती रही है। वाष्पीकरण द्वारा महासागरों का ताज़ा जल वायुमंडल में मिलकर वर्षा का कारण बनता है। यह वर्षा नदियों के रूप में स्थल पर नमक प्रवाहित करके महासागरों में पहुँचाती है।

सागरीय जल के नमक (Salts of Ocean)-
सागरीय जल में पाए जाने वाले नमक इस प्रकार हैं–

(i) सोडियम क्लोराइड — 77.8 प्रतिशत
(ii) मैग्नीशियम क्लोराइड — 10.9 प्रतिशत
(iii) मैग्नीश्यिम सल्फेट — 4.7 प्रतिशत
(iv) कैल्शियम सल्फेट — 3.6 प्रतिशत
(v) पोटाशियम सल्फेट — 2.5 प्रतिशत
(vi) कैल्शियम कार्बोनेट — 0.3 प्रतिशत
(vii) मैग्नीशियम ब्रोमाइड — 0.2 प्रतिशत

खारेपन का महत्त्व (Importance of Salinity) –
समुद्री जल के खारेपन का महत्त्व नीचे लिखे अनुसार है-

  • समुद्र में खारेपन की भिन्नता के कारण धाराएँ उत्पन्न होती हैं; जो निकटवर्ती क्षेत्रों में जलवायु को प्रभावित करती हैं।
  • समुद्री जल में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट नमक समुद्री जीव-जंतुओं विशेषकर मूंगा (Coral) और पंक (Ooze) का ज़ोन है, जिससे इनकी हड्डियाँ और पिंजर बनते हैं।
  • खारेपन के कारण धरती पर वनस्पति उगती है।
  • लवण ठंडे महासागरों को जमने नहीं देते और जीव-जंतु विशेष रूप से बहुमूल्य मछलियाँ नहीं मरती और जल परिवहन चालू रहता है।
  • खारेपन के कारण जल का घनत्व बढ़ जाता है, इसीलिए जहाज़ तैरते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

प्रश्न (ix)
गर्म और ठंडी धाराओं का आस-पास के क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
महासागरीय जल में तापमान का क्षैतिज विभाजन (Horizontal Distribution of Temperature in Ocean Water)-अर्ध-खुले सागरों और खुले सागरों के तापमान में भिन्नता होती है। इसका कारण यह है कि अर्ध खुले सागरों के तापमान पर निकटवर्ती क्षेत्रों का प्रभाव पड़ता है।

(क) महासागरों में जल पर तापमान का क्षैतिज विभाजन (Horizontal Distribution of Temperature in Ocean Water)-महासागरों में जल-तल (Water-surface) के तापमान का क्षैतिज विभाजन नीचे लिखे अनुसार है :

  • भूमध्य रेखीय भागों के जल का तापमान 26° सैल्सियस, ध्रुवीय क्षेत्रों में 0° सैल्सियस से -5° (minus five degree) सैल्सियस और 20°, 40° और 60° अक्षांशों के तापमान क्रमशः 23°, 14° और 1° सैल्सियस रहता है। इस प्रकार भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर महासागरीय जल का क्षैतिज तापमान कम होता जाता है। इसका कारण यह है कि भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लंब और ध्रुवों की ओर तिरछी पड़ती हैं।
  • ऋतु परिवर्तन के साथ महासागरों के ऊपरी तल के तापमान में परिवर्तन आ जाता है। गर्मी की ऋतु में दिन लंबे होने के कारण तापमान ऊँचा और सर्दी की ऋतु में दिन छोटे होने के कारण तापमान कम रहता है।
  • स्थल की तुलना में जल देरी से गर्म और देरी से ही ठंडा होता है। उत्तरी गोलार्द्ध में जल की तुलना में स्थल अधिक है और दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का क्षेत्र अधिक है। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में समुद्री जल का तापमान स्थलीय प्रभाव के कारण ऊँचा रहता है। इसकी तुलना में जल की अधिकता के कारण दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान कम रहता है।

3. अर्ध-खले सागरों में जल के तापमान का क्षैतिज विभाजन (Horizontal Distribution of Temperature in Partially Enclosed Seas) अर्ध-खुले सागरों के तापमान पर निकटवर्ती स्थलखंडों का प्रभाव अधिक पड़ता है।

(i) लाल सागर और फारस की खाड़ी (Red Sea and Persian Gulf)—ये दोनों अर्ध-खुले सागर हैं, जो संकरे जल संयोजकों (Straits) द्वारा हिंद महासागर से मिले हुए हैं। इन दोनों के चारों ओर मरुस्थल हैं, जिनके प्रभाव से तापमान उच्च, क्रमश: 32° से० और 34° से० रहता है। विश्व में सागरीय तल का अधिक-सेअधिक तापमान 34° से० है, जोकि फारस की खाड़ी में पाया जाता है।

कुछ सागरों के जल का तापमान-

सागर — तापमान
लाल सागर — 32°C.
खाड़ी फारस –34°C.
बाल्टिक सागर –10°C.
उत्तरी सागर –17°C.
प्रशांत महासागर –19.1°C.
हिंद महासागर –17.0°C.
अंध महासागर — 16.9°C.

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(ii) बाल्टिक सागर (Baltic Sea)-इस सागर में तापमान कम रहता है और शीत ऋतु में यह बर्फ में बदल जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह शीत प्रदेशों से घिरा हुआ है, जोकि सर्दियों में बर्फ से ढके रहते हैं। इसकी तुलना में निकट का विस्तृत उत्तर सागर (North Sea) कभी भी नहीं जमता। इसका कारण यह है कि एक तो यह खुला सागर है और दूसरा अंध महासागर की तुलना में गर्म जलं इसमें बेरोक प्रवेश करता है।

(iii) भूमध्य सागर या रोम सागर (Mediterranean Sea)—यह भी एक अर्ध-खुला समुद्र है, जो जिब्राल्टर (Gibraltar) जल संयोजक द्वारा अंध महासागर से जुड़ा हुआ है। इसका तापमान उच्च रहता है क्योंकि इसके दक्षिण और पूर्व की ओर मरुस्थल हैं। दूसरा, इस जल संयोजक की ऊँची कटक महासागर के जल को इस सागर में बहने से रोकती है।

महासागरीय जल में ताप का लंबवर्ती विभाजन-(Vertical Distribution of Temperature of Ocean Water)-सूर्य का ताप सबसे पहले महासागरीय तल का जल प्राप्त करता है और सबसे ऊपरी परत गर्म होती है। सूर्य के ताप की किरणें ज्यों-ज्यों गहराई में जाती हैं, तो बिखराव (Scattering), परावर्तन (Reflection) और प्रसारण (Diffusion) के कारण उनकी ताप-शक्ति नष्ट हो जाती है। इस प्रकार तल के नीचे के पानी का तापमान गहराई के साथ कम होता जाता है।

महासागरीय जल का तापमान-
गहराई के अनुसार (According to Depth)-

गहराई (Depth) मीटर — तापमान (°C)
200 — 15.9°C
400 —  10.0°C
1000 — 4.5°C
2000 — 2.3°C
3000 — 1.8°C
4400 — 1.7°C

1. महासागरीय जल का तापमान गहराई बढ़ने के साथ-साथ कम होता जाता है। इसका कारण यह है कि सूर्य की किरणें अपना प्रभाव महाद्वीपीय बढ़ौतरी की अधिकतम गहराई भाव 183 मीटर (100 फैदम) तक ही डाल सकती हैं।
2. महाद्वीपीय तट के नीचे महासागरों में तापमान अधिक कम होता है परंतु अर्ध-खुले सागरों में तापमान जल संयोजकों की कटक तक ही गिरता है और इससे आगे कम नहीं होता।

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हिंद महासागर के ऊपरी तल और लाल सागर के ऊपरी तल का तापमान लगभग समान (27°C) होता है। इन दोनों के बीच बाब-अल-मेंडर जल संयोजक की कटक है। उस गहराई तक दोनों में तापमान एक समान कम होता है क्योंकि इस गहराई तक हिंद महासागर का जल लाल सागर में प्रवेश करता रहता है। परंतु इससे अधिक गहराई पर लाल सागर का तापमान कम नहीं होता, जबकि हिंद महासागर में यह निरंतर कम होता रहता है।

3. गहराई के साथ तापमान कम होने की दर सभी गहराइयों में एक समान नहीं होती। लगभग 100 मीटर की गहराई तक जल का तापमान निकटवर्ती धरातलीय तापमान के लगभग बराबर होता है। धरातल से 1000 से 1800 मीटर की गहराई पर तापमान लगभग 15° से कम होकर लगभग 2°C रह जाता है। 4000 मीटर की गहराई पर तापमान कम होकर 1.6°C रह जाता है। महासागरों में किसी भी गहराई पर तापमान 1°C से कम नहीं होता। यद्यपि ध्रुवीय महासागरों की ऊपरी परत जम जाती है, पर निचला पानी कभी नहीं जमता। इसी कारण मछलियाँ और अन्य जीव-जन्तु निचले जल में मरते नहीं।

महासागरीय जल में खारापन (Salinity of Ocean Water)-
महासागरीय जल सदा खारा होता है, परंतु यह कहीं कम खारा और कहीं अधिक खारा होता है। सागर के इस खारेपन को ही महासागरीय खार या जल की लवणता कहा जाता है। यह खारापन महासागरीय जल में पाए जाने वाले नमक के कारण होता है। प्रसिद्ध सागर वैज्ञानिक मरे (Murray) के अनुसार प्रति घन किलोमीटर जल में 4/4 करोड़ टन नमक होता है। यदि महासागरीय जल के कुल नमक को बिछाया जाए, तो संपूर्ण पृथ्वी पर लगभग 150 मीटर मोटी परत बन जाएगी।

महासागरों का औसत खारापन (Average Salinity of Ocean)-
खुले महासागरों के जल में पाए जाने वाले लवणों के घोल को खारापन कहते हैं। (The total Salt Content of Oceans is Called Salinity.) । सागरीय जल का औसत खारापन 35 ग्राम प्रति हजार अर्थात् 35% होता है। खुले महासागरों में 1000 ग्राम जल में लगभग 35 ग्राम नमक होता है। ऐसे जल के खारेपन को 35 ग्राम प्रति हज़ार (Thirty five per thousand) कहा जाता है क्योंकि खारेपन को प्रति हज़ार ग्राम में ही दर्शाया जाता है।

महासागरों में खारेपन के कारण (Origin of Salinity in the Ocean)-
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद जब महासागरों की रचना हुई तो उस समय पृथ्वी के अधिकतर नमक इस जल में घुल गए। इसके बाद स्थलों से आने वाली अनगिनत नदियाँ अपने साथ घोल के रूप में नमक महासागरों में निक्षेप कर रही हैं, जिससे महासागरों में खारेपन की वृद्धि होती रही है। वाष्पीकरण द्वारा महासागरों का ताज़ा जल वायुमंडल में मिलकर वर्षा का कारण बनता है। यह वर्षा नदियों के रूप में स्थल पर नमक प्रवाहित करके महासागरों में पहुँचाती है।

सागरीय जल के नमक (Salts of Ocean)-
सागरीय जल में पाए जाने वाले नमक इस प्रकार हैं–

(i) सोडियम क्लोराइड — 77.8 प्रतिशत
(ii) मैग्नीशियम क्लोराइड — 10.9 प्रतिशत
(iii) मैग्नीश्यिम सल्फेट — 4.7 प्रतिशत
(iv) कैल्शियम सल्फेट — 3.6 प्रतिशत
(v) पोटाशियम सल्फेट — 2.5 प्रतिशत
(vi) कैल्शियम कार्बोनेट — 0.3 प्रतिशत
(vii) मैग्नीशियम ब्रोमाइड — 0.2 प्रतिशत

खारेपन का महत्त्व (Importance of Salinity) –
समुद्री जल के खारेपन का महत्त्व नीचे लिखे अनुसार है-

  • समुद्र में खारेपन की भिन्नता के कारण धाराएँ उत्पन्न होती हैं; जो निकटवर्ती क्षेत्रों में जलवायु को प्रभावित करती हैं।
  • समुद्री जल में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट नमक समुद्री जीव-जंतुओं विशेषकर मूंगा (Coral) और पंक (Ooze) का ज़ोन है, जिससे इनकी हड्डियाँ और पिंजर बनते हैं।
  • खारेपन के कारण धरती पर वनस्पति उगती है।
  • लवण ठंडे महासागरों को जमने नहीं देते और जीव-जंतु विशेष रूप से बहुमूल्य मछलियाँ नहीं मरती और जल परिवहन चालू रहता है।
  • खारेपन के कारण जल का घनत्व बढ़ जाता है, इसीलिए जहाज़ तैरते हैं।

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प्रश्न (x)
हिंद महासागर की धाराओं का वर्णन करें। उत्तरी हिंद महासागर की धाराओं का मानसून पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
हिंद महासागर की धाराएँ (Currents of Indian Ocean)-हिंद महासागर के माध्यम से धाराओं और पवनों के संबंध को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। यहाँ मानसून पवनों के कारण समुद्री धाराओं का क्रम भी मौसमी (Seasonal) होता है। उत्तरी हिंद महासागर में चलने वाली धाराएँ, मानसून पवनों के कारण प्रति छह महीने बाद अपनी दिशा बदल लेती हैं। परंतु दक्षिणी हिंद महासागर में धाराएँ पूरा वर्ष एक ही दिशा में चलने के कारण स्थायी होती हैं।

उत्तरी हिंद महासागर की परिवर्तनशील धाराएँ-मानसून के प्रभाव के कारण धाराएँ पूरा वर्ष अपनी दिशा बदलती रहती हैं। वास्तव में कोई भी निश्चित धारा नहीं मिलती। छह महीने के बाद इन धाराओं की दिशा और क्रम बदल जाता है।

  • दक्षिण-पश्चिमी मानसून प्रवाह (S.W. Monsoon Drift)–यह धारा गर्मी की ऋतु में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों के प्रभाव से चलती है। इस धारा का जल अफ्रीका के पूर्वी तट के साथ बहकर अरब सागर, श्रीलंका और बंगाल की खाड़ी का चक्कर लगाता है। यह धारा बर्मा के तट तक पहुँच जाती है।
  • उत्तर-पूर्वी मानसून प्रवाह (N.E. Monsoon Drift)-सर्दी की ऋतु में मानसून पवनों की दिशा उल्टी हो जाती है और धाराओं का क्रम भी उल्टा हो जाता है। यह धारा बर्मा के तट से शुरू होकर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का चक्कर लगाकर अफ्रीका के पूर्वी तट तक बहती है।

दक्षिणी हिंद महासागर की स्थायी धाराएँ-ये धाराएँ पूरा वर्ष एक ही दिशा में चलती हैं, इसलिए इन्हें स्थायी धाराएँ कहते हैं। ये धाराएँ घड़ी की विपरीत दिशा में (Anti-clockwise) चक्कर काटती हैं।

1. दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा (South Equatorial Current)-यह एक गर्म धारा है जो भूमध्य रेखा के दक्षिण में व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है। यह धारा इंडोनेशिया से निकलकर अफ्रीका के पूर्वी तट तक बहती है। मैडागास्कर द्वीप के निकट यह दक्षिण की ओर मुड़ जाती है।

2. भारतीय विपरीत धारा (Indian Counter Current)-भूमध्य रेखा के निकट पश्चिम से पूर्व दिशा में बहने वाली धारा को भारतीय विपरीत धारा कहते हैं।

3. मोज़म्बीक की धारा (Mozambique Current)—मैडागास्कर (मलागासी द्वीप) के कारण भूमध्य रेखीय – धारा कई शाखाओं में बँट जाती है-

  • मैडागास्कर धारा (Medagasker)-यह गर्म धारा मैडागास्कर के पूर्व में बहती है। इसमें दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा कई शाखाओं में बँट जाती है।
  • मोज़म्बीक धारा (Mozambique Current)-यह मैडागास्कर द्वीप के पश्चिम में एक तंग भाग Mozambique channel में बहती है। यह धारा भँवर के रूप में होती है। (iii) ऐगुलॉस धारा (Agulhas Current) ऊपर लिखित दोनों धाराएं मिलकर मैडागास्कर के दक्षिण में एक नई धारा को जन्म देती है, जिसे ऐगुलॉस धारा कहते हैं।

4. अंटार्कटिक धारा (Antarctic Current)-यह ठंडे जल की धारा है।।
5. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की धारा (West Australian Current)—यह ठंडी धारा ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट पर बहती है।

6. विपरीत भूमध्य रेखीय धारा (Counter Equatorial Current)-पानी की अधिकता और धरती की दैनिक गति के कारण भूमध्य रेखा के साथ-साथ विपरीत भूमध्य रेखीय धारा बहती है। यह धारा पश्चिम से पूर्व में अफ्रीका के गिनी तट तक बहती है। इसे गिनी की धारा (Guinea stream) भी कहते हैं।

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7. ब्राज़ील की धारा (Brazilian Current)—यह एक गर्म पानी की धारा है, जो ब्राज़ील तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है। उत्तर की ओर ब्राज़ील की गर्म धारा के मिलने से कोहरा पैदा हो जाता है। इससे जहाज़ों का आना-जाना बंद हो जाता है।

8. फाकलैंड धारा (Falkland Current)-यह ठंडी धारा दक्षिणी अमेरिका के दक्षिणी सिरे (Cape Horn) और फाकलैंड के निकट बहती है। उत्तर की ओर ब्राज़ील की गर्म धारा के मिलने से कोहरा पैदा हो जाता है। इससे जहाजों का आना-जाना बंद हो जाता है।

9. अंटार्कटिक प्रवाह (Antarctic Drift)—यह बहुत ठंडे पानी की धारा है, जो अंटार्कटिक महाद्वीप के चारों तरफ पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती है। यह अंध महासागर, शांत महासागर और हिंद महासागर की सांझी धारा है। थल की कमी के कारण यह पश्चिमी पवनों के प्रवाह से लगातार बहती है।

10. बैंगुऐला धारा (Benguela Current)—यह ठंडे पानी की धारा दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट पर बहती है। व्यापारिक पवनों के कारण तल का गर्म जल दूर बह जाता है और नीचे का ठंडा पानी ऊपर आ जाता है, जिसे Upwelling of water कहते हैं। अफ्रीका में कालाहारी मरुस्थल इसी धारा के कारण है।

प्रश्न (xi)
ज्वारभाटा किसे कहते हैं ? ये कैसे पैदा (बनते) होते हैं और इनका क्या महत्त्व है ? विस्तार से लिखें।
उत्तर-
ज्वारभाटा समुद्र की एक गति है। समुद्र का जल नियमित रूप से प्रतिदिन दो बार ऊँचा उठता है और दो बार नीचे उतरता है। “समुद्री जल के इस नियमित उतार-चढ़ाव को ज्वारभाटा कहते हैं।” (“Regular rise and fall of sea water is called Tides.”)। पानी के ऊपर उठने की क्रिया को ज्वार (Flood or High Tide or Incoming Tide) कहते हैं। पानी के नीचे उतरने की क्रिया को भाटा (Ebb or low Tide or Out Going Tide) कहते हैं।

विशेषताएँ :

  1. प्रत्येक स्थान पर ज्वारभाटे की ऊँचाई अलग-अलग होती है।
  2. प्रत्येक स्थान पर ज्वार और भाटे का समय अलग-अलग होता है।
  3. समुद्र का पानी 6 घंटे 13 मिनट तक ऊपर चढ़ता है और इतनी ही देर में नीचे उतरता है।
  4. ज्वारभाटा एक स्थान पर नित्य ही एक समय पर नहीं आता।

उत्पत्ति के कारण (Causes of Origin)—पुरातन काल में यूनान और रोम के निवासियों को ज्वारभाटे की जानकारी थी। ज्वारभाटे की उत्पत्ति का मूल कारण चंद्रमा की आकर्षण शक्ति होती है। सबसे पहले न्यूटन ने यह बताया था कि सूर्य और चंद्रमा की गतियों (Movements) तथा ज्वारभाटा में आपस में कुछ संबंध होता है।

चाँद अपने आकर्षण बल (Gravitational Attraction) के कारण धरती के जल को अपनी ओर खींचता है। स्थल-भाग कठोर होता है, इस कारण खींचा नहीं जा सकता, परंतु जल-भाग तरल होने के कारण ऊपर उठ जाता है। यह पानी चाँद की ओर उठता है। वहाँ से निकट का पानी सिमटकर ऊपर उठता जाता है, जिसे ऊँचा ज्वार (High Tide) कहते हैं। जिस स्थान पर पानी की मात्रा कम रह जाती है, वहाँ पानी अपने तल से नीचे गिर जाता है, उसे नीचा ज्वार (Low Tide) कहते हैं। धरती की दैनिक गति के कारण प्रत्येक स्थान पर दिन-रात में दो बार ज्वार आता है। एक ही समय में धरती के तल पर दो बार ज्वार पैदा होते हैं-एक ठीक चाँद के सामने और दूसरा उसकी विपरीत दिशा में (Diametrically Opposite)। चाँद की आकर्षण शक्ति के कारण ज्वार उठता है, इसे सीधा ज्वार (Direct Tide) कहते हैं। विपरीत दिशा में अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force) के कारण पानी ऊपर उठता है और ऊँचा ज्वार पैदा होता है। इसे Indirect Tide कहते हैं। इस प्रकार धरती के एक तरफ ज्वार आकर्षण शक्ति की अधिकता के कारण और दूसरी तरफ अपकेंद्रीय शक्ति की अधिकता के कारण पैदा होते हैं।

सूर्य का प्रभाव (Effect of Sun)-सभी ग्रहों पर सूर्य का प्रभाव होता है। धरती पर सूर्य और चंद्रमा दोनों का आकर्षण होता है। समुद्र के जल पर भी दोनों का आकर्षण होता है। सूर्य चाँद की तुलना में बहुत दूर है, इसलिए सूर्य की आकर्षण शक्ति बहुत साधारण है और चाँद की तुलना में 5/11 भाग कम है।

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ऊँचा ज्वारभाटा (Spring Tide)—सबसे अधिक ऊँचे ज्वार को बड़ा ज्वार कहते हैं। यह महीने में दो बार पूर्णिमा (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) को होता है।

कारण (Causes)-इस दशा में सूर्य, चंद्रमा और धरती एक सीधी रेखा में होते हैं। सूर्य और चाँद की सांझी आकर्षण शक्ति बढ़ जाने से ज्वार-शक्ति बढ़ जाती है। सूर्य और चाँद के कारण उत्पन्न ज्वार इकट्ठे हो जाते हैं (Spring tide is the sum of Solar and Lunar tides.)। इन दिनों में ज्वार अधिक ऊँचा और भाटा कम-से-कम नीचा होता है। ऊँचा ज्वार साधारण ज्वार से 20% अधिक ऊँचा होता है।

लघु ज्वार (Neap Tide)-अमावस्या के सात दिन बाद या पूर्णिमा के सात दिन बाद ज्वार की ऊँचाई दूसरे दिनों की तुलना में नीची रह जाती है। इसे लघु-ज्वार कहते हैं। इस हालत को शुक्ल और कृष्ण पक्ष की अष्टमी कहते हैं, जब आधा चाँद (Half Moon) होता है।

कारण (Causes)-इस हालत में सूर्य और चाँद, धरती के समकोण (At Right Angles) पर होते हैं। सूर्य और चांद की आकर्षण-शक्ति विपरीत दिशाओं में काम करती है। जहाँ सूर्य ज्वार पैदा करता है, चाँद वहाँ भाटा पैदा करता है। सूर्य और चाँद के ज्वार-भाटा एक-दूसरे को कम करते हैं (Neap tide is the difference of Solar and Lunar tides)। इन दिनों में ऊँचा ज्वार, कम ऊँचा और भाटा कम नीचा होता है। लघु ज्वार अक्सर साधारण ज्वार से 20% कम ऊँचा होता है।

ज्वारभाटे के लाभ (Advantages)-

  1. ज्वारभाटा समुद्र के तटों को साफ़ रखता है। यह उतार के समय कूड़ा-कर्कट, कीचड़ आदि को अपने साथ बहाकर ले जाता है।
  2. ज्वारभाटे की हलचल के कारण समुद्र का पानी जमता नहीं।
  3. ज्वार के समय नदियों के मुहानों पर पानी की गहराई बढ़ जाती हैं, जिससे बड़े-बड़े जहाज़ सेंट लारेंस, हुगली, हडसन नदी में प्रवेश कर सकते हैं। ज्वारभाटे के समय को बताने के लिए टाईम-टेबल बनाए जाते हैं।
  4. ज्वारभाटे के मुड़ते हुए पानी से पन-बिजली पैदा की जा सकती है। इस बिजली का प्रयोग करने के लिए फ्रांस और अमेरिका में कई प्रयत्न किए गए हैं।
  5. ज्वारभाटे के कारण बहुत सी सिप्पियां, कोड़ियाँ, अन्य वस्तुएँ आदि तट पर इकट्ठी हो जाती है। कई समुद्री जीव तटों पर पकड़े जाते हैं।
  6. ज्वारभाटा बंदरगाहों की अयोग्यता को दूर करते हैं और आदर्श बंदरगाहों को जन्म देते हैं। कम गहरी बंदरगाहों में बड़े-बड़े जहाज़ ज्वार के साथ दाखिल हो जाते हैं और भाटे के साथ वापस लौट आते हैं, जैसे-कोलकाता, कराची, लंदन आदि।
  7. ज्वारभाटा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सरल, आसान और निरंतर रखता है।

हानियाँ (Disadvantages)-

  1. ज्वारभाटे से कभी-कभी जहाज़ों को नुकसान होता है। छोटे-छोटे जहाज़ और नाव डूब जाते हैं।
  2. इससे बंदरगाहों के निकट रेत जम जाने से जहाजों के आने-जाने में रुकावट आती है।
  3. ज्वारभाटे के कारण मिट्टी के बहाव के कारण डेल्टा नहीं बनते।
  4. मछली पकड़ने के काम में रुकावट होती है।
  5. ज्वार का पानी जमा होने से तट पर दलदल बन जाती है।

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Geography Guide for Class 11 PSEB महासागर Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न | (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
पृथ्वी के कितने % भाग पर जल है ?
उत्तर-
71%।

प्रश्न 2.
महाद्वीपीय शैल्फ तट की औसत गहराई बताएँ।
उत्तर-
150 से 200 मीटर।

प्रश्न 3.
विश्व में सबसे अधिक गहरे स्थान के बारे में बताएँ।
उत्तर-
मेरियाना खाई – 11022 मीटर।

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प्रश्न 4.
किस महासागर के मध्य में ‘S’ आकार की पहाड़ी है ?
उत्तर-
अंध महासागर।।

प्रश्न 5.
किस महासागर में सबसे अधिक खाइयाँ हैं ?
उत्तर-
प्रशांत महासागर।

प्रश्न 6.
जल में डूबी पहाड़ियों की कुल लंबाई बताएँ।
उत्तर-
7500 कि० मी०।

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प्रश्न 7.
किसी एक प्रसिद्ध केनीयन का नाम बताएँ।
उत्तर-
ओशनो ग्राफर केनीयन।

प्रश्न 8.
महाद्वीपीय ढलान का कोण बताएँ।
उत्तर-
2°-5° तक।

प्रश्न 9.
संसार के प्रमुख महासागरों के नाम बताएँ।
उत्तर-
प्रशांत महासागर, अंध महासागर, हिंद महासागर, आर्कटिक महासागर।

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प्रश्न 10.
पृथ्वी को जलीय ग्रह क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
अधिक जल होने के कारण।

प्रश्न 11.
किस गोलार्द्ध को जलीय गोलार्द्ध कहते हैं ?
उत्तर-
दक्षिणी गोलार्द्ध।

प्रश्न 12.
किस यंत्र से समुद्र की गहराई मापी जाती है ?
उत्तर-
Sonic Depth Recorder.

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प्रश्न 13.
महासागरीय जल के गर्म होने की क्रियाएं बताएँ।
उत्तर-
विकिरण और संवहन।

प्रश्न 14.
महासागरों में नमक के स्रोत बताएँ।
उत्तर-
नदियाँ, लहरें और ज्वालामुखी।

प्रश्न 15.
महासागरीय जल के प्रमुख लवणों के नाम बताएँ।
उत्तर-
सोडियम क्लोराइड, मैग्नीशियम क्लोराइड, मैग्नीशियम सल्फेट, कैल्शियम सल्फेट, पोटाशियम सल्फेट।

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प्रश्न 16.
तरंग के दो भाग बताएँ।
उत्तर-
शिखर और गहराई।

प्रश्न 17.
भूमध्य रेखा पर सागरीय जल का ताप बताएँ।
उत्तर-
भूमध्य रेखा – 26°

प्रश्न 18.
पलावी हिम शैल के दो स्रोत बताएँ।
उत्तर-
अलास्का और ग्रीन लैंड।

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प्रश्न 19.
घिरे हुए एक सागर का नाम और उसका खारापन बताएँ।
उत्तर-
ग्रेट साल्ट झील – 220 ग्राम प्रति हज़ार।

प्रश्न 20.
भूमध्य रेखा के निकट खारापन कम क्यों है ?
उत्तर-
अधिक वर्षा के कारण।

प्रश्न 21.
काले सागर में खारापन कम क्यों है ?
उत्तर-
नदियों से ताज़ा पानी प्राप्त होने के कारण।

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प्रश्न 22.
लाल सागर में खारापन अधिक क्यों है ?
उत्तर-
नदियों की कमी और अधिक वाष्पीकरण के कारण।

प्रश्न 23.
महासागरों में औसत खारापन बताएँ।
उत्तर-
35 ग्राम प्रति हज़ार।

प्रश्न 24.
महासागरीय जल की तीन गतियाँ बताएँ।
उत्तर-

  1. तरंगें
  2. धाराएँ
  3. ज्वारभाटा।

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प्रश्न 25.
ज्वारभाटा कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर-
लघु ज्वारभाटा और ऊँचा ज्वारभाटा।

प्रश्न 26.
तरंगों के तीन प्रमुख प्रकार बताएँ।
उत्तर-
सरफ, स्वैश और अध-प्रवाह।

प्रश्न 27.
ऊँचा ज्वारभाटा कब उत्पन्न होता है ?
उत्तर-
अमावस्या और पूर्णिमा को।

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प्रश्न 28.
लघु ज्वारभाटा कब होता है ?
उत्तर-
कृष्ण और शुक्ल अष्टमी को।

प्रश्न 29.
अंध-महासागर में सबसे प्रसिद्ध गर्म धारा बताएँ।
उत्तर-
खाड़ी की धारा।

प्रश्न 30.
ज्वारभाटा के उत्पन्न होने का प्रमुख कारण बताएँ।
उत्तर-
चंद्रमा की आकर्षण-शक्ति।

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प्रश्न 31.
सरफ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
तटीय क्षेत्रों की टूटती लहरों को।

प्रश्न 32.
ज्वार की सबसे अधिक ऊँचाई कहाँ होती है ?
उत्तर-
फंडे की खाड़ी में।

प्रश्न 33.
न्यूफाउंडलैंड के निकट कोहरा क्यों पैदा होता है ?
उत्तर-
लैबरेडोर की ठंडी और खाड़ी की धारा मिलने के कारण।

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प्रश्न 34.
प्रशांत महासागर की दो ठंडी धाराओं के नाम बताएँ।
उत्तर-
पेरु की धारा और कैलीफोर्निया की धारा।

प्रश्न 35.
कालाहारी मरुस्थल के तट पर कौन-सी धारा चलती है ?
उत्तर-
बैंगुएला की धारा।

प्रश्न 36.
दो ज्वारों के बीच समय का अंतर बताएँ।
उत्तर-
12 घंटे 26 मिनट।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

नोट-सही उत्तर चुनकर लिखें-

प्रश्न 1.
पृथ्वी का जल-मंडल कितने प्रतिशत है ?
(क) 51%
(ख) 61%
(ग) 71%
(घ) 81%.
उत्तर-
71%.

प्रश्न 2.
विश्व में सबसे गहरी खाई कौन-सी है ?
(क) पोरटोरिको
(ख) मेरियाना
(ग) सुंडा
(घ) एटाकामा।
उत्तर-
मेरियाना।

प्रश्न 3.
कौन-सा भाग महासागरीय तल का सबसे अधिक भाग घेरता है ?
(क) निमग्न तट
(ख) महाद्वीपीय फाल
(ग) महासागरीय मैदान
(घ) खाइयाँ।
उत्तर-
महाद्वीपीय मैदान।

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प्रश्न 4.
महाद्वीपीय निमग्न तट की औसत गहराई है-
(क) 100 फैदम
(ख) 500 फुट
(ग) 300 मीटर
(घ) 400 मीटर।
उत्तर-
100 फैदम।

प्रश्न 5.
विश्व में सबसे छोटा महासागर कौन-सा है ?
(क) हिंद महासागर
(ख) अंध महासागर
(ग) आर्कटिक महासागर
(घ) प्रशांत महासागर।
उत्तर-
आर्कटिक महासागर ।

प्रश्न 6.
महासागरों में खारेपन को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक है-
(क) धाराएँ
(ख) पवनें
(ग) वाष्पीकरण
(घ) जल-मिश्रण।
उत्तर-
वाष्पीकरण।

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प्रश्न 7.
विश्व में औसत खारापन है-
(क) 35 ग्राम प्रति हज़ार
(ख) 210 ग्राम प्रति हज़ार
(ग) 16 ग्राम प्रति हज़ार
(घ) 112 ग्राम प्रति हज़ार।
उत्तर-
35 ग्राम प्रति हज़ार।

प्रश्न 8.
किस सागर में सबसे अधिक खारापन है ?
(क) लाल सागर
(ख) बाल्टिक सागर
(ग) मृत सागर
(घ) भूमध्य सागर।
उत्तर-
मृत सागर।

प्रश्न 9.
काले सागर में औसत खारापन है-
(क) 170 ग्राम प्रति हज़ार
(ख) 18 ग्राम प्रति हज़ार
(ग) 40 ग्राम प्रति हज़ार
(घ) 330 ग्राम प्रति हजार।
उत्तर-
18 ग्राम प्रति हजार

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित में प्रशांत महासागर की धारा बताएँ।
(क) मैडगास्कर की धारा
(ख) खाड़ी की धारा
(ग) क्यूरोशियो की धारा
(घ) लैबरेडोर की धारा।
उत्तर-
क्यूरोशियो की धारा।

प्रश्न 11.
महासागरीय धाराओं का प्रमुख कारण है-
(क) पवनें
(ख) जल के घनत्व में अंतर
(ग) पृथ्वी की दैनिक गति
(घ) स्थल खंडों की रुकावट।
उत्तर-
पवनें।

प्रश्न 12.
लघु ज्वार कब होता है ?
(क) पूर्णिमा
(ख) अमावस्या
(ग) अष्टमी
(घ) पूर्ण चंद्रमा।
उत्तर-
अष्टमी।

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प्रश्न 13.
अंध महासागर की गर्म धारा है।
(क) खाड़ी की धारा
(ख) कनेरी की धारा
(ग) लैबरेडोर की धारा
(घ) अंटार्कटिका की धारा।
उत्तर-
खाड़ी की धारा।

प्रश्न 14.
कालाहारी मरुस्थल के तट पर बहने वाली धारा है-
(क) खाड़ी की धारा
(ख) बैंगुएला की धारा
(ग) मानसून की धारा ।
(घ) लैबरेडोर की धारा।
उत्तर-
बैंगुएला की धारा।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
जलमंडल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पृथ्वी के तल पर पानी के नीचे डूबे हुए भाग को जलमंडल (Hydrosphere) कहते हैं। जलमंडल के अधीन महासागर, सागर, खाड़ी, झील आदि सब आ जाते हैं।

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प्रश्न 2.
जलमंडल का विस्तार बताएँ।
उत्तर-
प्रसिद्ध भूगोल वैज्ञानिक क्रुम्मेल (Krummel) के अनुसार जलमंडल का विस्तार पृथ्वी के 71% भाग पर है। जलमंडल लगभग 3626 लाख वर्ग किलोमीटर पर फैला हुआ है।

प्रश्न 3.
जलीय गोलार्द्ध (Water Hemisphere) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
उत्तरी गोलार्द्ध में 40% जल और 60% थल भाग हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में 81% जल और 19% थल भाग हैं।
दक्षिणी गोलार्द्ध में जल अधिक होने के कारण यह जलीय गोलार्द्ध कहलाता है। उत्तरी गोलार्द्ध को थल गोलार्द्ध (Land Hemisphere) कहा जाता है।

प्रश्न 4.
विश्व के प्रसिद्ध चार महासागरों के नाम और उनके क्षेत्रफल बताएँ।
उत्तर-

  1. प्रशांत महासागर – 1654 लाख वर्ग कि०मी०
  2. अंध महासागर – 822 लाख वर्ग कि०मी०
  3. हिंद महासागर – 735 लाख वर्ग कि०मी० .
  4. आर्कटिक महासागर – 141 लाख वर्ग कि०मी०

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प्रश्न 5.
महासागरीय फ़र्श को कितने मुख्य भागों में बाँटा जाता है ?
उत्तर-
महासागरीय फ़र्श को चार मुख्य भागों में बाँटा जाता है-

  1. महाद्वीपीय शैल्फ (Continental Shelf)
  2. महाद्वीपीय missing (Continental Slope)
  3. महाद्वीपीय मैदान (Deep Sea Plain)
  4. समुद्री गहराई (Ocean Deeps)

प्रश्न 6.
महासागरीय फ़र्श पर सबसे अधिक मिलने वाली भू-आकृतियों के नाम लिखें।
उत्तर-

  • समुद्री उभार (Ridges)
  • पहाड़ियाँ (Hills)
  • समुद्री टीले (Sea Mounts)
  • डूबे हुए द्वीप (Guyots)
  • खाइयाँ (Trenches)
  • कैनियान (Canyons)
  •  प्रवाह भित्तियाँ (Coral Reefs)।

प्रश्न 7.
पृथ्वी को जल ग्रह और नीला ग्रह क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
पृथ्वी के तल पर 71% भाग पर जलमंडल का विस्तार है, इसलिए इसे जल ग्रह (Watery Planet) कहते हैं। इस कारण अंतरिक्ष से पृथ्वी का रंग नीला दिखाई देता है और इसे नीला ग्रह (Blue Planet) कहते हैं।

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प्रश्न 8.
प्रति-ध्रुवीय स्थिति (Anti-Podal) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
इसका अर्थ है कि पृथ्वी पर जल और स्थल एक-दूसरे के विपरीत स्थित हैं। यदि पृथ्वी के केंद्र से कोई व्यास खींचा जाए तो उसके एक सिरे पर जल और दूसरे सिरे पर स्थल होगा। यह स्थिति Diametrically Opposite होगी।

प्रश्न 9.
पृथ्वी पर सबसे बड़ा महासागर कौन-सा है और उसका क्षेत्रफल कितना है ?
उत्तर–
प्रशांत महासागर पृथ्वी का सबसे बड़ा महासागर है, जिसका क्षेत्रफल 1654 लाख वर्ग किलोमीटर है।

प्रश्न 10.
महासागरों की गहराई किस यंत्र से मापी जाती है ?
उत्तर-
महासागरों की गहराई Sound Waves का प्रयोग करके Sonic Depth Recorder नामक यंत्र के द्वारा मापी जाती है।

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प्रश्न 11.
पृथ्वी के सबसे ऊँचे भाग और महासागरों के सबसे गहरे भाग में कितना अंतर है ?
उत्तर-
पृथ्वी के सबसे ऊँचे भाग मांऊट एवरेस्ट की ऊँचाई 8848 मीटर है और सबसे गहरे भाग मेरियाना खाई की गहराई 11033 मीटर है और दोनों में अंतर 19881 मीटर है। यदि एवरेस्ट शिखर को मेरियाना खाई में डुबो दिया जाए, तो इसके शिखर पर 2185 मीटर गहरा पानी होगा।

प्रश्न 12.
महाद्वीपीय शैल्फ (Continental Shelf) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
महाद्वीपों के चारों ओर के मंद ढलान वाले, समुद्री हिस्से को महाद्वीपीय शैल्फ कहा जाता है। यह क्षेत्र जल में डूबा रहता है।

प्रश्न 13.
महाद्वीपीय शैल्फ की औसत गहराई और विस्तार बताएँ।
उत्तर-
महाद्वीपीय शैल्फ की औसत गहराई 100 फैदम (Fathom) या 183 मीटर मानी जाती है। महासागरों के 7.6% भाग (360 लाख वर्ग कि०मी०) पर इसका विस्तार है। सबसे अधिक विस्तार अंध महासागर में 13.3% क्षेत्र पर है।

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प्रश्न 14.
महाद्वीपीय ढलान (Continental Slope) की परिभाषा दें।
उत्तर-
महाद्वीपीय शैल्फ से आगे गहरे समुद्री भाग तक तीखी ढलान को महाद्वीपीय ढलान कहते हैं। इसकी औसत ढलान 2° से 5° तक होती है और इसकी गहराई 200 मीटर से 3660 मीटर तक होती है। इसका सबसे अधिक विस्तार अंध महासागर के 12.4% भाग पर है।

प्रश्न 15.
महाद्वीपीय शैल्फ की रचना की विधियाँ बताएँ।
उत्तर-

  • जल सतह के ऊपर उठने या थल सतह के धंसने से।
  • अपरदन से।
  • तटों पर निक्षेप से।

प्रश्न 16.
विश्व में सबसे गहरी खाई कौन-सी है ?
उत्तर-
अंधमहासागर में गुयाम द्वीप के निकट मेरियाना खाई (11033 मीटर गहरी) सबसे गहरी खाई है।

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प्रश्न 17.
समुद्री खाई और कैनियन में क्या अंतर है ?
उत्तर-
महासागरीय फ़र्श पर गहरे मैदान में बहुत गहरी, तंग, लंबी और तीखी ढलान वाली गहराई को खाई (Trench) कहते हैं। परंतु महाद्वीपीय शैल्फ और ढलान पर तीखी ढलान वाली गहरी घाटियों और खाइयों को समुद्री कैनियन (Canyons) कहते हैं।

प्रश्न 18.
प्रशांत महासागर की तीन खाइयों के नाम बताएँ।
उत्तर-

  • चैलंजर खाई
  • होराइज़न खाई
  • ऐमडन खाई।

प्रश्न 19.
विश्व में कुल कितनी खाइयाँ हैं ? सबसे अधिक खाइयाँ किस महासागर में हैं ?
उत्तर-
विश्व में सभी महासागरों में 57 खाइयाँ हैं। सबसे अधिक खाइयाँ प्रशांत महासागर में हैं।

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प्रश्न 20.
प्रशांत महासागर की उत्पत्ति के बारे में बताएँ।
उत्तर-
एक विचार के अनुसार पृथ्वी से चंद्रमा के अलग होने के बाद बने गर्त से प्रशांत महासागर बना है। दूसरे विचार के अनुसार एक विशाल भू-खंड के धंस जाने से यह महासागर बना है।

प्रश्न 21.
मध्यवर्ती अंध महासागरीय कटक का वर्णन करें।
उत्तर-
यह ‘S’ आकार की कटक 14400 कि०मी० लंबी है और अंध-महासागर के मध्य में उत्तर में आइसलैंड से लेकर दक्षिण में बोविट टापू तक फैली हुई है और औसत रूप में 4000 मीटर गहरी है।

प्रश्न 22.
अंध महासागर की तीन प्रसिद्ध कटकोम के नाम बताएँ
उत्तर-

  1. डॉल्फिन कटक
  2. चैलंजर कटक
  3. वैलविस कटक
  4. रियो ग्रांड कटक
  5. विवल टामसन कटक।

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प्रश्न 23.
हिंद महासागर का क्षेत्रफल और आकार बताएँ।
उत्तर-
हिंद महासागर का कुल क्षेत्रफल लगभग 735 लाख वर्ग किलोमीटर है, जोकि जल-मंडल का 20% भाग है। यह त्रिकोण आकार का महासागर उत्तर में बंद है और स्थल-खंड से घिरा हुआ है।

प्रश्न 24.
हिंद महासागर को आधा-महासागर (Half Ocean) क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
हिंद महासागर का विस्तार केवल कर्क रेखा तक है और उत्तर में यह स्थल-खंड से बंद है। यह केवल दक्षिणी गोलार्द्ध में ही पूरी तरह फैला हुआ है, इसलिए इसे आधा महासागर कहते हैं।

प्रश्न 25.
हिंद महासागर का सबसे गहरा स्थान बताएँ।
उत्तर-
हिंद महासागर में सुंडा खाई (Sunda Trench) सबसे गहरा स्थान है, जो 7450 मीटर गहरा है और इंडोनेशिया के निकट स्थित है।

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प्रश्न 26.
महासागरों के तापमान के विभाजन पर कौन-से कारक प्रभाव डालते हैं ?
उत्तर-

  • भूमध्य रेखा से दूरी
  • प्रचलित पवनें और धाराएँ
  • थल खंडों का प्रभाव
  • हिम खंडों का बहाव।

प्रश्न 27.
उत्तरी सागर का तापमान ऊँचा क्यों रहता है ?
उत्तर-
खाड़ी की गर्म धारा के कारण।

प्रश्न 28.
लाल सागर और खाड़ी फारस के जल का तापमान बताएँ।
उत्तर-
खाड़ी फारस के जल का तापमान 34°C और लाल सागर के जल का तापमान 32°C रहता है।

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प्रश्न 29.
1° अक्षांश पर महासागरों के जल के तापमान के कम होने की क्या दर है ?
उत्तर-
1° अक्षांश पर 0.3°C तापमान कम होता है।

प्रश्न 30.
महासागरों के तापमान का कटिबंधों के अनुसार विभाजन बताएँ।
उत्तर-

  • उष्ण कटिबंध में उच्च तापमान (27°C)
  • शीतोष्ण कटिबंध में मध्यम तापमान (15°C)
  • ध्रुवीय कटिबंध में निम्न तापमान (0°C)

प्रश्न 31.
महासागरों में सूर्य की किरणों का प्रभाव कितनी गहराई तक होता है ?
उत्तर-
लगभग 183 मीटर तक।

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प्रश्न 32.
तीन महासागरों की सतह के जल का तापमान बताएँ।
उत्तर-

  • प्रशांत महासागर – 19.1°C
  • हिंद महासागर – 17.03°C
  • अंध महासागर-16.9°C

प्रश्न 33.
4000 मीटर की गहराई पर महासागरों का तापमान कितना होता है ?
उत्तर-
1.7°C.

प्रश्न 34.
हिंद महासागर और लाल सागर की 2400 मीटर की गहराई पर पानी के तापमान में बहुत अंतर क्यों है ?
उत्तर-
इन दोनों सागरों में बॉब० एल० मंदेब (Bob-el Mandeb) नाम के कटक पानी के मिलने में रुकावट डालते हैं। हिंद महासागर की गहराई पर 15°C तापमान है जबकि लाल सागर में 21°C है।

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प्रश्न 35.
महासागरों के खारेपन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
महासागरीय जल का खारापन वह अनुपात है, जो घुले हुए नमक की मात्रा और सागरीय जल की मात्रा में होता है।

प्रश्न 36.
महासागरीय खारेपन के स्रोत बताएँ।
उत्तर-

  • नदियाँ
  • लहरें
  • ज्वालामुखी।

प्रश्न 37.
महासागरीय जल में से नमक हटा लेने से क्या प्रभाव होगा ?
उत्तर-

  • महासागरीय जल के नमक को यदि भू-तल पर बिछा दिया जाए, तो भू-तल पर 55 मीटर की परत बिछ जाएगी।
  • समुद्र तल लगभग 30 मीटर नीचा हो जाएगा।

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प्रश्न 38.
महासागरीय जल का औसत खारापन कितना है ?
उत्तर-
महासागरीय जल का औसत खारापन 35 ग्राम नमक प्रति 1000 ग्राम जल है और इसे 35% के रूप में प्रकट किया जाता है।

प्रश्न 39.
महासागरीय जल के पाँच प्रसिद्ध लवण (नमक) और उनकी मात्रा बताएँ।
उत्तर-

  1. सोडियम क्लोराइड – 77.8%
  2. मैग्नीशियम क्लोराइड – 10.9%
  3. मैग्नीशियम सल्फेट – 4.7%
  4. कैल्शियम सल्फेट – 3.6%
  5. पोटाशियम सल्फेट – 2.5%

प्रश्न 40.
महासागरीय जल के खारेपन को नियंत्रित करने वाले तीन कारक बताएँ।
उत्तर-

  • तजें जल की प्रपत्ति वर्षा ओर नदियों से
  • वाष्पीकरण की तीव्रता और मात्रा।
  • पवनों और धाराओं द्वारा पानी की मिश्रण क्रिया।

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प्रश्न 41.
पानी के उत्थान (Upwelling of Water) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जिस प्रदेश से प्रचलित पवनें पानी बहाकर ले जाती हैं, उस स्थान पर नीचे से पानी की गहरी सतह ऊपर आ जाती है। इस क्रिया को पानी का उत्थान कहते हैं।

प्रश्न 42.
कर्क रेखा और मकर रेखा पर अधिक खारेपन के तीन कारण बताएँ।
उत्तर-

  • बादल रहित आकाश के कारण तीव्र वाष्पीकरण।
  • उच्च वायुदाब पेटियों के कारण वर्षा की कमी।
  • बड़ी नदियों का न होना।

प्रश्न 43.
भूमध्य रेखीय खंड में खारापन कम क्यों है ?
उत्तर-

  • हर रोज़ तेज़ वर्षा होने के कारण।
  • बड़ी-बड़ी नदियों (अमेज़न आदि) के कारण ताज़े जल की प्राप्ति।

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प्रश्न 44.
ध्रुवीय प्रदेशों में न्यूनतम खारेपन का कारण बताएँ।
उत्तर-

  • सूर्य का ताप कम है और वाष्पीकरण कम है।
  • हिम पिघलने से ताज़े जल की प्राप्ति।
  • विशाल नदियों से ताज़े जल की प्राप्ति।

प्रश्न 45.
भूमध्य सागर और लाल सागर में उच्च खारापन क्यों हैं ?
उत्तर-
भूमध्य सागर (39%) और लाल सागर (41%) में अधिक खारेपन का मुख्य कारण निकट के मरुस्थलों के कारण तीव्र वाष्पीकरण है। बड़ी नदियों की कमी के कारण ताज़े जल की प्राप्ति कम है।

प्रश्न 46.
काला सागर और बाल्टिक सागर में खारापन कम क्यों है ? .
उत्तर-
काला सागर (18%) और बाल्टिक सागर (8%) में कम खारेपन का मुख्य कारण इन शीत प्रदेशों में वाष्पीकरण की कमी है। अधिक वर्षा, हिम के पिघलने और बड़ी नदियों से ताज़े जल की पर्याप्त प्राप्ति है।

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प्रश्न 47.
मृत सागर कहाँ स्थित है और इसमें बहुत ऊँचा खारापन क्यों है ?
उत्तर-
मृत सागर पश्चिमी एशिया में इज़रायल और जॉर्डन देशों की सीमा पर स्थित है। इस पूर्ण बंद सागर में 237% खारापन है। आस-पास के शुष्क मरुस्थलों के कारण वाष्पीकरण तेज़ होता है, वर्षा नहीं होती, यह एक अंदरूनी प्रवाह वाला सागर है और कोई भी नदी इससे बाहर नहीं बहती।

प्रश्न 48.
किन्हीं तीन घिरे हुए बंद सागरों और झीलों के नाम और खारापन बताएँ।
उत्तर-

  • मृत सागर – 237.5%
  • ग्रेट साल्ट लेक – 220%
  • वान झील – 330%.

प्रश्न 49.
महासागर के जल की कौन-सी विभिन्न गतियाँ हैं ?
उत्तर-
महासागर के जल की तीन प्रकार की गतियाँ हैं-

  • लहरें
  • धाराएँ
  • ज्वारभाटा।

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प्रश्न 50.
समुद्री लहरें क्या होती हैं ?
उत्तर-
महासागरों में जल के ऊपर उठने और नीचे आने की गति (हलचल) को लहर कहा जाता है।

प्रश्न 51.
लहर के दो प्रमुख भाग बताएँ।
उत्तर-
लहर में जल के ऊपर उठे हुए भाग को शिखर (Crest) और निचले भाग को गर्त (Trough) कहते हैं।

प्रश्न 52.
लहर की लंबाई की परिभाषा लिखें।
उत्तर-
लहर के एक शिखर से दूसरे शिखर तक की दूरी को लहर की लंबाई कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

प्रश्न 53.
लहर की गति का नियम क्या है ?
उत्तर-
PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर 11

प्रश्न 54.
महासागरीय लहरों की प्रमुख किस्में बताएँ।
उत्तर-

  1. सी (sea)
  2. स्वैल (Swell)
  3. सर्फ (Surf)।

प्रश्न 55.
स्वॉश (Swash) और बैकवॉश (Backwash) में क्या अंतर है ?
उत्तर-
लहर का जल जब तट पर प्रवाह करता है, तो उसे स्वॉश कहते हैं। तट से लौटते हुए जल को उल्ट प्रवाह या बैकवॉश (Backwash) कहते हैं।

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प्रश्न 56.
सागरीय धारा की परिभाषा दें।
उत्तर-
समुद्र के एक भाग से दूसरे भाग की ओर, एक निश्चित दिशा में, विशाल जल-राशि के लगातार प्रवाह को सागरीय धारा कहते हैं।

प्रश्न 57.
ड्रिफ्ट और धारा में क्या अंतर है ?
उत्तर-
जब पवनों के वेग से, सागर तल पर जल धीमी गति से आगे बढ़ता है, तो उसे ड्रिफ्ट कहते हैं, जैसेमानसून ड्रिफ्ट। जब सागरीय जल तेज़ गति से आगे बढ़ता है तो उसे धारा कहते हैं।

प्रश्न 58.
धाराओं की उत्पत्ति के तीन प्रमुख कारण बताएँ।
उत्तर-

  • प्रचलित पवनें
  • तापमान और खारेपन में विभिन्नता
  • पृथ्वी की दैनिक गति।

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प्रश्न 59.
उत्तरी हिंद महासागर में धाराएँ सर्दी और गर्मी में अपनी दिशा क्यों बदल लेती हैं ?
उत्तर-
यहाँ गर्मियों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनें चलती हैं, परंतु सर्दियों में उत्तर-पूर्वी मानसून पवनें चलती हैं। पवनों की दिशा बदलने से धाराएँ भी अपनी दिशा बदल लेती हैं।

प्रश्न 60.
धाराओं के संबंध में फैरल के सिद्धान्त का उल्लेख करें।
उत्तर-
फैरल के सिद्धान्त के अनुसार धाराएँ उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं।

प्रश्न 61.
महासागरों में भूमध्य रेखीय विपरीत धारा का क्या कारण है ?
उत्तर-
भूमध्य रेखा पर अपकेंद्रीय बल अधिक होने के कारण जल पृथ्वी की परिभ्रमण दिशा के साथ-साथ पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बहता है।

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प्रश्न 62.
तीनों महासागरों की सांझी धारा कौन-सी है ?
उत्तर–
तीनों महासागरों में निर्विघ्न विस्तार के कारण जल की लगातार एक सांझी धारा बहती है, जिसे पश्चिमी पवन प्रवाह कहते हैं।

प्रश्न 63.
पश्चिमी यूरोप पर गल्फ स्ट्रीम के कोई दो प्रभाव बताएँ।
उत्तर-

  • पश्चिमी यूरोप में सर्दी की ऋतु में तापमान साधारण से 50°C ऊँचा रहता है।
  • पश्चिमी यूरोप की बंदरगाहें सारा साल व्यापार के लिए खुली रहती हैं।

प्रश्न 64.
नीचे लिखी धाराओं के कारण कौन-कौन से मरुस्थल बनते हैं
(i) कनेरी की धारा
(ii) पेरु की धारा
(iii) बैंगुएला की धारा।
उत्तर-
(i) कनेरी की धारा – सहारा मरुस्थल
(ii) पेरु की धारा – ऐटेकामा मरुस्थल
(iii) बैंगुएला की धारा – कालाहारी मरुस्थल।

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प्रश्न 65.
हिम शैलों (खंडों) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जल में तैरते हुए हिम खंडों के बड़े-बड़े टुकड़ों को हिम शैल कहते हैं। इनका 1/10 भाग ही जल की सतह के ऊपर रहता है।

प्रश्न 66.
हिम शैलों के किन्हीं दो प्रदेशों के नाम बताएँ।
उत्तर-
अलास्का और ग्रीनलैंड।

प्रश्न 67.
अंध महासागर की कौन-सी दो धाराएँ न्यूफाऊंडलैंड के निकट आपस में मिलती हैं ?
उत्तर-
लैबरेडोर की ठंडी धारा और खाड़ी की गर्म धारा।

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प्रश्न 68.
ज्वारभाटा की परिभाषा दें।
उत्तर-
सागरीय जल के नियमित उतार-चढ़ाव को ज्वारभाटा कहते हैं। पानी के ऊपर उठने को ज्वार और पानी के नीचे उतरने की क्रिया को भाटा कहते हैं।

प्रश्न 69.
विश्व में सबसे ऊँचा ज्वार कहाँ आता है ?
उत्तर-
दक्षिण-पूर्वी कनाडा की फंडे की खाड़ी (Bay of Funday) में 22 मीटर ऊँचा ज्वार आता है।

प्रश्न 70.
ज्वारभाटे की उत्पत्ति का प्रमुख कारण क्या है ?
उत्तर–
ज्वारभाटे की उत्पत्ति का प्रमुख कारण चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति है।

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प्रश्न 71.
ऊँचा ज्वार और लघु ज्वार में क्या अंतर है ?
उत्तर-
जब सूर्य, चाँद और धरती एक सीधी रेखा में होते हैं, तो सबसे अधिक ऊँचे ज्वार को ऊँचा ज्वार कहते हैं। जब सूर्य और चाँद धरती से समकोण की स्थिति में होते हैं, तो कम ऊँचे ज्वार को लघु ज्वार कहते हैं।

प्रश्न 72.
लघु ज्वार और ऊँचा ज्वार किन तिथियों को आते हैं ?
उत्तर-
ऊँचा ज्वार अमावस्या और पूर्णिमा को आते हैं, जबकि लघु ज्वार अष्टमी वाले दिनों में आते हैं।

प्रश्न 73.
दो बंदरगाहों के नाम बताएँ, जहाँ जहाज़ ज्वारभाटा की मदद से प्रवेश करते हैं ?
उत्तर-
कोलकाता और कराची।

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प्रश्न 74.
किसी स्थान पर ज्वार हर दिन 52 मिनट देरी से क्यों आता है ?
उत्तर-
चाँद पृथ्वी के सामने 24 घंटे बाद पहले स्थान पर नहीं आता, बल्कि 13° के कोण में आगे बढ़ जाता है। इसलिए किसी स्थान को चाँद के सामने आने के लिए 13° x 4 = 52 मिनट का अधिक समय लगता है।

प्रश्न 75.
ज्वार की दीवार से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब ज्वार का जल नदी में प्रवेश कर जाता है, तो वह जल की विपरीत दिशा में बहता है। ज्वार की लहर की ऊँचाई बढ़ जाती है। इसे ज्वार की दीवार कहते हैं।

प्रश्न 76.
किन नदियों में ज्वार की दीवार बनती है ?
उत्तर-
हुगली नदी, अमेज़न नदी, हडसन नदी।

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लघु उत्तरात्मक प्रश्न । (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
मनुष्य के लिए महासागरों की महत्ता का वर्णन करें।
उत्तर-
महासागरों की महत्ता (Significance of Oceans)—महासागर अनेक प्रकार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के लिए उपयोगी हैं-

  1. महासागर जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालते हैं।
  2. महासागर मनुष्यों के लिए मछलियों और खाद्य-पदार्थों के विशाल भंडार हैं।
  3. समुद्री जंतुओं से तेल, चमड़ा आदि कई उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
  4. महासागरों के कम गहरे क्षेत्रों में तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार हैं और वहाँ कई खनिज भी मिलते हैं।
  5. महासागरों में ज्वारीय और भू-तापीय ऊर्जा पैदा की जा सकती है।
  6. महासागर आवाजाही के महत्त्वपूर्ण, सस्ते और प्राकृतिक स्रोत हैं।

प्रश्न 2.
“महासागर भविष्य के भंडार हैं।” कथन की व्याख्या करें।
उत्तर-
महासागर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से धरती पर नमी, वर्षा, तापमान आदि पर प्रभाव डालते हैं। महासागर बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्य-पदार्थों के विशाल स्रोत हैं। मछलियाँ मानवीय भोजन का 10% भाग प्रदान करती हैं। मनुष्य कई प्रकार के उपयोगी पदार्थों के लिए महासागरों पर निर्भर करता है। खनिज तेल के 20% भंडार महासागर में मौजूद हैं। कई देशों में ऊर्जा संकट पर नियंत्रण करने के लिए महासागर से ज्वारीय और भू-तापीय ऊर्जा प्राप्त की जाती है। इस प्रकार भविष्य में मनुष्य की बढ़ती हुई माँगों की पूर्ति महासागरों से ही की जा सकेगी, इसीलिए महासागरों को भविष्य के भंडार कहा जाता है।

प्रश्न 3.
महाद्वीपीय शैल्फ और महाद्वीपीय ढलान में अंतर बताएँ।
उत्तर-
महाद्वीपीय शैल्फ (Continental Shelf)-

  1. महाद्वीपों के चारों ओर पानी के नीचे डूबे चबूतरों को महाद्वीपीय शैल्फ कहते हैं।
  2. इसकी औसत गहराई 200 मीटर (100 फैदम) होती है।
  3. सभी महासागरों के 7.5% भाग पर इसका विस्तार है।
  4. इसकी औसत ढलान 1° से कम है।
  5. मछली क्षेत्रों और पैट्रोलियम के कारण इसकी आर्थिक महत्ता है।

महाद्वीपीय ढलान (Continental Slope)-

  1. महाद्वीपीय शैल्फ से महासागर के ओर की ढलान को महाद्वीपीय ढलान कहते हैं।
  2. इसकी औसत गहराई 200 मीटर से 3000 मीटर तक होती है।
  3. सभी महासागरों के 8.5% भाग पर इसका विस्तार है।
  4. इसकी औसत ढलान 2° से 5° तक है।
  5. इस पर अनेक समुद्री कैनियन मिलती हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

प्रश्न 4.
समुद्री पर्वत और डूबे हुए द्वीप में अंतर बताएँ।
उत्तर-
समुद्री पर्वत (Sea Mounts)-

  1. यह एक प्रकार की समुद्री पहाड़ी होती है।
  2. यह समुद्र तल से 1000 मीटर ऊँचे होते हैं।
  3. इनकी चोटियाँ नुकीली होती हैं।

डूबे हुए द्वीप (Guyots)-

  1. ये ज्वालामुखी चोटियों के बचे-खुचे भाग होते हैं।
  2. ये समुद्री द्वीप कम ऊँचे होते हैं।
  3. इनकी चोटियाँ कटाव के कारण चौकोर होती

प्रश्न 5.
समुद्री खाई और समुद्री कैनियन में अंतर बताएँ।
उत्तर –
समुद्री खाई (Sub-marine Trench)-

  1. ये समुद्र के गहरे भागों में मिलती हैं।
  2. ये लंबी, गहरी और तंग खाइयाँ होती हैं।
  3. ये मोड़दार पर्वतों के साथ पाई जाती हैं।
  4. मेरियाना खाई सबसे गहरी खाई है, जोकि 11 किलोमीटर गहरी है।

समुद्री कैनियन (Sub-marine Canyon)-

  1. ये महाद्वीपीय शैल्फ और ढलानों पर मिलती हैं।
  2. ये तंग और गहरी ‘V’ आकार की घाटियाँ होती हैं।
  3. ये समुद्री तटों और नदियों के मुहानों पर पाई जाती हैं।
  4. बैरिंग कैनियन विश्व में सबसे बड़ी कैनियन है, जोकि 400 किलोमीटर लंबी है।

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प्रश्न 6.
धरती पर महासागरों को जलवायु के महान् नियंत्रक क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
महासागर जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालते हैं, इसलिए इन्हें जलवायु के प्रमुख नियंत्रक कहा जाता है।

  • महासागर धरती पर नमी, वर्षा और तापमान के विभाजन पर प्रभाव डालते हैं।
  • महासागर सूर्य की ऊर्जा के भंडार हैं।
  • महासागरों के कारण तटीय भागों में समकारी जलवायु पाई जाती है।
  • समुद्री धाराएँ अपने निकट के तटीय प्रदेशों के तापमान को समकारी बनाती हैं।

प्रश्न 7.
झीलों और आंतरिक सागरों में खारेपन के विभाजन के बारे में बताएँ।
उत्तर-
झीलों और आंतरिक सागरों में खारापन (Salinity in Lakes and Inland Seas)-झीलों और आंतरिक सागरों में खारेपन की मात्रा इनमें गिरने वाली नदियों, वाष्पीकरण की मात्रा और स्थिति के कारण भिन्न-भिन्न है। झीलों में नदियों के गिरने से ताज़ा जल अधिक हो जाता है और खारेपन की मात्रा कम हो जाती है। अधिक तापमान से वाष्पीकरण अधिक होता है, जिससे खारापन बढ़ जाता है। कैस्पियन सागर के उत्तरी भाग में खारापन 14 ग्राम प्रति हज़ार ग्राम जल है, परंतु दक्षिणी भाग में यह मात्रा 170 ग्राम प्रति हजार ग्राम जल है। संयुक्त राज्य अमेरिका की साल्ट झील में खारापन 220 ग्राम प्रति हज़ार है। जॉर्डन में मृत सागर (Dead Sea) में खारापन 238 ग्राम प्रति हज़ार है। तुर्की की वैन झील (Van Lake) में खारेपन की मात्रा 330 ग्राम प्रति हज़ार है। यहाँ अधिक वाष्पीकरण और नदियों की कमी के कारण खारापन अधिक है।

प्रश्न 8.
सागरीय जल के खारेपन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
समुद्र के जल का स्वाद खारा होता है। यह खारापन कई स्थानों पर अधिक और कई स्थानों पर कम होता है। समुद्र के जल में खारापन पैदा करने में नदियों का योगदान होता है। नदियों के पानी में कई तरह के नमक घुले होते हैं, जिन्हें नदियाँ अपने साथ समुद्रों में ले जाती हैं। इन नमक युक्त पदार्थों को ही खारेपन का नाम दिया जाता है। अनुमान है कि विश्व की सभी नदियाँ हर वर्ष 5 अरब 40 करोड़ टन नमक समुद्रों में ले जाती हैं। समुद्रों का औसत खारापन 35% होता है, परंतु सभी समुद्रों में यह एक समान नहीं होता। कहीं बहुत अधिक और कहीं बहुत कम होता है।

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प्रश्न 9.
झीलों और आंतरिक सागरों में खारेपन का विभाजन बताएँ।
उत्तर-
झीलों और आंतरिक सागरों (Lakes and Inland Seas) में खारापन झीलों और आंतरिक सागरों में खारेपन की मात्रा इन में गिरने वाली नदियों, वाष्पीकरण की मात्रा और स्थिति के कारण भिन्न-भिन्न होती है। झीलों में नदियों के गिरने से ताज़ा जल अधिक हो जाता है और खारेपन की मात्रा कम हो जाती है। अधिक तापमान के कारण वाष्पीकरण अधिक होता है, जिससे खारापन अधिक हो जाता है। कैस्पियन सागर के उत्तरी भाग में खारापन 14 ग्राम प्रति हज़ार है, परंतु दक्षिणी भाग में यह मात्रा 170 ग्राम प्रति हज़ार है। संयुक्त राज्य अमेरिका की साल्ट झील में खारापन 220 प्रति हज़ार है। जार्डन में मृत सागर (Dead Sea) में खारापन 238 ग्राम प्रति हज़ार है। तुर्की की वैन झील (Van Lake) में खारेपन की मात्रा 330 ग्राम प्रति हज़ार है। यहाँ अधिक खारापन अधिक वाष्पीकरण और नदियों की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 10.
अलग-अलग सागरों के खारेपन की मात्रा पर वाष्पीकरण का क्या प्रभाव है ?
उत्तर-
जिन महासागरों में वाष्पीकरण अधिक होगा, उनका जल अधिक खारा होगा। ऐसा इसलिए होता है कि वाष्पीकरण की क्रिया द्वारा सागरीय जल वाष्प बनकर उड़ जाता है और बाकी बचे जल में खारेपन की मात्रा अधिक हो जाती है। अधिक तापमान, वायु की तीव्रता और शुष्कता के कारण सागरों का खारापन बढ़ जाता है। कर्क रेखा और मकर रेखा के निकट अधिक वाष्पीकरण के कारण खारापन अधिक होता है। कम तापमान और कम वाष्पीकरण के कारण खारापन कम हो जाता है।

प्रश्न 11.
महासागरीय धाराओं की प्रमुख विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-

  1. धाराएँ लगातार एक निश्चित दिशा में बहती हैं।
  2. गर्म धाराएँ निचले अक्षांशों से ऊँचे अक्षांशों की ओर बहती हैं।
  3. ठंडी धाराएँ ऊँचे अक्षांशों से निचले अक्षांशों की ओर बहती हैं।
  4. उत्तरी गोलार्द्ध में धाराएँ अपनी दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं।
  5. निचले अक्षांशों में पूर्वी तटों पर गर्म धाराएँ और पश्चिमी तटों पर ठंडी धाराएँ बहती हैं।
  6. उच्च अक्षांशों में पश्चिमी तटों पर गर्म धाराएँ और पूर्वी तटों पर ठंडी धाराएँ बहती हैं।

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प्रश्न 12.
हुगली नदी में जहाज़ चलाने के लिए ज्वारभाटे की महत्ता बताएँ।
उत्तर-
हुगली नदी में ज्वारभाटे की विशेष महत्ता है। कोलकाता बंदरगाह एक कम गहरी और कृत्रिम बंदरगाह है। जब ज्वार के समय पानी ऊपर होता है, तो कोलकाता की कम गहरी बंदरगाह में बड़े-बड़े जहाज़ दाखिल हो जाते हैं। इस प्रकार पानी के बड़े-बड़े जहाज़ समुद्र में कई मील अंदर तक प्रवेश कर जाते हैं। भाटे के समय जहाज़ वापस हो जाते हैं। कोलकाता हुगली नदी के किनारे समुद्र तट से 120 किलोमीटर दूर है। परंतु हुगली नदी में आने वाले ऊँचे ज्वारभाटे के कारण पानी के जहाज़ कोलकाता तक पहुँच जाते हैं। जब ज्वार नहीं होता, तो जहाज़ों को कोलकाता से 70 किलोमीटर दूर डायमंड हार्बर (Diamond Harbour) में रुके रहना पड़ता है।

प्रश्न 13.
ज्वार की दीवार पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।।
उत्तर-
ज्वार की दीवार (Tidal Wall)-नदियों के मुहाने में पानी की ऊँची दीवार को ज्वार की दीवार कहते हैं। जब ज्वार उठता है, तो पानी की एक धारा नदी घाटी में प्रवेश करती हैं। यह, लहर नदी के जल को विपरीत दिशा में बहाने का यत्न करती है, ज्वार की लहर की ऊँचाई बहुत बढ़ जाती है। नदियों में पानी का बहाव विपरीत हो जाता है। पानी समुद्र से अंदर की ओर बहने लगता है। पानी की इस ऊँची दीवार को ज्वार-दीवार कहते हैं। ज्वारदीवार विशेषकर उन नदियों में दिखाई देती है, जिनका खुला मुहाना कुप्पी जैसा होता है। तंग मुँह और तेज़ धारा के कारण ज्वार-लहर के आगे एक दीवार खड़ी हो जाती है। यह ज्वार-दीवार बहुत विनाशकारी होती है। इससे नावें उलट जाती हैं। जहाज़ों के रस्से टूट जाते हैं। जहाज़ नष्ट हो जाते हैं । हुगली नदी में इन दीवारों के कारण छोटी नावों को बहुत नुकसान होता है। यंग-सी घाटी (चीन) में 3-4 मीटर ऊँची ज्वार की दीवार पाई जाती है, जो 16 किलोमीटर प्रति घंटे की दर से नदी में अंदर बढ़ती जाती है।

प्रश्न 14.
“धाराएँ प्रचलित पवनों के द्वारा निर्धारित होती हैं।” व्याख्या करें।
उत्तर-
प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)-हवा अपनी अपार शक्ति के कारण पानी को गति देती है। धरातल पर चलने वाली स्थायी पवनें (Planetary Winds) लगातार एक ही दिशा में चलने के कारण धाराओं को जन्म देती हैं। विश्व की प्रमुख धाराएँ स्थायी पवनों की दिशा के अनुसार चलती हैं। (Ocean currents are wind determined) । मौसमी पवनें (Seasonal Winds) भी धाराओं की दिशा और उत्पत्ति में सहायक होती हैं।

उदाहरण (Examples)-

  1. व्यापारिक पवनें (Trade Winds)—इनके द्वारा उत्तरी और दक्षिणी भूमध्य रेखीय धाराएँ (Equational Currents) पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं।
  2. पश्चिमी पवनें (Westerlies)—इनके प्रभाव से खाड़ी की धारा (Gulf Stream) और क्यूरोशियो (Curoshio) धारा पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है।

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प्रश्न 15.
किसी क्षेत्र की वर्षा पर धाराओं के प्रभाव का उल्लेख करें।
उत्तर-
गर्म धाराओं के निकट के प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है, परंतु ठंडी धाराओं के निकट के प्रदेशों में वर्षा कम होती है। गर्म धाराओं के ऊपर बहने वाली पवनों में नमी धारण करने की शक्ति बढ़ जाती है, परंतु ठंडी धाराओं के संपर्क में आकर पवनें ठंडी हो जाती हैं और अधिक नमी धारण नहीं कर सकतीं।

उदाहरण (Examples)–

  • उत्तर-पश्चिमी यूरोप में खाड़ी की गर्म धारा के कारण और जापान के पूर्वी तट पर क्यूरोशिओ की गर्म धारा के कारण अधिक वर्षा होती है।
  • विश्व के प्रमुख मरुस्थलों के तटों के निकट ठंडी धाराएँ बहती हैं, जैसे-सहारा तट पर कैनेरी धारा, कालाहारी तट पर बेंगुएला धारा, ऐटेकामा तट पर पेरू की धारा।

प्रश्न 16.
खाड़ी की धारा का वर्णन करते हुए इसके प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
खाड़ी की धारा (Gulf Stream Current)
उत्पत्ति (Origin)—यह धारा खाड़ी मैक्सिको में एकत्र पानी द्वारा पैदा होती है, इसीलिए इसे खाड़ी की धारा कहते हैं। यह धारा उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट के साथ-साथ उत्तर की ओर न्यूफाउंडलैंड (New Foundland) तक बहती है। यह गर्म पानी की धारा है, जो एक नदी के समान तेज़ चाल से चलती है। इसका रंग नीला होता है। यह लगभग 1 किलोमीटर गहरी और 50 किलोमीटर चौड़ी है और इसकी गति 8 किलोमीटर प्रति घंटा है।

शाखाओं के क्षेत्र (Areas)- 40° उत्तरी अक्षांशों के निकट यह धारा पश्चिमी पवनों (Westerlies) के प्रभाव से पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती है। इसकी मुख्य धारा यूरोप की ओर बहती है, जिसे उत्तरी अटलांटिक प्रवाह (North Atlantic Drift) कहते हैं। यह एक धीमी धारा है, जिसे पश्चिमी पवनों के कारण पश्चिमी पवन प्रवाह (West Wind Drift) भी कहते हैं। यूरोप के तट पर यह धारा कई शाखाओं में बाँटी जाती है। ब्रिटेन का चक्कर लगाती हुई एक शाखा नॉर्वे के तट को पार करके आर्कटिक सागर में स्पिटसबर्जन (Spitsbergen) तक पहुँच जाती है, जहाँ इसे नॉर्वेजियन धारा (Norwegian Current) कहते हैं।

प्रभाव (Effects)-

  1. यह एक गर्म जलधारा है, जो ठंडे अक्षांशों में गर्म जल पहुँचाती है।
  2. यह धारा पश्चिमी यूरोप को गर्मी प्रदान करती है। यूरोप में सर्दी की ऋतु में साधारण तापमान इसी धारा की देन है।
  3. पश्चिमी यूरोप की सुहावनी जलवायु इसी धारा की देन है, इसलिए इसे यूरोप की जीवन-रेखा (Life Line of Europe) भी कहते हैं।
  4. पश्चिमी यूरोप के बंदरगाह सर्दी की ऋतु में नहीं जमते और व्यापार के लिए खुले रहते हैं।
  5. इस धारा के ऊपर से निकलने वाली पश्चिमी पवनें (Westerlies) यूरोप में बहुत वर्षा करती हैं।

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प्रश्न 17.
लैबरेडोर की धारा का वर्णन करें।
उत्तर-
लैबरेडोर की धारा (Labrador Current)—यह ठंडे पानी की धारा है, जो आर्कटिक सागर (Arctic Ocean) से उत्तरी अंध-महासागर की ओर बहती है। यह धारा बैफिन खाड़ी (Baffin Bay) से निकलकर कनाडा के तट के साथ बहती हुई न्यूफाउंडलैंड तक आ जाती है। यहाँ यह खाड़ी की धारा के साथ मिल जाती है, जिससे घना कोहरा पैदा होता है, इसकी एक शाखा सैंट लारेंस (St. Lawrance) घाटी में प्रवेश करती है, जो कई महीने बर्फ से जमी रहती है।

प्रभाव (Effects)-

  • ये प्रदेश बर्फ से ढके रहने के कारण अनुपजाऊ होते हैं।
  • ठंडी धारा के कारण इस प्रदेश के बंदरगाह सर्दी की ऋतु में जम जाते हैं और व्यापार बंद हो जाता है।
  • यह धारा अपने साथ आर्कटिक सागर से बर्फ के बड़े-बड़े खंड (Icebergs) ले आती है। कोहरे के कारण जहाज़ इन खंडों से टकराकर दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं।

प्रश्न 18.
उत्तरी हिंद महासागर की धाराओं पर मानसून पवनों के प्रभाव के बारे में बताएँ।
उत्तर-
हिंद महासागर की धाराएं (Currents of Indian Ocean)-धाराओं और पवनों का संबंध हिंद महासागर में स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। यहाँ मानसून पवनों के कारण समुद्री धाराओं का क्रम भी मौसमी (Seasonal) होता है। यहाँ उत्तरी हिंद महासागर में चलने वाली धाराएँ, मानसून पवनों के कारण छह महीने के बाद अपनी दिशा बदल लेती हैं। परंतु दक्षिणी हिंद महासागर में धाराएँ पूरा वर्ष एक ही दिशा में चलने के कारण स्थायी होती हैं।

मानसून के प्रभाव के कारण धाराएँ सारा साल अपनी दिशा बदलती रहती हैं। वास्तव में कोई भी निश्चित धारा नहीं मिलती। छह महीने बाद इन धाराओं की दिशा और कर्म बदल जाते हैं।

प्रश्न 19.
ज्वारभाटा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
ज्वारभाटा समुद्र की एक गति है। समुद्र का जल नियमित रूप से प्रतिदिन दो बार ऊपर उठता है और दो बार नीचे उतरता है। “समुद्री जल के इस नियमित उतार-चढ़ाव को ज्वारभाटा कहते हैं।” (Regular rise and fall of sea water is called Tides) जल के ऊपर उठने की क्रिया को ज्वार (Flood or High Tides or Incoming Tide) कहते हैं। जल के नीचे उतरने की क्रिया को भाटा (Ebb or low Tide or Outgoing Tide) कहते हैं।

विशेषताएँ

  1. प्रत्येक स्थान पर ज्वारभाटे की ऊँचाई अलग-अलग होती है।
  2. प्रत्येक स्थान पर ज्वार और भाटे का समय अलग-अलग होता है।
  3. समुद्र का जल 6 घंटे 13 मिनट तक ऊपर चढ़ता है और इतनी ही देर में नीचे उतरता है।
  4. ज्वारभाटा एक स्थान पर नित्य ही एक समय नहीं आता।

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प्रश्न 20.
ज्वारभाटे की उत्पत्ति के कारण बताएँ।
उत्तर-
उत्पत्ति के कारण (Causes of Origin) चंद्रमा अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravitational Attraction) के कारण धरती के जल को अपनी ओर खींचता है। स्थल भाग कठोर होता है, इस कारण वह खींचा नहीं जा सकता, परंतु जल भाग तरल होने के कारण ऊपर उठता जाता है। यह जल चंद्रमा की ओर उठता है। वहाँ से निकट का जल सिमटकर ऊपर उठता जाता है, जिसे उच्च ज्वार (High Tide) कहते हैं। जिस स्थान पर जल की मात्रा कम रह जाती है, वहाँ जल अपने तल से नीचे गिर जाता है, उसे नीचा ज्वार (Low Tide) कहते हैं। धरती की दैनिक गति के कारण प्रत्येक स्थान पर दिन-रात में दो बार ज्वार आता है। एक ही समय में धरती के तल पर दो बार ज्वार पैदा होते हैंएक ठीक चाँद के सामने और दूसरा उसकी विपरीत दिशा में (Diametrical Opposite) चाँद की आकर्षण शक्ति के कारण ज्वार उठता है। इसे सीधा ज्वार (Direct Tide) कहते हैं। विपरीत दिशा में अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force) के कारण ज्वार उठता है और ऊँचा ज्वार पैदा होता है। इसे अप्रत्यक्ष ज्वार (Indirect Tide) कहते हैं। इस प्रकार धरती के एक तरफ ज्वार आकर्षण शक्ति की अधिकता के कारण और दूसरी तरफ अपकेंद्रीय शक्ति की अधिकता के कारण पैदा होते हैं।

प्रश्न 21.
लघु ज्वार और ऊँचे ज्वार में अंतर बताएँ।
उत्तर-
ऊँचा ज्वार (Spring Tide)-सबसे अधिक ऊँचे ज्वार को ऊँचा ज्वार कहते हैं। यह दशा अमावस्या (New moon) और पूर्णिमा (Full Moon) के दिन होती है।

कारण (Causes)-इस दशा में सूर्य, चाँद और धरती एक सीधी रेखा में होते हैं। सूर्य और चाँद की सांझी आकर्षण-शक्ति अधिक हो जाने से ज्वार-शक्ति बढ़ जाती है। सूर्य और चाँद के कारण उत्पन्न ज्वार इक्ट्ठे हो जाते हैं। (Spring tide is the sum of solar and luner tides.)। इन दिनों में ज्वार अधिक ऊँचा और भाटा बहुत कम नीचा होता है। ऊँचे ज्वार साधारण ज्वार से 20% अधिक ऊँचे होते हैं।

लघु ज्वार (Neap Tide)-अमावस्या के सात दिन बाद या पूर्णिमा के सात दिन बाद ज्वार की ऊँचाई दूसरे दिनों की तुलना में नीची रह जाती है। इसे लघु ज्वार कहते हैं। इस दशा को शुक्ल और कृष्ण पक्ष की अष्टमी कहते हैं, जब चाँद आधा (Half Moon) होता है।

कारण (Causes)—इस दशा में सूर्य और चाँद धरती की समकोण दशा (At Right Angles) पर होते हैं। सूर्य और चाँद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति विपरीत दिशाओं में काम करती है। जहाँ सूर्य ज्वार पैदा करता है, वहाँ चाँद भाटा पैदा करता है। सूर्य और चाँद के ज्वारभाटा एक-दूसरे को कम करते हैं। (Neap tide is the difference of solar and luner tides) । इन दिनों में ऊँचा ज्वार कम ऊँचा और भाटा कम नीचा होता है। छोटा ज्वार प्रायः साधारण ज्वार से 20% कम ऊँचा होता है।

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प्रश्न 22.
दो ज्वारों के बीच कितने समय का अंतर होता है ?
उत्तर-
ज्वारभाटे का नियम (Law of Tides)—किसी स्थान पर ज्वारभाटा नित्य एक समय पर नहीं आता। धरती अपनी धुरी पर 24 घंटों में एक पूरा चक्कर लगाती है। इसलिए विचार किया जाता है कि ज्वार प्रत्येक स्थान पर 12 घंटे बाद आए, परंतु प्रत्येक स्थान पर ज्वार 12 घंटे 26 मिनट बाद आता है। हर रोज़ ज्वार पिछले दिन की तुलना में देर से आता है।

कारण (Causes)–चाँद धरती के चारों ओर 28 दिनों में पूरा चक्कर लगाता है। धरती के चक्कर का 28 वाँ भाग चाँद हर रोज़ आगे बढ़ जाता है। इसलिए किसी स्थान को चाँद के सामने दोबारा आने में 24 घंटे से कुछ अधिक समय ही लगता है। 24 घंटे 60 मिनट

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दूसरे शब्दों में, हर 24 घंटे के बाद चाँद अपनी पहले वाली स्थिति से लगभग 13° (360/28 = 13°) आगे निकल जाता है। इसलिए किसी स्थान को चाँद के ठीक सामने आने में 13 x 4 = 52 मिनट अधिक समय लग जाता है क्योंकि दिन में दो बार ज्वार आता है, इसलिए प्रतिदिन ज्वार 26 मिनट के अंतर से अनुभव किया जाता है। पूरे 12 घंटे बाद पानी का चढ़ाव देखने में नहीं आता, बल्कि ज्वार 12 घंटे 26 मिनट बाद आता है। 6 घंटे 13 मिनट तक जल ऊपर उठता और उसके बाद 6 घंटे 13 मिनट तक जल नीचे उतरता रहता है। ज्वार के उतार-चढ़ाव का यह क्रम चलता रहता है।

निबंधात्मक प्रश्न । (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
अंध महासागर की स्थल रूपरेखा के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर-
अंधमहासागर (Atlantic Ocean)-
1. विस्तार और आकार (Shape and Size) इस सागर का क्षेत्रफल 8 करोड़ 20 लाख किलोमीटर है जोकि कुल सागरीय क्षेत्रफल का 1/6 भाग है। इसका आकार अंग्रेज़ी के ‘S’ अक्षर जैसा है। यह सागर भूमध्य रेखा पर लगभग 2560 कि०मी० चौड़ा है, परंतु दक्षिण की ओर इसकी चौड़ाई 4800 कि० मी० है। यह सागर उत्तर की ओर से बंद है, जबकि दक्षिण की ओर से खुला होने के कारण यह हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के साथ मिल जाता है।

2. समुद्र तल (Ocean Floor)—इस सागर के तटों पर चौड़ा महाद्वीपीय शैल्फ पाया जाता है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के तटों पर इसकी चौड़ाई 400 कि०मी० तक होती है। यहाँ प्रसिद्ध मछली क्षेत्र पाए जाते हैं।

3. समुद्री पहाड़ियाँ (Ridges)—इस सागर में नीचे लिखी प्रमुख समुद्री पहाड़ियाँ (Ridges) हैं

  • अंध महासागरीय मध्यवर्ती पहाड़ी (Central Ridge)
  • डॉल्फिन पहाड़ी (Dolphin Ridge)
  • दक्षिणी भाग में चैलंजर पहाड़ी (Challanger Ridge)
  • उत्तरी भाग में टैलीग्राफ पठार।

4. सागरीय बेसिन (Ocean Basin)-अंध महासागर में कई छोटे-छोटे बेसिन पाए जाते हैं, जैसे

  • लैबरोडोर बेसिन
  • स्पेनिश बेसिन
  • उत्तरी अमेरिका बेसिन
  • केपवरडे बेसिन
  • गिनी का बेसिन
  • ब्राज़ील का बेसिन।

5. अंध-महासागर के निवाणं (Deeps of Atlantic Ocean)-इस सागर के तट के साथ-साथ मोड़दार पर्वत होने के कारण यहाँ निवाण (Deeps) कम ही मिलते हैं। Mr. Murry के अनुसार इस सागर में 10 निवाण हैं। प्रमुख इस प्रकार हैं-

(i) प्यूरटो रीको निवाण (Puerto Rico Deep) यह इस सागर का सबसे गहरा स्थान (4812 फैदम) है।
(ii) रोमांच निवाण (Romanche Deep)—यह 4030 फैदम गहरा है।

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(iii) दक्षिणी सैंडविच निवाण (South Sandwitch Deep)-यह फाकलैंड के निकट 4575 फैदम गहरा है।
(iv) सीमावर्ती सागर (Marginal Sea)-अंध-महासागर में सीमावर्ती समुद्र कम ही मिलते हैं। इसमें पाए जाने वाले सीमावर्ती सागर अधिकतर यूरोप की ओर हैं। प्रमुख सीमावर्ती सागर इस प्रकार हैं-

(क) बाल्टिक सागर (Baltic Sea)
(ख) उत्तरी सागर (North Sea)
(ग) रोम सागर (Mediterranean Sea)
(घ) काला सागर (Black Sea)
(ङ) कैरेबीयन सागर (Caribbean Sea)
(च) बेफिन की खाड़ी (Baffin Bay)
(छ) खाड़ी मैक्सिको (Mexica Bay)
(ज) हडसन की खाड़ी (Hudson Bay)।

(v) द्वीप (Islands)—इस सागर में ग्रेट ब्रिटेन और न्यूफाउंडलैंड महत्त्वपूर्ण द्वीप हैं, जोकि महाद्वीपीय शैल्फ के ऊँचे भाग हैं। वेस्ट इंडीज़ द्वीपों का समूह है, जोकि चाप के रूप में उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बीच फैला हुआ है। इनके बारे में कहा जाता है कि ये डूबे हुए पहाड़ों के ऊँचे उठे हुए भाग हैं। मध्यवर्ती उभार पर कई द्वीप मिलते हैं, जैसे-

(क) फैरोस द्वीप (Faroes Island)
(ख) अज़ोरस द्वीप (Azores Island)
(ग) फाकलैंड द्वीप (Falkland Island)
(घ) सेंट हैलेना द्वीप (St. Helena Island)
(ङ) बरमुदा द्वीप (Barmuda Island)।
(च) अफ्रीका तट पर ज्वालामुखी के केपवरडे द्वीप और कनेरी द्वीप आदि।

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प्रश्न 2.
प्रशांत महासागर की स्थल रुपरेखा के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर-
1. विस्तार और आकार (Shape and Size)—यह त्रिभुज (A) आकार का महासागर पृथ्वी के 30% भाग पर फैला हुआ है। इसकी औसत गहराई 5000 मीटर है। उत्तर में यह बेरिंग समुद्र और आर्कटिक महासागर द्वारा बंद है। प्रशांत महासागर भूमध्य रेखा पर लगभग 16000 कि०मी० चौड़ा है।

2. समुद्री पहाड़ियाँ (Ridges)—प्रशांत महासागर में पहाड़ियों (Ridges) की कमी है। इसके कुछ भागों में पठारों के रूप में उठे हुए चबूतरे पाए जाते हैं। प्रमुख उभार इस प्रकार हैं –

  • हवाई उभार, जोकि लगभग तीन हज़ार कि०मी० लंबा है।
  • अल्बेट्रोस पठार, जोकि लगभग 1500 कि०मी० लंबा है।
  • इस सागर में अनेक उभार (Swell), ज्वालामुखी पहाड़ियाँ और प्रवाल भित्तियाँ पाई जाती हैं।

3. सागरीय बेसिन (Ocean Basin)-प्रशांत महासागर में कई प्रकार के बेसिन मिलते हैं, जो छोटी-छोटी पहाड़ियों (Ridges) द्वारा एक-दूसरे से अलग हैं। प्रमुख बेसिन इस प्रकार हैं –

  • ऐलुशीयन बेसिन
  • फिलिपीन बेसिन
  • फिज़ी बेसिन
  • पूर्वी ऑस्ट्रेलिया का बेसिन
  • प्रशांत अंटार्कटिका बेसिन।

4. सागरीय निवाण (Ocean Deeps)—इस महासागर में लगभग 32 निवाण मिलते हैं, जिनमें से अधिक Trenches हैं। इस सागर के निवाण (Deeps) और खाइयाँ (Trenches) अधिकतर इसके पश्चिमी भाग में हैं। इस सागर में सबसे गहरा स्थान मैरियाना खाई (Mariana Trench) है, जिसकी गहराई 11022 मीटर है। इसके अलावा ऐलुशीयन खाई, क्यूराइल खाई, जापान खाई, फिलीपाइन खाई, बोनिन खाई, मिंडानो टोंगा खाई और एटाकामा खाई प्रसिद्ध सागरीय निवाण हैं, जिनकी गहराई 7000 मीटर से भी अधिक है।

5. सीमवर्ती सागर (Marginal Seas)—प्रशांत महासागर में अधिकतर सीमावर्ती सागर पश्चिमी भागों में मिलते हैं। इसके पूर्वी भाग में कैलीफोर्निया की खाड़ी और अलास्का की खाड़ी है। शेष महत्त्वपूर्ण सागर पश्चिमी भाग में हैं(i) बेरिंग सागर (Bering Sea) (ii) पीला सागर (Yellow Sea) (iii) ओखोत्सक सागर (Okhotsk Sea) (iv) जापान सागर (Japan Sea) (v) चीन सागर (China Sea)।

6. द्वीप (Islands)—प्रशांत महासागर में लगभग 20 हज़ार द्वीप पाए जाते हैं। प्रमुख द्वीप ये हैं-

  • ऐलुशियन द्वीप और ब्रिटिश कोलंबिया द्वीप।
  • महाद्वीपीय द्वीप, जैसे-क्यूराईल द्वीप, जापान द्वीप समूह, फिलीपाइन द्वीप, इंडोनेशिया द्वीप और न्यूज़ीलैंड द्वीप।
  • ज्वालामुखी द्वीप जैसे-हवाई द्वीप।
  • प्रवाल द्वीप, जैसे-फिजी द्वीप।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर 3

प्रश्न 3.
हिंद महासागर के फर्श का वर्णन करें।
उत्तर-
(i) हिंद महासागर संसार का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है, जोकि तीन तरफ से स्थल भागों (अफ्रीका, एशिया, ऑस्ट्रेलिया) से घिरा हुआ है। इसका विस्तार 20° पूर्व से लेकर 115° पूर्व तक है। इसकी औसत गहराई 4000 मीटर है। यह सागर उत्तर में बंद है और दक्षिण में अंध महासागर और प्रशांत महासागर से मिल जाता है।
(ii) समुद्री पहाड़ियाँ (Ridges)—इस महासागर में कई पहाड़ियाँ मिलती हैं-

(क) मध्यवर्ती पहाड़ी (Mid Indian Ridge) कन्याकुमारी से लेकर अंटार्कटिका महाद्वीप तक 75° पूर्व देशांतर के साथ-साथ स्थित है। इसके समानांतर पूर्वी हिंद पहाड़ी और पश्चिमी हिंद पहाड़ियाँ स्थित हैं। दक्षिण में ऐमस्ट्रडम-सेंट पॉल पठार स्थित है।

(ख) अफ्रीका के पूर्वी सिरे पर स्कोटा छागोश पहाड़ी।
(ग) हिंद महासागर के पश्चिम में मैडगास्कर और प्रिंस ऐडवर्ड पहाड़ियाँ और कार्ल्सबर्ग पहाड़ियाँ स्थित हैं।

(ii) सागरीय बेसिन (Ocean Basin)-कई पहाड़ियों (Ridges) के कारण हिंद महासागर कई छोटे-छोटे बेसिनों में बँट गया है, जैसे-खाड़ी बंगाल, अरब सागर, सोमाली बेसिन, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का बेसिन और दक्षिणी हिंद बेसिन।

(iv) समुद्री निवाण (Ocean Deeps)—इस सागर में समुद्री निवाण बहुत कम हैं। सबसे अधिक गहरा स्थान सुंडा खाई (Sunda Trench) के निकट प्लैनट निवाण है, जोकि 4076 फैदम गहरा है।

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(v) सीमावर्ती सागर (Marginal Sea)-हिंद महासागर में अधिकतर सीमावर्ती सागर उत्तर की ओर हैं, जो इस प्रकार हैं-

(क) लाल सागर (Red Sea)
(ख) खाड़ी सागर (Persian Gulf)
(ग) अरब सागर (Arabian Sea)
(घ) खाड़ी बंगाल (Bay of Bengal)
(ङ) मोज़म्बिक चैनल (Mozambique Strait)
(च) अंडमान सागर (Andaman Sea)।

(vi) द्वीप (Islands)

(क) श्रीलंका और मैलागासी जैसे बड़े द्वीप
(ख) अंडमान-निकोबार, जंजीबार, लक्षद्वीप और मालदीव,
(ग) मारीशस और रीयूनियन जैसे ज्वालामुखी द्वीप।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

प्रश्न 4.
महासागरों के विस्तार का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्र विज्ञान (Oceanography)—महासागरों का अध्ययन प्राचीन काल से ही होता चला आ रहा है। महासागरों की परिक्रमा, ज्वारभाटे की जानकारी आदि ईसा से कई वर्ष पूर्व ही प्राप्त थी। जलवायु, समुद्री मार्गों, जीवविज्ञान आदि पर प्रभाव के कारण समुद्री विज्ञान भौतिक भूगोल में एक विशेष स्थान रखता है।

समुद्र विज्ञान दो शब्दों Ocean + Graphy के मेल से बना है। इस प्रकार इस विज्ञान में महासागरों का वर्णन होता है। एम०ए०मोरमर (M.A. Mormer) के अनुसार, “समुद्र विज्ञान महासागरों की आकृति, स्वरूप, पानी और गतियों का अध्ययन है।” (Oceanography is the study of the Science of Oceans-its form, nature, waters and movements.)। मोंक हाऊस के अनुसार, “समुद्र विज्ञान महासागरों के भौतिक और जैव गुणों का अध्ययन है।” (Oceanography is the study of a wide range of Physical and biological phenomena of oceans.) I ___डब्ल्यू० फ्रीमैन (W. Freeman) के अनुसार, “समुद्र विज्ञान भौतिक भूगोल का वह भाग है, जो पानी की गतियों
और मूल शक्तियों का अध्ययन करता है। इस अध्ययन में ज्वारभाटा, धाराओं, तट रेखाओं, समुद्री धरातल और जीवों का अध्ययन शामिल होता है।”

महासागर-विस्तार (Ocean-Extent)-पृथ्वी के तल पर जल में डूबे हुए भाग को जलमंडल (Hydrosphere) कहते हैं। जलमंडल में महासागर, सागर, खाड़ियाँ, झीलें आदि सभी जल-स्रोत आ जाते हैं। सौर-मंडल में पृथ्वी ही एक-मात्र ग्रह है, जिस पर जलमंडल मौजूद है। इसी कारण पृथ्वी पर मानव-जीवन संभव है।

पृथ्वी के लगभग 71% भाग पर जलमंडल का विस्तार है। इसलिए इसे जल-ग्रह (Watery Planet) कहते हैं। अंतरिक्ष से पृथ्वी का रंग नीला दिखाई देता है, इसलिए इसे नीला ग्रह (Blue Planet) भी कहते हैं।

धरातल पर जलमंडल लगभग 3,61,059,000 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं जोकि पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्रफल का 71% भाग है।
उत्तरी गोलार्द्ध का 61% भाग और दक्षिणी गोलार्द्ध का 81% भाग महासागरों द्वारा घिरा हुआ है। उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का विस्तार अधिक है, इसलिए इसे (Water Hemisphere) भी कहते हैं। जल और थल का विभाजन प्रति ध्रुवीय (Antipodal) है। उत्तरी ध्रुव की ओर चारों तरफ आर्कटिक महासागर स्थित है और दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका महाद्वीप द्वारा घिरा हुआ है ।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर 2

जलमंडल का क्षेत्रफल (Area of Hydrosphere) ब्रिटिश भूगोल वैज्ञानिक जॉन मरें (John Murray) ने जलमंडल का क्षेत्रफल 3626 लाख वर्ग किलोमीटर बताया है । महासागरों में प्रमुख प्रशांत महासागर, अंधमहासागर, हिंद महासागर और आर्कटिक महासागर हैं । प्रशांत महासागर सबसे बड़ा महासागर है, जो जलमंडल के 45.1% भाग पर फैला हुआ है ।

Areas of Different Oceans

Ocean — Area (Sq. K.m.)
प्रशांत महासागर — 16,53, 84,000
अंध महासागर — 8,22,17,000
हिंद महासागर — 7,34,81,000
आर्कटिक महासागर –1,40,56,000

महासागरों की औसत गहराई 3791 मीटर है। स्थल मंडल की अधिकतम ऊँचाई एवरेस्ट चोटी (Everest Peak) है, जोकि समुद्र तल से 8848 मीटर ऊँची है। जलमंडल की अधिकतम गहराई 11,033 मीटर, फिलीपीन देश के निकट प्रशांत महासागर की मेरियाना खाई में चैलंजर निवाण (Challeger Deep) में है। इस प्रकार यदि संसार के सबसे ऊँचे शिखर ऐवरेस्ट को प्रशांत महासागर की मेरियाना खाई में डुबो दिया जाए, तो उसके शिखर पर 2000 मीटर से अधिक पानी होगा।

प्रश्न 5.
सागरीय जल के खारेपन से क्या अभिप्राय है ? विश्व के भिन्न-भिन्न सागरों में खारेपन के विभाजन का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्र के जल का स्वाद खारा होता है। खारापन कई स्थानों पर अधिक और कई स्थानों पर कम होता है। समुद्र के जल में खारापन पैदा करने में दरिया के पानी का हाथ होता है। दरिया के पानी में कई प्रकार के नमक घुले हुए होते हैं, जिन्हें दरिया अपने साथ समुद्र में ले जाते हैं। इन नमक पदार्थों को भी खारेपन का नाम दिया जाता है। अनुमान है कि विश्व के सभी दरिया हर वर्ष 5 अरब 40 करोड़ टन नमक समुद्र में ले जाते हैं। समुद्रों का औसत खारापन 35% होता है, परंतु यह सब समुद्रों में एक समान नहीं है। कहीं बहुत अधिक है और कहीं बहुत कम। विश्व के भिन्न-भिन्न सागरों में खारेपन का विभाजन इस प्रकार है-

खारेपन का विभाजन-कई भौगोलिक तत्त्वों के कारण भिन्न-भिन्न सागरों में खारेपन की मात्रा में भिन्नता पाई जाती है-

1. खुले महासागरों में खारापन (Salinity in Open Seas)-

(i) भूमध्य रेखा के आस-पास के क्षेत्र (Near the Equator)—इन सागरों में औसत खारापन कम है, जोकि प्रति हजार ग्राम पानी में लगभग 34 ग्राम है।
कारण (Causes)

  • अधिक वर्षा का होना।
  • अमेज़न और कांगो जैसी बड़ी-बड़ी नदियों से ताज़े जल की प्राप्ति।

(ii) कर्क और मकर रेखा के निकट (Near the Tropics)—यहाँ खारेपन की मात्रा सबसे अधिक है, जोकि 36% है।
कारण (Causes)-

  • अधिक वाष्पीकरण का होना।
  • वर्षा का कम होना।
  • बड़ी नदियों की कमी होना।

(iii) ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Areas)-इन क्षेत्रों में खारेपन की मात्रा 20 से 30 ग्राम प्रति हज़ार होती है।
GARUT (Causes) –

  • कम तापमान के कारण कम वाष्पीकरण का होना।
  • पश्चिमी पवनों द्वारा अधिक वर्षा का होना।
  • बर्फ के पिघलने से ताज़े जल की प्राप्ति होना।

2. घिरे हुए समुद्रों में खारापन (Salinity in Enclosed Seas)-इन सागरों के खारेपन में काफी अंतर पाया जाता है। जैसे-

  • भूमध्य सागर में जिब्रालटर के निकट खारेपन की मात्रा 37 ग्राम प्रति हज़ार से 39 ग्राम प्रति हज़ार होती है। अधिक खारापन शुष्क गर्म ऋतु, अधिक वाष्पीकरण और नदियों की कमी के कारण होता है।
  • लाल सागर में 39 ग्राम प्रति हज़ार, खाड़ी स्वेज़ 41 ग्राम प्रति हज़ार और खाड़ी फारस में 38 ग्राम प्रति हज़ार खारेपन की मात्रा पाई जाती है।
  • काला सागर में 17 ग्राम प्रति हजार और इज़ेव सागर में 18 ग्राम प्रति हज़ार खारेपन की मात्रा है। बाल्टिक सागर में यह केवल 8 ग्राम प्रति हज़ार है।

कारण (Causes)-

  • यहाँ वाष्पीकरण कम है।
  • बड़ी-बड़ी नदियों का पानी साफ है।
  • हिम के पिघलने से भी अधिक जल की प्राप्ति होती है।

3. झीलों और आंतरिक सागरों में (Lakes and Inland Seas)-झीलों और आंतरिक सागरों में खारेपन की मात्रा इनमें गिरने वाली नदियों, वाष्पीकरण की मात्रा और स्थिति के कारण भिन्न-भिन्न है। समुद्रों में नदियों के गिरने से ताज़ा जल अधिक हो जाता है और खारेपन की मात्रा कम हो जाती है। अधिक तापमान के कारण वाष्पीकरण अधिक होता है, जिससे खारापन अधिक हो जाता है। कैस्पियन सागर के उतरी भाग में खारेपन की मात्रा 14 ग्राम प्रति हज़ार है, परंतु दक्षिणी भाग में यह मात्रा 170 ग्राम प्रति हज़ार है। संयुक्त राज्य अमेरिका की साल्ट झील में खारेपन की मात्रा 220 ग्राम प्रति हज़ार है। जॉर्डन में मृत सागर (Dead Sea) में खारेपन की मात्रा 238 ग्राम प्रति हज़ार है। तुर्की की वैन झील (Van Lake) में खारेपन की मात्रा 330 ग्राम प्रति हज़ार है। यहाँ अधिक खारापन अधिक वाष्पीकरण और नदियों की कमी के कारण होता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर

प्रश्न 6.
महासागरों में तापमान के क्षितिजीय विभाजन का वर्णन करें।
उत्तर-
महासागरीय जल में तापमान का क्षैतिज विभाजन (Horizontal Distribution of Temperature in Ocean Water)-अर्ध-खुले सागरों और खुले सागरों के तापमान में भिन्नता होती है। इसका कारण यह है कि अर्ध खुले सागरों के तापमान पर निकटवर्ती क्षेत्रों का प्रभाव पड़ता है।

(क) महासागरों में जल पर तापमान का क्षैतिज विभाजन (Horizontal Distribution of Temperature in Ocean Water)-महासागरों में जल-तल (Water-surface) के तापमान का क्षैतिज विभाजन नीचे लिखे अनुसार है :

  • भूमध्य रेखीय भागों के जल का तापमान 26° सैल्सियस, ध्रुवीय क्षेत्रों में 0° सैल्सियस से -5° (minus five degree) सैल्सियस और 20°, 40° और 60° अक्षांशों के तापमान क्रमशः 23°, 14° और 1° सैल्सियस रहता है। इस प्रकार भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर महासागरीय जल का क्षैतिज तापमान कम होता जाता है। इसका कारण यह है कि भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लंब और ध्रुवों की ओर तिरछी पड़ती हैं।
  • ऋतु परिवर्तन के साथ महासागरों के ऊपरी तल के तापमान में परिवर्तन आ जाता है। गर्मी की ऋतु में दिन लंबे होने के कारण तापमान ऊँचा और सर्दी की ऋतु में दिन छोटे होने के कारण तापमान कम रहता है।
  • स्थल की तुलना में जल देरी से गर्म और देरी से ही ठंडा होता है। उत्तरी गोलार्द्ध में जल की तुलना में स्थल अधिक है और दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का क्षेत्र अधिक है। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में समुद्री जल का तापमान स्थलीय प्रभाव के कारण ऊँचा रहता है। इसकी तुलना में जल की अधिकता के कारण दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान कम रहता है।

3. अर्ध-खले सागरों में जल के तापमान का क्षैतिज विभाजन (Horizontal Distribution of Temperature in Partially Enclosed Seas) अर्ध-खुले सागरों के तापमान पर निकटवर्ती स्थलखंडों का प्रभाव अधिक पड़ता है।

(i) लाल सागर और फारस की खाड़ी (Red Sea and Persian Gulf)—ये दोनों अर्ध-खुले सागर हैं, जो संकरे जल संयोजकों (Straits) द्वारा हिंद महासागर से मिले हुए हैं। इन दोनों के चारों ओर मरुस्थल हैं, जिनके प्रभाव से तापमान उच्च, क्रमश: 32° से० और 34° से० रहता है। विश्व में सागरीय तल का अधिक-सेअधिक तापमान 34° से० है, जोकि फारस की खाड़ी में पाया जाता है।

कुछ सागरों के जल का तापमान-

सागर — तापमान
लाल सागर — 32°C.
खाड़ी फारस –34°C.
बाल्टिक सागर –10°C.
उत्तरी सागर –17°C.
प्रशांत महासागर –19.1°C.
हिंद महासागर –17.0°C.
अंध महासागर — 16.9°C.

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर 6

(ii) बाल्टिक सागर (Baltic Sea)-इस सागर में तापमान कम रहता है और शीत ऋतु में यह बर्फ में बदल जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह शीत प्रदेशों से घिरा हुआ है, जोकि सर्दियों में बर्फ से ढके रहते हैं। इसकी तुलना में निकट का विस्तृत उत्तर सागर (North Sea) कभी भी नहीं जमता। इसका कारण यह है कि एक तो यह खुला सागर है और दूसरा अंध महासागर की तुलना में गर्म जलं इसमें बेरोक प्रवेश करता है।

(iii) भूमध्य सागर या रोम सागर (Mediterranean Sea)—यह भी एक अर्ध-खुला समुद्र है, जो जिब्राल्टर (Gibraltar) जल संयोजक द्वारा अंध महासागर से जुड़ा हुआ है। इसका तापमान उच्च रहता है क्योंकि इसके दक्षिण और पूर्व की ओर मरुस्थल हैं। दूसरा, इस जल संयोजक की ऊँची कटक महासागर के जल को इस सागर में बहने से रोकती है।

महासागरीय जल में ताप का लंबवर्ती विभाजन-(Vertical Distribution of Temperature of Ocean Water)-सूर्य का ताप सबसे पहले महासागरीय तल का जल प्राप्त करता है और सबसे ऊपरी परत गर्म होती है। सूर्य के ताप की किरणें ज्यों-ज्यों गहराई में जाती हैं, तो बिखराव (Scattering), परावर्तन (Reflection) और प्रसारण (Diffusion) के कारण उनकी ताप-शक्ति नष्ट हो जाती है। इस प्रकार तल के नीचे के पानी का तापमान गहराई के साथ कम होता जाता है।

महासागरीय जल का तापमान-
गहराई के अनुसार (According to Depth)-

गहराई (Depth) मीटर — तापमान (°C)
200 — 15.9°C
400 —  10.0°C
1000 — 4.5°C
2000 — 2.3°C
3000 — 1.8°C
4400 — 1.7°C

1. महासागरीय जल का तापमान गहराई बढ़ने के साथ-साथ कम होता जाता है। इसका कारण यह है कि सूर्य की किरणें अपना प्रभाव महाद्वीपीय बढ़ौतरी की अधिकतम गहराई भाव 183 मीटर (100 फैदम) तक ही डाल सकती हैं।

2. महाद्वीपीय तट के नीचे महासागरों में तापमान अधिक कम होता है परंतु अर्ध-खुले सागरों में तापमान जल संयोजकों की कटक तक ही गिरता है और इससे आगे कम नहीं होता।

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हिंद महासागर के ऊपरी तल और लाल सागर के ऊपरी तल का तापमान लगभग समान (27°C) होता है। इन दोनों के बीच बाब-अल-मेंडर जल संयोजक की कटक है। उस गहराई तक दोनों में तापमान एक समान कम होता है क्योंकि इस गहराई तक हिंद महासागर का जल लाल सागर में प्रवेश करता रहता है। परंतु इससे अधिक गहराई पर लाल सागर का तापमान कम नहीं होता, जबकि हिंद महासागर में यह निरंतर कम होता रहता है।

3. गहराई के साथ तापमान कम होने की दर सभी गहराइयों में एक समान नहीं होती। लगभग 100 मीटर की गहराई तक जल का तापमान निकटवर्ती धरातलीय तापमान के लगभग बराबर होता है। धरातल से 1000 से 1800 मीटर की गहराई पर तापमान लगभग 15° से कम होकर लगभग 2°C रह जाता है। 4000 मीटर की गहराई पर तापमान कम होकर 1.6°C रह जाता है। महासागरों में किसी भी गहराई पर तापमान 1°C से कम नहीं होता। यद्यपि ध्रुवीय महासागरों की ऊपरी परत जम जाती है, पर निचला पानी कभी नहीं जमता। इसी कारण मछलियाँ और अन्य जीव-जन्तु निचले जल में मरते नहीं।

प्रश्न 7.
महासागरीय जल में खारेपन के कारण और महत्ता बताएँ।
उत्तर-
महासागरीय जल में खारापन (Salinity of Ocean Water)-
महासागरीय जल सदा खारा होता है, परंतु यह कहीं कम खारा और कहीं अधिक खारा होता है। सागर के इस खारेपन को ही महासागरीय खार या जल की लवणता कहा जाता है। यह खारापन महासागरीय जल में पाए जाने वाले नमक के कारण होता है। प्रसिद्ध सागर वैज्ञानिक मरे (Murray) के अनुसार प्रति घन किलोमीटर जल में 4/4 करोड़ टन नमक होता है। यदि महासागरीय जल के कुल नमक को बिछाया जाए, तो संपूर्ण पृथ्वी पर लगभग 150 मीटर मोटी परत बन जाएगी।

महासागरों का औसत खारापन (Average Salinity of Ocean)-
खुले महासागरों के जल में पाए जाने वाले लवणों के घोल को खारापन कहते हैं। (The total Salt Content of Oceans is Called Salinity.) । सागरीय जल का औसत खारापन 35 ग्राम प्रति हजार अर्थात् 35% होता है। खुले महासागरों में 1000 ग्राम जल में लगभग 35 ग्राम नमक होता है। ऐसे जल के खारेपन को 35 ग्राम प्रति हज़ार (Thirty five per thousand) कहा जाता है क्योंकि खारेपन को प्रति हज़ार ग्राम में ही दर्शाया जाता है।

महासागरों में खारेपन के कारण (Origin of Salinity in the Ocean)-
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद जब महासागरों की रचना हुई तो उस समय पृथ्वी के अधिकतर नमक इस जल में घुल गए। इसके बाद स्थलों से आने वाली अनगिनत नदियाँ अपने साथ घोल के रूप में नमक महासागरों में निक्षेप कर रही हैं, जिससे महासागरों में खारेपन की वृद्धि होती रही है। वाष्पीकरण द्वारा महासागरों का ताज़ा जल वायुमंडल में मिलकर वर्षा का कारण बनता है। यह वर्षा नदियों के रूप में स्थल पर नमक प्रवाहित करके महासागरों में पहुँचाती है।

सागरीय जल के नमक (Salts of Ocean)-
सागरीय जल में पाए जाने वाले नमक इस प्रकार हैं–

(i) सोडियम क्लोराइड — 77.8 प्रतिशत
(ii) मैग्नीशियम क्लोराइड — 10.9 प्रतिशत
(iii) मैग्नीश्यिम सल्फेट — 4.7 प्रतिशत
(iv) कैल्शियम सल्फेट — 3.6 प्रतिशत
(v) पोटाशियम सल्फेट — 2.5 प्रतिशत
(vi) कैल्शियम कार्बोनेट — 0.3 प्रतिशत
(vii) मैग्नीशियम ब्रोमाइड — 0.2 प्रतिशत

खारेपन का महत्त्व (Importance of Salinity) –
समुद्री जल के खारेपन का महत्त्व नीचे लिखे अनुसार है-

  • समुद्र में खारेपन की भिन्नता के कारण धाराएँ उत्पन्न होती हैं; जो निकटवर्ती क्षेत्रों में जलवायु को प्रभावित करती हैं।
  • समुद्री जल में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट नमक समुद्री जीव-जंतुओं विशेषकर मूंगा (Coral) और पंक (Ooze) का ज़ोन है, जिससे इनकी हड्डियाँ और पिंजर बनते हैं।
  • खारेपन के कारण धरती पर वनस्पति उगती है।
  • लवण ठंडे महासागरों को जमने नहीं देते और जीव-जंतु विशेष रूप से बहुमूल्य मछलियाँ नहीं मरती और जल परिवहन चालू रहता है।
  • खारेपन के कारण जल का घनत्व बढ़ जाता है, इसीलिए जहाज़ तैरते हैं।

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प्रश्न 8.
समुद्री तरंगों की रचना और किस्मों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्री तरंगें या लहरें (Sea Waves)—पवनों के प्रभाव के कारण समुद्री तल के किसी भाग में जल ऊँचा और किसी भाग में नीचा होता है। इस क्रिया को लहर कहते हैं। लहरों के कारण जल आगे को नहीं बढ़ता, बल्कि अपने स्थान पर ही ऊँचा-नीचा और आगे-पीछे होता रहता है। लहर के ऊपर उठे भाग को तरंग शिखर (Crest) और निचले भाग को तरंग गर्त (Trough) कहते हैं। एक शिखर से दूसरे शिखर तक और एक गर्त से दूसरे गर्त तक की लंबाई को Wave Length कहा जाता है। गर्त और शिखर के बीच की दूरी को लहर की ऊँचाई (Amplitude of Wave) कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 9 महासागर 15

लहर की किस्में (Types of Waves) –
पवनों द्वारा उत्पन्न महासागरीय जल की तरंगें तीन किस्म की होती हैं-

  1. सी
  2. स्वैल
  3. सरफ।

1. सी (Sea)—पवनों के घर्षण से कई बार एक ही समय में विभिन्न लंबाई (Wave Length) वाली और विभिन्न दिशाओं में बढ़ने वाली तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं। इन्हें ‘सी’ (Sea) कहकर पुकारा जाता है।

2. महातरंग या स्वैल (Swell)-जब सी नामक अनियमित तरंगें महासागरीय जल-तल को उथल-पुथल करने वाली पवनों के प्रभाव से मुक्त होकर नियमित रूप में तरंग शिखर और तरंग गर्त की श्रृंखला में बढ़ती हैं, तो इन्हें महातरंग या स्वैल कहा जाता है।

3. सरफ (Surf)-जब महातरंग या स्वैल तट के निकट गहरे पानी (Deep Water) में पहुँचती है, तो इसके तरंग शिखर आपस में मिलकर ऊँचे हो जाते हैं, तरंग शिखर आगे की ओर झुक जाता है और टूट जाता है। तब इन्हें ब्रेकर या भंग-तरंग (Breaker) कहते हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
अन्तर्विवाह से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
वह विवाह जिसमें व्यक्ति को एक निश्चित समूह, जाति या उपजाति के अंदर ही विवाह करवाना पड़े, अन्तर्विवाह होता है।

प्रश्न 2.
विवाह संस्था की उत्पत्ति के कोई दो महत्त्वपूर्ण आधार बताइये।
उत्तर-
शारीरिक आवश्यकता, भावात्मक आवश्यकता, समाज को आगे बढ़ाना तथा बच्चों का पालन-पोषण करके विवाह की संस्था सामने आयी।

प्रश्न 3.
एक विवाह किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जब एक पुरुष का एक समय में एक स्त्री के साथ विवाह होता है तो इसे एक विवाह का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 4.
साली विवाह किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जब एक व्यक्ति अपनी पत्नी की मृत्यु के पश्चात् उसकी बहन से विवाह कर लेता है तो उसे साली विवाह कहते हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 5.
बहुपति विवाह के प्रकार बताइये।
उत्तर-
यह दो प्रकार का होता है-भातृ बहुपति विवाह जिसमें स्त्री के सभी पति भाई होते हैं तथा अभ्रातृ बहुपति विवाह जिसमें स्त्री के सभी पति भाई नहीं होते।

प्रश्न 6.
बहुपत्नी विवाह के प्रकार बताइये।
उत्तर-
यह दो प्रकार का होता है-द्वि-पत्नी विवाह जिसमें एक व्यक्ति की दो पत्नियाँ होती हैं तथा बहुपत्नी विवाह जिसमें व्यक्ति की कई पत्नियाँ होती हैं।

प्रश्न 7.
अन्तर्विवाह के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
मुसलमानों में शिया तथा सुन्नी अन्तर्वैवाहिक समूह हैं। ईसाइयों में रोमन कैथोलिक तथा प्रोटैस्टैंट अन्तर्वैवाहिक समूह है।

प्रश्न 8.
विवाह को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-
लुण्डबर्ग के अनुसार, “विवाह के नियम तथा तौर-तरीके होते हैं जो पति पत्नी के एक-दूसरे के प्रति अधिकारों, कर्तव्यों तथा विशेष अधिकारों का वर्णन करते हैं।”

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 9.
परिवार के दो प्रकार्य बताइये।
उत्तर-

  1. परिवार बच्चों का समाजीकरण करता है।
  2. परिवार बच्चे को सम्पत्ति प्रदान करता है।

प्रश्न 10.
आकार के आधार पर परिवार के स्वरूपों के नाम लिखिए।
उत्तर-
आकार के आधार पर परिवार के तीन प्रकार होते हैं-केन्द्रीय परिवार, संयुक्त परिवार तथा विस्तृत परिवार।

प्रश्न 11.
सत्ता के आधार पर परिवार के स्वरूपों के नाम लिखिए।
उत्तर-
सत्ता के आधार पर परिवार के दो प्रकार होते हैं-पितृसत्तात्मक व मातृसत्तात्मक।

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प्रश्न 12.
वैवाहिक सम्बन्ध किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वह नातेदारी जो विवाह के पश्चात् बनती है, उसे वैवाहिक नातेदारी कहते हैं। उदाहरण के लिए सास, ससुर, जमाई, बहू इत्यादि।

प्रश्न 13.
संयुक्त परिवार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
वह परिवार जिसमें दो से अधिक पीढ़ियों के लोग रहते हैं तथा एक रसोई में खाना खाते हैं, संयुक्त परिवार होता है।

प्रश्न 14.
नातेदारी से आप क्या समझते हैं ? .
उत्तर-
नातेदारी में वह संबंध शामिल होते हैं जो काल्पनिक या वास्तविक वंश परम्परागत बन्धनों पर आधारित तथा समाज द्वारा प्रभावित होते हों।

प्रश्न 15.
नातेदारी के प्रकार बताइये।
उत्तर-
नातेदारी दो प्रकार की होती है :- वैवाहिक तथा रक्त संबंधी।

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II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
संस्था शब्द से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
संस्था न तो लोगों का समूह है तथा न ही संगठन है। संस्था तो किसी कार्य या उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए परिमापों की व्यवस्था है। संस्था तो किसी विशेष महत्त्वपूर्ण मानवीय क्रियाओं के इर्द-गिर्द केन्द्रित रूढ़ियों तथा लोक रीतियों का गुच्छा है। संस्थाएं तो संरचित प्रक्रियाएं हैं जिसके द्वारा व्यक्ति अपने कार्य करता है।

प्रश्न 2.
अधिमान्य नियम किसे कहते हैं ?
उत्तर-
प्रत्येक संस्था के कुछ अधिमान्य नियम होते हैं जिन्हें सबको मानना पड़ता है। उदाहरण के लिए विवाह एक ऐसी संस्था है जो पति-पत्नी के बीच संबंधों को नियमित करती है। इस प्रकार शैक्षिक संस्थाओं के रूप में स्कूल तथा कॉलेज के अपने-अपने नियम तथा कार्य करने के तौर-तरीके होते हैं।

प्रश्न 3.
अनुलोम तथा प्रतिलोम क्या है ?
उत्तर-

  • अनुलोम-यह एक प्रकार का सामाजिक नियम है जिसके अनुसार उच्च जाति का लड़का निम्न जाति की लड़की से विवाह कर सकता है।
  • प्रतिलोम-यह एक प्रकार का विवाह है जिसमें निम्न जाति का लड़का उच्च जाति की लड़की से विवाह करता है। इस प्रकार के विवाह को मान्यता नहीं मिलती है।

प्रश्न 4.
बहुविवाह के दो प्रकारों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-

  1. बहपति विवाह-इस प्रकार के विवाह में एक स्त्री के कई पति होते हैं तथा इसके दो प्रकार होते हैं। भ्रातृ बहुपति विवाह जिसमें सभी पति भाई होते हैं तथा गैर-भ्रातृ बहुपति विवाह जिसमें सभी पति भाई नहीं होते।
  2. बहुपत्नी विवाह-इस प्रकार के विवाह में एक पति की एक समय में कई पत्नियाँ होती हैं।

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प्रश्न 5.
भ्रातृत्व बहपति विवाह किसे कहते हैं ?
उत्तर-
इस प्रकार के विवाह में एक पत्नी के कई पति होते हैं तथा वह सभी आपस में भाई होते हैं। बच्चों का पिता बड़े भाई को माना जाता है तथा पत्नी से संबंध बनाने से पहले बड़े भाई की आज्ञा लेनी पड़ती है।

प्रश्न 6.
निकटाभिगमन निषेध की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
निकटाभिगमन निषेध का अर्थ है शारीरिक अथवा वैवाहिक संबंध उन दो व्यक्तियों के बीच एक-दूसरे के साथ रक्त संबंधित हैं अथवा एक परिवार से संबंध रखते हैं। इस प्रकार के संबंध सभी मानवीय समाजों में वर्जित हैं। किसी भी संस्कृति में रक्त संबंधियों के बीच किसी प्रकार के लैंगिक संबंधों की आज्ञा नहीं होती है।

प्रश्न 7.
गोत्र किसे कहते हैं ?
उत्तर-
गोत्र रिश्तेदारों का समूह होता है जो किसी साझे पूर्वज की एक रेखीय संतान होते हैं। पूर्वज साधारणतया कल्पित ही होते हैं क्योंकि उनके बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता। यह बहिर्वैवाहिक समूह होते हैं। यह वंश समूह का ही विस्तृत रूप है जोकि माता या पिता के अनुरेखित रक्त संबंधियों से बनता है।

प्रश्न 8.
सलिंग तथा विलिंग सहोदर विवाह के मध्य अन्तर कीजिए।
उत्तर-

  • सलिंग विवाह एक प्रकार का विवाह है जिसमें दो भाइयों या दो बहनों के बच्चों का विवाह कर दिया जाता है। मुसलमानों में यह विवाह प्रचलित है।
  • विलिंग सहोदर विवाह में व्यक्ति के मामा की बेटी या बुआ की लड़की के साथ विवाह हो जाता है। इस प्रकार के विवाह गोंड, उराओं तथा खड़िया जनजातियों में प्रचलित हैं।

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प्रश्न 9.
निकटता तथा दूरी के आधार पर नातेदारी को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-
निकटता तथा दूरी के आधार पर तीन प्रकार की नातेदारी होती है-

  • प्राथमिक रिश्तेदार-वह रिश्तेदार जिनके साथ हमारा सीधा तथा नज़दीक का रक्त संबंध होता है जैसे कि माता-पिता, भाई-बहन।
  • द्वितीय रिश्तेदार-यह हमारे प्राथमिक रिश्तेदारों के प्राथमिक रिश्तेदार होते हैं जैसे कि पिता के पितादादा।
  • तृतीय रिश्तेदार-वह रिश्तेदार जो हमारे द्वितीय संबंधियों के प्राथमिक रिश्तेदार होते हैं जैसे कि चाचा की पत्नी-चाची।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्थाओं पर संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
1. विवाह-विवाह सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है जिसकी सहायता से व्यक्ति को अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाने तथा बच्चे पैदा करने की आज्ञा होती है। विवाह के बाद ही परिवार का निर्माण होता है।

2. परिवार-जब व्यक्ति विवाह करता है तथा बच्चे पैदा करता है तो परिवार का निर्माण होता है। परिवार ही व्यक्ति को जीवन जीने के तरीके सिखाता है तथा उसे समाज में रहने के तरीके सिखाता है।

3. नातेदारी-नातेदारी रिश्तेदारों की व्यवस्था है जिसमें रक्त संबंधी व वैवाहिक संबंधी रिश्तेदार शामिल होते हैं। रिश्तेदारी के बिना व्यक्ति जीवन जी नहीं सकता है।

प्रश्न 2.
विवाह की महत्त्वपूर्ण विशेषताएं कौन-सी हैं ?
उत्तर-

  • विवाह एक सर्वव्यापक संस्था है जो प्रत्येक समाज में पाई जाती है।
  • विवाह लैंगिक संबंधों को सीमित तथा नियन्त्रित करता है।
  • विवाह से व्यक्ति के लैंगिक संबंधों को सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है।
  • विवाह से स्त्री व पुरुष को सामाजिक स्थिति प्राप्त हो जाती है।
  • अलग-अलग समाजों में अलग-अलग प्रकार के विवाह होते हैं।
  • इसकी सहायता से धार्मिक रीति-रिवाजों को सुरक्षित रखा जाता है।

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प्रश्न 3.
विवाह के स्वरूपों के रूप में एक विवाह तथा बहविवाह के बीच विवाह के मध्य अंतर कीजिए।
उत्तर-
1. एक विवाह-आजकल के समय में एक विवाह का प्रचलन सबसे अधिक है। इस प्रकार के विवाह में एक पुरुष एक समय में एक ही स्त्री से विवाह करवा सकता है। इसमें एक पति या पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह ग़ैर-कानूनी है। पति-पत्नी के संबंध गहरे, स्थायी तथा प्यार से भरपूर होते हैं।

2. बहुविवाह-बहुविवाह का अर्थ है एक से अधिक विवाह करवाना। अगर एक स्त्री या पुरुष एक से अधिक विवाह करवाए तो इसे बहुविवाह कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है-बहुपत्नी विवाह तथा बहुपति विवाह । बहुपति विवाह दो प्रकार का होता है-भ्रातृ बहुपति विवाह तथा गैर-भ्रातृ बहुपति विवाह।

प्रश्न 4.
परिवार के प्रकार्यों को समझाइये।
उत्तर-

  • परिवार में बच्चे का समाजीकरण होता है। परिवार में व्यक्ति समाज में रहने के तौर-तरीके सीख़ता है तथा अच्छा नागरिक बनता है।
  • परिवार हमारी संस्कृति को संभालता है। प्रत्येक परिवार अपने बच्चों को संस्कृति देता है जिससे संस्कृति का पीढ़ी दर पीढ़ी संचार होता रहता है।
  • परिवार में व्यक्ति की संपत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाती है तथा इससे व्यक्ति के जीवन भर की कमाई सुरक्षित रह जाती है।
  • पैसे की आवश्यकता व्यक्ति की आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए होती हैं तथा इस कारण ही परिवार पैसे का भी प्रबन्ध करता है।
  • परिवार व्यक्ति के ऊपर नियन्त्रण रखता है ताकि वह गलत रास्ते पर न जाए।

प्रश्न 5.
(अ) अनुलोम (ब) प्रतिलोम (स) लेवीरेट/ देवर विवाह (द) सोरोरेट/साली विवाह जैसी अवधारणाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
(अ) अनुलोम-यह एक प्रकार का सामाजिक नियम है जिसके अनुसार उच्च जाति का लड़का निम्न जाति की लड़की से विवाह कर सकता है।
प्रतिलोम-यह एक प्रकार का विवाह है जिसमें निम्न जाति का लड़का उच्च जाति की लड़की से विवाह करता है। इस प्रकार के विवाह को मान्यता नहीं मिलती है।

(ब) अनुलोम-यह एक प्रकार का सामाजिक नियम है जिसके अनुसार उच्च जाति का लड़का निम्न जाति की लड़की से विवाह कर सकता है।
प्रतिलोम-यह एक प्रकार का विवाह है जिसमें निम्न जाति का लड़का उच्च जाति की लड़की से विवाह करता है। इस प्रकार के विवाह को मान्यता नहीं मिलती है।

(स) देवर विवाह-विवाह की इस प्रथा में पति की मृत्यु के पश्चात् पत्नी पति के छोटे भाई से विवाह कर लेती है। इससे परिवार की जायदाद सुरक्षित रह जाती है तथा परिवार टूटने से बच जाता है। बच्चों का पालन-पोषण ठीक ढंग से हो जाता है।

(द) साली विवाह-इस विवाह में पुरुष अपनी पत्नी की मृत्यु के पश्चात् अपनी साली से विवाह करवा लेता है। यह दो प्रकार का होता है-सीमित साली विवाह तथा समकालीन साली विवाह।

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IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें :

प्रश्न 1.
संस्था से आप क्या समझते हैं ? इसकी विशेषताएं बताइये।
उत्तर-
संस्था का अर्थ (Meaning of Institution)-हम अपने जीवन में हजारों बार इस संस्था शब्द का प्रयोग करते हैं। एक आम इन्सान की नज़र में संस्था का अर्थ किसी इमारत (Building) तक ही सीमित रहता है जबकि एक समाज शास्त्री की नज़र में इसका अर्थ किसी इमारत या लोगों के समूह से नहीं लिया जाता। समाज शास्त्री तो संस्था का अर्थ विस्तृत शब्दों में तथा समाज के अनुसार करते हैं। इनके अनुसार एक संस्था नियमों तथा परिमापों की व्यवस्था है जो मनुष्य की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में मदद करती हैं। इस तरह संस्था तो व्यक्तियों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए रूढ़ियों तथा लोक रीतियों का समूह है। यह तो वह प्रक्रिया है जिनकी मदद से व्यक्ति अपने कार्य करता है। संस्था तो सम्बन्धों की वह संगठित व्यवस्था है जिसमें समाज की कीमतें शामिल होती हैं तथा जो समाज की आवश्यकताओं को पूरा करती है। इसका कार्य मनुष्य की आवश्यताओं को पूरा करना होता है तथा मनुष्य के कार्य तथा व्यवहारों को पूरा करना होता है। इसमें पदों तथा भूमिकाओं का भी जाल होता है तथा इन्हें विभाजित किया जाता है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि संस्था मनुष्य की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कार्यविधियां, व्यवस्थाओं तथा नियमों का संगठन है। मनुष्य को अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए अनेक समूहों का सदस्य बनना पड़ता है। हर समूह में अपने सदस्यों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बहुत कोशिशें होती रहती हैं। बहुत-सी सफल तथा असफल कोशिशों के बाद समूह अपने सदस्य की ज़रूरतों को पूरा करने के तरीके ढूंढ लेता है तथा समूह के सभी सदस्य इन तरीकों को मान लेते हैं। इस तरह समूह के सभी नहीं तो ज्यादातर सदस्य इनको मान लेते हैं। इस तरह समाज में कुछ विशेष हालातों के लिए कुछ विशेष प्रकार के तरीके निर्धारित हो जाते हैं तथा इन तरीकों के विरुद्ध काम करना ठीक नहीं समझा जाता। इस तरह मनुष्यों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करना तथा सभी के द्वारा मान्यता प्राप्त कार्यविधियों को संस्था कहते हैं।

परिभाषाएं (Definitions) –

  • मैरिल तथा एलडरिज़ (Meril and Eldridge) के अनुसार, “सामाजिक संस्थाएं सामाजिक प्रतिमान हैं जोकि मनुष्य प्राणियों के अपने मौलिक कार्यों को करने में व्यवस्थित व्यवहार को स्थापित करती है।”
  • एलवुड (Elwood) के अनुसार, “संस्था इकट्ठे मिलकर रहने के प्रतिमानित तरीके हैं जो समुदाय की सत्ता द्वारा स्वीकृत, व्यवस्थित तथा स्थापित किए गए हों।”
  • सुदरलैंड (Sutherland) के अनुसार, “समाजशास्त्रीय भाषा में संस्था उन लोक रीतों तथा रूढ़ियों का समूह है जो मनुष्यों के उद्देश्यों या लक्षणों को प्राप्ति में केन्द्रित हो जाता है।”

इस तरह उपरोक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्था का विकास किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही हुआ है। इसलिए यह रीति-रिवाजों, परिमापों, नियमों, कीमतों आदि का भी समूह है। समनर (sumner) ने अपनी पुस्तक “Folkways” में, सामाजिक संरचना को भी संस्था में शामिल कर लिया है। संस्था व्यक्ति को व्यक्तिगत व्यवहार के तरीके पेश करती है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि संस्था क्रियाओं का वह संगठन होता है, जिसे समाज किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वीकार कर लेता है। समाज में अलगअलग सभाएं पाई जाती हैं तथा हर एक सभा की अपनी ही संस्था होती है, जिसके द्वारा वह अपने उद्देश्य की पूर्ति कर लेती है। उदाहरण के लिए राज्य की संस्था सरकार होती है। यह संस्थाएं व्यक्तियों को आपस में बाँध कर रखती हैं।

संस्था की विशेषताएं (Characteristics of Institution) –

1. यह सांस्कृतिक तत्त्वों से बनती है (It is made up of cultural things)-समाज में संस्कृति के जो तत्त्व मौजूद होते हैं जैसे रूढ़ियों, लोकरीतियों, परिमाप, प्रतीमान के संगठन को संस्था कहते हैं। एक समाज शास्त्री ने तो इसे प्रथाओं का गुच्छा कहा है। जब समाज में मिलने वाली प्रथाएं रीति-रिवाज, लोकरीतियां, रूढियां संगठित हो जाती हैं तथा एक व्यवस्था का रूप धारण कर लेती हैं तो यह संस्था है। इस तरह व्यवस्था संस्कृति में मिलने वाले तत्त्वों से बनती है तथा यह फिर मनुष्य की अलग-अलग आवश्यकताओं को पूरा करती है।

2. यह स्थायी होती है (It is Permanent) एक संस्था तब तक उपयोगी नहीं हो सकती जब तक वह ज्यादा समय तक लोगों की ज़रूरतों को पूरा न करे। अगर वह कम समय तक लोगों की आवश्यकता को पूरा करती है तो वह संस्था नहीं बल्कि सभा कहलाएगी। इस तरह संस्था अधिक समय तक लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करती है। इसका यह अर्थ नहीं है कि संस्था कभी भी अलोप हो सकती है। किसी भी संस्था मांग समय के अनुसार होती है। किसी विशेष समय में किसी संस्था की मांग कम भी हो सकती है तथा अधिक भी। अगर किसी समय में किसी संस्था की आवश्यकता नहीं होती या कोई संस्था अगर लोगों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती तो वह धीरे-धीरे अलोप हो जाती है।

3. इसके कुछ विशेष उद्देश्य होते हैं (It has some special motives or objectives)-जब भी संस्था का निर्माण होता है तो उसका कोई विशेष उद्देश्य होता है। संस्था को यह ज्ञान होता है कि अगर वह बन रही है तो उसके क्या उद्देश्य हैं। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों की विशेष प्रकार की ज़रूरतों को पूरा करना है। इस तरह लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना ही इनका विशेष उद्देश्य होता है परन्तु फिर भी यह हो सकता है कि समय बदलने के साथ-साथ संस्था लोगों की आवश्यकताओं को पूरा न कर सके तो फिर इन स्थितियों में उसकी जगह कोई और संस्था उत्पन्न हो जाती है।

4. संस्कृति के उपकरण (Cultural Equipments)-संस्था के उद्देश्य की पूर्ति के लिए संस्कृति के भौतिक पक्ष का सहारा लिया जाता है, जैसे फर्नीचर, ईमारत इत्यादि। इनका रूप तथा व्यवहार दोनों ही निश्चित किए जाते हैं। इस तरह अगर संस्था को अपने उद्देश्य पूरे करने हैं तो उसे भौतिक संस्कृति से बहुत कुछ लेना पड़ता है। अभौतिक संस्कृति जैसे विचार, लोक रीतियां, रूढ़ियां इत्यादि तो पहले ही संस्था में रहते हैं।

5. अमूर्तता (Abstractness)—जैसे कि ऊपर बताया गया है कि संस्था का विकास लोक रीतियों, रूढ़ियों, रिवाजों के साथ होता है। ये सभी अभौतिक संस्कृति का ही भाग हैं तथा अभौतिक संस्कृति के इन पक्षों को हम देख नहीं सकते केवल महसूस कर सकते हैं। इस तरह संस्था में अमूर्त्तता का पक्ष शामिल होता है। इसे स्पर्श नहीं सकते केवल महसूस किया जा सकता है। संस्था किसी स्पर्श करने वाली वस्तुओं का संगठन नहीं बल्कि नियमों, कार्य प्रणालियों, लोक रीतों का संगठन है जोकि मनुष्य की ज़रूरत को पूरा करने के लिए विकसित होती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 2.
एक सामाजिक संस्था के रूप में विवाह पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
विवाह स्त्री व पुरुष का समाज की ओर से स्वीकृत मेल है जो नए गृहस्थ का निर्माण करता है। विवाह न केवल आदमी व औरत के सम्बन्धों को ही मान्यता प्रदान करता है बल्कि इससे अन्य सम्बन्धों को भी मान्यता मिलती है। विवाह का अर्थ केवल सम्भोग नहीं है बल्कि विवाह परिवार की नींव है। विवाह की सहायता से व्यक्ति लैंगिक सम्बन्धों में प्रवेश करता है, घर बसाता है व सन्तान पैदा करके उसका पालन-पोषण करता है।

विवाह का अर्थ (Meaning of Marriage)-साधारण शब्दों में विवाह से अर्थ केवल लिंग सम्बन्धों की पूर्ति तक ही लिया जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह अर्थ बिल्कुल ही अधूरा है। विवाह का अर्थ है कि उस संस्था में विरोधी लिंगों के मेल जिसके द्वारा परिवार का निर्माण हो व समाज के द्वारा स्वीकारा जाए अर्थात् विवाह की संस्था का अर्थ केवल लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति ही नहीं बल्कि सामाजिक स्वीकृति से भी जोड़ते हैं।

विवाह की परिभाषाएं (Definitions of Marriage) –
1. मजूमदार (Majumdar) के अनुसार, “विवाह पुरुष व स्त्री का सामाजिक तौर से स्वीकार किया हुआ मेल होता है या पुरुष व स्त्री के मेल और सम्भोग को मान्यता प्रदान करने के लिए समाज द्वारा निकाली एक प्रतिनिधि या गौण संस्था है जिसका उद्देश्य है-(1) घर की स्थापना (2) लैंगिक सम्बन्धों में प्रवेश (3) बच्चे पैदा करना (4) बच्चों का पालन-पोषण करना ।”

2. वैस्टर मार्क (Western Mark) के अनुसार, “विवाह एक या अधिक पुरुषों का एक या अधिक स्त्रियों से होने वाला वह सम्बन्ध है, जो प्रथा या कानून द्वारा स्वीकार किया गया है जिसमें विवाह के दोनों पक्षों के और उनसे पैदा होने वाले बच्चों के अधिकार व कर्त्तव्य भी शामिल होते हैं।”

3. एण्डर्सन व पार्कर (Anderson and Parker) के अनुसार, “विवाह एक या ज्यादा पुरुषों व एक या अधिक स्त्रियों के बीच समाज द्वारा स्वीकारा स्थायी सम्बन्ध है, जिसमें पितृत्व हेतु सम्भोग की आज्ञा होती है।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि विवाह की संस्था एक ऐसी संस्था है, जिसके ऊपर हमारे समाज की संरचना भी निर्भर करती है। आदमी व औरत के लैंगिक सम्बन्धों को नियमित करके ही हम बच्चों के पालन-पोषण पर ध्यान दे सकते हैं। इसी कारण इस संस्था को सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त होती है। जब यह लिंग सम्बन्ध समाज के द्वारा स्वीकारे बिना ही स्थापित हो जाएं तो हम उस विवाह को या उन सम्बन्धों को गैर-कानूनी करार दे देते हैं व पैदा हुए बच्चों के लिए भी ‘नाजायज़ बच्चा’ (illegal child) शब्द का प्रयोग करते हैं। इस कारण विवाह का अर्थ केवल लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति ही नहीं बल्कि व्यक्ति इस संस्था का सदस्य बन कर कई और तरह के काम करता है, जो समाज के विकास के लिए ज़रूरी होते हैं।

प्रश्न 3.
विवाह के विभिन्न प्रकारों अथवा स्वरूपों को विस्तार से समझाइये।
उत्तर-
प्रत्येक समाज अपने आप में दूसरे समाज से अलग है। प्रत्येक समाज के अपने-अपने नियम, परम्पराएं व संस्थाएं होती हैं व प्रत्येक समाज में अलग-अलग संस्थाओं के भिन्न-भिन्न प्रकार होते हैं। क्योंकि प्रत्येक समाज में इन प्रकारों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बनाया जाता है। इस तरह विवाह नामक संस्था की अलगअलग समाजों में उनकी आवश्यकताओं के मुताबिक प्रकार किस्में या रूप हैं। इन रूपों का वर्णन निम्नलिखित है-

1. एक विवाह (Monogamy)-आजकल के आधुनिक युग में एक विवाह का प्रचलन अधिक है। इस तरह से विवाह में एक आदमी एक समय में एक ही औरत से विवाह करवा सकता है। एक पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह ग़ैर-कानूनी है। इसमें पति-पत्नी के सम्बन्ध अधिक स्थाई, गहरे, प्यार व हमदर्दी पूर्ण होते हैं। इसमें बच्चों का पालन-पोषण सही ढंग से हो सकता है और उन्हें माता-पिता का भरपूर प्यार मिलता है। इस तरह के विवाह में पति-पत्नी में पूरा तालमेल होता है जिससे परिवार में झगड़े होने की सम्भावना काफ़ी कम रहती है। किन्तु इस तरह के विवाह में कई समस्याएं भी हैं। पत्नी अथवा पति के अस्वस्थ होने पर सारे काम रुक जाते हैं व बच्चों की ओर पूरा ध्यान नहीं दिया जा सकता।

2. बहु पति विवाह (Polyandry)- इसमें एक स्त्री के कई पति होते हैं। यह आगे दो प्रकार का होता है।

(i) भ्रातृ बहुपति विवाह (Fraternal Polyandry)-इस विवाह के अनुसार स्त्री के सारे पति आपस में भाई होते हैं पर कभी-कभी ये सगे भाई न होकर एक ही जाति के व्यक्ति भी होते हैं। इस विवाह की प्रथा में सबसे बड़ा भाई एक स्त्री से विवाह करता है और उसके सब भाई उस पर पत्नी के रूप में अधिकार मानते हैं व सारे उससे लैंगिक सम्बन्ध रखते हैं। यदि कोई छोटा भाई विवाह करता है तो उसकी पत्नी भी सब भाइयों की पत्नी होती है जितने बच्चे होते हैं वह सब बड़े भाई के माने जाते हैं व सम्पत्ति में अधिकार भी सबसे अधिक बड़े भाई या सबसे पहले पति का होता है। भारत में ये प्रथा मालाबार, पंजाब, नीलगिरि, लद्दाख, सिक्किम व आसाम में पाई जाती है।

(ii) गैर-भ्रातृ बहुपति विवाह (Non Fraternal Polyandry) बहुपति विवाह के इस प्रकार में एक स्त्री के पति आपस में भाई नहीं होते। यह सब पति भिन्न-भिन्न स्थान के रहने वाले होते हैं। ऐसे हालात में स्त्री निश्चित समय के लिए एक पति के पास रहती है व फिर दूसरे के पास व फिर तीसरे के पास। इस तरह सम्पूर्ण वर्ष वह अलग-अलग पतियों के पास जीवन व्यतीत करती है। जिस समय में एक स्त्री एक पति के पास रहती है उस समय दौरान दूसरे पतियों को उससे सम्बन्ध बनाने का अधिकार नहीं होता। बच्चा होने के पश्चात् कोई एक पति एक विशेष संस्कार से उसका पिता बन जाता है। वह गर्भावस्था में स्त्री को तीर कमान भेंट करता है व उसे बच्चे का पिता मान लिया जाता है। बारी-बारी सभी पतियों को ऐसा करने दिया जाता है।

3. बहु-पत्नी विवाह (Polygyny)-बहु-पत्नी विवाह की प्रथा भारतवर्ष में पुराने समय में प्रचलित थी। राजा और उसके बड़े-बड़े मन्त्री बहुत सी पत्नियों को रखा करते थे। उस समय राजा के स्तर का अनुमान उसके द्वारा रखी गयी पत्नियों से होता था। मध्यकाल में भी मुग़ल वंशों में बहुत-सी पत्नियां रखने की प्रथा प्रचलित थी और अब भी मुसलमानों में चार विवाहों की प्रथा प्रचलित है। पुरुष की लैंगिक इच्छा को पूरा करने और परिवार की इच्छा को पूरा करने के कारण विवाह की इस प्रथा को अपनाया गया। इस प्रथा से समाज में बहुत सी समस्याएं पैदा हो गयी हैं और समाज में स्त्री को निम्न स्तर प्राप्त होता है।

4. साली विवाह (Sarorate-Marriage)—इस विवाह में पुरुष अपनी पत्नी की बहन के साथ विवाह करता है। साली के साथ विवाह दो तरह का होता है। साली विवाह में पुरुष अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उसकी बहन के साथ विवाह करता है। समकाली साली विवाह में पति अपनी पत्नी की सभी छोटी बहनों को अपनी पत्नी जैसा समझ लेता है। विवाह की इस पहली प्रथा का प्रचलन दूसरी प्रथा से अधिक प्रचलित है। इस प्रथा में परिवार के टूटने की शंका नहीं रहती और बच्चों का पालन-पोषण अच्छी तरह से हो जाता है।

5. देवर विवाह (Levirate Marriage)-विवाह की इस प्रथा के अनुसार पत्नी अपने पति की मौत के बाद पति के छोटे भाई से विवाह करती है। इस प्रथा के कारण ही एक तो घर की जायदाद सुरक्षित रहती है और दूसरा परिवार भी टूटने से बच जाता है, तीसरा बच्चों का पालन-पोषण ठीक ढंग से हो जाता है। इस प्रथा के अनुसार लड़के के माता-पिता को लड़की के माता-पिता का मूल्य वापिस नहीं करना पड़ता।

6. प्रेम विवाह (Love Marriage)-आधुनिक समाज में प्रेम विवाह का प्रचलन भी बढ़ता जा रहा है। इस विवाह में लड़का और लड़की में कॉलेज में पढ़ते हुए या इकट्ठे दफ्तर में नौकरी करते हुए पहली नज़र में ही प्यार हो जाता है। उनमें आपस की मुलाकातों का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। वह दोनों होटल, सिनेमा, पार्क आदि में मिलते रहते हैं। वह सच्चे प्यार और आपस में जीने मरने की कसमें खाते हैं। समाज उनको विवाह करने से रोकता है और उनके रास्ते में कई तरह की समस्याएं खड़ी करने की कोशिश की जाती है पर वह दोनों अपने फैसले पर अटल रहते हैं। यदि लड़का और लड़की के माता-पिता उनके विवाह को इजाजत नहीं देते हैं। वह दोनों अदालत में जाकर कानूनी तौर पर विवाह कर लेते हैं। इस तरह इस विवाह को प्रेम विवाह कहा जाता है।

7. अन्तर्विवाह (Endogamy)—अन्तर्विवाह के अन्तर्गत व्यक्ति को अपनी ही जाति की स्त्री से विवाह करवाना पड़ता था। अन्तर्विवाह के गुणों का वर्णन इस प्रकार है। इसके साथ रक्त की शुद्धता को सम्भाल कर रखा जाता है। इसके साथ समाज में एकता को बनाये रखा जाता है। इसके साथ सामूहिक जाति की सम्पत्ति सुरक्षित रहती है। इस विवाह में स्त्रियां काफ़ी खुश रहती हैं क्योंकि अपनी ही संस्कृति मिलने से उनका आपस में तालमेल अच्छा बैठता है। परन्तु दूसरी तरफ इस तरह का विवाह देश की एकता में रुकावट पैदा करता है। इस तरह जातिवाद को बढ़ावा मिलता है जिससे सामाजिक प्रगति में रुकावट पैदा होती है।

8. बहिर्विवाह (Exogemy)-बहिर्विवाह का अर्थ अपने गोत्र अपने गांव के बाहर वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करना है। एक ही गोत्र और गांव के आदमी और औरत आपस में भाई-बहन माने जाते हैं। वैस्टमार्क के अनुसार ऐसे विवाह का उद्देश्य नज़दीकी रिश्तेदारी में यौन सम्बन्धों को स्थापित न करना। यह विवाह प्रगतिवाद का सूचक है। इस विवाह से अलग-अलग समूहों में सम्बन्ध बढ़ता है। जैविक दृष्टिकोण से भी इस विवाह को उचित माना गया है। इस विवाह का सबसे बड़ा अवगुण यह है कि इसमें लड़का और लड़की को एक-दूसरे के विचारों को समझने में मुश्किल होती है। बर्हिविवाह करने से अलग-अलग समूहों में प्यार बढ़ता है। इस तरह राष्ट्रीय एकता की भावना को बल मिलता है।

9. अनुलोम विवाह (Anulom Marriage)-अनुलोम हिन्दू विवाह का एक नियम है जिसमें उच्च जाति या पुरुष अपने से नीची जाति की लड़कियों से विवाह कर सकता है। उदाहरण के तौर पर एक ब्राह्मण व्यक्ति क्षत्रिय, वैश्य और निम्न जाति की लड़की के साथ विवाह कर सकता था। इसका मुख्य कारण निम्न जाति के लोग उच्च जाति में विवाह करना अपनी इज्जत समझते थे क्योंकि इस तरह के विवाह से उनको भी समाज में उच्च स्थान मिल जाता था।

10. प्रतिलोम विवाह (Pratilom Marriage)–इस तरह के विवाह में निम्न जाति के पुरुष उच्च जाति की स्त्रियों के साथ विवाह करते थे। मनु ने इस तरह के विवाह का सख्त विरोध किया है। मनु के अनुसार इस तरह के विवाह से पैदा हुई सन्तान को अस्पृश्य माना जाता है। मनु ने ब्राह्मण स्त्री और निम्न जाति पुरुष से पैदा हुई सन्तान को चंडाल की संज्ञा दी थी। इसलिए इस तरह का विवाह हमेशा संकीर्णता के साथ देखा गया है। इस तरह से पैदा हुई सन्तान को किसी भी वंश के नाम को धारण नहीं कर सकती थी।

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प्रश्न 4.
विवाह को परिभाषित कीजिए। जीवन साथी चुनने के नियमों को विस्तार से लिखिए।
उत्तर-
विवाह स्त्री व पुरुष का समाज की ओर से स्वीकृत मेल है जो नए गृहस्थ का निर्माण करता है। विवाह न केवल आदमी व औरत के सम्बन्धों को ही मान्यता प्रदान करता है बल्कि इससे अन्य सम्बन्धों को भी मान्यता मिलती है। विवाह का अर्थ केवल सम्भोग नहीं है बल्कि विवाह परिवार की नींव है। विवाह की सहायता से व्यक्ति लैंगिक सम्बन्धों में प्रवेश करता है, घर बसाता है व सन्तान पैदा करके उसका पालन-पोषण करता है।

विवाह का अर्थ (Meaning of Marriage)-साधारण शब्दों में विवाह से अर्थ केवल लिंग सम्बन्धों की पूर्ति तक ही लिया जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह अर्थ बिल्कुल ही अधूरा है। विवाह का अर्थ है कि उस संस्था में विरोधी लिंगों के मेल जिसके द्वारा परिवार का निर्माण हो व समाज के द्वारा स्वीकारा जाए अर्थात् विवाह की संस्था का अर्थ केवल लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति ही नहीं बल्कि सामाजिक स्वीकृति से भी जोड़ते हैं।

विवाह की परिभाषाएं (Definitions of Marriage) –
1. मजूमदार (Majumdar) के अनुसार, “विवाह पुरुष व स्त्री का सामाजिक तौर से स्वीकार किया हुआ मेल होता है या पुरुष व स्त्री के मेल और सम्भोग को मान्यता प्रदान करने के लिए समाज द्वारा निकाली एक प्रतिनिधि या गौण संस्था है जिसका उद्देश्य है-(1) घर की स्थापना (2) लैंगिक सम्बन्धों में प्रवेश (3) बच्चे पैदा करना (4) बच्चों का पालन-पोषण करना ।”

2. वैस्टर मार्क (Western Mark) के अनुसार, “विवाह एक या अधिक पुरुषों का एक या अधिक स्त्रियों से होने वाला वह सम्बन्ध है, जो प्रथा या कानून द्वारा स्वीकार किया गया है जिसमें विवाह के दोनों पक्षों के और उनसे पैदा होने वाले बच्चों के अधिकार व कर्त्तव्य भी शामिल होते हैं।”

3. एण्डर्सन व पार्कर (Anderson and Parker) के अनुसार, “विवाह एक या ज्यादा पुरुषों व एक या अधिक स्त्रियों के बीच समाज द्वारा स्वीकारा स्थायी सम्बन्ध है, जिसमें पितृत्व हेतु सम्भोग की आज्ञा होती है।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि विवाह की संस्था एक ऐसी संस्था है, जिसके ऊपर हमारे समाज की संरचना भी निर्भर करती है। आदमी व औरत के लैंगिक सम्बन्धों को नियमित करके ही हम बच्चों के पालन-पोषण पर ध्यान दे सकते हैं। इसी कारण इस संस्था को सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त होती है। जब यह लिंग सम्बन्ध समाज के द्वारा स्वीकारे बिना ही स्थापित हो जाएं तो हम उस विवाह को या उन सम्बन्धों को गैर-कानूनी करार दे देते हैं व पैदा हुए बच्चों के लिए भी ‘नाजायज़ बच्चा’ (illegal child) शब्द का प्रयोग करते हैं। इस कारण विवाह का अर्थ केवल लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति ही नहीं बल्कि व्यक्ति इस संस्था का सदस्य बन कर कई और तरह के काम करता है, जो समाज के विकास के लिए ज़रूरी होते हैं।

साथी के चुनाव के नियम (Rules of Mate Selection)—प्रत्येक समाज में जीवन साथी के चुनाव के नियम पाए जाते हैं, जो व्यक्ति को यह बताते हैं कि वह किस लड़की या लड़के से विवाह करवा सकता है व किससे नहीं करवा सकता यह नियम निम्नलिखित है-

  1. अन्तर्विवाह (Endogamy)
  2. बहिर्विवाह (Exogamy) –
  3. अनुलोम (Hyperpamy)
  4. प्रतिलोम (Hypogamy)

अन्तर्विवाह (Endogamy)-अन्तर्विवाह के नियम के द्वारा व्यक्ति को अपनी जाति में ही विवाह करवाना पड़ता था। जाति आगे उप-जातियों में (Sub-caste) बंटी हुई थी। इस प्रकार व्यक्ति को उपजाति में ही विवाह करवाना पड़ता था। जाति प्रथा के समय अन्तः विवाह के इस नियम को बहुत सख्ती से लागू किया गया था। यदि कोई व्यक्ति इस नियम की उल्लंघना करता था तो उसको जाति में से बाहर निकाल दिया जाता था व उससे हर तरह के सम्बन्ध भी तोड़ लिए जाते थे। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार समाज को चार जातियों में बांटा हुआ था।

यह जातियां आगे उप-जातियों में बंटी हुई थीं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी उप-जाति में ही विवाह करवाता था। वर्तमान भारतीय समाज में विवाह के इस रूप में काफ़ी परिवर्तन देखने को मिलता है।

होईबल (Hoebal) के अनुसार, “अन्तर्विवाह एक सामाजिक नियम है जो यह मांग करता है कि व्यक्ति अपने सामाजिक समूह में जिसका वह सदस्य है विवाह करवाए।”
(“Endogamy is a social rule which demands that a person should marry with in a group at in which he is a member.”)

बहिर्विवाह (Exogamy) – विवाह की संस्था एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। कोई भी समाज किसी जोडे को बिना विवाह के पति-पत्नी के सम्बन्धों को स्थापित करने की स्वीकृति नहीं देता। इसी कारण प्रत्येक समाज विवाह स्थापित करने के लिए कुछ नियम बना लेता है। सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य साथी का चुनाव करना होता है। बहिर्विवाह में भी साथी के चुनाव करने का नियम होता है।

कई समाज में जिन व्यक्तियों में रक्त के सम्बन्ध होते हैं या अन्य किसी किस्म से वह एक-दूसरे से सम्बन्धित हों तो ऐसी अवस्था में उन्हें विवाह करने की स्वीकृति नहीं दी जाती।

इस प्रकार बहिर्विवाह का अर्थ होता है कि व्यक्ति को अपने समूह में विवाह करवाने की मनाही होती है। एक ही माता-पिता के बच्चों को आपस में विवाह करने से रोका जाता है।

मुसलमानों में माता-पिता के रिश्तेदारों में विवाह करने की इजाजत दी जाती है। इंग्लैण्ड के रोमन कैथोलिक चर्च में व्यक्ति को अपनी पत्नी की मौत के पश्चात अपनी साली से विवाह करने की इजाजत नहीं दी जाती।
ऑस्ट्रेलिया में लड़का अपने पिता की पत्नी से विवाह कर सकता है यदि वह उसकी सगी मां नहीं है।

बर्हिविवाह के नियम अनुसार व्यक्ति को अपनी जाति, गोत्र, स्पर्वर, सपिंड आदि में विवाह करवाने की आज्ञा नहीं दी जाती इसके कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं

1. गोत्र बहिर्विवाह-गोत्र बहिर्विवाह का अर्थ यह होता है कि व्यक्ति को अपने गोत्र में विवाह करवाने की इजाजत नहीं दी जाती। अर्थात् एक ही गोत्र के व्यक्तियों में विवाहित सम्बन्ध स्थापित नहीं किए जा सकते। गोत्र का अर्थ गायों को पालने वाला समूह होता है। मैक्स मूलर के अनुसार जो लोग अपनी गायों को एक ही स्थान पर बाँधते थे, उनमें नैतिक सम्बन्ध स्थापित हो जाते थे जिस कारण वह आपस में विवाह नहीं करवा सकते थे। इस प्रकार गोत्र में उन व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जिनमें नैतिक सम्बन्ध या रक्त सम्बन्ध पाए जाएं। इसी कारण एक गोत्र के व्यक्ति को दूसरे गोत्र के व्यक्ति से विवाह करवाने की इजाजत नहीं दी जाती।

2. स्पर्वर बहिर्विवाह-स्पर्वर बहिर्विवाह के नियम अनुसार एक ही पर्वर (Pravara) के लड़के व लड़की को विवाह करवाने की इजाजत नहीं होती। पर्वर में उन व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जिनमें साझे ऋषि-पूर्वज होते हैं। इस प्रकार कोई भी व्यक्ति अपने पर्वर के पूर्वजों से सम्बन्धित औरत से विवाह नहीं करवा सकता।

3. सपिंडा बहिर्विवाह-सपिण्ड बहिर्विवाह के नियम अनुसार उन सभी व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जिनके माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी एक ही होते हैं। पुत्र के शरीर में माता-पिता दोनों के रक्त कण होते हैं। वैज्ञानिकों ने रक्त से सम्बन्धित रिश्तेदारों में माता द्वारा पांच पीढ़ियों व पिता द्वारा सात पीढ़ियों के व्यक्तियों को शामिल किया है। इस तरह से सम्बन्धित लोगों में पुरुष व स्त्री विवाह नहीं करवा सकते। माता व पिता की तरफ से पीढ़ियों को निश्चित करना समाज के अपने ऊपर निर्भर करता है।

गांव बहिर्विवाह-इस नियम के अनुसार एक गांव के व्यक्ति आपस में विवाह नहीं करवा सकते। उत्तरी भारत में विवाह का यह नियम काफ़ी प्रचलित है। एक ही गांव के व्यक्तियों को आपस में सगे-सम्बन्धियों से भी अधिक माना जाता है। जैसे पंजाब में आमतौर से यह शब्द कहे जाते हैं कि गांव की बहन बेटी सबकी ही होती इसके अतिरिक्त गांव में लोग एक-दूसरे को रिश्तेदारियों के नाम से ही बुलाना शुरू कर देते हैं।

5. टोटम बहिर्विवाह-इस विवाह के नियम के अनुसार एक टोटम की पूजा करने वाले व्यक्ति आपस में विवाह नहीं करवा सकते। टोटम का अर्थ किसी पौधे या जानवर आदि को अपना देवता मान लेते हैं। इस प्रकार का नियम भारत के कबाईली लोगों में पाया जाता है। इसमें व्यक्ति अपने टोटम से बर्हिविवाह करवाता है।

अनुलोम विवाह (Hypergamy)-अनुलोम विवाह का वह नियम होता है जिसमें लड़की का विवाह उसके बराबर या उससे ऊंची जाति वाले लड़के के साथ किया जाता है। दूसरे अर्थ अनुसार उच्च जाति का पुरुष, निम्न जाति की स्त्री से जब विवाह करवाता था तो उसे अनुलोम विवाह का नाम दिया जाता था। इस प्रकार के विवाह को कुलीन विवाह का नाम भी दिया जाता है। इस प्रकार के विवाह में ब्राह्मण लड़की, केवल ब्राह्मण लड़के से ही विवाह करवा सकती है। क्षत्रिय लड़की क्षत्रिय लड़के या ब्राह्मण लड़के से विवाह करवा सकती है। वैश्य लड़की वैश्य लड़के या क्षत्रिय लड़के या ब्राह्मण लड़के से विवाह करवा सकती है।

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण लड़का किसी भी जाति की लड़की से विवाह करवा सकता है। क्षत्रिय लड़का ब्राह्मण लड़की के अलावा बाकी किसी भी लड़की से विवाह करवा सकता है। वैश्य लड़का ब्राह्मण व क्षत्रिय लड़की के अलावा किसी भी लड़की से व निम्न जाति का लड़का केवल निम्न जाति की लड़की से ही विवाह करवा सकता है। जब अन्तः विवाह के द्वारा समाज में समस्याएं पैदा होनी आरम्भ हो गईं तो अनुलोम विवाह को प्रोत्साहन मिला।

कुलीन विवाह भी अनुलोम विवाह की भान्ति थे। इस नियम अनुसार एक ही जाति का व्यक्ति, उसी जाति या निम्न जाति की लड़की से विवाह करवा सकता था। कुलीन विवाह के पाए जाने के कुछ कारण भी थे। एक तो यह कि प्रत्येक कोई अपनी लड़की का विवाह उच्च जाति के लड़के से करना चाहता था। उच्च जाति में लड़कियों की कमी होनी शुरू हो जाती थी। इस कारण कई लड़कों को बिना विवाह के ही ज़िन्दगी गुजारनी पड़ जाती थी। लड़की की कीमत बढ़ जाती थी। कई बार उच्च जाति का वर ढूंढ़ते समय उन्हें बड़ी उम्र के व्यक्ति से अपनी लड़की का विवाह करना पड़ जाता था। बहु विवाह की प्रथा भी इसी नियम के कारण ही पाई जाती थी। इसके अतिरिक्त अनैतिकता में भी बढ़ोत्तरी हुई व औरत की स्थिति में काफ़ी गिरावट आई। इस प्रकार कुलीन विवाह की प्रथा ने भी हमारे भारतीय समाज में कई सामाजिक बुराइयां पैदा की जिन्हें समाप्त करने के लिए सरकार को कई कानून बनाने पड़े।

प्रतिलोम विवाह (Hypogamy)-अन्तर्जातीय विवाह का दूसरा नियम प्रतिलोम है। यह नियम अनुलोम के बिल्कुल विपरीत है। इस नियम के अनुसार निम्न जाति का लड़का उच्च जाति की लड़की से विवाह करवाता था। जैसे ब्राह्मण जाति की लड़की क्षत्रिय जाति के लड़के से विवाह करवाए या फिर क्षत्रिय जाति का लड़का ब्राह्मण लड़की से। प्रतिलोम विवाह के नियम में यदि निम्न जाति का लड़का उच्च जाति की लड़की से विवाह करवाता था तो उससे पैदा सन्तान किसी भी जाति में नहीं रखी जाती थी व उसको चाण्डाल कहा जाता था।

अन्तर्जातीय विवाह के दोनों रूप हमारे भारतीय समाज में विकसित रहे हैं। वर्तमान समाज में अन्तर्जातीय विवाह की पाबन्दी नहीं है। जाति प्रथा का भेद-भाव भी हमारे भारतीय समाज में समाप्त हो गया है। अन्तर्जातीय विवाह की मदद से हम भारतीय समाज में पाई जा रही कई सामाजिक बुराइयों का खात्मा कर सकेंगे।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 5.
परिवार किसे कहते हैं ? परिवार की मूलभूत विशेषताएं कौन-सी हैं ?
उत्तर-
यदि हम मानवीय समाज का अध्ययन करें तो हमें पता चलेगा कि सबसे पहला समूह परिवार ही है। प्राचीन समय में तो श्रम-विभाजन परिवारों के आधार पर ही होता था। हमें कोई भी समाज ऐसा नहीं मिलेगा जहां कि परिवार नाम की संस्था न हो। आदिम समाज से लेकर आधुनिक समाज तक प्रत्येक स्थान पर यह संस्था मौजूद रही है। चाहे और बहुत सारी संस्थाएं विकसित हैं या समाप्त हो गईं पर परिवार की संस्था वहीं पर ही खड़ी है। चाहे आजकल के विकसित समाज में परिवार का महत्त्व कुछ कम हो गया है, परिवार के बहुत सारे कार्य अन्य संस्थाओं ने ले लिए हैं, परन्तु आजकल भी मानव की अधिकतर क्रियाएं परिवार को केन्द्र मानकर ही होती हैं। मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जिस तरह का परिवार बच्चे को प्राप्त होता है, उसी प्रकार का चरित्र बच्चे का बनता है व वह उसी अनुसार आगे चलकर कार्य करता है। सामाजिक विघटन व समाज की बहुत सारी समस्याओं के कारण ही परिवार में विघटन होता है।

परिवार सामाजिक संगठन के लिए एक महत्त्वपूर्ण समूह है, अंग्रेजी शब्द ‘Family’ रोमन भाषा के शब्द ‘Famulous’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘नौकर’। रोमन कानून के अनुसार इस शब्द का अर्थ ऐसे समूह से है, जिसमें नौकर, दास या मालिक वह सभी सदस्य शामिल होते हैं जो रक्त सम्बन्धों या विवाह सम्बन्धों पर आधारित होते हैं। यह एक ऐसा समूह है, जो आदमी व औरत की लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए समाज द्वारा बनाया जाता है। बच्चा परिवार में पल कर बड़ा होता है व समाज का एक नागरिक बनता है।

साधारण शब्दों में परिवार का अर्थ पति-पत्नी व उनके बच्चों से है, पर समाज शास्त्र में इसका अर्थ केवल लोगों का संग्रह ही नहीं बल्कि उनके आपसी सम्बन्धों की व्यवस्था है व इसका मुख्य उद्देश्य बच्चे पैदा करना, उनका पालन-पोषण करना, समाजीकरण करना व लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति करना है।

परिभाषाएं (Definitions) –
1. मैकाइवर (Maclver) के अनुसार, “परिवार बच्चों की उत्पत्ति व पालन-पोषण की व्यवस्था करने के लिए काफ़ी रूप से निश्चित व स्थायी यौन सम्बन्धों से परिभाषित एक समूह है।”

2. जी० पी० मर्डोक (G. P. Murdock) के अनुसार, “परिवार एक ऐसा समूह है, जिसकी विशेषताएं साझी रिहायश, आर्थिक सहयोग व सन्तान की उत्पत्ति या प्रजनन हैं। इसमें दोनों लिंगों के बालिग शामिल होते हैं, जिनमें कम-से-कम दो में समाज द्वारा स्वीकृत लैंगिक सम्बन्ध होता है व लैंगिक सम्बन्धों में बने इन बालिगों में अपने या स्वीकृत एक या अधिक बच्चे होते हैं।”

3. एच० एम० जॉनसन (H. M. Johnson) के अनुसार, “परिवार रक्त, विवाह या गोद लेने के आधार पर सम्बद्ध दो या दो से अधिक व्यक्तियों का समूह है। इन सभी व्यक्तियों को एक परिवार का सदस्य समझा जाता है।”

इस प्रकार परिवार वह समूह है जिसमें आदमी व औरत के लैंगिक सम्बन्धों को समाज के द्वारा स्वीकृत किया जाता है। यह एक सर्व व्यापक समूह है। इसके अर्थ के बारे में अन्त में हम यह कह सकते हैं कि परिवार एक जैविक इकाई है जिसको लैंगिक सम्बन्धों के लिए एक संस्था के तौर पर स्वीकृत किया जाता है। इसमें सदस्य एक दूसरे से निजी रूप से प्रजनन की प्रक्रिया से जुड़े होते हैं। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि परिवार में मातापिता व बच्चों को शामिल किया जाता है, जो प्रत्येक समाज में विकसित हैं।

विशेषताएं (Characteristics)-

1. सर्वव्यापकता (Universality)-परिवार एक सामाजिक समूह है। यह मानवीय इतिहास में पहली संस्था के रूप में जाना जाता है क्योंकि प्रत्येक समय पर प्रत्येक समाज में यह किसी-न-किसी किस्म में विकसित रहा है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य ज़रूर होता है।

2. भावात्मक आधार (Emotional Basis)-परिवार मानवीय समाज की नींव होता है जो व्यक्ति की मूल प्रवृत्तियों पर आधारित होती है जैसे-सन्तान उत्पत्ति, पति-पत्नी सम्बन्ध, वंश परम्परा कायम रखना, जायदाद की सुरक्षा आदि जैसी भावनाएं भी इसमें सम्मिलित होती हैं व इसके साथ ही सहयोग, प्यार, त्याग इत्यादि की भावना का भी विकास होता है जो समाज की प्रगति व विकास के लिए भी आवश्यक होता है।

3. रचनात्मक प्रभाव (Formative Influence) सामाजिक संरचना में परिवार को एक महत्त्वपूर्ण इकाई माना जाता है। परिवार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए भी रचनात्मक प्रभाव डालता है। परिवार ही पहली ऐसी संस्था होती है जिसमें रहकर बच्चा सामाजिक व्यवहार के बारे में जानकारी लेता है। व्यक्ति का बहुपक्षीय विकास परिवार की संस्था में ही हो सकता है।

4. लघु आकार (Small Size)-परिवार का आकार सीमित होता है क्योंकि जिन्होंने जन्म लिया होता है या जिनमें विवाह के सम्बन्ध होते हैं उसे ही परिवार में शामिल किया जाता है। प्राचीन समय में जब कृषि प्रधान समाज होता था तो संयुक्त परिवार पाया जाता था जिसमें माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, ताया-ताई इकट्ठे मिलकर रहते थे। जैसे-जैसे समाज में शिक्षा का विकास हुआ, स्त्रियों का नौकरी करना आरम्भ हुआ इत्यादि के साथ मूल परिवार अस्तित्व में आया जिसमें माता-पिता व बच्चे ही केवल शामिल किए जाते हैं। छोटे आकार का अर्थ होता है कि परिवार में व्यक्ति की सदस्यता केवल जन्म पर आधारित होती है व इसमें रक्त सम्बन्ध भी पाए जाते हैं।

5. सामाजिक संरचना में केन्द्रीय स्थान (Central position in the Social Structure)-परिवार पर हमारा सारा समाज आधारित होता है व अलग-अलग सभाओं का निर्माण भी परिवार से ही होता है। इसी कारण सामाजिक संरचना में इसको केन्द्रीय स्थान प्राप्त होता है। आरम्भिक समाज में संगठन परिवार पर ही आधारित होता था। सामाजिक प्रगति भी इस पर आधारित होती थी। चाहे आजकल के समय में अन्य संस्थाओं ने परिवार के कई काम ले लिए हैं परन्तु फिर भी कुछ काम समाज के लिए परिवार जो कर सकता है, वह दूसरी संस्थाएं नहीं कर सकती।

6. सदस्यों की ज़िम्मेदारी (Responsibility of the members)—परिवार का प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे से जुड़ा होता है व परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को भी संभालते हैं। इसमें किसी भी सदस्य में स्वार्थ की भावना नहीं होती बल्कि वह जो कुछ भी करता है अपने परिवार के विकास के लिए ही करता है। यहां तक कि उसमें त्याग की भावना का विकास भी परिवार में रहकर ही होता है। जिस तरह के निजी सम्बन्ध परिवार के सदस्यों में पाए जाते हैं उस प्रकार के सम्बन्ध किसी दूसरी संस्था में नहीं पाए जाते। परिवार में यदि कोई भी व्यक्ति बीमार पड़ जाता है तो दूसरे सदस्य अपना फर्ज़ समझने लगते हैं कि उस व्यक्ति की सेवा करें। इस प्रकार उनमें सहयोग की भावना का भी विकास हो जाता है।

7. यौन सम्बन्ध (Sexual relation)-परिवार के द्वारा ही आदमी व औरत में यौन सम्बन्धों की स्थापना होती है क्योंकि समाज के द्वारा स्वीकृति भी विवाह के पश्चात् ही परिवार का निर्माण करने की होती है। आरम्भिक समाज में यौन सम्बन्धों की उत्पत्ति से सम्बन्धित किसी प्रकार के कोई नियम नहीं होते थे तो परिवार का वास्तविक रूप भी नहीं था। हमारे सामने समाज भी विघटन की दिशा की ओर अग्रसर था।

प्रश्न 6.
परिवार के विभिन्न प्रकारों को विस्तार से समझाइये ।
उत्तर-
अलग-अलग समाजों में अलग-अलग आधारों पर कई प्रकार के परिवार पाए जाते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-

(A) सत्ता के आधार पर परिवार के प्रकार (Types of Family on the Basis of Authority)-सत्ता के आधार पर परिवार के निम्नलिखित प्रकार हैं

  1. पित प्रधान परिवार (Patriarchal Family)
  2. मातृ प्रधान परिवार (Matriarchal Family)

1. पितृ प्रधान परिवार (Patriarchal Family)-इस प्रकार के परिवार की किस्म में सम्पूर्ण शक्ति आदमी के हाथ में होती है। परिवार का मुखिया भी आदमी को बनाया जाता है। वंश परम्परा भी पिता पर ही निर्भर होती है। विवाह के पश्चात् औरत, आदमी के घर रहने लग जाती है व जायदाद भी केवल लडकों के बीच बांटी जाती है। घर में सबसे बड़े लड़के को सबसे अधिक आदर व सम्मान मिलता है। उसकी घर में इज्ज़त पिता के बराबर ही होती है। घर के हर तरह के ज़रूरी मामलों में भी आदमियों की ही दखलअंदाजी को ठीक समझा जाता है। यदि हम प्राचीन हिन्दू समाज की तरफ देखें तो भी वैदिक ग्रन्थों के अनुसार आदमी को ही औरत के लिए परमात्मा समझा जाता था। पिता के मरने के पश्चात् उसके सारे अधिकार उनके पुत्र को मिल जाते हैं।

2. मातृ प्रधान परिवार (Matriarchal Family)-इस प्रकार के परिवार में स्त्री जाति की ही समाज में प्रधानता होती थी। घर की सारी जायदाद की मलकीयत भी उसके हाथ में होती थी। परिवार की स्त्रियों का ही सम्पत्ति पर अधिकार होता है। विवाह के पश्चात् लड़का-लड़की के घर रहने चला जाता था। पुरोहितों का काम भी स्त्रियां ही करती थीं। परिवार की जायदाद का विभाजन भी स्त्रियों के बीच ही होता था। स्त्री की वंश- परम्परा ही आगे चलती थी। मैकाइवर ने मात प्रधान परिवार की कुछ विशेषताओं का वर्णन किया जो निम्नानुसार है –

  • इन बच्चों का वंश परिवार में मां के वंश के साथ निर्धारित होता है। इसलिए बच्चे पिता के कुल के नहीं बल्कि मां के कुल से सम्बन्धित समझे जाते हैं।
  • स्त्री व उसकी मां, भाई-बहन व बहनों के बच्चे शामिल होते हैं।
  • इन परिवारों के बीच पुत्र को पिता से कोई सम्पत्ति नहीं प्राप्त होती क्योंकि सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार माता द्वारा निश्चित किए जाते हैं।
  • सामाजिक सम्मान के पद पुत्र की बजाए भांजे को मिलते हैं।
  • इन परिवारों का अर्थ यह नहीं कि समाज में सभी अधिकार औरतों के होते हैं, आदमियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होते। कई क्षेत्रों में पुरुषों को कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं, परन्तु मिलते औरतों के द्वारा ही हैं।

(B) विवाह के आधार पर परिवार के प्रकार (Types of Family On the Basis of Marriage)विवाह के आधार पर परिवार के निम्नलिखित प्रकार हैं

  1. एक विवाही परिवार (Monogamous Family)
  2. बहु-पत्नी विवाह (Polygamous Family)
  3. बहु-पति परिवार (Polyandrous Family)

1. एक विवाही परिवार (Monogamous Family)-जब एक पुरुष एक स्त्री से या एक स्त्री एक पुरुष से विवाह करवाती है तो इस विवाह के आधार पर जो परिवार पाया जाता है उसको एक विवाह परिवार का नाम दिया जाता है। आधुनिक समय में इस परिवार को अधिक महत्ता प्राप्त है। इस परिवार की किस्म में सदस्यों का रहन-सहन का दर्जा ऊंचा होता है। बच्चों की परवरिश बहुत अच्छे ढंग से होती है। पुरुष व स्त्री के सम्बन्धों में भी बराबरी पाई जाती है। इसमें बच्चों की संख्या भी बहुत कम होती है। जिस कारण परिवार का आकार छोटा होता है।

2. बहु-पत्नी परिवार (Polygamous Family)-परिवार की इस प्रकार में एक पुरुष कई स्त्रियों से विवाह करवाता है। आरम्भ के राजा-महाराजाओं के समय इस प्रकार के विवाह द्वारा पाए गए परिवार को महत्ता प्राप्त थी। राजा-महाराजा कितने-कितने विवाह करवा लेते थे व पैदा हुए बच्चों का सम्मान भी काफ़ी होता था। फर्क कई बार यह होता था कि पहली पत्नी से पैदा हुए बच्चे को राजगद्दी दी जाती थी। आधुनिक समय में भारत में कानून द्वारा इस प्रकार के विवाह की पाबन्दी लगा दी है।

3. बहु-पति परिवार (Polyandrous Family)-इस प्रकार के परिवार में एक स्त्री के कितने ही पति होते थे। इसमें दो प्रकार पाए जाते हैं। इस प्रकार के परिवार को भ्रातृ विवाही परिवार का नाम दिया जाता है व दूसरे प्रकार के परिवार में स्त्री के सभी पतियों का भाई होना ज़रूरी नहीं होता। इस कारण इसको गैर भ्रातृ विवाही परिवार का नाम दिया जाता है। इस प्रकार के परिवार में स्त्री बारी-बारी सभी पतियों के पास रहती है। कुछ कबायली समाज में अभी भी इस प्रकार के विवाह की प्रथा के आधार पर परिवार पाए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर देहरादून के ‘ख़स’ कबीले व आस्ट्रेलिया के कुछ कबीलों में भी इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

(C) वंश के आधार पर परिवार के प्रकार (Types of Family On the Basis of Nomenclature)-

  1. पितृ वंशी परिवार (Patrilineal)
  2. मातृ वंशी परिवार (Matrilineal)
  3. दो वंश-नामी परिवार (Bilinear)
  4. अरेखकी परिवार (Nonunilineal)

पितृ वंशी परिवार में व्यक्ति का वंश अपने पिता वाला होता है। इस प्रकार का परिवार आजकल भी पाया जा रहा है। मात वंशी परिवार में मां के वंश नाम ही बच्चों को प्राप्त होता है। दो वंश नामी परिवार में माता व पिता दोनों का वंश साथ-साथ चलता है व अरेखकी परिवार में वंश के रिश्तेदार जो माता द्वारा या पिता द्वारा होते हों, इसके आधार पर पाया जाता है।

(D) रहने के स्थान के आधार पर परिवार के प्रकार (Types of Family On the Basis of Residence)—इस आधार पर परिवार के तीन प्रकार हैं-

  1. पितृ स्थानीय परिवार (Patrilocal Family)
  2. मातृ स्थानीय परिवार (Matrilocal Family)
  3. नव-स्थानीय परिवार (Neolocal Family)

पितृ स्थानीय परिवार में विवाह के बाद लड़की पति के घर जाकर रहने लग जाती है व मातृ स्थानीय परिवार में पति विवाह के पश्चात् पत्नी के घर रहने लग जाता है व नव स्थानीय परिवार में विवाह के पश्चात् पति-पत्नी दोनों अपना अलग किस्म का घर बनाकर रहने लग जाते हैं।

(E) रिश्तेदारी के आधार पर परिवार के प्रकार (Types of Family On the Basis of Relatives)- लिंटन ने इस प्रकार के परिवारों को दो भागों में बांटा है-

  1. रक्त सम्बन्धी परिवार (Consanguine family)
  2. विवाह सम्बन्धी परिवार (Conjugal family)

रक्त सम्बन्धी परिवार में केवल लिंग सम्बन्ध नहीं बल्कि दूसरे ही शामिल होते हैं। इस प्रकार के परिवार में सम्बन्ध व्यक्ति के जन्म पर आधारित होते हैं। यह तलाक होने पर भी टूटता नहीं। विवाह सम्बन्धी परिवार में पतिपत्नी व उनके अविवाहित बच्चे पाए जाते हैं।
इस प्रकार का परिवार पति-पत्नी के तलाक होने के पश्चात् टूट जाता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 7.
समकालीन समय में परिवार संस्था में होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
आधुनिक समय में परिवार नामक संस्था में हर पक्ष से परिवर्तन आ गए हैं क्योंकि जैसे-जैसे हमारे सामाजिक ढांचे में परिवर्तन आ रहे हैं, उसी तरह से पारिवारिक व्यवस्था भी बदल रही है। परिवार की बनावट और कामों पर नए हालातों का काफ़ी प्रभाव पड़ा है। अब हम देखेंगे कि परिवार के ढांचे और कामों में किस तरह के परिवर्तन आए हैं-

1. स्थिति में परिवर्तन-पुराने समय में लडकी के जन्म को शाप माना जाता था। उसको शिक्षा भी नहीं दी जाती थी। धीरे-धीरे समाज में जैसे-जैसे परिवर्तन आए, औरत ने भी शिक्षा लेनी प्रारम्भ कर दी। पहले विवाह के बाद औरत सिर्फ़ पति पर ही निर्भर होती थी पर आजकल के समय में काफ़ी औरतें आर्थिक पक्ष से आज़ाद हैं और वह पति पर कम निर्भर हैं। कई स्थानों पर तो पत्नी की तनख्वाह पति से ज़्यादा है। इन हालातों में पारिवारिक विघटन की स्थिति पैदा होने का खतरा हो जाता है। इसके अलावा पति-पत्नी की स्थिति आजकल बराबर होती है जिसके कारण दोनों का अहं एक-दूसरे से नीचा नहीं होता। इस कारण दोनों में लड़ाई-झगड़ा शुरू हो जाता है और इससे बच्चे भी प्रभावित होते हैं। इस तरह ऐसे कई और कारण हैं जिनके कारण परिवार के टूटने के खतरे काफ़ी बढ़ जाते हैं और बच्चे तथा परिवार दोनों मुश्किल में आ जाते हैं।

शैक्षिक कार्यों में परिवर्तन-समाज में परिवर्तन आने के साथ इसकी सारी संस्थाओं में भी परिवर्तन आ रहे हैं। परिवार जो भी काम पहले अपने सदस्यों के लिए करता था। उनमें भी ख़ासा परिवर्तन आया है। प्राचीन समाजों में बच्चा शिक्षा परिवार में ही लेता था और शिक्षा भी परिवार के परम्परागत काम से सम्बन्धित होती थी। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि संयुक्त परिवार प्रणाली होती थी और जो काम पिता करता था वही काम पुत्र भी करता था और पिता के अधीन पुत्र भी उस काम में माहिर हो जाता था। धीरे-धीरे आधुनिकता के अधीन बच्चा पढ़ाई करने के लिए शिक्षण संस्थाओं में जाने लग गया और इसके कारण वह अब परिवार के परम्परागत कामों से दूर होकर कोई अन्य कार्य अपनाने लग गया है। इस तरह परिवार का शिक्षा का परम्परागत काम उससे कट कर शिक्षण संस्थाओं के पास चला गया है।

2. आर्थिक कार्यों में परिवर्तन-पहले समय में परिवार आर्थिक क्रियाओं का केन्द्र होता था। रोटी कमाने का सारा काम परिवार ही करता था जैसे-आटा पीसने का काम, कपड़ा बनाने का काम, आदि। इस तरह जीने के सारे साधन परिवार में ही उपलब्ध थे। पर जैसे-जैसे औद्योगीकरण शुरू हुआ और आगे बढ़ा, उसके साथ-साथ परिवार के यह सारे काम बड़े-बड़े उद्योगों ने ले लिए हैं, जैसे कपड़ा बनाने का काम कपड़े की मिलें कर रही हैं, आटा चक्की पर पीसा जाता है। इस तरह परिवार के आर्थिक कार्य कारखानों में चले गए हैं। इस तरह आर्थिक उत्पादन की ज़िम्मेदारी परिवार से दूसरी संस्थाओं ने ले ली है।

3. धार्मिक कार्यों में परिवर्तन-पुराने समय में परिवार का एक मुख्य काम परिवार के सदस्यों को धार्मिक शिक्षा देना होता है। परिवार में ही बच्चे को नैतिकता और धार्मिकता के पाठ पढ़ाए जाते हैं। पर जैसे-जैसे नई वैज्ञानिक खोजें और आविष्कार सामने आएं, वैसे-वैसे लोगों का दृष्टिकोण बदलकर धार्मिक से वैज्ञानिक हो गया। पहले ज़माने में धर्म की बहुत महत्ता थी, परन्तु विज्ञान ने धार्मिक क्रियाओं की महत्ता कम कर दी है। इस प्रकार परिवार के धार्मिक काम भी अब पहले से कम हो गए हैं।

4. सामाजिक कार्यों में परिवर्तन-परिवार के सामाजिक कार्यों में भी काफ़ी परिवर्तन आया है। पराने ज़माने में पत्नी अपने पति को परमेश्वर समझती थी। पति का यह फर्ज़ होता था कि वह अपनी पत्नी को खुश रखे। इसके अलावा परिवार अपने सदस्यों पर सामाजिक नियन्त्रण रखने का भी काम करता था, पर अब सामाजिक नियन्त्रण का कार्य अन्य एजेंसियां, जैसे पुलिस, सेना, कचहरी आदि, के पास चला गया है। इसके अलावा बच्चों के पालनपोषण का काम भी परिवार का होता था। बच्चा घर में ही पलता था और बड़ा हो जाता था और घर के सारे सदस्य उसको प्यार करते थे। पर धीरे-धीरे आधुनिकीकरण के कारण औरतों ने घर से निकलकर बाहर काम करना शुरू कर दिया और बच्चों की परवरिश के लिए क्रैच खुल गए जहां बच्चों को दूसरी औरतों द्वारा पाला जाने लग गया। इस तरह परिवार के इस काम में भी कमी आ गई है।

5. पारिवारिक एकता में कमी-पुराने जमाने में विस्तृत परिवार हुआ करते थे, पर आजकल परिवारों में यह एकता और विस्तृत परिवार खत्म हो गए हैं। हर किसी के अपने-अपने आदर्श हैं। कोई एक-दूसरे की दखलअंदाजी पसंद नहीं करता। इस तरह वह इकट्ठे रहते हैं, खाते-पीते हैं पर एक-दूसरे के साथ कोई वास्ता नहीं रखते। उनमें एकता का अभाव होता है।

प्रश्न 8.
नातेदारी को परिभाषित कीजिए तथा इसके प्रकारों को विस्तार से समझाइये।
उत्तर-
नातेदारी का अर्थ (Meaning of Kinship)-Kin शब्द अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जोकि शब्द Cynn से निकला है जिसका अर्थ केवल ‘रिश्तेदार’ होता है और समाज शास्त्रियों और मानव वैज्ञानियों ने अपने अध्ययन के वक्त इस ‘रिश्तेदार’ शब्द को मुख्य रखा है। नातेदारी शब्द में रिश्तेदार होते हैं ; जैसे रक्त सम्बन्धी, सगे और रिश्तेदार।

आम शब्दों में समाज शास्त्र में नातेदारी व्यवस्था से मतलब उन नियमों के संकूल से है जो वंश क्रम, उत्तराधिकार, विरासत, विवाह, विवाह के बाहर लैंगिक सम्बन्धों, निवास आदि का नियमन करते हुए समाज विशेष में मनुष्य या उसके समूह की स्थिति उसके रक्त के सम्बन्धों या विवाहिक सम्बन्धों के पक्ष से निर्धारित करते हों। इसका यह अर्थ हुआ कि असली या रक्त और विवाह द्वारा बनाए और विकसित सामाजिक सम्बन्धों की व्यवस्था नातेदारी व्यवस्था कहलाती है। इसका साफ़ एवं स्पष्ट अर्थ यह हुआ कि वह सम्बन्ध जो खून द्वारा बनाए होते हैं और विवाह द्वारा बन जाते हैं वह सभी नातेदारी व्यवस्था का हिस्सा होते हैं। इसमें वह सारे रिश्तेदार शामिल होते हैं जोकि खून और विवाह द्वारा बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, मामा-मामी, ताया-ताई, भाई-बहन, सास-ससुर, साला-साली आदि। यह सभी हमारे रिश्तेदार होते हैं और नातेदारी व्यवस्था का हिस्सा होते हैं।

परिभाषाएं (Definitions) –

  1. लूसी मेयर (Lucy Mayor) के अनुसार, “बंधुत्व या नातेदारी में, सामाजिक सम्बन्धों को जैविक शब्दों में व्यक्त किया जाता है।”
  2. चार्ल्स विनिक (Charles Winick) के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में वह सम्बन्ध शामिल किए जाते हैं जो कल्पित या वास्तविक वंश परम्परागत बन्धनों पर आधारित और समाज द्वारा प्रभावित होते हैं।”
  3. लैवी टास (Levi Strauss) के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था एक निरंकुश व्यवस्था है।”
  4. रैडक्लिफ ब्राऊन (Redcliff Brown) के अनुसार, “परिवार और विवाह के अस्तित्व से पैदा हुए या इसके परिणामस्वरूप पैदा हुए सारे सम्बन्ध नातेदारी व्यवस्था में होते हैं।”
  5. डॉ० मजूमदार (Dr. Majumdar) के अनुसार, “सारे समाजों में मनुष्य भिन्न प्रकार के बन्धनों में समूह में बंधे हुए हैं। इन बन्धनों में सबसे सर्वव्यापक और सबसे ज़्यादा मौलिक वह बन्धन है जोकि सन्तान पैदा करने पर आधारित है जोकि आन्तरिक मानव प्रेरणा है। यही नातेदारी कहलाती है।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि दो व्यक्ति रिश्तेदार होते हैं यदि उनके पूर्वज एक ही हों तो वह एक व्यक्ति की संतान होते हैं। नातेदारी व्यवस्था रिश्तेदारों की व्यवस्था है जोकि रक्त सम्बन्धों या विवाह सम्बन्धों पर आधारित होता है। नातेदारी व्यवस्था सांस्कृतिक है और इसकी बनावट सारे संसार में अलगअलग है। नातेदारी व्यवस्था में उन सभी असली या नकली रक्त-सम्बन्धों को शामिल किया जाता है जो समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होते हैं। एक नाजायज़ बच्चे को नातेदारी में ऊंचा स्थान प्राप्त नहीं हो सकता, पर एक गोद लिए बच्चे को नातेदारी व्यवस्था में ऊंचा स्थान प्राप्त हो जाता है। यह एक विशेष नातेदारी समूह की व्यवस्था है जिसमें सारे रिश्तेदार शामिल होते हैं और जो एक-दूसरे के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियां समझते हैं। इस तरह समाज द्वारा मान्यता प्राप्त असली या नकली रक्त के और विवाह द्वारा स्थापित और गहरे सामाजिक सम्बन्धों की व्यवस्था को नातेदारी व्यवस्था कहा जाता है।

नातेदारी के प्रकार (Types of Kinship)-व्यक्ति की नज़दीकी और दूरी के आधार पर नातेदारी को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। नातेदारी में सभी रिश्तेदारों में एक जैसे सम्बन्ध नहीं पाए जाते हैं। जो सम्बन्ध हमारे अपने माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चों के साथ होंगे वह हमारे अपने चाचे-भतीजे, मामा-मामी के साथ नहीं हो सकते क्योंकि हमारा अपने माता-पिता, पति-पत्नी के साथ जो सम्बन्ध है वह चाचा, भतीजे, मामा आदि के साथ नहीं हो सकता। उनमें बहुत ज्यादा गहरे सम्बन्ध नहीं पाए जाते। इस नज़दीकी और दूरी के आधार पर नातेदारी को तीन श्रेणियों में बांटा गया है जिनका वर्णन इस प्रकार है-

1. प्राथमिक रिश्तेदार (Primary relatives)-पहली श्रेणी की नातेदारी में प्राथमिक रिश्तेदार जैसे, पतिपत्नी, पिता-पुत्र, माता-पुत्र, माता-पुत्री, पिता-पुत्री, बहन-बहन, भाई-बहन, बहन-भाई, भाई-भाई आदि आते हैं। मरडोक के अनुसार, यह आठ प्रकार के होते हैं। यह प्राथमिक इसलिए होते हैं क्योंकि इनमें सम्बन्ध प्रत्यक्ष और गहरे होते हैं।

2. गौण सम्बन्धी (Secondary relations)-हमारे कुछ रिश्तेदार प्राथमिक होते हैं जैसे, माता, पिता, बहन, भाई आदि। इनके साथ हमारा प्रत्यक्ष रिश्ता होता है। पर कुछ रिश्तेदार ऐसे होते हैं जिनके साथ हमारा प्रत्यक्ष रिश्ता नहीं होता बल्कि, हम उनके साथ प्राथमिक रिश्तेदार के माध्यम के साथ जुड़े होते हैं जैसे-माता का भाई, पिता का भाई, माता की बहन, पिता की बहन, बहन का पति, भाई की पत्नी आदि। इन सब के साथ हमारा गहरा रिश्ता नहीं होता बल्कि यह गौण सम्बन्धी होते हैं। मर्डोक के अनुसार, यह सम्बन्ध 33 प्रकार के होते हैं।

3. तीसरे दर्जे के सम्बन्धी (Tertiary Kins) सबसे पहले रिश्तेदार प्राथमिक होते हैं और फिर गौण सम्बन्धी अर्थात् प्राथमिक सम्बन्धों की मदद के साथ रिश्ते बनते हैं। तीसरी प्रकार के सम्बन्धी वह होते हैं जो गौण सम्बन्धियों के प्राथमिक रिश्तेदार हैं। जैसे पिता के भाई का पुत्र, माता के भाई की पत्नी-(मामी), पत्नी के भाई की पत्नी अर्थात् साले की पत्नी, माता की बहन का पति अर्थात् मौसा जी इत्यादि। मर्डोक ने इनकी संख्या 151 दी है।

इस प्रकार यह तीन श्रेणियों की नातेदारी होती है पर यदि हम चाहें तो हम चौथी और पांचवीं श्रेणी के बारे में ज्ञान सकते हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 9.
सामाजिक जीवन में नातेदारी के महत्त्व को समझाइये।
उत्तर-
नातेदारी व्यवस्था का सामाजिक संरचना में एक विशेष स्थान है। इसके साथ ही समाज की बनावट बनती है। यदि नातेदारी व्यवस्था ही न हो तो समाज एक संगठन की तरह नहीं बन सकेगा और सही तरीके से काम नहीं कर सकेगा। इसलिए इसका महत्त्व काफ़ी बढ़ गया है जिसका वर्णन अग्रलिखित है

1. नातेदारी सम्बन्धों के माध्यम से ही कबाइली और खेती वाले समाजों के बीच अधिकार और परिवार एवं विवाह, उत्पादन और उपभोग की पद्धति और राजनीतिक सत्ता के अधिकारों का निर्धारण होता है। शहरी समाजों में भी विवाह और पारिवारिक उत्सवों के समय नातेदारी सम्बन्धों का महत्त्व देखने को मिलता है।

2. नातेदारी, परिवार और विवाह में गहरा सम्बन्ध है। नातेदारी के माध्यम से ही इस बात का निर्धारण होता है कि कौन किसके साथ विवाह कर सकता है और कौन-कौन से सम्बन्धों की शब्दावली भी है। नातेदारी से ही वंश सम्बन्ध, गोत्र और खानदान का निर्धारण होता है और वंश, गोत्र और खानदान में बहिर्विवाह का सिद्धान्त पाया जाता है।

3. पारिवारिक जीवन, वंश सम्बन्ध, गोत्र और खानदान के सदस्यों के बीच नातेदारी के आधार पर ही जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों एवं कर्म-काण्डों में किसका क्या अधिकार और ज़िम्मेदारी है, इसका निर्धारण होता है, जैसे ; विवाह के संस्कार और इसके साथ जुड़े कर्म-काण्डों में बड़े भाई, मां और बुआ का विशेष महत्त्व है। मृत्यु के बाद आग कौन देगा, इसका सम्बन्ध भी नातेदारी पर निर्भर करता है। जिन लोगों को आग देने का अधिकार होता है, नातेदारी उनके उत्तराधिकार को निश्चित करती है। सामाजिक संगठन (जन्म, विवाह, मौत) और सामूहिक उत्सवों के मौकों और नातेदारी या रिश्तेदारों को बुलाया जाना जरूरी होता है, ऐसा करने के साथ सम्बन्धों में और मज़बूती बढ़ती है।

4. नातेदारी व्यवस्था के साथ समाज को मज़बूती मिलती है। नातेदारी व्यवस्था सामाजिक संगठन को बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि नातेदारी व्यवस्था ही न हो तो सामाजिक संगठन टूट जाएगा और समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी।

5. नातेदारी व्यवस्था लैंगिक सम्बन्धों को निश्चित करती है। नातेदारी व्यवस्था में लैंगिक सम्बन्ध बनाने, हमारे समाज में वर्जित है। यदि नातेदारी व्यवस्था न हो तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी और नाजायज़ लैंगिक सम्बन्ध और अवैध बच्चों की भरमार होगी जिसके साथ समाज छिन्न-भिन्न हो जाएगा।

6. नातेदारी व्यवस्था विवाह निर्धारण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अपने गोत्र में विवाह नहीं करवाना, माता की तरफ से कितने रिश्तेदार छोड़ने हैं, पिता की तरफ से कितने रिश्तेदार छोड़ने हैं, यह सब कुछ नातेदारी व्यवस्था पर भी निर्भर करता है। यदि यह व्यवस्था न हो तो विवाह करने में किसी भी नियम की पालना नहीं होगी जिसके कारण समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी।

7. नातेदारी व्यवस्था मनुष्य को मानसिक शान्ति प्रदान करती है। आजकल के औद्योगिक समाज में चाहे हमारे विचार Practical हो चुके हैं पर फिर भी मनुष्य नातेदारी के बन्धनों से मुक्त नहीं हो सका है। वह अपने बुजुर्गों की तस्वीरें घर में टांग कर रखता है, उनकी तस्वीरों का संग्रह करता है, मरने के बाद उनका श्राद्ध करता है। मनुष्य जाति नातेदारी पर आधारित समूहों में रही है। नातेदारी के बिना व्यक्ति एक मरे हुए व्यक्ति के समान है। हमारे रिश्तेदार हमें सबसे ज्यादा जानते हैं, पहचानते हैं। वह अपने आपको अपने परिवार का हिस्सा समझते हैं। यदि हम किसी परेशानी में होते हैं तो हमारे रिश्तेदार हमें मानसिक तौर पर शान्त करते हैं। हम अपने रिश्तेदारों में ही रह कर सबसे ज्यादा प्रसन्नता और आनन्द महसूस करते हैं।

8. हमारी नातेदारी ही हमारे विवाह और परिवार का निर्धारण करती है कि किसके साथ विवाह करना है, किसके साथ नहीं करना है। सगोत्र, अन्तर्जातीय विवाह सब कुछ ही नातेदारी पर ही निर्भर करता है। परिवार में ही खून और विवाह के सम्बन्ध पाए जाते हैं। नातेदारी के कारण ही विवाह और नातेदारी में व्यवस्था पैदा होती है।

प्रश्न 10.
वैवाहिक तथा रक्त सम्बन्धों में अन्तर कीजिए।
उत्तर-
(i) रक्त संबंधी नातेदारी (Consanguinity) सगोत्र नातेदारी शुरुआती परिवार के आधार पर और इसमें पैदा हुए असली या नकली रक्त के वंश परम्परागत सम्बन्धों को सगोत्र नातेदारी कहते हैं। आम शब्दों में वह सभी रिश्तेदार या व्यक्ति जो रक्त के बन्धनों में बन्धे होते हैं उनको सगोत्र नातेदारी कहते हैं। रक्त का सम्बन्ध चाहे असली हो या नकली इसको नातेदारी व्यवस्था में तो ही ऊंचा स्थान प्राप्त होता है। यदि इस सम्बन्ध को समाज की मान्यता प्राप्त हो। उदाहरण के तौर पर नाजायज़ बच्चे को, चाहे उसके साथ भी रक्त सम्बन्ध होता है, समाज में मान्यता प्राप्त नहीं होती क्योंकि उसको समाज की मान्यता प्राप्त नहीं होती और गोद लिए बच्चे को, चाहे उसके साथ रक्त सम्बन्ध नहीं होता, समाज में मान्यता प्राप्त होती है और वह सगोत्र प्रणाली का हिस्सा होते हैं। रक्त सम्बन्धों को हर प्रकार के समाजों में मान्यता प्राप्त है।

इस तरह इस चर्चा से स्पष्ट है कि शुरुआती परिवार के आधार पर रक्त-वंश परम्परागत सम्बन्धों से पैदा हुए सारे रिश्तेदार इस सगोत्र नातेदारी प्रणाली में शामिल है। हम उदाहरण ले सकते हैं बहन-भाई, मामा, चाचा, ताया, नाना-नानी, दादा-दादी आदि। यहाँ यह बताने योग्य है कि रक्त सम्बन्ध सिर्फ़ पिता वाली तरफ से ही नहीं होता बल्कि माता वाली तरफ से भी होता है। इस तरह पिता वाली तरफ से रक्त सम्बन्धियों को पितृ पक्ष रिश्तेदार कहते हैं और माता वाली तरफ से रक्त सम्बन्धियों को मात पक्ष रिश्तेदार।

वर्गीकरण-खून के आधार पर आधारित रिश्तेदारों को अलग-अलग नामों के साथ जाना जाता है। एक ही मां-बाप के बच्चे, जो आपस में सगे भाई-बहन होते हैं, को सिबलिंग (Sibling) कहते हैं और सौतेले बहन-भाई को हॉफ़ सिबलिंग (Half sibling) कहते हैं। पिता वाली तरफ सिर्फ आदमियों के रक्त सम्बन्धियों जो सिर्फ आदमी होते हैं उनको सगा-सम्बन्धी (Agnates) कहते हैं और इसी तरह माता वाली तरफ सिर्फ औरतों के रक्त सम्बन्धियों जो सिर्फ औरतें होती हैं, उनको (Utrine) कहते हैं। इसी तरह वह लोग जो रक्त सम्बन्धों के कारण सम्बन्धित हों, उनको रक्त सम्बन्धी रिश्तेदार (Consanguined kin) कहा जाता है। इन रक्त सम्बन्धियों को दो हिस्सों में बांटा जाता है।

  • एक रेखकी रिश्तेदार (Unilineal Kin)-इस प्रकार की रिश्तेदारी में वह व्यक्ति आते हैं जो वंश क्रम की सीधी रेखा द्वारा सम्बन्धित हों जैसे पिता, पिता का पिता, पुत्र और पुत्र का पुत्र ।
  • कुलेटरल या समानान्तर रिश्तेदार (Collateral Kin)-इस प्रकार के रिश्तेदार वह व्यक्ति होते हैं, जो हर रिश्तेदारों के द्वारा असीधे तौर पर सम्बन्धित हों जैसे पिता का भाई चाचा, मां की बहन मौसी, मां का भाई मामा आदि।

(ii) विवाह संबंधी नातेदारी (Affinity)—इसको सामाजिक नातेदारी का नाम भी दिया जाता है। इस प्रकार की नातेदारी में उस तरह के रिश्तेदार शामिल होते हैं जो किसी आदमी या औरत के विवाह करने से पैदा होते हैं। जब किसी लड़के का लड़की से विवाह होता है तो उसका सिर्फ लड़की के साथ ही सम्बन्ध स्थापित नहीं होता बल्कि लड़की के माध्यम से उसके परिवार के बहुत सारे सदस्यों के साथ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इसी तरह जब लड़की का लड़के के साथ विवाह होता है तो लड़की का भी लड़के के परिवार के सारे सदस्यों के साथ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इस तरह सिर्फ विवाह करवाने के साथ ही लड़का-लड़की के कई प्रकार के नए रिश्ते अस्तित्व में आ जाते हैं। इस तरह विवाह पर आधारित नातेदारी को विवाहिक नातेदारी का नाम दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर जीजा-साला, साढू-जमाई, ससुर, ननद, भाभी, बहु, सास आदि। इस तरह की नातेदारी की प्राणीशास्त्री महत्ता के साथ-साथ सामाजिक महत्ता भी होती है। प्राणीशास्त्रीय महत्त्व तो पति-पत्नी के लिए है पर सास-ससुर, देवर, ननद, भाभी, साढ़, साली, साला, जमाई आदि रिश्ते सामाजिक होते हैं। मॉर्गन ने दुनिया के कई भागों में प्रचलित साकेदारियों का अध्ययन किया और इनको वर्णनात्मक और व्यक्तिनिष्ठ नामकरण के साथ तो मनुष्य श्रेणियों में बांटा है। वर्णनात्मक प्रणाली में आम-तौर पर विवाहिक सम्बन्धियों के लिए एक ही नाम दिया जाता है। ऐसे नाम नातेदारी की तुलना में सम्बन्ध के बारे में ज्यादा बताते हैं। व्यक्तिनिष्ठ शब्द असली सम्बन्धों के बारे में बताते हैं। जैसे-अंकल को हम मामा, चाचा, फुफड़ और मौसा के लिए प्रयोग करते हैं। यह पहले प्रकार की उदाहरण है। परन्तु फादर या पिता के लिए कोई शब्द प्रयोग नहीं हो सकते।

इस तरह Nephew को भतीजे या भांजे के लिए, cousin को मामा, चाचा, ताया, मासी, बुआ के बच्चों के लिए प्रयोग किया जाता है। इस तरह Sister-in-law को साली और ननद और Brother-in-law को देवर तथा साले के लिए प्रयोग किया जाता है।

इस तरह आधुनिक समाज में नए-नए शब्दों का प्रयोग किया जाता है। असल में यह सारे शब्द नातेदारी के सूचक हैं और विवाहिक नातेदारी पर आधारित होते हैं। जैसे व्यक्ति को जमाई का दर्जा, पति का दर्जा, औरत को बहू और पत्नी का दर्जा विवाह के कारण ही प्राप्त होता है। इस तरह हम बहुत सारी वैवाहिक रिश्तेदारियों को गिन सकते हैं।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions) :

प्रश्न 1.
समाज की आधारभूत इकाई कौन-सी होती है ?
(A) परिवार
(B) विवाह
(C) नातेदारी
(D) सरकार।
उत्तर-
(A) परिवार।

प्रश्न 2.
यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए समाज ने एक संस्था को मान्यता दी है जिसे ……. कहते हैं।
(A) विवाह
(B) परिवार
(C) सरकार
(D) नातेदारी।
उत्तर-
(A) विवाह।

प्रश्न 3.
बच्चे का समाजीकरण कौन शुरू करता है ?
(A) सरकार
(B) परिवार
(C) पड़ोस
(D) खेल समूह।
उत्तर-
(B) परिवार।

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प्रश्न 4.
कौन अगली पीढ़ी को संस्कृति का हस्तांतरण करता है ?
(A) पड़ोस
(B) सरकार
(C) परिवार
(D) समाज।
उत्तर-
(C) परिवार।

प्रश्न 5.
यौन इच्छा ने किस संस्था को जन्म दिया ?
(A) परिवार
(B) समाज
(C) सरकार
(D) विवाह।
उत्तर-
(D) विवाह।

प्रश्न 6.
मातुलेय परिवारों में किन रिश्तेदारों में निकटता होती है ?
(A) मामा-भांजा
(B) माता-पुत्री
(C) पिता-पुत्र
(D) चाचा-भतीजा।
उत्तर
(A) मामा-भांजा।

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प्रश्न 7.
रक्त सम्बन्धी या सीधे सम्बन्धी ……. सम्बन्धी होते हैं।
(A) प्राथमिक
(B) द्वितीय
(C) तृतीय
(D) चतुर्थ।
उत्तर-
(A) प्राथमिक।

प्रश्न 8.
जो सम्बन्ध हमारे माता पिता के लिए प्राथमिक होता है उसे क्या कहते हैं ?
(A) प्राथमिक सम्बन्ध
(B) द्वितीय सम्बन्ध
(C) तृतीय सम्बन्ध
(D) चतुर्थ सम्बन्ध।
उत्तर-
(B) द्वितीय सम्बन्ध।

प्रश्न 9.
जो सम्बन्धी द्वितीय सम्बन्धों से बनते हैं वह हमारे ……….. सम्बन्धी होते हैं।
(A) प्राथमिक
(B) द्वितीय
(C) तृतीय
(D) चतुर्थ।
उत्तर-
(C) तृतीय।

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प्रश्न 10.
बच्चे की प्रथम पाठशाला कौन सी होती है ?
(A) सरकार
(B) परिवार
(C) खेल समूह
(D) पड़ोस।
उत्तर-
(B) परिवार।

प्रश्न 11.
उस परिवार को क्या कहते हैं जिसमें पति पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे रहते हैं ?
(A) केंद्रीय परिवार
(B) संयुक्त परिवार ।
(C) विस्तृत परिवार
(D) नव स्थानीय परिवार।
उत्तर-
(A) केन्द्रीय परिवार।

प्रश्न 12.
इनमें से कौन सा परिवार का कार्य है ?
(A) बच्चे का समाजीकरण
(B) बच्चों पर नियंत्रण
(C) बच्चे का पालन-पोषण
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

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प्रश्न 13.
विवाह के आधार पर परिवार का प्रकार बताएं।
(A) एक विवाह परिवार
(B) बहु विवाही परिवार
(C) समूह विवाही परिवार
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 14.
नातेदारी के कितने प्रकार होते हैं ?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार।
उत्तर-
(B) दो।

प्रश्न 15.
प्राथमिक रिश्तेदार कितने प्रकार के होते हैं ?
(A) पाँच
(B) छः
(C) आठ
(D) दस।
उत्तर-
(C) आठ।

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प्रश्न 16.
द्वितीयक सम्बन्धी कितने प्रकार के होते हैं ?
(A) 30
(B) 33
(C) 36
(D) 39.
उत्तर-
(B) 33.

II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. ……….. परिवार में पिता की सत्ता चलती है।
2. ………… परिवार में माता की सत्ता चलती है।
3. ………….. विवाह में अपने समूह में ही विवाह करवाया जाता है।
4. ……….. परिवार में दो या अधिक पीढ़ियों में परिवार इकट्ठे रहते हैं।
5. बहुपति विवाह …………….. प्रकार का होता है।
6. आकार के आधार पर परिवार ……….. प्रकार के होते हैं।
7. सत्ता के आधार पर परिवार …………… प्रकार के होते हैं।
उत्तर-

  1. पितृसत्तात्मक,
  2. मातृसत्तात्मक,
  3. अन्तः,
  4. संयुक्त,
  5. दो,
  6. तीन,
  7. दो।

III. सही/गलत (True/False) :

1. एकाकी परिवार में संपूर्ण नियंत्रण पिता के हाथों में होता है।
2. स्त्रियों की संख्या कम होने के कारण बहुपति विवाह होते हैं।
3. बहुविवाह संसार में सबसे अधिक प्रचलित हैं।
4. नातेदारी के दो प्रकार होते हैं।
5. परिवार संस्कृति के वाहक के रूप में कार्य करता है।
6. मातृवंशी परिवार में सम्पत्ति पुत्री को नहीं मिलती है।
7. परिवार के सदस्यों में रक्त संबंध होते हैं।
उत्तर-

  1. गलत,
  2. सही,
  3. गलत,
  4. सही,
  5. सही,
  6. गलत,
  7. सही।

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IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1.
एक विवाह का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जब एक पुरुष एक स्त्री से विवाह करता है तो उसे एक विवाह कहते हैं।

प्रश्न 2.
बहुविवाह के कितने प्रकार हैं ?
उत्तर-
बहुविवाह के तीन प्रकार हैं।

प्रश्न 3.
द्विविवाह में एक पुरुष की कितनी पत्नियां होती हैं ?
उत्तर-
द्विविवाह में एक पुरुष की दो पत्नियां होती हैं।

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प्रश्न 4.
बहुपति विवाह में एक स्त्री के कितने पति हो सकते हैं ?
उत्तर-
बहुपति विवाह में एक स्त्री के कई पति हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
अन्तर्विवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर-
जब व्यक्ति केवल अपनी ही जाति में विवाह करवा सकता हो उसे अंतर्विवाह कहा जाता है।

प्रश्न 6.
बर्हिविवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर-
जब व्यक्ति को अपनी गोत्र के बाहर परंतु अपनी जाति के अंदर विवाह करवाना पड़े तो उसे बर्हिविवाह कहते हैं।

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प्रश्न 7.
यह शब्द किसके हैं, “विवाह एक समझौता है जिसमें बच्चों की पैदाइश तथा देखभाल होती
उत्तर-
यह शब्द मैलीनोवस्की के हैं।

प्रश्न 8.
संसार में विवाह का कौन-सा प्रकार सबसे अधिक प्रचलित है ?
उत्तर-
संसार में विवाह का सबसे अधिक प्रचलित प्रकार एक विवाह है।

प्रश्न 9.
बहु-पत्नी विवाह का अर्थ।
उत्तर-
जब एक पुरुष कई स्त्रियों के साथ विवाह करवाए तो उसे बहु-पत्नी विवाह कहते हैं।

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प्रश्न 10.
बहु-पति विवाह का अर्थ।
उत्तर-
जब कई पुरुष मिलकर एक स्त्री से विवाह करते हैं, तो उसे बहु-पति विवाह कहते हैं।

प्रश्न 11.
एफिनिटी क्या होता है ?
उत्तर-
सामाजिक सम्बन्ध जो विवाह पर आधारित होते हैं, उन्हें एफिनिटी कहते हैं।

प्रश्न 12.
यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए सामाजिक मान्यता प्राप्त संस्था कौन-सी है ?
उत्तर-
यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए समाज ने एक संस्था को मान्यता दी हुई है, जिसे परिवार कहते हैं।

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प्रश्न 13.
यौन इच्छा ने किस प्रथा को जन्म दिया ?
उत्तर-
यौन इच्छा ने विवाह नामक प्रथा को जन्म दिया।

प्रश्न 14.
विवाह क्या होता है ?
उत्तर-
यौन सम्बन्धों को समाज ने एक प्रथा के द्वारा मान्यता दी हुई है, जिसे विवाह कहते हैं।

प्रश्न 15.
कुलीन विवाह क्या होता है ?
उत्तर-
जब एक ही जाति में ऊंचे कुलों से सम्बन्धित लड़के-लड़की का विवाह होता है तो उसे कुलीन विवाह कहते हैं।

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प्रश्न 16.
प्रेम विवाह का प्राचीन नाम क्या है ?
उत्तर-
प्रेम विवाह का प्राचीन नाम गंधर्व विवाह है।

प्रश्न 17.
भ्रातृक बहुपति विवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर-
अगर सभी भाई एक स्त्री से इकट्ठे विवाह करें तो उसे भ्रातृक बहुपति विवाह कहते हैं।

प्रश्न 18.
कौन-से पुरुष को पूर्ण पुरुष कहा जाता है ?
उत्तर-
जिस पुरुष के स्त्री तथा बच्चे हों, उसे पूर्ण पुरुष कहा जाता है।

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प्रश्न 19.
अन्तर्विवाह का कोई कारण बताओ।
उत्तर-
रक्त की शुद्धता बनाए रखने के लिए अन्तर्विवाह की आवश्यकताएं पड़ी।

प्रश्न 20.
प्राथमिक सम्बन्धी कौन-से होते हैं ? ।
उत्तर-
रक्त सम्बन्धी या सीधे सम्बन्ध प्राथमिक सम्बन्ध होते हैं, जैसे कि पिता, माता, भाई, बहन इत्यादि।

प्रश्न 21.
द्वितीय सम्बन्धी कौन-से होते हैं ?
उत्तर-
जो हमारे माता या पिता का प्राथमिक सम्बन्धी होता है वह हमारे लिए द्वितीय सम्बन्धी होता है, जैसे मामा, चाचा, ताया, बुआ इत्यादि।

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प्रश्न 22.
तृतीय सम्बन्धी कौन-से होते हैं ? .
उत्तर-
जो सम्बन्धी द्वितीय सम्बन्धों से बनते हैं वह हमारे तृतीय सम्बन्धी होते हैं, जैसे पिता की बहन का पति, माता के भाई की पत्नी इत्यादि।

प्रश्न 23.
समूह विवाह क्या होता है ?
उत्तर-
जब बहुत सारी स्त्रियों का बहुत सारे पुरुषों के साथ इकट्ठे विवाह होता है, उसे समूह विवाह कहते

प्रश्न 24.
बहिर्विवाह में किससे बाहर विवाह करना पड़ता है ?
उत्तर-
बहिर्विवाह में अपने सपिण्ड, प्रवर तथा गोत्र से बाहर करना पड़ता है।

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प्रश्न 25.
अन्तर्विवाह क्या होता है ?
उत्तर-
जब व्यक्ति को अपने समूह या जाति के अन्दर विवाह करना पड़े तो उसे अन्तर्विवाह कहते हैं।

प्रश्न 26.
प्रतिलोम विवाह क्या होता है ?
उत्तर-
जब निम्न जाति का पुरुष उच्च जाति की स्त्री से विवाह करता है तो उसे प्रतिलोम विवाह कहते हैं।

प्रश्न 27.
कौन-सी संस्था परिवार के निर्माण में सहायक होती है ?
उत्तर-
विवाह नामक संस्था परिवार के निर्माण में सहायक होती है।

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प्रश्न 28.
किस संस्था से समाज विघटन से बचता है ?
उत्तर-
विवाह नामक संस्था के कारण समाज का विघटन नहीं होता।

प्रश्न 29.
बहु-पत्नी विवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर-
जब एक व्यक्ति एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करवाए तो उसे बहु-पत्नी विवाह कहते हैं।

प्रश्न 30.
बहु-पति विवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर-
जब एक स्त्री के कई पति हों तो उस विवाह को बहुपति विवाह कहते हैं।

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प्रश्न 31.
बहु-पति विवाह के कितने प्रकार होते हैं ?
उत्तर-
बहुपति विवाह के दो प्रकार-भ्रातृ बहुपति विवाह तथा गैर-भ्रात बहुपति विवाह होते हैं।

प्रश्न 32.
एक विवाह को आदर्श क्यों माना जाता है ?
उत्तर-
क्योंकि इससे परिवार अधिक स्थायी रहते हैं।

प्रश्न 33.
पितृ सत्तात्मक परिवार में ……….. शक्ति अधिक होती है।
उत्तर-
पितृ सत्तात्मक परिवार में पिता की शक्ति अधिक होती है।

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प्रश्न 34.
मातृ सत्तात्मक परिवार में …………… की सत्ता चलती है।
उत्तर-
मातृ सत्तात्मक परिवार में माता की सत्ता चलती है।

प्रश्न 35.
रक्त सम्बन्धी परिवार में कौन-से सम्बन्ध पाए जाते हैं ?
उत्तर-
रक्त सम्बन्धी परिवार में रक्त सम्बन्ध पाए जाते हैं।

प्रश्न 36.
सदस्यों के आधार पर परिवार के कितने तथा कौन-से प्रकार होते हैं ?
उत्तर-
सदस्यों के आधार पर परिवार के तीन प्रकार केन्द्रीय परिवार, संयुक्त परिवार तथा विस्तृत परिवार होते हैं।

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प्रश्न 37.
विवाह के आधार पर परिवार के कितने तथा कौन-से प्रकार होते हैं ?
उत्तर-
विवाह के आधार पर परिवार के दो प्रकार-एक विवाही परिवार तथा बहुविवाही परिवार होते हैं।

प्रश्न 38.
वंश के आधार पर कितने प्रकार के परिवार होते हैं ?
उत्तर-
चार प्रकार के परिवार ।

प्रश्न 39.
केन्द्रीय परिवार का अर्थ बताएं।
उत्तर-
वह परिवार जिसमें पति-पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे रहते हों उसे केन्द्रीय परिवार कहा जाता है।

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प्रश्न 40.
हिन्दू विधवा पुनर्विवाह एक्ट कब पास हुआ था ?
उत्तर-
सन् 1856 में।

प्रश्न 41.
शब्द Family किस भाषा के शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर है ?
उत्तर-
शब्द Family लातीनी भाषा के शब्द का अंग्रेज़ी रूपान्तर है।

प्रश्न 42.
शब्द Family लातीनी भाषा के किस शब्द से निकला है ?
उत्तर-
शब्द Family लातीनी भाषा के शब्द Famulus से निकला है।

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प्रश्न 43.
परिवार के स्वरूप में परिवर्तन का एक कारण बताओ।
उत्तर-
आजकल स्त्रियां घर से जाकर दफ्तरों में काम करने लगी हैं जिससे उनकी परिवार तथा पति पर निर्भरता काफ़ी कम हो गई है।

प्रश्न 44.
परिवार एक सर्वव्यापक संस्था है। कैसे ?
उत्तर-
परिवार एक सर्वव्यापक संस्था है क्योंकि यह प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में पाया जाता है।

प्रश्न 45.
परिवार में सदस्यों के बीच किस प्रकार के सम्बन्ध होते हैं ?
उत्तर-
परिवार में सदस्यों के बीच रक्त सम्बन्ध होते हैं।

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प्रश्न 46.
समाज में परिवार का किस प्रकार का स्थान होता है ?
उत्तर-
समाज में परिवार का केन्द्रीय स्थान होता है।

प्रश्न 47.
परिवार के सदस्यों में किस प्रकार के गुण पाए जाते हैं ? ।
उत्तर-
परिवार के सदस्यों में हमदर्दी, त्याग, प्रेम जैसे गुण पाए जाते हैं।

प्रश्न 48.
परिवार के दो जैविक कार्य बताएं।
उत्तर-

  1. परिवार में ही व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ सम्बन्ध बनाता है।
  2. परिवार में ही सन्तान उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 49.
परिवार के दो आर्थिक कार्य बताएं।
उत्तर-

  1. परिवार सदस्यों के खाने का प्रबन्ध करता है।
  2. परिवार एक उत्पादक इकाई के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 50.
परिवार में उत्तराधिकार का निर्धारण कैसे होता है ?
उत्तर-
बेटों में जायदाद का समान विभाजन कर दिया जाता है।

प्रश्न 51.
परिवार के दो सामाजिक कार्य बताएं।
उत्तर-

  1. परिवार व्यक्ति को सामाजिक स्थिति प्रदान करता है।
  2. परिवार संस्कृति को अगली पीढ़ी को सौंप देता है।

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प्रश्न 52.
कौन-सी संस्था बच्चे का समाजीकरण करती है ?
उत्तर-
परिवार नामक संस्था बच्चे का समाजीकरण करती है।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विवाह से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निश्चित हो जाती है। स्पष्ट करें।
उत्तर-
विवाह के कारण व्यक्ति को समाज में कई सारे पद मिल जाते हैं, जैसे-पति, पिता, जीजा, दामाद इत्यादि। इन सभी पदों में ज़िम्मेदारी होती है। विवाह से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निश्चित हो जाती है।

प्रश्न 2.
मनु ने प्रतिलोम विवाह के बारे में कौन-से विचार व्यक्त किए हैं ?
उत्तर-
मनु के अनुसार निम्न जाति के पुरुष का उच्च जाति की स्त्री से विवाह करना पाप है। इसे उन्होंने निषेध करार दिया है। इस प्रकार के विवाह से पैदा होने वाली सन्तान को उन्होंने चण्डाल कहा है।

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प्रश्न 3.
अनुलोम विवाह क्या होता है ?
उत्तर-
जब एक उच्च जाति का लड़का निम्न जाति की लड़की से विवाह करता है तो उसे अनुलोम विवाह कहते हैं। इस प्रकार के विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त है तथा इस प्रकार के विवाह साधारणतया होते रहते थे।

प्रश्न 4.
विवाह पर प्रतिबन्ध।
उत्तर-
कई समाजों में विवाह करवाने के ऊपर कई प्रकार के प्रतिबन्ध होते हैं कि किस समूह में विवाह करना है तथा किस में नहीं। साधारणतया रक्त सम्बन्धी, एक ही गोत्र वाले व्यक्ति आपस में विवाह नहीं करवा सकते।

प्रश्न 5.
गैर-भातृ बहुपति विवाह।
उत्तर-
बहुपति विवाह का वह प्रकार जिसमें पत्नी के सभी पति आपस में भाई नहीं होते गैर-भ्रातृ बहुपति विवाह होता है। विवाह के पश्चात् पत्नी निश्चित समय के लिए अलग-अलग पतियों के साथ रहती है।

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प्रश्न 6.
बहुपत्नी विवाह का अर्थ।
उत्तर-
यह विवाह का वह प्रकार है जिसमें एक व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियां होती हैं। यह दो प्रकार का होता है-प्रतिबन्धित तथा अप्रतिबन्धित बहु-पत्नी विवाह । इस प्रकार का विवाह आजकल वर्जित है।

प्रश्न 7.
बहु-पत्नी विवाह में स्त्रियों की स्थिति।
उत्तर-
बहु-पत्नी विवाह में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न होती है क्योंकि उसे कई पुरुषों से विवाह तथा संबंध रखने पड़ते हैं। इसका उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा उनकी सामाजिक स्थिति भी निम्न होती है।

प्रश्न 8.
एक विवाह पर संक्षेप नोट लिखें।
उत्तर-
जब एक ही स्त्री से एक ही पुरुष विवाह करवाता है तो विवाह को एक विवाह कहते हैं। जब तक दोनों जीवित हैं अथवा एक दूसरे से तलाक नहीं ले लेते, वह दूसरा विवाह नहीं करवा सकते।

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प्रश्न 9.
बहु-पति विवाह के दो अवगुण।
उत्तर-

  1. इस प्रकार के विवाह में स्त्री का स्वास्थ्य खराब हो जाता है क्योंकि उसे कई पतियों की लैंगिक इच्छा को पूर्ण करना पड़ता है।
  2. इस प्रकार के विवाह में स्त्री के लिए पतियों में झगडे होते रहते हैं।

प्रश्न 10.
एक विवाह के दो गुण।
उत्तर-

  1. एक विवाह में पति-पत्नी के संबंध अधिक गहरे होते हैं।
  2. इस विवाह में बच्चों का पालन-पोषण ठीक ढंग से हो जाता है।
  3. इस विवाह में पारिवारिक झगड़े कम होते हैं।
  4. इसमें पति-पत्नी में तालमेल रहता है।

प्रश्न 11.
बहुपत्नी विवाह के मुख्य कारण बताएं।
उत्तर-

  1. पुरुषों की अधिक यौन संबंधों की इच्छा के कारण बहुपत्नी विवाह सामने आए।
  2. लड़कियां पैदा होने के कारण तथा लड़का होने की इच्छा के कारण यह विवाह बढ़ गए।
  3. राजा-महाराजाओं के अधिक पत्नियां रखने के शौक के कारण यह विवाह सामने आए।

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प्रश्न 12.
परिवार क्या होता है ?
उत्तर-
परिवार उस समूह को कहते हैं जो यौन सम्बन्धों पर आधारित है और जो इतना छोटा व स्थायी है कि उससे बच्चों की उत्पत्ति तथा पालन-पोषण हो सके। इसमें सभी रक्त संबंधी शामिल होते हैं।

प्रश्न 13.
पितृ सत्तात्मक परिवार कौन-सा होता है ?
उत्तर-
वह परिवार जहां सारे अधिकार पिता के हाथ में होते हैं, परिवार पिता के नाम पर चलता है तथा परिवार पर पिता का पूरा नियन्त्रण होता है। घर के सभी सदस्यों को पिता की आज्ञा के अनुसार कार्य करना पड़ता है।

प्रश्न 14.
मातृ-सत्तात्मक परिवार।
उत्तर-
वह परिवार जहां सारे अधिकार माता के हाथ में होते हैं, परिवार माता के नाम पर चलता है तथा परिवार पर माता का नियन्त्रण होता है। सम्पत्ति पर माता का अधिकार होता है तथा माता के पश्चात् सम्पत्ति पुत्री को प्राप्त होती है।

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प्रश्न 15.
विवाह के आधार पर परिवार के कितने प्रकार होते हैं ?
उत्तर-
विवाह के आधार पर परिवार दो प्रकार के होते हैं-

  1. एक विवाही परिवार
  2. बहु विवाही परिवार।

प्रश्न 16.
परिवार में शिक्षा संबंधी कार्यों में परिवर्तन।
उत्तर–
पहले परिवार बच्चों को शिक्षा देता था परन्तु अब इसमें परिवर्तन आ गया है। अब परिवार का यह कार्य स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों ने लिया है। पहले परिवार के बड़े बुजुर्ग बच्चों को शिक्षा देते थे परन्तु अब यह कार्य औपचारिक संस्थाओं के पास है।

प्रश्न 17.
परिवार की केंद्रीय स्थिति।
उत्तर-
परिवार की समाज में केन्द्रीय स्थिति है क्योंकि परिवार के बिना समाज अस्तित्व में नहीं आ सकता तथा प्रत्येक व्यक्ति समाज में ही रहना पसंद करता है। परिवार के कारण ही समाज अस्तित्व में आता है।

प्रश्न 18.
बच्चों का पालन-पोषण।
उत्तर-
बच्चों का पालन-पोषण परिवार का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है क्योंकि परिवार ही बच्चों की सभी आवश्यकताएं पूर्ण करता है। परिवार उसे अच्छा नागरिक बनाने के लिए सभी चीजें उपलब्ध करवाता है।

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प्रश्न 19.
घर की व्यवस्था।
उत्तर-
परिवार अपने सदस्यों के लिए घर की व्यवस्था करता है। घर के बिना परिवार न तो बन सकता है तथा न ही प्रगति कर सकता है। इस प्रकार घर की व्यवस्था करके परिवार सदस्यों के व्यक्तित्व का विकास भी करता है।

प्रश्न 20.
परिवार में सहयोग।
उत्तर-
पति तथा पत्नी एक-दूसरे से सहयोग करते हैं ताकि परिवार का कल्याण हो सके। वह अपने बच्चों तथा परिवार को अच्छा जीवन देने के लिए एक-दूसरे से सहयोग करते हैं। पति-पत्नी के सहयोग के कारण ही परिवार सामने आता है।

प्रश्न 21.
साझे परिवार पर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव।
उत्तर-
साझे परिवार में रहने वाले व्यक्ति पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के अधीन आ रहे हैं। इस कारण वह अपने सांझे परिवारों को छोड़ रहे हैं तथा केंद्रीय परिवार बसा रहे हैं। इस तरह साझे परिवार खत्म हो रहे हैं।

प्रश्न 22.
परिवार के दो कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. परिवार में व्यक्ति की सम्पत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँच जाती है तथा किसी तीसरे व्यक्ति के पास नहीं जाती।
  2. बच्चों के पालन-पोषण तथा सुरक्षा का कार्य परिवार का ही होता है तथा उनका सही विकास परिवार में ही हो सकता है।

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प्रश्न 23.
परिवार के कार्यों में कोई दो परिवर्तन।
उत्तर-

  1. आजकल के परिवार अधिक प्रगतिशील हो रहे हैं।
  2. स्त्रियां घरों से बाहर निकल कर कार्य कर रही हैं जिस कारण उनके कार्य बदल रहे हैं।
  3. परिवार के मुखिया का नियन्त्रण कम हो गया है तथा सभी अपनी इच्छा से कार्य करते हैं।

प्रश्न 24.
नवस्थानीय परिवार।
उत्तर-
इस प्रकार के परिवार में विवाह के पश्चात् पति-पत्नी अपने माता-पिता के घर जाकर नहीं रहते बल्कि अपना नया घर बसाते हैं तथा बिना रोक-टोक के रहते हैं। आजकल इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक संस्था।
उत्तर-
संस्था न तो लोगों का समूह है और न ही संगठन है। सामाजिक संस्था तो किसी कार्य या उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए परिमाप की व्यवस्था है। संस्था तो किसी विशेष महत्त्वपूर्ण क्रिया के आस-पास केन्द्रित रूढियों और लोक रीतों का जाल है। संस्थाएं तो संरचिंत प्रक्रियाएं हैं जिनके द्वारा व्यक्ति अपने कार्य करता है।

प्रश्न 2.
संस्था के दो महत्त्वपूर्ण तत्त्व बताइये।
उत्तर-

  1. निश्चित उद्देश्य-संस्था विशेष मानवीय आवश्यकता के लिए विकसित होती है। बिना उद्देश्य के संस्था नहीं होती है। इस प्रकार संस्था किसी निश्चित उद्देश्य के लिए बनती है।
  2. एक विचार-विचार ही संस्था का आवश्यक तत्त्व है। किसी भी आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक विचार की शुरुआत होती है जिसको समूह अपने लिए आवश्यक समझता है। इस कारण इसकी रक्षा हेतु वह संस्था को विकसित करता है।

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प्रश्न 3.
संस्था की चार विशेषताएं लिखो।
उत्तर-

  1. संस्था व्यवस्था एक इकाई है।
  2. संस्था के स्पष्ट तौर पर परिभाषित उद्देश्य हैं।
  3. संस्था अमूर्त होती है।
  4. संस्था की एक परम्परा व प्रतीक होता है।

प्रश्न 4.
संस्था के कोई चार कार्य बतायें।
उत्तर-

  1. संस्था समाज के ऊपर नियन्त्रण रखती है।
  2. संस्था व्यक्ति को पद एवं भूमिका प्रदान करती है।
  3. संस्था उद्देश्य को पूरा करने में मदद करती है।
  4. संस्था सांस्कृतिक एकसारता प्रदान करती है।
  5. संस्था संस्कृति की वाहक है।

प्रश्न 5.
संस्था कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-
वैसे तो संस्थाएं कई प्रकार की होती हैं, पर साधारणतया संस्थाएं चार प्रकार की होती हैं-

  1. सामाजिक संस्थाएं (Social Institutions)
  2. राजनैतिक संस्थाएं (Political Institutions)
  3. आर्थिक संस्थाएं (Economic Institutions)
  4. धार्मिक संस्थाएं (Religious Institutions)।

प्रश्न 6.
विवाह का अर्थ।
उत्तर–
प्रत्येक समाज में परिवार की स्थापना के लिए स्त्री व पुरुष के लिंगक सम्बन्धों को स्थापित करने की मान्यता विवाह द्वारा दी जाती है। इस प्रकार लिंग सम्बन्धों को निश्चित करने व संचालित करने के लिए बच्चों के पालनपोषण की ज़िम्मेदारी को निर्धारित करने व परिवार को स्थाई रूप देने के लिए बनाए गए नियमों को विवाह कहते हैं। परिवार बसाने के लिए दो या दो से अधिक स्त्रियों व पुरुषों के बीच ज़रूरी सम्बन्ध स्थापित करने व उन्हें स्थिर रखने के लिए संस्थात्मक व्यवस्था को विवाह कहते हैं। जिसका उद्देश्य घर की स्थापना, यौन सम्बन्धों में प्रवेश व बच्चों का पालन-पोषण है।

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प्रश्न 7.
एक विवाह।
उत्तर-
आजकल के आधुनिक युग में एक विवाह का प्रचलन सबसे अधिक है। इस तरह के विवाह में एक पुरुष एक ही समय, एक ही स्त्री के साथ विवाह कर सकता है। एक विवाह में पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह करना गैरकानूनी माना जाता है। इसमें पति-पत्नी के सम्बन्ध गहरे, स्थायी और प्यार हमदर्दी वाले होते हैं। इसमें बच्चों का पालनपोषण अच्छे ढंग से हो जाता है। उनको माता-पिता का पूरा प्यार मिलता है। पति-पत्नी में प्यार और तालमेल होता है। इसमें पुरुष और स्त्री के सम्बन्धों में समान अधिकार पाये जाते हैं।

प्रश्न 8.
एक विवाह के गुण।
उत्तर-

  1. पति-पत्नी के सम्बन्ध अधिक गहरे होते हैं।
  2. इसमें बच्चों का पालन-पोषण अच्छी तरह होता है।
  3. पति-पत्नी में तालमेल अधिक रहता है।
  4. पारिवारिक झगड़े कम होते हैं।
  5. व्यक्ति मनोवैज्ञानिक और जैविक तनावों से मुक्त रहता है।
  6. लड़का और लड़की दोनों को समान अधिकार प्राप्त होता है।

प्रश्न 9.
एक विवाह के अवगुण।
उत्तर-

  1. बीमारी या गर्भावस्था में पति-पत्नी के साथ यौन सम्बन्ध नहीं रख सकता इसलिए वह बाहर जाना आरम्भ कर देता है।
  2. बाहरी सम्बन्धों की वजह से अनैतिकता बढ़ती है।
  3. कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं।
  4. पति का पत्नी के बीमार होने से घरेलू काम रुक जाते हैं, जिससे बच्चों का पालन-पोषण सही नहीं हो पाता।

प्रश्न 10.
बहिर्विवाह से क्या अर्थ है ?
उत्तर-
बहिर्विवाह का अर्थ है कि अपनी गोत्र, अपने सपिण्ड और टोटम से बाहर वैवाहिक सम्बन्ध पैदा करने पड़ते हैं। एक ही गोत्र, सपिण्ड और टोटम के पुरुष और स्त्री आपस में भाई-बहन माने जाते हैं। वैस्ट मार्क के अनुसार इस विवाह का उद्देश्य नज़दीक के रिश्तेदारों में यौन सम्बन्ध स्थापित न होने देना है। ये विवाह प्रगतिवाद का सूचक है और ये विवाह भिन्न-भिन्न वर्गों में सम्पर्क बढ़ाता है। जैविक दृष्टिकोण से यह विवाह ठीक माना गया है। इस विवाह का सबसे बड़ा अवगुण यह है कि इसमें वर-वधू को एक-दूसरे के विचारों को जानने में बड़ी मुश्किलें आती हैं।

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प्रश्न 11.
अन्तर्विवाह।
उत्तर-
अन्तर्विवाह में व्यक्ति को अपनी ही जाति में विवाह करना पड़ता था। इसमें विवाह का एक बन्धन क्षेत्र होता है जिसके अनुसार आदमी औरत एक निश्चित सामाजिक समूह के अधीन ही विवाह कर सकते हैं। इसके साथ समूह की एकता रखी जा सकती है। यह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक प्रगति में रुकावट पैदा करती है। इसके साथ जातिवाद की भावना को भी बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 12.
दो पत्नी विवाह।
उत्तर-
इस प्रकार के विवाह में एक पुरुष का विवाह दो स्त्रियों के साथ होता है। ये दोनों स्त्रियां उस पुरुष की पत्नियां होती हैं। इसलिये इस विवाह को दो पत्नी विवाह कहा जाता है। इसमें पुरुष को दो पत्नियां रखने की इजाजत दी जाती है।

प्रश्न 13.
बहु-पत्नी प्रथा।
उत्तर-
यह बहु-विवाह का एक अन्य रूप है। इस तरह के विवाह में व्यक्ति एक से अधिक पत्नियों के साथ विवाह करवाता है। रिउटर के अनुसार बहु-पत्नी विवाह विवाह का वह रूप है, जिसमें व्यक्ति एक ही समय में एक से अधिक पत्नियों को रख सकता है। ये प्रथा संसार के सभी समाजों में पाई जाती है। पुरुष में यौन की इच्छा और बड़े परिवार की चाह के कारण इस विवाह प्रथा को अपनाया गया।

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प्रश्न 14.
बहु-पत्नी विवाह के कारण।
उत्तर-

  1. पुरुषों की अधिक यौन सम्बन्धों की इच्छाओं के कारण बहु विवाह होते हैं।
  2. बड़े परिवार की इच्छा के कारण यह विवाह होते हैं।
  3. लड़कियां होने पर लड़कों की इच्छा के कारण यह विवाह होते हैं।
  4. स्त्रियों की गणना बढ़ने के कारण भी यह विवाह होते थे।
  5. राजाओं, महाराजाओं की अधिक पत्नियां रखने के शौक के कारण इस प्रकार के विवाह होते थे।

प्रश्न 15.
बहु-पत्नी विवाह के गुण।
उत्तर-

  1. बच्चों का बढ़िया पालन-पोषण हो जाता है।
  2. मर्दो की अधिक यौन इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है।
  3. सम्पत्ति घर में ही रहती है।
  4. सन्तान शक्तिशाली और सेहतमंद पैदा होती है।
  5. एक पत्नी के बीमार होने से घर के काम चलते रहते हैं।
  6. लिंग सम्बन्धों की पूर्ति के कारण अनैतिकता नहीं फैलती।

प्रश्न 16.
बहु-पत्नी विवाह के अवगुण।
उत्तर-

  1. इसके साथ स्त्रियों का दर्जा निम्न होता है।
  2. स्त्रियों की यौन इच्छा पूरी नहीं होती, जिसके लिये वह बाहर जाती हैं और अनैतिकता फैलती है।
  3. अधिक पत्नियों के कारण उनमें झगड़ा रहता है।
  4. परिवार में अशान्ति रहती है।
  5. परिवार में आर्थिक बोझ बढ़ता है।

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प्रश्न 17.
कुलीन विवाह।
उत्तर-
हिन्दू समाज में बहु-पत्नी विवाह का सबसे मुख्य उदाहरण कुलीन बहु-विवाह है। सभी चाहते हैं कि उनकी लड़कियों का विवाह बड़ी जाति के लड़कों के साथ हो पर कुलीन वंश की गिनती अधिक नहीं थी। एक-एक कुलीन ब्राह्मण 100-100 लड़कियों के साथ विवाह करवाता था। इस कारण दहेज प्रथा बढ़ गई और समाज में अनैतिकता भी बढ़ गई।

प्रश्न 18.
साली विवाह।
उत्तर-
इस विवाह में पुरुष अपनी स्त्री की बहन के साथ विवाह करता है। ये विवाह दो तरह का होता है। सीमित साली विवाह, समकालीन साली विवाह, सीमित साली विवाह में पुरुष अपनी स्त्री की मौत के बाद उसकी बहन के साथ विवाह करता है। समकालीन साली विवाह में पुरुष अपनी स्त्री की सभी-बहनों को अपनी पत्नियों के समान मानता है। पहली किस्म का प्रचलन अधिक है। इनमें परिवार नहीं टूटता और बच्चों का पालन-पोषण अधिक अच्छी तरह होता है।

प्रश्न 19.
देवर विवाह।
उत्तर-
विवाह की इस प्रथा में पत्नी अपने पति की मौत के बाद उसके भाई के साथ विवाह करवाती है। इसके साथ परिवार की सम्पत्ति सुरक्षित रह जाती है। परिवार टूटने से बचता है। बच्चों का पालन-पोषण ठीक हो जाता है। इस विवाह के साथ लड़के के माता-पिता को लड़की का मूल्य वापिस नहीं करना पड़ता।

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प्रश्न 20.
बहु-पति विवाह।
उत्तर-
इस विवाह में एक स्त्री बहुत से पतियों के साथ विवाह करती है। एक ही समय में वह सभी की पत्नी होती है इसके दो प्रकार हैं। भ्रात बहु-पति विवाह, जिसमें स्त्री के सभी पति आपस में भाई होते हैं और गैर-भ्रातृ बहु-पति विवाह, जिसमें स्त्री के सभी पति आपस में भाई नहीं होते। ग़रीबी और स्त्रियों की कम गिनती के कारण ये प्रथा बढ़ी।

प्रश्न 21.
भ्रातृ बहु-पति विवाह।
उत्तर-
इस विवाह की प्रथा के अनुसार स्त्री के सारे पति परस्पर भाई हुआ करते थे अथवा एक ही जाति के व्यक्ति होते थे। इस विवाह की प्रथा में सबसे बड़ा भाई एक स्त्री से विवाह करता है तथा उसके सब भाइयों का उस पर पत्नी रूप में अधिकार होता है व सारे उससे लैंगिक सम्बन्ध रखते हैं। यदि कोई छोटा भाई विवाह करता है तो उसकी भी पत्नी सब भाइयों की पत्नी होती है, जो बच्चे होते हैं वो सब बड़े भाई के नाम से माने जाते हैं व सम्पत्ति पर भी अधिकार बड़े भाई का अधिक होता है।

प्रश्न 22.
गैर-भ्रातृ बहु-पति विवाह।
उत्तर–
बहु-पति विवाह की इस प्रकार में एक औरत के पति आपस में भाई नहीं होते। यह पति सब भिन्न-भिन्न स्थानों में रहते हैं। ऐसे समय में औरत निश्चित समय के लिए एक पति के पास रहती है इस प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे के पास। इस तरह सारा साल अलग-अलग पतियों के पास जीवन व्यतीत करती है। जिस समय एक स्त्री एक पति के पास रहती है उस समय दूसरे पतियों को उससे सम्बन्ध बनाने का अधिकार नहीं होता। बच्चा होने पर एक विशेष संस्कार अनुसार पति उसका पिता बन जाता है जो वह गर्भावस्था में स्त्री को धनुष (तीर-कमान) भेंट करता है। उसे उस बच्चे का पिता मान लिया जाता है।

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प्रश्न 23.
परिवार का अर्थ।
उत्तर-
परिवार एक ऐसी संस्था है जिससे स्त्री व पुरुष समाज से मान्यता प्राप्त लिंग सम्बन्ध स्थापित करता है। परिवार व्यक्तियों का वह समूह है जो एक विशेष नाम से पहचाना जाता है जिसमें पति-पत्नी के स्थाई लिंग सम्बन्ध होते हैं जिसमें सदस्यों के पालन-पोषण की पूर्ण व्यवस्था होती है जिससे सदस्यों में खून के सम्बन्ध होते हैं व इसके सदस्य एक खास निवास स्थान पर रहते हैं।

प्रश्न 24.
परिवार की विशेषताएं।
उत्तर-

  1. परिवार सर्वव्यापक है।
  2. परिवार लिंग सम्बन्धों से उत्पन्न समूह है।
  3. परिवार का सामाजिक आधार में केन्द्रीय स्थान होता है।
  4. परिवार में रक्त सम्बन्धों का बन्धन होता है।
  5. परिवार में सदस्यों की ज़िम्मेदारी अन्य सदस्य चुनते हैं।
  6. परिवार सामाजिक नियन्त्रण का आधार होता है।

प्रश्न 25.
परिवार व सामाजिक नियन्त्रण।
उत्तर-
परिवार ही बच्चों पर नियन्त्रण रखता है व उसको नियन्त्रण में रहना सिखाता है। परिवार उस पर इस प्रकार से नियन्त्रण रखता है कि उसमें ग़लत आदतें न उत्पन्न हो सकें। परिवार अपने सदस्यों के हर तरह के व्यवहार व क्रियाओं पर नियन्त्रण रखता है। इस तरह बच्चा अनुशासन में रहना सीखता जाता है। इस प्रकार परिवार बच्चे पर निगरानी रखकर एक तरह से सामाजिक नियन्त्रण रखता है।

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प्रश्न 26.
परिवार व समाजीकरण।
उत्तर-
परिवार माता-पिता व बच्चों की स्थायी संस्था है, जिसका प्रथम कार्य बच्चों का समाजीकरण करना है। परिवार में बच्चा हमदर्दी, प्यार व ज़िम्मेदारी की पालना करना सीखता है। परिवार से ही वह छोटे, बराबर के व बड़ों के प्रति व्यवहार प्रकट करना सीखता है। परिवार में उसकी आदतों, अनुभवों, शिक्षाओं व कार्यों से ही आगे जाकर समाज में उसका काम व आचरण निश्चित होता है। परिवार में ही वह सामाजिक रीति-रिवाजों, रस्मों, आचरण, नियमों, सामाजिक बन्धनों की पालना इत्यादि सीखता है। इस प्रकार परिवार समाजीकरण का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रश्न 27.
एकाकी परिवार क्या है ?
उत्तर-
इकाई परिवार वह परिवार है जिसमें पति-पत्नी व उनके अविवाहित बच्चे रहते हैं। विवाह के बाद बच्चे अपना अलग घर कायम कर लेते हैं। यह सबसे छोटे परिवार होते हैं। यह परिवार अधिक प्रगतिशील होते हैं व उनके फैसले तर्क के आधार पर होते हैं। इसमें पति-पत्नी को बराबर का दर्जा हासिल होता है। आजकल इकाई परिवार का अधिक चलन है।

प्रश्न 28.
इकाई परिवार की विशेषताएं बताओ।
उत्तर-

  1. केन्द्रीय परिवार या इकाई परिवार आकार में छोटा होता है।
  2. इकाई परिवार में सम्बन्ध सीमित होते हैं।
  3. परिवार के प्रत्येक सदस्य को महत्त्व मिलता है।
  4. परिवार की सत्ता साझी होती है।

प्रश्न 29.
इकाई परिवार के गुण (लाभ)।
उत्तर-

  1. इकाई परिवारों में औरतों की स्थिति ऊंची होती है।
  2. इसमें रहने-सहने का दर्जा उच्च वर्ग का होता है।
  3. व्यक्ति को मानसिक सन्तुष्टि मिलती है।
  4. व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।
  5. सदस्यों में सहयोग की भावना होती है।

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प्रश्न 30.
इकाई परिवार के अवगुण (हानियां)।
उत्तर-

  1. यदि माता या पिता में से कोई बीमार पड़ जाए तो घर के कामों में रुकावट आ जाती है।
  2. इसमें बेरोज़गार व्यक्ति का गुजारा मुश्किल से होता है।
  3. पति की मौत के पश्चात् यदि औरत अशिक्षित हो तो परिवार की पालना कठिन हो जाती है।
  4. कई बार आर्थिक मुश्किलों के कारण पति-पत्नी में लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं।

प्रश्न 31.
संयुक्त परिवार।
उत्तर-
संयुक्त परिवार एक मुखिया की ओर से शासित अनेकों पीढ़ियों के रक्त सम्बन्धियों का एक ऐसा समूह है जिनका निवास, चूल्हा व सम्पत्ति संयुक्त होते हैं। वह सब कर्तव्यों व बन्धनों में बंधे रहते हैं। संयुक्त परिवार की विशेषताएं हैं-(1) साझा चूल्हा (2) साझा निवास (3) साझी सम्पत्ति (4) मुखिया का शासन (5) बड़ा आकार। आजकल इस प्रकार के परिवारों की बजाय केन्द्रीय परिवार चलन में आ गए हैं।

प्रश्न 32.
संयुक्त जायदाद या ‘संयुक्त सम्पत्ति’।
उत्तर-
संयुक्त परिवार में सम्पत्ति पर सभी सदस्यों का बराबर अधिकार होता है। प्रत्येक सदस्य अपनी सामर्थ्य अनुसार इस सम्पत्ति में अपना योगदान डालता है। जिस व्यक्ति को जितनी आवश्यकता होती है वह उतनी सम्पत्ति खर्च कर लेता है। परिवार का कर्त्ता साझी जायदाद की देख-रेख करता है।

प्रश्न 33.
साझा रसोई-घर।
उत्तर-
संयुक्त परिवार की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके सभी सदस्य एक ही रसोई घर का इस्तेमाल करते हैं। भाव यह कि उनका खाना एक ही जगह बनता है व उसे वह इकट्ठे ही मिलकर खाते हैं। ऐसा करते समय वह अपने विचार एक-दूसरे से बांटते हैं। इससे उनका आपसी प्यार व हमदर्दी बनी रहती है।

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प्रश्न 34.
साझे परिवार में कर्ता।
उत्तर-
संयुक्त परिवार में घर के मुखिया की मुख्य भूमिका होती है जिसको कर्ता कहते हैं। परिवार का सबसे बड़ा सदस्य परिवार का मुखिया या कर्ता होता है। परिवार से सम्बन्धित सारे महत्त्वपूर्ण फैसले उसके द्वारा लिए जाते हैं। वह परिवार की साझी सम्पत्ति की देखभाल करता है। परिवार के सभी सदस्य उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। कर्ता की मृत्यु के पश्चात् परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी उसके सबसे बड़े बेटे पर आ जाती है और वह परिवार का कर्ता बन जाता है।

प्रश्न 35.
संयुक्त परिवार के गुण (लाभ)।
उत्तर-

  1. संयुक्त परिवार संस्कृति व समाज की सुरक्षा करता है।
  2. संयुक्त परिवार बच्चों का पालन-पोषण करता है।
  3. संयुक्त परिवार सामाजिक नियन्त्रण व मनोरंजन का केन्द्र होता है।
  4. संयुक्त परिवार सम्पत्ति के विभाजन को रोकता है, उत्पादन में बढ़ोत्तरी व खर्च में कमी करता है।
  5. बुजुर्गों व बीमार सदस्यों की मदद करता है।

प्रश्न 36.
संयुक्त परिवार के अवगुण (हानियां)।
उत्तर-

  1. संयुक्त परिवार में व्यक्ति के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं हो पाता।
  2. संयुक्त परिवार में औरतों का निम्न दर्जा होता है।
  3. इनमें व्यक्तियों की खाली रहने की आदत पड़ जाती है।
  4. चिंता न होने से अधिक संतान उत्पत्ति होती है।
  5. लड़ाई-झगड़े अधिक होते हैं।
  6. पति-पत्नी को एकान्त प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 37.
क्यों संयुक्त परिवार टूट रहे हैं ?
उत्तर-
संयुक्त परिवारों के टूटने के कई कारण हैं; जैसे-

  1. धन की बढ़ती महत्ता के कारण।
  2. पश्चिमी प्रभाव के कारण।
  3. औद्योगीकरण के बढ़ने के कारण।
  4. सामाजिक गतिशीलता के सामने आने के कारण।
  5. जनसंख्या की बढ़ती दर के कारण।
  6. यातायात के साधनों का विकास की वजह से।
  7. स्वतन्त्रता व समानता के आदर्श के सामने आने से।
  8. औरतों के आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने से।

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प्रश्न 38.
पितृ-मुखी परिवार क्या है ?
अथवा
पितृसत्तात्मक परिवार।
उत्तर-
जैसे कि नाम से ही ज्ञात होता है कि इस प्रकार के परिवारों की सत्ता या शक्ति पूरी तरह से पिता के हाथ में होती है। परिवार के सम्पूर्ण कार्य पिता के हाथ में होते हैं। वह ही परिवार का कर्ता होता है। परिवार के सभी छोटे या बड़े कार्यों में पिता का ही कहना माना जाता है। परिवार के सभी सदस्यों पर पिता का ही नियन्त्रण होता है। इस तरह का परिवार पिता के नाम पर ही चलता है। पिता के वंश का नाम पुत्र को मिलता है व पिता के वंश का महत्त्व होता है। आजकल इस प्रकार के परिवार मिलते हैं।

प्रश्न 39.
मातृ-वंशी परिवार।
अथवा
मातृसत्तात्मक परिवार।
उत्तर-
जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है कि परिवार में सत्ता या शक्ति माता के हाथ ही होती है। बच्चों पर माता के रिश्तेदारों का अधिकार अधिक होता है न कि पिता के रिश्तेदारों का। स्त्री ही मूल पूर्वज मानी जाती है। सम्पत्ति का वारिस पुत्र नहीं बल्कि मां का भाई या भांजा होता है। परिवार मां के नाम से चलता है। इस प्रकार का परिवार भारत में कुछ कबीलों में जैसे गारो, खासी आदि में मिल जाता है।

प्रश्न 40.
परिवार के मुख्य कार्य बताओ।
उत्तर-

  1. लैंगिक सम्बन्धों की पूर्ति करता है।
  2. सन्तान पैदा करना।
  3. सदस्यों की सुरक्षा व पालन-पोषण करता है।
  4. सम्पत्ति की देखभाल व आय-व्यय का प्रबन्ध करता है।
  5. धर्म की शिक्षा देना।
  6. बच्चों का समाजीकरण करता है।
  7. संस्कृति का संचार व विकास करता है।
  8. परिवार सामाजिक नियन्त्रण में मदद करता है।

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प्रश्न 41.
परिवार के कार्यों में परिवर्तन।
उत्तर-

  1. परिवार अधिकतर प्रगतिशील हो रहे हैं।
  2. धार्मिक उत्तरदायित्वों की पालना की भावना कम हो रही है।
  3. पारिवारिक महत्त्व काफ़ी कम हो गया है।
  4. औरतें काम करने के लिए बाहर जाती हैं, इसलिए उनके काम बदल रहे हैं।
  5. संयुक्त परिवार कम हो रहे हैं।

प्रश्न 42.
रक्त सम्बन्धी परिवार।
उत्तर-
इस प्रकार के परिवार में रक्त-सम्बन्ध का स्थान सर्वोच्च होता है। इनमें किसी प्रकार के लिंग सम्बन्ध नहीं होते। इसमें पति-पत्नी भी होते हैं परन्तु वह परिवार के आधार नहीं होते। इसमें सदस्यता जन्म पर आधारित होती है। तलाक भी इन परिवारों को भिन्न नहीं कर सकता और यह स्थाई होते हैं।

प्रश्न 43.
पितृ स्थानीय परिवार।
उत्तर-
इस प्रकार के परिवार में लड़की विवाह के उपरान्त अपने पिता का घर छोड़कर अपने पति के घर जाकर रहने लग जाती है और पति के माता-पिता व पति के साथ वहीं घर बसाती है। इस प्रकार के परिवार आमतौर से प्रत्येक समाज में मिल जाते हैं।

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प्रश्न 44.
नव स्थानीय परिवार।
उत्तर-
इस प्रकार के परिवार पहली दोनों किस्मों से भिन्न हैं। इसमें पति-पत्नी कोई भी एक-दूसरे के पिता के घर जाकर नहीं रहते बल्कि वह किसी और स्थान पर जाकर नया घर बसाते हैं। इसलिए इसको नव स्थानीय परिवार कहते हैं। आजकल के औद्योगिक समाज में इस तरह के परिवार आम पाए जाते हैं।

प्रश्न 45.
नातेदारी क्या होती है ?
अथवा
नातेदारी।
उत्तर-
चार्लस विनिक के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में वे सम्बन्ध शामिल किये जाते हैं जोकि कल्पित या वास्तविक वंश परम्परागत बन्धनों के ऊपर आधारित एवं समाज के द्वारा प्रभावित होते हैं।”

प्रश्न 46.
नातेदारी को कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-
निम्न तीन में बांटा जा सकता है-

  1. व्यावहारिक नातेदारी।
  2. सगोत्र नातेदारी।
  3. कल्पित या रस्मी नातेदारी।

प्रश्न 47.
सगोत्र नातेदारी क्या होती है ?
उत्तर-
वह सभी व्यक्ति जिनमें रक्त का बन्धन है, सगोत्र नातेदारी का ही भाग होते हैं। रक्त का सम्बन्ध यद्यपि वास्तविक हो या कल्पित तो ही इसी आधार के ऊपर सम्बन्धित व्यक्तियों को नातेदारी व्यवस्था में स्थान प्राप्त है यदि इसको सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है।

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प्रश्न 48.
वंश समूह क्या होता है ?
उत्तर-
वंश समूह माता या पिता में से किसी एक के रक्त सम्बन्धियों से मिलकर बनता है। इन सभी सम्बन्धियों के किसी एक स्त्री या पुरुष के साथ वास्तविक वंश परम्परागत होते (Ties) हैं। सभी सदस्य वास्तविक साझे पूर्वज की सन्तान होने के कारण अपने वंश समूह में विवाह नहीं करवाते। इस प्रकार वंश समूह उन रक्त के सम्बन्धियों का समूह होता है। जो साझे पूर्वज की एक रेखकी सन्तान होते है और जिनकी पहचान को अनुरेखित किया जाता
है।

प्रश्न 49.
गोत्र क्या होते हैं ?
उत्तर-
गोत्र वंश समूह का ही विस्तृत रूप है, जोकि माता-पिता के किसी एक के अनुरेखित रक्त सम्बन्धियों से मिलकर बनता है। इस तरह गोत्र रिश्तेदारों का समूह होता है, जो किसी साझे पूर्वज की एक रेखकी सन्तान होती है। पूर्वज आमतौर पर कल्पित ही होते हैं। क्योंकि इनके बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता है। यह बहिर्विवाही समूह होते हैं।

प्रश्न 50.
वैवाहिक नातेदारी।
उत्तर-
वैवाहिक नातेदारी पति-पत्नी के यौन सम्बन्धों पर आधारित होती है। यद्यपि उनमें कोई रक्त सम्बन्ध नहीं होता। परन्तु उनमें विवाह के बाद सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं। विवाह के बाद व्यक्ति को पति के साथ जवाई, फूफड़, जीजा, सांदू आदि के रुतबे हासिल होते हैं। इस तरह स्त्री को भी पत्नी के साथ-साथ, देवराणी, जेठानी, चाची, ताई इत्यादि का रुतबा प्राप्त होता है। इस तरह के रुतबों को वैवाहिक नातेदारी का नाम दिया जाता है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विवाह की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-
विवाह की विशेषताओं का वर्णन नीचे दिया गया है-
1. विवाह एक सर्वव्यापक संस्था है (It is an universal insitutions)-विवाह की संस्था चाहे प्राचीन थी, चाहे आधुनिक है, सभी समाजों में पाई जाती है। यह सर्वव्यापक है। इस संस्था के बिना किसी स्थिर समाज की हम कल्पना तक नहीं कर सकते।

2. इस संस्था के द्वारा आदमी व औरत के लैंगिक सम्बन्धों को सामाजिक मान्यता प्राप्त होती है (Social sanction)-बिना सामाजिक मान्यता के यह सम्बन्ध गैर कानूनी करार दिए जाते हैं। इस संस्था का सदस्य बन कर व्यक्ति अपने दूसरे अधिकारों को भी जान जाता है व उसका दायरा कुछ सीमित हो जाता है।

3. दो विरोधी लिंगों का सम्बन्ध इस संस्था को जन्म देता है (Development of institution)-इससे मानव अपनी जैविक ज़रूरत को भी पूरा कर लेता है। पशुओं में भी विरोधी लिंगों का मेल होता है। लेकिन मानवों के इस मेल के द्वारा विवाह की संस्था का जन्म होता है परन्तु जानवरों का इस संस्था से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता।

4. विवाह की संस्था के द्वारा व्यक्ति को सामाजिक स्थिति भी प्राप्त हो जाती है (Provide social status)-विवाह के पश्चात् पुरुष व स्त्री, पति-पत्नी के रूप में स्वीकृत किए जाते हैं। बच्चा पैदा होने के बाद उनकी सामाजिक स्थिति माता-पिता से सम्बन्धित हो जाती है जिसके साथ परिवार का जन्म हो जाता है।

5. विवाह को एक समझौता भी समझा जाता है (Social Contract)—इसमें आदमी व औरत न केवल अपनी लिंग इच्छाओं की पूर्ति करते हैं बल्कि बच्चों के पालन-पोषण का बोझ भी सम्भालते हैं व पारिवारिक उत्तरदायित्वों को भी अदा किया जाता है।

6. विवाह के प्रकार अलग-अलग समाजों में अलग-अलग पाए जाते हैं (Different types in different societies)—प्रत्येक समाज की अपनी ही संस्कृति होती है जिसकी सुरक्षा से बाकी संस्थाएं जुड़ी होती हैं। उदाहरण के लिए मुसलमानों की संस्कृति एक से अधिक विवाह की आज्ञा दे देती है परन्तु हिन्दुओं की संस्कृति इसके विपरीत है अर्थात् एक से अधिक विवाह को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं होती।

7. विवाह के द्वारा व्यक्ति को कानूनन मान्यता प्राप्त हो जाती है (Legal Sanction)-इससे पुरुष व स्त्री के विवाह सम्बन्ध भी स्थापित हो जाते हैं।

8. इस संस्था के द्वारा धार्मिक रीति-रिवाज भी सुरक्षित रहते हैं। चाहे आधुनिक समय में कोर्ट-मैरिज होने लगी है, परन्तु धार्मिक संस्कार अभी भी इस संस्था से जुड़े हुए हैं।

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प्रश्न 2.
एक विवाह का क्या अर्थ है ? इसके कारणों, लाभों तथा कमियों का वर्णन करें।
उत्तर-
आधुनिक समय में अधिकतर पाई जाने वाली विवाह का प्रकार ‘एक विवाह’ है। एक विवाह का अर्थ है जब एक आदमी, एक समय एक ही औरत से या एक औरत, एक समय, एक ही आदमी से विवाह करवाती है तो इसको एक विवाह का नाम दिया गया है। आजकल के सांस्कृतिक समाजों में इसको काफ़ी महत्ता प्राप्त है।

मैलिनोवस्की (Malinoviski) के अनुसार, “एक विवाह ही, विवाह का वास्तविक प्रकार है, जो पाई जा रही है व पाई जाती रहेगी।”
पीडीगंटन (Piddington) के अनुसार, “एक विवाह, विवाह का वह स्वरूप है, जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति एक से अधिक स्त्रियों के साथ एक ही समय पर विवाह सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता।”

वुकेनोविक के अनुसार, “उसी विवाह को एक विवाह कहना ठीक होता है, जिसमें न केवल एक व्यक्ति की पत्नी या पति हो, बल्कि किसी की भी मौत हो जाने पर दूसरा विवाह न करे। आमतौर पर एक पति या पत्नी के जीते जी किसी से न विवाह करना ही एक विवाह माना जाता है।”

भारतीय समाज में हिन्दू धर्म के अनुसार भी एक विवाह को ही आदर्श विवाह माना जाता है। प्राचीन समय से ही स्त्री के लिए उसका पति ही परमेश्वर होता था। पति की मौत के साथ वह औरत आप भी सती होना बेहतर समझती थी। भारत में हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 के अधीन भी बहु-विवाह को समाप्त कर दिया गया व एक विवाह करने की ही स्वीकृति हो गई। आधुनिक समय में तो कानून इतने सख्त हैं कि तलाक लिए बिना आदमी व औरत दूसरा विवाह नहीं करवा सकते। कुछ हालातों में दूसरे विवाह की इजाजत दी गई जैसे सन्तान न होने की सूरत में. पति या पत्नी में कोई एक ला-इलाज बीमारी से सम्बन्धित हो आदि।

कारण (Causes)-

1. आधुनिक समाज में एक विवाह की प्रथा ही प्रचलित रही है। इस प्रथा के आने से ही हमारे समाज में भी प्रगति हुई है। जहां एक विवाह की प्रथा पाई गई उस समाज में प्रगति भी अधिक हुई। समाज की प्रगति के लिए भी एक विवाह को आवश्यक समझा गया।

2. स्त्रियों व पुरुषों की जनसंख्या की दर में बराबरी पाए जाने के कारण भी एक विवाह ही ज़रूरी समझा गया। इस अनुपात की बराबरी के कारण समाज में स्थिरता भी आ गई।

3. एकाधिकार की भावना के कारण भी एक विवाह को स्वीकृति प्राप्त हुई। आदिम समाज में जब विवाह की संस्था अधिक नियमित नहीं थी हुई तो कोई भी आदमी, किसी भी औरत से सम्बन्ध रख लेता था। कुछ देर के बाद उनमें ईर्ष्या की भावना पैदा होनी शुरू हो गई क्योंकि प्रत्येक आदमी यह इच्छा रखने लगा कि उसकी औरत, दूसरे आदमी के पास न जाए। उस समय जो आदमी शारीरिक तौर पर अधिक बलवान् थे, उन्होंने स्त्री पर एकाधिकार रखना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे आजकल के समय में आदमी व औरत दोनों के द्वारा एकाधिकार की भावना को अपनाया जाने लगा व आधुनिक समाज में एक विवाह के प्रकार को अपनाया गया।

4. प्राचीन समय में स्त्री का मूल्य रखा जाता था। जो भी पुरुष उस कीमत को अदा कर देता था उसको वह स्त्री दे दी जाती थी। इसके अतिरिक्त परिवार की स्थिरता के कारण एक पुरुष व एक स्त्री का विवाह प्रचलित था।

एक विवाह के लाभ (Advantages of Monogamy)-

1. स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन (Change in the Status of Women)–प्राचीन समय से स्त्रियों की समाज में काफ़ी निम्न स्थिति थी। पुरुष ने जिस तरह चाहा, उसी तरह का स्त्री से व्यवहार किया। यहां तक कि आश्रम व्यवस्था में स्त्री ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश नहीं कर सकती थी। उस का कार्य केवल बच्चे पैदा करना, घर का काम करना इत्यादि तक सीमित था।

इसके अतिरिक्त यदि जाति-प्रथा पर नजर डालें तो वहां भी औरत के जन्म को बुरा समझा जाता था। बिना पुरुष के उसको समाज में जीने का कोई अधिकार नहीं होता था वह पति की मौत पर अपने आप को सती कर देती थी। धीरे-धीरे जब शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन हुआ तो उनकी स्थिति पुरुषों के समान हो गई। इसी कारण एक विवाह की प्रथा के साथ स्त्री ने अपनी स्थिति को स्त्री के समान ही समझा। इस विवाह के प्रकार ने स्त्री की स्थिति में अधिक परिवर्तन किया।

2. बच्चों का पालन-पोषण (Up-bringing of Children)-एक विवाह के प्रकार के आधार पर जो परिवार पाया गया, उसमें बच्चों की परवरिश पहले से अधिक अच्छे ढंग से हो गई। दूसरे विवाह के प्रकारों में बच्चों में ईर्ष्या की भावना रहती थी। यहां तक कि परिवार के सभी सदस्यों में प्यार केवल दिखावा मात्र तक ही सीमित था। इस विवाह की किस्म से माता-पिता द्वारा बच्चों को सम्पूर्ण प्यार प्राप्त हुआ। उनकी हर तरह की ज़रूरतों की ओर ध्यान दिया गया। बच्चों में योग्यता व ज्ञान बढ़ा। उसके व्यक्तित्व का भी विकास हुआ।

3. परिवार की स्थिरता (Stability of Family)-एक विवाह से परिवार पहले से अधिक स्थिर हो गए। आदमी व औरत को एक-दूसरे के विचार समझने का मौका मिला। परिवार तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक पुरुष व स्त्री दोनों में सूझ-बूझ न हो। बहु-विवाह में लड़ाई-झगड़ा अधिक रहता था, न तो पुरुष स्त्री को पूरा प्यार दे सकता था न ही स्त्री पुरुष को पूरा प्यार दे सकती थी। तनाव की स्थिति तकरीबन विकसित रहती थी। इस स्थिति का प्रभाव बच्चों पर पड़ता था जिससे बच्चों का सम्पूर्ण विकास नहीं हो सकता था। इसी कारण एक विवाह की प्रथा के द्वारा ही पारिवारिक जिन्दगी को अधिक स्थिरता प्राप्त हुई।

4. जायदाद का विभाजन (Division of Property)-जायदाद का विभाजन बहु-विवाह में एक समस्या बन जाती थी। कई बार तो भाई-भाई आपस में एक-दूसरे को मारने के लिए भी तैयार हो जाते थे। परन्तु एक विवाह की प्रथा में इस समस्या का हल हो गया। व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी जायदाद उसके बच्चों में बराबरी से विभाजित कर दी जाती थी।

5. रहन-सहन का उच्च-स्तर (Higher Standard of living)-आधुनिक समय में व्यक्ति की ज़िन्दगी प्राचीन समय से अधिक आरामदायक हो गई। एक पुरुष को केवल एक ही स्त्री व एक स्त्री को केवल एक ही पुरुष की देखभाल करनी पड़ती थी। हरेक व्यक्ति अपने बच्चों को अपनी इच्छा अनुसार अधिक-से-अधिक अच्छी शिक्षा दे सकता है व अपने आराम की सहूलतें भी प्राप्त कर लेता है। बहु-विवाह की प्रथा में अधिक बच्चों की परवरिश भी मुश्किल हो जाती थी। एक विवाह की प्रथा से सीमित परिवार को ज्यादातर अपनाया गया।

एक विवाह की कमियां (Demerits of Monogamy)-

1. एक विवाह की प्रथा में जब स्त्री बच्चा पैदा करने की अवस्था में होती है तो वह पुरुष को पूरा सहयोग नहीं दे सकती इसके अतिरिक्त बीमारी के समय पुरुष अपनी लैंगिक इच्छा की पूर्ति के लिए घर से बाहर जाना शुरू हो गया जिससे वेश्याओं को समाज में जगह मिल गई। कई स्थितियों में पुरुष व स्त्री को मजबूरन इकटे रहना पड़ता है चाहे उनमें आपसी प्यार न हो तो भी पुरुष व स्त्री दोनों अपनी जैविक भूख को मिटाने के लिए घर से बाहर जाने लगे हैं।

2. दूसरी कमी एक विवाह की प्रथा का कारण यह रहा कि यदि घर में पति या पत्नी दोनों में से कोई भी एक बीमार हो या दोनों, ऐसी स्थिति में घर बिलकुल बेहाल हो जाता है। बच्चों को खाने-पीने की समस्या का सामना करना पड़ जाता है व कई मनोवैज्ञानिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है।

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प्रश्न 3.
बहु-विवाह की परिभाषाओं, प्रकारों, कारणों, लाभों तथा हानियों सहित व्याख्या करें।
उत्तर-
बहु-विवाह का अर्थ है जब तक एक से अधिक आदमी या औरतों से विवाह करने की स्वीकृति हो, उसको बह-विवाह का नाम दिया गया है। बलसेरा (Balsera) के अनुसार, “विवाह की वह प्रकार जिसमें पतियों व पत्नियों की बहुलता होती है, वह बहु-विवाह कहलाता है।”
बहु-विवाह के आगे भी कुछ प्रकार पाए गए हैं जो निम्नलिखित अनुसार है-

  1. दो-पत्नी विवाह (Bigamy)
  2. बहु-पत्नी विवाह (Polygyny)
  3. बहु-पति विवाह (Polyandry)

दो-पत्नी विवाह (Bigamy)-विवाह की इस प्रथा में एक पुरुष को केवल दो स्त्रियों से विवाह करवाने की आज्ञा होती है। विवाह का यह प्रकार पंजाब में भी प्रचलित रहा था।

बहु-पत्नी विवाह (Polygyny) विवाह के इस प्रकार का अर्थ है जब एक पुरुष का विवाह अधिक स्त्रियों से कर दिया जाता है, तो उसको बहु-पत्नी विवाह कहा जाता है।

के० एम० कपाड़िया (Kapadia) के अनुसार, “बहु-पत्नी विवाह, विवाह का वह प्रकार होता है, जिसमें पुरुष एक ही समय एक से अधिक स्त्रियां रख सकता है।”
जी० डी० मिचैल (G.D. Mitchell) के अनुसार, “एक पुरुष यदि एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करवाता है तो उसको बहु-पत्नी विवाह का नाम दिया जाता है।

यह दो प्रकार का होता है :

  1. प्रतिबन्धित बहु-पत्नी विवाह (Restricted Polygyny Marriage) .
  2. अप्रतिबन्धित बहु-पत्नी विवाह (Unrestricted Polygyny Marriage)

प्रतिबन्धित बहु-पत्नी विवाह (Restricted Polygyny)-बहु-पत्नी विवाह के इस प्रकार में पत्नियों की संख्या सीमित कर दी जाती है। व्यक्ति उस सीमा से अधिक पत्नियां व्यक्ति नहीं रख सकता। मुसलमानों में प्रतिबन्धित बहु-पत्नी विवाह की प्रथा अनुसार एक व्यक्ति के लिए पत्नियों की संख्या भी निश्चित कर दी जाती है।

अप्रतिबन्धित बहु-पत्नी विवाह (Unrestricted Polygyny)–इस प्रथा के अनुसार कोई भी पुरुष जितनी मर्जी पत्नियां रख सकता है। भारत में भी प्राचीन समय में विवाह की यह प्रथा ही प्रचलित थी।

बहु-पत्नी विवाह के कारण (Causes of Polygyny)-वैस्टर मार्क ने बहु-पत्नी विवाह के कई कारण दिए हैं जो निम्नलिखित हैं-

  1. स्त्रियों के पुरुषों से जल्दी बूढ़े हो जाने के कारण बहु-पत्नी विवाह प्रचलित रहा। बच्चा पैदा होने के पश्चात् स्त्रियों की सेहत भी कमजोर हो जाती थी। ऐसा अधिकतर असभ्य समाजों में पाया गया है।
  2. विवाह के पश्चात् कुछ समय स्त्री व पुरुष के वैवाहिक सम्बन्धों पर पाबन्दी लगा दी जाती थी। उदाहरण के तौर पर गर्भवती स्त्री के लिए भी यौन सम्बन्धों पर पाबन्दी होती थी। इस कारण भी एक से अधिक विवाह की आज्ञा दी जाती थी।
  3. पुरुषों में अधिक यौन सम्बन्धों की इच्छा भी इस विवाह के कारणों में मुख्य थी व कई बार पुरुषों द्वारा परिवर्तन चाहने के कारण भी बहु-पत्नी विवाह प्रचलित था।
  4. विशाल परिवार को प्राचीन समय में अच्छा दर्जा प्राप्त होता था। बड़े आकार के परिवार की इच्छा भी बहुपत्नी विवाह को प्रभावित करती थी।
  5. प्राचीन कबीले-समाजों में समाज को सम्मान प्राप्त करने के लिए भी कबीले के सरदार एक से अधिक विवाह करवाने में विश्वास रखते थे। क्योंकि लोग उसको अधिक अमीर परिवार से सम्बन्धित कर देते थे।

बहु-पत्नी विवाह के लाभ (Merits of Polygyny)-

  1. बहु-पत्नी विवाह की प्रथा से बच्चों का पालनपोषण बहुत बढ़िया ढंग से हो जाता था क्योंकि कई औरतें मिल कर उनकी देखभाल कर लेती थीं। यदि एक औरत बीमार हो जाती थी तो दूसरी औरत उसके बच्चों को रोटी इत्यादि दे देती थी।
  2. इस विवाह का लाभ यह भी था कि वेश्याओं के पास पुरुष को जाकर पैसा बर्बाद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। घर में ही उसको अधिक काम इच्छा के लिए आवश्यक नवीनता भी प्राप्त हो जाती थी। इसकारण घर की सम्पत्ति भी सुरक्षित रहती थी।
  3. इस प्रथा से बच्चे भी स्वस्थ होते थे। क्योंकि एक स्त्री को ही अकेले बहुत बच्चों को जन्म देने के लिए उपयोग नहीं किया जाता था।
  4. बहु-पत्नी विवाह से जब कुलीन विवाह पाया गया तो निम्न जाति की लड़की भी उच्च जाति के लड़के से शादी करने लगी जिसके परिणामस्वरूप समाज में भाईचारे की भावना भी अधिक जागृत हुई।

बहु-पत्नी विवाह की हानियां (Demerits of Polygyny)-

  1. बहु-पत्नी विवाह की सबसे बड़ी कमी यह थी कि स्त्रियों का दर्जा समाज में बहुत निम्न था। क्योंकि स्त्री को केवल पुरुष के मनोरंजन के साधन रूप में ही समझा जाता था। आदमी के लिए औरत के प्रति प्यार की भावना नहीं थी बल्कि वह उसको केवल लिंग इच्छा की पूर्ति से ही सम्बन्ध रखता था। औरत की भावनाओं की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता था। समाज में तो औरत की कोई पहचान ही नहीं थी।
  2. स्त्रियां जब लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति से अधूरी रह जाती थी तो वह घर से बाहर जाकर अपने यौन सम्बन्ध कायम करने लग जाती थी क्योंकि एक पुरुष बहु-पत्नियों से विवाह करवा कर अपनी सन्तुष्टि तो कर सकता है परन्तु स्त्रियों की सन्तुष्टि नहीं हो सकती।
  3. परिवार में विवाह की इस प्रथा के साथ-माहौल दुःखदायक ही रह जाता था क्योंकि अधिक पत्नियां होने से आपस में लड़ाई-झगड़ा लगा रहता था।
  4. बहु-पत्नी विवाह की प्रथा के कारण समाज में परिवार के मुखिया पर आर्थिक बोझ अधिक होता था क्योंकि कमाने वाला एक होता था व बाकी परिवार के सभी सदस्य उस पर ही निर्भर होते थे। परिवार के रहन-सहन का दर्जा काफ़ी निम्न हो जाता था।
  5. बहु-पत्नी विवाह में परिवार का आकार बड़ा होता था जिस कारण मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा रहती थीं।

प्रश्न 4.
बहु-पति विवाह के प्रकारों, कारणों, लाभों तथा हानियों सहित व्याख्या करें।
उत्तर-
संसार के कई समाजों में बहु-पति विवाह की प्रथा प्रचलित है। बहु-पति विवाह का अर्थ विवाह की वह प्रथा है जिसमें एक औरत एक ही समय में एक से अधिक आदमियों से विवाह करवाए। उसको बह-पति विवाह का नाम दिया जाता है। अधिकतर यह विवाह तिब्बत (Tibet) पोलीनेशिया (Polynesia) के मार्कयूज़नीम, मालाबार के टोडा (Todas) मलायाद्वीप के कुछ कबीलों में अभी भी प्रचलित है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में महाभारत के अनुसार पांच पाण्डव भाइयों की भी एक ही पत्नी थी। भारत में देहरादून के खस कबीले, मध्य भारत के टोडा कबीले, केरल के कोट कबीले में भी बह-पति विवाह की प्रथा अभी भी प्रचलित है। इसके अतिरिक्त कई पहाडी कबीलों में भी इसी प्रथा को मान्यता प्राप्त हुई है। बहु-पति विवाह के बारे अलग-अलग विद्वानों के विचार नीचे दिए जा रहे हैं-

के० एम० कपाड़िया (K.M. Kapadia) के अनुसार, “बहु-पति विवाह एक ऐसी संस्था है जिसमें एक स्त्री के एक ही समय एक से अधिक पति होते हैं या इस प्रथा के अनुसार सभी भाइयों की सामूहिक रूप से एक पत्नी या कई पत्नियां होती हैं।” ___* जी० डी० मिचैल (G. D. Mitchell) के अनुसार, “एक स्त्री का दो या दो से अधिक पुरुषों से विवाह की प्रथा बहु-पति विवाह है।” इस प्रकार जिस विवाह में एक स्त्री के एक से अधिक पति हों को बहु-पति विवाह कहा जाता है।

बहु-पति विवाह के प्रकार (Types of Polyandrous Marriage)-बहु-पति विवाह के दो मुख्य रूप पाए होते हैं :

  1. भ्रातृ बहु-पति विवाह (Fraternal Polyandry)
  2. गैर-भ्रातृ बहु-पति विवाह (Non-Fraternal Polyandry)

भ्रातृ बहु-पति विवाह (Fraternal Polyandry)-बहु-पति विवाह के इस प्रकार के अनुसार स्त्री के सभी पति आपस में भाई होते हैं। बड़े भाई को बच्चे का पिता समझा जाता था व बाकी छोटे भाई उस औरत के पति होते हैं व वह अपने बड़े भाई की आज्ञा के बिना यौन सम्बन्ध नहीं स्थापित कर सकते थे। घर में बड़े भाई की आज्ञा ही चलती थी व उसकी ही ज़िम्मेदारी होती थी कि वह बच्चों का पालन-पोषण करे। विवाह के पश्चात् यदि पति का और भाई भी जन्म लेता है तो उसको भी उस औरत का पति ही समझा जाता था। यदि बड़े के अलावा कोई और भाई भी किसी और जगह विवाह कर ले तो भी उसकी औरत के बाकी भाइयों से पत्नी वाले सम्बन्ध ही होते थे। यदि भाई इस बात को न मानें, अपनी पत्नी पर केवल अपना अधिकार ही समझे तो उसको जायदाद में से बेदखल कर दिया जाता था। भारत में नीलगिरी, लद्दाख, सिक्किम, असम इत्यादि में भी यह प्रथा पाई जाती है।

गैर-भ्रातृ बहुपति विवाह (Non-Fraternal Polyandry)-बहुपति विवाह के इस प्रकार में स्त्री के सभी पति भाई नहीं होते बल्कि वह सब अलग-अलग स्थान पर रहते हैं। औरत के लिए समय निश्चित किया जाता है कि उसने कितने समय के लिए एक पति के पास रहना है। निश्चित समय समाप्त होने पर वह दूसरे पति के साथ रहती है। इस प्रकार बारी-बारी वह सब पतियों के साथ रहती है। इस प्रकार में यदि स्त्री की मृत्यु हो जाए तो सारे पतियों को विधुर सा जीवन जीना पड़ता है। कई कबीले जिनमें यह प्रथा पाई जाती है तो सब जब स्त्री गर्भवती होती है तो गर्भ अवस्था में जो पति उसको तीरकमान भेंट करता है तो उसी को बच्चे का पिता स्वीकार कर लिया जाता है व बारी-बारी सभी पतियों को इस रस्म के अदा करने का अधिकार दिया जाता है। इस प्रकार इस प्रथा अनुसार यह भी नियम होता है कि एक निश्चित समय के लिए वह जिस पति के साथ रह रही होती है तो बाकी पतियों के उसके साथ लिंग सम्बन्धों की आज्ञा नहीं होती।

बहु-पति विवाह के कारण (Causes of Polyandry)-

1. प्राचीन कबीलों में रहते हुए लोगों के लिए एक व्यक्ति द्वारा पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उठानी मुश्किल होती थी जिस कारण व्यक्ति मिल कर एक स्त्री से विवाह करवा लेते थे। डॉ० कपाड़िया के अनुसार यह प्रथा कठोर प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण भी पाई जाती थी। प्राचीन समय में रोजी रोटी के लिए व्यक्ति को बहुत लम्बा समय अपने परिवार से दूर रहना पड़ता था इस कारण कुछ व्यक्ति इस काम में व्यस्त रहते थे व बाकी पुरुष परिवार की देख-रेख के लिए घर रहते थे।

2. बढ़ती हुई जनसंख्या को सीमित करने के लिए भी विवाह की यह प्रथा पाई गई। इसमें परिवार सीमित रहता है। क्योंकि बच्चे कम पैदा होते हैं।

3. कई स्थानों पर रोजी रोटी के साधन सीमित होने के कारण भी यह प्रथा पाई गई क्योंकि कमाने वालों की संख्या सीमित साधनों के कारण अधिक थी व खाने वाले कम हो जाते थे, जिससे उनमें खुशहाली भी थी।

4. कई समाज शास्त्रियों के अनुसार विवाह की इस प्रथा के प्रचलित होने का कारण औरतों की संख्या का मर्दो की संख्या से कम होना भी है। ___5. कुछ क्षेत्रों में लड़की की कीमत अदा करने पर ही उसको पत्नी बनाया जा सकता था व कई बार लड़की की कीमत इतनी अधिक होती थी कि अकेले व्यक्ति की हैसियत से बाहर होती थी। इस कारण कई व्यक्ति मिलकर उसको पत्नी बनाने के लिए कीमत अदा करने के काबिल होते थे। इसी कारण वह सभी मिलकर एक ही औरत को अपनी पत्नी स्वीकार कर लेते थे।

बहुपति विवाह के लाभ (Merits of Polyandry)-
1. बहु-पति विवाह की प्रथा से जनसंख्या सीमित की जा सकती है क्योंकि कई समाजों में ग़रीबी का कारण भी बढ़ती. आबादी द्वारा होता है, इस प्रथा से बच्चों की संख्या कम हो जाती है।

2. इस प्रथा से जैसे जनसंख्या सीमित होती है उसी तरह रहन-सहन का दर्जा ऊंचा हो जाता है, क्योंकि कमाने वाले पर परिवार का बोझ काफ़ी कम होता है। कमाने वालों की संख्या अधिक होती है जिस कारण परिवार पर किसी प्रकार का आर्थिक बोझ नहीं पड़ता।

3. संयुक्त परिवार इस प्रथा के द्वारा ही पाया जाता है व साथ ही परिवार का आकार भी सीमित होता है। इस कारण लड़ाई-झगड़े भी कम हो जाते हैं क्योंकि प्रत्येक परिवार का सदस्य, परिवार के साझे लाभ के लिए ही मेहनत करता है।

4. बहुपति विवाह की प्रथा में बच्चों का पालन-पोषण अधिक स्थिर ढंग से होता है क्योंकि बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी परिवार के सभी सदस्यों की साझी होती है। माता व पिता का प्यार जो बच्चों के व्यक्तित्व के निर्माण के लिए पाया जाता है, भी बच्चों को प्राप्त हो जाता है। संघर्ष की स्थिति बहुत कम पाई जाती है।

बहुपति विवाह की हानियाँ (Demerits of Polyandry)-
1. बहुपति विवाह का सबसे बड़ा नुकसान औरतों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित होता है क्योंकि एक स्त्री को कितने ही पुरुषों की लैंगिक इच्छा की पूर्ति करनी पड़ती है जिस कारण उनका स्वास्थ्य कमज़ोर हो जाता था।

2. विवाह की इस प्रथा से जन्म दर बहुत कम होती थी। यदि यह विवाह कुछ कबीलों में विकसित रहा तो आने वाले वर्षों में हो सकता है कि समाज भी समाप्त हो जाए।

3. सभी पुरुषों की काम वासना पूरी नहीं की जा सकती क्योंकि औरत के लिए प्रत्येक आदमी के पास रहने का समय निश्चित किया जाता है। जब वह निश्चित समय एक आदमी के पास रह रही होती है तो बाकी आदमियों को उसके साथ सहवास करने की मनाही होती है। ऐसी स्थिति में आदमी अपनी काम इच्छा की पूर्ति के लिए घर से बाहर निकल जाते हैं। इस प्रकार परिवार व समाज दोनों के बीच झगड़े से अनैतिकता में अधिकता पाई जाती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 5.
विवाह की संस्था में आ रहे परिवर्तनों का वर्णन करो।
उत्तर-
1. सरकार द्वारा लाए गए परिवर्तन-जब विवाह को एक संस्था के रूप में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हुई तो इस संस्था में कई प्रकार के परिवर्तन भी लाए गए। विवाह सम्बन्धी कानून पास किए गए जिनमें हिन्दू मैरिज एक्ट सन् 1955 (Hindu Marriage Act 1955) में पास किया गया। इस कानून के तहत बहु-विवाह की प्रथा पर पाबन्दी लगा दी गई। एक विवाह को ही समाज द्वारा स्वीकारा गया व एक आदर्श विवाह भी माना गया। बाल विवाह जैसी बुराई जो बहुत समय से इस समाज में चली आ रही थी, को भी समाप्त किया गया व कानून की उल्लंघना करने वाले को कठोर सज़ा दिए जाने का भी प्रावधान बना। तलाक सम्बन्धी कानून भी पास किया ताकि आदमी व औरत की ज़िन्दगी तनाव भरपूर न रहे। पुराने समय में औरत से चाहे पति दुर्व्यवहार करे तो भी उसको अपनी सारी ज़िन्दगी बितानी पड़ती थी परन्तु अब आदमी व औरत दोनों को छूट दी गई है कि कोई भी अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है ताकि सुख से भरपूर जीवन व्यतीत कर सके।

2. विवाह को सामाजिक समझौते से सम्बन्धित किया गया-पुरानी विचारधारा के अनुसार आदमी व औरत के लिए विवाह एक धार्मिक बन्धन तक ही सीमित होता था, परन्तु आजकल की विचारधारा के अनुसार विवाह को इस बात तक सही बताया कि यदि पुरुष व स्त्री के बीच अच्छे सम्बन्ध हैं तो ठीक है, नहीं तो इस समझौते को तोड़ा भी जा सकता है। कई हालातों में जबरदस्ती विवाह कर दिया जाता है तो बाद में सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए पति-पत्नी के द्वारा आप भी फ़ैसला लिया जा सकता है क्योंकि दोनों के लिए नियम भी समान के बनाए जाते हैं। आधुनिक समय में विवाह को निजी खुशी से सम्बन्धित किया है ताकि परिवार में बच्चों की देखभाल भी ठीक ढंग से हो सके।

3. औरतों की स्थिति में परिवर्तन-जैसे-जैसे औरतें समाज के प्रत्येक क्षेत्र में हिस्सा लेने लगी हैं वैसे-वैसे विवाह का स्वरूप भी बदल गया है। शुरू में समाज में औरत आर्थिक पक्ष से बिलकुल ही दूसरों पर आधारित होती थी। इस तरह वह हर तरह का दुःख भी बर्दाश्त कर लेती थी। परन्तु धीरे-धीरे औरत ने जब शिक्षा प्राप्त कर ली तो उससे वह आर्थिक तौर पर स्वतन्त्र हो गई। वह अपने फ़ैसले आप लेने लगी। कानूनी पक्ष से भी उसे काफ़ी मदद प्राप्त हुई। पति के जुल्म करने की स्थिति में वह उससे अलग होकर अपना जीवन अधिक अच्छी तरह गुज़ारने लगी। इस प्रकार जब औरत ने समाज में अपनी एक जगह बना ली तो विवाह की संस्था में स्वयं परिवर्तन आ गया। तलाक दर में तेजी आई। औरत की स्थिति पहले से अधिक अच्छी हो गई।

4. शिक्षा के विकास द्वारा परिवर्तन-शुरू में शिक्षा की ओर कोई महत्त्व नहीं दिया जाता था। इसी कारण धार्मिक संस्कार को पूरा करने के लिए विवाह की प्रथा विकसित रही। परन्तु जैसे-जैसे शिक्षा में बढ़ोत्तरी हुई तो विवाह को ज़रूरी न समझा गया व न ही छोटी उम्र में लड़की व लड़के की शादी की गई। शिक्षित बच्चे अपनी मर्जी से विवाह करवाने की इच्छा जाहिर करने लगे।

5. औद्योगीकरण के विकास द्वारा लाया परिवर्तन-पुराने समाज में विवाह सम्बन्धी नियम इतने कठोर होते थे कि हर एक व्यक्ति को अपनी ही जाति में विवाह करवाना पड़ता था। यदि वह उस नियम की उल्लंघना भी करता तो उसको सज़ा दी जाती थी। परन्तु जैसे-जैसे पैसे का महत्त्व समाज में बढ़ा तो विवाह के सम्बन्धों में परिवर्तन आ गया। प्राचीन समय की भान्ति विवाह में पवित्रता नहीं रही। आदमी व औरत ने अपने सम्बन्धों को भी काफ़ी हद तक पैसे के सुपुर्द कर दिया जिस कारण कई बार उनका एक-दूसरे पर विश्वास भी समाप्त हो जाता है व वह अलग रहना शुरू कर देते हैं। इसके अतिरिक्त औरतों व आदमियों दोनों तरफ से कुछ कमियां पैदा हो गई हैं जिनसे विवाह की संस्था की प्रबलता में भी कमी आई।

प्रश्न 6.
परिवार के मुख्य कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर-
अलग-अलग समाजशास्त्रियों ने परिवार के कार्यों को अपने-अपने ढंग से वर्गीकृत किया। इनका वर्णन अग्रलिखित अनुसार है
I. जैविक कार्य (Biological Functions of Family)

1. लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति (Satisfaction of Sexual desire) परिवार का यह ज़रूरी कार्य तब से पाया जा रहा है जब से मानवीय समाज पाया गया है क्योंकि लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति परिवार का प्रारम्भिक कार्य होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति ही आदमी व औरत को लम्बे समय तक जोड़े रखती है, जिसके साथ इनमें शख्सियत का भी निर्माण होता है। यदि हम इस इच्छा को दबा देते हैं तो इससे कई ऐसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं जिनसे सामाजिक सम्बन्ध भी टूट जाते हैं।

2. सन्तान उत्पत्ति (Reproduction)—मानवीय समाज को जीवित रखने के लिए भी यह ज़रूरी होता है कि हम मानवीय नस्ल को आगे से आगे बढ़ाएं। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार व्यक्ति को तब तक मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती जब तक उसके पुत्र पैदा नहीं होता। समाज भी परिवार से बाहर पैदा हुए बच्चे को गैर-कानूनी करार दे देता है। इसी कारण परिवार को ही सन्तान उत्पत्ति का मनोरथ कहा जाता है।

3. रहने की व्यवस्था (Provision of Shelter)-परिवार के द्वारा व्यक्ति की सुरक्षा का प्रबन्ध भी किया जाता है। व्यक्ति के रहने के लिए घर की व्यवस्था की जाती है ताकि रोज़ाना के कार्यों से वापिस आकर वह घर में अपने परिवार सहित रह सके। आजकल के समय में क्लबों, होटलों आदि में चाहे आदमी को रहने के लिए जगह मिल जाती है परन्तु घर उसके लिए स्वर्ग के समान होता है क्योंकि जो आराम उसको घर में रहकर मिलता है वह कहीं और नहीं मिलता।

4. बच्चों का पालन-पोषण (Upbringing of Children) बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी का कार्य भी परिवार का ही होता है। बच्चा पैदा करने का अर्थ यह नहीं कि उसको परिवार की ज़रूरत नहीं बल्कि बच्चे का सही विकास माता-पिता की देख-रेख में ही ठीक हो सकता है। यह ठीक है कि आधुनिक समय में औरतों के रोज़गार में आ जाने से बच्चों की सम्भाल परिवार से बाहर क्रैचों में जाकर होने लगी है, परन्तु फिर भी हम यह देखते हैं कि जो बच्चे माता-पिता की देख-रेख में बड़े होते हैं, उनमें अधिक गुणों का भी विकास हुआ होता है। हैवलॉक (Havelock) के अनुसार अमेरिका में माँ का दूध पीने वाले बच्चों के बीच मृत्यु दर, दूसरा दूध पीने वाले बच्चों से बहुत कम है। इस प्रकार परिवार की सहायता के साथ ही हम बच्चों की परवरिश ठीक ढंग से कर सकते हैं व इससे ही बच्चे का सम्पूर्ण विकास भी हो सकता है।

II. आर्थिक कार्य (Economic Functions)-परिवार को शुरू से आर्थिक कार्यों का केन्द्र माना जाता रहा है क्योंकि अपने सदस्यों की आर्थिक सुरक्षा भी इसी से प्राप्त होती है। परंपरागत समाजों में तो काफ़ी चीजें घर में रहकर ही बनाई जाती थीं। परिवार के आर्थिक कार्य इस प्रकार हैं-

1. जायदाद की सुरक्षा (Protection of Property)—परिवार में व्यक्ति की जायदाद एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाती है। प्राचीन समय में अधिकतर पितृ प्रधान परिवार में जायदाद का विभाजन केवल लड़कों में ही किया जाता था परन्तु आजकल के आधुनिक समय में जायदाद का विभाजन कानून के द्वारा लड़के व लड़की दोनों के बीच किया जाने लगा है। यदि कोई व्यक्ति विवाहित नहीं होता तो उसकी मौत के बाद जायदाद के विभाजन पीछे, रिश्तेदारों के बीच भी लड़ाई शुरू हो जाती है। इस प्रकार जायदाद परिवार के सदस्यों के बीच परिवार के मुखिया की इच्छा के मुताबिक विभाजित कर दी जाती है।

2. पैसे का प्रबन्ध (Provision of Money)-पैसे की ज़रूरत परिवार के सदस्यों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए होती है। इस कारण परिवार के मुखिया द्वारा ही प्राचीन समय में पैसे का प्रबन्ध किया जाता था। आजकल आदमी व औरत दोनों मिलकर मेहनत करके परिवार के सदस्यों की ज़रूरतों को पूरा करते हैं।

III. परिवार के सामाजिक कार्य(Social functions of family)—

1. समाजीकरण (Socialization)-परिवार में व्यक्ति समाज के बीच रहने के तौर-तरीके सीखकर ही एक अच्छा नागरिक बनता है व परिवार के द्वारा ही बच्चे का सामाजिक सम्पर्क भी स्थापित होता है। व्यक्ति का जन्म परिवार में होता है व सबसे पहले वह अपने माता-पिता के सम्पर्क में आता है क्योंकि उसकी प्राथमिक ज़रूरतों की पूर्ति भी इन्हीं से ही होती है। स्थिति व भूमिका की प्राप्ति भी व्यक्ति के परिवार में ही रहकर होती है। प्रदत्त पद की प्राप्ति भी परिवार से ही होती है।

परिवार में रहकर ही बच्चे के व्यक्तित्व का विकास होता है। यह सामाजिक विशेषता उसको परिवार में रहकर ही प्राप्त होती है। सैण्डरसन ने व्यक्ति की पशु प्रवृत्तियों को नियन्त्रण में रखना, अच्छी आदतों का निर्माण करना, ज़िम्मेदारियों को समझना व व्यक्ति में स्वः विश्वास का विकास करना भी परिवार के द्वारा किए जाने वाले कार्यों के रूप में स्वीकार किया गया है। सहयोग, प्यार, कुर्बानी, अनुशासन इत्यादि जैसे गुणों का विकास भी बच्चे में परिवार के बीच रहकर ही होता है। जिस प्रकार की शिक्षा बच्चा परिवार में रहकर प्राप्त करता है, उस प्रकार का असर बच्चे में समाज के लिए भी विकसित हो जाता है। उसको हर तरह से समाज में व्यवहार करने के बारे में पता लग जाता है।

2. सामाजिक संस्कृति को सुरक्षित रखना व आगे पहुंचाना (Protection and transmission of culture)-परिवार हमारी संस्कृति को सम्भालता है व यह संस्कृति ही हमारी सामाजिक विरासत होती है। इसमें निरन्तरता बनी रहती है। प्रत्येक परिवार अपनी यह ज़िम्मेदारी समझता है कि वह नई पीढ़ी को अच्छे संस्कार, आदतें, रीति-रिवाज, परम्पराएं इत्यादि प्रदान करे, बच्चा वह हर चीज़ अचेतन प्रक्रिया में ही सीखता रहता है। क्योंकि वह जो कुछ भी अपने माता-पिता को करता देखता है वही वह आप करने लग जाता है। प्रत्येक परिवार के अपने रीति-रिवाज होते हैं जिन पर वह आधारित होता है। परिवार कुछ चीजें बच्चों को चेतन रूप में भी सिखाता है ताकि बच्चा परिवार के बनाए हुए आदर्शों के मुताबिक चले। इस प्रकार इस निरन्तरता के आधार पर ही परिवार की संस्कृति सुरक्षित भी रहती है व अगली पीढ़ी तक भी पहुंच जाती है।

3. सामाजिक नियन्त्रण (Social Control)-परिवार को सामाजिक नियन्त्रण की एक एजेंसी के रूप में महत्ता प्राप्त है क्योंकि यह पहली एजेंसी होती है जिसमें बच्चे पर नियन्त्रण रखा जाता है ताकि गलत आदतों का निर्माण उसमें न हो सके। उदाहरण के लिए माता-पिता बच्चे के झूठ बोलने पर नियन्त्रण रखते हैं, बड़ों के साथ गलत व्यवहार आदि पर नियन्त्रण करते हैं ताकि बच्चा परिवार के बनाए हुए कुछ नियमों की पालना करे। प्रत्येक सदस्य परिवार के लिए ऐसा काम करना चाहता है जिससे समाज में उसके परिवार का गौरव अधिक बढ़े। परिवार अपने सदस्यों के हर तरह के व्यवहार व क्रियाओं पर नियन्त्रण रखता है। इससे बच्चा आज्ञाकारी व अनुशासन प्रिय बन जाता है। यदि घर का एक बच्चा अपने बड़े भाई बहन या माता-पिता से गलत तरीके से व्यवहार करेगा तो समाज के बाकी सदस्यों के साथ भी वह दुर्व्यवहार करने लग जाता है। जैसे चोरी करना जोकि समाज के कानूनों के द्वारा जुर्म करार दिया जाता है। उसकी आदत भी कई बार परिवार के बड़े सदस्यों को देखकर सीखी जाती है। यदि परिवार के माता-पिता बच्चे के किसी प्रकार की वस्तु चोरी करके घर लाने पर मनाही नहीं करेंगे तो बच्चा बड़ा होकर यही काम करने लगेगा। इसी तरह से परिवार बच्चे पर हर तरह की निगरानी रखकर सामाजिक नियन्त्रण रखता है।

4. स्थिति प्रदान करना (Provide Status)-परिवार में रहकर बच्चे को अपने स्थान व भूमिका का पता · चलता है। प्राचीन समाज में तो बच्चा जैसे भी परिवार में पैदा होता था उसी तरह का आदर उसको प्राप्त होने लग जाता था। जैसे अमीर परिवार, राजा-महाराजा के परिवार, जागीरदार के परिवार आदि में पैदा हुए बच्चे को उतना ही सम्मान समाज में प्राप्त होता था जितना उसके माता-पिता को। उसकी स्थिति वही होती थी। एक गरीब घर में पैदा हुए बच्चे की स्थिति भी निम्न होती थी। चाहे आजकल के समय में बच्चा समाज के बीच अपनी स्थिति परिश्रम से प्राप्त करने लगा है परन्तु फिर भी कुछ सीमा तक बच्चा जिस तरह के परिवार में जन्म लेता है उसको उसी प्रकार कम या अधिक परिश्रम करना पड़ता है।

IV. शिक्षा सम्बन्धी कार्य (Educational Function)-परिवार बच्चे की शिक्षा के लिए प्राथमिक साधन होता है क्योंकि सबसे प्रथम शिक्षा बच्चा परिवार में रहकर ही प्राप्त करता है। अच्छी आदतें सीखना व और अन्य कई गुण आदि परिवार से ही सम्बन्धित होते हैं। प्राचीन समाजों में व्यापार सम्बन्धी शिक्षा, धर्म सम्बन्धी शिक्षा, अच्छा नागरिक बनने सम्बन्धी, बच्चा परिवार में ही प्राप्त करता है। चाहे आज के समाज में बच्चे के शिक्षात्मक कार्य दूसरी संस्थाओं के पास चले गए हैं परन्तु फिर भी कुछ सीमा तक परिवार अभी भी इस शिक्षा सम्बन्धी कार्यों को अदा कर रहा है।

V. राजनीतिक कार्य (Political Function)-राजनीतिक क्षेत्र के लिए परिवार को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं। कनफ्यूशियस के अनुसार मनुष्य सबसे पहला सदस्य परिवार का है व बाद में राज्य का। आदिम (Primitve) समाज में परिवार की महत्ता राजनीतिक पक्ष से अधिक प्रबल होती थी। समाज अलग-अलग कबीलों में बंटा हुआ था। इन कबीलों के ऊपर सबसे बड़ी आयु वाले व्यक्तियों को मुखिया बनाया जाता था। परिवार में भी सबसे बड़ी आयु वाला मुखिया होता था व परिवार के बाकी सदस्य उसके मुताबिक चलते थे। भारतीय संयुक्त परिवार प्रणाली में भी परिवार के मुखिया की ही प्रतिनिधिता होती थी। यह मुखिया परिवार का दादा, पड़दादा आदि हो सकता था। परिवार के सदस्यों को अलग-अलग स्थितियां व रोल दिए जाते थे जिन्हें निभाना परिवार के प्रत्येक सदस्य का फर्ज होता था। परिवार की स्थिरता भी इसी कारण होती थी। आधुनिक समाज में परिवार के असंगठन का कारण ही परिवार के राजनीतिक कार्यों की कमी होती है। परिवार ही व्यक्ति को एक राजनीतिक व्यक्ति बनाने में मदद करता है जिससे व्यक्ति समाज का एक अच्छा नागरिक बन सकता है। यह राजनीतिक संगठन ही एक.ऐसा ताकतवर संगठन होता है जो व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्धों को भी नियमित करता है। सो पारिवारिक संगठन ही हमारे सामाजिक संगठन के लिए उत्तरदायी होता है। इस प्रकार परिवार राजनीतिक कार्य भी अदा करता है।

VI. धार्मिक कार्य (Religious Function)-धार्मिक संस्कारों के बारे जानकारी व्यक्ति को परिवार से ही प्राप्त होती है। जैसे हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार तब तक धार्मिक संस्कार अधूरे होते हैं जब तक पत्नी न हो। परिवार धार्मिक क्रियाओं का केन्द्र होता है। भारतीय समाज में विवाह को ही धार्मिक बन्धन का नाम दिया जाता है। धार्मिक क्रियाओं के द्वारा ही इसको पूरा किया जाता है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के धार्मिक संस्कार परिवार द्वारा अदा किए जाते हैं। व्यक्ति में नैतिकता का विकास भी धर्म के द्वारा होता है। धर्म एक प्रकार से व्यक्ति पर नियन्त्रण भी रखता है। इससे व्यक्ति में अच्छे गुणों का विकास होता है जैसे कुर्बानी अथवा त्याग की भावना, प्यार, सहयोग इत्यादि।

धर्म के आधार पर ही पारिवारिक जीवन भी निर्भर करता है। इस प्रकार धर्म अपने सदस्यों को धार्मिक आदर्शों, नियमों आदि प्रति पहचान करवाता है जिससे व्यक्तियों में एकता इत्यादि की भावना भी कायम रहती है। चाहे आजकल के समाज में लोगों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया है परन्तु फिर भी परिवार धार्मिक रिवाजों को कायम रख रहा है।

VII. मनोरंजन के कार्य (Recreational Function) परिवार अपने सदस्यों के मनोरंजन के लिए भी सहूलतें प्रदान करता है। शुरू के समाज में व्यक्ति रात के समय परिवार में इकट्ठे बैठकर एक-दूसरे से अपनी रोज़ाना की बातचीत करते थे व परिवार के बुजुर्ग सदस्य अपनी बाल कथाएं आदि सुनाकर शेष का मनोरंजन करते थे। उस समय मनोरंजन के दूसरे साधन विकसित नहीं थे। इसके अतिरिक्त त्योहारों के समय भी परिवार के सदस्य इकट्ठे मिल कर नाचते, गाना गाते थे जिनसे सबका मनोरंजन होता था।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

प्रश्न 7.
गोत्र के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
गोत्र को वंश समूह का विस्तृत रूप कह सकते हैं। जब कोई वंश समूह विकास के कारण बढ़ जाता है तो वह गोत्र का रूप धारण कर लेता है। यह माता या पिता के अनुरेखित रक्त सम्बन्धियों को मिलाकर बनता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि गोत्र रक्त के रिश्तेदारों का समूह होता है और वह सभी किसी साझे पूर्वज के एक रेखकी सन्तान होते हैं। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि यह साझे पूर्वज काल्पनिक होते हैं क्योंकि उनके बारे में किसी को पता नहीं होता है।

गोत्र किसी ऐसे व्यक्ति या पूर्वज से शुरू होता है जिसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता। क्योंकि यह माना जाता है कि उसने ही परिवार को या उस गोत्र को शुरू किया था इसलिए उसको संस्थापक मान लिया जाता है। उस गोत्र का नाम भी उसके पूर्वज के नाम के साथ रख लिया जाता है। गोत्र हमेशा एक तरफ को चलती है मतलब किसी बच्चे के माता-पिता के गोत्र एक नहीं हो सकते वह हमेशा अलग-अलग होंगे। यह एक पक्ष का ही होता है। इसका यह अर्थ है कि माता की गोत्र अलग परिवारों का इकट्ठ है और पिता की गोत्र भिन्न परिवारों का इकट्ठ है। इस तरह यह गोत्र बाहर व्यक्ति का समूह होता है। एक ही गोत्र में विवाह नहीं हो सकता।

परिभाषाएं (Definitions) –

(1) मजूमदार (Majumdar) के अनुसार, “एक क्लैन या सिब अक्सर कुछ वंश समूहों का जुट होता है जोकि आपसी उत्पत्ति एक कल्पित पूर्वज से मानते हैं जोकि मनुष्य या मनुष्य की तरह, पशु, वृक्ष, पौधा या निर्जीव वस्तु हो सकता है।”
(“A clan or sib is often the combination of a few lineages and descent into may be ultimately traced to a mythical ancestor, who may be human, human like, animal, plant or even in animate.”)

(2) पिंडिगटन (Pidington) के अनुसार, “एक गोत्र जिसको कभी-कभी कुल (Sib) भी कहते हैं, एक बाहर विवाही सामाजिक समूह है जिसके सदस्य अपने आपको एक-दूसरे के साथ सम्बन्धित समझते हैं, जो आमतौर पर अपनी उत्पत्ति एक काल्पनिक वंशानुक्रम द्वारा किसी बड़े-बूढ़ों से मानते हैं।”
(“A clan some times called sib is an exogamous social group whose members regard themselves as being related to each other usually by functional descent from a common ancestor.”)

(3) रिवर्ज़ (Rivers) के अनुसार, “गोत्र में कबीले का एक बाहर विवाहित विभाजन है जिसके सदस्य अपने ही कुछ बन्धनों द्वारा एक-दूसरे के साथ सम्बन्धित रहते हैं। इस बन्धन का आकार एक साझे पूर्वज की सन्तान या वंश होने में विश्वास एक साझा टोटम या एक साझे भू-भाग में निवास हो सकता है।”(“Clan is an exogamous division of tribe the members of which are held to be related to one another by same common lies, it may be descent from a common ancestor, possession of a common totom or hibitationed of a common territory.”) .

इन परिभाषाओं को देखकर हम कह सकते हैं कि गोत्र एक काफ़ी बड़ा रक्त समूह होता है जोकि एक वंश के सिद्धान्त पर आधारित होता है। गोत्र अपने आप में एक पूरा सामाजिक संगठन है जोकि एक समाज की अलगअलग गोत्रों को एक खास रूप अर्थात् और काम प्रदान करती है। गोत्र या तो मातृ वंशी होती है या फिर पितृ वंशी, मतलब कि बच्चे या तो पिता की गोत्र के सदस्य होते हैं या फिर माता की गोत्र के सदस्य । एक गोत्र बाहरी समूह होता है अर्थात् विवाह गोत्र से बाहर होना चाहिए है। इसलिए माता-पिता के गोत्र अलग-अलग होने चाहिए।

गोत्र की विशेषताएं (Characteristics of Clan) –

1. गोत्र की सदस्यता वंश पर आधारित होती है (Membership of Clan depends upon Lineage)गोत्र की सदस्यता वंश परम्परा पर आधारित होती है। यह चाहे पितृ वंशी या मातृ वंशी हो सकता है जोकि उस समाज पर निर्भर करता है। व्यक्ति की गोत्र उसके हाथ में नहीं होती। यह उसकी इच्छा पर भी आधारित नहीं होती। यह तो जन्म पर आधारित होता है। व्यक्ति जिस गोत्र में जन्म लेता है उसका सदस्य बन जाता है। व्यक्ति जिस गोत्र में जन्म लेता है, उसमें ही बड़ा होता है और उसमें ही मर जाता है।

2. हर गोत्र का नाम होता है (Each clan has a name)-हर गोत्र का एक खास नाम होता है। चाहे यह नाम, पशु, वृक्ष, किसी प्राकृतिक वस्तु आदि से भी लिया जा सकता है। यह चार प्रकार के होते हैं-भू-भागी नाम, टोटम वाले नाम, उपनाम, ऋषि नाम।

3. एक पक्ष (Unilateral)–गोत्र हमेशा एक पक्ष का होता है। यह कभी भी दो पक्ष की नहीं हो सकती। इसका मतलब यह हुआ कि गोत्र या पितृ वंशी समूह होगा या मातृ वंशी समूह। पितृ वंशी समूह से मतलब है कि वह बच्चा पिता के वंश का सदस्य होगा और मातृ वंशी से मतलब है कि वह माता के वंश का सदस्य होगा। इस तरह सिर्फ एक पक्ष होगा दोनों तरफ से नहीं।

4. गोत्र के सदस्य एक स्थान पर नहीं रहते (Member of a clan do not live at one place)-गोत्र के सदस्यों में खून का सम्बन्ध होता है पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह एक ही स्थान पर रहते हों। इनका निवास स्थान साझा नहीं होता।

5. साझा पूर्वज (Common Ancestor)—गोत्र का एक साझा पूर्वज होता है चाहे उस पूर्वज के बारे में किसी को पता नहीं होता। यह साझा पूर्वज हमेशा कल्पना पर आधारित होता है। चाहे वह पूर्वज असल में भी हो सकते हैं पर यह आमतौर पर कल्पित भी हो सकता है।

6. बर्हिविवाही समूह (Exogamous group)-गोत्र एक बर्हिविवाही समूह है। इसका मतलब है कि कोई भी एक ही गोत्र में विवाह नहीं करवा सकता। यह वर्जित होता है। यह इस वज़ह के कारण होता है क्योंकि गोत्र के सारे सदस्य एक साझे असली या कल्पित पूर्वज की पैदावार होते हैं और उन सभी में खून के सम्बन्ध होते हैं। इस वज़ह के कारण उस रिश्ते में बहन-भाई हुए और इनमें वर्जित है। विवाह अपनी गोत्र से बाहर ही करवाया जा सकता है

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 7 विवाह, परिवार तथा नातेदारी

विवाह, परिवार तथा नातेदारी PSEB 11th Class Sociology Notes

  • प्रत्येक समाज ने अपने सदस्यों की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए कुछ संस्थाओं का निर्माण किया होता है। संस्था सामाजिक व्यवस्था का एक ढांचा है जो एक समुदाय के सदस्यों के व्यवहार को निर्देशित करती है। यह विशेष प्रकार की आवश्यकता को पूर्ण करती है जो समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
  • संस्थाओं की कुछ विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह विशेष आवश्यकताएं पूर्ण करती हैं, यह नियमों का एक गुच्छा हैं, यह अमूर्त व सर्वव्यापक होती हैं, यह स्थायी होती हैं जिनमें आसानी से परिवर्तन नहीं आते, इनमें प्रकृति सामाजिक होती है इत्यादि।
  • विवाह एक ऐसी सामाजिक संस्था है जो प्रत्येक समाज में पाई जाती है। यह समाज की एक मौलिक संस्था . है। विवाह से दो विरोधी लिंगों के व्यक्तियों को पति-पत्नी के रूप में इकट्ठे रहने की आज्ञा मिल जाती है। वह लैंगिक संबंध स्थापित करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं तथा समाज के आगे बढ़ने में योगदान देते हैं।
  • वैसे तो समाज में विवाह के कई प्रकार मिलते हैं परन्तु एक विवाह तथा बहु विवाह ही प्रमुख हैं। बहुविवाह आगे दो भागों में विभाजित हैं-बहुपति विवाह तथा बहुपत्नी विवाह । बहुपति विवाह कई जनजातीय समाजों में प्रचलित है तथा बहुपत्नी विवाह पहले हमारे समाजों में प्रचलित था।
  • हमारे समाज में जीवन साथी के चुनाव के कई तरीके प्रचलित हैं जिनमें से अन्तर्विवाह (Endogamy) तथा बहिर्विवाह (Exogamy) प्रमुख हैं। अन्तर्विवाह में व्यक्ति को एक निश्चित समूह के अंदर ही विवाह करना पड़ता है तथा बहिर्विवाह में व्यक्ति को एक निश्चित समूह से बाहर विवाह करवाना पड़ता है।
  • विवाह की संस्था में पिछले कुछ समय में कई प्रकार के परिवर्तन आए हैं। इन परिवर्तनों के कई मुख्य कारण हैं जैसे कि औद्योगीकरण, नगरीकरण, आधुनिक शिक्षा, नए कानूनों का बनना, स्त्रियों की स्वतन्त्रता, पश्चिमी समाजों का प्रभाव इत्यादि।
  • परिवार एक ऐसी सर्वव्यापक संस्था है जो प्रत्येक समाज में किसी न किसी रूप में मौजद है। व्यक्ति केजीवन में परिवार नामक संस्था का काफ़ी अधिक प्रभाव है तथा इसके बिना व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता।
  • परिवार के कई विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह सर्वव्यापक संस्था है, इसका भावात्मक आधार होता है, इसका आकार छोटा होता है यह स्थायी तथा अस्थायी दोनों प्रकार का होता है, यह व्यक्ति के व्यवहार को नियन्त्रित करता है इत्यादि।
  • परिवार के कई प्रकार होते हैं तथा इनके रहने के स्थान, सत्ता, सदस्यों इत्यादि के आधार पर कई भागों में विभाजित किया जा सकता है।
  • पिछले कुछ समय में परिवार नामक संस्था में कई प्रकार के परिवर्तन आए हैं जैसे कि आकार का छोटा होना, परिवारों का टूटना, स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन, नातेदारी के संबंधों का कमज़ोर होना, कार्यों में परिवर्तन इत्यादि।
  • नातेदारी व्यक्ति के रिश्तों की व्यवस्था है। इसमें कई प्रकार के रिश्ते आते हैं। नातेदारी को दो आधारों पर विभाजित किया जा सकता है। वह दो आधार हैं-रक्त संबंध तथा विवाह।
  • नज़दीकी तथा दूरी के आधार पर तीन प्रकार के रिश्तेदार पाए जाते हैं-प्राथमिक, द्वितीय तथा तृतीय प्रकार के रिश्तेदार। प्राथमिक रिश्तेदार माता-पिता, बहन-भाई होते हैं। द्वितीय रिश्तेदार हमारे प्राथमिक रिश्तेदारों के प्राथमिक रिश्तेदार होते हैं जैसे पिता का पिता-दादा। तृतीय प्रकार के रिश्तेदार द्वितीय रिश्तेदारों के प्राथमिक रिश्तेदार होते हैं जैसे-चाचा का पुत्र-चचेरा भाई।
  • पितृसत्तात्मक (Patriarchal)-वह परिवार जहाँ पिता की सत्ता चलती हो तथा उसका ही नियन्त्रण हो।
  • मातृसत्तात्मक (Matriarchal)—वह परिवार जहाँ माता की सत्ता चलती हो तथा उसका ही नियन्त्रण हो।
  • एकाकी परिवार (Nuclear Family)—वह परिवार जहाँ पति, पत्नी व उनके बिन ब्याहे बच्चे रहते हों।
  • संयुक्त परिवार (Joint Family)-वह परिवार जिसमें दो या अधिक पीढ़ियों के सदस्य इकट्ठे रहते हों तथा एक ही रसोई में से खाना खाते हों।
  • अन्तर्विवाह (Endogamy)-एक निश्चित समूह, जैसे कि जाति में ही विवाह करवाना।
  • बहिर्विवाह (Exogamy)-एक निश्चित समूह, जैसे कि गोत्र या परिवार से बाहर विवाह करवाना।
  • एक विवाह (Monogamy)-जब एक स्त्री का एक पुरुष से विवाह हो उसे एक विवाह कहते हैं।
  • बहु विवाह (Polygamy)-जब एक पुरुष या स्त्री दो या अधिक विवाह करवाएं तो उसे बहुविवाह कहते है।
  • विवाह मूलक नातेदारी (Affinal Kinship)—वह रिश्तेदारी जो व्यक्ति के विवाह के पश्चात् बनती है जैसे कि जमाई, जीजा, इत्यादि।
  • रक्त मूलक नातेदारी (Consanguineous Kinship)—वह नातेदारी जो व्यक्ति के जन्म के पश्चात् ही बन जाती है जैसे-पुत्र, पुत्री, माता, पिता, भाई, बहन इत्यादि।
  • नातेदारी (Kinship)-सामाजिक संबंध जो वास्तविक या काल्पनिक आधारों पर रक्त या विवाह के अनुसार बनते हों।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 8 चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र

Punjab State Board PSEB 12th Class Geography Book Solutions Chapter 8 चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Geography Chapter 8 चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र

PSEB 12th Class Geography Guide चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र Textbook Questions and Answers

प्रश्न I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में दें:

प्रश्न 1.
पर्यावरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
मनुष्य तथा जीव-जन्तुओं के आस-पास जो एक घेरा बना है जिसमें वह लगातार सहजीवी रिश्ते में रह रहा है, पर्यावरण कहलाता है।

प्रश्न 2.
प्रदूषण की परिभाषा दो।
उत्तर-
जब भौतिक पर्यावरण में कुछ जहरीले पदार्थ तथा रसायन अधिक मात्रा में जमा हो जाते हैं जो पानी, वायु तथा मिट्टी को जीवन भर के लिए अयोग्य बना देते हैं, प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 3.
भू-प्रदूषण से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
मिट्टी में हानिकारक पदार्थों के जमा होने के साथ मिट्टी की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक संरचना बुरी तरह तहस-नहस हो जाती है जिसके साथ मिट्टी की उपजाऊ शक्ति खत्म हो जाती है, इसको भू-प्रदूषण कहते हैं।

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प्रश्न 4.
यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
यूट्रोफिकेशन कुपोषण प्रक्रिया तब घटती है जब अधिक मात्रा में रासायनिक खादों के रूप में प्रयोग किए जाने वाले नाइट्रेट फास्फेट जल के स्रोतों में मिल कर ऐलगी को खाने वाले बैक्टीरिया की मात्रा बढ़ा देते हैं जिसके साथ पानी में घुलने वाली आक्सीजन कम हो जाती है तथा पानी के जीव-जन्तु मर जाते हैं।

प्रश्न 5.
जल-प्रदूषण के कोई दो बिन्दु स्रोतों (Point Sources) के नाम बताओ।
उत्तर-
जल प्रदूषण के बिन्दु स्रोत हैं-शहरी सीवरेज़, कारखानों से निकली पाइपें इत्यादि।

प्रश्न 6.
जल दिवस (Water Day) कब मनाया जाता है ?
उत्तर-
जल दिवस हर साल 22 मार्च को मनाया जाता है।

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प्रश्न 7.
‘नमामि गंगा’ मिशन क्या है ?
उत्तर-
भारत सरकार ने गंगा नदी को साफ रखने के लिए तथा इसको बचाने के लिए नमामि गंगा मिशन की शुरुआत की है।

प्रश्न 8.
हवा-प्रदूषण क्या है ?
उत्तर-
जब हवा में जहरीले तथा अनचाहे पदार्थ मिल कर वायु को दूषित कर देते हैं तथा यह वायु मनुष्य के स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर बुरा प्रभाव डालती है, तो उसे वायु प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 9.
वायु प्रदूषण के कोई दो प्राकृतिक स्रोत बताओ। किस आकार के धूल के कण सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं ?
(i) PM5 किलोमीटर
(ii) PM10 माइक्रोमीटर
(iii) PM 2.5 माइक्रोमीटर
(iv) PM 3 किलोमीटर।
उत्तर-
(ii) PM 2.5 माइक्रोमीटर।

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प्रश्न 10.
धरती दिवस मनाया जाता है ?
(i) 5 जून
(ii) 23 मार्च
(ii) 22 अप्रैल
(iv) 17 सितंबर।
उत्तर-
(ii) 22 अप्रैल।

प्रश्न 11.
सिआचिन का शब्द अर्थ क्या है ?
उत्तर-
सिआ (Sia) + चिन (Chen) का भाव है-बड़ी संख्या में गुलाब के फूल।

प्रश्न 12.
LOAC से क्या भाव है ?
उत्तर-
LOAC का अर्थ है-लाइन ऑफ ऐक्चुअल कंट्रोल। यह सिआचिन ग्लेशियर के क्षेत्र में एक विवादग्रस्त सीमा रेखा है।

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प्रश्न 13.
सिंध जल सन्धि में पूर्वी नहरें कौन-सी मानी गई हैं ?
उत्तर-
सिंध जल सन्धि में पूर्वी नहरें सतलुज, ब्यास तथा रावी मानी गई हैं।

प्रश्न 14.
पाक खाड़ी में 14वीं सदी दौरान कौन-से टापू प्रकट हुए ?
उत्तर-
पाक खाड़ी में 14वीं सदी दौरान कच्चातिवु तथा रामेश्वरम् के टापू प्रकट हुए।

प्रश्न 15.
पहाड़ी इलाकों में मिलते ‘LA’ का क्या हैं ?
उत्तर-
उत्तरी भारतीय भाषा में ‘LA’ तथा दर्रा दोनों शब्दों को पहाड़ी नदियों को समझने के लिए एक-दूसरे की जगह पर प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 16.
भारत में हाथ से काम करने के योग्य लोगों की संख्या कितनी है ?
उत्तर-
भारत में हाथ से काम करने वाले लोगों की संख्या 48 करोड़ 60 लाख के लगभग है।

प्रश्न 17.
संसद् में स्त्रियों के प्रतिनिधित्व के लिए संसार में कौन-सा देश सबसे आगे है ?
उत्तर-
संसद् में स्त्रियों के प्रतिनिधित्व के लिए संसार में रवान्डा, देश है, जहां संसद् में स्त्रियों का प्रतिनिधित्व 64 प्रतिशत है।

प्रश्न 18.
राष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण का कौन-सा मुद्दा सबसे जरूरी भौगोलिक अध्ययन मांगता है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषणों के मामले सबसे ज़रूरी भौगोलिक अध्ययन मांगते हैं।

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प्रश्न 19.
भारत में कुल कितना पशुधन है ?
उत्तर-
भारत में कुल 19.1 प्रतिशत पशुधन है।

प्रश्न 20.
कौन-से रसदार फलों के उत्पादन के लिए पंजाब देश में आगे है ?
उत्तर-
किन्नू तथा अंगूर जैसे फलों के उत्पादन के लिए पंजाब देश में आगे है।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चार पंक्तियों में दें:

प्रश्न 1.
भूमि प्रदूषण के क्या कारण हैं ? इसका कृषि पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
भूमि प्रदूषण के मुख्य कारण हैं-

  1. कृषि के उत्पादन के लिए प्रयोग किए जाने वाले नदीननाशक, जहरीली दवाइयां इत्यादि के छिड़काव के कारण भूमि प्रदूषित होती है।
  2. बड़ी मात्रा में लगे कूड़े इत्यादि के ढेर भी भूमि को दूषित करते हैं।
  3. जंगलों के अंतर्गत कम क्षेत्र भी भूमि को दूषित करते हैं।
  4. शहरीकरण होने के कारण भी प्रदूषण में वृद्धि हो रही है।

कृषि पर प्रभाव-भूमि प्रदूषण के कारण कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव हैं-

  1. इस कारण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
  2. मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरता कम होती है; जिस कारण मिट्टी अधिक खुरती है। मिट्टी में मौजूद ज़रूरी उपजाऊ तत्त्व खत्म हो जाते हैं। मिट्टी में खारापन आ जाता है।

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प्रश्न 2.
चार R क्या है ?
उत्तर-
प्राकृतिक स्रोतों के योग्य प्रयोग के लिये निम्नलिखित चार ‘R’ के बारे में ज्ञान आवश्यक है।

  • मना करना (Refuse) हमें अपने घरों में फालतू सामान नहीं रखना चाहिए सिर्फ ज़रूरत अनुसार सामान ही घरों में रखना चाहिए। पॉलीथीन में लिपटा सामान तथा पॉलीथीन के लिफाफे लेने से इन्कार कर देना चाहिए।
  • दोबारा उपयोग (Reuse) जो सामान दोबारा प्रयोग में लाया जा सकता है उसको दोबारा प्रयोग करना चाहिए जैसे कि लकड़ी, स्टील, कांच इत्यादि के सामान को दोबारा प्रयोग किया जा सकता है।
  • दोबारा प्रयोग योग्य बनाना (Recycle)—घर का न प्रयोग होने वाला सामान इकट्ठा करके कबाड़ी तक पहुँचा देना चाहिए, ताकि उसको पिघला कर दोबारा प्रयोग योग्य बनाया जा सके। बाज़ार जाते समय वस्त्र या पटसन का थैला लेकर जाओ। पॉलिथीन के लिफाफे में डालने से खाने-पीने का सामान, फल इत्यादि जहरीले हो सकते हैं।
  • कम करना (Reduce)-हमें प्लास्टिक तथा फालतू सामान के प्रयोग को कम करके अपनी ज़रूरतों को
    सीमित करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 3.
जल प्रदूषण क्या होता है ? अलग-अलग प्रकार के जल प्रदूषकों के नाम बताओ।
उत्तर-
जल में भौतिक या रासायनिक परिवर्तन के कारण जब जल दूषित हो जाता है, उसे जल प्रदूषण कहते हैं।
जल प्रदूषणों के नाम- अलग-अलग जल प्रदूषणों के नाम निम्नलिखित हैं-

  1. रासायनिक खादों के रूप में उपयोग किए जाने वाले नाइट्रेट व फास्फेट।
  2. सीवरेज़।
  3. कारखानों की पाइप के द्वारा निकाला पदार्थ।
  4. कई तरह के तेज़ाब, ज़हरीले पदार्थ जैसे पोलीक्लोरीनेटड थाई फिनाइल, डी०डी०टी० इत्यादि तथा ज़हरीले नमक, धातु इत्यादि भी पानी दूषित करते हैं।

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प्रश्न 4.
जल प्रदूषण रोकने के कोई चार तरीके बताओ।
उत्तर-
जल प्रदूषण को रोकने के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं-

  • ताप बिजली घरों के गर्म पानी को नहरों में फेंकने से पहले पानी ठंडा कर लेना चाहिए।
  • घरों का सीवरेज कई बार पेयजल के स्रोतों में फेंका जाता है, इस पर पूरी तरह रोक लगानी चाहिए।
  • नदी के साथ-साथ उगे हुए पेड़-पौधों को राइपेरियन बफर कहा जाता है। इसके साथ नदी के पानी की रक्षा ‘होती है। इसलिए सरकार को इस राइपेरियन बफर को बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए।
  • जल प्रदूषण की समस्या विकासशील देशों में काफी खतरनाक रूप धारण कर चुकी है। भारत के तकरीबन सारे राज्यों में सन् 1974 में बने कानून जल प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पोल्यूशन एक्ट लागू हो गया है। इस कानून के अनुसार सभी नगर पालिकाओं तथा उद्योग प्रयोग किए गए पानी को नदियोंमें फेंकने से पहले साफ करेंगे तथा ज़हरीले पदार्थों को बाहर निकालेंगे और फिर पानी नदी में छोड़ा जाएगा।

प्रश्न 5.
वायु प्रदूषण करने वाले कोई चार कारकों के नाम बताओ। मानवीय स्वास्थ्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
ज़हरीले तथा अनचाहे पदार्थों द्वारा वायु को दूषित कर देने को, वायु प्रदूषण कहते हैं। मुख्य वायु प्रदूषण करने वाले कारक हैं :

  • ज्वालामुखी विस्फोट कारण निकली गैसें इत्यादि।
  • कार्बन तथा ऑक्साइड।
  • नाइट्रोजन तथा ऑक्साइड।
  • हवा में धूल कण।
  • धुआं, ओज़ोन, सल्फ्यूरिक अम्ल इत्यादि।

मानवीय स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण का प्रभाव-PM10 मोटे कण 10 माइक्रोमीटर तक ये कण फेफड़ों तक जाकर मनुष्य की मौत का कारण बन सकते हैं। वायु प्रदूषण के कारण 10 लाख लोग भारत में हर साल मर जाते हैं।

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प्रश्न 6.
भारत की दरपेश कोई चार मुश्किलों के नाम बताओ जो भौगोलिक अध्ययन मांगती हैं ?
उत्तर-
भारत की दरपेश मुश्किलें जो भौगोलिक अध्ययन मांगती हैं इस प्रकार हैं-
प्रदूषण की समस्या, विश्व में रहते लोगों, समाज तथा देश में एक पक्ष सामान है, वह है-जीवन का आधार । पृथ्वी तथा पृथ्वी से जुड़े प्राकृतिक स्रोत का यह पक्ष भौगोलिक दृष्टिकोण को अध्ययन में लेकर आता है। विकासशील देशों में विकास का अर्थ लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना तथा हर मनुष्य को सुरक्षा प्रदान करना है। भारत की दरपेश कुछ मुद्दों का अध्ययन करने की मांग है-

  • सिआचिन ग्लेशियर का मुद्दा- यह ग्लेशियर सिंध तथा नुबरा नदियों को जल प्रदान करता है तथा पाकिस्तानी हमलावरों को दक्षिण की तफ बढ़ने से रोकता है। इस क्षेत्र की सीमाबंदी की जानी अभी बाकी है। बल्कि तार इत्यादि लगाकर सीमा को स्पष्ट करना चाहिए तथा सीमा सम्बन्धी मामलों के बारे में राष्ट्रीय स्तर पर बातचीत करके मामला निपटा लेना चाहिए।
  • सरकरीक का मुद्दा-यह एक दलदली खाड़ी है। देश के विभाजन समय कच्छ का इलाका बोबे प्रैजीडैन्सी के अधीन था और पाकिस्तान का दावा है कि कच्छ के तत्कालीन बादशाह तथा सिंध की सरकार के बीच 1914 में हुए समझौते के अनुसार यह क्षेत्र पाकिस्तान का होना चाहिए। यह सीमा क्षेत्र दोनों देशों के मध्य एक मुद्दा है।
  • कच्चातिवु-कच्चातिवु श्रीलंका में पड़ता एक विवाद ग्रस्त टापू है।
  • सिंध जल संधि का मुद्दा।

प्रश्न 7.
आर्थिक पक्ष से हम विश्व के देशों का विभाजन कैसे कर सकते हैं ?
उत्तर-
आर्थिक पक्ष से हम विश्व के देशों का विभाजन इस प्रकार कर सकते हैं-आर्थिक पक्ष से हम विश्व को तीन भागों में बाँट सकते हैं-विकसित, विकासशील तथा अल्पविकसित देश। जब लोग गरीब देशों की बात करते हैं उनमें खास कर तीसरी श्रेणी में शामिल किया जाता है। जो देश अभी विकास कर रहे हैं उनको विकासशील देश कहते हैं तथा जिन देशों में काफी हद तक विकास हो चुका है, उन्हें विकसित देश कहते हैं। तीसरे हिस्से के देशों में पेनांग, जेनेवा, ताईवान इत्यादि। विकासशील देशों में भारत, चीन, इण्डोनेशिया इत्यादि विकसित देशों में यू०एस०ए० जापान, इटली, फ्रांस, जर्मनी इत्यादि को शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 8.
सिंध जल संधि के मुताबिक पश्चिमी नदियों का जल कौन से कारणों के लिए भारत उपयोग कर सकता है ?
उत्तर-
सिंध जल संधि जो सन् 1960 में हुई। इस संधि के अनुसार पश्चिमी नदियों के जल का प्रयोग करने के लिए भारत को पूरी तरह से आजादी है। वह इन नदियों पर 3.6 MAF मात्रा तक भंडारण कर सकता है पर भंडारण में 0.5 MAF पानी हर साल छोड़ कर एकत्र करना होगा। पश्चिमी नदियों (चिनाब, जेहलम तथा सिंध) का पानी पाकिस्तान बिना किसी रुकावट के प्रयोग कर सकता है तथा भारत की ज़िम्मेदारी है कि इन नदियों का सारा जल जाने दिया जाए, सिर्फ चार स्थितियों के बिना-

  1. घरेलू उपयोग के लिए
  2. किसी ऐसे उपयोग के लिए प्रयोग किए पानी को खत्म न करे।
  3. कृषि के लिए।
  4. पन बिजली उत्पादन के लिए।

प्रश्न 9.
भौगोलिक सिरमौरता पक्ष से अध्ययन की कोई चार शाखाओं के नाम लिखो।
उत्तर-
भौगोलिक सिरमौरता प्राकृतिक तथा मानवीय प्रक्रियाओं के स्थानीय विभाजन की प्रसन्नता जिसका उद्देश्य प्राप्तियों का एहसास, स्थानीय विभाजन करवाना होता है। इसकी मुख्य शाखाएं हैं-

  • भू-आकृति वैज्ञानिक पक्ष-इसमें जलवायु वैज्ञानिक सिरमौरता, महासागरीय देन तथा अलग पेड़-पौधे तथा जीव जन्तु इत्यादि आते हैं।
  • मानवीय साधनों की उत्तमता-इसमें कृषि क्षेत्र की उपज, बुनियादी ढांचे की सुंदरता, औद्योगिक प्राप्तियां शामिल हैं।
  • सांस्कृतिक विशेषताएं- इसके अंतर्गत राष्ट्रीय चिन्ह, कबाइली दौलत तथा धार्मिक सहवास शामिल हैं।
  • जन-आंकड़े-इसके अधीन ऐतिहासिक स्थान, यूनेस्को से संबंधित दौलत तथा सैलानी रुचि के स्थानों की शान शामिल हैं।

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प्रश्न 10.
समुद्र तल से ऊँचा जाने के साथ क्या बिमारी होती है तथा इससे कैसे बचा जा सकता है ?
उत्तर-
समुद्र तल से ऊंचा जाने पर माऊंटेस सिकनैस नामक बिमारी हो जाती है तथा इस बिमारी से बचने के लिए ऐसे क्षेत्र में रहना चाहिए जहाँ पहले 2-3 दिन कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्र में प्रवास के लिए अपने आप को ढालना बहुत ज़रूरी है।

प्रश्न III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 10-12 पंक्तियों में दें :

प्रश्न 1.
वायु प्रदूषण रोकने पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
वायु प्रदूषण की रोकथाम निम्नलिखित प्रकार से की जा सकती है-ताप या उत्प्रेरक का असर कम करने के लिए आवश्यक है कि प्रदूषित कणों को रोका जाए। भारत में ब्यूरो ऑफ इण्डियन स्टेंडर्स ने वायु की गुणवत्ता का सूचकांक बनाया है जो कि 0 से 500 के करीब है। अगर सूचकांक बढ़ता है तो इसका अर्थ है, हवा के प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। वायु के प्रदूषण को कम करने के लिए अपारंपरिक स्रोतों का प्रयोग, जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि को बढ़ाना आवश्यक है। पेड़ों को काटने पर रोक लगानी चाहिए तथा अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए। फालतू सड़कों के बैरियर तथा चैक पोस्टों इत्यादि को कम करना चाहिए, ताकि प्रदूषण की समस्या को कम किया जा सके तथा तेल को बचाया जा सके। वायु की निगरानी के लिए उपकरण, वायु साफ करने वाले फिल्टर, रेडियो मीटर इत्यादि को महत्त्वपूर्ण स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 2.
लासैंट अध्ययन के मुताबिक कितने भारतीय वायु प्रदूषण से पीड़ित हैं ? इसका क्या असर हो रहा
उत्तर-
मैडिकल मैगजीन द लासैंट के अध्ययन के मुताबिक भारत में जहरीली हवा या प्रदूषित वायु में लोग सांस ले रहे हैं। जिस कारण भारत में औसतन दो मौतें हर रोज़ हो रही हैं। ये मौतें इस जहरीली वायु के कारण ही हो रही हैं। दुनिया के प्रदूषित शहरों में कुछ शहर भारत में ही हैं। 2010 में किए एक अध्ययन के अनुसार विश्व में 2.7 से 3.4 करोड़ बच्चे वायु प्रदूषण के कारण निश्चित समय से पहले पैदा होते हैं तथा एशिया में यह दर 1.6 तक है।

प्रश्न 3.
भारत के भू-जल में आर्सेनिक की समस्या के बारे में एक नोट लिखो।।
उत्तर-
आर्सेनिक पूरे संसार में पृथ्वी के नीचे वाले पानी की बहुत गंभीर समस्या बनती जा रही है। खास कर ट्यूबवैल अधिक मात्रा वाले गंगा डेल्टा में, पश्चिमी बंगाल के क्षेत्र में बहुत सारे लोग इसका शिकार हो गए हैं। 2007 के साल में किए एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया के 70 देशों में 1 करोड़ 37 लाख लोग आर्सेनिक जहर के शिकार हो चुके हैं। भारत की भूमि के नीचे वाला पानी में जो कि पीने योग्य पानी है कारखानों, नगरपालिका में से निकले दृषित जल के कारण दूषित हो गया है। मानवीय स्वास्थ्य के लिए खासकर नवजात बच्चों के लिए बहुत खतरनाक है। पृथ्वी के नीचे पीने योग्य पानी में क्लोराइड की मात्रा बढ़ने के कारण मांसपेशीय तथा दिमागी रोग हो रहे हैं, इसके अतिरिक्त आंतड़ियों के रोग, दांतों के रोग भी मानवीय स्वास्थ्य को खराब कर रहे हैं। इसी प्रकार आर्सेनिक दिमाग की बिमारियों, फेफड़ों की बिमारियों तथा चमड़ी के कैंसर की बिमारियों का मुख्य कारण बनती जा रही है। साल 2030 तक संसार में पानी की मांग अब के समय से 50% बढ़ने का एक अनुमान है। कहते हैं कि यह मांग शहरी क्षेत्र में अधिक बढ़ने का अनुमान है।

प्रश्न 4.
ऑपरेशन मेघदूत क्या था ? जान-पहचान करवाओ।
उत्तर-
युद्ध के समय सिआचिन (सैंची) ग्लेशियर का महत्त्व काफी है जिस पर पाकिस्तान अपना अधिकार जमाने की लगातार कोशिश कर रहा है। अप्रैल 1984 से भारतीय सेना को समुद्र तल से 6400 मीटर की ऊँचाई पर NH9842 पर इंदिरा कोल के मध्य आगे वाली चौकी पर तैनात रहने की इस सैनिक कार्रवाई को मेघदूत के नाम से जाना जाता है। सिआचिन (सैंची) ग्लेशियर पर कब्जे का मुद्दा सियासी तथा राजनीतिक दोनों स्तरों पर हल की मांग करता है जिस कारण पिछले कुछ सालों से यह क्षेत्र सैनिक कार्रवाई का एक आधार ही बन गया है। भारत ने सिआचिन ग्लेशियर पर अपने अस्तित्व का आरम्भिक ढांचा तैयार कर ही लिया है तथा यह दावा भी भारत कर रहा है कि दोनों चीन तथा पाकिस्तान के पक्ष से भारत अच्छी हालात में है। भारतीय सेना क्षेत्र की सुरक्षा कर रही है।

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प्रश्न 5.
सर करीक क्षेत्र का प्राकृतिक साधनों के पक्ष से क्या महत्त्व है ? लिखो।
उत्तर-
सर करीक एक दलदली खाड़ी है जो कि भारत के गुजरात तथा पाकिस्तान के सिंध के प्रदेशों के मध्य का एक प्रांत है। लगभग 96 किलोमीटर लम्बी इस सागरीय सीमा दोनों देशों के मध्य एक मुद्दा है। इस क्षेत्र को बाण गंगा भी कहते हैं। सर करीक क्षेत्र के प्राकृतिक साधनों के कारण इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

  • खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की अधिकता के कारण इस स्थान का आर्थिक महत्त्व काफ़ी बढ़ जाता है।
  • इसके तटीय क्षेत्र में भूमि पर तथा सागरीयं तल पर प्राकृतिक गैस के काफ़ी भंडार हैं।
  • यहाँ हाइड्रोकार्बन के अस्तित्व की भी काफ़ी संभावनाएं हैं।
  • मछुआरों की गतिविधियां काफी हैं।

प्रश्न 6.
सिंध जल संधि जम्मू तथा कश्मीर के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुई है। कैसे ?
उत्तर-
सिंध जल संधि जम्मू तथा कश्मीर के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुई है क्योंकि इस संधि में इलाके के लोगों की ज़रूरतों तथा इच्छा का ध्यान नहीं रखा गया। यह संधि लोग विरोधी तथा एक तरफ की संधि लगती है जिसको या तो रद्द किया जाना या फिर दुबारा उस पर विचार करना आवश्यक है। सन् 1960 के पानी की 159MAF मात्रा में कमी हो गई तथा कुल मात्रा 117MAF रह गई जिस कारण जम्मू-कश्मीर के लोग काफी चिंता में पड़ गए। एक अनुमान अनुसार 2050 तक सिंध के जलतंत्र की भारतीय नदियों में 17 प्रतिशत पानी कम होने की उम्मीद है तथा पाकिस्तान में पहुँचते पानी में भी 27 प्रतिशत कमी आने की उम्मीद है। सिंध जल संधि करते समय जम्मू तथा कश्मीर के लोगों के पक्ष को नज़र अंदाज किया गया। जम्मू तथा कश्मीर में रोक लगाई गई कि 9.7 लाख एकड़ से अधिक भूमि कृषि के उद्देश्य के लिए नहीं प्रयोग की जाएगी।

प्रश्न 7.
पंजाब की भौगौलिक सिरमौरता वर्णन करते कोई आठ कारण लिखें।
उत्तर-
पंजाब की भौगौलिक सिरमौरता वर्णन करते मुख्य कारण हैं-

  • पंजाब में देश के हर प्रांत के मुकाबले किन्नू का उत्पादन सबसे अधिक होता है।
  • पंजाब में अंगूर की प्रति हैक्टेयर उपज देश में सबसे अधिक होती है।
  • पंजाब हर साल 7.16 लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन कर रहा है, जो देश के कुल उत्पादन का 10 प्रतिशत
  • प्रति व्यक्ति अंडों के उत्पादन में देश में पंजाब सबसे आगे हैं।
  • देश में पंजाब से संयुक्त राज्य अमेरिका को शहद निर्यात किया जाता है।
  • पंजाब देश की 22 प्रतिशत गेहूँ, 12 प्रतिशत चावल, 23 प्रतिशत कपास पैदा कर रहा है।
  • पंजाब में जंगलों अधीन क्षेत्र में 100 वर्ग कि०मी० क्षेत्र की वृद्धि हुई जो और किसी प्रांत में नहीं हुई।
  • पंजाब लैंड एक्ट 1900 के अनुसार रक्षित किए गए 55 हजार हैक्टेयर जंगली क्षेत्र को कंडी क्षेत्र के लोगों के लिए कृषि करने तथा रोजी-रोटी कमाने के लिए प्रयोग करने की स्वतन्त्रता दी गई।

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प्रश्न IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 20 पंक्तियों में दो :

प्रश्न 1.
भारत श्रीलंका मध्य कच्चातीवू मसला क्या हैं ? यह भारत की तरफ खुद पैदा की मुश्किल है, कैसे ?
उत्तर-
श्रीलंका में पड़ते कच्चातीवू का टापू विवादों से घिरा हुआ है। यह टापू 285.2 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इस टापू पर मनुष्य जनसंख्या नहीं है। 14वीं सदी में सागर तल पर घटी ज्वालामुखी कार्रवाई के कारण कच्चातीवू तथा रामेश्वरमू नामक टापू अस्तित्व में आए। ऐतिहासिक समय में कच्चातीवू टापू का प्रयोग भारतीय मछुआरे करते थे। इस टापू पर रामनद का राजा राज कर रहा था। बाद में मद्रास प्रेजीडेंसी का ही एक हिस्सा बन गया था। भारत मानता है कि कच्चातीवू टापू पर श्रीलंका का कब्जा होना चाहिए परन्तु इस कब्ज़े को कानूनी तौर पर मान्यता हासिल नहीं है। इसका कारण है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1974 में संसद् की मन्जूरी के बिना ही टापू का मालिकाना श्रीलंका को दे दिया था। यह टापू (कच्चातीवू) सांस्कृतिक पक्ष से तमिल लोगों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है तथा यह टापू मछलियां पकड़ने के रोज़गार के लिए भारत तथा श्रीलंका दोनों ही देशों के मछुआरों के द्वारा प्रयोग में लाया जा रहा है जबकि इस टापू पर पेयजल की कमी है।

राष्ट्रीय भाईचारे की तरफ से इस टापू को देश के अंग के तौर पर पहचाना गया है। श्रीलंका वाले. भाग से इस टापू पर मछलियां पकड़ने का काम अधिक किया जाता है। सारे क्षेत्र में सागरीय स्रोतों की बहुतायत है। श्रीलंकाई मछुआरों को तमिलनाडु के मछुआरों के मुकाबले मछली पकड़ने का काम करने में बहुत कठिनाइयां आ रही हैं। भारतीय मछुआरों के पास अच्छी तकनीक है पर भारतीय सागरीय फर्श को जाल से खींचने वाली नावों ने उजाड़ दिया है जिस कारण भारतीय जल क्षेत्र से श्रीलंका जल क्षेत्र मछलियां पकड़ने में आगे हैं। मछलियां पकड़ने के लिए लाइसेंस प्रबंध जो कि मछली पकड़ने के नियम बताता है जो नियम कानून बने हैं अगर उनका पालन किया जाए, तो तमिलनाडु की सरकार तथा भारत सरकार की सहायता से दोनों देशों के सागरीय मछुआरों सागरीय जीवों को जमा कर बहुत देर के लिए सम्भाल कर रखने, खराब होने से बचाने तथा ऐसी अन्य सुविधाएं लेकर अपनी रोजी रोटी का अच्छा आसान साधन बना सकते हैं।

प्रश्न 2.
सिंध जल संधि की रक्षा के लिए भारत अपना आप गुप्त करके भी काम कर रहा है ? कैसे ?
उत्तर-
सिंध जल संधि 1960 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति फील्ड मार्शल मुहम्मद अयूब खान के मध्य में सिंध की नदियों के पानी के विभाजन को लेकर हुई। इस संधि के मुताबिक भारत की पूर्वी नदियों सतलुज, ब्यास तथा रावी के पानी को बिना किसी रोक-टोक के भारत प्रयोग कर सकता है तथा पश्चिमी नदियों का जल सिंध, चिनाब, जेहलम पाकिस्तान के हिस्से आएगा। भारत ने जल संधि को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है तथा तीन लड़ाइयां, उग्रवाद के समय में संधि के नियमों का पालन किया तथा कभी संधि भंग करने का कोई प्रयास नहीं किया। भारत ने सिंध जल संधि की रक्षा अपना आप गुप्त करके भी की है। निम्नलिखित बातों से यह बात स्पष्ट हो जाती हैं-

  • 80 प्रतिशत से अधिक जल इन नदियों का पाकिस्तान के हिस्से आ रहा है क्योंकि पश्चिमी नदियों में बह रहे जल की मात्रा पूर्वी नदियों से कहीं अधिक है।
  • जम्मू तथा कश्मीर में रोक लगाई गई है कि जम्मू तथा कश्मीर 9.7 लाख एकड़ से अधिक भूमि किसी भी कृषि कार्य में नहीं लगाएगा।
  • भारत तथा पाकिस्तान की इस संधि द्वारा भारत को सिंचाई के लिए तथा जल-ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए हमेशा पानी की कमी रही जो कभी पूरी नहीं हुई।
  • 1960 में हुई संधि के अनुसार भारत की तरफ से तैयार की जाती इलाकई योजना परखी जाती है तथा पश्चिम की नदियों के किनारों के पास लाई गई हर एक ईंट के बारे में भी प्रसिद्ध पर्यावरण विद् तथा राष्ट्रीय संस्थाओं की सलाह अनुसार आगे का काम किया जाता है।
  • जम्मू तथा कश्मीर के नागरिकों का पक्ष सिंध जल संधि करते समय नज़रअंदाज किया गया है। भारत तथा पाकिस्तान की सीमा के पास 54 स्थायी नदियां, नहरें इत्यादि हैं तथा भारत अपनी पूरी ज़िम्मेदारी की बारे में समझता है। कूटनीतियों द्वारा भारत का स्टैंड हिलाया नहीं जा सकता, इसके कई कारण हैं-
    • एक तो भारत की राष्ट्रीय भरोसे योग्यता में कमी आ सकती है। इस तरह भारत अपनी प्राप्त की स्थिति खो सकता है जो उसको संयुक्त राष्ट्र सलामति कौशल जैसी संस्थाओं को हासिल हैं।
    • भारतीय सीमाओं के पानी की साझ समय पड़ोसी देशों में भी भारत के लिए संदेह स्वभाव पैदा हो जाएगा।

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प्रश्न 3.
भारत की भौगोलिक सिरमौरता को प्रकट करते तथ्य से पहचान करवाओ।
उत्तर-
भारत की भौगोलिक सिरमौरता को प्रकट करते तथ्य निम्नलिखित हैं-

  • भौगोलिक सिरमौरता हमें अभिमान महसूस करवाता है कि संसार की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट जो एशिया महाद्वीप में है।
  • सुंदरवन डेल्टा जो विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है वह हमारे देश की बंगाल की खाड़ी में स्थित है।
  • भारतीय जनसंख्या में दो तिहाई भाग में 15 से 64 साल के लोग रहते हैं तथा 48 करोड़ 60 लाख के करीब हाथ से काम करने वाले लोग रहते हैं तथा भारत में मध्यम आयु 29 साल है।
  • भारत में 19.1 प्रतिशत पशु प्रधान हैं जिस कारण भारत दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है।
  • भारत संसार के 17 भिन्न प्रकार के जानवर तथा पौधे इत्यादि की बड़ी गिनती वाले देशों में एक है।
  • भारत के उत्तर में 6.1 किलोमीटर की औसतन ऊँचाई वाला हिमालय पर्वत है जो कि उत्तरी ध्रुवीय पवनों के असरदायक होने पर रोक लगाता है।
  • भारत के पास कुल 9.6 प्रतिशत जल संसाधन हैं तथा 4 प्रतिशत जल का पुन: उपयोग किया जाता है।
  • 2016 के साल में भारत में बागाती उपज 28 करोड़ 34 लाख टन तक पहुँच गया था तथा इसका पूरा श्रेय भारतीय किसानों को जाता है।
  • भारत के पास संसार में दूसरे नंबर पर सबसे अधिक कृषि योग्य भूमि है तथा दूसरे नंबर पर सड़कों का जाल है।
  • हिमालय पर्वत माला भारत में संसार की सबसे ऊँची पर्वत माला है जो समुद्र तल से लगभग 6.1 किलोमीटर की ऊँचाई पर है।
  • भारतीय महाद्वीपों के नाम से पहचाने जाते पांच महाद्वीपों में भारत सबसे अधिक अलग पहचान रखता है।
  • भारत हिंद महासागर के 23 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले जल पर अपना अधिकार जमा रहा है।
  • देश का 90 प्रतिशत तक का भाग 6° से 52°C तापमान के मध्य का क्षेत्र है, जिस कारण देश में पूरा साल कोई न कोई पेड़ पौधों को उगाने के हालात कहीं न कहीं आवश्यक होते हैं। किसान तीन प्रकार की फसलें एक साल में आसानी से उगा लेते हैं।

प्रश्न 4.
भौगोलिक सिरमौरता क्या होती है ? भूगोल में इसके अध्ययन की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर-
भौगोलिक सिरमौरता-प्राकृतिक तथा मानवीय दोनों प्रकार की क्रियाएं जिनके स्थानीय विभाजन की प्रशंसा, जिसका उद्देश्य प्राप्तियों का एहसास करवाना होता है, भौगोलिक सिरमौरता कहलाती है। प्राकृतिक की तरफ मनुष्य को दिए गए प्राकृतिक स्रोतों का प्रयोग करके कोई प्रशंसा हासिल करना या प्रशंसा तक पहुँचने की मानवीय पहुँच ही भौगोलिक सिरमौरता कहलाती है। भौगोलिक सिरमौरता व्याख्यात्मक विषय है। भौगोलिक सिरमौरता ऐसा विषय है जो हर एक स्पष्ट तथा अस्पष्ट तथा हर किस्म के साधनों की व्याख्या करता है जो हमारी पृथ्वी, हमारे देश, शहर, कस्बे इत्यादि को बाकी कस्बों, शहरों इत्यादि से अलग बनाते हैं।

भौगोलिक सिरमौरता का अध्ययन हमें हर पक्ष से गर्व महसूस करवाता है तथा हमें संतुष्टि देता है कि हमारे सारे देश में यह चीज़ सबसे अधिक हैं जैसे कि भूगोल में इसके अध्ययन से हमें पता चलता है कि विश्व की सबसे ऊँची चोटी माऊंट एवरेस्ट हमारे महाद्वीप में है या सुंदरवन संसार का सबसे बड़ा डेल्टा हमारी बंगाल की खाड़ी में मौजूद है। इसके साथ हमें अपने देश की सिरमौरता के बारे में पता चलता है तथा हमें अपने देश पर गर्व महसूस होता है।

भूगोल में इसके अध्ययन की काफी आवश्यकता है। भौगोलिक सिरमौरता का उद्देश्य, भौगोलिक पक्ष से विकसित हो रहे मनों को इस ग्रह के हर देश में मिलने वाले स्रोतों की भौगोलिक दौलत से इस अध्ययन के द्वारा परिचित करवाया जाता है। भारत ने इस क्षेत्र के अध्ययन की तरफ काफी उन्नति की है। पर मीडिया सिर्फ लोगों के दुःख, तकलीफों तथा असफलताओं की गाथाएं ही सुनाता आ रहा है। उनकी ये बातें सच्ची हैं पर यदि सिर्फ नकारात्मक बातें ही लोगों तक पहुँचती रहीं तो लोगों की सोच की सीमाएं कुछ समय के बाद सीमित हो जाएंगी। वह देश को आने वाले संभावित खतरों तथा उन खतरों द्वारा आने वाली कमियों के बारे में नहीं सोच सकेंगे। जैसे कि एक उदाहरण है कि भारतीय कृषि के हालात कुल मिलाकर बहुत अच्छे नहीं हैं पर तथ्य यह है कि देश के 85 प्रतिशत किसान छोटे तथा मध्यम हैं उनके पास काम करने के लिए 21 प्रतिशत तक कृषि योग्य भूमि है तथा 79 प्रतिशत भूमि मध्यम दों के किसानों के पास हैं तथा फिर भी सहकारी तथा मिलकर की जाने वाली कृषि ही देश के प्रारंभिक कार्य को बचा रही है। भौगोलिक सिरमौरता का अध्ययन हमें गर्व महसूस करवाता है इसलिए भौगोलिक अध्ययन के क्षेत्र में इसकी बहुत आवश्यकता है।

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Geography Guide for Class 12 PSEB चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र Important Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective Type Question Answers)

A. बहु-विकल्पी प्रश्न :

प्रश्न 1.
सिआचिन से क्या भाव है ?
(A) बड़ी संख्या में गुलाब के फूल
(B) बड़ी संख्या में झाड़ियां
(C) बड़ी संख्या में कमल के फूल
(D) बड़ी संख्या में जानवरों के झुंड।
उत्तर-
(A) बड़ी संख्या में गुलाब के फूल

प्रश्न 2.
सिआचिन ग्लेशियर किस तरफ से आने वाले पाकिस्तानी हमलावरों को आगे बढ़ने से रोकता है ?
(A) उत्तर
(B) दक्षिण
(C) पूर्व
(D) पश्चिम।
उत्तर-
(B) दक्षिण

प्रश्न 3.
माऊनटेन सिकनैस की बिमारी खास कर कहां होती है ?
(A) दलदली भूमि पर
(B) पठारी इलाकों में
(C) समुद्री तल से ऊँचे क्षेत्रों में
(D) तटीय क्षेत्रों के नज़दीक।
उत्तर-
(C) समुद्री तल से ऊँचे क्षेत्रों में

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प्रश्न 4.
सरकरीक की दलदली खाड़ी भारत तथा पाकिस्तान के कौन-से क्षेत्रों में स्थित है ?
(A) गुजरात तथा सिंध
(B) लायलपुर तथा पंजाब
(C) लाहौर तथा गुजरात
(D) आन्ध्र प्रदेश तथा रावलपिंडी।
उत्तर-
(A) गुजरात तथा सिंध

प्रश्न 5.
सिंध जल संधि कब हुई ?
(A) 1960
(B) 1965
(C) 1959
(D) 1970.
उत्तर-
(A) 1960

प्रश्न 6.
भारत को कौन-सी दिशा की नदियों का पानी प्रयोग करने की छूट है ?
(A) पश्चिमी
(B) पूर्वी
(C) दक्षिणी
(D) उत्तरी।
उत्तर-
(A) पश्चिमी

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प्रश्न 7.
पर्यावरण को मोटे तौर पर हम कितने भागों में विभाजित कर सकते हैं ?
(A) प्राकृतिक तथा भौतिक
(B) भौतिक तथा सांस्कृतिक
(C) सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक
(D) भौतिक तथा रासायनिक।
उत्तर-
(C) सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक

प्रश्न 8.
प्रदूषण का प्रमुख स्रोत क्या है ?
(A) फसलें
(B) ठोस कूड़ा-कर्कट
(C) जंगल
(D) जानवर।
उत्तर-
(B) ठोस कूड़ा-कर्कट

प्रश्न 9.
वायु प्रदूषण का प्राकृतिक स्रोत कौन-सा है ?
(A) मनुष्य
(B) कृषि
(C) पानी
(D) ज्वालामुखी।
उत्तर-
(D) ज्वालामुखी।

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प्रश्न 10.
गंगा की ढाल के साथ प्रदूषण का मुख्य स्त्रोत क्या है ?
(A) चमड़ा उद्योग
(B) कागज़ उद्योग
(C) गैसें
(D) फालतू नाले।
उत्तर-
(A) चमड़ा उद्योग

प्रश्न 11.
पर्यावरण दिवस कब मनाया जाता है ?
(A) 22 अप्रैल
(B) 22 जून
(C) 22 मार्च
(D) 22 सितंबर।
उत्तर-
(B) 22 जून

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सा भू-प्रदूषण का कारक नहीं है ?
(A) तेज़ाब
(B) कीटनाशक
(C) तांबा
(D) मशीनें।
उत्तर-
(D) मशीनें।

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प्रश्न 13.
आर्सेनिक कौन-से पानी की गंभीर समस्या है ?
(A) पेयजल की
(B) पृथ्वी के नीचे वाले पानी की
(C) नहरों के पानी की
(D) समुद्र के पानी की।
उत्तर-
(B) पृथ्वी के नीचे वाले पानी की

प्रश्न 14.
भारत सरकार ने गंगा नदी को साफ करने के लिए कौन-से मिशन का आगाज़ किया है ?
(A) नमामि गंगे
(B) बहु आयामी योजना
(C) स्वच्छ भारत अभियान
(D) गंगा साफ योजना।
उत्तर-
(A) नमामि गंगे

प्रश्न 15.
भारत की औसत मध्यम आयु कितनी है ?
(A) 22 माल
(B) 29 साल
(C) 30 साल
(D) 25 साल।
उत्तर-
(B) 29 साल

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प्रश्न 16.
पंजाब का शहद किस क्षेत्र को निर्यात किया जाता है ?
(A) यू०एस०ए०
(B) ऑस्ट्रेलिया
(C) जापान
(D) चीन।
उत्तर-
(A) यू०एस०ए०

प्रश्न 17.
भारत में सालाना दूध का कितना उत्पादन होता है ?
(A) 16 करोड़ टन
(B) 120 करोड़ टन
(C) 10,000 करोड़ टन
(D) 15 करोड़ टन।
उत्तर-
(A) 16 करोड़ टन

प्रश्न 18.
वाहनों में से निकलता धुआं स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव डालता है ?
(A) खून में ऑक्सीजन कम करता है
(B) सांस के रोग
(C) आँखों के गम्भीर रोग
(D) गले की सूजन।
उत्तर-
(A) खून में ऑक्सीजन कम करता है

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प्रश्न 19.
विश्व जल दिवस कब मनाया जाता है ?
(A) 22 मार्च
(B) 22 अप्रैल
(C) 22 जून
(D) 22 अक्तूबर।
उत्तर-
(A) 22 मार्च

प्रश्न 20.
भारत में संसार का कितना पशुधन है ?
(A) 19.1 फीसदी
(B) 10 फीसदी
(C) 50 फीसदी
(D) 51 फीसदी।
उत्तर-
(A) 19.1 फीसदी

B. खाली स्थान भरें :

1. सन् 1972 में ………………… समझौते में 1949 के सीमा रेखा के संबंधी समझौते के बारे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया।
2. कच्चातीवू टापू …………… एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है।
3. भारत को सतलुज ………………… तथा ………………… पानी को बेरोक करने की स्वतन्त्रता है।
4. पर्यावरण ………………… तथा ………………… दो भागों में विभाजित किया जाता है।
5. कार्बन मोनोऑक्साइड खून में ………………. की मात्रा को कम कर देती है।
उत्तर-

  1. शिमला
  2. 285.2 एकड़
  3. ब्यास, रावी
  4. प्राकृतिक पर्यावरण, सांस्कृतिक पर्यावरण
  5. ऑक्सीजन।

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C. निम्नलिखित कथन सही (√) हैं या गलत (x):

1. बारीक कण 2.5 माइक्रोमीटर के कण सबसे अधिक खतरनाक होते हैं।
2. सल्फर-डाइऑक्साइड (SO2) तेज़ाबी वर्षा का कारण बनती है।
3. भारतीय संसद् में स्त्रियों की प्रतिनिधिता 50 प्रतिशत है।
4. कई तेज़ाब भी पानी को प्रदूषित करते हैं।
5. 1975 में सिंध जल संधि भारत तथा पाकिस्तान के मध्य हुई।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. गलत
  4. सही
  5. गलत।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्नोत्तर (One Word/Line Question Answers) :

प्रश्न 1.
मानव भूगोल क्या है ?
उत्तर-
मानव जीवन का भौगोलिक दृष्टिकोण मानव भूगोल कहलाता है।

प्रश्न 2.
कंधी क्षेत्र में प्रमुख दर्रे कौन-से हैं ?
उत्तर-
सिआला, बिलाफोंडला, गिओंग ला।

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प्रश्न 3.
सिआचिन ग्लेशियर के क्षेत्र में पड़ती विवादग्रस्त सीमाओं के नाम बताओ।
उत्तर-
LOC तथा LOAC.

प्रश्न 4.
सिआचिन कौन-सी नदियों को जल प्रदान करता है ?
उत्तर-
सिंध तथा नूबरा।

प्रश्न 5.
औरो पॉलिटिक्स से क्या भाव है ?
उत्तर-
औरो पॉलिटिक्स से भाव सियासी मामलों के लिए पहाड़ी क्षेत्रों का नाजायज़ प्रयोग करने से है।

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प्रश्न 6.
सरकरीक क्या है ?
उत्तर-
यह एक दलदली खाड़ी है जो भारत के गुजरात तथा पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र के मध्य है।

प्रश्न 7.
स्थल वेंग सिद्धान्त किन नहरों पर लागू है ?
उत्तर-
जहाजरानी करने योग्य पर।

प्रश्न 8.
कच्चातीवू टापू का प्रयोग इतिहास में कौन करते थे ?
उत्तर-
भारतीय मछुआरे।

प्रश्न 9.
कच्चातीवू टापू पर सबसे पहले किसका स्वामित्व था ?
उत्तर-
रामनद के राजे का।

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प्रश्न 10.
सिंध जल संधि किन-किन के मध्य में हुई ?
उत्तर-
यह संधि 1960 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तथा पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुहम्मद अयूब खान के मध्य में हुई।

प्रश्न 11.
पश्चिमी नहरों के नाम बताओ जिसका जल पाकिस्तान प्रयोग करता है ?
उत्तर-
चिनाब, जेहलम तथा सिंध।

प्रश्न 12.
पर्यावरण को कौन-से हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर-
प्राकृतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण।

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प्रश्न 13.
प्रदूषण से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब भौतिक पर्यावरण में कुछ ज़हरीले, अनचाहे पदार्थ तथा रसायन मिल जाते हैं उसको प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 14.
कौन-सा शहर वाहन कार्बन मोनोऑक्साइड छो है ?
उत्तर-
दिल्ली।

प्रश्न 15.
भू-प्रदूषण का कोई एक कारण बताओ।
उत्तर-
जंगलों की लगातार कटाई।

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प्रश्न 16.
वायु प्रदूषण के कोई दो कारकों के नाम बताओ।
उत्तर-
ज्वालामुखी तथा उद्योग।

प्रश्न 17.
उस गैस का नाम बताओ जो ओज़ोन गैस को दूषित कर रही है ?
उत्तर-
CFC क्लोरोफ्लोरो कार्बन।

प्रश्न 18.
प्रदूषण के तीन मुख्य प्रकार बताओ।
उत्तर-

  1. वायु प्रदूषण
  2. जल प्रदूषण
  3. भूमि प्रदूषण ।

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प्रश्न 19.
भारत में सालाना कितना अनाज पैदा किया जाता है ?
उत्तर-
25 करोड़, 70 लाख टन।

प्रश्न 20.
भूमि प्रदूषण को हम किस प्रकार रोक सकते हैं ?
उत्तर-
रासायनिक खादों तथा कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग कम करके।

प्रश्न 21.
छूत के रोग लगने वाले कीटाणु कौन-से हैं ?
उत्तर-
बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ, परजीवी तथा वाइरस इत्यादि।

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प्रश्न 22.
जल प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार अजीवी मिश्रण कौन-से हैं ?
उत्तर-
तेज़ाब, ज़हरीले नमक, धातु इत्यादि।

प्रश्न 23.
केन्द्र सरकार ने नमामि गंगा प्रोजैक्ट के लिए कितने रुपये जारी किए हैं ?
उत्तर-
20,000 करोड़।

प्रश्न 24.
वायु प्रदूषित कारक संसार की कितनी वायु को दूषित कर रहे हैं ?
उत्तर-
85 प्रतिशत।

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प्रश्न 25.
ऐल्डीहाइड प्रदूषण के साथ स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
साँस के रोग हो जाते हैं।

प्रश्न 26.
वायु में धूल के कण SPM कब पैदा होते हैं ?
उत्तर-
उद्योग, खनन, पॉलिश, सूती वस्त्र उद्योग, खनिज तेल इत्यादि के जलने से।

प्रश्न 27.
वायु प्रदूषण के कारण होने वाली भारतीय मौतों की संख्या कितनी है ?
उत्तर-
10 लाख हर साल।

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प्रश्न 28.
भारत में सालाना दूध का कितना उत्पादन होता है ?
उत्तर-
16 करोड़ टन।

प्रश्न 29.
भारत में प्रति व्यक्ति दूध का कितना उपभोग होता है ?
उत्तर-
1032 मि०मी० रोज़ाना।

प्रश्न 30.
संसार की सबसे ऊंची पर्वत माला कौन-सी है ?
उत्तर-
हिमालय पर्वतमाला।

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प्रश्न 31.
भारत में स्तनधारी जानवरों की संख्या कितनी है ?
उत्तर-
86 प्रतिशत।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
प्रदूषण और प्रदूषक में क्या भेद है ?
उत्तर-
प्रदूषण से अभिप्राय वायु, भूमि तथा जल साधनों का अवनयन तथा हानिकारक बनाना है। प्रदूषक उन पदार्थों को कहते हैं जो पर्यावरण में प्रदूषण फैलाते हैं।

प्रश्न 2.
माउनटेन सिकनैस क्या है ?
उत्तर-
यह एक बिमारी है जो कि समुद्र तल से काफी ऊँचाई वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में होती है। इसलिए इससे बचने के लिए पहले 2-3 दिन कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों में रहने के लिए अपने आपको उनके अनुसार ढालना ज़रूरी है।

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प्रश्न 3.
बाण गंगा का क्षेत्र कौन-सा है ?
उत्तर-
सरकरीक एक दलदली खाड़ी है तथा लगभग 96 किलोमीटर लम्बी यह गुजरात तथा सिंध के मध्य में सागरीय सीमा है जिसका दोनों देशों के बीच एक मसला है। इस क्षेत्र को बाण गंगा भी कहते हैं।

प्रश्न 4.
कच्चातीवू टापू का इतिहास क्या है ?
उत्तर-
कच्चातीवू टापू का प्रयोग सबसे पहले मछुआरों द्वारा किया जाता था। इस टापू पर पहले रामनंद के राजा का राज्य होता था जो बाद में अंग्रेज़ों के अधीन आ गया। श्रीलंका का इस पर कब्जा आज के समय में भी है।

प्रश्न 5.
सिंध जल संधि 1968 में नदियों के पानी का विभाजुन कैसे किया गया ?
उत्तर-
सिंध जल संधि 1960 में पूर्वी तथा पश्चिमी नदियों का विभाजन कर दिया गया। पूर्वी नदियों के पानी (सतलुज, व्यास, रावी) पर भारत का तथा पश्चिमी नदियों के पानी (चिनाब, सिंध, जेहलम) पर पाकिस्तान का अधिकार हो गया।

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प्रश्न 6.
पर्यावरण से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
मनुष्य तथा जीव-जन्तुओं के आस-पास फैले घेरे को जिसमें परस्पर मनुष्य विचरते हैं पर्यावरण कहते हैं। इसको मुख्य रूप में दो भागों में विभाजित किया जाता है-

  1. प्राकृतिक पर्यावरण (Natural Environment)
  2. सांस्कृतिक पर्यावरण (Cultural Environment)

प्रश्न 7.
पर्यावरण प्रदूषण क्या है ?
उत्तर-
भौतिक पर्यावरण (जल, वायु, मिट्टी) में जब कुछ ज़हरीले पदार्थ तथा रसायन अधिक मात्रा में इकट्ठे हो जाते हैं पर्यावरण प्रदूषण कहलाता है। यह मुख्य रूप में तीन प्रकार का होता है

  1. जल प्रदूषण
  2. वायु प्रदूषण
  3. मिट्टी प्रदूषण।

प्रश्न 8.
भू/मिट्टी प्रदूषण के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
भू/मिट्टी प्रदूषण के मुख्य कारण हैं-

  • रासायनिक खादों, कीटनाशकों, नदीननाशकों तथा ज़हरीली दवाइयों का छिड़काव इत्यादि।
  • शहरों, कस्बों इत्यादि में कूड़े-कर्कट के ढेर।
  • जंगलों के अंतर्गत क्षेत्र का कम होना तथा जंगलों की कटाई।
  • शहरीकरण में वृद्धि।

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प्रश्न 9.
भूमि-प्रदूषण के कारण कृषि पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
भूमि प्रदूषण के कारण कृषि पर होने वाले प्रभाव हैं-

  • इस द्वारा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
  • मिट्टी में नाइट्रोजन की स्थिरता कम हो जाती है।
  • मिट्टी अधिक खुरने लगती है।
  • उपजाऊ शक्ति कम होने कारण फसलों का उत्पादन कम हो जाता है।
  • मिट्टी में प्रदूषण के कारण खारापन काफी बढ़ जाता है।

प्रश्न 10.
पोषण-सुपोषण से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब जल के दो स्रोतों में रासायनिक खादों के रूप में प्रयोग में लाए जा रहे नाइट्रेट फास्फेट मिलकर जल में खास कर एलगी की वृद्धि का एक कारण बन जाते हैं तथा जिस कारण एलगी को खाने वाले बैक्टीरिया की मात्रा में वृद्धि हो जाती है तथा पानी में मौजूद ऑक्सीजन कम हो जाती है जिस कारण मछलियां इत्यादि मरने लगती हैं इसको पोषण-सुपोषण कहते हैं।

प्रश्न 11.
गंगा नदी को साफ करने के चरणों में से तुरन्त नज़र आने वाले प्रभाव कौन-से हैं ?
उत्तर-
तुरन्त नज़र आने वाले प्रभाव हैं-

  1. गंगा नदी के पानी में तैरता कूड़ा-कर्कट हटाया जाएगा।
  2. लोगों को सफाई के लिए जागरूक करना।
  3. गंदे पानी का निकास गंगा नदी में जाने से रोकना।
  4. आधी जली लाशों को गंगा नदी में फेंके जाने पर पूरी तरह से पाबन्दी।
  5. गंगा घाट के दोबारा से निर्माण करने की योजना।

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प्रश्न 12.
वायु प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत कौन-से हैं ?
उत्तर-
वायु प्रदूषण के मुख्य प्राकृतिक स्रोत हैं-

  1. ज्वालामुखी के विस्फोट कारण निकली जहरीली गैसें।
  2. वायु इत्यादि के साथ उड़ रही रेत।
  3. धूल, मिट्टी।
  4. जंगलों तथा फसलों को लगने वाली आग इत्यादि।

प्रश्न 13.
नाइट्रोजन ऑक्साइड प्रदूषण के मुख्य स्रोत कौन-से हैं तथा स्वास्थ्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ता
उत्तर-
नाइट्रोजन ऑक्साइड प्रदूषण के मुख्य स्रोत कोयले तथा वाहनों में से निकला धुआं है तथा इसके कारण साँस के रोग, आँखों की बिमारियाँ, फेफड़ों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 14.
सल्फर-डाइऑक्साइड के पड़ते प्रभावों का वर्णन करो।
उत्तर-
सल्फर-डाइऑक्साइड (SO.) की बढ़ती मात्रा तेज़ाबी वर्षा का एक कारण बन सकती है इसके साथ इमारतों तथा साथ ही जंगलों का काफी नुकसान हो जाता है। इसके द्वारा नदियों तथा झीलों का पानी भी तेज़ाबी हो जाता

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प्रश्न 15.
सफर को परिभाषित करो।
उत्तर-
सफर-यह प्रकल्प भारत सरकार के पृथ्वी तथा विज्ञान मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए हैं जिसमें (WMO) विश्व मौसम विभाग की संस्थाओं द्वारा भारत के महानगरों में प्रदूषण के स्तर को मापा जाता है तथा प्रदूषण के बारे में भविष्यवाणी की जाती है।

प्रश्न 16.
पंजाब की भौगोलिक सिरमौरता के कोई दो पक्ष बताओ।
उत्तर-

  1. पंजाब में हर साल 7.16 लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन होता है।
  2. पंजाब में प्रति व्यक्ति अंडों का उत्पादन अधिक होता है। भारत में इस पक्ष की औसतन संख्या 35 है जबकि पंजाब में यह संख्या 125 तक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सिआचिन ग्लेशियर का महत्त्व बयान करो।
उत्तर-
सिआचिन ग्लेशियर की महत्त्व निम्नलिखित है-

  1. इसके द्वारा नूबर तथा सिंध नदियों को जल प्रदान करवाया जाता है।
  2. पाकिस्तानी हमलावर दक्षिण की तरफ से भारत में दाखिल नहीं होते। यह हमलावरों को आगे बढ़ने से रोकता
  3. सिआचिन का उत्तर तरफ का क्षेत्र इंदिरा कोल, पाकिस्तान के द्वारा गैर-कानूनी तरीके से चीन को दिए गिलगिट, बालिस्तान के क्षेत्रों की सकीम घाटी पर नज़र बनाए रखने का स्थान है।
  4. चीन भी सिआचिन को हासिल करने की इच्छा रखता है, क्योंकि चीन तथा पाकिस्तान के आपसी गठजोड़ में यह अहम् भूमिका निभा सकता है।
  5. भारत तथा पाकिस्तान के बीच 1949 के कराची समझौते के आधार पर गोलाबंदी रेखा NJ9842 प्वाइंट से आगे है अर्थ है कि ग्लेशियरों के उत्तर दिशा में।
  6. यह ग्लेशियर पाकिस्तान के सैनिकों को सेल्टरों कंधी के पश्चिम की तरफ ऊंचाई का लाभ देता है। जो कि रणनीतिक लाभ है।

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प्रश्न 2.
सरकरीक की खाड़ी पर नोट लिखो।
उत्तर-
सरकरीक एक दलदली खाड़ी है। यह खाड़ी गुजरात तथा सिंध क्षेत्रों के बीच स्थित है। स्वतन्त्रता से पहले गुजरात के क्षेत्र पर अंग्रेज़ों का राज्य था तथा पाकिस्तान का दावा है कि कच्छ का क्षेत्र-तत्कालीन बादशाह तथा सिंध की सरकार के बीच 1914 में हुए समझौते के मुताबिक पाकिस्तान का होना चाहिए। यह एक सागरीय सीमा है जिसकी लंबाई लगभग 96 किलोमीटर है। इस क्षेत्र को बाण गंगा भी कहते हैं। 1914 में हुए समझौते के अनुसार सरकरीक के पूर्वी किनारे को भारत सीमा मानते हैं।

प्रश्न 3.
सरकरीक की खाड़ी की मुख्य विशेषता क्या है ?
अथवा
सरकरीक की खाड़ी की आर्थिक महत्ता किन तत्त्वों से पता चलती है ?
उत्तर-
सरकरीक की खाड़ी दलदली खाड़ी जो गुजरात तथा सिंध के क्षेत्रों के बीच स्थित है। इस खाड़ी की सैनिक महत्ता कम है पर आर्थिक महत्त्व काफी है। इसका महत्त्व निम्नलिखित है-

  • इस स्थान पर खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार हैं।
  • हाइड्रोकार्बनों के अस्तित्व की बड़ी संभावना है।
  • मछुआरों की गतिविधियां काफ़ी तेज हैं। इस स्थान पर पाकिस्तान तथा भारत के मछुआरे मछलियां पकड़ने का काम करते हैं।
  • जब एक बार इसकी सीमा निर्धारित कर दी जाएगी तब यह समुद्री सीमा को निश्चित कर देंगी जिसके साथ
    आर्थिक क्षेत्र की सीमाएं भी सीमित हो जाएंगी तथा आर्थिक ज़ोन (EEZ) 200 नोटीकल मील (370 km) तक फैल जाएगा जिसके साथ वाणिज्य संबंधी उपयोग शुरू हो जाएगा।

प्रश्न 4.
वायु प्रदूषण के मानवीय स्वास्थ्य पर पड़ते प्रभावों का वर्णन करो।
उत्तर-
वायु प्रदूषण के कारण मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव इस प्रकार हैं-

  1. वायुमंडल की ओजोन परत रासायनिक पदार्थों के कारण नष्ट होती जा रही है। क्लोरो-फ्लोरो कार्बन तथा हिमनदी के सिकुड़ने इत्यादि के कारण ओजोन परत नष्ट हो रही है।
  2. वायु प्रदूषण के कारण मानव को कई प्रकार की बिमारियों का सामना करना पड़ता है जैसे कि फेफड़ों की बिमारियां, गले की बिमारियां तथा चमड़ी की बिमारियां इत्यादि।
  3. काला धुआं इत्यादि के इकट्ठा करने के साथ जो मुख्य क्षेत्रों में तथा शहरों में हो रहा है इसका कारण जहरीली गैसें हैं जो वायुमंडल में प्रचलित हैं।
  4. वायु प्रदूषण तेज़ाबी वर्षा का कारण बनती है।

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प्रश्न 5.
भारत में वायु प्रदूषण के कोई चार स्रोतों का वर्णन करो।
उत्तर-
वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं-

  1. प्राकृतिक स्रोत-जैसे-ज्वालामुखी विस्फोट, धूल, तूफान, अग्नि इत्यादि।
  2. उद्योग-उद्योगों से निकली गैसें, धूल कण इत्यादि।
  3. फैक्टरी-फैक्ट्रियों से निकला धुआं तथा राख इत्यादि।
  4. मोटर वाहनों से मोनोक्साइड और सीसा वायुमंडल में छोड़े जाते हैं। यही नहीं ओज़ोन की परत को पतला करने वाला क्लोरोफ्लोरो कार्बन भी वायुमंडल में छोड़ा जाता है।

प्रश्न 6.
ऑपरेशन जिब्राल्टर (Operation Gibraltar) पर नोट लिखो।
उत्तर-
ऑपरेशन जिब्राल्टर एक कोड नाम है जो पाकिस्तान की कूटनीति जो जम्मू तथा कश्मीर में प्रवेश करने की थी तथा प्रवेश करके वहाँ पर एक विद्रोह शुरू करना था। यदि यह विद्रोह शुरू हो जाता तो पाकिस्तान का अधिकार जम्मू-कश्मीर पर हो जाना निश्चित था। 1965 में पाकिस्तान की सेना आजाद कश्मीर रैगुलर फोर्स जम्मू तथा कश्मीर में दाखिल हुई। कश्मीरी मुसलमानों को अपने साथ मिलाने के लिए यह ऑपरेशन 1965 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई का एक कारण बना। वास्तव में 1950 से 1960 तक के वर्षों से ही पाकिस्तान सिआचिन पर अपना अधिकार करना चाहता था तथा सैनिक नफ़री को बढ़ाकर पाकिस्तान मसले को जीवित भी रख रहा था। 1984 तक भारत तथा पाकिस्तान के 2000 तक सैनिक अपनी जान खो चुके थे, क्योंकि पर्यावरण काफी कठोर था।

प्रश्न 7.
कच्चातीवू के मसले को लेकर इंदिरा गांधी की एमरजैंसी पर नोट लिखो।
उत्तर-
1974 में कच्चातीवू श्रीलंका को सौंपा गया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के द्वारा यह इलाका इंडो-श्रीलंका मैरीटाइम ऐग्रीमैंट के अनुसार श्रीलंका के हिस्से कर दिया था। इस ऐग्रीमैंट के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने मज़बूरन इंदिरा गांधी को लिखा था कि किसी समय यह धरती इतिहास में रामनद के अंतर्गत होती थी। भारत कच्चातीवू टापू पर श्रीलंका में कब्जे को मानता तो है पर इस कब्जे को कोई कानूनी मान्यता नहीं मिली क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सन् 1974 में संसद् की मंजूरी के बिना टापू का मालिकाना श्रीलंका को दिया। कुछ समय के बाद फिर 1976 में एक ऐग्रीमैंट पास हुआ जिसमें दोनों ने तमिलनाडु तथा श्रीलंका के मछुआरों को एक-दूसरे के इलाके में जाने पर रोक लगा दी गई।

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प्रश्न 8.
भूमि प्रदूषण क्या है ? इसके पर्यावरण तथा शहरों पर पड़ते प्रभाव के बारे में बताओ।
उत्तर-
भूमि में जैविक तथा अजैविक पदार्थों की एक पतली परत होती है। जब मिट्टी में जहरीले पदार्थ का जमाव हो जाता है तथा मिट्टी की रासायनिक, भौतिक संरचना बुरी तरह खराब हो जाती है। भूमि प्रदूषण कहलाता है। इसका पर्यावरण तथा शहरों पर पड़ने वाला प्रभाव निम्नलिखित है-

पर्यावरण पर प्रभाव-

  1. इस प्रदूषण के कारण वनस्पति की काफी कमी होती है।
  2. इस प्रदूषण के कारण पारिस्थितिक तंत्र भी नष्ट होता है।
  3. मिट्टी के आवश्यक जैविक-अजैविक बैक्टीरिया की कमी भी आ जाती है।

शहरों पर प्रभाव –

  1. सीवरेज कूड़े तथा मिट्टी के साथ भर जाता है।
  2. सीवरेज का प्रवाह थम जाता है।
  3. कूड़े के ढेर लग जाते हैं जिस कारण बदबूदार तथा ज़हरीली गैसें मिट्टी में मिलने लगती हैं।

प्रश्न 9.
सिंध जल संधि का भारत के लिए होने वाले महत्त्व का वर्णन करो।
उत्तर-
सिंध जल संधि 9 सितंबर, 1960 तक भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच हुई थी।

  • सिंध जल संधि के कारण पिछले 58 सालों में भारत शांतिपूर्ण तरीके से सिंध नदियों का पानी प्रयोग कर रहा है।
  • इस संधि के प्रबंध अनुसार सिंध तथा इसकी सहायक नदियों का जल भारत तथा पाकिस्तान दोनों देशों के द्वारा प्रयोग किया जा रहा है, जबकि संधि के अनुसार व्यास, रावी तथा सतलुज भारतीय सरकार तथा सिंध, चिनाब तथा जेहलम के जल का अधिकार पाकिस्तान की सरकार के पास है।
  • इस संधि के अनुसार जहां सिंध नदी भारत में दाखिल होती है। भारत इसका 20 प्रतिशत पानी प्रयोग कर सकता है। यह जल सिंचाई, यातायात इत्यादि के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • इस संधि के द्वारा मध्यम वाला रचनातन्त्र मिलता है जो बीच के झगड़ों का निपटारा भी करता है। इस तरह जैसे सिंध नदी तिब्बत (चीन) में शुरू होती है जिसने इस संधि को संभाला हुआ है। यदि चीन इसके जल को रोक ले तो यह भारत तथा पाकिस्तान दोनों देशों पर प्रभाव डालेगा।

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प्रश्न 10.
गंगा नदी के जल प्रदूषकों तथा प्रदूषण के प्रकार के बारे में बताओ।
उत्तर-
गंगा नदी के मुख्य पानी प्रदूषकों हैं-

  1. कानपुर के नीचे का भाग।
  2. वाराणसी के नीचे।
  3. फरक्का बैरज़ से इलाहाबाद तक।

प्रदूषण के प्रकार-

  1. कानपुर जैसे नगरों में औद्योगिक प्रदूषण फैल रहा है।
  2. घरेलू अपशिष्ट पदार्थों के फैलाव के कारण जो मुख्य रूप में शहरी क्षेत्रों से अधिक आता है।
  3. पशु लाशों या मृत शरीरों को पानी में फेंकना जिस कारण गंगा नदी के जल में प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है।
  4. फैक्ट्री तथा उद्योगों इत्यादि का गंदा जल नदी में जा रहा है, जिस कारण नदी का पानी गंदा हो रहा है।

प्रश्न 11.
वायु में मौजूद धूल के कण SPM पर नोट लिखो।
उत्तर-
वायु में मौजूद धूल के कण (Suspended Particulate Matter) बहुत बारीक से लेकर बड़े-बड़े आकार के हो सकते हैं; ऐसे कण हमें खासकर उद्योगों से, खनन की प्रक्रिया से, सूती वस्त्र उद्योग से, खनिज तेल के ईंधन के साथ पैदा होते हैं। इनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर से लेकर 10 मिलीमीटर तक हो सकता है। ठंडे तथा नमी वाले हालातों में संघनन की क्रिया में न्यूक्लियस का काम भी यह कण करते हैं तथा कुहरा घना दिखाई देता है। विशेष तौर पर SPM दो प्रकार के होते हैं। एक तो काफी बारीक कण जो 2.5 माइक्रोमीटर तक होते हैं तथा यह सबसे अधिक हानिकारक होते हैं तथा दूसरे मोटे कण जो 10 माइक्रोमीटर तक हैं। ये कण फेफड़ों तक पहुँच कर मनुष्य की मौत का कारण भी बन सकते हैं।

प्रश्न 12.
भारत को सबसे अधिक गौरवान्वित पेश करते पक्ष बताओ।
उत्तर-
भारत को सबसे अधिक गौरवान्वित पेश करते पक्ष हैं-

  • देश का 90% तक का हिस्सा 85°C से 52°C तापमान के बीच के औसत क्षेत्र में पड़ता है तथा देश में हर समय पौधों के उगने के हालात होते हैं जिसके कारण किसान फसलों की पैदावार सहज रूप में कर सकता है।
  • भारत में 19.1 प्रतिशत पशुधन हैं जिसके कारण भारत दूध का बड़ा उत्पादक है।
  • बड़ी संख्या में आर्थिक मध्य वर्ग भारत में प्रवास कर रहा है जो कि अपने जीवन का स्तर सुधारने के लिए खुल कर खर्चा करने तथा संसार के उत्पादकों को खरीदने की ताकत रखता है।
  • भारत में उत्पादन लागतें भी कम हैं।
  • भारत हर साल 25 करोड़ 70 लाख टन अनाज पैदा करता है।

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निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
भूमि प्रदूषण क्या है ? भूमि प्रदूषण के स्रोत, कारण, प्रभाव तथा रोकने के सुझाव बताओ।
अथवा
भूमि (मिट्टी) प्रदूषण पर नोट लिखो।
उत्तर-
भूमि (मिट्टी) प्रदूषण (Soil Pollution)-कंकरीट, इमारतों तथा सड़कों इत्यादि के उभार के कारण, एक धरती का हिस्सा जो पहले मिट्टी के साथ ढकी हुई थी। इसके अलग-अलग नाम हैं जैसे कि मिट्टी, गीली मिट्टी, कीचड़, भूमि इत्यादि तथा यह सारे हमारे लिए बहुत आवश्यक हैं जो पौधे हमें भोजन प्रदान करते हैं, मिट्टी में ही पैदा होते हैं तथा हमें स्वस्थ (तंदरुस्त) बनाते हैं। पर बाकी प्राकृतिक स्रोतों की तरह धरती का मिट्टी स्रोत भी गंदा हो रहा है। मिट्टी प्रदूषण का मुख्य कारण मनुष्य द्वारा फैलाई गंदगी है। जब मिट्टी में जहरीले पदार्थों के जमाव होने के कारण मिट्टी में मौजूद जैविक तथा अजैविक पदार्थों की पतली परत नष्ट होनी शुरू हो जाती है जिस कारण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम होनी शुरू हो जाती है। इसको भूमि (मिट्टी) प्रदूषण कहते हैं।

स्रोत (Sources)-मिट्टी को प्रदूषित करने वाले जहरीले पदार्थ हैं-पारा, तेज़ाब, सीसा, तांबा, जिंक, कैडमियम, खार, साइनाइड, करोमेट, कीटनाशक, रासायनिक खादें तथा रेडियोधर्मी पदार्थ, फैक्ट्रियाँ तथा उद्योगों में से निकला फालतू पदार्थ।

मिट्टी प्रदूषण के मुख्य कारण (Main Causes of Soil Pollution)-
1. औद्योगिक क्रियाओं का योगदान (Role of Industrial Activities)-यह पिछली सदी से काफ़ी अधिक बढ़ गया है। खासकर जब से निर्माण उद्योग तथा खनन की गतिविधियाँ बढ़ गई हैं। अधिकतर उद्योगों के लिए कच्चा माल खानों से धरती की खुदाई करके निकाला जाता है। इस प्रकार औद्योगिक विकास के कारण धरती पर मिट्टी प्रदूषित हो रही है।

2. कृषि क्रियाएं (Agricultural Activities) रासायनिक खादों, कीटनाशकों इत्यादि का प्रयोग फसल की पैदावार को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इस प्रकार कई रसायनों का मेल होता है जो कि प्राकृतिक तौर पर नष्ट नहीं किए जा सकते। इस प्रकार यह रसायन धीरे-धीरे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कम करते हैं। कई रसायन मिट्टी की बनावट को भी खराब करते हैं।

3. कूड़ा-कर्कट का निष्कासन (Disposal of Garbage/Wastage) अधिकतर हम कई बार अपने घर के कूड़े-कर्कट का निष्कासन करते हैं। औद्योगिक फालतू पदार्थों के अतिरिक्त मनुष्य अपने गंदे सामान का निष्कासन करता है जिस कारण कई बार सीवरेज़ के पानी के साथ मिलने के कारण गंदगी फैलती है।

4. तेल का छलकाव (Oil Spill)-कई बार पाइप द्वारा जब तेल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया जाता है। तब उस समय कई बार तेल लीक हो जाता है जिस कारण यह तेल मिट्टी में मिल जाता है तथा मिट्टी प्रदूषित हो जाती है।

5. तेजाबी वर्षा (Acid Rain)-एसिड तेजाबी वर्षा तब होती है जब प्रदूषिक मौजूद वायु में मिल जाते हैं तथा वर्षा के साथ धरती पर गिरते हैं तथा यह गंदा पानी मिट्टी के साथ मिल कर मिट्टी को भी गंदा कर देते हैं।

6. बड़ी मात्रा में शहरों तथा गाँवों में लगे कूड़े के ढेर भी प्रदूषण का कारण बनते हैं।

7. शहरीकरण के कारण भी मिट्टी प्रदूषण में लगातार वृद्धि हो रही है।

8. जंगलों की हो रही अंधा-धुंध कटाई भी मिट्टी प्रदूषण का एक बड़ा कारण सिद्ध हो रही है।

9. गहन कृषि भी प्रदूषण की समस्या को बढ़ा रही है।

10. सड़कों का मलबा इत्यादि।

मिट्टी प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Soil Pollution)-

1. मानव के स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effect on Human Health)—पहले इस पक्ष पर ध्यान देना चाहिए कि मिट्टी एक कारण है जो हमारी ज़िन्दगी को संभाल रही है। इसमें प्रदूषण की मात्रा की वृद्धि का मनुष्य के स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पौधे तथा फसलें जो इस प्रदूषित मिट्टी में उग रहे हैं अपने अंदर ये प्रदूषिक तत्त्व समा लेते हैं जो हमारे तक पहुंच जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य को कैंसर जैसी बीमारियां हो जाती हैं। इसके बिना जैव ईजाफा (Eutrophication) हो जाता है। पृथ्वी पर पड़े बड़े कूड़े के ढेरों से जहरीली गैसें मिट्टी में मिल जाती हैं जो मनुष्य की प्रजनन शक्ति को कम कर देती हैं। कैंसर या मन मितलाने जैसे खतरनाक रोग मनुष्य को लग जाते हैं। इसके बिना भोजन पर होने वाले इसके प्रभाव के कारण मनुष्य अंदर जैसे भोजन के खाने के बाद फूड प्वाइजनिंग जैसी बीमारियां हो जाने की संभावना बढ़ जाती हैं।

2. पेड़-पौधों पर प्रभाव (Effect on Growth of Plants)-पर्यावरण व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है जब मिट्टी
लगातार प्रदूषित होती जाती है। जब कम समय में ही मिट्टी तेजी के साथ बदलती है तब पौधों तथा मिट्टी की रसायन प्रक्रिया पूरी तरह बदल जाती है। फंगी तथा बैक्टीरिया की मिट्टी में मात्रा कम होनी शुरू हो जाती है जिस कारण मिट्टी प्रदूषित होने लगती है। धीरे-धीरे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरता भी कम हो जाती है। मिट्टी अपरदन अधिक है, जिस कारण पेड़-पौधों तथा फसलों के उत्पादन में कमी आ जाती है।

3. जहरीली धूल (Toxic Dust)-कूड़ा-कर्कट में कई तरह की जहरीली गैसें निकलती हैं जो पर्यावरण को गंदा करती हैं तथा मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। इस धूल की बदबू मनुष्य को कठिनाइयों में डाल देती है।

4. पर्यावरण पर प्रभाव (Effects on Environment)-इस द्वारा वनस्पति कम हो जाती है तथा पारिस्थितिक तंत्र भी तहस-नहस होता है।

5. शहरों का प्रभाव (Effects m Cities)-नालियां कूड़ा इत्यादि तथा मिट्टी से भर जाती हैं तथा पानी के सीवरेज प्रवाह में मुश्किलें पैदा हो जाती हैं।

मिट्टी प्रदूषण को रोकने के लिए सुझाव (Control Measures for Soil Pollution)-

  • मिट्टी प्रदूषण को रोकने के लिए हमें फालतू सामान तथा प्लास्टिक का प्रयोग कम करना चाहिए तथा उपयोग किए गए फालतू सामान को इकट्ठा करके कबाड़ी तक पहुंचाना चाहिए ताकि इसको दोबारा प्रयोग योग्य बनाया जा सके।
  • रासायनिक खादों पैस्टीसाइड, फर्टीलाइजर इत्यादि का प्रयोग कृषक गतिविधियों को कम करना चाहिए।
  • लोगों को चार R से परिचित करवाना चाहिए। यह चार R हैं Refuse मतलब कि पॉलिथीन लिफाफे इत्यादि लेने से मना कर देना, Reuse द्वारा प्रयोग, Recycle द्वारा उत्पादन तथा Reduce कम करना इत्यादि।
  • पैकट चीजें खरीदने से परहेज़ करो बाद में यह पैकट ही कूड़े के ढेर बन जाते हैं, धरती पर कूड़े के ढेर लगाने नहीं चाहिए।
  • ध्यान रखो कि फालतू गंदगी या कूड़ा-कर्कट न फैलाओ।
  • हमेशा स्वाभाविक तरीके से सड़नशील पदार्थ खरीदो।
  • हमेशा जैविक कृषि करो तथा जैव भोजन खाओ तथा रासायनिक दवाइयों का प्रयोग कम करो।
  • हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए।
  • कूड़े के पड़े ढेरों पर बिजली बनाने का काम लिया जाना चाहिए।
  • निर्माण के कामों पर सामान की बर्बादी को कम करना चाहिए।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 8 चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र

प्रश्न 2.
जल प्रदूषण क्या है ? इसके कारण, प्रभाव तथा सुझाव के बारे चर्चा करो।
अथवा
जल प्रदूषण पर नोट लिखो।
उत्तर-
जल प्रदूषण (Water Pollution)-जल प्रदूषण की समस्या विश्वव्यापी समस्या है। जल के स्रोतों (नदियों, झरने, समुद्र तथा नीचे वाले पानी) इत्यादि के प्रदूषण को जल प्रदूषण कहते हैं। यह पर्यावरण में औद्योगिक प्रदूषकों के द्वारा होता है जो सीधे या असीधे तौर पर पानी में विसर्जित होते हैं। बिना किसी शोधन से जब कई कारखानों का या घरों का गंदगी पानी में घुल जाता है तब वह पानी को प्रदूषित बनाता है।

जल प्रदूषण के स्त्रोत (Sources of Water Pollution)-जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं : –

1. बिन्दु स्रोत (Point Resources)—जो प्रदूषिक पानी में किसी एक खास स्रोत से आ रहे हो जैसे कि सीवरेज पाइपों या कारखानों में पाइपों के द्वारा गंदे पदार्थ का बहाव जब नदियों, झीलों तथा अन्य साफ जल के स्रोतों के साथ मिल जाता है तब जल प्रदूषित हो जाता है।

2. गैर-बिन्दु स्रोत (Non-Point Sources) गैर-बिन्दु स्रोत बिखरे हुए बेकार पदार्थों के कारण पैदा होते हैं।
यह किसी एक खास स्रोत से नहीं आते। इनके मुख्य स्रोत हैं-कृषि वाले क्षेत्र, जंगल, गाँव तथा शहर, सड़कों पर बहने वाला जल जब साफ जल से मिल जाता है। इस प्रकार पानी दूषित हो जाता है। गैर-बिन्दु स्रोतों के कारण जो प्रदूषण फैलता है। इसको कंट्रोल करना काफ़ी मुश्किल है।

जल प्रदूषण के कारण तथा प्रभाव (Causes and Effects of Water Pollution)-
1. प्राकृतिक कारण (Natural Causes) वर्षा के जल में वायु में गैसें तथा धूल कण इत्यादि मिल जाने के कारण यह जल जहाँ पर भी जमा होता है वहां जल को प्रदूषित कर देता है। इसके अतिरिक्त ज्वालामुखी इत्यादि भी इसके महत्त्वपूर्ण कारण हैं।

2. रोग लगाने वाले कीटाणु (Pathogens)—यह प्रदूषण कई रोगों का जनक भी है। इस कारण बैक्टीरिया, जीवाणु, परजीवी, वाइरस इत्यादि होते हैं। यह मुख्य रूप में जल के एक स्थान इकट्ठे रहने के कारण आते हैं। इसके अतिरिक्त यह सड़े-गले पदार्थों में भी पैदा होते हैं।

3. दूषित पदार्थ (Polluted Substances)-इसमें कार्बनिक तथा अकार्बनिक हर प्रकार के पदार्थ जो नदियों में नहीं होने चाहिए, इस श्रेणी में आते हैं। वस्त्रों की धुलाई या बर्तनों को साफ करना, मनुष्य या जानवरों का साबुन का प्रयोग करना। इसके साथ साबुन पानी में मिल जाता है। खाद्य पदार्थ इत्यादि अन्य पदार्थों के जल में मिलने से भी जल प्रदूषित हो जाता है। पेट्रोल इत्यादि पदार्थों के रिसाव से समुद्री जल प्रदूषित हो जाता है। पेट्रोल का आयात-निर्यात समुद्रों द्वारा किया जाता है। इन जहाज़ों में कई बार रिसाव होने के कारण जहाज़ किसी दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं। उसके डूबने से तेल समुद्र में फैल जाता है तथा जल प्रदूषित हो जाता है।

4. अजीवी मिश्रण (Toxic Substances)-कई प्रकार के तेज़ाब, ज़हरीले नमक, धातु इत्यादि भी पानी को प्रदूषित बनाते हैं तथा जल को अयोग्य बना देते हैं।

5. कई स्थानों पर जहां लोग नदी के किनारे जाकर रहने लगे हैं। वे लोग किसी व्यक्ति की मौत के बाद उनकी लाशों को जलाने की बजाए नदी में बहा देते हैं। जैसे-जैसे लाश सड़कर गलने लगती है वैसे ही जल में कीटाणुओं की संख्या बढ़ने लगती है जिसके साथ पानी प्रदूषित होता है।

6. अक्सर किसी त्योहार पर मूर्तियों की पूजा करके मूर्तियों का विसर्जन समुद्र, नदी या फिर तालाबों में किया जाता है। यह भी जल को प्रदूषित करती है। हमें चाहिए कि त्योहार समय ऐसी मूर्तियों का प्रयोग करना चाहिए जिसमें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया गया हो ताकि प्रदूषण कम हो।

7. जब नदी या तालाब के जल में Nuclear Test किया जाता है तब वह टैस्ट के दौरान जल में न्यूक्लियर के कुछ पार्टीकल रह जाते हैं जिससे जल दूषित हो जाता है।

8. किसानों द्वारा कृषि में प्रयोग किए गए रसायन भी जल में मिल जाते हैं जिसके साथ ही जल प्रदूषित हो जाता है।

जल प्रदूषण को रोकने का सुझाव (Measures to Control Water Pollution) हम सभी जानते हैं कि जल ही जीवन है तथा यदि इस जल प्रदूषण को समय रहते ठीक न किया गया तब वह दिन दूर नहीं जब एक देश दूसरे देश के साथ जल की प्राप्ति के लिए लड़ेगा। इस प्रदूषण को रोकने के कुछ सुझाव हैं-

1. तालाब या नदी में कपड़े या बर्तन न धोएं जाएं। अक्सर देखा गया है कि धोबी या आस-पास रहने वाले लोग कपड़े तथा बर्तन तालाब में धोते हैं। इस प्रकार जल में रहने वाले जीव-जन्तु तथा जल को हानि पहुँचती है इसलिए इसको बंद किया जाना चाहिए।

2. जानवरों को तालाबों में न नहाने दिया जाए क्योंकि तालाब का जल स्थिर रहता है तथा जानवरों के नहाने के साथ जल धीरे-धीरे गंदा हो जाता है तथा बाद में किसी भी चीज़ के लिए उपयोगी नहीं रहता।

3. राइप्रेयन बफ़र नदी के साथ-साथ उगने वाले वृक्षों तथा पेड़-पौधों की कतारें होती हैं, जो कि आस-पास के क्षेत्रों के नहर इत्यादि के जल की रक्षा करती हैं तथा जैव भिन्नता में वृद्धि भी करती हैं। आम लोगों तथा सरकारों को इस बफ़र में वृद्धि करनी चाहिए तथा वृक्षों को काटने पर रोक लगानी चाहिए।

4. हमें जल प्रदूषण को रोकने के लिए बनाए गए सारे कानूनों का पालन करना चाहिए। भारत के लगभग सारे राज्यों में 1947 में कानून बना था। यह कानून इस बात को आवश्यक करता है कि सारे परिषद् के उद्योग प्रयोग किए गए गंदे पानी को नदियों इत्यादि में फेंकने से पहले उसको साफ करें तथा फिर नदी में छोड़ें।

5. उद्योगों तथा औद्योगिक संसाधनों को अधिक ज़िम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए।

6. जहरीले कचरे का उचित निपटारा करना चाहिए। जिन फैक्ट्रियों में पेंट, साफ सफाई तथा दाग मिटाने वाले रसायनों का प्रयोग किया जाता है जहां से निकलने वाले पानी की उचित सफाई शौध होनी आवश्यक है। कार या अन्य मशीनों से होने वाले तेल के रिसाव पर भी पूरी तरह से रोक लगनी आवश्यक है।

7. जल में उपजने वाले पौधे जो पानी को साफ रखते हैं। हमें अधिक-से-अधिक ऐसे पौधे लगाने चाहिए।

8. मृतक शरीरों को नदियों में नहीं फेंकना चाहिए। हर शहर तथा कस्बे में सीवरेज की पूरी सुविधा होनी चाहिए।

9. हमें मल-मूत्र तथा सीवरेज के जल को शहरों तथा कस्बों में रहने वाले जल से मिलने से रोकना चाहिए। उनको खड्डों में प्रवाहित करना चाहिए। ऐसा करने के साथ वह खाद में बदल जाएंगे तथा कृषि के लिए इस्तेमाल किए जा सकेंगे।

10. जल में बैक्टीरिया को खत्म करने के लिए इसमें ब्लीचिंग पाऊडर या अन्य रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है।

11. अंधाधुंध कीटनाशकों के प्रयोग को कम करना चाहिए।

12. प्राकृतिक कृषि करने के लिए किसानों को उत्साहित करना चाहिए तथा पशुओं के गोबर का प्रयोग खाद के तौर पर किया जाना चाहिए।

13. समुद्र इत्यादि जल स्रोतों के जल में मिले हुए तेल को साफ करने के लिए कागज़ उद्योग के एक बचे हुए उत्पाद – बीगोली का प्रयोग किया जा सकता है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 8 चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र

प्रश्न 3.
वायु प्रदूषण पर नोट लिखो।
उत्तर-
वायु प्रदूषण (Air Pollution)-वायुमंडल पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। मानव जीवन के लिए वायु का होना बहुत आवश्यक है। वायु के बिना मानवीय जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती क्योंकि मानव वायु के बिना 5-6 मिनट से अधिक नहीं रह सकता। एक मनुष्य दिनभर में औसतन 20 हजार बार सांस लेते हैं। इसके दौरान मानवं 35 पौंड वायु का प्रयोग करता है। अगर यह प्राण देने वाली वायु शुद्ध नहीं होगी तो यह प्राण देने के बजाए प्राण ले लेगी। वायुमंडल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन-डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड इत्यादि गैसें एक निश्चित अनुपात में होती हैं जब इनके संतुलन में परिवर्तन आता है तब वायुमंडल अशुद्ध हो जाता है। वायु में जब ज़हरीले तथा अनचाहे पदार्थ घुलकर वायु को दूषित कर देते हैं तब वह हवा मनुष्य स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर बुरा प्रभाव डालती है।

वायु प्रदूषण के स्रोत (Sources of Air Pollution)-

1. प्राकृतिक स्रोत (Natural Sources) ज्वालामुखी विस्फोट के कारण निकली गैसों तथा साथ उड़ रही धूल, रेत, जंगलों को लगी आग इत्यादि।

2. मानव द्वारा पैदा किये स्रोत (Man Made Sources)-औद्योगिक क्रियाओं द्वारा निकलने वाले धुएं, मनुष्य द्वारा लगाए गए कूड़े के ढेर, खाना इत्यादि बनाने के लिए लगाई आग, वाहनों के प्रयोग से निकला धुआं इत्यादि। हमारी 85% वायु को कार्बन के ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, सल्फर के ऑक्साइड, वायु में मौजूद धूल कण, कार्बन के यौगिक, इत्यादि दूषित कर रहे हैं।

हवा प्रदूषण के कारण (Causes of Air Pollution)—विश्व की बढ़ती जनसंख्या ने प्राकृतिक साधनों का अधिक प्रयोग किया है। औद्योगीकरण के कारण बड़े-बड़े बंजर बनते जा रहे हैं। इन शहरों तथा नगरों में जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसके साथ शहरों, नगरों में रहने के लिए स्थान की समस्या आ रही है। इस समस्या को सुलझाने के लिए लोगों ने बस्तियों का निर्माण किया तथा वहाँ जलनिकासी नालियां इत्यादि का अच्छी बंदोबस्त न होने के कारण गंदी बस्ती में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। उद्योगों में से निकलने वाला धुआं, किसानों द्वारा रसायनों का प्रयोग से वायु के प्रदूषण में वृद्धि हो रही है।

उद्योगों में जीवाश्म ईंधन (Use of Fossil Fuels in Industries) अधिकतर वायु प्रदूषक औद्योगिक क्रियाओं कारण पैदा होते हैं। इनसे कुछ उद्योगों में जीवाश्म ईंधन की प्रक्रिया के कारण ओज़ोन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड इत्यादि गैसें निकलती हैं जो वायु को दूषित करती हैं।

घरों को गर्म रखने के लिए कई प्रकार के ईंधन (Fossil Fuels) का प्रयोग जैसे तेल, गैस, कोयला इत्यादि किया जाता है। इनके ईंधन का अर्थ है कि महत्त्वपूर्ण प्रदूषक सल्फर डाइऑक्साइड का पैदा होना। यदि घरों को गर्मी देने के लिए बिजली का प्रयोग किया जाता है तो जो बिजली पैदा करने वाले प्लांट हैं उनको चलाने के लिए भी इन जीवाश्म ईंधनों का ही प्रयोग किया जाता है जिसके साथ वायु प्रदूषित हो जाती है।

ज्वालामुखी इत्यादि के फटने के साथ वायु में कई जहरीली गैसें मिल जाती हैं। सल्फर डाइऑक्साइड इनमें ही एक गैस है जो ज्वालामुखी के फटने से निकलती है। इसके अतिरिक्त जंगलों को लगी आग के कारण कई प्रदूषक वायु में मिल जाते हैं जिसके साथ वायु दूषित हो जाती है।

वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution)-
1. जब वायुमंडल में लगातार कार्बन-डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन इत्यादि मिलते रहते हैं तब स्वाभाविक ही है कि ऐसे प्रदूषित पर्यावरण में साँस लेने के साथ साँस से संबंधित बिमारियां होने लगती हैं। इसके साथ ही घुटने, सिरदर्द, आँखों का दर्द, आँखों में जलने इत्यादि बिमारियों का सामना मनुष्य को करना पड़ता है।

2. वाहनों तथा कारखानों से निकलते धुएं में सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा होती है जो कि पहले सल्फाइड तथा बाद में सल्फ्यूरिक अम्ल में बदल जाती है तथा फिर वायु में बूंदों के रूप में रहती है। वर्षा के दिनों में यह वर्षा के जल के साथ धरती पर गिरती है जिसके साथ भूमि की उत्पादन शक्ति कम हो जाती है साथ ही सल्फर डाइऑक्साइड के कारण दमा इत्यादि रोग हो जाते हैं।

3. कुछ रासायनिक गैसें वायुमंडल में पहुंच कर वायु में ओज़ोन मंडल के साथ क्रिया करके उसकी मात्रा को कम कर देती है। ओजोन मंडल ब्रह्मांड से आने वाले हानिकारक विकिरणों को रोकती है। हमारे लिए ओज़ोन मंडल एक ढाल का काम करती है। पर जब ओज़ोन मंडल की कमी होगी तब स्किन कैंसर जैसे भयानक रोग भी हो सकते हैं।

4. वायु प्रदूषण का असर भवनों, स्मारकों इत्यादि पर भी होता है जैसे कि ताजमहल को खतरा मथुरा तेल शोधन कारखाने से हुआ है।

5. वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर कम होना भी प्राणियों के लिए खतरनाक है क्योंकि ऑक्सीजन भी प्राणियों के लिए आवश्यक है।

6. उद्योगों, खनन, पॉलिश, सूती वस्त्र उद्योग इत्यादि से निकलने वाले धूलकण भी वायु का प्रदूषण फैलाते हैं।

वायु प्रदूषण को रोकने के सुझाव (Measures to Control Air Pollution)-

  • कारखानों को शहरी क्षेत्रों से दूर स्थापित करना चाहिए। साथ ही ऐसी तकनीक का प्रयोग करना चाहिए जिसके साथ धुएं का अधिकतर भाग बाहर न निकले तथा फालतू पदार्थ तथा अधिक गैसों की मात्रा वायु में न मिल सके।
  • जनसंख्या शिक्षा के उचित प्रबंध भी किए जाने चाहिए ताकि जनसंख्या की वृद्धि को रोका जा सके।
  • शहरीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए गाँव तथा कस्बों में रोज़गार के अच्छे उद्योगों तथा अन्य सुविधाओं की उपलब्धि करवानी चाहिए।
  • वाहनों में से निकलते धुएं को इस तरह समायोजित करना चाहिए कि कम से कम धुआं बाहर निकले।
  • सौर ऊर्जा की तकनीक को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • इस प्रकार के ईंधन का प्रयोग करने का सुझाव देना चाहिए जिसके प्रयोग करने के साथ उसका पूरा ऑक्सीकरण हो जाए तथा धुआं कम से कम निकले।
  • जंगलों की हो रही अंधा-धुंध कटाई को रोका जाना चाहिए। इस काम के लिए सरकार के साथ-साथ स्वयं सेवी संस्थाओं तथा हर एक मानव को आगे आना चाहिए तथा जंगलों की कटाई को रोकना चाहिए।
  • शहरों तथा नगरों में फालतू पदार्थों के निकास के लिए सीवरेज हर स्थान पर होने चाहिए।
  • बच्चों के पाठ्यक्रम में इस विषय प्रति चेतना जागृति करनी बहत आवश्यक है इसकी जानकारी इस कारण होने वाली हानियों के प्रति मानव समाज को सचेत करने के लिए दूरदर्शन, रेडियो, अखबारों इत्यादि के माध्यम द्वारा देनी चाहिए।
  • ताप या उत्प्रेरक ईंधन के साथ प्रदूषित कणों को रोकना चाहिए ताकि उनका नुकसान कम हो।

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प्रश्न 4.
सिआचिन का शाब्दिकार्थ क्या है ? इसका महत्त्व तथा भारत के पक्ष के बारे में वर्णन करो।
उत्तर-
बलोचिस्तान के पास पड़ते क्षेत्र में बलती भाषा में ‘सिआ’ का अर्थ है कि एक प्रकार का जंगली गुलाब तथा ‘चिन’ का अर्थ है ‘बहुतांत’। इस तरह सिआचिन का अर्थ है बड़ी मात्रा में ‘गुलाब के फूल’। सिआचिन ग्लेशियर हिमालय की पूर्वी कराकोरम पर्वतमाला में भारत-पाक नियंत्रण रेखा के पास लगभग स्थिति एक (हिमानी) ग्लेशियर है। यह कराकोरम के पांच ग्लेशियरों में सबसे बड़ा ग्लेशियर है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई इसके स्रोत इंदिरा कोल पर लगभग 5,753 मीटर है तथा सिआचिन ग्लेशियर पर 1984 से भारत का नियंत्रण है तथा भारत जहाँ अपने जम्मू तथा कश्मीर राज्य के लद्दाख खंड के लेह जिले के अधीन प्रशासन करता है। पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर भारत के नियंत्रण का अंत करने के लिए असफल यत्न किए हैं पर वर्तमान में भी सिआचिन विवाद जारी रहा है। भारत तथा पाकिस्तान दोनों ही जहाँ अपने अधिकार का दावा करते हैं। सिआचिन ग्लेशियर का इलाका असल में भारत की दो विवादग्रस्त सीमाओं लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) तथा लाइन ऑफ ऐक्चूअल कंट्रोल (LOAC) की भूमि है।

सिआचिन ग्लेशियर की महत्ता (Importance of Siachan Glacier)-

  • यह ग्लेशियर प्रसिद्ध नूबरा तथा सिंध नदियों को जल प्रदान करने वाला एक बड़ा स्रोत है।
  • सिआचिन ग्लेशियर एक ऐसा स्रोत है जिससे भारतीय उपमहाद्वीप को ताजा जल मिलता है। यह वह स्थान है · जहां नूबर नदी निकलनी शुरू होती है तथा सिंध नदी जो पंजाब के कई क्षेत्रों को कृषि की सिंचाई के लिए जल प्रदान करती है या यहाँ जल लेती है।
  • सिआचिन ग्लेशियर का धुर उत्तरी इंदिरा कोल का क्षेत्र पाकिस्तान की तरफ से गैर-कानूनी ढंग से चीन को दिए गिलगिट-वालिस्तान का क्षेत्र की सरगर्म घाटी पर नज़र रखने के लिए अच्छा स्थान है।
  • चीन की दिलचस्पी भी सिआचिन को हासिल करने की है, क्योंकि चीन पाकिस्तान गठजोड़ में अच्छी भूमिका अदा कर सकता है।
  • यह ग्लेशियर पाकिस्तानी सैनिकों को भी सैल्टरी कंधों की ऊंचाई वाले पश्चिमी हिस्से का रणनीतिक लाभ भी देता है तथा साथ ही लद्दाख की सीओंक घाटी में घुसपैठ को रोकता है।
  • सिआचिन पर कब्जा होने की कोई अवस्था अक्साइचिन तथा अरुणाचल प्रदेश के मुद्दों पर भी प्रभाव डाल सकता है।
  • सिआचिन पर अधिकार होने का मुख्य आधार जम्मू तथा कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के ज़िले पर भारतीय क्षेत्र कारण है।
  • सन् 1949 में हुआ कराची का समझौता (भारत + पाक) जिसके अनुसार ‘गोलाबन्दी रेखा’ को आगे भाव ग्लेशियरों के उत्तर में NJ9842 प्वाईंट।
  • 1972 में हुए शिमला समझौते में 1949 की कंट्रोल रेखा के संबंध पर कोई बदलाव नहीं किया गया।

भारत का पक्ष (India’s Concern)-सिआचिन ग्लेशियर भारत का क्षेत्र है इसमें कोई शक नहीं है। इस क्षेत्र की सीमाबंदी की जानी अभी बाकी है। इस ग्लेशियर पर कब्जे के लिए सैनिकों की जिंदगी तथा अन्य स्रोतों के नुकसान हमेशा सवाल खड़ा करते रहे हैं पर ऐसी कठिनाइयों के बाद भी भारत सरकार तथा भारतीय फौज के फैसलों तथा ज़ज्बे की अन्य कोई मिसाल ढूंढनी मुश्किल है। सिआचिन के देख-रेख के लिए, इस प्राकृतिक स्रोत के स्थान की सुरक्षा के लिए सैनिकों की तथा पर्वतीय देख-रेख दलों की आवश्यकता तो हमेशा ही रहेगी क्योंकि भारत तथा पाकिस्तान दोनों ही इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा रहे हैं। 1970, 1980 से लगातार एक लाइन NJ9842 करोकोरम दरों से दिखाई दे रही है जिसके बारे में भारत का विचार था कि यह एक कारटोग्राफिक नुक्स है तथा शिमला समझौते के विरोध का कारण बनी है। 1984 ई० में भारत ने ऑपरेशन मेघदूत चलाया जो कि एक सैनिक ऑपरेशन था जो भारत का सिआचिन ग्लेशियर पर उसको उसका कब्जा दिया है।

1984 से 1999 तक भारत और पाकिस्तान के बीच काफी मुठभेड़ हुए। भारत के सैनिकों की तरफ से सिआचिन ग्लेशियर पर हर समय लगे रहने की सैनिक कारवाई को ऑपरेशन मेघदूत का नाम दिया जाता है। सिआचिन ग्लेशियर पर कब्जे का मामला सियासी भी था तथा राजनीतिक स्तर पर भी हल मांग रहा है पर पिछले कुछ सालों में यह मुद्दा तथा क्षेत्र सिर्फ एक सैनिक कार्रवाई का आधार बन गया है। भारत ने सिआचिन पर अपनी अस्तित्व की प्रारंभिक संरचना पूरी तरह तैयार कर ली है तथा यह दावा करने वाले दोनों पक्षों भाव चीन तथा पाकिस्तान से अधिक अच्छा स्थिति में पहुंच गया है। भारतीय सेना क्षेत्र के प्राकृतिक स्रोतों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़खानी करने को छोड़कर उनकी रक्षा कर रही है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 8 चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र

प्रश्न 5.
1960 की सिंध जल संधि पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
सिंध जल संधि जल के वितरण को लेकर भारत तथा पाकिस्तान के बीच हुई थी। इस संधि पर कराची में 19 सितंबर, 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के अनुसार तीन पूर्वी नदियों-व्यास, रावी, तथा सतलुज का नियन्त्रण भारत के पास तथा पश्चिमी नदियों-सिंध, चिनाब तथा जेहलम का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया। पर इनके बीच विवादग्रस्त प्रावधान था जिसके अनुसार जल का वितरण किस प्रकार किया जाएगा यह अभी निश्चित होना है, क्योंकि पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों का प्रवाह पहले भारत से होकर आता है। संधि के अनुसार भारत को उनका उपभोग सिंचाई के लिए तथा बिजली के उत्पादन के लिए किए जाने की मन्जूरी दे दी गई। सिंध जल संधि के बाद सिंध नदियों के जलतंत्र के जल की पूरी तथा विश्वसनीय प्रयोग करने के लिए आपसी नेक नीति तथा दोस्ताना जज्बे के साथ हदबंदी पर विभाजन हो सके। एकदूसरे के हक तथा ज़िम्मेदारी को ध्यान में रखा गया तथा आपसी सहयोग के साथ इन नदियों के जल का प्रयोग किया जा सके।

सिंध नदी सिस्टम में तीन पश्चिमी नदियां सिंध, जेहलम तथा चिनाब तथा तीन पूर्वी नदियां सतलुज, ब्यास तथा रावी शामिल हैं। इस संधि के अनुसार रावी, ब्यास तथा सतलुज पूर्वी नदियां पाकिस्तान के प्रवेश करने से पूर्व इन नदियों का जल बेरोक-टोक भारत को प्रयोग की मन्जूरी मिल गई। भारत ने 1960 से 1970 तक के दशक में तथा 1973 तक नहर प्रबंध को पूरी तरह से निर्माण कर लेने तक पूर्वी नदियों के पानी को छुआ तक भी नहीं था। पूर्वी नदियों का जल पाकिस्तान के क्षेत्र में दाखिल हो जाने के बाद पाकिस्तान को उनके प्रयोग की खुली स्वतन्त्रता का हक मिल गया। धारा-III जो कि पाकिस्तान के पश्चिमी नदियों के बारे में है। इसके अनुसार इनके जल के बेरोक प्रयोग का हक पाकिस्तान को है। पर भारत की ज़िम्मेदारी है कि इन नदियों का सारा जल बहने दिया जाए।

सिर्फ 4 स्थितियों के अतिरिक्त बिना घरेलू प्रयोग के, किसी ऐसे उपयोग के लिए प्रयोग जिससे पानी खत्म न हो, कृषि के लिए, बिजली के उत्पादन के लिए। पाकिस्तान की तरह भारत को आजादी है कि वह पश्चिमी नदियों के जल पर पानी की 3.6 MAF मात्रा तक भंडारण कर सकता है पर ऐसे भंडारण में 0.5 MAF जल हर साल छोड़ कर और इकट्ठा करना होगा। सिंध जल संधि, नदियों के बेसिन के विभाजन के पक्ष से पक्षीय विभाजन का एक नमूना है. जो कि दो देशों के इंजीनियरों तथा इंजीनियरी विभाजन का ही एक दस्तावेज है। संधि वास्तव में नदियों के पानी के दोहरे प्रबंध के लिए होनी चाहिए थी पर आपसी झगड़े विभाजन की कड़वाहट ने दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे पर शक करने वाला बना बना दिया था। जिस कारण संधि की शर्तों में अधिकार कम तथा प्रतिबन्ध अधिक लिखे गए थे। जिस कारण जम्मू तथा कश्मीर में इस संधि के खिलाफ निराशा फैल गई क्योंकि इस संधि में लोगों की इच्छाओं को नज़रअंदाज किया गया था। यह संधि लोग विरोधी तथा एक तरफ की संधि थी। जिस पर दुबारा से विचार करना बहुत आवश्यक था।

सन् 1960 के बाद पानी की 159 MAF तक की मात्रा में कमी आ गई थी तथा 17MAF रह गई। जिस कारण जम्मू तथा कश्मीर के लोगों को चिंता हो गई। एक अनुमान के अनुसार सन् 2050 तक सिंध का जलतंत्र तथा भारतीय ‘नदियों के पानी की मात्रा में 17 प्रतिशत तक की कटौती का अनुमान लगाया गया तथा पाकिस्तान में पहुँच रहे जल में 27% तक की कमी के अनुमान लगाये गए। मौसमी परिवर्तन के कारण जैसे कि बर्फ का कम टिकना इत्यादि के कारण राष्ट्रीय स्वामित्व तथा प्रबंध सिंध बेसिन की प्राकृतिक सामूहिक एकता बनाने के लिए तथा प्राकृतिक सामूहिक एकता बनाने के प्रयास किए जाने की मांग बढ़ गई।

दक्षिणी एशिया के क्षेत्रों में रोज़ाना बदल रहे मौसम के नज़रिए के कारण, बाँध तथा सिंचाई योजनाओं निर्माण की ज़रूरत में वृद्धि हो गई पर यह कार्रवाई हर पक्ष से पूर्ण होनी ज़रूरी है। भारत ने जल संधि को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है तथा तीन लड़ाइयां, आतंकवाद तथा अन्य युद्ध तथा ठंडे संबंधों के बाद भी भारत ने इस संधि की शर्तों को भंग नहीं किया। भारत ने अपना आप खोकर भी इस संधि की रक्षा की तथा सारी शर्तों की पालना की, क्योंकि-

  • पाकिस्तान के क्षेत्र में पड़ने वाली पश्चिमी नदियों का जल अधिक है तथा पाकिस्तान का 80 प्रतिशत जल पर अधिकार है तथा इस जल की मात्रा कहीं कम है।
  • 9.7 लाख एकड़ भूमि पर जम्मू तथा कश्मीर के क्षेत्र पर पाबंदी भी लगाई गई कि वह इस भूमि को कृषि के लिए प्रयोग नहीं करेंगे।
  • भारत को इस संधि के द्वारा सिंचाई तथा बिजली उत्पादन के लिए जितना भी जल मिला उसके साथ भारत की जरूरतें कभी पूरी नहीं हुईं।
  • भारत में बनाई गई कोई भी क्षेत्रीय योजना का 1960 की संधि के अनुसार परीक्षण किया जाएगा तथा पश्चिमी नदियों के किनारों के नज़दीक लाई गई हर एक ईंट के बारे में भी प्रसिद्ध पर्यावरण विदों तथा राष्ट्रीय संस्थाओं की सलाह (परामर्श) अनुसार कार्रवाई की गई है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 8 चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र

चुनिन्दा परिप्रेक्ष्य (मुद्दों) तथा भौगोलिक दृष्टिकोण पर एक नज़र PSEB 12th Class Geography Notes

  • मानवीय जीवन के भौगोलिक दृष्टिकोण से किए अध्ययन को मानव भूगोल कहते हैं। सारे विश्व में मानवीय जीवन एक जैसा नहीं होता।
  • सिआचिन ग्लेशियर 35°5′ अक्षांश से 76°9′ पूर्वी देशांतर पर स्थित है। यहां सर्दियों में 35 फुट के करीब बर्फवारी होती है तथा तापमान 50°C तक पहुँच जाता है। इस ग्लेशियर का ज्यादातर हिस्सा भारत तथा पाकिस्तान के मध्य कंट्रोल रेखा के अंतर्गत आता है।
  • 1972 के शिमला समझौते के अनुसार 1949 में कंट्रोल रेखा से संबंधित समझौते के बारे में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता।
  • गुजरात तथा पाकिस्तान के सिंध के प्रांतों में एक दलदली खाड़ी सरकरीक है। 1914 के समझौते के अनुसार सरकरीक का सारा इलाका पाकिस्तान का होना चाहिए। यह सीमान्त दोनों देशों के मध्य एक गंभीर मसला है।
  • पर्यावरण प्रदूषण मुख्य रूप में तीन प्रकार का होता है-भूमि प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण।
  • पृथ्वी पर भौतिक पर्यावरण में जब कुछ ज़हरीले पदार्थ तथा रसायनों की मात्रा बढ़ जाती है तथा ये पदार्थ भूमि, हवा, जल को अयोग्य बना देते हैं तो इसे प्रदूषण कहते हैं।
  • भूमि प्रदूषण का मुख्य कारण, जंगलों की अंधा-धुंध कटाई, कीटनाशकों का अधिक प्रयोग, शहरीकरण इत्यादि। हम 22 अप्रैल को राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस मनाते हैं।
  • जल में रसायनों के मिलने के कारण पानी दूषित हो जाता है, इसको जल प्रदूषण कहते हैं।
  • कई तरह के तेज़ाब, ज़हरीले नमक, धातु इत्यादि भी पानी को प्रदूषित करते हैं तथा पानी पीने योग्य नहीं रहता।
  • भारत सरकार ने गंगा नदी को साफ़ रखने के लिए ‘नमामि गंगा’ नामक मिशन का आगाज़ किया है।
  • वायु में जहरीले पदार्थों तथा अनचाहे पदार्थों के मिलने से वायु दूषित हो जाती है। इसके प्रमुख स्रोत हैंरेत, जंगलों को लगी आग, कार्बन के आक्साइड, हवा में धूलकण, धूल, धुआं, ओज़ोन, सल्फ्यूरिक एसिड इत्यादि।
  • पृथ्वी पर विज्ञान मंत्रालय भारत सरकार ने सफर प्रकल्प शुरू किया जो विश्व मौसम विभाग की संस्थाओं भारत के महानगरों का स्तर आंकते हैं।
  • प्राकृतिक तथा मानवीय प्रक्रियाओं के स्थानीय विभाजन की प्रशंसा जिसका उद्देश्य प्राप्तियों का एहसास, सार्थक ढंग से करवाना भौगोलिक सर्वोच्चता कहलाती है।
  • मानव भूगोल-मानवीय जीवन के भौगोलिक दृष्टिकोण से किए जाने वाले अध्ययन को मानवीय भूगोल , कहते हैं।
  • सिआचिन ग्लेशियर-सिआदिन का अर्थ है-बड़ी संख्या में ‘गुलाब के फूल’। सिआचिन ध्रुवीय इलाकों के अतिरिक्त दूसरे नंबर का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। यह हिमालय पर्वतों की पूर्वी कराकुरम श्रृंखला में 35°5′ उत्तरी अक्षांश तथा 76°9’ पूर्वी देशांतर पर स्थित है।
  • कच्चातिवु—कच्चातिवु श्रीलंका में पड़ने वाला एक विवादों में घिरा वह टापू है जो कि 285.2 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • प्रदूषण–भौतिक पर्यावरण में जब कुछ ज़हरीले पदार्थों तथा रसायनों में वृद्धि होती है जो कि जल, वायु तथा मिट्टी को अयोग्य बना जाते हैं, इसको प्रदूषण कहते हैं।
  • भू-प्रदूषण के स्रोत-कारखानों से निकले जहरीले पदार्थ-पारा, सीसा, तांबा, जिंक, साइनाइड, तेज़ाब, कीटनाशक इत्यादि।
  • चार R-Refuse, Reuse, Recycle and Reduce
  • जल प्रदूषण-जब जल में कुछ रसायन तथा घरेलू कचरा इत्यादि पदार्थ मिल जाते हैं तब पानी दूषित हो जाता है जिसको जल प्रदूषण कहते हैं।
  • वायु प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत-ज्वालामुखी विस्फोट के कारण निकले पदार्थ-रेल, धूल तथा जंगलों को – लगने वाली आग इत्यादि कारणों के कारण हवा दूषित हो जाती है।
  • PM10 मोटे कण 10 माइक्रोमीटर तक ये कण फेफड़ों तक जाकर मनुष्य की मौत का कारण बन सकते हैं।
  • भारत की औसत मध्यम आयु 29 साल है जबकि जापान में 49 साल तथा यू०एस०ए० में मध्यम आयु करीब 38 साल है।
  • भारत के पास विश्व का 9.6 प्रतिशत जल संसाधन है।
  • पंजाब के हर शहर, गाँव तथा बस्ती में एक महिला स्वास्थ्य संघ स्थापित है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science Geography Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप

SST Guide for Class 7 PSEB पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में लिखें

प्रश्न 1.
धरती की कितनी पर्ते हैं? इनके नाम लिखो।
उत्तर-
धरती की तीन पर्ते हैं-स्थल मण्डल, मैंटल तथा केन्द्रीय भाग। इन्हें क्रमशः सियाल, सीमा तथा नाइफ कहा जाता है।

प्रश्न 2.
धरती पर कितनी प्रकार की चट्टानें पाई जाती हैं?
उत्तर-
धरती पर कई प्रकार की चट्टानें (शैलें) पाई जाती हैं। निर्माण के आधार पर चट्टानें तीन प्रकार की होती हैं-आग्नेय चट्टानें, तलछटी या तहदार चट्टानें तथा परिवर्तित चट्टानें।

प्रश्न 3.
धरती के मैंटल भाग के बारे में लिखो।
उत्तर-
पृथ्वी की ऊपरी पर्त के नीचे पृथ्वी का मैंटल भाग है। इसकी सामान्य मोटाई 2900 किलोमीटर है। इनको दो भागों में बांटा जाता है-ऊपरी मैंटल और निचली मैंटल।

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प्रश्न 4.
धरती की सियाल परत को इस नाम से क्यों पुकारा जाता है?
उत्तर-
धरती की सियाल परत में सिलिकॉन (Si) तथा एल्युमीनियम (AI) तत्त्वों की अधिकता है। इसी कारण इस परत को सियाल (Si + Al = SIAL) कहा जाता है।

प्रश्न 5.
धरती के आन्तरिक भाग (परत) को क्या कहते हैं? यह कौन-कौन से तत्त्वों की बनी हुई है?
उत्तर-
पृथ्वी के आन्तरिक भाग को ‘नाइफ़’ कहते हैं। यह परत निक्कल तथा लोहे से बनी है।

प्रश्न 6.
धरती के भूमि कटाव से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर-
धरती को निम्नलिखित उपायों द्वारा भूमि कटाव से बचाया जा सकता है –

  1. अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाकर
  2. खेतीबाड़ी के अच्छे ढंग अपनाकर
  3. पशुओं की चराई को घटाकर।

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(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 50-60 शब्दों में दो।

प्रश्न 1.
अग्नि (आग्नेय) चट्टानें किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार की हैं? अंतर्वेदी (अंतर्वेधी) चट्टानों के बारे में लिखो।
उत्तर-
अग्नि (आग्नेय) चट्टान वह चट्टान है जिसका निर्माण मैग्मा तथा लावा के ठण्डा होने से हुआ है। ये चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-अंतर्वेदी (अन्तर्वेधी) चट्टानें तथा बाहरवेदी (बहिर्वेधी) चट्टानें।

अन्तर्वेधी आग्नेय चट्टानें-कभी-कभी मैग्मा पृथ्वी के अन्दर ही धीरे-धीरे ठण्डा होकर जम जाता है। इस प्रकार बनी चट्टानों को अन्तर्वेधी आग्नेय चट्टानें कहते हैं। ये चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-पातालीय आग्नेय चट्टानें तथा . मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानें।

1. पातालीय आग्नेय चट्टानें-जब पृथ्वी के आन्तरिक भाग में मैग्मा बहुत अधिक गहराई पर चट्टान का रूप ले लेता है, तो उस चट्टान को पाताली अग्नि (पातालीय आग्नेय) चट्टान कहा जाता है। ग्रेनाइट इसी प्रकार की चट्टान है ।

2. मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानें-कभी कभी मैग्मा पृथ्वी के मध्य भागों की दरारों में जम जाता है। इस प्रकार जो चट्टानें बनती हैं उन्हें मध्यवर्ती अग्नि (आग्नेय) चट्टानें कहते हैं। डाइक तथा सिल इन चट्टानों के उदाहरण हैं।

प्रश्न 2.
पर्तदार (सतहदार) चट्टानें किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार की हैं?
उत्तर-
पर्तदार (सतहदार) चट्टानें वे चट्टानें हैं जो पर्तों (परतों) के रूप में पाई जाती हैं। ये अनाच्छादन के कारकों की जमाव क्रिया से बनती हैं। ये जमाव पृथ्वी के निचले स्थानों पर पाए जाते हैं।
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप 1
पृथ्वी के तल पर वर्षा, वायु, गर्मी, सर्दी, नदी तथा हिमनदी के कारण शैलें टूटती रहती हैं। नदी-नाले इन टूटे हुए शैल कणों को अपने साथ बहाकर ले जाते हैं। जब ये नदी-नाले समुद्र में जाकर गिरते हैं तो सारा तलछट समुद्र की तह में जमा हो जाता है। वायु भी अनेक शैल कण उड़ाकर समुद्र में फेंकती है। समुद्र में जमा होने वाली इस सामग्री को तलछट अथवा अवसाद कहते हैं। समय बीतने के साथ-साथ नदियां तलछट की परतों पर परतें बिछाती रहती हैं। लाखों वर्षों के पश्चात् दबाव के कारण तलछट की परतें कठोर हो जाती हैं और तलछटी अथवा तहदार चट्टानों का रूप धारण कर लेती हैं। रचना के आधार पर तलछटी शैलें दो प्रकार की होती हैं-जैविक तथा अजैविक।

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प्रश्न 3.
रूपान्तरित चट्टानों के बारे में लिखो, इन चट्टानों के प्रमुख उदाहरण दो।
उत्तर-
धरती के अंदर ताप एवं दबाव या दोनों के संयुक्त प्रभाव के कारण, आग्नेय और तहदार चट्टानों के रंग, रूप, संरचना, कठोरता आदि में परिवर्तन आ जाता है। इन परिवर्तनों के कारण मूल रूप से बदल जाने वाली इन चट्टानों को परिवर्तित या रूपान्तरित चट्टानें कहते हैं। रूपान्तरण दो प्रकार का होता है, तापीय और क्षेत्रीय।

तापीय रूपान्तरण-जब दरारों और नालियों आदि में बहता हुआ मैग्मा चट्टानों के सम्पर्क में आता है, तो वह अपने उच्च तापमान के कारण उनको पिघला देता है। इसे तापीय रूपान्तरण कहते हैं।

क्षेत्रीय रूपान्तरण-किसी बड़े क्षेत्र में ऊपर की चट्टानों के अत्यन्त दबाव के कारण नीचे की चट्टानों के मूल रूप में परिवर्तन आ जाता है। इसे क्षेत्रीय रूपान्तरण कहते हैं।
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप 2

प्रश्न 4.
धरती में मिलने वाले खनिज पदार्थों का वर्गीकरण करो।
उत्तर-
धरती में पाये जाने वाले खनिजों को निम्नलिखित तीन वर्गों में बांटा जा सकता है –

  1. धात्विक खनिज-इन खनिजों में धातु के अंश होते हैं। लोहा, तांबा, टिन, एल्युमीनियम, सोना, चांदी आदि खनिज धात्विक खनिज हैं।
  2. अधात्विक खनिज-इन खनिजों में धातु के अंश नहीं होते। सल्फर (गंधक), अभ्रक, जिप्सम, पोटाश, फॉस्फेट आदि खनिज अधात्विक खनिज हैं।
  3. शक्ति खनिज-इन खनिजों से ज्वलन शक्ति तथा ऊर्जा प्राप्त होती है। इस ऊर्जा से कारखाने, मोटरगाड़ियां आदि चलाई जाती हैं। इन खनिजों में कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि शामिल हैं।

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प्रश्न 5.
अभ्रक (अबरक) किस प्रकार का खनिज है? यह कौन से काम आता है?
उत्तर-
अभ्रक (अबरक) एक अधात्विक खनिज है। इसके कई लाभ हैं जिसके कारण यह एक महत्त्वपूर्ण खनिज बन गया है।

  1. इस खनिज का अधिकतर उपयोग बिजली का सामान बनाने में किया जाता है।
  2. इसका उपयोग लैंप की चिमनियों, रंग-रोगन, रबड़, कागज़, दवाइयों, मोटरों, पारदर्शी चादरों आदि के निर्माण . में किया जाता है।
  3. अभ्रक की पतली शीटें बिजली की मोटरों और गर्म करने वाली वस्तुओं में ताप नष्ट होने और करंट लगने से बचाव के लिए डाली जाती हैं।

प्रश्न 6.
तरल सोना किसे कहते हैं? इसके बारे में संक्षिप्त जानकारी दें।
उत्तर-
तरल सोना खनिज तेल को कहा जाता है। इसे यह नाम इसलिए दिया जाता है क्योंकि यह एक तरल खनिज है और बहुत ही उपयोगी है। इसे पेट्रोलियम अथवा चालक शक्ति भी कहते हैं। क्योंकि खनिजों की तरह इसे भी धरती में से निकाला जाता है, इसलिए इसे खनिज तेल कहा जाता है। इसे पेट्रोलियम नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि यह दो शब्दों-पेट्रो और उलियम के जोड़ से बना है। लातीनी भाषा में पैट्रो का अर्थ होता है चट्टान और उलियम का अर्थ होता है-तेल। इस प्रकार पेट्रोलियम का शाब्दिक अर्थ चट्टान से प्राप्त खनिज तेल है। यह वनस्पति और मरे हुए जीव-जन्तुओं के परतदार चट्टानों के बीच दब जाने से बना है।

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प्रश्न 7.
पृथ्वी पर मिट्टी का क्या महत्त्व है? इसके बारे में लिखो ।
उत्तर-
मिट्टी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमि साधन है। मिट्टी का महत्त्व इसकी उपजाऊ शक्ति में निहित है। उपजाऊ मिट्टी सदैव मनुष्य को आकर्षित करती रही है, क्योंकि मनुष्य को भोजन की वस्तुएं इसी से प्राप्त होती हैं। यही कारण है कि मनुष्य आरम्भ से ही उपजाऊ भूमियों पर रहना पसन्द करता है। प्राचीन सभ्यताओं का जन्म एवं विकास भी संसार की उपजाऊ नदी-घाटियों में ही हुआ है। इसमें सिन्ध, नील, दजला-फरात, यंगसी घाटियों का विशेष योगदान रहा है। आज भी उपजाऊ नदी-घाटियों और मैदानों में ही घनी जनसंख्या पाई जाती है। भारत अपनी उपजाऊ मिट्टी के कारण ही इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए भोजन पैदा करने में समर्थ हो सका है।

प्रश्न 8.
भारत में लोहा, कोयला व पैट्रोलियम कहां-कहां पाया जाता है ?
उत्तर-
भारत में ये खनिज क्रमश: निम्नलिखित प्रदेशों में पाया जाता है –

  1. लोहा- भारत में लोहा उड़ीसा, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक तथा गोवा में पाया जाता है।
  2. कोयला- भारत में कोयला मुख्य रूप से दामोदर घाटी में पाया जाता है। इसके अन्य उत्पादक प्रदेश पश्चिम बंगाल तथा मध्य प्रदेश हैं।
  3. पैट्रोलियम-पैट्रोलियम मुख्य रूप से भारत के तटीय क्षेत्रों में मिलता है। इसके मुख्य उत्पादक राज्य गुजरात, असम तथा महाराष्ट्र हैं।

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(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125-130 शब्दों में दो।

प्रश्न 1.
धरती पर मिलने वाली चट्टानों (शैलों) के बारे में विस्तार से लिखें।
उत्तर-
पृथ्वी की ऊपरी पर्त जिन पदार्थों से मिलकर बनी है, उन सभी पदार्थों को शैल कहते हैं। शैलें पत्थर की तरह कठोर भी होती हैं और रेत की तरह नर्म भी। कुछ शैलें बहुत कठोर होती हैं और देर से टूटती हैं। कुछ शैलें नर्म होती हैं और शीघ्र टूट जाती हैं। शैलें तीन प्रकार की होती हैं –

1. आग्नेय शैलें-आग्नेय का अर्थ होता है-आग या अग्नि से सम्बन्धित। यहां अग्नि से भाव है-उच्च तापमान अथवा गर्मी से है। आग्नेय शैलें पृथ्वी की आन्तरिक गर्मी से बनती हैं। इसलिए इनका नाम आग्नेय शैलें पड़ गया है। पृथ्वी के भीतरी भाग में बहुत गर्मी होती है। यहां सब पदार्थ पिघली हुई अवस्था में होते हैं। इन पिघले हुए पदार्थों को मैग्मा कहते हैं। पृथ्वी के बाहर आने वाले मैग्मा को लावा कहा जाता है। बाहर निकलने पर गर्म लावा धीरे-धीरे ठण्डा होकर ठोस बन जाता है। इस प्रकार आग्नेय शैलों का निर्माण होता है। आग्नेय शैलें दो प्रकार की होती हैं –
(i) अन्तर्वेधी शैलें तथा
(ii) बहिर्वेधी शैलें।
(i) अन्तर्वेधी शैलें-ये शैलें धरातल के भीतर बनती हैं। ये भी दो प्रकार की होती हैं-पातालीय तथा मध्यवर्ती।
(a) पातालीय आग्नेय शैलें-कई बार लावा धरातल के नीचे ही ठण्डा होकर जम जाता है। धरातल के नीचे बनी इस प्रकार की आग्नेय शैलों को पातालीय आग्नेय शैलें कहा जाता है। ग्रेनाइट इस प्रकार की चट्टान है।
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप 3

(b) मध्यवर्ती आग्नेय शैलें-प्रायः लावा पृथ्वी के धरातल को फाड़कर बाहर निकलने का प्रयास करता है। परन्तु कभी यह धरातल पर नहीं पहुंच पाता और धरातल की दरारों में ही ठण्डा होकर कठोर रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार बनी आग्नेय चट्टानों को मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानें कहते हैं। डाइक, सिल, डोलोराइट आदि आग्नेय शैलों का निर्माण इसी प्रकार होता है।

(ii) बहिर्वेधी शैलें-ये शैलें धरातल पर लावे के ठण्डा होने से बनती हैं।

2. तलछटी या अवसादी शैलें-पृथ्वी के धरातल की शैलें वर्षा, वायु, नदी, हिमनदी और गर्मी-सर्दी के कारण टूटती-फूटती रहती हैं। इनके टूटे-फूटे कणों को नदियां और हिमनदियां अपने साथ बहाकर ले जाती हैं और किसी एक स्थान पर इकट्ठा कर देती हैं। धीरे-धीरे इन कणों की तहें एक-दूसरे पर जमा होने लगती हैं। हज़ारों सालों तक दबाव के कारण ये तहें कठोर हो जाती हैं। इस तरह ये तहें तलछटी चट्टानों का रूप धारण कर लेती हैं। इन शैलों को अवसादी या परतदार शैलें भी कहते हैं। गंगा और सिन्धु का मैदान तथा हिमालय पर्वत भी इसी प्रकार की शैलों से बना है।

3. रूपान्तरित शैलें-ये चट्टानें आग्नेय तथा तहदार चट्टानों की संरचना के रंग-रूप तथा गुण आदि बदलने से बनती हैं। यह रूपान्तरण पृथ्वी के भीतर की गर्मी और दबाव के कारण होता है। उदाहरण के लिए चूने का पत्थर संगमरमर बन जाता है, जो एक रूपान्तरित शैल है। भारत का दक्षिणी पठार रूपान्तरित चट्टानों से बना है।

रूपान्तरित चट्टानें धरातल के नीचे बहुत अधिक गहराई में पाई जाती हैं। ये दो प्रकार से बनती हैं-तापीय रूपान्तरण द्वारा तथा क्षेत्रीय रूपान्तरण द्वारा।
(i) तापीय रूपान्तरण द्वारा-जब गर्म मैग्मा पृथ्वी के भीतर की दरारों तथा नालियों में से गुज़रता है, तो यह अपने सम्पर्क में आने वाली चट्टानों को पका देता है। इसे तापीय रूपान्तर कहते हैं, जिससे रूपान्तरित चट्टानें बनती हैं।

(ii) क्षेत्रीय रूपान्तरण द्वारा-कभी-कभी एक बड़े क्षेत्र में ऊपरी शैलों के दबाव के कारण निचली शैलों का मूल रूप बदल जाता है। इसे क्षेत्रीय रूपान्तरण कहते हैं।

रूपान्तरित चट्टान में मूल चट्टान के कुछ गुण अवश्य रह जाते हैं। उदाहरण के लिए तहदार चट्टान से बनी रूपान्तरित चट्टान भी तहदार होती है। इसी प्रकार आग्नेय चट्टान से बनी परिवर्तित (रूपान्तरित) चट्टान के कुछ गुण मूल चट्टान से मिलते-जुलते होते हैं।

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प्रश्न 2.
खनिज पदार्थ किसे कहते हैं? हमारी धरती पर कौन-से खनिज पदार्थ मिलते हैं? इनका वर्गीकरण करो। धातु खनिजों के बारे में भी जानकारी दें।
उत्तर-
चट्टानों का निर्माण करने वाले पदार्थों को खनिज पदार्थ कहते हैं। इन्हें धरती को खोदकर निकाला जाता है। हमारी धरती पर अनेक प्रकार के खनिज मिलते हैं।
खनिजों का वर्गीकरण-इन खनिजों को तीन वर्गों में बांटा गया है –

  1. धात्विक (धातु) खनिज-इन में धातु के अंश होते हैं। इनमें लोहा, तांबा, टिन, एल्युमीनियम, सोना, चांदी आदि खनिज शामिल हैं।
  2. अधात्विक खनिज-इन खनिजों में धातु का अंश नहीं होता। इनमें सल्फर, जिप्सम, अभ्रक, फॉस्फोरस, पोटाश आदि खनिज शामिल हैं।
  3. शक्ति खनिज-इन खनिजों से ज्वलन शक्ति, ऊर्जा आदि मिलते हैं। इनसे हमारे थर्मल प्लांट, कारखाने, मोटर गाड़ियां आदि चलती हैं। कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि मुख्य शक्ति खनिज हैं।

धात्विक खनिज-मुख्य धात्विक खनिजों का वर्णन इस प्रकार है –
1. लोहा-लोहे का उपयोग छोटी-सी कील से लेकर बड़े-बड़े समुद्री जहाज़ बनाने में होता है। पूरी औद्योगिक मशीनरी, मोटर कारों, रेलों, खेती के लिए मशीनरी आदि का निर्माण भी इसी खनिज पर आधारित है। लोहे और इस्पात ने औद्योगिक क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है। लोहा लगभग संसार के सभी महाद्वीपों में पाया जाता है। भारत में उड़ीसा, झारखण्ड, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और गोवा लोहे के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।

2. तांबा-तांबा मनुष्य द्वारा खोजी गई सबसे पहली धातु थी। इसके औद्योगिक महत्त्व को देखते हुए लोहे के बाद तांबे का ही स्थान आता है। धातु-युग का आरम्भ तांबे के प्रयोग से ही हुआ था। इससे कई प्रकार के बर्तन बनाए जाते हैं। आज के युग में इसका महत्त्व और भी बढ़ गया है। इसका उपयोग बिजली का सामान बनाने के लिए किया जाता है। यह बिजली का सुचालक है। इसी कारण बिजली की तारें अधिकतर तांबे की ही बनाई जाती हैं। टेलीफोन-केबल तारें, रेलवे-इंजन, हवाई-जहाज़ और घड़ियों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
चिली (दक्षिण अमेरिका) संसार में सबसे अधिक तांबा पैदा करता है। दूसरे नम्बर पर संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) आता है। अफ्रीका महाद्वीप में भी तांबे के पर्याप्त भण्डार हैं। इसके अतिरिक्त भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया में भी तांबे का उत्पादन होता है। भारत में झारखण्ड, मध्य प्रदेश, सीमांध्र, राजस्थान राज्यों में तांबे के भण्डार पाए जाते हैं।

3. बॉक्साइट-बॉक्साइट से एल्युमीनियम प्राप्त किया जाता है। एल्युमीनियम हल्के भार वाली धातु है, जिसका अधिकतर उपयोग हवाई जहाज़ बनाने में किया जाता है। रेल-गाड़ियों, मोटरों, बसों, कारों और बिजली की तारों में भी इसका उपयोग होता है। इससे बर्तन बनाए जाते हैं। इससे बर्तन भी बनाए जाते हैं। इससे बनी वस्तुओं को जंग नहीं लगता। इसलिए ये वस्तुएं बहुत देर तक प्रयोग में लाई जा सकती हैं।
संसार में सबसे अधिक बॉक्साइट ऑस्ट्रेलिया में निकाला जाता है। भारत में बॉक्साइट महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में पाया जाता है।

4. मैंगनीज़-मैंगनीज़ भी एक अति महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। इसका अधिक उपयोग कच्चे लोहे (जो कि धरती में से मिलता है) से स्टील बनाने में किया जाता है। यह ब्लीचिंग पाऊडर, कीट-नाशक दवाएं, रंग-रोगन और शीशा बनाने के लिये भी उपयोग में लाया जाता है। रूस, जार्जिया, यूक्रेन, कज़ाखिस्तान में मैंगनीज़ के काफ़ी भण्डार हैं। इनके अतिरिक्त दक्षिणी अफ्रीका, ब्राजील (दक्षिणी अमेरिका) और भारत भी मैंगनीज़ के मुख्य उत्पादक देश हैं। भारत में मध्य-प्रदेश से सबसे अधिक मैंगनीज़ प्राप्त होता है। तेलंगाना, सीमांध्र, कर्नाटक, उड़ीसा और झारखण्ड में भी मैंगनीज़ मिलता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप

प्रश्न 3.
शक्ति खनिज किसे कहते हैं? किसी एक शकिा खनिज के विषय में जानकारी दें।
उत्तर-
वे खनिज जिनसे कारखाने, मोटर गाड़ियां आदि चलाने के लिए ऊर्जा तथा ज्वलन ऊर्जा प्राप्त होती है, शक्ति खनिज कहलाते हैं। मुख्य शक्ति खनिज कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस आदि हैं। इनमें से कोयले तथा खनिज तेल का औद्योगिक दृष्टि से विशेष महत्त्व है। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –

1. कोयला-कोयला मुख्य शक्ति खनिज है। अब कोयले का सीधे शक्ति के रूप में उपयोग.कम हो गया है। अब इससे बिजली पैदा करके शक्ति प्राप्त की जाने लगी है। इस उद्देश्य के लिए उपयोग में लाया जाने वाला कोयला प्रत्थरी कोयला है। यह कोयला हजारों साल पहले वनों के धरती की गहरी परतों में दबे रहने और उन पर धरती की गर्मी और ऊपर की तहों के दबाव के कारण बना था। इस प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष लग गए।

संसार में कोयले के अधिकतर भण्डार 35° से 65° अक्षांशों में पाये जाते हैं। संसार का 90% कोयला चीन, यू० एस० ए०, रूस और यूरोपीय देशों में मिलता है। इनके अतिरिक्त दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और एशिया महाद्वीप में भी कोयले के विशाल भण्डार हैं। जापान और थाइलैण्ड में भी कोयला पाया जाता है। भारत संसार का 5% कोयला पैदा करता है। भारत में दामोदर घाटी प्रमुख कोयला क्षेत्र है। पश्चिमी बंगाल और मध्य-प्रदेश राज्यों में भी कोयला पाया जाता है।

2. खनिज तेल-खनिज तेल को तरल सोना भी कहा जाता है। इसे यह नाम इसके बढ़ते हुए उपयोग तथा महत्त्व
के कारण दिया गया है। इसे पेट्रोलियम तथा चालक शक्ति भी कहते हैं। क्योंकि खनिजों की तरह इसे भी धरती में से निकाला जाता है, इस कारण इसे खनिज तेल कहा जाता है। इसे पेट्रोलियम नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि यह दो शब्दों-‘पेट्रो’ और ‘ओलियम’ के जोड़ से बना है। लातीनी भाषा में पैट्रा का अर्थ है-चट्टान और ओलियम का अर्थ है-तेल। इस प्रकार पेट्रोलियम का शाब्दिक अर्थ चट्टान से प्राप्त खनिज तेल है। यह वनस्पति और मरे हुए जीव-जन्तुओं के परतदार चट्टानों के बीच दब जाने से बना है। जो पेट्रोल हमें धरती के नीचे से मिलता है, वह अशुद्ध और अशोधित होता है। इसे कच्चा तेल कहा जाता है। कच्चे तेल को शोधक कारखानों में शुद्ध करके इससे कई वस्तुएं प्राप्त की जाती हैं, जैसे-पेट्रोल, डीज़ल, मिट्टी का तेल, गैस, चिकनाहट वाले तेल, ग्रीस, मोम आदि।

संसार में सबसे बड़े तेल भण्डार दक्षिण-पश्चिमी एशिया में हैं। इस क्षेत्र में सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत तथा यू० ए० ई० (यूनाइटिड अरब अमीरात) शामिल हैं।
नोट : विद्यार्थी दोनों में से कोई एक लिखें।

प्रश्न 4.
भारत में पायी जाने वाली मिट्टी की किस्मों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखो।
उत्तर-
मिट्टी (मृदा) एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। यह कृषि का आधार है। भारत में मुख्य रूप से छः प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है –
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप 4
1. जलोढ़ मिट्टी-जलोढ़ मिट्टी वह मिट्टी है जो नदियों द्वारा लाई गई तलछट के जमाव से बनती है। यह संसार को सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से एक है। भारत में यह मिट्टी सतलुज-गंगा के मैदान और महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी के डेल्टों में पाई जाती है। जलोढ़ मिट्टी का प्रत्येक वर्ष नवीनीकरण होता रहता है। इसका कारण यह है कि नदियां हर वर्ष नई मिट्टी लाकर बिछाती हैं। नई जलोढ़ मिट्टी को खादर तथा पुरानी जलोढ़ मिट्टी को बांगर कहते हैं।

2. काली मिट्टी-लावा चट्टानों के टूटने-फूटने से बनी मिट्टी को काली मिट्टी कहते हैं। इसमें फॉस्फोरस, पोटाश और नाइट्रोजन की बहुत कमी होती है, जबकि मैग्नीशियम, लोहा, चूना तथा जीवांश काफ़ी मात्रा में पाए जाते हैं। यह मिट्टी नमी को काफ़ी समय तक समाए रखती है। यह मिट्टी कपास की उपज के लिए बहुत उपयोगी होती है। इसलिए इसे कपास की मिट्टी के नाम से भी पुकारा जाता है। हमारे देश में काली मिट्टी उत्तरी महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी आन्ध्र प्रदेश में पाई जाती है।

3. लाल मिट्टी-इस मिट्टी का निर्माण आग्नेय शैलों से हुआ है। इसमें लोहे का अंश अधिक होता है। इसी कारण ही इसका रंग लाल या पीला होता है। यह मिट्टी अधिक उपजाऊ नहीं होती। परन्तु खादों के उपयोग द्वारा इस मिट्टी से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। भारत में लाल मिट्टी प्रायद्वीप के दक्षिण तथा पूर्व के गर्म-शुष्क प्रदेशों में फैली हुई है।

4. लैटराइट मिट्टी-यह मिट्टी अधिक वर्षा वाले गर्म प्रदेशों में मिलती है। भारी वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण इस मिट्टी के पोषक तत्त्व घुल कर मिट्टी के नीचे चले जाते हैं। इस क्रिया को निक्षालन (Deaching) कहते हैं। पोषक तत्त्वों की कमी के कारण यह मिट्टी कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं होती। भारत में यह मिट्टी पश्चिमी घाट, छोटा नागपुर के पठार तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के कुछ भागों में फैली हुई है।

5. शुष्क रेतीली अथवा मरुस्थली मिट्टी-इस मिट्टी में रेत के कणों की अधिकता होती है, परन्तु इसमें ह्यूमस का अभाव होता है। इसलिए यह मिट्टी उपजाऊ नहीं होती। भारत में यह मिट्टी राजस्थान तथा गुजरात के मरुस्थलीय क्षेत्रों में पाई जाती है।

6. पर्वतीय (पर्वती) मिट्टी-पर्वतीय मिट्टी कम गहरी तथा पतली सतह वाली होती है। इसमें लोहे का अंश अधिक होता है। पर्याप्त वर्षा मिलने पर इस मिट्टी में चाय की कृषि की जाती है। भारत में यह मिट्टी हिमालय क्षेत्र में पाई जाती है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप

PSEB 7th Class Social Science Guide पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
ज्वालामुखी पर्वत कैसे बनता है? इसका एक उदाहरण दें।
उत्तर-
ज्वालामुखी पर्वत धराबल में से बाहर निकलने वाले लावे के इकट्ठा होने से बनता है। जापान का फियूजीयामा पर्वत इस का एक उत्तम उदाहरण है।

प्रश्न 2.
छिद्रदार (Porous) तथा छिद्रहीन (Non Porous) चट्टानों में क्या अन्तर है?
उत्तर-
छिद्रदार चट्टानों में रेत की मात्रा अधिक होती है, जबकि छिद्रहीन चट्टानों में चिकनी मिट्टी की मात्रा अधिक होती है।

प्रश्न 3.
पानी समा सकने के आधार पर चट्टानों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर–
पानी समा सकने के आधार पर चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-पारगामी (पारगम्य) तथा अपारगामी (अपार-गम्य)। पारगामी चट्टानों में पानी आसानी से प्रवेश कर जाता है, परन्तु अपारगामी चट्टानों में पानी प्रवेश नहीं कर पाता।

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प्रश्न 4.
रासायनिक रचना के आधार पर चट्टानें कौन-कौन से दो प्रकार की होती हैं?
उत्तर-

  1. क्षारीय चट्टानें तथा
  2. तेज़ाबी अथवा अम्लीय चट्टानें।

प्रश्न 5.
मैग्मा तथा लावा में क्या अन्तर है?
उत्तर-
धरातल के अन्दर पिघला हुआ पदार्थ मैग्मा कहलाता है। जब यह मैग्मा दरारों में से होकर धरातल पर आ जाता है, तो इसे लावा कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्राथमिक चट्टानें किन्हें कहते हैं और क्यों? इनकी दो विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
आग्नेय चट्टानों को प्राथमिक चट्टानें कहते हैं, क्योंकि पृथ्वी पर सबसे पहले इन्हीं चट्टानों का निर्माण हुआ था।
विशेषताएं-

  1. आग्नेय चट्टानें रवेदार पिण्डों में पाई जाती हैं। इसलिए इनमें तहें या परतें नहीं होती।
  2. इन चट्टानों में वनस्पति और जीव-जन्तुओं के अवशेष भी नहीं पाये जाते।

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प्रश्न 7.
मिट्टी किसे कहते हैं?
उत्तर-
मिट्टी धरातल के ऊपर का वह भाग है जो चट्टानों की टूट-फूट से बनती हैं। इसके कण बहुत बारीक, कोमल और अलग-अलग होते हैं ताकि पौधों की जड़ें इसमें आसानी से प्रवेश कर सकें।

प्रश्न 8.
मिट्टी में कौन-से दो प्रकार के तत्त्व होते हैं?
उत्तर-
मिट्टी में दो प्रकार के तत्त्व अथवा पदार्थ होते हैं-खनिज पदार्थ और कार्बनिक पदार्थ। मिट्टी को खनिज पदार्थ मूल चट्टान से प्राप्त होते हैं। मिट्टी में शामिल वनस्पति और जीव-जन्तुओं के गले-सड़े पदार्थ को ‘कार्बनिक पदार्थ’ कहा जाता है।

प्रश्न 9.
मिट्टी (मृदा) की रचना में कौन-से कारक सहायक होते हैं?
उत्तर-
मिट्टी (मृदा) की रचना में निम्नलिखित कई कारक सहायक होते हैं –
1. मूल शैल-मूल शैल से अभिप्राय उस शैल से है जिससे मृदा अथवा मिट्टी का निर्माण होता है। मृदा की विशेषताएं जनक शैल के अनुरूप होती हैं। उदाहरण के लिए शैल (Shale) से चीका मिट्टी बनती है, जबकि बलुआ पत्थर से बालू के कण प्राप्त होते हैं।

2. जलवाय-मदा निर्माण को प्रभावित करने वाले जलवायु के कारकों में तापमान और वर्षा प्रमुख हैं। तापमान में बार-बार परिवर्तन होने और वायुमण्डल में जल की उपस्थिति से अपक्षय की दर बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप मृदा के निर्माण की गति में तेजी आ जाती है।

3. स्थलाकृति-किसी क्षेत्र की स्थलाकृति उसके अपवाह को प्रभावित करती है। तीव्र ढाल पर अपक्षयित शैल कण टिक नहीं पाते। जल के द्वारा तथा गुरुत्व बल के प्रभाव से ये कण ढाल पर नीचे की ओर सरक जाते हैं। इसके विपरीत मैदानों और मंद ढालों पर मृदा बिना किसी बाधा के टिकी रहती है।

4.. मृदा में विद्यमान मृत पौधे तथा जीव-जन्तु-मृत पौधों और जीव-जन्तुओं से मृदा को हमस प्राप्त होती है। ह्यमस वाली मृदा अधिक उपजाऊ होती है।

5. समय-मृदा निर्माण के कारक के रूप में समय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। मृदा के निर्माण में जितना अधिक समय लगता है, उतनी ही अधिक मोटी उसकी परत होती है।

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प्रश्न 10.
मिट्टी के अपरदन अथवा भूमि कटाव से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
तेज़ वायु तथा बहता जल मिट्टी की ऊपरी सतह को अपने साथ बहाकर ले जाते हैं। इसे मिट्टी का अपरदन अथवा भूमि का कटाव कहते हैं। इसके कारण मिट्टी कृषि योग्य नहीं रहुती। यह क्रिया उन स्थानों पर अधिक होती है जहां भूमि की ढाल बहुत तीव्र हो और जहां वर्षा बहुत तेज़ बौछारों के रूप में होती है। भूमि कटाव उन क्षेत्रों में भी अधिक होता है, जहां वनस्पति कम हो, जैसे कि मरुस्थलीय क्षेत्र में।

प्रश्न 11.
किस मिट्टी को कपास की मिट्टी कहा जाता है और क्यों?
उत्तर-
काली अथवा रेगड़ मिट्टी को कपास की मिट्टी कहा जाता है। इसका कारण यह है कि यह मिट्टी कपास की फसल के लिए आदर्श होती है।

प्रश्न 12.
जलोढ़ मिट्टी की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. इस मिट्टी में पोटाश, फॉस्फोरिक अम्ल तथा चूना पर्याप्त मात्रा में होता है।
  2. इस मिट्टी में नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है।

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प्रश्न 13.
काली अथवा रेगड़ मिट्टी की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. काली मिट्टी लावा के प्रवाह से बनी है।
  2. यह मिट्टी कपास की फसल के लिए अधिक उपयोगी है।

प्रश्न 14.
लैटराइट मिट्टी की दो विशेषताएं बताओ।
उत्तर-

  1. लैटराइट मिट्टी कम उपजाऊ होती है।
  2. यह मिट्टी घास और झाड़ियों के पैदा होने के लिए उपयुक्त है।

प्रश्न 15.
मरुस्थलीय मिट्टी को कृषि के लिए उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर-
सिंचाई की सुविधाएं जुटा कर मरुस्थलीय मिट्टी को कृषि के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है।

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(क) सही कथनों पर (✓) तथा ग़लत कथनों पर (✗) का चिन्ह लगाएं :

  1. आज तक विश्व ग्लोबल गांव नहीं बन सका।
  2. जीव जगत में पेड़-पौधे शामिल नहीं हैं।
  3. समुद्र का धरती पर सबसे अधिक प्रभाव जलवायु पर पड़ता है।
  4. बुध ग्रह के इर्द-गिर्द वायुमण्डल नहीं है।

उत्तर-

  1. (✗),
  2. (✗),
  3. (✓),
  4. (✓)

(ख) सही जोड़े बनाएं:

  1. धातु खनिज – अत्यधिक उपजाऊ
  2. अधातु खनिज – सोना, चांदी
  3. रेतीली मिट्टी – पोटाश, फास्फेट
  4. जलौढ़ मिट्टी – ह्यूमस की कमी

उत्तर-

  1. धातु खनिज – सोना, चांदी
  2. अधातु खनिज – पोटाश, फास्फेट
  3. रेतीली मिट्टी – ह्यूमस की कमी
  4. जलौढ़ मिट्टी – अत्यधिक उपजाऊ।

(ग) सही उत्तर चुनिए

प्रश्न 1.
जापान का फ्यूजीयामा पर्वत लावे से बना है। यह लावा कहां से आता है?
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 2 पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप 5
(i) ऊँचे पर्वतों से
(ii) धरती के आन्तरिक भाग से
(iii) पर्तदार या तलछटी चट्टानों के जमने से ।
उत्तर-
(ii) धरती के आन्तरिक भाग से।

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प्रश्न 2.
भारत में गंगा सतलुज का मैदान एक विशेष प्रकार की सामग्री से बना है। इस सामग्री का जमाव कैसे होता
(i) बहते हुए पानी के द्वारा
(ii) हिमनदी तथा वायु द्वारा
(iii) इन सबके द्वारा।
उत्तर-
(iii) इन सबके द्वारा।

पृथ्वी का आन्तरिक तथा बाहरी स्वरूप PSEB 7th Class Social Science Notes

  • स्थलमण्डल – इसमें पृथ्वी की ऊपरी कठोर परत आती है, जिसे सियाल कहते हैं। इस भाग की साधारण मोटाई 100 किलोमीटर के लगभग है। इसमें सिलिकॉन और एल्युमीनियम के तत्त्व अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।
  • खनिज – खनिज वे प्राकृतिक पदार्थ हैं जो किसी एक या एक से अधिक तत्त्वों के मेल से बने हैं।
  • चट्टान (शैल) – प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले खनिजों के मिश्रण को चट्टान कहते हैं। निर्माण के आधार पर ये तीन प्रकार की होती हैं-आग्नेय, तलछटी तथा रूपांतरित।
  • मैग्मा – पृथ्वी की गहराई में अधिकांश पदार्थ पिघली हुई अवस्था में पाये जाते हैं। इसे मैग्मा कहते हैं।
  • लावा – जब मैग्मा पृथ्वी के धरातल पर पहुंचता है, तो वह लावा कहलाता है।
  • आग्नेय शैल तथा रूपान्तरित शैल – आग्नेय शैल पिघले हुए लावे के ठण्डा होकर जमने से बनती है। जबकि रूपान्तरित शैलों का निर्माण तलछटी या आग्नेय शैलों के गुण तथा रंग-रूप बदलने से होता है। उदाहरण के लिए ग्रेनाइट एक आग्नेय शैल है, जबकि ग्रेनाइट के रूप परिवर्तन से बनी नीस एक रूपान्तरित शैल है।
  • धात्विक खनिज – इन खनिजों में धातु के अंश पाये जाते हैं; जैसे-लोहा, सोना, चांदी, तांबा आदि चिल्ली (दक्षिणी अमेरिका) संसार में सबसे अधिक तांबा पैदा करता है।
  • अधात्विक खनिज – इन खनिजों में धातु के अंश नहीं पाये जाते; जैसे-अभ्रक, पोटाश, जिप्सम आदि।
  • खनिजों का संरक्षण – खनिजों के निर्माण में सैंकड़ों वर्ष लग जाते हैं। इसलिए इनका संरक्षण आवश्यक है।
  • चालक शक्ति – जिस शक्ति (ऊर्जा) से हमारे वाहन चलते हैं, उसे चालक शक्ति कहते हैं।

योग (Yoga) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions योग (Yoga) Game Rules.

योग (Yoga) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

PSEB 11th Class Physical Education Guide योग (Yoga) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘योग’ शब्द संस्कृत की किस धातु से लिया गया है ?
उत्तर-
योग शब्द संस्कृत की ‘युज्’ धातु से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘जोड़’ या ‘मेल’।

प्रश्न 2.
प्राणायाम की किस्मों के नाम लिखें।
उत्तर-
प्राणायाम
(Pranayama)
प्राणायाम दो शब्दों के मेल से बना है “प्राण” का अर्थ है ‘जीवन’ और ‘याम’ का अर्थ है, ‘नियन्त्रण’ जिससे अभिप्राय है जीवन पर नियन्त्रण अथवा सांस पर नियन्त्रण। प्राणायाम वह क्रिया है जिससे जीवन की शक्ति को बढ़ाया जा सकता है और इस पर नियन्त्रण किया जा सकता है।
मनु-महाराज ने कहा है, “प्राणायाम से मनुष्य के सभी दोष समाप्त हो जाते हैं और कमियां पूरी हो जाती हैं।”

प्राणायाम के आधार
(Basis of Pranayama)
सांस को बाहर की ओर निकालना तथा फिर अन्दर की ओर करना और अन्दर ही कुछ समय रोक कर फिर कुछ … समय के बाद बाहर निकालने की तीनों क्रियाएं ही प्राणायाम का आधार हैं।
रेचक-सांस बाहर को छोड़ने की क्रिया को ‘रेचक’ कहते हैं।
पूरक-जब सांस अन्दर खींचते हैं तो इसे पूरक कहते हैं।
कुम्भक-सांस को अन्दर खींचने के बाद उसे वहां ही रोकने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं।

प्राण के नाम
(Name of Prana)
व्यक्ति के सारे शरीर में प्राण समाया हुआ है। इसके पांच नाम हैं—

  1. प्राण-यह गले से दिल तक है। इसी प्राण की शक्ति से सांस शरीर में नीचे जाता है।
  2. अप्राण-नाभिका से निचले भाग में प्राण को अप्राण कहते हैं। छोटी और बड़ी आन्तों में यही प्राण होता है। यह टट्टी, पेशाब और हवा को शरीर में से बाहर निकालने के लिए सहायता करता है।
  3. समान-दिल और नाभिका तक रहने वाली प्राण क्रिया को समान कहते हैं। यह प्राण पाचन क्रिया और एडरीनल ग्रन्थि की कार्यक्षमता में वृद्धि करता है।
  4. उदाना–गले से सिर तक रहने वाले प्राण को उदान कहते हैं। आंखों, कानों, नाक, मस्तिष्क इत्यादि अंगों का काम इसी प्राण के कारण होता है।
  5. ध्यान-यह प्राण शरीर के सभी भागों में रहता है और शरीर का अन्य प्राणों से मेल-जोल रखता है। शरीर के हिलने-जुलने पर इसका नियन्त्रण होता है।

प्राणायाम की किस्में
(Kinds of Pranayama)
शास्त्रों में प्राणायाम कई प्रकार के दिये गए हैं, परन्तु प्रायः यह आठ होते हैं—

  1. सूर्य-भेदी प्राणायाम
  2. उजयी प्राणायाम
  3. शीतकारी प्राणायाम
  4. शीतली प्राणायाम
  5. भस्त्रिका प्राणायाम
  6. भ्रमरी प्राणायाम
  7. मुर्छा प्राणायाम
  8. कपालभाती प्राणायाम

योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 3.
योग की कोई छः किस्मों के नाम लिखें।
उत्तर-
योग की छ: किस्में-अष्टांग योग, हठ योग, जनन योग, मंत्र योग, भक्ति योग, कुंडली योग।

प्रश्न 4.
अष्टांग योग के तत्वों के नाम लिखें।
उत्तर-
यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्राणायाम, धारणा, ध्यान तथा समाधि अष्टांग योग के तत्त्व हैं।

प्रश्न 5.
ताड़ासन की विधि लिखें।
उत्तर-
ताड़ासन (Tarasan)—इस आसन में खड़े होने की स्थिति में धड़ को ऊपर की ओर खींचा जाता है।
ताड़ासन की स्थिति (Position of Tarasan)-इस आसन में स्थिति ताड़ के वृक्ष जैसी होती है।
योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 1
ताड़ासन
ताड़ासन की विधि (Technique of Tarasan) खड़े होकर पांव की एड़ियों और अंगुलियों को जोड़ कर भुजाओं को ऊपर सीधा करें। हाथों की अंगुलियां एक-दूसरे हाथ में फंसा लें। हथेलियां ऊपर और नज़र सामने हो। अपना पूरा सांस अन्दर की ओर खींचें। एड़ियों को ऊपर उठा कर शरीर का सारा भार पंजों पर ही डालें। शरीर को ऊपर की ओर खींचे। कुछ समय के बाद सांस छोड़ते हुए शरीर को नीचे लाएं। ऐसा दस पन्द्रह बार करो।
ताड़ासन के लाभ (Advantages of Tarasan)-

  1. इससे शरीर का मोटापा दूर होता है।
  2. इससे कब्ज दूर होती है।
  3. इससे आंतों के रोग नहीं लगते।
  4. प्रतिदिन ठण्डा पानी पी कर इस आसन को करने से पेट साफ रहता है।

योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 6.
पश्चिमोत्तानासन की विधि लिखें।
उत्तर-
पश्चिमोत्तानासन (Paschimotanasana)—इसमें पांवों के अंगूठों को अंगुलियों से पकड़ कर इस प्रकार बैठा जाता है कि धड़ एक ओर ज़ोर से चला जाए।
पश्चिमोत्तानासन की स्थिति (Position of Paschimotanasana)-इस आसन में सारे शरीर को फैला कर मोड़ा जाता है।
पश्चिमोत्तानासन की विधि (Technique of Paschimotansana)-दोनों टांगें आगे की ओर फैला कर भूमि पर बैठ जाएं। दोनों हाथों से पांवों के अंगूठे पकड़ कर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए घुटनों को छूने की कोशिश करो। फिर धीरे-धीरे सांस लेते हुए सिर को ऊपर उठाएं और पहले वाली स्थिति में आ जाएं। यह आसन हर रोज़ 10-15 बार करना चाहिए।
योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 2
पश्चिमोत्तानासन
लाभ (Advantages)—

  1. इस आसन से जंघाओं को शक्ति मिलती है।
  2. नाड़ियों की सफाई होती है।
  3. पेट के अनेक प्रकार के रोगों से छुटकारा मिलता है।
  4. शरीर की बढ़ी हुई चर्बी कम होती है।
  5. पेट की गैस समाप्त होती है।

Physical Education Guide for Class 11 PSEB योग (Yoga) Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
योग का इतिहास लिखें।
उत्तर-
योग का इतिहास उत्तर
(History of Yoga)
‘योग’ का इतिहास वास्तव में बहुत पुराना है। योग के उद्भव के बारे में दृढ़तापूर्वक व स्पष्टता से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। केवल यह कहा जा सकता है कि योग का उद्भव भारतवर्ष में हुआ था। उपलब्ध तथ्य यह दर्शाते हैं कि योग सिन्धु घाटी सभ्यता से सम्बन्धित है। उस समय व्यक्ति योग किया करते थे। गौण स्रोतों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि योग का उद्भव भारतवर्ष में लगभग 3000 ई० पू० हुआ था। 147 ई० पू० पतंजलि (Patanjali) के द्वारा योग पर प्रथम पुस्तक लिखी गई थी। वास्तव में योग संस्कृत भाषा के ‘युज्’ शब्द से लिया गया है। जिसका अभिप्राय है ‘जोड़’ या ‘मेल’। आजकल योग पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो चुका है। आधुनिक युग को तनाव, दबाव व चिंता का युग कहा जा सकता है। इसलिए अधिकतर व्यक्ति खुशी से भरपूर व फलदायक जीवन नहीं गुजार रहे हैं। पश्चिमी देशों में योग जीवन का एक भाग बन चुका है। मानव जीवन में योग बहुत महत्त्वपूर्ण है।

योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 2.
यौगिक व्यायाम के नए नियम लिखे।
उत्तर-
यौगिक व्यायाम के नये नियम
(New Rules of Yogic Exercise)

  1. यौगिक व्यायाम करने का स्थान समतल होना चाहिए। ज़मीन पर दरी या कम्बल डाल कर यौगिक व्यायाम करने चाहिए।
  2. यौगिक व्यायाम करने का स्थान एकान्त, हवादार और सफाई वाला होना चाहिए।
  3. यौगिक व्यायाम करते हुए श्वास और मन को शान्त रखना चाहिए।
  4. भोजन करने के बाद कम-से-कम चार घण्टे के पश्चात् यौगिक आसन करने चाहिए।
  5. यौगिक आसन धीरे-धीरे करने चाहिए और अभ्यास को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।
  6. अभ्यास प्रतिदिन किसी योग्य प्रशिक्षक की देख-रेख में करना चाहिए।
  7. दो आसनों के मध्य में थोड़ा विश्राम शव आसन द्वारा कर लेना चाहिए।
  8. शरीर पर कम-से-कम कपड़े पहनने चाहिए, लंगोट, निक्कर, बनियान आदि और सन्तुलित भोजन करना चाहिए।

बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम में निम्नलिखित यौगिक व्यायाम सम्मिलित किए गए हैं जिनके दैनिक अभ्यास द्वारा एक साधारण व्यक्ति का स्वास्थ्य बना रहता है—

  1. ताड़ासन
  2. अर्द्धचन्द्रासन
  3. भुजंगासन
  4. शलभासन
  5. धनुरासन
  6. अर्द्धमत्स्येन्द्रासन
  7. पश्चिमोत्तानासन
  8. पद्मासन
  9. स्वास्तिकासन
  10. सर्वांगासन
  11. मत्स्यासन
  12. हलासन
  13. योग मुद्रा
  14. मयूरासन
  15. उड्डियान
  16. प्राणायाम : अनुलोम विलोम
  17. सूर्य नमस्कार
  18. शवासन

प्रश्न 3.
भुजंगासन की विधि बताकर इसके लाभ लिखें।
उत्तर-
भुजंगासन (Bhujangasana)-इसमें चित्त लेट कर धड़ को ढीला किया जाता है।
भुजंगासन की विधि (Technique of Bhujangasana)—इसे सर्पासन भी कहते हैं। इसमें शरीर की स्थिति सर्प के आकार जैसी होती है। सर्पासन करने के लिए भूमि पर पेट के बल लेटें। दोनों हाथ कन्धों के बराबर रखो। धीरेधीरे टांगों को अकड़ाते हुए हथेलियों के बल छाती को इतना ऊपर उठाएं कि भुजाएं बिल्कुल सीधी हो जाएं। पंजों को अन्दर की ओर करो और सिर को धीरे-धीरे पीछे की ओर लटकाएं। धीरे-धीरे पहली स्थिति में लौट आएं। इस आसन को तीन से पांच बार करें।
लाभ (Advantages)—

  1. भुजंगासन से पाचन शक्ति बढ़ती है।
  2. जिगर और तिल्ली के रोगों से छुटकारा मिलता है।
  3. रीढ़ की हड्डी और मांसपेशियां मज़बूत बनती हैं।
  4. कब्ज दूर होती है।
  5. बढ़ा हुआ पेट अन्दर को धंसता है।
  6. फेफड़े शक्तिशाली होते हैं।
    योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 3
    भुजंगासन

योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 4.
धनुरासन और अर्द्धमत्स्येन्द्रासन की विधि और लाभ लिखें।
उत्तर-
धनुरासन (Dhanurasana)—इसमें चित्त लेट कर और टांगों को ऊपर खींच कर पांवों को हाथों से पकड़ा जाता है।
धनुरासन की विधि (Technique of Dhanurasana)-इससे शरीर की स्थिति कमान की तरह होती है। धनुरासन करने के लिए पेट के बल भूमि पर लेट जाएं। घुटनों को पीछे की ओर मोड़ कर रखें। टखनों के समीप पांवों
योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 4
धनुरासन
को हाथ से पकड़ें। लम्बी सांस लेकर छाती को जितना हो सके ऊपर की ओर उठाएं। अब पांव अकड़ायें जिससे शरीर का आकार कमान की तरह बन जाए। जितने समय तक सम्भव हो ऊपर वाली स्थिति में रहें। सांस छोड़ते समय शरीर को ढीला रखते हुए पहले वाली स्थिति में आ जाएं। इस आसन को तीन-चार बार करें। भुजंगासन और धनुरासन दोनों ही आसन बारी-बारी करने चाहिए।
लाभ (Advantages)—

  1. इस आसन से शरीर का मोटापा कम होता है।
  2. इससे पाचन शक्ति बढ़ती है।
  3. गठिया और मूत्र रोगों से छुटकारा मिलता है।
  4. मेहदा तथा आंतें अधिक ताकतवर बनती हैं।
  5. रीढ़ की ‘हड्डी तथा मांसपेशियां मज़बूत और लचकीली बनती हैं।

अर्द्धमत्स्येन्द्रासन (Ardhmatseyandrasana) इसमें बैठने की स्थिति में धड़ को पावों की ओर धंसा जाता है।
विधि-ज़मीन पर बैठकर बाएं पांव की एड़ी को दाईं ओर नितम्ब के पास ले जाओ। जिससे एडी का भाग गदा के निकट लगे। दायें पांव को ज़मीन पर बायें पांव के घुटने के निकट रखो फिर वक्षस्थल के निकट बाईं भुजा को लाएं, दायें पांव के घुटने के नीचे अपनी जंघा पर रखें, पीछे की ओर से दायें हाथ द्वारा कमर को लपेट कर नाभि को स्पर्श करने का यत्न करें। फिर पांव बदल कर सारी क्रिया को दोहराएँ।
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अर्द्धमत्स्येन्द्रासन
लाभ—

  1. इस आसन द्वारा मांसपेशियां और जोड़ अधिक लचीले रहते हैं और शरीर में शक्ति आती है।
  2. यह आसन, वायु विकार और मधुमेह दूर करता है तथा आन्त उतरने (Hernia) में लाभदायक है।
  3. यह आसन मूत्राशय, अमाशय, प्लीहादि के रोगों में लाभदायक है।
  4. इस आसन के करने से मोटापा दूर रहता है।
  5. छोटी तथा बड़ी आन्तों के रोगों के लिए बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 5.
पद्मासन, मयूरासन, सर्वांगासन और मत्स्यासन की विधि और लाभ बताएं।
उत्तर-
पद्मासन (Padamasana)-इसमें टांगों की चौंकड़ी लगा कर बैठा जाता है। पद्मासन की विधि (Technique of Padamasana)-चौकड़ी मार कर बैठने के बाद दायां पांव बाईं जांघ पर इस तरह रखें कि दायें पांव की एड़ी बाईं जांघ पर पेडू हड्डी को छुए। इसके पश्चात् बायें पांव को उठा कर उसी प्रकार दायें पांव की जांघ पर रख लें। रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहनी चाहिए। बाजुओं को तान कर हाथों को घुटनों पर रखो। कुछ दिनों के अभ्यास द्वारा इस आसन को बहुत ही आसानी से किया जा सकता है।
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पद्मासन
लाभ (Advantages)—

  1. इस आसन में पाचन शक्ति बढ़ती है।
  2. यह आसन मन की एकाग्रता के लिए सर्वोत्तम है।
  3. कमर दर्द दूर होता है।
  4. दिल के तथा पेट के रोग नहीं लगते।
  5. मूत्र के रोगों को दूर करता है।

मयूरासन (Mayurasana)
विधि (Technique)-पेट के बल ज़मीन पर लेट कर दोनों पांवों के पंजों को मिलाओ। दोनों कहनियों को आपस में मिला कर ज़मीन पर ले जाओ। सम्पूर्ण शरीर का भार कुहनियों पर दे कर घुटनों और पैरों को जमीन से उठाए रखो।
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मयूरासन
लाभ (Advantages)—

  1. यह आसन फेफड़ों की बीमारी दूर करता है। चेहरे को लाली प्रदान करता है।
  2. पेट की सभी बीमारियां इससे दूर होती हैं और बांहों तथा हाथों को बलवान बनाता है।
  3. इस आसन से आंखों की नज़र पास की व दूर की ठीक रहती है।
  4. इस आसन से मधुमेह रोग नहीं होता यदि हो जाए तो दूर हो जाता है।
  5. यह आसन रक्त संचार को नियमित करता है।

सर्वांगासन (Sarvangasana)—इसमें कन्धों पर खड़ा हुआ जाता है।
सर्वांगासन की विधि (Technique of Sarvangasana)—सर्वांगासन में शरीर की स्थिति अर्द्ध हल आसन की भान्ति होती है। इस आसन के लिए शरीर को सीधा करके पीठ के बल ज़मीन पर लेट जाएं। हाथों को जंघाओं के बराबर रखें। दोनों पांवों को एक बार उठा कर हथेलियों द्वारा पीठ को सहारा देकर कुहनियों को ज़मीन पर टिकाएँ।
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सर्वांगासन
सारे शरीर को सीधा रखें। शरीर का भार कन्धों और गर्दन पर रहे। ठोडी कण्ठकूप से लगी रहे। कुछ समय इस स्थिति में रहने के पश्चात् धीरे-धीरे पहली स्थिति में आएं। आरम्भ में आसन का समय बढ़ा कर 5 से 7 मिनट तक किया जा सकता है। जो व्यक्ति किसी कारण शीर्षासन नहीं कर सकते उन्हें सर्वांगासन करना चाहिए।
लाभ (Advantages)—

  1. इस आसन से कब्ज दूर होती है, भूख खूब लगती है।
  2. बाहर को बढ़ा हुआ पेट अन्दर धंसता है।
  3. शरीर के सभी अंगों में चुस्ती आती है।
  4. पेट की गैस नष्ट होती है।
  5. रक्त का संचार तेज़ और शुद्ध होता है।
  6. बवासीर के रोग से छुटकारा मिलता है।

मत्स्यासन (Matsyasana)—इसमें पद्मासन में बैठकर Supine लेते हुए और पीछे की ओर arch बनाते हैं।
विधि (Technique)—पद्मासन लगा कर सिर को इतना पीछे ले जाओ जिससे सिर की चोटी का भाग ज़मीन पर लग जाए और पीठ का भाग ज़मीन से ऊपर उठा हो। दोनों हाथों से दोनों पैरों के अंगूठे पकड़ें।
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मत्स्यासन
लाभ (Advantages)—

  1. वह आसन चेहरे को आकर्षक बनाता है। चर्म रोग को दूर करता है।
  2. यह आसन टांसिल, मधुमेह, घुटनों तथा कमर दर्द के लिए लाभदायक है। शुद्ध रक्त का निर्माण तथा संचार करता है।
  3. इस आसन द्वारा मेरूदण्ड में लचक आती है, कब्ज दूर होती है, भूख बढ़ती है, पेट की गैस को नष्ट करके भोजन पचाता है।
  4. यह आसन फेफड़ों के लिए लाभदायक है, श्वास सम्बन्धी रोग जैसे खांसी, दमा, श्वास नली की बीमारी आदि दूर करता है। नेत्र दोषों को दूर करता है।
  5. यह आसन टांगों और भुजाओं की शक्ति को बढ़ाता है और मानसिक दुर्बलता को दूर करता है।

योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 6.
हलासन और शवासन की विधि और लाभ बताएं।
उत्तर-
हलासन (Halasana)—इसमें Supine लेते हुए, टांगें उठा कर और सिर से परे रखी जाती हैं।
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हलासन
विधि (Technique)—दोनों टांगों को ऊपर उठाएं, सिर को पीछे रखें और दोनों पांवों को सिर के पीछे ज़मीन पर रखें। पैरों के अंगूठे ज़मीन को छू लें। यह स्थिति जब तक हो सके रखें। इसके पश्चात् अपनी टांगें पहले वाले स्थान पर लाएं जहां से आरम्भ किया था।
लाभ (Advantages)—

  1. हल आसन औरतों और मर्दो के लिए हर आयु में लाभदायक है।
  2. यह आसन रक्त के दबाव अधिक और कम के लिए भी फायदेमंद है। जिस व्यक्ति को दिल की बीमारी हो उसके लिए भी लाभदायक है।
  3. रक्त का दौरा नियमित हो जाता है।
  4. इस आसन को करने से व्यक्ति की वसा कम हो जाती है और कमर व पेट पतले हो जाते हैं।
  5. रीढ़ की हड्डी लचकदार हो जाती है।

शवासन (Shavasana)—चित्त लेट कर मीटर को ढीला छोड़ दें।
शवासन की विधि (Technique of Shavasana)—शवासन में पीठ के बल सीधा लेट कर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ा जाता है। शवासन करने के लिए जमीन पर पीठ के बल लेट जाओ और शरीर के अंगों को ढीला छोड़ दें। धीरे-धीरे लम्बे सांस लो। बिल्कुल चित्त लेट कर सारे शरीर के अंगों को ढीला छोड़ दो। दोनों पांवों के बीच एक डेढ़ फुट की दूरी होनी चाहिए। हाथों की हथेलियों को आकाश की ओर करके शरीर से दूर रखो। आंखें बन्द कर अन्तान हो कर सोचो कि शरीर ढीला हो रहा है। अनुभव करो कि शरीर विश्राम की स्थिति में है। यह आसन 3 से 5 मिनट तक करना चाहिए। इस आसन का अभ्यास प्रत्येक आसन के शुरू या अन्त में करना ज़रूरी है।
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शवासन
महत्त्व (Importance)—

  1. शवासन से उच्च रक्त चाप और मानसिक तनाव से छुटकारा मिलता है।
  2. यह दिल और दिमाग को ताज़ा करता है।
  3. इस आसन द्वारा शरीर की थकावट दूर होती है।

योग मुद्रा (Yog Mudra)—इसमें व्यक्ति पद्मासन में बैठता है, धड़ को झुकाता है और भूमि पर सिर को विश्राम देता है।
मयूरासन (Mayurasana)—इसमें शरीर को क्षैतिज रूप में कुहनियों पर सन्तुलित किया जाता है। हथेलियां भूमि पर टिकाई होती हैं।
उड्डियान (Uddiyan)—पांवों को अलग-अलग करके खड़ा होकर धड़ को आगे की ओर झुकाएं। हाथों को जांघों पर रखें। सांस बाहर निकालें और पसलियों के नीचे अन्दर को सांस खींचने की नकल करें।

प्राणायाम : अनुलोम विलोम (Pranayam : Anulom Vilom)—बैठकर निश्चित अवधि के लिए बारीबारी सांस को अन्दर खींचें, ठोडी की सहायता से सांस रोकें और सांस बाहर निकालें।

लाभ (Advantages)—प्राणायाम आसन द्वारा रक्त, नाड़ियों और मन की शुद्धि होती है।
सूर्य नमस्कार (Surya Namaskar)—सूर्य नमस्कार के 16 अंग हैं परन्तु 16 अंगों वाला सूर्य सम्पूर्ण सृष्टि के लय होने के समय प्रकट होता है। साधारणतया इसके 12 अंगों का ही अभ्यास किया जाता है।

लाभ (Advantages)—यह श्रेष्ठ यौगिक व्यायाम है। इससे व्यक्ति को आसन, मुद्रा और प्राणायाम के लाभ प्राप्त होते हैं। अभ्यासी का शरीर सूर्य के समान चमकने लगता है। चर्म सम्बन्धी रोगों से बचाव होता है। कोष्ठ बद्धता दृर होती है। मेरूदण्ड और कमर लचकीली होती है। गर्भवती स्त्रियों और हर्निया के रोगियों को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।

योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 7.
वज्रासन, शीर्षासन, चक्रासन और गरुड़ासन की विधि एवं लाभ लिखें।
उत्तर-
वज्रासन (Vajur Asana)—पैरों को पीछे की ओर मोड़ कर बैठना और हाथों को घुटनों पर रखना इसकी स्थिति है।
विधि (Technique)—

  1. घुटने मोड़ कर पैरों को पीछे की ओर करके पैरों के तलुओं के भार बैठो।
  2. नीचे पैर इस प्रकार हों कि पैर के अंगूठे एक दूसरे से मिले हों।
  3. दोनों घुटने भी मिले हों और कमर तथा पीठ दोनों एकदम सीधे रहें।
  4. दोनों हाथों को तान कर घुटनों के पास रखो।
  5. सांसें लम्बी-लम्बी और साधारण हों।
  6. यह आसन प्रतिदिन 3 मिनट से लेकर 20 मिनट तक करना चाहिए।

लाभ (Advantages)—
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वज्रासन

  1. शरीर में स्फूर्ति आती है।
  2. शरीर का मोटापा दूर हो जाता है।
  3. शरीर स्वस्थ रहता है।
  4. मांसपेशियां मज़बूत होती हैं।
  5. इससे स्वप्न दोष दूर हो जाता है।
  6. पैरों का दर्द दूर हो जाता है।
  7. मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  8. मनुष्य निश्चिंत हो जाता है।
  9. इससे मधुमेह की बीमारी में लाभ पहुंचता है।
  10. पाचन-क्रिया ठीक रहती है।

शीर्षासन (Shirsh Asana)-इस आसन में सिर नीचे और पैर ऊपर की ओर होते हैं।
विधि (Technique)—

  1. एक दरी या कम्बल बिछा कर घुटनों के भार बैठो।
  2. दोनों हाथों की अंगुलियां कस कर बांध लो। दोनों हाथों को कोणदार बना कर कम्बल या दरी पर रखो।
  3. सिर का सामने वाला भाग हाथों में इस प्रकार ज़मीन पर रखो कि दोनों अंगूठे सिर के पिछले हिस्से को दबाएं।
  4. टांगों को धीरे-धीरे अन्दर की ओर मोड़ते हुए शरीर को सिर और दोनों हाथों के सहारे आसमान की ओर उठाओ।
  5. पैरों को धीरे-धीरे ऊपर उठाओ। पहले एक टांग को सीधा करो, फिर दूसरी को।
  6. शरीर को बिल्कुल सीधा रखो।
  7. शरीर का सारा भार बांहों और सिर पर बराबर पड़े।
  8. दीवार या साथी का सहारा लो।

लाभ (Advantages)—
योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 13
शीर्षासन

  1. यह आसन भूख बढ़ाता है।
  2. इससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
  3. मोटापा दूर हो जाता है।
  4. जिगर ठीक प्रकार से कार्य करता है।
  5. पेशाब की बीमारियां दूर हो जाती हैं।
  6. बवासीर आदि बीमारियां दूर हो जाती हैं।
  7. इस आसन का प्रतिदिन अभ्यास करने से कई मानसिक बीमारियां दूर हो जाती हैं।

सावधानियां (Precautions)—

  1. जब आंखों में लाली आ जाए तो बन्द कर दो।
  2. सिर चकराने लगे तो आसन बन्द कर दें।
  3. कानों में सां-सां की ध्वनि सुनाई दे तो शीर्षासन बन्द कर दें।
  4. नाक बन्द हो जाए तो यह आसन बन्द कर दें।
  5. यदि शरीर भार सहन न कर सके तो आसन बन्द कर दें।
  6. पैरों व बांहों में कम्पन होने लगे तो आसन बन्द कर दो।
  7. यदि दिल घबराने लगे तो भी आसन बन्द कर दो।
  8. शीर्षासन सदैव एकान्त स्थान पर करना चाहिए।
  9. आवश्यकता होने पर दीवार का सहारा लेना चाहिए।
  10. यह आसन केवल एक मिनट से पांच मिनट तक करो। इससे अधिक शरीर के लिए हानिकारक है।

चक्रासन (Chakar Asana) की स्थिति-इस आसन में शरीर को गोल चक्र जैसा बनाना पड़ता है।
योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 14
चक्रासन
विधि (Technique)—

  1. पीठ के भार लेट कर, घुटनों को मोड़ कर, पैरों के तलवों को जमीन से लगाओ। दोनों पैरों के बीच में एक से डेढ़ फुट का अन्तर रखो।
  2. हाथों को पीछे की ओर ज़मीन पर रखो। तलवों और अंगुलियों को दृढ़ता के साथ ज़मीन से लगाए रखो।
  3. अब हाथ-पैरों के सहारे पूरे शरीर को चक्रासन या चक्र की शक्ल में ले जाओ।
  4. सारे शरीर की स्थिति गोलाकार होनी चाहिए।
  5. आंखें बन्द रखो ताकि श्वास की गति तेज़ हो सके।

लाभ (Advantages)—

  1. शरीर की सारी कमजोरियां दूर हो जाती हैं।
  2. शरीर के सारे अंगों को लचीला बनाता है।
  3. हर्निया तथा गुर्दो के रोग दूर करने में लाभदायक होता है।
  4. पाचन शक्ति को बढ़ाता है।
  5. पेट की वायु विकार आदि बीमारियां दूर हो जाती हैं।
  6. रीढ़ की हड्डी मजबूत हो जाती है।
  7. जांघ तथा बाहें शक्तिशाली बनती हैं।
  8. गुर्दे की बीमारियां घट जाती हैं।
  9. कमर दर्द दूर हो जाता है।
  10. शरीर हल्कापन अनुभव करता है।

गरुड़ आसन (Garur Asana) की स्थिति- गरुड़ आसन में शरीर की स्थिति गरुड़ पक्षी की भांति पैरों पर सीधे खड़ा होना होता है।
विधि (Technique)—

  1. सीधे खड़े होकर बायें पैर को उठा कर दाहिनी टांग में बेल की तरह लपेट लो।
  2. बाईं जांघ दाईं जांघ पर आ जायेगी तथा बाईं जांघ पिंडली को ढांप देगी।
  3. शरीर का सारा भार एक ही टांग पर कर दो।
  4. बाएं बाजू को दायें बाजू से दोनों हथेलियों को नमस्कार की स्थिति में ले जाओ।
  5. इसके बाद बाईं टांग को थोड़ा सा झुका कर शरीर को बैठने की स्थिति में ले जाओ। इस प्रकार शरीर की नसें खिंच जाती हैं। अब शरीर को सीधा करो और सावधान की स्थिति में हो जाओ।
  6. अब हाथों और पैरों को बदल कर पहली वाली स्थिति में पुनः दोहराओ।

लाभ (Advantages)—
योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 15
गरुड़ासन

  1. शरीर के सभी अंगों को शक्तिाली बनाता है।
  2. शरीर स्वस्थ हो जाता है।
  3. यह बांहों को ताकतवर बनाता है।
  4. यह हर्निया रोग से मनुष्य को बचाता है।
  5. टांगें शक्तिशाली हो जाती हैं।
  6. शरीर हल्कापन अनुभव करता है।
  7. रक्त संचार तेज़ हो जाता है।
  8. गरुड़ आसन करने से मनुष्य बहुत-सी बीमारियों से बच जाता है।

योग (Yoga) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 8.
अष्टांग योग के अंगों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
अष्टांग योग
(Ashtang Yoga)
अष्टांग योग के आठ अंग हैं, इसलिए इसका नाम अष्टांग योग है।
योगाभ्यास की पतजंलि ऋषि द्वारा आठ अवस्थाएं मानी गई हैं। इन्हें पतजंलि ऋषि का अष्टांग योग भी कहते हैं—

  1. यम (Yama, Forbearnace)
  2. नियम (Niyama, Observance)
  3. आसन (Asana, Posture)
  4. प्राणायाम (Pranayama, Regulation of Breathing)
  5. प्रत्याहार (Pratyahara, Abstracition)
  6. धारणा (Dharna, Concentration)
  7. ध्यान (Dhyana, Meditation)
  8. समाधि (Samadhi, Trance)।

योग की ऊपरी बताई गई आठ अवस्थाओं में से पहली पांच अवस्थाओं का सम्बन्ध आन्तरिक यौगिक क्रियाओं से है। इन सभी अवस्थाओं को आगे फिर इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है—
1. यम (Yama, Forbearance) यम के निम्नलिखित पांच अंग हैं—

  • अहिंसा (Ahimsa, Non-violence)
  • सत्य (Satya, Truth)
  • अस्तेय (Astey, Conquest of the sense of mind)
  • अपरिग्रह (Aprigraha, Non-receiving)
  • ब्रह्मचर्य (Brahmacharya, Celibacy)।

2. नियम (Niyama, Observance)-नियम के निम्नलिखित पांच अंग हैं :—

  • शौच (Shauch, Obeying the call of nature)
  • सन्तोष (Santosh, Contentment)
  • तप (Tapas, Penance)
  • स्वाध्याय (Savadhyay, Self-study)
  • ईश्वर परिधान (Ishwar Pridhan, God Consciousness)।

3. आसन (Asana or Posture) आसनों की संख्या उतनी है जितनी कि इस संसार में पशु-पक्षियों की। आसन-शारीरिक क्षमता, शक्ति के अनुसार, प्रतिदिन सांस द्वारा हवा को बाहर निकलने, सांस रोकने और फिर सांस लेने से करने चाहिएं।

4. प्राणायाम (Pranayma, Regulation of Breathing), प्राणायाम उपासना की मांग है। इसको तीन भागों में बांटा जा सकता है—

  • पूरक (Purak, Inhalation)।
  • रेचक (Rechak, Exhalation) और
  • कुम्भक (Kumbhak, Holding of Breath)। कई प्रकार से सांस लेने तथा इसे रोककर बाहर निकालने को प्राणायाम कहते हैं।

5. प्रत्याहार (Pratyahara)– प्रत्याहार से अभिप्राय: है वापिस लाना तथा सांसारिक प्रसन्नताओं से मन को मोड़ना।

6. धारणा (Dharna)-अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखने को धारणा कहते हैं जो बहुत कठिन है।

7. ध्यान (Dhyana)–जब मन पर नियन्त्रण हो जाता है तो ध्यान लगना आरम्भ हो जाता है। इस अवस्था में मन और शरीर नदी के प्रवाह की भान्ति हो जाते हैं जिसमें पानी की धाराओं का कोई प्रभाव नहीं होता।

8. समाधि (Samadhi)-मन की वह अवस्था जो धारणा से आरम्भ होती है, समाधि में समाप्त हो जाती है। इन सभी अवस्थाओं का आपस में गहरा सम्बन्ध है।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

Punjab State Board PSEB 7th Class Agriculture Book Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Agriculture Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

PSEB 7th Class Agriculture Guide फसलों के कीट और बीमारियाँ Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
धान की फसल की किस बीमारी से बंगाल में अकाल पड़ा ?
उत्तर-
भूरी चित्ती की बीमारी।

प्रश्न 2.
पंजाब में कपास की फसल का 1996-2002 तक किस कीट ने सबसे अधिक नुकसान किया ?
उत्तर-
अमरीकन सुंडी।

प्रश्न 3.
उन फसलों को क्या कहते हैं, जिनमें किसी अन्य जीव/जंतु के जीन जाते हैं ?
उत्तर-
ट्रांसजेनिक।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 4.
क्या रासायनिक दवाइयाँ मनुष्य के लिए हानिकारक हैं ?
उत्तर-
रासायनिक दवाइयां मनुष्य के लिए हानिकारक हैं क्योंकि यह ज़हर होती हैं।

प्रश्न 5.
किसी एक फसल के जीवाणु रोग का नाम लिखो।
उत्तर-
तने का गलना।

प्रश्न 6.
किसी एक फसल के विषाणु रोग का नाम लिखो।
उत्तर-
ठुठ्ठी रोग।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 7.
कोई दो रस चूसने वाले कीटों के नाम लिखो।
उत्तर-
तेला, चेपा।

प्रश्न 8.
कोई दो फल और तना छेदक कीटों के नाम लिखो।
उत्तर-
गन्ने का कीट, चितकबरी सुंडी, बैंगन की सुंडी, मक्की की फसल की शाख की मक्खी ।

प्रश्न 9.
पौधों की बीमारियों का फैलाव कैसे होता है ?
उत्तर-
बीमारी वाले बीज, बामारी वाले खेत, वर्षा तथा तेज़ हवा के कारण।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 10.
क्या एक कीट कई फसलों का नुकसान कर सकता है ? उदाहरण दें।
उत्तर-
हां, कर सकता है, जैसे-तेला, कपास, मक्की, धान आदि को हानि पहुंचाता

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
पौध-संरक्षण के कौन-कौन से ढंग हैं ?
उत्तर-
पौध संरक्षण के ढंग हैं-रासायनिक दवाइयां, रोग सहन करने वाली किस्में, भिन्न कीटनाशकों का प्रयोग, फसल की काश्त संबंधी व्यवस्थित तरीके; जैसे-बिजाई का समय, सिंचाई और खाद प्रबन्धन आदि कई मकैनिकल तरीके।

प्रश्न 2.
ट्रांसजेनिक विधि क्या होती है ?
उत्तर-
यह पौध संरक्षण का आधुनिक ढंग है। इस विधि में किसी भी जीव-जंतु से आवश्यक जीन फसलों में डाल कर पौध संरक्षण किया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
पौध-संरक्षण के असफल होने से कैसी स्थिति पैदा हो जाती है ?
उत्तर-
पौध संरक्षण के फेल होने से अकाल जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।

प्रश्न 4.
अलग-अलग फसलों के रस चूसने वाले कीट कौन-से हैं ?
उत्तर-

रस चूसने वाला कीट फसल का नाम
1. तेला कपास, भिंडी, आम आदि
2. चेपा तेल बीज, गेहूँ, आड़ आदि
3. सफेद मक्खी कपास, टमाटर, पपीता आदि
4. मिली बग्ग कपास, आम, नींबू जाति के फल आदि।।

 

प्रश्न 5.
विषाणु रोग का फैलाव कैसे होता है और रोकथाम कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
पौधों में कीड़े-मकौड़ों द्वारा विषाणु रोग फैलते हैं। इनकी प्रभावशाली तरीके से रोकथाम मुश्किल है।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 6.
फंगस से होने वाली फसलों की मुख्य बीमारियाँ कौन-सी हैं ?
उत्तर-
फंगस या फंफूद से होने वाली बीमारियां हैं-झुलस रोग, बीज गलन रोग, कंगियारी, चिटों रोग।

प्रश्न 7.
कीड़े-मकौड़ों की कौन-सी मुख्य विशेषताएं हैं, जिनके कारण वह धरती पर अधिक संख्या में विद्यमान हैं ?
उत्तर-
शारीरिक बनावट, फलने-फूलने का ढंग, भिन्न-भिन्न भोजन पदार्थों की खाने की समर्था, फुर्तीलापन आदि ऐसे गुण हैं।

प्रश्न 8.
तना छेदक और फल छेदक कीट फसल का कैसे नुकसान करते हैं ?
उत्तर-
ये कीट पौधे के भिन्न-भिन्न भागों के अन्दर जाकर नुकसान करते हैं; जैसेतने में छेद करते हैं, सब्जियों तथा फलों के अन्दर जाते हैं।

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प्रश्न 9.
पत्ते खाने वाले कीट फसल का कैसे नुकसान करते हैं ?
उत्तर-
यह कीट पत्तों को खाकर पौधे की प्रकाश संश्लेषण की समर्था को कम कर देते हैं।

प्रश्न 10.
रासायनिक दवाइयों के प्रयोग के लिए किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ?
उत्तर-
रासायनिक दवाइयों को बच्चों की पहुंच से दूर रखना चाहिए। प्रयोग के समय पूरी सावधानी रखनी चाहिए, यदि ये जहर चढ़ जाए तो तुरंत डॉक्टर को बुला लेना चाहिए।

(ग) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
हानिकारक कीट फसलों को किन-किन तरीकों से नुकसान पहुँचाते
उत्तर-
हानिकारक कीट फसलों को अलग-अलग ढंग से हानि पहुंचाते हैं—
1. कई कीट ; जैसे-तेला, चेपा, सफेद मक्खी , मिली बग्ग आदि पत्तों में से रस चूस कर इनमें से हरा मादा तथा खनिज पदार्थों की कमी कर देते हैं। इस तरह पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा पौधे की वृद्धि रुक जाती है।
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चित्र-फसल रस चूसने वाले कीट
चित्र-रस चूसने वाले कीट
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चित्र-कपास की फसल पर टींडे की सुंडी का हमला
चित्र-तना छेदक कीट का हमला
चित्र-पत्ते को काट कर खाने वाली स्लेटी सुंडी

2. कुछ कीट पौधों के फलों तथा तनों आदि में जाकर नुकसान करते हैं; जैसे-गन्ने का कीट, मक्की की फसल में शाख की मक्खी, कपास की अमरीकन सुंडी आदि।

3. कुछ कीट पत्तों को खाकर प्रकाश संश्लेषण की समर्था कम कर देते हैं। यह या तो पत्तों को किनारों से मुख्य नाड़ी की तरफ खा जाते हैं या पत्तों का हरा मादा खा जाते हैं तथा पत्ते को छननी जैसा बना देते हैं। यह हैं-टिड्डे, सैनिक सुंडी, कंबल कीड़ा, हड्डा भंग आदि।

4. कुछ कीट जैसे दीमक, सफेद सुंडी ज़मीन के नीचे वाले भाग, जैसे-जडें, तना आदि को खा जाते हैं तथा पौधा मर जाता है।

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प्रश्न 2.
फसलों की बीमारियों के मुख्य रूप से क्या-क्या कारण हैं ?
उत्तर-
फसलों को भिन्न-भिन्न अवस्था में फंगस, जीवाणु, विषाणु आदि से कई प्रकार की बीमारियां लग जाती हैं। पौधे की बीमारियां मुख्य रूप से बीमारी वाले बीजों, बीमारी वाले खेतों, वर्षा तथा तेज़ हवा के कारण एक खेत से दूसरे खेत में फैलती हैं।
फंगस से होने वाली बीमारियां—
फफूंद से होने वाली बीमारियां हैं—
झुलस रोग, बीज गलन रोग, कंगियारी, चिंटो रोग।
जीवाणुओं से होने वाली बीमारियां-तने का गलना, पत्तों का धब्बा रोग आदि। विषाणुओं से होने वाले रोग-जैसे ठुठ्ठी रोग, चितकबरा रोग।
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चित्र-बीज गलन रोग
चित्र-मूंगी का चितकबरा रोग
PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ 4
चित्र-कपास का ठूठी रोग

प्रश्न 3.
फसल-संरक्षण की क्या महत्ता है ?
उत्तर-
कृषि के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई है। बहुत उन्नत किस्में तथा नई तकनीकें खोज ली गई हैं परन्तु अधिक पैदावार लेने के लिए कीटों तथा रोगों से फसल का बचाव करना भी बहुत आवश्यक है। प्रत्येक वर्ष कीटों तथा रोगों के कारण एक तिहाई पैदावार का नुकसान हो जाता है। यह बचाव ही पौध संरक्षण है या फसल सुरक्षा है। यदि फसल की रोगों तथा कीटों के हमले से सुरक्षा नहीं की जाएगी तो अकाल पड़ सकता है, जैसे कि 1943 में बंगाल में धान को भूरी चित्ती के रोग के कारण हुआ था तथा 1996-2002 के दौरान पंजाब में कपास पर अमरीकन सुंडी के हमले के कारण सारी फसल ही नष्ट होने की कगार पर पहुंच गई थी। इसलिए फसल को सुरक्षित रख कर ही अधिक पैदावार तथा अधिक लाभ लिया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
बीमारी या कीट के हमले से पहले पौध-संरक्षण के लिए कौन-से ढंग और सावधानियां अपनानी चाहिएं ?
उत्तर-
बीमारी या कीट के हमले से पहले अपनाए जाने वाले ढंग और सावधानियां इस प्रकार हैं—

  1. ऐसी किस्मों का चयन करें जो रोग सहने की समर्था रखती हों।
  2. बीजों की सुधाई करके बोना चाहिए।
  3. कुछ बीमारियों तथा कीटों से बचाव, खेतों को धूप में खुला रख कर किया जा सकता है।
  4. सिंचाई, खादें तथा दवाइयों का प्रयोग सही मात्रा में करना चाहिए, अनावश्यक नहीं ।
  5. खेतों के आस-पास मेडों पर खरपतवार को समाप्त करने से कीटों का हमला कम होता है।

प्रश्न 5.
बीमारी या कीट के हमले के बाद पौध-संरक्षण के लिए कौन-से ढंग और सावधानियां अपनानी चाहिएं ?
उत्तर-
बीमारी या कीटों का हमला होने के बाद प्रयोग किए जाने वाले ढंग इस प्रकार

  1. सबसे पहले बीमारी कौन-सी है, इसका कारण क्या है पता लगाएं। इसी प्रकार कीटों की पहचान करना भी आवश्यक है। इसके बाद इनकी रोकथाम की योजना तैयार करनी चाहिए। जैसे विषाणु रोग में इसको फैलाने वाले कीटों की रोकथाम करनी आवश्यक है।
  2. शुरू में ही जब बीमारी या कीटों का हमला कम होता है। ऐसे पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।
  3. कीट या बीमारी के कारण हुए नुकसान के लिए दिए गए चेतावनी वाले स्तर पर ही रासायनिक कीटनाशकों/फंफूदी नाशकों का प्रयोग करना चाहिए।
  4. रासायनिक दवाइयों का चुनाव कीट के स्वभाव, हमले की निशानियां तथा बीमारी के कारण के अनुसार ही करना चाहिए।
  5. रासायनिक दवाइयों का सही मात्रा तथा सही समय का ध्यान रख कर ही प्रयोग करना चाहिए।

योग्यता विस्तार–अलग-अलग फसलों/सब्जियों पर बीमारियों के हमले वाले नमूने इकट्ठे करके एक फाइल तैयार करो।

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Agriculture Guide for Class 7 PSEB फसलों के कीट और बीमारियाँ Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
तेला कौन-सी फसलों को नुकसान पहुंचाता है ?
उत्तर-
कपास, भिण्डी, मक्का, आम आदि।

प्रश्न 2.
चेपा कौन-सी फसलों को हानि करता है ?
उत्तर-
गेहूं, तेल बीज, गाजरी पौधे, आडू

प्रश्न 3.
सफेद मक्खी कौन-सी फसलों को हानि पहुंचाती है ?
उत्तर-
नरमा, दालें, टमाटर, पपीता आदि।

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प्रश्न 4.
मिली बग्ग कौन-सी फसलों को हानि पहुंचाता है ?
उत्तर-
नरमा, आम, नींबू जाति के फल, पपीता आदि।

प्रश्न 5.
किसी तना छेदक कीट का नाम बताएं।
उत्तर-
मक्की की फसल में शाख की मक्खी, कमाद का कीट।

प्रश्न 6.
फल छेदक कीट की पहचान कैसे की जाती है ?
उत्तर-
कीट द्वारा छोड़े गए मल-मूत्र से।

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प्रश्न 7.
फल छेदक कीट का उदाहरण दें।
उत्तर-
अमरीकन सुंडी, बैंगन की सुंडी।

प्रश्न 8.
पत्तों को काटकर खाने वाले कीट पत्ते को कैसे खाते हैं ?
उत्तर-
यह पत्तों को किनारों से मुख्य नाड़ी की तरफ खाते हैं।

प्रश्न 9.
पत्तों को काट कर खाने वाले कीटों का उदाहरण दें।
उत्तर-
टिड्डे, सैनिक सुंडी, स्लेटी सुंडी, लाल सुंडी, भुंग आदि।

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प्रश्न 10.
पत्तों को छननी बनाने वाले कीट पत्तों का कैसे नुकसान करते हैं ?
उत्तर-
यह पत्तों का हरा मादा खा जाते हैं परन्तु पत्तों की नाड़ियों को नुकसान नहीं करते जिस कारण पत्ते छननी जैसे हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
पत्तों को छननी जैसा बनाने वाले कीटों के नाम बताओ।
उत्तर-
हड्डा भुंग, कंबल कीड़ा, गोभी की तितली।

प्रश्न 12.
जड़ को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के नाम बताओ।
उत्तर-
दीमक, सफेद सुंडी।

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प्रश्न 13.
झुलस रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
पानी रिसते धब्बे पत्तों तथा तनों पर बनते हैं। सफेद फंफूद पत्तों के निचली ओर दिखाई देती है।

प्रश्न 14.
बीज गलन रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
ज़मीन के अन्दर ही बीज गल जाता है।

प्रश्न 15.
कंगियारी के लक्षण बताओ।
उत्तर-
इसमें दानों के स्थान पर काला धुड़ा बन जाता है।

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प्रश्न 16.
चिटों रोग कौन-सी फसल को लगते हैं ?
उत्तर-
बेर, मटर, आदि।

प्रश्न 17.
विषाणु रोग कैसे फैलते हैं ?
उत्तर-
विषाणु रोग कीड़े-मकौड़ों द्वारा फैलते हैं।

प्रश्न 18.
नरमे (कपास) में सफेद मक्खी कौन-सा रोग फैलाती है ?
उत्तर-
ठुठ्ठी रोग।

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प्रश्न 19.
क्या विषाणु रोगों की रोकथाम आसानी से हो जाती है ?
उत्तर-
नहीं, इनकी रोकथाम मुश्किल है।

प्रश्न 20.
ठुठ्ठी रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
पत्ते किनारों से अन्दर की ओर मुड जाते हैं।

प्रश्न 21.
चितकबरा रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
पत्तों पर बिना क्रम के पीले तथा हरे धब्बे पड़ जाते हैं।

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प्रश्न 22.
पपीते को लगने वाला एक विषाणु रोग बताओ।
उत्तर-
ठुठ्ठी रोग।

प्रश्न 23.
मूंगी को लगने वाला एक विषाणु रोग बताओ।
उत्तर-
चितकबरा रोग।

प्रश्न 24.
कीटों तथा बीमारियों की उचित रोकथाम को कितने भागों में बांट सकते हैं ?
उत्तर-
दो भागों में।

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प्रश्न 25.
कीटों या बीमारियों को समाप्त करने के लिए रसायनों का चुनाव किस अनुसार करना चाहिए ?
उत्तर-
कीट के स्वभाव, हमले की निशानियां तथा बीमारी के कारण के अनुसार।

प्रश्न 26.
यदि किसी को जहर चढ़ जाए तो क्या पिला कर उल्टी करवानी चाहिए ?
उत्तर-
नमक वाला पानी पिला कर।

प्रश्न 27.
उल्टी किस स्थिति में नहीं करवानी चाहिए ?
उत्तर-
जब मरीज़ बेहोश हो जाए।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
यदि कीटनाशक दवाइयां किसी की आंखों में पड़ जाएं तो क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
आंखों की पलकें खुली रखें और डॉक्टर के आने तक पानी से धोते रहें। डॉक्टर के बिना बताए कोई भी दवाई आँखों में न डालें।

प्रश्न 2.
कीटों का फसलों के विकास से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर-
कई कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे उपज कम हो जाती है। कुछ कीट लाभकारी होते हैं; जैसे-मधुमक्खियां जो परागण क्रिया द्वारा फसलों की उपज बढ़ाने में सहायता करती हैं।

प्रश्न 3.
कीटनाशक दवाइयों की खाली बोतलों और डिब्बों को क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
खाली बोतलों और डिब्बों को जलाने की बजाय भूमि में दबा देना चाहिए।

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प्रश्न 4.
कृषि ज़हर छिड़काव करने वाले के खाने-पीने के बारे में बताएं।
उत्तर-
भूखे पेट छिड़काव न करें तथा छिड़काव के दौरान कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। पहले ही पेट भरकर खाना खा लेना चाहिए।

प्रश्न 5.
सांस द्वारा अंदर गए जहर से बचाव के बारे में बताएं।
उत्तर-
रोगी को शीघ्र खुली हवा में ले जाएं तथा बंद कमरे की सभी खिड़कियां तथा दरवाजे खोल दें। रोगी के कपड़ों को ढीला कर दें। यदि सांस बंद हो रही हो या चाल में परिवर्तन नज़र आए तो उसे बनावटी सांस दें, परन्तु छाती पर भार न डालें। रोगी को सर्दी न लगने दें उसे कंबल आदि दें। रोगी को बोलने न दें। रोगी को घबराहट हो तो उसे अन्धेरे कमरे में रखें। वहां शोर आदि न करें।

प्रश्न 6.
रोमों द्वारा अंदर गए जहर से बचाव के बारे में बताएं।
उत्तर–
पानी से शरीर को गीला करें तथा रोगी के सारे कपड़े उतारकर शरीर पर लगातार पानी डालें। शरीर को पानी से लगातार साफ़ करें। शरीर को जल्दी धो लें, क्योंकि इससे काफ़ी फर्क पड़ता है।

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प्रश्न 7.
जहरीली दवाई आंख में पड़ जाने पर क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
ऐसी हालत में निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए—

  1. आंखों की पलकें खुली रखें।
  2. बहते पानी से जितनी जल्दी हो आंखों को धीरे-धीरे धोएं।
  3. डॉक्टर के आने तक आंखों को धोते रहें।
  4. किसी दवाई का प्रयोग डॉक्टर की सलाह के बिना न करें। ग़लत दवाई हानिकारक हो सकती है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि जहर से बचाव के आम साधन बताएं।
उत्तर-
रोगी को ठंड से बचाने के लिए हल्के कंबल का प्रयोग करें। इस काम के लिए गर्म पानी वाली बोतल का प्रयोग न करें। रोगी का बिस्तर पांव की तरफ से ऊंचा रखें तथा टांग और बाजुओं को फीतों से बांध दें। रोगी को चुस्ती के लिए हाइपोडरमिक टीके जैसे कैफीन तथा एपाइनाफ्रिन लगाएं। डेक्सटरोज 5% का घोल नाड़ी से शरीर में भेजें। रोगी को खून या प्लाज़मा भी दें। रोगी को तेज़ तथा ज्यादा दवाइयां देकर न थकाएं।

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प्रश्न 2.
कृषि ज़हरों के उचित प्रयोग का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
कृषि ज़हरों के उचित प्रयोग के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है, जो इस प्रकार हैं—

  1. पहले कीड़े, बीमारी तथा नदीनों की पहचान करके ही बताए गए ज़हर को उचित मात्रा में प्रयोग करें। हर कीड़े, बीमारी तथा नदीन के लिए अलग-अलग ज़हर अलग-अलग मात्रा में प्रयोग किया जाता है।
  2. दुकानदार की ग़लत राय न मानें बल्कि कृषि विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करें।
  3. कभी भी कीटनाशक और नदीननाशकों को कृषि विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किए बगैर मिलाकर न छिड़कें।
  4. कृषि ज़हरों का छिड़काव जिस दिन हवा न चल रही हो या कम हवा चलने के दौरान ही किया जाना चाहिए। छिड़काव करने वाले व्यक्ति का मुँह भी हवा की दिशा से उल्टा होना चाहिए।
  5. यदि छिड़काव करने के 24 घंटे के भीतर वर्षा हो जाए तो दोबारा छिड़काव करें।

प्रश्न 3.
कृषि ज़हरों के सुरक्षित प्रयोग के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
इनके सुरक्षित प्रयोग के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए—

  1. घरों में इन कीटनाशकों को खाने-पीने की वस्तुओं तथा दवाइयों से दूर रखें।
  2. कृषि ज़हर की शीशी या डिब्बे पर लिखे निर्देशों को ध्यान से पढ़कर ही उसे प्रयोग में लाएं।
  3. कीटनाशक दवाइयों वाली बोतलों और डिब्बों का दोबारा प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. कृषि ज़हरों को घर में हमेशा बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
  5. यदि छिड़काव करते समय नोजल बंद हो जाए तो कभी भी मुँह से फूंक मारकर इसे खोलने की कोशिश न करें।
  6. छिड़काव करने से पहले ही पेट भर खाना खा लेना चाहिए। कभी भी खाली पेट छिड़काव न करें। खाने-पीने से पहले अच्छी तरह साबुन से हाथ धो लें।
  7. छिड़काव करने वाले व्यक्ति को दिन में 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करना चाहिए।
  8. कीटनाशक दवाइयों को पानी में घोलते समय छींटा वगैरह नहीं पड़ने देना चाहिए।
  9. तेज़ हवा वाले दिन छिड़काव न करें।
  10. छिड़काव का काम खत्म करके पहने हुए कपड़े बदलकर साबुन से अच्छी तरह धो लें।
  11. दवाई वाले खाली डिब्बों को न जलाएं बल्कि इन्हें भूमि में दबा दें।

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प्रश्न 4.
निगली हुई कीटनाशक दवाई से बचाव के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
यदि कृषि ज़हर निगल लिया हो तो उल्टी करवानी चाहिए। इसके लिए एक चम्मच नमक गर्म पानी में घोलकर रोगी को दें तथा तब तक देते रहें जब तक उल्टी न हो जाए। गले को उंगली से धीरे-धीरे टटोलें या चम्मच की पिछली तरफ को गले में रखने से जब पेट नमकीन पानी से भर जाए तो उल्टी आसानी से होगी।

यदि रोगी पहले ही उल्टी कर दे तो उसे बिना नमक के गर्म पानी ज्यादा मात्रा में दें। साथ बताए गए निर्देशों का पालन करें। यदि रोगी बेहोश हो जाए तो उल्टी की दवाई न दें।

फसलों के कीट और बीमारियाँ PSEB 7th Class Agriculture Notes

  • फसलों की अधिक पैदावार के लिए फसलों की कीटों तथा बीमारियों से सुरक्षा बहुत आवश्यक है।
  • प्रत्येक वर्ष बीमारियों तथा कीटों के कारण एक तिहाई पैदावार का नुकसान हो जाता है।
  • बंगाल में 1943 में धान में भूरी चित्ती की बीमारी के कारण अकाल पड़ गया था।
  • पंजाब में 1996 से 2002 तक अमरीकन सुंडी के हमले के कारण कपास की फसल तबाह हो गई थी।
  • कीड़े-मकौड़ों की जातियां अन्य सभी प्राणियों से अधिक हैं। ये अपने आप को प्रत्येक वातावरण में ढाल लेते हैं।
  • फसल को मुख्य रूप से चार प्रकार के कीट नुकसान पहुँचाते हैं।
  • रस चूसने वाले कीट हैं-तेला, चेपा, सफेद मक्खी आदि।
  • फल और तना छेदक कीट हैं-गन्ने का कीट, गुलाबी सुंडी, शाख की मक्खी, अमरीकन तथा चितकबरी सुंडी, बैंगन की सुंडी आदि।
  • पत्तों को खाने वाले कीट-टिड्डे, सैनिक सुंडी, लाल भंग, स्लेटी भंग आदि।
  • पत्तों को छननी बनाने वाले कीट हैं-हड्डा भंग, कंबल कीड़ा, गोभी की तितली आदि।
  • जड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-दीमक, सफेद सुंडी आदि।
  • फसलों को बीमारियां, फंगस, जीवाणु, विषाणु आदि से लगती हैं।
  • फफूंद से लगने वाली बीमारियां हैं-झुलस रोग, बीज गलन रोग, कंगियारी, चिंटो रोग।
  • विषाणुओं से लगने वाले रोग हैं-ठुठ्ठी रोग, चितकबरा रोग।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

मिसलों की उत्पत्ति तथा विकास (Origin and Development of Misls)

प्रश्न 1.
पंजाब में सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास का विवरण दीजिए।
(Trace the origin and development of Sikh Misls in the Punjab.)
अथवा
‘मिसल’ शब्द का आप क्या अर्थ समझते हैं ? सिख मिसलों की उत्पत्ति का वर्णन कीजिए।
(What do you understand by the term ‘Misl? ? Describe the origin of the Sikh Misls.)
अथवा
मिसल की परिभाषा दीजिए। आप सिख मिसलों की उत्पत्ति और विकास के विषय में क्या जानते हैं ?
(Define Misl. What do you know about the origin and growth of Sikh Misls ?)
अथवा
‘मिसल’ शब्द से आपका क्या अभिप्राय है ? प्रमुख सिख मिसलों के इतिहास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(What do you understand by the term ‘Misl’ ? Give an account of the history of the important Sikh Misls.)
अथवा
‘मिसल’ शब्द से क्या भाव है ? सिख मिसलों की उत्पत्ति और विकास का वर्णन करें।
(What do you mean by word Misl ? Describe the origin and growth of Sikh Misls.)
उत्तर-
शताब्दी में पंजाब में सिख मिसलों की स्थापना यहाँ के इतिहास के लिए एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।
(क) सिख मिसल से अभिप्राय (The Meaning of the Sikh Misl)-मिसल अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है एक समान या बराबर। 18वीं शताब्दी के दूसरे मध्य में पंजाब में सिखों ने 12 मिसलें स्थापित कर ली थीं। प्रत्येक मिसल का सरदार दूसरी मिसल के सरदारों के साथ एक जैसा व्यवहार करता था परंतु वे अपना आंतरिक शासन चलाने में पूर्ण रूप से स्वतंत्र थे। सिख जत्थों की इस सामान्य विशेषता के कारण उनको मिसलें कहा जाता था।

(ख) सिख मिसलों की उत्पत्ति (Origin of the Sikh Misls)—मुग़लों के सिखों पर बढ़ रहे अत्याचारों और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण को देखते हुए नवाब कपूर सिंह ने सिखों में एकता की कमी अनुभव की। इस उद्देश्य से 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में वैशाखी के दिन दल खालसा की स्थापना की गई। दल खालसा के अधीन 12 जत्थे गठित किए गए। प्रत्येक जत्थे का अपना अलग सरदार और झंडा था। इन जत्थों को ही मिसल कहा जाता था। इन मिसलों ने सन् 1767 ई० से 1799 ई० के दौरान पंजाब के विभिन्न भागों में अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे।

(ग) सिख मिसलों का विकास (Growth of the Sikh Misls)-1767 ई० से लेकर 1799 ई० के दौरान जमुना और सिंध नदियों के बीच के क्षेत्रों में सिखों ने 12 स्वतंत्र मिसलें स्थापित की। इन मिसलों के विकास और उनके इतिहास संबंधी संक्षेप जानकारी निम्नलिखित अनुसार है—
1. फैजलपुरिया मिसल (Faizalpuria Misl)-इस मिसल का संस्थापक नवाब कपूर सिंह था। उसने सर्वप्रथम अमृतसर के समीप फैज़लपुर नामक गाँव पर अधिकार किया था। इसलिए इस मिसल का नाम फैज़लपुरिया मिसल पड़ गया था। नवाब कपूर सिंह अपनी वीरता के कारण सिखों में बहुत प्रख्यात था। फैजलपुरिया मिसल के अधीन जालंधर, लुधियाना, पट्टी, नूरपुर तथा बहिरामपुर आदि प्रदेश सम्मिलित थे। 1753 ई० में नवाब कपूर सिंह की मृत्यु के उपरांत खुशहाल सिंह तथा बुद्ध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

2. भंगी मिसल (Bhangi Misl) भंगी मिसल की स्थापना यद्यपि सरदार छज्जा सिंह ने की थी परंतु सरदार हरी सिंह को इस मिसल का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। झंडा सिंह एवं गंडा सिंह इस मिसल के अन्य प्रसिद्ध नेता थे। इस मिसल का लाहौर, अमृतसर, गुजरात एवं स्यालकोट आदि प्रदेशों पर अधिकार था। क्योंकि इस मिसल के नेताओं को भंग पीने की बहुत आदत थी इसलिए इस मिसल का नाम भंगी मिसल पड़ा। .

3. आहलूवालिया मिसल (Ahluwalia Misl) आहलूवालिया मिसल की स्थापना सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने की थी। क्योंकि वह लाहौर के निकट आहलू गाँव का निवासी था इसलिए इस मिसल का नाम आलहूवालिया पड़ा। वह एक महान् नेता था। उसे 1748 ई० में दल खालसा का प्रधान सेनापति बनाया गया था। उसने लाहौर, कसूर एवं सरहिंद पर अधिकार करके अपनी वीरता का प्रमाण दिया। उसे सुल्तान-उल-कौम की उपाधि से सम्मानित किया गया था। आहलूवालिया मिसल की राजधानी का नाम कपूरथला था। 1783 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया की मृत्यु के पश्चात् भाग सिंह तथा फतेह सिंह आहलूवालिया ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

4. रामगढ़िया मिसल (Ramgarhia Misl)-रामगढ़िया मिसल का संस्थापक खुशहाल सिंह था। इस मिसल का सबसे प्रख्यात नेता सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया था। उसने दीपालपुर, कलानौर, बटाला, उड़मुड़ टांडा, हरिपुर एवं करतारपुर नामक प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया था। इस मिसल की राजधानी का नाम श्री हरगोबिंदपुर था। 1803 ई० में जस्सा सिंह रामगढ़िया की मृत्यु के उपरांत सरदार जोध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया। .

5. शुकरचकिया मिसल (Sukarchakiya Misl)-शुकरचकिया मिसल का संस्थापक सरदार चढ़त सिंह था। क्योंकि उसके पुरखे शुकरचक गाँव से संबंधित थे इसलिए इस मिसल का नाम शुकरचकिया मिसल पड़ा। वह एक साहसी योद्धा था। उसने ऐमनाबाद, गुजराँवाला, स्यालकोट, वजीराबाद, चकवाल, जलालपुर तथा रसूलपुर
आदि प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया था। शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम गुजराँवाला था। चढ़त सिंह के पश्चात् महा सिंह तथा रणजीत सिंह ने शुकरचकिया मिसल का कार्यभार संभाला। 1799 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर पर अधिकार कर लिया था तथा यह विजय पंजाब के इतिहास में एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।

6. कन्हैया मिसल (Kanahiya Misl) कन्हैया मिसल का संस्थापक जय सिंह था। क्योंकि वह कान्हा गाँव का निवासी था इसलिए इस मिसल का नाम कन्हैया मिसल पड़ा। जय सिंह काफी बहादुर था। उसने मुकेरियाँ, गुरदासपुर, पठानकोट तथा काँगड़ा के क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया था। 1798 ई० में जय सिंह की मृत्यु के पश्चात् सदा कौर इस मिसल की नेता बनी। वह महाराजा रणजीत सिंह की सास थी तथा बहुत महत्त्वाकांक्षी थी।

7. फूलकियाँ मिसल (Phulkian Misl)-फूलकियाँ मिसल की स्थापना चौधरी फूल नामक एक जाट ने की थी। इसमें पटियाला, नाभा तथा जींद के प्रदेश शामिल थे। पटियाला के प्रख्यात फूलकियाँ सरदार बाबा आला सिंह, अमर सिंह तथा साहिब सिंह, नाभा के हमीर सिंह एवं जसवंत सिंह तथा जींद के गजपत सिंह एवं भाग सिंह थे।

8. डल्लेवालिया मिसल (Dallewalia Misl)–डल्लेवालिया मिसल का संस्थापक गुलाब सिंह था। तारा सिंह घेबा इस मिसल का प्रख्यात सरदार था। इस मिसल का फिल्लौर, राहों, नकोदर, बद्दोवाल आदि प्रदेशों पर अधिकार था।

9. नकई मिसल (Nakkai Misl)—नकई मिसल का संस्थापक सरदार हीरा सिंह था। उसने नक्का, चुनियाँ, दीपालपुर, कंगनपुर, शेरगढ़, फरीदाबाद आदि प्रदेशों पर अधिकार करके नकई मिसल का विस्तार किया। रण सिंह नकई सरदारों में से सबसे अधिक प्रसिद्ध था। उसने कोट कमालिया तथा शकरपुर के प्रदेशों पर अधिकार करके नकई मिसल में शामिल किया।

10. निशानवालिया मिसल (Nishanwalia Misl)-इस मिसल का संस्थापक सरदार संगत सिंह था। इस मिसल के सरदार दल खालसा का झंडा या निशान उठाकर चलते थे, जिस कारण इस मिसल का नाम निशानवालिया मिसल पड़ गया। संगत सिंह ने अंबाला, शाहबाद, सिंघवाला, साहनेवाल, दोराहा आदि प्रदेशों पर कब्जा करके अपनी मिसंल का विस्तार किया। उसने सिंघवाला को अपनी राजधानी बनाया। 1774 ई० में संगत सिंह की मृत्यु के बाद उसका भाई मोहन सिंह इस मिसल का सरदार बना।

11. शहीद मिसल (Shahid Misl) शहीद मिसल का संस्थापक सरदार सुधा सिंह था। क्योंकि इस मिसल के सरदार अफ़गानों के साथ हुई लड़ाइयों में शहीद हो गए थे इस कारण इस मिसल को शहीद मिसल कहा जाने लगा। बाबा दीप सिंह जी, इस मिसल के सबसे लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने 1757 ई० में अमृतसर में अफ़गानों से लड़ते हुए शहीदी प्राप्त की थी। कर्म सिंह और गुरबख्श सिंह इस मिसल के दो अन्य दो अन्य ख्याति प्राप्त नेता थे। इस मिसल में सहारनपुर, शहजादपुर और केसनी नाम के क्षेत्र शामिल थे। इस मिसल के अधिकतर लोग निहंग थे जो नीले वस्त्र पहनते थे। इसलिए शहीद मिसल को निहंग मिसल भी कहा जाता है।

12. करोड़सिंधिया मिसल (Krorsinghia Misl)—इस मिसल का संस्थापक करोड़ा सिंह था जिस कारण इसका नाम करोड़सिंघिया मिसल पड़ गया। क्योंकि करोड़ा सिंह पंजगड़िया गाँव का रहने वाला था इसलिए इस मिसल को पंजगड़िया मिसल भी कहा जाता है। 1764 ई० में करोड़ा सिंह की मृत्यु के पश्चात् बघेल सिंह इस मिसल का मुखिया बना। वह करोड़सिंघिया मिसल के मुखियों में से सबसे अधिक प्रसिद्ध था। उसने करनाल के निकट स्थित चलोदी को अपनी राजधानी बनाया। उसने नवांशहर और बंगा के क्षेत्रों को अपनी मिसल में सम्मिलित किया। बघेल सिंह की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र जोध सिंह मिसल का सरदार बना। उसने मालवा के कई प्रदेशों पर कब्जा कर लिया था।

सिख मिसलों के शासक अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप में शासन करते थे, परंत उनकी विशेष बात यह थी कि वे समस्त सिख जाति के साथ संबंधित मामलों पर विचार करने के लिए विशेष अवसरों पर अकाल तख्त साहिब अमृतसर में एकत्र होते थे। यहाँ वे गुरु ग्रंथ साहिब की उपस्थिति में प्रस्ताव पास करते थे। इन्हें गुरमता कहा जाता था। इन गुरमतों का सभी सिख सम्मान करते थे। इस कारण उनमें आपसी संबंध बने रहे।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

मिसल का राज्य प्रबंध (Administration of the Misls)

प्रश्न 2.
सिख मिसलों के संगठन पर एक नोट लिखें। (Write a note on the Organisation of the Sikh Misls.)
अथवा
मिसलों के संगठन की प्रकृति का वर्णन कीजिए। (Discuss the nature of the Organisation of Misls.)
अथवा
सिख मिसलों के राज प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ लिखिए। (Bring out the main features of the Administration of the Sikh Misls.)
अथवा
मिसलों के नागरिक तथा सैनिक प्रबंध का विवरण दें। (Give an account of Civil and Military Administration of the Misls.)
अथवा
सिख मिसलों की उत्पत्ति और विकास के विषय में आप क्या जानते हो ? (What do you know about the origin and growth of the Sikh Misls ?)
अथवा
मिसलों के अंदरूनी शासन प्रबन्ध की व्याख्या करो।
(Describe the internal administration system of the Misls.)
उत्तर-
सिख मिसलों के संगठन का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
I. गुरमता (Gurmata)
गुरमता सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था थी। इसका शाब्दिक अर्थ है, “गुरु का मत या निर्णय”। दूसरे शब्दों में गुरु ग्रंथ साहिब जी की उपस्थिति में सरबत खालसा द्वारा जो निर्णय स्वीकार किए जाते हैं उनको गुरमता कहते हैं। सरबत खालसा के सम्मेलनों में सिख पंथ के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मामलों से संबंधित गुरमते पास किए जाते थे। सभी सिख इन गुरमतों को गुरु की आज्ञा मान कर पालना करते थे।

II. मिसलों का आंतरिक संगठन (Internal Organisation of the Misls)
1. सरदार और मिसलदार (Sardar and Misldar)-प्रत्येक मिसल के मुखिया को सरदार कहा जाता था और प्रत्येक सरदार के अधीन कई मिसलदार होते थे। सरदार की तरह मिसलदारों के पास भी अपनी सेना होती थी। सरदार जीते हुए क्षेत्रों में से कुछ भाग अपने अधीन मिसलदारों को दे देता था। प्रारंभ में सरदार का पद पैतृक नहीं होता था। धीरे-धीरे सरदार का पद पैतृक हो गया। चाहे सरदार निरंकुश थे पर वे अत्याचारी नहीं थे। वे प्रजा से अपने परिवार की तरह प्यार करते थे।

2. जिले (Districts) मिसलों को कई जिलों में बाँटा गया था। प्रत्येक जिले के मुखिया को कारदार कहा जाता था। वह ज़िले का शासन प्रबंध चलाने के लिए ज़िम्मेदार होता था।

3. गाँव (Villages)-मिसल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। गाँव का प्रबंध पंचायत के हाथों में होता था। गाँव के लगभग सारे मामले पंचायत द्वारा ही हल कर लिए जाते थे। लंबरदार, पटवारी और चौकीदार गाँव के महत्त्वपूर्ण कर्मचारी थे।

III. मिसलों का आर्थिक प्रबंध (Financial Administration of the Misls)
1. लगान प्रबंध (Land Revenue Administration) मिसलों के समय आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। इसकी दर भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न होती थी। यह प्रायः कुल उपज का 1/3 से 1/4 भाग होता था। यह लगान वर्ष में दो बार रबी और खरीफ फसलों के तैयार होने के समय लिया जाता था। लगान एकत्रित करने के लिए बटाई प्रणाली प्रचलित थी। लगान अनाज या नकदी किसी भी रूप में दिया जा सकता था। मिसल काल में भूमि अधिकार संबंधी चार प्रथाएँ–पट्टीदारी, मिसलदारी, जागीरदारी तथा ताबेदारी प्रचलित थीं।

2. राखी प्रथा (Rakhi System)-पंजाब के लोगों को विदेशी हमलावरों तथा सरकारी कर्मचारियों से सदैव लूटमार का भय लगा रहता था। इसलिए अनेक गाँवों ने अपनी रक्षा के लिए मिसलों की शरण ली। मिसल सरदार उनकी शरण में आने वाले गाँवों को सरकारी कर्मचारियों तथा विदेशी आक्रमणकारियों की लूट-पाट से बचाते थे। इस रक्षा के बदले उस गाँव के लोग अपनी उपज का पाँचवां भाग वर्ष में दो बार मिसल के सरदार को देते थे। इस तरह यह राखी कर मिसलों की आय का एक अच्छा साधन था।

3. आय के अन्य साधन (Other Sources of Income)—इसके अतिरिक्त मिसल सरदारों को चुंगी कर, _ भेंटों और युद्ध के समय की गई लूटमार से भी कुछ आय प्राप्त हो जाती थी।

4. व्यय (Expenditure)-मिसल सरदार अपनी आय का एक बड़ा भाग सेना, घोड़े, शस्त्रों, नए किलों के निर्माण और पुराने किलों की मुरम्मत पर व्यय करता था। इसके अतिरिक्त मिसल सरदार गुरुद्वारों और मंदिरों को दान भी देते थे और निर्धन लोगों के लिए लंगर भी लगाते थे।

IV. न्याय प्रबंध (Judicial Administration)
1. पंचायत (Panchayat) मिसलों के समय पंचायत न्याय प्रबंध की सबसे छोटी अदालत होती थी। पंचायत प्रत्येक गाँव में होती थी। गाँव में अधिकतर मुकद्दमों का फैसला पंचायतों द्वारा ही किया जाता था। लोग पंचायत को परमेश्वर का रूप समझकर उसका फैसला स्वीकार कर लेते थे।

2. सरदार की अदालत (Sardar’s Court)—प्रत्येक मिसल का सरदार अपनी अलग अदालत लगाता था। इसमें वह दीवानी और फौजदारी दोनों तरह के मुकद्दमों का निर्णय करता था। वह किसी भी अपराधी को मृत्यु का दंड देने का भी अधिकार रखता था परंतु वे आम तौर पर अपराधियों को नर्म सज़ाएँ ही देते थे।

3. सरबत खालसा (Sarbat Khalsa)-सरबत खालसा को सिखों की सर्वोच्च अदालत माना जाता था। मिसलदारों के आपसी झगड़ों और सिख कौम से संबंधित मामलों की सुनवाई सरबत खालसा द्वारा की जाती थी। सरबत खालसा मुकद्दमों का फैसला करने के लिए अकाल तख्त अमृतसर में एकत्रित होता था। उस द्वारा पास किए गए गुरमत्तों की सभी सिख पालना करते थे।

4. कानून और सजाएँ (Laws and Punishments) सिख मिसलों के समय न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं था। मुकद्दमों के फैसले प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किये जाते थे। उस काल की सज़ाएँ कड़ी नहीं थीं। अधिकतर अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था।

V. सैनिक प्रबंध (Military Administration)
1. घुड़सवार सेना (Cavalry)-घुड़सवार सेना मिसलों की सेना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था। सिख बहुत निपुण घुड़सवार थे। सिखों के तीव्र गति से दौड़ने वाले घोड़े उनकी गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के संचालन में बहुत सहायक सिद्ध हुए।

2. पैदल सैनिक (Infantry)-मिसलों के समय पैदल सेना को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता था। पैदल सैनिक किलों में पहरा देते, संदेश पहुँचाते और स्त्रियों और बच्चों की देखभाल करते थे।

3. भर्ती (Recruitment)-मिसल सेना में भर्ती होने के लिए किसी को भी विवश नहीं किया जाता था। सैनिकों को कोई नियमित प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता था। उनको नकद वेतन के स्थान पर युद्ध के दौरान की गई लूटमार से हिस्सा मिलता था।

4. सैनिकों के शस्त्र और सामान (Weapons and Equipment of the Soldiers)-सिख सैनिक युद्ध के समय तलवारों, तीर-कमानों, खंजरों, ढालों और बौँ का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त वे बंदूकों का प्रयोग भी करते थे।

5. लड़ाई का ढंग (Mode of Fighting)–मिसलों के समय सैनिक छापामार ढंग से अपने शत्रुओं का मुकाबला करते थे। इसका कारण यह था कि दुश्मनों के मुकाबले सिख सैनिकों के साधन बहुत सीमित थे। मारो और भागो इस युद्ध नीति का प्रमुख आधार था। सिखों की लड़ाई का यह ढंग उनकी सफलता का एक प्रमुख कारण बना।

6. मिसलों की कुल सेना (Total Strength of the Misls)-मिसल सैनिकों की कुल संख्या के संबंध में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। बी० सी० ह्यगल के अनुसार मिसलों के समय सिख सैनिकों की संख्या 69,500 थी। फ्रोस्टर के अनुसार मिसल सैनिकों की कुल संख्या दो लाख के लगभग थी। आधुनिक इतिहासकारों डॉ० हरी राम गुप्ता और एस० एस० गाँधी आदि के अनुसार यह संख्या लगभग एक लाख थी।
अंत में हम एस० एस० गाँधी के इन शब्दों से सहमत हैं,
“मिसल संगठन बिना शक बेढंगा था, परंतु यह उस समय के अनुरूप था। इसकी अपनी ही सफलताएँ और महान् प्राप्तियाँ थीं।”1

1. “The Misl organisation was undoubtedly. crude but it suited the times. It had its triumphs and grand achievements to its credit.” S.S. Gandhi, Struggle of the Sikhs for Sovereignty (Delhi : 1980) p. 300.

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संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मिसल शब्द से क्या अभिप्राय है ? मिसलों की उत्पत्ति कैसे हुई ? (What do you mean by the word Misl ? How did the Misls originate ?)
अथवा
मिसलों की उत्पत्ति का संक्षिप्त वर्णन करें। (Explain in brief about the origin of Misls.) (P.S.E.B. Mar. 2007, July 09)
अथवा
मिसलों से आपका क्या अभिप्राय है ? संक्षेप में उनकी उत्पत्ति के बारे में लिखें। (What do you understand by Misls ? Describe in brief about their origin.)
उत्तर-
मिसल से अभिप्राय फाइल से है जिसमें मिसलों के विवरण दर्ज किए जाते थे। बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के पश्चात् पंजाब के मुग़ल सूबेदारों ने सिखों पर घोर अत्याचार किए। परिणामस्वरूप सिखों ने पहाड़ों और जंगलों में जाकर शरण ली। मुग़लों और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों का मुकाबला करने के लिए 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में दल खालसा की स्थापना की गई। दल खालसा के अधीन 12 जत्थे गठित किए गए। कालांतर में इन जत्थों ने पंजाब में 12 स्वतंत्र सिख मिसलें स्थापित की।

प्रश्न 2.
मिसलों के संगठन के स्वरूप पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the nature of Misl organisation.)
उत्तर-
सिख मिसलों के संगठन के स्वरूप के बारे में इतिहासकारों ने भिन्न-भिन्न मत प्रकट किए हैं। इसका कारण यह था कि मिसलों का राज्य प्रबंध किसी निश्चित शासन प्रणाली के अनुसार नहीं चलाया जाता था। अलगअलग सरदारों ने शासन प्रबंध चलाने के लिए आवश्यकतानुसार अपने-अपने नियम बना लिए थे। जे० डी० कनिंघम के विचारानुसार, सिख मिसलों के संगठन का स्वरूप धर्मतांत्रिक, संघात्मक और सामंतवादी.था। डॉ० ए० सी० बैनर्जी के विचारानुसार, “मिसलों का संगठन बनावट में प्रजातंत्रीय और एकता प्रदान करने वाले सिद्धांतों में धार्मिक था।”

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प्रश्न 3.
नवाब कपूर सिंह पर एक संक्षेप नोट लिखें। (Write a short note on Nawab Kapoor Singh.)
अथवा
नवाब कूपर सिंह के जीवन का संक्षिप्त में वर्णन करें।
(Give a brief account of the life of Nawab Kapoor Singh.)
अथवा
नवाब कूपर सिंह कौन थे। उनकी सफलताओं का वर्णन करो। (Who was Nawab Kapoor Singh ? Describe his achievements.)
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह फैज़लपुरिया मिसल के संस्थापक थे। 1733 ई० में पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ ने उन्हें नवाब का पद तथा एक लाख वार्षिक आय वाली जागीर दी। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिखों को दो जत्थों-बुड्डा दल और तरुणा दल में गठित किया। उन्होंने बड़ी योग्यता और सूझ-बूझ के साथ इन दोनों दलों का नेतृत्व किया। 1748 ई० में उन्होंने दल खालसा की स्थापना की। उन्होंने सिख पंथ का घोर कठिनाइयों के समय नेतृत्व किया। उनकी 1753 ई० में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 4.
जस्सा सिंह आहलूवालिया की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the achievements of Jassa Singh Ahluwalia.)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया के विषय में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ahluwalia ?)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया पर एक नोट लिखें।
(Write a note on Jassa Singh Ahluwalia.)
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया मिसल के संस्थापक थे। 1748 ई० में दल खालसा की स्थापना के समय जस्सा सिंह आहलूवालिया को सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया। 1761 ई० में जस्सा सिंह ने लाहौर पर विजय प्राप्त की। 1762 ई० में बड़े घल्लूघारे के समय जस्सा सिंह ने अहमद शाह अब्दाली की सेना से डट कर मुकाबला किया। 1764 ई० में जस्सा सिंह ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया। जस्सा सिंह ने कपूरथला पर कब्जा कर उसे आहलूवालिया मिसल की राजधानी घोषित किया। 1783 ई० में वह हम से सदा के लिए बिछुड़ गए।

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प्रश्न 5.
जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ? उसकी सफ़लताओं का संक्षेप वर्णन करें। (Who was Jassa Singh Ramgarhia ? Write a short note on his achievements.)
अथवा
जस्सा सिंह रामगढ़िया के बारे में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ramgarhia ?)
उत्तर-
जस्सा सिंह रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता था। मीर मन्नू की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में फैली अराजकता का लाभ उठाकर जस्सा सिंह ने कलानौर, बटाला, हरगोबिंदपुर, कादियाँ, टाँडा, करतारपुर और हरिपुर इत्यादि पर अधिकार करके रामगढ़िया मिसल का खूब विस्तार किया। उसके नेतृत्व में यह मिसल उन्नति के शिखर पर पहुँच गई थी। उसने श्री हरगोबिंदपुर को रामगढ़िया मिसल की राजधानी घोषित किया। जस्सा सिंह की 1803 ई० में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 6.
महा सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Mahan Singh.)
उत्तर-
1774 ई० में महा सिंह शुकरचकिया मिसल का नया मुखिया बना। महा सिंह ने शुकरचकिया मिसल के प्रदेशों का विस्तार प्रारंभ किया। उसने सबसे पहले रोहतास पर अधिकार किया। इसके पश्चात् रसूल नगर और अलीपुर प्रदेशों पर अधिकार किया। महां सिंह ने सभी सरदारों से मुलतान, बहावलपुर, साहीवाल आदि प्रदेशों को भी जीत लिया। बटाला के निकट हुए युद्ध में जय सिंह का पुत्र गुरबख्श सिंह मारा गया। कुछ समय पश्चात् शुकरचकिया और कन्हैया मिसलों में मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित हो गए। 1792 ई० में महा सिंह की मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 7.
फुलकियाँ मिसल पर एक संक्षेप नोट लिखें। (Wrie a short note on Phulkian Misl.)
उत्तर-
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक चौधरी फूल था। उसके वंश ने पटियाला, नाभा तथा जींद के प्रदेशों पर अपना राज्य स्थापित किया। पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बहुत बहादुर था। उसने अनेकों प्रदेशों पर कब्जा किया तथा बरनाला को अपनी राजधानी बनाया। उसने 1765 ई० में अहमद शाह
अब्दाली से समझौता किया। नाभा में फुलकियाँ मिसल की स्थापना हमीर सिंह ने की थी। उसने 1755 ई० से 1783 ई० तक शासन किया। जींद में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक गजपत सिंह था। उसने अपनी सुपुत्री राज कौर की शादी महा सिंह से की। 1809 ई० में फुलकियाँ मिसल अंग्रेजों के संरक्षण में चली गई थी।

प्रश्न 8.
आला सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Ala Singh.)
उत्तर-
आला सिंह पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक था। उसने 1748 ई० में अहमद शाह अब्दाली के प्रथम आक्रमण के दौरान मुग़लों की सहायता की। शीघ्र ही आला सिंह ने बुढलाडा, टोहाना, भटनेर और जैमलपुर के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 1765 ई० में अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अब्दाली के साथ समझौते के कारण दल खालसा के सदस्यों ने आला सिंह को अब्दाली से अपने संबंध तोड़ने का निर्देश दिया, परंतु शीघ्र ही वह इस संसार से कूच कर गए।

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प्रश्न 9.
खालसा के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you understand by Sarbat Khalsa ?)
अथवा
सरबत खालसा के बारे में नोट लिखें। (Write a note on Sarbat Khalsa.)
उत्तर-
सरबत खालसा का आयोजन सिख पंथ से संबंधित विषयों पर विचार के लिए हर वर्ष दीवाली और बैसाखी के अवसर पर अकाल तख्त साहिब अमृतसर में किया जाता था। सारे सिख गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेक कर बैठ जाते थे। इसके पश्चात् कीर्तन होता था फिर अरदास की जाती थी। इसके बाद कोई एक सिख खड़ा होकर संबंधित समस्या के बारे सरबत खालसा को बताता था। निर्णय सर्वसम्मति से लिया जाता था।

प्रश्न 10.
गुरमता से क्या अभिप्राय है ? गुरमता के कार्यों की संक्षेप जानकारी दें।
(What is meant by Gurmata ? Give a brief account of its functions.)
अथवा
गुरमता पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a brief note on Gurmata.)
अथवा
गुरमता के बारे में आप क्या जानते हो?
(What do you know about Gurmata ?)
अथवा
गुरमता से क्या भाव है ? गुरमता के तीन विशेष कार्य बताएँ। (What is meant by Gurmata ? Discuss about the three main works of Gurmata.)
उत्तर-
गुरमता सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था थी। गुरमता गुरु और मता के मेल से बना है-जिसके शाब्दिक अर्थ हैं, ‘गुर का मत या निर्णय’। दूसरे शब्दों में, गुरु ग्रंथ साहिब जी की उपस्थिति में सरबत खालसा द्वारा जो निर्णय लिए जाते थे उनको गुरमता कहा जाता था। इन गुरमतों का सभी सिख पालन करते थे। गुरमता के महत्त्वपूर्ण कार्य थे-सिखों की नीति तैयार करना, दल खालसा के नेता का चुनाव करना, शत्रुओं के विरुद्ध सैनिक योजनाओं को अंतिम रूप देना, सिख सरदारों के झगड़ों का निपटारा करना और सिख धर्म का प्रचार का प्रबंध करना।

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प्रश्न 11.
मिसलों के आंतरिक संगठन की कोई तीन विशेषताएँ बताओ। (Mention any three features of internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
सिख मिसलों का अंदरूनी संगठन कैसा था ? व्याख्या करें।
(Describe the internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
मिसल प्रबंध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(Describe the main features of Misl Administration.)
अथवा
मिसलों के आंतरिक संगठन की कोई पाँच विशेषताएँ बताएँ। (Write five features of internal organisation of the Sikh Misls.)
उत्तर-
मिसल का प्रधान सरदार कहलाता था। सरदार अपनी प्रजा से स्नेह रखते थे। मिसल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। गाँव का प्रबंध पंचायत के हाथों में था। मिसलों का न्याय प्रबंध साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों का फैसला प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाता था। सज़ाएँ अधिक सख्त नहीं थीं। आमतौर पर जुर्माना ही वसूल किया जाता था। मिसलों की आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। सरदार गाँव के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते थे।

प्रश्न 12.
राखी प्रणाली पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Rakhi system.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? संक्षिप्त व्याख्या करें। (What is Rakhi system ? Explain in brief.)
अथवा
‘राखी व्यवस्था’ के विषय में आप क्या जानते हैं ? संक्षेप में लिखिए।
(What do you know about Rakhi system ? Write in brief.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? इसका आरंभ कैसे हुआ ? (What is Rakhi system ? Explain its origin.)
अथवा
राखी व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about ‘Rakhi system’ ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के पश्चात् पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बन गया। लोगों को सदैव लूटमार का भय लगा रहता था। इसलिए बहुत-से गाँवों ने अपनी रक्षा के लिए मिसलों की शरण ली। सिसल सरदार उनकी शरण में आने वाले गाँवों को सरकारी कर्मचारियों तथा विदेशी आक्रमणकारियों की लूटपाट से बचाते थे। इसके अतिरिक्त वे स्वयं भी इन गाँवों पर कभी आक्रमण नहीं करते थे। राखी प्रणाली से लोगों का जीवन सुरक्षित हुआ।

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प्रश्न 13.
मिसल काल के वित्तीय प्रबंध के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the financial administration of Misl period ?)
अथवा
मिसल शासन की अर्थ-व्यवस्था पर नोट लिखें। (Write a short note on economy under the Misls.)
उत्तर-
मिसल काल में मिसलों की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था। यह भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न होता था। यह प्रायः कुल उपज का 1/3 से 1/4 भाग तक होता था। भू-राजस्व के बाद मिसलों की आय का दूसरा मुख्य साधन राखी प्रथा था। मिसल सरदार अपनी आय का एक बड़ा भाग सेना, घोड़ों तथा हथियारों पर खर्च करते थे। वे गुरुद्वारों तथा मंदिरों को दान भी देते थे।

प्रश्न 14.
मिसलों की न्याय व्यवस्था पर नोट लिखें।
(Write a note on the Judicial system of Misls.)
उत्तर-
सिख मिसलों के समय न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों के फैसले उस समय के प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किए जाते थे। उस समय सजाएँ सख्त नहीं थीं। किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया जाता था। अधिकतर अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था। गाँव में अधिकतर मुकद्दमों का फैसला पंचायतों द्वारा ही किया जाता था। लोग पंचायत को परमेश्वर समझ कर उसका फैसला स्वीकार करते थे। प्रत्येक मिसल के सरदार की अपनी अलग अदालत होती थी।

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प्रश्न 15.
सिख मिसलों के सैनिकों प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
(Describe the main features of military administratidn of Sikh Misls.)
अथवा
सिख मिसलों के सैनिक प्रबंध की मुख्य तीन विशेषताएँ लिखिए। (Write three main features of military administration of Sikh Misls.)
उत्तर-

  1. मिसलों के काल में घुड़सवार सेना को सेना का महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता था।
  2. लोग अपनी इच्छा से सेना में भर्ती होते थे।
  3. इन सैनिकों को कोई नियमित प्रशिक्षण नहीं दिया जाता था तथा उन्हें नकद वेतन भी नहीं दिया जाता था।
  4. उस समय सैनिकों का कोई विवरण नहीं रखा जाता था।
  5. सिख सैनिक सीमित साधनों के कारण छापामार ढंग से दुश्मन का मुकाबला करते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
मिसल शब्द से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
मिसल शब्द का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
समान।

प्रश्न 2.
मिसल किस भाषा का शब्द है ?
उत्तर-
अरबी।

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प्रश्न 3.
मिसलों की कुल संख्या कितनी थी ?
उत्तर-
12.

प्रश्न 4.
पंजाब में सिख मिसलें किस शताब्दी में स्थापित हुईं ?
उत्तर-
18वीं शताब्दी।

प्रश्न 5.
किसी एक प्रमुख मिसल का नाम लिखें।
उत्तर-
आहलूवालिया मिसल।

प्रश्न 6.
फैजलपुरिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह।

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प्रश्न 7.
फैज़लपुरिया मिसल के सबसे प्रसिद्ध नेता का नाम बताएँ।
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह।

प्रश्न 8.
नवाब कपूर सिंह कौन था ?
उत्तर-
फैज़लपुरिया मिसल का संस्थापक।

प्रश्न 9.
नवाब कपूर सिंह ने किस मिसल की स्थापना की?
उत्तर-
फैज़लपुरिया मिसल।

प्रश्न 10.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया।

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प्रश्न 11.
आहलूवालिया मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर-
क्योंकि जस्सा सिंद्र लाहौर के नज़दीक स्थित आहलू गाँव से संबंधित था।

प्रश्न 12.
आहलूवालिया मिसल की राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर-
कपूरथला।

प्रश्न 13.
जस्सा सिंह आहलूवालिया कौन था ?
उत्तर-
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक।

प्रश्न 14.
रामगढ़िया मिसल की राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
श्री हरगोबिंदपुर।

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प्रश्न 15.
रामगढ़िया मिसल के किसी एक सर्वाधिक प्रसिद्ध नेता का नाम बताएँ ।
उत्तर-
जस्सा सिंह रामगढ़िया।

प्रश्न 16.
जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ?
उत्तर-
रामगढ़िया मिसल का सबसे शक्तिशाली सरदार।

प्रश्न 17.
भंगी मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
छज्जा सिंह।

प्रश्न 18.
भंगी मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर-
क्योंकि इस मिसल के नेताओं को भांग पीने की बहुत आदत थी।

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प्रश्न 19.
सिख मिसलों में सबसे शक्तिशाली मिसल कौन-सी थी ?
उत्तर-
शुकरचकिया मिसल।

प्रश्न 20.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
चढ़त सिंह।

प्रश्न 21.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम बताएँ।
उत्तर-
गुजराँवाला।

प्रश्न 22.
महा सिंह कौन था ?
उत्तर-
महा सिंह 1774 ई० में शुकरचकिया मिसल का नेता बना।

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प्रश्न 23.
कन्हैया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
जय सिंह।

प्रश्न 24.
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
चौधरी फूल।

प्रश्न 25.
बाबा आला सिंह कौन था ?
उत्तर-
पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक।

प्रश्न 26.
बाबा आला सिंह की राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर-
बरनाला।

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प्रश्न 27.
अहमद शाह अब्दाली ने किसे राजा की उपाधि से सम्मानित किया था ?
उत्तर-
बाबा आला सिंह को।

प्रश्न 28.
डल्लेवालिया मिसल का सबसे योग्य नेता कौन था ?
उत्तर-
तारा सिंह घेबा।

प्रश्न 29.
शहीद मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
सरदार सुधा सिंह।

प्रश्न 30.
शहीद मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर-
इस मिसल के नेताओं द्वारा दी गई शहीदियों के कारण ।

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प्रश्न 31.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था कौन-सी थी ?
अथवा
सिखों की केंद्रीय संस्था का क्या नाम था ?
उत्तर-
गुरमता।

प्रश्न 32.
गुरमता से क्या भाव है ?
उत्तर-
गुरु का फैसला।

प्रश्न 33.
गुरुमता के पीछे कौन-सी शक्ति काम करती थी ?
उत्तर-
धार्मिक।

प्रश्न 34.
सरबत खालसा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
अकाल तख्त साहिब, अमृतसर में आयोजित किया जाने वाला सिख सम्मेलन।।

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प्रश्न 35.
सरबत खालसा की सभाएँ कहाँ बुलाई जाती थीं ?
उत्तर-
अमृतसर।

प्रश्न 36.
सिख मिसलों के मुखिया को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
सरदार।

प्रश्न 37.
सिख मिसलों के प्रशासन की कोई एक विशेषता बताएँ।
उत्तर-
सिख मिसलों के सरदार अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे।

प्रश्न 38.
राखी प्रणाली से क्या भाव है ?
अथवा
राखी प्रथा क्या है ?
उत्तर-
राखी प्रणाली के अंतर्गत आने वाले गाँवों को सिख सुरक्षा प्रदान करते थे।

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प्रश्न 39.
मिसल सेना की लड़ने की विधि कौन सी थी ?
उत्तर-
गुरिल्ला विधि।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
18वीं शताब्दी में पंजाब में…….स्वतंत्र सिख मिसलें स्थापित हुईं।
उत्तर-
(12)

प्रश्न 2.
नवाब कपूर सिंह……मिसल का संस्थापक था।
उत्तर-
(फैजलपुरिया)

प्रश्न 3.
नवाब कपूर सिंह ने…….में दल खालसा की स्थापना की थी।
उत्तर-
(1748 ई०)

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प्रश्न 4.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक……..था।
उत्तर-
(जस्सा सिंह आहलूवालिया)

प्रश्न 5.
जस्सा सिंह आहलूवालिया ने ………….को अपनी राजधानी बनाया।
उत्तर-
(कपूरथला)

प्रश्न 6.
रामगढ़िया मिसल का संस्थापक……….था।
उत्तर-
(खुशहाल सिंह)

प्रश्न 7.
रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता………था।
उत्तर-
(जस्सा सिंह रामगढ़िया)

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प्रश्न 8.
जस्सा सिंह रामगढ़िया की राजधानी का नाम………था।
उत्तर-
(श्री हरिगोबिंद पुर)

प्रश्न 9.
झंडा सिंह……….मिसल का एक प्रसिद्ध नेता था।
उत्तर-
(भंगी)

प्रश्न 10.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक………था।
उत्तर-
(चढ़त सिंह)

प्रश्न 11.
1774 ई० में………शुकरचकिया मिसल का नया नेता बना।
उत्तर-
(महा सिंह)

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प्रश्न 12.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम……….था।
उत्तर-
(गुजराँवाला)

प्रश्न 13.
बाबा दीप सिंह जी …………. मिसल के साथ संबंध रखते थे।
उत्तर-
(शहीद)

प्रश्न 14.
महाराजा रणजीत सिंह ने………में शुकरचकिया मिसल की बागडोर संभाली।
उत्तर-
(1792 ई०)

प्रश्न 15.
कन्हैया मिसल का संस्थापक………….था।
उत्तर-
(जय सिंह)

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प्रश्न 16.
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक………था।
उत्तर-
(चौधरी फूल)

प्रश्न 17.
पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक……….था।
उत्तर
(बाबा आला सिंह)

प्रश्न 18.
बाबा आला सिंह ने…………को अपनी राजधानी बनाया। .
उत्तर-
(बरनाला)

प्रश्न 19.
डल्लेवालिया मिसल के सबसे प्रसिद्ध नेता का नाम……….था।
उत्तर
(तारा सिंह घेबा)

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प्रश्न 20.
शहीद मिसल का संस्थापक………….था।
उत्तर-
(सुधा सिंह)

प्रश्न 21.
बाबा दीप सिंह जी का संबंध………मिसल के साथ था।
उत्तर-
(शहीद)

प्रश्न 22.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था का नाम……….था।
उत्तर-
(गुरमता)

प्रश्न 23.
मिसल काल में मिसल के मुखिया को…………..कहा जाता था। .
उत्तर-
(सरदार)

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प्रश्न 24.
सिख मिसलों के समय आमदन का मुख्य स्रोत………..था।
उत्तर-
(भूमि लगान)

प्रश्न 25.
राखी प्रथा पंजाब में………….शताब्दी में प्रचलित हुई।
उत्तर-
(18वीं)

प्रश्न 26.
मिसल काल में अपराधियों से अधिकतर………….वसूल किया जाता था।
उत्तर-
(जुर्माना)

प्रश्न 27.
सिख मिसलों के समय सैनिक……….से अपने दुश्मनों का सामना करते थे।
उत्तर-
(छापामार ढंग)

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(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
18वीं सदी में पंजाब में 12 स्वतंत्र सिख मिसलों की स्थापना हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
मिसल अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है बराबर।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 3.
नवाब कपूर सिंह फैज़लपुरिया मिसल का संस्थापक था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 4.
फैजलपुरिया मिसल को आहलूवालिया मिसल भी कहा जाता है। .
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 5.
नवाब कपूर सिंह ने 1734 ई० में दल खालसा की स्थापना की थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
नवाब कपूर सिंह दल खालसा का प्रधान सेनापति था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 7.
नवाब कपूर सिंह की मृत्य 1753 ई० में हुई थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक जस्सा सिंह रामगढ़िया था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 9.
1748 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया को दल खालसा का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया। गया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
जस्सा सिंह आहलूवालिया को सुल्तान-उल-कौम की उपाधि से सम्मानित किया गया था ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 11.
जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कपूरथला को अपनी राजधानी बनाया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता जस्सा सिंह रामगढ़िया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 13.
जस्सा सिंह रामगढ़िया ने करतारपुर को अपनी राजधानी बनाया।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 14.
भंगी मिसल का यह नाम इसके नेताओं द्वारा भांग पीने के कारण पड़ा।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 15.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 16.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम लाहौर था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 17.
1792 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने शुकरचकिया मिसल की बागडोर संभाली।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 18.
जय सिंह कन्हैया मिसल का संस्थापक था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 19.
रानी जिंदा कन्हैया मिसल की आगू थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 20.
डल्लेवालिया मिसल के सब से प्रसिद्ध नेता बाबा दीप सिंह जी थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 21.
बाबा आला सिंह ने बरनाला को अपनी राजधानी बनाया था। .
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 22.
बाबा आला सिंह की मृत्यु 1762 ई० में हुई थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 23.
1765 ई० में अहमद सिंह पटियाला की गद्दी पर बैठा था। . .
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 24.
अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को ‘राजा-ए-राजगान बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित किया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 25.
निशानवालिया मिसल का संस्थापक हमीर सिंह था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 26.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था का नाम गुरमता था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 27.
मिसल के मुखिया को मिसलदार कहा जाता था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 28.
18वीं सदी में पंजाब में राखी प्रथा का प्रचलन हुआ।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 29.
मिसल काल में सरबत खालसा को सिखों की सर्वोच्च अदालत कहा जाता था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 30.
सिख मिसलों के सैनिक अपने दुश्मनों का मुकाबला छापामार ढंग से करते थे।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
पंजाब में स्थापित मिसलों की कुल संख्या कितनी थी ?
(i) 5
(ii) 10
(iii) 12
(iv) 15
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 2.
नवाब कपूर सिंह कौन था ?
(i) फैजलपुरिया मिसल का संस्थापक
(ii) जालंधर का फ़ौजदार
(iii) पंजाब का सूबेदार
(iv) आहलूवालिया मिसल का नेता।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 3.
मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) जस्सा सिंह
(ii) भाग सिंह
(iii) फ़तह सिंह
(iv) खुशहाल सिंह।
उत्तर-(i)

प्रश्न 4.
आहलूवालिया मिसल की राजधानी कौन-सी थी ?
(i) अमृतसर
(ii) कपूरथला
(iii) लाहौर
(iv) श्री हरगोबिंदपुर।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 5.
रामगढ़िया मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) जस्सा सिंह रामगढ़िया
(ii) खुशहाल सिंह
(iii) जोध सिंह
(iv) भाग सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 6.
रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता कौन था ?
(i) जस्सा सिंह रामगढ़िया
(ii) नंद सिंह
(iii) खुशहाल सिंह
(iv) जोध सिंह।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 7.
रामगढ़िया मिसल की राजधानी का क्या नाम था ?
(i) कपूरथला
(ii) श्री हरगोबिंदपुर
(iii) लाहौर
(iv) बरनाला।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 8.
भंगी मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) हरी सिंह
(ii) छज्जा सिंह
(iii) गुलाब सिंह
(iv) भीम सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 9.
भंगी मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता कौन था ?
(i) हरी सिंह
(ii) झंडा सिंह
(iii) गंडा सिंह
(iv) भीम सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 10.
सिख मिसलों में सबसे शक्तिशाली मिसल कौन-सी थी ?
(i) शुकरचकिया मिसल
(ii) भंगी मिसल
(iii) कन्हैया मिसल
(iv) फुलकियाँ मिसल।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 11.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) खुशहाल सिंह
(ii) नवाब कपूर सिंह
(iii) छज्जा सिंह
(iv) चढ़त सिंह।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 12.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम बताएँ ।
(i) अमृतसर
(ii) लाहौर
(iii) गुजराँवाला
(iv) बरनाला।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से किस नगर पर चढ़त सिंह ने अधिकार नहीं किया था ?
(i) स्यालकोट
(ii) चकवाल
(iii) गुजराँवाला
(iv) अलीपुर
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 14.
महा सिंह की मृत्यु कब हुई ?
अथवा
रणजीत सिंह कब शुकरचकिया मिसल का नेता बना ?
(i) 1770 ई० में
(ii) 1780 ई० में
(iii) 1782 ई० में
(iv) 1792 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 15.
कन्हैया मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) जय सिंह
(ii) सदा कौर
(iii) बाबा आला सिंह
(iv) जस्सा सिंह आहलूवालिया।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 16.
सदा कौर कौन थी ?
(i) कन्हैया मिसल की नेता
(i) महा सिंह की सास
(iii) भंगी मिसल की नेता
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 17.
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) चौधरी फूल
(ii) छज्जा सिंह
(iii) नवाब कपूर सिंह
(iv) गंडा सिंह।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 18.
पटियाला रियासत का संस्थापक कौन था ?
(i) अमर सिंह
(ii) बाबा आला सिंह
(ii) हमीर सिंह
(iv) गजपत सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 19.
बाबा आला सिंह ने किसको पटियाला रियासत की राजधानी बनाया ?
(i) कपूरथला
(ii) श्री हरगोबिंदपुर
(iii) बरनाला
(iv) गुजरांवाला।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 20.
डल्लेवालिया मिसल का सबसे प्रसिद्ध सरदार कौन था ?
(i) गुलाब सिंह
(ii) तारा सिंह घेबा
(iii) जय सिंह
(iv) बाबा आला सिंह।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 21.
शहीद मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता कौन था ?
(i) सुधा सिंह
(ii) बाबा दीप सिंह जी
(iii) कर्म सिंह
(iv) गुरबख्श सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 22.
नकई मिसल का संस्थापक कौन था?
(i) नाहर सिंह
(ii) हीरा सिंह
(iii) राम सिंह
(iv) काहन सिंह ।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 23.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था कौन-सी थी ?
(i) राखी प्रथा
(ii) जागीरदारी
(iii) गुरमता
(iv) मिसल।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 24.
मिसल काल में जिले के मुखिया को क्या कहा जाता था ?
(i) ज़िलेदार
(ii) कारदार
(iii) थानेदार
(iv) सरदार।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 25.
राखी प्रथा क्या थी ?
(i) विदेशी आक्रमणकारियों से गाँव की रक्षा करनी
(ii) फसलों की देखभाल करनी
(iii) स्त्रियों की रक्षा करनी
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 26.
मिसल काल में सबसे महत्त्वपूर्ण किस सेना को माना जाता था ?
(i) घुड़सवार सेना को
(ii) पैदल सेना को
(iii) रथ सेना को
(iv) नौसेना को।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 3.
पंजाब की किन्हीं छ: मिसलों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Explain briefly any six Misls of Punjab.) a
उत्तर-
1. फैजलपुरिया मिसल-इस मिसल का संस्थापक नवाब कपूर सिंह था। उसने सर्वप्रथम अमृतसर के समीप फैजलपुर नामक गाँव पर अधिकार किया था। इसलिए इस मिसल का नाम फैजलपुरिया मिसल पड़ गया था। नवाब कपूर सिंह अपनी वीरता के कारण सिखों में बहुत प्रख्यात था। 1753 ई० में नवाब कपूर सिंह की मृत्यु के उपरांत खुशहाल सिंह तथा बुद्ध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

2. भंगी मिसल-भंगी मिसल की स्थापना यद्यपि सरदार छज्जा सिंह ने की थी परंतु सरदार हरी सिंह को इस मिसल का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। झंडा सिंह एवं गंडा सिंह इस मिसल के अन्य प्रसिद्ध नेता थे। क्योंकि इस मिसल के नेताओं को भंग पीने की बहुत आदत थी इसलिए इस मिसल का नाम भंगी मिसल पड़ा।

3. रामगढ़िया मिसल-रामगढ़िया मिसल का संस्थापक खुशहाल सिंह था। इस मिसल का सबसे प्रख्यात नेता सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया था। इस मिसल की राजधानी का नाम श्री हरगोबिंदपुर था। 1803 ई० में जस्सा सिंह रामगढ़िया की मृत्यु के उपरांत सरदार जोध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

4. शुकरचकिया मिसल-शुकरचकिया मिसल का संस्थापक सरदार चढ़त सिंह था। क्योंकि उसके पुरखे शुकरचक गाँव से संबंधित थे इसलिए इस मिसल का नाम शुकरचकिया मिसल पड़ा। वह एक साहसी योद्धा था। शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम गुजराँवाला था। चढ़त सिंह के पश्चात् महा सिंह तथा रणजीत सिंह ने शुकरचकिया मिसल का कार्यभार संभाला। 1799 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर पर अधिकार कर लिया था तथा यह विजय पंजाब के इतिहास में एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।

5. कन्हैया मिसल-कन्हैया मिसल का संस्थापक जय सिंह था। क्योंकि वह कान्हा गाँव का निवासी था इसलिए इस मिसल का नाम कन्हैया मिसल पड़ा। जय सिंह काफ़ी बहादुर था। 1798 ई० में जय सिंह की मृत्यु के पश्चात् सदा कौर इस मिसल की नेता बनी। वह महाराजा रणजीत सिंह की सास थी तथा बहुत महत्त्वाकांक्षी थी।

6. आहलूवालिया मिसल-आहलूवालिया मिसल का संस्थापक सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया था। उसने जालंधर दोआब तथा बारी दोआब के इलाकों पर कब्जा करके अपनी वीरता का परिचय दिया। उसे सुल्तानउल-कौम की उपाधि से सम्मानित किया गया। आहलूवालिया मिसल की राजधानी का नाम कपूरथला था। 1783 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया की मृत्यु के पश्चात् भाग सिंह तथा फतेह सिंह ने शासन किया।

प्रश्न 4.
नवाब कपूर सिंह पर एक संक्षेप नोट लिखें।
(Write a short note on Nawab Kapoor Singh.)
अथवा
नवाब कपूर सिंह के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Nawab Kapoor Singh ?)..
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह सिखों के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे। वह फैजलपुरिया मिसल के संस्थापक थे। उनका जन्म 1697 ई० में कालोके नामक गाँव में हुआ था। उसके पिता का नाम दलीप सिंह था और वह जाट परिवार से संबंध रखते थे। कपूर सिंह शीघ्र ही सिखों के प्रसिद्ध मुखिया बन गए। 1733 ई० में उन्होंने पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ से नवाब का पद. तथा एक लाख वार्षिक आय वाली जागीर प्राप्त की। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिख शक्ति को संगठित करने के उद्देश्य से उनको दो जत्थों बुड्डा दल और तरुणा दल में गठित किया। उन्होंने बड़ी योग्यता और सूझ-बूझ के साथ इन दोनों दलों का नेतृत्व किया। जकरिया खाँ सिखों की बढ़ती हुई शक्ति को सहन करने को तैयार नहीं था। इसलिए उसने 1735 ई० में सिखों को दी गई जागीर को वापस ले लिया। उसने सिखों पर घोर अत्याचार आरंभ कर दिए। नवाब कपूर सिंह के नेतृत्व में खालसा ने इतने भयानक कष्टों को खुशी-खुशी सहन किया किंतु उन्होंने जकरिया खाँ के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया। नवाब कपूर सिंह ने 1736 ई० में सरहिंद में भयंकर लूटमार की। नवाब कपूर सिंह ने 1739 ई० में नादिरशाह को दिन में तारे दिखा दिए थे। उसने 1748 ई० में अमृतसर को अपने अधीन कर लिया था। 1748 ई० में उन्होंने दल खालसा की स्थापना करके सिख पंथ के लिए महान कार्य किया। नवाब कपूर सिंह न केवल एक वीर योद्धा था अपितु वह सिख पंथ का एक महान् प्रचारक भी था। उसने बड़ी संख्या में लोगों को सिख धर्म में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया। निस्संदेह सिख पंथ के विकास तथा उसको संगठित करने के लिए नवाब कपूर सिंह ने बहुमूल्य योगदान दिया। उनकी 1753 ई० में मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 5.
जस्सा सिंह आहलूवालिया की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the achievements of Jassa Singh Ahluwalia.)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया के विषय में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ahluwalia ?)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया पर एक नोट लिखें। (Write a note on Jassa Singh Ahluwalia.)
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया 18वीं शताब्दी में सिखों का एक योग्य एवं वीर नेता था। वह आहलूवालिया मिसल का संस्थापक था। उसका जन्म 1718 ई० में लाहौर के निकट स्थित आहलू नामक गाँव में हुआ था। आप के पिता का नाम बदर सिंह था। जस्सा सिंह अभी छोटे ही थे कि उनके पिता का देहांत हो गया। नवाब कपूर सिंह ने जस्सा सिंह आहलूवालिया को अपने पुत्र की तरह पालन-पोषण किया। 1739 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया के नेतृत्व में सिखों ने नादिरशाह की सेना पर आक्रमण करके बहुत-सा धन लूट लिया था। निस्संदेह यह एक अत्यंत साहसी कार्य था। 1746 ई० में छोटे घल्लूघारे के समय इन्होंने वीरता के वे जौहर दिखाए कि उनकी ख्याति दूरदूर तक फैल गई। 1747 ई० में अमृतसर के फ़ौजदार सलाबत खाँ ने दरबार साहिब में सिखों के प्रवेश पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए थे। परिणामस्वरूप जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कुछ सिखों को साथ लेकर अमृतसर पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में सलाबत खाँ मारा गया एवं सिखों का अमृतसर पर अधिकार हो गया। जस्सा सिंह आहलूवालिया अपनी वीरता एवं प्रतिभा के कारण शीघ्र ही सिखों के प्रसिद्ध नेता बन गए। 1748 ई० में उन्हें दल खालसा का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया। उन्होंने दल खालसा का कुशलतापूर्वक नेतृत्व करके सिख पंथ की महान सेवा की। 1761 ई० में जस्सा सिंह के नेतृत्व में सिखों ने लाहौर पर विजय प्राप्त की। 1762 ई० में बड़े घल्लूघारे समय भी जस्सा सिंह आहलूवालिया ने अहमदशाह अब्दाली की सेना का बड़ी बहादुरी से सामना किया। 1764 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया। 1778 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कपूरथला पर कब्जा कर लिया और इसको आहलूवालिया मिसल की राजधानी बना दिया। इस प्रकार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने सिख पंथ के लिए महान् उपलब्धियाँ प्राप्त की। 1783 ई० में इस महान् नेता की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 6.
जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ? उसकी सफलताओं का संक्षेप वर्णन करें। (Who was Jassa Singh Ramgarhia ? Write a short note on his achievements.)
अथवा
जस्सा सिंह रामगढ़िया के बारे में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ramgarhia ?)
उत्तर-
जस्सा सिंह रामगढ़िया मिसल का सबसे महान् नेता था। उसने सिख पंथ में बहुत कठिन परिस्थितियों में योग्य नेतृत्व किया था। उनका जन्म 1723 ई० में लाहौर के निकट स्थित गाँव इच्छोगिल में सरदार भगवान सिंह के घर हुआ था। आपको सिख पंथ की सेवा करना विरासत में प्राप्त हुआ था। उनके नेतृत्व में रामगढ़िया मिसल ने अद्वितीय उन्नति की। जस्सा सिंह रामगढ़िया पहले जालंधर के फ़ौजदार अदीना बेग़ के अधीन नौकरी करता था। अक्तूबर, 1748 ई० में मीर मन्नू और अदीना बेग की सेनाओं ने 500 सिखों को अचानक रामरौणी के किले में घेर लिया था। जस्सा सिंह रामगढ़िया इसे सहन न कर सका। वह तुरंत उनकी सहायता के लिए पहुँचा। उसके इस सहयोग के कारण 300 सिखों की जानें बच गईं। इससे प्रसन्न होकर रामरौणी का किला सिखों ने जस्सा सिंह रामगढ़िया के हवाले कर दिया। जस्सा सिंह रामगढ़िया ने इस किले का नाम रामगढ़ रखा। 1753 ई० में मीर मन्नू की मृत्यु की पश्चात् पंजाब में अराजकता फैल गई। इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाकर जस्सा सिंह रामगढिया ने कलानौर, बटाला, हरगोबिंदपुर, कादियाँ, उड़मुड़ टांडा, दीपालपुर, करतारपुर और हरिपुर इत्यादि प्रदेशों पर अधिकार करके रामगढ़िया मिसल का खूब विस्तार किया। उसने श्री हरगोबिंदपुर को रामगढ़िया मिसल की राजधानी घोषित किया। जस्सा सिंह रामगढ़िया के आहलूवालिया और शुकरचकिया मिसलों के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। 1803 ई० में जस्सा सिंह रामगढ़िया ने सदैव के लिए हमसे अलविदा ले ली। उनका जीवन आने वाले सिख नेताओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत रहा।

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प्रश्न 7.
महा सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Maha Singh.).
उत्तर-
चढ़त सिंह की मृत्यु के पश्चात् 1774 ई० में उसका पुत्र महा सिंह शुकरचकिया मिसल का नया मुखिया बमा। उस समय महा सिंह की आयु केवल दस वर्ष की थी। इसलिए उसकी माँ देसाँ ने कुछ समय के लिए बड़ी समझदारी से मिसल का नेतृत्व किया। शीघ्र ही महा सिंह ने शुकरचकिया मिसल के प्रदेशों का विस्तार प्रारंभ किया। उसने सबसे पहले रोहतास पर अधिकार किया। इसके पश्चात् रसूल नगर और अलीपुर प्रदेशों पर अधिकार किया। महा सिंह ने रसूलपुर नगर का नाम बदल कर रामनगर और अलीपुर का नाम बदल कर अकालगढ़ रख दिया। महा सिंह ने भंगी सरदारों से मुलतान, बहावलपुर, साहीवाल आदि प्रदेशों को भी जीत लिया। महा सिंह की बढ़ती हुई शक्ति के कारण जय सिंह कन्हैया उससे बड़ी ईर्ष्या करने लग पड़ा। इसलिए उसको सबक सिखाने के लिए महा सिंह ने जस्सा सिंह रामगढ़िया के साथ मिलकर कन्हैया मिसल पर आक्रमण कर दिया। बटाला के निकट हुए युद्ध में जय सिंह का पुत्र गुरबख्श सिंह मारा गया। कुछ समय पश्चात् शुकरचकिया और कन्हैया मिसलों में मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित हो गए। जय सिंह ने अपनी पौत्री मेहताब कौर की सगाई महा सिंह के पुत्र रणजीत सिंह के साथ कर दी। 1792 ई० में महा सिंह की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 8.
फुलकियाँ मिसल पर एक संक्षेप नोट लिखें। (Write a short note on Phulkian Misl.)
उत्तर-
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक चौधरी फूल था। उसके वंश ने पटियाला, नाभा तथा जींद के प्रदेशों पर अपना राज्य स्थापित किया। पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बहुत बहादुर था। उसने अनेकों प्रदेशों पर कब्जा किया तथा बरनाला को अपनी राजधानी बनाया। 1764 ई० में उसने सरहिंद पर विजय प्राप्त की। 1764 ई० में उसने अहमद शाह अब्दाली से समझौता किया। 1765 ई० में आला सिंह के पश्चात् अमर सिंह तथा साहब सिंह ने शासन किया। नाभा में फुलकियाँ मिसल की स्थापना हमीर सिंह ने की थी। उसने 1755 ई० से 1783 ई० तक शासन किया। उसके पश्चात् उसका बेटा जसवंत सिंह गद्दी पर बैठा। जींद में फलकियाँ मिसल का संस्थापक गजपत सिंह था। उसने पानीपत तथा करनाल के प्रदेशों को विजय किया था। उसने अपनी सुपुत्री राज कौर की शादी महा सिंह से की। 1809 ई० में फुलकियाँ मिसल अंग्रेजों के संरक्षण में चली गई थी।

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प्रश्न 9.
आला सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on Ala Singh.)
उत्तर-
पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बड़ा बहादुर था। उसने बरनाला को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। 1768 ई० में अहमद शाह अब्दाली के प्रथम आक्रमण के दौरान आला सिंह ने उसके विरुद्ध मुग़लों की सहायता की थी। उसकी सेवाओं के दृष्टिगत मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला ने एक खिलत भेट की। इससे आला सिंह की प्रसिद्धि बुहत बढ़ गई। शीघ्र ही आला सिंह ने बुडलाडा, टोहाना, भटनेर और जैमलपुर के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 1762 ई० में अपने छठे,आक्रमण के दौरान अब्दाली ने बरनाला पर आक्रमण किया और आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया। आला सिंह ने अब्दाली को भारी राशि देकर अपनी जान बचाई। 1765 ई० में अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अब्दाली के साथ समझौते के कारण दल खालसा के सदस्य उससे रुष्ट हो गए और उसे अब्दाली से अपने संबंध तोड़ने हेत कहा, परंतु शीघ्र ही आला सिंह की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 10.
सरबत खालसा तथा गुरमता के विषय में आप क्या जानते हैं ?, (What do you understand by Sarbat Khalsa and Gurmata ?)
अथवा
‘सरबत खालसा’ और ‘गुरमता’ के बारे में अपने विचार लिखें। (Write your views on ‘Sarbat Khalsa’ and ‘Gurmata’.)
उत्तर-
1. सरबत खालसा-सिख पंथ से संबंधित विषयों पर विचार करने के लिए वर्ष में दो बार दीवाली और वैशाखी के अवसर पर सरबत खालसा का समागम अकाल तख्त साहिब अमृतसर में बुलाया जाता था। सारे सिख गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेक कर बैठ जाते थे। इसके पश्चात् गुरुवाणी का कीर्तन होता था फिर अरदास की जाती थी। इसके बाद कोई एक सिख खड़ा होकर संबंधित समस्या के बारे सरबत खालसा को जानकारी देता था। इस समस्या के बारे विचार-विमर्श करने के लिए प्रत्येक पुरुष व स्त्री को पूरी छूट होती थी। कोई भी निर्णय सर्वसम्मति से लिया जाता था।

2. गुरमता-गुरमता सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था थी। गुरमता पंजाबी के दो शब्दों गुरु और मता के मेल से बना है-जिसके शाब्दिक अर्थ हैं, ‘गुरु का मत या निर्णय’। दूसरे शब्दों में, गुरु ग्रंथ साहिब जी की उपस्थिति में सरबत खालसा द्वारा जो निर्णय स्वीकार किए जाते थे उनको गुरमता कहा जाता था। इन गुरमतों का सारे सिख बड़े सत्कार से पालन करते थे। गुरमता के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य ये थे-दल खालसा के नेता का चुनाव करना, सिखों की विशेष नीति तैयार करना, सांझे शत्रुओं के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही के लिए योजनाओं को अंतिम रूप देना, सिख सरदारों के आपसी झगड़ों का निपटारा करना और सिख धर्म के प्रचार के लिए प्रबंध करना।

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प्रश्न 11.
गुरमता से क्या अभिप्राय है ? गुरमता के कार्यों की संक्षेप जानकारी दें। (What is meant by Gurmata ? Give a brief account of its functions.)
अथवा
गुरमता पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a brief note on Gurmata.)
अथवा
गुरमता बारे आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Gurmata ?)
उत्तर-
गुरमता एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। इसके द्वारा अनेक राजनीतिक, सैनिक, धार्मिक तथा न्याय संबंधी कार्य किए जाते थे।

  1. इसका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य दल खालसा के सर्वोच्च सेनापति की नियुक्ति करना था।
  2. इसके द्वारा सिखों की विदेश नीति को तैयार किया जाता था।
  3. इसके द्वारा सिखों के सांझे शत्रुओं के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया जाता था।
  4. यह सिख मिसलों के सरदारों के आपसी झगड़ों का निपटारा करता था।
  5. इसमें सिख धर्म के प्रचार तथा सिख धर्म से संबंधित अन्य समस्याओं से संबंधित विचार किया जाता था तथा कार्यक्रम तैयार किया जाता था।
  6. इसके द्वारा विभिन्न मिसल सरदारों के अथवा व्यक्तिगत सिखों के झगड़ों का निपटारा किया जाता था। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा सिख मिसलों के उत्तराधिकार एवं सीमा संबंधी झगड़ों का निर्णय भी किया जाता था।

सिख पंथ से संबंधित विषयों पर विचार करने के लिए वर्ष में दो बार बैसाखी और दीवाली के अवसरों पर अकाल तख्त में सरबत खालसा का आयोजन किया जाता था। वे अकाल तख्त साहिब के प्रांगण में रखे गए गुरु ग्रंथ साहिब जी को माथा टेक कर स्थान ग्रहण करते थे। उनके पीछे उनके अनुयायी तथा अन्य सिख संगत होती थी। आयोजन का आरंभ कीर्तन द्वारा किया जाता था। इसके पश्चात् अरदास की जाती थी। इसके पश्चात् ग्रंथी खड़ा होकर संबंधित समस्या के बारे में सरबत खालसा को जानकारी देता था। इस समस्या के बारे में विचार-विमर्श करने के लिए सरबत खालसा के सभी सदस्यों को पूर्ण स्वतंत्रता होती थी।

प्रश्न 12.
मिसलों के आंतरिक संगठन की कोई छः विशेषताएँ बताओ। (Mention any six features of internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
सिख मिसलों का अंदरूनी संगठन कैसा था ? व्याख्या करें। (Describe the internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
मिसल प्रबंध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें। (Describe the main features of Misl Administration.)
उत्तर-
प्रत्येक मिसल के मुखिया को सरदार कहा जाता था और प्रत्येक सरदार के अधीन कई मिसलदार होते थे। सरदार विजित किए हुए क्षेत्रों में से कुछ भाग अपने अधीन मिसलदारों को दे देता था। कई बार मिसलदार सरदार से अलग होकर अपनी स्वतंत्र मिसल स्थापित कर लेते थे। सरदार अपनी प्रजा से अपने परिवार की तरह प्यार करते थे। मिसल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। गाँव का प्रबंध पंचायत के हाथों में था। गाँव के लगभग सभी मसले पंचायत द्वारा ही हल कर लिए जाते थे। लोग पंचायत का बड़ा आदर करते थे। सिख मिसलों का न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों का फैसला उस समय के प्रचलित रीतिरिवाजों के अनुसार किया जाता था। अपराधियों को सख्त सज़ाएँ नहीं दी जाती थीं। उनसे आमतौर पर जुर्माना ही वसूल किया जाता था। मिसलों के समय आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। यह भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न रहता था। यह आमतौर पर 1/3 से 1/4 भाग होता था। यह लगान वर्ष में दो बार वसूल किया जाता था। लगान अनाज या नकदी किसी भी रूप में दिया जा सकता था।

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प्रश्न 13.
राखी प्रणाली पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Rakhi System.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? संक्षिप्त व्याख्या करें। (What is Rakhi System ? Explain in brief.)
अथवा
‘राखी व्यवस्था’ के विषय में आप क्या जानते हैं ? संक्षेप में लिखिए। (What do you know about Rakhi System ? Write in brief.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? इसका आरंभ कैसे हुआ ? व्याख्या करें। (What is Rakhi System ? Explain its origin.)
अथवा
राखी व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about ‘Rakhi System’ ?)
अथवा
मिसल प्रशासन में राखी प्रणाली का क्या महत्त्व था? (What was the importance of Rakhi System under the Misl Administration ?)
उत्तर-
18वीं शताब्दी पंजाब में जिन महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना हुई उनमें से राखी प्रणाली सबसे महत्त्वपूर्ण थी। —
1. राखी प्रणाली से अभिप्राय-राखी शब्द से अभिप्राय है रक्षा करना। वे गाँव जो अपनी इच्छा से सिखों की रक्षा के अधीन आ जाते थे उन्हें बाह्य आक्रमणों के समय तथा सिखों की लूटमार से सुरक्षा की गारंटी दी जाती थी। इस सुरक्षा के बदले उन्हें अपनी उपज का पाँचवां भाग सिखों को देना पड़ता था।

2. राखी प्रणाली का आरंभ-पंजाब में मुग़ल सूबेदारों की दमनकारी नीति, नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों के कारण पंजाब में अराजकता फैल गई थी। पंजाब में कोई स्थिर सरकार भी नहीं थी। इस वातावरण के कारण पंजाब में कृषि, उद्योग तथा व्यापार को काफ़ी हानि पहुँची। पंजाब के स्थानीय अधिकारी तथा ज़मींदार किसानों का बहुत शोषण करते थे तथा वे जब चाहते तलवार के बल पर लोगों की संपत्ति आदि लूट लेते थे। ऐसे अराजकता के वातावरण में दल खालसा ने राखी प्रणाली का आरंभ किया।

3. राखी प्रणाली की विशेषताएँ-राखी प्रणाली के अनुसार जो गाँव स्वयं को सरकारी अधिकारियों, ज़मींदारों, चोर-डाकुओं तथा विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करना चाहते थे वे सिखों की शरण में आ जाते थे। सिखों की शरण में आने वाले गाँवों को इन सभी की लूटमार से बचाया जाता था। इस सुरक्षा के कारण प्रत्येक गाँव को वर्ष में दो बार अपनी कुल उपज का 1/5वां भाग दल खालसा को देना पड़ता था।

4. राखी प्रणाली की महत्ता-18वीं शताब्दी में पंजाब में राखी प्रणाली की स्थापना अनेक पक्षों से लाभदायक सिद्ध हुई। प्रथम, इसने पंजाब में सिखों की राजनीतिक शक्ति के उत्थान की ओर प्रथम महान् पग उठाया। दूसरा, इस कारण पंजाब के लोगों को सदियों बाद सुख का साँस मिला। वे अत्याचारी जागीरदारों तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचारों से बच गए। तीसरा, उन्हें विदेशी आक्रमणकारियों की लूटमार का भय भी ने रहा। चौथा, पंजाब में शाँति स्थापित होने के कारण यहाँ की कृषि, उद्योग तथा व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 14.
मिसल काल के वित्तीय प्रबंध के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the financial administration of Misl period ?)
अथवा
मिसल शासन की अर्थ-व्यवस्था पर एक नोट लिखें। (Write a short note on economy under the Misls.)
उत्तर-
मिसल काल के वित्तीय प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—
1. लगान प्रबंध-मिसलों के समय आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। इसकी दर भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न होती थी। यह प्रायः कुल उपज का 1/3 से 1/4 भाग होता था। यह लगान वर्ष में दो बार रबी और खरीफ फसलों के तैयार होने के समय लिया जाता था। लगान एकत्रित करने के लिए बटाई प्रणाली प्रचलित थी। लगान अनाज या नकदी किसी भी रूप में दिया जा सकता था। मिसल काल में भूमि अधिकार संबंधी चार प्रथाएँ-पट्टीदारी, मिसलदारी, जागीरदारी तथा ताबेदारी प्रचलित थीं।

2. राखी प्रथा-पंजाब के लोगों को विदेशी हमलावरों तथा सरकारी कर्मचारियों से सदैव लूटमार का भय लगा रहता था। इसलिए अनेक गाँवों ने अपनी रक्षा के लिए मिसलों की शरण ली। मिसल सरदार उनकी शरण में आने वाले गाँवों को सरकारी कर्मचारियों तथा विदेशी आक्रमणकारियों की लूट-पाट से बचाते थे। इस रक्षा के बदले उस गाँव के लोग अपनी उपज का पाँचवां भाग वर्ष में दो बार मिसल के सरदार को देते थे। इस तरह यह राखी कर मिसलों की आय का एक अच्छा साधन था।

3. आय के अन्य साधन-इसके अतिरिक्त मिसल सरदारों को चुंगी कर, भेंटों से और युद्ध के समय की गई लूटमार से भी कुछ आय प्राप्त हो जाती थी।

4. व्यय-मिसल सरदार अपनी आय का एक बहुत बड़ा भाग सेना, घोड़ों, शस्त्रों, नए किलों के निर्माण और पुराने किलों की मुरम्मत पर व्यय करता था। इसके अतिरिक्त मिसल सरदार गुरुद्वारों और मंदिरों को दान भी देते थे और निर्धन लोगों के लिए लंगर भी लगाते थे।

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प्रश्न 15.
मिसलों की न्याय व्यवस्था पर नोट लिखें। (Write a note on the Judicial system of Misls.)
उत्तर-
सिख मिसलों के समय न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों के फैसले उस समय के प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किए जाते थे। उस समय सज़ाएँ सख्त नहीं थीं। किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया जाता था। अधिकतर अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था। बार-बार अपराध करने वाले अपराधी के शरीर का कोई अंग काट दिया जाता था। मिसलों के समय पंचायत न्याय प्रबंध की सबसे छोटी अदालत होती थी। गाँव में अधिकतर मुकद्दमों का फैसला पंचायतों द्वारा ही किया जाता था। लोग पंचायत को परमेश्वर समझ कर उसका फैसला स्वीकार करते थे। प्रत्येक मिसल के सरदार की अपनी अलग अदालत होती थी। इसमें दीवानी और फ़ौजदारी दोनों तरह के मुकद्दमों का निर्णय किया जाता था। वह पंचायत के फैसलों के विरुद्ध भी अपीलें सुनता था। सरबत खालसा सिखों की सर्वोच्च अदालत थी। इसमें मिसल सरदारों के आपसी झगड़ों तथा सिख कौम से संबंधित मामलों की सुनवाई की जाती थी तथा इनका निर्णय गुरमतों द्वारा किया जाता था।

प्रश्न 16.
सिख मिसलों के सैनिक प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ बताएँ। (Describe the main features of military administration of Sikh Misls.)
उत्तर-
1. घुड़सवार सेना-घुड़सवार सेना मिसलों की सेना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था। सिख बहुत निपुण घुड़सवार थे। सिखों के तीव्र गति से दौड़ने वाले घोड़े उनकी गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के संचालन में बहुत सहायक सिद्ध हुए।

2. पैदल सैनिक–मिसलों के समय पैदल सेना को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता था। पैदल सैनिक किलों में पहरा देते, संदेश पहुँचाते और स्त्रियों और बच्चों की देखभाल करते थे।

3. भर्ती-मिसल सेना में भर्ती होने के लिए किसी को भी विवश नहीं किया जाता था। सैनिकों को कोई नियमित प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता था। उनको नकद वेतन के स्थान पर युद्ध के दौरान की गई लूटमार से हिस्सा मिलता था।

4. सैनिकों के शस्त्र और सामान–सिख सैनिक युद्ध के समय तलवारों, तीर-कमानों, खंजरों, ढालों और बों का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त वे बंदूकों का प्रयोग भी करते थे।

5. लड़ाई का ढंग-मिसलों के समय सैनिक छापामार ढंग से अपने शत्रुओं का मुकाबला करते थे। इसका कारण यह था कि दुश्मनों के मुकाबले सिख सैनिकों के साधन बहुत सीमित थे। मारो और भागो इस युद्ध नीति का प्रमुख आधार था। सिखों की लड़ाई का यह ढंग उनकी सफलता का एक प्रमुख कारण बना।

6. मिसलों की कुल सेना–मिसल सैनिकों की कुल संख्या के संबंध में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। आधुनिक इतिहासकारों डॉ० हरी राम गुप्ता और एस० एस० गाँधी आदि के अनुसार यह संख्या लगभग एक लाख थी।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

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नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
नवाब कपूर सिंह फैजलपुरिया मिसल का संस्थापक था। उसने सबसे पहले अमृतसर के निकट फैजलपुर नामक गाँव पर अधिकार किया। इस गाँव का नाम बदल कर सिंघपुर रखा गया। इसी कारण फैजलपुरिया मिसल को सिंघपुरिया मिसल भी कहा जाता है। सरदार कपूर सिंह का जन्म 1697 ई० में कालोके नामक गाँव में हुआ था। उसके पिता का नाम दलीप सिंह था और वह जाट परिवार से संबंध रखते थे। कपूर सिंह बाल्यकाल से ही अत्यंत वीर और निडर थे। उन्होंने भाई मनी सिंह से अमृत छका था। शीघ्र ही वह सिखों के प्रसिद्ध मुखिया बन गए। 1733 ई० में उन्होंने पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ से नवाब का पद तथा एक लाख वार्षिक आय वाली जागीर प्राप्त की। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिख शक्ति को संगठित करने के उद्देश्य से उनको दो जत्थों बुड्डा दल और तरुणा दल के रूप में गठित किया। उन्होंने बड़ी योग्यता और सूझ-बूझ के साथ इन दोनों दलों का नेतृत्व किया। 1748 ई० में उन्होंने दल खालसा की स्थापना करके सिख पंथ के लिए महान् कार्य किया। वास्तव में सिख पंथ के विकास तथा उसको संगठित करने के लिए नवाब कपूर सिंह का योगदान बड़ा प्रशंसनीय था। उनकी 1753 ई० में मृत्यु हो गई।

  1. फैज़लपुरिया मिसल के संस्थापक कौन थे ?
  2. फैज़लपुरिया को अन्य किस नाम से जाना जाता था ?
  3. सरदार कपूर सिंह ने कब तथा किससे नवाब का दर्जा प्राप्त किया था ?
  4. नवाब कपूर सिंह की कोई एक सफलता के बारे में बताएँ।
  5. दल खालसा की स्थापना ……….. में की गई।

उत्तर-

  1. फैजलपुरिया मिसल के संस्थापक नवाव कपूर सिंह थे।
  2. फैज़लपुरिया को सिंघपुरिया मिसल के नाम से जाना जाता था।
  3. सरदार कपूर सिंह ने 1733 ई० में पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ से नवाब का दर्जा प्राप्त किया था।
  4. उन्होंने 1734 ई० में बुड्डा दल तथा तरुणा दल का गठन किया।
  5. 1748 ई०।

2
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक सरदार जस्सा सिंह था। वह लाहौर के निकट स्थित गाँव आहलू का निवासी था। इस कारण इस मिसल का नाम आहलूवालिया मिसल पड़ गया। जस्सा सिंह अपने गुणों के कारण शीघ्र ही सिखों के प्रसिद्ध नेता बन गए। 1739 ई० में जस्सा सिंह के नेतृत्व में सिखों ने नादिर शाह की सेना पर आक्रमण करके बहुत-सा धन लूट लिया था। 1746 ई० में छोटे घल्लूघारे के समय इन्होंने वीरता के बड़े जौहर दिखाए। परिणामस्वरूप उनका नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया। 1748 ई० में दल खालसा की स्थापना के समय जस्सा सिंह आहलूवालिया को सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया। उन्होंने दल खालसा का नेतृत्व करके सिख पंथ की महान् सेवा की। 1761 ई० में जस्सा सिंह के नेतृत्व में सिखों ने लाहौर पर जीत प्राप्त की। यह सिखों की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विजय थी। 1762 ई० में बड़े घल्लूघारे के समय भी जस्सा सिंह ने अहमद शाह अब्दाली की फ़ौजों का बड़ी वीरता के साथ मुकाबला किया। 1764 ई० में जस्सा सिंह ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया और इसके शासक जैन खाँ को मौत के घाट उतार दिया। 1778 ई० में जस्सा सिंह ने कपूरथला पर कब्जा कर लिया और इसको आहलूवालिया मिसल की राजधानी बना दिया।

  1. जस्सा सिंह आहलूवालिया कौन था ?
  2. आहलूवालिया मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
  3. जस्सा सिंह आहलूवालिया की राजधानी का नाम क्या था ?
  4. जस्सा सिंह आहलूवालिया की कोई एक सफलता लिखें।
  5. जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कपूरथला पर कब कब्जा किया ?
    • 1761 ई०
    • 1768 ई०
    • 1778 ई०
    • 1782 ई०।

उत्तर-

  1. जस्सा सिंह आहलूवालिया, आहलूवालिया मिसल के संस्थापक थे।
  2. क्योंकि जस्सा सिंह आहलूवालिया आहलू गाँव का निवासी था।.
  3. जस्सा सिंह आहलूवालिया की राजधानी का नाम कपूरथला था।
  4. उन्होंने 1761 ई० में लाहौर में विजय प्राप्त की।
  5. 1778 ई०।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

3
जस्सा सिंह रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता था। उसके नेतृत्व में यह मिसल अपनी उन्नति के शिखर पर पहुँच गई थी। जस्सा सिंह पहले जालंधर के फ़ौजदार अदीना बेग के अधीन नौकरी करता था। अक्तूबर, 1748 ई० में मीर मन्नू और अदीना बेग की सेनाओं ने 500 सिखों को अचानक रामरौणी के किले में घेर लिया था। अपने भाइयों पर आए इस संकट को देखकर जस्सा सिंह के खून ने जोश मारा। वह अदीना बेग की नौकरी छोड़कर सिखों की सहायता के लिए पहुँचा। उसके इस सहयोग के कारण 300 सिखों की जानें बच गईं। इससे प्रसन्न होकर रामरौणी का किला सिखों ने जस्सा सिंह के सुपुर्द कर दिया। जस्सा सिंह ने इस किले का नाम रामगढ़ रखा। इससे ही उसकी मिसल का नाम रामगढ़िया पड़ गया। 1753 ई० में मीर मन्नू की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में फैली अराजकता का लाभ उठाकर जस्सा सिंह ने कलानौर, बटाला, हरगोबिंदपुर, कादियाँ, उड़मुड़ टांडा, दीपालपुर, करतारपुर और हरिपुर इत्यादि प्रदेशों पर अधिकार करके रामगढ़िया मिसल का खूब विस्तार किया। उसने श्री हरगोबिंदपुर को रामगढ़िया मिसल की राजधानी घोषित किया। जस्सा सिंह के आहलूवालिया और शुकरचकिया मिसलों के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। जस्सा सिंह की 1803 ई० में मृत्यु हो गई।

  1. जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ?
  2. जस्सा सिंह रामगढ़िया ने रामरौणी किले का क्या नाम रखा ?
  3. जस्सा सिंह रामगढ़िया की राजधानी का नाम क्या था ?
  4. जस्सा सिंह रामगढ़िया की कोई एक सफलता लिखें।
  5. ………. में मीर मन्नू की मृत्यु हुई।

उत्तर-

  1. जस्सा सिंह रामगढ़िया, रामगढ़िया मिसल के सबसे प्रसिद्ध नेता थे।
  2. जस्सा सिंह रामगढ़िया ने रामरौणी किले का नाम बदलकर रामगढ़ रखा।
  3. जस्सा सिंह रामगढ़िया की राजधानी का नाम श्री हरगोबिंदपुर था।
  4. उसने सिखों को रामरौणी किले में मुग़लों के घेरे से बचाया था।
  5. 1753 ई०।

4
पटियाला में फुलकिया मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बड़ा बहादुर था। उसने 1731 ई० में जालंधर दोआब के और मालेरकोटला के फ़ौजदारों की संयुक्त सेना को करारी हार दी थी। आला सिंह ने बरनाला को अपनी सरगर्मियों का केंद्र बनाया। उसने लौंगोवाल, छजली, दिरबा और शेरों नाम के गाँवों की स्थापना की। 1748 ई० में अहमद शाह अब्दाली के प्रथम आक्रमण के दौरान आला सिंह ने उसके विरुद्ध मुग़लों की सहायता की। उसकी सेवाओं के दृष्टिगत मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला ने एक खिलत भेंट की। इससे आला सिंह की प्रसिद्धि बढ़ गई। शीघ्र ही आला सिंह ने भट्टी भाइयों जोकि उसके कट्टर शत्रु थे, को हरा कर बुडलाडा, टोहाना, भटनेर और जैमलपुर के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 1761 ई० में आला सिंह ने अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों की मदद की थी। इसलिए 1762 ई० में अपने छठे आक्रमण के दौरान अब्दाली ने बरनाला पर आक्रमण किया और आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया। आला सिंह ने अब्दाली को भारी राशि देकर अपनी जान बचाई। 1764 ई० में आला सिंह ने दल खालसा के अन्य सरदारों के साथ मिलकर सरहिंद पर आक्रमण कर इसके सूबेदार जैन खाँ को यमलोक पहँचा दिया था। इसी वर्ष अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त कर दिया एवं उसे राजा की उपाधि से सम्मानित किया।

  1. आला सिंह कौन था ?
  2. आला सिंह की राजधानी का क्या नाम था ?
  3. अहमद शाह अब्दाली ने कब आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया था ?
  4. अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को कहाँ का सूबेदार नियुक्त किया था ?
  5. आला सिंह को कब सरहिंद का सूबेदार नियुक्त किया गया ?
    • 1748 ई०
    • 1761 ई०
    • 1762 ई०
    • 1764 ई०।

उत्तर-

  1. आला सिंह पटियाला में फुलकिया मिसल का संस्थापक था।
  2. आला सिंह की राजधानी का नाम बरनाला था।
  3. अहमद शाह अब्दाली ने 1762 ई० में आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया था।
  4. अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त किया था।
  5. 1764 ई०।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप PSEB 12th Class History Notes

  • मिसल शब्द से भाव (Meaning of the word Misl)—कनिंघम और प्रिंसेप के अनुसार मिसल अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘बराबर’-डेविड आक्टरलोनी मिसल शब्द को स्वतंत्र शासन करने वाले कबीले या जाति से जोड़ते हैं-अधिकतर इतिहासकारों के अनुसार मिसल शब्द का अर्थ फाइल है।
  • सिख मिसलों की उत्पत्ति (Origin of the Sikh Misls)-सिख मिसलों की उत्पत्ति किसी पूर्व निर्धारित योजना या निश्चित समय में नहीं हुई थी-मुग़ल सूबेदारों के बढ़ते अत्याचारों के कारण 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिख शक्ति को बुड्डा दल और तरुणा दल में संगठित कर दियाउन्होंने ही 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में दल खालसा की स्थापना की-दल खालसा के अधीन 12 जत्थे गठित किए गए-इन्हें ही मिसल कहा जाता था।
  • सिख मिसलों का विकास (Growth of the Sikh Misls)-सिखों की महत्त्वपूर्ण मिसलों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
    • फैज़लपुरिया मिसल (Faizalpuria Misl)-फैजलपुरिया मिसल का संस्थापक नवाब कपूर सिंह था-उस मिसल के अधीन अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, पट्टी और नूरपुर आदि के प्रदेश आते थे।
    • आहलूवालिया मिसल (Ahluwalia Misl)-आहलूवालिया मिसल का संस्थापक जस्सा सिंह था-इस मिसल के अधीन सरहिंद और कपूरथला आदि के महत्त्वपूर्ण प्रदेश आते थे।
    • रामगढ़िया मिसल (Ramgarhia Misl)-इस मिसल का संस्थापक खुशहाल सिंह था—इस मिसल के अधीन बटाला, कादियाँ, उड़मुड़ टांडा, हरगोबिंदपुर और करतारपुर आदि के प्रदेश आते थे।
    • शुकरचकिया मिसल (Sukarchakiya Misl)-शुकरचकिया मिसल का संस्थापक चढ़त सिंह था-इस मिसल की राजधानी गुजराँवाला थी-महाराजा रणजीत सिंह इसी मिसल से संबंध रखता था।
    • अन्य मिसलें (Other Misis)—अन्य मिसलों में भंगी मिसल, फुलकियाँ मिसल, कन्हैया मिसल, ___ डल्लेवालिया मिसल, शहीद मिसल, नकई मिसल, निशानवालिया मिसल और करोड़ सिंघिया मिसल आती थीं।
  • मिसलों का राज्य प्रबंध (Administration of the Misls) गुरमता सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था थी-सारे सिख इन गुरमतों को गुरु की आज्ञा समझकर पालना करते थे-प्रत्येक मिसल का मुखिया सरदार कहलाता था-उसके अधीन कई मिसलदार थे-प्रत्येक मिसल कई जिलों में बंटी होती थी-मिसल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी-मिसलों की आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान और राखी प्रथा थी- मिसलों का न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था-आधुनिक इतिहासकार मिसलों के समय सैनिकों की कुल संख्या एक लाख के करीब मानते हैं।

PSEB 7th Class Home Science Practical जाँघिया

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Practical जाँघिया Notes.

PSEB 7th Class Home Science Practical जाँघिया

PSEB 7th Class Home Science Practical जाँघिया 1
चित्र 6.1

माप-आयु – 2-3 वर्ष ।
लम्बाई – 11′
चौड़ाई – 16” ( चौड़ाई)
कागज़ का माप-लम्बाई 22″, चौड़ाई 16”

  1. चौड़ाई की ओर से कागज़ को दोहरा करते हैं।
  2. लम्बाई की ओर से कागज़ को दोहरा करते हैं।

दो बार दोहरे वाले भाग को बाईं ओर तथा एक बार दोहरे किए भाग को निचली ओर रखते हैं। चारों कोनों पर उ, अ, इ, स के चिन्ह लगाते हैं। उ, अ को दो बराबर भागों में बांटकर ह का चिन्ह लगाते हैं।

  • इ, स को दो बराबर भागों में बांटकर क का चिन्ह लगाते हैं।
  • ह तथा क को सीधी रेखा से मिलाते हैं।
  • उ, इ तथा अ, स को तीन बराबर भागों में बाँटकर रेखा लगाते हैं।
  • उ से 1″ नीचे को चिन्ह लगाकर ख का नाम देते हैं।
  • अ से 1” अन्दर की ओर लेकर ग का चिन्ह लगाते हैं।
  • ख तथा ग को थोड़ी सी गोलाई वाली रेखा से मिलाते हैं।
  • क से 1, स, इ वाली रेखा लेकर घ का चिन्ह लगाते हैं।
  • स से 1 खाना + 1” ऊपर लेकर झ का चिन्ह लगाते हैं।
  • झ ग को सीधी रेखा से मिलाते हैं।
  • फिर घ झ को सीधी रेखा से मिलाते हैं।
  • घ झ को दो भागों में बाँटकर च का निशान लगाते हैं।
  • च से ऊपर आधा इंच लेकर छ का निशान लगाते हैं और एक इंच ऊपर ज का निशान लगाते हैं।
  • घ, छ और झ को पिछली टाँग की गोलाई के लिए गोलाई में मिलाते हैं।
  • घ, छ और झ को टाँग की आगे की गोलाई के लिए गोलाई में मिलाते हैं।
  • घ, ज और झ को टाँग की आगे की गोलाई के लिए गोलाई में मिलाते हैं।

PSEB 7th Class Home Science Practical जाँघिया

कपड़ा-36” चौड़ाई की 26” लम्बी सफ़ेद या अन्य किसी हल्के रंग की पापलीन या कैम्बिक लगाई जा सकती है।
सिलाई-छोरों पर रन एण्ड फैल सिलाई करते हैं। टाँग वाली गोलाई को अन्दर थोड़ा-सा मोड़कर लेस लगाते हैं।
कमर-3/4” अन्दर की ओर मोड़कर तुरपाई कर लेते हैं तथा ” चौड़ा तथा 12” लम्बा इलास्टिक डाल देते हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions स्रोत आधारित प्रश्न.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology स्रोत आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित स्रोत को पढ़ें तथा साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
19वीं सदी में प्राकृतिक विज्ञानों ने बहुत प्रगति की। प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों द्वारा प्राप्त सफलता ने बड़ी संख्या में समाज, विचारकों को उनका अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया। उनका मानना था कि यदि प्राकतिक विज्ञान की पद्धतियों से भौतिक विश्व में भौतिक या प्राकृतिक प्रघटनाओं को सफलतापूर्वक समझा जा सकता है तो उन्हीं पद्धतियों को सामाजिक विश्व की सामाजिक प्रघटनाओं को समझने में भी सफलतापूर्वक प्रयुक्त किया जा सकता है। अगस्त कोंत, हरबर्ट स्पेंसर, एमिल दुर्खाइम, मैक्स वेबर जैसे विद्वानों तथा अन्य समाजशास्त्रियों ने समाज का अध्ययन विज्ञान की पद्धतियों से करने का समर्थन किया क्योंकि वे प्राकृतिक वैज्ञानिकों की खोजों से प्रेरित थे और समान तरीके से ही समाज का अध्ययन करना चाहते थे।

(i) किस कारण सामाजिक विचारक प्राकृतिक विज्ञानों का अनुकरण करने के लिए प्रेरित हुए ?
(ii) किन समाजशास्त्रियों ने समाज का अध्ययन किया ?
(ii) समाजशास्त्रियों का प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धतियों के बारे में क्या विचार था ?
उत्तर-
(i) 19वीं शताब्दी में प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को काफी सफलता प्राप्त हुई। इस कारण सामाजिक विचारक प्राकृतिक विज्ञानों का अनुकरण करने के लिए प्रेरित हुए।
(ii) अगस्त कोंत, हरबर्ट स्पेंसर, एमिल दुर्खाइम, मैक्स वेबर जैसे समाजशास्त्रियों ने समाज का गहनता से अध्ययन किया।
(iii) समाजशास्त्रियों का मानना था कि जैसे प्राकृतिक विज्ञान की पद्धतियों से प्राकृतिक घटनाओं को आसानी से समझा जा सकता है तो उन्हीं पद्धतियों की सहायता से सामाजिक विश्व की सामाजिक प्रघटनाओं को भी सफलतापूर्वक समझा जा सकता है।

प्रश्न 2.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
यूरोप और अमेरिका में, 19वीं सदी के बाद समाजशास्त्र एक विषय के रूप में विकसित हुआ। हालांकि, भारत में, यह न केवल थोड़ी देर से उभरा अपितु अध्ययन के एक विषय के रूप में इसे कम महत्त्व दिया गया। तथापि, स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भारत में समाजशास्त्र के महत्त्व में वृद्धि हुई और देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम मे एक स्वतंत्र विषय के रूप में स्थान प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक विषय के रूप मे भी पहचान बनायी। राधा कमल मुखर्जी, जी० एस० धुर्ये, डी० पी० मुखर्जी, डी० एन० मजूमदार, के० एम० कपाडिया, एम० एन० श्रीनिवास, पी० एन० प्रभु, ए० आर० देसाई इत्यादि कुछ महत्त्पूर्ण विद्वान हैं जिन्होंने भारतीय समाजशास्त्र के विकास में योगदान दिया।

(i) एक विषय के रूप में समाजशास्त्र यूरोप में कब विकसित हुआ ?
(ii) कुछ भारतीय समाजशास्त्रियों के नाम बताएं जिन्होंने भारतीय समाजशास्त्र के विकास में योगदान दिया।
(iii) भारत में समाजशास्त्र कैसे विकसित हुआ ?
उत्तर-
(i) यूरोप तथा अमेरिका में समाजशास्त्र एक विषय के रूप में 19वीं शताब्दी के पश्चात् काफी तेज़ी से विकसित हुआ।
(ii) राधा कमल मुखर्जी, जी० एस० घुर्ये, डी० पी० मुखर्जी, डी० एन० मजूमदार, के० एम० कपाड़िया, एम० एन० श्रीनिवास, पी० एन० प्रभु, ए० आर० देसाई जैसे भारतीय समाजशास्त्रियों ने भारतीय समाजशास्त्र के विकास में काफी योगदान दिया।
(iii) 1947 से पहले भारत में समाजशास्त्र का विकास तेज़ी से न हो पाया क्योंकि भारत पराधीन था। परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में समाजशास्त्र तेजी से विकसित हुआ तथा देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में इसे एक स्वतन्त्र विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा। इसके अतिरिक्त, इसे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी प्रयोग किया जाने लगा जिस कारण यह तेजी से विकसित हुआ।

PSEB 11th Class Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

प्रश्न 3.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
मॉरिस गिंसबर्ग के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से समाजशास्त्र की जड़ें राजनीति तथा इतिहास के दर्शन में हैं। इस कारण से समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान पर निर्भर करता है। प्रत्येक सामाजिक समस्या का एक राजनीतिक कारण है। राजनीतिक व्यवस्था या शक्ति संरचना की प्रकृति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन समाज में भी परिवर्तन लाता है। विभिन्न राजनीतिक घटनाओं को समझने के लिए समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से मदद लेता है। इसी तरह, राजनीति विज्ञान भी समाजशास्त्र पर पर निर्भर करता है। राज्य अपने नियमों, अधिनियमों और कानूनों का निर्माण सामाजिक प्रथाओं, परम्पराओं तथा मूल्यों के आधार पर करता है। अतः बिना समाजशास्त्रियों पृष्ठभूमि के राजनीति विज्ञान का अध्ययन अधूरा होगा। लगभग सभी राजनीतिक समस्याओं की उत्पत्ति सामाजिक है तथा इन राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र की सहायता लेता है।

(i) मॉरिस गिंसबर्ग के अनुसार समाजशास्त्र राजनीति पर क्यों निर्भर है ?
(ii) गिंसबर्ग के अनुसार बिना समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि के राजनीति विज्ञान का अध्ययन क्यों अधूरा है ?
(ii) किस प्रकार राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र की सहायता लेता है ?
उत्तर-
(i) गिंसबर्ग के अनुसार ऐतिहासिक रूप से समाजशास्त्र की जड़ें राजनीति व इतिहास के दर्शन में हैं। इसलिए समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान पर निर्भर है।
(ii) गिंसबर्ग के अनुसार राज्य जब भी अपने नियम अथवा कानून बनाता है, उसे सामाजिक मूल्यों, प्रथाओं, परम्पराओं का ध्यान रखना पड़ता है। इस कारण बिना समाजशास्त्रीय पृष्ठभूमि के राजनीति विज्ञान का अध्ययन अधूरा है।
(iii) गिंसबर्ग के अनुसार लगभग सभी राजनीतिक समस्याओं की उत्पत्ति समाज में से ही होती है तथा समाज का अध्ययन समाजशास्त्र करता है। इस लिए जब भी राजनीति विज्ञान को समाज का अध्ययन करना होता है, उसे समाजशास्त्र की सहायता लेनी ही पड़ती है।

प्रश्न 4.
निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
विभिन्न समाज विज्ञानों में समाज का भिन्न अर्थ लगाया जाता है, परन्तु समाजशास्त्र में इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार की सामाजिक इकाइयों के संदर्भ में होता है। समाजशास्त्र का मुख्य ध्यान मानव समाज पर तथा इसमें पाये जाने वाले सम्बन्धों के नेटवर्क/जाल पर होता है। एक समाज में समाजशास्त्री सामाजिक प्राणियों के अन्तः सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं तथा यह ज्ञात करते हैं कि एक विशिष्ट स्थिति में एक व्यक्ति कैसे व्यवहार करता है, उसे दूसरों से क्या उम्मीद करनी चाहिए तथा दूसरे उससे क्या उम्मीदें/अपेक्षाएं करते हैं।

(i) समाज शब्द का प्रयोग अलग-अलग समाज विज्ञानों में अलग-अलग क्यों है ?
(ii) समाजशास्त्र में समाज का क्या अर्थ है ?
(iii) समाज व एक समाज में क्या अंतर है ?
उत्तर-
(i) अलग-अलग समाज विज्ञान समाज के एक विशेष भाग का अध्ययन करते हैं। जैसे अर्थशास्त्र पैसे से संबंधित विषय का अध्ययन करता है। इस कारण वह समाज शब्द का अर्थ भी अलग-अलग ही लेते हैं।
(ii) समाजशास्त्र में सम्बन्धों के जाल को समाज कहा जाता है। जब लोगों के बीच सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं तो समाज का निर्माण होना शुरू हो जाता है। इस प्रकार सामाजिक सम्बन्धों के जाल को समाज कहते हैं।
(iii) जब हम समाज की बात करते हैं तो यह सभी समाजों को इक्ट्ठे लेते हैं तथा अमूर्त रूप से उसका अध्ययन करते हैं परन्तु एक समाज में हम किसी विशेष समाज की बात कर रहे होते हैं जैसे कि भारतीय समाज या अमेरिकी समाज। इस कारण यह मूर्त समाज हो जाता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

प्रश्न 5.
निम्न दिए स्त्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
समुदाय किसी भी आकार का एक सामाजिक समूह है जिसके सदस्य एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हैं, अक्सर एक सरकार तथा एक सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विरासत को सांझा करते हैं। समुदाय से अभिप्राय लोगों के एक समुच्चय से भी लिया जाता है जो समान प्रकार के कार्य या गतिविधियों में संलग्न रहते हैं जैसे प्रजातीय समुदाय, धार्मिक समुदाय, एक राष्ट्रीय समुदाय, एक जाति समुदाय या एक भाषायी समुदाय इत्यादि। इस अर्थ में यह समान विशेषताओं या पक्षों वाले एक सामाजिक, धार्मिक या व्यावसायिक समूह का प्रतिनिधित्व करता है तथा वहद समाज जिसमें यह रहता है, से स्वयं को कुछ अर्थों में भिन्न प्रदर्शित करता है। अत: समुदाय का अभिप्राय एक विशाल क्षेत्र में फैले लोगों से है जो एक या अन्य किसी प्रकार से समानताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदाहरण के लिए, ‘अन्तर्राष्ट्रीय समदाय’ या ‘एन० आर० आई० समुदाय’ जैसे शब्द समान विशेषताओं से निर्मित कुछ सुसंगत समूहों के रूप में साहित्य में प्रयुक्त किये जाते हैं।

(i) समुदाय का क्या अर्थ है ?
(ii) समुदाय की कुछ उदाहरण दीजिए।
(iii) समुदाय तथा समिति में दो अंतर बताएं।
उत्तर-
(i) समुदाय किसी भी आकार का एक सामाजिक समूह है जिसके सदस्य एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हैं, अक्सर एक सरकार तथा एक सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विरासत को सांझा करते हैं।
(ii) अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, भारतीय समुदाय, पंजाबी समुदाय इत्यादि समुदाय के कुछ उदाहरण हैं।
(iii) (a) समुदाय स्वयं ही निर्मित हो जाता है परन्तु समिति को जानबूझ कर किसी विशेष उद्देश्य से निर्मित किया जाता है।
(b) सभी लोग स्वत: ही किसी न किसी समुदाय का सदस्य बन जाते हैं परन्तु समिति की सदस्यता ऐच्छिक होती है अर्थात् व्यक्ति जब चाहे किसी समिति की सदस्यता ले तथा छोड़ सकता है।

प्रश्न 6.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
सामाजिक समूह व्यक्तियों का संगठन है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य अंतः क्रियाएँ पाई जाती हैं। इसमें वे व्यक्ति आते हैं, जो एक दूसरे के साथ अंतःक्रिया करते हैं, और अपने को अलग सामाजिक इकाई मानते हैं। समूह में सदस्यों की संख्या को दो से सौ व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसके साथ, सामाजिक समूह की प्रकृति गतिशील होती है, इसकी गतिविधियों में समय-समय पर परिवर्तन आता रहता है। सामाजिक समूह के अन्तर्गत व्यक्तियों में अंतक्रियाएँ व्यक्तियों को अन्यों से पहचान के लिए भी प्रेरित करती हैं। समूह, आमतौर पर स्थिर तथा सामाजिक इकाई है। उदाहरण के लिए, परिवार, समुदाय, गाँव आदि, समूह विभिन्न संगठित क्रियाएँ करते हैं, जोकि समाज के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

(i) सामाजिक समूह का क्या अर्थ है ?
(ii) क्या भीड़ को समूह कहा जा सकता है ? यदि नहीं तो क्यों ?
(iii) प्राथमिक व द्वितीय समूह का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
(i) व्यक्तियों के उस संगठन को सामाजिक समूह कहा जाता है, जिसमें व्यक्तियों के बीच अन्तक्रियाएँ पाई जाती हैं। जब लोग एक-दूसरे के साथ अन्तक्रियाएं करते हैं तो उनके बीच समूह का निर्माण होता है।
(ii) जी नहीं, भीड़ को समूह नहीं कहा जा सकता क्योंकि भीड में लोगों के बीच अन्तक्रिया नहीं होगी।
अगर अन्तक्रिया नहीं होगी तो उनमें संबंध नहीं बन पाएंगे। जिस कारण समूह का निर्माण नहीं हो पाएगा।
(iii) प्राथमिक समूह-वह समूह जिसके साथ हमारा सीधा, प्रत्यक्ष ब रोज़ाना का संबंध होता है उसे हम प्राथमिक समूह कहते हैं। जैसे-परिवार, मित्र समूह, स्कूल इत्यादि। द्वितीय समूह-वह समूह जिसके साथ हमारा प्रत्यक्ष व रोज़ाना का संबंध नहीं होता उसे हम द्वितीय
समूह कहते हैं। जैसे कि मेरे पिता का ऑफिस।

PSEB 11th Class Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

प्रश्न 7.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर देंद्वितीय समूह लगभग प्राथमिक समूह के विपरीत होते हैं। कूले ने द्वितीय समूह के बारे में नहीं बताया, जब वह प्राथमिक समूह के सम्बन्ध में बता रहे थे। बाद में, विचारकों ने प्राथमिक समूह से द्वितीय समूह के विचार को समझा। द्वितीय समूह वे समूह हैं, जो आकार में बड़े होते हैं तथा थोड़े समय के लिए होते हैं। सदस्यों में विचारों का आदान-प्रदान औपचारिक, उपयोग-आधारित, विशेष तथा अस्थायी होता है। क्योंकि इसके सदस्य अपनी-अपनी, भूमिकाओं तथा किये जाने वाले कार्यों के कारण ही आपस में जुड़ें होते हैं। दुकान के मालिक एवं ग्राहक, क्रिकेट मैच में इकट्टे हुए लोग तथा औद्योगिक संगठन इसके उत्तम उदाहरण हैं। कारखाने के मजदूर, सेना, कॉलेज का विद्यार्थी-संगठन-विश्व-विद्यालय के विद्यार्थी, एक राजनैतिक दल आदि भी द्वितीय समूह के अन्रा उदाहरण हैं।

(i) द्वितीय समूह का क्या अर्थ है ?
(ii) द्वितीय समूह की कुछ उदाहरण दें।
(iii) प्राथमिक व द्वितीय समूहों में दो अंतर दें।
उत्तर-
(i) वह समूह जिनके साथ हमारा सीधा व प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता, जिनकी सदस्यता हम अपनी इच्छा से ग्रहण करके कभी भी छोड़ सकते हैं, उसे द्वितीय समूह कहा जा सकता है।
(ii) पिता का दफ़तर, माता का ऑफिस, पिता का मित्र समूह, राजनीतिक दल, कारखाने के मजदूर इत्यादि द्वितीय समूह की उदाहरण हैं।
(iii) (a) प्राथमिक समूह आकार में काफ़ी छोटे होते हैं परन्तु द्वितीय समूह आकार में काफी बड़े होते हैं।
(b) प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच अनौपचारिक व प्रत्यक्ष संबंध होते हैं परन्तु द्वितीय समूह के सदस्यों के बीच औपचारिक व अप्रत्यक्ष संबंध होते हैं।

प्रश्न 8.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
संस्कृतियां एक समाज से दूसरे समाज तक भिन्नता रखती हैं तथा हर एक संस्कृति के अपने मूल्य तथा मापदण्ड होते हैं। सामाजिक मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त व्यवहारों के नियम हैं जबकि मूल्य से अभिप्राय, उस सामान्य पक्ष से है कि “क्या ठीक है या अभिलाषित व्यवहार है” तथा “क्या नहीं होना चाहिए”मान्य से संबंधित है। उदाहरण के लिए किसी एक संस्कृति में सत्कार को उच्च सामाजिक मूल्य माना जाता है जबकि अन्य समाज मे ऐसा नहीं होता। सामान्यतः कुछ समाजों में बहुपत्नी प्रथा को एक पारम्परिक रूप का विवाह माना जाता है जबकि अन्य समाजों में इसे एक उपयुक्त प्रथा नहीं माना जाता।

(i) संस्कृति का क्या अर्थ है ?
(ii) क्या दो देशों की संस्कृति एक सी हो सकती है?
(iii) संस्कृति के प्रकार बताएं।
उत्तर-
(i) आदिकाल से लेकर आज तक जो कुछ भी मनुष्य ने अपने अनुभव से प्राप्त किया है, उसे संस्कृति कहते हैं। हमारे विचार अनुभव, विज्ञान, तकनीक, वस्तुएं, मूल्य, परंपराएं इत्यादि सब कुछ संस्कृति का ही हिस्सा हैं।
(ii) जी नहीं, दो देशों की संस्कृति एक सी नहीं हो सकती। चाहे दोनों देशों के लोग एक ही धर्म से क्यों न संबंध रखते हों, उनके विचारों, आदर्शों, मूल्यों इत्यादि में कुछ न कुछ अंतर अवश्य रहता है। इस कारण उनकी संस्कृति भी अलग होती है।
(iii) संस्कृति के दो प्रकार होते हैं-
(a) भौतिक संस्कृति-संस्कृति का वह भाग जिसे हम देख व स्पर्श कर सकते हैं, भौतिक संस्कृति कहलाता है। उदाहरण के लिए कार, मेज़, कुर्सी, पुस्तकें, पैन, इमारतें इत्यादि। (b) अभौतिक संस्कृति-संस्कृति का वह भाग जिसे हम देख या स्पर्श नहीं कर सकते, उसे अभौतिक संस्कृति कहते हैं। उदाहरण के लिए हमारे मूल्य, परंपराएं, विचार, आदर्श इत्यादि।

PSEB 11th Class Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

प्रश्न 9.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
जीवन के विभिन्न स्तरों के दौरान व्यक्ति भिन्न-भिन्न संस्थाओं, समुदायों तथा व्यक्तियों के संपर्क में आता है। अपने संपूर्ण जीवन के दौरान वे बहुत कुछ सीखता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में विभिन्न अभिकरण तथा संगठन महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं तथा संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों का संस्थापन करते हैं। प्रत्येक समाज के समाजीकरण के अभिकरण होते हैं जैसे व्यक्ति, समूह, संगठन तथा संस्थाएं जो कि जीवन क्रम के समाजीकरण के लिए पर्याप्त मात्रा प्रदान करते हैं। अभिकरण वह क्रिया विधि है जिसके द्वारा स्वयं विचारों, विश्वासों एवं संस्कृति के व्यावहारिक प्रारूपों को सीखता है। अभिकरण नए सदस्यों को समाजीकरण की सहायता से अनेक स्थानों को ढूंढ़ने में सहायता करते हैं उसी प्रकार जैसे वे समाज के वृद्धावस्था को नई जिम्मेदारियों के लिए तैयार करते हैं।

(i) समाजीकरण का क्या अर्थ है ?
(ii) समाजीकरण के साधनों के नाम बताएं।
(iii) अभिकरण क्या है ?
उत्तर-
(i) समाजीकरण एक सीखने की प्रक्रिया है। पैदा होने से लेकर जीवन के अंत तक मनुष्य कुछ न कुछ सीखता रहता है जिसमें जीवन जीने व व्यवहार करने के तरीके शामिल होते हैं। इस सीखने की प्रक्रिया को हम समाजीकरण कहते हैं।
(ii) परिवार, स्कूल, खेल समूह, राजनीतिक संस्थाएं, मूल्य, परम्पराएं इत्यादि समाजीकरण के साधन अथवा अभिकरण के रूप में कार्य करती हैं।
(iii) अभिकरण वह क्रिया विधि है जिसकी सहायता से व्यक्ति विचारों विश्वास व संस्कृति में व्यावहारिक प्रारूपों को सीखता है। अभिकरण नए सदस्यों को समाजीकरण की सहायता से अनेकों स्थानों को ढूंढने में सहायता करते हैं। इस प्रकार वृद्धावस्था में नए उत्तरदायित्वों को संभालने को तैयार होता है।

प्रश्न 10.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
यद्यपि धर्म की महत्ता लोगों में अब कम हो गई है जबकि कुछ पीढ़ियां पहले, यह हमारे विचारों, मूल्यों और व्यवहारों को भी काफी प्रभावित करती थीं। भारत जैसे देश में धर्म हमारे जीवन के हर पक्ष को नियंत्रित करता है और यह समाजीकरण का एक शक्तिशाली अभिकर्ता (एजेंट) होता है।
कई प्रकार के धार्मिक संस्कार एवं कर्मकाण्ड, विश्वास एवं श्रद्धा, मूल्य एवं मापदण्ड धर्म के अनुसार ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होते हैं। धार्मिक त्योहार आमतौर पर सामूहिक रूप से निभाये जाते हैं जोकि समाजीकरण की प्रक्रिया में सहायता करते हैं। धर्म के सहारे ही एक बच्चा एक अलौकिक शक्ति (भगवान) के बारे में सीखता है कि यह हमें बुरी आत्माओं तथा बुराई से बचाती है। यह देखा जाता है कि अगर एक व्यक्ति के माता-पिता धार्मिक होते हैं तो जब एक बच्चा बड़ा होगा वो भी धार्मिक बनता जाएगा।

(i) धर्म क्या है ?
(ii) धर्म की समाजीकरण में क्या भूमिका है ?
(iii) क्या आज धर्म का महत्त्व कम हो रहा है ? यदि हाँ तो क्यों ?
उत्तर-
(i) धर्म और कुछ नहीं बल्कि एक अलौकिक शक्ति में विश्वास है जो हमारी पहुँच से बहुत दूर है। यह विश्वासों, मूल्यों, परंपराओं इत्यादि की व्यवस्था है जिसमें इस धर्म के अनुयायी विश्वास करते हैं।
(ii) धर्म का समाजीकरण में काफी महत्त्व है क्योंकि व्यक्ति धर्म के मूल्यों, परंपराओं के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करता । बचपन से ही बच्चों को धार्मिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती है जिस कारण व्यक्ति शुरू से ही अपने धर्म से जुड़ जाता है। वह कोई ऐसा कार्य नहीं करता जो धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध हो। इस प्रकार धर्म व्यक्ति पर नियन्त्रण भी रखता है और उसका समाजीकरण भी करता है।
(iii) यह सत्य है कि आजकल धर्म का महत्त्व कम हो रहा है। लोग आजकल अधिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं व विज्ञान की तरफ उनका झुकाव काफी बढ़ रहा है। परन्तु धर्म में तर्क का कोई स्थान नहीं होता जो विज्ञान में सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार लोग अब धर्म के स्थान पर विज्ञान को महत्त्व दे रहे हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions स्रोत आधारित प्रश्न

प्रश्न 11.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें-
विवाह महिलाओं एवं पुरुषों की शारीरिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए निर्मित एक संस्था है। यह पुरुष एवं महिला को परिवार निर्मित करने हेतु एक दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने की अनुमति देता है। विवाह का प्राथमिक उद्देश्य स्थायी सम्बन्धों के द्वारा यौनिक क्रियाओं को नियन्त्रित करना है। सरल शब्दों में, विवाह को एक ऐसी संस्था के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो पुरुषों एवं महिलाओं को पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने, बच्चों को जन्म देने तथा पति, पत्नी तथा बच्चों से सम्बन्धित विभिन्न अधिकारों और दायित्वों का निर्वाह करने की अनुमति प्रदान करता है। समाज एक पुरुष एवं महिला के मध्य वैवाहिक सम्बन्धों को एक धार्मिक संस्कार के रूप में अपनी अनुमति प्रदान करता है। विवाहित दंपति एक दूसरे के प्रति तथा सामान्य तौर पर समाज के प्रति अनेक दायित्वों का निर्वाह करते हैं। विवाह एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक उद्देश्य को भी पूरा करता है यह उत्तराधिकार से सम्बद्ध सम्पत्ति अधिकार को परिभाषित करता है। इस प्रकार, हम समझ सकते हैं कि विवाह एक पुरुष और महिला के बीच बहु-आयामी सम्बन्धों को व्यक्त करता है।

(i) विवाह का क्या अर्थ है ?
(ii) हिन्दू धर्म में विवाह को क्या कहते हैं ?
(iii) क्या आजकल विवाह का महत्त्व कम हो रहा है ?
उत्तर-
(i) विवाह एक ऐसी संस्था है जो पुरुष-स्त्री को पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने, बच्चों को जन्म देना तथा पति-पत्नी व बच्चों से संबंधित विभिन्न अधिकारों और दायित्वों का निर्वाह करने की अनुमति प्रदान करता है।
(ii) हिन्दू धर्म में विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता है क्योंकि विवाह बहुत से धार्मिक अनुष्ठान करके पूर्ण किया जाता है।
(iii) जी हाँ, यह सत्य है कि आजकल धर्म का महत्त्व कम हो रहा है। आजकल विवाह को धार्मिक
संस्कार न मानकर समझौता माना जाता है जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है। आजकल तो बहुत से युवक व युवतियों ने बिना विवाह किए इक्ट्ठे रहना शुरू कर दिया है जिससे विवाह का महत्त्व कम हो रहा है।

प्रश्न 12.
निम्न दिए स्रोत को पढ़ें व साथ दिए प्रश्नों के उत्तर दें
परिवार का अध्ययन इसलिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह पुरुषों और स्त्रियों तथा बच्चों को एक स्थाई सम्बन्धों में बांधकर मानव समाज के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संस्कृति का हस्तान्तरण परिवारों के भीतर होता है। सामाजिक प्रतिमानों, प्रथाओं तथा मूल्यों के विषय में सांस्कृतिक समझ तथा ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होते हैं। एक परिवार जिसमें बच्चा जन्म लेता है उसे जन्म का परिवार’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में, ऐसे परिवार को समरक्त परिवार कहते हैं जिसके सदस्य रक्त सम्बन्धों के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं जैसे भाई एवं बहिन तथा पिता और पुत्र इत्यादि।वह परिवार जो विवाह के बाद निर्मित होता है उसे ‘प्रजनन का परिवार’ या दापत्यमूलक परिवार कहते हैं जो ऐसे व्यस्क सदस्यों से निर्मित होता है जिनके बीच यौनिक सम्बन्ध होते हैं।

(i) परिवार किसे कहते हैं ?
(ii) जन्म का परिवार व दापत्यमूलक परिवार किसे कहते हैं ? ।
(ii) परिवार का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर-
(i) परिवार पुरुष व स्त्री के मेल से बनी ऐसी संस्था है जिसमें उन्हें लैंगिक संबंध स्थापित करने, संतान उत्पन्न करने व उनका भरण पोषण करने की आज्ञा होती है।
(ii) एक परिवार जिसमें बच्चा जन्म लेता है उसे जन्म का परिवार कहते हैं। वह परिवार जो विवाह के बाद निर्मित होता है इसे दापत्यमूलक अथवा प्रजनन परिवार कहते हैं।
(iii) परिवार का अध्ययन काफी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह पुरुष, स्त्री व बच्चों को एक स्थायी बंधन में बाँधकर रखता है। इससे परिवार समाज निर्माण मे महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। परिवार ही संस्कृति के हस्तांतरण में सहायता करता है। सामाजिक प्रथाओं, प्रतिमानों, व्यवहार करने के तरीकों में हस्तांतरण में भी परिवार समाज की सहायता करता है। इस प्रकार परिवार हमारे जीवन में व समाज निर्माण में सहायक होता है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 20 ग्रामीण विकास और स्थानीय सरकार

Punjab State Board PSEB 6th Class Social Science Book Solutions Civics Chapter 20 ग्रामीण विकास और स्थानीय सरकार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Social Science Civics Chapter 20 ग्रामीण विकास और स्थानीय सरकार

SST Guide for Class 6 PSEB ग्रामीण विकास और स्थानीय सरकार Textbook Questions and Answers

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न I.
ग्रामीण स्थानीय सरकार की इकाइयों का चुनाव लड़ने के लिए कम से कम कितनी आयु होनी चाहिए?
(क) 20 साल
(ख) 22 साल
(ग) 21 साल।
उत्तर-
21 साल।

प्रश्न II.
मतदाताओं (वोटरों) द्वारा पंचायत समिति में सीधे चुने जाने वाले सदस्यों की कम से कम तथा अधिक से अधिक संख्या कितनी हो सकती है?
(क) 9 से 25
(ख) 15 से 25
(ग) 6 से 29।
उत्तर-
15 से 251

प्रश्न III.
मतदाताओं (वोटरों) द्वारा जिला परिषद् में सीधे चुने जाने वाले सदस्यों की कम से कम तथा अधिक से अधिक संख्या कितनी हो सकती है?
(क) 10 से 25
(ख) 12 से 25
(ग) 14 से 25।
उत्तर-
10 से 25।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 20 ग्रामीण विकास और स्थानीय सरकार

प्रश्न IV.
पंचायत की आय-व्यय का हिसाब रखने वाले कर्मचारी को क्या कहते हैं?
(क) अधीक्षक (सुपरिन्टेंडेंट)
(ख) सचिव।
उत्तर-
सचिव।

I. नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखो

प्रश्न 1.
भारत में गाँवों की संख्या कितनी है?
उत्तर-
लगभग 6 लाख।

प्रश्न 2.
पंचायती राज्य का क्या अर्थ है?
उत्तर-
गाँवों की तीन स्तरों वाली स्थानीय शासन व्यवस्था को पंचायत राज्य अथवा पंचायती राज कहते हैं। सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत होती है। यह गाँव की स्थानीय सरकार है। इससे ऊपर पंचायत समिति और सबसे ऊपर जिला परिषद् होती है। पंचायत समिति जिला परिषद् तथा ग्राम पंचायत के बीच कड़ी का काम करती है।

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प्रश्न 3.
पंचायती राज्य की प्रारम्भिक तथा उच्च संस्था के नाम लिखो।
उत्तर-
पंचायती राज की प्रारम्भिक संस्था ग्राम पंचायत है। इसकी उच्च संस्था ज़िला परिषद् है।

प्रश्न 4.
पंजाब में ग्राम पंचायत के सदस्यों की (कम-से-कम और अधिक-सेअधिक) संख्या कितनी होती है?
उत्तर-
कम-से-कम 5 और अधिक-से-अधिक 13

प्रश्न 5.
ज़िला परिषद् के दो कार्य लिखो।
उत्तर-
जिला परिषद् की स्थापना ग्राम विकास के लिए की जाती है।

  1. इसका मुख्य कार्य पंचायत समितियों की देखभाल करना तथा उनमें तालमेल बनाए रखना है। यह सरकार तथा पंचायत समितियों के बीच कड़ी का काम करती है।
  2. यह सरकार को विकास कार्यों के बारे में राय देती है।

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प्रश्न 6.
वर्तमान समय में गांवों में कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं?
उत्तर-
वर्तमान समय में भारत सरकार के प्रयत्नों से गाँवों में निम्नलिखित अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं –

1. शिक्षा का प्रसार-शिक्षा के प्रसार के लिए स्कूल और कॉलेज खोले गए हैं। 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गई है। अशिक्षित प्रौढ़ों के लिए ‘प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र’ स्थापित किए गए हैं।

2. कृषि का विकास-ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। आजादी के बाद कृषि के विकास के लिए कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की गई । यहाँ कृषि के लिए उत्तम बीजों की खोज की जाती है। कृषकों के लिए वर्ष में एक बार प्रदर्शनी लगाई जाती है। इसमें कृषि वैज्ञानिक किसानों को उन्नत कृषि के लिए परामर्श देते हैं। किसानों को उत्तम किस्म के बीजों और फ़सलों के लिए आवश्यक कीटनाशक दवाइयों का वितरण किया जाता है। इससे उपज में वृद्धि हुई है।
भारत सरकार ने भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों को इकट्ठा करके चकबन्दी भी कर दी है ताकि मशीनों द्वारा कृषि की जा सके।

3. स्त्री शिक्षा तथा स्वास्थ्य-गाँवों में स्त्री शिक्षा में विस्तार के लिए लड़कियों को विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं। लोगों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए प्राइमरी स्वास्थ्य केन्द्र खोले गए हैं। इन केन्द्रों में ग्रामीण लोगों को हर प्रकार की डॉक्टरी सहायता दी जाती है।

4. अन्य परिवर्तन –
(i) फ़सलों के मंडीकरण के लिए देश के लगभग सभी गाँवों को पहुँच मार्ग द्वारा राजमार्गों से जोड़ने के प्रयत्न किए गए हैं।
(ii) केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा गाँवों की आर्थिक स्थिति सुधारने के उद्देश्य से ग्रामीणों को लघु उद्योग लगाने के लिए सस्ते दर पर ऋण दिए जाते हैं।
(iii) गांवों में पीने के पानी का प्रबन्ध और विद्युतीकरण करने के हर सम्भव प्रयत्न किए जा रहे हैं।
(iv) सहकारी कृषि और सरकारी बैंकों के खुलने से भी कई गाँवों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।

प्रश्न 7.
पंचायत की बनावट के बारे में संक्षेप नोट लिखो।
उत्तर-
ग्राम पंचायत 200 से अधिक जनसंख्या वाले प्रत्येक गांव में बनाई जाती है। पंजाब में ग्राम पंचायत के सदस्यों की संख्या 5 से 13 तक हो सकती है।
पंचों का चुनाव-ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों (जिनकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक हो) द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में स्त्रियों के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित रखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त पिछड़ी जातियों तथा कबीलों के सदस्यों की संख्या उनकी जनसंख्या तथा गांव की कुल जनसंख्या के अनुपात के अनुसार निश्चित की जाती है।

सरपंच – प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक सरपंच होता है। उसका चुनाव भी ग्राम सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से करते हैं।
पंचायत सचिव-पंचायत के कार्यों में सहायता के लिए एक सरकारी कर्मचारी भी होता है जिसे पंचायत सचिव कहते हैं। वह पंचायत के आय व्यय का हिसाब रखता है। वह पंचायत के कार्यों की रिपोर्ट तैयार करके ब्लॉक पंचायत के अधिकारी को देता है।

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प्रश्न 8.
ग्राम सभा से क्या तात्पर्य है? ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में क्या अंतर है?
उत्तर-
ग्राम सभा ग्राम पंचायत का चुनाव करने वाली एक सभा होती है। 18 वर्ष या इससे अधिक आयु वाले सभी ग्रामीण इसके सदस्य होते हैं। इसके सदस्य ही मतदान द्वारा ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करते हैं। इसके विपरीत ग्राम पंचायत, ग्राम सभा द्वारा चुनी गई एक समिति होती है। यह गाँव की उन्नति के लिए कार्य करती है। इसे अपने हिसाब-किताब को हर साल ग्राम सभा के सामने रखना पड़ता है।

प्रश्न 9.
पंचायत समिति का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन-सा है?
उत्तर-
पंचायत समिति का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य सम्बन्धित ग्राम पंचायतों के लिए आवश्यक नियम बनाना और गांवों में नागरिक सुविधाएं प्रदान करना है।

प्रश्न 10.
आपके क्षेत्र की पंचायत समिति अपने ब्लॉक के वातावरण को सुधारने के लिए क्या करती है?
उत्तर-
पंचायत समिति अपने ब्लॉक की पंचायतों के विकास तथा ब्लॉक के वातावरण को सुधारने के लिए कई प्रकार के कार्य करती है। इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं –

1. कृषि का विकास-(i) पंचायत समिति अपने क्षेत्र में कृषि की उपज बढ़ाने के लिए उत्तम बीजों और खाद वितरण का कार्य करती है। (ii) इसके अतिरिक्त यह कृषि कार्यों के लिए ऋण देने, अधिक भूमि को सिंचाई योग्य बनाने तथा कृषि के लिए अधिक बिजली देने के कार्य भी करती है।

2. पशु एवं मत्स्य पालन-पंचायत समिति अपने क्षेत्र में पशु एवं मत्स्य पालन को बढ़ावा देती है। इसका उद्देश्य दूध, अण्डे, मांस आदि की आपूर्ति को बढ़ाना है।

3. यातायात-पंचायत समिति सड़कों तथा पुलियों को बनवाने तथा उनकी मुरम्मत , कार्य करती है।

4. स्वास्थ्य तथा सफ़ाई-पंचायत समिति गांवों में स्वास्थ्य तथा स्वच्छता के कार्य ती है। यह ग्रामीणों को पीने के लिए स्वच्छ जल की सुविधाएं प्रदान करती है और उन्हें स्थ्य सम्बन्धी शिक्षा देती है।
(1) इसके अतिरिक्त यह हानिकारक कीटों को नष्ट करती है।
(2) यह ग्रामीणों को धुआं रहित चूल्हों का प्रयोग करने के लिए भी प्रेरित करती है।

5. सामाजिक शिक्षा-पंचायत समिति लोगों को नागरिक शिक्षा देने के लिए मनोरंजन न्द्रों तथा पुस्तकालयों की व्यवस्था करती है। यह शारीरिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देती है।

6. ग्रामीण एवं लघु उद्योग-इनमें हथकरघा, विद्युत् करघा, खादी, रेशम के कीड़े लना आदि लघु उद्योग आते हैं। पंचायत समिति इन उद्योगों को उन्नत बनाने का प्रयास रती है।

7. प्रशासनिक कार्य-पंचायत समिति अपने क्षेत्र की पंचायतों के कार्यों की ख-रेख करती है। ये उन्हें आदेश भी दे सकती है और सलाह भी दे सकती है।

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I. नीचे लिखे रिक्त स्थान भरो

  1. भारत में ……… राज्य और ……… केन्द्र प्रशासित क्षेत्र हैं।
  2. पंचायत समिति पंचायती राज्य की ……… संस्था है।
  3. ग्राम पंचायत और पंचायत समिति का कार्यकाल ……… साल होता है।
  4. पंजाब में ……… जिला परिषद् हैं।
  5. पंचायती राज्य की सबसे ऊंची संस्था ……… है।

उत्तर-

  1. 28, 8
  2. मध्य की
  3. 5
  4. 22
  5. जिला परिषद्।

II. निम्नलिखित वाक्यों पर सही (✓) या ग़लत (✗) का निशान लगाओ

  1. अंग्रेज़ी राज्य के समय गांवों की आर्थिक दशा बहुत खराब थी।
  2. ग्राम पंचायत में स्त्रियों के लिए सीटें आरक्षित नहीं होती।
  3. जिला प्रबन्ध को ठीक प्रकार से चलाने के लिए अलग-अलग विभागों के जिला अधिकारी होते हैं।
  4. जिला परिषद् को जिला पंचायत भी कहा जाता है।
  5. पंचायत/ब्लॉक समिति 100 गांवों के लिए बनाई जाती है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✗)
  3. (✓)
  4. (✓)
  5. (✓)

PSEB 6th Class Social Science Guide ग्रामीण विकास और स्थानीय सरकार Important Questions and Answers

कम से कम शब्दों में उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचायती राज का क्या उद्देश्य है?
उत्तर-
ग्रामीण विकास।

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प्रश्न 2.
भारत में अक्तूबर 2019 में एक राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदिया गया है। उस राज्य का क्या नाम था?
उत्तर-
जम्मू कश्मीर।

प्रश्न 3.
ग्राम पंचायत का मुखिया सरपंच कहलाता है। उसका चुनाव कौन कर है?
उत्तर-
मतदाता (वोटर)।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचायती राज के अन्तर्गत महिलाओं के लिए आरक्षित अंश कितना है
उत्तर-
पंचायती राज के अन्तर्गत महिलाओं के लिए कम-से-कम एक तिहाई (1/3 4 स्थान आरक्षित होते हैं।

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प्रश्न 2.
पंचायतों की आय के दो प्रमुख साधन बताओ।
उत्तर-
सरकारी अनुदान और सार्वजनिक सम्पत्ति की बिक्री से प्राप्त आय।

प्रश्न 3.
गांवों में छोटे-छोटे झगड़ों का फैसला किस संस्था द्वारा किया जाता है ।
उत्तर-
गांवों में छोटे-छोटे झगड़ों का फैसला न्याय पंचायत द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 4.
ग्राम पंचायत के प्रधान को क्या कहते हैं?
उत्तर-
सरपंच।

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प्रश्न 5.
पंचायत समिति के अध्यक्ष का चनाव कौन करता है?
उत्तर-
पंचायत समिति के सभी सदस्य मिलकर एक अध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

प्रश्न 6.
सामुदायिक विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी किसे माना जातः ।
उत्तर-
खण्ड विकास अधिकारी (बी० डी० ओ०) सामुदायिक विकास का सब महत्त्वपूर्ण अधिकारी होता है।

प्रश्न 7.
जिला परिषद् के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को उनके कार्यकाल के दौरा किस प्रकार हटाया जा सकता है?
उत्तर-
जिला परिषद् के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।

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प्रश्न 8.
अंग्रेज़ी राज्य में गांवों की अवस्था कैसी थी?
उत्तर-
अंग्रेजी राज्य में भारत के गांवों की दशा दयनीय थी। सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण गांवों की आत्मनिर्भरता भंग हो गई और गांव पिछड़ गए। उनकी आर्थिक स्थिति डावांडोल हो गई। किसान ऋण से घिर गया।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्राम पंचायत के प्रधान का चुनाव कैसे होता है? उसके दो प्रमुख कार्यों “का उल्लेख करो।
उत्तर-
पंचायतों के प्रधान को कुछ राज्यों में गांव की वयस्क जनता चुनती है। परन्तु कुछ स्थानों पर इसका चुनाव ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है। उसे प्रायः सरपंच कहा जाता है। पंचायत का प्रधान मुख्य रूप से दो कार्य करता है –

  1. वह पंचायत की बैठकें बुलाता है।
  2. वह पंचायत की बैठकों का सभापतित्व करता है।

प्रश्न 2.
ग्राम पंचायतों की आय के साधन कौन-कौन से हैं? वे इस धन को किस प्रकार खर्च करती हैं?
उत्तर-
आय के साधन-पंचायतों की आय के अनेक साधन हैं –

  1. मेलों और दुकानों से प्राप्त कर।
  2. पशु-मेलों में पशुओं के क्रय-विक्रय की रजिस्ट्री फीस।
  3. गांव के मकानों पर कर।
  4. सरकार से प्राप्त अनुदान।
  5. सार्वजनिक सम्पत्ति का विक्रय।
    धन का व्यय-ग्राम पंचायतें अपनी आय को गांवों के विकास कार्यों पर खर्च करती हैं।

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प्रश्न 3.
न्याय पंचायत में किस प्रकार के मुकद्दमों की सुनवाई होती है?
उत्तर-
न्याय पंचायत में केवल निम्न स्तर के दीवानी और फौजदारी मुकद्दमों की सुनवाई होती है। न्याय पंचायतों को जुर्माना करने का अधिकार है परन्तु जेल भेजने का अधिकार नहीं है। न्याय पंचायतों में वकील आदि की आवश्यकता नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति न्याय पंचायत के फैसले से सन्तुष्ट न हो तो वह ऊपरी अदालतों में जा सकता है।

प्रश्न 4.
पंचायतें गांव की भलाई के लिए कौन-कौन से कार्य करती हैं?
उत्तर-
पंचायतें मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य करती हैं –
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  1. गांव की गलियां पक्की करवाना तथा उनकी मरम्मत करवाना।
  2. पीने के पानी का प्रबन्ध करना।
  3. गांव में सफ़ाई का प्रबन्ध करना तथा बीमारियों की रोकथाम करना।
  4. गांव में प्रकाश का प्रबन्ध करना।
  5. गांव के छोटे-छोटे झगड़ों का निपटारा करना।

प्रश्न 5.
खण्ड विकास एवं पंचायत अधिकारी (बी० डी० पी० ओ०) की ग्राम विकास में क्या भूमिका है?
उत्तर-
खण्ड विकास एवं पंचायत अधिकारी निम्नलिखित कार्य करता है –

  1. वह पंचायत समिति के निर्णयों को लागू करता है।
  2. वह विकास योजनाओं को कार्य रूप देता है।
  3. वह ग्रामीण विकास कार्यों में मार्ग-दर्शन करता है।

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प्रश्न 6.
जिला परिषद् के कार्यों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
ज़िला-परिषद् की स्थापना ग्राम विकास के लिए की जाती है। इसका मुख्य कार्य पंचायत समितियों की देखभाल करना तथा उनमें तालमेल बनाए रखना है। यह सरकार तथा पंचायत समितियों के बीच कड़ी का काम करती है। यह सरकार को विकास कार्यों के बारे में राय देती है।

प्रश्न 7.
ग्राम सभा से क्या अभिप्राय है? यह कौन-कौन से कार्य करती है?
उत्तर-
ग्राम सभा में गांव के 18 वर्ष या इससे अधिक आयु के सदस्य शामिल होते हैं। इन सभी सदस्यों के नाम पंचायत क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज होते हैं। गांव की सभी स्त्रियां तथा पुरुष जिनकी आयु 18 वर्ष अथवा इस से अधिक हो, ग्राम सभा के सदस्य होते हैं।
ग्राम सभा के कार्य –

  1. गाँव का बजट तैयार करना।
  2. पंचायत की वार्षिक रिपोर्ट की समीक्षा करना।
  3. आगामी वर्ष के लिए विकास योजनाएं बनाना।

प्रश्न 8.
पंचायत को विशेष अनुदान क्यों मिलता है?
उत्तर-
पंचायतों को ग्रामीण विकास के लिए अनेक कार्य करने पड़ते हैं। परन्तु उनकी आय के स्रोत कम हैं। इसलिए पंचायत को राज्य सरकार की ओर से विशेष अनुदान दिया जाता है।

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प्रश्न 9.
पंचायती राज प्रणाली में राज्य सरकार क्या भूमिका निभाती है?
उत्तर-
राज्य सरकारें पंचायतों तथा पंचायती राज को शक्तिशाली बनाने के लिए हर प्रकार की सहायता करती हैं। हमारे गांवों में अधिकतर लोग निर्धन तथा अशिक्षित हैं। अतः राज्य सरकार को पंचायती राज पर अधिक कठोरता से नियन्त्रण रखना पड़ता है। वह इसके कार्यों पर कड़ी निगरानी रखती है।

प्रश्न 10.
जिला परिषद् की रचना पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
ज़िला परिषद् की रचना इस प्रकार होती है –

1. सदस्यता-(1) ज़िला परिषद् के क्षेत्र में आने वाली सभी पंचायत समिति के अध्यक्ष जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। (2) सम्बन्धित जिले में पड़ने वाली विधान सभा, विधान परिषद् तथा संसद् के सदस्य भी जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। (3) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों तथा इनसे सम्बन्धित महिलाओं के लिए जिला परिषद में कुछ स्थान आरक्षित होते हैं।

2. अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष-ज़िला परिषद् के सदस्य निर्वाचित सदस्यों में से एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। जिला परिषद् उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उन्हें पदच्युत भी कर सकती है।

3. जिला परिषद की कार्यावधि-ज़िला परिषद् की कार्यावधि 5 वर्ष की होती है। परन्तु यदि जिला परिषद् शक्तियों का दुरुपयोग करे अथवा राज्य सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का उल्लंघन करे तो राज्य सरकार उसे समय से पूर्व भी भंग कर सकती है।

प्रश्न 11.
जिला परिषद् की आय के स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
जिला परिषद् की आय के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं –

  1. कर तथा अनुदान-पंचायत समितियों की भान्ति जिला परिषद् की आय भी करों तथा राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त अनुदान पर निर्भर करती है।
  2. प्रशासन न्यास तथा दान-जिला परिषदों को प्रशासन न्यासों अथवा दान से आय होती है।
  3. किराए-ज़िला परिषदों को घरों अथवा दुकानों से किराए के रूप में कुछ आय प्राप्त हो जाती है।
  4. उद्योग चलाने के लिए अनुदान-ज़िला परिषदों को घरेलू, ग्रामीण तथा छोटे पैमाने के उद्योग चलाने के लिए सर्व भारतीय संस्थाओं से अनुदान मिल जाते हैं।

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ग्रामीण विकास और स्थानीय सरकार PSEB 6th Class Social Science Notes

  • गांवों का देश – भारत में लगभग 6 लाख गांव हैं। यहां की 75% जनसंख्या गांवों में रहती है।
  • पंचायती राज – गाँवों के विकास के लिए त्रि-स्तरीय व्यवस्था।
  • ग्राम पंचायत – पंचायती राज का सबसे निचला स्तर जो अपने गाँव के विकास के लिए कार्य करती है।
  • ग्राम सभा – गाँव के वयस्क नागरिकों का समूह जो पंचायत के सदस्यों का चुनाव करते हैं।
  • न्याय पंचायत – गाँव में न्याय का कार्य करने वाली संस्था।
  • पंचायत समिति – यह संस्था ब्लॉक स्तर पर ग्रामीण विकास का कार्य करती है।
  • जिला परिषद् – यह संस्था जिला स्तर पर ग्रामीण विकास का कार्य करती है।