PSEB 12th Class History Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

सामाजिक स्थिति (Social Condition)

प्रश्न 1.
मुगलों के अधीन पंजाब के लोगों की सामाजिक अवस्था का अध्ययन कीजिए।
(Study the social condition of the people of the Punjab under the Mughals.)
अथवा
मुग़लों के अधीन पंजाब के लोगों की सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ?
(What were the main features of social life of the people of Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लों के समय पंजाब.के लोगों की सामाजिक दशा का वर्णन करो ? (Give a brief account of the social condition of the Punjab Under the Mughals.)
उत्तर-
मुगलों ने पंजाब में 1526 ई० से 1752 ई० तक शासन किया। मुग़लकालीन पंजाब की सामाजिक दशा कोई विशेष अच्छी न थी। मुग़लकालीन पंजाब का समाज मुख्य रूप से दो वर्गों-मुसलमान तथा हिंदुओं में बँटा हुआ था। सिखों को उस समय हिंदू समाज का ही अंग माना जाता था। मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के सामाजिक जीवन का विवरण निम्नलिखित है—
1. मुसलमानों की तीन श्रेणियाँ (Three Classes of the Muslims)-पंजाब का मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था

i) उच्च श्रेणी (The Upper Class)-मुसलमानों की उच्च श्रेणी में बड़े-बड़े मनसबदार, सूबेदार, जागीरदार और रईस लोग सम्मिलित थे। इस श्रेणी के लोग बड़े भव्य महलों में रहते थे। वे बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे। उनकी सेवा के लिए बहुसंख्या में नौकर होते थे।

ii) मध्यम श्रेणी (The Middle Class)—इस श्रेणी में व्यापारी, किसान, सैनिक और छोटे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल थे। उच्च श्रेणी की अपेक्षा इनका जीवन स्तर कुछ निम्न तो था, परंतु खुशहाल था।

iii) निम्न श्रेणी (The Lower Class)—इस श्रेणी की संख्या सबसे अधिक थी। इस श्रेणी में लोहार, जुलाहे, दस्तकार, बढ़ई, छोटे-छोटे दुकानदार, घरेलू नौकर, मज़दूर और दास आदि आते थे। उनकी दशा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं थी। निर्धन होने के कारण वे गंदी झोपड़ियों में रहते थे। वे फटे-पुराने वस्त्र पहनते थे। गुलामों की संख्या बहुत अधिक थी। बी० एन० लुनिया के अनुसार,
“दासी अपने स्वामी के हाथों में एक खिलौने की तरह थी।”1

2. हिंदुओं की जाति प्रथा (Caste system of the Hindus)—पंजाब की अधिकतर जनसंख्या हिंदू थी। हिंदू समाज कई जातियों तथा उपजातियों में बँटा हुआ था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। निम्न जाति के लोगों को उच्च जाति के लोगों के साथ मेलजोल करने, वेद पढ़ने, मंदिरों में जाने तथा कुओं और तालाबों में जल भरने की आज्ञा नहीं थी। जाति नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को बिरादरी से निकाल दिया जाता था।

3. स्त्रियों की स्थिति (Condition of Women). मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय स्त्री समाज में प्रचलित बुराइयों जैसे लड़कियों की हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, बहु-विवाह तथा पर्दा प्रथा आदि ने समाज में उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय बना दी थी।

4. खान-पान (Diet)-उच्च श्रेणी के लोग माँस, पूरी और हलवा खाने के अत्यंत शौकीन थे। वे मक्खन, मलाई, ताज़े फलों और शुष्क मेवों का भी बहुत प्रयोग करते थे। हिंदू अधिकतर शाकाहारी होते थे। उस समय लस्सी पीने का बहुत रिवाज था। गर्मियों में ठंडे शरबतों का बहुत प्रयोग किया जाता था।

5. वेशभूषा तथा गहने (Dress and Ornaments)-मुग़लकालीन पंजाब के लोग सूती और रेशमी वस्त्र पहनते थे। उच्च वर्ग में पुरुषों की वेशभूषा खुला कुर्ता, तंग पाजामा या सलवार तथा पगड़ी होती थी। स्त्रियों में कमीज़ और सलवार का रिवाज आम था। हिंदू स्त्रियाँ साड़ियाँ पहनती थीं तथा अपने सिर को चादर या दुपट्टे से ढाँपती थीं। उस समय स्त्रियाँ और पुरुष दोनों गहने पहनने के बहुत शौकीन थे। स्त्रियाँ तो शरीर के प्रत्येक अंग में गहने पहनती थीं जैसे कानों में काँटे, नाक में नथनी, बाँहों में चूड़ियाँ और गले में हार इत्यादि।

6. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-मुग़लकालीन पंजाब में लोग कई ढंगों से अपना मनोरंजन करते थे। लोग अपना मनोरंजन शिकार करके, रथों की दौड़ में भाग लेकर, कबूतरबाज़ी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, शतरंज और चौपड़ खेलकर, संगीत, कुश्तियाँ और ताश खेलकर करते थे। इसके अतिरिक्त लोग त्योहारों और मेलों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे।

7. शिक्षा (Education)—उस समय लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्राथमिक शिक्षा मंदिरों में तथा मुसलमान मस्जिदों में प्राप्त करते थे। मुसलमानों के मुकाबले हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, जालंधर, सुल्तानपुर, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

1. “A female slave was toy of her master.” B.N. Luniya, Life and Culture in Medieval India (Indore : 1978) p. 190.

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आर्थिक स्थिति (Economic Condition)

प्रश्न 2.
मुगलों के अधीन पंजाब की आर्थिक दशा का वर्णन कीजिए। (P.S.E.B. Mar. 2008) (Describe the economic condition of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोग आर्थिक रूप से समृद्ध थे। वस्तुओं की कीमतें सस्ती थीं अतैव ग़रीब लोगों का गुज़ारा भी अच्छा हो जाता था। कृषि, उद्योग तथा व्यापार उन्नत अवस्था में था। लाहौर तथा मुलतान व्यापारिक पक्ष से सबसे प्रसिद्ध नगर थे। उस काल के पंजाब के लोगों की आर्थिक दशा का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
1. खेती बाड़ी (Agriculture)—पंजाब के लगभग 80 प्रतिशत लोग खेती बाड़ी का व्यवसाय करते थे। इसका मुख्य कारण यह था कि यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी और सिंचाई साधनों की कोई कमी नहीं थी। पंजाब में जब्ती प्रणाली लागू थी। अत: भूमि को उसकी उपजाऊ शक्ति के आधार पर चार वर्गों—पोलज, परोती, छछर और बंजर भूमि में बाँटा हुआ था। सरकार अपना लगान भूमि की उपजाऊ शक्ति को ध्यान में रखकर निर्धारित करती थी। यह कुल फसल का 1/3 हिस्सा हुआ करता था। सरकार किसानों की सुविधानुसार अपना लगान अनाज अथवा नकदी के रूप में एकत्रित करती थी। अकाल पड़ने या कम फसल होने की स्थिति में लगान कम या माफ कर दिया जाता था। सरकारी कर्मचारियों को यह कड़े आदेश थे कि वे किसी प्रकार से किसानों से अधिक वसूली न करें। इन सभी प्रयत्नों के परिणामस्वरूप पंजाब में फसलों की भरपूर पैदावार होती थी। पंजाब की प्रमुख फसलें गेहूँ, चावल, गन्ना, कपास, मक्की , चने और जौ थीं।

2. उद्योग (Industries)-पंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य धंधा उद्योगों से संबंधित था। उस समय के प्रमुख उद्योगों का वर्णन निम्नलिखित है—

i) सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Industry)-मुग़लकाल में सूती वस्त्र उद्योग पंजाब का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग था। लाहौर, मुलतान, गुजरात, बजवाड़ा और अमृतसर इस उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे। लाहौर में कई प्रकार का सूती कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान बढ़िया दरियाँ, चादरें और गलीचे बनाने के लिए प्रसिद्ध था। समाना में बहुत ही उत्तम प्रकार का कपड़ा तैयार किया जाता था।

ii) रेशमी वस्त्र उद्योग (Silk Industry)-मुगलकाल में रेशम उद्योग पंजाब का दूसरा प्रमुख उद्योग था। इस उद्योग के प्रमुख केंद्र मुलतान, कश्मीर तथा अमृतसर थे। मुलतान के रेशमी वस्त्रों की बहुत माँग थी। लाहौर में गुलबदन और दरियाई नाम के रेशमी वस्त्र तैयार किए जाते थे।

iii) ऊनी वस्त्र उद्योग (Woollen Industry)-पंजाब में ऊनी वस्त्र उद्योग के दो प्रसिद्ध केंद्र कश्मीर और अमृतसर थे। कश्मीर शालों के उद्योग के लिए संसार-भर में प्रसिद्ध था। अमृतसर में कंबल और लोइयाँ बहुत उच्चकोटि की तैयार की जाती थीं।

iv) चमड़ा उद्योग (Leather Industry)-मुगलकाल के पंजाब के चमड़ा उद्योग की गणना प्रसिद्ध उद्योगों में की जाती थी। चमड़े से बहुत-सी वस्तुएँ जैसे घोड़ों की काठियाँ, चप्पलें, दस्ताने और पानी लाने और ले जाने वाली मशके आदि तैयार की जाती थीं। इस उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र होशियारपुर, पेशावर और मुलतान थे।

3. पशु-पालन (Animal Rearing)—पंजाब में पशु-पालन भी एक प्रमुख व्यवसाय था। बैल, भैंसे और ऊँट खेती बाड़ी के लिए प्रयोग किए जाते थे। घोड़े और ऊँट सवारी के काम आते थे। गाय, भैंसें, भेड़ें, बकरियाँ दूध प्राप्त करने के लिए पाली जाती थीं। भेड़ों से ऊन भी प्राप्त की जाती थी। इन पशुओं के व्यापार के लिए अनेक स्थानों पर मंडियाँ लगाई जाती थीं।

4. खनिज पदार्थ (Minerals)-मुग़लकालीन पंजाब में खनिज पदार्थों की मात्रा काफ़ी कम थी। मंडी के पहाड़ी प्रदेशों में ताँबा मिलता था। जम्मू में जिस्त की खानें थीं। खिऊड़ा, नूरपुर और कालाबाग में नमक की खानें थीं। पंजाब की नदियों की रेत छान कर कुछ सोना भी प्राप्त किया जाता था।

5. व्यापार (Trade)—मुग़लकालीन पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार बहुत उन्नत था। व्यापार का काम खत्री, बनिए, महाजनों, बोहरों और खोजों के हाथ में था। पंजाब का विदेशी व्यापार—अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत, भूटान, सीरिया, चीन और यूरोपीय देशों से चलता था। पंजाब इन देशों को सूती और रेशमी वस्त्र, शालें, कंबल, अनाज, नील और नमक आदि का निर्यात करता था। दूसरी ओर इन देशों से बढ़िया नस्ल के घोड़े, सूखे मेवे, ऐश्वर्य की वस्तुएँ, कालीन, रेशम, बहुमूल्य पत्थरों आदि का आयात किया जाता था। यह व्यापार स्थल और जल दोनों मार्गों से होता था।

6. प्रसिद्ध व्यापारिक नगर (Famous Commercial Towns)—पंजाब के सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक नगर लाहौर और मुलतान थे। इनके अतिरिक्त अमृतसर, जालंधर, बजवाड़ा, बटाला, पानीपत, सुल्तानपुर, करतारपुर आदि नगर भी बहुत प्रसिद्ध थे।

7. कीमतें (Prices)—मुग़लों के समय पंजाब में वस्तुएँ काफ़ी सस्ती थीं। अकबर के समय एक मन गेहूँ का मूल्य 12 दाम, एक मन चावल का मूल्य 20 दाम, एक मन चने का मूल्य 16 दाम, एक मन दूध का मूल्य 25 दाम और एक मन चीनी का मूल्य 6 दाम था। अकबर के बाद भी वस्तुओं का मूल्य लगभग यही रहा। अतः कम कीमतों के कारण ग़रीब लोग भी अपना निर्वाह अच्छी तरह से कर लेते थे।

प्रश्न 3.
मुग़लों के अधीन पंजाब के लोगों की आर्थिक व सामाजिक जीवन की क्या विशेषताएँ थीं ?
(What were the main features of the social and economic life of the people of the – Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Give a brief account of the social and economic conditions of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुगलों ने पंजाब में 1526 ई० से 1752 ई० तक शासन किया। मुग़लकालीन पंजाब की सामाजिक दशा कोई विशेष अच्छी न थी। मुग़लकालीन पंजाब का समाज मुख्य रूप से दो वर्गों-मुसलमान तथा हिंदुओं में बँटा हुआ था। सिखों को उस समय हिंदू समाज का ही अंग माना जाता था। मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के सामाजिक जीवन का विवरण निम्नलिखित है—
1. मुसलमानों की तीन श्रेणियाँ (Three Classes of the Muslims)-पंजाब का मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था

i) उच्च श्रेणी (The Upper Class)-मुसलमानों की उच्च श्रेणी में बड़े-बड़े मनसबदार, सूबेदार, जागीरदार और रईस लोग सम्मिलित थे। इस श्रेणी के लोग बड़े भव्य महलों में रहते थे। वे बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे। उनकी सेवा के लिए बहुसंख्या में नौकर होते थे।

ii) मध्यम श्रेणी (The Middle Class)—इस श्रेणी में व्यापारी, किसान, सैनिक और छोटे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल थे। उच्च श्रेणी की अपेक्षा इनका जीवन स्तर कुछ निम्न तो था, परंतु खुशहाल था।

iii) निम्न श्रेणी (The Lower Class)—इस श्रेणी की संख्या सबसे अधिक थी। इस श्रेणी में लोहार, जुलाहे, दस्तकार, बढ़ई, छोटे-छोटे दुकानदार, घरेलू नौकर, मज़दूर और दास आदि आते थे। उनकी दशा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं थी। निर्धन होने के कारण वे गंदी झोपड़ियों में रहते थे। वे फटे-पुराने वस्त्र पहनते थे। गुलामों की संख्या बहुत अधिक थी। बी० एन० लुनिया के अनुसार,
“दासी अपने स्वामी के हाथों में एक खिलौने की तरह थी।”1

2. हिंदुओं की जाति प्रथा (Caste system of the Hindus)—पंजाब की अधिकतर जनसंख्या हिंदू थी। हिंदू समाज कई जातियों तथा उपजातियों में बँटा हुआ था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। निम्न जाति के लोगों को उच्च जाति के लोगों के साथ मेलजोल करने, वेद पढ़ने, मंदिरों में जाने तथा कुओं और तालाबों में जल भरने की आज्ञा नहीं थी। जाति नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को बिरादरी से निकाल दिया जाता था।

3. स्त्रियों की स्थिति (Condition of Women). मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय स्त्री समाज में प्रचलित बुराइयों जैसे लड़कियों की हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, बहु-विवाह तथा पर्दा प्रथा आदि ने समाज में उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय बना दी थी।

4. खान-पान (Diet)-उच्च श्रेणी के लोग माँस, पूरी और हलवा खाने के अत्यंत शौकीन थे। वे मक्खन, मलाई, ताज़े फलों और शुष्क मेवों का भी बहुत प्रयोग करते थे। हिंदू अधिकतर शाकाहारी होते थे। उस समय लस्सी पीने का बहुत रिवाज था। गर्मियों में ठंडे शरबतों का बहुत प्रयोग किया जाता था।

5. वेशभूषा तथा गहने (Dress and Ornaments)-मुग़लकालीन पंजाब के लोग सूती और रेशमी वस्त्र पहनते थे। उच्च वर्ग में पुरुषों की वेशभूषा खुला कुर्ता, तंग पाजामा या सलवार तथा पगड़ी होती थी। स्त्रियों में कमीज़ और सलवार का रिवाज आम था। हिंदू स्त्रियाँ साड़ियाँ पहनती थीं तथा अपने सिर को चादर या दुपट्टे से ढाँपती थीं। उस समय स्त्रियाँ और पुरुष दोनों गहने पहनने के बहुत शौकीन थे। स्त्रियाँ तो शरीर के प्रत्येक अंग में गहने पहनती थीं जैसे कानों में काँटे, नाक में नथनी, बाँहों में चूड़ियाँ और गले में हार इत्यादि।

6. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-मुग़लकालीन पंजाब में लोग कई ढंगों से अपना मनोरंजन करते थे। लोग अपना मनोरंजन शिकार करके, रथों की दौड़ में भाग लेकर, कबूतरबाज़ी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, शतरंज और चौपड़ खेलकर, संगीत, कुश्तियाँ और ताश खेलकर करते थे। इसके अतिरिक्त लोग त्योहारों और मेलों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे।

7. शिक्षा (Education)—उस समय लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्राथमिक शिक्षा मंदिरों में तथा मुसलमान मस्जिदों में प्राप्त करते थे। मुसलमानों के मुकाबले हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, जालंधर, सुल्तानपुर, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

1. “A female slave was toy of her master.” B.N. Luniya, Life and Culture in Medieval India (Indore : 1978) p. 190.

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धार्मिक स्थिति (Religious Condition)

प्रश्न 4.
मुग़ल काल में पंजाब के लोगों की धार्मिक अवस्था पर आलोचनात्मक नोट लिखें।
(Write a critical note on the religious condition of the people of Punjab during the Mughal period.)
अथवा
मुग़ल काल में लोगों की धार्मिक अवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करें।
(What do you know about the religious condition of the people of Punjab under the Mughals ? Explain.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में हिंदू मत तथा इस्लाम के साथ-साथ सिख मत भी प्रचलित हो चुका था। उस समय पंजाब में बौद्ध मत लगभग लुप्त हो चुका था तथा जैन मत केवल नगरों के व्यापारी वर्ग तक ही सीमित था। इस काल में पंजाब में ईसाई मत का प्रचार भी आरंभ हो चुका था। इस काल के लोग अंध-विश्वासों तथा धर्म के बाह्याडंबरों पर अधिक बल देते थे। अधिकतर लोग धर्म की वास्तविकता को भूल चुके थे। पंजाब में सिख गुरुओं ने लोगों को धर्म का वास्तविक मार्ग दिखाने का महान् कार्य किया।—

1. हिंदू धर्म (Hinduism)-हिंदू धर्म की गणना भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में की जाती है। इस धर्म के अनुयायी राम, विष्णु, कृष्ण, शिव, हनुमान, दुर्गा, काली तथा लक्ष्मी आदि देवी-देवताओं की पूजा करते थे। इन देवी-देवताओं की स्मृति में अति संदर मंदिरों का निर्माण किया जाता था। इनमें आकर्षक मर्तियाँ रखी जाती थीं। हिंदू धर्म के सभी रीति-रिवाजों में ब्राह्मणों का शामिल होना अनिवार्य समझा जाता था। हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथों में वेदों, रामायण तथा गीता को मुख्य स्थान प्राप्त था। हिंदू ब्राह्मण तथा गाय का विशेष सत्कार करते थे। मुग़ल सम्राट अकबर ने अपनी धार्मिक सहनशीलता की नीति के कारण धार्मिक क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया था। उसने हिंदुओं को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की तथा उन पर लगे तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर को हटा दिया था। औरंगज़ेब एक कट्टर सुन्नी सम्राट् था। उसने हिंदुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया। उनके मंदिरों तथा मूर्तियों को तोड़ दिया गया। उन पर बहुत-से प्रतिबंध लगा दिए गए। परिणामस्वरूप, हिंदू मुग़ल राज्य के कट्टर शत्रु बन गए।

2. इस्लाम (Islam) भारत में इस्लाम का सबसे अधिक प्रसार पंजाब में हुआ था। इसका मुख्य कारण यह था कि मुस्लिम आक्रमणकारी भारत में सबसे पहले पंजाब में स्थायी रूप में बसे थे। इस धर्म के अनुयायी एक अल्लाह में विश्वास रखते थे। वे हज़रत मुहम्मद साहिब को अल्लाह का पैगंबर समझते थे। वे दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे। वे रमजान के महीने में रोज़े रखते थे। वे हज यात्रा करना अनिवार्य समझते थे। वे जकात (दान) देते थे। वे मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे। दिल्ली के सुल्तान तथा मुग़ल बादशाह मुसलमान थे इसलिए उनके शासनकाल में इस्लाम का तीव्र गति से प्रसार होने लगा। मुसलमानों को सरकार की ओर से विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं इसलिए पंजाब की निम्न जातियों के बहुत-से लोग इस्लाम में शामिल हो गए। मुगल बादशाह औरंगजेब ने तलवार की नोक पर बहुत-से लोगों को बलपूर्वक इस्लाम में शामिल किया।

3. सूफ़ी मत (Sufism)—सूफी मत इस्लाम का ही एक संप्रदाय था। इस धर्म के लोग धार्मिक सहनशीलता की नीति में विश्वास रखते थे। उनका मुख्य संदेश परस्पर भ्रातृत्व तथा लोगों की सेवा करना था। वे संगीत में बुराइयों के विरुद्ध आवाज़ उठाई। मुग़लकाल में पंजाब में चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी तथा नक्शबंदी नामक सूफ़ी सिलसिले प्रसिद्ध थे। सूफ़ी सभी जातियों के लोगों के साथ स्नेह करते थे इसलिए बहुत-से लोग सूफ़ी मत में शामिल हुए। सूफ़ी सिलसिलों में केवल नक्शबंदी सिलसिला कट्टर विचारों का था। नक्शबंदियों ने गुरु अर्जन देव जी तथा गुरु तेग़ बहादुर जी को शहीद करवाने के लिए मुग़ल बादशाहों को भड़काया था।

4. सिख धर्म (Sikhism)—मुग़लकाल में पंजाब में सिख धर्म का जन्म हुआ। इस धर्म की स्थापना गुरु नानक देव जी ने 15वीं शताब्दी में की थी। गुरु नानक साहिब जी ने उस समय समाज में प्रचलित सामाजिक तथा धार्मिक बुराइयों का खंडन किया। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा तथा आपसी भ्रातृत्व का संदेश दिया। उन्होंने संगत तथा पंगत संस्थाओं की नींव रखी। उनके धर्म के द्वार प्रत्येक जाति तथा वर्ग के लोगों के लिए खुले थे। उन्होंने अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का नया मार्ग दिखाया। गुरु जी के संदेश को उनके नौ उत्तराधिकारियों ने जारी रखा। मुग़ल सम्राट अकबर की धार्मिक सहनशीलता की नीति के कारण पंजाब में सिख धर्म को प्रफुल्लित होने का स्वर्ण अवसर मिला। सम्राट् जहाँगीर के सिंहासन पर बैठते ही मुग़ल-सिख संबंधों में तनाव आ गया। 1606 ई० में गुरु अर्जन साहिब जी की शहीदी तथा 1675 ई० में गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी के कारण सिख भड़क उठे। मुग़ल अत्याचारों को कड़ा उत्तर देने के लिए 1699 ई० में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ का सृजन किया। खालसा की सृजना पंजाब के इतिहास में एक नया पड़ाव प्रमाणित हुई।

5. अन्य धर्म (Other Religions)-ऊपरलिखित धर्मों के अतिरिक्त मुगलकालीन पंजाब में बौद्ध मत तथा जैन मत भी प्रचलित थे। इन धर्मों के अनुयायियों की संख्या बहुत कम थी। मुग़ल सम्राट अकबर के शासनकाल में पंजाब में ईसाई मत का प्रचार भी होने लग पड़ा था। अकबर ने ईसाइयों को लाहौर में अपना गिरजाघर बनाने की आज्ञा दी थी। इस धर्म को पंजाब में कोई खास प्रोत्साहन न मिला।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मुगलकालीन पंजाब में मुस्लिम समाज की स्थिति कैसी थी ?
(What was the condition of Muslims under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति कैसी थी ?
(What was the condition of Muslim society under the Mughal period in Punjab ?)
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज पर एक नोट लिखें।
(Write a note on the Muslim society of the Punjab during the Mughal times.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण उनको समाज में कुछ विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं। मुसलमान तीन श्रेणियों में विभाजित थे। उच्च श्रेणी के लोग वे शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। सुरा एवं सुंदरी उनके मनोरंजन के मुख्य साधन थे। मध्य वर्ग के लोगों का जीवन स्तर उच्च श्रेणी के मुकाबले में कुछ कम था परंतु खुशहाल था। निम्न श्रेणी के लोगों की स्थिति बड़ी शोचनीय थी। उनका जीवन-निर्वाह करना अत्यंत कठिन होता था।

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प्रश्न 2.
मुगलकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति कैसी थी ? (What was the condition of Hindus in the society of Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लों के अधीन पंजाब के हिंदुओं की स्थिति का संक्षेप में अध्ययन करें। (Study in brief the condition of Hindu society in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति बहुत खराब थी। यद्यपि हिंदू बहु-संख्या में थे फिर भी उन्हें उच्च पदों से वंचित रखा जाता था। उनको काफिर कहकर संबोधित किया जाता था। उनको इस्लाम स्वीकार करने के लिए विवश किया जाता था। हिंदू समाज कई जातियों. तथा उपजातियों में बँटा हुआ था। जाति संबंधी नियम बहुत अधिक कठोर थे। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों पर घोर अत्याचार करते थे। इसके अतिरिक्त उन पर अनेक पाबंदियाँ लगाई गई थीं।

प्रश्न 3.
मुग़लों के अधीन पंजाब में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी ?
(What was the position of women in Punjab under the Mughals ?) .
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब में स्त्रियों में प्रचलित किन्हीं तीन बुराइयों का संक्षिप्त विवरण दें। (Describe any three evils prevalent among women in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय लड़कियों का विवाह अल्पायु में ही कर दिया जाता था। लड़कियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। समाज में सती प्रथा भी प्रचलित थी। विधवा का जीवन बहुत दयनीय था। मुस्लिम और हिंदू स्त्रियों में पर्दे की प्रथा प्रचलित थी।

प्रश्न 4.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों के मनोरंजन के क्या साधन थे ?
(What were the main sources of entertainment of the people of Pnjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के मनोरंजन के कई साधन थे। उच्च श्रेणी के लोग अपना मनोरंजन शिकार, चौगान खेलकर, कबूतरबाजी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, शतरंज और चौपड़ खेलकर और महफ़िलों में भाग लेकर करते थे! आम लोग अपना मनोरंजन संगीत, नाच, कुश्तियाँ करके, दौड़ों में भाग लेकर, मदारियों के खेल द्वारा करते थे। लोग त्योहारों तथा मेलों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। हिंदुओं के प्रमुख त्योहार दीवाली, दशहरा, लोहड़ी, होली, शिवरात्रि और राम नवमी आदि थे। मुसलमानों के मुख्य त्योहार ईद, शबे-बारात और नौरोज थे।

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प्रश्न 5.
मुग़लों के अधीन पंजाब में शिक्षा के प्रबंध पर एक नोट लिखें।
(Write a note about prevalent education in Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़ल काल में लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदु अपनी प्रारंभिक शिक्षा मंदिरों में और मुसलमान अपनी शिक्षा मस्जिदों में प्राप्त करते थे। ये संस्थान लोगों द्वारा दिए गए दान पर चलते थे। मुसलमानों की अपेक्षा हिंदु शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात् गुरु को कुछ दक्षिणा दिया करते थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, स्यालकोट, जालंधर, सुल्तानपुर, बटाला, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

प्रश्न 6.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों की सामाजिक स्थिति की मुख्य विशेषताएँ बताएँ। (
(Mention the main salient features of social condition of people of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। उनको समाज में कुछ विशेष अधिकार प्राप्त थे। मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों-उच्च, मध्य एवं निम्न श्रेणी में बँटा हुआ था। उच्च श्रेणी के लोग बड़े ऐश्वर्य और शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। निम्न श्रेणी के लोगों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी। हिंदुओं की जो कि पंजाब की बहसंख्यक श्रेणी से संबंधित थे, स्थिति अच्छी नहीं थी। उनको बहुत-से अधिकारों से वंचित रखा जाता था। मुसलमान उनसे बहुत घृणा करते थे। हिंदू समाज कई जातियों और उपजातियों में बँटा हुआ था। समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।

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प्रश्न 7.
मुगलकालीन पंजाब में खेती की क्या दशा थी ?
(What was the condition of agriculture in Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों का मुख्य व्यवसाय क्या था ? (What was the main occupation of Punjabis under the Mughals ?)
उत्तर-
पंजाब की भूमि अत्यधिक उपजाऊ थी। मुग़लकालीन पंजाब में लोगों का मुख्य व्यवसाय खेतीबाड़ी था। पंजाब के 80% लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए थे। इसलिए मुग़ल सरकार ने खेतीबाड़ी को उत्साहित करने के लिए विशेष ध्यान दिया। नई भूमि को खेती के अधीन लाने वाले किसानों को विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं। लगान, भूमि की उपजाऊ शक्ति और सिंचाई की सुविधाओं के अनुसार निश्चित किया गया था। उस समय पंजाब की प्रमुख फसलें गेहूँ, चने, चावल, मक्की , गन्ना, कपास और जौ थीं।

प्रश्न 8.
मुगलकालीन पंजाब में प्रचलित कपड़ा उद्योग संबंधी जानकारी दें। (Write a brief note on textile industry of Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में प्रचलित उद्योगों में कपड़ा उद्योग सबसे अधिक महत्तवपूर्ण था। अमृतसर, लाहौर, मुलतान और गुजरात में बढ़िया प्रकार का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान बढ़िया दरियों, मेजपोशों तथा चादरों के लिए प्रसिद्ध था। पेशावर में सुंदर लुंगियाँ तैयार की जाती थीं। मुलतान, लाहौर और अमृतसर में पायजामे और सलवारें तैयार की जाती थीं। गुजरात में शिफोन का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान, कश्मीर और अमृतसर रेशमी कपड़ा उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे।

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प्रश्न 9.
मुग़लकालीन पंजाब के व्यापार के संबंध में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about trade in Punjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार बहुत उन्नत था। पंजाब का विदेशी व्यापार अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत, भूटान, सीरिया, चीन और यूरोपीय देशों के साथ चलता था। पंजाब इन देशों को सूती और रेशमी कपड़े, शालें, कंबल, अनाज, चीनी, नील और नमक आदि का निर्यात करता था। इनके बदले पंजाब इन देशों से बढ़िया नस्ल के घोड़े, खुश्क मेवे, ऐश्वर्य की चीजें, रेशम, बहुमूल्य पत्थरों इत्यादि का आयात करता था।

प्रश्न 10.
मुग़लों के अधीन पंजाब की आर्थिक दशा का संक्षेप में वर्णन करो।
(Write a short note on the economic condition of Punjab during the Mughal rule.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों की आर्थिक अवस्था पर एक नोट लिखें। .
(Write a note on economic condition of Punjabis during the Mughal rule.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों की आर्थिक स्थिति उच्च दर्जे की थी। उस समय कृषि 80% लोगों का मुख्य व्यवसाय था। भूमि के उपजाऊ तथा सरकार द्वारा पूर्ण सहायता प्रदान किए जाने के कारण कृषि काफ़ी उन्नत थी। मुग़लकालीन पंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय उद्योग था। कपड़ा उद्योग उस समय पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग था। पंजाब के कुछ लोग पशु-पालन का कार्य करते थे। कुछ लोग खानों में कार्य करते थे। उस समय पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार भी उन्नत था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
मुग़लकाल में पंजाबी समाज किन दो वर्गों में बँटा हुआ था ?
उत्तर-
मुसलमान तथा हिंदू।

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प्रश्न 2.
पंजाब में मुस्लिम समाज को कितने वर्गों में बँटा हुआ था ?
अथवा
मुग़ल काल में मुसलमानों की तीन श्रेणियों के नाम बताओ।
अथवा
मुगलकालीन समाज में मुसलमानों की तीन श्रेणियाँ कौन-सी थीं ?
उत्तर-
उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग।

प्रश्न 3.
मुगलकालीन पंजाब में मुसलमानों के समाज की कितनी श्रेणियाँ थीं ?
उत्तर-
तीन।

प्रश्न 4.
मुग़लकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की उच्च श्रेणी के लोग कैसा जीवन व्यतीत करते थे ?
उत्तर-
बहुत ऐश्वर्यपूर्ण।

प्रश्न 5.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की निम्न श्रेणी में सम्मिलित कोई एक वर्ग बताएँ।
उत्तर-
दास।

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प्रश्न 6.
मुग़लकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज के निम्न वर्ग के लोगों की दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत दयनीय।

प्रश्न 7.
मुगलकालीन पंजाब के हिंदू समाज में कितनी जातियाँ प्रचलित थीं ?
उत्तर-
चार।

प्रश्न 8.
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत दयनीय।

प्रश्न 9.
मुगलकालीन पंजाब के स्त्री समाज की कोई एक बुराई कौन-सी थी ?
उत्तर-
सती प्रथा।

प्रश्न 10.
क्या मुग़लकालीन पंजाब में दास प्रथा प्रचलित थी ?
उत्तर-
हां।

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प्रश्न 11.
मुग़लकालीन में पंजाब में उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध कोई एक केंद्र बताएँ।
उत्तर-
लाहौर।

प्रश्न 12.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों की आर्थिक दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत अच्छी

प्रश्न 13.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
उत्तर-
कृषि।

प्रश्न 14.
मुग़लकालीन पंजाब का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग कौन-सा था ?
उत्तर-
सूती कपड़ा उद्योग।

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प्रश्न 15.
मुगलकालीन पंजाब में रेशम उद्योग के किसी एक विख्यात केंद्र का नाम लिखें।
उत्तर-
कश्मीर।

प्रश्न 16.
मुगलकालीन पंजाब में व्यापार की दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत उन्नत।

प्रश्न 17.
मुगलकालीन पंजाब के दो सर्वाधिक विख्यात व्यापारिक नगर कौन-से थे ?
उत्तर-
लाहौर तथा मुलतान।

प्रश्न 18.
मुगलकालीन पंजाब के किसी एक प्रसिद्ध नगर का नाम लिखिए।
उत्तर-
लाहौर।

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प्रश्न 19.
मुगलकालीन पंजाब में कौन-सा सिक्का सर्वाधिक प्रचलित था ?
उत्तर-
दाम।

प्रश्न 20.
मुग़लकाल में प्रचलति सिक्का दाम किस धातु का बना हुआ था ?
उत्तर-
ताँबे का।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
मुग़लों के अधीन पंजाब का मुस्लिम समाज…….श्रेणियों में बँटा हुआ था।
उत्तर-
(तीन)

प्रश्न 2.
मुसलमानों की निम्न श्रेणी में सबसे अधिक संख्या…….की थी।
उत्तर-
(गुलामों)

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प्रश्न 3.
मुग़लकालीन पंजाब के हिंदू समाज में…….को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
उत्तर-
(ब्राह्मणों)

प्रश्न 4.
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत…..थी।
उत्तर-
(शोचनीय)

प्रश्न 5.
मुग़लकालीन पंजाब में……….और……..उच्च शिक्षा के सबसे प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

प्रश्न 6.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय…….था।
उत्तर-
(कृषि)

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प्रश्न 7.
मुग़लकालीन पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग……..था।
उत्तर-
(सूती कपड़ा उद्योग)

प्रश्न 8.
मुग़ल काल में ……….शालों के उद्योग के लिए संसार में प्रसिद्ध था।
उत्तर-
(कश्मीर)

प्रश्न 9.
मुग़ल काल में सूती कपड़ा उद्योग के लिए……और…..प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

प्रश्न 10.
मुग़ल काल में पंजाब के…….और……नगर व्यापारिक पक्ष से सब से महत्त्वपूर्ण हैं।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

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प्रश्न 11.
अकबर ने हिंदुओं पर लगे तीर्थ यात्रा कर को……..में हटा दिया था।
उत्तर-
(1563 ई०)

प्रश्न 12.
अकबर ने 1564 ई० में हिंदुओं पर लगे……..को हटा दिया था।
उत्तर-
(जज़िया कर)

प्रश्न 13.
औरंगजेब ने……….में हिंदुओं पर पुन: जजिया कर को लगा दिया था।
उत्तर-
(1679 ई०)

प्रश्न 14.
मुग़ल काल में भारत में सबसे अधिक इस्लाम का प्रसार…..में हुआ था।
उत्तर-
(पंजाब)

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प्रश्न 15.
मुग़ल काल में पंजाब में……..धर्म का जन्म हुआ।
उत्तर-
(सिख)

प्रश्न 16.
मध्यकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य धर्म …………. था।
उत्तर-
(हिंदू)

(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
मुग़ल काल में पंजाब का मुस्लिम समाज दो श्रेणियों में बँटा हुआ था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
मुसलमानों की उच्च श्रेणी में मनसबदार और सूबेदार शामिल थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 3.
मुसलमानों की मध्य श्रेणी में दास शामिल थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 4.
मुसलमानों की निम्न श्रेणी की संख्या सबसे अधिक थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
मुग़ल काल में पंजाब का हिंदू समाज कई जातियों और उपजातियों में बँटा हुआ था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
मुग़ल काल के हिंदू समाज में लोग शूद्रों से घृणा करते थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 7.
मुग़लकालीन पंजाब के हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा बहुत शोचनीय थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
मुग़ल काल में अधिकतर हिंदू शाकाहारी थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 9.
मुग़ल काल में हिंदू स्त्रियाँ साड़ियाँ पहनती थीं।।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
मुग़ल काल में लाहौर और मुलतान उच्च शिक्षा के दो प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 11.
मुग़लकालीन पंजाब में शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र लाहौर था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
मुग़ल काल में स्त्रियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 13.
मुग़ल काल में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 14.
पंजाब में जब्ती प्रणाली 1581 ई० में शुरू की गई थी।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 15.
जब्ती प्रणाली के अधीन ज़मीन को पाँच वर्गों में बांटा हुआ था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 16.
मुग़ल काल में चमड़ा उद्योग पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 17.
मुग़ल काल में लाहौर और अमृतसर सूती कपड़ा उद्योग के दो प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 18.
मुग़ल काल में कश्मीर और लाहौर रेशमी उद्योग के दो प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 19.
मुग़ल काल में कश्मीर शालों के उद्योग के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 20.
दाम ताँबे की धातु का बना होता था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 21.
मुग़लकालीन पंजाब में सिख धर्म का जन्म हुआ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 22.
मुग़ल काल में चिश्ती सिलसिला बहुत प्रसिद्ध था।
उत्तर-
ठीक

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(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
मुग़लकाल में पंजाब का समाज कितने मुख्य वर्गों में बँटा हुआ था ?
(i) दो
(ii) तीन
(iii) चार
(iv) पाँच।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 2.
मुगलकाल में पंजाब का मुस्लिम समाज कितने वर्गों में बँटा हुआ था ?
(i) तीन
(ii) चार
(iii) पाँच
(iv) सात।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 3.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की उच्च श्रेणी में कौन शामिल नहीं थे ?
(i) जागीरदार
(ii) मनसबदार
(iii) व्यापारी
(iv) सूबेदार।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 4.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की मध्य श्रेणी में कौन शामिल नहीं थे ?
(i) व्यापारी
(ii) किसान
(iii) सैनिक
(iv) मज़दूर।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 5.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की निम्न श्रेणी में कौन शामिल था ?
(i) दास
(ii) मजदूर
(iii) नौकर
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 6.
मुग़लकालीन स्त्री समाज में किस बुराई का प्रचलन था ?
(i) कन्या वध
(ii) बाल विवाह
(iii) सती प्रथा
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 7.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों का मनोरंजन का मुख्य साधन क्या था ?
(i) शिकार
(ii) शतरंज
(iii) नृत्य-संगीत
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 8.
मुगलकालीन में पंजाब में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र कौन-सा था ?
(i) लाहौर
(ii) मुलतान
(iii) सरहिंद
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 9.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
(i) कृषि
(ii) व्यापार
(iii) उद्योग
(iv) पशु-पालन।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 10.
मुगलकालीन पंजाब की प्रमुख फ़सल कौन-सी थी ?
(i) गेहूँ
(ii) गन्ना
(iii) कपास
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 11.
मुगलकालीन पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग कौन-सा था ?
(i) सूती कपड़ा उद्योग
(ii) चमड़ा उद्योग
(iii) खंड उद्योग
(iv) लकड़ी उद्योग।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 12.
मुगलकालीन पंजाब में निम्नलिखित में से कौन-सा केंद्र ऊनी वस्त्र के उद्योग के लिए सबसे प्रसिद्ध था ?
(i) कश्मीर
(ii) गुजरात
(iii) लाहौर
(iv) स्यालकोट।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 13.
मुगलकालीन पंजाब के लोग किस वस्तु का निर्यात नहीं करते थे ?
(i) घोडे
(ii) कपड़ा
(iii) चीनी
(iv) कंबल।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 14.
मुगलकालीन पंजाब का कौन-सा नगर व्यापार के लिए सबसे प्रसिद्ध था ?
(i) अमृतसर
(ii) कश्मीर
(iii) लाहौर
(iv) पानीपत।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 15.
मुगलकाल में सर्वाधिक प्रचलित दाम नाम का सिक्का किस धातु का बना था ?
(i) सोना
(ii) चाँदी
(iii) लोहा
(iv) ताँबा।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 16.
मुगलकालीन पंजाब में चाँदी के सिक्के को क्या कहा जाता था ?
(i) दाम
(ii) सिक्का
(iii) रुपया
(iv) मुद्रा।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 17.
मुगलकाल में किस धर्म का जन्म हुआ ?
(i) इस्लाम
(ii) हिंदू धर्म
(iii) सिख धर्म
(iv) ईसाई धर्म।
उत्तर-
(iii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
मुगलकालीन पंजाब में मुस्लिम समाज की स्थिति कैसी थी ? (What was the condition of Muslims under the Mughals ?)
अथवा
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज पर एक नोट लिखें। (Write a note on the Muslim society of the Punjab during the Mughal times.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण उनको समाज में कुछ विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं। राज्य के उच्च पदों पर मुसलमानों को नियुक्त किया जाता था। उस समय मुसलमान तीन श्रेणियों में विभाजित थे। उच्च श्रेणी जिसमें बड़े-बड़े मनसबदार, सूबेदार, जागीरदार आदि शामिल थे; वे बड़ा आरामदायक एवं शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। सुरा एवं सुंदरी उनके मनोरंजन के मुख्य साधन थे। उनकी सेवा के लिए बड़ी संख्या में नौकर होते थे। मध्य वर्ग में किसान, दुकानदार और छोटे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल थे। उच्च श्रेणी के मुकाबले में उनका जीवन स्तर चाहे कुछ नीचा था पर फिर भी उनका जीवन खुशहाल था। निम्न श्रेणी में घरेलू नौकर, श्रमिक, दास, छोटे दुकानदार आदि शामिल थे। उनकी स्थिति बड़ी शोचनीय थी। निर्धन होने के कारण उनका जीवन-निर्वाह करना अत्यंत कठिन होता था।

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प्रश्न 2.
मुगलकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति कैसी थी ? (What was the condition of Hindus in the society of Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुगलों के अधीन पंजाब के हिंदुओं की स्थिति का संक्षेप में अध्ययन करें। (Study in brief the condition of Hindu society in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति अच्छी नहीं थी। समाज में चाहे हिंदुओं की संख्या अधिक थी, परंतु उन्हें उच्च पदों से वंचित रखा जाता था। मुसलमान उनको काफिर कहते थे। उनका बहुत अपमान किया जाता था। उनको इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए विवश किया जाता था। उस समय हिंदू समाज कई जातियों तथा उपजातियों में बंटा हुआ था। जाति संबंधी नियम पहले से अधिक कठोर हो गए थे। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों से घृणा करते थे। उन पर घोर अत्याचार किए जाते थे। इसके अतिरिक्त उन पर अनेक पाबंदियाँ लगाई गई थीं। समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के अनुसार कार्य करता था। जाति संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जाता था। हिंदुओं की यह जाति प्रथा उनके लिए बड़ी हानिकारक सिद्ध हुई।

प्रश्न 3.
मग़लों के अधीन पंजाब में स्त्रियों की हालत कैसी थी ? (What was the position of women in Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब में स्त्रियों में प्रचलित किन्हीं छः बुराइयों का संक्षिप्त विवरण दें। (Describe any six evils prevalent among women in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी।

  1. उस समय लड़कियों का विवाह अल्पायु में ही कर दिया जाता था।
  2. लड़कियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।
  3. पति की मृत्यु हो जाने पर पत्नी को पति के साथ जीवित जला दिया जाता था। इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता था।
  4. जो स्त्रियाँ सती नहीं होती थीं उनको विधवा का जीवन व्यतीत करना पड़ता था। विधवा को पुनर्विवाह की आज्ञा नहीं थी।
  5. मुस्लिम और हिंदू स्त्रियों में पर्दे की प्रथा प्रचलित थी।
  6. समाज में स्त्रियों का स्थान पुरुषों के बराबर नहीं समझा जाता था।

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प्रश्न 4.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के मनोरंजन के क्या मुख्य साधन थे ?
(What were the main sources of entertainment of the people of Punjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोग कई ढंगों से अपना मनोरंजन करते थे। उच्च श्रेणी के लोग अपना मनोरंजन शिकार, रथों की दौड़ में भाग लेकर, चौगान खेलकर, कबूतरबाज़ी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, तैराकी करके, शतरंज और चौपड़ खेल कर और महिफ़लों में भाग लेकर करते थे। आम लोग अपना मनोरंजन संगीत, नाच-भंगड़े, कुश्तियाँ करके, दौड़ों में भाग लेकर, जादूगरों तथा मदारियों के खेल देख कर तथा ताश खेल कर करते थे। इनके अतिरिक्त लोग त्योहारों तथा मेलों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। हिंदुओं के प्रमुख त्योहार दीवाली, दशहरा, वैशाखी, लोहड़ी, होली, शिवरात्रि और राम नवमी आदि थे। मुसलमानों के मुख्य त्योहार. ईद, शबे-बारात और नौरोज थे। इनके अतिरिक्त सूफ़ी-संतों की मजारों पर भी भारी मेले लगते थे। सिख वैशाखी तथा दीवाली के अवसरों पर हरिमंदिर साहिब अमृतसर में बहुत उत्साह के साथ इकट्ठे होते थे।

प्रश्न 5.
मुग़लों के अधीन पंजाब में शिक्षा का क्या प्रबंध था ? (Write a note about prevalent education in Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़ल काल में लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्रारंभिक शिक्षा मंदिरों में और मुसलमान अपनी शिक्षा मस्जिदों में प्राप्त करते थे। ये लोगों द्वारा दिए गए दान पर चलते थे। यहाँ विद्यार्थियों को अपने-अपने धर्मों के बारे में भी शिक्षा दी जाती थी। मुसलमानों की अपेक्षा हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात् गुरु को कुछ दक्षिणा दिया करते थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, स्यालकोट, जालंधर, सुल्तानपुर, बटाला, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। सरकार इनको आर्थिक सहायता देती थी। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। केवल उच्च घराने की कुछ स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करती थीं। इनकी शिक्षा का प्रबंध घरों में ही निजी तौर पर किया जाता था।

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प्रश्न 6.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों की सामाजिक स्थिति की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
(Mention the main salient features of social condition of people of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। उनको समाज में कुछ विशेष अधिकार प्राप्त थे। मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों-उच्च, मध्य एवं निम्न श्रेणी में बंटा हुआ था। उच्च श्रेणी के लोग बड़े ऐश्वर्य और शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। निम्न श्रेणी के लोगों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी। हिंदुओं की जो कि पंजाब की बहुसंख्यक श्रेणी से संबंधित थे, स्थिति अच्छी नहीं थी। उनको बहुत-से अधिकारों से वंचित रखा जाता था। मुसलमान उनसे बहुत घृणा करते थे। हिंदू समाज कई जातियों और उपजातियों में बंटा हुआ था। जाति संबंधी नियम पहले से बहुत कठोर हो चुके थे। समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय लोग सूती और रेशमी कपड़े पहनते थे। उच्च वर्ग के लोगों की पोशाकें बहुत कीमती हुआ करती थीं जबकि आम लोगों की पोशाक बिल्कुल सादा होती थी। उस समय स्त्रियाँ और पुरुष दोनों गहने पहनने के बड़े शौकीन थे।

प्रश्न 7.
मग़लकालीन पंजाब की खेती-बाड़ी संबंधी स्थिति पर संक्षिप्त प्रकाश डालें। (Give an account of agriculture of Punjab under the Mughals.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाब में सरकार ने खेती-बाडी संबंधी कौन-सी नीति अपनाई ?
(What policy did the government adopt regarding agriculture in Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों का मुख्य व्यवसाय क्या था ? (What was the main occupation of Punjabis under the Mughals ?)
उत्तर-
मुगलकालीन पंजाब में लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी था। पंजाब के 80% लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए थे। इसलिए मुग़ल सरकार ने खेती-बाड़ी को उत्साहित करने के लिए विशेष ध्यान दिया। नई भूमि को खेती के अधीन लाने वाले किसानों को विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं। सिंचाई साधनों को उन्नत करने के लिए सरकार किसानों को तकावी ऋण बाँटती थी। लगान, भूमि की उपजाऊ शक्ति और सिंचाई की सुविधाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग निश्चित किया गया था। अकाल के दिनों में भूमि का लगान माफ कर दिया जाता था। लगान एकत्रित करने वाले कर्मचारियों को राज्य की ओर से कड़े निर्देश थे कि वे किसी प्रकार भी कृषकों का शोषण न करें। खादों के प्रयोग को उत्साहित किया जाता था। इन सभी प्रयत्नों के परिणामस्वरूप मुग़लों के समय फसलों की भरपूर पैदावार प्राप्त की जाती थी। उस समय पंजाब की प्रमुख फसलें गेहूँ, चने, चावल, मक्की , गन्ना, कपास और जौ थीं। इनके अतिरिक्त उस समय तिलहन, अफ़ीम और कई प्रकार के फलों की भी खेती की जाती थी।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

प्रश्न 8.
मुगलकालीन पंजाब में प्रचलित कपड़ा उद्योग संबंधी जानकारी दें। (Write a brief note on textile industry of Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुगलकालीन पंजाब में प्रचलित उद्योगों में सूती कपड़ा उद्योग सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण था। अमृतसर, लाहौर, मुलतान और गुजरात में बढ़िया प्रकार का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान बढ़िया दरियों, मेज़पोशों तथा चादरों के लिए प्रसिद्ध था। पेशावर में सुंदर लुंगियाँ तैयार की जाती थीं। मुलतान, लाहौर और अमृतसर में पायजामे और सलवारें तैयार की जाती थीं। गुजरात में शिफोन का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान, कश्मीर और अमृतसर रेशमी कपड़ा उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे। उस समय पंजाब में गुलबदन, दरियाई और धूप-छाँव नाम के रेशमी वस्त्र तैयार किये जाते थे। उस समय रेशमी कपड़े की लाहौर राज्य के उच्च घरानों में बड़ी माँग, थी। ऊनी कपड़ा उद्योग के लिए कश्मीर और अमृतसर के केंद्र प्रसिद्ध थे। कश्मीर शालों के उद्योग के लिए संसार भर में प्रसिद्ध था। शालें तैयार करने के लिए विदेशों से भी ऊन मंगवाई जाती थी। अमृतसर में शालें, कंबल और लोइयाँ बनाई जाती थीं। यहाँ के कंबल और लोइयाँ बहुत प्रसिद्ध थीं।

प्रश्न 9.
मुगलकालीन पंजाब के व्यापार के संबंध में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about trade in Punjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार बहुत उन्नत था। इसके कई कारण थे। पहला, पंजाब की भौगोलिक स्थिति व्यापारिक पक्ष से बहुत महत्त्वपूर्ण थी। दूसरे, यहाँ के यातायात के साधन उन्नत थे। तीसरे, यहाँ फसलों की भरपूर पैदावार होती थी और उद्योग-धंधे भी उन्नत थे। व्यापार का कार्य क्षत्रियों, बनियों, महाजनों, अरोड़ों, बोहरों और खोजों के हाथ में था। पंजाब का विदेशी व्यापार अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत, भूटान, सीरिया, चीन और यूरोपीय देशों के साथ चलता था। पंजाब इन देशों को सूती और रेशमी कपड़े, शालें, कंबल, अनाज, चीनी, नील और नमक आदि का निर्यात करता था। इनके बदले पंजाब इन देशों से बढ़िया नस्ल के घोड़े, खुश्क मेवे, ऐश्वर्य की चीजें, रेशम, बहुमूल्य पत्थरों इत्यादि का आयात करता था। सामान को ढोने के लिए बैल-गाड़ियों, ऊँटों, खच्चरों, घोड़ों और बैलों का प्रयोग किया जाता था। इसके अतिरिक्त जल मार्ग से सामान ले जाने के लिए नावों का प्रयोग भी किया जाता था।

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प्रश्न 10.
मुग़लों के अधीन पंजाब की आर्थिक दशा का संक्षेप में वर्णन करो। (Write a short note on the economic condition of Punjab during the Mughal rule.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों की आर्थिक अवस्था पर एक नोट लिखें। (Write a note on the economic condition of Punjabis during the Mughal rule.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाब की आर्थिक हालत के ऊपर प्रकाश डालें। (Throw light on the economic condition of Punjab under the Mughal rule.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। कृषि उस समय के लोगों का मुख्य व्यवसाय था। भूमि के उपजाऊ होने के कारण, उत्तम सिंचाई साधनों तथा सरकार द्वारा विशेष सुविधाएँ दिए जाने के कारण इस धंधे को बहुत प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप उस समय फसलों की भरपूर पैदावार प्राप्त की जाती थी। पंजाब की मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, गन्ना, कपास, मक्की, चना और जौ थीं। पंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय उद्योग थे। कपड़ा उद्योग उस समय पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग था। इसके अतिरिक्त चमड़ा उद्योग, चीनी उद्योग, शस्त्र उद्योग और लकड़ी उद्योग भी प्रसिद्ध थे। उस समय पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार भी उन्नत था। पंजाब का विदेशी व्यापार अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत और यूरोपीय देशों के साथ चलता था। पंजाब से इन देशों को सूती और रेशमी कपड़े, शालें, कंबल, अनाज, चीनी, नील इत्यादि का निर्यात किया जाता था। इनके बदले पंजाब विदेशों से बहुमूल्य पत्थर, रेशम, खुश्क मेवे तथा बढ़िया नस्ल के घोड़ों आदि का निर्यात करता था। मुग़लकालीन पंजाब में वस्तुओं की कीमतें बहुत कम थीं। परिणामस्वरूप निर्धन लोगों का निर्वाह भी अच्छे ढंग से हो जाता था।

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
मुग़ल काल में लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्राथमिक शिक्षा मंदिरों में तथा मुसलमान मस्जिदों में प्राप्त करते थे। ये लोगों द्वारा दिए गए दान पर चलते थे। यहाँ विद्यार्थियों को अपने-अपने धर्मों के बारे में शिक्षा दी जाती थी। मुसलमानों के मुकाबले हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। वे अपनी पढ़ाई पूरी करके गुरुं को कुछ दक्षिणा दे देते थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, स्यालकोट, जालंधर, सुल्तानपुर, बटाला, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। सरकार इन मदरसों को आर्थिक सहायता देती थी। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। केवल उच्च घराने की कुछ स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करती थीं। इनकी शिक्षा का प्रबंध घरों में प्राइवेट तौर पर किया जाता था।

  1. मुग़ल काल में शिक्षा विकसित क्यों नहीं थी ?
  2. मुग़ल काल में मुसलमान अपनी आरंभिक शिक्षा कहाँ से प्राप्त करते थे ?
  3. मुग़ल काल में प्रचलित शिक्षा की कोई एक विशेषता लिखें।
  4. मुग़ल काल में स्त्रियों की शिक्षा कैसी थी ?
  5. मुग़ल काल में विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पूरी करके गुरु को कुछ ……….. देते थे।

उत्तर-

  1. क्योंकि मुग़ल काल में शिक्षा देने की जिम्मेवारी सरकार की नहीं थी।
  2. मुग़ल काल में मुसलमान अपनी आरंभिक शिक्षा मस्जिदों से प्राप्त करते थे।
  3. उस समय विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी।
  4. मुग़ल काल में स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था।
  5. दक्षिणा।

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2
मुग़ल काल में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी था। पंजाब की कुल जनसंख्या के 80 प्रतिशत लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए थे। इसका मुख्य कारण यह था कि यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी और सिंचाई साधनों की कोई कमी नहीं थी। मुग़ल बादशाह इस बात से भली-भाँति परिचित थे कि साम्राज्य की खुशहाली किसानों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है। इसलिए उन्होंने खेती-बाड़ी को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष ध्यान दिया। 1581 ई० में पंजाब में ज़ब्ती प्रणाली लागू की गई थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत पंजाब में खेती योग्य सारी भूमि की पैमाइश की गई। इस भूमि को उसकी उपजाऊ शक्ति के आधार पर चार वर्गों पोलज, परोती, छछर और बंजर भूमि में बाँटा गया। सरकार अपना लगान भूमि की उपजाऊ शक्ति, सिंचाई की सुविधाओं तथा पिछले दस वर्ष की औसत उपज को ध्यान में रखकर निर्धारित करती थी। यह कुल फसल का 1/3 हिस्सा हुआ करता था। सरकार किसानों की सुविधानुसार अपना लगान अनाज अथवा नकदी के रूप में एकत्रित करती थी। ”

  1. मुगल काल में लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
  2. मुग़ल काल में कितने प्रतिशत लोग कृषि के व्यवसाय से जुड़े हुए थे ? ।
    • 50%
    • 60%
    • 70%
    • 80%.
  3. जब्ती प्रणाली से क्या भाव है ?
  4. मुग़ल काल में खेतीबाड़ी की कोई एक विशेषता लिखें।
  5. मुग़ल काल में सरकार किसानों से किस रूप में अपना लगान इकट्ठा करते थे ?

उत्तर-

  1. मुग़ल काल में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।
  2. 80%
  3. ज़ब्ती प्रणाली से भाव कृषि योग्य भूमि की पैमाइश से है।
  4. सरकार अपना लगान भूमि की उपजाऊ शक्ति, सिंचाई की सुविधाओं तथा पिछले दस सालों की औसत उपज को ध्यान में रखकर निश्चित करती थी।
  5. मुग़ल काल में सरकार किसानों से अनाज एवं नकदी के रूप में लगान एकत्रित करती थी।

3
मुग़ल काल में पंजाब में सिख धर्म का जन्म हुआ। इस धर्म की स्थापना गुरु नानक देव जी ने 15वीं शताब्दी में की थी। गुरु नानक देव जी ने उस समय समाज में प्रचलित सामाजिक तथा धार्मिक बुराइयों का खंडन किया। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा तथा आपसी भ्रातृत्व का संदेश दिया। उन्होंने संगत तथा पंगत संस्थाओं की नींव रखी। उनके धर्म के द्वार प्रत्येक जाति तथा वर्ग के लोगों के लिए खुले थे। उन्होंने अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का नया मार्ग दिखाया। गुरु जी के संदेश को उनके नौ उत्तराधिकारियों ने जारी रखा। मुग़ल सम्राट अकबर की धार्मिक सहनशीलता की नीति के कारण पंजाब में सिख धर्म को प्रफुल्लित होने का स्वर्ण अवसर मिला। सम्राट् जहाँगीर के सिंहासन पर बैठते ही मुग़ल सिख संबंधों में तनाव आ गया। 1606 ई० में गुरु अर्जन साहिब की शहीदी तथा 1675 ई० में गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी के कारण सिख भड़क उठे। मुग़ल अत्याचारों का कड़ा उत्तर देने के लिए 1699 ई० में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ का सृजन किया। खालसा की स्थापना कारण पंजाब के इतिहास में एक नए युग का आरंभ हुआ।

  1. सिख धर्म का जन्म किस काल में हुआ ?
  2. सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
  3. संगत व पंगत से क्या भाव है ?
  4. गुरु तेग़ बहादुर जी को कब शहीद किया गया था ?
    • 1605 ई०
    • 1606 ई०
    • 1665 ई०
    • 1675 ई०
  5. खालसा पंथ की स्थापना किसने की थी ?

उत्तर-

  1. सिख धर्म का जन्म मुग़ल काल में हुआ।
  2. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी थे।
    • संगत से भाव उस समूह से है जो इकट्ठे मिलकर गुरु जी के उपदेश सुनते थे।
    • पंगत से भाव कतारों में बैठकर लंगर छकने से है।
  3. 1675 ई०।
  4. खालसा पंथ की स्थापना गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति PSEB 12th Class History Notes

  • सामाजिक स्थिति (Social Condition)-पंजाब का समाज मुख्य रूप से दो वर्गों-मुसलमान और हिंदुओं में बँटा हुआ था—मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों उच्च, मध्यम तथा निम्न में बँटा हुआ था-उच्च वर्ग में बड़े-बड़े मनसबदार तथा रईस लोग आते थे—मध्यम श्रेणी में किसान और सरकारी कर्मचारी तथा निम्न वर्ग में नौकर और मज़दूर आदि आते थे—हिंदू समाज कई जातियों तथा उपजातियों में बँटा हुआ था—स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी—उच्च वर्ग का खान पान बहुत ही अच्छा था जबकि निम्न वर्ग के लोग मात्र गुजारा करते थे—हिंदू अधिकतर शाकाहारी थे—उच्च वर्ग के लोग काफ़ी मूल्यवान वस्त्र पहनते थे—स्त्रियाँ और पुरुष दोनों गहने पहनने के बड़े शौकीन थे—शिकार, रथदौड़, चौगान, कबूतरबाजी और शतरंज आदि लोगों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे—शिक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी न थी—यह मंदिरों और मस्जिदों द्वारा प्रदान की जाती थी।
  • आर्थिक स्थिति (Economic Condition)-पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती बाड़ी था—कुल जनसंख्या के 80% लोग कृषि से जुड़े थे—पंजाब में फसलों की भरपूर पैदावार होती थीपंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य धंधा उद्योग था—सूती वस्त्र उद्योग पंजाब का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग. था—अन्य उद्योगों में रेशमी वस्त्र उद्योग, चमड़ा उद्योग, बर्तन उद्योग, चीनी उद्योग तथा शस्त्र उद्योग महत्त्वपूर्ण थे—कई लोग पशु पालन का काम करते थे—आंतरिक और विदेशी व्यापार बहुत उन्नत थाविदेशी व्यापार अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत, भूटान, चीन और यूरोपीय देशों के साथ होता था—लाहौर और मुलतान व्यापारिक पक्ष से सबसे महत्त्वपूर्ण नगर थे—कीमतें कम होने के कारण ग़रीब लोगों का गुजारा भी अच्छा हो जाता था।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

गुरु नानक देव जी का जीवन (Life of Guru Nanak Dev Ji)

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी के जीवन का संक्षिप्त वर्णन करें । (Give a brief account of the life of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानक देव जी की गणना विश्व के महापुरुषों में की जाती है। गुरु नानक साहिब ने अज्ञानता के अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया। उन्होंने लोगों को सत्यनाम और भ्रातृत्व का संदेश दिया। गुरु नानक देव जी के महान् जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. जन्म और माता-पिता (Birth and Parentage)-गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 ई० को पूर्णिमा के दिन राय भोय की तलवंडी में हुआ। यह स्थान अब पाकिस्तान के शेखूपुरा जिला में स्थित है। इस पवित्र स्थान को आजकल ननकाणा साहिब कहा जाता है। गुरु नानक देव जी के पिता जी का नाम मेहता काल
और माता जी का नाम तृप्ता जी था। उनकी एक बहन थी जिसका नाम बेबे नानकी था। सिख परंपराओं के अनुसार गुरु साहिब के जन्म के समय अनेक चमत्कार हुए। भाई गुरदास जी लिखते हैं-
सतगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होया।
जिओ कर सूरज निकलिया तारे छपे अंधेर पलोया॥

2. बचपन और शिक्षा (Childhood and Education)-गुरु नानक देव जी बचपन से ही बहुत गंभीर और विचारशील स्वभाव के थे। उनका झुकाव खेलों की ओर कम और प्रभु-भक्ति की ओर अधिक था। गुरु साहिब जब सात वर्ष के हुए तो उन्हें पंडित गोपाल की पाठशाला में आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा गया। इसके पश्चात् गुरु साहिब ने पंडित बृजनाथ से संस्कृत तथा मौलवी कुतुबुद्दीन से फ़ारसी और अरबी का ज्ञान प्राप्त किया। जब गुरु नानक देव जी 9 वर्ष के हुए तो पुरोहित हरिदयाल को उन्हें जनेऊ पहनाने के लिए बुलाया गया। परंतु उन्होंने स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि वे केवल दया, संतोष, जत और सत से निर्मित जनेऊ पहनेंगे जो न टूटे, न जले और न ही मलिन हो पाये।

3. भिन्न-भिन्न व्यवसायों में (In Various occupations)-गुरु नानक देव जी को अपने विचारों में मगन देखकर उनके पिता जी ने उन्हें किसी कार्य में लगाने का यत्न किया। सर्वप्रथम गुरु नानक देव जी को भैंसें चराने का कार्य सौंपा गया परंतु गुरु नानक देव जी ने कोई रुचि न दिखाई। फलस्वरूप अब गुरु साहिब को व्यापार में लगाने का निर्णय किया गया। गुरु जी को 20 रुपये दिए गए और मंडी भेजा गया। मार्ग में गुरु साहिब को भूखे साधुओं की टोली मिली। गुरु नानक देव जी ने अपने सारे रुपये इन साधुओं को भोजन खिलाने में व्यय कर दिए और खाली हाथ लौट आए। यह घटना इतिहास में ‘सच्चा सौदा’ के नाम से जानी जाती है।

4. विवाह (Marriage)-गुरु नानक देव जी का विवाह बटाला निवासी मूल चंद की सुपुत्री सुलक्खनी जी से कर दिया गया। उस समय आपकी आयु 14 वर्ष थी। समय के साथ आपके घर दो पुत्रों श्री चंद और लखमी दास ने जन्म लिया।

5. सुल्तानपुर लोधी में नौकरी (Service at Sultanpur Lodhi)—जब गुरु नानक देव जी 20 वर्ष के हुए तो मेहता कालू जी ने आपको सुल्तानपुर लोधी में अपने जंवाई जयराम के पास भेज दिया। उनकी सिफ़ारिश पर नानक जी को मोदीखाना अन्न भंडार में नौकरी मिल गई। गुरु साहिब ने यह कार्य बड़ी योग्यता से किया।

6. ज्ञान प्राप्ति (Enlightenment)-गुरु नानक देव जी सुल्तानपुर लोधी में रहते हुए प्रतिदिन सुबह बेईं नदी में स्नान करने के लिए जाते थे। एक दिन वे स्नान करने गए और तीन दिनों तक लुप्त रहे। इस समय उन्हें सत्य ज्ञान की प्राप्ति हुई । उस समय गुरु नानक देव जी की आयु 30 वर्ष थी। ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु साहिब ने सर्वप्रथम “न को हिंदू, न को मुसलमान” शब्द कहे।

7. उदासियाँ (Travels)-1499 ई० में ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु जी ने देश तथा विदेश की यात्राएँ कीं। इन यात्राओं को उदासियाँ भी कहा जाता है। इन यात्राओं का उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता एवं अंध-विश्वास को दूर करना था तथा परस्पर भ्रातृभाव व एक ईश्वर का प्रचार करना था। भारत में गुरु नानक देव जी ने उत्तर में कैलाश पर्वत से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक तथा पश्चिम में पाकपटन से लेकर पूर्व में आसाम तक की यात्रा की। गुरु साहिब भारत से बाहर मक्का, मदीना, बगदाद तथा लंका भी गए। गुरु साहिब की यात्राओं के बारे में हमें उनकी बाणी से महत्त्वपूर्ण संकेत मिलते हैं। गुरु नानक साहिब ने अपने जीवन के लगभग 21 वर्ष इन यात्राओं में बिताए। इन यात्राओं के दौरान गुरु नानक देव जी लोगों में फैले अंध-विश्वास को काफी सीमा तक दूर करने में सफल हुए तथा उन्होंने नाम के चक्र को चारों दिशाओं में फैलाया।

8. करतारपुर में निवास (Settled at Kartarpur)-गुरु नानक देव जी ने 1521 ई० में रावी नदी के तट पर करतारपुर नामक नगर की स्थापना की। यहाँ गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शब्दों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए एक मील पत्थर सिद्ध हुआ। गुरु नानक देव जी की प्रमुख वाणियों के नाम जपुजी साहिब, वार माझ, आसा दी वार, सिद्ध गोष्टि, वार मल्हार, बारह माह और पट्टी इत्यादि हैं।

9. उत्तराधिकारी की नियुक्ति (Nomination of the Successor)-1539 ई० में ज्योति-जोत समाने से पूर्व गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गुरु नानक देव जी ने एक नारियल और पाँच पैसे भाई लहणा जी के सम्मुख रखकर अपना शीश झुकाया। इस प्रकार भाई लहणा जी गुरु अंगद देव जी बने। इस प्रकार गुरु नानक साहिब ने एक ऐसा पौधा लगाया जो गुरु गोबिंद सिंह जी के समय एक घने वृक्ष का रूप धारण कर गया। डॉक्टर हरी राम गुप्ता के अनुसार,
“गुरु अंगद देव जी की नियुक्ति एक बहुत ही दूरदर्शिता वाला कार्य था।”1

10. ज्योति-जोत समाना (Immersed in Eternal Light)-गुरु नानक देव जी 22 सितंबर, 1539 ई० को ज्योति-जोत समा गए।

1. “The appointment of Angad was a step of far-reaching significance.” Dr. H.R. Gupta, History of Sikh Gururs (New Delhi : 1973) p. 81.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ 1
GURDWARA NANKANA SAHIB : PAKISTAN

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

गुरु नानक देव जी की उदासियाँ (Udasis of Guru Nanak Dev Ji)

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का वर्णन करें। इनका क्या उद्देश्य था ?
(Write a note on the Udasis of Guru Nanak Dev Ji. What was the aim of these Udasis ?) ·
अथवा
उदासियों से क्या भाव है ? गुरु नानक देव जी की उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें। (What is meant by Udasis ? Give a brief account of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
संक्षेप में गुरु नानक देव जी की उदासियों का वर्णन करें। उनका क्या उद्देश्य था ?
(Briefly discuss the travels (Udasis) of Guru Nanak Dev Ji. What was their aim ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की उदासियों का वर्णन करें। (Give an account of the Udasis (travels) of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
‘ गुरु नानक देव जी की उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें। इन उदासियों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ?
(Describe briefly the Udasis of Guru Nanak Dev Ji. What was their impact on society ?)
उत्तर-
1499 ई० में ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु नानक देव जी देश और विदेशों की लंबी यात्रा के लिए निकल पड़े। गुरु नानक देव जी ने लगभग 21 वर्ष इन यात्राओं में व्यतीत किए। गुरु नानक साहिब की इन यात्राओं को उदासियाँ भी कहा जाता है क्योंकि गुरु साहिब इस समय के दौरान घर-द्वार त्याग कर एक उदासी की भाँति भ्रमण करते रहे। गुरु नानक देव जी ने कुल कितनी उदासियाँ की, इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। आधुनिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि गुरु नानक देव जी की उदासियों की संख्या तीन थी।

उदासियों का उद्देश्य (Objects of the Udasis)
गुरु नानक देव जी की उदासियों का प्रमुख उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता और अंध-विश्वासों को दूर करना था। उस समय हिंदू और मुसलमान दोनों ही धर्म के मार्ग से भटक चुके थे। हिंदू ब्राह्मण और योगी जिनका प्रमुख कार्य भटके हुए लोगों को सही मार्ग दिखाना था, वे स्वयं ही भ्रष्ट और आचरणहीन हो चुके थे। लोगों ने असंख्य देवी-देवताओं, कब्रों, वृक्षों, सर्पो और पत्थरों इत्यादि की आराधना आरंभ कर दी थी। मुसलमानों के धार्मिक नेता भी चरित्रहीन हो चुके थे। उस समय अधिकाँश मुसलमान भोग-विलास का जीवन व्यतीत करते थे। समाज कई जातियों और उपजातियों में विभाजित था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। समाज में स्त्रियों की दशा बहुत ही दयनीय थी। गुरु नानक देव जी ने अज्ञानता में भटक रहे इन लोगों को प्रकाश का एक नया मार्ग बताने के लिए यात्राएँ कीं।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० एस० एस० कोहली के अनुसार,
“इस महापुरुष ने अपने मिशन को इस देश तक सीमित नहीं रखा। उसने सारी मानवता की जागृति के लिए दूर-दूर के देशों की यात्राएँ कीं।”2

प्रथम उदासी
(First Udasi)
गुरु नानक देव जी ने 1499 ई० के अंत में अपनी पहली यात्रा आरंभ की। इन यात्राओं के समय भाई मरदाना उनके साथ रहा। इस यात्रा को गुरु नानक देव जी ने 12 वर्ष में संपूर्ण किया और वह पूर्व से दक्षिण की ओर गए। इस यात्रा के दौरान गुरु जी ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. सैदपुर (Saidpur)-गुरु नानक देव जी अपनी प्रथम उदासी के दौरान सर्वप्रथम सैदपुर (ऐमनाबाद) पहुँचे। . यहाँ पहुँचने पर मलिक भागो ने गुरु साहिब को एक ब्रह्मभोज पर निमंत्रण दिया, परंतु गुरु साहिब एक निर्धन बढ़ई भाई लालो के घर ठहरे। जब इस संबंध में मलिक भागो ने गुरु नानक साहिब से पूछा तो उन्होंने एक हाथ में मलिक भागो के भोज और दूसरे हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी लेकर ज़ोर से दबाया। मलिक भागो के भोज से खून और भाई लालो की रोटी में से दूध निकला। इस प्रकार गुरु साहिब ने उसे बताया कि हमें श्रम तथा ईमानदारी की कमाई करनी चाहिए।

2. तालुंबा (Talumba) गुरु नानक देव जी की तालुंबा में भेंट सज्जन ठग से हुई। उसने यात्रियों के लिए अपनी हवेली में एक मंदिर और मस्जिद बनाई हुई थी। वह दिन के समय तो यात्रियों की खूब सेवा करता किंतु रात के समय उन्हें लूटकर कुएँ में फैंक देता था। वह गुरु नानक देव जी और मरदाना के साथ भी कुछ ऐसा ही करने की योजनाएँ बना रहा था। रात्रि के समय जब गुरु नानक देव जी ने वाणी पढ़ी तो सज्जन ठग गुरु साहिब के चरणों में गिर पड़ा। गुरु नानक देव जी ने उसे क्षमा कर दिया। इस घटना के पश्चात् सज्जन ने अपना शेष जीवन सिख धर्म का प्रचार करने में व्यतीत किया। के० एस० दुग्गल के अनुसार, “सज्जन की सराय जो कि एक वधस्थल था, एक धर्मशाला में परिवर्तित हो गया।”3

3. कुरुक्षेत्र (Kurukshetra)-गुरु नानक देव जी सूर्य ग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र पहुँचे। इस अवसर पर हज़ारों ब्राह्मण और साधु एकत्रित हुए थे। गुरु नानक देव जी ने ब्राह्मणों को समझाया कि हमें सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। गुरु जी के विचारों से प्रभावित होकर अनेक लोग उनके अनुयायी बन गए।

4. दिल्ली (Delhi) दिल्ली में गुरु नानक देव जी मजनूं का टिल्ला में रुके। गुरु नानक देव जी के उपदेशों का वहाँ की संगत पर गहरा प्रभाव पड़ा।

5. हरिद्वार (Haridwar)-गुरु नानक देव जी जब हरिद्वार पहुँचे तो वहाँ बड़ी संख्या में हिंदू स्नान करते हुए पूर्व की ओर मुँह करके सूर्य और पितरों को पानी दे रहे थे। ऐसा देखकर गुरु साहिब ने पश्चिम की ओर मुँह करके पानी देना आरंभ कर दिया। यह देखकर लोग गुरु जी से पूछने लगे कि वे क्या कर रहे हैं। गुरु जी ने कहा कि वे करतारपुर में अपने खेतों को पानी दे रहे हैं। यह उत्तर सुनकर लोग हंस पड़े और कहने लगे कि यह पानी यहाँ से 300 मील दूर उनके खेतों में कैसे पहुंच सकता है ? गुरु जी ने उत्तर दिया कि यदि तुम्हारा पानी लाखों मील दूर स्थित सूर्य तक पहुँच सकता है तो मेरा पानी इतने निकट स्थित खेतों तक क्यों नहीं पहुँच सकता ? गुरु जी के इस उत्तर से लोग बहुत प्रभावित हुए तथा उनके अनुयायी बन गए।

6. गोरखमता (Gorakhmata)—गुरु नानक देव जी हरिद्वार के पश्चात् गोरखमता पहुँचे। गुरु नानक देव जी ने यहाँ के सिद्ध योगियों को बताया कि कानों में कुंडल पहनने, शरीर पर विभूति रमाने, शृंख बजाने से अथवा सिर मुंडवा देने से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। मुक्ति तो आत्मा की शुद्धि से प्राप्त होती है। ये योगी गुरु साहिब के उपदेशों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उस समय से ही गोरखमता का नाम नानकमता पड़ गया।

7. बनारस (Banaras)-बनारस भी हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान था। यहाँ गुरु नानक देव जी का पंडित चतर दास से मूर्ति-पूजा के संबंध में एक दीर्घ वार्तालाप हुआ। गुरु जी के उपदेशों से प्रभावित होकर चतर दास गुरु जी का सिख बन गया।

8. कामरूप (Kamrup)-धुबरी से गुरु नानक देव जी कामरूप (असम) पहुँचे। यहाँ की प्रसिद्ध जादूगरनी नूरशाही ने अपनी सुंदरता के बल पर गुरु जी को भटकाने का असफल प्रयास किया। गुरु जी ने उसे जीवन का सही मनोरथ बताया।

9. जगन्नाथ पुरी (Jagannath Puri)-असम की यात्रा के पश्चात् गुरु नानक देव जी उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी पहुँचे। पंडितों ने गुरु साहिब को जगन्नाथ देवता की आरती करने के लिए कहा। गुरु नानक साहिब ने उन्हें बताया कि उस परम पिता परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है।

10. लंका (Ceylon)-गुरु नानक जी दक्षिण भारत के प्रदेशों से होते हुए लंका पहुँचे। गुरु साहिब के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होकर लंका का राजा शिवनाथ गुरु जी का अनुयायी बन गया।

11. पाकपटन (Pakpattan)—लंका से पंजाब वापसी के समय गुरु नानक देव जी पाकपटन में ठहरे। यहाँ वे शेख फरीद जी की गद्दी पर बैठे शेख़ ब्रह्म को मिले। यह मुलाकात दोनों के लिए एक प्रसन्नता का स्रोत सिद्ध हुई।

2. “The Great Master did not confine his mission to this country; he travelled far and wide to far off lands and countries in order to enlighten humanity as a whole.” Dr. S.S. Kohli, Travels of Guru Nanak (Chandigarh : 1978) p. IX.
3. “Sajjan’s den of an assassin was transformed into a dharmsala.” K.S. Duggal, Sikh Gurus : Their Lives and Teachings (New Delhi : 1993) p. 17.

द्वितीय उदासी
(Second Udasi)
गुरु नानक देव जी ने 1513 ई० के अंत में अपनी द्वितीय उदासी उत्तर की ओर आरंभ की। इस उदासी में उन्हें तीन वर्ष लगे। इस उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी निम्नलिखित प्रमुख स्थानों पर गए—

1. पहाड़ी रियासतें (Hilly States)—गुरु नानक देव जी ने मंडी, रवालसर, ज्वालामुखी, काँगड़ा, बैजनाथ और कुल्लू इत्यादि पहाड़ी रियासतों की यात्रा की। गुरु नानक देव जी के उपदेशों से प्रभावित होकर इन पहाड़ी रियासतों के बहुत-से लोग उनके अनुयायी बन गए।

2. कैलाश पर्वत (Kailash Parvat)-गुरु नानक देव जी तिब्बत से होते हुए कैलाश पर्वत पहुँचे। गुरु साहिब के यहाँ पहुँचने पर सिद्ध बहुत हैरान हुए। गुरु नानक देव जी ने उन्हें बताया कि संसार से सत्य लुप्त हो गया है और चारों ओर भ्रष्टाचार और झूठ का बोलबाला है। इसलिए गुरु साहिब ने उन्हें मानवता का पथ-प्रदर्शन करने का संदेश दिया।

3. लद्दाख (Ladakh)—कैलाश पर्वत के पश्चात् गुरु नानक देव जी लद्दाख पहुँचे। यहाँ के बहुत-से लोग गुरु साहिब के अनुयायी बन गए।

4. कश्मीर (Kashmir)-कश्मीर में स्थित मटन में गुरु नानक देव जी का पंडित ब्रह्मदास से काफ़ी लंबा धार्मिक शास्त्रार्थ हुआ। गुरु नानक देव जी ने उसे समझाया कि मुक्ति केवल वेदों और रामायण इत्यादि को पढ़ने से नहीं अपितु उनमें दी गई बातों पर अमल करके प्राप्त की जा सकती है।।

5. हसन अब्दाल (Hasan Abdal)-गुरु नानक देव जी पंजाब की वापसी यात्रा के समय हसन अब्दाल ठहरे। यहाँ एक अहँकारी फकीर वली कंधारी ने गुरु नानक देव जी को कुचलने के उद्देश्य से एक बहुत बड़ा पत्थर पहाड़ी से नीचे की ओर लुढ़का दिया। गुरु साहिब ने इसे अपने पंजे से रोक दिया। इस स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।

6. स्यालकोट (Sialkot) स्यालकोट में गुरु नानक देव जी की मुलाकात एक मुसलमान सन्त हमजा गौस से हुई। उसने किसी बात पर नाराज़ होकर अपनी शक्ति द्वारा सारे शहर को नष्ट करने का निर्णय कर लिया था। परंतु जब वह गुरु साहिब से मिला तो वह उनके व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपना निर्णय बदल दिया। इस घटना का लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

तृतीय उदासी
(Third Udasi)
गुरु नानक देव जी ने 1517 ई० के अंत में अपनी तृतीय उदासी आरंभ की। इस उदासी के दौरान गुरु साहिब पश्चिमी एशिया के देशों की ओर गए। इस उदासी के दौरान गुरु नानक साहिब ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. मुलतान (Multan)—मुलतान में बहुत-से सूफ़ी संत निवास करते थे। मुलतान में गुरु साहिब की भेंट प्रसिद्ध सूफी संत शेख बहाउद्दीन से हुई। शेख बहाउद्दीन उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

2. मक्का (Mecca)-मक्का हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म स्थान है । सिख परम्परा के अनुसार गुरु नानक देव जी जब मक्का पहुँचे तो काअबे की ओर पाँव करके सो गए। जब काज़ी रुकनुद्दीन ने यह देखा तो वह क्रोधित हो गया। कहा जाता है कि जब काजी ने गुरु साहिब के पाँव पकड़कर दूसरी ओर घुमाने आरंभ किए तो मेहराब भी उसी ओर घूमने लग पड़ा। यह देखकर मुसलमान बहुत प्रभावित हुए। गुरु साहिब ने उन्हें समझाया कि अल्लाह सर्वव्यापक है।

3. मदीना (Madina) मक्का के पश्चात् गुरु नानक देव जी मदीना पहुँचे। गुरु साहिब ने अपने उपदेशों का प्रचार किया। यहाँ गुरु साहिब का इमाम आज़िम के साथ शास्त्रार्थ भी, हुआ।

4. बगदाद (Baghdad) बगदाद में गुरु नानक देव जी की भेंट शेख बहलोल से हुई। वह गुरु साहिब की वाणी से प्रभावित होकर उनका श्रद्धालु बन गया।

5. सैदपुर (Saidpur)—गुरु नानक देव जी जब 1520 ई० के अंत में सैदपुर पहुंचे तो उस समय बाबर ने पंजाब पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के समय हज़ारों की संख्या में लोगों को बंदी बना लिया गया। इन बंदी बनाए गए लोगों में गुरु नानक साहिब भी थे। जब बाद में बाबर को यह ज्ञात हुआ कि गुरु साहिब एक महान् संत हैं तो उसने न केवल गुरु नानक देव जी को बल्कि बहुत से अन्य बंदियों को भी रिहा कर दिया।

इसके पश्चात् गुरु नानक देव जी तलवंडी आ गए। इस प्रकार गुरु नानक देव जी की इन यात्राओं की श्रृंखला 1521 ई० में समाप्त हुई।
उदासियों का प्रभाव
(Impact of the Udasis)
गुरु नानक देव जी की यात्राओं के बहुत महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े। वे लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूर करने और उनमें एक नई जागृति लाने में काफ़ी सीमा तक सफल हुए। गुरु नानक देव जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर हज़ारों की संख्या में लोग उनके परम श्रद्धालु बन गए। इस प्रकार गुरु नानक देव जी के जीवन काल में ही सिख पंथ अस्तित्व में आ गया। अंत में हम डॉक्टर एस० एस० कोहली के इन शब्दों से सहमत हैं,
“वे (गुरु नानक देव जी) एक पवित्र उद्देश्य को पूर्ण करना चाहते थे और इसमें उन्हें चमत्कारी सफलता प्राप्त हुई।”4
4. “He had a holy mission to perform and his performance was no less than a miracle.” Dr. S.S. Kohli, op, cit., p. XV..

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ
(Teachings of Guru Nanak Dev Ji)

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
(Describe in detail the teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाएँ क्या थी ? उनका सामाजिक महत्त्व क्या था ?
(What were the main teachings of Guru Nanak Dev Ji ? What was their social importance ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का अध्ययन कीजिए। उनका सामाजिक महत्त्व क्या था ?
(Study the main teachings of Guru Nanak Dev Ji. What was their social significance ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन करें। (Study the main teachings of Guru Nanak Dev Ji.).
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन करो। (Give a brief account of the main teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का वर्णन करो। (Describe the teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ बड़ी सरल किंतु प्रभावशाली थीं। उनकी शिक्षाएँ किसी एक वर्ग, जाति अथवा प्रांत के लिए नहीं थीं। इनका संबंध तो सारी मानव जाति से था। गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन इस प्रकार है—

1. ईश्वर का स्वरूप (The Nature of God)-गुरु नानक देव जी एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपनी वाणी में बार-बार ईश्वर की एकता पर बल दिया है। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर ही संसार की रचना करता है, उसका पालन-पोषण करता है और उसका विनाश करता है। देवी-देवते सैंकड़ों और हजारों हैं, परंतु ईश्वर एक है। उसे कई नामों से जाना जाता है जैसे-हरि, गोपाल, वाहेगुरु, साहिब, अल्लाह, खुदा और राम इत्यादि। ईश्वर के दो रूप हैं। वह निर्गुण भी है और सगुण भी। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। वह जो चाहता है, वही होता है। उसकी इच्छा के विपरीत कुछ नहीं हो सकता। गुरु जी के अनुसार ईश्वर निराकार है। उसका कोई आकार अथवा रंग-रूप नहीं है। उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

2. माया (Maya)-गुरु नानक देव जी के अनुसार माया मनुष्य के लिए मुक्ति के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुएँ जैसे धन-दौलत, उच्च पद, ऐश्वर्य, सुंदर नारी, पुत्र इत्यादि के चक्र में फंसा रहता है। इसी को माया कहते हैं। माया के कारण वह ईश्वर से दूर हो जाता है और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।

3. हऊमै (Haumai)-मनमुख व्यक्ति में हऊमै (अहं) की भावना बड़ी प्रबल होती है। हऊमै के कारण वह संसार की बुराइयों में फंसा रहता है। फलस्वरूप वह मुक्ति प्राप्त करने की अपेक्षा आवागमन के चक्र में और फंस जाता है।

4. जाति प्रथा का खंडन (Condemnation of the Caste System) उस समय का हिंदू समाज न केवल चार मुख्य जातियों बल्कि अनेक अन्य उपजातियों में विभाजित था। उच्च जाति के लोग निम्न जाति से बहुत घृणा करते थे और उन पर बहुत अत्याचार करते थे। समाज में छुआछूत की भावना बहुत फैल गई थी। गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। गुरु साहिब ने लोगों को परस्पर भ्रातृभाव का संदेश दिया।

5. मूर्ति-पूजा का खंडन (Condemnation of Idol Worship)-गुरु नानक देव जी ने मूर्ति-पूजा के विरुद्ध प्रचार किया। गुरु साहिब का कहना था कि पत्थर की मूर्तियाँ निर्जीव हैं। यदि उन्हें पानी में फेंक दिया जाए तो वे डूब जाएँगी। जो मूर्तियाँ स्वयं की रक्षा नहीं कर पातीं, वे मनुष्य को कैसे इस भवसागर से पार उतार सकती हैं ? अतः इन मूर्तियों की पूजा करना व्यर्थ है।

6. खोखले रीति-रिवाजों का खंडन (Condemmation of Empty Rituals)-गुरु नानक देव जी ने समाज में प्रचलित खोखले रीति-रिवाजों एवं अंधविश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने लोगों को बताया कि माथे पर तिलक लगाने, शरीर पर राख मलने, उपवास रखने, वन में जाकर तपस्या करने, भगवे वस्त्र पहनने से मनुष्य को मुक्ति प्राप्त नहीं होती। उनके अनुसार उस व्यक्ति का धर्म सच्चा है जिसका अंतःकरण सच्चा है।

7. स्त्रियों के साथ निम्न बर्ताव का खंडन (Denounced IItreatment with Women)-गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। उनमें असंख्य कुरीतियाँ प्रचलित थीं। गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों में प्रचलित कुरीतियों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने समानता के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। गुरु नानक साहिब फरमाते हैं,
सो क्यों मंदा आखिए जित जम्मे राजान ॥

8. नाम का जाप (Recitation of Nam)-गुरु नानक देव जी नाम जपने और शब्द की आराधना को ईश्वर की भक्ति का सर्वोच्च रूप समझते थे। इन पर चलकर मनुष्य इस रोगग्रस्त अथवा कष्टमयी संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। नाम के बिना मनुष्य आवागमन के चक्र में फंसा रहता है। ईश्वर के नाम का जाप पावन मन और सच्ची श्रद्धा से करना चाहिए। डॉक्टर दीवान सिंह लिखते हैं,

9. गुरु का महत्त्व (Importance of the Guru)—गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं। उनके अनुसार गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी है। गुरु ही मनुष्य को अंधकार (अज्ञानता) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर लाता है। सच्चे गुरु का मिलना कोई सरल कार्य नहीं है। ईश्वर की कृपा के बिना मनुष्य को गुरु की प्राप्ति नहीं हो सकती।

10. हुक्म (Hukam)-गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में परमात्मा के हुक्म को विशेष महत्त्व प्राप्त है। हुक्म के कारण ही मनुष्य को सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। गुरवाणी में अनेक स्थानों पर उस वाहिगुरु के हुक्म को मीठा करके मानने का आदेश दिया गया है। जो मनुष्य ऐसा करता है उसे मुक्ति प्राप्त होती है। जो मनुष्य परमात्मा के आदेश को नहीं मानता वह दर-दर की ठोकरें खाता है।

11. सच्च-खंड (Sach Khand)-गुरु नानक देव जी के अनुसार मानव जीवन का उच्चतम उद्देश्य सच्च-खंड को प्राप्त करना है। सच्च-खंड तक पहुँचने के लिए मनुष्य को धर्म-खंड, ज्ञान-खंड, शर्म-खंड तथा कर्म-खंड में से गुज़रना होता है। सच्च-खंड आखिरी अवस्था है। सच्च-खंड में आत्मा पूर्णतया परमात्मा में लीन हो जाती है।

“पापों एवं बुराइयों से ग्रसित मानवता की मुक्ति के लिए केवल नाम ही सबसे प्रभावकारी स्रोत एवं . शक्ति है।”5
5. Nam is the only and most efficacious source and agent for the redemption and salvation of the sinful and self-engrossed mankind.” Dr. Dewan Singh, Mysticism of Guru Nanak (Amritsar : 1995)2. 57.

शिक्षाओं का महत्त्व
(Importance of Teachings)
गुरु नानक देव जी के उपदेशों ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों को पर्याप्त सीमा तक प्रभावित किया। परिणामस्वरूप लोगों को एक नई दिशा मिली। वे व्यर्थ के रस्म-रिवाज छोड़कर एक परमात्मा की पूजा करने लगे। गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का खंडन करके, परस्पर भ्रातृ-भाव का प्रचार करके, स्त्रियों को पुरुषों के समान दर्जा देकर, संगत तथा पंगत नामक संस्थाओं की स्थापना करके एक नए समाज की आधारशिला रखी। गुरु जी ने अपने उपदेशों द्वारा उस समय के अत्याचारी शासकों तथा उनके भ्रष्ट अधिकारियों को भी झकझोर डाला। प्रसिद्ध इतिहासकार . आई० बी० बैनर्जी के अनुसार,
“गुरु नानक का समय अज्ञानता तथा संघर्ष का समय था तथा हम यह बिना झिझक कह सकते हैं कि गुरु नानक का सन्देश सत्य तथा शाँति का संदेश था।”6

6. “The age of Guru Nanak was an age of ignorance and an age of strife, and we may say at . once the message of Nanak was a message of truth and a message of peace.” Dr. I.B. Banerjee Evolution of the Khalsa (Calcutta : 1979) Vol. I, p. 95.

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी की सिख पंथ को देन के संबंध में संक्षिप्त जानकारी दें। (Give a brief account of the contribution of Guru Nanak Dev Ji to Sikhism.)
उत्तर-
15वीं शताब्दी में, जब गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ तो उस समय लोग अज्ञानता के अँधकार में भटक रहा था। समाज में महिलाओं की दशा बहुत खराब थी। गुरु नानक देव जी ने लोगों में नई जागृति उत्पन्न करने के उद्देश्य से देश तथा विदेश की यात्राएँ की। गुरु जी ने संगत तथा पंगत नामक संस्थाओं की नींव डाली। गुरु नानक देव जी ने 1539 ई० में ज्योति-जोत समाने से पूर्व अंगद देव जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गुरु अंगद देव जी की नियुक्ति सिख पंथ के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण प्रमाणित हुई।

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प्रश्न 2.
उदासियों से क्या भाव है ? गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ?
(What do you mean by Udasis ? What were the aims of Guru Nanak Dev Ji’s Udasis ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ? (What were the aims of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी द्वारा विभिन्न दिशाओं में की गई यात्राओं को उनकी उदासियाँ कहा जाता है। इन उदासियों का उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता तथा अंधविश्वास को दूर करना था। वह एक ईश्वर की पूजा तथा भाईचारे का संदेश जन-साधारण तक पहुंचाना चाहते थे। गुरु नानक साहिब ने लोगों को अपने विचारों से अवगत कराया। उन्होंने समाज में प्रचलित झठे रीति-रिवाजों, कर्मकांडों तथा कुप्रथाओं का खंडन किया। उनकी यात्रा का प्रमुख उद्देश्य धर्म के वास्तविक रूप को लोगों के समक्ष लाना था।

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (Give a brief account of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं तीन महत्त्वपूर्ण उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें। (Give a brief account of any three important Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी ने अपनी प्रथम उदासी सैदपुर से शुरू की। मलिक भागों द्वारा पूछने पर गुरु जी ने बताया कि हमें मेहनत की कमाई से गुजारा करना चाहिए न कि बेईमानी के पैसों से।।
  2. हरिद्वार में गुरु नानक देव जी ने लोगों को यह बात समझाई कि गंगा स्नान करने से या पितरों को पानी देने से कुछ प्राप्त नहीं होता।
  3. मक्का में गुरु जी ने यह प्रमाणित किया कि अल्लाह किसी विशेष स्थान पर नहीं अपितु प्रत्येक स्थान पर विद्यमान है।

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का सार लिखिए।
(Write an essence of the teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the teachings of Guru Nanak Dev Ji ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं तीन शिक्षाओं का वर्णन कीजिए। (Describe any three teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर एक है। वह निराकार तथा सर्वव्यापक है।
  2. गुरु जी माया को मुक्ति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानते थे।
  3. गुरु जी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को मनुष्य के पाँच शत्रु बताते हैं। इनके कारण मनुष्य आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।
  4. गुरु नानक देव जी ने मूर्ति पूजा का खंडन किया।
  5. गुरु नानक देव जी के अनुसार मनमुख व्यक्ति में अहंकार की भावना बहुत प्रबल होती है।

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प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी के ईश्वर संबंधी क्या विचार थे ? (What was Guru Nank Dev Ji’s concept of God ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के ईश्वर संबंधी क्या विचार थे ? (What were the views of Guru Nanak Dev Ji about God ?)
उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने ईश्वर की एकता पर बल दिया।
  2. केवल ईश्वर ही संसार को रचने वाला, पालने वाला तथा नाश करने वाला है।
  3. ईश्वर के दो रूप हैं। वह निर्गुण भी है और सगुण भी।
  4. ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। उसकी इच्छा के विपरीत कुछ नहीं हो सकता।
  5. वह आवागमन के चक्र से मुक्त है।

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी ने किन प्रचलित धार्मिक विश्वासों तथा प्रथाओं का खंडन किया ?
(Which prevalent religious beliefs and conventions were condemned by Guru Nanak Dev Ji ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी ने कौन-से प्रचलित धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों का खंडन किया ? (What type of religious beliefs and rituals were condemned by Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने समाज में प्रचलित समस्त अंधविश्वासों तथा व्यवहारों का ज़ोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने वेद, शास्त्र, मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा, तथा जीवन के विभिन्न महत्त्वपूर्ण अवसरों से संबंधित संस्कारों का विरोध किया। ब्राह्मण इन रस्मों के मुख्य समर्थक थे। उन्होंने जोगियों की पद्धति को भी दो कारणों से स्वीकार न किया। प्रथम, जोगियों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा का अभाव था। दूसरा, वे अपने सामाजिक दायित्व से दूर भागते थे। गुरु नानक देव जी अवतारवाद में भी विश्वास नहीं रखते थे।

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी का माया का संकल्प क्या है ? संक्षिप्त उत्तर दीजिए।
(What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of Maya ? Explain in brief.)
अथवा
गुरु नानक देव जी के माया के संकल्प का वर्णन कीजिए।
(Describe Guru Nanak Dev Ji’s concept of Maya.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी मानते थे कि माया मनुष्य के लिए मुक्ति के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुओं जैसे धन-दौलत, उच्च पद, सुंदर नारी, पुत्र आदि के चक्रों में फंसा रहता है। इसे ही माया कहते हैं। माया जिससे वह इतना प्रेम करता है, उसका मौत के बाद साथ नहीं देती। माया के कारण वह आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।

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प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में गुरु का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Guru’ in Guru Nanak Dev Ji’s teachings ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के गुरु संबंधी क्या विचार थे ? (What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of ‘Guru’ ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु को एक वास्तविक सीढ़ी मानते हैं। वह ही मनुष्य को मोह और अहं के रोग से दूर करता है। वही नाम और शब्द की आराधना करने का ढंग बताता है। गुरु के बिना भक्ति भाव और ज्ञान संभव है। गुरु के बिना मनुष्य को चारों और अँधकार दिखाई देता है। गुरु ही मनुष्य को अँधकार से प्रकाश की ओर लाता है। सच्चा गुरु ईश्वर स्वयं है, जो शब्द द्वारा शिक्षा देता है।

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में ‘नाम’ का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Nam’ in Guru Nanak.Dev Ji’s teachings ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी नाम की आराधना को ईश्वर की भक्ति का सर्वोच्च रूप समझते थे। नाम आराधना के कारण मनुष्य इस रोगग्रस्त अथवा कष्टमयी संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। नाम की आराधना करने वाले मनुष्य के सभी भ्रम दूर हो जाते हैं तथा उसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है। उसकी आत्मा सदैव एक कमल के फूल की तरह खिली रहती है। ईश्वर के नाम के बिना मनुष्य का इस संसार में आना व्यर्थ है। नाम के बिना मनुष्य सभी प्रकार के पापों और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है। ईश्वर उसे नरक से नहीं बचा सकता।

प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में हुक्म का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Hukam’ in Guru Nanak Dev Ji’s teachings ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में परमात्मा के हुक्म अथवा भाणे को विशेष महत्त्व प्राप्त है। सारा संसार उस परमात्मा के हुक्म के अनुसार चलता है। उसके हुक्म के अनुसार ही जीव इस संसार में जन्म लेता है या उसकी मृत्यु होती है। उसे प्रशंसा प्राप्त होती है अथवा वह नीच बन जाता है। हुक्म के कारण ही उसे सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के हुकम को नहीं मानता वह दर-दर की ठोकरे खाता है।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी के स्त्री जाति संबंधी क्या विचार थे ? (What were the views of Guru-Nanak Dev Ji about women ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। समाज में स्त्रियों का स्थान पुरुषों के समान नहीं समझा जाता था। गुरु नानक देव जी बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा सती प्रथा के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने का समर्थन किया। इस संबंध में उन्होंने स्त्रियों को संगत एवं पंगत में सम्मिलित होने की आज्ञा दी।

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी के संदेश का सामाजिक अर्थ क्या था ? (What was the social meaning of Guru Nanak Dev Ji’s message ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पंजाब पर क्या प्रभाव पड़ा ? (What was the impact of teachings of Guru Nanak Dev Ji on Punjab ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के संदेश के सामाजिक अर्थ बहुत महत्त्वपूर्ण थे। उनका संदेश प्रत्येक के लिए था। कोई भी स्त्री-पुरुष गुरु जी द्वारा दर्शाए गए मार्ग को अपना सकता था। मुक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था। गुरु जी ने सामाजिक समानता का प्रचार किया। उन्होंने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। सामाजिक समानता के संदेश को व्यावहारिक रूप देने के लिए गुरु जी ने संगत तथा पंगत (लंगर) नामक दो संस्थाएँ चलाईं। लंगर तैयार करते समय जाति-पाति का कोई भेद-भाव नहीं किया जाता था।

प्रश्न 13.
जाति प्रथा पर गुरु नानक देव जी के क्या विचार थे? (What were the views of Guru Nanak Dev Ji on caste system ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उनका प्रमुख उद्देश्य सामाजिक असमानता को दूर करना था। गुरु नानक देव जी का कथन था कि कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के कारण अमीर अथवा ग़रीब नहीं होता। परमात्मा के दरबार में जाति नहीं अपितु कर्मों के अनुसार फल मिलता है। गुरु नानक देव जी ने निम्न जातियों एवं निम्न वर्गों के लोगों को अपने साथ जोड़ा।

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प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ भक्ति प्रचारकों से किस प्रकार भिन्न थीं ?
(How far were the teachings of Guru Nanak Dev Ji different from the Bhakti reformers ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा निराकार है। वह कभी भी मानवीय रूप को घारण नहीं करता। भक्ति प्रचारकों ने कृष्ण तथा राम को परमात्मा का अवतार माना। गुरु नानक देव जी मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे। जबकि भक्ति प्रचारकों का इसमें पूर्ण विश्वास था। गुरु नानक देव जी गृहस्थ जीवन में विश्वास रखते थे। भक्ति प्रचारक गृहस्थ जीवन को मुक्ति की राह में आने वाली एक बड़ी रुकावट मानते थे। गुरु नानक देव जी ने संगत तथा पंगत नामक दो संस्थाएँ स्थापित की। भक्ति प्रचारकों ने ऐसी कोई संस्था स्थापित नहीं की।

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी एक महान् कवि और संगीतकार थे। इसकी व्याख्या करें।
(Guru Nanak Dev Ji was a great poet and musician. Explain.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी एक धार्मिक महापुरुष होने के साथ-साथ एक महान् संगीतकार तथा कवि भी थे। आपकी कविताओं के मुकाबले की कविताएँ विश्व साहित्य में भी बहुत कम हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित आप जी के 976 शब्द आपके महान् कवि होने का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। गुरु नानक देव जी ने इन कविताओं में परमात्मा तथा मानवता का गुणगान किया है। इनमें उच्चकोटि के अलंकरणों तथा उपमाओं का प्रयोग किया गया है। गुरु नानक देव जी कई प्रकार के रागों की जानकारी रखते थे। उनके कीर्तन का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ता था।

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष कहाँ तथा कैसे व्यतीत किए ? (How and where did Guru Nanak Dev Ji spend last 18 years of his life ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने करतारपुर (अर्थात् ईश्वर का नगर) मामक नगर की स्थापना की। इसी स्थान पर गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की । ‘संगत’ से अभिप्राय उस सभा से था जो प्रतिदिन गुरु जी के उपदेशों को सुनने के लिए होती थी। ‘पंगत’ से अभिप्राय था- एक पंक्ति में बैठकर लंगर छकना। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शब्दों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी का जन्म कब हुआ ?
उत्तर-
1469 ई०।

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर-
तलवंडी (पाकिस्तान)।

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प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान को आजकल क्या कहा जाता है ?
उत्तर-
ननकाणा साहिब।

प्रश्न 5.
“सतगुरु नानक प्रगटिआ मिटी धुंधु जागु चानणु होआ” किसने कहा था?
उत्तर-
भाई गुरदास जी।

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर-
मेहता कालू जी।

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प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी के पिता जी किस जाति से संबंधित थे?
उत्तर-
बेदी।

प्रश्न 8.
मेहता कालू जी कौन थे?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के पिता।

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी की माता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-
तृप्ता जी।

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प्रश्न 10.
तृप्ता जी कौन थी?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की माता जी।

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी की बहन का क्या नाम था ?
उत्तर-बेबे नानकी जी।

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी की पत्नी का क्या नाम था ?
अथवा
गुरु नानक देव जी का विवाह किसके साथ हुआ था?
उत्तर-
बीबी सुलक्खनी जी से।

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प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी ने सच्चा सौदा कितने रुपयों के साथ किया?
उत्तर-
20 रुपयों के साथ।

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी को सुल्तानपुर लोधी क्यों भेजा गया?
उत्तर-
नौकरी करने के लिए।

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति कब हुई ?
उत्तर-
1499 ई०

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प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी ने ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम कौन-से शब्द कहे?
अथवा
गुरु नानक साहिब ने किस स्थान से तथा किन शब्दों से सर्वप्रथम प्रचार आरंभ किया?
उत्तर-
“न को हिंदू न को मुसलमान”

प्रश्न 17.
गुरु नानक देव जी की उदासियों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की उदासियों से अभिप्राय उनकी यात्राओं से है।

प्रश्न 18.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का क्या उद्देश्य था?
उत्तर-
लोगों में फैली अज्ञानता और अंधविश्वासों को दूर करना।

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प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी ने अपनी प्रथम उदासी कब आरंभ की?
उत्तर-
1499 ई०।

प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासी कहाँ से आरंभ की?
उत्तर-
सैदपुर।

प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी ने अपनी प्रथम उदासी के दौरान जिन स्थानों पर चरण रखे, उनमें से किसी एक महत्त्वपूर्ण स्थान का नाम बताएँ।
उत्तर-
कुरुक्षेत्र।

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प्रश्न 22.
उदासियों के समय गुरु नानक देव जी का साथी कौन था ?
उत्तर-
भाई मरदाना जी।

प्रश्न 23.
भाई मरदाना कीर्तन के समय कौन-सा साज़ बजाता था ?
उत्तर-
रबाब।

प्रश्न 24.
श्री गुरु नानक देव जी सैदपुर में किसके घर ठहरे थे ?
अथवा
गुरु नानक देव जी का प्रथम शिष्य कौन था ?
उत्तर-
भाई लालो।

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प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने सैदपुर (ऐमनाबाद) में मलिक भागो का भोजन खाने से क्यों इंकार कर दिया था?
उत्तर-
क्योंकि उसकी कमाई ईमानदारी की नहीं थी।

प्रश्न 26.
गुरु नानक देव जी सज्जन ठग को कहाँ मिले ?
अथवा
श्री गुरु नानक देव जी की सज्जन के साथ मुलाकात कहाँ हुई थी ?
उत्तर-
तालुंबा में।

प्रश्न 27.
गुरु नानक देव जी ने किस स्थान पर पूर्व की अपेक्षा पश्चिम दिशा में अपने खेतों को पानी दिया?
उत्तर-
हरिद्वार।

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प्रश्न 28.
गुरु नानक देव जी पानीपत में किस सूफ़ी से मिले ?
उत्तर-
शेख ताहिर से।

प्रश्न 29.
गुरु नानक देव जी की उदासी के बाद गोरखमता का क्या नाम पड़ा?
उत्तर-
नानकमता।

प्रश्न 30.
नूरशाही कौन थी?
उत्तर-
कामरूप की प्रसिद्ध जादूगरनी।

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प्रश्न 31.
उड़ीसा के किस मंदिर में गुरु साहिब ने लोगों को आरती का सही अर्थ बताया?
उत्तर-
जगन्नाथ पुरी।

प्रश्न 32.
गुरु नानक साहिब ने कैलाश पर्वत के सिद्धों को क्या उपदेश दिया?
उत्तर-
वह मानवता की सेवा करें।

प्रश्न 33.
गुरु नानक देव जी लंका के किस शासक को मिले थे ?
उत्तर-
शिवनाथ।

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प्रश्न 34.
गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासियों के दौरान किस स्थान पर काबे को घुमाया?
उत्तर-
मक्का

प्रश्न 35.
मक्का में गुरु नानक देव जी का किस काजी के साथ वाद-विवाद हुआ?
उत्तर-
रुकनुद्दीन।

प्रश्न 36.
हसन अब्दाल को अब किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर-
पंजा साहिब।

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प्रश्न 37.
श्री गुरु नानक देव जी बगदाद में किस शेख को मिले ?
उत्तर-
शेख बहलोल।

प्रश्न 38.
गुरु नानक देव जी को बाबर ने कब गिरफ्तार किया था?
उत्तर-
1520 ई०।

प्रश्न 39.
गुरु नानक देव जी का समकालीन मुग़ल बादशाह कौन था?
उत्तर-
बाबर।

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प्रश्न 40.
गुरु नानक देव जी ने सैदपुर आक्रमण की तुलना किसके साथ की है?
उत्तर-
पाप की बारात।

प्रश्न 41.
गुरु नानक देव जी की कोई एक मुख्य शिक्षा बताएँ।
उत्तर-
ईश्वर एक है।

प्रश्न 42.
गुरु नानक देव जी का माया का संकल्प क्या था?
उत्तर-
संसार एक माया है।

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प्रश्न 43.
गुरु नानक देव जी के अनुसार मनुष्य के पाँच दुश्मन कौन-से हैं ?
उत्तर-
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार।

प्रश्न 44.
गुरु नानक देव जी की शिक्षा में गुरु का क्या महत्त्व है?
अथवा
सिख धर्म में गुरु को क्या महत्त्व दिया गया है?
उत्तर-
गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी है।

प्रश्न 45.
गुरु नानक देव जी के अनुसार नाम जपने का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
नाम के बिना मनुष्य का इस संसार में आना व्यर्थ है।

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प्रश्न 46.
मनमुख व्यक्ति की कोई एक विशेषता बताएँ।
उत्तर-
मनमुख व्यक्ति इंद्रिय-जन्य भूख से घिरा रहता है।

प्रश्न 47.
आत्म-समर्पण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
अहं का त्याग।

प्रश्न 48.
‘नदिर’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
ईश्वर की दया।

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प्रश्न 49.
हुक्म शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
ईश्वर की इच्छा।

प्रश्न 50.
‘किरत’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
मेहनत तथा इमानदारी का श्रम।

प्रश्न 51.
अंजन माहि निरंजन’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
संसार की बुराइयों में रहते हुए सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना।

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प्रश्न 52.
गुरु नानक देव जी ने अपने अनुयायियों को कौन-सी तीन बातों पर चलने को कहा?
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का सार तीन शब्दों में बताएँ।
उत्तर-
श्रम करो, नाम जपो तथा बाँट कर खाओ।

प्रश्न 53.
कीर्तन की प्रथा किस गुरु जी ने आरंभ की?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

प्रश्न 54.
रावी के किनारे गुरु नानक देव जी ने कौन-सा नगर बसाया?
उत्तर-
करतारपुर।

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प्रश्न 55.
करतारपुर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
‘ईश्वर का नगर’। प्रश्न 56. करतारपुर में गुरु नानक देव जी ने कौन-सी दो संस्थाएँ स्थापित की? उत्तर-‘संगत और पंगत’।

प्रश्न 57.
संगत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
संगत से अभिप्राय उस समूह से है जो एकत्रित होकर गुरु जी के उपदेश सुनते हैं।

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प्रश्न 58.
पंगत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
पंक्तियों में बैठकर लंगर खाना।

प्रश्न 59.
लंगर प्रथा का आरंभ किस गुरु साहिब ने किया?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

प्रश्न 60.
गुरु नानक देव जी तथा भक्तों की शिक्षाओं में कोई एक अंतर बताएँ।
उत्तर-
गुरु नानक देव जी मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे जबकि भक्त नहीं।

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प्रश्न 61.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन का अंतिम समय कहाँ व्यतीत किया?
अथवा
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष कहाँ व्यतीत किए ?
उत्तर-
करतारपुर।

प्रश्न 62.
गुरु नानक देव जी कब ज्योति-जोत समाए थे?”
उत्तर-
1539 ई० में।

प्रश्न 63.
गुरु नानक देव जी कहाँ ज्योति-जोत समाए ?
उत्तर-
करतारपुर (पाकिस्तान)।

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प्रश्न 64.
गुरु नानक देव जी ने किसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी।

प्रश्न 65.
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अंगद देव का नाम क्यों दिया?
उत्तर-
क्योंकि वह भाई लहणा जी को अपने शरीर का एक अंग समझते थे।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
……………. में गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ।
उत्तर-
(1469 ई०)

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प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी के पिता जी का नाम ………….. जी था।
उत्तर-
(मेहता कालू)

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की बहन का नाम ……………… जी था।
उत्तर-
(बेबे नानकी)

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की माता जी का नाम ………………. जी था।
उत्तर-
(तृप्ता )

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प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी ने सच्चा सौदा …………. रुपयों से किया।
उत्तर-
(20)

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी ने ……………….. के मोदीखाने में नौकरी की।
उत्तर-
(सुल्तानपुर लोधी)

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी के ज्ञान-प्राप्ति के समय उनकी आयु ………… थी।
उत्तर-
(30 वर्ष)

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प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी ने ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम …………….. शब्द कहे।
उत्तर-
(न को हिंदू, न.को मुसलमान)

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी की उदासियों से भाव है …………..।
उत्तर-
(यात्राएँ)

प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी ने पहली उदासी ………….. ई० में शुरू की।
उत्तर-
(1499)

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प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी ने यात्राओं के समय …………….. सदैव उनके साथ रहता था।
उत्तर-
(भाई मरदाना)

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी के अपनी पहली यात्रा के दौरान सबसे पहले …………….. नामक स्थान पर गए।
उत्तर-
(सैदपुर)

प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी की सज्जन ठग के साथ मुलाकात जन ठग के साथ मुलाकात …………….. में हुई।
उत्तर-
(तालुंबा)

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प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी ने …………… में अपने खेतों को पानी दिया।
उत्तर-
(हरिद्वार)

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी ने ……………. में परमात्मा की वास्तविक आरती के महत्त्व के बारे में बताया।
उत्तर-
(जगन्नाथ पुरी)

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी की सिद्धों के साथ मुलाकात …………… में हुई थी।
उत्तर-
(कैलाश पर्वत)

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प्रश्न 17.
गुरु नानक देव जी मक्का यात्रा के समय वहाँ के काजी का नाम ……………… था।
उत्तर-
(रुकनुद्दीन)

प्रश्न 18.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष …………… में व्यतीत किए।
उत्तर-
(करतारपुर)

प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी ने …………….. और …………… नामक दो संस्थाओं की स्थापना की।
उत्तर-
(संगत, पंगत)

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प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ………….. परमात्मा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
(एक)

प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा और मूर्ति पूजा का ……………… किया।
उत्तर-
(खंडन)

प्रश्न 22.
गुरु नानक देव जी के अनुसार मनुष्य के ……………. शत्रु हैं।
उत्तर-
(पाँच)

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प्रश्न 23.
गुरु नानक देव जी के अनुसार मानव जीवन का उच्चतम उद्देश्य ……………… को प्राप्त करना है।
उत्तर-
(सच्च-खंड)

प्रश्न 24.
गुरु नानक देव जी ……………….. में ज्योति-ज्योत समाए।
उत्तर-
(1539 ई०)

प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने ……………… को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
उत्तर-
(भाई लहणा जी)

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(ii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ई० में हुआ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी के पिता जी का नाम मेहता काल जी था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की माता का नाम सभराई देवी जी था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी की बहन का नाम बेबे नानकी जी था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी बेदी जाति के साथ संबंधित थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी ने 40 रुपयों से सच्चा सौदा किया।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी का विवाह अमृतसर निवासी बीबी सुलक्खनी जी के साथ किया गया था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी के दो पुत्रों के नाम श्रीचंद और लख्मी दास थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी ने गोइंदवाल साहिब के मोदीखाने में नौकरी की थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी ने ज्ञान प्राप्ति के बाद ‘म को हिंदू, न को मुसलमान’ नामक शब्द कहे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
ज्ञान प्राप्ति के समय गुरु नानक देव जी की आयु 35 वर्ष थी।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी की उदासियों से भाव उनकी यात्राओं से हैं।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी ने अपनी पहली उदासी सैदपुर से आरंभ की।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी सैदपुर में मलिक भागो के घर ठहरे थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी कुरुक्षेत्र में सज्जन ठग से मिले।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 17.
गुरु नानक देव जी ने हरिद्वार से अपने खेतों को पानी दिया था। .
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 18.
गुरु नानक देव जी ने जगन्नाथ पुरी में पंडितों को वास्तविक आरती की जानकारी दी।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 19.
मक्का में गुरु नानक देव जी काबे की ओर पैर करके सो गए थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ने संगत और पंगत नामक दो संस्थाओं की स्थापना की थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी एक परमात्मा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 22.
गुरु नानक देव जी जाति प्रथा और मूर्ति पूजा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 23.
गुरु नानक देव जी स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार देने के पक्ष में थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 24.
गुरु नानक देव जी 1539 ई० में ज्योति-ज्योत समाए।
उत्तर-
ठीक

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
(i) गुरु नानक देव जी
(ii) गुरु अंगद देव जी
(iii) गुरु हरगोबिंद जी
(iv) गुरु गोबिंद सिंह जी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी का जन्म कब हुआ ?
(i) 1459 ई० में
(ii) 1469 ई० में
(iii) 1479 ई० में
(iv) 1489 ई० में।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी का जन्म स्थान कौन-सा था ? ।
(i) कीरतपुर साहिब
(ii) करतारपुर
(iii) तलवंडी
(iv) लाहौर।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी के पिता जी का क्या नाम था ?
(i) मेहता कालू जी
(ii) जैराम जी
(iii) श्री चंद जी
(iv) फेरुमल जी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी की माता जी का क्या नाम था ?
(i) खीवी जी
(ii) तृप्ता जी
(iii) नानकी जी
(iv) गुजरी जी।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन गुरु नानक देव जी की बहन थी ?
(i) बेबे नानकी जी
(ii) भानी जी
(iii) दानी जी
(iv) खीवी जी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी ने सच्चा सौदा कितने रुपयों में किया था ?
(i) 10
(ii) 20
(iii) 30
(iv) 50
उत्तर-
(i)

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी की पत्नी का क्या नाम था ?
(i) गंगा देवी जी
(ii) सुलक्खनी जी
(iii) बीबी वीरो जी
(iv) बीबी भानी जी।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 9.
मेहता कालू ने गुरु नानक देव जी को कहाँ नौकरी करने के लिए भेजा था ?
(i) मुलतान
(ii) सीतापुर
(iii) सुल्तानपुर लोधी
(iv) कीरतपुर साहिब।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 10.
ज्ञान प्राप्ति के समय गुरु नानक देव जी की आयु कितनी थी ?
(i) 20 साल
(ii) 22 साल
(iii) 26 साल
(iv) 30 साल।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का उद्देश्य क्या था ?
(i) लोगों में फैले अन्धविश्वास को दूर करना
(ii) नाम का प्रचार करना
(iii) आपसी भाईचारे का प्रचार करना
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी ने अपनी पहली उदासी कहाँ से आरंभ की ?
(i) गोरखमता
(ii) हरिद्वार
(iii) सैदपुर
(iv) कुरुक्षेत्र।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी की मुलाकात सजन ठग से कहाँ हुई थी ?
(i) तालुंबा में
(ii) सैदपुर में।
(iii) दिल्ली में
(iv) धुबरी में।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी जादूगरनी नूरशाही को कहाँ मिले थे ?
(i) गया
(ii) कामरूप
(iii) धुबरी में
(iv) बनारस।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 15.
किस स्थान पर गुरु नानक साहिब ने बताया परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है ?
(i) हरिद्वार
(ii) कुरुक्षेत्र
(iii) बनारस
(iv) जगन्नाथ पुरी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी श्री लंका में किस शासक से मिले थे ?
(i) कृष्णदेव राय
(ii) भोलेनाथ
(ii) शिवनाथ
(iv) शंकर देव।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 17.
निम्नलिखित में से किस स्थान को आजकल पंजा साहिब के नाम से जाना जाता है ?
(i) पाकपटन
(ii) स्यालकोट
(iii) हसन अब्दाल
(iv) गोरखमता।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 18.
मक्का में कौन-से काज़ी ने गुरु नानक देव जी को काबे की तरफ पाँव करके सोने से रोका था?
(i) बहाउदीन
(ii) कुतुबुदीन
(iii) रुकनुदीन
(iv) शमसुदीन।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी की बगदाद में किसके साथ मुलाकाल हुई ?
(i) सज्जन ठग
(ii) शेख बहलोल
(iii) बाबर
(iv) चैतन्य महाप्रभु।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ने करतारपुर में कब निवास किया ?
(i) 1519 ई० में
(ii) 1520 ई० में
(iii) 1521 ई० में
(iv) 1522 ई० में।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा का क्या स्वरूप है ?
(i) वह सर्वशक्तिमान है
(ii) वह सदैव रहने वाला है
(iii) वह निर्गुण और सगुण है
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 22.
निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता मनमुख व्यक्ति की नहीं है ?
(i) वह माया के चक्कर में फंसा रहता है।
(ii) वह सदैव नाम का जाप करता है
(iii) उसमें हऊमै की भावना रहती है
(iv) वह सदैव इंद्रियजन्य भूख से घिरा रहता है।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 23.
गुरु नानक देव जी ने निम्नलिखित में से किसका खंडन नहीं किया ?
(i) पुरोहित वर्ग का
(i) जाति प्रथा का
(iii) मूर्ति पूजा का
(iv) स्त्री पुरुष की बराबरी का।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 24.
गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा तक पहुँचने का कौन-सा साधन अपनाना चाहिए ?
(i) नाम का जाप करना
(ii) सच्चे गुरु को मिलना
(iii) परमात्मा का हुक्म मानना
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने मनुष्य के कितने शत्रु बताएँ हैं ?
(i) दो
(ii) तीन
(iii) चार
(iv) पाँच।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 26.
गुरु नानक देव जी ने निम्नलिखित में से कौन-से सिद्धांत पर चलने के लिए प्रत्येक मनुष्य के लिए ज़रूरी बताया ?
(i) किरत करना
(ii) नाम जपना
(iii) बाँट छकना
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 27.
कीर्तन की प्रथा किस गुरु ने आरंभ की ?
(i) गुरु नानक देव जी ने
(ii) गुरु अमरदास जी ने
(iii) गुरु अर्जन देव जी ने
(iv) गुरु गोबिंद सिंह जी ने।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 28.
निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य प्रमाणित करता है कि गुरु नानक देव जी एक क्रांतिकारी थे ?
(i) नई संस्थाओं की स्थापना
(i) जाति प्रथा का विरोध
(iii) मूर्ति पूजा का खंडन
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 29.
गुरु नानक देव जी ने अपना उत्तराधिकारी किसे नियुक्त किया ?
(i) भाई जेठा जी
(ii) भाई दुर्गा जी
(iii) भाई लहणा जी
(iv) श्री चंद जी।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 30.
गुरु नानक देव जी कब ज्योति-जोत समाए थे ?
(i) 1519 ई० में
(ii) 1529 ई० में
(iii) 1539 ई० में
(iv) 1549 ई० में।
उत्तर-
(iii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी की सिख पंथ को देन के संबंध में संक्षिप्त जानकारी दें। (Give a brief account of the contribution of Guru Nanak Dev Ji to Sikhism.)
उत्तर-
15वीं शताब्दी में, जब गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ तो उस समय भारत की राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक दशा बहुत शोचनीय थी। मुसलमान शासक वर्ग से संबंधित थे। वे हिंदुओं से बहुत घृणा करते थे और उन पर भारी अत्याचार करते थे। धर्म केवल एक दिखावा बन कर रह गया था। लोग अज्ञानता के अंधकार में भटक रहे थे। समाज में महिलाओं की दशा बहुत खराब थी। गुरु नानक देव जी ने लोगों में प्रचलित अंधविश्वासों को दूर करने के लिए तथा उनमें नई जागृति उत्पन्न करने के उद्देश्य से देश तथा विदेश की यात्राएँ कीं। इन यात्राओं के दौरान गुरु जी ने लोगों से एक ईश्वर की पूजा करने, आपसी भ्रातृत्व, महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने, शुद्ध व पवित्र जीवन व्यतीत करने तथा अंध-विश्वासों को त्यागने का.प्रचार किया। गुरु जी जहाँ भी गए उन्होंने अपने उपदेशों द्वारा लोगों पर गहरा प्रभाव डाला। गुरु जी ने शासक वर्ग तथा उसके कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उन्होंने संगत तथा पंगत नामक संस्थाओं की नींव रखी। गुरु जी के जीवन काल में ही एक नया भाईचारा अस्तित्व में आ चुका था। गुरु नानक देव जी ने 1539 ई० में ज्योति-जोत समाने से पूर्व अंगद देव जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गुरु अंगद देव जी की नियुक्ति सिख पंथ के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण प्रमाणित हुई।

प्रश्न 2.
उदासियों से क्या भाव है ? गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ? (What do you mean by Udasis ? What were the aims of Guru Nanak Dev Ji’s Udasis ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ?
(What were the aims of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की उदासियों से अभिप्राय उनकी यात्राओं से था। गुरु नानक देव जी की उदासियों का मुख्य उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता तथा अंध-विश्वासों को दूर करना था। वह एक ईश्वर की पूजा तथा आपसी भ्रातृत्व का संदेश जन-साधारण तक पहुँचाना चाहते थे। उस समय हिंदू तथा मुसलमान दोनों ही धर्म के वास्तविक सिद्धांतों को भूल कर अपने मार्ग से भटक चुके थे। पुरोहित वर्ग जिसका मुख्य कार्य भटके हुए लोगों का उचित दिशा निर्देशन करना था, वह स्वयं ही भ्रष्ट हो चुका था। जब धर्म के ठेकेदार स्वयं ही अंधकार में भटक रहे हों तो जन-साधारण की दशा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। लोगों ने अनगिनत देवी-देवताओं, कब्रों, वृक्षों, साँपों तथा पत्थरों आदि की पूजा आरंभ कर दी थी। इस प्रकार धर्म की सच्ची भावना समाप्त हो चुकी थी। समाज जातियों तथा उपजातियों में विभाजित था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। समाज में महिलाओं की दशा दयनीय थी। उन्हें पुरुषों के समान नहीं समझा जाता था। गुरु नानक देव जी ने अज्ञानता के अंधेरे में भटक रहे इन लोगों को प्रकाश का एक नया मार्ग दिखाने के लिए यात्राएँ कीं।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की प्रमुख उदासियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (Give a brief account of the main Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं छः महत्त्वपूर्ण उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Give a brief account of any six important Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
1. सैदपुर-गुरु नानक देव जी अपनी प्रथम उदासी के दौरान सर्वप्रथम सैदपुर पहुंचे। यहाँ पहुँचने पर मलिक भागो ने गुरु साहिब को एक ब्रह्मभोज पर निमंत्रण दिया, परंतु गुरु साहिब एक निर्धन बढ़ई भाई लालो के घर ठहरे। जब इस संबंध में मलिक भागो ने गुरु नानक देव जी से पूछा तो उन्होंने एक हाथ में मलिक भागो के भोज और दूसरे हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी लेकर ज़ोर से दबाया। मलिक भागो के भोज से खून और भाई लालो की रोटी में से दूध निकला। इस प्रकार गुरु साहिब ने उसे बताया कि हमें श्रम तथा ईमानदारी की कमाई करनी चाहिए।

2. तालुंबा-तालुंबा में गुरु नानक देव जी की भेंट सज्जन ठग से हुई। उसने यात्रियों के लिए अपनी हवेली में एक मंदिर और मस्जिद बनाई हुई थी। वह दिन के समय तो यात्रियों की खूब सेवा करता, किंतु रात के समय उन्हें लूटकर कुएँ में फेंक देता था। वह गुरु नानक देव जी और मरदाना के साथ भी कुछ ऐसा ही करने की योजनाएँ बना रहा था। रात्रि के समय जब गुरु नानक देव जी ने वाणी पढ़ी तो सज्जन ठग गुरु साहिब के चरणों में गिर पड़ा। गुरु नानक देव जी ने उसे क्षमा कर दिया। इस घटना के पश्चात् सज्जन ने अपना शेष जीवन सिख धर्म का प्रचार करने में व्यतीत किया। .

3. गोरखमता-हरिद्वार के पश्चात् गुरु नानक देव जी गोरखमता पहुँचे। गुरु नानक देव जी ने यहाँ के सिद्ध योगियों को बताया कि कानों में कुंडल पहनने, शरीर पर विभूति रमाने, बँख बजाने से अथवा सिर मुंडवा देने से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। मुक्ति तो आत्मा की शुद्धि से प्राप्त होती है। ये योगी गुरु नानक देव जी के उपदेशों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उस समय से ही गोरखमता का नाम नानकमता- पड़ गया।

4. हसन अब्दाल-गुरु नानक देव जी पंजाब की वापसी यात्रा के समय हसन अब्दाल ठहरे। यहाँ एक अहँकारी फकीर वली कंधारी ने गुरु नानक देव जी को कुचलने के उद्देश्य से एक बहुत बड़ा पत्थर पहाड़ी से नीचे की ओर लुढ़का दिया। गुरु साहिब ने इसे अपने पंजे से रोक दिया। इस स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।

5. मक्का -मक्का हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म स्थान है। सिख परंपरा के अनुसार गुरु नानक देव जी जब मक्का पहुँचे तो वह काअबे की ओर पाँव करके सो गए। जब काज़ी रुकनुद्दीन ने यह देखा तो वह क्रोधित हो गया। गुरु साहिब ने उसे समझाया कि अल्लाह सर्वव्यापक है।

6. जगन्नाथ पुरी-असम की यात्रा के पश्चात् गुरु नानक देव जी उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी पहुँचे। पंडितों ने गुरु साहिब को जगन्नाथ देवता की आरती करने के लिए कहा। गुरु नानक साहिब ने उन्हें बताया कि उस परम पिता परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है।

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की प्रथम उदासी का वर्णन करो।
(Give a brief account of the first Udasi of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने 1499 ई० के अंत में अपनी पहली यात्रा आरंभ की। इन यात्राओं के समय भाई मरदाना उनके साथ रहा। इस यात्रा को गुरु नानक देव जी ने 12 वर्ष में संपूर्ण किया और वह पूर्व से दक्षिण की ओर गए। इस यात्रा के दौरान गुरु जी ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. सैदपुर-गुरु नानक देव जी अपनी प्रथम उदासी के दौरान सर्वप्रथम सैदपुर पहुँचे। यहाँ पहुँचने पर मलिक भागो ने गुरु साहिब को एक ब्रह्मभोज पर निमंत्रण दिया, परंतु गुरु साहिब एक निर्धन बढ़ई भाई लालो के घर ठहरे। जब इस संबंध में मलिक भागो ने गुरु नानक देव जी से पूछा तो उन्होंने एक हाथ में मलिक भागो के भोज और दूसरे हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी लेकर ज़ोर से दबाया। मलिक भागो के भोज से खून और भाई लालो की रोटी में से दूध निकला। इस प्रकार गुरु साहिब ने उसे बताया कि हमें श्रम तथा ईमानदारी की कमाई करनी चाहिए।

2. कुरुक्षेत्र-गुरु नानक देव जी सूर्य ग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र पहुँचे। इस अवसर पर हज़ारों ब्राह्मण और साधु एकत्रित हुए थे। गुरु साहिब ने ब्राह्मणों को समझाया कि हमें सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। गुरु जी के विचारों से प्रभावित होकर अनेक लोग उनके अनुयायी बन गए।

3. गोरखमता-हरिद्वार के पश्चात् गुरु नानक देव जी गोरखमता पहुँचे। गुरु नानक साहिब ने यहाँ के सिद्ध योगियों को बताया कि कानों में कुंडल पहनने, शरीर पर विभूति रमाने, शैख बजाने से अथवा सिर मुंडवा देने से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। मुक्ति तो आत्मा की शुद्धि से प्राप्त होती है। ये योगी गुरु साहिब के उपदेशों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उस समय से ही गोरखमता का नाम नानकमता पड़ गया।

4. कामरूप-धुबरी से गुरु नानक देव जी कामरूप (असम) पहुँचे। यहाँ की प्रसिद्ध जादूगरनी नूरशाही ने. अपनी सुंदरता के बल पर गुरु जी को भटकाने का असफल प्रयास किया। गुरु जी ने उसे जीवन का सही मनोरथ बताया।

5. जगन्नाथ पुरी-असम की यात्रा के पश्चात् गुरु नानक देव जी उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी पहुँचे। पंडितों ने गुरु साहिब को जगन्नाथ देवता की आरती करने के लिए कहा। गुरु नानक साहिब ने उन्हें बताया कि उस परम पिता परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है।

6. लंका-गुरु नानक देव जी ने लंका की भी यात्रा की। लंका का शासक शिवनाथ गुरु नानक देव जी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुआ तथा उनका श्रद्धालु बन गया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी की दूसरी उदासी के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the Second Udasi of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-गुरु नानक देव जी ने 1513 ई० में अपनी द्वितीय उदासी उत्तर की ओर आरंभ की। इस उदासी में उन्हें तीन वर्ष लगे। इस उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी निम्नलिखित प्रमुख स्थानों पर गए—

1. पहाड़ी रियासतें-गुरु नानक देव जी ने अपनी दूसरी उदासी दौरन मंडी, रवालसर, ज्वालामुखी काँगड़ा, बैजनाथ और कुल्लू इत्यादि पहाड़ी रियासतों की यात्रा की। गुरु नानक देव जी के उपदेशों से प्रभावित होकर इन पहाडी रियासतों के बहुत-से लोग उनके अनुयायी बन गए।

2. कैलाश पर्वत-गुरु नानक देव जी तिब्बत से होते हुए कैलाश पर्वत पहुँचे। गुरु साहिब के यहाँ पहुँचने पर सिद्ध बहुत हैरान हुए। गुरु नानक देव जी ने उन्हें बताया कि संसार से सत्य लुप्त हो गया है और चारों ओर भ्रष्टाचार और झूठ का बोलबाला है। इसलिए गुरु साहिब ने उन्हें मानवता का पथ-प्रदर्शन करने का संदेश दिया।

3. लद्दाख–कैलाश पर्वत के पश्चात् गुरु नानक देव जी लद्दाख पहुँचे। यहाँ के बहुत-से लोग गुरु साहिब के अनुयायी बन गए।

4. कश्मीर-कश्मीर में स्थित मटन में गुरु नानक देव जी का पंडित ब्रह्मदास से काफ़ी लंबा धार्मिक शास्त्रार्थ हुआ। गुरु नानक देव जी ने उसे समझाया कि मुक्ति केवल वेदों और रामायण इत्यादि को पढ़ने से नहीं अपितु उनमें दी गई बातों पर अमल करके प्राप्त की जा सकती है।

5. हसन अब्दाल—गुरु नानक देव जी पंजाब की वापसी यात्रा के समय हसन अब्दाल ठहरे। यहाँ एक अहँकारी फकीर वली कंधारी ने गुरु नानक देव जी को कुचलने के उद्देश्य से एक बहुत बड़ा पत्थर पहाड़ी से नीचे की ओर लुढ़का दिया। गुरु साहिब ने इसे अपने पंजे से रोक दिया। इस स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।

6. स्यालकोट स्यालकोट में गुरु नानक देव जी की मुलाकात एक मुसलमान संत हमजा गौस से हुई। उसने किसी बात पर नाराज़ होकर अपनी शक्ति द्वारा सारे शहर को नष्ट करने का निर्णय कर लिया था। परंतु जब वह गुरु साहिब से मिला तो वह उनके व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपना निर्णय बदल दिया। इस घटना का लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी की तीसरी उदासी के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Third Udasi of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने 1517 ई० के अंत में अपनी तृतीय उदासी आरंभ की। इस उदासी के दौरान गुरु साहिब पश्चिमी एशिया के देशों की ओर गए। इस उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. मुलतान-मुलतान में बहुत-से सूफी संत निवास करते थे। मुलतान में गुरु नानक देव जी की भेंट प्रसिद्ध सूफी संत शेख बहाउद्दीन से हुई। शेख बहाउद्दीन उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

2. मक्का-मक्का हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म स्थान है। सिख परंपरा के अनुसार गुरु नानक देव जी जब मक्का पहुँचे तो काअबे की ओर पाँव करके सो गए। जब काज़ी रुकनुद्दीन ने यह देखा तो वह क्रोधित हो गया। कहा जाता है कि जब काजी ने गुरु साहिब के पाँव पकड़कर दूसरी ओर घुमाने आरंभ किए तो मेहराब भी उसी ओर घूमने लग पड़ा। यह देखकर मुसलमान बहुत प्रभावित हुए। गुरु साहिब ने उन्हें समझाया कि अल्लाह सर्वव्यापक है।

3. मदीना-मक्का के पश्चात् गुरु नानक देव जी मदीना पहुँचे और वहाँ अपने उपदेशों का प्रचार किया। यहाँ गुरु साहिब का इमाम आज़िम के साथ शास्त्रार्थ भी हुआ।

4. बगदाद-बगदाद में गुरु नानक देव जी की भेंट शेख बहलोल से हुई। वह गुरु साहिब की वाणी से प्रभावित होकर उनका श्रद्धालु बन गया।

5. सैदपुर-गुरु नानक देव जी जब 1520 ई० के अंत में सैदपुर पहुँचे तो उस समय बाबर ने पंजाब पर बिजय प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के समय हज़ारों की संख्या में लोगों को बंदी बना लिया गया। इन बंदी बनाए गए लोगों में गुरु नानक देव जी भी थे। जब बाद में बाबर को यह ज्ञात हुआ कि गुरु साहिब एक महान् संत हैं तो उसने न केवल गुरु नानक देव जी को बल्कि बहुत-से अन्य बंदियों को भी रिहा कर दिया।

6. पेशावर-गुरु नानक देव जी अपनी तीसरी उदासी के दौरान पेशावर भी गये। यहाँ वे योगियों से मिले तथा उन्हें धर्म का वास्तविक मार्ग बताया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन करें। (Briefly describe of the teachings of Guru Nanak Dev Ji.).
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं छः शिक्षाओं के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about any six teachings of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ बड़ी सरल किंतु प्रभावशाली थीं। उनकी शिक्षाएँ किसी एक वर्ग, जाति अथवा प्रांत के लिए नहीं थीं। इनका बंध तो सारी मानव जाति से था। गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन इस प्रकार है—

1. ईश्वर का स्वरूप-गुरु नानक देव जी एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपनी वाणी में बार-बार ईश्वर की एकता पर बल दिया है। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर ही संसार की रचना करता है, उसका पालन-पोषण करता है और उसका विनाश करता है। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान् है।

2. माया-गुरु नानक देव जी के अनुसार माया मनुष्य के लिए मुक्ति के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुएँ जैसे धन-दौलत, उच्च पद, ऐश्वर्य, सुंदर नारी, पुत्र इत्यादि के चक्र में फंसा रहता है। इसी को माया कहते हैं। माया के कारण वह ईश्वर से दूर हो जाता है और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।

3. जाति प्रथा का खंडन-उस समय का हिंदू समाज न केवल चार मुख्य जातियों बल्कि अनेक अन्य उपजातियों में विभाजित था। उच्च जाति के लोग निम्न जाति से बहुत घृणा करते थे और उन पर बहुत अत्याचार करते थे। समाज में छुआछूत की भावना बहुत फैल गई थी। गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। गुरु साहिब ने लोगों को परस्पर भ्रातृभाव का संदेश दिया।

4. स्त्रियों के साथ निम्न बर्ताव का खंडन—गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। उनमें असंख्य कुरीतियाँ प्रचलित थीं। गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों में प्रचलित कुरीतियों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने समानता के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई।

5. गुरु का महत्त्व-गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं। उनके अनुसार गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी है। गुरु ही मनुष्य को अंधकार (अज्ञानता) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर लाता है। सच्चे गुरु का मिलना कोई सरल कार्य नहीं है। ईश्वर की कृपा के बिना मनुष्य को गुरु की प्राप्ति नहीं हो सकती।

6. हक्म-गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में परमात्मा के हुक्म (आदेश) अथवा इच्छा को विशेष महत्त्व प्राप्त है। हुक्म के कारण ही मनुष्य को सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के आदेश को नहीं मानता वह दरदर की ठोकरें खाता है।

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी के ईश्वर संबंधी क्या विचार थे ? (What was Guru Nanak’s concept of God ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर के स्वरूप संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित अनुसार हैं—

1. परमात्मा एक है—गुरु नानक देव जी अपनी बाणी में बार-बार परमात्मा के एक होने पर बल देते हैं। उनके अनुसार परमात्मा ही संसार की रचना, उसका पालन-पोषण तथा उसका संहार करने वाला है। उसके द्वारा किए गए ये काम दूसरे देवी-देवताओं के महत्त्व को कम करते हैं। देवी-देवते सैंकड़ों तथा हज़ारों हैं, परंतु परमात्मा एक है। उस परमात्मा को हरि, गोपाल, अल्लाह, खुदा, राम तथा साहिब आदि नाम से पुकारा जाता है।

2. निर्गुण और सगुण-परमात्मा के दो रूप हैं। वह निर्गुण भी है और सगुण भी। पहले जब परमात्मा ने पृथ्वी तथा आकाश की रचना नहीं की थी तो वह अपने आप में ही रहता था। यह परमात्मा का निर्गुण स्वरूप था। फिर परमात्मा ने सृष्टि की रचना की। इस रचना द्वारा परमात्मा ने स्वयं को रूपमान किया। यह परमात्मा का सगुण स्वरूप

3. रचयिता, पालनकर्ता और नाशवानकर्ता-ईश्वर ही इस संसार का रचयिता, पालनकर्ता और इसका विनाश करने वाला है। ईश्वर के मन में जब आया तब उसने इस संसार की रचना की। वह ही इस संसार का पालन करता है। ईश्वर जब चाहे तब इस संसार का विनाश कर सकता है।

4. सर्वशक्तिमान-गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहता है, वही होता है। उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं हो सकता। यदि परमात्मा की इच्छा हो तो वह भिखारी को भी सिंहासन पर बैठा सकता है और राजा को रंक (भिखारी) बना सकता है। .

5. अजर-अमर-परमात्मा द्वारा रची हुई सृष्टि नश्वर है। यह अस्थिर है। परमात्मा सदैव रहने वाला है। वह आवागमन तथा जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त है।

6. परमात्मा की महानता—गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा महान् है। उसकी महानता का वर्णन करना असंभव है। वह क्या देखता है और क्या सुनता है, उसका ज्ञान कितना है और वह कितना दयालु है और उसके दिए गए उपहारों का परिचय नहीं दिया जा सकता। परमात्मा स्वयं ही जानता है कि वह कितना महान् है। परमात्मा को छोड़कर किसी अन्य देवी-देवता की पूजा करना व्यर्थ है। ये परमात्मा के सम्मुख उसी प्रकार हैं जिस प्रकार सूर्य के सम्मुख एक छोटा सा तारा।

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प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी का माया का संकल्प क्या है ? (What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of Maya ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के अनुसार माया मनुष्य के लिए मुक्ति मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुओं जैसे धन-दौलत, उच्च पद, ऐश्वर्य, सुंदर नारी, पुत्र आदि के चक्रों में फंसा रहता है। इसे ही माया कहते हैं। मनमुख रचयिता और उसकी रचना के अंतर को नहीं समझ सकता। गुरु नानक देव जी ने माया को सर्पणी, माया ममता मोहणी, माया मोह, त्रिकुटी तथा सूहा रंग इत्यादि के नामों से पुकारा है। माया जिससे वह इतना प्रेम करता है, उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके साथ नहीं जाती। माया के कारण वह ईश्वर से दूर हो जाता है और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है। गुरु जी कहते हैं कि मनुष्य सोना-चाँदी आदि एकत्रित करके सोचता है कि वह संसार का बहुत बड़ा व्यक्ति बन गया है परंतु वास्तव में वह व्यक्ति अपने जीवन के लिए विष एकत्रित कर रहा होता है। इसी प्रकार वह दुविधा में फंस कर अपने जीवन का नाश कर लेता है। संक्षेप में माया मनुष्य की खुशियों का स्रोत नहीं अपितु उसके दुःखों का भंडार है। जो व्यक्ति माया का शिकार होता है उसे ईश्वर के दरबार में कोई स्थान नहीं मिलता।

प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में ‘गुरु’ का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Guru’ in Guru Nanak Dev’s Ji teachings ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के ‘गुरु’ संबंधी विचार क्या थे ? (What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of ‘Guru’ ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु का बहुत महत्त्व मानते हैं। उनके अनुसार गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली एक वास्तविक सीढ़ी है। गुरु ही मनुष्य को मोह और अहं के रोग से दूर करता है। वही नाम और शब्द की आराधना द्वारा भक्ति के मार्ग का अनुसरण करने का ढंग बताता है। गुरु के बिना भक्ति भाव और ज्ञान संभव नहीं होता। गुरु के बिना मनुष्य को चारों ओर अँधकार दिखाई देता है। गुरु ही मनुष्य को अँधकार (अज्ञानता) से प्रकाश की ओर ले जाता है। वह प्रत्येक असंभव कार्य को.संभव बना सकता है। अतः उसके साथ मिलने से ही मनुष्य की जीवनधारा बदल जाती है। वह सदा निरवैर रहता है। दोस्त तथा दुश्मन उसके लिए एक हैं। यदि कोई दुश्मन भी उसकी शरण में आ जाए तो वह उसे माफ कर देता है। सच्चे गुरु का मिलना कोई सरल कार्य नहीं है। परमात्मा की दया के बिना मनुष्य को गुरु की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह बात यहाँ विशेष उल्लेखनीय है कि गुरु नानक देव जी जब गुरु की बात करते हैं तो उनका अभिप्राय किसी मानवीय गुरु से नहीं है। सच्चा गुरु तो ईश्वर स्वयं है, जो शब्द द्वारा शिक्षा देता है।

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प्रश्न 11.
नाम जपना, किरत करनी व बाँटकर छकना, सिख धर्म के बुनियादी नियम हैं। व्याख्या करें।
(Name, Do the Honest Labour Remembering Divine and Sharing with the Needy are the basis of the Sikh Way of Life. Discuss.)
उत्तर-

1. नाम जपना-सिख धर्म में नाम की आराधना अथवा सिमरन को ईश्वर की भक्ति का सर्वोच्च रूप समझा गया है। गुरु नानक देव जी का कथन था कि नाम की आराधना से जहाँ मन के पाप दूर हो जाते हैं वहीं वह निर्मल हो जाता है। इस कारण मनुष्य के सभी कष्ट खत्म हो जाते हैं। नाम की आराधना से मनुष्य के सभी कार्य सहजता से होते चले जाते हैं क्योंकि ईश्वर स्वयं उसके सभी कार्यों में सहायता करता है। नाम के बिना मनुष्य का इस संसार में आना व्यर्थ है।

2. किरत करनी-किरत से भाव है मेहनत एवं ईमानदारी की कमाई करना। किरत करना अत्यंत आवश्यक है। यह परमात्मा का हुक्म (आदेश) है। हम प्रतिदिन देखते हैं कि विश्व का प्रत्येक जीव-जंतु किरत करके अपना पेट पाल रहा है। मानव के लिए किरत करने की आवश्यकता सबसे अधिक है क्योंकि वह सभी जीवों का सरदार है। जो व्यक्ति किरत नहीं करता वह अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट नहीं रख सकता। ऐसा व्यक्ति वास्तव में उस परमात्मा के विरुद्ध गुनाहं करता है।

3. बाँट छकना-सिख धर्म में बाँट छकने के सिद्धांत को काफी महत्त्व दिया गया है। बाँट छकने से भाव ज़रूरतमंद लोगों के साथ बाँटो। सिख धर्म खा कर पीछे बाँटने की नहीं अपितु पहले बाँटकर बाद में खाने की शिक्षा देता है। इसमें दूसरों को भी अपना भाई-बहन समझने तथा उन्हें पहले बाँटने की प्रेरणा दी गई है। गुरु नानक देव जी फरमाते हैं—
घालि खाए कुछ हथों देइ॥
नानक राह पछाणे सेइ॥
दान देने अथवा बाँट के खाने के लिए केवल वही व्यक्ति सफल है जो श्रम की कमाई करके दान देता है। सिख धर्म में दशाँश देने का हुक्म है। इससे भाव यह है कि आप कमाई (आय) का दसवां हिस्सा लोक कल्याण कार्यों के लिए खर्च करें।

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी के स्त्री जाति संबंधी क्या विचार थे? (What were the views of Guru Nanak Dev Ji about women ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। समाज में उनका स्तर पुरुषों के समान नहीं था। उनमें अनेक कुरीतियाँ जैसे बाल-विवाह, बहु-विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा तथा तलाक प्रथा इत्यादि प्रचलित थीं। गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों में प्रचलित कुरीतियों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने समाज में स्त्रियों का सम्मान बढ़ाने हेतु एक ज़ोरदार अभियान चलाया। वह बाल-विवाह, बहु-विवाह, पर्दा प्रथा तथा सती प्रथा इत्यादि कुरीतियों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने का समर्थन किया। इस संबंध में उन्होंने स्त्रियों को संगत एवं पंगत में सम्मिलित होने की आज्ञा दी। गुरु जी का विचार था कि हमें स्त्रियों से जो कि महान् सम्राटों को जन्म देती हैं, के साथ कभी भी बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। वह स्त्रियों को शिक्षा दिए जाने के पक्ष में थे।

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प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी के संदेश का सामाजिक अर्थ क्या था ? (What was the social meaning of Guru Nanak Dev Ji’s message ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के संदेश के सामाजिक अर्थ बहुत महत्त्वपूर्ण थे। उनका संदेश प्रत्येक के लिए था। कोई भी स्त्री-पुरुष गुरु जी द्वारा दर्शाए गए मार्ग को अपना सकता था। मुक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था। गुरु जी ने सामाजिक समानता का प्रचार किया। उन्होंने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। सामाजिक समानता के संदेश को व्यावहारिक रूप देने के लिए गुरु जी ने संगत तथा पंगत (लंगर) नामक दो संस्थाएँ चलाईं। लंगर तैयार करते समय जाति-पाति का कोई भेद-भाव नहीं किया जाता था। गुरु नानक देव जी ने अपने समय के शासकों में प्रचलित अन्याय की नीति और व्याप्त भ्रष्टाचार की जोरदार शब्दों में निंदा की। शासक वर्ग के साथ-साथ गुरु जी ने अत्याचारी सरकारी कर्मचारियों की भी आलोचना की। इस प्रकार गुरु नानक देव जी ने पंजाब के समाज को एक नया स्वरूप देने का उपाय किया।

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ भक्ति प्रचारकों से किस प्रकार भिन्न थीं ? (How far were the teachings of Guru Nanak different from the Bhakti reformers ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ भक्ति प्रचारकों से कई पक्षों से भिन्न थीं। गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा निराकार है। वह कभी भी मानवीय रूप को धारण नहीं करता। भक्ति प्रचारकों ने कृष्ण तथा राम को परमात्मा का अवतार माना। गुरु नानक देव जी मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे जबकि भक्ति प्रचारकों का इसमें पूर्ण विश्वास था। गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म का प्रसार करने के लिए गुरु अंगद देव जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करके गुरुगद्दी को जारी रखा। दूसरी ओर बहुत कम भक्ति प्रचारकों ने गुरुगद्दी की परंपरा को जारी रखा। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उनका अस्तित्व खत्म हो गया। गुरु नानक देव जी गृहस्थ जीवन में विश्वास रखते थे। भक्ति प्रचारक गृहस्थ जीवन को मुक्ति की राह में आने वाली एक बड़ी रुकावट मानते थे। गुरु नानक देव जी ने संगत तथा पंगत नामक दो संस्थाएँ स्थापित की। इनमें प्रत्येक स्त्री, पुरुष अथवा बच्चे बिना किसी भेद-भाव के सम्मिलित हो सकते थे। भक्ति प्रचारकों ने ऐसी कोई संस्था स्थापित नहीं की। गुरु नानक देव जी संस्कृत को पवित्र भाषा नहीं मानते थे। उन्होंने अपनी शिक्षाओं का प्रचार लोगों की आम भाषा पंजाबी में किया। अधिकतर भक्ति प्रचारक संस्कृत को पवित्र भाषा समझते थे।

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प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी एक महान् कवि और संगीतकार थे । इसकी व्याख्या करें। (Guru Nanak Dev Ji was a great poet and musician. Explain.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी न केवल एक धार्मिक महापुरुष थे अपितु एक महान् कवि एवं संगीतकार भी थे। आपकी कविताएँ इतनी उच्चकोटि की थीं कि इनके मुकाबले की कविताएँ विश्व साहित्य में भी बहुत कम हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित आप जी के 976 शब्द आपके महान् कवि होने का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। गुरु नानक देव जी ने इन कविताओं में परमात्मा तथा मानवता का अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णन किया है। इनमें उच्चकोटि के अलंकरणों तथा उपमाओं का प्रयोग किया गया है। गुरु नानक साहिब बहुत संक्षिप्त शब्दों में काफ़ी गहराई की बातें कह जाते हैं। गरु साहिब की ये कविताएँ पंजाबी साहित्य को एक अमूल्य देन हैं। गुरु नानक देव जी प्रथम ऐसे सुधारक थे जिन्होंने अपने उपदेशों को लोगों तक पहुँचाने के लिए संगीत का प्रयोग किया। वह कई प्रकार के रागों की जानकारी रखते थे। उनके कीर्तन को सुन कर बड़े-बड़े पापी भी उनके चरणों पर गिर जाते थे।

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष कहाँ तथा कैसे व्यतीत किए ? (How and where did Guru Nanak Dev Ji spend last 18 years of his life ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने 1521 ई० में रावी नदी के तट पर करतारपुर (अर्थात् ईश्वर का नगर) नामक नगर की स्थापना की। इसी स्थान पर गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की। ‘संगत’ से अभिप्राय उस सभा से था जो प्रतिदिन गुरु जी के उपदेशों को सुनने के लिए होती थी। इस संगत में बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को शामिल होने का अधिकार था। इसमें केवल एक परमात्मा के नाम का जाप होता था। ‘पंगत’ से अभिप्राय था-पंक्ति में बैठकर लंगर छकना। लंगर में जाति अथवा धर्म इत्यादि का कोई भेद-भाव नहीं किया जाता था। ये दोनों संस्थाएँ गुरु साहिब के उपदेशों का प्रसार करने में सहायक सिद्ध हुईं। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शबदों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। गुरु साहिब की प्रमुख वाणियों के नाम जपुजी साहिब, वार माझ, आसा दीवार, सिद्ध गोष्टि, वार मल्हार, बारह माह और पट्टी इत्यादि हैं।

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Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
गुरु नानक देव जी की गणना विश्व के महापुरुषों में की जाती है। वह सिख पंथ के संस्थापक थे। 15वीं शताब्दी में जब उनका जन्म हुआ तो भूमि पर चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। लोगों में अंध-विश्वास बहुत बढ़ गए थे। वे अज्ञानता के अंधकार में भटक रहे थे। चारों ओर अधर्म, झूठ और भ्रष्टाचार का बोलबाला था। लोग धर्म की वास्तविकता को भूल चुके थे। यह केवल आडंबरों और कर्मकांडों का एक दिखावा-सा बनकर रह गया था। शासक
और उनके कर्मचारी प्रजा का कल्याण करने की अपेक्षा उन पर अत्याचार करते थे। वे अपना अधिकतर समय रंगरलियों में व्यतीत करते थे। गुरु नानक साहिब ने अज्ञानता के अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया।

  1. सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
  2. गुरु नानक देव जी के जन्म के समय समाज की स्थिति कैसी थी ?
  3. गुरु नानक देव जी के जन्म के समय शासक व कर्मचारी वर्ग का प्रजा के प्रति व्यवहार कैसा था ?
  4. गुरु नानक देव जी ने मानवता को कौन-सा मार्ग दिखाया ?
  5. गुरु नानक देव जी के समय लोग धर्म की वास्तविकता को ………… चुके थे।

उत्तर-

  1. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी थे।।
  2. उस समय लोगों में अंध-विश्वास बहुत बढ़ गया था।
  3. गुरु नानक देव जी के जन्म समय शासक तथा कर्मचारी वर्ग प्रजा पर बहुत अत्याचार करते थे।
  4. गुरु नानक देव जी ने मानवता को सत्य तथा ज्ञान का मार्ग दिखाया।
  5. भूल।

2
1499 ई० में ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु नानक देव जी अधिकाँश समय सुल्तानपुर लोधी में न ठहरे और वे देश और विदेशों की लंबी यात्रा के लिए निकल पड़े। गुरु नानक साहिब ने लगभग 21 वर्ष इन यात्राओं में व्यतीत किए। गुरु नानक साहिब की इन यात्राओं को उदासियाँ भी कहा जाता है क्योंकि गुरु साहिब इस समय के दौरान घर-द्वार त्याग कर एक उदासी की भाँति भ्रमण करते रहे। गुरु साहिब की इन उदासियों के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए हमें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पहला, गुरु जी ने अपनी उदासियों के संबंध में कुछ नहीं लिखा। दूसरा, इन उदासियों से संबंधित हमें कोई तत्कालीन स्रोत प्राप्त नहीं है।

  1. गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुई ?
  2. उदासियों से क्या भाव है?
  3. गुरु नानक देव जी की उदासियों से संबंधित आने वाली कोई एक कठिनाई के बारे में बताएँ।
  4. गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासियों का आरंभ कहाँ से किया ?
  5. गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति कब हुई थी ?
    • 1469 ई०
    • 1479 ई०
    • 1489 ई०
    • 1499 ई०।

उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति सुल्तानपुर लोधी में हुई।
  2. उदासियों से भाव गुरु नानक देव जी की यात्राओं से है।
  3. इन उदासियों से संबंधित हमें कोई समकालीन स्रोत नहीं मिला है।
  4. गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासियों का आरंभ सैदपुर से किया।
  5. 1499 ई०।

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3
गुरु नानक देव जी जब 1520 ई० के अंत में सैदपुर पहुंचे तो उस समय बाबर ने पंजाब पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के समय मुग़ल सेनाओं ने बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की हत्या कर दी। सैदपुर में भारी लूटपाट की गई और घरों में आग लगा दी गई। स्त्रियों को अपमानित किया गया। हज़ारों की संख्या में पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को बंदी बना लिया गया। इन बंदी बनाए गए लोगों में गुरु नानक साहिब भी थे। जब बाद में बाबर को यह ज्ञात हुआ कि गुरु साहिब एक महान् संत है तो वह गुरु जी के दर्शन के लिए स्वयं आया वह गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने न केवल गुरु साहिब को बल्कि बहुत-से अन्य बंदियों को भी रिहा कर दिया।

  1. बाबर ने सैदपुर पर आक्रमण कब किया था ?
  2. बाबर की सेना ने सैदपुर में क्या किया ?
  3. क्या बाबर ने गुरु नानक देव जी को सैदपुर में कैद किया था.?
  4. बाबर ने जब गुरु नानक देव जी के दर्शन किए उसने क्या किया ?
  5. बाबर की सेना ने सैदपुर में स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार किया ? .
    • उनको अपमानित किया गया।
    • उनका सम्मान किया गया
    • उनको गिरफ्तार कर लिया गया
    • उपरोक्त में से कोई नहीं।

उत्तर-

  1. बाबर ने सैदपुर पर 1520 ई० में आक्रमण किया था।
  2. बाबर की सेना ने सैदपुर में बड़ी संख्या में लूटमार की थी।
  3. जी, हाँ, बाबर ने सैदपुर में गुरु नानक देव जी को कैद किया था।
  4. बाबर ने जब गुरु नानक देव जी के दर्शन किए तब उसने गुरु साहिब व अन्य कई कैदियों को भी रिहा कर दिया।
  5. उनको अपमानित किया गया।

4
गुरु नानक देव जी ने रावी नदी के तट पर 1521 ई० में करतारपुर (अर्थात् ईश्वर का नगर) नामक नगर की स्थापना की। इसी स्थान पर गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की। संगत’ से अभिप्राय उस सभा से था जो प्रतिदिन गुरु जी के उपदेशों को सुनने के लिए होती थी। इस संगत में बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को शामिल होने का अधिकार था। इसमें केवल एक परमात्मा के नाम का जाप होता था। ‘पंगत’ से अभिप्राय था-पंक्ति में बैठकर लंगर छकना। लंगर में जाति अथवा धर्म इत्यादि का कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। ये दोनों संस्थाएँ गुरु साहिब के उपदेशों का प्रसार करने में सहायक सिद्ध हुईं। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शब्दों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

  1. करतारपुर से क्या भाव है ?
  2. गुरु नानक देव जी ने करतारपुर में कौन-सी दो संस्थाओं की स्थापना की ?
  3. गुरु नानक देव जी ने कितने शब्दों की रचना की ?
  4. गुरु नानक देव जी की किन्हीं दो प्रमुख वाणियों के नाम लिखें।
  5. गुरु नानक देव जी ने करतारपुर की स्थापना कब की थी ?
    • 1501 ई० में
    • 1511 ई० में
    • 1521 ई० में
    • 1531 ई० में।

उत्तर-

  1. करतारपुर से भाव है ईश्वर का नगर।
  2. गुरु नानक देव जी ने करतारपुर में संगत व पंगत नाम की दो संस्थाओं की स्थापना की।
  3. गुरु नानक देव जी ने 976 शब्दों की रचना की।
  4. गुरु नानक देव जी की दो प्रमुख वाणियों के नाम जपुजी साहिब तथा आसा दी वार हैं।
  5. 1521 ई० में।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ PSEB 12th Class History Notes

  1. गुरु नानक देव जी का प्रारंभिक जीवन (Early Career of Guru Nanak Dev Ji)-गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 ई० को राय भोय की तलवंडी में हआ-आपके पिता जी का नाम मेहता कालू तथा माता जी का नाम तृप्ता जी था-आपकी बहन का नाम बेबे नानकी था। गुरु नानक देव जी बचपन से ही बहुत गंभीर और विचारशील स्वभाव के थे-गुरु साहिब के आध्यात्मिक ज्ञान से उनके अध्यापक चकित रह गए-गुरु नानक देव जी के पिता जी ने उन्हें कई व्यवसायों में लगाने का प्रयत्न किया परंतु गुरु जी ने कोई रुचि न दिखाई-14 वर्ष की आयु में आपका विवाह बटाला निवासी मूल चंद की सुपुत्री सुलक्खनी जी से कर दिया गया-20 वर्ष की आयु में आप सुल्तानपुर लोधी के मोदीखाना अन्न भंडार में नौकरी करने लगे-सुल्तानपुर लोधी में आपको बेईं नदी में स्नान के दौरान सत्य ज्ञान की प्राप्ति हुई-उस समय आपकी आयु 30 वर्ष की थी।
  2. गुरु नानक देव जी की उदासियाँ (Udasis of Guru Nanak Dev Ji)-1499 ई० में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् गुरु नानक देव जी देश और विदेशों की लंबी यात्रा पर निकल पड़े-गुरु साहिब ने कुल 21 वर्ष इन उदासियों अथवा यात्राओं में व्यतीत किए-इन उदासियों का उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता को दूर करना और एक ईश्वर की आराधना का प्रचार करना था-गुरु नानक देव जी ने 1499 ई० के अंत में भाई मरदाना के साथ अपनी पहली उदासी आरंभ की-इस उदासी में गुरु जी ने सैदपुर, तालुंबा, कुरुक्षेत्र, पानीपत, दिल्ली, हरिद्वार, गोरखमता, बनारस, कामरूप, गया, जगन्नाथपुरी, लंका और पाकपटन के प्रदेश की यात्रा की-गुरु नानक देव जी ने 1513-14 ई० में अपनी दूसरी उदासी आरंभ की-इस उदासी में गुरु जी ने पहाड़ी रियासतों, कैलाश पर्वत, लद्दाख, कश्मीर, हसन अब्दाल और स्यालकोट की यात्रा की-1517 ई० में आरंभ की गई अपनी तृतीय उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी ने मुलतान, मक्का, मदीना, बगदाद, काबुल, पेशावर और सैदपुर के प्रदेशों की यात्रा कीइन उदासियों के दौरान गुरु नानक देव जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर हज़ारों लोग उनके अनुयायी बन गए।
  3. गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ (Teachings of Guru Nanak Dev Ji)-गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ बड़ी सरल और प्रभावशाली थीं-गुरु जी के अनुसार ईश्वर एक है-वह इस संसार का रचयिता, पालनकर्ता और नाशवान्कर्ता हैं-वह निराकार और सर्वव्यापक है-उनके अनुसार माया मनुष्य के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है-हऊमै (अहं) मनुष्य के सभी दुःखों का मूल कारण है-गुरु जी ने जाति प्रथा तथा खोखले रीति रिवाजों का जोरदार शब्दों में खंडन किया-गुरु जी ने स्त्रियों को समाज में सम्मानजनक स्थान देने के लिए आवाज़ उठाई-गुरु जी द्वारा नाम जपने पर विशेष बल दिया गया-उन्होंने गुरु को मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी माना है।
  4. ज्योति-जोत समाना (Immersed in Eternal Light)-22 सितंबर, 1539 ई० को गुरु नानक देव जी ज्योति-जोत समा गए। ज्योति-जोत समाने से पूर्व गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 20 भारत और सार्क Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 20 भारत और सार्क

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस) की पृष्ठभूमि एवं इसकी स्थापना के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।
(Describe the background and efforts made for the establishment of South Asian Association for Regional Co-operation-SAARC.)
अथवा
सार्क की स्थापना पर नोट लिखें तथा सार्क के उद्देश्यों का वर्णन करें। (Write a note on Establishment (formation) of SAARC and discuss its objectives.)
उत्तर-
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, भूटान, नेपाल, मालदीव, अफ़गानिस्तान और श्रीलंका का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन की स्थापना आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग द्वारा दक्षिणी एशिया के लोगों के कल्याण के लिए की गई थी।

सार्क की स्थापना (Establishment of SAARC)-द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटों-पूंजीवादी गुट और साम्यवादी गुट में बंट गया था। पूंजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरिका जबकि साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ करने लगा। विश्व में आर्थिक सहयोग और सुरक्षात्मक उद्देश्यों को लेकर क्षेत्रीय संगठन बनने लगे। आपसी संगठन बनाने की यह प्रक्रिया पूरे यूरोप और धीरे-धीरे विश्व भर में फैलने लगी।
1975 में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए बंगला देश, भारत, फिलीपीन्स, लाओस, श्रीलंका, थाइलैंड आदि देशों ने समझौता किया।

दक्षिण एशियाई देशों में सामाजिक, जातीय, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों की सामान्य सांझ है और तीव्र विकास की इच्छा भी है लेकिन इनमें कई बातों पर आपसी अविश्वास की भावना भी देखी जा सकती है। विशेष रूप से इन देशों के सुरक्षात्मक हित, विभिन्न राजनीतिक संस्कृति भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद और इस क्षेत्र में भारत की विशेष स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। 70 के दशक के अंत में बंगला देश के दिवंगत राष्ट्रपति जिआउर्रहमान ने एक विचार दिया था कि दक्षिण एशिया के सात देशों को मिलकर इस क्षेत्र की समस्याओं पर विचार करना चाहिए और आर्थिक विकास के लिए प्रयास करना चाहिए। आपसी सहयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग के लिए बंगला देश कार्यकारी पत्र (Bangladesh Working paper on South Asian Regional Cooperation) जारी किया गया जिसमें सहयोग के 11 प्रमुख बिंदुओं पर बल दिया गया। ये 11 प्रमुख बिंदु थे-दूर संचार, यातायात, जहाजरानी, शैक्षणिक व सांस्कृतिक सहयोग, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग, कृषि अनुसन्धान, पर्यटन, संयुक्त उपक्रम, बाज़ार प्रोत्साहन, मौसम विज्ञान। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।’ दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क कोई राजनीतिक संघ

या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे की सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

अनेक अध्ययनों के पश्चात् 1-2 अगस्त, 1983 को दिल्ली में सात देशों-भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और बंगला देश के विदेश मंत्रियों की एक बैठक हुई। इस बैठक में सातों देशों के विदेश मंत्रियों ने दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते की उद्घोषणा में कहा गया कि दक्षिणी एशिया में आपसी सहयोग लाभदायक, वांछनीय और आवश्यक है और इससे क्षेत्र के लोगों के जीवन को सुधारने में मदद और प्रोत्साहन मिलेगा। अंतत: दक्षिणी एशियाई देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन बंगला देश की राजधानी ढाका में हुआ जिसमें 8 दिसम्बर, 1985 को सार्क घोषणा-पत्र (Charter) को स्वीकार किया गया। इस प्रकार औपचारिक रूप से दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) अस्तित्व में आया। इस संगठन की स्थापना में भारत की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही। इसके प्रथम शिखर सम्मेलन से लेकर अन्त तक भारत का योगदान इसमें विशेष स्थान रखता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि भारत दक्षिणी एशिया का एक प्रमुख देश है और सार्क की सफलता या असफलता बहुत सीमा तक भारत के सक्रिय सहयोग पर ही निर्भर करती है।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क दक्षिणी एशिया के आठ देशों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। यह एक राजनीतिक संगठन नहीं है। यह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी व वैज्ञानिक हितों की पूर्ति के लिए आपसी सहयोग पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन का उदय भी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं से प्रेरित है। सार्क की स्थापना में भारत की सक्रिय भागीदारी रही है।
सार्क के उद्देश्य-

सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बंगला देश, नेपाल, मालदीव, अफ़गानिस्तान और भूटान का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन की स्थापना भी बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण के सन्दर्भ में हुई। इस संगठन की स्थापना बंगला देश के दिवंगत शासनाध्यक्ष जिआउर्रहमान की पहल पर हुई। इसके लिए 1-2 अगस्त, 1983 को नई दिल्ली में इन सात देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में सदस्य देशों ने आपसी सहयोग के कुछ मुद्दों पर एक सहमति पत्र तैयार किया। इस सहमति पत्र के आधार पर दिसम्बर, 1985 में ढाका में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ। इस शिखर सम्मेलन में 8 दिसंबर को सार्क का घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया।

सार्क के सिद्धान्त (Principles of SAARC) दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता व राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

सार्क के उद्देश्य (Objectives of the SAARC)-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के चार्टर में इसके निम्नलिखित उद्देश्यों का वर्णन किया गया है

  • दक्षिण एशियाई देशों के लोगों का कल्याण और जीवन में गुणात्मकता लाना।
  • आर्थिक वृद्धि, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास।
  • सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
  • अन्य देशों के साथ सहयोग करना।
  • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मज़बूत बनाना।
  • एक दूसरे की समस्याओं के लिए आपसी विश्वास, समझ-बूझ व सहृदयता विकसित करना।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क एक ऐसा संगठन है जो सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता व अखण्डता में विश्वास रखते हुए क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए आपसी सहयोग की अपेक्षा रखता है। सार्क क्षेत्रीय विकास एवं कल्याण के लिए बनाया गया संगठन है। यह कोई सैनिक या राजनीतिक गठबन्धन नहीं है। सार्क के घोषणा पत्र में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इसमें द्वि-पक्षीय मामलों पर बहस नहीं की जाएगी। किन्तु इसकी बैठकों में कई बार द्वि-पक्षीय मामले उठाने का भी प्रयास किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की ओर से यह प्रयास अधिक होता है। भारत ने सदैव इसका विरोध किया है। सार्क क्षेत्रीय सहयोग के लिए बनाया गया है और यदि यह निर्धारित सिद्धान्तों का पालन करें तो घोषित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 2.
सार्क के लक्ष्य और सिद्धान्त क्या हैं ? । (What are objectives and principles of SAARC ?)
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बंगला देश, नेपाल, मालदीव, अफ़गानिस्तान और भूटान का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन की स्थापना भी बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण के सन्दर्भ में हुई। इस संगठन की स्थापना बंगला देश के दिवंगत शासनाध्यक्ष जिआउर्रहमान की पहल पर हुई। इसके लिए 1-2 अगस्त, 1983 को नई दिल्ली में इन सात देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में सदस्य देशों ने आपसी सहयोग के कुछ मुद्दों पर एक सहमति पत्र तैयार किया। इस सहमति पत्र के आधार पर दिसम्बर, 1985 में ढाका में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ। इस शिखर सम्मेलन में 8 दिसंबर को सार्क का घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया।

सार्क के सिद्धान्त (Principles of SAARC) दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता व राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

सार्क के उद्देश्य (Objectives of the SAARC)-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के चार्टर में इसके निम्नलिखित उद्देश्यों का वर्णन किया गया है

  • दक्षिण एशियाई देशों के लोगों का कल्याण और जीवन में गुणात्मकता लाना।
  • आर्थिक वृद्धि, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास।
  • सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
  • अन्य देशों के साथ सहयोग करना।
  • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मज़बूत बनाना।
  • एक दूसरे की समस्याओं के लिए आपसी विश्वास, समझ-बूझ व सहृदयता विकसित करना।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क एक ऐसा संगठन है जो सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता व अखण्डता में विश्वास रखते हुए क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए आपसी सहयोग की अपेक्षा रखता है। सार्क क्षेत्रीय विकास एवं कल्याण के लिए बनाया गया संगठन है। यह कोई सैनिक या राजनीतिक गठबन्धन नहीं है। सार्क के घोषणा पत्र में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इसमें द्वि-पक्षीय मामलों पर बहस नहीं की जाएगी। किन्तु इसकी बैठकों में कई बार द्वि-पक्षीय मामले उठाने का भी प्रयास किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की ओर से यह प्रयास अधिक होता है। भारत ने सदैव इसका विरोध किया है। सार्क क्षेत्रीय सहयोग के लिए बनाया गया है और यदि यह निर्धारित सिद्धान्तों का पालन करें तो घोषित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 3.
सार्क की महत्त्वपूर्ण गतिविधियां क्या रही हैं ? उनमें भारत की भूमिका क्या है ?
(What important actiyities of SAARC has taken up during its existence ? What has been India’s role in them ?)
अथवा
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) द्वारा अपने अस्तित्व में किए गए मुख्य कार्य कौन-से हैं ? इनमें भारत की भूमिका क्या रही है ?
(What important activities has SAARC taken up during its existense ? What has been India’s role in them.)
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन का उद्देश्य इन देशों के बीच अधिकाधिक क्षेत्रों में सहयोग स्थापित करना है ताकि समस्याएं एक-दूसरे की सहायता से हल हो सकें। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि, ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।’ दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा।’ सार्क कोई राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे को सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे की आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

प्रथम शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ का प्रथम शिखर सम्मेलन 1985 में ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में सभी सदस्यों ने पारस्परिक सहयोग के लिए अपनी वचनबद्धता पर सहमति प्रकट की।

द्वितीय शिखर सम्मेलन-द्वितीय शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1986 में भारत में बंगलौर में हुआ। इन देशों ने 1990 तक सार्वभौमिक प्रतिरक्षण, सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा, मातृ-शिशु पोषाहार, साफ़ सुरक्षित पेय जल की व्यवस्था और 2000 से पूर्व समुचित आवास के लक्ष्य निर्धारित किए। – तृतीय शिखर सम्मेलन-सार्क का तीसरा शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1987 में काठमांडू में हुआ। इस सम्मेलन में तीन ऐतिहासिक निर्णय लिए गए

(1) आतंकवाद को समाप्त करने का समझौता हुआ।
(2) दक्षिण एशियाई खाद्य सुरक्षा भंडार की स्थापना का निर्णय किया गया।
(3) तीसरा महत्त्वपूर्ण निर्णय सार्क क्षेत्र के पर्यावरण की रक्षा के उपाय करने के लिए पर्यावरण सम्बन्धी अध्ययन करना है।

चौथा शिखर सम्मेलन-सार्क का चौथा सम्मेलन श्रीलंका की अशांत स्थिति के कारण वहां न होकर 29 सितम्बर, 1988 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुआ। इस सम्मेलन का विशेष महत्त्व है क्योंकि यह सम्मेलन पाकिस्तान में लोकतन्त्र की बहाली के बाद हुआ। इस सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए

  • इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रीय संसदों के सदस्य एक विशेष सार्क पत्र दस्तावेज़ पर किसी भी देश की यात्रा कर सकेंगे तथा उन्हें वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं होगी।
  • नशीले पदार्थों के ग़लत प्रयोग को रोकने हेतु ज़ोरदार अभियान जारी रखने का संकल्प किया।
  • इस सम्मेलन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ‘सार्क 2000’ का निर्माण है। ‘सार्क 2000’ एक क्षेत्रीय योजना की अवधारणा है। इस योजना द्वारा शताब्दी के अंत तक इस क्षेत्र के एक अरब से ज्यादा लोगों की आवास, शिक्षा और साक्षरता की आवश्यकताएं पूरी की जा सकें।
  • संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के अनुसार वर्ष 1989 को ‘बालिका वर्ष’ के रूप में मनाने का आह्वान किया गया। (5) परमाणु निःशस्त्रीकरण का भी निर्णय लिया गया।
  • शिखर सम्मेलन के निर्णय के अनुसार इस क्षेत्र का कोई भी देश सार्क का सदस्य बन सकता है, यदि वह इसके घोषणा-पत्र के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखता है।

कोलंबो सम्मेलन-21 दिसम्बर, 1991 को सार्क का सम्मेलन कोलंबो में हुआ। सार्क के सातों देश क्षेत्र में व्यापार को उदार बनाने पर सहमत हो गए। सातों सदस्य देशों ने नि:शस्त्रीकरण की सामान्य प्रवृत्तियों का स्वागत किया। घोषणा-पत्र में मानव अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है।

ढाका शिखर सम्मेलन-12 दिसम्बर, 1992 को सार्क का शिखर सम्मेलन ढाका (बंगला देश) में होना था, परन्तु भारत के आग्रह पर स्थगित कर दिया गया और 13 जनवरी, 1993 को शिखर सम्मेलन होना निश्चित किया गया। 13 जनवरी को भी यह सम्मेलन न हो सका। यह सम्मेलन 10 और 11 अप्रैल को ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में दक्षेस राष्ट्रों के नेताओं ने सातों राष्ट्रों के बीच एक ‘महाबाज़ार’ का निर्माण करने तथा दक्षिण एशिया के स्वतन्त्र व्यक्तित्व पर विशेष बल दिया।

नई दिल्ली सम्मेलन-2 मई, 1995 को सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में आरम्भ हुआ। इस सम्मेलन की मुख्य उपलब्धि आपसी सहयोग के क्षेत्र में दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार व्यवस्था (साप्टा) पर सदस्य राष्ट्रों की सहमति है। सभी सदस्य राज्यों ने वर्ष 1995 को ‘दक्षेस ग़रीबी उन्मूलन वर्ष’ मनाने का फैसला
किया।

नौवां शिखर सम्मेलन-मई, 1997 में मालद्वीप की राजधानी माले में सार्क का नौवां शिखर सम्मेलन हुआ। माले शिखर सम्मेलन में सन् 2001 तक दक्षेस में मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) स्थापित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।

दक्षेस का दसवां शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन का दसवां शिखर सम्मेलन तीन दिन के लिए कोलंबो में 28 जुलाई, 1998 को प्रारम्भ हुआ और 31 जुलाई को समाप्त हुआ। दक्षेस ने सदस्य देशों की सभी क्षेत्रों में समृद्धि के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक कार्यसूची की घोषणा की। सदस्य देशों ने परमाणु हथियारों को पूरी तरह से नष्ट करने और प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण के तहत विश्वभर में परमाणु निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता की अपनी वचनबद्धता को दोहराया।

दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन-दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारत एवं पाकिस्तान के तनाव के बीच 5 एवं 6 फरवरी, 2002 को हुआ। इस सम्मेलन में अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये, जैसे कि आतंकवाद को समाप्त करने एवं दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) को शीघ्र लागू करने के फैसले लिए। इसके अतिरिक्त महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक और एड्स के मुकाबले के लिए सामूहिक पहल की बात भी दक्षेस घोषणा में कही गई।

12वां सार्क शिखर सम्मेलन, जनवरी-2004-‘दक्षेस’ देशों का 12वां शिखर-सम्मेलन 4 जनवरी, 2004 को इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुआ। इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। सम्मेलन के अन्त में 11 पृष्ठों का एक सांझा घोषणा-पत्र (इस्लामाबाद घोषणा-पत्र) जारी किया गया। इस सम्मेलन की प्रमुख बातें निम्नलिखित रहीं-

  • ‘दक्षिणी एशियाई मुक्त व्यापार व्यवस्था’ (साफ्टा) को मंजूरी दी गई। यह समझौता 1 जनवरी, 2006 से लागू होगा।
  • दक्षिणी एशिया से ग़रीबी, पिछड़ापन आदि दूर करने के लिए सामाजिक घोषणा-पत्र जारी किया गया।
  • 1987 में किए गए आतंकवाद निरोधक सार्क समझौते की समीक्षा की गई तथा आतंकवाद पर प्रभावी रोकथाम . लगाने पर सहमति हुई।
  • दक्षेस पुरस्कार आरम्भ करने का निर्णय लिया गया।

13वां सार्क शिखर सम्मेलन-नवम्बर, 2005-सार्क का 13वां शिखर सम्मेलन नवम्बर, 2005 में ढाका में हुआ। सार्क सदस्य देशों ने परस्पर वीजा नियमों को उदार बनाने के लिए सार्क संचार परिषद् का गठन करने के लिए तथा सीमा शुल्क मामलों में परस्पर सहयोग के लिए आपस में समझौता किया।

14वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 14वां शिखर सम्मेलन 3-4 अप्रैल, 2007 को भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुआ। इस सम्मेलन में अफ़गानिस्तान को सार्क का 8वां सदस्य बनाया गया। इस सम्मेलन में सदस्य देशों ने निम्नलिखित मुद्दों पर अपनी सहमति प्रकट की

  • आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए उनको मिलने वाली वित्तीय सहायता को रोकने का प्रयास किया जाए।
  • दक्षिण एशिया विकास फंड की शुरुआत की जाए।
  • साफ्टा को और मज़बूत किया जाए।
  • सार्क देशों से ग़रीबी दूर करने तथा बच्चों एवं महिलाओं के विकास के लिए विशेष प्रयास किए जाएं।

15वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 15वां शिखर सम्मेलन 2-3 अगस्त, 2008 को श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में हुआ। इस सम्मेलन में एक 41 सूत्रीय घोषणा पत्र जारी किया गया जिसके महत्त्वपूर्ण प्रावधान इस प्रकार

  • आतंकवाद को रोकने के लिए प्रभावशाली प्रयास किए जाएंगे।
  • साफ्टा पूर्ण तौर पर लागू किया जाए।
  • एक सांझा खाद्यान्न भण्डार स्थापित किया जाएगा।
  • सार्क देशों में मादक पदार्थों, मानवीय और हथियारों की तस्करी को रोकने के लिए एक सांझा कानूनी तन्त्र विकसित किया जाएगा। ___

16वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 16वां शिखर सम्मेलन 28-29 अप्रैल, 2010 को भूटान की राजधानी थिम्पू में हुआ। सार्क घोषणा पत्र में सभी तरह के आतंकवाद की आलोचना करते हुए उसके विरुद्ध लड़ने के लिए पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देने की बात की गई। सार्क नेताओं ने 2011-20 के दशक को डिकेट ऑफ़ इंट्रारीजनल कनेक्टिविटी इन सार्क के रूप में मनाने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया।

17वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 17वां शिखर सम्मेलन 10-11 नवम्बर, 2011 को मालदीव में हुआ। इस सम्मेलन में राष्ट्रों ने आपसी व्यापार, आपदा प्रबन्धन, समुद्री दस्युओं से निपटने की समस्या व वैश्विक आर्थिक संकट के मुद्दों पर चर्चा हुई।

18वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 18वां शिखर सम्मेलन 26-27 नवम्बर 2014 को नेपाल में हुआ। भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सार्क सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए आतंकवाद तथा अर्न्तदेशीय अपराधों से निपटने का

आहवान किया। उन्होंने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सार्क देशों को तीन से पांच साल का व्यापार वीजा देने की घोषणा की।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 4.
सार्क का महत्त्व लिखो और इसके सामने आने वाली समस्याओं का वर्णन करो। (Write down the Importance of SAARC and explain its Problems.).
अथवा
सार्क की समस्याओं का वर्णन करो। (Explain the Problems of SAARC)
अथवा
सार्क की स्थापना कब हई ? सार्क की असफलताओं के कारणो का वर्णन करें। (When was ‘SAARC’ formed ? Explain the reasons for the failure of SAARC.)
उत्तर-
आज के तकनीकी युग में कोई देश आपसी सहयोग के बिना उन्नति नहीं कर सकता। विश्व के लगभग सभी राष्ट्र आर्थिक उन्नति के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। इसी आपसी सहयोग को बनाने एवं बढ़ाने के विचार से दक्षिण एशिया के सात देशों ने देश की स्थापना की। सार्क के दक्षिण एशिया के सदस्य राष्ट्रों की आर्थिक उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की है। आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए 1995 में सार्क देशों ने साफ्टा को लागू किया। इस सहयोग को और अधिक बढ़ाने के लिए सार्क के 12वें शिखर सम्मेलन में साफ्टा को वर्ष 2006 से लागू करने की अनुमति दे दी है।

सार्क का महत्त्व/सफलताएं-सार्क देशों द्वारा अपनाए गए आर्थिक सहयोग कार्यक्रम का महत्त्व निम्नलिखित

  • दक्षिण एशियाई देशों द्वारा आर्थिक रूप से एक-दूसरे से सहयोग के कारण इस क्षेत्र में लोगों के जीवन स्तर में भारी सुधार आया है।
  • इसने आर्थिक विकास को गति प्रदान की है।
  • आर्थिक सहयोग के चलते सदस्य राष्ट्रों द्वारा एक-दूसरे पर से विभिन्न प्रकार के कर हटाने से व्यापार को बढ़ावा मिला है।
  • दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार आया है।
  • आर्थिक क्षेत्र में सहयोग से सार्क देशों के सम्बन्धों में अधिक मज़बूती आई है।

सार्क की समस्याएं-

  • सार्क की सफलता में सदैव भारत-पाक के कटु सम्बन्ध रुकावट पैदा करते हैं।
  • सार्क के सदस्य देश भारत जैसे बड़े देश पर पूर्ण विश्वास नहीं कर पा रहे हैं।
  • सार्क के अधिकांश देशों में आन्तरिक अशान्ति एवं अस्थिरता इसके मार्ग में रुकावट है।
  • सार्क देशों में अधिक मात्रा में अनपढ़ता, बेरोज़गारी तथा भुखमरी पाई जाती है, जोकि इसकी सफलता में बाधा पैदा करती है।
  • सार्क के देश एक ही वस्तु के लिए परस्पर प्रतियोगिता करते हैं।
  • सार्क क्षेत्र में महाशक्तियों की राजनीति के कारण विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
  • सार्क की एक महत्त्वपूर्ण समस्या आतंकवाद है।
  • सार्क देशों के बीच अर्तक्षेत्रीय व्यापार बहुत कम है।
  • सार्क देशों में प्रशासनिक बाधाएं बहुत अधिक पाई जाती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
सार्क से आपका क्या अभिप्राय है? इसके मुख्य उद्देश्यों के बारे में संक्षेप में लिखिए। (P.B. 2010)
अथवा
सार्क के मुख्य उद्देश्य लिखो।
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1-2 अगस्त, 1983 को सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली की बैठक में की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन 7-8 दिसम्बर, 1985 को ढाका में हुआ। इस प्रकार औपचारिक रूप से सार्क की स्थापना हुई। दक्षेस के सदस्य हैं-भारत, मालदीव, पाकिस्तान, बंगला देश, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान और नेपाल । दक्षेस के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं
(1) दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें। (2) दक्षेस के राज्य अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें। (3) क्षेत्र की अधिक-से-अधिक सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति करना। (4) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्म-विश्वास पैदा करना।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 2.
दक्षेस (SAARC) का क्या अर्थ है ? इसके महत्त्व का वर्णन करें।
अथवा
सार्क (SAARC) की महत्ता लिखें।
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना अगस्त, 1983 में सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली में बैठक की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन दिसम्बर, 1985 में ढाका (बंगला देश) में हुआ। इस प्रकार 1985 में सार्क की औपचारिक स्थापना हो गई। सार्क का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया के राष्ट्रों की समस्याओं को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाना है और इन राष्ट्रों में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में विकास करना है।
महत्त्व-(1) सार्क के कारण दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे के समीप आए हैं और कुछ सामान्य समस्याओं को हल करने में सार्क सफल रहा है।
(2) क्षेत्र के बाहर के देशों का हस्तक्षेप काफ़ी कम हो गया है।

प्रश्न 3.
सार्क (SAARC) के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं ?
उत्तर-
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता व राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 4.
‘साप्टा’ पर संक्षेप टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
‘साप्टा’ का उद्देश्य सार्क देशों के मध्य व्यापारिक सहयोग को बढ़ाकर एक ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र’ (साप्टा) की स्थापना करना है। मुक्त व्यापार क्षेत्र से अभिप्राय सदस्य देशों के बीच ऐसे व्यापार से है जो कस्टम और प्रशुल्क के प्रतिबन्धों से मुक्त हो अर्थात् ऐसा क्षेत्र जिसमें वस्तुओं का स्वतन्त्र आवागमन हो। ‘साफ्टा’ की स्थापना इसी उद्देश्य के लिए की गई थी। यह भी आशा की गई थी कि 21वीं शताब्दी के शुरू होने से पहले ‘साप्टा’ का स्थान साफ्टा ले लेगा। सार्क के 10वें शिखर सम्मेलन (ढाका) में यह निर्णय लिया गया कि साफ्टा’ के सम्बन्ध में एक विशेषज्ञ समिति की स्थापना की जाए जो 2001 की एक सन्धि तक पहुंचने के लिए अपना निष्कर्ष दे। जनवरी, 2004 में इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुए 12वें सार्क शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साप्टा) समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता ‘दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था’ (साप्टा) का स्थान लेगा। इस समझौते के लागू होने से यह आशा की जा सकती है कि इससे दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

प्रश्न 5.
‘सार्क’ से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके मुख्य उद्देश्यों के बारे में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
‘सार्क’ का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। सार्क के उद्देश्य(1) सार्क के सामने सबसे बड़ी समस्या इस क्षेत्र में पायी जाने वाली राजनीतिक असिथरता है। (2) वर्तमान समय में सार्क के सामने दूसरी सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद है। (3) सार्क के सामने एक अन्य समस्या इस क्षेत्र में पाए जाने वाली निर्धरता एवं बेरोज़गारी है।

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प्रश्न 6.
‘सार्क’ की कोई चार उपलब्धियां लिखिए।
उत्तर-

  • सार्क ने इस क्षेत्र में शान्ति की सम्भावनाएं पैदा की हैं।
  • सार्क के माध्यम से कई क्षेत्रों में सहयोग के विकास का प्रयास किया गया है।
  • सार्क देशों ने खाद्यान्नों की सुरक्षा के लिए भण्डार बनाया है।
  • सार्क के कारण दक्षिण एशिया के देश परस्पर समीप आए हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
सार्क से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1-2 अगस्त, 1983 को सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली की बैठक में की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन 78 दिसम्बर, 1985 को ढाका में हुआ। इस प्रकार औपचारिक रूप से सार्क की स्थापना हुई। दक्षेस के सदस्य हैंभारत, मालदीव, पाकिस्तान, बंगला देश, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान और नेपाल।

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प्रश्न 2.
सार्क के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर-

  • दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें।
  • दक्षेस के राज्य अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें।

प्रश्न 3.
सार्क (SAARC) का पूरा नाम लिखें।
उत्तर-
सार्क (SAARC)-दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (South Asian Association for Regional Co-operation)।

प्रश्न 4.
सार्क (SAARC) के कोई चार देशों के नाम बताएं।
उत्तर-
सार्क (SAARC) के चार देश हैं-(1) भारत (2) बांग्लादेश (3) श्रीलंका (4) भूटान।

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प्रश्न 5.
‘सार्क’ की कोई दो उपलब्धियां लिखिए।
उत्तर-

  • सार्क ने इस क्षेत्र में शान्ति की सम्भावनाएं पैदा की हैं।
  • सार्क के माध्यम से कई क्षेत्रों में सहयोग के विकास का प्रयास किया गया है। .

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
दक्षेस (सार्क) का अर्थ लिखें।
उत्तर-
दक्षेस (सार्क) अर्थात् ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक संगठन है, जिसकी स्थापना इन देशों ने आपसी सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से की है।

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प्रश्न 2.
सार्क की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर-
सन् 1985 में।

प्रश्न 3.
सार्क के किसी एक सदस्य देश का नाम लिखें।
उत्तर-
भारत सार्क का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य देश है।

प्रश्न 4.
दक्षेस (SAARC) का कार्यालय कहाँ स्थापित किया गया है ?
उत्तर-
दक्षेस (SAARC) का कार्यालय नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में स्थापित किया गया है।

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प्रश्न 5.
सार्क का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर-
सार्क (SAARC)–दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (South Asian Association for Regional Co-operation)।

प्रश्न 6.
साफ्टा (SAFTA) का पूर्ण रूप लिखिए।
उत्तर-
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (South Asian Free Trade Area)।

प्रश्न 7.
सार्क देशों में कौन-सा देश है, जिसकी सीमाएं सभी सार्क देशों के साथ लगती हैं ?
उत्तर-
भारत की सीमाएं सभी स्पर्क देशों के साथ लगती हैं।

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प्रश्न 8.
सार्क के अब तक कितने सम्मेलन हो चुके हैं ?
उत्तर-
सार्क के अब तक 18-शिखर सम्मेलन हो चुके हैं।

प्रश्न 9.
‘सार्क’ में शामिल देशों के नाम लिखो।
उत्तर-
सार्क में भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालद्वीप तथा अफ़गानिस्तान शामिल हैं।

प्रश्न 10.
अफ़गानिस्तान सार्क का सदस्य कब बना था?
उत्तर-
अफ़गानिस्तान को अप्रैल 2007 में भारत में हुए 14वें सार्क शिखर सम्मेलन में सार्क का सदस्य बनाया गया।

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प्रश्न 11.
वर्तमान समय में सार्क के कितने देश सदस्य हैं ?
उत्तर-
वर्तमान समय में सार्क के 8 सदस्य हैं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. दक्षिण एशिया के सहयोग संगठन को …….. कहते हैं।
2. 70 के दशक में बांग्ला देश के दिवंगत राष्ट्रपति ……….. ने सार्क का विचार दिया।
3. 1-2 अगस्त ……. को दक्षिण एशिया के सात देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक दिल्ली में हुई।
4. सार्क की औपचारिक रूप से स्थापना सन् …….. में हुई।
उत्तर-

  1. सार्क
  2. जिआउर्रहमान
  3. 1983
  4. 1985.

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें

1. सार्क एक राष्ट्रीय संगठन है।
2. सार्क दक्षिण एशियाई देशों का संगठन है।
3. सार्क की स्थापना 1990 में की गई ।
4. सार्क का पहला सम्मेलन ढाका में हुआ।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. सही
  3. ग़लत
  4. सही।

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प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सार्क का उद्देश्य है
(क) दक्षिण एशियाई देशों में सहयोग बढ़े
(ख) दक्षेस के राज्य समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से करें
(ग) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मविश्वास पैदा करना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
सार्क है एक
(क) सर्वव्यापक (संस्था) संगठन
(ख) क्षेत्रीय संगठन
(ग) विश्व संगठन
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन।
उत्तर-
(ख) क्षेत्रीय संगठन

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प्रश्न 3.
सार्क ने ग़रीबी उन्मूलन वर्ष किस वर्ष मनाने का निर्णय किया ?
(क) 1990
(ख) 1995
(ग) 2000
(घ) 2005.
उत्तर-
(ख) 1995

प्रश्न 4.
साप्टा (SAPTA) का अर्थ है
(क) दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था
(ख) दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र
(ग) दक्षिण एशियाई हिंसा क्षेत्र
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(क) दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्य

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 6 लिंग असमानता

Punjab State Board PSEB 12th Class Sociology Book Solutions Chapter 6 लिंग असमानता Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Sociology Chapter 6 लिंग असमानता

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लिंग वर्ग संबंध व्याख्या करता है-
(क) पुरुष व स्त्री में असमानता
(ख) पुरुष शक्ति व स्त्री शक्ति के मध्य संबंध
(ग) पुरुष शक्ति व स्त्री शक्ति पर प्रबलता
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(ख) पुरुष शक्ति व स्त्री शक्ति के मध्य संबंध।

प्रश्न 2.
ट्रांसजेंडर का अर्थ है-
(क) पुरुष
(ख) स्त्री
(ग) तीसरा लिंग वर्ग
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(ग) तीसरा लिंग वर्ग।

प्रश्न 3.
नारीवाद के सिद्धान्त दिए गए हैं-
(क) कार्ल मार्क्स द्वारा
(ख) अगस्त काम्टे द्वारा
(ग) वैबर द्वारा
(घ) इमाइल दुर्थीम द्वारा।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स द्वारा।

प्रश्न 4.
लिंग भेदभाव क्या है ?
(क) व्यावहारिक अधीनता
(ख) निष्कासन
(ग) अप्रतिभागिता
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
लिंग अनुपात का अभिप्राय है
(क) 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या
(ख) 1000 स्त्रियों पर पुरुषों की संख्या
(ग) 1000 स्त्रियों पर बच्चों की संख्या
(घ) स्त्रियों व पुरुषों की संख्या।
उत्तर-
(क) 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 6 लिंग असमानता

B. रिक्त स्थान भरें-

1. …………. से भाव पुरुष प्रधान परिवार में पिता की अहम् भूमिका है।
2. ………….. स्त्रियों की अधीनता से जुड़ा हुआ मौलिक मुद्दा है।
3. ………. नारीवाद पितृवाद के सार्वभौमिक स्वभाव को केन्द्रीय मानते हैं।
4. …………. परिवार पैतृक प्रधान होते हैं।
5. भारत की जनगणना 2011 दर्शाती है कि 1000 पुरुषों पर …….. स्त्रियां हैं।
उत्तर-

  1. पितृपक्ष की प्रबलता
  2. नारीवाद
  3. प्रगतिशील
  4. पितृसत्तात्मक
  5. 943.

C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं-

1. लिंग वर्ग समाजीकरण ने नारी अधीनता को संस्थागत किया है।
2. लिंग अनुपात का अर्थ है 1000 स्त्रियों पर पुरुषों की संख्या।
3. तीसरा लिंग का अर्थ उन व्यक्तियों से है जिनमें पुरुष व स्त्री दोनों प्रकार के लक्षण हों।
4. उदार नारीवाद विश्वास रखता है कि सभी व्यक्ति समान व महत्त्वपूर्ण हैं।
उत्तर-

  1. सही
  2. गलत
  3. सही
  4. सही।

D. निम्नलिखित शब्दों का मिलान करें-

कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
लिंग स्थिति — पिता की अहम् भूमिका
पैतृक प्रधानता — अपेक्षित दृष्टिकोण व व्यवहार
साइमन डे० व्योवर — जैविकीय श्रेणी
लिंग वर्ग भूमिका — विण्डीकेशन ऑफ द राइटस ऑफ वुमन
वाल्स्टोन क्राफ्ट– द सैकण्ड सैक्स
उत्तर-
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
लिंग स्थिति — जैविकीय श्रेणी
पैतृक प्रधानता — पिता की अहम् भूमिका
साइमन डे० व्योवर — द सैकण्ड सैक्स
लिंग वर्ग भूमिका — अपेक्षित दृष्टिकोण व व्यवहार
वाल्स्टोन क्राफ्ट– विण्डीकेशन ऑफ द राइटस ऑफ वुमन

II. अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. लिंग वर्ग सम्बन्ध से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-लिंग वर्ग सम्बन्ध का अर्थ है पुरुष व स्त्री के सम्बन्ध जो विचारधारा, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक मुद्दों पर आधारित है।

प्रश्न 2. लिंग स्थिति की परिभाषा दें।
उत्तर-लिंग स्थिति एक जैविक श्रेणी है जिसमें उन जैविक या मनोवैज्ञानिक विशेषताओं को शामिल किया गया है जिसमें स्त्रियों व पुरुषों के बीच अंतरों को दर्शाया गया है।

प्रश्न 3. 0-6 वर्ष के 1000 लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या क्या कहलाती है ?
उत्तर-इसे बाल लिंग अनुपात कहते हैं।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 6 लिंग असमानता

प्रश्न 4. 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या क्या कहलाती है ?
उत्तर-इसे लिंग अनुपात कहते हैं।

प्रश्न 5. पुरुष प्रधान परिवारों को क्या कहते हैं ?
उत्तर- यह वह परिवार होते हैं जिनमें पिता की प्रधानता होती है तथा घर में पिता की सत्ता चलती है।

प्रश्न 6. लिंग वर्ग की परिभाषा दें।
उत्तर- शब्द लिंग वर्ग समाज की तरफ से बनाया गया है। इस शब्द का अर्थ है वह व्यवहार जो सामाजिक प्रथाओं से बनता है।

प्रश्न 7. लिंग वर्ग सम्बन्ध से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-देखें प्रश्न 1.

प्रश्न 8. पैतृक प्रधानता क्या है ?
उत्तर- यह वह सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पिता की सत्ता चलती है, उसकी आज्ञा मानी जाती है तथा वंश का नाम भी पिता के नाम से ही चलता है।

III. लघु उत्तरों वाले प्रश्न मन

प्रश्न 1.
लिंग (Sex) तथा लिंग वर्ग (Gender) भेदभाव में जाति की क्या भूमिका है ?
उत्तर-
लिंग तथा लिंग वर्ग भेदभाव में जाति की बहुत बड़ी भूमिका है। जाति ने अपने प्रबल समय में स्त्रियों पर बहुत से प्रतिबन्ध लगा दिए। वह शिक्षा नहीं ले सकती थी, घर से बाहर नहीं जा सकती थी, सम्पत्ति नहीं रख सकती थी। इस प्रकार उनकी स्थिति निम्न हो गई तथा लिंग आधारित भेदभाव शुरू हो गया।

प्रश्न 2.
लिंग वर्ग समानता से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
लिंग वर्ग समानता का अर्थ है समाज में लिंग आधारित भेदभाव न हो तथा सभी को समान अधिकार प्राप्त हों। स्त्रियों को भी वह अधिकार प्राप्त हों जो पुरुषों को प्राप्त होते हैं। चाहे संविधान ने सभी को समान अधिकार दिए हैं परन्तु आज भी स्त्रियां समान अधिकारों के लिए जूझ रही हैं।

प्रश्न 3.
क्या लिंग वर्ग समाजीकरण लिंग भेदभाव का संकेत है ? संक्षेप में बताएं।
उत्तर-
जी हां, लिंग वर्ग समाजीकरण वास्तव में भेदभाव का प्रतीक है क्योंकि बचपन से ही बच्चों को लिंग के अनुसार रहने की शिक्षा दी जाती है। उनसे यह आशा की जाती है कि वह अपने लिंग अनुसार स्थापित नियमों के अनुसार व्यवहार करें जिसमें साफ भेदभाव झलकता है।

प्रश्न 4.
क्या पैतृक प्रधानता स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा का कारण है ? संक्षेप में टिप्पणी करें।
उत्तर-
हमारा समाज प्रकृति से ही पैतृक प्रधान है जिसमें पुरुषों की प्रधानता होती है तथा घर के महत्त्वपूर्ण निर्णय पुरुष ही करते हैं। इसमें लड़कियों को सिखाया जाता है कि वह लड़कों से कमज़ोर है जिसका फायदा पुरुष उठाते हैं तथा स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा करते हैं।

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IV. दीर्य उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
नारीवाद के सिद्धान्त से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नारीवाद आन्दोलनों तथा विचारधाराओं का एक संग्रह है जिनका उद्देश्य स्त्रियों के लिए समान राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक अधिकारों को परिभाषित करना, उन्हें स्थापित तथा उनकी रक्षा करना है। इसमें शिक्षा तथा रोज़गार के क्षेत्र में स्त्रियों के लिए समान अवसरों की स्थापना करने की मांग करना शामिल है। नारीवादी सिद्धान्तों का उद्देश्य लिंग आधारित असमानता की प्रकृति तथा कारणों को समझना व इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले लिंग वर्ग भेदभाव की राजनीति तथा शक्ति संतुलन के सिद्धान्तों पर इसके प्रभाव की व्याख्या करना है।

प्रश्न 2.
सार्वजनिक क्षेत्र में लिंग वर्ग भेदभाव के उदाहरण दें।
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं है कि जनतक क्षेत्र में लिंग आधारित भेदभाव होता है। जनतक क्षेत्र का अर्थ है राजनीतिक। अगर हम देश की राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी का प्रतिशत देखें तो यह काफ़ी कम है। देश की संसद् में चुनी जाने वाली स्त्रियों की संख्या कभी भी 15% से अधिक नहीं हुई है। 2009-14 वाली 15वीं लोकसभा में यह संख्या 10% थी जो 2014-19 वाली 16वीं लोकसभा में 12% ही रह गई। इससे हमें लैंगिक भेदभाव का पता चलता है। हमारी वैधानिक संस्थाओं में स्त्रियों के लिए 33% स्थान आरक्षित करने का बिल अभी तक पास नहीं हुआ है जिससे पता चलता है कि लैंगिक भेदभाव चल रहा है। स्थानीय स्वैः संस्थाओं में चाहे स्त्रियों के लिए 33% स्थान आरक्षित हैं परन्तु वास्तव में सारा कार्य उनके पति ही करते हैं जो जनतक क्षेत्र में लिंग वर्ग भेदभाव दर्शाता है।

प्रश्न 3.
लिंग वर्ग भेदभाव में जाति की क्या भूमिका है ?
उत्तर-
अगर हम भारतीय समाज के इतिहास को देखें तो हमें पता चलता है कि लिंग वर्ग भेदभाव का सबसे बड़ा कारण ही जाति प्रथा है। जब हमारे समाज में जाति नहीं थी, उस समय स्त्रियों को बहुत से अधिकार प्राप्त थे तथा समाज में उन्हें ऊँचा दर्जा प्राप्त था। परन्तु जाति प्रथा के आने के पश्चात् यह स्थिति निम्न होनी शुरू हो गई। जाति प्रथा में स्त्रियों को अपवित्र समझा जाता था जिस कारण उनके साथ कई निर्योग्यताएं जोड़ दी गईं। बाल विवाह, दहेज प्रथा जैसी बुराइयों ने स्थिति को और खराब कर दिया। मध्य काल में जाति प्रथा ने स्त्रियों पर और कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए ताकि मुसलमान उनसे विवाह न कर पाएं। इससे स्थिति और खराब हो गई। सती प्रथा तथा बहुविवाह जैसी प्रथाओं ने आग में घी डालने का कार्य किया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लिंग वर्ग भेदभाव में जाति प्रथा की काफ़ी बड़ी भूमिका है।

प्रश्न 4.
लिंग वर्ग भेदभाव में धर्म की क्या भूमिका है ?
उत्तर-
लिंग वर्ग भेदभाव में हम धर्म की भूमिका को नकार नहीं सकते। धर्म ने भी स्त्रियों के प्रति भेदभाव सामने लाने में काफ़ी बड़ी भूमिका अदा की है। धर्म तथा जाति के कारण स्त्रियों को अपवित्र कहा गया। महीने के कुछ दिनों में उनके मंदिर जाने तथा धार्मिक कार्य करने पर पाबंदी लगा दी गई। आज भी इन प्रथाओं का पालन किया जाता है। देश के कई मंदिरों में आज भी स्त्रियां नहीं जा सकती क्योंकि उन्हें अपवित्र समझा जाता है। जब भारत पर दूसरे धर्म के लोगों ने हमला किया तो अलग-अलग धर्मों ने स्त्रियों पर बहुत-सी पाबंदियां लगा दी। ये पाबंदियां आज भी जारी हैं। चाहे आजकल लोगों में पढ़ने-लिखने के कारण धर्म का प्रभाव कम हो गया है परन्तु फिर भी लोग धर्म के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करते तथा धर्म भी लिंग वर्ग भेदभाव का एक कारण बन जाता है।

प्रश्न 5.
नगरीय भारत तथा ग्रामीण भारत में लिंग वर्ग के समाजीकरण पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
लिंग वर्ग समाजीकरण में बच्चों को यह सिखाया जाता है कि उन्होंने अपने लिंग के अनुसार किस प्रकार व्यवहार करना है। लड़कियों को ठीक कपड़े डालने के बारे में बताया जाता है, उन्हें ठीक ढंग से उठने-बैठने के बारे में कहा जाता है, उन्हें एक दायरे में रहना सिखाया जाता है तथा पारिवारिक प्रतिष्ठा का ध्यान रखने के लिए कहा जाता है। लिंग वर्ग समाजीकरण में ही लिंग वर्ग भेदभाव छुपा हुआ है। ग्रामीण भारत में तो यह काफ़ी अधिक होता है क्योंकि लोग कम पढ़े-लिखे होते हैं तथा पुरानी प्रथाओं से जुड़े होते हैं। चाहे नगरीय भारत की शिक्षा दर काफ़ी बढ़ गई है परन्तु फिर भी लड़कियों को एक विशेष ढंग से रहना सिखाया जाता है ताकि वे अपनी सीमा से बाहर न जाएं। यह सब कुछ लिंग वर्ग भेदभाव को ही बढ़ाता है।

V. अति दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
नारीवाद के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
मार्क्सवादी नारीवाद पर चर्चा कीजिए।
अथवा
नारीवाद के उदारवादी सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
अथवा
प्रगतिशील नारीवाद और उदारवादी नारीवाद पर नोट लिखिए।
उत्तर-
नारीवाद आंदोलन तथा विचारधाराओं का एक संग्रह है, जिनका उद्देश्य स्त्रियों के लिए समान राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक अधिकारों को परिभाषित करना, उनकी स्थापना व रक्षा करना है। इसमें शिक्षा तथा रोज़गार के क्षेत्र में स्त्रियों के लिए समान मौकों की स्थापना करने की मांग शामिल है। नारीवादी सिद्धान्तों का उद्देश्य लिंग वर्ग असमानता की प्रकृति तथा कारणों को समझना तथा इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले लिंग वर्ग भेदभाव की राजनीति व शक्ति संतुलन के सिद्धान्तों पर इसके प्रभाव की व्याख्या करना है।

नारीवाद एक विचारधारा है जिसमें कई प्रकार के विचारों को शामिल करते हैं जैसे कि मार्क्सवादी नारीवाद, प्रगतिशील नारीवाद, उदारवादी नारीवाद इत्यादि। यह सिद्धान्त वास्तव में पितृ सत्ता के विचार पर बल देते हुए स्त्रियों के आंदोलन के तर्क का निर्माण करते हैं। नारीवाद का मुख्य मुद्दा स्त्रियों की अधीनता से जुड़ा हुआ है। नारीवाद से संबंधित प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन इस प्रकार हैं-

1. मार्क्सवादी नारीवाद (Marxist Feminism)—यह सिद्धान्त कार्ल मार्क्स के समाजवादी सिद्धान्त में से निकला है। यह सिद्धान्त बताता है कि किस प्रकार स्त्रियों के शोषण को समाज की संरचना में योजनाबद्ध ढंग से बुना गया। उन्होंने पितृ सत्ता तथा पूँजीवाद के सम्बन्धों पर ध्यान केन्द्रित किया। उनके अनुसार स्त्रियों पर अत्याचार विचारधारक प्रभुत्व का परिणाम है जोकि आर्थिक क्रियाओं में से निकला है। फ्रेडरिक एंजल्स के अनुसार पूँजीवाद के विकास तथा व्यक्तिगत सम्पत्ति के सामने आने से समाज में स्त्रियों की स्थिति में काफ़ी परिवर्तन आया है। उनका मानना था कि स्त्रियों की क्रियाएं परिवार में ही सीमित थी जबकि बुर्जुआ परिवार पितृ सत्तात्मक तथा शोषण पर आधारित थे क्योंकि पुरुष हमेशा ध्यान रखते थे कि जायदाद उनके पुत्र के पास ही जाए।

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2. प्रगतिशील नारीवाद (Radical Feminism)-उग्र नारीवाद पितृसत्ता की सर्वव्यापक प्रकृति पर ध्यान केंद्रित करता है तथा बताता है कि पुरुष स्त्रियों को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। Simonede Beauvoir ने एक पुस्तक लिखी ‘The Second Sex’ जिसमें उन्होंने कहा कि, “स्त्रियां पैदा नहीं हुई बल्कि बनाई गई हैं।” उनका कहना था कि गर्भपात अधिकार की मौजूदगी, प्रभावशाली जन्म दर पर नियन्त्रण तथा एक विवाह के खत्म होने से उन्हें अपने शरीर पर अधिक अधिकार होगा। इस विचारधारा के समर्थक विश्वास करते हैं कि स्त्रियों के शोषण का आधार उनका प्रजनन सामर्थ्य है जिस पर पुरुषों का नियन्त्रण होता है। उनका कहना था कि पितृसत्तात्मक प्राकृतिक अथवा आवश्यक नहीं है बल्कि इसकी जड़ें जैविकता से जुड़ी हैं। इससे परिवार में प्राकृतिक श्रम विभाजन हो गया तथा स्त्रियों की स्वतन्त्रता उस समय ही मुमकिन है जब लिंग वर्ग अंतरों को खत्म कर दिया जाए।

3. उदारवादी नारीवाद (Liberal Feminism)–उदारवादी नारीवाद के समर्थकों का विश्वास है कि सभी व्यक्ति महत्त्वपूर्ण हैं तथा सभी के साथ समानता वाला व्यवहार होना चाहिए। Mary Wollstone Craft ने 1972 में एक पुस्तक लिखी ‘Vindication of the Rights of Women’ । आधुनिक नारीवाद की यह प्रथम पुस्तक थी जिसने स्त्रियों के लिए वोट के अधिकार का समर्थन किया। उनका मानना था कि अगर स्त्रियों को प्राकृतिक अधिकारों के अनुसार शिक्षा प्राप्त हो जाए तो राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र में लिंग के अंतर का कोई महत्त्व ही नहीं रहेगा।

प्रश्न 2.
‘स्त्री पैदा नहीं हुई-बनाई गई है’ इस विषय पर अपने विचार विस्तार में दें।
उत्तर-
अस्तित्ववादी कहते हैं कि व्यक्ति पैदा नहीं होता बल्कि वह हमारे विकल्पों का परिणाम है क्योंकि हम स्वयं को अपने साधनों तथा समाज की तरफ से दिए साधनों से बनाते हैं। Simonde Beauvoir ने एक पुस्तक लिखी The Second Sex’ जिसमें उन्होंने मानवीय स्वतन्त्रता की एक अस्पष्ट तस्वीर पेश की कि स्त्रियां अपने शरीर के कारण कौन-सी असुविधाओं के साथ जी रही हैं। इस पुस्तक में उन्होंने बताया कि किस प्रकार स्त्रियां अपने शरीर तथा समय के साथ उसमें आने वाले परिवर्तनों को देखती हैं। यहां वह स्त्री के शरीर को सुविधा व असुविधा के रूप में देखती है तथा स्त्री को स्वतन्त्र तथा दबे हुए व्यक्ति के रूप में देखती है। वास्तव में यह स्त्री पर निर्भर करता है कि वह किस हद तक स्वयं को स्वतन्त्र वस्तु के रूप में देखती है या समाज की तरफ से घूरे जाने वाली वस्तु के रूप में देखती है।

कुछ व्यक्तियों के अनुसार स्त्री एक घूरने वाली वस्तु है जिसकी परिभाषा हम लिखते हैं। De Beauvoir इस विचार को उठाती हैं तथा इसे पुरुषों के स्त्रियों के बारे में विचार पर लागू करती हैं। स्त्री के बारे में यह विचार एक पुरुषों द्वारा परिभाषित संकल्प है जिसमें स्त्री को वस्तु समझा जाता है तथा पुरुष स्वयं को एक Subject समझता है। इस प्रकार शब्द ‘स्त्री’ का वह अर्थ है जो पुरुषों द्वारा दिया गया है। De Beauvoir कहती हैं कि स्त्रियों की जैविक स्थिति उनके विरुद्ध नहीं है बल्कि वह स्थिति है जो सकारात्मक या नकारात्मक बन जाती है। स्त्रियों के जैविक अनुभव जैसे कि गर्भवती होना, माहवारी, शारीरिक अंगों का उभार इत्यादि का स्वयं में कोई अर्थ नहीं है परन्तु विरोधी समाज में इन्हें एक बोझ समझा जाता है तथा पितृ सत्तात्मक समाज में इन्हें स्त्रियों के लिए एक असुविधा के रूप में देखा जाता है।

इस प्रकार चाहे स्त्री प्राकृतिक रूप से पैदा होती है परन्तु उसके बारे में अलग-अलग प्रकार के विचार अलग-अलग समाजों में अलग-अलग ही बनते हैं। कई समाजों में स्त्रियों को उपभोग करने वाली वस्तु समझा जाता है तथा उन पर कई प्रकार के अत्याचार होते हैं जैसे कि बलात्कार, छेड़छाड़, मारना पीटना, घरेलू हिंसा, दहेज, हत्या इत्यादि। यह सब कुछ समाज की मानसिकता के कारण होता है जो स्त्रियों के प्रति बनी हुई है। इस कारण ही राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी कम होती है। परन्तु कई समाज ऐसे भी हैं जहाँ स्त्रियों का काफ़ी सम्मान होता है तथा उनके विरुद्ध कोई अत्याचार नहीं किए जाते। वहां राजनीतिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी काफ़ी अधिक होती है तथा वे समाज के प्रत्येक क्षेत्र में भाग लेती हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह सब कुछ समाज पर निर्भर करता है कि वह स्त्री को किस रूप में देखता है। अगर उन्हें ऊँचा दर्जा नहीं दिया जाएगा तथा घूरने वाली वस्तु समझा जाएगा तो समाज कभी भी प्रगति नहीं कर पाएगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्त्रियां पैदा नहीं होती बल्कि उन्हें बनाया जाता है।

प्रश्न 3.
क्या लिंग वर्ग असमानता भारत के लोकतांत्रिक समाज में वाद-विवाद का विषय है ?
उत्तर-
भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ देश के सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के बहुत से अधिकार समान रूप से दिए गए हैं। हमारा एक मूलभूत अधिकार है कि सम्पूर्ण देश में समानता मौजूद है अर्थात् व्यक्ति किसी भी जाति, लिंग, धर्म, रंग इत्यादि का हो, सब के साथ समान व्यवहार किया जाएगा। परन्तु अगर हम देश में वास्तविकता देखें तो समानता मौजूद नहीं है। बहुत से क्षेत्रों में स्त्रियों के साथ भेदभाव किया जाता है। हम अलग-अलग क्षेत्रों में लैंगिक असमानता की मौजूदगी देख सकते हैं तथा यह ही देश में लोकतांत्रिक समाज के होने पर प्रश्न खड़ा करती है। इसकी कई उदाहरणें हम दे सकते हैं जैसे कि-

(i) देश के निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्त्रियों की भागीदारी अधिक नहीं है। ग्रामीण तथा नगरीय समाजों में स्त्रियों के पास अपनी इच्छा से कुछ करने की स्वतन्त्रता नहीं होती। उन्हें वह ही करना पड़ता है जो उनके परिवार की इच्छा होती है। परिवार की इच्छा के बिना वह कुछ नहीं कर सकती।

(ii) जब भी जाति, रिश्तेदारी या धर्म का सवाल होता है तो स्त्रियों को ही निशाना बनाया जाता है। अगर हम ध्यान से देखें तो हम कह सकते हैं कि स्त्रियां पितृसत्ता की कैदी हैं। उनकी जब भी पुरुषों से तुलना की जाती है तो हमेशा ही उनके साथ भेदभाव होता है जो लोकतन्त्र की आत्मा के विरुद्ध है।

(iii) स्त्रियां सरकारी नौकरियां कर रही हैं तथा प्राइवेट भी। चाहे सरकारी क्षेत्र में स्त्री तथा पुरुष को एक जैसे कार्य के लिए समान वेतन मिलता है परन्तु प्राइवेट क्षेत्र में ऐसा नहीं होता। वहां पर स्त्रियों को पुरुषों से कम वेतन मिलता है तथा उनका काफ़ी शोषण भी किया जाता है जो हमारे मूलभूत अधिकारों के विरुद्ध है।

(iv) कम होता लिंग अनुपात भी हमें लिंग वर्ग भेदभाव के बारे में बताता है। स्त्रियों को एक निशाने के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। राजनीतिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता।

(v) संविधान ने स्त्रियों को समान अधिकार दिए हैं तथा कई कानूनों से उन्हें अपने पिता की सम्पत्ति में अपना हिस्सा लेने का अधिकार दिया गया है। परन्तु अगर वह अपने भाइयों से पिता की सम्पत्ति में हिस्सा मांगती हैं तो उनकी हमेशा आलोचना की जाती है तथा बात न्यायालय तक पहुँच जाती है।

(vi) इन उदाहरणों को देख कर हम कह सकते हैं कि भारतीय समाज के लोकतांत्रिक होने पर प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। जब तक हम स्त्रियों की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में समानता सुनिश्चित नहीं करते, उस समय तक हम अपने देश को सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं कह सकते।

प्रश्न 4.
भारत के राजनीतिक क्षेत्र में लिंग वर्ग भेदभाव की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-
अगर हम भारतीय राजनीति की तरफ देखें तो हमें कुछ ऐसे लक्षण मिल जाएंगे जो लिंग वर्ग भेदभाव को दर्शाते हैं। इनमें से कुछ का वर्णन इस प्रकार है
(i) भारत की राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी काफ़ी कम है। अगर हम 1952 में गठित हुई प्रथम लोकसभा से लेकर 2014 में गठित हुई 16वीं लोकसभा की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि लोक सभा में उनकी भागीदारी काफ़ी कम है। प्रथम लोकसभा में केवल 22 स्त्रियां ही चुनकर आई थीं जो कि 5% के करीब बैठता है। परन्तु 2014 में बनी 16वीं लोकसभा में यह बढ़ कर 66 हो गया जो 12.2% बैठता है। इससे पता चलता है कि लोकसभा में उनकी भागीदारी कितनी कम है। यह सब कुछ नीचे दी गई सूची से स्पष्ट हो जाएगा :
im
इस सूची को देखकर पता चलता है कि इस क्षेत्र में कितनी लिंग वर्ग असमानता मौजूद है।

(ii) राजनीतिक दल भी अधिक स्त्रियों के राजनीतिक क्षेत्र में आने के पक्ष में नहीं हैं। शायद इसका कारण यह है कि हमारा समाज पितृ प्रधान है तथा पुरुष स्त्रियों की आज्ञा मानने को तैयार नहीं होते। हमारी संसद् में एक बिल पेश किया गया था जिसके अनुसार देश की सभी वैधानिक संस्थाओं में स्त्रियों के लिए 33% स्थान आरक्षित रखने का प्रावधान था परन्तु वह बिल कई वर्ष बाद भी पास नहीं हो पाया है। इससे हमें पता चलता है कि राजनीति में किस प्रकार लिंग वर्ग भेदभाव जारी है।

(iii) यह भी देखा गया है कि चाहे स्त्रियां किसी राजनीतिक दल के बड़े नेताओं में शामिल हो जाती हैं परन्तु दल के निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका काफ़ी कम होती है। अगर उन्हें अपनी योग्यता साबित करने का मौका दिया जाता है तो उन्हें दल की महिला विंग का प्रधान बना दिया जाता है ताकि वह स्त्रियों से संबंधित मुद्दों को संभाल सकें। इस प्रकार लिंग वर्ग भेदभाव राजनीतिक दलों में साफ झलकता है।

(iv) हमारे देश में तीन प्रकार की सरकारें मिलती हैं—केंद्र सरकार, राज्य सरकारें तथा स्थानीय स्वैः संस्थाएं। स्थानीय स्वैः संस्थाओं में गांवों तथा नगरों दोनों संस्थाओं में स्त्रियों के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित रखे गए हैं जहां से केवल स्त्रियां ही चुनाव लड़ेंगी। उस स्थान पर स्त्री के चुनाव जीतने के पश्चात् सारा कार्य उनके पति करते हैं वह नहीं। बहुत ही कम स्त्रियां हैं जो अपना कार्य स्वयं करती हैं तथा अपने क्षेत्र का विकास करती हैं।

यहां आकर मुख्य मुद्दा सामने आता है कि राजनीतिक क्षेत्र तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्त्रियों की भागीदारी काफ़ी कम है। वह तो स्वयं को मुक्त रूप से प्रकट कर नहीं सकती हैं तथा विकास की प्रक्रिया से दूर हो जाती हैं।

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प्रश्न 5.
लिंग वर्ग भेदभाव किस प्रकार सर्वपक्षीय विकास में रुकावट है ? (P.S.E.B. 2017)
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं है कि लिंग वर्ग भेदभाव सर्वपक्षीय विकास के रास्ते में एक रुकावट है। हमारा समाज दो लिंगों के आपसी सहयोग पर टिका हुआ है तथा वह हैं पुरुष तथा स्त्री। समाज को चलाने व आगे बढ़ाने के लिए भी दोनों के सहयोग की आवश्यकता होती है। एक के न होने की स्थिति में समाज न तो आगे बढ़ सकेगा व न ही चल सकेगा। लिंग वर्ग भेदभाव तथा सर्वपक्षीय विकास को हम कुछ प्रमुख बिंदुओं पर रख सकते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है

(i) पुराने समय में श्रम विभाजन लिंग के आधार पर होता था। पुरुष खाने का प्रबन्ध करते थे तथा स्त्रियां घर संभालती थीं व बच्चों का पालन-पोषण करती थीं। इस सहयोग के कारण ही समाज ठीक ढंग से आगे बढ़ सका है।

(ii) आजकल के समय में भी पुरुष व स्त्री का सहयोग सर्वपक्षीय विकास के लिए बहुत आवश्यक है क्योंकि अगर दोनों का सहयोग नहीं होगा तो एक घर का विकास नहीं हो सकता, समाज तो बहुत दूर की बात है।

(iii) यह कहा जाता है कि समाज की आधी जनसंख्या स्त्रियां ही हैं। अगर इस आधी जनसंख्या को विकास के क्षेत्र में भागीदार नहीं बनाया जाएगा तथा घर की चारदीवारी में बंद रखा जाएगा तो उस समाज की आय भी आधी ही रह जाएगी। वह आय आवश्यकताओं को ही मुश्किल से पूरा करेगी। परन्तु अगर वह आधी जनसंख्या आय बढ़ाने में भागीदार बनेगी तो परिवार, समाज तथा देश की प्रगति अवश्य हो जाएगी।

यहां हम एक उदाहरण ले सकते हैं भारतीय समाज व पश्चिमी समाजों की। भारतीय समाज में लिंग वर्ग भेदभाव काफ़ी अधिक है जिस कारण कई क्षेत्रों में स्त्रियां अपने मूलभूत अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पाती हैं तथा उन्हें सम्पूर्ण जीवन ही घर की चारदीवारी में व्यतीत करना पड़ता है। वह आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र में भाग नहीं ले सकतीं जिस कारण देश का सर्वपक्षीय विकास नहीं हो सका है। इसके विपरीत अगर हम पश्चिमी देशों की तरफ देखें तो उनके आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी काफ़ी अधिक है। वे पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करती हैं, पढ़ती हैं तथा पैसे कमाती हैं। इस कारण परिवार, समाज तथा देश का सर्वपक्षीय विकास हुआ है। दोनों समाजों की तुलना करके ही हमें अंतर पता चल जाता है। जहां पर लिंग वर्ग भेदभाव होता है, वहां विकास कम है तथा जहां लैंगिक भेदभाव नहीं होता वहां विकास ही विकास होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लैंगिक भेदभाव समावेशी विकास के रास्ते में एक रुकावट है।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न (OTHER IMPORTANT QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लिंग के आधार पर समाज में कितने वर्ग मिलते हैं ?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार।
उत्तर-
(ख) दो।

प्रश्न 2.
लिंग शब्द एक ………. शब्द है।
(क) सामाजिक
(ख) जैविक
(ग) सामाजिक सांस्कृतिक
(घ) राजनीतिक।
उत्तर-
(ख) जैविक।

प्रश्न 3.
शब्द लिंग वर्ग कहां पर तैयार होता है ?
(क) घर
(ख) समाज
(ग) देश
(घ) संसार।
उत्तर-
(ख) समाज।

प्रश्न 4.
जब लिंग के आधार पर अंतर रखा जाता है तो उसे ……. कहते हैं।
(क) लिंग वर्ग समाजीकरण
(ख) लिंग वर्ग समानता
(ग) लिंग वर्ग भेदभाव
(घ) लिंग वर्ग संबंध।
उत्तर-
(ग) लिंग वर्ग भेदभाव।

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प्रश्न 5.
Simone de Beauvoir ने कौन-सी पुस्तक लिखी थी ?
(क) The Second Sex
(ख) The Third Sex
(ग) The Second Job
(घ) The Third Job.
उत्तर-
(क) The Second Sex.

प्रश्न 6.
प्रगतिशील नारीवाद किस चीज़ पर बल देता है ?
(क) पितृसत्ता
(ख) मातृसत्ता
(ग) लोकतन्त्र
(घ) राजशाही।
उत्तर-
(क) पितृसत्ता।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. संसार में दो प्रकार के लिंग …… तथा ………. पाए जाते हैं।
2. लिंग वर्ग असमानता का मुख्य कारण ……………… है।
3. …………. का अर्थ है घर में पिता की सत्ता।
4. मार्क्सवादी नारीवाद पितृ सत्ता तथा …………. के बीच संबंधों पर ध्यान देते हैं।
5. ………… ने किताब The Second Sex लिखी थी।
6. ………… का अर्थ पुरुष प्रधान समाज में पिता का शासन है।
उत्तर-

  1. स्त्री, पुरुष
  2. पितृसत्ता
  3. पितृसत्ता
  4. पूँजीवाद
  5. Simone de Beauvoir
  6. पैतृकता।

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C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं-

1. प्रगतिशील नारीवाद कहता है कि सभी व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है।
2. प्रगतिशील नारीवाद कहता है कि स्त्रियों को दबाने में पुरुषों की काफ़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
3. बच्चों को लिंग अनुसार शिक्षा देने को लिंग वर्ग समाजीकरण कहते हैं।
4. लिंग वर्ग समाजीकरण भेदभाव बढ़ाने वाली प्रक्रिया है।
5. 2011 में 1000 पुरुषों के पीछे 914 स्त्रियां (0-6 वर्ष) थीं।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही
  5. सही।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. क्या समाज में स्त्रियों के साथ भेदभाव होता है ?
उत्तर-जी हां, समाज में स्त्रियों के साथ भेदभाव होता है।

प्रश्न 2. करवाचौथ क्या होता है ?
उत्तर-पत्नी अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती है जिसे करवाचौथ कहते हैं।

प्रश्न 3. पितृसत्ता में किसकी आज्ञा मानी जाती है ?
उत्तर-पितृसत्ता में घर के पुरुषों की आज्ञा मानी जाती है।

प्रश्न 4. लिंग क्या है ?
उत्तर-लिंग एक जैविक शब्द है जो पुरुष तथा स्त्री के बीच शारीरिक अंतरों के बारे में बताता है।

प्रश्न 5. लिंग वर्ग क्या है ?
उत्तर-लिंग वर्ग समाज की तरफ से बनाया गया शब्द है जिसमें बहुत सारे हालात आ जाते हैं जिनमें पुरुष व स्त्री के संबंध चलते हैं।

प्रश्न 6. लिंग वर्ग संबंधों में हम किस वस्तु का अध्ययन करते हैं ?
उत्तर-लिंग वर्ग संबंधों में हम लिंग वर्ग अधीनता का अध्ययन करते हैं।

प्रश्न 7. लिंग वर्ग समाजीकरण की नींव किस पर टिकी हई है ?
उत्तर-लिंग वर्ग समाजीकरण की नींव क्या, क्यों तथा क्या नहीं करना है पर टिकी हुई है।

प्रश्न 8. लिंग वर्ग समाजीकरण क्या है ?
उत्तर-जब समाज अपने बच्चों को लिंग के अनुसार व्यवहार करना सिखाता है, उसे लिंग वर्ग समाजीकरण कहते हैं।

प्रश्न 9. लिंग वर्ग भेदभाव क्या है ?
उत्तर-जब समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो उसे लिंग वर्ग भेदभाव कहते हैं।

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प्रश्न 10. लिंग अनुपात क्या होता है ?
उत्तर-एक विशेष क्षेत्र में 1000 पुरुषों के पीछे स्त्रियों की संख्या को लिंग अनुपात कहते हैं।

प्रश्न 11. कम होते लिंग अनुपात का मुख्य कारण क्या है ?
उत्तर-कम होते लिंग अनुपात का मुख्य कारण है लिंग आधारित गर्भपात तथा लड़का प्राप्त करने की इच्छा।

III. अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जब हम लिंग वर्ग संबंधों की बात करते हैं तो किसके बारे में सोचते हैं ?
उत्तर-
जब हम लिंग वर्ग संबंधों की बात करते हैं तो चार बातों के बारे में सोचते हैं-

  • पुरुष व स्त्री के बीच असमानताएं।
  • पुरुष शक्ति व स्त्री शक्ति के बीच संबंध।
  • पुरुष शक्ति का स्त्रियों पर प्रभुत्व का अध्ययन करना।
  • आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी।

प्रश्न 2.
लिंग तथा लिंग वर्ग में क्या अंतर है ?
उत्तर-
लिंग एक जैविक धारणा है जो पुरुष तथा स्त्री के बीच शारीरिक अंतरों को दर्शाता है जबकि लिंग वर्ग समाज द्वारा बनाई गई एक धारणा है जिसमें वे राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा आर्थिक प्रस्थापनाएं होती हैं जिनमें स्त्री व पुरुष कार्य करते हैं।

प्रश्न 3.
लिंग वर्ग संबंध का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
लिंग वर्ग संबंध का अर्थ है स्त्रियों व पुरुषों के वह संबंध जो विचारधारक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक मुद्दों पर आधारित होते हैं। इसमें हम लिंग वर्ग प्रभुत्व, स्त्रियों की स्थिति को ऊँचा करने के मुद्दे तथा स्त्रियों से संबंधित समस्या को देखा जाता है।

प्रश्न 4.
लिंग वर्ग संबंधों में हम किन मुद्दों की बात करते हैं ?
उत्तर-
लिंग वर्ग संबंधों में हम कई मुद्दों की बात करते हैं जैसे कि विवाह तथा परिवार की संस्था, विवाह से पहले संबंध, वैवाहिक संबंध, विवाह के बाद बनने वाले संबंध, समलैंगिकता का मुद्दा, तीसरे लिंग का मुद्दा इत्यादि।

प्रश्न 5.
अलग-अलग समाजों में स्त्रियों की अधीनता किस पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
अलग-अलग समाजों में स्त्रियों की अधीनता कई मुद्दों पर निर्भर करती है : जैसे कि वर्ग, जाति, धर्म, शिक्षा, सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जिस प्रकार की समाज की प्रकृति होगी उस प्रकार की स्त्रियों की अधीनता होगी।

प्रश्न 6.
लिंग वर्ग समाजीकरण का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
लिंग वर्ग समाजीकरण का अर्थ है वह ढंग जिनसे समाज ध्यान रखता है कि बच्चे अपने लिंग से संबंधित ठीक व्यवहार सीखें। यह बच्चों को उनके लिंग अनुसार अलग-अलग समूहों में विभाजित कर देता है। इस प्रकार इससे समाज मानवीय व्यवहार को नियन्त्रित करता है।

प्रश्न 7.
लिंग वर्ग भेदभाव का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
सम्पूर्ण जनसंख्या के बड़े हिस्से अर्थात् स्त्रियों से अधीनता, निष्काषन तथा गैर-भागीदारी वाला व्यवहार किया जाता है तथा उन्हें दरकिनार व नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इस प्रकार के व्यवहार को लिंग वर्ग भेदभाव कहा जाता है।

प्रश्न 8.
लिंग अनुपात का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
एक विशेष क्षेत्र में 1000 पुरुषों की तुलना में मौजूद स्त्रियों की संख्या को लिंग अनुपात का नाम दिया जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का लिंग अनुपात 1000 : 914 (0-6 वर्ष) था।

IV. लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अलग-अलग कालों में स्त्रियों की स्थिति।
उत्तर-
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी तथा ऊंची थी। इस काल में स्त्री को धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों को पूर्ण करने के लिए आवश्यक माना जाता है। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों का आदर सम्मान कम हो गया।

बाल-विवाह शुरू हो गए जिससे उसे शिक्षा प्राप्त करनी मुश्किल हो गई। स्मृति काल में स्त्री की स्थिति और निम्न हो गई। उसे हर समय निगरानी में रखा जाता था तथा उसका सम्मान केवल मां के रूप में ही रह गया था। मध्य काल में तो जाति प्रथा के कारण उसे कई प्रकार के प्रतिबन्धों के बीच रखा जाता था परन्तु आधुनिक काल में उसकी स्थिति को ऊंचा उठाने के लिए कई प्रकार की आवाजें उठीं तथा आज उसकी स्थिति मर्दो के समान हो गई है।

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प्रश्न 2.
स्त्रियों की निम्न स्थिति के कारण।
उत्तर-

  • संयुक्त परिवार प्रथा में स्त्री को घर की चारदीवारी तथा कई प्रकार के प्रतिबन्धों में रहना पड़ता था जिस कारण उसकी स्थिति निम्न हो गई।
  • समाज में मर्दो की प्रधानता तथा पितृ सत्तात्मक परिवार होने के कारण स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न हो गई।
  • बाल विवाह के कारण स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने का मौका प्राप्त नहीं होता था जिससे उनकी स्थिति निम्न हो गई।
  • स्त्रियों के अनपढ़ होने के कारण वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं थीं तथा उनकी स्थिति निम्न ही रही।
  • स्त्रियां मर्दो पर आर्थिक तौर पर निर्भर होती थीं जिस कारण उन्हें अपनी निम्न स्थिति को स्वीकार करना पड़ता था।

प्रश्न 3.
स्त्रियों की धार्मिक निर्योग्यताएं।
उत्तर-
वैदिक काल में स्त्रियों को धार्मिक कर्म-काण्डों के लिए आवश्यक माना जाता था परन्तु बाल विवाह के शुरू होने से उनका धार्मिक ज्ञान ख़त्म होना शुरू हो गया जिस कारण उन्हें यज्ञों से दूर किया जाने लगा। शिक्षा प्राप्त न कर सकने के कारण उनका धर्म सम्बन्धी ज्ञान ख़त्म हो गया तथा वह यज्ञ तथा धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं कर सकती थी। आदमी के प्रभुत्व के कारण स्त्रियों के धार्मिक कार्यों को बिल्कुल ही ख़त्म कर दिया गया। उसको मासिक धर्म के कारण अपवित्र समझा जाने लगा तथा धार्मिक कार्यों से दूर कर दिया गया।

प्रश्न 4.
स्त्रियों की आर्थिक निर्योग्यताएं।
उत्तर-
स्त्रियों को बहुत-सी आर्थिक निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था। वैदिक काल में तो स्त्रियों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त था परन्तु समय के साथ-साथ यह अधिकार ख़त्म हो गया। मध्य काल में वह न तो सम्पत्ति रख सकती थी तथा न ही पिता की सम्पत्ति में से हिस्सा ले सकती थी। वह कोई कार्य नहीं कर सकती थी जिस कारण उसे पैसे के सम्बन्ध में स्वतन्त्रता हासिल नहीं थी। आर्थिक तौर पर वह पिता, पति तथा बेटों पर निर्भर थी।

प्रश्न 5.
स्त्रियों की स्थिति में आ रहे परिवर्तन।
उत्तर-

  • पढ़ने-लिखने के कारण स्त्रियां पढ़-लिख रही हैं।
  • औद्योगिकीकरण के कारण स्त्रियां अब उद्योगों तथा दफ्तरों में कार्य कर रही हैं।
  • पश्चिमी संस्कृति के विकास के कारण उनकी मानसिकता बदल रही है तथा उन्हें अपने अधिकारों का पता चल रहा है।
  • भारत सरकार ने उन्हें ऊपर उठाने के लिए कई प्रकार के कानूनों का निर्माण किया है जिस कारण उनकी स्थिति ऊंची हो रही है।

प्रश्न 6.
लिंग।
उत्तर-
साधारणतया शब्द लिंग को पुरुष तथा स्त्री के बीच के शारीरिक तथा सामाजिक अंतरों को बताने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि मर्द तथा स्त्री में कौन-से शारीरिक अंतर है जोकि प्रकृति से ही प्राप्त होते हैं तथा कौन-से सामाजिक अंतर हैं जोकि दोनों को समाज में रहते हुए प्राप्त होते हैं। इन अंतरों को बताने के लिए शब्द लिंग का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 7.
लैंगिक भेदभाव।
उत्तर-
साधारण शब्दों में पुरुष तथा स्त्री में मिलने वाले अंतरों को लैंगिक भेदभाव अथवा अंतर का नाम दिया जाता है। संसार में दो तरह के मनुष्य मर्द तथा स्त्री रहते हैं। किसी भी मनुष्य को उसके शारीरिक लक्षणों के आधार पर देख कर ही पहचाना जा सकता है कि वह पुरुष है अथवा स्त्री। प्रकृति ने भी इनमें कुछ अन्तर किया है। पुरुष तथा स्त्री के अपने-अपने अलग ही शारीरिक लक्षण हैं। इन लक्षणों के आधार पर मर्द तथा स्त्री में अंतर तथा भेदभाव किया जा सकता है। इस प्रकार पुरुष तथा स्त्री में जो अंतर पाया जाता है उसे ही लैंगिक अंतर अथवा भेदभाव का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 8.
लैंगिक अंतर का प्राकृतिक कारण।
उत्तर-
लैंगिक अंतर की शुरुआत तो प्रकृति ने ही की है। मनुष्य को भी प्रकृति ने ही बनाया है। प्रकृति ने दो प्रकार के मनुष्यों-पुरुष तथा स्त्री को बनाया है। पुरुषों को प्रकृति ने दाढ़ी, मूंछे, शरीर पर बाल, कठोरता इत्यादि दिए हैं परन्तु स्त्रियों को सुन्दरता, कोमल स्वभाव, प्यार से भरपूर बनाया है। प्रकृति ने ही मनुष्यों को कठोर कार्य, पैसे तथा रोटी कमाने का कार्य दिया है जबकि स्त्रियों को आसान कार्य दिए हैं। इस प्रकार प्रकृति ने ही लैंगिक अंतर उत्पन्न किए हैं।

प्रश्न 9.
लैंगिक भेदभाव का सामाजिक कारक।
उत्तर-
प्रकृति ने तो लैंगिक अंतर उत्पन्न किए हैं परन्तु मनुष्य ने भी सामाजिक तौर पर अंतर उत्पन्न किए हैं। समाज में बहुत से ऐसे कार्य हैं जो पुरुषों के लिए रखे गए हैं स्त्रियों के लिए नहीं। प्राचीन समय से ही स्त्रियों से भेदभाव किया जाता रहा है तथा अंतर रखा जाता रहा है। स्त्रियों को प्राचीन समय से ही शिक्षा तथा सम्पत्ति से दूर रखा गया है। उन्हें केवल घर तक ही सीमित रखा गया है। स्त्रियों से सम्बन्धित निर्णय भी पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं तथा उनका स्त्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण होता है। चाहे आधुनिक समाजों में यह अंतर कम हो रहा है। परन्तु परम्परागत समाजों में यह अभी भी कायम है।

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V. बड़े उत्तरो वाले प्रश्न-

प्रश्न 1.
लिंग का क्या अर्थ है ? समाज का निर्माण करने के रूप में इस की व्याख्या करो।
अथवा
सामाजिक रचना के रूप में लिंग-रूप के ऊपर नोट लिखें।
उत्तर-
साधारणतया शब्द लिंग को आदमी तथा औरत के बीच शारीरिक तथा सामाजिक अन्तर को बताने के लिए प्रयोग किया जाता है। इस का अर्थ यह है कि आदमी तथा औरत के बीच कौन-से शारीरिक अन्तर हैं जोकि प्रकृति से ही प्राप्त होते हैं तथा कौन से सामाजिक अन्तर हैं जोकि दोनों को समाज में रहते हुए प्राप्त होते हैं। इन अन्तरों को बताने के लिए शब्द लिंग का प्रयोग किया जाता है। यदि हम जैविक पक्ष से इसे देखें तो हमें पता चलता है कि आदमी तथा औरत में बहुत से जैविक अन्तर हैं जैसे कि कामुक अंग तथा और अंगों का उभार इत्यादि अथवा आदमी का औरत से अधिक परिश्रम वाले कार्य कर सकना।

इस तरह यदि हम सामाजिक रूप से देखेंगे हमें पता चलता है कि समाज में रहते हुए भी आदमी तथा औरत में बहुत से सामाजिक अन्तर होते हैं। उदाहरणतः पितृसत्तात्मक समाज तथा मातृसत्तात्मक समाज पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष का हुक्म चलता है, सभी को पुरुष का कहना मानना पड़ता है, पिता पैसे कमाता है तथा औरत घर की देखभाल करती है पितृसत्तात्मक समाजों में स्त्री की स्थिति बहुत ही निम्न होती है। उस को बच्चों की मां या घर की नौकरानी से बढ़कर स्थिति प्राप्त नहीं होती है। इस तरह पितृसत्तात्मकता समाजों में पिता की स्थिति सबसे उच्च होती है, वही समाज का कर्ताधर्ता होता है तथा वंश भी उस के नाम पर ही चलता है। जायदाद भी पिता के बाद उसके पुत्र को ही प्राप्त होती है। दूसरी तरफ मातृसत्तात्मक समाजों में आदमी की स्थिति औरत से निम्न होती है। समाज तथा परिवार को औरतें चलाती हैं। औरतों को प्रत्येक प्रकार की शक्ति प्राप्त होती है। औरतें ही परिवार को कर्ता-धर्ता होती हैं। वंश मां के नाम पर चलता है। विवाह के बाद आदमी औरत के घर रहने जाता है तथा जायदाद मां के बाद बेटी को या भानजे को प्राप्त होती है।

इस उदाहरण से यह पता चलता है कि सिर्फ जैविक रूप से ही लैंगिक अन्तर नहीं होता बल्कि सामाजिक रूप से भी लिंग अन्तर देखने को मिलता है। हमें समाज में रहते हुए ऐसी बहुत सी उदाहरणें मिल जाएंगी जिनसे हमें लिंग अन्तर के बारे में पता चलेगा। परन्तु समाजशास्त्रियों के अनुसार लिंग का अर्थ कुछ अलग ही है। समाजशास्त्री इस शब्द की सम्पूर्ण व्याख्या करने के पक्ष में हैं तथा इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि किस हद तक लैंगिक व्यवहार प्राकृतिक है, सामाजिक है या मनुष्यों द्वारा निर्मित है। समाजशास्त्री लिंग शब्द को दो अर्थों में लेते हैं-

(1) पहला अर्थ है आदमी तथा औरत के बीच कौन-से जैविक तथा शारीरिक अन्तर हैं। इस का अर्थ यह है कि कौन-से जैविक तथा शारीरिक अन्तरों के कारण हम आदमी तथा औरत को एक-दूसरे से अलग कर सकते हैं। यह अन्तर प्राकृतिक होते हैं तथा मनुष्य का इन पर कोई वश नहीं चलता है।

(2) लिंग शब्द का दूसरा अर्थ मनुष्य के व्यवहार तथा भूमिकाओं में सामाजिक तथा सांस्कृतिक अन्तर से है। इस का अर्थ यह है कि समाज में रहते हुए मनुष्यों के व्यवहार में कौन-सा अन्तर होता है जिस से हमें लैंगिक अन्तर (आदमी तथा औरत) का पता चलता है। यह अन्तर समाज में ही निर्मित होते हैं तथा मनुष्य इनका निर्माण करता है।

इस तरह समाजशास्त्री लिंग शब्द का अर्थ दो हिस्सों में लेते हैं। पहले हिस्से में जैविक अन्तर आते हैं जो प्रकृति पर निर्भर करते हैं। दूसरे हिस्से में सामाजिक तथा सांस्कृतिक अन्तर आते हैं जोकि मनुष्य द्वारा ही निर्मित होते हैं जैसे कि प्राचीन समय में स्त्री को उपनयान संस्कार नहीं करने दिया जाता था। परन्तु यहां महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह आगे आता है कि समाज में रहते हुए आदमी तथा औरत का व्यवहार जैविक कारणों की तरफ से निर्धारित होता है या सामाजिक सांस्कृतिक कारणों से ? उन दोनों का व्यवहार कौन से कारणों से प्रभावित होता है ? क्या आदमी तथा औरत प्राकृतिक रूप से ही एक-दूसरे से अलग हैं या फिर उनके बीच के अन्तर समाज में ही निर्मित होते हैं ? क्या आदमी जन्म से ही तार्किक तथा तेज़ हैं और औरतें प्राकृतिक रूप से ही शांत तथा सहनशील है क्या सिर्फ आदमी ही घर से बाहर जाकर कार्य करेंगे तथा पैसा कमाएंगे तथा औरतें घर तथा बच्चों की देखभाल करेंगी। क्या औरतें घरों से बाहर जाकर पैसा नहीं कमा सकतीं तथा आदमी घर की देखभाल नहीं कर सकते ? इस तरह के प्रश्न बहुत ही गम्भीर हैं तथा इस प्रकार के प्रश्नों पर गौर करना बहुत ज़रूरी है । इस तरह के प्रश्नों को देखते हुए हमारे सामने इन प्रश्नों को हल करने के लिए दो विचार हमारे सामने आते हैं। पहला विचार प्रकृतिवादियों (Naturists) ने दिया है तथा दूसरा विचार समाजशास्त्रियों (Sociologists) ने दिया है। इन दोनों के विचारों का वर्णन इस प्रकार हैं

(1) प्रकृतिवादी यह विचार देते हैं कि समाज में दोनों ही लिंगों में जो भी सामाजिक सांस्कृतिक अन्तर हैं वह सिर्फ जैविक अन्तरों के कारण है। इसका अर्थ यह है कि दोनों लिंगों के बीच सामाजिक सांस्कृतिक अन्तरों का आधार सामाजिक नहीं बल्कि जैविक है। जो भी अन्तर प्रकृति ने मनुष्यों को दिए हैं उन के कारण ही सामाजिक सांस्कृतिक अन्तर पैदा होते हैं। आदमी को औरत से ज्यादा शक्तिशाली माना जाता है तथा होते भी हैं तथा इस कारण ही वह समाज की व्यवस्था रखते हैं। औरतों को प्रकृति ने बच्चे पैदा करने तथा पालने का कार्य दिया है क्योंकि उनको प्यार, सहनशीलता तथा ध्यान रखने के गुण जन्म से ही प्राप्त होते हैं। उनको सहनशीलता तथा प्यार करना सिखाना नहीं पड़ता बल्कि यह गुण तो प्रत्येक औरत में जन्मजात ही होते हैं। इस तरह आदमी तथा औरत में प्राचीन समाज से ही श्रम विभाजन की व्यवस्था चली आ रही है कि आदमी घर से बाहर जाकर कार्य करेगा या परिश्रम करेगा तथा औरतें घर की देखभाल करेंगी तथा बच्चों का पालन-पोषण करेंगी। इसका कारण यह है कि प्रत्येक मनुष्य को जन्म से ही कुछ कार्य करने के गुण प्राप्त हो जाते हैं तथा वह करता भी है।

प्रकृतिशास्त्रियों का यह विचार डार्विन के उद्विकास के सिद्धान्त का ही एक हिस्सा है। परन्तु यह विचार डार्विन के विचार से भी आगे निकल गया है। प्रकृतिशास्त्रियों का कहना है कि प्रत्येक प्राणी उद्विकास की प्रक्रिया से होकर निकलता है अर्थात् वह छोटे से बड़ा तथा साधारण से जटिल की तरफ बढ़ता है। उदाहरणतः आदमी तथा औरत के संभोग से भ्रूण पैदा होता है तथा उस से धीरे-धीरे वह भ्रूण एक बच्चा बन जाता है। इस तरह प्रत्येक प्राणी निम्न स्तर से शुरू होकर उच्च स्तर की तरफ बढ़ता है। प्राणिशास्त्रियों का कहना है कि जैविक स्तर पर स्त्री तथा पुरुष एक-दूसरे से अलग हैं तथा दोनों ही अलग-अलग प्रकार से जीवन जीते हैं। परन्तु आदमी औरत से अधिक शक्तिशाली हैं इस कारण समाज में उनकी उच्च स्थिति है, उनकी सत्ता चलती है तथा फैसले लेने में उनका सबसे बड़ा हाथ होता है।

परन्तु यहां आकार सामाजिक मानवशास्त्रियों का कहना है कि आदमी तथा औरत में शारीरिक अन्तर हैं परन्तु इन्होंने इन शारीरिक अन्तरों को सामाजिक भूमिकाओं के साथ जोड़ दिया है। मोंक के अनुसार आदमी तथा औरत के बीच शारीरिक अन्तर समाज में लैंगिक श्रम विभाजन का आधार है। इस का अर्थ यह है कि चाहे आदमी तथा औरत के बीच शारीरिक अन्तर हैं परन्तु यह शारीरिक अन्तर ही समाज में आदमी तथा औरत के बीच श्रम विभाजन का आधार भी हैं। इसका कहना था कि आदमी क्योंकि शक्तिशाली होते हैं तथा औरतें बच्चों को पालने में सामर्थ्य होती हैं इस कारण यह श्रम विभाजन ही लैंगिक भूमिकाओं को निर्धारित करता है। इसी तरह पारसंज़ के अनुसार औरतें ही आदमी को प्यार, हमदर्दी, भावनात्मक मज़बूती इत्यादि देती हैं क्योंकि यह गुण उन्हें जन्म से ही प्राप्त हो जाते हैं तथा यही गुण किसी भी बच्चे के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आदमी बाहर के कार्य करते हैं तथा औरतें घर के कार्य करती हैं। उसके अनुसार समाज में आदमी तथा औरत के बीच साफ़ तथा स्पष्ट श्रम विभाजन होना चाहिए ताकि सामाजिक व्यवस्था ठीक प्रकार से कार्य कर सके।

परन्तु मर्डोक तथा पारसंज़ के विचारों की भी आलोचना हुई है। कई प्रकृतिशास्त्रियों ने इस विचार का खण्डन किया है कि सामाजिक भूमिका का निर्धारण जैविक अन्तरों के कारण होता है। उन का कहना है कि माता तथा पिता दोनों ही बच्चों का ध्यान रखते हैं तथा ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे की भूमिका भी निभाते हैं। उनके अनुसार आजकल औरतें भी मर्दो के शक्ति के प्रयोग करने वाले कार्य करने लग गई हैं जैसे सेना में भर्ती होना, खदानों में तथा बड़ी-बड़ी इमारतों के निर्माण के कार्य करना इत्यादि। इस तरह उनका कहना है कि सामाजिक भूमिकाओं का निर्धारण जैविक अन्तरों के . कारण नहीं होता है तथा जैविक अन्तर ही लिंग भूमिका के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण है।

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(2) समाजशास्त्रीय विचार (Sociological view)—दूसरी तरफ समाजशास्त्रीय विचार प्रकृतिशास्त्रियों के विचार के बिल्कुल ही विपरीत है। वह प्रकृतिशास्त्रियों के इस विचार को बिल्कुल ही नकारते हैं कि जैविक अन्तर ही लिंग भूमिका का निर्धारण करते हैं। वह कहते हैं कि लैंगिक भूमिका जैविक कारणों का कारण निर्धारित नहीं होती बल्कि यह तो समाज में ही निर्मित होती है तथा संस्कृति द्वारा निर्धारित होती है। व्यक्ति को समाज में रहते हुए बहुत-सी भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं। चाहे कई बार यह भूमिका लिंग के आधार पर प्राप्त होती है जैसे कि माता या पिता। परन्तु बहुत-सी भूमिकाएं समाज की संस्कृति के अनुसार व्यक्ति को प्राप्त होती है। उनका कहना है कि हमारे अलग-अलग समाजों में बहुत-सी उदाहरणों से पता चलता है कि बच्चे पैदा करने को छोड़कर समाज में कोई भी कार्य औरतों के लिए आरक्षित नहीं है। इस का अर्थ यह है कि औरतें किसी भी कार्य को कर सकती हैं, उनके लिए कोई विशेष कार्य निर्धारित नहीं है। औरतों का लैंगिक आधार उन को किसी भी कार्य को करने से रोक नहीं सकता वह प्रत्येक प्रकार का कार्य कर सकती हैं। यहां तक कि मां की भूमिका भी समाज तथा संस्कृति द्वारा बनाई गई होती है। हमारे पास बहुतसी उदाहरणें मौजूद हैं जिन से पता चलता है कि जिन बच्चों की मां नहीं होती उन के पिता ही मां की भूमिका भी निभाते हैं। इस तरह समाजशास्त्रियों का विचार है कि लैंगिक भूमिका में निर्धारण में सामाजिक कारकों का बहुत बड़ा हाथ है।

समाज निर्माण में लिंग की भूमिका (Role of Gender in Social Construct)-

लैंगिक भूमिकाएँ जैविक कारणों के कारण नहीं सांस्कृतिक कारणों के कारण पैदा होती हैं। हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मनुष्य समाज में रह कर ही आदमी तथा औरत की भूमिका निभाना सीखते हैं। उनको जन्म के बाद ही पता नहीं लग जाता कि वह लड़का है या लड़की। समाज में रहते-रहते, लोगों के व्यवहार करने के ढंगों से उसको अपने लिंग के बारे में पता चल जाता है। अब हम इसको समाजीकरण के रूप में देखेंगे। व्यक्ति को जंगली से इन्सान बनाने में समाजीकरण का बहुत बड़ा हाथ होता है। समाजीकरण करने में दोनों लिंगों का हिस्सा होता है। इस को लैंगिक समाजीकरण का नाम दिया जाता है।

समाजीकरण (Socialization)—समाजशास्त्र में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण संकल्प आता है समाजीकरण। समाजीकरण की प्रक्रिया वह प्रक्रिया है जिससे मनुष्य समाज में रहने के तौर-तरीके तथा व्यवहार करने के तरीके सीखता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति समाजिक भूमिकाओं को निभाना सीखता है। इस प्रकार से लैंगिक समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें आदमी तथा औरत अपने लिंग के अनुसार व्यवहार करना सीखते हैं। यह वह प्रक्रिया है जो बच्चे के जन्म के बाद ही शुरू हो जाती है तथा व्यक्ति के मरने तक चलती रहती है। हमारी लैंगिक भूमिका बहुत ही जल्दी शुरू हो जाती है तथा बच्चे को ही अपने लिंग के अनुसार भूमिका निभाने का पता चल जाता है। इस प्रक्रिया के कई स्तर हैं तथा यह स्तर इस प्रकार हैं

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(1) लिंग सम्बन्धी भूमिका का निर्धारण जन्म के कुछ समय बाद ही शुरू हो जाता है। 1-2 साल के बच्चे को भी इस बारे में पता चल जाता है क्योंकि परिवार के सदस्य उसके साथ उसके लिंग के अनुसार ही व्यवहार करते हैं तथा उसका सम्बोधन भी उसी के अनुसार ही होता है। लड़की के साथ लड़के की तुलना में कुछ कोमल व्यवहार होता है। लड़के को शक्तिशाली तथा लड़कियों से ज्यादा तेज़ समझा जाता है। मां-बाप भी बच्चे के लिंग के अनुसार उस से व्यवहार करते हैं चाहे व्यवहार में अन्तर बहुत कम होता है। दोनों लिंगों के बच्चों को अलग-अलग प्रकार के कपड़े पहनाए जाते हैं, अलग-अलग रंग के कपड़े पहनाए जाते हैं, उनके साथ बोलने का, सम्बोधन का, व्यवहार करने का तरीका भी अलग होता है। यहां तक कि यदि बच्चे को सज़ा देनी होती है तो वह भी उसके लिंग के अनुसार ही दी जाती है। इस तरह जन्म के कुछ समय बाद ही लैंगिक समाजीकरण शुरू हो जाता है तथा सारी उम्र चलता रहता है।

(2) लैंगिक समाजीकरण का दूसरा स्तर बचपन में शुरू हो जाता है जब बच्चा खेल समूह में तथा खेलों में भाग लेता है। बच्चा अपने लिंग के अनुसार ही खेल समूह में भाग लेता है। लड़की, लड़कियों के साथ खेलती है तथा लड़कालड़कों के साथ खेलता है। इस समय पर आकर दोनों लिंगों की खेलों में भी अन्तर आ जाता है। लड़के अधिक परिश्रम वाली खेलें खेलते हैं तथा लड़कियां कम परिश्रम वाली खेलें खेलती हैं। यहां तक कि लड़के को अधिक परिश्रम वाली खेल खेलने के लिए प्रेरित किया जाता है। लड़कों तथा लड़कियों के खेलने वाले खिलौनों में भी अन्तर होता है। लड़के को पिस्तौलैं, बसों, कारों, Outdoor sports की चीजें लेकर दी जाती हैं। इस तरह लड़के तथा लड़कियां अपने समूह के अनुसार व्यवहार करना सीखना शुरू कर देते हैं जिससे उनको समाज में रहने के तरीकों का पता चलना शुरू हो जाता है।

(3) लैंगिक समाजीकरण की प्रक्रिया का तीसरा स्तर है स्कूल जहां बच्चा जीवन के बहुत-से महत्त्वपूर्ण साल व्यतीत करता है। यही समय है जिस में बच्चा या तो बिगड़ जाता है या कुछ सीख जाता है। यह प्रक्रिया परिवार में ही नहीं चलती बल्कि स्कूल में भी पूरे जोर-शोर से चलती रहती है। जितना प्रभाव स्कूल का लैंगिक व्यवहार पर पड़ता है, और किसी भी साधन का नहीं पड़ता है। बच्चे अपने लिंग के अनुसार क्लास में बैठते हैं, एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं। लड़कियां, लड़कों से दूर रहती हैं तथा उन से बात भी दूर से ही करती हैं क्योंकि उन को इस बारे में बताया जाता है। लड़के Female अध्यापकों से प्रभावित होते हैं तथा लड़कियां male अध्यापकों से प्रभावित होती हैं। यहां आकर दोनों के बिल्कुल ही अलग समूह बन जाते हैं जिससे समाज के निर्माण में बहुत मदद मिलती है। दोनों अपने लिंग के अनुसार कार्य करना सीख जाते हैं। लड़कों को घर से बाहर के कार्य करने भेजा जाता है तथा लड़कियों को घर के कार्य करने सिखाया जाता है। लड़कियों को साधारणतया Home Science जैसे विषय लेकर दिए जाते हैं तथा लड़कों को Science, Math, Commerce इत्यादि जैसे विषय लेकर दिए जाते हैं। इस तरह समाज निर्माण के मुख्य तत्त्वों का निर्माण इस स्तर पर आकर शुरू हो जाता है।

(4) लैंगिक समाजीकरण का अगला तथा अन्तिम स्तर होता है बालिग लैंगिक समाजीकरण जिस में लड़के तथा लड़कियां एक-दूसरे से बिल्कुल ही अलग हो जाते हैं। बालिग होने पर लड़के अधिक शक्तिशाली कार्य करते हैं तथा लड़कियां साधारणतया औरतों वाले कम परिश्रम वाले कार्य करना ही पसंद करती हैं जैसे पढ़ाना, क्लर्क के कार्य इत्यादि। औरतों को बहुत ही कम उच्च स्थितियां प्राप्त होती हैं, औरतों को कम वेतन तथा कम उन्नति मिलती है। औरतें जल्दी-जल्दी अपनी नौकरी बदलना पसन्द नहीं करती हैं।

इस प्रकार से लिंग के आधार पर दोनों समूह अलग-अलग कार्य करने लग जाते हैं जिससे समाज की व्यवस्था बनी रहती है तथा समाज सही प्रकार से कार्य करता है। यदि दोनों समूहों में कार्य के आधार पर अन्तर न हो तो दोनों लिंगों के कार्य एक-दूसरे में मिल जाएंगे तथा कोई अपना कार्य सही प्रकार से नहीं कर पाएगा। सामाजिक व्यवस्था तथा ढांचा बिल्कुल ही खत्म हो जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति अपनी मर्जी के अनुसार कार्य करेगा तथा लैंगिक आधार पर श्रम विभाजन बिल्कुल ही खत्म हो जाएगा। आदमी तथा औरत अपनी ज़िम्मेदारियां तथा भूमिकाएं एक-दूसरे के ऊपर फेंक देंगे तथा कोई भी अपनी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होगा। इस तरह हम कह सकते हैं कि लिंग का समाज निर्माण के रूप में बहुत बड़ा हाथ है तथा समाज इसी कारण अच्छी प्रकार से कार्य कर रहा है।

प्रश्न 2.
महिलाओं की निम्न स्थिति के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
विभिन्न युगों या कालों में स्त्रियों की स्थिति कभी अच्छी या कभी निम्न रही है। वैदिक काल में तो यह बहुत अच्छी थी पर धीरे-धीरे काफ़ी निम्न होती चली गई। वैदिक काल के बाद तो विशेषकर मध्यकाल से लेकर ब्रिटिश काल अर्थात् आज़ादी से पहले तक स्त्रियों की स्थिति निम्न रही है। स्त्रियों की निम्न स्थिति का सिर्फ कोई एक कारण नहीं है बल्कि अनेकों कारण हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

1. संयुक्त परिवार प्रणाली (Joint Family System) भारतीय समाज में संयुक्त परिवार प्रथा मिलती है। स्त्रियों की दयनीय स्थिति बनाने में इस प्रणाली की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रथा में स्त्रियों को सम्पत्ति रखने या किसी
और प्रकार के सामाजिक अधिकार नहीं होते हैं। स्त्रियों को घर की चारदीवारी में कैद रखना पारिवारिक सम्मान की बात समझी जाती थी। परिवार में बाल विवाह को तथा सती प्रथा को महत्त्व दिया जाता था जिस वजह से स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न होती थी।

2. पितृसत्तात्मक परिवार (Patriarchal Family) भारतीय समाज में ज्यादातर पितृसत्तात्मक परिवार देखने को मिल जाते हैं। इस प्रकार के परिवार में परिवार का प्रत्येक कार्य पिता की इच्छा के अनुसार ही होता है। बच्चों के नाम के साथ पिता के वंश का नाम जोड़ा जाता है। विवाह के बाद स्त्री को पति के घर जाकर रहना होता है। पारिवारिक मामलों तथा संपत्ति पर अधिकार पिता का ही होता है। इस प्रकार के परिवार में स्त्री की स्थिति काफ़ी निम्न होती है क्योंकि घर के किसी काम में स्त्री की सलाह नहीं ली जाती है।

3. कन्यादान का आदर्श (Ideal of Kanyadan)-पुराने समय से ही हिन्दू विवाह में कन्यादान का आदर्श प्रचलित रहा है। पिता अपनी इच्छानुसार अपनी लड़की के लिए अच्छा-सा वर ढूंढ़ता है तथा उसे अपनी लड़की दान के रूप में दे देता है। पिता द्वारा किया गया कन्या का यह दान इस बात का प्रतीक है कि पत्नी के ऊपर पति का पूरा अधिकार होता है। इस तरह दान के आदर्श के आधार पर भी स्त्रियों की स्थिति समाज में निम्न ही रही है।

4. बाल विवाह (Child Marriage) बाल विवाह की प्रथा के कारण भी स्त्रियों की स्थिति निम्न रही है। इस प्रथा के कारण छोटी उम्र में ही लड़कियों का विवाह हो जाता है जिस वजह से न तो वह शिक्षा ग्रहण कर पाती हैं तथा न ही उन्हें अपने अधिकारों का पता लगता है। पति भी उन पर आसानी से अपनी प्रभुता जमा लेते हैं जिस वजह से स्त्रियों को हमेशा पति के अधीन रहना पड़ता है।

5. कुलीन विवाह (Hypergamy)-कुलीन विवाह प्रथा के अन्तर्गत लड़की का विवाह या तो बराबर के कुल में या फिर अपने से ऊँचे कुल में करना होता है, जबकि लड़कों को अपने से नीचे कुलों में विवाह करने की छूट होती है। इसलिए लड़की के माता-पिता छोटी उम्र में ही लड़की का विवाह कर देते हैं ताकि किसी किस्म की उन्हें तथा लड़की को परेशानी न उठानी पड़े। इस वजह से स्त्रियों में अशिक्षा की समस्या हो जाती है तथा उनकी स्थिति निम्न ही रह जाती है।

6. स्त्रियों की अशिक्षा (Illiteracy) शिक्षा में अभाव के कारण भी हिन्दू स्त्री की स्थिति दयनीय रही है। बालविवाह के कारण शिक्षा न प्राप्त कर पाना जिसकी वजह से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न होना स्त्रियों की निम्न स्थिति का महत्त्वपूर्ण कारण रहा है। अज्ञान के कारण अनेक अन्धविश्वासों, कुरीतियों, कुसंस्कारों तथा सामाजिक परम्पराओं के बीच स्त्री इस प्रकार जकड़ती गई कि उनसे पीछा छुड़ाना एक समस्या बन गई। स्त्रियों को चारदीवारी के अन्दर रखकर पति को परमेश्वर मानने का उपदेश उसे बचपन से ही पढाया जाता था तथा पूर्ण जीवन सबके बीच में रहते हुए सबकी सेवा करते हुए बिता देना स्त्री का धर्म समझा जाता रहा है। इन सब चीज़ों के चलते स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पाई तथा उसका स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता ही चला गया।

7. स्त्रियों की आर्थिक निर्भरता (Economic Dependency of Women)—पुराने समय से ही परिवार का कर्ता पिता या पुरुष रहा है। इसलिए परिवार के भरण-पोषण या पालन-पोषण का भार उसके कंधों पर ही होता है। स्त्रियों का घर से बाहर जाना परिवार के सम्मान के विरुद्ध समझा जाता था। इसलिए आर्थिक मामलों में हमेशा स्त्री को पुरुष के ऊपर निर्भर रहना पड़ता था। परिणामस्वरूप स्त्रियों की स्थिति निम्न से निम्नतम होती गई।

8. ब्राह्मणवाद (Brahmanism)-कुछ विचारकों का यह मानना है कि हिन्दू धर्म या ब्राह्मणवाद स्त्रियों की निम्न स्थिति का मुख्य कारण है क्योंकि ब्राह्मणों ने जो सामाजिक तथा धार्मिक नियम बनाए थे उनमें पुरुषों को उच्च स्थिति तथा स्त्रियों को निम्न स्थिति दी गई थी। मनु के अनुसार भी स्त्री का मुख्य धर्म पति की सेवा करना है। मुसलमानों ने जब भारत में अपना राज्य बनाया तो उनके पास स्त्रियों की कमी थी क्योंकि वह बाहर से आए थे तथा उन्हें हिन्दू स्त्रियों से विवाह पर कोई आपत्ति नहीं थी। इस वजह से हिंदू स्त्रियों को मुसलमानों से बचाने के लिए हिन्दुओं ने विवाह सम्बन्धी नियम और कठोर कर दिए। बाल विवाह को बढ़ावा दिया गया तथा विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए। सती प्रथा तथा पर्दा प्रथा को बढ़ावा दिया गया जिस वजह से स्त्रियों की स्थिति और निम्न होती चली गई।

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प्रश्न 3.
स्त्रियों को जीवन में कौन-सी निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था ?
उत्तर-
यह माना जाता है कि मर्दो तथा स्त्रियों की स्थिति और संख्या लगभग समान है तथा इस कारण वैदिक काल में दोनों को बराबर अधिकार प्राप्त थे। परन्तु समय के साथ-साथ युग बदलते गए तथा स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन आता गया। स्त्रियों की स्थिति निम्न होती गई तथा उन पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगा कर कई प्रकार की निर्योग्यताएं थोप दी गईं। स्त्री का सम्मान केवल माता के रूप में ही रह गया। स्त्रियों से सम्बन्धित कुछ निर्योग्यताओं का वर्णन इस प्रकार है-

1. धार्मिक निर्योग्यताएं (Religious disabilities)-वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति बहुत ही अच्छी थी तथा उन्हें किसी भी प्रकार की निर्योग्यता का सामना नहीं करना पड़ता था। स्त्रियों को धार्मिक कार्य के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण समझा जाता था क्योंकि यह माना जाता था कि धार्मिक यज्ञों तथा और कई प्रकार के कर्मकाण्डों को पूर्ण करने के लिए स्त्री आवश्यक है। स्त्रियों के बिना यज्ञ तथा और कर्मकाण्ड पूर्ण नहीं हो सकते। इसके साथ ही स्त्रियां शिक्षा प्राप्त करती थी तथा शिक्षा धर्म के आधार पर होती थी। इसलिए उन्हें धार्मिक ग्रन्थों का पूर्ण ज्ञान होता था।

परन्तु समय के साथ-साथ स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन आया तथा उनकी सामाजिक स्थिति निम्न होने लगी। बाल विवाह होने के कारण उनका धार्मिक ज्ञान खत्म होना शुरू हो गया जिस कारण उनको यज्ञ से दूर किया जाने लग गया। क्योंकि वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकती थी इस कारण धर्म के सम्बन्ध में उनकी जानकारी खत्म हो गई। अब वह यज्ञ नहीं कर सकती थी तथा धार्मिक कर्मकाण्ड भी पूर्ण नहीं कर सकती थी। मर्द के प्रभुत्व के कारण स्त्रियों के धार्मिक कार्यों को बिल्कुल ही खत्म कर दिया गया। उसका धर्म केवल परिवार तथा पति की सेवा करना ही रह गया। इस प्रकार स्त्रियों को धार्मिक शिक्षा से भी अलग कर दिया गया क्योंकि उसको मासिक धर्म के कारण अपवित्र समझा जाने लग गया। इस ढंग से यह धार्मक निर्योग्यताएं स्त्रियों के ऊपर थोपी गईं। .

2. सामाजिक निर्योग्यताएं (Social disabilities) धार्मिक निर्योग्यताओं के साथ-साथ स्त्रियों के लिए सामाजिक निर्योग्यताओं की शुरुआत भी हुई। काफ़ी प्राचीन समय से स्त्रियों को बाल विवाह के कारण शिक्षा प्राप्त नहीं होती थी। शिक्षाप्राप्त न करने की स्थिति में वह किसी प्रकार की नौकरी भी नहीं कर सकती थी, क्योंकि नौकरी प्राप्त करने के लिए शिक्षा ज़रूरी समझी जाती है। बाल विवाह के कारण शिक्षा प्राप्त करने के समय तो लड़की का विवाह हो जाता था। इसलिए वह शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर सकती थी।

समाज में स्त्रियों से सम्बन्धित कई प्रकार की सामाजिक कुरीतियां भी प्रचलित थीं। सबसे पहली कुरीति थी बाल विवाह । छोटी आयु में ही लड़की का विवाह कर दिया जाता था जिस कारण वह न तो पढ़ सकती थी तथा न ही बाहर के कार्य कर सकती थी। इस कारण वह घर की चारदीवारी में ही सिमट के रह गई थी।
बाल विवाह के साथ-साथ पर्दा प्रथा भी प्रचलित थी। स्त्रियां सभी मर्दो के सामने नहीं आ सकती थीं। यदि किसी कारण आना भी पड़ता था तो उसे लम्बा सा पर्दा करके आना पड़ता था। सती प्रथा तो काफ़ी प्राचीन समय से चली आ रही थी। यदि किसी स्त्री का पति मर जाता था तो उस स्त्री के लिए अकेले ही जीवन जीना नर्क समान समझा जाता था। इसलिए स्त्री अपने पति की चिता पर ही बैठ जाती थी तथा वह सती हो जाती थी। विधवा पुनर्विवाह वैदिक काल में तो होते थे परन्तु वह बाद में बन्द हो गए। विधवा होने के कारण स्त्रियों के लिए सती प्रथा भी 19वीं सदी तक चलती रही। मुसलमानों के भारत में राज्य करने के बाद उन्होंने हिन्दू स्त्रियों से विवाह करने शुरू कर दिए। हिन्दू स्त्रियों को मुसलमानों से बचाने के लिए ब्राह्मणों ने स्त्रियों पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिए। इस तरह स्त्रियों पर सामाजिक तौर पर कई प्रकार की निर्योग्यताएं थोप दी गई थीं।

3. पारिवारिक निर्योग्यताएं (Familial disabilities) स्त्रियों को परिवार से सम्बन्धित कई प्रकार की निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था। चाहे अमीर परिवारों में तो स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी परन्तु ग़रीब परिवार में तो स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न थी। विधवा स्त्री को परिवार के किसी भी उत्सव में भाग लेने नहीं दिया जाता था। पत्नी को दासी समझा जाता था। छोटी-सी गलती पर पत्नी को पीटा जाता था। पत्नी का धर्म पति तथा परिवार की सेवा करना होता था। सास तथा ससुर भी बह पर काफ़ी अत्याचार करते थे। स्त्री हमेशा ही पुरुष पर निर्भर करती थी। विवाह से पहले पिता पर, विवाह के बाद पति पर तथा बुढ़ापे के समय वह बच्चों पर निर्भर होती थी। परिवार पितृ प्रधान होते थे जिस कारण परिवार के किसी भी निर्णय में उसकी सलाह नहीं ली जाती थी। यहां तक कि उसके विवाह के निर्णय भी पिता ही लेता था। इस तरह औरत को दासी या पैर की जूती समझा जाता था।

4. आर्थिक निर्योग्यताएं (Economic disabilities)-स्त्रियों को बहुत-सी आर्थिक निर्योग्यताओं का भी सामना करना पड़ता था। वैदिक काल में तो स्त्रियों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त था परन्तु समय के साथ ही यह अधिकार खत्म हो गया। मध्य काल में तो वह न तो सम्पत्ति रख सकती थी तथा न ही पिता की सम्पत्ति में से हिस्सा ले सकती थी। संयुक्त परिवार में सम्पत्ति पर सभी मर्दो का अधिकार होता था। बँटवारे के समय स्त्रियों तथा लड़कियों को कोई हिस्सा नहीं दिया जाता था। वह कोई कार्य नहीं करती थी केवल परिवार में ही रहकर परिवार की देखभाल करती थी। इस कारण उसे पैसे से सम्बन्धित कोई स्वतन्त्रता नहीं थी। आर्थिक तौर पर वह पिता, पति तथा लड़कों पर ही निर्भर थी।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि स्त्रियों को समाज में कई प्रकार की निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था चाहे वैदिक काल में स्त्रियों पर कोई निर्योग्यता नहीं थी तथा उसको बहुत-से अधिकार प्राप्त थे, परन्तु समय के साथ-साथ यह सभी अधिकार खत्म हो गए तथा अधिकारों की जगह उन पर निर्योग्यताएं थोप दी गई।

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प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता के बाद स्त्रियों की स्थिति सुधारने के क्या प्रयास किए गए ?
उत्तर-
देश की आधी जनसंख्या स्त्रियों की है। इसलिए देश के विकास के लिए यह भी ज़रूरी है कि उनकी स्थिति में सुधार लाया जाये। उनसे संबंधित कुप्रथाओं तथा अन्धविश्वासों को समाप्त किया जाए। स्वतन्त्रता के बाद भारत के संविधान में कई ऐसे प्रावधान किये गये जिनसे महिलाओं की स्थिति में सुधार हो। उनकी सामाजिक स्थिति बेहतर बनाने के लिए अलग-अलग कानून बनाए गए। आजादी के बाद देश की महिलाओं के उत्थान, कल्याण तथा स्थिति में सुधार के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं-

1. संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions) महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए संविधान में निम्नलिखित प्रावधान है-

  • अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के सामने सभी समान हैं।
  • अनुच्छेद 15 (1) द्वारा धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भारतीय से भेदभाव की मनाही है।
  • अनुच्छेद 15 (3) के अनुसार राज्य महिलाओं तथा बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करें।
  • अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य रोजगार तथा नियुक्ति के मामलों में सभी भारतीयों को समान अवसर प्रदान करें।
  • अनुच्छेद 39 (A) के अनुसार राज्य पुरुषों तथा महिलाओं को आजीविका के समान अवसर उपलब्ध करवाए।
  • अनुच्छेद 39 (D) के अनुसार पुरुषों तथा महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाए।
  • अनुच्छेद 42 के अनुसार राज्य कार्य की न्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न करें तथा अधिक-से-अधिक प्रसूति सहायता प्रदान करें।
  • अनुच्छेद 51 (A) (E) के अनुसार स्त्रियों के गौरव का अपमान करने वाली प्रथाओं का त्याग किया जाए।
  • अनुच्छेद 243 के अनुसार स्थानीय निकायों-पंचायतों तथा नगरपालिकाओं में एक तिहाई स्थानों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है।

2. कानून (Legislations)-महिलाओं के हितों की सुरक्षा तथा उनकी सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए कई कानूनों का निर्माण किया गया जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

  • सती प्रथा निवारण अधिनियम, 1829, 1987 (The Sati Prohibition Act)
  • हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 (The Hindu Widow Remarriage Act)
  • बाल विवाह अवरोध अधिनियम (The Child Marriage Restraint Act)
  • हिन्दू स्त्रियों का सम्पत्ति पर अधिकार (The Hindu Women’s Right to Property Act) 1937.
  • विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) 1954.
  • हिन्दू विवाह तथा विवाह विच्छेद अधिनियम (The Hindu Marriage and Divorce Act) 1955 & 1967.
  • हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम (The Hindu Succession Act) 1956.
  • दहेज प्रतिबन्ध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) 1961, 1984, 1986.
  • मातृत्व हित लाभ अधिनियम (Maternity Relief Act) 1961, 1976.
  • मुस्लिम महिला तलाक के अधिकारों का संरक्षण अधिनियम (Muslim Women Protection of Rights of Divorce) 1986.

पीछे दिए कानूनों में से चाहे कुछ आज़ादी से पहले बनाए गए थे पर उनमें आज़ादी के बाद संशोधन कर लिए गए हैं। इन सभी विधानों से महिलाओं की सभी प्रकार की समस्याओं जैसे दहेज, बाल विवाह, सती प्रथा, सम्पत्ति का उत्तराधिकार इत्यादि का समाधान हो गया है तथा इनसे महिलाओं की स्थिति सुधारने में मदद मिली है।

3. महिला कल्याण कार्यक्रम (Women Welfare Programmes)-स्त्रियों के उत्थान के लिए आज़ादी के बाद कई कार्यक्रम चलाए गए जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

  • 1975 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया तथा उनके कल्याण के कई कार्यक्रम चलाए गए।
  • 1982-83 में ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक तौर पर मज़बूत करने के लिए डवाकरा कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
  • 1986-87 में महिला विकास निगम की स्थापना की गई ताकि अधिक-से-अधिक महिलाओं को रोज़गार के अवसर प्राप्त हों।
  • 1992 में राष्ट्रीय महिला आयोग का पुनर्गठन किया गया ताकि महिलाओं के ऊपर बढ़ रहे अत्याचारों को रोका जा सके।

4. देश में महिला मंडलों की स्थापना की गई। यह महिलाओं के वे संगठन हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के कल्याण के लिए कार्यक्रम चलाते हैं। इन कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च का 75% पैसा केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड देता है।

5. शहरों में कामकाजी महिलाओं को समस्या न आए इसीलिए सही दर पर रहने की व्यवस्था की गई है। केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने होस्टल स्थापित किए हैं ताकि कामकाजी महिलाएं उनमें रह सकें।

6. केन्द्रीय समाज कल्याण मण्डल ने सामाजिक आर्थिक कार्यक्रम देश में 1958 के बाद से चलाने शुरू किए ताकि ज़रूरतमंद, अनाथ तथा विकलांग महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवाया जा सके। इसमें डेयरी कार्यक्रम भी शामिल हैं।
इस तरह आजादी के पश्चात् बहुत सारे कार्यक्रम चलाए गए हैं ताकि महिलाओं की सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाया जा सके। अब महिला सशक्तिकरण में चल रहे प्रयासों की वजह से भारतीय महिलाओं का बेहतर भविष्य दृष्टिगोचर होता है।

प्रश्न 5.
भारतीय स्त्रियों की स्थिति में आए परिवर्तनों के कारणों तथा स्त्रियों की वर्तमान स्थिति का वर्णन करो।
अथवा
क्या आधुनिक समयों में औरत की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है ?
उत्तर-
आज के समय में भारतीय महिलाओं की स्थिति में काफ़ी परिवर्तन आए हैं। महिलाओं की जो स्थिति आज से 50 साल पहले थी उसमें तथा आज की महिला की स्थिति में काफ़ी फर्क है। आज महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर बाहर दफ्तरों में काम कर रही हैं। पर यह परिवर्तन किसी एक कारण की वजह से नहीं आया है। इसके कई कारण हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

1. स्त्रियों की साक्षरता दर में वृद्धि (Improvement in the literacy rate of women)-आज़ादी से पहले स्त्रियों की शिक्षा की तरफ कोई ध्यान नहीं देता था पर आज़ादी के पश्चात् भारत सरकार की तरफ से स्त्रियों की शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए कई उपाय किए गए जिस वजह से स्त्रियों की शिक्षा के स्तर में काफ़ी वृद्धि हुई। सरकार ने लड़कियों को पढ़ाने के लिए मुफ्त शिक्षा, छात्रवृत्तियां प्रदान की, मुफ़्त किताबों का प्रबन्ध किया ताकि लोग अपनी लड़कियों को स्कूल भेजें। इस तरह धीरे-धीरे स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार हुआ तथा उनका शिक्षा स्तर बढ़ने लगा। आजकल हर क्षेत्र में लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। शिक्षा की वजह से उनके विवाह भी देर से होने लगे जिस वजह से उनका जीवन स्तर ऊंचा उठने लगा। आज लड़कियां भी लड़कों की तरह बढ़-चढ़ कर शिक्षा ग्रहण करती हैं। इस तरह स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण उनमें शिक्षा का प्रसार है।

2. औद्योगीकरण (Industrialization)-आज़ादी के बाद औद्योगीकरण का बहुत तेज़ी से विकास हुआ। शिक्षा प्राप्त करने की वजह से औरतें भी घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर नौकरियां करने लगीं जिस वजह से उनके ऊपर से पाबंदियां हटने लगीं। औरतें दफ्तरों में और पुरुषों के साथ मिलकर काम करने लगीं जिस वजह से जाति प्रथा की पाबंदियां खत्म होनी शुरू हो गईं। औरों के साथ मेल-जोल से प्रेम विवाह के प्रचलन बढ़ने लगे। दफ्तरों में काम करने की वजह से उनकी पुरुषों पर से आर्थिक निर्भरता कम हो गई जिस वजह से स्त्रियों की स्थिति में काफ़ी सुधार हुआ। इस तरह औरतों की स्थिति सुधारने में औद्योगीकरण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 6 लिंग असमानता

3. पश्चिमी संस्कृति (Western Culture)-आजादी के बाद भारत पश्चिमी देशों के संपर्क में आया जिस वजह से वहां के विचार, वहां की संस्कृति हमारे देश में भी आयी। महिलाओं को उनके अधिकारों, उनकी आजादी के बारे में पता चला जिस वजह से उनकी विचारधारा में परिवर्तन आना शुरू हो गया। इस संस्कृति की वजह से अब महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिला कर खड़ी होनी शुरू हो गईं। दफ्तरों में काम करने की वजह से औरतें आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हो गईं तथा उनमें मर्दो के साथ समानता का भाव आने लगा। कुछ महिला आन्दोलन भी चले जिस वजह से महिलाओं में जागरूकता आ गई तथा उनकी स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हो गया।

4. अंतर्जातीय विवाह (Inter Caste Marriage)-आज़ादी के बाद 1955 में हिन्दू विवाह कानून पास हुआ जिससे अन्तर्जातीय विवाह को कानूनी मंजूरी मिल गई। शिक्षा के प्रसार की वजह से औरतें दफ्तरों में काम करने लग गईं, घर से बाहर निकलीं जिस वजह से वह और जातियों के संपर्क में आईं। प्रेम विवाह, अन्तर्जातीय विवाह होने लगे जिस वजह से लोगों की विचारधारा में परिवर्तन आने लग गए। इस वजह से अब लोगों की नजरों में औरतों की स्थिति ऊँची होनी शुरू हो गई। औरतों की आत्मनिर्भरता की वजह से उन्हें और सम्मान मिलने लगा। इस तरह अन्तर्जातीय विवाह की वजह से दहेज प्रथा या वर मूल्य में कमी होनी शुरू हो गई तथा स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हो गया।

5. संचार तथा यातायात के साधनों का विकास (Development in the means of communication and transport)-आजादी के बाद यातायात तथा संचार के साधनों में विकास होना शुरू हुआ। लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आने शुरू हो गए। लोग गांव छोड़कर दूर-दूर शहरों में जाकर रहने लगे जिस वजह से वे और जातियों के सम्पर्क में आए। इसके साथ ही कुछ नारी आन्दोलन चले तथा सरकारी कानून भी बने ताकि महिलाओं का शोषण न हो सके। इन साधनों के विकास की वजह से स्त्रियां पढ़ने लगीं, नौकरियां करने लगी तथा लोगों की विचारधारा में धीरे-धीरे परिवर्तन होने शुरू हो गए।

6. विधानों का निर्माण (Formation of Laws)-चाहे आजादी से पहले भी महिलाओं के उत्थान के लिए कई कानूनों का निर्माण हुआ था पर वह पूरी तरह लागू नहीं हुए थे क्योंकि हमारे देश में विदेशी सरकार थी। पर 1947 के पश्चात् भारत सरकार ने इन कानूनों में संशोधन किए तथा उन्हें सख्ती से लागू किया। इसके अलावा कुछ और नए कानून भी बने जैसे कि हिन्दू विवाह कानून, हिन्दू उत्तराधिकार कानून, दहेज प्रतिबन्ध कानून इत्यादि ताकि स्त्रियों का शोषण होने से रोका जा सके। इन कानूनों की वजह से स्त्रियों का शोषण कम होना शुरू हो गया तथा स्त्रियां अपने आपको सुरक्षित महसूस करने लग गईं। अब कोई भी स्त्रियों का शोषण करने से पहले दस बार सोचता है क्योंकि अब कानून स्त्रियों के साथ है। इस तरह कानूनों की वजह से भी स्त्रियों की स्थिति में काफ़ी परिवर्तन आए हैं।

7. संयुक्त परिवार का विघटन (Disintegration of Joint Family) यातायात तथा संचार के साधनों के विकास, शिक्षा, नौकरी, दफ्तरों में काम, अपने घर या गांव या शहर से दूर काम मिलना तथा औद्योगीकरण की वजह से संयुक्त परिवारों में विघटन आने शुरू हो गए। पहले संयुक्त परिवारों में स्त्री घर में ही घुट-घुट कर मर जाती थी पर शिक्षा के प्रसार तथा दफ्तरों में नौकरी करने की वजह से हर कोई संयुक्त परिवार छोड़कर अपना केन्द्रीय परिवार बसाने लगा जो कि समानता पर आधारित होता है। संयुक्त परिवार में स्त्री को पैर की जूती समझा जाता है पर केंद्रीय परिवारों में स्त्री की स्थिति पुरुषों के समान होती है जहां स्त्री आर्थिक या हर किसी क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़ी होती है। इस तरह संयुक्त परिवारों के विघटन ने भी स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

लिंग असमानता PSEB 12th Class Sociology Notes

  • हम सभी समाज, परिवार व सम्बन्धों में रहते हैं तथा हमने परिवार में रहते हुए पुरुषों को स्त्रियों से बातें करते हुए सुना होगा। इस बातचीत में शायद हमें कभी लगा होगा कि घर की स्त्रियों के साथ भेदभाव हो रहा है। यह लिंग आधारित भेदभाव ही लैंगिक भेदभाव है।
  • शब्द लिंग वर्ग (Gender) समाज की तरफ से बनाया गया है तथा यह संस्कृति का योगदान है। लिंग वर्ग एक समाजशास्त्रीय शब्द है जिसमें राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा आर्थिक रूप से स्त्री तथा पुरुष के बीच रिश्तों की नींव रखी जाती है। इसका अर्थ है कि जब हम सामाजिक सांस्कृतिक रूप से पुरुष स्त्री के संबंधों की बात करते हैं तो लिंग वर्ग शब्द सामने आता है।
  • लिंग तथा लिंग वर्ग शब्दों में अंतर होता है। शब्द लिंग एक जैविक शब्द है जो बताता है कि कौन पुरुष है या कौन स्त्री। परन्तु लिंग अंतर वह व्यवहार है जो सामाजिक प्रथाओं से बनता है।
  • जब हम लिंग संबंधों की बात करते हैं इसका अर्थ है स्त्री-पुरुष के वह रिश्ते जो विचारधारा, संस्कृति, राजनीतिक तथा आर्थिक मुद्दों पर आधारित होते हैं। लिंग संबंधों में हम लिंग अधीनता का अध्ययन करते हैं कि कौन-सा लिंग दूसरे पर हावी होता है।
  • हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है जिसमें स्त्रियों के साथ कई प्रकार से भेदभाव किया जाता है। चाहे हमारे संविधान ने हमें समानता का अधिकार दिया है परन्तु आज भी बहुत से अधिकार हैं जो स्त्रियों को नहीं दिए जाते।
  • पितृप्रधान परिवार वह परिवार होता है जिसमें पिता की प्रधानता होती है तथा उसकी ही आज्ञा चलती है। परिवार
    के सभी निर्णय पिता लेता है तथा पुरुषों को स्त्रियों से ऊँचा समझा जाता है।
  • लिंग वर्ग समाजीकरण का वह तरीका है जिसमें समाज यह ध्यान रखता है कि बच्चे अपने लिंग के अनुसार सही व्यवहार करना सीख जाएं। यह बच्चों को भी अलग-अलग वर्गों में विभाजित करते हैं कि वह लड़का है या लड़की। इस प्रकार समाज लिंग वर्ग समाजीकरण के साथ व्यक्ति के व्यवहार को नियन्त्रित करता है।
  • लिंग वर्ग भेदभाव हमारे समाज के लिए कोई नई बात नहीं है। यह सदियों से चलता आ रहा है। स्त्रियों के साथ कई ढंगों से भेदभाव किया जाता है जिससे स्त्रियों को काफ़ी कुछ सहना पड़ता है। अगर बच्चों के लिंग अनुपात (0-6 वर्ष) की बात करें तो 2011 में यह 1000 : 914 था अर्थात् 1000 लड़कों के पीछे 914 लड़कियां थीं।
  • यह भेदभाव हम शिक्षा के क्षेत्र में भी देख सकते हैं। 2011 में देश की साक्षरता दर 74% थी जिसमें 82% पुरुष तथा 65% स्त्रियां शिक्षित थीं। आज भी देश के अंदरूनी भागों में लोग लड़कियों को पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेजते।
  • हमारे देश में स्त्रियों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बलात्कार, अपहरण, वेश्यावृत्ति, बेच देना, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा, दहेज, तंग करना इत्यादि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनसे स्त्रियों को रोजाना दो-चार होना पड़ता है।
  • लिंग वर्ग भूमिका (Gender Role) लिंग वर्ग भूमिका का अर्थ है वह व्यवहार जो प्रत्येक समाज में लिंग ‘ वर्ग से संबंधित होता है।
  • लिंग वर्ग भेदभाव (Gender Discrimination)-जनसंख्या के एक हिस्से से अधीनता, निष्कासन तथा भाग न लेने वाला व्यवहार विशेषतया स्त्रियां तथा उन्हें दरकिनार एवं नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
  • ट्रांसजेंडर (Transgender)-व्यक्तियों का वह वर्ग जिनमें पुरुषों व स्त्रियों दोनों के गुण मौजूद होते हैं।
  • समाजीकरण (Socialization) तमाम आयु चलने वाली व सीखने वाली वह प्रक्रिया जिसमें व्यक्ति समाज में जीवन जीने के तरीके, संस्कृति इत्यादि सीखते हैं तथा उन्हें अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं।
  • पितृपक्ष की प्रबलता (Patriarchy) समाज का वह प्रकार जिसमें पुरुषों के हाथों में सत्ता होती है तथा स्त्रियों को इससे बाहर रखा जाता है। घर के सबसे बड़े पुरुष के हाथों में सत्ता होती है तथा परिवार का वंश
    सत्ता के नाम से चलता है।
  • शिशु लिंग अनुपात (Child Sex Ratio)-इसका अर्थ है 1000 लड़कों (0-6 वर्ष) के पीछे लड़कियों (0-6 वर्ष) की संख्या । 2011 में यह 1000 : 914 था।
  • लिंग अनुपात (Sex Ratio)- इसका अर्थ है 1000 पुरुषों के पीछे स्त्रियों की संख्या। 2011 में यह 1000 : 943 था।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र पर एक नोट लिखें। (Write a note on U.N.)
उत्तर-
द्वितीय महायुद्ध की तबाही को देखकर संसार के सभी भागों में यह इच्छा होने लगी थी कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की स्थापना के लिए कोई शक्तिशाली अन्तर्राष्ट्रीय मशीनरी बनाई जाए। अत: 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई। आरम्भ में इसके 51 देश सदस्य थे जबकि आजकल 193 देश इसके सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व का सबसे बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इसका मुख्यालय न्यूयार्क (अमेरिका) में है।

संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य (Aims of the United Nations)-संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना में ही इस संगठन के उद्देश्यों का वर्णन किया गया है। प्रस्तावना में कहा गया है, कि “हम संयुक्त राष्ट्र के लोग…..लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हमेशा सहयोग करेंगे।”
सानफ्रांसिस्को में आयोजित सम्मेलन में इस संगठन के चार उद्देश्य बताए गए(1) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना और अन्तर्राष्ट्रीय खतरों का सामूहिक मुकाबला करना।

(2) विभिन्न राष्ट्रों के मध्य समान अधिकार, स्वाभिमान तथा जनता में आत्म-निर्णय के अधिकार के आधार पर सम्बन्धों की स्थापना और विश्व शान्ति को सुदृढ़ करने के उपाय करना। ।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।
(4) उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न राज्यों के मध्य सहयोग करने के लिए एक केन्द्र की भूमिका निभाना।

संयुक्त राष्ट्र के अंग (PRINCIPAL ORGANS OF THE UNITED NATIONS)

संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुसार छह प्रमुख अंग हैं जिनके द्वारा यह अपने बहुमुखी कार्य करता है। इन छह अंगों का वर्णन इस प्रकार है

I. महासभा (The General Assembly)-महासभा को संयुक्त राष्ट्र की संसद् भी कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश महासभा के भी सदस्य होते हैं। संयुक्त राष्ट्र का प्रत्येक सदस्य देश महासभा में 5 प्रतिनिधि भेज सकता है। महासभा का अधिवेशन प्रतिवर्ष सितम्बर मास के तीसरे मंगलवार को होता है। महासभा हर वर्ष अपना एक अध्यक्ष चुनती है। महासभा में प्रत्येक सदस्य देश को एक मत देने का अधिकार प्राप्त है। महासभा की शक्तियां अथवा कार्य इस प्रकार हैं-

(1) सुरक्षा परिषद् के 10 अस्थायी सदस्यों का 2/3 बहुमत से चुनाव करना।
(2) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 न्यायाधीशों का चुनाव करना।
(3) चार्टर के अधीन सारे विषयों पर विचार करना।
(4) संयुक्त राष्ट्र के अन्य अंगों व एजेन्सियों पर नियन्त्रण करना।
(5) संयुक्त राष्ट्र का बजट तैयार करना।
(6) संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन करना।
222

II. सुरक्षा परिषद् (The Security Council)-सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका के समान है। सुरक्षा परिषद् एक छोटा लेकिन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। इसके कुल 15 सदस्य हैं। इनमें से पाँच स्थायी हैं
ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, रूस और चीन। इसके अलावा दस अस्थायी सदस्य 2 वर्षों के लिए महासभा द्वारा चुने जाते हैं। स्थायी सदस्यों को निषेधाधिकार (veto) प्राप्त है। सुरक्षा परिषद् के मुख्य कार्य तथा शक्तियाँ इस प्रकार हैं
(1) ऐसे मामले पर विचार करना जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा भंग होने का भय हो।
(2) महासभा अपने अनेक चुनाव सम्बन्धी कार्य सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर ही करती है।
(3) चार्टर में संशोधन सुरक्षा परिषद् की सहमति से ही हो सकता है।

III. आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् (The Economic and Social Council)-विश्व की सामाजिक, आर्थिक व मानवीय समस्याओं के हल के लिए संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक व सामाजिक परिषद् की स्थापना की गई। प्रारम्भ में इस परिषद् के 18 सदस्य थे, लेकिन आजकल इसकी सदस्य संख्या 54 है। ये सदस्य महासभा द्वारा 2/3 बहुमत से तीन वर्ष के लिए चुने जाते हैं और 1/3 सदस्य प्रति वर्ष रिटायर हो जाते हैं। आर्थिक और सामाजिक परिषद् की एक वर्ष में कम-से-कम तीन बैठकें होती हैं। इस परिषद् के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं
(1) सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना।
(2) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याओं का हल निकालना।
(3) बिना किसी भेदभाव के मानवाधिकारों को लागू करवाना।
(4) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी मामलों का अध्ययन करना और रिपोर्ट तैयार करना।
(5) संयुक्त राष्ट्र की अन्य विशिष्ट एजेन्सियों से रिपोर्ट प्राप्त करना।

IV. ट्रस्टीशिप कौंसिल (The Trusteeship Council)-ट्रस्टीशिप कौंसिल का उद्देश्य पिछड़े हुए देशों को विकसित देशों के नेतृत्व में उन्नति दिलाना है ताकि वे शीघ्रता से स्वशासन के योग्य हो जाएं। ट्रस्टीशिप कौंसिल में सुरक्षा परिषद् के सारे स्थायी सदस्य होते हैं। इनके अलावा सुरक्षित प्रदेशों का प्रबन्ध चलाने वाले देश भी इसके सदस्य होते हैं। इस परिषद् की साल में दो बैठकें होती हैं और इसके निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं। ट्रस्टीशिप कौंसिल के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं-

(1) प्रबन्धक राज्यों से हर वर्ष वहां की जनता के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विषयों के बारे में रिपोर्ट लेना।
(2) सुरक्षित प्रदेशों की जनता से अपीलें सुनना।
(3) निरीक्षक मण्डलों को न्यास प्रदेशों का दौरा करने के लिए भेजना।

V. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)-अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 न्यायाधीश होते हैं जिन्हें महासभा तथा सुरक्षा परिषद् अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है। न्यायाधीश 9 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। 1/3 न्यायाधीश प्रत्येक पाँच वर्ष पश्चात् रिटायर हो जाते हैं और उनकी जगह नए न्यायाधीश नियुक्त किए जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में स्थित है। इस न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस प्रकार है

1. अनिवार्य क्षेत्राधिकार-सन्धियों की व्याख्या करना अन्तर्राष्ट्रीय कानून से सम्बन्धित विवाद, अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व को भंग करने वाले तथ्यों की स्थिति तथा किसी अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व के उल्लंघन किए जाने पर दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की मात्रा और स्वरूप।
2. ऐच्छिक क्षेत्राधिकार- अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय उन विवादों को भी सुनता है तथा निर्णय देता है जो राज्य स्वयं इसके सम्मुख लाते हैं।
3. सलाहकारी कार्य-चार्टर की धारा 96 के अनुसार महासभा और सुरक्षा परिषद् अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय से कानून प्रश्नों पर सलाह ले सकती है।

VI. सचिवालय (The Secretariate)-संयुक्त राष्ट्र का प्रबन्धक काम चलाने के लिए चार्टर के अनुसार सचिवालय स्थापित किया गया है, जिसमें संगठन की ज़रूरत के अनुसार कर्मचारी होते हैं। महासचिव सचिवालय का मुखिया होता है। महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा 5 वर्ष के लिए करती है। सचिवालय संयुक्त राष्ट्र के सारे अंगों की कार्यवाही लिखता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों को प्रकाशित करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)-संयुक्त राष्ट्र ने आगामी पीढ़ियों को अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध की विभीषिका से बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भले ही राजनीतिक क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियां कम रही हों, परन्तु सामाजिक व आर्थिक विकास के क्षेत्र में इसने अद्वितीय भूमिका निभाई है। आज बढ़ते हुए आतंकवाद, निर्धनता और आर्थिक समस्याओं के कारण संयुक्त राष्ट्र की गैर-राजनीतिक भूमिका पहले से भी अधिक बढ़ गई है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र में भारत की भूमिका का वर्णन करें। (Describe India’s role in United Nations.)
अथवा
भारत ने विश्व शांति की स्थापना में सयुक्त राष्ट्र संघ में क्या भूमिका निभाई है ? (What is India’s role in the United Nations in the maintaining World Peace ?)
अथवा
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में क्या भूमिका निभाई है? (What role India has played in the establishment of world peace ?)
उत्तर-
द्वितीय महायुद्ध की भयानक तबाही देखकर संसार के सभी भागों में प्रत्येक मनुष्य सोचने लग गया कि यदि एक ऐसा युद्ध और हुआ तो विश्व का तथा मानव जाति का सर्वनाश हो जाएगा। अतः हमारी यह लालसा बढ़ती गई कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति स्थापित करने के लिए कोई अन्तर्राष्ट्रीय मशीनरी स्थापित की जाए। आने वाली पीढ़ियों को युद्ध से बचाने के लिए 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई। संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन-समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्मनिर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना, आर्थिक, सामाजिक अथवा मानवतावादी स्वरूप सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना तथा इस सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को समन्वय करने के लिए निमित्त एक केन्द्र का कार्य करना है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आरम्भ में 51 सदस्य थे और वर्तमान सदस्य संख्या 193 है। भारत संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य है और इसे विश्व शान्ति के लिए एक महत्त्वपूर्ण संस्था मानता है। 1946 में ही पं० जवाहर लाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग करने और इसके चार्टर में पूरी तरह आस्था व्यक्त की। जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो भारत को स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्माण करने का अवसर मिला। भारत की विदेश नीति के कर्णधार पं० जवाहर लाल नेहरू ने गुट-निरपेक्षता, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतन्त्रता की प्राप्ति तथा रक्षा के लिए लड़ने वाले देशों को नैतिक सहायता देने और विश्व-शान्ति स्थापित करने की नीति को अपनाया। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत के योगदान का वर्णन इस प्रकार से किया जा सकता है

1. भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना-भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के लिए सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य बना। सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्री ए. रामास्वामी मुदालियर ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध को रोकने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय का महत्त्व सर्वाधिक होना चाहिए। भारत की सिफ़ारिश पर चार्टर में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं के बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहित करने का उद्देश्य जोड़ा गया।

2. संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण विश्वास (Full Faith in United Nations)-भारत संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों व उद्देश्यों में पूर्ण विश्वास रखता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के प्रथम अधिवेशन में भारत के प्रतिनिधि ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि भारत की संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों और उद्देश्यों में पूर्ण आस्था है तथा भारत संयुक्त राष्ट्र को पूरा सहयोग देता रहेगा। 3 नवम्बर, 1945 को पं० जवाहर लाल नेहरू ने महासभा को सम्बोधित करते हुए स्पष्ट कहा था,

“इस महासभा को मैं अपने देश के लोगों और अपमी सरकार की ओर से कहूँगा कि हम संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों और उद्देश्यों का पूर्णतः पालन करते हैं और उनकी पूर्ति के लिए तथा अपनी योग्यता सहित प्रयत्न करेंगे।

3. संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य तथा भारत की विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्त एक समान (Objectives of the U.N. at the basic Principle of Indian Foreign Policy are Indentical)—संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य और भारत की विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्त एक समान हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बनाये रखना, राष्ट्रों के बीच सहयोग को बढ़ाना, अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना तथा मानव अधिकारों के लिए सम्मान विकसित करना आदि है। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों से मेल खाते हुए सिद्धान्तों का वर्णन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में नीति-निर्देशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत विदेश नीति से सम्बन्धित सिद्धान्तों में किया गया है, जो इस प्रकार

(1) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
(2) दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना तथा
(3) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्ति से हल करना इत्यादि।

4. संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता बढ़ाने में भारत की भूमिका-भारत की सदा ही यह नीति रही है कि विश्व शान्ति को बनाए रखने के लिए संसार के सभी देशों को, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखते हैं, सदस्य बनना चाहिए। इसलिए 1950 से लेकर अगले 20 वर्षों तक लगातार जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ में साम्यवादी चीन को सदस्य बनाने का प्रश्न आया, भारत ने सदैव इसका समर्थन किया। परन्तु अमेरिका सुरक्षा परिषद् में चीन की सदस्यता के प्रस्ताव पर वीटो का प्रयोग करता रहा। 1972 में अमेरिका का चीन के प्रति दृष्टिकोण बदलने पर ही चीन सयुंक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बना। बंगला देश को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनवाने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

5. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों में भारत का स्थान-संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों और विशेष एजेन्सियों में भारत को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। 1954 में भारत की श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित महासभा (General Assembly) की अध्यक्षा निर्वाचित हुई। 1956 में डॉ० राधाकृष्णन यूनेस्को के प्रधान चुने गए। भारत सात बार सुरक्षा परिषद् का सदस्य रह चुका है। सामाजिक और आर्थिक परिषद् का भारत लंगभग निरन्तर सदस्य चला आ रहा है। भारत के डॉ० नगेन्द्र सिंह को 1973 और 1982 में पुनः अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया। फरवरी 1985 में उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना गया। 1989 में न्यायमूर्ति आर० एस० पाठक को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त हुआ। फरवरी, 2003 में भारत की प्रथम महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी को संयुक्त राष्ट्र नागरिक पुलिस सलाहकार नियुक्त किया गया। वे इस प्रतिष्ठत पद पर नियुक्त होने वाली न केवल प्रथम भारतीय अपितु विश्व की प्रथम महिला अधिकारी हैं।

6. भारत और संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट एजेन्सियां (India and Specialized Agencies of U.N.)-भारत संयुक्त राष्ट्र की सभी विशिष्ट एजेन्सियों का सदस्य है तथा इसने इन एजेन्सियों के कार्यों व गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत कृषि प्रधान देश है। अत: भारत खाद्य व कृषि संगठन (FAO) का सदस्य है और भारत ने इसके सम्मेलनों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है तथा खाद्य पदार्थों के उत्पादन की वृद्धि और कृषि के विकास के लिए तकनीकी विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत यूनेस्को का महत्त्वपूर्ण सदस्य है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सहायता से भारत के गांवों में स्वास्थ्य, गांवों की सफ़ाई, पीने के पानी की व्यवस्था, परिवार और बाल कल्याण के अनेक कल्याणकारी कार्य चल रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक ने भारत के विकास के लिए अनेक योजनाओं के लिए व्यापक ऋण दिए हैं।

7. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा की दृष्टि से भारत का योगदान-संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य विश्व में शान्ति एवं सुरक्षा बनाए रखना है। भारत ने विश्व शान्ति सुरक्षा को बनाये रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका वर्णन हम इस प्रकार कर सकते हैं-

(i) कोरिया की समस्या-1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के प्रतिरोध के लिए भेजीं। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया। भारत ने इस युद्ध को समाप्त कराने तथा युद्ध बन्दियों के आदान-प्रदान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत को तटस्थ राष्ट्र आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।

(ii) स्वेज़ नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस और इज़राइल ने मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें यह कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए। स्वेज़ नहर समस्या को हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(ii) कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए बेल्जियम ने कांगो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। लुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो भेजी। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र सेना में सबसे बड़ी एक टुकड़ी भारतीय बटालियन की थी।

(iv) अरब-इजराइल विवाद-1967 में अरब-इज़राइल युद्ध में इज़राइल ने अरब क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारत की नीति यह रही है कि इज़राइल को अरब क्षेत्र खाली करने चाहिएं और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित सभी प्रस्तावों को मानना चाहिए।

(v) सोमालिया के लिए भारतीय सहायता- भारत ने सोमालिया में शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की अपील पर 2500 सैनिक भेजे। भारत के विदेश राज्य मन्त्री एडुआर्दो फैलोरियो ने स्वयं सोमालिया जाकर स्थिति का जायजा लिया और भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सोमालिया के लिए नियुक्त विशेष प्रतिनिधि को 2.50 लाख डालर का अंशदान दिया।

(vi) युगांडा में शान्ति अभियान-रुआंडा और युगांडा के राष्ट्रपतियों की एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद वहां अराजकता फैल गई। वहां के स्थानीय कबीलों में सत्ता प्राप्ति के लिए खूनी संघर्ष आरम्भ हो गया जिसमें लाखों नागरिक मारे गए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युगांडा में शान्ति स्थापना के लिए और खूनी संघर्ष को रोकने के लिए एक शान्ति योजना बनाई जिसके अन्तर्गत भारत को अपने सैनिक युगांडा में भेजने का आग्रह किया गया। भारत ने अक्तूबर, 1994 को अपने 2000 सैनिक युगांडा भेजे।
उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त भारत ने अन्य समस्याओं को सुलझाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

8. उपनिवेशवाद का विरोधी-भारत उपनिवेशवाद का सदा ही विरोधी रहा है और भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द की। बंगला देश को स्वतन्त्र करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिन उपनिवेशों को स्वतन्त्रता दिलाने का प्रयत्न किया है, भारत ने उसका समर्थन किया है। भारत ने उपनिवेशवाद के खिलाफ नवीन शक्ति सहित प्रबल संघर्ष छेड़े जाने का आह्वान किया है। सितम्बर, 1986 में भारत के विदेश मन्त्री शिवशंकर ने नामीबिया के संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष अधिवेशन में नामीबिया को दक्षिणी अफ्रीका से मुक्त करवाने के लिए दस सूत्रीय कार्यवाही योजना का प्रस्ताव रखा। इस अवसर पर श्री शिवशंकर ने प्रधानमन्त्री राजीव गांधी के इस संकल्प को दोहराया कि नामीबिया नागरिकों को आजादी दिलाने की हर सम्भव कोशिश की जाएगी।

9. रंग-भेद के विरुद्ध संघर्ष- भारत ने रंग-भेद की नीति को विश्व शान्ति के लिए खतरा माना है। रंग-भेद पक्षपात की सबसे व्यापक, अभ्यस्त तथा भ्रष्टाचार प्रदर्शित उदाहरण एशिया तथा अफ्रीका के काले वर्गों के प्रति गोरों की धारणा थी। रंग-भेद की नीति में दक्षिणी अफ्रीकी सरकार सबसे आगे है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में कई बार रंग-भेद की नीति के विरुद्ध आवाज़ उठाई और विश्व जनमत तैयार किया जिसके फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनेक प्रस्ताव पारित किए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने रंगभेद की नीति को मानवता के नाम पर कलंक बताते हुए कहा है कि दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद की नीति को समाप्त करने के लिए विश्व समुदाय तत्काल व्यापक व समयबद्ध कार्यक्रम प्रारम्भ करे। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी के मतानुसार रंग भेद को समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार के खिलाफ़ व्यापक और अनिवार्य आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना है। श्री राजीव गांधी ने विश्व समुदाय को आह्वान किया कि प्रिटोरिया शासन का समर्थन करने वाली मात्र आधा दर्जन सरकारों को पीछे धकेल कर दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध कठोर कदम उठाए और उसे मजबूर करे कि वह अश्वेतों से बातचीत करें और रंगभेद की नीति समाप्त करे। भारत के निरन्तर प्रयासों के कारण 27 अप्रैल, 1994 को दक्षिण अफ्रीका में पहली बार बहु-जातीय चुनाव हुए जिसके कारण दक्षिण अफ्रीका से रंगभेद, जातीय भेदभाव आदि को समाप्त कर दिया गया है।

10. निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में भारत का सहयोग-संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में महासभा और सुरक्षा परिषद् दोनों के ऊपर यह ज़िम्मेदारी डाली गई है कि वे निःशस्त्रीकरण के लिए कार्य करें। भारत की नीति यही रही है कि निःशस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व शान्ति को बनाए रखा जा सकता है और अणु शक्ति का प्रयोग केवल मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार स्पष्ट शब्दों में कहा है कि नि:शस्त्रीकरण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वे सामूहिक विध्वंस करने वाले परमाणु हथियारों पर पाबन्दी लगाने के पक्ष में है। अक्तूबर, 1987 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह प्रस्ताव रखा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा परमाणु हथियार वाले सभी देशों को इन हथियारों का प्रसार रोकने के लिए सहमत कराए और साथ ही इन हथियारों का उत्पादन पूरी तरह रोकना चाहिए तथा हथियारों को बनाने के लिए काम आने वाले विस्फोटक पदार्थ के उत्पादन में भी पूरी तरह कटौती करनी चाहिए। जून, 1988 में स्वर्गीय प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने नि:शस्त्रीकरण पर संयुक्त राष्ट्र के तीसरे विशेष सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए आगामी 22 वर्ष के भीतर विश्व के सभी तरह के परमाणु हथियार हटाने के लिए तीन चरणों में समयवद्ध कार्य योजना का सुझाव दिया तथा संयुक्त राष्ट्र से इस योजना को तत्काल एक कार्यक्रम के रूप में आरम्भ करने का आग्रह किया है। 11वें गुट-निरपेक्ष देशों के सम्मेलन (अक्तूबर, 1995) में भारत ने विश्व से पूर्ण परमाणु नि:शस्त्रीकरण के पक्ष में सहयोग देने की बात कही। भारत पूर्ण नि:शस्त्रीकरण के पक्ष में है।

11. मानव अधिकारों की रक्षा-भारत मानव अधिकारों का महान् समर्थक है और भारत ने सदा यह कोशिश की है कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानव अधिकारों की रक्षा के लिए उचित कार्यवाही करे।

12. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन-भारत गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक है और इस आन्दोलन ने शीत युद्ध को कम किया है और संयुक्त राष्ट्र संघ को पूरी तरह से गुटों में विभक्त होने से बचाया है।

13. आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने में भारत की भूमिका- भारत का सदा से ही यह विचार रहा है कि विश्व-शान्ति की स्थायी स्थापना तभी हो सकती है यदि आर्थिक और सामाजिक अन्याय को समाप्त किया जाए। भारत ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। भारत ने आर्थिक व पिछड़े देशों के विकास पर विशेष बल दिया है और विकसित देशों को अविकसित देशों की अधिक-से-अधिक सहायता करने के लिए कहा है। राष्ट्र संघ औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) का तीसरा अधिवेशन जनवरी, 1980 में नई दिल्ली में हुआ। 24 अक्तूबर, 1985 को महासभा को सम्बोधित करते हुए स्वर्गीय प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का आह्वान किया कि वे शान्ति के प्रति अपने को समर्पित कर दुनिया से भुखमरी दूर करने के लिए संघर्ष करें।

14. भारत संयुक्त राष्ट्र की अन्तरिक्ष समिति में (India on Space Committee of U.N.)–भारत संयुक्त राष्ट्र की अन्तरिक्ष समिति का सदस्य है। भारत ने सदा इस बात पर जोर दिया है कि अन्तरिक्ष का प्रयोग शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष-भारत विश्व-शान्ति व सुरक्षा को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग देता रहा है और भारत का अटल विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व-शान्ति को बनाये रखने का महत्त्वपूर्ण यन्त्र है। पं० जवाहर लाल नेहरू ने एक बार कहा था, “हम संयुक्त राष्ट्र संघ के बिना विश्व की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।” भारत संयुक्त राष्ट्र संघ को विश्व-शान्ति की स्थापना का माध्यम मानता है। भारत को आशा है कि जैसे राष्ट्र व्यक्तियों के लिए है, राष्ट्रों के लिए संयुक्त राष्ट्र भी वैसा ही बन जाएगा।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ का क्या अर्थ है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ का अपना संविधान है जिसे चार्टर (Charter) कहा जाता है और यह चार्टर सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में तैयार किया गया था। संयुक्त राष्ट्र का मुख्य कार्यालय अमेरिका के प्रसिद्ध नगर न्यूयार्क में स्थित है। आरम्भ में संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य थे, परन्तु आजकल इसकी सदस्य संख्या 193 है। भारत इसके आरम्भिक सदस्यों में से है। संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म निर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना और इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को चलाने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य उद्देश्य लिखो।
(उत्तर-

  • संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना है तथा युद्धों को रोकना और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा हल करना है।
  • भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच समान अधिकारों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना करना है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना।
  •  उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न राज्यों के मध्य सहयोग करने के लिए एक केन्द्र की भूमिका निभाना।

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प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र के पांच देशों के नाम लिखो, जिन्हें वीटो शक्ति प्राप्त है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में वीटो शक्ति मानने वाले 5 महान् देशों के नाम लिखो।
उत्तर-
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। सुरक्षा परिषद् की कुल संख्या 15 है। इनमें 10 अस्थायी सदस्य तथा 5 स्थायी सदस्य हैं। 5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो का अधिकार दिया गया है। ये देश हैंअमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस तथा साम्यवादी चीन।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना कब हुई इसके अंगों के नाम लिखो।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र के चार अंगों के नाम लिखो।।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थीं। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुसार इसके 6 मुख्य अंग हैं जिनके द्वारा यह अपने बहुमुखी कर्त्तव्यों को पूरा करता है-

  • महासभा-महासभा संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा अंग है। इसके 193 सदस्य हैं। इसका मुख्य कार्य चार्टर के क्षेत्र में हर विषय पर विचार-विमर्श करना है।
  • सुरक्षा परिषद्-चार्टर के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा करने की जिम्मेवारी सुरक्षा परिषद् की है। इसके कुल 15 सदस्य हैं जिनमें पांच राष्ट्र अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और साम्यवादी चीन स्थायी सदस्य हैं और 10 राष्ट्र अस्थायी सदस्य हैं।
  • आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्-संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुसार इसका मुख्य मनोरथ आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं को सुलझाना तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग लाना है।
  • ट्रस्टीशिप कौंसिल-इसका उद्देश्य पिछड़े हुए देशों को विकसित देशों के नेतृत्व में उन्नति दिलाना है ताकि वे शीघ्रता से स्वशासन के लिए तैयार हो सकें। ट्रस्टीशिप कौंसिल में सुरक्षा परिषद् से सारे स्थायी सदस्य होते हैं।
  • अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय-विभिन्न राष्ट्रों के मध्य विभिन्न विवादों को हल करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की व्यवस्था की गई है। इसके 15 जज होते हैं जिन्हें महासभा तथा सुरक्षा परिषद् अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है।
  • सचिवालय-संयुक्त राष्ट्र का प्रबन्ध कार्य चलाने के लिए चार्टर के अनुसार सचिवालय स्थापित किया गया है। सचिवालय का मुखिया महासचिव होता है जिसकी नियुक्ति महासभा सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर करती है। सचिवालय में दुनिया के अनेक देशों के नागरिक काम करते हैं।

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प्रश्न 5.
भारत का संयुक्त राष्ट्र के चार क्षेत्रों में दिए गए योगदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारत अनेक बार संयुक्त राष्ट्र संघ के भिन्न-भिन्न अंगों का सदस्य रह चुका है, जैसे कि

  • भारत सुरक्षा परिषद् का सात बार अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत ने सुरक्षा परिषद् के सदस्य के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • भारत सामाजिक तथा आर्थिक परिषद् का सदस्य अनेक बार रह चुका है और अब पिछले कुछ वर्षों से भारत इस परिषद् का निरन्तर सदस्य चला आ रहा है।
  • 1956 में भारत की श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित महासभा की अध्यक्षा चुनी गई।
  • भारत ने सदा ही यह कोशिश की है, कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानवधिकारों की रक्षा के लिए उचित कार्यवाही करे।

प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र में वीटो शक्ति क्या है ? यह शक्ति किन देशों के पास है ? नाम लिखो।
उत्तर-
निषेधाधिकार या वीटो सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की महत्त्वपूर्ण शक्ति है। निषेधाधिकार का अर्थ है स्थायी सदस्यों द्वारा संयुक्त राष्ट्र में किसी प्रस्ताव को पास होने से रोकना। इसका अभिप्राय यह है कि यदि पांच स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक सदस्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में रखे गए प्रस्ताव के विरोध में वोट डाल दे तो वह प्रस्ताव पास नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद् में यदि कोई सदस्य अनुपस्थित रहता है तो उसको निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं माना जाएगा। वीटो शक्ति अमेरिका, चीन, इंग्लैण्ड, रूस तथा फ्रांस के पास है।

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प्रश्न 7.
भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य कब बना ?
अथवा
यह क्यों कहा जाता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र का मौलिक मेम्बर है ?
उत्तर-
यद्यपि 1945 में भारत एक स्वतन्त्र देश नहीं था, परन्तु फिर भी उसने 26 जून, 1945 में हुए सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर पर हस्ताक्षर किए। इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व ए० आर० मुदालियार, फिरोजखान नून और कृष्माचारी ने किया। इस प्रकार भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक/मौलिक सदस्य बन गया।

प्रश्न 8.
विश्व शान्ति की स्थापना में भारत की संयुक्त राष्ट्र में क्या भूमिका है ?
अथवा
विश्व शान्ति की स्थापना में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में क्या भूमिका निभाई है?
उत्तर-
भारत ने विश्व-शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

  • कोरिया समस्या-1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के विरुद्ध भेजीं। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया।
  • स्वेज़ नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा इज़राइल ने मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए।
  • कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। लुमुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो में भेजी।
  • भारत ने सोमालिया में शान्ति स्थापित करने के उद्देश्यों से संयुक्त राष्ट्र की अपील पर 2500 सैनिक भेजे थे।

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प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण विशिष्ट एजेन्सियों के नाम लिखो।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों के नाम लिखो।
उत्तर-

  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ (I.L.O.)
  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)
  • विश्व स्वास्थ्य संघ (W.H.O.)
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.)
  • अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (I.B.R.D.)
  • खाद्य और खेतीबाड़ी संघ (F.A.O.)।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। आजकल इसकी सदस्य संख्या 193 है। भारत इसके आरम्भिक सदस्यों में से है। संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन-समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म-निर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना और इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को चलाने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है।

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प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र के पांच देशों के नाम लिखो, जिन्हें वीटो शक्ति प्राप्त है ?
उत्तर-
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। सुरक्षा परिषद् की कुल सदस्य संख्या 15 है। इनमें 10 अस्थायी सदस्य तथा 5 स्थायी सदस्य हैं। 5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो का अधिकार दिया गया है। ये देश हैं-अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा साम्यवादी चीन।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंगों के नाम लिखो।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र के 6 अंग हैं-(1) महासभा, (2) सुरक्षा परिषद्, (3) आर्थिक एवं सामाजिक परिषद्, (4) न्यास परिषद्, (5) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय तथा (6) सचिवालय।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों के नाम लिखें।
उत्तर-

  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ (I.L.O.)
  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)
  • विश्व स्वास्थ्य संघ (W.H.O.)
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.)

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प्रश्न 5.
यह क्यों कहा जाता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र का मौलिक मेम्बर है?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई तथा इसके कुल कितने मौलिक सदस्य थे ? (P.B. 2017)
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को सान फ्रांसिस्को सम्मेलन के परिणामस्वरूप हुई थी। इस सम्मेलन में 51 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें से 50 देशों ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर किए। इन सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र का मौलिक सदस्य कहा जाता है। भारत भी इन देशों में से एक था जिसने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। इस प्रकार भारत को संयुक्त राष्ट्र का मौलिक सदस्य कहा जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का उद्देश्य बताएं।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना विश्व में युद्धों को रोकने तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा के उद्देश्य से की गई थी।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र का कोई एक मूलभूत सिद्धान्त बताएं।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र का एक मूलभूत सिद्धान्त यह है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना सदस्य राष्ट्रों की समानता के आधार पर की गई है।

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प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ की दो एजेन्सियों के पूरे नाम लिखें।
उत्तर-

  1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.)
  2. अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (I.L.O.)

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब की गई थी ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई।

प्रश्न 5.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में ‘वीटो’ शक्ति का प्रयोग करने वाले देशों के नाम बताइये।
उत्तर-
5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो अधिकार प्राप्त है। ये देश हैं-अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा चीन।

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प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की नियुक्ति कैसे की जाती है ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा करती है।

प्रश्न 7.
भारत संयुक्त राष्ट्र का मैम्बर कब बना था ?
उत्तर-
भारत सन् 1945 में ही संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन गया था।

प्रश्न 8.
संयुक्त राष्ट्र में कार्य कर चुके किसी एक भारतीय का नाम लिखो।
उत्तर-
श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षा रह चुकी है।

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प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र के दो मुख्य अंगों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. महासभा
  2. सुरक्षा परिषद् ।

प्रश्न 10.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव का क्या नाम है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र का वर्तमान सेक्रेटरी जनरल कौन है ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव का नाम श्री एन्टोनियो गुटेरेश है।

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्र की एक महत्त्वपूर्ण विशिष्ट एजेन्सी का नाम लिखो।
उत्तर-
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (I.L.O.)।

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प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. एन्टोनियो गुटेरेश संयुक्त राष्ट्र का नौवां ……… है। वह …….. का नागरिक है।
2. संयुक्त राष्ट्र संघ में ………. मूल संस्थापक सदस्य हैं।
3. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना ……….. 1945 को हुई।
4. भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का …….. देश है। 5. संयुक्त राष्ट्र संघ के ………. अंग हैं।
उत्तर-

  1. महासचिव, पुर्तगाल
  2. 51
  3. 24 अक्तूबर
  4. संस्थापक
  5. 6।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें

1. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई।
2. संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य प्रभुसत्ता सम्पन्न हैं।
3. वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र की सदस्य संख्या 190 है।
4. संयुक्त राष्ट्र संघ के कुल 7 अंग हैं।
5. संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य महासभा के सदस्य हैं।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. ग़लत
  4. ग़लत
  5. सही।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना कब हुई ?
(क) 24 अक्तूबर, 1945
(ख) 24 अक्तूबर, 1940
(ग) 24 अक्तूबर, 1943
(घ) 24 अक्तूबर, 1944.
उत्तर-
(क) 24 अक्तूबर, 1945

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कितने अनुच्छेद हैं ?
(क) 110
(ख) 111
(ग) 120
(घ) 151
उत्तर-
(ख) 111

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन-सा देश संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारंभिक सदस्य है ?
(क) पाकिस्तान
(ख) बंगला देश
(ग) भारत
(घ) नेपाल।
उत्तर-
(ग) भारत

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय स्थित है ?
(क) न्यूयार्क में ।
(ख) लंदन में
(ग) नई दिल्ली में
(घ) पैरिस में।
उत्तर-
(क) न्यूयार्क में ।

प्रश्न 5.
प्रारंभ में संयुक्त राष्ट्र संघ के कितने सदस्य थे ?
(क) 45
(ख) 48
(ग) 51
(घ) 55.
उत्तर-
(ग) 51

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 5 वर्ग असमानताएं

Punjab State Board PSEB 12th Class Sociology Book Solutions Chapter 5 वर्ग असमानताएं Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 वर्ग असमानताएं

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सभी समाजों के अस्तित्व का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।’ किसका कथन है :
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) वी० आई० लेनिन
(ग) एनटोनियो ग्रामसी
(घ) रोसा लक्समबर्ग।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 2.
‘अपने आप में वर्ग’ और ‘अपने आप के लिए वर्ग’ की अवधारणा किसने दी है ?
(क) मार्क्स
(ख) वैबर
(ग) सोरोकिन
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) मार्क्स।

प्रश्न 3.
ऐरिक आलिन राइट द्वारा दिया गया वर्ग सिद्धान्त किनके विचारों का संश्लेषण करते हैं ?
(क) मार्क्स और दुखीम
(ख) मार्क्स और वैबर
(ग) मार्क्स और स्पैंसर
(घ) मार्क्स और एंजेल्स।
उत्तर-
(क) मार्क्स और दुर्थीम।

प्रश्न 4.
सम्पत्तिविहीन सफेदपोश व्यावसायिक वर्ग की एक वर्ग के रूप में चर्चा किसने की है ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) लॉयड वार्नर
(घ) विलफ्रिडो-पेरिटो।
उत्तर-
(ख) मैक्स वैबर।

प्रश्न 5.
जाति व वर्ग में भिन्नता को कौन नहीं दर्शाता :
(क) आरोपित व उपलब्धियां
(ख) बंद व मुक्त गतिशीलता
(ग) पवित्र व धर्म निरपेक्ष
(घ) शासक एवं शासित।
उत्तर-
(घ) शासक एवं शासित।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा उत्पादन का साधन नहीं है ?
(क) भूमि
(ख) संस्कृति
(ग) श्रम
(घ) पूंजी।
उत्तर-
(ख) संस्कृति।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन जीवन अवसरों व बाजार स्थितियों को वर्ग विश्लेषण के लिए महत्त्व देते हैं ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) एलफ्रेड वेबर
(घ) सी० डब्ल्यू० मिल्स।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 8.
भारत में उत्पादन के संसाधनों के स्वामित्व का निर्णायक कारण कौन-सा है ?
(क) स्थिति समूह
(ख) वर्ग
(ग) जाति
(घ) सामाजिक श्रेणी।
उत्तर-
(ग) जाति।

प्रश्न 9.
कृषिदास (खेतीहर मज़दूर) वर्ग का विरोधी है :
(क) सामंत
(ख) छोटे स्तर के पूंजीपति
(ग) बुर्जुआ
(घ) स्वामी।
उत्तर-
(क) सामंत।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. वर्ग प्रणाली स्वभाव में ……………… है।
2. वर्ग प्रणाली स्तर में ………………..
3. वैबर ने वर्ग के …………………… पद पर विचार किया है।
4. व्यक्ति का वर्ग स्तर …………………… एवं …………………… द्वारा निर्धारित होता है।
उत्तर-

  1. सार्वभौमिक,
  2. मुक्त,
  3. आर्थिक,
  4. शिक्षा, व्यवसाय।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं

1. सामाजिक वर्ग दासता, दर्जा, जागीरदारी तथा जाति की तरह स्तरीकरण का ही एक रूप है।
2. एक सामाजिक वर्ग अनिवार्य रूप से एक स्थिति समूह होता है।
3. वैबर के अनुसार धन, शक्ति तथा स्थिति असमानता के रूप हैं।
4. सामाजिक वर्ग मुक्त समूह हैं।
उत्तर-

  1.  सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही।

D. निम्नलिखित शब्दों का मिलान करें-

कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
सामाजिक वर्ग — बुर्जुआ
पूंजीपति — विशेष वर्ग की जीवन शैली
वर्ग के निर्धारक — मुक्त समूह
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
वर्ग चेतना — व्यवसाय
जीने का ढंग — आत्म जागरुकता
उत्तर-
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
सामाजिक वर्ग — मुक्त समूह
पूंजीपति — बुर्जुआ
वर्ग के निर्धारक — व्यवसाय
वर्ग चेतना — आत्म जागरुकता
जीने का ढंग — विशेष वर्ग की जीवन शैली

II. अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. किस सामाजिक समूह में सदस्यों का उत्पादन की शक्तियों के साथ समान सम्बन्ध होता है ?
उत्तर-पूंजीपति वर्ग में।

प्रश्न 2. क्या वर्ग में किसी की उर्ध्वगामी व निम्नगामी गतिशीलता हो सकता है ?
उत्तर-जी हाँ, यह मुमकिन है।

प्रश्न 3. विभिन्न सामाजिक आर्थिक स्थितियों में समूहों के विभाजन को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-वर्ग व्यवस्था।

प्रश्न 4. व्यक्तियों का कौन-सा सामाजिक वर्ग नीले कॉलर अथवा श्रम व्यवसाय की रचना करता है ?
उत्तर-श्रमिक वर्ग या मज़दूर वर्ग।

प्रश्न 5. वर्ग की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को दर्शाइए।
उत्तर-(i) वर्ग व्यवस्था के कई आधार होते हैं। (ii) वर्ग के लोगों में अपने वर्ग के प्रति चेतना होती है।

प्रश्न 6. आप संसाधनों के स्वामित्व से क्या समझते हैं ?
उत्तर- इसका अर्थ है कि साधनों पर किसी-न-किसी का व्यक्तिगत अधिकार होता है तथा वह ही उसका मालिक होता है।

प्रश्न 7. उत्पादन के साधनों को पहचानें।
उत्तर-वह साधन जो किसी न किसी वस्तु के उत्पादन में सहायता करते हैं, उत्पादन के साधन होते हैं जैसे कि मशीनें, उद्योग, औज़ार इत्यादि।

प्रश्न 8. उन दो वर्गों के नाम दें जो दासता के समय पाए गए।
उत्तर-दासता के समय दो वर्ग होते थे तथा वे थे गुलाम तथा स्वामी।

प्रश्न 9. बुर्जुआ कौन है ?
उत्तर-जिसके हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा जो उन साधनों की सहायता से अन्य वर्गों का शोषण करता है उसे बुर्जुआ कहते हैं। जैसे कि उद्योगपति।

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III. लघु उत्तरों वाले प्रश्न-

प्रश्न 1.
वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वर्ग ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी की स्थिति समाज में अपनी ही होती है। इसके अनुसार वर्ग के प्रत्येक सदस्य को कुछ विशेष उत्तरादियत्व, अधिकार तथा शक्तियां भी प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 2.
जाति व वर्ग में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-

  • जाति में व्यक्ति की स्थिति प्रदत्त होती है, जबकि वर्ग में यह अर्जित होती है।
  • व्यक्ति अपनी जाति को परिवर्तित नहीं कर सकता जबकि वर्ग को कर सकता है।
  • मुख्यतः चार प्रकार की जातियां होती हैं जबकि वर्ग हज़ारों की संख्या में हो सकते हैं।

प्रश्न 3.
ग्रामीण भारत में पाए जाने वाले वर्गों की पहचान करें।
उत्तर-
बड़े ज़मींदार, गैर-हाज़िर ज़मींदार, पूँजीपति किसान, किसान, ठेका आधारित ठेकेदार, सीमांत किसान, भूमिविहीन कृषक, साहूकार, छोटे व्यापारी, स्वैः नियुक्त व्यक्ति इत्यादि।

प्रश्न 4.
मार्क्स के इस कथन का क्या अभिप्राय है कि ‘सभी मौजूद समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।’
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार आज तक जितने भी समाज हुए हैं उनमें मुख्य रूप से दो समूह हुए हैं-प्रथम वह जिसके पास उत्पादन के साधन हैं तथा द्वितीय वह जिसके पास नहीं है। इस कारण दोनों में संघर्ष चलता रहा है। इस कारण मार्क्स ने कहा था कि सभी मौजूद समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।

प्रश्न 5.
मैक्स वैबर द्वारा वर्णित किए गए वर्गों के नाम लिखें।
उत्तर-

  • पूंजीपति बुर्जुआ वर्ग
  • सम्पत्ति विहीन सफेद पोश कार्यकारी वर्ग
  • मध्यवर्गीय वर्ग
  • औद्योगिक कार्यकारी वर्ग।

IV. दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐरिक ओलिन राइट के वर्ग विषयक विचारों की चर्चा करें।
उत्तर-
ऐरिक ओलिन राइट ने वर्ग का सिद्धांत दिया है तथा यह सिद्धांत मार्क्स वैबर के विचारों का मिश्रण है। राइट के अनुसार पूँजीपति समाज में आर्थिक साधनों पर नियंत्रण के लिए तीन मापदण्ड हैं तथा वह हैं-

  • पैसा या पूँजी पर नियन्त्रण ।
  • ज़मीन, फैक्टरी तथा दफ्तरों पर नियन्त्रण
  • मज़दूरों पर नियन्त्रण।।

यह मापदण्ड ही कई वर्गों का निर्माण करते हैं जैसे कि नीली वर्दी वाले कर्मी, श्वेत कालर कर्मी, व्यावसायिक कर्मचारी व शारीरिक कार्य करने वाले कर्मी इत्यादि। उसके अनुसार मध्य वर्ग के वर्करों (प्रबन्धक व निरीक्षक) का मालिकों से सीधा रिश्ता होता है जबकि मजदूर वर्ग का शोषण होता है।

प्रश्न 2.
जाति व वर्ग में संबंध स्पष्ट करें।
अथवा
जाति तथा वर्ग किस प्रकार परस्पर सम्बन्धित है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • जाति जन्म पर आधारित होती है जबकि वर्ग व्यवसाय तथा व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित होता है।
  • जाति में प्रदत्त स्थिति प्राप्त होती है जबकि वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है।
  • जाति अन्तर्वैवाहिक समूह होती है, जबकि वर्ग बर्हिविवाही समूह होता है।
  • जाति को वैधता हिंदू धार्मिक क्रियाओं से मिलती है परन्तु वर्ग को वैधता उसकी व्यक्तिगत योग्यता तथा पूँजीवादी व्यवस्था से मिलती है।
  • जाति में गतिशीलता नहीं होती है क्योंकि यह एक बंद व्यवस्था है परन्तु वर्ग में गतिशीलता होती है क्योंकि यह एक मुक्त व्यवस्था है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण भारत में पाए जाने वाले वर्गों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
बड़े ज़मींदार, गैर-हाज़िर ज़मींदार, पूँजीपति किसान, किसान, ठेका आधारित ठेकेदार, सीमांत किसान, भूमिविहीन कृषक, साहूकार, छोटे व्यापारी, स्वैः नियुक्त व्यक्ति इत्यादि।

प्रश्न 4.
शहरी भारत में पाए जाने वाले वर्गों का संक्षेप में वर्णन करें।
अथवा
नगरीय भारत में पाए जाने वाले वर्गों को लिखिए।
उत्तर-

  • कार्पोरेट पूंजीपति।
  • औद्योगिक पूंजीपति।
  • आर्थिक पूंजीपति।
  • नौकरशाह।
  • सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक अभिजात वर्ग।
  • मध्य वर्ग-मैनेजर, व्यापारी, छोटे दुकानदार, स्वै-कार्यरत व्यक्ति, बैंकर।
  • निम्न वर्ग-सहायक, मिस्त्री, निम्न स्तरीय निरीक्षक।
  • संगठित क्षेत्र में औद्योगिक कार्यरत वर्ग।
  • असंगठित/अर्द्ध संगठित क्षेत्र में कार्यरत वर्ग।
  • दिहाड़ीदार मज़दूर।
  • बेरोज़गार व्यक्ति।

प्रश्न 5.
मध्य वर्ग पर कुछ टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
अमीर तथा निर्धन व्यक्तियों के बीच एक अन्य वर्ग आता है जिसे मध्य वर्ग का नाम दिया जाता है। यह वर्ग साधारणतया तथा नौकरी करने वालों, छोटे दुकानदारों या व्यापारी लोगों का होता है। यह वर्ग या तो उच्च वर्ग के लोगों के पास नौकरी करता है या सरकारी नौकरी करता है। छोटे-बड़े व्यापारी, छोटे-बड़े दुकानदार, क्लर्क, छोटे-बड़े अफसर, छोटे-बड़े किसान, ठेकेदार, जायदाद का कार्य करने वाले लोग, छोटे-मोटे कलाकार इत्यादि सभी इस वर्ग में आते हैं। उच्च वर्ग इस वर्ग की सहायता से निम्न वर्ग पर अपना अधिकार कायम रखता है।

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V. अति दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मार्क्सवादी के वर्ग सिद्धान्त का वर्णन करें।
अथवा
वर्ग के मार्क्सवादी सिद्धान्त को बताइए।
उत्तर-
कार्ल मार्क्स ने सामाजिक स्तरीकरण का संघर्षवाद का सिद्धान्त दिया है और यह सिद्धान्त 19वीं शताब्दी के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों के कारण ही आगे आया है। मार्क्स ने केवल सामाजिक कारकों को ही सामाजिक स्तरीकरण एवं अलग-अलग वर्गों में संघर्ष का सिद्धान्त माना है। ___ मार्क्स ने यह सिद्धान्त श्रम विभाजन के आधार पर दिया। उसके अनुसार श्रम दो प्रकार का होता है-शारीरिक एवं बौद्धिक श्रम और यही अन्तर ही सामाजिक वर्गों में संघर्ष का कारण बना।

मार्क्स का कहना है कि समाज में साधारणतः दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है। दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता है। इस मलकीयत के आधार पर ही पहला वर्ग उच्च स्थिति में एवं दूसरा वर्ग निम्न स्थिति में होता है। मार्क्स पहले (मालिक) वर्ग को पूंजीपति वर्ग और दूसरे (गैर-मालिक) वर्ग को मज़दूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग, मजदूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है और मज़दूर वर्ग अपने आर्थिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यही स्तरीकरण का परिणाम है।

मार्क्स का कहना है कि स्तरीकरण के आने का कारण ही सम्पत्ति का असमान विभाजन है। स्तरीकरण की प्रकृति उस समाज के वर्गों पर निर्भर करती है और वर्गों की प्रकृति उत्पादन के तरीकों पर उत्पादन का तरीका तकनीक पर निर्भर करता है। वर्ग एक समूह होता है जिसके सदस्यों के सम्बन्ध उत्पादन की शक्तियों के समान होते हैं, इस तरह वह सभी व्यक्ति जो उत्पादन की शक्तियों पर नियन्त्रण रखते हैं। वह पहला वर्ग यानि कि पूंजीपति वर्ग होता है जो उत्पादन की शक्तियों का मालिक होता है। दूसरा वर्ग वह है तो उत्पादन की शक्तियों का मालिक नहीं है बल्कि वह मजदूरी या मेहनत करके अपना समय व्यतीत करता है यानि कि यह मजदूर वर्ग कहलाता है। अलग-अलग समाजों में इनके अलगअलग नाम हैं जिनमें ज़मींदारी समाज में ज़मींदार और खेतीहर मज़दूर और पूंजीपति समाज में पूंजीपति एवं मजदूर। पूंजीपति वर्ग के पास उत्पादन की शक्ति होती है और मजदूर वर्ग के पास केवल मज़दूरी होती है जिसकी सहायता के साथ वह अपना गुजारा करता है। इस प्रकार उत्पादन के तरीकों एवं सम्पत्ति के समान विभाजन के आधार पर बने वर्गों को मार्क्स ने सामाजिक वर्ग का नाम दिया है।

मार्क्स के अनुसार “आज का समाज चार युगों में से गुजर कर हमारे सामने आया है।”

(a) प्राचीन समाजवादी युग (Primitive Ancient Society or Communism)
(b) प्राचीन समाज (Ancient Society)
(c) सामन्तवादी युग (Feudal Society)
(d) पूंजीवाद युग (Capitalist Society)।

मार्क्स के अनुसार पहले प्रकार के समाज में वर्ग अस्तित्व में नहीं आये थे। परन्तु उसके पश्चात् के समाजों में दो प्रमुख वर्ग हमारे सामने आये। प्राचीन समाज में मालिक एवं दास। सामन्तवादी में सामन्त एवं खेतीहारी मज़दूर वर्ग। पूंजीवादी समाज में पूंजीवादी एवं मज़दूर वर्ग। प्रायः समाज में मजदूरी का कार्य दूसरे वर्ग के द्वारा ही किया गया। मजदूर वर्ग बहुसंख्यक होता है और पूंजीवादी वर्ग कम संख्या वाला।

मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो प्रकार के वर्गों का अनुभव किया है। परन्तु मार्क्स के फिर भी इस मामले में विचार एक समान नहीं है। मार्क्स कहता है कि पूंजीवादी समाज में तीन वर्ग होते हैं। मज़दूर, सामन्त एवं ज़मीन के मालिक (land owners) मार्क्स ने इन तीनों में से अन्तर आय के साधनों, लाभ एवं ज़मीन के किराये के आधार पर किया है। परन्तु मार्क्स की तीन पक्षीय व्यवस्था इंग्लैण्ड में कभी सामने नहीं आई।

मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ तीन वर्गीय व्यवस्था दो वर्गीय व्यवस्था में परिवर्तित हो जायेगी एवं मध्यम वर्ग समाप्त हो जायेगा। इस बारे में उसने कम्युनिष्ट घोषणा पत्र में कहा है। मार्क्स ने विशेष समाज के अन्य वर्गों का उल्लेख भी किया है। जैसे बुर्जुआ या पूंजीपति वर्ग को उसने दो उपवर्ग जैसे प्रभावी बुर्जुआ और छोटे बुर्जुआ वर्गों में बांटा है। प्रभावी बुर्जुआ वे होते हैं जो बड़े-बड़े पूंजीपति व उद्योगपति होते हैं और जो हज़ारों की संख्या में मजदूरों को कार्य करने को देते हैं। छोटे बुर्जुआ वे छोटे उद्योगपति या दुकानदार होते हैं जिनके व्यापार छोटे स्तर पर होते हैं और वे बहुत अधिक मज़दूरों को कार्य नहीं दे सकते। वे काफ़ी सीमा तक स्वयं ही कार्य करते हैं। मार्क्स यहां पर फिर कहता है कि पूंजीवाद के विकसित होने के साथ-साथ मध्यम वर्ग व छोटी-छोटी बुर्जुआ उप-जातियां समाप्त हो जाएंगी या फिर मज़दूर वर्ग में मिल जाएंगी। इस तरह समाज में पूंजीपति व मजदूर वर्ग रह जाएगा।

वर्गों के बीच सम्बन्ध (Relationship between Classes) –

मार्क्स के अनुसार “पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग का आर्थिक शोषण करता रहता है और मज़दूर वर्ग अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करता रहता है। इस कारण दोनों वर्गों के बीच के सम्बन्ध विरोध वाले होते हैं। यद्यपि कुछ समय के लिये दोनों वर्गों के बीच का विरोध शान्त हो जाता है परन्तु वह विरोध चलता रहता है। यह आवश्यक नहीं कि यह विरोध ऊपरी तौर पर ही दिखाई दे। परन्तु उनको इस विरोध का अहसास तो होता ही रहता है।”

मार्क्स के अनुसार वर्गों के बीच आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता एवं संघर्ष पर आधारित होते हैं। हम उदाहरण ले सकते हैं पूंजीवादी समाज के दो वर्गों का। एक वर्ग पूंजीपति का होता है दूसरा वर्ग मज़दूर का होता है। यह दोनों वर्ग अपने अस्तित्व के लिये एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन की शक्तियां एक मलकीयत नहीं होती हैं। उसके पास रोटी कमाने हेतु अपनी मेहनत के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। वह रोटी कमाने के लिये पूंजीपति वर्ग के पास अपनी मेहनत बेचते हैं और उन पर ही निर्भर करते हैं। वह अपनी मजदूरी पूंजीपतियों के पास बेचते हैं जिसके बदले पूंजीपति उनको मेहनत का किराया देता है। इसी किराये के साथ मज़दूर अपना पेट पालता है। पूंजीपति भी मज़दूरों की मेहनत पर ही निर्भर करता है। क्योंकि मजदूरों के बिना कार्य किये न तो उसका उत्पादन हो सकता है और न ही उसके पास पूंजी एकत्रित हो सकती है। – इस प्रकार दोनों वर्ग एक-दूसरे के ऊपर निर्भर हैं। परन्तु इस निर्भरता का अर्थ यह नहीं है कि उनमें सम्बन्ध एक समान होते हैं।

पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग का शोषण करता है। वह कम धन खर्च करके अधिक उत्पादन करना चाहता है ताकि उसका स्वयं का लाभ बढ़ सके। मज़दूर अधिक मज़दूरी मांगता है ताकि वह अपना व परिवार का पेट पाल सके। उधर पूंजीपति मज़दूरों को कम मजदूरी देकर वस्तुओं को ऊँची कीमत पर बेचने की कोशिश करता है ताकि उसका लाभ बढ़ सके। इस प्रकार दोनों वर्गों के भीतर अपने-अपने हितों के लिये संघर्ष (Conflict of Interest) चलता रहता है। यह संघर्ष अन्ततः समतावादी व्यवस्था (Communism) को जन्म देगा जिसमें न तो विरोध होगा न ही किसी का शोषण होगा, न ही किसी के ऊपर अत्याचार होगा, न ही हितों का संघर्ष होगा और यह समाज वर्ग रहित समाज होगा।

कार्ल मार्क्स ने ऐतिहासिक आधार पर स्तरीकरण के संघर्ष सिद्धान्त की व्याख्या की है। मार्क्स के स्तरीकरण के संघर्ष के सिद्धान्त में निम्नलिखित बातें मुख्य हैं-

1. समाज में दो वर्ग (Two classes in society) मार्क्स का कहना था कि प्रत्येक प्रकार के समाज में साधारणत: दो वर्ग पाए जाते हैं। पहला तो वह जिसके हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा जिसे हम आज पूंजीपति के नाम से जानते हैं। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते तथा जो अपना श्रम बेचकर गुज़ारा करता है। इसको मज़दूर वर्ग का नाम दिया जाता है। पहला वर्ग शोषण करता है तथा दूसरा वर्ग शोषित होता है।

2. उत्पादन के साधनों पर अधिकार (Right over means of production)-मार्क्स ने स्तरीकरण की ऐतिहासिक आधार पर व्याख्या करते हुए कहा है कि समाज में स्तरीकरण उत्पादन के साधनों पर अधिकार के आधार पर होता है। प्रत्येक समाज में इस आधार पर दो वर्ग पाए जाते हैं। पहला वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर अधिकार होता है। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते तथा जो अपना श्रम बेचकर रोज़ी कमाता है।

3. उत्पादन की व्यवस्था (Modes of Production)-उत्पादन की व्यवस्था पर ही सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप निर्भर करता है। जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसकी स्थिति अन्य वर्गों से उच्च होती है। इस वर्ग को मार्क्स ने पूंजीपति या बुर्जुआ (Bourgeoisie) का नाम दिया है। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते, जो अपनी स्थिति से सन्तुष्ट नहीं होता तथा अपनी स्थिति को बदलना चाहता है। इसको मार्क्स ने मज़दूर या प्रोलतारी (Proletariat) का नाम दिया है।

4. मनुष्यों का इतिहास-वर्ग संघर्ष का इतिहास (Human history-History of Class Struggle)-मार्क्स का कहना है कि मनुष्यों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। हम किसी भी समाज की उदाहरण ले सकते हैं। प्रत्येक समाज में अलग-अलग वर्गों में किसी-न-किसी रूप में संघर्ष तो चलता ही रहा है। __ इस तरह मार्क्स का कहना था कि सभी समाजों में साधारणतः पर दो वर्ग रहे हैं-मज़दूर तथा पूंजीपति वर्ग। दोनों में वर्ग संघर्ष चलता ही रहता है। इन में वर्ग संघर्ष के कई कारण होते हैं जैसे कि दोनों वर्गों में बहुत ज्यादा आर्थिक अन्तर होता है जिस कारण वह एक-दूसरे का विरोध करते हैं। पूंजीपति वर्ग बिना परिश्रम किए ही अमीर होता चला जाता है तथा मज़दूर वर्ग सारा दिन परिश्रम करने के बाद भी ग़रीब ही बना रहता है।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

समय के साथ-साथ मज़दूर वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन बना लेता है तथा यह संगठन पूंजीपतियों से अपने अधिकार लेने के लिए संघर्ष करते हैं। इस संघर्ष का परिणाम यह होता है कि समय आने पर मज़दूर वर्ग पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध क्रान्ति कर देता है तथा क्रान्ति के बाद पूंजीपतियों का खात्मा करके अपनी सत्ता स्थापित कर लेते हैं। पूंजीपति अपने पैसे की मदद से प्रति क्रान्ति की कोशिश करेंगे परन्तु उनकी प्रति क्रान्ति को दबा दिया जाएगा तथा मजदूरों की सत्ता स्थापित हो जाएगी। पहले साम्यवाद तथा फिर समाजवाद की स्थिति आएगी जिसमें हरेक को उसकी ज़रूरत तथा योग्यता के अनुसार मिलेगा। समाज में कोई वर्ग नहीं होगा तथा यह वर्गहीन समाज होगा जिसमें सभी को बराबर का हिस्सा मिलेगा। कोई भी उच्च या निम्न नहीं होगा तथा मज़दूर वर्ग की सत्ता स्थापित रहेगी। मार्क्स का कहना था कि चाहे यह स्थिति अभी नहीं आयी है परन्तु जल्द ही यह स्थिति आ जाएगी तथा समाज में से स्तरीकरण खत्म हो जाएगा।

प्रश्न 2.
वैबर के वर्ग सिद्धान्त का वर्णन करें।
अथवा
वर्ग के वैबर सिद्धान्त की चर्चा कीजिए।
अथवा
वैबर के वर्ग सिद्धान्त की चर्चा करें।
उत्तर-
मैक्स वैबर ने वर्ग का सिद्धान्त दिया था जिसमें उसने वर्ग, स्थिति समूह तथा दल की अलग-अलग व्याख्या की थी। वैबर का स्तरीकरण का सिद्धान्त तर्कसंगत तथा व्यावहारिक माना जाता है। यही कारण है कि अमेरिकी समाजशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त को काफ़ी महत्त्व प्रदान किया है। वैबर ने स्तरीकरण को तीन पक्षों से समझाया है तथा वह है वर्ग, स्थिति तथा दल। इन तीनों ही समूहों को एक प्रकार से हित समूह कहा जा सकता है जो न केवल अपने अंदर लड़ सकते हैं बल्कि यह एक-दूसरे के विरुद्ध भी लड़ सकते हैं। यह एक विशेष सत्ता के बारे में बताते हैं तथा आपस में एक-दूसरे से संबंधित भी होते हैं। अब हम इन तीनों का अलग-अलग विस्तार से वर्णन करेंगे।

वर्ग (Class)-मार्ल मार्क्स ने वर्ग की परिभाषा आर्थिक आधार पर दी थी तथा उसी प्रकार वैबर ने भी वर्ग की धारणा आर्थिक आधार पर दी है। वैबर के अनुसार, “वर्ग ऐसे लोगों का समूह होता है जो किसी समाज के आर्थिक मौकों की संरचना में समान स्थिति में होता है तथा जो समान स्थिति में रहते हैं। “यह स्थितियां उनकी आर्थिक शक्ति के रूप तथा मात्रा पर निर्भर करती है।” इस प्रकार वैबर ऐसे वर्ग की बात करता है जिसमें लोगों की एक विशेष संख्या के लिए जीवन के मौके एक समान होते हैं। चाहे वैबर की यह धारणा मार्क्स की वर्ग की धारणा से अलग नहीं है परन्तु वैबर ने वर्ग की कल्पना समान आर्थिक स्थितियों में रहने वाले लोगों के रूप में की है आत्म चेतनता समूह के रूप में नहीं। वैबर ने वर्ग के तीन प्रकार बताए हैं जोकि निम्नलिखित हैं :

(1) सम्पत्ति वर्ग (A Property Class)
(2) अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)
(3) सामाजिक वर्ग (A Social Class)।

1. सम्पत्ति वर्ग (A Property Class)-सम्पत्ति वर्ग वह वर्ग होता है जिस की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितनी सम्पत्ति अथवा जायदाद है। यह वर्ग आगे दो भागों में बांटा गया है-

(i) सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Positively Privileged Property Class)—इस वर्ग के पास काफ़ी सम्पत्ति तथा जायदाद होती है तथा यह इस जायदाद से हुई आय पर अपना गुज़ारा करता है। यह वर्ग उपभोग करने वाली वस्तुओं के खरीदने या बेचने, जायदाद इकट्ठी करके अथवा शिक्षा लेने के ऊपर अपना एकाधिकार कर सकता है।
(ii) नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Negatively Privileged Property Class)—इस वर्ग के मुख्य सदस्य अनपढ़, निर्धन, सम्पत्तिहीन तथा कर्जे के बोझ नीचे दबे हुए लोग होते हैं। इन दोनों समूहों के साथ एक विशेष अधिकार प्राप्त मध्य वर्ग भी होता है जिसमें ऊपर वाले दोनों वर्गों के लोग शामिल होते हैं। वैबर के अनुसार पूंजीपति अपनी विशेष स्थिति होने के कारण तथा मज़दूर अपनी नकारात्मक रूप से विशेष स्थिति होने के कारण इस समूह में शामिल होता है।

2. अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)-यह उस प्रकार का समूह होता है जिस की स्थिति बाज़ार में मौजूदा सेवाओं का लाभ उठाने के मौकों के साथ निर्धारित होती है। यह समूह आगे तीन प्रकार का होता है-

  • सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Positively Privileged Acquisition Class) इस वर्ग का उत्पादक फैक्टरी वालों के प्रबंध पर एकाधिकार होता है। यह फैक्ट्रियों वाले बैंकर, उद्योगपति, फाईनेंसर इत्यादि होते हैं। यह लोग प्रबंधकीय व्यवस्था को नियन्त्रण में रखने के साथ-साथ सरकारी आर्थिक नीतियों . पर भीषण प्रभाव डालते हैं।
  • विशेषाधिकार प्राप्त मध्य अधिग्रहण वर्ग (The Middle Privileged Acquisition Class)—यह वर्ग मध्य वर्ग के लोगों का वर्ग होता है जिसमें छोटे पेशेवर लोग, कारीगर, स्वतन्त्र किसान इत्यादि शामिल होते हैं।
  • नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Negatively Privileged Acquisition Class)-इस वर्ग में छोटे वर्गों के लोग विशेषतया कुशल, अर्द्ध-कुशल तथा अकुशल मजदूर शामिल होते हैं।

3. सामाजिक वर्ग (Social Class)—इस वर्ग की संख्या काफी अधिक होती है। इसमें अलग-अलग पीढ़ियों की तरक्की के कारण निश्चित रूप से परिवर्तन दिखाई देता है। परन्तु वैबर सामाजिक वर्ग की व्याख्या विशेष अधिकारों के अनुसार नहीं करता। उसके अनुसार मजदूर वर्ग, निम्न मध्य वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, सम्पत्ति वाले लोग इत्यादि इसमें शामिल होते हैं।

वैबर के अनुसार किन्हीं विशेष स्थितियों में वर्ग के लोग मिलजुल कर कार्य करते हैं तथा इस कार्य करने की प्रक्रिया को वैबर ने वर्ग क्रिया का नाम दिया है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर ने इस बात पर विश्वास नहीं किया कि वर्ग क्रिया जैसी बात अक्सर हो सकती है। वैबर का कहना था कि वर्ग में वर्ग चेतनता नहीं होती बल्कि उनकी प्रकृति पूर्णतया आर्थिक होती है। उनमें इस बात की भी संभावना नहीं होती कि वह अपने हितों को प्राप्त करने के लिए इकट्ठे होकर संघर्ष करेंगे। एक वर्ग लोगों का केवल एक समूह होता है जिनकी आर्थिक स्थिति बाज़ार में एक जैसी होती है। वह उन चीजों को इकट्ठे करने में जीवन के ऐसे परिवर्तनों को महसूस करते हैं, जिनकी समाज में कोई इज्जत होती है तथा उनमें किसी विशेष स्थिति में वर्ग चेतना विकसित होने की तथा इकट्ठे होकर क्रिया करने की संभावना होती है। वैबर का कहना था कि अगर ऐसा होता है तो वर्ग एक समुदाय का रूप ले लेता है।

स्थिति समूह (Status Group)—स्थिति समूह को साधारणतया आर्थिक वर्ग स्तरीकरण के विपरीत समझा जाता है। वर्ग केवल आर्थिक मान्यताओं पर आधारित होता है जोकि समान बाज़ारी स्थितियों के कारण समान हितों वाला समूह है। परन्तु दूसरी तरफ स्थिति समूह सांस्कृतिक क्षेत्र में पाया जाता है यह केवल संख्यक श्रेणियों के नहीं होते बल्कि यह असल में वह समूह होते हैं जिनकी समान जीवन शैली होती है, संसार के प्रति समान दृष्टिकोण होता है तथा ये लोग आपस में एकता भी रखते हैं।

वैबर के अनुसार वर्ग तथा स्थिति समूह में अंतर होता है। हरेक का अपना ढंग होता है तथा इनमें लोग असमान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी स्कूल का अध्यापक। चाहे उसकी आय 8-10 हज़ार रुपये प्रति माह होगी जोकि आज के समय में कम है परन्तु उसकी स्थिति ऊंची है। परन्तु एक स्मगलर या वेश्या चाहे माह में लाखों कमा रहे हों परन्तु उनका स्थिति समूह निम्न ही रहेगी क्योंकि उनके पेशे को समाज मान्यता नहीं देता। इस प्रकार दोनों के समूहों में अंतर होता है। किसी पेशे समूह को भी स्थिति समूह का नाम दिया जाता है क्योंकि हरेक प्रकार के पेशे में उस पेशे से संबंधित लोगों के लिए पैसा कमाने के समान मौके होते हैं। यही समूह उनकी जीवन शैली को समान भी बनाते हैं। एक पेशा समूह के सदस्य एक-दूसरे के नज़दीक रहते हैं, एक ही प्रकार के कपड़े पहनते हैं तथा उनके मूल्य भी एक जैसे ही होते हैं। यही कारण है कि इसके सदस्यों का दायरा विशाल हो जाता है।

दल (Party) वैबर के अनुसार दल वर्ग स्थिति के साथ निर्धारित हितों का प्रतिनिधित्व करता है। यह दल किसी न किसी स्थिति में उन सदस्यों की भर्ती करता है जिनकी विचारधारा दल की विचारधारा से मिलती हो। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उनके लिए दल स्थिति दल ही बने। वैबर का कहना है कि दल हमेशा इस ताक में रहते हैं कि सत्ता उनके हाथ में आए अर्थात् राज्य या सरकार की शक्ति उनके हाथों में हो। वैबर का कहना है कि चाहे दल राजनीतिक सत्ता का एक हिस्सा होते हैं परन्तु फिर भी सत्ता कई प्रकार से प्राप्त की जा सकती है जैसे कि पैसा, अधिकार, प्रभाव, दबाव इत्यादि। दल राज्य की सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं तथा राज्य एक संगठन होता है। दल की हरेक प्रकार की क्रिया इस बात की तरफ ध्यान देती है कि सत्ता किस प्रकार प्राप्त की जाए। वैबर ने राज्य का विश्लेषण किया तथा इससे ही उसने नौकरशाही का सिद्धान्त पेश किया।

वैबर के अनुसार दल दो प्रकार के होते हैं। पहला है सरप्रस्ती का दल (Patronage Party) जिनके लिए कोई स्पष्ट नियम, संकल्प इत्यादि नहीं होते। यह किसी विशेष मौके के लिए बनाए जाते हैं तथा हितों की पूर्ति के बाद इन्हें छोड़ दिया जाता है। दूसरी प्रकार का दल है सिद्धान्तों का दल (Party of Principles) जिसमें स्पष्ट या मज़बूत नियम या सिद्धान्त होते हैं। यह दल किसी विशेष अवसर के लिए नहीं बनाए जाते। वैबर के अनुसार चाहे इन तीनों वर्ग, स्थिति समूह तथा दल में काफी अन्तर होता है परन्तु फिर भी इनमें आपसी संबंध भी मौजूद होता है।

प्रश्न 3.
वर्ग, सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक स्तरीकरण में पारस्परिक सम्बन्ध क्या है ? वर्णन करें।
उत्तर-
वर्ग, सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक स्तरीकरण में काफ़ी गहरा सम्बन्ध है परन्तु इस सम्बन्ध का जानने से पहले हमें इसका अर्थ देखना पड़ेगा।

  • वर्ग-वर्ग ऐसे लोगों का समूह है जो किसी-न-किसी आधार पर अन्य समूहों से अलग होता है। वर्ग के सदस्य अपने वर्ग के प्रति चेतन होते हैं तथा अन्य वर्गों के लोगों को अपने वर्ग में आसानी से नहीं आने देते। वर्ग के कई आधार होते हैं जैसे कि धन, सम्पत्ति, व्यवसाय इत्यादि।
  • सामाजिक गतिशीलता-सम्पूर्ण समाज अलग-अलग वर्गों में विभाजित होता है तथा इन वर्गों के लोगों के अपना वर्ग छोड़ कर दूसरे वर्ग में जाने की प्रक्रिया को सामाजिक गतिशीलता कहते हैं। लोग अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अपना वर्ग परिवर्तित कर लेते हैं तथा इस कारण गतिशीलता की प्रक्रिया चलती रहती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण-समाज को अलग-अलग स्तरों अथवा वर्गों में विभाजित करने की प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं। समाज को अलग-अलग आधारों पर विभाजित किया जाता है जैसे कि आय, जाति, लिंग, आयु, शिक्षा, धन इत्यादि।

अगर हम इन तीन संकल्पों के अर्थ को ध्यान से देखें तो हमें पता चलता है कि इन तीनों का आपस में काफ़ी गहरा सम्बन्ध है। समाज को अलग-अलग वर्गों अथवा स्तरों में विभाजित करने की प्रक्रिया को स्तरीकरण कहते हैं तथा लोग अपना वर्ग परिवर्तित करते रहते हैं। लोग अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अपना वर्ग परिवर्तित कर लेते हैं तथा एक वर्ग से दूसरे वर्ग में जाने की प्रक्रिया को गतिशीलता कहते हैं।

आजकल के समय में लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं तथा अलग-अलग व्यवसाय अपना रहे हैं। शिक्षा लेने के कारण उनकी सामाजिक स्थिति ऊँची हो जाती है तथा वह अच्छी नौकरी करने लग जाते हैं। अच्छी नौकरी के कारण उनके पास पैसा आ जाता है तथा वह सामाजिक स्तरीकरण में उच्च स्तर पर पहुँच जाते हैं। धीरे-धीरे वह तरक्की प्राप्त करने के लिए नौकरी ही बदल लेते हैं तथा अधिक पैसा कमाने लग जाते हैं। इस प्रकार वह समय के साथ अलग-अलग वर्गों के सदस्य बनते हैं जिस कारण समाज में गतिशीलता चलती रहती है।

इस व्याख्या को देखने के पश्चात् हम कह सकते हैं कि वर्ग, गतिशीलता तथा स्तरीकरण में काफ़ी गहरा सम्बन्ध होता है। इस कारण ही समाज प्रगति की तरफ बढ़ता है तथा लोग प्रगति करते रहते हैं।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न (OTHER IMPORTANT QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इनमें से कौन-सी वर्ग की विशेषता नहीं है ?
(क) अर्जित स्थिति
(ख) मुक्त व्यवस्था
(ग) जन्म पर आधारित
(घ) समूहों में उच्च निम्न स्थिति।
उत्तर-
(ग) जन्म पर आधारित।

प्रश्न 2.
कौन-सी वर्ग की विशेषता है ?
(क) उच्च निम्न की भावना
(ख) सामाजिक गतिशीलता
(ग) उपवर्गों का विकास
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 3.
उस व्यवस्था को क्या कहते हैं जिसमें समाज के व्यक्तियों को अलग-अलग आधारों पर विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है ?
(क) जाति व्यवस्था
(ख) वर्ग व्यवस्था
(ग) सामुदायिक व्यवस्था
(घ) सामाजिक व्यवस्था।
उत्तर-
(ख) वर्ग व्यवस्था।

प्रश्न 4.
वर्ग व्यवस्था का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
(क) जाति व्यवस्था कमजोर हो रही है।
(ख) निम्न जातियों के लोग उच्च स्तर पर पहुँच रहे हैं।
(ग) व्यक्ति को अपनी योग्यता दिखाने का मौका मिलता है।
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
वर्ग तथा जाति में क्या अंतर है ?
(क) जाति जन्म व वर्ग योग्यता पर आधारित होता है।
(ख) व्यक्ति वर्ग बदल सकता है पर जाति नहीं।
(ग) जाति में कई प्रकार के प्रतिबन्ध होते हैं पर वर्ग में नहीं।
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 6.
वर्ग संघर्ष का सिद्धांत किसने दिया था ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) राईट
(घ) वार्नर।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 7.
वर्ग चेतना तथा वर्ग संघर्ष की अवधारणा किसने दी है ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) दुर्थीम
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. वर्ग की सदस्या व्यक्ति की …….. पर निर्भर करती है।
2. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत .. ………………… ने दिया था।
3. मार्क्स के अनुसार संसार में …. …. प्रकार के वर्ग होते हैं।
4. ……………… को बुर्जुआ कहते हैं।
5. ……………….. वर्ग को सर्वहारा कहते हैं।
उत्तर-

  1. योग्यता
  2. कार्ल मार्क्स
  3. दो
  4. पूँजीपति
  5. मज़दूर।

C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं-

1. सभी वर्गों में वर्ग चेतना मौजूद होती है।
2. वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है।
3. आय, व्यवसाय, धन तथा शिक्षा व्यक्ति का वर्ग निर्धारित करते हैं।
4. वैबर के अनुसार धन, सत्ता तथा स्थिति असमानता के आधार हैं।
5. वार्नर ने भारत की वर्ग संरचना का अध्ययन किया था।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही
  5. गलत।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. वर्ग की सदस्यता किस पर निर्भर करती है ?
उत्तर-वर्ग की सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 2. आजकल वर्ग का निर्धारण किस आधार पर होता है ?
उत्तर-आजकल वर्ग का निर्धारण शिक्षा, धन, व्यवसाय, नातेदारी इत्यादि के आधार पर होता है।

प्रश्न 3. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत किसने दिया था ?
उत्तर-वर्ग संघर्ष का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया था।

प्रश्न 4. धन के आधार पर हम लोगों को कितने वर्गों में बाँट सकते हैं ?
उत्तर-धन के आधार पर हम लोगों को उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा श्रमिक वर्ग में बाँट सकते हैं।

प्रश्न 5. गाँव में मिलने वाले मुख्य वर्ग बताएँ।
उत्तर- गाँव में हमें ज़मींदार वर्ग, किसान वर्ग व मज़दूर वर्ग मुख्यतः मिल जाते हैं।

प्रश्न 6. वर्ग व्यवस्था क्या होती है ?
उत्तर-जब समाज में अलग-अलग आधारों पर कई प्रकार के समूह बन जाते हैं उसे वर्ग व्यवस्था कहते हैं।

प्रश्न 7. वर्ग किस प्रकार का समूह है ?
उत्तर-वर्ग एक मुक्त समूह होता है जिसकी सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 8. वर्ग में किस प्रकार के संबंध पाए जाते हैं ?
उत्तर-वर्ग में औपचारिक, अस्थाई तथा सीमित संबंध पाए जाते हैं।

प्रश्न 9. मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार क्या होता है ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार आर्थिक अर्थात् धन होता है।

प्रश्न 10. मार्क्स के अनुसार संसार में कितने वर्ग होते हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार संसार में दो वर्ग होते हैं-पूँजीपति तथा मज़दूर।

प्रश्न 11. वैबर के अनुसार असमानता का आधार क्या होता है ?
उत्तर-वैबर के अनुसार धन, सत्ता तथा स्थिति असमानता के आधार होते हैं।

प्रश्न 12. बुर्जुआ क्या होता है ?
उत्तर-जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसे बुर्जुआ कहते हैं।

प्रश्न 13. सर्वहारा क्या होता है ?
उत्तर-वह वर्ग जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते, अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता, उसे सर्वहारा कहते हैं।

प्रश्न 14. वर्गहीन समाज कौन-सा होता है ?
उत्तर-वह समाज जहाँ वर्ग नहीं होते, वह वर्गहीन समाज होता है।

प्रश्न 15. जाति व वर्ग में एक अंतर बताएं।
उत्तर-जाति जन्म पर आधारित होती है परन्तु वर्ग योग्यता पर आधारित होता है।

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III. अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न ।

प्रश्न 1.
वर्ग क्या होता है ?
अथवा
वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
समाज में जब अलग-अलग व्यक्तियों को विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है तो उसे विशेष सामाजिक स्थिति वाले समूह को वर्ग कहते हैं। मार्क्स के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग को उसके उत्पादन के साधनों तथा सम्पत्ति के विभाजन से स्थापित होने वाले संबंधों के संदर्भ में परिभाषित किया जा सकता है।”

प्रश्न 2.
वर्ग की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  • वर्ग के सभी सदस्यों की समाज में स्थिति लगभग समान ही होती है जैसे अमीर वर्ग के सदस्यों को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।
  • वर्गों का निर्माण अलग-अलग आधारों पर होता है जैसे कि शिक्षा, पैसा, व्यवसाय, राजनीति, धर्म इत्यादि।

प्रश्न 3.
वर्ग व्यवस्था के कोई तीन प्रभाव बताएं।
उत्तर-

  • वर्ग व्यवस्था से जाति व्यवस्था कमजोर हो गई है।
  • वर्ग व्यवस्था से निम्न जातियों के लोग उच्च स्तर पर पहुंच रहे हैं।
  • वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति को अपनी योग्यता दिखाने का मौका प्राप्त होता है।

प्रश्न 4.
नगरों में मुख्य रूप से कौन-से तीन वर्ग देखने को मिल जाते हैं ?
उत्तर-

  • उच्च वर्ग-वह वर्ग जो अमीर व ताकतवर होता है।
  • मध्य वर्ग-डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, नौकरी पेशा लोग, दुकानदार इसमें आते हैं।
  • निम्न वर्ग-इसमें वे मज़दूर आते हैं जो अपना परिश्रम बेच कर गुज़ारा करते हैं।

IV. लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रेणी व्यवस्था या वर्ग व्यवस्था।
उत्तर-
श्रेणी व्यवस्था ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी की स्थिति समाज में अपनी ही होती है। इसके अनुसार श्रेणी के प्रत्येक सदस्य को कुछ विशेष कर्त्तव्य, अधिकार तथा शक्तियां प्राप्त होती हैं। श्रेणी चेतनता ही श्रेणी की मुख्य ज़रूरत होती है। श्रेणी के बीच व्यक्ति अपने आप को कुछ सदस्यों से उच्च तथा कुछ से निम्न समझता है।

प्रश्न 2.
वर्ग की दो विशेषताएं।
अथवा सामाजिक वर्ग की विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • वर्ग चेतनता-प्रत्येक वर्ग में इस बात की चेतनता होती है कि उसका पद या आदर दूसरी श्रेणी की तुलना में अधिक है। अर्थात् व्यक्ति को उच्च, निम्न या समानता के बारे में पूरी चेतनता होती है।
  • सीमित सामाजिक सम्बन्ध-वर्ग व्यवस्था में लोग अपने ही वर्ग के सदस्यों से गहरे सम्बन्ध रखता है तथा दूसरी श्रेणी के लोगों के साथ उसके सम्बन्ध सीमित होते हैं।

प्रश्न 3.
मुक्त व्यवस्था।
उत्तर-
श्रेणी व्यवस्था के बीच व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर निम्न या उच्च स्थिति की तरफ परिवर्तन कर सकता है। वह ग़रीब से अमीर तथा अमीर से ग़रीब हो सकता है। खुलेपन से अभिप्राय व्यक्तियों को बराबर अवसर प्राप्त होने से है। वह पूरी तरह अपनी योग्यता का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 4.
धन तथा आय वर्ग व्यवस्था के निर्धारक।
उत्तर-
समाज के बीच उच्च श्रेणी की स्थिति का सदस्य बनने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है। परन्तु पैसे के साथ व्यक्ति आप ही उच्च स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु उसकी अगली पीढ़ी के लिए उच्च स्थिति निश्चित हो जाती है। आय के साथ भी व्यक्ति को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती है क्योंकि ज्यादा आमदनी से ज्यादा पैसा आता है। परन्तु इसके लिए यह देखना ज़रूरी है कि व्यक्ति की आय ईमानदारी की है या काले धन्धे द्वारा प्राप्त है।

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प्रश्न 5.
जाति तथा वर्ग में कोई चार अन्तर।
उत्तर-

  • जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती है तथा वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसकी योग्यता पर आधारित होती है।
  • जाति व्यवस्था में पेशा जन्म पर ही निश्चित होता है। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति अपनी इच्छा से कोई भी पेशा अपना सकता है।
  • जाति बन्द व्यवस्था है पर वर्ग खुली व्यवस्था है।
  • जाति में कई पाबन्दियां होती हैं परन्तु वर्ग में नहीं।

प्रश्न 6.
जाति-बन्द स्तरीकरण का आधार।
उत्तर-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसके जन्म से सम्बन्धित होती है। जिस जाति में वह पैदा होता है वह उसके घेरे में बंध जाता है। यहां तक कि वह अपनी योग्यता का सम्पूर्ण इस्तेमाल नहीं कर सकता है। उसको न तो कार्य करने की स्वतन्त्रता होती है तथा न ही वह दूसरी जातियों से सम्पर्क स्थापित कर सकता है। यदि वह जाति के नियमों को तोड़ता है तो उसको जाति से बाहर निकाल दिया जाता है। इस कारण जाति को बन्द स्तरीकरण का आधार माना जाता है।

प्रश्न 7.
मार्क्स के अनुसार स्तरीकरण का परिणाम क्या है ?
उत्तर-मार्क्स का कहना है, कि समाज में दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक होता है तथा दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता। इस मलकीयत के आधार पर ही मालिक वर्ग की स्थिति उच्च तथा गैर-मालिक वर्ग की स्थिति निम्न होती है। मालिक वर्ग को मार्क्स पूंजीपति वर्ग तथा गैर-मालिक वर्ग को मज़दूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है तथा मजदूर वर्ग अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यह ही स्तरीकरण का परिणाम है।

प्रश्न 8.
वर्गों में आपसी सम्बन्ध किस तरह के होते हैं ?
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार वर्गों में आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता तथा संघर्ष वाले होते हैं। पूंजीपति तथा मजदूर दोनों अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। मजदूर वर्ग को रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचना पड़ता है। वह पूंजीपति को अपना परिश्रम बेचते हैं तथा रोटी कमाने के लिए उस पर निर्भर करते हैं। उसकी मजदूरी के एवज में पूंजीपति उनको मज़दूरी का किराया देते हैं। पूंजीपति भी मज़दूरों पर निर्भर करता है, क्योंकि मज़दूर के कार्य किए बिना उसका न तो उत्पादन हो सकता है तथा न ही उसके पास पूंजी इकट्ठी हो सकती है। परन्तु निर्भरता के साथ संघर्ष भी चलता रहता है क्योंकि मजदूर अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए उससे संघर्ष करता रहता है।

प्रश्न 9.
मार्क्स के वर्ग के सिद्धान्त में कौन-सी बातें मुख्य हैं ?
उत्तर-

  • सबसे पहले प्रत्येक प्रकार के समाज में मुख्य तौर पर दो वर्ग होते हैं। एक वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा दूसरे के पास नहीं होते हैं।
  • मार्क्स के अनुसार समाज में स्तरीकरण उत्पादन के साधनों पर अधिकार के आधार पर होता है। जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसकी स्थिति उच्च होती है तथा जिस के पास साधन नहीं होते उसकी स्थिति निम्न होती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप उत्पादन की व्यवस्था पर निर्भर करता है।
  • मार्क्स के अनुसार मनुष्यों के समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। वर्ग संघर्ष किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक समाज में मौजूद रहा है।

प्रश्न 10.
वर्ग संघर्ष।
उत्तर-
कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो वर्गों की विवेचना की है। उसके अनुसार, प्रत्येक समाज में दो विरोधी वर्गएक शोषण करने वाला तथा दूसरा शोषित होने वाला वर्ग होते हैं। इनमें संघर्ष होता है जिसे मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है। शोषण करने वाला पूंजीपति वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा वह इन उत्पादन के साधनों के साथ अन्य वर्गों को दबाता है। दूसरा वर्ग मज़दूर वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते हैं। इसके पास रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं होता है। यह वर्ग पहले वर्ग से हमेशा शोषित होता है जिस कारण दोनों वर्गों के बीच संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष को ही मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है।

प्रश्न 11.
उत्पादन के साधन।
उत्तर-
उत्पादन के साधन वे साधन हैं जिसकी सहायता से कार्य करके पैसा कमाया जाता है तथा अच्छा जीवन व्यतीत किया जाता है। मनुष्य उत्पादन के साधनों का प्रयोग करके अपने उत्पादन कौशल के आधार पर ही भौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा यह सभी तत्व इकट्ठे मिलकर उत्पादन शक्तियों का निर्माण करते हैं। उत्पादन के तरीकों पर पूँजीपति का अधिकार होता है तथा वह इनकी सहायता से अतिरिक्त मूल्य का निर्माण करके मज़दूर वर्ग का शोषण करता है। इन उत्पादन के साधनों की सहायता से वह अधिक अमीर होता जाता है जिसका प्रयोग वह मजदूर वर्ग को दबाने के लिए करता है।

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प्रश्न 12.
सामाजिक गतिशीलता।
उत्तर-
समाज मनुष्यों के बीच सम्बन्धों से बनता है। समाज में प्रत्येक मनुष्य की अपनी एक सामाजिक स्थिति होती है तथा यह स्थिति कुछ आधारों पर निर्भर करती है। कुछ समाजों में यह जन्म तथा कुछ में यह कर्म पर आधारित होती है। समाज में कुछ परिवर्तन होते रहते हैं। जन्म के आधार पर यह परिवर्तन सम्भव नहीं है क्योंकि जाति जन्म के आधार पर निश्चित होती है जिसमें परिवर्तन सम्भव नहीं है। परन्तु पेशों, कार्य, पैसे इत्यादि के आधार पर वर्ग परिवर्तन मुमकिन है। समाज में किसी भी सदस्य द्वारा अपनी सामाजिक स्थिति के आधार पर परिवर्तन करना ही सामाजिक गतिशीलता है।

प्रश्न 13.
गतिशीलता की दो परिभाषाएं।
उत्तर-
फेयरचाइल्ड के अनुसार, “मनुष्यों द्वारा अपने समूह को परिवर्तित करना ही सामाजिक गतिशीलता है। सामाजिक गतिशीलता का अर्थ व्यक्तियों की एक समूह से दूसरे समूह की तरफ की गति है।”
बोगार्डस के अनुसार, “सामाजिक पदवी में कोई भी परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता है।”

प्रश्न 14.
शिक्षा-सामाजिक गतिशीलता का सूचक।
उत्तर-
शिक्षा को सामाजिक गतिशीलता का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है। यह कहा जाता है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करेगा उतना ही अधिक जीवन में सफल होगा। शिक्षा व्यक्ति के बजुर्गों द्वारा किए गलत कार्यों को भी ठीक कर देती है। यह माना जाता है कि शिक्षा को नौकरी का साधन नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षा प्रत्यक्ष रूप से ऊपर की तरफ की गतिशीलता की तरफ नहीं लेकर जाती। शिक्षा तो व्यक्ति के लिए उस समय मौजूद मौके अर्जित करने के लिए व्यक्ति की योग्यता को बढ़ाती है। शिक्षा वह तरीके बताती है जो किसी भी पेशे को अपनाने के लिए ज़रूरी होते हैं, परन्तु यह उन तरीकों को प्रयोग करने के मौके प्रदान नहीं करती।

प्रश्न 15.
आय-सामाजिक गतिशीलता का सूचक।
उत्तर-
व्यक्ति की आय गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। व्यक्ति की आय उसकी सामाजिक स्थिति को उच्च अथवा निम्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिसकी आय अधिक होती है उसका सामाजिक रुतबा भी उच्च होता है तथा जिसकी आय कम होती है उसका सामाजिक रुतबा भी निम्न होता है। आय बढ़ने से लोग अपनी जीवन शैली बढ़िया कर लेते हैं तथा गतिशील होकर वर्ग व्यवस्था में ऊँचे हो जाते हैं। इस तरह आय गतिशीलता का महत्त्वपूर्ण सूचक है।

V. बड़े उत्तरों वाले प्रश्न-

प्रश्न 1.
वर्ग के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तार से लिखें ।
अथवा
वर्ग क्या होता है ? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-
सामाजिक स्तरीकरण का आधार वर्ग होता है। वर्ग में व्यक्ति की स्थिति उसके वर्ग की भूमिका के अनुसार होती है। मानवीय समाज में सभी मनुष्यों की स्थिति बराबर या समान नहीं होती। किसी-न-किसी आधार पर असमानता पाई जाती रही है व इसी असमानता की भावना के कारण ही वर्ग पहचान में आए हैं। विशेषकर पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा प्रणाली, आधुनिकीकरण के कारण समाज भारत में वर्ग व्यवस्था आगे आई है। पश्चिमी देशों में भी स्तरीकरण वर्ग व्यवस्था पर आधारित होता है। भारत में भी बहुत सारे वर्ग पहचान में आए हैं जैसे अध्यापक वर्ग, व्यापार वर्ग, डॉक्टर वर्ग आदि।

वर्ग का अर्थ व परिभाषाएं (Meaning & Definitions of Class):

प्रत्येक समाज कई वर्गों में विभाजित होता है व प्रत्येक वर्ग की समाज में भिन्न-भिन्न स्थिति होती है। इस स्थिति के आधार पर ही व्यक्ति को उच्च या निम्न जाना जाता है। वर्ग की मुख्य विशेषता वर्ग चेतनता होती है। इस प्रकार समाज में जब विभिन्न व्यक्तियों को विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है तो उसको वर्ग व्यवस्था कहते हैं। प्रत्येक वर्ग आर्थिक पक्ष से एक-दूसरे से अलग होता है।

  • मैकाइवर (Maclver) ने वर्ग को सामाजिक आधार पर बताया है। उस के अनुसार, “सामाजिक वर्ग एकत्रता वह हिस्सा होता है जिसको सामाजिक स्थिति के आधार पर बचे हुए हिस्से से अलग कर दिया जाता है।”
  • मोरिस जिन्सबर्ग (Morris Ginsberg) के अनुसार, “वर्ग व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो सांझे वंशक्रम, व्यापार सम्पत्ति के द्वारा एक सा जीवन ढंग, एक से विचारों का स्टाफ, भावनाएं, व्यवहार के रूप में रखते हों व जो इनमें से कुछ या सारे आधार पर एक-दूसरे से समान रूप में अलग-अलग मात्रा में पाई जाती हो।”
  • गिलबर्ट (Gilbert) के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग व्यक्तियों की एकत्र विशेष श्रेणी है जिस की समाज में एक विशेष स्थिति होती है, यह विशेष स्थिति ही दूसरे समूहों से उनके सम्बन्ध निर्धारित करती है।”
  • कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के विचार अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग को उसके उत्पादन के साधनों व सम्पत्ति के विभाजन से स्थापित होने वाले सम्बन्धों के सन्दर्भ में भी परिभाषित किया जा सकता है।”
  • आगबन व निमकौफ (Ogburn & Nimkoff) के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग की मौलिक विशेषता दुसरे सामाजिक वर्गों की तुलना में उसकी उच्च व निम्न सामाजिक स्थिति होती है।”

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि सामाजिक वर्ग कई व्यक्तियों का वर्ग होता है, जिसको समय विशेष में एक विशेष स्थिति प्राप्त होती है। इसी कारण उनको कुछ विशेष शक्ति, अधिकार व उत्तरदायित्व भी मिलते हैं। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की योग्यता महत्त्वपूर्ण होती है। इस कारण हर व्यक्ति परिश्रम करके सामाजिक वर्ग में अपनी स्थिति को ऊँची करना चाहता है। प्रत्येक समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित होता है। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति निश्चित नहीं होती। उसकी स्थिति में गतिशीलता पाई जाती है। इस कारण इसे खुला स्तरीकरण भी कहते हैं। व्यक्ति अपनी वर्ग स्थिति स्वयं निर्धारित करता है। यह जन्म पर आधारित नहीं होता।

वर्ग की विशेषताएं (Characteristics of Class):

1. श्रेष्ठता व हीनता की भावना (Feeling of Superiority and Inferiority)—वर्ग व्यवस्था में भी ऊँच व नीच के सम्बन्ध पाए जाते हैं। उदाहरणतः उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों से अपने आप को अलग व ऊँचा महसूस करते हैं। ऊँचे वर्ग में अमीर लोग आ जाते हैं व निम्न वर्ग में ग़रीब लोग। अमीर लोगों की समाज में उच्च स्थिति होती है व ग़रीब लोग भिन्न-भिन्न निवास स्थान पर रहते हैं। उन निवास स्थानों को देखकर ही पता लग जाता है कि वह अमीर वर्ग से सम्बन्धित हैं या ग़रीब वर्ग से।

2. सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)—वर्ग व्यवस्था किसी भी व्यक्ति के लिए निश्चित नहीं होती। वह बदलती रहती है। व्यक्ति अपनी मेहनत से निम्न से उच्च स्थिति को प्राप्त कर लेता है व अपने गलत कार्यों के परिणामस्वरूप ऊंची से निम्न स्थिति पर भी पहुंच जाता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी आधार पर समाज में अपनी इज्जत बढ़ाना चाहता है। इसी कारण वर्ग व्यवस्था व्यक्ति को क्रियाशील भी रखती है। उदाहरणतः एक आम दफ़तर में लगा क्लर्क यदि परिश्रम करके I.A.S. इम्तिहान में आगे बढ़ जाता है तो उसकी स्थिति बिल्कुल ही बदल जाती है।

3. खुलापन (Openness)—वर्ग व्यवस्था में खुलापन पाया जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति को पूरी आज़ादी होती है कि वह कुछ भी कर सके। वह अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी व्यापार को अपना सकता है। किसी भी जाति का व्यक्ति किसी भी वर्ग का सदस्य अपनी योग्यता के आधार पर बन सकता है। निम्न वर्ग के लोग मेहनत करके उच्च वर्ग में आ सकते हैं। इसमें व्यक्ति के जन्म की कोई महत्ता नहीं होती। व्यक्ति की स्थिति उसकी योग्यता पर निर्भर करती है। एक अमीर मां-बाप का लड़का तब तक अमीर बना रहेगा जब तक उसके माता-पिता की सम्पत्ति समाप्त नहीं हो जाती। बाद में हो सकता है कि यदि वह मेहनत न करे तो भूखा भी मर सकता है। यह वर्ग व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान आर्थिक मौके भी प्रदान करती है। इस प्रकार इसमें खुलापन पाया जाता है।

4. सीमित सामाजिक सम्बन्ध (Limited Social Relations) वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्ध सीमित होते हैं। प्रत्येक वर्ग के लोग अपने बराबर के वर्ग के लोगों से सम्बन्ध रखना अधिक ठीक समझते हैं। प्रत्येक वर्ग अपने ही लोगों से नज़दीकी रखना चाहता है। वह दूसरे वर्ग से सम्बन्ध नहीं रखना चाहता।

5. उपवर्गों का विकास (Development of Sub-Classes)-आर्थिक दृष्टिकोण से हम वर्ग व्यवस्था को तीन भागों में बाँटते हैं

(i) उच्च वर्ग (Upper Class)
(ii) मध्य वर्ग (Middle Class)
(iii) निम्न वर्ग (Lower Class)।

परन्तु आगे हर वर्ग कई और उपवर्गों में बाँटा होता है, जैसे एक अमीर वर्ग में भी भिन्नता नज़र आती है। कुछ लोग बहुत अमीर हैं, कुछ उससे कम व कुछ सबसे कम। इसी प्रकार मध्य वर्ग व निम्न वर्ग में भी उप-वर्ग पाए जाते हैं। हर वर्ग के उप-वर्गों में भी अन्तर पाया जाता है। इस प्रकार वर्ग, उप वर्गों से मिल कर बनता है।

6. विभिन्न आधार (Different Bases)—जैसे हम शुरू में ही विभिन्न समाज वैज्ञानिकों के विचारों से यह परिणाम निकाल चुके हैं कि वर्ग के भिन्न-भिन्न आधार हैं। प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार को वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है। उसके अनुसार समाज में केवल दो वर्ग पाए गए हैं। एक तो पूंजीपति वर्ग, दूसरा श्रमिक वर्ग। हर्टन व हंट के अनुसार हमें याद रखना चाहिए कि वर्ग मूल में, विशेष जीवन ढंग है। ऑगबर्न व निमकौफ़, मैकाइवर गिलबर्ट ने वर्ग के लिए सामाजिक आधार को मुख्य माना है। जिन्ज़बर्ग, लेपियर जैसे वैज्ञानिकों ने सांस्कृतिक आधार को ही वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि वर्ग के निर्धारण करने का कोई एक आधार नहीं, बल्कि कई अलग-अलग आधार हैं। जैसे पढ़ा-लिखा वर्ग, अमीर वर्ग, डॉक्टर वर्ग आदि। इस प्रकार वर्ग कई आधारों के परिणामस्वरूप पाया गया है।

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7. वर्ग पहचान (Identification of Class)—वर्ग व्यवस्था में बाहरी दृष्टिकोण भी महत्त्वपूर्ण होता है। कई बार हम देख कर यह अनुमान लगा लेते हैं कि यह व्यक्ति उच्च वर्ग का है या निम्न का। हमारे आधुनिक समाज में कोठी, कार, स्कूटर, टी० वी०, वी० सी० आर०, फ्रिज आदि व्यक्ति के स्थिति चिन्ह को निर्धारित करते हैं। इस प्रकार बाहरी संकेतों से हमें वर्ग भिन्नता का पता चल जाता है।
प्रत्येक वर्ग के लोगों का जीवन ढंग लगभग एक सा ही होता है। मैक्स वैबर के अनुसार, “हम एक समूह को तो ही वर्ग कह सकते हैं जब उस समूह के लोगों को जीवन के कुछ ख़ास मौके न प्राप्त हों।” इस प्रकार हर वर्ग के सदस्यों की ज़रूरतें भी एक सी ही होती हैं।

8. वर्ग चेतनता (Class Consciousness)-प्रत्येक सदस्य अपनी वर्ग स्थिति के प्रति पूरी तरह चेतन होता है। इसी कारण वर्ग चेतना, वर्ग व्यवस्था की मुख्य विशेषता है। वर्ग चेतना व्यक्ति को आगे बढ़ने के मौके प्रदान करती है क्योंकि चेतना के आधार पर ही हम एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करते हैं। व्यक्ति का व्यवहार भी इसके द्वारा ही निश्चित होता है।

9. उतार-चढ़ाव का क्रम (Hierarchical Order)-प्रत्येक समाज में भिन्न-भिन्न स्थिति रखने वाले वर्ग पाए जाते हैं। स्थिति का उतार-चढ़ाव चलता रहता है व भिन्न-भिन्न वर्गों का निर्माण होता रहता है। साधारणत: यह देखने में आया है कि समाज में उच्च वर्ग के लोगों की गणना कम होती है व मध्यम व निम्न वर्गों के लोगों की गणना अधिक होती है। प्रत्येक वर्ग के लोग अपनी मेहनत व योग्यता से अपने से उच्च वर्ग में जाने की कोशिश करते रहते हैं।

10. आपसी निर्भरता (Mutual Dependence) समाज के सभी वर्गों में आपसी निर्भरता होती है व वह एकदूसरे पर निर्भर होते हैं। उच्च वर्ग को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए मध्यम वर्ग की ज़रूरत पड़ती है व इसी तरह मध्यम वर्ग को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए निम्न वर्ग की ज़रूरत पड़ती है। इसी तरह उल्टा भी होता है। इस प्रकार यह सारे वर्ग अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।

11. वर्ग एक खुली व्यवस्था है (Class is an open system)-वर्ग एक खुली व्यवस्था होती है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक वर्ग के दरवाजे खुले होते हैं। व्यक्ति अपनी मेहनत, योग्यता व कोशिशों से अपना वर्ग बदल भी सकता है व कोशिशें न करके छोटे वर्ग में भी पहुँच सकता है। उसके रास्ते में जाति कोई रुकावट नहीं डालती। उदाहरणत: निम्न जाति का व्यक्ति भी परिश्रम करके उच्च वर्ग में पहुँच सकता है।

12. वर्ग की स्थिति (Status of Class)—प्रत्येक वर्ग की स्थितियों में कुछ समानता होती है। इस समानता के कारण ही प्रत्येक वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति करने के समान मौके प्राप्त होते हैं। व्यक्ति की शिक्षा, उसके रहने का स्थान, अन्य चीजें आदि उसके वर्ग की स्थिति अनुसार होती हैं।

प्रश्न 2.
वर्ग के विभाजन के अलग-अलग आधारों का वर्णन करो।
अथवा वर्ग के सह-संबंधों की व्याख्या करें।
अथवा आय तथा व्यवसाय की वर्ग निर्धारक के रूप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
वर्ग की व्याख्या व विशेषताओं के आधार पर हम वर्ग के विभाजन के कुछ आधारों का जिक्र कर सकते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया गया है
(1) परिवार व रिश्तेदार (2) सम्पत्ति व आय, पैसा (3) व्यापार (4) रहने के स्थान की दिशा (5) शिक्षा (6) शक्ति (7) धर्म (8) प्रजाति (9) जाति (10) स्थिति चिन्ह।

1. परिवार व रिश्तेदारी (Family and Kinship) परिवार व रिश्तेदारी भी वर्ग की स्थिति निर्धारित करने के लिए जिम्मेवार होता है। बीयरस्टेड के अनुसार, “सामाजिक वर्ग की कसौटी के रूप में परिवार व रिश्तेदारी का महत्त्व सारे समाज में बराबर नहीं होता, बल्कि यह तो अनेक आधारों में एक विशेष आधार है जिसका उपयोग सम्पूर्ण व्यवस्था में एक अंग के रूप में किया जा सकता है। परिवार के द्वारा प्राप्त स्थिति पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। जैसे टाटा बिरला आदि के परिवार में पैदा हुई सन्तान पूंजीपति ही रहती है क्योंकि उनके बुजुर्गों ने इतना पैसा कमाया होता है कि कई पीढ़ियां यदि न भी मेहनत करें तो भी खा सकती हैं। इस प्रकार अमीर परिवार में पैदा हुए व्यक्ति को भी वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है। इस प्रकार परिवार व रिश्तेदारी की स्थिति के आधार पर भी व्यक्ति को वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।।

2. सम्पत्ति, आय व पैसा (Property, Income and Money)-वर्ग के आधार पर सम्पत्ति, पैसे व आय को प्रत्येक समाज में महत्त्वपूर्ण जगह प्राप्त होती है। आधुनिक समाज को इसी कारण पूंजीवादी समाज कहा गया है। पैसा एक ऐसा स्रोत है जो व्यक्ति को समाज में बहुत तेज़ी से उच्च सामाजिक स्थिति की ओर ले जाता है। मार्टिनडेल व मोनाचेसी (Martindal and Monachesi) के अनुसार, “उत्पादन के साधनों व उत्पादित पदार्थों पर व्यक्ति का काबू जितना अधिक होगा उसको उतनी ही उच्च वर्ग वाली स्थिति प्राप्त होती है।” प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक कार्ल मार्क्स ने पैसे को ही वर्ग निर्धारण के लिए मुख्य माना। अधिक पैसा होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अमीर है। उनकी आय भी अधिक होती है। इस प्रकार धन, सम्पत्ति व आय के आधार पर भी वर्ग निर्धारित होता है।

3. पेशा (Occupation)—सामाजिक वर्ग को निर्धारक पेशा भी माना जाता है। व्यक्ति समाज में किस तरह का पेशा कर रहा है, यह भी वर्ग व्यवस्था से सम्बन्धित है। क्योंकि हमारी वर्ग व्यवस्था के बीच कुछ पेशे बहुत ही महत्त्वपूर्ण पाए गए हैं व कुछ पेशे कम महत्त्वपूर्ण। इस प्रकार हम देखते हैं कि डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफैसर आदि की पारिवारिक स्थिति चाहे जैसी भी हो परन्तु पेशे के आधार पर उनकी सामाजिक स्थिति उच्च ही रहती है। लोग उनका आदर-सम्मान भी पूरा करते हैं। इस प्रकार कम पढ़े-लिखे व्यक्ति का पेशा समाज में निम्न रहता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पेशा भी वर्ग व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण निर्धारक होता है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने के लिए कोई-न-कोई काम करना पड़ता है। इस प्रकार यह काम व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार करता है। वह जिस तरह का पेशा करता है समाज में उसे उसी तरह की स्थिति प्राप्त हो जाती है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति गलत पेशे को अपनाकर पैसा इकट्ठा कर भी लेता है तो उसकी समाज में कोई इज्ज़त नहीं होती। आधुनिक समाज में शिक्षा से सम्बन्धित पेशे की अधिक महत्ता पाई जाती है।

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4. रहने के स्थान की दिशा (Location of residence)—व्यक्ति किस जगह पर रहता है, यह भी उसकी वर्ग स्थिति को निर्धारित करता है। शहरों में हम आम देखते हैं कि लोग अपनी वर्ग स्थिति को देखते हुए, रहने के स्थान का चुनाव करते हैं। जैसे हम समाज में कुछ स्थानों के लिए (Posh areas) शब्द भी प्रयोग करते हैं। वार्नर के अनुसार जो परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी शहर के काल में पुश्तैनी घर में रहते हैं उनकी स्थिति भी उच्च होती है। कहने से भाव यह है कि कुछ लोग पुराने समय से अपने बड़े-बड़े पुश्तैनी घरों में ही रह जाते हैं। इस कारण भी वर्ग व्यवस्था में उनकी स्थिति उच्च ही बनी रहती है। बड़े-बड़े शहरों में व्यक्तियों के निवास स्थान के लिए भिन्न-भिन्न कालोनियां बनी रहती हैं। मज़दूर वर्ग के लोगों के रहने के स्थान अलग होते हैं। वहां अधिक गन्दगी भी पाई जाती है। अमीर लोग बड़े घरों में व साफ़-सुथरी जगह पर रहते हैं जबकि ग़रीब लोग झोंपड़ियों या गन्दी बस्तियों में रहते हैं।

5. शिक्षा (Education)-आधुनिक समाज शिक्षा के आधार पर दो वर्गों में विभाजित होता है-

(i) शिक्षित वर्ग (Literate Class)
(ii) अनपढ़ वर्ग (Illiterate Class)।

शिक्षा की महत्ता प्रत्येक वर्ग में पाई जाती है। साधारणतः पर हम देखते हैं कि पढ़े-लिखे व्यक्ति को समाज में इज्जत की नज़र से देखा जाता है। चाहे उनके पास पैसा भी न हो। इस कारण प्रत्येक व्यक्ति वर्तमान सामाजिक स्थिति अनुसार शिक्षा की प्राप्ति को ज़रूरी समझने लगा है। शिक्षा की प्रकृति भी व्यक्ति की वर्ग स्थिति के निर्धारण के लिए जिम्मेवार होती है। औद्योगीकृत समाज में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति काफ़ी ऊँची होती है।

6. शक्ति (Power)—आजकल औद्योगीकरण के विकास के कारण व लोकतन्त्र के आने से शक्ति भी वर्ग संरचना का आधार बन गई है। अधिक शक्ति का होना या न होना व्यक्ति के वर्ग का निर्धारण करती है। शक्ति से व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति का भी निर्धारण होता है। शक्ति कुछ श्रेष्ठ लोगों के हाथ में होती है व वह श्रेष्ठ लोग नेता, अधिकारी, सैनिक अधिकारी, अमीर लोग होते हैं। हमने उदाहरण ली है आज की भारत सरकार की। नरेंद्र मोदी की स्थिति निश्चय ही सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह से ऊँची होगी क्योंकि उनके पास शक्ति है, सत्ता उनके हाथ में है, परन्तु मनमोहन सिंह के पास नहीं है। इस प्रकार आज भाजपा की स्थिति कांग्रेस से उच्च है क्योंकि केन्द्र में भाजपा पार्टी की सरकार है।

7. धर्म (Religion)-राबर्ट बियरस्टड ने धर्म को भी सामाजिक स्थिति का महत्त्वपूर्ण निर्धारक माना है। कई समाज ऐसे हैं जहां परम्परावादी रूढ़िवादी विचारों का अधिक प्रभाव पाया जाता है। उच्च धर्म के आधार पर स्थिति निर्धारित होती है। आधुनिक समय में समाज उन्नति के रास्ते पर चल रहा है जिस कारण धर्म की महत्ता उतनी नहीं जितनी पहले होती थी। प्राचीन भारतीय समाज में ब्राह्मणों की स्थिति उच्च होती थी परन्तु आजकल नहीं। पाकिस्तान में मुसलमानों की स्थिति निश्चित रूप से हिन्दुओं व ईसाइयों से बढ़िया है क्योंकि वहां राज्य का धर्म ही इस्लाम है। इस प्रकार कई बार धर्म भी वर्ग स्थिति का निर्धारण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

8. प्रजाति (Race) दुनिया से कई समाज में प्रजाति भी वर्ग निर्माण या वर्ग की स्थिति बताने में सहायक होती है। गोरे लोगों को उच्च वर्ग का व काले लोगों को निम्न वर्ग का समझा जाता है। अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों में एशिया के देशों के लोगों को बुरी निगाह से देखा जाता है। इन देशों में प्रजातीय हिंसा आम देखने को मिलती है। दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद की नीति काफ़ी चली है।

9. जाति (Caste)-भारत जैसे देश में जहां जाति प्रथा सदियों से भारतीय समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही है, जाति वर्ग निर्धारण का बहुत
महत्त्वपूर्ण आधार रही है। जाति जन्म पर आधारित होती है। जिस जाति में व्यक्ति ने जन्म लिया है वह अपनी योग्यता से भी उसे परिवर्तित नहीं सकता।

10. स्थिति चिन्ह (Status Symbol)—स्थिति चिन्ह लगभग हर एक समाज में व्यक्ति की वर्ग व्यवस्था को निर्धारित करता है। आजकल के समय, कोठी, कार, टी० वी०, टैलीफोन, फ्रिज आदि का होना व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करता है। इस प्रकार किसी व्यक्ति के पास अच्छी ज़िन्दगी को बिताने वाली कितनी सुविधाएं हैं। यह सब स्थिति चिन्हों में शामिल होती हैं, जो व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करते हैं।
इस विवरण के आधार पर हम इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि व्यक्ति के वर्ग के निर्धारण में केवल एक कारक ही जिम्मेवार नहीं होता, बल्कि कई कारक जिम्मेवार होते हैं।

प्रश्न 3.
जाति व वर्ग में अन्तर बताओ।
उत्तर-
सामाजिक स्तरीकरण के दो मुख्य आधार जाति व वर्ग हैं। जाति को एक बन्द व्यवस्था व वर्ग को एक खुली व्यवस्था कहा जाता है। पर वर्ग अधिक खुली अवस्था नहीं है क्योंकि किसी भी वर्ग को अन्दर जाने के लिए सख्त मेहनत करनी पड़ती है व उस वर्ग के सदस्य रास्ते में काफ़ी रोड़े अटकाते हैं। कई विद्वान् यह कहते हैं कि जाति व वर्ग में कोई विशेष अन्तर नहीं है परन्तु दोनों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो यह पता चलेगा कि दोनों में काफ़ी अन्तर है। इनका वर्णन इस प्रकार है-

1. जाति जन्म पर आधारित होती है पर वर्ग का आधार कर्म होता है (Caste is based on birth but class is based on action)-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती थी। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, वह सारी ही उम्र उसी से जुड़ा होता था।
वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता शिक्षा, आय, व्यापार योग्यता पर आधारित होती है। व्यक्ति जब चाहे अपनी सदस्यता बदल सकता है। एक ग़रीब वर्ग से सम्बन्धित व्यक्ति परिश्रम करके अपनी सदस्यता अमीर वर्ग से ही जोड़ सकता है। वर्ग की सदस्यता योग्यता पर आधारित होती है। यदि व्यक्ति में योग्यता नहीं है व वह कर्म नहीं करता है तो वह उच्च स्थिति से निम्न स्थिति में भी जा सकता है। यदि वह कर्म करता है तो वह निम्न स्थिति से उच्च स्थिति में भी जा सकता है। जिस प्रकार जाति धर्म पर आधारित है पर वर्ग कर्म पर आधारित होता है।

2. जाति का पेशा निश्चित होता है पर वर्ग का नहीं (Occupation of caste is determined but not of class) जाति प्रथा में पेशे की व्यवस्था भी व्यक्ति के जन्म पर ही आधारित होती थी अर्थात् विभिन्न जातियों से सम्बन्धित पेशे होते थे। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, उसको जाति से सम्बन्धित पेशा अपनाना होता था। वह सारी उम्र उस पेशे को बदल कर कोई दूसरा कार्य भी नहीं अपना सकता था। इस प्रकार न चाहते हुए भी उसको अपनी जाति के पेशे को ही अपनाना पड़ता था।

वर्ग व्यवस्था में पेशे के चुनाव का क्षेत्र बहुत विशाल है। व्यक्ति की अपनी इच्छा होती है कि वह किसी भी पेशे को अपना ले। विशेष रूप से व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता था कि वह किसी भी पेशे को अपना लेता है। विशेष रूप से पर व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता है वह उसी पेशे को अपनाता है क्योंकि उसका विशेष उद्देश्य लाभ प्राप्ति की ओर होता था व कई बार यदि वह एक पेशे को करते हुए तंग आ जाता है तो वह दूसरे किसी और पेशे को भी अपना सकता है। इस प्रकार पेशे को अपनाना व्यक्ति की योग्यता पर आधारित होता है।

3. जाति की सदस्यता प्रदत्त होती है पर वर्ग की सदस्यता अर्जित होती है (Membership of caste is ascribed but membership of class is achieved)-सम्बन्धित होती थी भाव कि स्थिति वह खुद प्राप्त नहीं करता था बल्कि जन्म से ही सम्बन्धित होती थी। इसी कारण व्यक्ति की स्थिति के लिए ‘प्रदत्त’ (ascribed) शब्द का उपयोग किया जाता था। इसी कारण जाति व्यवस्था में स्थिरता बनी रहती थी। व्यक्ति का पद वह ही होता था जो उसके परिवार का हो। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति ‘अर्जित’ (achieved) होती है अर्थात् उसको समाज में अपनी स्थिति प्राप्त करनी पड़ती है। इस कारण व्यक्ति शुरू से ही परिश्रम करनी शुरू कर देता है। व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर निम्न स्थिति से उच्च स्थिति भी प्राप्त कर लेता है। इसमें व्यक्ति के जन्म का कोई महत्त्व नहीं होता। बल्कि परिश्रम व योग्यता उसके वर्ग व स्थिति के बदलने में महत्त्वपूर्ण होती है।

4. जाति बन्द व्यवस्था है व वर्ग खुली व्यवस्था है (Caste is a closed system but class is an open system)-जाति प्रथा स्तरीकरण का बन्द समूह होता है क्योंकि व्यक्ति को सारी उम्र सीमाओं में बन्ध कर रहना पड़ता है। न तो वह जाति बदल सकता है न ही पेशा। श्रेणी व्यवस्था स्तरीकरण का खुला समूह होता है। इस प्रकार व्यक्ति को हर किस्म की आज़ादी होती है। वह किसी भी क्षेत्र में मेहनत करके आगे बढ़ सकता है। उसको समाज में अपनी निम्न स्थिति से ऊपर की स्थिति की ओर बढ़ने के पूरे मौके भी प्राप्त होते हैं। वर्ग का दरवाज़ा प्रत्येक के लिए खुला होता है। व्यक्ति अपनी योग्यता, सम्पत्ति, परिश्रम के अनुसार किसी भी वर्ग का सदस्य बन सकता है व वह अपनी सारी उम्र में कई वर्गों का सदस्य बनता है।

5. जाति व्यवस्था में कई पाबन्दियां होती हैं परन्तु वर्ग में कोई नहीं होती (There are many restrictions in caste system but not in any class)-जाति प्रथा द्वारा अपने सदस्यों पर कई पाबन्दियां लगाई जाती थीं। खान-पान सम्बन्धी, विवाह, सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने आदि सम्बन्धी बहुत पाबन्दियां थीं। व्यक्ति की ज़िन्दगी पर जाति का पूरा नियन्त्रण होता था। वह उन पाबन्दियां को तोड़ भी नहीं सकता था। ___ वर्ग व्यवस्था में व्यक्तिगत आज़ादी होती थी। भोजन, विवाह आदि सम्बन्धी किसी प्रकार का कोई नियन्त्रण नहीं होता था। किसी भी वर्ग का व्यक्ति दूसरे वर्ग के व्यक्ति से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित कर सकता था।

6. जाति में चेतनता नहीं होती पर वर्ग में चेतनता होती है (There is no caste consciousness but there is class consciousness) —जाति व्यवस्था में जाति चेतनता नहीं पाई जाती थी। इसका एक कारण तो था कि चाहे निम्न जाति के व्यक्ति को पता था कि उच्च जातियों की स्थिति उच्च है, परन्तु फिर भी वह इस सम्बन्धी कुछ नहीं कर सकता था। इसी कारण वह मेहनत करनी भी बन्द कर देता था। उसको अपनी योग्यता अनुसार समाज में कुछ भी प्राप्त नहीं होता था।

वर्ग के सदस्यों में वर्ग चेतनता पाई जाती थी। इसी चेतनता के आधार पर तो वर्ग का निर्माण होता था। व्यक्ति इस सम्बन्धी पूरा चेतन होता था कि वह कितनी मेहनत करे ताकि उच्च वर्ग स्थिति को प्राप्त कर सके। इसी प्रकार वह हमेशा अपनी योग्यता को बढ़ाने की ओर ही लगा रहता था।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जाति व्यवस्था का केवल एक ही आधार होता है, वह था सांस्कृतिक। परन्तु वर्ग व्यवस्था के कई आधार पाए जाते हैं। हर आधार अनुसार वर्ग विभाजन अलग होता है। आर्थिक कारणों का वर्ग व्यवस्था पर अधिक प्रभाव होता था। व्यक्ति की आर्थिकता में परिवर्तन आने से उसकी सदस्यता बदल जाती है। परन्तु जाति व्यवस्था में आर्थिकता का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक बन्द व्यवस्था थी। भाव कि एक वर्ग व दूसरे वर्ग में जाति प्रथा वाली ही भिन्नता है, लेकिन जाति को व्यक्ति बदल नहीं सकता था जबकि वर्ग व्यवस्था को बदल सकता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक वर्ग के अलग-अलग संकेतकों का वर्णन करें।
उत्तर-
एक सूचक वह वस्तु है, जो किसी लक्षण के अतिरिक्त उस बारे में बताता है, कि वह उसके बारे में पूरी तरह बताता है। सामाजिक गतिशीलता के कई सूचक हैं जिनमें से शिक्षा, व्यवसाय एवं आय प्रमुख हैं। इनका वर्णन निम्न प्रकार का है

1. शिक्षा (Education) शिक्षा को सामाजिक वर्ग का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। यह कहा जाता है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करेगा, वह उतना ही ज़िन्दगी में सफल होगा। शिक्षा व्यक्ति के बुजुर्गों द्वारा किये गये गलत कार्यों को भी ठीक कर देती है। यह माना जाता है कि शिक्षा को केवल नौकरी का साधन मात्र नहीं समझा जाना चाहिए क्योंकि शिक्षा सीधे तौर पर ऊपर की तरफ गतिशीलता को लेकर जाती है। शिक्षा तो व्यक्ति के लिए उस समय उपस्थित अवसर प्राप्त करने के लिए व्यक्ति की योग्यता को बढ़ाती है। शिक्षा वह रास्ता बताती है, जो किसी भी व्यवसाय को अपनाने के लिए आवश्यक होते हैं, परन्तु यह उन रास्तों को प्रयोग करने के अवसर प्रदान नहीं करती है। शिक्षा गतिशीलता के साधन के रूप में कई कार्य करती है जैसे कि

  • शिक्षा व्यक्ति को मज़दूर से मैनेजर तक का रास्ता दिखाती है। कोई भी मज़दूर शिक्षा प्राप्त करने के बाद मैनेजर की पदवी तक पहुंच सकता है।
  • शिक्षा किसी को भी व्यवसाय प्राप्त करने के बारे में बताती है। व्यक्ति को अच्छी आय वाला रोजगार प्रदान करती है।
  • शिक्षा व्यक्ति की अधिक आय और नौकरी वाली पदवियां अर्जित करने में सहायता करती है। साधारणतः सरकारी नौकरी अच्छी शिक्षा द्वारा प्राप्त की जाती है। इसलिए अधिक तनख्वाह (Salary) के लिए अच्छी शिक्षा ग्रहण करना आवश्यक है।

यह माना जाता है कि व्यक्ति जितना अधिक समय पढ़ाई में लगाता है, उसकी अधिक आय एवं सामाजिक गतिशीलता में ऊपर की तरफ बढ़ने के अधिक अवसर आते हैं। शिक्षा व्यक्ति को कई प्रकार के व्यवसाय प्राप्त करने के अवसर प्रदान करती है। कई प्रकार के अध्ययनों से यह पता चला है कि शिक्षा न केवल व्यक्ति को ऊंची पदवी प्राप्त करने का अवसर देती है, बल्कि इसके साथ व्यक्ति समाज के बीच रहने एवं व्यवहार करने के तरीकों के बारे में बतलाती है। ऐसा सीखने से व्यक्ति के लिए सफलता प्राप्ति के अवसर बढ़ जाते हैं। इस तरह शिक्षा व्यक्ति के लिए सामाजिक गतिशीलता में ऊपर बढ़ने के अवसर प्रदान करती है।

शिक्षा एक विद्यार्थी के जीवन में अवसर प्राप्त करने के अवसरों में वृद्धि प्रदान करती है। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् व्यक्ति में धन प्राप्ति हेतु समर्था में वृद्धि होती है। जो बच्चे पढ़ाई की तरफ ध्यान नहीं देते हैं, उनका जीवन काफ़ी कठिनाइयों वाला व संघर्षपूर्ण हो जाता है। परन्तु जो बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं और अपना अधिक समय पढ़ाई में व्यतीत करते हैं वे बड़े होकर अधिक धन की प्राप्ति करते हैं।

बच्चों की पृष्ठभूमि (Background History) भी उनकी वर्तमान प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन बच्चों के माता-पिता अधिक पढ़े-लिखे होते हैं और ऊंची पदवी पर कार्य कर रहे होते हैं उनको घर में ही शिक्षा का अच्छा वातावरण प्राप्त होता है, उन बच्चों के माता-पिता उन बच्चों के लिए आदर्श बन जाते हैं। माता-पिता बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने की महत्ता के बारे में बतला कर उनको शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रेरित करते हैं। इस तरह पढ़ाई के पश्चात् उनमें सामाजिक पदवी प्राप्त करने की लालसा बढ़ जाती है और वे ऊंची पदवी प्राप्त करके समाज में ऊंचा उठ जाते हैं। इस प्रकार शिक्षा गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है।

यहां एक बात साफ कर देनी ज़रूरी है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करता है, उसको जीवन में उन्नति करने के उतने ही मौके बढ़ जाते हैं। जितना अधिक समय तथा पैसा व्यक्ति शिक्षा में निवेश करता है, उतने ही उसको अच्छी नौकरी अथवा व्यापार करने के अधिक मौके प्राप्त होंगे। उदाहरणत: यदि किसी विद्यार्थी ने बी० कॉम (B.Com.) की डिग्री प्राप्त करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी है तो उसको अच्छी नौकरी मिलने के बहुत ही कम मौके प्राप्त होंगे। परन्तु उसने B.Com. के बाद किसी I.I.M. से M.B.A. कर ली है तो उसको बहुत ही अच्छी नौकरी तथा बहुत ही अच्छा वेतन प्राप्त हो सकता है। इस तरह जितना अधिक समय तथा पैसा शिक्षा पर खर्च किया जाएगा, उतने अधिक मौके बढ़िया नौकरी के लिए प्राप्त होंगे।

अन्त में हम कह सकते हैं कि चाहे शिक्षा गतिशीलता का एक सीधा रास्ता नहीं है परन्तु यह व्यक्ति को उसके पेशे को बदलने तथा उससे लाभ उठाने में बहुत ज्यादा मदद करती है। शिक्षा व्यक्ति को गतिशील होने के लिए प्रेरित करती है तथा जीवन में ऊपर उठने के मौके प्रदान करती है।

2. व्यवसाय (Occupation)-गतिशीलता के कारण ही समाज को पता चलता है कि किस पद पर किस व्यक्ति को बिठाया जाए। इस प्रकार समाज प्रत्येक पद पर योग्य व्यक्ति को ही बिठाता है। इस तरह यह व्यक्ति को उसके लक्ष्य प्राप्ति हेतु सहायता करती है। व्यवसाय के आधार पर समाज को हम दो तरह के समाजों में बांट सकते हैं। (1) बन्द समाज एवं खुला समाज। इन समाजों की गतिशीलता में व्यवसाय का महत्त्व इस प्रकार है

(i) बन्द समाज (Closed Society)-भारत पुराने समाज में बन्द समाजों की उदाहरण है। पुराने समाज में चार प्रकार की जातियां थीं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं निम्न जातियां। प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था।
ब्राह्मणों का कार्य पढ़ाना था, जिस कारण उसकी सामाजिक स्थिति सबसे ऊंची थी। उसके पश्चात् क्षत्रिय आते थे, जिनका कार्य देश की रक्षा करना था और राज्य चलाना था। तीसरे स्थान पर वैश्य थे जिनका कार्य व्यापार एवं कृषि करना था। सबसे निम्न स्थान निम्न जातियों का था, जिनका कार्य उपरोक्त तीनों जातियों की सेवा करना था।

प्रत्येक व्यक्ति का व्यवसाय उसकी जाति एवं जन्म से सम्बन्धित होता था। प्रत्येक जाति के लोग अपने-अपने विशेष कार्य करते थे। जाति अपने सदस्यों को अन्य व्यवसायों को अपनाने के लिए रोकती थी। क्योंकि इसके साथ जाति के आर्थिक एवं धार्मिक बन्धन टूटते थे। यदि कोई जाति के बन्धनों को तोड़ता भी था तो उसे जाति में ही से बाहर निकाल दिया जाता था। इस प्रकार जाति एवं उपजाति अपने-अपने भिन्न-भिन्न कार्यों को करती थी।

हमारे देश में स्वतन्त्रता के पश्चात् आधुनिकीकरण एवं औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। जिस कारण लोगों को अपने व्यवसायों को बदलने के अवसर प्राप्त हुए। लोगों के व्यवसाय से सम्बन्धित बन्धन समाप्त हो गये। उन्होंने अन्य व्यवसाय अपना लिये। इस प्रकार बन्द समाजों में गतिशीलता व्यवसायों के कारण आरम्भ हुई और वह अब भी चल रही है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि बन्द समाजों में पेशा व्यक्ति को अपनी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होता था बल्कि उसको जन्म के आधार पर प्राप्त होता था। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था उसको उस जाति से सम्बन्धित पेशा अपनाना ही पड़ता था। चाहे कुछ पेशे जैसे कि सेना में नौकरी करना, कृषि करना, व्यापार इत्यादि में कुछ प्रतिबन्ध कम थे, परन्तु फिर भी व्यक्तियों के ऊपर पेशा अपनाने की बन्दिशें थीं। यदि कोई पेशे से सम्बन्धित जाति के नियमों के विरुद्ध जाता था तो उसको जाति में से निकाल दिया जाता था। इस तरह बन्द समाजों में पेशा व्यक्ति की योग्यता पर नहीं बल्कि जन्म के आधार पर प्राप्त होता था। परन्तु हमारे देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् बहुत से कारणों के कारण गतिशीलता की प्रक्रिया शुरू हुई जैसे कि आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण, शहरीकरण इत्यादि तथा धीरे-धीरे पेशे से सम्बन्धित गतिशीलता शुरू हो गई है। अब तो भारत जैसे बन्द समाजों में भी पेशे पर आधारित गतिशीलता शुरू हो गई है। लोग अब अपनी मर्जी तथा योग्यता के अनुसार पेशा अपनाने लग गए हैं। पेशे से सम्बन्धित पाबन्दियां बहुत ही कम हो गई हैं।

(ii) खुला समाज (Open Society)-खुले समाज के भीतर समूह कट्टर नहीं होते हैं। व्यक्ति को अपना कोई भी व्यवसाय अपनाने की स्वतन्त्रता होती है। वह कोई भी व्यवसाय स्वः इच्छा से अपना सकता है। ऐसे समाजों में ऊंची पदवी वाले व्यवसायों में श्रम की मांग में वृद्धि होने के कारण गतिशीलता भी बढ़ जाती है। परन्तु ऊंची पदवी केवल योग्य व्यक्तियों को ही प्राप्त होती है। यद्यपि अब मशीनों के बढ़ने के कारण मजदूरों की मांग कम हो गई है। परन्तु तकनीकी शिक्षा प्राप्त व योग्य कर्मियों (कर्मचारियों) की मांग अब तक भी है। इस प्रकार तकनीकी शिक्षा प्राप्त योग्य व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर अब बढ़ रहे हैं। लोग अलग-अलग कार्यों को अपना रहे हैं जिस कारण समाजों में गतिशीलता भी बढ़ रही है। इस तरह खुले समाजों में आधुनिकीकरण एवं औद्योगिकीकरण के कारण गतिशीलता भी बढ़ रही है।

खुले समाजों में व्यक्ति की जाति अथवा जन्म नहीं बल्कि उसकी योग्यता की महत्ता होती है। व्यक्ति में जिस प्रकार की योग्यता होती है वह उस प्रकार का पेशा अपनाता है। खुले समाजों में व्यक्ति की जाति का महत्त्व नहीं है कि उसने किस जाति में जन्म लिया है बल्कि महत्त्व इस बात का है कि उसमें किस कार्य को करने की योग्यता है। नाई का पुत्र बड़ा अफ़सर बन सकता है तथा अफसर का पुत्र कोई व्यापार कर सकता है। व्यक्ति अपनी मर्जी का पेशा अपना सकता है, उसके ऊपर किसी प्रकार का कोई बन्धन नहीं होता है कि वह किस प्रकार का पेशा अपनाए। वह अलग-अलग प्रकार की तकनीकी शिक्षा प्राप्त करके अलग-अलग प्रकार के पेशे अपना सकता है। कोई छोटा सा कोर्स करते ही व्यक्ति के लिए नौकरी प्राप्त करने के मौके बढ़ जाते हैं। लोग अलग-अलग पेशे अपना रहे हैं। कंपनियां अधिक वेतन तथा अच्छी स्थिति का प्रलोभन देती हैं जिस कारण लोग पुरानी नौकरी छोड़कर अधिक वेतन वाली नौकरी कर लेते हैं जिस कारण समाज में गतिशीलता बढ़ रही है। आधुनिकीकरण तथा औद्योगीकरण ने तो गतिशीलता को बहुत ही अधिक बढ़ा दिया है। इस तरह खुले समाजों में पेशे के आधार पर गतिशीलता बहुत अधिक बढ़ रही है।

3. आय (Income)—व्यक्ति की आय गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। व्यक्ति की आय उसकी सामाजिक स्थिति को ऊंचा व निम्न रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अपनाती है। जिसकी आय अधिक होती है उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक होती है। परन्तु जिसकी आय कम होती है उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी कम होती है।

आजकल का समाज वर्ग प्रणाली पर आधारित है। इस प्रणाली में धन एवं आय की महत्ता अधिक है। व्यक्ति अपनी योग्यता के कारण सामाजिक स्तरीकरण में ऊंचा स्थान प्राप्त करता है। व्यक्ति अपने आपके साथ, अपनी आर्थिक स्थिति अन्य लोगों के मुकाबले सुधार लेता है और अपनी जीवन शैली भी बदल लेता है। खुले समाजों में अधिक आय वाले को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सामाजिक वर्ग के निर्धारण हेतु आय एक महत्त्वपूर्ण कारक है। आमदनी (आय) के कारण ही व्यक्ति अपनी जीवन शैली बढ़िया कर लेता है। अमीर व्यक्तियों के पास पैसा तो काफ़ी अधिक होता है। परन्तु उनके जीवन शैली भिन्न-भिन्न प्रकार की हो सकती है। नये बने अमीरों को अमीरों की जीवन शैली सीखने में काफ़ी समय लग जाता है। चाहे वह व्यक्ति स्वयं अमीरों की जीवन शैली न सीख सके। परन्तु उसके बच्चे अवश्य अमीरों की शैली सीख जाते हैं। इस प्रकार अमीर व्यक्ति के बच्चों का सामाजिक जीवन स्तर काफ़ी ऊंचा उठ जाता है। धन के कारण उसके बच्चे अमीरों की जीवन शैली अपना लेते हैं और उनके बच्चों को यह शैली विरासत में मिल जाती है।

इस प्रकार आमदनी के तरीकों से ही सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। एक व्यापारी की कमाई को इज्जत प्राप्त होती है। परन्तु एक वेश्या या स्मगलर के द्वारा कमाये धन को इज्ज़त की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। आय में वृद्धि के साथ व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा, वर्ग, रहने-सहने का तरीका बदल लेता है जिस कारण सामाजिक गतिशीलता भी बढ़ती है।

व्यक्ति की आय बढ़ने से उसकी स्थिति में अपने आप ही परिवर्तन आ जाता है। लोग उसको इज्जत की नज़रों से देखना शुरू कर देते हैं। लोगों की नज़रों में अब वह एक अमीर आदमी बन जाता है तथा उसको समाज में प्रतिष्ठा हासिल हो जाती है। परन्तु एक बात ध्यान रखने वाली है कि आमदनी प्राप्त करने के ढंग समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होने चाहिए, गैर-मान्यता प्राप्त नहीं। पैसा आने से तथा आय बढ़ने से व्यक्ति अपने आराम की चीजें खरीदना शुरू कर देता है-जिससे उसके रुतबे तथा सामाजिक स्थिति में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हो जाती है। वह अपना जीवन ऐश से जीना शुरू कर देता है। इस तरह आय बढ़ने से उसकी समाज में स्थिति निम्न से उच्च हो जाती है तथा यह ही गतिशीलता का सूचक है।
इस तरह इस व्याख्या से स्पष्ट है कि शिक्षा, पेशा तथा आय सामाजिक गतिशीलता के प्रमुख सूचक हैं।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

वर्ग असमानताएं PSEB 12th Class Sociology Notes

  • हमें हमारे समाज में कई सामाजिक समूह मिल जाएंगे जो अन्य समूहों से अधिक अमीर, इज्ज़तदार तथा शक्तिशाली होते हैं। यह अलग-अलग समूह समाज के स्तरीकरण का निर्माण करते हैं।
  • प्रत्येक समाज में बहुत से वर्ग होते हैं जो अलग-अलग आधारों के अनुसार निर्मित होते हैं तथा यह एक-दूसरे से किसी न किसी आधार पर अलग होते हैं।
  • कार्ल मार्क्स ने चाहे वर्ग की परिभाषा कहीं पर भी नहीं दी है परन्तु उसके अनुसार समाज में दो प्रकार के वर्ग होते हैं। पहला जिसके पास सब कुछ होता है (Haves) तथा दूसरा वह जिसके पास कुछ भी नहीं होता (Have nots)
  • वर्ग की कई विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह प्रत्येक स्थान पर पाए जाते हैं, इसमें स्थिति अर्जित की जाती है, यह खुला समूह होता है, आर्थिकता इसका प्रमुख आधार होता है, यह स्थायी होते हैं इत्यादि।
  • कार्ल मार्क्स का कहना था कि वर्गों में चेतनता होती है जिस कारण समाज के अलग-अलग वर्गों में वर्ग संघर्ष चलता रहता है।
  • मार्क्स के अनुसार अलग-अलग समय में अलग-अलग समाजों में दो प्रकार के समूह पाए जाते हैं। प्रथम वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं जिसे पूँजीपति कहते हैं। दूसरा वर्ग वह है जिसके पास अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता। उसे मज़दूर वर्ग कहते हैं।
  • मैक्स वैबर के अनुसार पैसा, शक्ति तथा प्रतिष्ठा असमानता के आधार हैं। वर्ग कई चीज़ों से जुड़ा होता है जैसे कि आर्थिकता, समाज में स्थिति तथा राजनीति में सत्ता। वैबर के अनुसार एक वर्ग के व्यक्तियों का जीवन जीने का ढंग एक जैसा ही होता है।
  • वार्नर ने अमेरिका में वर्ग व्यवस्था का अध्ययन किया तथा कहा कि तीन प्रकार के वर्ग होते हैं-उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग। यह तीनों वर्ग आगे जाकर उच्च, मध्य तथा निम्न में विभाजित होते हैं। वार्नर ने वर्ग संरचना की आय तथा धन के आधार पर व्याख्या की है।
  • अगर आजकल के समय में देखें तो वर्ग कई आधारों पर बनते हैं परन्तु शिक्षा, पेशा तथा आय इसके प्रमुख आधार हैं।
  • वर्ग तथा जाति एक-दूसरे से काफ़ी अलग होते हैं जैसे कि वर्ग एक खुली व्यवस्था है परन्तु जाति एक बंद वर्ग है, वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है परन्तु जाति में यह प्रदत्त होती है, वर्ग में गतिशीलता होती है परन्तु जाति में नहीं इत्यादि।
  •  वर्ग संघर्ष (Class Struggle)- यह एक प्रकार का तनाव है जो सामाजिक आर्थिक हितों तथा अलग-अलग समूहों के लोगों के हितों के कारण समाज में मौजूद होता है।
  • बुर्जुआ (Bourgeoisie)-यह एक प्रकार का सामाजिक वर्ग है जो उत्पादन के साधनों का मालिक होता है तथा जो अपने साधनों की सहायता से समाज के अन्य समूहों का आर्थिक शोषण करता है।
  • संभ्रांत वर्ग (Elite) यह उच्च विशिष्ट लोग होते हैं जो अपने समूह तथा समाज में नेता की भूमिका तथा रास्ता दिखाने की भूमिका निभाते हैं। उनकी भूमिका या नेतृत्व सामाजिक परिवर्तन को उत्पन्न करता है।
  • सर्वहारा (Proletariat)—पूँजीवादी समाज में इस शब्द को उस वर्ग के लिए प्रयोग किया जाता है जो श्रमिकों व औद्योगिक मजदूरों के लिए प्रयोग किया जाता है। इनके पास अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता।
  • सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)—इस शब्द को व्यक्तियों अथवा समूहों को अलग-अलग सामाजिक आर्थिक पदों पर जाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • दासत्व (Slavery)—यह सामाजिक स्तरीकरण का एक रूप है जिसमें कुछ व्यक्तियों के ऊपर अन्य व्यक्ति अपनी जायदाद की तरह स्वामित्व रखते हैं।
  • छोटे दुकानदार (Petty Bourgeoisie)—यह एक फ्रैंच शब्द है जो एक सामाजिक वर्ग के लिए प्रयोग किया
    जाता है जिसमें छोटे-छोटे पूँजीपतियों जैसे कि दुकानदार तथा वर्कर आ जाते हैं जो उत्पादन, विभाजन तथा वस्तुओं के विनिमय तथा बुर्जुआ मालिकों द्वारा स्वीकृत किए जाते हैं।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 13 दल खालसा का उत्थान और इसकी युद्ध प्रणाली

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 13 दल खालसा का उत्थान और इसकी युद्ध प्रणाली Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 13 दल खालसा का उत्थान और इसकी युद्ध प्रणाली

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

दल खालसा के उत्थान के कारण तथा महत्त्व (Causes and Importance of the Rise of the Dal Khalsa)

प्रश्न 1.
किन परिस्थितियों में दल खालसा का उत्थान हुआ ? इसके संगठन, महत्त्व और युद्ध प्रणाली का परीक्षण कीजिए।
(Describe the circumstances leading to the rise of Dal Khalsa. Examine its organisation, importance and mode of fighting.)
अथवा
दल खालसा के उत्थान के कारण, संगठन, महत्त्व और युद्ध प्रणाली के बारे में बताएँ।
(Discuss about the reasons of the creation, organisation, importance and mode of fighting of Dal Khalsa.)
अथवा
दल खालसा की उत्पत्ति, मुख्य विशेषताएँ और महत्त्व का वर्णन करें।
(Discuss the origin, important, features and importance of the Dal Khalsa.)
अथवा
किन स्थितियों के कारण दल खालसा की स्थापना हुई ? इसका पंजाब के इतिहास में क्या महत्त्व है ?
(Discuss the circumstances leading to the establishment of Dal Khalsa. What is its significance in the History of Punjab ?)
अथवा
दल खालसा की स्थापना के क्या कारण थे ?
(What were the causes reponsible for the rise of Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा की उत्पत्ति, मुख्य विशेषताएँ तथा महत्त्व के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the organisation, main features and significance of the Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा के उत्थान की परिस्थितियों का वर्णन करें। इसके संगठन, युद्ध प्रणाली तथा महत्त्व की संक्षिप्त जानकारी दें।
(Describe the circumstances leading to the establishment of the Dal Khalsa. Give a brief account of its organisation, mode of fighting and importance.)
अथवा
दल खालसा की स्थापना के कारणों का अध्ययन करें। (Study the causes of the establishment of Dal Khalsa.)
अथवा
दल खालसा की स्थापना के क्या कारण थे ? इसका पंजाब के इतिहास में क्या महत्त्व है ?
(What were the reasons of the creation of Dal Khalsa ? What is its importance in the History of Punjab ?)
अथवा
दल खालसा के संगठन का वर्णन कीजिए और इसके महत्त्व का परीक्षण कीजिए।
(Give an account of the organisation of Dal Khalsa and examine its significance.)
अथवा
दल खालसा का पंजाब के इतिहास में क्या महत्त्व है ? (What is the significance of Dal Khalsa in the History of Punjab ?)
अथवा
दल खालसा की सैनिक प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (Describe the main features of the military system of Dal Khalsa.)
अथवा
दल खालसा की सैनिक प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ? (What were the main features of the military system of the Dal Khalsa ?)
उत्तर-
1748 ई० में दल खालसा की स्थापना सिख इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इसकी स्थापना ने सिख कौम में नवप्राण फूंके। इसने सिखों को पंजाब के मुग़ल और अफ़गान सूबेदारों के जुल्मों से टक्कर लेने के योग्य बनाया। दल खालसा के यत्नों के कारण ही सिख अंत में पंजाब में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफल हुए। निस्संदेह दल खालसा की स्थापना तो सिख इतिहास का एक मील पत्थर था।

I. दल खालसा की स्थापना के कारण (Causes of the Establishment of the Dal Khalsa)
1. सिखों पर अत्याचार (Persecution of the Sikhs)-1716 ई० में बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद पंजाब के मुग़ल सूबेदारों अब्दुस समद खाँ और जकरिया खाँ ने सिखों पर कठोर अत्याचार करने शुरू कर दिए। सिखों के सिरों पर इनाम घोषित किए गए। सिखों को गिरफ्तार कर लाहौर में शहीद किया जाने लगा। मजबूर हो कर सिखों को वनों और पहाड़ों में जा कर शरण लेनी पड़ी। यहाँ उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मुग़ल सेनाएँ उनका पीछा करती रहती थीं। ऐसी स्थिति में उनको अपने-आप को जत्थों में संगठित करने की आवश्यकता अनुभव हुई। उन्होंने अपने छोटे-छोटे जत्थे बना लिए जो बाद में दल खालसा की स्थापना में सहायक सिद्ध हुए।

2. बुड्डा दल और तरुणा दल का गठन (Foundation of Buddha Dal and Taruna Dal)-1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सारे छोटे-छोटे दलों को मिला कर दो मुख्य दलों में संगठित कर दिया। इनके नाम बुड्ढा दल तथा तरुणा दल थे। बुड्डा दल में 40 वर्ष की आयु से ऊपर के सिखों को शामिल किया गया था। इस दल का कार्य सिखों के पवित्र धार्मिक स्थानों की देख-भाल करना और सिख धर्म का प्रचार करना था। तरुणा दल में 40 साल से कम आयु के सिखों को शामिल किया गया था। इस दल का मुख्य कार्य दुश्मनों का मुकाबला करना था। तरुणा दल को आगे पाँच जत्थों में बाँटा गया था। प्रत्येक जत्थे को एक अलग जत्थेदार के अधीन रखा गया था। इन दलों की स्थापना ने सिखों का संगठन मज़बूत किया।

3. दलों का पुनर्गठन (Reorganisation of the Dals) जकरिया खाँ की मृत्यु के बाद पंजाब में अराजकता का दौर आरंभ हुआ। इस स्थिति का लाभ उठा कर सिखों ने 1745 ई० को दीवाली के अवसर पर अमृतसर में यह गुरमता पास किया कि सौ-सौ सिखों के 25 जत्थे बनाए जाएँ। इन जत्थों ने सरकार का सामना करने के लिए गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई। इन जत्थों ने बटाला, जालंधर, बजवाड़ा और फगवाड़ा आदि स्थानों पर भारी लूटमार की। धीरे-धीरे इन जत्थों की गिनती 25 से बढ़ कर 65 हो गई।

II. दल खालसा की स्थापना (Establishment of the Dal Khalsa)
29 मार्च, 1748 ई० को बैसाखी के दिन सिख अमृतसर में इकट्ठे हुए। इस अवसर पर नवाब कपूर सिंह ने यह सुझाव दिया कि पंथ को एकता और मज़बूती की ज़रूरत है। इस उद्देश्य को सामने रखते हुए उस दिन दल खालसा की स्थापना की गई। 65 सिख जत्थों को 12 मुख्य जत्थों में संगठित कर दिया गया। प्रत्येक जत्थे का अपना अलग नेता और झंडा था। सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया को दल खालसा का प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। दल खालसा में शामिल होने वाले सिखों से यह आशा की जाती थी कि वह घुड़सवारी और शस्त्र चलाने में निपुण हो। दल खालसा का प्रत्येक सदस्य किसी भी जत्थे में शामिल होने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र था। युद्ध के समय 12 जत्थों के सरदारों में से एक को दल खालसा का प्रधान चुन लिया जाता था। ‘सरबत खालसा’ की बैठक हर वर्ष वैसाखी और दीवाली के अवसर पर अमृतसर में बुलाई जाती थी। इस बैठक में महत्त्वपूर्ण मामलों संबंधी गुरमते पास किए जाते थे। इन गुरमतों का सारे सिख पालन करते थे।

III. दल खालसा की सैनिक-प्रणाली की विशेषताएँ
(Features of the Military System of the Dal Khalsa) दल खालसा की महत्त्वपूर्ण सैनिक विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—
1. घुड़सवार सेना (Cavalry)-घुड़सवार सेना दल खालसा की सेना का महत्त्वपूर्ण अंग थी। वास्तव में इस काल में होने वाली लड़ाइयाँ ही ऐसी थीं जिनमें घुड़सवार सेना के बिना जीत प्राप्त करना असंभव था। सिखों के घोड़े बहुत कुशल थे। वे एक दिन में पचास से सौ मील तक का सफर तय करने की समर्था रखते थे।।

2. पैदल सेना (Infantry)-दल खालसा में पैदल सेना का काम केवल पहरा देना था। सिख इस सेना में भर्ती होने को अपना अपमान समझते थे।

3. शस्त्र (Arms)-लड़ाई के समय सिख तलवारों, बरछियों, खंडों, नेजों, तीर कमानों और बंदूकों का प्रयोग करते थे। बारूद की कमी के कारण बंदूकों का कम ही प्रयोग किया जाता था।

4. सेना में भर्ती और अनुशासन (Recruitment and Discipline)-दल खालसा में भर्ती होने के लिए कोई निश्चित नियम नहीं था। कोई भी सिख किसी भी जत्थे में शामिल हो सकता था। वह अपनी इच्छा के अनुसार जब चाहे जत्थे को छोड़कर दूसरे जत्थे में जा सकता था। सैनिकों के नामों, वेतन का भी कोई लिखित विवरण नहीं रखा जाता था। सैनिकों के प्रशिक्षण इत्यादि की भी कोई व्यवस्था नहीं थी। दल खालसा के सैनिक सदैव धार्मिक जोश के साथ लड़ते थे। वे अपने नेता की आज्ञा का पालन करना अपना कर्तव्य समझते थे। इस कारण दल खालसा में सदैव अनुशासन की भावना रहती थी।

5. वेतन (Salary)–दल खालसा में सिखों को कोई निश्चित वेतन नहीं मिलता था। उनको केवल लूट में से हिस्सा मिलता था। बाद में उन्हें जीते गए प्रदेश में से भी कुछ हिस्सा दिया जाने लगा।

6. युद्ध प्रणाली (Mode of Fighting)-दल खालसा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुरिल्ला अथवा छापामार युद्ध प्रणाली थी। गुरदास नंगल की लड़ाई से सिखों ने यह पाठ लिया कि मुग़ल सेना से खुले युद्ध में टक्कर लेना हानिकारक सिद्ध हो सकता है। दूसरा, सिखों के साधन मुग़लों की अपेक्षा सीमित थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली सिखों की शक्ति बढ़ाने में बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई। इस प्रणाली के द्वारा सिख अपने शत्रुओं पर अचानक हमला करके उनको भारी हानि पहुँचाते थे। जितने समय में शत्रु संभलते सिख पुनः जंगलों और पहाड़ों की ओर चले जाते। सिख सैनिकों ने इस युद्ध प्रणाली के कारण मुग़लों और अफ़गानों की नाक में दम कर रखा था।

IV. दल खालसा का महत्त्व (Significance of the Dal Khalsa)
देल खालसा की स्थापना सिख इतिहास में एक मील पत्थर साबित हुई। इसने सिखों की बिखरी हुई शक्ति को एकता के सूत्र में बाँध दिया। इसने उनको धर्म के लिए हर प्रकार की कुर्बानी देने के लिए प्रेरित किया। इसके नेतृत्व में सिखों ने मुग़लों और अफ़गानों का डटकर मुकाबला किया। दल खालसा ने ही पंजाब में सिखों को राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान की। इसके अतिरिक्त दल खालसा के यत्नों से ही सिख पंजाब में स्वतंत्र मिसलें स्थापित करने में सफल हुए। प्रसिद्ध इतिहासकार निहार रंजन रे का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“दल खालसा की स्थापना सिख इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई।” 1

1. “ The organisation of the Dal Khalsa has been rightly characterised as landmark in the history of the Sikhs.” Nihar Ranjan Ray, The Sikh Gurus and the Sikh Society (Patiala : 1970)p: 160.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 13 दल खालसा का उत्थान और इसकी युद्ध प्रणाली

प्रश्न 2.
दल खालसा की सैनिक प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ? (What were the main features of the Military System of the Dal Khalsa ?)
उत्तर-
दल खालसा की सैनिक-प्रणाली की विशेषताएँ
(Features of the Military System of the Dal Khalsa) दल खालसा की महत्त्वपूर्ण सैनिक विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—
1. घुड़सवार सेना (Cavalry)-घुड़सवार सेना दल खालसा की सेना का महत्त्वपूर्ण अंग थी। वास्तव में इस काल में होने वाली लड़ाइयाँ ही ऐसी थीं जिनमें घुड़सवार सेना के बिना जीत प्राप्त करना असंभव था। सिखों के घोड़े बहुत कुशल थे। वे एक दिन में पचास से सौ मील तक का सफर तय करने की समर्था रखते थे।।

2. पैदल सेना (Infantry)-दल खालसा में पैदल सेना का काम केवल पहरा देना था। सिख इस सेना में भर्ती होने को अपना अपमान समझते थे।

3. शस्त्र (Arms)-लड़ाई के समय सिख तलवारों, बरछियों, खंडों, नेजों, तीर कमानों और बंदूकों का प्रयोग करते थे। बारूद की कमी के कारण बंदूकों का कम ही प्रयोग किया जाता था।

4. सेना में भर्ती और अनुशासन (Recruitment and Discipline)-दल खालसा में भर्ती होने के लिए कोई निश्चित नियम नहीं था। कोई भी सिख किसी भी जत्थे में शामिल हो सकता था। वह अपनी इच्छा के अनुसार जब चाहे जत्थे को छोड़कर दूसरे जत्थे में जा सकता था। सैनिकों के नामों, वेतन का भी कोई लिखित विवरण नहीं रखा जाता था। सैनिकों के प्रशिक्षण इत्यादि की भी कोई व्यवस्था नहीं थी। दल खालसा के सैनिक सदैव धार्मिक जोश के साथ लड़ते थे। वे अपने नेता की आज्ञा का पालन करना अपना कर्तव्य समझते थे। इस कारण दल खालसा में सदैव अनुशासन की भावना रहती थी।

5. वेतन (Salary)–दल खालसा में सिखों को कोई निश्चित वेतन नहीं मिलता था। उनको केवल लूट में से हिस्सा मिलता था। बाद में उन्हें जीते गए प्रदेश में से भी कुछ हिस्सा दिया जाने लगा।

6. युद्ध प्रणाली (Mode of Fighting)-दल खालसा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुरिल्ला अथवा छापामार युद्ध प्रणाली थी। गुरदास नंगल की लड़ाई से सिखों ने यह पाठ लिया कि मुग़ल सेना से खुले युद्ध में टक्कर लेना हानिकारक सिद्ध हो सकता है। दूसरा, सिखों के साधन मुग़लों की अपेक्षा सीमित थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली सिखों की शक्ति बढ़ाने में बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई। इस प्रणाली के द्वारा सिख अपने शत्रुओं पर अचानक हमला करके उनको भारी हानि पहुँचाते थे। जितने समय में शत्रु संभलते सिख पुनः जंगलों और पहाड़ों की ओर चले जाते। सिख सैनिकों ने इस युद्ध प्रणाली के कारण मुग़लों और अफ़गानों की नाक में दम कर रखा था।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
दल खालसा की स्थापना के मुख्य कारण क्या थे ? (What were the main causes of the foundation of Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा की उत्पत्ति के तीन कारणों की व्याख्या कीजिए।
(Discuss the three causes of the foundation of Dal Khalsa.)
उत्तर-
1716 ई० में बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद सिखों में नेतृत्व का अभाव उत्पन्न हो गया। परिणामस्वरूप सिख संगठित रूप में न रह सके। मुग़ल सेनाएँ उनका पीछा करती रहती थीं। अतः सिखों ने अपने छोटे-छोटे जत्थे बना लिए। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने बुड्वा दल तथा तरुणा दल की स्थापना की। यह दल खालसा की स्थापना की दिशा में उठाया गया एक ठोस कदम था। नवाब कपूर सिंह ने 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में दल खालसा की स्थापना की। इस प्रकार दल खालसा अस्तित्व में आया।

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प्रश्न 2.
दल खालसा के संगठन बारे आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the organisation of Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा के मुख्य सिद्धांत बताएँ।
(What are main principles of Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा की तीन मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
(Write the main three features of the Dal Khalsa.) ।
अथवा
दल खालसा की स्थापना कब हुई ? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
(When was Dal Khalsa founded ? Describe its main features.)
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह ने 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में दल खालसा की स्थापना की। दल खालसा का प्रधान सेनापति सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया को नियुक्त किया गया। प्रत्येक सिख जिसका गुरु गोबिंद सिंह जी के नियमों पर विश्वास था, को दल खालसा का सदस्य समझा जाता था। दल खालसा में शामिल होने वाले सिखों से यह आशा की जाती थी कि वे घुड़सवारी और शस्त्र चलाने में निपुण हों। दल खालसा के सैनिक छापामार युद्ध प्रणाली द्वारा युद्ध करते थे।

प्रश्न 3.
दल खालसा की सैनिक प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ लिखें। (Write the chief salient features of military administration of Dal Khalsa.)
उत्तर-

  1. दल खालसा में सिख अपनी इच्छानुसार भर्ती होते थे।
  2. सैनिकों के नामों, वेतन इत्यादि का कोई लिखित विवरण नहीं रखा जाता था।
  3. सैनिकों को प्रशिक्षण देने का भी कोई प्रबंध नहीं था
  4. सिख सैनिक छापामार युद्ध प्रणाली द्वारा युद्ध करते थे। वे अपने शत्रुओं पर अचानक आक्रमण करके उनको भारी हानि पहुँचाते थे।
  5. दल खालसा की सेना में पैदल सेना तथा तोपखाने का अभाव था।

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प्रश्न 4.
सिखों की गुरिल्ला युद्ध नीति पर एक नोट लिखिए।
(Write a note on guerilla mode of fighting of the Sikhs.)
अथवा
दल खालसा की युद्ध प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ संक्षेप में बताएँ।
(Give a brief account of the main features of mode of fighting of Dal Khalsa.)
अथवा
दल खालसा की युद्ध प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Make a brief mention of the main features of the mode of fighting of Dal Khalsa.)
उत्तर-
दल खालसा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता छापामार युद्ध-नीति थी। इसका कारण सिखों के सीमित साधन थे। इस प्रणाली के द्वारा सिख अपने शत्रुओं पर अचानक हमला करके उन्हें भारी हानि पहुँचाते थे। शत्रु के संभलने से पहले ही वे पुनः जंगलों और पहाड़ों की ओर चले जाते। सिख सैनिक इस युद्ध प्रणाली के कारण ही . मुग़लों और अफ़गानों का मुकाबला करने में सफल हुए।

प्रश्न 5.
दल खालसा की कब और कहाँ स्थापना हुई ? सिख इतिहास में दल खालसा के महत्त्व का वर्णन करो।
(When and where was Dal Khalsa’ established ? What is its significance in Sikh History ?)
अथवा
दल खालसा के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
(Describe the importance of Dal Khalsa.)
उत्तर-
दल खालसा की स्थापना 29 मार्च, 1748 ई० में वैसाखी वाले दिन अमृतसर में हुई। इसने सिखों को पंजाब में मुग़ल और अफ़गान अत्याचारों का मुकाबला करने के योग्य बनाया। इसने सिखों को राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान की। फलस्वरूप सिख पंजाब में अपनी स्वतंत्र मिसलों की स्थापना करने में सफल हुए। दल खालसा के कारण सिखों में एकता तथा अनुशासन आ गया। दल खालसा की स्थापना के कारण ही सिख एक गौरवमयी युग में प्रवेश कर पाए।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 13 दल खालसा का उत्थान और इसकी युद्ध प्रणाली

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
दल खालसा की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार कोई एक कारण बताएँ।
अथवा
‘दल खालसा की स्थापना का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर-
सिख अपनी शक्ति को संगठित करना चाहते थे।

प्रश्न 2.
बुड्डा दल तथा तरुणा दल की स्थापना कब हुई ?
उत्तर-
1734 ई०।

प्रश्न 3.
बुड्डा दल में किन सिखों को सम्मिलित किया जाता था ?
उत्तर-
40 वर्ष से अधिक आयु के सिखों को।

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प्रश्न 4.
बुड्डा दल के नेता कौन थे ?
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह।

प्रश्न 5.
तरुणा दल में किन सिखों को सम्मिलित किया जाता था ?
उत्तर-
नौजवान सिखों को।

प्रश्न 6.
तरुणा दल का मुख्य कार्य क्या था ?
उत्तर-
शत्रुओं का सामना करना।

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प्रश्न 7.
दल खालसा की स्थापना कब हुई ?
उत्तर-
29 मार्च, 1748 ई०।

प्रश्न 8.
दल खालसा की स्थापना किसने की थी ?
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह।

प्रश्न 9.
दल खालसा की स्थापना कहाँ की गई ?
उत्तर-
अमृतसर।

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प्रश्न 10.
दल खालसा से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
सिखों का सैनिक संगठन।

प्रश्न 11.
दल खालसा के कितने जत्थे थे?
उत्तर-
12.

प्रश्न 12.
दल खालसा के किसी एक मुख्य जत्थे का नाम लिखें।
उत्तर-
शुकरचकिया जत्था।

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प्रश्न 13.
दल खालसा का प्रधान सेनापति कब नियुक्त किया गया ?
उत्तर-
1748 ई०।

प्रश्न 14.
दल खालसा का प्रधान सेनापति किसे नियुक्त किया गया था ?
अथवा
दल खालसा का प्रथम जत्थेदार कौन था ?
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया।

प्रश्न 15.
दल खालसा का प्रथम मुख्य जत्थेदार कौन था?
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया।

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प्रश्न 16.
जस्सा सिंह आहलूवालिया को किस उपाधि के साथ सम्मानित किया गया था ?
उत्तर-
सुल्तान-उल-कौम।

प्रश्न 17.
सरबत खालसा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
समूची सिख संगत।

प्रश्न 18.
दल खालसा की युद्ध विधि कैसी थी ?
उत्तर-
छापामार युद्ध।

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प्रश्न 19.
दल खालसा ने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली क्यों अपनाई ?
उत्तर-
क्योंकि सिखों के साधन मुगलों की तुलना में बिल्कुल सीमित थे।

प्रश्न 20.
दल खालसा का क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
इसने सिखों की बिखरी हुई शक्ति को एकता के सूत्र में बाँधा।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
……..में बुड्ढा दल और तरुणा दल की स्थापना की गई।
उत्तर-
(1734 ई०)

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प्रश्न 2.
तरुणा दल और बुड्डा दल की स्थापना…….ने की थी।
उत्तर-
(नवाब कपूर सिंह)

प्रश्न 3.
दल खालसा की स्थापना……..में की गई थी।
उत्तर-
(1748 ई०)

प्रश्न 4.
दल खालसा की स्थापना……..में की गई थी।
उत्तर-
(अमृतसर)

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प्रश्न 5.
दल खालसा का प्रधान सेनापति ……………. को नियुक्त किया गया था।
उत्तर-
(सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया)

प्रश्न 6.
दल खालसा की सेना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग……..था।
उत्तर-
(घुड़सवार सेना)

प्रश्न 7.
दल खालसा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता……..युद्ध प्रणाली को अपनाना था।
उत्तर-
(छापामार)

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(ii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
नवाब कपूर सिंह ने बुड्डा दल और तरुणा दल की स्थापना 1738 ई० में की थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
दल खालसा की स्थापना 1749 ई० में की गई थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 3.
दल खालसा की स्थापना श्री आनंदपुर साहिब में की गई थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 4.
दल खालसा का प्रधान सेनापति सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया को नियुक्त किया गया था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 5.
दल खालसा की सेना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग घुड़सवार सेना था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
दल खालसा ने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली को अपनाया था।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न | (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
दल खालसा की स्थापना क्यों की गई थी ?
(i) सिख अपनी शक्ति को संगठित करना चाहते थे
(ii) नवाब कपूर सिंह पंथ में एकता स्थापित करना चाहते थे
(iii) सिख मुग़ल सरकार को सबक सिखाना चाहते थे
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 2.
दल खालसा की स्थापना कब की गई थी ?
(i) 1733 ई० में
(ii) 1734 ई० में
(iii) 1739 ई० में
(iv) 1748 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 3.
दल खालसा की स्थापना किसने की थी ?
(i) नवाब कपूर सिंह ने
(ii) जस्सा सिंह आहलूवालिया ने
(iii) जस्सा सिंह रामगढ़िया ने
(iv) महाराजा रणजीत सिंह ने।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 4.
दल खालसा की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(i) दिल्ली में
(ii) जालंधर में
(iii) अमृतसर में
(iv) लुधियाना में।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 5.
नवाब कपूर सिंह ने दल खालसा की स्थापना कहाँ की थी ?
(i) लाहौर
(ii) अमृतसर
(iii) तरनतारन
(iv) अटारी।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 6.
दल खालसा का प्रधान सेनापति कौन था ?
(i) जस्सा सिंह आहलूवालिया
(ii) जस्सा सिंह रामगढ़िया
(iii) नवाब कपूर सिंह
(iv) बाबा आला सिंह।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 7.
दल खालसा ने किसको ‘सुल्तान-उल-कौम’ की उपाधि से सम्मानित किया था ?
(i) महाराजा रणजीत सिंह को
(ii) नवाब कपूर सिंह को
(iii) जस्सा सिंह आहलूवालिया को
(iv) जय सिंह को।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 8.
सरबत खालसा की सभाएँ कहाँ बुलाई जाती थीं ?
(i) दिल्ली में
(ii) लाहौर में
(iii) अमृतसर में
(iv) खडूर साहिब में।
उत्तर-
(iii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
दल खालसा की स्थापना के मुख्य कारण क्या थे ? (What were the main causes of the foundation of Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा की उत्पत्ति के मुख्य कारणों की व्याख्या कीजिए। (Discuss the main causes of the foundation of Dal Khalsa.)
उत्तर-
1716 ई० में बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद सिख संगठित रूप से पंजाब में न रह सके। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर पंजाब के मुगल सूबेदारों अब्दुस समद खाँ तथा जकरिया खाँ ने सिखों पर घोर अत्याचार करने आरंभ कर दिए। सिखों के सिरों के लिए इनाम घोषित किये गये। बाध्य होकर सिखों को पहाड़ों एवं वनों में जाकर शरण लेनी पड़ी। मुग़ल सेनाएँ उनका पीछा करती रहती थीं। जहाँ कहीं वे अकेले नज़र आते शहीद कर दिए जाते। ऐसी स्थिति में सिखों ने अपने आप को जत्थों के रूप में संगठित करने की आवश्यकता अनुभव की। परिणामस्वरूप उन्होंने अपने छोटे-छोटे जत्थे बना लिए। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने एक बहुत प्रशंसनीय निर्णय किया। उसने सिखों को दो दलों-बड़ा दल तथा तरुणा दल-में गठित किया। यह दल खालसा की स्थापना की दिशा में उठाया गया एक ठोस कदम था। 1745 ई० में दीवाली के अवसर पर अमृतसर में 100-100 सिखों के 25 जत्थे बनाए गये। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़कर 65 हो गई। मुग़लों के विरुद्ध अपनी कार्यवाही को तीव्र करने के उद्देश्य से नवाब कपूर सिंह ने 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में दल खालसा की स्थापना की।

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प्रश्न 2.
दल खालसा के संगठन के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the organisation of Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा के मुख्य सिद्धांत बताओ। (What are the main principles of Dal Khalsa ?)
अथवा
दल खालसा की मुख्य विशेषताएँ लिखिए। (Write the main features of the Dal Khalsa.)
अथवा
दल खालसा की स्थापना कब हुई ? इसकी मुख्य विशेषताएँ लिखें। (When was Dal Khalsa founded ? Describe its main features.)
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह के सुझाव पर सिख पंथ की एकता के लिए 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में दल खालसा की स्थापना की गई। सिखों के 65 जत्थों को 12 जत्थों में संगठित किया गया। प्रत्येक जत्थे का अलग नेता और झंडा था। सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया को दल खालसा का प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। प्रत्येक सिख जिसका गुरु गोबिंद सिंह जी के नियमों पर विश्वास था, को दल खालसा का सदस्य समझा जाता था। प्रत्येक सिख के लिए यह आवश्यक था कि वह पंथ के शत्रुओं का मुकाबला करने हेतु दल खालसा में शामिल हो। दल खालसा में शामिल होने वाले सिखों से यह आशा की जाती थी कि वे घुड़सवारी और शस्त्र चलाने में निपुण हों। दल खालसा का प्रत्येक सदस्य किसी भी जत्थे में शामिल होने के लिए स्वतंत्र था। लड़ाई के समय 12 जत्थों के सरदारों में से किसी एक को दल खालसा का प्रधान चुन लिया जाता था और शेष सरदार उसकी आज्ञा का पालन करते थे। घुड़सवार सेना दल खालसा की सेना का मुख्य अंग था। सिख छापामार युद्धों के द्वारा अपने शत्रुओं का मुकाबला करते थे।

प्रश्न 3.
दल खालसा की सैनिक प्रणाली की छः विशेषताएँ लिखें।
(Write the six features of military administration of Dal Khalsa.)
उत्तर-
दल खालसा की महत्त्वपूर्ण सैनिक विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—
1. घुड़सवार सेना-घुड़सवार सेना दल खालसा की सेना का महत्त्वपूर्ण अंग थी। वास्तव में इस काल में होने वाली लड़ाइयाँ ही ऐसी थीं जिनमें घुड़सवार सेना के बिना जीत प्राप्त करना असंभव था। सिखों के घोड़े बहुत कुशल थे। वे एक दिन में पचास से सौ मील तक का सफर तय करने की समर्था रखते थे।

2. पैदल सेना-दल खालसा में पैदल सेना का काम केवल पहरा देना था। सिख इस सेना में भर्ती होने को अपना अपमान समझते थे।

3. शस्त्र-लड़ाई के समय सिख तलवारों, बरछियों, खंडों, नेजों, तीर-कमानों और बंदूकों का प्रयोग करते थे। बारूद की कमी के कारण बंदूकों का कम ही प्रयोग किया जाता था।

4. सेना में भर्ती और अनुशासन-दल खालसा में भर्ती होने के लिए किसी भी सिख को विवश नहीं किया जाता था। प्रत्येक सिख अपनी इच्छानुसार दल खालसा के किसी भी जत्थे में सम्मिलित हो सकता था, वह जब चाहे उस जत्थे को छोड़कर दूसरे जत्थे में जा सकता था। सैनिकों के नामों, वेतन इत्यादि का कोई लिखित विवरण नहीं रखा जाता था।

5. वेतन–दल खालसा में सिखों को कोई निश्चित वेतन नहीं मिलता था। उनको केवल लूट में से हिस्सा मिलता था। बाद में उन्हें जीते गए प्रदेश में से भी कुछ हिस्सा दिया जाने लगा।

6. युद्ध प्रणाली–दल खालसा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुरिल्ला अथवा छापामार युद्ध प्रणाली थी। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली सिखों की शक्ति बढ़ाने में बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई। इस प्रणाली के द्वारा सिख अपने शत्रुओं पर अचानक हमला करके उनको भारी हानि पहुँचाते थे। जितने समय में शत्रु संभलते सिख पुनः जंगलों और पहाड़ों की ओर चले जाते। सिख सैनिकों ने इस युद्ध प्रणाली के कारण मुग़लों और अफ़गानों की नाक में दम कर रखा था।

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प्रश्न 4.
दल खालसा की गुरिल्ला युद्ध नीति पर एक नोट लिखिए। (Write a note on guerilla mode of fighting of the Dal Khalsa.)
अथवा
दल खालसा की युद्ध प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ संक्षेप में बताएँ। . (Give a brief account of the main features of mode of fighting of Dal Khalsa.)
अथवा
दल खालसा की युद्ध प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Make a brief mention of the main features of the mode of fighting of Dal Khalsa.)
उत्तर-
दल खालसा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुरिल्ला अथवा छापामार युद्ध प्रणाली को अपनाना था। अनेक कारणों से सिखों को यह प्रणाली अपनाने के लिए विवश होना पड़ा। पहला, गुरदास नंगल की लड़ाई में बंदा सिंह बहादुर और सैंकड़ों अन्य सिखों को कैदी बना लिया गया था जिन्हें बाद में बड़ी निर्ममता के साथ कत्ल कर दिया गया। इससे सिखों ने यह पाठ सीखा कि मुग़ल सेना से खुले युद्ध में टक्कर लेना उनके लिए कितना हानिकारक सिद्ध हो सकता है। दूसरे, अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ, याहिया खाँ और मीर मन्नू के भारी अत्याचारों का मुकाबला करने के लिए सिखों के पास कोई अन्य रास्ता नहीं था। इसका कारण यह था कि सिखों के साधन मुग़लों की अपेक्षा बहुत सीमित थे। गुरिल्ला युद्ध प्रणाली सिखों की शक्ति बढ़ाने में बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई। इस प्रणाली के द्वारा सिख अपने शत्रुओं पर अचानक हमला करके उनको भारी हानि पहँचाते थे। जितने समय में शत्र संभलते सिख पुनः जंगलों और पहाड़ों की ओर चले जाते। सिख यह कार्यवाही बड़ी फुर्ती के साथ करते। सिख सैनिक इस युद्ध प्रणाली के कारण ही पहले मुग़लों और बाद में अफ़गानों का मुकाबला करने में सफल हुए।

प्रश्न 5.
दल खालसा की कब और कहाँ स्थापना हुई ? सिख इतिहास में दल खालसा के महत्त्व का वर्णन करो। (When and where was Dal Khalsa established ? What is its significance in Sikh History ?)
अथवा
दल खालसा का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of Dal Khalsa ?)
उत्तर-
दल खालसा की स्थापना 29 मार्च, 1748 ई० में वैशाखी वाले दिन अमृतसर में की गई। दल खालसा की स्थापना सिख इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इसने सिख कौम में एक नए जीवन का संचार किया। इसने सिखों को एकता के सूत्र में बाँधा। इसने सिखों को पंजाब के मुग़ल और अफ़गान सूबेदारों के अत्याचारों का मुकाबला करने के योग्य बनाया। इसने पंजाब में सिखों को राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान की। दल खालसा के प्रयत्नों के फलस्वरूप सिख पंजाब में अपनी स्वतंत्र मिसलों की स्थापना करने में सफल हुए। दल खालसा ने लोकतंत्रीय सिद्धांतों का प्रचलन किया। वास्तव में दल खालसा की स्थापना के कारण ही सिख अंधकारपूर्ण युग से एक गौरवमयी युग में दाखिल होने में सफल हुए। निस्संदेह दल खालसा ने सिखों को बहुपक्षीय देन दी।

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Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
जकरिया खाँ के सभी प्रयास जब सिखों की शक्ति को कुचलने में असफल रहे तो उसने 1733 ई० में सिंखों से समझौता कर लिया। इस कारण सिखों को अपनी शक्ति संगठित करने का सुनहरी मौका मिल गया। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सारे छोटे-छोटे दलों को मिला कर मुख्य दल में संगठित कर दिया। इनके नाम बुड्डा दल तथा तरुणा दल थे। बुड्डा दल में 40 वर्ष की आयु से ऊपर के सिखों को शामिल किया गया था। इस दल का कार्य सिखों के पवित्र धार्मिक स्थानों की देख-भाल करना और सिख धर्म का प्रचार करना था। तरुणा दल में 40 साल से कम आयु के सिखों को शामिल किया गया था। इस दल का मुख्य कार्य अपनी कौम की रक्षा करना और दुश्मनों का मुकाबला करना था। तरुणा दल को आगे पाँच जत्थों में बाँटा गया था और प्रत्येक जत्थे को एक अलग अनुभवी सिख जत्थेदार के अधीन रखा गया था। प्रत्येक दल में 1300 से लेकर 2000 तक नौजवान थे। प्रत्येक जत्थे का अपना झंडा तथा नगाड़ा था। चाहे नवाब कपूर सिंह जी को बुड्डा दल का नेतृत्व सौंपा गया था, पर वह दोनों दलों में साझी कड़ी का कार्य भी करते थे। दो दलों में संगठित हो जाने के कारण सिख मुग़लों के विरुद्ध अपनी गतिविधियाँ तेज़ कर सके।

  1. जकरिया खाँ कौन था ?
  2. बुड्ढा दल तथा तरुणा दल का गठन कब किया गया था ?
  3. बुड्डा दल तथा तरुणा दल का गठन किसने किया था ?
    • बंदा सिंह बहादुर
    • नवाब कपूर सिंह।
    • गुरु गोबिंद सिंह
    • उपरोक्त में से कोई नहीं।
  4. तरुणा दल में कौन सम्मिलित थे ?
  5. बुड्डा दल का नेतृत्व किसने किया था ?

उत्तर-

  1. जकरिया खाँ लाहौर का सूबेदार था।
  2. बुड्ढा दल तथा तरुणा दल का गठन 1734 ई० में किया गया था।
  3. नवाब कपूर सिंह।
  4. तरुणा दल में 40 साल से कम आयु के नौजवान सम्मिलित थे।
  5. बुड्ढा दल का नेतृत्व नवाब कपूर सिंह ने किया था।

2
29 मार्च, 1748 ई० को बैसाखी के दिन सिख अमृतसर में इकट्ठे हुए। नवाब कपूर सिंह जी ने यह सुझाव दिया कि आने वाले समय को देखते हुए पंथ को एकता और मज़बूती की ज़रूरत है। इस उद्देश्य को सामने रखते हुए उस दिन दल खालसा की स्थापना की गई। 65 सिख जत्थों को 12 मुख्य जत्थों में संगठित कर दिया गया। प्रत्येक जत्थे का अपना अलग नेता और झंडा था। सरदार जस्सा सिंह आहलुवालिया को दल खालसा का प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। प्रत्येक सिख जिसको गुरु गोबिंद सिंह जी के असूलों पर विश्वास था, को दल खालसा का सदस्य समझा जाता था। प्रत्येक सिख के लिए यह ज़रूरी था कि वह पंथ के शत्रुओं का मुकाबला करने के लिए दल खालसा में शामिल हो। दल खालसा में शामिल होने वाले सिखों से यह आशा की जाती थी कि वह घुड़सवारी और शस्त्र चलाने में निपुण हों। दल खालसा का प्रत्येक सदस्य किसी भी जत्थे में शामिल होने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र था।

  1. दल खालसा की स्थापना किसने की थी ?
  2. दल खालसा की स्थापना कब की गई थी ?
    • 1733 ई०
    • 1734 ई०
    • 1738 ई०
    • 1748 ई०
  3. सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया कौन था ?
  4. दल खालसा में कौन शामिल हो सकता था ?
  5. दल खालसा की कोई एक विशेषता लिखें।

उत्तर-

  1. दल खालसा की स्थापना नवाब कपूर सिंह जी ने की थी।
  2. 1748 ई०।
  3. सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया दल खालसा के प्रधान सेनापति थे।
  4. दल खालसा में प्रत्येक वह सिख शामिल हो सकता था जो गुरु गोबिंद जी के नियमों में विश्वास रखता था।
  5. घुड़सवार सेना दल खालसा की सेना का मुख्य अंग थी।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 13 दल खालसा का उत्थान और इसकी युद्ध प्रणाली

दल खालसा का उत्थान और इसकी युद्ध प्रणाली PSEB 12th Class History Notes

  • दल खालसा के उत्थान के कारण (Causes of the Rise of the Dal Khalsa)-बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद मुग़ल सूबेदारों ने सिखों पर कठोर अत्याचार आरंभ कर दिए थे—सिख शक्ति को संगठित करने के लिए 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने उन्हें बुड्डा दल और तरुणा दल में संगठित कर दिया—पंजाब में फैली अशाँति से लाभ उठाते हुए 1745 ई० में अमृतसर में सौ-सौ सिखों के 25 जत्थों की स्थापना की गई—ये जत्थे दल खालसा की स्थापना का आधार बने।
  • दल खालसा की स्थापना (Establishment of the Dal Khalsa)–दल खालसा की स्थापना 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में हुई—इसकी स्थापना नवाब कपूर सिंह जी ने की-सिखों को 12 मुख्य जत्थों में संगठित कर दिया गया—प्रत्येक जत्थे का अपना अलग नेता और झंडा था—सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया को दल खालसा का प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया।
  • दल खालसा की सैनिक विशेषताएँ (Military Features of the Dal Khalsa)-घुड़सवार सेना दल खालसा की सेना का मुख्य अंग थी—सेना में भर्ती होने के लिए किसी भी सिख को विवश नहीं किया जाता था—प्रत्येक सिख जब चाहे एक जत्थे को छोड़कर दूसरे जत्थे में जा सकता थासैनिक प्रशिक्षण और विधिवत् वेतन की कोई व्यवस्था न थी—दल खालसा के सैनिक गुरिल्ला युद्ध प्रणाली से लड़ते थे-लड़ाई के समय तलवारों, बरछियों, खंडों, तीर कमानों और बंदूकों का प्रयोग किया जाता था।
  • दल खालसा का महत्त्व (Significance of the Dal Khalsa)-दल खालसा ने सिखों की बिखरी हुई शक्ति को एकता के सूत्र में बाँध दिया-इसने सिखों को अनुशासन में रहना सिखाया—दल खालसा के प्रयासों से ही सिख पंजाब में अपनी स्वतंत्र मिसलें स्थापित करने में सफल हुए।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 5 आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत

Punjab State Board PSEB 12th Class Geography Book Solutions Chapter 5 आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत Textbook Exercise Questions and Answers.

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PSEB 12th Class Geography Guide आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत Textbook Questions and Answers

प्रश्न I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में दें:

प्रश्न 1.
खनिजों को कौन से दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर-
खनिजों को निम्नलिखित दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है—

  1. धातु खनिज (Metallic Minerals)
  2. अधातु खनिज (Non-Metallic Minerals)

प्रश्न 2.
देश के घरेलू उत्पादन में खनिजों का तथा उद्योगों का फ़ीसद हिस्सा कितना-कितना है ?
उत्तर-
देश के घरेलू उत्पादन में खनिजों का हिस्सा 2.2% से 2.5% है तथा उद्योगों का 10% से 11% तक बनता

प्रश्न 3.
कौन-सी धातु आधुनिक सभ्यता की रीढ़ की हड्डी है ?
उत्तर-
लोहा आधुनिक सभ्यता की रीढ़ की हड्डी है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 5 आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत

प्रश्न 4.
हल्के भूरे पीले रंग का लोहा, कौन-सी किस्म का हो सकता है ?
उत्तर-
लिमोनाइट किस्म का लोहा हल्के भूरे पीले रंग का होता है।

प्रश्न 5.
मयूरभंज और क्योंझर खाने कौन से राज्य में पड़ती हैं ?
उत्तर-
मयूरभंज और क्योंझर खाने उड़ीसा राज्य में पड़ती हैं।

प्रश्न 6.
प्राचीन मनुष्य किस धातु का अधिक उपयोग करता था ?
उत्तर-
तांबा का उपयोग प्राचीन मनुष्य सबसे अधिक करता था।

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प्रश्न 7.
भारत में तांबे का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य कौन-सा है ?
उत्तर-
भारत में तांबे का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश है।

प्रश्न 8.
एल्यूमीनियम बनाने के लिए किस खनिज का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर-
एल्यूमीनियम बनाने के लिए बॉक्साइट खनिज का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 9.
इस्पात बनाने के लिए कौन-सा खनिज प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
लोहे से इस्पात बनाया जाता है तथा इसके लिए मैंगनीज़ का प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 10.
‘काला सोना’ कौन से खनिज पदार्थ को कहते हैं ?
उत्तर-
‘काला सोना’ कोयले को कहते हैं।

प्रश्न 11.
भारत में सर्वोत्तम कोयला कौन से क्षेत्र से निकाला जाता है ?
उत्तर-
भारत में सर्वोत्तम कोयला जम्मू कश्मीर से निकाला जाता है।

प्रश्न 12.
डिगबोई तथा अंकलेश्वर में क्या समानता है ?
उत्तर-
डिगबोई तथा अंकलेश्वर दोनों ही भारत के प्रमुख पैट्रोलियम उत्पादक केन्द्र हैं।

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प्रश्न 13.
कोझिकोड़ तथा फिरोजगंज कौन-सी ऊर्जा के उत्पादन के केन्द्र हैं ?
उत्तर-
कोझिकोड़ पवन ऊर्जा का तथा फिरोजगंज बिजली उत्पादन के केन्द्र हैं।

प्रश्न 14.
स्रोतों की संभाल संबंधी 1992 को अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन कहां पर हुआ था ?
उत्तर-
ब्राजील के शहर रिओ डी जनेरियो में 1992 को अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में स्रोतों की संभाल की सख्ती के साथ वकालत की गई।

प्रश्न 15.
IREDA का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर-
Indian Renewable Energy Development Agency भारतीय नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेन्सी।

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प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चार पंक्तियों में दें:

प्रश्न 1.
कोयला, ऊर्जा का दोहरा स्रोत कैसे है ?
उत्तर-
कोयला हमारे देश की आर्थिकता को जितनी मज़बूती देता है उतना ही महत्त्व यह ऊर्जा के क्षेत्र में भी रखता है। भारत में आर्थिकता की वृद्धि दर 8 से 10% प्रति वर्ष है इसके साथ ही ऊर्जा की आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है। अब कोयले से बिजली भी पैदा की जा रही है। इसलिए कोयले को ऊर्जा का दोहरा स्रोत कहते हैं।

प्रश्न 2.
बंबे हाई के साथ संक्षिप्त जान पहचान करवाएं।
उत्तर-
बंबे हाई मुंबई शहर से 176 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पश्चिम की तरफ अरब सागर में स्थित है तथा यहाँ तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार मिलते हैं। जिस कारण इसकी विशेषता में वृद्धि होती जा रही है।

प्रश्न 3.
जैविक और अजैविक खनिजों की दो-दो उदाहरणे दो।
उत्तर-
जैविक और अजैविक खनिजों की उदाहरणे हैंजैविक स्त्रोत-जंगल, फसलें इत्यादि। अजैविक स्त्रोत-भूमि, पानी इत्यादि।

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प्रश्न 4.
कच्चे लोहे की चार किस्मों के नाम लिखो।
उत्तर-
कच्चे लोहे के चार प्रकार निम्नलिखित हैं—

  1. मैग्नेटाइट
  2. हैमेटाइट
  3. लिमोनाइट
  4. साइडेराइट।

प्रश्न 5.
तांबे की तीन विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
तांबे की तीन विशेषताएं निम्नलिखित हैं—

  1. तांबा हल्के गुलाबी भूरे रंग की धातु है यह समूह में मिलती है।
  2. तांबा बिजली और ताप का अच्छा संचालक है।
  3. इससे जंग नहीं लगता।
  4. इसको किसी भी धातु के साथ मिलाकर मिश्रित धातु बनाई जा सकती है।

प्रश्न 6.
बॉक्साइट का उपयोग कौन-कौन से कार्यों में किया जाता है ?
उत्तर-

  1. बॉक्साइट का उपयोग एल्यूमीनियम बनाने में किया जाता है।
  2. इसके अतिरिक्त बॉक्साइट का उपयोग सीमेंट बनाने में, आग रोकने वाली भट्टी बनाने इत्यादि कार्यों के लिए भी किया जाता है।

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प्रश्न 7.
मैंगनीज कैसी धातु है और कहाँ पर मिलती है ?
उत्तर-
मैंगनीज हल्के स्लेटी रंग की धातु है, जो कि साधारणतया कच्चे लोहे के साथ ही खानों के बीच हमें मिलती है। लोहे से इस्पात बनाने के लिए मुख्य रूप में इसका उपयोग किया जाता है। भारत में यह उड़ीसा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश इत्यादि राज्यों से मिलता है।

प्रश्न 8.
वायु ऊर्जा उत्पादन में भारत के मुख्य राज्य हैं ?
उत्तर-
वायु ऊर्जा उत्पादन में भारत के मुख्य राज्य हैं-तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश तथा केरल इत्यादि।

प्रश्न 9.
ज्वारीय ऊर्जा किस तरह उत्पन्न होती है ?
उत्तर-
ज्वारीय ऊर्जा अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की तरह एक भरोसे-योग्य ऊर्जा है। समद्र में ज्वार-भाटा तथा सागरीय धाराओं के साथ चलने वाली टरबाइनें, पानी की पिछली सतह पर लगाई जाती हैं। इस तरह ज्वारीय ऊर्जा पैदा की जाती है। सौभाग्यवश से दक्षिणी भारत तीनों सिरों से समुद्र के साथ घिरा हुआ है। इस तरह यहाँ ज्वारीय शक्ति के साथ बिजली पैदा करने की संभावना तथा योग्यता है।

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प्रश्न III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 10-12 पंक्तियों में दें:

प्रश्न 1.
कच्चे लोहे की किस्मों का वर्णन करो।
उत्तर-
कच्चे लोहे के प्रकार निम्नलिखित हैं—

  1. मैग्नेटाइट-यह सबसे उच्च कोटि का कच्चा लोहा है। इसके बीच 72% शुद्ध लोहे के अंश मिलते हैं। इसके गुण चुंबकीय होने के कारण इसको मैग्नेटाइट कहते हैं।
  2. हैमेटाइट-इस किस्म के कच्चे लोहे में 60 से लेकर 70 प्रतिशत तक शुद्ध लोहे के अंश होते हैं। इसे दूसरे स्तर का हैमेटाइट लोहा भी कहते हैं।
  3. लिमोनाइट-इसका रंग पीला या हल्का भूरा होता है। इसमें 40 से 60 प्रतिशत तक शुद्ध कच्चे लोहे के अंश होते हैं। इससे तीसरे स्तर का लिमोनाइट लोहा कहते हैं।
  4. साइडेराइट- यह खासकर काफी अशुद्धियों से भरा होता है इसमें 40 से 50 प्रतिशत तक ही शुद्ध लोहे के अंश होते हैं। इसकी गिनती चौथे स्तर के कच्चे लोहे के रूप में की जाती है।

प्रश्न 2.
भारत में तांबे के उत्पादन के व्यापार से पहचान करवाओ।
उत्तर-
तांबे का उपयोग मनुष्य प्राचीन काल से ही कर रहा है। तांबे के उत्पादन तथा व्यापार का वर्णन निम्नलिखित है—
भारत में तांबे के भंडार बहुत ही कम हैं। हमारा देश संसार का कुल 2% तांबा पैदा कर रहा है। देश में तांबे के अन्तर्गत कुल 69 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है। इसमें सिर्फ 20 हजार वर्ग किलोमीटर में से ही तांबा निकाला जाता है। तांबे के मुख्य उत्पादक राज्य हैं—

1.मध्य प्रदेश-यह तांबे का भारत में सबसे बड़ा उत्पादक प्रदेश है। मलंजखंड, तारेगऊ, पट्टी, मध्य प्रदेश में तांबे का उत्पादन सबसे अधिक करते हैं। यह पट्टी बालाघाट प्रांत में है, जहाँ 8.33 मिलियन कच्चे तांबे के भंडार में से 1,006 हजार टन धातु मौजूद है।

2. राजस्थान-राजस्थान तांबा उत्पादन करने वाला दूसरा बड़ा राज्य है, जो भारत का 40 प्रतिशत तांबा पैदा करता है। तांबे के भंडार अरावली क्षेत्र में मौजूद हैं। राजस्थान के प्रांत अलवर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, डुगरपुर, जयपुर, झुनझुनु, पाली, सीकर, सिरोही तथा उदयपुर में 6 करोड़ टन कच्चे तांबे के भंडार हैं।

3. झारखंड-झारखंड में सिंहभूमि प्रांत के मोसाबनि, खोडाई रख्खा, पारसनाथ, बरखानाथ इत्यादि प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।
भारत का तांबे का उत्पादन बहुत कम है। इसलिए हम तांबा विदेशों में से मंगवा रहे हैं। मुख्य तौर पर अमेरिका, कैनेडा, जिम्बाब्बे, जापान तथा मैक्सिको मुख्य तांबा निर्यातकर्ता देश हैं।

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प्रश्न 3.
बॉक्साइट के उपयोग तथा व्यापार के बारे में संक्षिप्त से बताओ।
उत्तर-
मैंगनीज एक हल्के रंग की धातु है जो कि मुख्य रूप में कच्चे लोहे के साथ ही खानों में मिलती है। लोहे से अगर इस्पात बनाया जाता है, तब मैंगनीज का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त ब्लीचिंग पाऊडर, कीटनाशक, रंग तथा टार्च बनाने में भी मैंगनीज का उपयोग किया जाता है। साल 2012-13 में इस खनिज का उत्पादन 23 लाख से 22 हजार टन हो गया है। उत्पादन के लिहाज से उड़ीसा (44%) सबसे बड़ा भारत का उत्पादक देश है, उसके बाद कर्नाटक (22%), मध्य प्रदेश (13%), महाराष्ट्र (8%), आन्ध्रप्रदेश (4%), झारखंड तथा गोआ (3%), राजस्थान, गुजरात तथा पश्चिमी बंगाल मिलकर 3% मैंगनीज का उत्पादन करते हैं।

साल 2012-13 में मैंगनीज़ का निर्यात 72 हजार टन था। भारतीय मैंगनीज का मुख्य खरीददार चीन (99%) ही है। उपयोग योग्य मैंगनीज की पूर्ति कम होने के कारण भारत को मैंगनीज बाहर से मंगवाना पड़ता है। 2012-13 के सालों में 23 लाख 30 हजार टन मैंगनीज़ आयात किया गया।

प्रश्न 4.
कोयले की किस्मों तथा उनके गुणों के बारे में संक्षिप्त में बताओ।
उत्तर-
कोयले की किस्में तथा उनके गुण इस प्रकार हैं—
1. ऐन्थेसाइट- इस प्रकार के कोयले में कार्बन की मात्रा 85 प्रतिशत से अधिक होती है। यह एक बेहतरीन प्रकार का कोयला होता है। यह बहुत सख्त होता है और देर तक जलता है जिसके कारण अधिक ऊर्जा देता है और धुएं की कमी होती है।

2. बिटुमिनस-इस तरह के कोयले में कार्बन की मात्रा 50 से 85 प्रतिशत तक होती है। यह भी सख्त किस्म का कोयला होता है तथा इसमें कार्बन की मात्रा अधिक होती है। ऊर्जा बहुत देता है तथा धुएं की कमी होती है। कोकिंग कोयला तथा स्टीम कोयला इस प्रकार का होता है।

3. लिग्नाइट-इस तरह के कोयले में कार्बन की मात्रा 35 से 50 प्रतिशत तक होती है। इसको भूरे काले रंग वाला कोयला कहते हैं। इस प्रकार के कोयले में धुएं की भी अधिक मात्रा होती है। इसका प्रयोग ताप विद्युत् में किया जाता है।

4. पीट-इस प्रकार के कोयले में कार्बन की मात्रा 35 प्रतिशत से भी कम होती है। यह सबसे घटिया किस्म का कोयला होता है। यह भूरे रंग का कोयला है और जलने के बाद धुएं की बहुत मात्रा निकलती है।

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प्रश्न 5.
भारत में पैट्रोलियम के उत्पादक क्षेत्र कौन से हैं ?
उत्तर-
भारत में पैट्रोलियम के उत्पादक क्षेत्रों का वर्णन इस प्रकार है—

  1. असम-असम भारत के पैट्रोल निकालने वाले क्षेत्रों में सबसे पुराना केन्द्र है। डिगबोई, बप्पायुंग, हंसापुंग, सुरमाघाटी में बदरपुर, मसीमपुर, पथरिया इत्यादि पैट्रोल उत्पादक क्षेत्र हैं।
  2. नहरकटिया क्षेत्र-असम में यह एक नवीन तेल क्षेत्र है जिसमें नहरकटिया, हुगरीजन, मोरान, लकवा इत्यादि मुख्य केन्द्र हैं।
  3. गुजरात में अंकलेश्वर कैम्बे, लयुनेज़, कलोल, डोलका, सनंदा, बेवल बाकल तथा कटान इत्यादि पैट्रोल तथा प्राकृतिक गैस के मुख्य उत्पादक केन्द्र हैं।
  4. बंबे हाई-यह शहर मुंबई शहर से 176 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में अरब सागर में आता है। यहाँ तेल तथा प्राकृतिक गैस के अच्छे भंडार हैं।

प्रश्न 6.
भारत में सौर ऊर्जा के उत्पादन तथा वितरण पर नोट लिखो।
उत्तर-
पृथ्वी पर हर एक ऊर्जा का जन्म सौर ऊर्जा द्वारा हुआ माना जाता है। वस्तुओं को सुखाने, उन्हें गर्म करने, खाना बनाने तथा फोटोवोलटिक पैनलों के द्वारा बिजली बनाने में इसका उपयोग किया जाता है।
भारत में 6 अप्रैल, 1917 तक सौर ऊर्जा का सामर्थ्य 12.28 GW गीगावाट के करीब था। भारत सरकार ने 2022 तक एक लाख मैगावाट सौर ऊर्जा के साथ बिजली तैयार करने का उद्देश्य रखा है।

वितरण-आर्थिक साल 2016-17 में आन्ध्र प्रदेश में 1,294.26 MW मैगावाट उत्पादन का योगदान डाला था। इस नाम में 1000 किलोवाट = 1 मैगावाट, 1 गीगावाट = 1000 मैगावाट। दूसरे नंबर पर कर्नाटक फिर तेलंगाना, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड इत्यादि स्थान शामिल होते हैं। 2017 साल में विश्व बैंक ने सौर ऊर्जा के विकास के लिए एक अरब डालर का कर्ज दिया है जोकि विश्व के बाकी देशों से सबसे अधिक है।

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प्रश्न 7.
स्थायी विकास पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
स्थायी विकास उस विकास को कहते हैं जिसमें मौजूदा पीढ़ी की आवश्यकताओं का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है तथा साथ ही आने वाली पीढ़ी की आवश्यकताओं तथा मांगों का भी पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है। हमारे वर्तमान समाज की यह एक जोरदार मांग भी है ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए स्रोतों की संभाल की जा सके और वे भी इन स्रोतों का पूरा-पूरा लाभ उठा सकें। हालांकि विकसित देशों के द्वारा अपनाये गए विकास मॉडल जिन्होंने उन्हें विकसित बनाया है, इसमें अधिकतर सिर्फ वर्तमान को ध्यान में रखकर बनाये गए हैं। इस तरह ये भविष्य के लिए खतरा भी सिद्ध हुए हैं। इसलिए ज़रूरी है कि अन्तर्राष्ट्रीय भाईचारे के साथ हम अपने ग्रह के प्राकृतिक साधन बचा सकें ताकि गरीबी से छुटकारा पाकर खुशहाल जिन्दगी व्यतीत कर सकें तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति प्राप्त कर सकें।

प्रश्न IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 20 पंक्तियों में दो :

प्रश्न 1.
प्राकृतिक स्रोतों की संभाल के बारे में किए प्रयत्नों की जरूरत से पहचान करवाओ।
उत्तर-
किसी भी देश का विकास उस देश के प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करता है। क्योंकि सभी उद्योग प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करते हैं। इस तरह देश के हर पक्ष से विकास के लिए स्रोतों के उपयोग की बहुत ज़रूरत होती है, परन्तु प्रत्येक देश अपने आर्थिक विकास के कारण स्रोतों का अन्धाधुंध उपयोग कर रहे हैं जिसके कारण हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है। महात्मा गांधी जी ने इस लूट का कारण लिखा है कि धरती पर हर व्यक्ति की ज़रूरत के लिए बहुत स्रोत हैं पर किसी के भी लालच के लिए कोई नहीं। ब्राजील के शहर रीओ डी जेनेरियो में 1992 में अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान स्रोतों की संभाल की सख्ती के साथ वकालत की गई।

मनुष्य अपनी ज़रूरतों को पूरी करने के लिए प्राकृतिक स्रोतों को अधिक से अधिक लूट रहे हैं। अगर हम इन प्राकृतिक स्रोतों की इस प्रकार ही लूटते चले गए, तो आने वाले पीढ़ी के लिये कुछ भी साफ सुथरा छोड़ कर नहीं जा सकेंगे इसलिए स्रोतों की संभाल की आवश्यकता है। क्योंकि—
1. स्रोत पारिस्थितिक तंत्र को ठीक रखने के लिए बहुत आवश्यक हैं।

2. प्राकृतिक प्रजातियों को बचाने की योग्यता बनाये रखने के लिए जो प्राकृतिक जीव इत्यादि मिलते हैं उनको नुकसान पहुंचाने पर रोक होनी चाहिए।

3. मौजूदा और आने वाली पीढ़ी के लिए स्रोत बरकरार रखने के लिए स्रोतों का फालतू उपयोग नहीं करना चाहिए। सिर्फ अपनी ज़रूरत के अनुसार उनका उपयोग करना चाहिए, ताकि स्रोतों का अधिक नुकसान न हो तथा आने वाली पीढ़ी के लिए यह स्रोत बचे रहें तथा वे भी इसका लाभ उठा सकें।

4. मनुष्य की रक्षा के लिए स्थायी या निरंतर विकास (Sustainable Development)-स्थाई या निरंतर विकास वह विकास होता है जिसमें मौजूदा पीढ़ी तथा आने वाली पीढ़ी के बारे ध्यान रखा जाता है। मौजूदा समाज को विकास के इस मॉडल की आवश्यकता है, ताकि वर्तमान के साथ-साथ भविष्य का भी ध्यान रखा जा सके। हालांकि विकसित देशों की तरफ अपनाये गए विकास मॉडल जिन्होंने उनको विकसित बनाया है में से अधिकतर सिर्फ वर्तमान को मुख्य रख कर बनाये गये थे। ये भविष्य के लिए खतरा भी सिद्ध हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि अन्तर्राष्ट्रीय भाईचारे के साथ हम अपने ग्रह के प्राकृतिक साधन बचा सकें, ताकि गरीबी से छुटकारा पाकर खुशहाल जिन्दगी व्यतीत कर सकें और राष्ट्रीय शान्ति प्राप्त कर सकें।

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प्रश्न 2.
भारत में नवीकरणीय ऊर्जा पैदा करने की क्या संभावनाएं हैं ? वायु ऊर्जा उत्पादन से पहचान करवाओ।
उत्तर-
विश्व में तेल, कोयला तथा गैस की मांग लगातार बढ़ने के कारण ऊर्जा संकट पैदा हो गया। इसलिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग आवश्यक हो गया। इसमें कोयला, प्राकृतिक गैस, पैट्रोल इत्यादि के प्रयोग को कम करने के लिए सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने की बहुत आवश्यकता है तथा इनकी महत्ता में भी वृद्धि हो रही है। यह स्रोत नवीकरणीय हैं, कोई प्रदूषण नहीं करते, पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ऐसी ऊर्जा का उपयोग दूर-दराज के क्षेत्रों में किया जाता है। यह ऊर्जा भविष्य की ज़रूरतों को पूरा करने योग्य है। इस ऊर्जा का महत्त्व समझते हुए भारत सरकार ने 1987 में नवीकरणीय ऊर्जा विकास संबंधी ऐजेंसी IREDA का संगठन किया तथा 1992 में गैर परंपरागत विकास ऊर्जा स्रोत मन्त्रालय का गठन किया। यह मन्त्रालय अब तेजी के साथ इस दिशा में काम कर रहा है।

भारत में 6 अप्रैल, 1917 तक कुल सौर ऊर्जा की योग्यता 12.28 GW गीगावाट थी। भारत सरकार ने 2022 तक 1,00,000 मैगावाट सौर ऊर्जा के साथ बिजली तैयार करने का लक्ष्य रखा है। 2016-17 में आंध्र प्रदेश ने 1,294.26 मैगावाट उत्पादन का योगदान डाला था। (इस नाप में 1000 किलोवाट = 1 मैगावाट, 1 गीगावाट = 1000 मैगावाट।) दूसरे नंबर पर कर्नाटक (888.38 MW) तथा फिर तेलंगाना (759.13 MW) फिर राजस्थान, तमिलनाडु, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड इत्यादि राज्य शामिल हैं विश्व बैंक ने इसके लिए एक अरब डालर का कर्जा दिया है जोकि विश्व के किसी और देश से अधिक है क्योंकि भारत का 1,00,000 मैगावाट का लक्ष्य भी संसार में सबसे अधिक है। स्पष्ट है कि भविष्य की जरूरतों को मुख्य रखकर देश की तरफ से ऊर्जा क्षेत्रों में बड़ी कोशिशें की गई हैं।
देश में नवीकरणीय स्रोतों का विकास निम्नलिखित हैं—

क्षेत्र सामर्थ्य विकास
वायु ऊर्जा 20.000 MW 900 MW
सौर ऊर्जा 20 MW/sq. KM 810 MW
पानी गर्म करके सिस्टम 4,20,000
सोलर कुक्कर 4,57,000
बायोगैस 12 Million 2.5 million
धुएं रहित चुल्हे 120 million 23.7 million

वायु ऊर्जा-वायु ऊर्जा एक परंपरागत ऊर्जा साधन है। वायु वेग के साथ टरबाइन चला कर बिजली पैदा की जाती हैं। वायु ऊर्जा का सफलतापूर्वक प्रयोग सबसे पहले नीदरलैंड्स में किया गया है। कैलिफोर्निया में भी ऊर्जा का विकास किया गया है। इसके लिए महंगी तकनोलॉजी तथा अधिक पूंजी की ज़रूरत होती है क्योंकि वायु साफ होती है और प्रदूषण रहित है। इसलिए इसकी काफी उपलब्धि है। 2016-17 में वायु ऊर्जा 5400 मैगावाट और 2017-18 में 6000 मैगावाट होने के उम्मीद है। देश में अलग-अलग राज्यों के अनुसार वायु ऊर्जा उत्पादन का वितरण इस प्रकार है—
Installed wind capacity by State as of Oct. 2016

State Total capacity (MW)
Tamilnadu 7,684.31
Maharashtra 4,664,08
Gujarat 4,227.31
Rajasthan 4,123.35
Karnataka 3,082.45
Madhya Pradesh 2,288.60
Andhra Pradesh 1,366.35
Telangana 98.70
Kerala 43.50

 

प्रश्न 3.
कोयला उत्पादन में भारत के अलग-अलग राज्यों की स्थिति क्या है ? नोट लिखो।
उत्तर-
कोयले के उपयोग तथा उद्योगों के बीच इसके विशेष महत्त्व के कारण कोयले को काला सोना भी कहते हैं क्योंकि जिस तरह सोना आर्थिकता को मज़बूती देता है, उसी तरह कोयला भी ऊर्जा क्षेत्र में काफी महत्त्व रखता है। कोयला एक तहदार चट्टान है जोकि करोड़ों साल पहले जंगलों के धरती के नीचे दब जाने के कारण बनी थी। जिस पर भार और उच्च तापमान के कारण कोयले में तबदील हो गया। कोयले की मांग तथा ज़रूरतें भी तेजी से बढ़ रही हैं। आजकल तो कोयले से बिजली भी पैदा की जा रही है।
कोयले के प्रकार (Types of coal)—

  1. एंथेसाइट
  2. बिटुमिनस
  3. लिग्नाइट
  4. पीट

भारत में कोयले के उत्पादन के अधीन भारत के अलग-अलग राज्यों की स्थिति इस प्रकार है—
1. झारखंड-भारत के कुल कोयला उत्पादन में झारखंड पहला स्थान रखता है जो कि कुल कोयला उत्पादन में 27.3 प्रतिशत हिस्सा डालता है। झारखंड में कोयला उत्पादन के मुख्य स्थान हैं-दामोदर घाटी में झरिया, बोकारो, कर्णपुर, गिरिडीह, डालटनगंज, जमशेदपुर, आसनसोल, दुर्गपुर तथा बोकारो, राजमहल इत्यादि।

2. उड़ीसा-उड़ीसा भारत के कुल कोयला उत्पादन में 24 प्रतिशत हिस्सा डालता है। इसके प्रमुख स्थान हैं सांबलपुर, तालचेर, गणापुर, हिमगिरि इत्यादि।

3. छत्तीसगढ़-छत्तीसगढ़ भारत के कुल कोयला उत्पादन में 18 प्रतिशत तक का हिस्सा डालता है। इस राज्य में 12 कोयले की खाने हैं और इन खानों में 44 अरब, 48 करोड़, 30 लाख टन कोयला भंडार होने का एक अनुमान है। इसके मुख्य कोयला उत्पादक केंद्र हैं-सिंगरौली, कोरबा, सुहागपुर, रामपुर, पत्थर खेड़ा, सोनहट, सुरगुजा इत्यादि। इस राज्य का कोयला उत्पादन में दूसरा स्थान है।

4. मध्य प्रदेश-मध्य प्रदेश के उमारिया, सुहागपुर, सिंगरौली इत्यादि प्रमुख कोयला उत्पादक स्थान हैं।

5. आन्ध्र प्रदेश-इस क्षेत्र के पश्चिमी गोदावरी नदी घाटी में सिंगरौली, कोठगुडम तथा तंदूर खाने हैं।

6. तेलंगाना-प्रणीहता गोदावरी घाटी अपने पास कोयले के भंडारों के कारण काफी प्रसिद्ध है। अदीनबाद, करीमनगर खम्म, निजामाबाद, वारंगल प्रांत में उत्तरी आसिफाबाद उत्तर तथा दक्षिणी गोदावरी में सिंगरेनी प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं। महाराष्ट्र में वर्धा घाटी में चंद्रपुर तथा बल्लारपुर इत्यादि। पश्चिमी बंगाल के रानीगंज आसनसोल इत्यादि स्थानों से कोयला निकाला जाता है।

भारत ने 2015-16 के साल में पहली बार 2 से 3 मिलियन टन कोयला पड़ोसी देश बंगलादेश को निर्यात किया। कोयले का उत्पादन साल 2015-16 में 8.5 प्रतिशत तक बढ़ गया।
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प्रश्न 4.
बीमार प्रांत कौन से हैं ? इनमें से तांबे का उत्पादन कौन से राज्य करते हैं?
उत्तर-
20वीं सदी में भारत के बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश राज्यों के लिए एक कहावत प्रसिद्ध हो गई कि ये बीमार राज्य थे तथा यह नाम काफी प्रचलित रहा। इनको यह नाम देने का कारण यह था कि यहाँ विकास की दर काफी धीमी थी जबकि यहाँ जनसंख्या बहुत अधिक थी। पर आज के समय में यह स्थिति बदलती जा रही है। उस समय झारखंड भी बिहार राज्य का ही एक हिस्सा था और भरपूर स्रोतों के बावजूद विकास का न होना इन राज्यों पर एक धब्बा था।
बीमार प्रान्तों में आजकल हालात बदलते जा रहे हैं। इनमें विकास हो रहा है। इनमें मुख्य तांबा उत्पादक राज्य इस प्रकार हैं—

1. मध्य प्रदेश-मध्य प्रदेश में सबसे अधिक तांबे का उत्पादन होता है तथा 20वीं सदी में यह बीमार सबे की पंक्ति में आता है। मध्य प्रदेश के मालंजखंड, तारोगाऊ पट्टी सब बड़े तांबा उत्पादक क्षेत्र हैं। इनके अतिरिक्त बालाघाट प्रांत में ही 8.33 मिलियन कच्चे तांबे के भंडार हैं जहाँ पर 1,006 हजार टन तांबा प्राप्त किया जाता है।

2. राजस्थान-भारत में राजस्थान तांबे के उत्पादन में दूसरा प्रमुख क्षेत्र है। इस स्थान पर भारत का 40 प्रतिशत तांबा प्राप्त किया जाता है। तांबे के भंडार मुख्य रूप में अरावली पर्वत श्रेणी में मौजूद हैं। अलवर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, झुनझुनु, पाली, सीकर, सिरोही तथा उदयपुर प्रांतों में तांबे के प्रमुख भंडार हैं जो राजस्थान में मौजूद हैं।

3.  झारखंड-झारखंड राज्य के हजारी बाग तथा सिंहभूमि जिलों में से तांबा प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 5.
खनिज पदार्थ के विभाजन के अलग-अलग तरीके क्या हैं ? विस्तार से चर्चा करो और उदाहरण भी दो।
उत्तर-
किसी भी औद्योगिक विकास के लिए खनिज विशेष महत्त्व रखते हैं। इन्हें उद्योगों की रीढ़ की हड्डी कहते हैं। खनिज सामान बनाने, मशीनों, आटोमोबाइल, डिफैंस का सामान बनाने, रेलवे के इंजन, जहाज़ इत्यादि बनाने के लिए प्रयोग किये जाते हैं। खास कर इनके भौतिक तथा रासायनिक गुणों के आधार पर खनिजों को आगे दो भागों में विभाजित किया जाता है—

  1. धातु खनिज (Metallic Minerals)
  2. अधातु खनिज (Non-Metallic Minerals)

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खनिजों को उनके रंग, सख्त, प्राकृतिक तथा भौतिक, रासायनिक गुणों के आधार पर आगे दो भागों धातु और अधातु में विभाजित किया जाता है। इनके अतिरिक्त कुछ खनिजों को ऊर्जा स्रोतों के रूप में भी उपयोग किया जाता है जैसे कि कोयला तथा पैट्रोलियम इत्यादि।

1. धातु खनिज (Metallic Minerals)-इनमें सारे धातु शामिल हैं। इन खनिजों में कुछ नर्म होते हैं और कुछ सख्त होते हैं जैसे कि कच्चा लोहा, बॉक्साइट, इस्पात, सोना इत्यादि।

  • लौह धातु (Ferrous Minerals)-जिन खनिजों में लौह अंश मौजूद होते हैं उन्हें लौह धातु कहते हैं जैसे कि मैंगनीज, कच्चा लोहा इत्यादि।
  • अलौह धातु (Non-Ferrous Minerals)-जिन खनिजों में लोहे के अंश मौजूद नहीं होते हैं वह अलौह धातु कहलाते हैं। इनकी उदाहरण हैं सोना, लैड, जिंक इत्यादि। ये धातुएं, बिजली का सामान बनाने, अभियान्त्रिकी का सामान बनाने तथा रासायनिक उद्योगों के लिए काफी उपयोगी हैं।।

2. अधातु खनिज (Non-Metallic Minerals)-जिन खनिजों में धातु कम होती हैं अधातु खनिज कहते हैं। यह खासकर नर्म तथा चमकीले होते हैं, जैसे कि सल्फर, चूना पत्थर, साल्टपीटर इत्यादि।

3. खनिज पदार्थ (Mineral Fuels)-इनके अन्तर्गत खासकर कोयला, पैट्रोल, प्राकृतिक गैस इत्यादि आ जाते हैं। कोयला जिसको काला सोना कहते हैं ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है। यह एक तहदार चट्टान है जो कि करोड़ों साल पहला जंगलों की धरती के नीचे दब जाने के बाद भार और उच्च तापमान के कारण कोयले में बदल गया। अब कोयले की सहायता से बिजली पैदा की जा रही है। पैट्रोलियम तहदार चट्टानों में से निकाले खनिज तेल को साफ करके बनाया जाता है। इसमें सबसे अधिक ज्वलनशीलता होती है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक गैस भी ऊर्जा का एक मुख्य स्रोत है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 5 आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत

Geography Guide for Class 12 PSEB आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत Important Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective Type Question Answers)

A. बहु-विकल्पी प्रश्न :

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में दक्षिणी अफ्रीका का सबसे अग्रणी पैट्रोलियम उत्पादक राज्य कौन सा है ?
(A) भारत
(B) पेरू
(C) वेनेजुएला
(D) लीबिया।
उत्तर-
(C)

प्रश्न 2.
भारत के कुल घरेलू उत्पादन में खनिज कितना हिस्सा डालते हैं ?
(A) 5% से 10%
(B) 2.2% से 2.5%
(C) 8% से 10%
(D) 2.5% से 2.9%।
उत्तर-
(B)

प्रश्न 3.
मैग्नेटाइट में शुद्ध कच्चे लोहे के कितने प्रतिशत अंश होते हैं ?
(A) 72%
(B) 70%
(C) 69%
(D) 79%.
उत्तर-
(A)

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सी लोहे की किस्म नहीं है ?
(A) मैग्नेटाइट
(B) हैमेटाइट
(C) लिमोनाइट
(D) लिगनाइट।
उत्तर-
(B)

प्रश्न 5.
भारत में कच्चे लोहे का उत्पादन सबसे अधिक किस राज्य में होता है ?
(A) कर्नाटक
(B) रांची
(C) बिहार
(D) गोआ।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से किस धातु का उपयोग मनुष्य द्वारा प्राचीन काल से किया जा रहा है ?
(A) लोहा
(B) कोयला
(C) तांबा
(D) पीतल।
उत्तर-
(C)

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प्रश्न 7.
भारत में तांबे का क्षेत्र कितने वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है ?
(A) 69 हजार
(B) 65 हजार
(C) 70 हजार
(D) 62 हजार।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से भारत किस देश से तांबा आयात करता है ?
(A) अमेरिका
(B) बंगलादेश
(C) पाकिस्तान
(D) अफ्रीका।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 9.
एल्यूमीनियम को किस धातु से बनाया जाता है ?
(A) बॉक्साइट
(B) मैंगनीज़
(C) इस्पात
(D) मीका।
उत्तर-
(A)

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन से स्रोत परंपरागत ऊर्जा के स्रोत नहीं हैं ?
(A) कोयला
(B) खनिज तेल
(C) सौर ऊर्जा
(D) प्राकृतिक गैस।
उत्तर-
(C)

प्रश्न 11.
निम्नलिखित खनिजों में से किसका झारखंड बड़ा उत्पादक राज्य है ?
(A) बाक्साइट
(B) कच्चा लोहा
(C) इस्पात
(D) तांबा।
उत्तर-
(B)

प्रश्न 12.
सबसे कठोर खनिज कौन सा है ?
(A) डायमंड
(B) ग्रेनाइट
(C) गैबरो
(D) बसाल्ट।
उत्तर-
(A)

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प्रश्न 13.
हैमेटाइट में शुद्ध लौह धातु के कितने अंश होते हैं ?
(A) 60 से 70%
(B) 20 से 30%
(C) 30 से 40%
(D) 40 से 50%.
उत्तर-
(A)

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में महाराष्ट्र के कौन-से जिले में मैंगनीज़ का उत्पादन नहीं होता ?
(A) नागपुर
(B) बंधारा
(C) रत्नागिरी
(D) पूना।
उत्तर-
(C)

प्रश्न 15.
ऊर्जा के स्रोतों में किसको काला सोना कहते हैं ?
(A) कोयला
(B) तांबा
(C) पैट्रोल
(D) सौर ऊर्जा।
उत्तर-
(A)

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प्रश्न 16.
ब्राजील के शहर रीओ डी जेनेरियो में राष्ट्रीय सम्मेलन कब हुआ ?
(A) 1992
(B) 1993
(C) 1994
(D) 1995.
उत्तर-
(A)

प्रश्न 17.
मध्य प्रदेश में नागदा पहाड़ियों में कितने मैगावाट का पवन ऊर्जा फार्म लगाया गया है ?
(A) 15
(B) 17
(C) 18
(D) 20.
उत्तर-
(A)

प्रश्न 18.
ONGC मैंगलोर शोधनशाला भारत के किस राज्य में है ?
(A) महाराष्ट्र
(B) कर्नाटक
(C) तमिलनाडु
(D) केरल।
उत्तर-
(B)

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प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य 20वीं सदी में बीमार राज्य के तौर पर जाना जाता था ?
(A) बिहार
(B) पंजाब
(C) महाराष्ट्र
(D) गुजरात।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में से कौन सी मैंगनीज की महत्ता नहीं है ?
(A) इस्पात बनाता है |
(B) कीटनाशक बनाती है
(C) ब्लीचिंग पाऊडर बनाता है
(D) कपड़े बनाता है।
उत्तर-
(D)

B. खाली स्थान भरें :

  1. खनिज, लोहा, तांबा, सोना इत्यादि को ………….. तथा ………. धातु में विभाजित किया जाता है।
  2. भारत में बिहार ………… ……….. तथा …………. राज्यों के लिए 20वीं सदी में बीमार राज्य’ नाम प्रसिद्ध हुआ।
  3. मैग्नेटाइट में …….. गुण होने के कारण इसको मैग्नेटाइट कहते हैं।
  4. ……. संसार का पांचवां बड़ा लोहा आयातक देश है।
  5. भारत में बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक ………. राज्य है।
  6. ……….. स्रोत बेजान होते हैं।
  7. पवन ऊर्जा ……….. स्रोतों की उदाहरण है।
  8. ……. सबसे बढ़िया किस्म का कोयला है।

उत्तर-

  1. लौह, अलौह,
  2. मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश,
  3. चुंबकीय,
  4. भारत,
  5. उड़ीसा,
  6. अजैविक,
  7. नवीकरणीय
  8. एंथ्रासाइट

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C. निम्नलिखित कथन सही (V) हैं या गलत (x):

  1. अभ्रक, चूना पत्थर, ग्रेफाइट इत्यादि अजैविक खनिज हैं।
  2. पहले झारखंड भी बिहार राज्य का ही हिस्सा होता था।
  3. पीट सबसे अच्छा किस्म का कोयला है।
  4. साइडेराइट कच्चे लोहे में किसी प्रकार की अशुद्धि नहीं होती।
  5. मैंगनीज हल्के स्लेटी रंग की धातु है।

उत्तर-

  1. सही,
  2. सही,
  3. गलत,
  4. गलत,
  5. सही।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले उत्तर (One Word/Line Question Answers) :

प्रश्न 1.
भौतिक तथा रासायनिक गुणों के आधार पर खनिजों को कौन-से दो हिस्सों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
धातु और अधातु खनिज।

प्रश्न 2.
लौह खनिज के चार प्रकार बताओ।
उत्तर-
मैग्नेटाइट, हैमेटाइट, लिमोनाइट, साइडेराइट।

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प्रश्न 3.
भारत में लौह खनिज के उत्पादक तीन राज्य बताओ।
उत्तर-
झारखंड, उड़ीसा, कर्नाटक।

प्रश्न 4.
तांबा उत्पादक तीन देश बताओ।
उत्तर-
संयुक्त राज्य, चिल्ली, रूस।।

प्रश्न 5.
कोयले के चार प्रमुख प्रकार बताओ।
उत्तर-
पीट, लिगनाइट, बिटुमिनस, एंथ्रासाइट।

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प्रश्न 6.
वित्तीय वर्ष 2015-16 में कोयले का भारत में उत्पादन कितना था ?
उत्तर-
63 करोड़ 92 लाख 34 हजार टन।

प्रश्न 7.
मुंबई हाई कहां स्थित है ?
उत्तर-
यह मुंबई शहर से 176 किलोमीटर उत्तर पश्चिम की ‘फ अरब सागर में है।

प्रश्न 8.
भारत में पैट्रोल का कुल उत्पादन कितना है ?
उत्तर-
3.24 करोड़ टन।

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प्रश्न 9.
भारत में तेल की सबसे बड़ी रिफाइनरी कौन सी है ?
उत्तर-
जमुना नगर (गुजरात)

प्रश्न 10.
भारत में कच्चे लोहे का कुल उत्पादन कितना होता है ?
उत्तर-
7.5 करोड़ टन।

प्रश्न 11.
परंपरागत ऊर्जा के स्रोतों की उदाहरण दो।
उत्तर-
कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस तथा लकड़ी इत्यादि।

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प्रश्न 12.
जैविक स्त्रोत कौन-से होते हैं ?
उत्तर-
वे स्रोत जिनमें जान होती है जैविक स्रोत कहलाते हैं, जैसे-जंगल।

प्रश्न 13.
भारत में किस राज्य में कोयले का सबसे अधिक उत्पादन होता है ?
उत्तर-
झारखण्ड।

प्रश्न 14.
भारत में कोयले के उत्पादन में वृद्धि के कोई दो कारण बताओ।
उत्तर-
रेलवे तथा दो विश्वयुद्ध।

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प्रश्न 15.
कोई दो अलौह धातुएं के नाम बताओ।
उत्तर-
मैंगनीज तथा निक्कल।

प्रश्न 16.
भारत में कुल कितनी तेल रिफाइनरी हैं ?
उत्तर-
23 तेल रिफाइनरियां।

प्रश्न 17.
भारत में कौन-सा राज्य पवन ऊर्जा पैदा करने में आगे है ?
उत्तर-
तमिलनाडु।

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प्रश्न 18.
केरल के किस जिले पर पवन ऊर्जा फार्म योग्यता है ?
उत्तर-
पालाकोड़ जिले में कोजीकोड़ के स्थान पर योग्यता है।

प्रश्न 19.
उड़ीसा में पवन ऊर्जा योग्यता अधिक क्यों है ?
उत्तर-
क्योंकि उड़ीसा एक तटीय प्रांत है।

प्रश्न 20.
भारत में कितनी ज्वारीय ऊर्जा पैदा करने की योग्यता है ?
उत्तर-
8000 से 9000 मैगावाट।

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प्रश्न 21.
भारत सरकार ने 2022 तक कितनी ऊर्जा पैदा करने का लक्ष्य रखा है ?
उत्तर-
17.5 गीगावाट।

प्रश्न 22.
अधातु खनिजों को आगे कौन से दो भागों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
जैविक तथा अजैविक खनिज।

प्रश्न 23.
तांबे की कोई एक विशेषता बताओ।
उत्तर-
तांबे को जंग नहीं लगता।

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प्रश्न 24.
मैंगनीज़ का कोई एक उपयोग बताओ।
उत्तर-
इससे ब्लीचिंग पाऊडर बनता है।

प्रश्न 25.
गैर-अपारंपरिक स्रोतों की कोई दो उदाहरणे दो।
उत्तर-
कोयला, प्राकृतिक गैस।

प्रश्न 26.
सबसे बेहतरीन प्रकार का कोयला कौन सा है तथा इसमें शुद्ध कोयले का कितने % अंश होते हैं ?
उत्तर-
ऐन्थेसाइट, इसमें शुद्ध कोयले के 85% अंश होते हैं।

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प्रश्न 27.
लिग्नाइट कोयले का कोई एक गुण बताओ।
उत्तर-
यह अधिक धुआं छोड़ता है तथा जलने के बाद राख अधिक बचती है।

प्रश्न 28.
बिटुमिनस किस्म का कोयला कौन-से राज्यों में मिलता है ?
उत्तर-
झारखण्ड, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश।

प्रश्न 29.
भारत में सबसे बढ़िया क्वालिटी के कच्चे लोहे के भंडार कहां पर मिलते हैं ?
उत्तर-
छत्तीसगढ़ में बलाड़िला, कर्नाटक में बेलारी, झारखण्ड तथा उड़ीसा में मिलते हैं।

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प्रश्न 30.
भारत के प्रमुख बॉक्साइट आयातक देश कौन से हैं ?
उत्तर-
चीन, कुवैत तथा कतर।

प्रश्न 31.
सुरक्षित पैट्रोलियम भंडारगृह देश के संकट समय कितने दिन तक सहायता कर सकते हैं ?
उत्तर-
10 दिन तक।

प्रश्न 32.
पवन की तेज़ गति के साथ टरबाइन चला कर बिजली क्यों पैदा की जाती है ?
उत्तर-
क्योंकि पवन साफ, प्रदूषण रहित तथा बड़ी मात्रा में उपलब्ध होती है।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
खनिज किसे कहते हैं ?
उत्तर-
खनिज धरती पर प्राकृतिक रूप में मिलने वाला पदार्थ है जिसकी अलग रासायनिक रचना होती है। हम खनिज को चट्टानों से प्राप्त करते हैं। खनिज एक या एक से अधिक तत्वों से मिलकर बनता है तथा इसका निश्चित रासायनिक संगठन होता है।

प्रश्न 2.
खनिज कितने किस्मों के होते हैं ? उदाहरणों के साथ लिखो।
उत्तर-
खनिज को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जाता है—

  1. धातु खनिज (Metallic Minerals)-जिन खनिजों में धातवीय गुण मौजूद होते हैं, उन्हें धातु खनिज कहते हैं। यह नर्म तथा कठोर दोनों तरह के होते हैं। इसमें लोहा, तांबा, एल्यूमीनियम, सोना, चांदी, खनिज पदार्थ शामिल किए जाते हैं जिनसे कई धातुएं तैयार की जाती हैं।
  2. अधातु खनिज (Non-Metallic Minerals) इसमें धातु गुण कम होते हैं, यह नर्म, गैर-चमकीले होते हैं। इसमें नमक, अभ्रक, चूने का पत्थर, ग्रेफाइट, डोलोमाइट, पोटाश, जिप्सम इत्यादि खनिज शामिल हैं। इनसे धातुएं नहीं बनाई जातीं।
  3. ईंधन खनिज पदार्थ (Fuel Minerals)—इसमें कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस शामिल हैं। इन्हें शक्ति के साधन भी कहा जाता है।

प्रश्न 3.
खनन की किस्में बताओ।
उत्तर-
खनन मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है—

  1. Open Cast Mining
  2. Shaft Mining
  3. Off-shore Drilling

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प्रश्न 4.
खनिजों का महत्त्व बताओ।
उत्तर-

  1. खनिज किसी भी देश के औद्योगिक विकास की रीढ़ की हड्डी हैं।
  2. खनिज उपकरण, मशीनें, कृषि उपकरण, बचाव उपकरण, मोटरगाड़ियां, रेल इंजन इत्यादि बनाने के लिए ज़रूरी
  3. खनिज पदार्थ जेवर, सिक्के, बर्तन तथा सजावट का सामान बनाने के लिए आवश्यक हैं।
  4. घर, मकान, पुल इत्यादि बनाने के लिए ज़रूरी हैं।

प्रश्न 5.
क्या भारत खनिज स्रोतों में सबसे समर्थ है ?
उत्तर-
भारत अपनी आवश्यकताओं पूरी करने के लिए अधिकतर खनिज स्रोतों में समर्थ है। भारत में कोयला, कच्चा लोहा, चूना पत्थर, बॉक्साइट तथा मैंगनीज़ में कुछ खनिजों को आयात किया जाता है। भारत में कोयले तथा तेल के भंडार कम हैं, पर नये तेल भंडार को ढूंढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

प्रश्न 6.
बीमार राज्यों पर नोट लिखो।
उत्तर-
भारत में 20वीं सदी के समय बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश को बीमार राज्य कहा जाता हैं क्योंकि यहां जनसंख्या अधिक होने के पश्चात् भी विकास की दर काफी कम थी। इन हालातों में अब काफी हद तक परिवर्तन हो गया है। यहां स्रोतों की मौजूदगी थी पर फिर भी विकास में कमी थी।

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प्रश्न 7.
कच्चे लोहे के मुख्य प्रकारों के बारे में बताओ।
उत्तर-
कच्चे लोहे में धातु के अंश के अनुसार लोहा चार प्रकार का होता है—

  1. मैग्नेटाइट-इस बढ़िया प्रकार के लोहे में 70% से 72% धातु अंश होता है। इसका रंग लाल होता है।
  2. हैमेटाइट-इस किस्म में 60 से 70 प्रतिशत तक धातु अंश होते हैं।
  3. लिमोनाइट-इस पीले रंग के लोहे में 40 से 60 प्रतिशत तक लोहे का अंश होता है।
  4. साइडेराइट-इस घटिया भूरे रंग के लोहे में धातु अंश 20% से 30% होता है।

प्रश्न 8.
तांबे की मुख्य विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
तांबे की मुख्य विशेषताएं हैं—

  1. यह धातु हल्के गुलाबी या भूरे रंग की होती है जो समूह में मिलती है।
  2. प्राचीन काल से मनुष्य इसका प्रयोग कर रहा है।
  3. इसको जंग नहीं लगता।
  4. यह बिजली तथा ताप का अच्छा सुचालक है।
  5. इससे मिश्रित धातु बनाई जा सकती है।

प्रश्न 9.
बॉक्साइट धातु का उपयोग तथा मुख्य उत्पादक राज्यों के नाम लिखो।
उत्तर-
बॉक्साइट धातु की सहायता से एल्यूमीनियम बनाया जाता है। बाक्साइट एल्यूमीनियम ऑक्साइड की चट्टान है। इसका गुलाबी, सफेद या लाल रंग होता है। भारत में बाक्साइट विशेषकर उड़ीसा, गुजरात, झारखण्ड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ तमिलनाडु, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों में मिलता है।

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प्रश्न 10.
मैंगनीज किस तरह की धातु है तथा यह भारत में कहां-कहां मिलती है ?
उत्तर-
मैंगनीज़ हल्के स्लेटी रंग की धातु है जो खास कर कच्चे लोहे के साथ ही खानों में मिलती है। जब लोहे से इस्पात बनाया जाता है तब मैंगनीज़ का प्रयोग किया जाता है। लोहे का भारत में उत्पादन विशेष उड़ीसा, कर्नाटक, मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, झारखण्ड, गोआ, राजस्थान, गुजरात तथा पश्चिमी बंगाल इत्यादि में किया जाता है।

प्रश्न 11.
ऊर्जा के स्रोतों तथा किसी देश के विकास का आपस में क्या संबंध है ?
उत्तर-
ऊर्जा के स्रोत किसी भी देश के आर्थिक विकास की आरम्भिक सीढ़ी है। किसी भी देश के लिए विकास करने रहने के लिए आवश्यक है कि वे ऊर्जा के क्षेत्र में विकास करते हैं क्योंकि जनसंख्या की वृद्धि के कारण कृषि से संबंधित मशीनें, औद्योगीकरण तथा यातायात के साधनों में वृद्धि के कारण अब इन उद्योगों को चलाने तथा बनाने के लिए ऊर्जा के साधनों की मांग बढ़ती जा रही है। इसलिए हम कह सकते हैं कि ऊर्जा के स्रोतों तथा किसी देश के विकास के बीच गहरा संबंध है।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के स्रोत कितने प्रकार के होते हैं ? बताओ।
उत्तर-
ऊर्जा के स्रोत इस प्रकार हैं—

  1. नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत
  2. गैर-नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत
  3. पारंपरिक स्रोत
  4. गैर-पारंपरिक स्रोत
  5. जैविक स्रोत
  6. अजैविक स्रोत

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प्रश्न 13.
ऐन्थेसाइट कोयले के गुणों पर नोट लिखो।
उत्तर-
ऐन्थेसाइट कोयले के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं—

  1. यह सबसे उच्च कोटि का कोयला है।
  2. यह काफी कठोर होता है।
  3. यह अधिक समय जलता है तथा ऊर्जा अधिक देता है।
  4. जलने के बाद यह राख कम छोड़ता है।

प्रश्न 14.
खनिज पदार्थ के आर्थिक महत्त्व बताओ।
उत्तर-
खनिज पदार्थ भू तल के नीचे मिलने वाली प्राकृतिक सम्पत्ति है। खनिज पदार्थ औद्योगिक विकास की नींव हैं। इसलिए खनिज पदार्थों को उद्योगों के विटामिन भी कहा जाता है। वर्तमान युग में यंत्र, यातायात के साधन, भवन निर्माण, शक्ति के साधन इत्यादि खनिज पदार्थों पर निर्भर करते हैं। भविष्य में अणु शक्ति भी यूरेनियम, थोरियम इत्यादि खनिज पदार्थों पर निर्भर करेगी। इसलिए इसे वर्तमान सभ्यता भी कहा जाता है।

प्रश्न 15.
लोहे के आर्थिक महत्त्व बताओ।
उत्तर-
लोहा सबसे अधिक उपयोगी खनिज है। लोहा किसी देश के औद्योगिक विकास की आधारशिला है। मशीनों, उपकरणों के निर्माण का आधार लोहा है। लोहे से यातायात के साधन, कृषि के उपकरण, भारी मशीनें, पुल, बाँध बनाने वाले औद्योगिक प्लांट बनाए जाते हैं। इसलिए इस युग को लोहा-इस्पात युग भी कहते हैं। लोहे को औद्योगिक विकास की कुंजी भी कहा जाता है।

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प्रश्न 16.
संसार में कोयले का शक्ति के साधन के रूप में क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
आधुनिक युग में कोयले को शक्ति का प्रमुख साधन माना जाता है। कोयले को उद्योग का जन्मदाता भी कहते हैं। कई उद्योगों के लिए कोयला एक कच्चे माल का काम करता है। कोयले को औद्योगिक क्रांति का आधार माना जाता है। संसार के अधिकतर औद्योगिक प्रदेश कोयला क्षेत्रों के नज़दीक स्थित हैं। किसी हद तक आधुनिक सभ्यता कोयले पर निर्भर करती है।

प्रश्न 17.
संसार में अधिकतर औद्योगिक प्रदेश कोयला क्षेत्रों के पास स्थित हैं ? क्यों ?
उत्तर-
कोयला आधुनिक युग में शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। औद्योगिक क्रांति का जन्म कोयले पर आधारित है। संसार के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र कोयला खानों के आस-पास स्थित हैं। भारत में दामोदर घाटी का औद्योगिक क्षेत्र, झरिया तथा रानीगंज कोयला क्षेत्र के आस-पास स्थित हैं।

प्रश्न 18.
एल्यूमीनियम के उपयोग बताओ।
उत्तर-
एल्यूमीनियम एक हल्की धातु है इसके उपयोग निम्नलिखित हैं—

  1. इसका उपयोग हवाई जहाज़, रेलगाड़ियां, मोटरकार, भवन निर्माण इत्यादि में किया जाता है।
  2. इसको जंग नहीं लगता।
  3. इससे पतली चादरें, बर्तन, सिक्के, फर्नीचर, डिब्बे बनाए जाते हैं।
  4. यह बिजली तथा ताप का उत्तम संचालक है।
  5. इसका प्रयोग बिजली के यंत्र, रेडियो, टी.वी. इत्यादि बनाने के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 19.
खनिज तेल का महत्त्व बताओ।
उत्तर-
पैट्रोलियम का महत्त्व-तेल का व्यापारिक उपयोग सन् 1859 में शुरू हुआ जबकि संसार में खनिज तेल का पहला कुआँ 22 मीटर तक गहरा यू० एस० ए० में टिटसविले नामक स्थान पर खोदा गया। आधुनिक समय में पैट्रोलियम शक्ति का सबसे बड़ा साधन है। इसका उपयोग मोटर गाड़ियों, हवाई जहाजों, रेल इंजनों, कृषि के उपकरणों में किया जाता है। इससे दैनिक प्रयोग की लगभग 5,000 वस्तुएं तैयार की जाती हैं। इसके साथ ग्रीस, रंग, दवाइयां, नकली रबड़, प्लास्टिक, लाईलोन, खाद इत्यादि का उत्पादन होता है।

प्रश्न 20.
मध्य पूर्व में तेल उत्पादक देशों के नाम बताओ।।
उत्तर-
मध्य पूर्व या दक्षिणी-पश्चिमी एशिया में प्रमुख तेल उत्पादक देश कुवैत, साऊदी अरेबिया, ईरान तथा ईराक हैं। इसके अतिरिक्त आबूधाबी, कतर, बहरीन, ओमान इत्यादि देशों में भी कुछ तेल मिलता है।

प्रश्न 21.
पवन ऊर्जा से क्या भाव है ?
उत्तर-
पवन ऊर्जा एक परंपरागत ऊर्जा साधन है। पवन वेग के साथ टरबाइन चलाकर बिजली पैदा की जाती है। पवन ऊर्जा का सफलतापूर्वक प्रयोग सबसे पहले नीदरलैंड में किया गया है। कैलिफोर्निया में भी पवन ऊर्जा का विकास किया गया है। इसके लिए महंगी तकनीक तथा अधिक पूंजी की जरूरत है।

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प्रश्न 22.
पन बिजली को सफेद कोयला क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
पन बिजली ऊर्जा का एक समाप्त न होने वाला स्रोत है। इसका नवीकरण होता रहता है। इसके महत्त्व के कारण इसकी तुलना कोयला के साथ की जाती है। परन्तु पन-बिजली को आसानी से बिना किसी धुएं के प्रयोग किया जा सकता है। इसलिए इसको सफेद कोयला कहा जाता है।

प्रश्न 23.
लोहा इस्पात का महत्त्व बताओ।
उत्तर-
लोहा इस्पात उद्योग आधुनिक उद्योग का नींव पत्थर है। लोहा कठोर, प्रबल तथा सस्ता होने के कारण दूसरी धातु की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। इसके साथ कई तरह की मशीनें, यातायात के साधन, कृषि उपकरण, ऊंचेऊंचे पुल, सैनिक हथियार, टैंक, रॉकेट तथा दैनिक प्रयोग के लिए कई वस्तुएं तैयार की जाती हैं। लौह-इस्पात का उत्पादन ही किसी देश के आर्थिक विकास का मापदंड है। आधुनिक सभ्यता लोहे-इस्पात पर निर्भर करती है। इसलिए वर्तमान युग को इस्पात युग कहते हैं।

प्रश्न 24.
स्त्रोत प्राकृतिक तौर पर हमें मिलते रहते हैं, फिर भी इनकी संभाल की ज़रूरत क्यों है ?
उत्तर-
हम अगर प्राकृतिक स्रोतों का प्रयोग इस तरह करते रहे तो ये स्रोत हमारे आने वाली पीढ़ियों तक खत्म हो जाएंगे, क्योंकि इनको बनने में लाखों साल लग जाते हैं। हमें इनकी संभाल की बहुत ज़रूरत है, ताकि—

  1. स्रोतों के पारिस्थितिक तंत्र को ठीक रखा जा सके।
  2. प्राकृतिक प्रजातियों को बचाया जा सके।
  3. मनुष्य की रक्षा की जा सके।

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प्रश्न 25.
स्थायी या निरंतर विकास क्या है ?
उत्तर-
स्थायी या निरंतर विकास का अर्थ है कि प्राकृतिक स्रोतों को ध्यान के साथ प्रयोग किया जाए तथा इस तरह किया जाए कि स्रोत बेकार में खराब न हों और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए ये स्रोत बच सकें तथा वह भी इसका लाभ उठा सकें। इसलिए हमारे आज के समय की यह एक मुख्य ज़रूरत भी है। इसलिए बहुत सारे देशों ने इसको विकास मॉडल के रूप में अपनाया है तथा इनको विकसित बनाया है। अत: ज़रूरी है कि राष्ट्रीय भाईचारे के साथ हम अपनी धरती के इन प्राकृतिक स्रोतों को बचाएं ताकि गरीबी से छुटकारा पाया जा सके तथा देश को खुशहाल बनाया जा सके।

प्रश्न 26.
सुरक्षित पैट्रोलियम भंडार पर नोट लिखो।
उत्तर-
भारत ने एक नीति के पक्ष से देश में सख्त आवश्यकता के समय के लिए एक तेल भंडार को सुरक्षित रखा है जिसमें 5 मिलीयन तक का तेल भंडारण है, जो कि मंगलौर, विशाखापट्टनम तथा उदपी के पास पादूर में स्थित है। यह तेल के भंडार देश में 10 दिन तक संकट के समय सहायता कर सकते हैं।

प्रश्न 27.
बायोगैस ऊर्जा से आपका क्या अर्थ है ?
उत्तर-
कृषि के बचे तथा बेकार पदार्थों से ऊर्जा पैदा की जाती है तथा भारत में लगभग 25 लाख बायोगैस प्लांट हैं। इनके विकास से देश में 75 लाख टन ईंधन की बचत होती है। धुआं रहित चूल्हा इस पर निर्भर है। इससे हर साल 360 लाख टन हरी खाद तैयार होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
कच्चे लोहे के प्रकारों का वर्णन करो।
उत्तर-
कच्चे लोहे की किस्में (Types of Iron Ore) खनिज लोहे में धातु के अंश के अनुसार लोहा मुख्य रूप में चार प्रकार का होता है—

  1. मैग्नेटाइट- यह कच्चे लोहे की सबसे बढ़िया किस्म है। इसका रंग लाल होता है। इसमें 70% से 72% तक धातु अंश होते हैं। इसमें चुंबकीय गुण भी मौजूद होते हैं।
  2. हैमेटाइट-इस काले लाल रंग के कच्चे लोहे में 55% से 69% तक धातु अंश होता है।
  3. लिमोनाइट-यह कच्चा लोहा पीले रंग का होता है। इसमें 30% से 60% तक लौह अंश होते हैं।
  4. साइडेराइट-इस घटिया भूरे रंग के लोहे में धातु अंश 20% से 30% होता है।

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प्रश्न 2.
भारत में प्रमुख कच्चे लोहे के उत्पादन क्षेत्र बताओ।
उत्तर-

  1. कर्नाटक-इस क्षेत्र में भारत के कुल लोहे के उत्पादन का 1/4 हिस्सा आता है। यह भारत का सबसे बड़ा कच्चा लोहा उत्पाद क्षेत्र है। इसमें एक मंगलूर जिले में बाबा बूढ़न की पहाड़ियां, केमानगुंडीखान, संदूर पर होसथेट, चितुरदुर्ग इत्यादि काफी प्रसिद्ध हैं। यहाँ पर मैगनेटाइट तथा हैमेटाइट किस्म का लोहा मिलता है।
  2. उड़ीसा-यह राज्य भारत का 22%, कच्चा लोहा पैदा करता है। इस राज्य में मयूरभंज, क्योंझर तथा बोनाई क्षेत्रों में लोहा मिलता है।
  3. छत्तीसगढ़-यह राज्य भारत का 22% कच्चा लोहा पैदा करता है। यहाँ थाली-राजहारा पहाड़ियां तथा बस्तर क्षेत्र काफी प्रसिद्ध हैं।
  4. गोआ-यह राज्य भारत का 18% कच्चा लोहा पैदा करता है। यहाँ मोरमुगाओ बंदरगाह तथा मांडवी नदी लोहे के लिए प्रसिद्ध हैं।
  5. झारखण्ड-इस राज्य में भारत का 25% कच्चा लोहा पैदा होता है। इस राज्य में सिंहभूमि जिले में नोआमण्डी तथा पनसिरा बुडु की प्रसिद्ध खाने हैं। नोआमण्डी खान एशिया में सबसे बड़ी लोहे की खान है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वस्तुओं में से हर एक के उपयोग बताओ।
(A) तांबा
(B) एल्यूमीनियम
(C) यूरेनियम,
(D) थोरियम।
उत्तर-
(A) तांबा (Copper) तांबा एक अलौह धातु है। यह धातु बिजली की उत्तम चालक है। इसका उपयोग रेडियो, टेलीफोन, टेलीविज़न, टैलीग्राफ, बिजली की तार, रेल इंजन, हवाई जहाज़, समुद्री जहाज़ इत्यादि में होता है। इस धातु के प्राचीन काल में उपकरण, सिक्के इत्यादि बनाए जाते रहे हैं। यह एक उत्तम मिश्रित धातु है। इसको और धातुओं के साथ मिला कर कांसा, पीतल इत्यादि धातु बनाई जा सकती हैं।

(B) एल्यूमीनियम-एल्यूमीनियम एक हल्की धातु है। इसका प्रयोग हवाई जहाज, रेल-गाड़िया, मोटरकारें, भवन निर्माण में किया जाता है। इसको जंग नहीं लगता। इससे पतली चादरें, बर्तन, सिक्के, फर्नीचर, डिब्बे इत्यादि बनाए जाते हैं। यह बिजली तथा ताप का उत्तम सुचालक है इसलिए इसका प्रयोग बिजली की तार, उपकरण, रेडियो, टी०वी० इत्यादि में किया जाता है।

(C) यूरेनियम- यूरेनियम एक भारी, कठोर, रेडियोधर्मी धातु होती है। इस धातु का परमाणु शक्ति के निर्माण के कारण सैनिक महत्त्व है। यह धातु परमाणु बम बनाने में प्रयोग की जाती है।

(D) थोरियम- यह एक भूरे रंग की धातु है। परमाणु शक्ति के विकास के कारण थोरियम का आर्थिक तथा सैनिक महत्त्व बढ़ गया है। थोरियम का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत मोनोजाइट है। थोरियम को नाभकीय ऊर्जा प्राप्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इससे तार और शीटें बनाई जाती हैं।

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प्रश्न 4.
खनिज किसे कहते हैं ? इसकी मुख्य किस्मों में अन्तर बताओ।
उत्तर-
खनिज एक या एक से अधिक तत्त्वों से मिलकर बनता है तथा इसका निश्चित रासायनिक संगठन होता है। संसार में लगभग 70-80 खनिज मिलते हैं जिनका आर्थिक उपयोग किया जाता है। इन्हें तीन भागों में विभाजित किया जाता है—

  1. धातु खनिज (Metallic Minerals)-इसमें लोहा, तांबा, एल्यूमीनियम, सोना, चाँदी, खनिज पदार्थ शामिल किए जाते हैं जिनसे कई धातुएं तैयार की जाती हैं।
  2. अधातु खनिज (Non-Metallic Minerals)—इसमें नमक, अभ्रक, चूने का पत्थर, ग्रेफाइट, डोलोमाइट, पोटाश, जिप्सम इत्यादि खनिज शामिल हैं। इनसे धातुएं नहीं बनाई जातीं।
  3. ईंधन खनिज पदार्थ (Fuel Minerals)-इसमें कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस शामिल हैं। इन्हें शक्ति के साधन भी कहा जाता है।

प्रश्न 5.
भारत में प्रमुख तांबा क्षेत्र बताओ।
उत्तर-

  1. मध्य प्रदेश–यह राज्य भारत का सबसे बड़ा तांबा उत्पादक है। यहां मालेजखंड, तारेगाऊ, बालाघाट, बारागाँव प्रसिद्ध तांबा उत्पादक जिले हैं।
  2. राजस्थान- इस राज्य में भारत का 40% तांबा मौजूद है। यहाँ अलवर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, झुनझुनु, डूंगरपुर, पाली, सीकर, सिरोही पर, उदयपुर इत्यादि जिले तांबा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।
  3. झारखण्ड-झारखण्ड में सिंहभूमि जिले के मोसबनी, चोड़ाई रखा, पारसनाथ, बरखानाथ इत्यादि जिले उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 6.
मैंगनीज के निर्यात तथा आयात पर नोट लिखो।
उत्तर-
निर्यात (Export)-2012-13 के सालों में मैंगनीज़ का 72 हज़ार टन निर्यात किया गया। भारत के मैंगनीज का मुख्य खरीददार देश चीन है। भारत में पैदा किया जाने वाला मैंगनीज़ उच्च दर्जे का होता है।

आयात (Import)-क्योंकि मैंगनीज का उत्पादन पूर्ति से कम होता है। इसलिए भारत को मैंगनीज़ बाहर और देशों से आयात भी करना पड़ता है। 2012-13 के सालों में 20 से लेकर 30 हजार टन मैंगनीज का आयात किया गया है। इसमें 43% हिस्सा दक्षिणी अमेरिका, 32% ऑस्ट्रेलिया, गैबीन से 90% तथा कोटे-डी-आईबोरे से 4% आयात किया गया था।

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प्रश्न 7.
ऊर्जा के स्रोतों पर नोट लिखो।
उत्तर-
किसी भी देश की आर्थिकता उस देश के ऊर्जा के स्रोतों पर निर्भर करती है क्योंकि उद्योगों इत्यादि को चलाने के लिए ऊर्जा के स्रोतों की आवश्यकता होती है। बढ़ रहे उद्योगों के कारण ऊर्जा के स्रोतों की मांग में वृद्धि हो रही है।

  1. परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोत-कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस इत्यादि।
  2. गैर परंपरागत ऊर्जा के स्त्रोत-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस, ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, समुद्री, ताप ऊर्जा इत्यादि।
  3. नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि।
  4. गैर नवीकरणीय ऊर्जा के स्त्रोत-कोयला, प्राकृतिक गैस, खनिज तेल, परमाणु ऊर्जा ।
  5. जैविक स्त्रोत-जंगल, फसलें, जानवर, इन्सान इत्यादि।
  6. अजैविक स्रोत-जैसे भूमि, पानी, खनिज पदार्थ इत्यादि।

प्रश्न 8.
कोयले के मुख्य प्रकारों का वर्णन करो।
उत्तर-
रचना तथा कोयले की किस्में (Formation and Types of Coal) कार्बन की मात्रा के अनुसार कोयले की निम्नलिखित किस्में हैं—

  1. ऐन्थेसाइट-यह उत्तम प्रकार का कोयला होता है जिसमें 85% तक कार्बन होता है तथा यह सख्त किस्म का होता है तथा जलने के बाद धुएं की कमी होती है।
  2. बिटुमिनस-इस मध्यम श्रेणी के कोयले में 50% से 85% तक कार्बन होता है, कोकिंग कोयला तथा स्टीम कोयला इस प्रकार का होता है।
  3. लिग्नाइट-इस कोयले में 35 से 50% तक कार्बन की मात्रा होती है। इसका प्रयोग ताप बिजली पैदा करने में किया जाता है।
  4. पीट-इस कोयले में 35% से भी कम कार्बन की मात्रा होती है। यह घटिया किस्म का कोयला है। इसका रंग भूरा होता है तथा जलने के बाद धुएं की मात्रा अधिक होती है।

प्रश्न 9.
भारत के प्रमुख कोयला क्षेत्र बताओ।
उत्तर-
भारत में सबसे पहले 1814 में कोयले की खुदाई आरम्भ हुई तथा लगातार क्षेत्रों का विस्तार बढ़ता गया। भारत के कोयला क्षेत्र हैं—

  1. पश्चिमी बंगाल-इस प्रदेश में 1267 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई रानीगंज की प्राचीन खान है। यहाँ से भारत का 30% कोयला मिलता है।
  2. झारखण्ड-यह राज्य भारत का 50% कोयला पैदा करता है। यहां दामोदर घाटी में झरिया, बोकारो, करणपुर, गिरिहीड़ तथा डाल्टनगंज प्रमुख खाने हैं। झरिया का कोयला क्षेत्र सबसे बड़ी खान है। यहां बढ़िया प्रकार का कोक कोयला मिलता है जो इस प्रकार के इस्पात उद्योग में जमशेदपुर, आसन-सोल, दुर्गापुर तथा बोकारो के कारखानों में प्रयोग होता है।
  3. उड़ीसा-यह राज्य भारत का 24% कोयला पैदा करता है। तालाचेर, सावलपुर, राणापुर, हिमगिर मुख्य कोयला क्षेत्र हैं।
  4. छत्तीसगढ़- यहां भारत का 18% कोयला पैदा होता है। 5. मध्य प्रदेश-इस प्रदेश में नदी घाटियों में कई खाने जैसे सोन घाटी में सुहागपुर, कोरबा, उमरिया, रामपुर, तत्तापानी प्रमुख खाने हैं।

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प्रश्न 10.
कोयले के संरक्षण के लिए कौन-सी विधियों को अपनाया जाना चाहिए ?
उत्तर-
कोयले के संरक्षण के लिए जिन विधियों की ज़रूरत है वे इस प्रकार हैं—

  1. कोयले की खुदाई वैज्ञानिक विधियों द्वारा की जाए, ताकि कोयला कम मात्रा में नष्ट हो।
  2. ईंधन के लिए घरों में तथा रेलों में कोयले का उपयोग कम से कम किया जाए।
  3. पन बिजली का प्रयोग करके कोयले के भंडारों को सुरक्षित किया जा सकता है।
  4. कोयले के नए भण्डारों की खोज की जाए।
  5. कोयले का योजनाबद्ध उपयोग किया जाए ताकि इसके भण्डार एक लम्बे समय तक प्रयोग किए जा सकें।

प्रश्न 11.
“पेट्रोलियम के भण्डार अधिक देर तक नहीं चलेंगे।” व्याख्या करो।
उत्तर-
पेट्रोलियम एक समाप्त होने वाला शक्ति का साधन है। पृथ्वी पर पेट्रोलियम के भण्डार सीमित मात्रा में मिलते हैं। जिन क्षेत्रों से एक बार खनिज तेल निकाल लिया जाता है वे भण्डार सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। आधुनिक युग में पेट्रोलियम की मांग बड़ी तेजी से बढ़ रही है। इस कारण भविष्य में खनिज तेल की काफी कमी हो जाएगी। अधिकतर वैज्ञानिकों का मत है कि पेट्रोलियम के भण्डार कुछ शताब्दियों में ही समाप्त हो जाएंगे। ये भण्डार अधिक समय तक नहीं चल सकेंगे। ये सन् 2050 ई० तक ही पर्याप्त होंगे। इसका मुख्य कारण है कि खनिज तेल अधिक मात्रा में निकाला जा रहा है। नये क्षेत्रों का विकास कम हुआ है। खनिज तेल निकालने तथा साफ करने में बहुत सा तेल नष्ट हो जाता है। तेल की कीमत में लगातार वृद्धि हो रही है। इसलिए प्रत्येक देश अपने भण्डारों की अधिक से अधिक कीमत प्राप्त करने के लिए अधिक मात्रा में तेल का शोषण कर रहा है। खनिज तेल के स्थान पर दूसरे साधनों का प्रयोग भी कम है। इसलिए यह अनुमान ठीक है कि पेट्रोलियम के भण्डार अधिक समय तक नहीं चल सकेंगे।

प्रश्न 12.
पेट्रोलियम के संरक्षण के लिए कौन-कौन सी विधियों को अपनाना आवश्यक है ?
उत्तर-
एक अनुमान के अनुसार ये भण्डार अधिक देर तक नहीं चल सकेंगे। इसलिए इन साधनों का संरक्षण अति आवश्यक है। पेट्रोलियम साधनों के संरक्षण के लिए निम्नलिखित विधियों का प्रयोग आवश्यक है—

  1. पेट्रोलियम का सदुपयोग किया जाए तथा प्रत्येक बूंद को नष्ट होने से बचाया जाए।
  2. खनिज तेल को निकालने तथा साफ करने के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके नष्ट होने वाले तेल को बचाया जाए।
  3. तेल के स्थान पर दूसरे साधनों का प्रयोग अधिक किया जाए।
  4. तेल के नए क्षेत्रों की खोज की जाए।
  5. तेल युक्त चट्टानों से तेल के अतिरिक्त अन्य वस्तुएं अधिक से अधिक प्राप्त की जाएं।
  6. तेल धीरे-धीरे से निकालने से सभी कुओं में उच्च दबाव रहता है तथा तेल के भण्डार अधिक समय तक चल सकते हैं।

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प्रश्न 13.
भारत के प्रमुख तेल उत्पादक प्रदेश बताओ।
उत्तर-
भारत के मुख्य तेल (Major Oil Fields) क्षेत्र निम्नलिखित हैं—

  1. डिगबोई क्षेत्र (Digboi Oil Field)—यह असम प्रदेश में भारत का सबसे प्राचीन तथा अधिक तेल वाला क्षेत्र है। यहाँ से भारत का 60% खनिज तेल प्राप्त किया जाता है। 21 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तीन तेलकूप हैंडिगबोई, बप्पायुंग तथा हंसायुग।
  2. गुजरात क्षेत्र (Gujarat Oil Field) कैम्बे तथा कच्छ की खाड़ी के निकट अंकलेश्वर, लयुनेज़, कलोल स्थानों पर तेल का उत्पादन आरम्भ हो गया है। इस क्षेत्र में प्रति वर्ष 30 लाख टन तेल प्राप्त होता है।
  3. बॉम्बे हाई क्षेत्र (Bombay High Oil Field) खाड़ी कच्छ के कम गहरे समुद्री भाग में भी तेल मिल गया है। यहाँ बॉम्बे हाई तथा बसीन क्षेत्र हैं।

प्रश्न 14.
किसी स्थान पर जल-बिजली का विकास किन-किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-
जल बिजली का विकास निम्नलिखित भौगोलिक तथा आर्थिक तत्त्वों पर निर्भर करता है—

  1. ऊँची-नीची भूमि (Uneven Relief)-जल बिजली के विकास के लिए ऊँची-नीची तथा ढालू भूमि होनी चाहिए। इस दृष्टि से पर्वतीय तथा पठारी प्रदेश जल बिजली के विकास के लिए आदर्श क्षेत्र होते हैं। अधिक ऊँचाई से गिरने वाला जल अधिक मात्रा में जल बिजली उत्पन्न करता है।
  2. अधिक वर्षा (Abundant Rainfall)-जल बिजली के लिए सारा वर्ष निरन्तर जल की मात्रा उपलब्ध होनी चाहिए।
  3. विशाल नदियों तथा जल प्रपातों का होना (Waterfalls & Huge Rivers) नदियों में जल की मात्रा अधिक होनी चाहिए ताकि वर्ष भर समान रूप से जल प्राप्त हो सके। पर्वतीय प्रदेशों में बनने वाले प्राकृतिक जल प्रपात जल बिजली विकास में सहायक होते हैं। जैसे उत्तरी अमेरिका में नियाग्रा जल प्रपात।

प्रश्न 15.
कोयले तथा खनिज तेल के साथ जल-बिजली शक्ति के तुलनात्मक महत्त्व का अध्ययन करो।
उत्तर-
पिछले कुछ सालों से जल बिजली का कोयले तथा खनिज तेल से अधिक महत्त्व है। इसके कई कारण हैं :

  1. स्थायी साधन-कोयला तथा तेल समाप्त हो जाने वाले साधन हैं इनके भण्डार सीमित हैं। धातु जल बिजली एक स्थायी साधन है।
  2. स्वच्छ साधन-कोयला तथा तेल धुएँ इत्यादि के कारण पर्यावरण को दूषित कर देते हैं परन्तु जल बिजली एक स्वच्छ साधन है तथा इसका सुविधापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। इसको सफेद कोयता भी कहते हैं।
  3. कम (खर्च)-जल बिजली एक सस्ता साधन है।
  4. उद्योगों का विकेंद्रीकरण-जल बिजली द्वारा उद्योगों का विकेंद्रीकरण आसानी के साथ किया जा सकता है।

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प्रश्न 16.
धात्विक तथा अधात्विक खनिजों में अन्तर बताओ।
उत्तर-

धात्विक खनिज अधात्विक खनिज
1. इन खनिजों को और नये पदार्थ बनाने के लिए की प्राप्ति नहीं होती। 1. अधात्विक खनिजों को गलाने से भी किसी धातु पिघलाया जा सकता है।
2. उदाहरणे-लोहा, तांबा, बाक्साइट, मैंगनीज धात्विक खनिज हैं। 2. कोयला, अभ्रक, संगमरमर, पोटाश अधात्विक खनिज हैं।
3. ये खनिज प्रायः आग्नेय चट्टानों में पाए जाते हैं। 3. ये खनिज प्रायः तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।
4. इन्हें दोबारा पिघला कर भी प्रयोग किया जा सकता है। 4. इन्हें पिघलाकर प्रयोग नहीं किया जा सकता।

 

प्रश्न 17.
भारत में सौर ऊर्जा के उपयोग क्या हैं ?
उत्तर-
भारत में सौर ऊर्जा के उपयोग निम्नलिखित हैं—

  1. यह ऊर्जा हर स्थान पर मिलती है। सूर्य ऊर्जा को खाना बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
  2. सर्दी में ताप देने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  3. इसको गलियों तथा घरों में रोशनी देने के लिए उपयोग किया जाता है।
  4. फसलों को खुश्क करने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 18.
पवन ऊर्जा पर नोट लिखो।
उत्तर-
पवन ऊर्जा एक नवीकरणीय स्रोत है तथा प्रदूषण रहित ऊर्जा है। हवा की गति जो कि एक निरन्तर वेग के साथ चलती है, पवन ऊर्जा पैदा करने में सहायता करती है। पवन चक्कियां ऊर्जा पैदा करने के लिए लगाई जाती हैं। पवन ऊर्जा भोजन पदार्थों को पीसने (Grinding) के लिए भी प्रयोग की जाती हैं। कुआँ इत्यादि में से पानी निकालने के लिए भी पवन चक्की का प्रयोग किया जाता है। टरबाइनों को चलाकर बिजली भी पैदा की जाती है। भारत में तमिलनाडु में सबसे ज्यादा पवन ऊर्जा पैदा की जाती है।

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प्रश्न 19.
ज्वारीय ऊर्जा पर नोट लिखो।
उत्तर-
ज्वारीय ऊर्जा बड़े ज्वार-भाटों से तटीय राज्यों में मिलती है। इस ऊर्जा को सागर के प्रवेशिका पर बाँध बना कर प्राप्त किया जा सकता है। सागर में ज्वारभाटा पर सागरीय धाराओं के साथ चलने वाली टरबाइनें पानी की सतह के नीचे लगाई जाती हैं जिसके साथ बिजली पैदा की जाती है। कैम्बे की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी पर गंगा, सुन्दरवन डेल्टा ज्वारीय ऊर्जा पैदा करने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान हैं।

प्रश्न 20.
गैर परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोतों के विकास की ज़रूरत क्यों है ? कारण बताओ।
उत्तर-
गैर परम्परागत ऊर्जा के स्रोतों के विकास की बहुत आवश्यकता है क्योंकि इन ऊर्जा के स्रोतों को दुबारा से बनाया जा सकता है। इन स्रोतों को प्राकृतिक साधनों-सूर्य, हवा, पानी इत्यादि का प्रयोग करके दुबारा बनाया जा सकता है। जब हम जीवाश्म ईंधन का प्रयोग करते हैं, तब उसके साथ हमारी पृथ्वी के ऊपर वाले साधन दूषित हो जाते हैं तथा खराब होते हैं और पर्यावरण दूषित होता है। ईंधन खनिजों जैसे कि कोयला इत्यादि के जलने के बाद पर्यावरण में प्रदूषण भी फैलता है। खनिज तेल की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ने के कारण आने वाले समय के लिए इसके भंडार समाप्त होते नज़र आ रहे हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि गैर परम्परागत ऊर्जा के स्रोत ही एक विकल्प हैं तथा इनके विकास की अब काफ़ी ज़रूरत है। कुछ महत्त्वपूर्ण गैर परम्परागत ऊर्जा के स्रोत हैं-सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, प्राकृतिक गैस, ज्वारीय ऊर्जा इत्यादि।

प्रश्न 21.
खनिज तेल के गुण तथा नुकसान बताओ।
उत्तर-

खनिज तेल के गण (Advantages of Oil) खनिज तेल के नुकसान (Disadvantages of Oil)
1. खनिज तेल सस्ता तथा यातायात के लिए काफी सुविधाजनक है। इसको पाइप लाइन द्वारा आसानी से एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाया जा सकता है। 1. पैट्रोल के झलकाव के कारण प्रदूषण फैलता है तथा पानी में पैदा होने वाले जीवों का नुकसान होता है।
2. मुख्य रूप में पैट्रो रसायन उद्योगों के लिए धुरे का काम करते हैं। 2. प्रदूषक निकलने के साथ तेज़ाबी वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
3. खोज निर्माण कौशल काफी महंगा है।
4. यह नवीकरणीय स्रोत नहीं है।

 

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प्रश्न 22.
निरन्तर विकास से आपका क्या अर्थ है ? इसके मुख्य सिद्धान्त बताओ।
उत्तर-
साधनों का विकास बिना पर्यावरण को दूषित किए किया जा सके तथा आने वाली पीढ़ी की आवश्यकताओं को मुख्य रूप में रखकर उपयोग किया जाए। इस तरह के विकास को निरन्तर विकास का नाम दिया जाता है। निरन्तर विकास के मुख्य सिद्धान्त हैं—

  1. हर एक की जीवन गुणवत्ता में वृद्धि
  2. पृथ्वी के अलग-अलग स्रोतों की संभाल
  3. प्राकृतिक स्रोतों का रिक्तीकरण कम करना।
  4. पर्यावरण के लिए एक उचित ढंग अपनाना।
  5. समाज को अपने पर्यावरण की संभाल करने में सहायता करना।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
कच्चे लोहे के प्रकारों तथा भारत में लोहे के उत्पादन तथा वितरण का वर्णन करो।
उत्तर-
लोहा किसी देश के औद्योगिक विकास की आधारशिला है। पृथ्वी की कुल चट्टानों के 5% भाग में लोहे की कच्ची धातु मिलती है। संसार में लोहे के अधिकतर भण्डार मध्य अक्षांशों में स्थित देशों तथा अन्य महासागर के तटवर्ती देशों में मिलते हैं। लोहे का उपयोग मनुष्य प्राचीन काल से करता आ रहा है। यह धरती की पपड़ी में एक खनिज है। इसका प्रयोग इस्पात बनाने के लिए भी किया जाता है। इस्पात हमारे इतिहास में निर्माण के लिए सबसे प्रसिद्ध है तथा तीसरी तथा चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से 18वीं सदी तक भारत का लोहा काफी प्रसिद्ध रहा है।
लोहे को हमारे आधुनिक उद्योगों के लिए रीढ़ की हड्डी भी कहते हैं। किसी भी देश के लोगों का जीवन स्तर भी कई प्रकार से इस पर निर्भर करता है। कच्चा लोहा खानों से निकाला जाता है तथा इसकी मुख्य किस्में इस प्रकार हैं—

  1. मैग्नेटाइट (Magnetite)-इस प्रकार के बढ़िया लोहे में 72% धातु अंश होते हैं। चुंबकीय गुणों के कारण इसे मैग्नेटाइट कहा जाता है।
  2. हैमेटाइट (Hematite)-इस लाल रंग के लोहे में 60% से 70% तक धातु अंश होता है। यह रक्त की तरह लाल रंग का होता है।
  3. लिमोनाइट (Limonite)—इस पीले रंग के लोहे में 40% से 50% तक लोहे का अंश होता है।
  4. सिडेराइट (Siderite)—इस भूरे रंग के लोहे में धातु अंश 48% होता है।

इस लोहे में अशुद्धियाँ अधिक होती भारत संसार का 5% लोहा उत्पन्न करता है तथा आठवें स्थान पर है। भारतीय लोहे में कम अशुद्धियाँ हैं तथा इसमें 75% धातु अंश होता है। देश में एक लम्बे समय के प्रयोग के लिए 2300 करोड़ टन लोहे के भंडार हैं। इस प्रकार संसार के 20% भंडार भारत में हैं। भारत में अधिकतर लोहा हैमेटाइट जाति का मिलता है जिसमें 60% से अधिक लौह-अंश मिलता है। भारत में लगभग हर साल ₹1700 करोड़ का लोहा विदेशों को निर्यात किया जाता है। भारत में कच्चे लोहे हैमेटाइट के भंडार 12 अरब 31 करोड़ 73 लाख टन है तथा मैगनेटाइट 5 अरब 39 करोड़ 52 लाख है। सबसे बढ़िया प्रकार के कच्चे लोहे के भंडार छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोआ, झारखण्ड इत्यादि में मिलते हैं।

लोहा क्षेत्रों का वितरण (Distribution)-भारत में कर्नाटक राज्य सबसे अधिक लोहा का उत्पादन करता है। बिहार तथा उड़ीसा भारत का 75% लोहा उत्पन्न करते हैं। इसे भारत का लोहा क्षेत्र कहते हैं। इस क्षेत्र में भारत के मुख्य इस्पात कारखाने हैं।
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विभिन्न राज्यों में उत्पादन निम्नलिखित हैं :
1. कर्नाटक-कर्नाटक राज्य में सबसे अधिक लोहे का उत्पादन होता है। यहाँ भारत का 1/4 हिस्सा लोहा पैदा किया जाता है। इस राज्य में मुख्य रूप में बाबा बूढ़न पहाड़ियों में केमनगुंडी तथा चिकमंगलूर में कुद्रेमुख क्षेत्र प्रसिद्ध हैं। यह लोहा भद्रावती इस्पात कारखाने में प्रयोग होता है।

2. उड़ीसा-यह राज्य देश का 13% लोहा उत्पन्न करता है। इस राज्य में मयूरभंज, क्योंझर तथा बनाई जिलों में खानें हैं।

  • मयूरभंज में गुरमहासिनी, सुलेपत, बादाम पहाड़ खाने हैं।
  • क्योंझर में बगियां बुडु खान है।
  • बोनाई में किरिबुरु खान से प्राप्त लोहा जापान को निर्यात होता है तथा राऊरकेला इस्पात कारखाने में प्रयोग किया जाता है।

3. छत्तीसगढ़-यह राज्य भारत का 18% कच्चे लोहे का उत्पादन करता है। इस राज्य में धाली-राजहरा की पहाड़ियां लोहे के प्रसिद्ध क्षेत्र हैं। बस्तर क्षेत्र में बैलाडिला तथा रावघाट के नए क्षेत्रों में लोहे की खाने हैं। यहाँ से लोहा जापान को निर्यात किया जाता है तथा भिलाई कारखाने में प्रयोग होता है।

4. गोआ-गोआ राज्य भारत के कुल लोहा भंडार में 18% हिस्सा डालता है। गोआ में लौह अयस्क के नए भंडारों के पता लगने से उत्पादन में वृद्धि हुई है। उत्तरी गोआ तथा दक्षिणी गोआ में प्रमुख खानें हैं।

5. झारखण्ड-इस राज्य में भारत के 25% लोहे के भण्डार हैं और यह कुल उत्पादन में 14% हिस्सा डालता है। इस राज्य में कोल्हन जगीर में सिंहभूमि क्षेत्र प्रमुख है। यहां पर नोआ मंडी, पनसिरा बुडु, बुडाबुरु प्रसिद्ध लोहे के भण्डार हैं। नोआ मंडी खान एशिया में सबसे बड़ी लोहे की खान है। इस लोहे को जमशेदपुर व दुर्गापुर कारखानों में भेजा जाता है। इसके अतिरिक्त राजस्थान में धनौरा व धन चोली क्षेत्र, हरियाणा में महेंद्रगढ़ क्षेत्र, जम्मू कश्मीर में ऊधमपुर क्षेत्र, महाराष्ट्र में चांदा तथा रत्नागिरी क्षेत्र में लोहारा तथा पीपल गाँव खान क्षेत्र, आंध्र प्रदेश में कुढ़पा तथा करनूल क्षेत्र।

भारत संसार का पांचवा बड़ा लोहा निर्यात देश है। देश का 50 से 60% लोहा जापान, जर्मनी, इटली, कोरिया देशों को निर्यात किया जाता है। जबकि कुल लोहे का तीन चौथाई भाग जापान को निर्यात किया जा रहा है। जापान भारत के लोहे का सबसे बड़ा खरीददार है। भारत से लोहा मारमागांव, विशाखापट्टनम, पाराद्वीप तथा मंगलौर बंदरगाहों से निर्यात किया जाता है।

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प्रश्न 2.
भारत में तांबे के उत्पादन तथा वितरण का वर्णन करो।
उत्तर-
तांबा एक प्राचीन धातु है आधुनिक युग में लोहे के पश्चात् तांबे का दूसरा स्थान है। संसार में लगभग 40 देशों में तांबा मिलता है, परन्तु तांबे के मुख्य भण्डार पांच देशों में मिलते हैं। सोवियत रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, मध्य अफ्रीका, एण्डीज़ पर्वत तथा कनाडा का पठार तांबे के मुख्य देश हैं। तांबे से हम अच्छी तरह से परिचित हैं। यह एक हल्के गुलाबी भूरे रंग की धातु है जो कि हमें चट्टानों के रूप में मिलती है। तांबा लचकीला होता है तथा लचकीलेपन के कारण बिजली तथा ताप का अच्छा सुचालक है। कई बिजली उद्योगों में इसका प्रयोग किया जाता है। इसको जंग नहीं लगता तथा इसके प्रयोग से मिश्रित धातु बनाई जा सकती है। तांबे का प्रयोग मनुष्य ने एक धातु के रूप में लोहे से पहले शुरू किया था। तांबे का प्रयोग बर्तन बनाने तथा सिक्के बनाने में काफी किया जा रहा है। इसके साथ बिजली का सामान, तारें इत्यादि भी बनाई जाती हैं।

भारत में तांबे के भंडार काफी सीमित हैं। तांबे के उत्पादन में भारत काफी भाग्यशाली भी है। हमारा देश संसार का तक़रीबन 2% तांबा पैदा करता है। 1950-51 से 1970-71 तक तांबे का उत्पादन काफी अच्छा है, पर यह वृद्धि धीरेधीरे हुई। 1970-71 से 1990-91 तक तांबे का उत्पादन तेजी से बढ़ा। इस समय में तांबे का उत्पादन 5,255 हजार टन रिकॉर्ड किया गया। इसके बाद 1996-97 में इसके उत्पादन में थोड़ी गिरावट आई यह उत्पादन 3,896 हजार टन तक पहुंच गया। 1997-98 में इसके उत्पादन में काफी कमी आई। यह कम होकर सिर्फ 233 हजार टन रह गया तथा 1997-98 तक उत्पादन कम ही रहा।
Production and Distribution

State

Production (Lakh Tonnes)

Percentage of all India
Madhya Pradesh 87 56.86
Rajasthan 62 40.52
Jharkhand 4 2.62
All India 153 100.00

 

Trends in Production of Copper Ore in India

Year Quantity (Thousand Tonnes) Value (₹ Crore)
1950-51 375 1.94
1960-61 423 2.29
1970-71 666 4.95
1980-81 2109 42.70
1990-91 5255 169.97
1994-95 4767 208.92
1996-97 3896 241.59
1997-98 233 395.97
1998-99 199 337.72
1999 165 310.56
2000-01 164 324.32
2002-03 153 242.96

यह 153 हजार टन 2002-03 तक पहुँच गया। भारत में खास कर तांबा मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा झारखण्ड में मिलता है।
1. मध्य प्रदेश-मध्य प्रदेश तांबे का सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में इसने कर्नाटक, राजस्थान तथा झारखण्ड को उत्पादन के रिकॉर्ड में पीछे छोड़ दिया है। 2002-03 के सालों में इस राज्य में देश का 56.86% तांबे का उत्पादन किया गया। तारे गाँव जिले में इस राज्य की सबसे बड़ी पट्टी है। इसके अतिरिक्त मलंजखंड, बालाघाट ज़िले भी काफी प्रसिद्ध हैं। इन प्रांतों में 84.83 मिलियन टन तांबा पैदा किया जाता है। इसके अतिरिक्त बेतूल बासगाँव क्षेत्र तांबे के लिए प्रसिद्ध हैं।

2. राजस्थान-राजस्थान ने भी तांबे के उत्पादन में काफी विकास किया है तथा तांबे के उत्पादन के लिए भारत का दूसरा स्थान है। यह भारत का 40% तांबा पैदा करता है। ज्यादातर तांबे का उत्पादन अरावली पर्वत श्रेणी में मौजूद है। इस राज्य में अलवर, अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जयपुर, झुनझुनु, पाली सीकर, सिरोही तथा
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उदयपुर तांबे के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। इन जिलों में एक अनुमान अनुसार 65.08 मिलियन टन तांबे का उत्पादन होता है। राजस्थान के ज़िले खेत सिंहाणा, झुनझुनु में तांबा मिलता है। यह बेल्ट उत्तरी पूर्वी से लेकर दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र तक 80 किलोमीटर के घेरे में फैली है। खेती सिंहाणा में आमतौर पर 1.8 मिलियन टन तक का उत्पादन होता है।

3. झारखण्ड-शुरुआत में झारखण्ड बिहार का ही एक हिस्सा होता है। 1980 तक यह तांबा उत्पादन का एक विशेष क्षेत्र था पर धीरे-धीरे यहाँ उत्पादन कम होने लगा तथा झारखण्ड तांबा उत्पादक में तीसरा स्थान पर आ गया, इसका कारण इसके अपने जिले में उत्पादन का कम होना तथा बाकी ज़िलों में उत्पादन में वृद्धि होने से है। राज्य में तांबे का उत्पादन 62% तक 1977-78 से कम हो गया तथा 2002-03 में हालात अधिक नाजुक हो गए। झारखण्ड के सिंहभूमि जिले के मोसाबनी, खेडाई रखा, धोबानी, पारसनाथ, बरखानाथ इत्यादि प्रमुख तांबा उत्पादक क्षेत्र हैं।
आयात (Import)-भारत में तांबे का उत्पादन हमारी मांग से कम हुआ है। इस कारण भारत को तांबा बाहर से आयात करना पड़ता है। मुख्य रूप में भारत यू०एस०ए०, कैनेडा, जापान तथा मैक्सिको से तांबा आयात करता है। हर साल माँग के हिसाब से आयात किया जाता है। हर साल मांग के हिसाब से आयात की दर बढ़ती-कम होती जाती है।

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प्रश्न 3.
भारत में बाक्साइट के उत्पादन तथा वितरण पर नोट लिखो।
उत्तर-
बाक्साइट एक महत्त्वपूर्ण धातु है जिसका प्रयोग एल्यूमीनियम बनाने के लिए किया जाता है। असल में यह बाक्साइट एल्यूमीनियम आक्साइड की चट्टान ही होती है। यह कोई निश्चित खनिज नहीं पर एक चट्टान का टुकड़ा है। जिसमें हाईड्रेटिड एल्यूमीनियम आक्साइड शामिल होता है। यह गुलाबी, सफेद या लाल रंग का होता है। इसका रंग इसमें मौजूद आयरन पर निर्भर करता है।

उत्पादन तथा वितरण (Production and Distribution)—देश में कुल भंडार 31076 मिलियन टन है। जिसका रिकॉर्ड 1 अप्रैल, 2000 में किया गया। साल 2012-13 में बाक्साइट का उत्पादन 15 हजार 360 टन हो गया था जोकि पिछले साल से 13% अधिक था। ज्यादातर बाक्साइट झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, गुजरात तथा राजस्थान प्रदेश से प्राप्त किया जाता है।
जम्मू कश्मीर, केरल, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में भी बाक्साइट के होने का पता चलता है।

1. उड़ीसा (Orissa)-उड़ीसा सबसे बड़ा बाक्साइट उत्पादक प्रदेश है। उड़ीसा का 95 प्रतिशत बाक्साइट पूर्वी घाट, राज्य के दक्षिणी पश्चिमी भाग के जिला कोरापुट, रायगढ़, कालाहांडी से आता है। मुख्य रूप में इस राज्य के बाक्साइट की बेल्ट कालाहांडी तथा कोरापुट जिलों में है जो आँध्र प्रदेश तक फैली हुई हैं।
Production of Bauxite in India 2002–03
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2. गुजरात-गुजरात भारत का दूसरा महत्त्वपूर्ण बाक्साइट उत्पादक राज्य है। यह देश का 15 प्रतिशत बाक्साइट पैदा करता है। इस स्थान पर कुल बाक्साइट 87.5 मिलियन टन तक मिलता है जो मुख्य रूप में जमुनानगर, जूनागढ़, खेड़ा, कच्छ सांबरकांधा, अमरेली तथा भावनगर में पाया जाता है। प्रमुख तौर पर कच्छ की खाड़ी से अरब सागर किनारे की यह पट्टी मुख्य ज़िलों भावनगर, जूनागढ़ तथा अमरेली ज़िलों में फैली हुई है तथा 48 किलोमीटर लम्बी तथा 3 से लेकर 4.5 किलोमीटर तक चौड़ी है।

3. झारखण्ड-इस राज्य में से 63.5 मिलियन टन बाक्साइट के भंडार मिलते हैं। यह भंडार मुख्य रूप में रांची, लोहारदागां, पलामू तथा गुमला इत्यादि स्थानों से मिलते हैं। हारदागां से बढ़िया किस्म का बाक्साइट मिलता है।

4. महाराष्ट्र-महाराष्ट्र के क्षेत्र में से 10 प्रतिशत के लगभग बाक्साइट मिलता है। कोलापुर के पठारी भाग, उदयगिरि, रांधनगड़ी, इंजरगंज प्रमुख बाक्साइट उत्पादक जिले हैं। ठाणे, रत्नागिरी, सतारा तथा पुणे क्षेत्रों में भी बाक्साइट का उत्पादन किया जाता है। डांगरवाड़ी तथा इंदरगंज जिले एल्यूमीनियम के लिए प्रसिद्ध हैं।

5. छत्तीसगढ़- छत्तीसगढ़ भारत के कुल उत्पादन में 6 प्रतिशत तक का हिस्सा डालते हैं। बिलासपुर के दुर्ग जिलों में मैकाल पर्वत श्रेणी तथा अमरकंटक पठारी भाग्य में सूरगुजा, रायगढ़ तथा बिलासपुर जिले बाक्साइट के उत्पादन के लिए काफी प्रसिद्ध हैं।

6. तमिलनाडु-तमिलनाडु के एक करोड़ 72 लाख टन बाक्साइट भंडार नीलगिरि, सेलम तथा मदुराय में पाए जाते हैं।

7. मध्य प्रदेश-यहां पाइकल पर्वत श्रेणी के शाहडोल, मांडला, बालाघाट तथा जबलपुर जिले के कोटली क्षेत्र बाक्साइट के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। बाक्साइट का निर्यात 2011-12 में 4 लाख एक हजार टन से अगले साल 2012-13 में 34 लाख 10 हज़ार हो गया था। चीन (91%), कुवैत (3%) तथा कतर (2%) भारत के बाक्साइट के आयातक देश हैं।

प्रश्न 4.
मैंगनीज के भारत में उत्पादन तथा वितरण का वर्णन करो।
उत्तर-
मैंगनीज एक प्राकृतिक धातु नहीं है। यह हमेशा लोहे से इस्पात बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। यह हल्के स्लेटी रंग की धातु है जो कि कच्चे लोहे के साथ ही खानों में मिलती है। यह मुख्य रूप में लौह-इस्पात उद्योग के लिए प्रयोग किया जाता है। एक टन इस्पात बनाने के लिए 6 किलोग्राम मैंगनीज की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक दवाइयां, रंग तथा बैटरियां इत्यादि बनाने में भी किया जाता है।

भारत में मैंगनीज का उत्पादन तथा वितरण (Manganese Ore Distribution in India)-भारत जिम्बाब्वे के बाद मैंगनीज भंडारों में संसार में दूसरा स्थान रखता है तथा 430 मिलियन टन मैंगनीज़ का भंडार करता है।
भारत संसार में उत्पादन के लिहाज़ से पांचवां स्थान रखता है क्रमवार चीन, गैबोन, दक्षिणी अफ्रीका तथा ऑस्ट्रेलिया में मैंगनीज का बढ़िया उत्पादन होता है। भारत में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आन्ध्रा प्रदेश तथा कर्नाटक मुख्य मैंगनीज उत्पादक राज्य हैं। महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश दोनों ही मैंगनीज का आधा भाग पैदा करते हैं।
(State Wise Reserves of Maganese)
Odisa (44%)
Karnataka (22%)
Madhya Pradesh (13%)
Maharashtra (8%)
Andhra Pradesh (4%)
Jharkhand and Goa (3%)
Rajasthan, Gujarat and
West Bengal (3%).

  1. उड़ीसा-यह भारत का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। यह भारत के कुल बाक्साइट उत्पादन में 44% का हिस्सा डालता है। मुख्य उत्पादक जिलों में सुन्दरगढ़ जिले की खान, गंगपुर कालाहांडी, कोरापुट तथा बोनाई क्षेत्र प्रसिद्ध हैं।
  2. कर्नाटक-कर्नाटक भारत की कुल मैंगनीज के 22 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन करता है। उत्तर कन्नड़, शिमोगा, बिलारी, चितलदुर्ग तथा टुमकुर ज़िले प्रमुख मैंगनीज उत्पादन केन्द्र हैं।
  3. मध्य प्रदेश-यह प्रदेश देश की पैदावार में 13% तक का योगदान डालता है। यहाँ मैंगनीज बालाघाट, छिंदवाड़ा तथा जबलपुर जिलों में से मिलती है।
  4. महाराष्ट्र-महाराष्ट्र में नागपुर तथा भंडारा क्षेत्र तथा रत्नागिरी ज़िले मैंगनीज के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।
  5. आन्ध्र प्रदेश-आन्ध्र प्रदेश में मुख्य रूप में मैंगनीज पट्टी श्रीकाकुलम और विशाखापट्टनम जिले में से मिलता है। श्रीकाकुलम सबसे पुरानी मैंगनीज की खान है। इसके अतिरिक्त कुड़प्पा, विजयनगर, गंटूर मैंगनीज के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।

इसके अतिरिक्त गोआ, पंचमहल, गुजरात, उदयपुर, बनसवांग, राजस्थान मैंगनीज के उत्पादन के लिए काफी प्रसिद्ध हैं। निर्यात (Export)-2012-13 में मैंगनीज का उत्पादन 72 हजार टन था। मुख्य भारतीय मैंगनीज का खरीददार चीन था। भारतीय मैंगनीज उच्च स्तर का होता है।

आयात (Import)—मैंगनीज की पूर्ति की मांग से कम होने के कारण भारत को मैंगनीज बाहर से मंगवानी पड़ती हैं। 2012-13 के सालों में 23 लाख 30 हजार टन मैंगनीज का आयात किया जाता है। आयात मुख्य रूप में अमेरिका ऑस्ट्रेलिया, गैबीन के स्थानों से किया जाता है।
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प्रश्न 5.
भारत में कोयले के उत्पादन तथा वितरण पर नोट लिखो।
उत्तर-
आधुनिक युग में कोयला शक्ति का प्रमुख साधन है। कोयले को उद्योग की जननी भी कहा जाता है। कई उद्योगों के लिए कोयला एक कच्चे माल का पदार्थ है। कोयले से बचे पदार्थ बैनज़ोल, कोलतार, मैथनोल इत्यादि का प्रयोग कई रासायनिक उद्योगों में किया जाता है। रंग-रोगन, नकली रबड़, प्लास्टिक, रिबन, लेम्प इत्यादि अनेक वस्तुएं कोयले से तैयार की जाती हैं। इस उपयोगिता के कारण कोयले को काला सोना भी कहा जाता है। कोयले को औद्योगिक क्रान्ति का आधार माना जाता है। संसार के अधिकांश औद्योगिक प्रदेश कोयले क्षेत्रों के निकट स्थित हैं, किसी सीमा तक आधुनिक सभ्यता कोयले पर निर्भर करती है। कोयला मुख्य रूप में चार किस्मों में विभाजित किया जाता है।

1. एंथेसाइट-यह उत्तम प्रकार का कोयला होता है जिसमें 85% तक कार्बन होता है। इसमें धुएँ की कमी होती है। इसका रंग काला होता है। इस प्रकार कठोर कोयले के भण्डार कम मिलते हैं।

2. बिटुमिनस-इस मध्यम श्रेणी के कोयले में 85% तक कार्बन होता है। कोकिंग कोयला इस प्रकार का होता है। इसे धातु गलाने तथा जलयानों में प्रयोग किया जाता है।

3. लिगनाइट-इस कोयले में 50% तक कार्बन की मात्रा होती है। इसका प्रयोग ताप विद्युत् में किया जाता है। इसमें से धुआँ बहुत निकलता है।

4. पीट-यह घटिया किस्म का भूरे रंग का कोयला है जिसमें 35% से कम कार्बन होता है। यह कोयला निर्माण की प्रथम अवस्था है। इसकी जलन क्षमता कम होने के कारण इसका प्रयोग कम होता है।

उत्पादन तथा वितरण-भारत में सबसे पहले कोयले का उत्पादन 1774 में पश्चिमी बंगाल में रानीगंज खान से आरंभ हुआ तथा निरंतर कोयले के उत्पादन में वृद्धि होती रही। स्वतन्त्रता के पश्चात् 30 वर्ष में कोयले के उत्पादन में 6 गुना वृद्धि हुई। भारत में कोयला मुख्य रूप में-झारखण्ड, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश इत्यादि क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है। 2015-16 के साल में भारत में कोयले का उत्पादन 63 करोड़ 92 लाख 34 हजार टन था जो कि 2014-15 में 60 करोड़ 91 लाख 79 हजार टन से 3 करोड़ 55 हज़ार टन से अधिक था। भारत में कोयले की मांग के मुख्य क्षेत्र इस्पात उद्योग, शक्ति उत्पादन, रेलवे, घरेलू खपत तथा अन्य उद्योग हैं। सन् 1972 में भारत ने कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया है तथा कोल इंडिया लिमिटेड नाम की सरकारी संस्था स्थापित की है। कोयले के उत्पादन में सरकारी तथा गैर-सरकारी क्षेत्रों का योगदान निम्नलिखित सारणी के अनुसार है—
Production of Raw Coal during the year 2015-16 (CMT)
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भारत में कोयला प्राप्ति के दो प्रकार के क्षेत्र हैं—
I. गोंडवाना कोयला क्षेत्र (Gondwana Coal Fields)—
1. पश्चिमी बंगाल-इस प्रदेश से 1267 वर्ग किलोमीटर में फैली रानीगंज की प्राचीन तथा सबसे गहरी खान है। यहां उच्च कोटि के कोयला भंडार हैं। यहाँ भारत का 30% कोयला मिलता है।

2. झारखण्ड-यह राज्य भारत का 27.3% कोयला उत्पन्न करता है। यहां दामोदर घाटी में झरिया, बोकारो, कर्णपुर, गिरिडीह तथा डाल्टनगंज प्रमुख खाने हैं। झरिया का कोयला क्षेत्र सबसे बड़ी खान है। यहाँ बढ़िया प्रकार का कोक कोयला मिलता है जो इस प्रकार के इस्पात के उद्योग में जमशेदपुर, आसनसोल, दुर्गापुर तथा बोकारो के कारखानों में प्रयोग होता है।

3. उड़ीसा-उड़ीसा भारत के कुल कोयले का 24 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है। तालेचर, संबलपुर तथा रामपुर हिमगिर महत्त्वपूर्ण कोयला क्षेत्र हैं। इकक्ला तलेचर, उड़ीसा का % हिस्सा पैदा करता है।

4. छत्तीसगढ़-छत्तीसगढ़ भारत का 18 प्रतिशत कोयले का उत्पादन करता है। यहां कोयले की 12 खाने हैं। इस राज्य का कोयला नदी घाटियों की खानों से मिलता है। यहां सिंगरौली कोयला क्षेत्र तथा कोरबा क्षेत्र प्रसिद्ध हैं। यहां से ताप बिजली घरों तथा भिलाई इस्पात केंद्र को कोयला भेजा जाता है। इसके अतिरिक्त सुहागपुर, रामपुर, पत्थर खेड़ा, सोनहल अन्य प्रमुख कोयला भंडार हैं।

5. मध्य प्रदेश-यहाँ कई नदी घाटियों में कोयला खाने हैं। बोकारो, उमरिया, रामपुर, तत्तापानी प्रमुख खाने हैं।

6. आन्ध्र प्रदेश-आन्ध्र प्रदेश में गोदावरी नदी घाटी में सिंगरौली कोठगुडम तथा तंदूर खाने हैं।

7. अन्य क्षेत्र-महाराष्ट्र में बर्धा घाटी में चन्द्रपुर तथा बल्लारपुर पश्चिमी बंगाल में रानीगंज, आन्ध्र प्रदेश में सिंगरौला, कोठगुड़म, महाराष्ट्र में अन्य खाने हैं।

II. टरशरी कोयला क्षेत्र (Tertiary Coal Fields)-इस किस्म का लिग्नाइट कोयला असम में लमीमपुर तथा माकूम क्षेत्र में मिलता है। राजस्थान में बीकानेर जिले में पालना नामक क्षेत्र में लिग्नाइट कोयला मिलता है। मेघालय में गारो, खासी, जयंतिया पहाड़ियों में। तमिलनाडु में दक्षिणी अरकाट में नेवेली में लिग्नाइट कोयला मिलता है। जम्मू कश्मीर में पुंछ, रियासी तथा ऊधमपुर में निम्नकोटि का कोयला मिलता है। भारत में 12000 करोड़ टन कोयले के सुरक्षित भंडार हैं। परन्तु बढ़िया प्रकार का कोयला सिर्फ 100 सालों के लिए काफी है। इसलिए बढ़िया किस्म के कोयले को बचाया जाता है। संसार में कोयले के उत्पादन में भारत का आठवां स्थान है। देश की 800 से अधिक कोयला खानों में से 3000 लाख टन कोयला निकाला गया है। इन कोयला खानों में लगभग 4 लाख मज़दूर काम करते हैं। 1972 में भारत सरकार ने कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया है।
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प्रश्न 6.
भारत में पैट्रोलियम के महत्त्व, उत्पादन तथा वितरण का वर्णन करो।
उत्तर-
पैट्रोलियम शब्द दो शब्दों के जोड़ से बना है (Petra = rock, Oleum = oil) इसलिए इसे चट्टानी तेल भी कहते हैं क्योंकि यह चट्टानों से प्राप्त किया जाता है। खनिज तेल कार्बन तथा हाइड्रोजन का मिश्रण है। पृथ्वी के नीचे दबी हुई समुद्री वनस्पति तथा जीव जन्तुओं से लाखों वर्षों के बाद अधिक ताप तथा दबाव के कारण खनिज तेल बन जाता है। तकनीकी तौर पर पैट्रोलियम एक ज्वलनशील तरल पदार्थ है जो कि हाइड्रोकार्बन का बना होता है। इसमें 90 से 95 प्रतिशत पैट्रोलियम के तथा बाकी जैविक पदार्थों तथा कुछ भाग ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर इत्यादि होती है।

प्राचीन काल में पैट्रोलियम का प्रयोग दवाइयों, खनिज प्रकाश व लेप इत्यादि कार्यों के लिए किया जाता था। पैट्रोलियम तथा पैट्रोलियम से बने पदार्थों का उपयोग मुख्य रूप में ऊर्जा पैदा करने के लिए किया जाता है। यह घनी तथा सुविधाजनक तरल ईंधन है। आधुनिक युग में खनिज तेल का व्यापारिक उपयोग सन् 1859 में शुरू हुआ जबकि संसार में खनिज तेल का पहला कुआँ 22 मीटर गहरा यू०एस०ए० में टटिसविले नामक स्थान पर खोदा गया। आधुनिक युग में पैट्रोलियम शक्ति का सबसे बड़ा साधन है। इसे खनिज तेल भी कहते हैं। इससे हर भाग पानी, हवा तथा धरती पर क्रांति आई है। कोई भी सामान आसानी से पैदावार देशों से उपभोक्ता देशों तक पहुँचाया जा सकता है। इसका प्रयोग मोटर-गाड़ियों, वायुयान, जलयान, रेल इंजन, कृषि यंत्रों में किया जाता है। इससे दैनिक प्रयोग की लगभग 5,000 वस्तुएँ तैयार की जाती हैं। इसमें स्नेहक, रंग, दवाइयां, नकली रबड़ व प्लास्टिक, नाइलोन, खाद इत्यादि पदार्थों का उत्पादन होता है।

भारत का बहुत बड़ा हिस्सा तलछटी चट्टानों (Sedimentary Rocks) ने घेरा हुआ है। परन्तु तेल के भंडारों में समानता नहीं है। भारतीय खनिज साल की किताब 1982 के एक अनुमान अनुसार भारत में 468 मिलियन टन जमा तेल है जिनमें 328 मिलियन टन मुम्बई हाई में मिलता है तथा 1984 के जमा आँकड़ों के अनुसार यह 500 मिलियन टन हो गया था।

उत्पादन-आज़ादी के समय भारत पैट्रोलियम के उत्पादन में एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था। मुंबई हाई की जगह से बढ़िया पैट्रोलियम बड़े पैमाने पर पैदा किया जाता था। समुद्रगामी उत्पादन 1970 के शताब्दी तक शुरू नहीं हुआ था तथा सारा उत्पादन तटवर्ती समुद्र के तरफ से मिलता था। 1980-81 के मध्य तक कच्चे तेल का उत्पादन समुद्र से आता था तथा बाकी बचता समुद्रगामी स्थानों से प्राप्त किया जाता है। पर 1990-91 से 2003-04 तक उत्पादन कच्चे तेल समुद्रगामी स्थानों से आना शुरू हो गया।
Production of Petroleum (Crude) in India (Million Tonnes)
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Production of Petroleum (Crude) in India 2002-03 (Million Tonnes)
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भारत में प्रमुख पैट्रोल उत्पादक क्षेत्र—

  1. सबसे पुराने पैट्रोल निकालने के केन्द्र असम में है। डिगबोई, बापापुंग, हुंसापुग, सुरमा घाटी तथा बदरपुर, मसीमपुर अन्य पैट्रोल उत्पादन के केन्द्र हैं।
  2. असम में नाहरकटिया, रुदरसागर, मोरा, हुगरीजन अन्य पैट्रोल उत्पादन के केन्द्र हैं।
  3. गुजरात में कैंबे तथा कच्छ की खाड़ी के निटक अंकलेश्वर, लयुनेज, कलोल नामक स्थान पर तेल का उत्पादन आरंभ हो गया है। इस राज्य में तेल क्षेत्र बड़ौदा, सूरत, मेहसना ज़िलों में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में मेहासना, ढोल्का, नवगाम, सानन्द इत्यादि कई स्थानों पर तेल मिला है।
  4. नाहरकटिया असम में यह एक नवीन तेल क्षेत्र है जिसमें नहरकटिया लकवा प्रमुख तेलकूप हैं।
  5. बसीन तेल क्षेत्र-बंबई हाई के दक्षिण में स्थित इस क्षेत्र से तेल निकालना शुरू हो गया है।
  6. सुरमा घाटी में बदरपुर, मसीमपुर, पथरिया नामक कूपों में घटिया प्रकार का तेल थोड़ी मात्रा में मिला है।
  7. बंबई हाई क्षेत्र-खाड़ी कच्छ के कम गहरे समुद्री भाग में तेल मिल गया है। 19 फरवरी, 1974 को ‘सागर सम्राट’ नामक जहाज़ द्वारा की गई खुदाई से Bombay High के क्षेत्र में तेल मिला है। इस क्षेत्र से 21 मई, 1976 से तेल निकलना आरंभ हो गया। यहाँ से प्रतिवर्ष 150 लाख टन तेल निकालने का लक्ष्य है। यह क्षेत्र बंबई से उत्तर-पश्चिमी में 176 कि०मी० दूरी पर स्थित है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 5 आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत

प्रश्न 7.
“कोयला भूतकाल का ईंधन है, पैट्रोलियम वर्तमान का और बिजली शक्ति भविष्य का ईंधन है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
कोयला, पैट्रोलियम तथा बिजली शक्ति आधुनिक युग में ईंधन के प्रमुख साधन हैं। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ इन शक्ति के साधनों का तुलनात्मक महत्त्व बदलता रहा है। यह कथन ठीक है कि कोयला भूतकाल, पैट्रोलियम वर्तमान तथा बिजली शक्ति भविष्य का ईंधन है।

प्राचीन काल में शक्ति के साधनों तथा ईंधन की कमी थी। लकड़ी को जलाकर ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता था। 18वीं शताब्दी में दो आविष्कारों के कारण कोयले का महत्त्व बढ़ता गया। 1769 में भाप के इंजन की खोज से परिवहन के साधनों में कोयले का उपयोग अधिक हो गया। कोक कोयले का धातु गलाने के उद्योग विशेषकर लोहाइस्पात उद्योगों में प्रयोग होने से विशेष परिवर्तन हुआ। इस प्रकार कोयले का उपयोग कारखानों के लिए चालक शक्ति के रूप में भी बढ़ता गया। कोयले का कच्चे माल के रूप में प्रयोग करके कई रंग रोगन, नकली रबड़, प्लास्टिक, खाद इत्यादि भी तैयार किए जाने लगे। घरेलू जीवन में भी कोयले का प्रयोग मकानों को गर्म करने तथा ईंधन के रूप में किया जाने लगा। इस प्रकार 20वीं शताब्दी के आरम्भ में कोयला समस्त शक्ति का 90% भाग प्रदान करता है। कोयला एक सीमित साधन है। इसलिए कोयले के स्थान पर अन्य साधनों की खोज की गई। पैट्रोल, जल बिजली तथा परमाणु शक्ति का प्रयोग किया जाने लगा। इस प्रकार कोयले का महत्त्व कम होना शुरू हो गया। 1950 में संसार की कुल शक्ति का 60% भाग कोयले से प्राप्त होता था। फिर आधुनिक सभ्यता के विकास के लिए कोयला आवश्यक है। कुछ उद्योगों में कोयले के सिवाय दूसरे ईंधन प्रयोग नहीं किए जा सकते। कोयले के भण्डार सीमित हैं। अधिक प्रयोग से यह कम हो रहे हैं। दूसरे साधनों का प्रयोग कई सुविधाओं के कारण बढ़ता जा रहा है। इसलिए हम कह सकते हैं कि कोयला भूतकाल का ईंधन है।
संसार में शक्ति साधनों का उपयोग (%) में
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ईंधन का दूसरा प्रमुख साधन पैट्रोलियम है। तेल की खोज सन् 1859 में हुई। इससे पहले पैट्रोलियम का उपयोग घरेलू रूप में कई देशों में किया जाता था। परन्तु इसका व्यापारिक उपयोग 20वीं शताब्दी में ही आरम्भ हुआ। पिछले 100 वर्षों में पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का प्रयोग परिवहन तथा चालक शक्ति के रूप में निरन्तर बढ़ता जा रहा है। कई सुविधाओं के कारण कारखानों तथा परिवहन में कोयले की अपेक्षा पैट्रोलियम शक्ति का प्रमुख स्रोत बन गया है। आधुनिक मशीनी युग पैट्रोलियम पर ही टिका हुआ है जिससे चिकने पदार्थ प्राप्त होते हैं। तेल से अनेक प्रकार की वस्तुएं जैसे ईंधन पदार्थ, दवाइयां, रंग-रोगन, मशीनों के तेल तैयार किए जाते हैं। आजकल सभ्य समाज में विभिन्न घरेलू कार्यों के लिए पैट्रोलियम को ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। आर्थिक महत्त्व के कारण पैट्रोलियम की मांग तथा प्रयोग में निरन्तर वृद्धि हो रही है। आधुनिक सभ्यता की तेल के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए इसे हम वर्तमान का ईंधन कह सकते हैं क्योंकि निकट भविष्य में ही पैट्रोलियम के साधन समाप्त हो जाएंगे।

पिछले कुछ समय से पैट्रोलियम की कीमतों में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। इसलिए यह एक महंगा साधन बनता जा रहा है। कोयले के भण्डार भी अधिक देर तक नहीं चलाये जा सकते। इसलिए अनेक देशों में बिजली शक्ति का विकास किया जा रहा है। इटली तथा जापान जैसे देश जल शक्ति के सहारे ही संसार में उन्नति के शिखर पर पहुँचे हैं। जल बिजली एक अक्षय साधन है। इसे सुविधापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है। इसलिए इसे श्वेत कोयला (White Coal) भी कहते हैं। संसार के कई प्रदेशों में जल बिजली के विशाल संभाव्य साधन मौजूद हैं, जैसे अफ्रीका में। निकट भविष्य में इन प्रदेशों में कई योजनाओं की सहायता से जल बिजली शक्ति का अधिक मात्रा में विकास किया जाएगा। जिन देशों में कोयला और पैट्रोलियम की कमी है वहाँ औद्योगिक विकास के लिए जल बिजली योजनाएँ बनाई गई हैं। इसी दिशा में अणु शक्ति एक नवीनतम साधन के रूप में उभर रही है परन्तु कई राजनीतिक तथा आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसका भविष्य धुंधला है। अतः बिजली शक्ति को ही भविष्य का ईंधन भी कहा जा सकता है।

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आर्थिक भूगोल : खनिज तथा ऊर्जा स्रोत PSEB 12th Class Geography Notes

  • किसी देश की आर्थिक खुशहाली उसके खनिजों की उपलब्धता तथा उद्योगों के विकास पर निर्भर करती है।
  • हमारे देश की GDP में खनिजों का 2.2% से 2.5% और उद्योगों का 10% से 11% तक का हिस्सा है। |
  • खनिजों को मुख्य रूप में धातु तथा अधातु में विभाजित किया जाता है।
  • खनिजों को लौह तथा अलौह धातु में विभाजित किया जाता है। जिस धातु में लोहा होता है उसे लौह और जिसमें नहीं होता, उन्हें अलौह धातु कहते हैं।
  • लोहा प्राचीन काल से ही बहुत प्रसिद्ध है। इसको आधुनिक सभ्यता की नींव कहते हैं। इसको मैग्नेटाइट, हैमेटाइट, लिमोनाइट, साइडेराइट चार प्रकारों में विभाजित किया जाता है।
  • एल्यूमीनियम बाक्साइट धातु से बनता है। भारत में उड़ीसा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।
  • लोहे से इस्पात बनाने के लिए मैंगनीज मिलाया जाता है। यह हल्के स्लेटी रंग की धातु है। भारत में उड़ीसा मैंगनीज का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। कोयले को काला सोना कहा जाता है। यह मुख्य रूप में ऐन्थेसाइट, बिटुमिनस, लिग्नाइट, पीट इत्यादि चार प्रकार का होता है।
  • ऊर्जा किसी भी देश की आर्थिकता की वृद्धि और विकास की बुनियाद है। ऊर्जा को कई हिस्सों में विभाजित किया जाता है, जैसे कि नवीनीकरण स्रोत, गैर नवीकरणीय स्रोत, परंपरागत स्रोत, गैर पारंपरिक स्रोत, जैविक और अजैविक स्रोत।
  • पैट्रोलियम को तहदार चट्टानों में से निकाले खनिज तेल को साफ करके बनाया जाता है। भारत में पैट्रोल के 27 बेसिन हैं। भारत में प्रमुख पैट्रोल उत्पादक क्षेत्र हैं डिगबोई, बप्यायुंग, सुरमा घाटी में बदरपुर, मसीमपुर, असम और गुजरात इत्यादि।
  • भारत सरकार ने 2022 तक 17.5 गीगावाट ऊर्जा पैदा करने का उद्देश्य रखा है जिसमें 60 GW जलविद्युत् गैस, 100 GW सौर ऊर्जा तथा जैव शक्ति से 10 GW तथा जल शक्ति से 5 GW बिजली पैदा करना है।
  • रिओ डी जेनेरियो में 1992 में अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान स्रोतों की संभाल की सख्ती के साथ वकालत की गई है।
  • खनिज पदार्थ-भारत में बड़ी संख्या में खनिज पदार्थ मिलते हैं। 100 खनिज पदार्थ अनुमानतः भारत में मिलते हैं। मुख्य रूप में खनिज दामोदर घाटी में मिलते हैं। खनिज मुख्य रूप में दो तरह के होते हैं—
    • धातु खनिज
    • अधातु खनिज।
  • बीमार राज्य–बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश को 20 वीं सदी में बीमार राज्य कहते थे क्योंकि यहाँ विकास दर कम थी।
  • लोहे की मुख्य किस्में-लोहे के मुख्य चार प्रकार हैं
    • मैग्नेटाइट-यह सबसे बढ़िया प्रकार 72% शुद्ध लोहा।
    • हैमेटाइट-60% से 70% शुद्ध लोहा
    • लिमोनाइट-40% से 60% शुद्ध लोहा
    • साइडेराइट-40% से 50% लौह अंश
  • खनिज पेटियां-भारत में तीन खनिज पेटियां हैं-उत्तरी पूर्वी पठार, दक्षिण-पश्चिमी पठार, उत्तर पश्चिमी प्रदेश।
  • ऊर्जा संसाधन- भारत में कोयला, खनिज तेल, जलविद्युत् गैस, अणुशक्ति प्रमुख ऊर्जा संसाधन हैं।
  • गैर अपारंपरिक ऊर्जा के स्रोत-कोयला, प्राकृतिक गैस, खनिज तेल, खनिज तथा परमाणु ऊर्जा इत्यादि।
  • जैविक स्त्रोत-वे स्रोत जिनमें जान होती है, जैसे कि जानवर, फसलें, इन्सान इत्यादि।
  • नवीकरणीय तथा गैर नवीकरणीय स्रोत-कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस तथा लकड़ी गैर नवीकरणीय और वायु ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा इत्यादि नवीकरणीय स्रोत हैं।
  • रक्षित पैट्रोलियम भंडार-भारत ने भविष्य की जरूरतों के लिए एक तेल भंडार रक्षित रखा है, जिसमें 50 लाख मीट्रिक टन तेल का भंडार है।
  • निरंतर विकास-जब हम आज की पीढ़ी तथा आने वाली पीढ़ी, दोनों की जरूरतों का ध्यान रखते हैं उसे निरंतर विकास कहते हैं।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

अब्दुस समद स्वाँ 1713-26 ई० (Abdus Samad Khan 1713-26 A.D.)

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद सिखों की दशा कैसी थी ? अब्दुस समद खाँ ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया ?
(What was the condition of the Sikhs after the martyrdom of Banda Singh Bahadur ? How did Abdus Samad Khan tackle the Sikhs ?)
अथवा
अब्दुस समद खाँ ने 1713-1716 तक सिखों की शक्ति कुचलने के लिए क्या कदम उठाए ?
(What steps were taken by Abdus Samad Khan to crush the powers of the Sikhs during 1713-1726 ?)
अथवा
अब्दुस समद खाँ के सिखों के साथ 1713 से 1726 तक कैसे संबंध थे ? (What were the relations of the Sikhs with Abdus Samad Khan during 1713 to 1726 ?)
उत्तर-
अब्दुस समद खाँ को 1713 ई० में मुग़ल सम्राट फर्रुखसियर द्वारा लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया गया था। उसे इस उद्देश्य से इस पद पर नियुक्त किया गया था कि वह पंजाब में सिखों की शक्ति का पूर्णत: दमन कर दे। उसने बंदा सिंह बहादुर को बंदी बना लिया और उसे दिल्ली लाकर 1716 ई० में शहीद कर दिया। फर्रुखसियर अब्दुस समद खाँ की इस कार्यवाई से बहुत प्रसन्न हुआ। अब्दुस समद खाँ के सिखों के साथ संबंधों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है—
1. फर्रुखसियर का आदेश (Farrukhsiyar Edict)-1716 ई० में मुग़ल सम्राट् फर्रुखसियर ने एक शाही आदेश जारी किया। इसमें मुग़ल अधिकारियों को यह आदेश दिया कि जो भी सिख तम्हारे हाथ लगे, उसकी हत्या कर दो। सिखों को सहायता अथवा शरण देने वालों को भी यही सज़ा दी जाए। यदि कोई व्यक्ति सिखों को बंदी बनाने में सरकार की सहायता करे तो उसे पुरस्कार दिया जाए।

2. अब्दुस समद खाँ द्वारा सिखों के विरुद्ध उठाए गए पग (Steps taken by Abdus Samad Khan against the Sikhs)—शाही आदेश के जारी होने के पश्चात् अब्दुस समद खाँ ने सिखों पर घोर अत्याचार आरंभ कर दिए। सैंकड़ों निर्दोष सिखों को प्रतिदिन बंदी बनाकर लाहौर लाया जाता। जल्लाद इन सिखों को घोर यातनाएँ देने के पश्चात् शहीद कर देते। अब्दुस समद खाँ की इस कठोर नीति से बचने के लिए बहुत-से सिखों ने लक्खी वन और शिवालिक पर्वत में जाकर शरण ली। इस प्रकार अपने शासनकाल के आरंभिक कुछ वर्षों में अब्दुस समद खाँ की सिखों के विरुद्ध दमनकारी नीति बहुत सफल रही। इससे प्रसन्न होकर फर्रुखसियर ने उसे ‘राज्य की तलवार’ की उपाधि से सम्मानित किया।

3. सिखों में फूट (Split among the Sikhs)—बंदा सिंह बहादुर के बलिदान के पश्चात् सिख परस्पर फूट का शिकार हो गए। वे तत्त खालसा और बंदई खालसा नामक दो मुख्य संप्रदायों में विभाजित हो गए। तत्त खालसा गुरु गोबिंद सिंह जी के धार्मिक सिद्धांतों के दृढ़ समर्थक थे। बंदई खालसा बंदा सिंह बहादुर को अपना नेता मानने लगे थे। तत्त खालसा वाले आपस में मिलते समय ‘वाहिगुरु जी का खालसा वाहिगुरु जी की फतह’ कहते थे जबकि बंदई खालसा ‘फतह धर्म और फतह दर्शन’ शब्दों का प्रयोग करते थे। तत्त खालसा वाले नीले रंग के वस्त्र धारण करते थे जबकि बंदई खालसा वाले लाल रंग के। दोनों संप्रदायों के बीच परस्पर मतभेद दिन प्रतिदिन बढ़ते गए। फलस्वरूप सिख अब्दुस समद खाँ के अत्याचारों का संगठित होकर सामना न कर पाए।

4. परिस्थितियों में परिवर्तन (Change in Circumstances)-1720 ई० के पश्चात् परिस्थितियों में कुछ परिवर्तन आए और सिखों की स्थिति में सुधार होने लगा। शाही दरबार षड्यंत्रों का अड्डा बन कर रह गया था। परिणामस्वरूप केंद्रीय सरकार सिखों की ओर अपना वाँछित ध्यान न दे पाई। पंजाब में अब्दुस समद खाँ भी ईसा खाँ और हुसैन खाँ के विद्रोहों का दमन करने में उलझ गया। भाई मनी सिंह जी ने बैसाखी के अवसर पर 1721 ई० में अमृतसर में तत्त खालसा और बंदई खालसा में परस्पर समझौता करवा दिया । परिणामस्वरूप सिख फिर से एक हो गए।

5. सिखों की कार्यवाहियाँ (Activities of the Sikhs) स्थिति में परिवर्तन आने से सिखों में एक नया जोश पैदा हुआ। उन्होंने सौ-सौ सिखों के जत्थे बना लिए और मुग़ल प्रदेशों में लूटपाट आरंभ कर दी। उन्होंने उन हिंदुओं और मुसलमानों को दंड देना आरंभ कर दिया था जिन्होंने सिखों, उनकी स्त्रियों और बच्चों को मुग़लों के सुपुर्द कर दिया था। अब्दुस समद खाँ ने सिखों को सबक सिखाने के लिए असलम खाँ के अधीन कुछ सेना अमृतसर भेजी। सिखों ने इस सेना पर अचानक आक्रमण करके उसे कड़ी पराजय दी। इस लड़ाई में असलम खाँ को लड़ाई का मैदान छोड़कर भागने के लिए विवश होना पड़ा।

6. अब्दुस समद खाँ की असफलता (Failure of Abdus Samad Khan)-अब्दुस समद खाँ अपने सभी प्रयासों के बावजूद सिखों का दमन करने में विफल रहा। इसके कई कारण थे। पहला, अब्दुस समद खाँ अब बूढ़ा होने लगा था। दूसरा, सिखों में परस्पर एकता स्थापित हो गई थी। तीसरा, अब्दुस समद खाँ को मुग़ल अधिकारियों के षड्यंत्रों का शिकार होना पड़ा। चौथा, उसे केंद्र से पर्याप्त सहायता न प्राप्त हुई। 1726 ई० में अब्दुस समद खाँ को पदच्युत कर दिया गया।

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MARTYRDOM OF BHAI MANI SINGH JI

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जकरिया रवाँ 1726-45 ई० (Zakariya Khan 1726-45 A.D.)

प्रश्न 2.
सिखों की शक्ति कुचलने के लिए जकरिया खाँ ने क्या पग उठाए ? उसके प्रयासों से उसे कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई ?
(What measures were adopted by Zakariya Khan to crush the powers of the Sikhs ? How far did he succeed in his efforts ?)
अथवा
जकरिया खाँ के राज्यकाल में सिखों के कत्लेआम का संक्षिप्त वर्णन करें। (Describe briefly the persecution of the Sikhs in the reign of Zakariya Khan.)
अथवा
जकरिया खाँ के सिखों के साथ संबंधों की चर्चा करें।
(Discuss the relations of Zakariya Khan with the Sikhs.)
अथवा
जकरिया खाँ के सिखों के साथ निपटने के लिए किस प्रकार के प्रयत्न किए ? (How did Zakariya Khan treat with the Sikhs ?)
अथवा
सिखों की शक्ति को कुचलने के लिए जकरिया खाँ ने क्या कदम उठाए ? उसे अपने प्रयत्नों में किस प्रकार सफलता मिली ?
(What measures were adopted by Zakariya Khan to crush the power of the Sikhs ? How far did he succeed in his efforts ?)
उत्तर-
अब्दुस समद खाँ के बाद उनका पुत्र जकरिया खाँ लाहौर का सूबेदार बना था। वह इस पद पर 1726 ई० से 1745 ई० तक रहा। जकरिया खाँ के शासनकाल तथा उसके सिखों के साथ संबंधों का वर्णन इस प्रकार है—
1. सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाइयाँ (Harsh measures against the Sikhs)—जकरिया खाँ ने पद संभालते ही सिखों की शक्ति का दमन करने के लिए 20,000 सैनिकों को भर्ती किया। गाँवों के मुकद्दमों तथा चौधरियों को यह आदेश दिया गया कि वे सिखों को अपने क्षेत्र में शरणं न दें। जकरिया खाँ ने यह घोषणा की कि किसी सिख के संबंध में सूचना देने वाले को 10 रुपये, बंदी बनवाने वाले को 25 रुपए, बंदी बनाकर सरकार के सुपुर्द करने वाले को 50 रुपए और सिर काटकर सरकार को भेंट करने वाले को 100 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा। इस प्रकार सिखों पर अत्याचारों का दौर पुनः आरंभ हो गया। सैंकड़ों सिखों को लाहौर के दिल्ली गेट में शहीद किया जाने लगा। इसके कारण इस स्थान का नाम ही ‘शहीद गंज’ पड़ गया।

2. भाई तारा सिंह जी वाँ का बलिदान (Martyrdom of Bhai Tara Singh Ji Van)-भाई तारा सिंह जी अमृतसर जिला के गाँव वाँ का निवासी था। उसने बंदा सिंह बहादुर की लड़ाइयों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नौशहरा का चौधरी साहिब राय सिखों के खेतों में अपने घोड़े छोड़ देता था। जब सिख इस बात पर आपत्ति उठाते तो वह सिखों का अपमान करता। भाई तारा सिंह जी वाँ के लिए यह बात असहनीय थी। एक दिन उसने साहिब राय की एक घोड़ी को पकड़कर बेच दिया और मिले हुए पैसों को लंगर के लिए दे दिया। इस पर सिखों को सबक सिखाने दे. लिए साहिब राय ने जकरिया खाँ से सहायता की माँग की तो जकरिया खाँ ने 2200 घुड़सवार सिखों के विरुद्ध भेजे। भाई तारा सिंह जी वाँ और उसके 22 साथी मुग़लों का सामना करते हुए शहीद हो गए। परंतु इससे पूर्व उन्होंने 300 मुगल सैनिकों को यमलोक पहुँचा दिया था। एस० एस० सीतल के शब्दों में,
“उस (तारा सिंह) के बलिदान का सिखों के दिलों पर गहरा प्रभाव पड़ा।”1

3. सिखों की जवाबी.कार्यवाइयाँ (Retaliatory measures of the Sikhs)-भाई तारा सिंह जी वाँ और उसके साथियों के बलिदान ने सिखों में एक नया जोश पैदा किया। उन्होंने गुरिल्ला युद्धों द्वारा सरकारी कोषों को लूटना आरंभ कर दिया। उन्होंने कई स्थानों पर आक्रमण करके सरकार के पिठुओं को मार डाला। जब जकरिया खाँ इन सिखों के विरुद्ध अपने सैनिकों को भेजता तो वे झट वनों और पहाड़ों में जा छुपते।

4. हैदरी ध्वज की घटना (Incident of Haidri Flag) जकरिया खाँ ने सिखों का अंत करने के लिए विवश होकर जेहाद का नारा लगाया। हजारों की संख्या में मुसलमान इनायत उल्ला खाँ के ध्वज तले एकत्रित हो गए। उन्हें ईद के शुभ दिन एक हैदरी ध्वज दिया गया और यह कहा गया कि इस ध्वज तले लड़ने वालों को अल्ला अवश्य विजय देगा। परंतु एक दिन लगभग 7 हज़ार सिखों ने इन गाज़ियों पर अचानक आक्रमण करके हज़ारों गाज़ियों की हत्या कर दी। इस घटना से सरकार की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा।

5. जकरिया खाँ का सिखों से समझौता (Agreement of Zakariya Khan with the Sikhs) अब ज़करिया खाँ ने सिखों को प्रसन्न करने की नीति अपनाई। उसने 1733 ई० में घोषणा की कि यदि सिख सरकार विरोधी कार्यवाइयों को बंद कर दें तो उन्हें एक लाख रुपए वार्षिक आय वाली एक जागीर व उनके नेता को ‘नवाब’ की उपाधि दी जाएगी। पहले तो सिख इस समझौते के विरुद्ध थे, परंतु बाद में उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। सिखों ने नवाब की उपाधि सरदार कपूर सिंह फैज़लपुरिया को दी।

6. बुड्डा दल एवं तरुणा दल का गठन (Formation of Buddha Dal & Taruna Dal)-मुग़लों से समझौता हो जाने पर नवाब कपूर सिंह ने सिखों को यह संदेश भेजा कि वे पुन: अपने घरों में लौट आएं। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिखों की शक्ति दृढ़ करने के उद्देश्य से उन्हें दो जत्थों में संगठित कर दिया। ये जत्थे थेबुड्डा दल और तरुणा दल। बुड्डा दल में 40 वर्ष से बड़ी आयु के सिखों को शामिल किया गया तथा तरुणा दल में उससे कम आयु वाले सिखों को। तरुणा दल को आगे पाँच जत्थों में विभाजित किया गया था। बुड्डा दल धार्मिक स्थानों की देख-रेख करता था जबकि तरुणा दल शत्रुओं का सामना करता था।

7. मुग़लों और सिखों के बीच पुनः संघर्ष (Renewed Struggle between the Mughals and the. Sikhs)-अपनी शक्ति को संगठित करने के बाद सिखों ने अपनी सैनिक कार्यवाइयों को फिर से आरंभ कर दिया। उन्होंने शाही खजाने को लुटना आरंभ कर दिया था। अतः जकरिया खाँ ने क्रोधित होकर सिखों को दी गई जागीर को 1735 ई० में ज़ब्त कर लिया। सिखों के विरुद्ध पुनः कड़ी सैनिक कार्यवाई के आदेश दिए गए। परिणामस्वरूप. सिख वनों की ओर चले गए। इस अवसर का लाभ उठाकर मुग़लों ने हरिमंदिर साहिब पर अधिकार कर लिया।

8. भाई मनी सिंह जी का बलिदान (Martyrdom of Bhai Mani Singh Ji)-भाई मनी सिंह जी 1721 ई० से हरिमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी चले आ रहे थे। उन्होंने जकरिया खाँ को यह निवेदन किया कि यदि वह सिखों को दीवाली के अवसर पर हरिमंदिर साहिब आने की अनुमति दे तो वे 5,000 रुपए भेंट करेंगे। जकरिया खाँ ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। परंतु सिख अमृतसर में एकत्रित हो ही रहे थे, कि जकरिया खाँ के सैनिकों ने उन पर आक्रमण कर दिया और कई निर्दोष सिखों को शहीद कर दिया। फलस्वरूप हरिमंदिर साहिब में दीवाली का उत्सव न मनाया जा सका। जकरिया खाँ ने भाई मनी सिंह जी से 5,000 रुपए की माँग की। भाई मनी सिंह जी यह पैसा देने में असमर्थ रहे अतः उन्हें बंदी बनाकर लाहौर भेज दिया गया। भाई साहिब को इस्लाम ग्रहण करने को कहा गया, परंतु उन्होंने इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें 1738 ई० में निर्ममतापूर्वक शहीद कर दिया गया। इस घटना से सिखों में रोष की लहर दौड़ गई। प्रसिद्ध इतिहासकार खुशवंत सिंह के विचारानुसार,
“पवित्र एवं पूज्य योग मुख्य पुजारी (भाई मनी सिंह) के बलिदान के कारण सिख भड़क उठे।”2

9. सिखों का नादिरशाह को लूटना (Sikhs robbed Nadir Shah)-1739 ई० में नादिरशाह दिल्ली में भारी लूटपाट करके पंजाब से होता हुआ वापिस ईरान जा रहा था। जब सिखों को यह सूचना मिली तो उन्होंने आक्रमण करके उसका बहुत-सा खज़ाना लूट लिया। नादिरशाह ने जकरिया खाँ को यह चेतावनी दी कि शीघ्र ही सिख पंजाब के शासक होंगे।

10. जकरिया खाँ द्वारा सिखों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाइयाँ (Strong actions against the Sikhs by Zakariya Khan) नादिरशाह की चेतावनी का जकरियाँ खाँ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उसने सिखों के विनाश के लिए अनेक पग उठाए। सिखों का पुनः प्रतिदिन बड़ी निर्दयता से शहीद किया जाने लगा। कुछ प्रमुख शहीदों का वर्णन इस प्रकार है

i) भाई बोता सिंह जी (Bhai Bota Singh Ji)—जकरियाँ खाँ ने असंख्य सिखों को शहीद करने के पश्चात् यह घोषणा की कि उसने सिखों का नामो-निशान मिटा दिया है। सिखों का अस्तित्व दर्शाने के लिए भाई बोता सिंह जी ने सराय नूरदीन में एक चौंकी स्थापित कर ली और वहाँ चुंगीकर लेना आरंभ कर दिया। जकरिया खाँ ने उसे गिरफ्तार करने के लिए कुछ सेना भेजी। भाई बोता सिंह जी शत्रुओं का डटकर सामना करते हुए शहीद हो गए।

ii) भाई मेहताब सिंह जी तथा भाई सुखा सिंह जी (Bhai Mehtab Singh Ji and Bhai Sukha Singh Ji) अमृतसर जिले के मंडियाला गाँव का चौधरी मस्सा रंघड़ हरिमंदिर साहिब की पवित्रता को भंग कर रहा था। इस कारण सिख उसे एक सबक सिखाना चाहते थे। एक दिन भाई मेहताब सिंह जी तथा भाई सखा सिंह जी कुछ बोरियों में पत्थर भर कर तथा ऊपर कुछ सिक्के रखकर हरिमंदिर साहिब पहुँच गए। सैनिकों द्वारा पूछने पर उन्होंने बताया कि वह लगान उगाह कर लाए हैं । मस्सा रंघड़ सिक्कों से भरी बोरियाँ देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। जैसे ही वह ये बोरियाँ लेने नीचे झुका उसी समय भाई मेहताब सिंह जी ने तलवार के एक ही वार से उसका सिर धड़ से अलग कर। बाद में मुग़लों ने भाई मेहताब सिंह जी तथा भाई सुखा सिंह जी को बंदी बनाकर 1740 ई० . में बड़ी निर्दयता से शहीद कर दिया गया।

iii) बाल हकीकत राय जी (Bal Haqiqat Rai Ji)—बाल हकीकत राय जी स्यालकोट का रहने वाला था। एक दिन कुछ मुसलमान लड़कों ने हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध कुछ अपमानजनक शब्द कहे। बाल हकीकत राय जी यह सहन न कर सके। उसने हज़रत मुहम्मद साहिब के संबंध में कुछ अनुचित शब्द कहे। इस पर बाल .हकीकत राय जी पर मुकद्दमा चलाया गया तथा मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। यह घटना 1742 ई० की है। इस घटना के कारण लोगों ने ज़ालिम मुग़ल शासन का अंत करने का प्रण लिया।

iv) भाई तारू सिंह जी (Bhai Taru Singh Ji)—भाई तारू सिंह जी माझा क्षेत्र के पूहला गाँव के निवासी थे। वह अपनी आय से अक्सर सिखों की सहायता करते थे। सरकार की दृष्टि में यह एक घोर अपराध था । जकरिया खाँ ने भाई तारू सिंह जी को लाहौर बुलाकर इस्लाम धर्म ग्रहण करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि वह किसी भी मूल्य पर सतगुरु की दी हुई पवित्र दात केशों को नहीं दे सकते। हाँ वह अपने केश अपनी खोपड़ी सहित उतरवा सकते हैं। इस पर जल्लादों ने भाई तारू सिंह की खोपड़ी उतार दी। यह घटना 1745 ई० की है। जब भाई साहिब जी की खोपड़ी उतारी जा रही थी तो वह जपुजी साहिब का पाठ कर रहे थे। इस अद्वितीय बलिदान ने सिखों में एक नया जोश उत्पन्न कर दिया।

11. जकरिया खाँ की मृत्यु (Death of Zakariya Khan) जकरिया खाँ ने निस्संदेह अपने शासन काल में सिखों पर घोर अत्याचार किए। वह अपने अथक प्रयत्नों के बावजूद सिखों की शक्ति को कुचलने में असफल रहा। जकरिया खाँ की 1 जुलाई, 1745 ई० को मृत्यु हो गई। पतवंत सिंह का यह कथन पूर्णतः ठीक है,
“किसी ने भी सिखों का इससे अधिक उत्साह के साथ दमन नहीं किया जितना कि जकरिया खाँ ने।”3

1. “The news of his martyrdom, deeply moved the feelings of the Sikhs.” S.S. Seetal, Rise of the Sikh Power in the Punjab (Ludhiana : 1982) p. 166. .
2. “The killing of the pious and venerable head priest caused deep resentment among the Sikhs.” . Khushwant Singh, The Sikhs (New Delhi : 1989) Vol. 1, p. 237.
3. “No one persecuted the Sikhs with greater zeal than Zakariya Khan.” Patwant Singh, The Sikhs (New Delhi : 1999) p. 83.
याहिया रवाँ 1746-47 ई० (Yahiya Khan 1746 – 47 A.D.)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध

प्रश्न 3.
संक्षेप में अब्दुस समद खाँ तथा जकरिया खाँ के सिखों के साथ संबंधों की चर्चा करें।
(Briefly describe the relations of Abdus Samad Khan and Zakariya Khan with the Sikhs.)
उत्तर-
1. सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाइयाँ (Harsh measures against the Sikhs)—जकरिया खाँ ने पद संभालते ही सिखों की शक्ति का दमन करने के लिए 20,000 सैनिकों को भर्ती किया। गाँवों के मुकद्दमों तथा चौधरियों को यह आदेश दिया गया कि वे सिखों को अपने क्षेत्र में शरणं न दें। जकरिया खाँ ने यह घोषणा की कि किसी सिख के संबंध में सूचना देने वाले को 10 रुपये, बंदी बनवाने वाले को 25 रुपए, बंदी बनाकर सरकार के सुपुर्द करने वाले को 50 रुपए और सिर काटकर सरकार को भेंट करने वाले को 100 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा। इस प्रकार सिखों पर अत्याचारों का दौर पुनः आरंभ हो गया। सैंकड़ों सिखों को लाहौर के दिल्ली गेट में शहीद किया जाने लगा। इसके कारण इस स्थान का नाम ही ‘शहीद गंज’ पड़ गया।

2. भाई तारा सिंह जी वाँ का बलिदान (Martyrdom of Bhai Tara Singh Ji Van)-भाई तारा सिंह जी अमृतसर जिला के गाँव वाँ का निवासी था। उसने बंदा सिंह बहादुर की लड़ाइयों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नौशहरा का चौधरी साहिब राय सिखों के खेतों में अपने घोड़े छोड़ देता था। जब सिख इस बात पर आपत्ति उठाते तो वह सिखों का अपमान करता। भाई तारा सिंह जी वाँ के लिए यह बात असहनीय थी। एक दिन उसने साहिब राय की एक घोड़ी को पकड़कर बेच दिया और मिले हुए पैसों को लंगर के लिए दे दिया। इस पर सिखों को सबक सिखाने दे. लिए साहिब राय ने जकरिया खाँ से सहायता की माँग की तो जकरिया खाँ ने 2200 घुड़सवार सिखों के विरुद्ध भेजे। भाई तारा सिंह जी वाँ और उसके 22 साथी मुग़लों का सामना करते हुए शहीद हो गए। परंतु इससे पूर्व उन्होंने 300 मुगल सैनिकों को यमलोक पहुँचा दिया था। एस० एस० सीतल के शब्दों में,
“उस (तारा सिंह) के बलिदान का सिखों के दिलों पर गहरा प्रभाव पड़ा।”1

3. सिखों की जवाबी.कार्यवाइयाँ (Retaliatory measures of the Sikhs)-भाई तारा सिंह जी वाँ और उसके साथियों के बलिदान ने सिखों में एक नया जोश पैदा किया। उन्होंने गुरिल्ला युद्धों द्वारा सरकारी कोषों को लूटना आरंभ कर दिया। उन्होंने कई स्थानों पर आक्रमण करके सरकार के पिठुओं को मार डाला। जब जकरिया खाँ इन सिखों के विरुद्ध अपने सैनिकों को भेजता तो वे झट वनों और पहाड़ों में जा छुपते।

4. हैदरी ध्वज की घटना (Incident of Haidri Flag) जकरिया खाँ ने सिखों का अंत करने के लिए विवश होकर जेहाद का नारा लगाया। हजारों की संख्या में मुसलमान इनायत उल्ला खाँ के ध्वज तले एकत्रित हो गए। उन्हें ईद के शुभ दिन एक हैदरी ध्वज दिया गया और यह कहा गया कि इस ध्वज तले लड़ने वालों को अल्ला अवश्य विजय देगा। परंतु एक दिन लगभग 7 हज़ार सिखों ने इन गाज़ियों पर अचानक आक्रमण करके हज़ारों गाज़ियों की हत्या कर दी। इस घटना से सरकार की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा।

5. जकरिया खाँ का सिखों से समझौता (Agreement of Zakariya Khan with the Sikhs) अब ज़करिया खाँ ने सिखों को प्रसन्न करने की नीति अपनाई। उसने 1733 ई० में घोषणा की कि यदि सिख सरकार विरोधी कार्यवाइयों को बंद कर दें तो उन्हें एक लाख रुपए वार्षिक आय वाली एक जागीर व उनके नेता को ‘नवाब’ की उपाधि दी जाएगी। पहले तो सिख इस समझौते के विरुद्ध थे, परंतु बाद में उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। सिखों ने नवाब की उपाधि सरदार कपूर सिंह फैज़लपुरिया को दी।

6. बुड्डा दल एवं तरुणा दल का गठन (Formation of Buddha Dal & Taruna Dal)-मुग़लों से समझौता हो जाने पर नवाब कपूर सिंह ने सिखों को यह संदेश भेजा कि वे पुन: अपने घरों में लौट आएं। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिखों की शक्ति दृढ़ करने के उद्देश्य से उन्हें दो जत्थों में संगठित कर दिया। ये जत्थे थेबुड्डा दल और तरुणा दल। बुड्डा दल में 40 वर्ष से बड़ी आयु के सिखों को शामिल किया गया तथा तरुणा दल में उससे कम आयु वाले सिखों को। तरुणा दल को आगे पाँच जत्थों में विभाजित किया गया था। बुड्डा दल धार्मिक स्थानों की देख-रेख करता था जबकि तरुणा दल शत्रुओं का सामना करता था।

7. मुग़लों और सिखों के बीच पुनः संघर्ष (Renewed Struggle between the Mughals and the. Sikhs)-अपनी शक्ति को संगठित करने के बाद सिखों ने अपनी सैनिक कार्यवाइयों को फिर से आरंभ कर दिया। उन्होंने शाही खजाने को लुटना आरंभ कर दिया था। अतः जकरिया खाँ ने क्रोधित होकर सिखों को दी गई जागीर को 1735 ई० में ज़ब्त कर लिया। सिखों के विरुद्ध पुनः कड़ी सैनिक कार्यवाई के आदेश दिए गए। परिणामस्वरूप. सिख वनों की ओर चले गए। इस अवसर का लाभ उठाकर मुग़लों ने हरिमंदिर साहिब पर अधिकार कर लिया।

8. भाई मनी सिंह जी का बलिदान (Martyrdom of Bhai Mani Singh Ji)-भाई मनी सिंह जी 1721 ई० से हरिमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी चले आ रहे थे। उन्होंने जकरिया खाँ को यह निवेदन किया कि यदि वह सिखों को दीवाली के अवसर पर हरिमंदिर साहिब आने की अनुमति दे तो वे 5,000 रुपए भेंट करेंगे। जकरिया खाँ ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। परंतु सिख अमृतसर में एकत्रित हो ही रहे थे, कि जकरिया खाँ के सैनिकों ने उन पर आक्रमण कर दिया और कई निर्दोष सिखों को शहीद कर दिया। फलस्वरूप हरिमंदिर साहिब में दीवाली का उत्सव न मनाया जा सका। जकरिया खाँ ने भाई मनी सिंह जी से 5,000 रुपए की माँग की। भाई मनी सिंह जी यह पैसा देने में असमर्थ रहे अतः उन्हें बंदी बनाकर लाहौर भेज दिया गया। भाई साहिब को इस्लाम ग्रहण करने को कहा गया, परंतु उन्होंने इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें 1738 ई० में निर्ममतापूर्वक शहीद कर दिया गया। इस घटना से सिखों में रोष की लहर दौड़ गई। प्रसिद्ध इतिहासकार खुशवंत सिंह के विचारानुसार,
“पवित्र एवं पूज्य योग मुख्य पुजारी (भाई मनी सिंह) के बलिदान के कारण सिख भड़क उठे।”2

9. सिखों का नादिरशाह को लूटना (Sikhs robbed Nadir Shah)-1739 ई० में नादिरशाह दिल्ली में भारी लूटपाट करके पंजाब से होता हुआ वापिस ईरान जा रहा था। जब सिखों को यह सूचना मिली तो उन्होंने आक्रमण करके उसका बहुत-सा खज़ाना लूट लिया। नादिरशाह ने जकरिया खाँ को यह चेतावनी दी कि शीघ्र ही सिख पंजाब के शासक होंगे।

10. जकरिया खाँ द्वारा सिखों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाइयाँ (Strong actions against the Sikhs by Zakariya Khan) नादिरशाह की चेतावनी का जकरियाँ खाँ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उसने सिखों के विनाश के लिए अनेक पग उठाए। सिखों का पुनः प्रतिदिन बड़ी निर्दयता से शहीद किया जाने लगा। कुछ प्रमुख शहीदों का वर्णन इस प्रकार है

i) भाई बोता सिंह जी (Bhai Bota Singh Ji)—जकरियाँ खाँ ने असंख्य सिखों को शहीद करने के पश्चात् यह घोषणा की कि उसने सिखों का नामो-निशान मिटा दिया है। सिखों का अस्तित्व दर्शाने के लिए भाई बोता सिंह जी ने सराय नूरदीन में एक चौंकी स्थापित कर ली और वहाँ चुंगीकर लेना आरंभ कर दिया। जकरिया खाँ ने उसे गिरफ्तार करने के लिए कुछ सेना भेजी। भाई बोता सिंह जी शत्रुओं का डटकर सामना करते हुए शहीद हो गए।

ii) भाई मेहताब सिंह जी तथा भाई सुखा सिंह जी (Bhai Mehtab Singh Ji and Bhai Sukha Singh Ji) अमृतसर जिले के मंडियाला गाँव का चौधरी मस्सा रंघड़ हरिमंदिर साहिब की पवित्रता को भंग कर रहा था। इस कारण सिख उसे एक सबक सिखाना चाहते थे। एक दिन भाई मेहताब सिंह जी तथा भाई सखा सिंह जी कुछ बोरियों में पत्थर भर कर तथा ऊपर कुछ सिक्के रखकर हरिमंदिर साहिब पहुँच गए। सैनिकों द्वारा पूछने पर उन्होंने बताया कि वह लगान उगाह कर लाए हैं । मस्सा रंघड़ सिक्कों से भरी बोरियाँ देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। जैसे ही वह ये बोरियाँ लेने नीचे झुका उसी समय भाई मेहताब सिंह जी ने तलवार के एक ही वार से उसका सिर धड़ से अलग कर। बाद में मुग़लों ने भाई मेहताब सिंह जी तथा भाई सुखा सिंह जी को बंदी बनाकर 1740 ई० . में बड़ी निर्दयता से शहीद कर दिया गया।

iii) बाल हकीकत राय जी (Bal Haqiqat Rai Ji)—बाल हकीकत राय जी स्यालकोट का रहने वाला था। एक दिन कुछ मुसलमान लड़कों ने हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध कुछ अपमानजनक शब्द कहे। बाल हकीकत राय जी यह सहन न कर सके। उसने हज़रत मुहम्मद साहिब के संबंध में कुछ अनुचित शब्द कहे। इस पर बाल .हकीकत राय जी पर मुकद्दमा चलाया गया तथा मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। यह घटना 1742 ई० की है। इस घटना के कारण लोगों ने ज़ालिम मुग़ल शासन का अंत करने का प्रण लिया।

iv) भाई तारू सिंह जी (Bhai Taru Singh Ji)—भाई तारू सिंह जी माझा क्षेत्र के पूहला गाँव के निवासी थे। वह अपनी आय से अक्सर सिखों की सहायता करते थे। सरकार की दृष्टि में यह एक घोर अपराध था । जकरिया खाँ ने भाई तारू सिंह जी को लाहौर बुलाकर इस्लाम धर्म ग्रहण करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि वह किसी भी मूल्य पर सतगुरु की दी हुई पवित्र दात केशों को नहीं दे सकते। हाँ वह अपने केश अपनी खोपड़ी सहित उतरवा सकते हैं। इस पर जल्लादों ने भाई तारू सिंह की खोपड़ी उतार दी। यह घटना 1745 ई० की है। जब भाई साहिब जी की खोपड़ी उतारी जा रही थी तो वह जपुजी साहिब का पाठ कर रहे थे। इस अद्वितीय बलिदान ने सिखों में एक नया जोश उत्पन्न कर दिया।

11. जकरिया खाँ की मृत्यु (Death of Zakariya Khan) जकरिया खाँ ने निस्संदेह अपने शासन काल में सिखों पर घोर अत्याचार किए। वह अपने अथक प्रयत्नों के बावजूद सिखों की शक्ति को कुचलने में असफल रहा। जकरिया खाँ की 1 जुलाई, 1745 ई० को मृत्यु हो गई। पतवंत सिंह का यह कथन पूर्णतः ठीक है,
“किसी ने भी सिखों का इससे अधिक उत्साह के साथ दमन नहीं किया जितना कि जकरिया खाँ ने।”3

1. “The news of his martyrdom, deeply moved the feelings of the Sikhs.” S.S. Seetal, Rise of the Sikh Power in the Punjab (Ludhiana : 1982) p. 166. .
2. “The killing of the pious and venerable head priest caused deep resentment among the Sikhs.” . Khushwant Singh, The Sikhs (New Delhi : 1989) Vol. 1, p. 237.
3. “No one persecuted the Sikhs with greater zeal than Zakariya Khan.” Patwant Singh, The Sikhs (New Delhi : 1999) p. 83.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध

याहिया रवाँ 1746-47 ई० (Yahiya Khan 1746 – 47 A.D.)

प्रश्न 4.
याहिया खाँ ने सिखों की ताकत को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए ? (What steps were taken by Yahiya Khan to crush the power of the Sikhs ?)
उत्तर-
ज़करिया खाँ की मृत्यु के बाद याहिया खाँ दिल्ली के वज़ीर कमरुद्दीन के सहयोग से 1746 ई० में लाहौर का सूबेदार बना। वह 1747 ई० तक इस पद पर रहा। सिखों पर अत्याचार करने के लिए वह अपने पिता ज़करिया खाँ से एक कदम आगे था। उसके सिखों के साथ संबंधों का वर्णन इस प्रकार है—
1. सिखों की गतिविधियाँ (Activities of the Sikhs)-ज़करिया खाँ की मृत्यु का लाभ उठाकर सिखों ने अपनी शक्ति को संगठित कर लिया था। उन्होंने पंजाब के कई गाँवों में चौधरियों तथा मुकद्दमों की सिखों के विरुद्ध कार्यवाही करने के कारण हत्या कर दी थी। इसके अतिरिक्त सिख पंजाब के कई क्षेत्रों में खूब लूटपाट करते थे।

2. जसपत राय की मृत्यु (Death of Jaspat Rai)-1746 ई० में सिखों के एक जत्थे ने गोंदलावाला गाँव से बहुत-सी भेड़-बकरियों को पकड़ लिया। लोगों की शिकायत पर जसपत राय ने सिखों को ये भेड़-बकरियाँ लौटाने का आदेश दिया। सिखों के इंकार करने पर उसने सिखों पर आक्रमण कर दिया। लड़ाई के दौरान जसपत राय मारा गया। इस कारण मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई।

3. लखपत राय की सिखों के विरुद्ध कार्यवाही (Actions of Lakhpat Rai against the Sikhs)जसपत राय की मृत्यु का समाचार पाकर उसका भाई दीवान लखपत राय आग-बबूला हो गया। उसने यह प्रण किया कि वह सिखों का नामो-निशान मिटा कर ही दम लेगा। याहिया खाँ ने सिखों को उनके धर्म-ग्रंथों को पढने पर प्रतिबंध लगा दिया। उसने गुरु शब्द के प्रयोग पर रोक लगा दी। इस उद्देश्य से उसने गुड़ के स्थान पर लोगों को रोड़ी शब्द का प्रयोग करने के लिए कहा, क्योंकि गुड़ शब्द की आवाज़ गुरु के साथ मिलती-जुलती थी। इसी प्रकार ग्रंथ के स्थान पर पोथी शब्द का प्रयोग करने का आदेश दिया गया। इन आदेशों का उल्लंघन करने वालों को मृत्यु दंड दिया जाता था। उसने बहुत-से सिखों को बंदी बनाया और उनको लाहौर लाकर शहीद कर दिया।

4. पहला घल्लूघारा (First Holocaust)-1746 ई० में याहिया खाँ और लखपत राय के नेतृत्व में मग़ल सेना ने लगभग 15,000 सिखों को काहनूवान में घेर लिया। सिख बसोली की पहाड़ियों की ओर चले गए। मुग़ल सैनिकों ने उनका पीछा किया। सिख भारी संकट में फंस गए। एक ओर ऊँची पहाड़ियाँ थीं और दूसरी ओर रावी नदी में बाढ़ आई हुई थी। पीछे मुग़ल सैनिक उनका पीछा कर रहे थे। इस आक्रमण में 7,000 सिख शहीद हो गए और 3,000 सिखों को बंदी बना लिया गया। सिखों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब सिखों की एक बार में ही इतनी भारी प्राण-हानि हुई। इस दर्दनाक घटना को सिख इतिहास में पहला अथवा छोटा घल्लूघारा के नाम से याद किया जाता है। गुरबख्श सिंह का यह कहना पूर्णतः ठीक है,
“1746 के इस विनाशकारी झटके ने सिखों के इस विश्वास को और बल प्रदान किया कि वे अत्याचारियों का सर्वनाश करें।”4

5. याहिया खाँ का पतन (Fall of Yahiya Khan)-नवंबर, 1746 ई० में याहिया खाँ के छोटे भाई शाहनवाज़ खाँ ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह चार मास तक रहा। इस विद्रोह के अंत में शाहनवाज़ खाँ सफल रहा और उसने 17 मार्च, 1747 ई० को याहिया खाँ को कारावास में डाल दिया। इस प्रकार उसके अत्याचारों का अंत हुआ।

4. “This devastating blow to the Sikhs in 1746 made them more determined than ever to put an end to the genocide.” Gurbakhsh Singh, The Sikh Faith : A Universal Message (Amritsar : 1997) p. 93.

प्रश्न 5.
1726-1746 तक जकरिया खाँ तथा याहिया खाँ ने सिखों की ताकत कुचलने के लिए क्या कदम उठाए ?
(What steps were taken by Zakariya Khan and Yahiya Khan from 1726-1746 in order to crush the power of the Sikhs ?)
अथवा
ज़करिया खाँ तथा याहिया खाँ के अधीन सिखों पर किए गए अत्याचारों का वर्णन करें।
(Describe the persecution of the Sikhs during the rule of Zakariya Khan and Yahiya Khan.)
उत्तर-
ज़करिया खाँ की मृत्यु के बाद याहिया खाँ दिल्ली के वज़ीर कमरुद्दीन के सहयोग से 1746 ई० में लाहौर का सूबेदार बना। वह 1747 ई० तक इस पद पर रहा। सिखों पर अत्याचार करने के लिए वह अपने पिता ज़करिया खाँ से एक कदम आगे था। उसके सिखों के साथ संबंधों का वर्णन इस प्रकार है—
1. सिखों की गतिविधियाँ (Activities of the Sikhs)-ज़करिया खाँ की मृत्यु का लाभ उठाकर सिखों ने अपनी शक्ति को संगठित कर लिया था। उन्होंने पंजाब के कई गाँवों में चौधरियों तथा मुकद्दमों की सिखों के विरुद्ध कार्यवाही करने के कारण हत्या कर दी थी। इसके अतिरिक्त सिख पंजाब के कई क्षेत्रों में खूब लूटपाट करते थे।

2. जसपत राय की मृत्यु (Death of Jaspat Rai)-1746 ई० में सिखों के एक जत्थे ने गोंदलावाला गाँव से बहुत-सी भेड़-बकरियों को पकड़ लिया। लोगों की शिकायत पर जसपत राय ने सिखों को ये भेड़-बकरियाँ लौटाने का आदेश दिया। सिखों के इंकार करने पर उसने सिखों पर आक्रमण कर दिया। लड़ाई के दौरान जसपत राय मारा गया। इस कारण मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई।

3. लखपत राय की सिखों के विरुद्ध कार्यवाही (Actions of Lakhpat Rai against the Sikhs)जसपत राय की मृत्यु का समाचार पाकर उसका भाई दीवान लखपत राय आग-बबूला हो गया। उसने यह प्रण किया कि वह सिखों का नामो-निशान मिटा कर ही दम लेगा। याहिया खाँ ने सिखों को उनके धर्म-ग्रंथों को पढने पर प्रतिबंध लगा दिया। उसने गुरु शब्द के प्रयोग पर रोक लगा दी। इस उद्देश्य से उसने गुड़ के स्थान पर लोगों को रोड़ी शब्द का प्रयोग करने के लिए कहा, क्योंकि गुड़ शब्द की आवाज़ गुरु के साथ मिलती-जुलती थी। इसी प्रकार ग्रंथ के स्थान पर पोथी शब्द का प्रयोग करने का आदेश दिया गया। इन आदेशों का उल्लंघन करने वालों को मृत्यु दंड दिया जाता था। उसने बहुत-से सिखों को बंदी बनाया और उनको लाहौर लाकर शहीद कर दिया।

4. पहला घल्लूघारा (First Holocaust)-1746 ई० में याहिया खाँ और लखपत राय के नेतृत्व में मग़ल सेना ने लगभग 15,000 सिखों को काहनूवान में घेर लिया। सिख बसोली की पहाड़ियों की ओर चले गए। मुग़ल सैनिकों ने उनका पीछा किया। सिख भारी संकट में फंस गए। एक ओर ऊँची पहाड़ियाँ थीं और दूसरी ओर रावी नदी में बाढ़ आई हुई थी। पीछे मुग़ल सैनिक उनका पीछा कर रहे थे। इस आक्रमण में 7,000 सिख शहीद हो गए और 3,000 सिखों को बंदी बना लिया गया। सिखों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब सिखों की एक बार में ही इतनी भारी प्राण-हानि हुई। इस दर्दनाक घटना को सिख इतिहास में पहला अथवा छोटा घल्लूघारा के नाम से याद किया जाता है। गुरबख्श सिंह का यह कहना पूर्णतः ठीक है,
“1746 के इस विनाशकारी झटके ने सिखों के इस विश्वास को और बल प्रदान किया कि वे अत्याचारियों का सर्वनाश करें।”4

5. याहिया खाँ का पतन (Fall of Yahiya Khan)-नवंबर, 1746 ई० में याहिया खाँ के छोटे भाई शाहनवाज़ खाँ ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह चार मास तक रहा। इस विद्रोह के अंत में शाहनवाज़ खाँ सफल रहा और उसने 17 मार्च, 1747 ई० को याहिया खाँ को कारावास में डाल दिया। इस प्रकार उसके अत्याचारों का अंत हुआ।

4. “This devastating blow to the Sikhs in 1746 made them more determined than ever to put an end to the genocide.” Gurbakhsh Singh, The Sikh Faith : A Universal Message (Amritsar : 1997) p. 93.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध

प्रश्न 6.
1716 ई० से 1747 ई० तक सिखों के कत्लेआम का संक्षिप्त वर्णन करें। (Explain in brief the persecution of the Sikhs during 1716 to 1747 A.D.)
अथवा
1716-1747 के समय दौरान मुग़ल गवर्नरों ने सिखों को कुचलने के लिए क्या प्रयास किया ? मुगल गवर्नर सिखों को कुचलने में क्यों असफल रहे ?
(What steps did the Mughal Governors take to crush the Sikhs between 1716-1747 ? Why did the Mughal Governors fail to suppress the Sikhs ?)
नोट-
उत्तर के लिए विद्यार्थी प्रश्न नं० 1, 2 एवं 4 का उत्तर देखें।

मीर मन्नू 1748-53 ई०. (Mir Mannu 1748-53 A.D.)

प्रश्न 7.
मीर मन्नू के अधीन सिखों पर किए गए अत्याचारों का वर्णन कीजिए। उसकी विफलता के कारण भी बताएँ।
(Discuss the persecution of the Sikhs under Mir Mannu. Explain the causes of his failure also.)
अथवा
मीर मन्नू के सिखों के साथ कैसे संबंध थे ? वह अपने उद्देश्य को पूर्ण करने में क्यों विफल रहा ? (Describe Mir Mannu’s relations with the Sikhs. Why did he fail to achieve his objective ?)
अथवा
मीर मन्नू कौन था ? सिखों को कुचलने में उसकी विफलता के क्या कारण थे ? (Who was Mir Mannu ? What were the causes of his failure to crush the Sikhs ?)
अथवा
मीर मन्नू के सिखों के साथ संबंधों की चर्चा कीजिए। (Describe the relations Mir Mannu had with the Sikhs.)
अथवा
मुईन-उल-मुल्क (मीर मन्नू) के जीवन और सफलताओं का वर्णन कीजिए। (Describe the career and achievements of Muin-Ul-Mulk (Mir Mannu)).
अथवा
मीर मन्नू ने सिखों के साथ निपटने के लिए क्या प्रयत्न किए? (What was the strategy of Mir Mannu to fight against the sikhs ?)
उत्तर-
मीर मन्नू मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला के वज़ीर कमरुद्दीन का पुत्र था। वह मुईन-उल-मुल्क के नाम से भी जाना जाता था। वह एक वीर, अनुशासित तथा योग्य राजनीतिज्ञ था। मीर मन्नू के इन्हीं गुणों के कारण उसे पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया गया था। वह 1748 ई० से 1753 ई० तक पंजाब का सूबेदार रहा। हरबंस सिंह के अनुसार, “मीर मन्नू अपने पूर्व-अधिकारियों से अधिक सिखों का कट्टर शत्रु सिद्ध हुआ।”5
1. मीर मन्न की मश्किलें (Difficulties of Mir Mannu) मीर मन्न जब पंजाब का सूबेदार बना तब उसके सामने पहाड़ सी मुश्किलें थीं। सिंहासन की प्राप्ति के लिए याहिया खाँ और शाहनवाज खाँ के बीच संघर्ष के कारण पंजाब में अराजकता फैल गई थी। अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण ने पंजाब की राजनीतिक स्थिति को जटिल बना दिया था। सिखों ने अपनी लूटपाट की कार्यवाइयाँ तेज़ कर दी थीं। राज्यकोष लगभग रिक्त पड़ा था। मीर मन्नू ने इन मुश्किलों पर नियंत्रण करने के लिए विशेष पग उठाने का निर्णय लिया।

2. सिखों के विरुद्ध कार्यवाई (Action against the Sikhs)-मीर मन्नू ने सर्वप्रथम अपना ध्यान सिखों की ओर लगाया। उसने सिखों का विनाश करने के लिए पंजाब के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में अपनी सेना भेजी। उसने जालंधर के फ़ौजदार अदीना बेग को सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करने के आदेश दिए। सिखों को प्रतिदिन बंदी बनाया जाने लगा। अदीना बेग और सिखों में हुई एक लड़ाई में 600 सिख शहीद हो गए। फलस्वरूप सिखों ने वनों में शरण ली।

3. रामरौणी दुर्ग का घेरा (Siege of Ramrauni Fort)-सिख अक्तूबर, 1748 ई० में दीवाली के अवसर पर अमृतसर में एकत्रित हुए। जब मीर मन्नू को यह समाचार मिला तो वह एक विशाल सेना के साथ अमृतसर की ओर बढ़ा। सिखों ने रामरौणी दुर्ग में जाकर शरण ली। मीर मन्नू ने रामरौणी दुर्ग को घेर लिया। यह घेरा चार माह तक जारी रहा। ऐसे समय में जस्सा सिंह रामगढ़िया अपने सैनिकों सहित सिखों की सहायता के लिए पहुँचा। इसी समय मीर मन्नू को यह सूचना मिली कि अहमदशाह अब्दाली पंजाब पर आक्रमण करने वाला है। फलस्वरूप मीर मन्नू ने सिखों के साथ समझौता कर लिया और घेरा उठा लिया। समझौते के अनुसार मीर मन्नू ने सिखों को पट्टी में एक जागीर दी ताकि वे शाँति से रहें।

4. अब्दाली का दूसरा आक्रमण (Second Invasion of Abdali)-अहमदशाह अब्दाली ने दिसंबर, 1748 ई० में पंजाब पर दूसरी बार आक्रमण किया। मीर मन्नू ने बुद्धिमानी से काम लेते हुए अब्दाली से समझौता कर लिया। इसके अनुसार मीर मन्नू ने सियालकोट, गुजरात, पसरूर और औरंगाबाद का लगान अब्दाली को देना मान लिया। यह लगान 14 लाख रुपए वार्षिक था।

5. नासिर खाँ एवं शाह नवाज़ खाँ के विद्रोह (Revolts of Nasir Khan and Shah Nawaz Khan)दिल्ली के वज़ीर सफदरजंग के भड़काने पर फ़ौजदार नासिर खाँ तथा मुलतान के सूबेदार शाहनवाज़ खाँ ने मीर मन्नू के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। शाहनवाज़ खाँ ने सिखों को भी लाहौर में अशांति फैलाने के लिए उकसाया। मीर मन्नू ने कौड़ा मल को शाहनवाज़ खाँ के विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा। इस लड़ाई में शाहनवाज़ खाँ मारा गया।

6. अब्दाली का तीसरा आक्रमण (Third Invasion of Abdali)-अब्दाली ने 1751 ई० के अंत में पंजाब पर तीसरी बार आक्रमण कर दिया। 6 मार्च, 1752 ई० में अहमदशाह अब्दाली और मीर मन्नू की सेनाओं के बीच लाहौर के निकट बड़ा घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में मीर मन्नू को बंदी बना लिया गया। इस प्रकार अहमदशाह अब्दाली का 1752 ई० में पंजाब पर अधिकार हो गया। अहमदशाह अब्दाली ने मीर मन्नू को ही पंजाब का सूबेदार नियुक्त कर दिया और उसे सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करने का आदेश दिया।

7. सिखों पर पुनः अत्याचार (Renewal of Sikh Persecution)—मीर मन्नू ने सिखों का सर्वनाश करने के लिए बड़े जोरदार प्रयास आरंभ कर दिए। सिखों के सिरों के मूल्य निश्चित किए गए। सिखों को शरण देने वालों को कठोर दंड दिए गए। मार्च, 1753 ई० में जब सिख होला मोहल्ला के अवसर पर माखोवाल में एकत्रित हुए थे तो अदीना बेग ने अचानक आक्रमण करके बहुत-से सिखों की हत्या कर दी। सिख स्त्रियों और बच्चों को बंदी बनाकर लाहौर ले जाया गया। इन स्त्रियों और बच्चों पर जो अत्याचार किए गए, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। प्रत्येक स्त्री को सवा-सवा मन अनाज प्रतिदिन पीसने के लिए दिया जाता। छोटे बच्चों को उनकी माताओं से छीनकर उनके सामने हत्या की जाती। इन घोर अत्याचारों के बावजूद सिखों की संख्या कम होने की अपेक्षा बढ़ती चली गई। उस समय यह लोकोक्ति बहुत प्रचलित थी
“मन्नू असाडी दातरी, असीं मन्नू दे सोए।
ज्यों-ज्यों मन्नू वड्दा, असीं दून सवाए होए।”

8. मीर मन्नू की मृत्यु (Death of Mir Mannu)-3 नवंबर, 1753 ई० को मीर मन्नू को यह सूचना मिली कि कुछ सिख तिलकपुर में एक गन्ने के खेत में छुपे हुए हैं। वह तुरंत सिखों का अंत करने के लिए अपने घोड़े पर सवार होकर वहाँ पहुँच गया। वहाँ पर सिखों द्वारा चलाई गई गोलियों के कारण उसका घोड़ा घबरा गया। उसने मीर मन्नू को नीचे गिरा दिया, परंतु उसका एक पाँव घोड़े की रकाब में फंस गया। घोड़ा उसी प्रकार मीर मन्नू को घसीटता गया जिसके कारण मीर मन्नू की मृत्यु हो गई। इस प्रकार प्रकृति ने मीर मन्नू से उसके अत्याचारों का प्रतिशोध ले लिया। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर एन० के० सिन्हा ने ठीक लिखा है,

“अप्रत्यक्ष रूप में मीर मन्नू सिखों की शक्ति बढ़ाने के लिए उत्तरदायी था।”6
1. दल खालसा का संगठन (Organisation of the Dal Khalsa)-मीर मन्नू की विफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण दल खालसा का संगठन था। सिखों ने मीर मन्नू के अत्याचारों का डटकर सामना करने के लिए स्वयं को 12 जत्थों में संगठित कर लिया था। सिख दल खालसा का अत्यधिक सम्मान करते थे और इसके आदेश पर कोई भी बलिदान देने के लिए तैयार रहते थे। परिणामस्वरूप मीर मन्नू के लिए सिखों का दमन करना कठिन हो गया।

2. सिखों के असाधारण गुण (Uncommon qualities of the Sikhs)–सिखों में अपने धर्म के लिए दृढ़ निश्चय, अपार जोश और असीमित बलिदान की भावनाएँ थीं। वे अत्यधिक मुश्किलों की घड़ी में भी अपने धैर्य का त्याग नहीं करते थे। मीर मन्नू ने सिखों पर असीमित अत्याचार किए, परंतु वह सिखों को विचलित करने में असफल रहा। अतः सिखों के इन असाधारण गुणों के कारण भी मीर मन्नू विफल रहा।

3. सिखों की गुरिल्ला युद्ध नीति (Guerilla tactics of the Sikhs)-सिखों ने मुग़ल सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई अर्थात् सिखों को जब अवसर मिलता, वे मुग़ल सेना पर आक्रमण करते और लूटपाट करने के बाद पुनः वनों में जाकर शरण ले लेते। अतः आमने-सामने की टक्कर के अभाव में मीर मन्नू सिखों की शक्ति का दमन करने में विफल रहा।

4. दीवान कौड़ा मल्ल का सिखों से सहयोग (Cooperation of Diwan Kaura Mal with the Sikhs) दीवान कौड़ा मल्ल मीर मन्न का प्रमुख परामर्शदाता था। सहजधारी सिख होने के कारण वह सिखों से सहानुभूति रखता था। मीर मन्नू उसके परामर्श के बिना सिखों के विरुद्ध कोई कार्यवाई नहीं करता था। जब भी मीर मन्नू ने सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करने का निर्णय किया तो दीवान कौड़ा मल्ल उसे सिखों से समझौता करने के लिए मना लेता था। अतः दीवान कौड़ा मल्ल का सहयोग भी सिख शक्ति को बचाए रखने में बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ।

5. अदीना बेग की दोहरी नीति (Dual Policy of Adina Beg)—अदीना बेग जालंधर दोआब का फ़ौजदार था। वह मीर मन्नू के बाद पंजाब का सूबेदार बनना चाहता था। मीर मन्नू ने जब भी उसे सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करने का आदेश दिया तो उसने इसका पालन नहीं किया। वह पंजाब में अशांति के माहौल को बनाए रखना चाहता था। अतः अदीना बेग की दोहरी नीति भी मीर मन्नू की विफलता का कारण बनी।

6. मीर मन्नू की समस्याएँ (Problems of Mir Mannu)-अपने शासनकाल के दौरान कई समस्याओं से घिरा रहने के कारण भी मीर मन्नू सिखों का पूर्ण दमन करने में विफल रहा। उसकी पहली बड़ी समस्या अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण थे। इन आक्रमणों के कारण उसे सिखों के विरुद्ध कार्यवाई स्थगित करनी पड़ती थी। दूसरा, दिल्ली का वज़ीर सफदरजंग भी उसे पदच्युत करने के लिए षड्यंत्र रचता रहता था। उसके कहने पर ही नासिर खाँ और शाह नवाज़ खाँ ने मीर मन्नू के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। फलस्वरूप मीर मन्नू इन समस्याओं से जूझने में ही व्यस्त रहा।

5. “Mir Mannu proved a worse foe of the Sikhs than his predecessors.” Harbans Singh, The Heritage of the Sikhs (New Delhi : 1983) p. 134.
6. “Indirectly, Mir Mannu was responsible for the growth of the power of the Sikhs.” Dr. N.K. Sinha, Rise of the Sikh Power (Calcutta : 1973) p. 19.

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मीर मन्न की विफलता के कारण (Causes of the Failure of Mir Mannu)

प्रश्न 8.
मीर मन्नू की सिखों के विरुद्ध असफलता के क्या कारण थे ?
(What were the main reasons of the failure of Mir Mannu against the Sikhs ?)
अथवा
मीर मन्नू सिखों को कुचलने में क्यों असफल रहा ?
(Why did Mir Mannu fail to crush the Sikhs ?)
अथवा
मीर मन्नू की असफलता के कारणों की व्याख्या करें।
(Explain the causes of failure of Mir Mannu.) :
उत्तर-
मीर मन्नू ने सिखों का अंत करने के लिए अथक प्रयास किए, परंतु इसके बावजूद वह सिखों का दमन करने में विफल रहा। उसकी विफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
1. दल खालसा का संगठन (Organisation of the Dal Khalsa)-मीर मन्नू की विफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण दल खालसा का संगठन था। सिखों ने मीर मन्नू के अत्याचारों का डटकर सामना करने के लिए स्वयं को 12 जत्थों में संगठित कर लिया था। सिख दल खालसा का अत्यधिक सम्मान करते थे और इसके आदेश पर कोई भी बलिदान देने के लिए तैयार रहते थे। परिणामस्वरूप मीर मन्नू के लिए सिखों का दमन करना कठिन हो गया।

2. सिखों के असाधारण गुण (Uncommon qualities of the Sikhs)–सिखों में अपने धर्म के लिए दृढ़ निश्चय, अपार जोश और असीमित बलिदान की भावनाएँ थीं। वे अत्यधिक मुश्किलों की घड़ी में भी अपने धैर्य का त्याग नहीं करते थे। मीर मन्नू ने सिखों पर असीमित अत्याचार किए, परंतु वह सिखों को विचलित करने में असफल रहा। अतः सिखों के इन असाधारण गुणों के कारण भी मीर मन्नू विफल रहा।

3. सिखों की गुरिल्ला युद्ध नीति (Guerilla tactics of the Sikhs)-सिखों ने मुग़ल सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई अर्थात् सिखों को जब अवसर मिलता, वे मुग़ल सेना पर आक्रमण करते और लूटपाट करने के बाद पुनः वनों में जाकर शरण ले लेते। अतः आमने-सामने की टक्कर के अभाव में मीर मन्नू सिखों की शक्ति का दमन करने में विफल रहा।

4. दीवान कौड़ा मल्ल का सिखों से सहयोग (Cooperation of Diwan Kaura Mal with the Sikhs) दीवान कौड़ा मल्ल मीर मन्न का प्रमुख परामर्शदाता था। सहजधारी सिख होने के कारण वह सिखों से सहानुभूति रखता था। मीर मन्नू उसके परामर्श के बिना सिखों के विरुद्ध कोई कार्यवाई नहीं करता था। जब भी मीर मन्नू ने सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करने का निर्णय किया तो दीवान कौड़ा मल्ल उसे सिखों से समझौता करने के लिए मना लेता था। अतः दीवान कौड़ा मल्ल का सहयोग भी सिख शक्ति को बचाए रखने में बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ।

5. अदीना बेग की दोहरी नीति (Dual Policy of Adina Beg)—अदीना बेग जालंधर दोआब का फ़ौजदार था। वह मीर मन्नू के बाद पंजाब का सूबेदार बनना चाहता था। मीर मन्नू ने जब भी उसे सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करने का आदेश दिया तो उसने इसका पालन नहीं किया। वह पंजाब में अशांति के माहौल को बनाए रखना चाहता था। अतः अदीना बेग की दोहरी नीति भी मीर मन्नू की विफलता का कारण बनी।

6. मीर मन्नू की समस्याएँ (Problems of Mir Mannu)-अपने शासनकाल के दौरान कई समस्याओं से घिरा रहने के कारण भी मीर मन्नू सिखों का पूर्ण दमन करने में विफल रहा। उसकी पहली बड़ी समस्या अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण थे। इन आक्रमणों के कारण उसे सिखों के विरुद्ध कार्यवाई स्थगित करनी पड़ती थी। दूसरा, दिल्ली का वज़ीर सफदरजंग भी उसे पदच्युत करने के लिए षड्यंत्र रचता रहता था। उसके कहने पर ही नासिर खाँ और शाह नवाज़ खाँ ने मीर मन्नू के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। फलस्वरूप मीर मन्नू इन समस्याओं से जूझने में ही व्यस्त रहा।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
अब्दुस समद खाँ पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on Abdus Samad Khan.)
अथवा
अब्दुस समद खाँ के अधीन सिखों पर किए गए अत्याचारों का संक्षेप में ब्योरा दें।
(Briefly explain the repressions done on the Sikhs by Abdus Samad Khan.)
उत्तर-
अब्दुस समद खाँ 1713-1726 ई० तक पंजाब का गवर्नर रहा। अब्दुस समद खाँ 1715 ई० में बंदा सिंह बहादुर तथा उसके अन्य साथियों को पकड़ने में सफल हुआ। इसके पश्चात् सिखों पर अत्याचारों का दौर प्रारंभ हो गया। अब्दुस समद खाँ की दमनकारी कार्यवाहियों से प्रसन्न होकर मुग़ल बादशाह फ़र्रुखसियर ने उसको ‘राज्य की तलवार’ का खिताब दिया। अब्दुस समद खाँ अपने पूरे प्रयत्नों के बावजूद सिखों की शक्ति को कुचलने में असफल रहा। परिणामस्वरूप 1726 ई० में उसको उसके पद से हटा दिया गया।

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प्रश्न 2.
बंदई खालसा तथा तत्त खालसा से क्या अभिप्राय है ? उनके बीच मतभेद कैसे समाप्त हुआ ?
(What do you mean by Bandai and Tat Khalsa ? How were their differences resolved ?)
अथवा
बंदई खालसा व तत्त खालसा में मतभेद कैसे समाप्त हुए ?
(How were the differences between Bandai Khalsa and Tat Khalsa finished ?)
अथवा
तत्त खालसा और बंदई खालसा में क्या मतभेद था ? इनके बीच समझौता किसने करवाया ?
(What was the difference between Tat Khalsa and Bandai Khalsa ? Who compromised them ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद सिखों की क्या स्थिति थी ?
(What was the position of the Sikhs after the martyrdom of Banda Singh Bahadur?)
उत्तर-
1716 ई० में बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद सिख बंदई खालसा एवं तत्त खालसा नामक दो दलों में बँट गए। वे सिख जो गुरु गोबिंद सिंह जी के सिद्धांतों को मानते थे तत्त खालसा तथा जो बंदा सिंह बहादुर के सिद्धांतों में विश्वास रखते थे बंदई खालसा कहलवाए। बंदई खालसा बंदा सिंह बहादुर को अपना गुरु मानते थे जबकि तत्त खालसा वाले गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानते थे। 1721 ई० में हरिमंदिर साहिब के प्रमुख ग्रंथी भाई मनी सिंह जी ने इन दोनों दलों में समझौता करवा दिया। इससे सिख संगठन की शक्ति में वृद्धि हुई।

प्रश्न 3.
जकरिया खाँ ने सिखों के साथ निपटने की किस प्रकार कोशिश की ?
(How did Zakariya Khan try to deal with the Sikhs ?)
अथवा
जकरिया खाँ के अधीन सिखों के दमन का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Discuss briefly the persecution of the Sikhs under Zakariya Khan.)
अथवा
सिखों की शक्ति को कुचलने के लिए जकरिया खाँ ने क्या कदम उठाए ? (What measures were atopted by Zakariya Khan to crush the power of the Sikhs ?)
अथवा
सिखों की शक्ति को कुचलने के लिए जकरिया खाँ ने क्या कदम उठाए तथा वह अपने प्रयत्नों में कहां तक सफल रहा ?
(What measures were adopted by Zakariya Khan to crush the power of the Sikhs ? How far did he succeeded in his efforts ?)
उत्तर-
ज़करिया खाँ 1726 ई० में पंजाब का गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने सिखों की शक्ति को कुचलने के लिए कठोर नीति अपनाई। बड़ी संख्या में सिखों को पकड़कर मौत के घाट उतार दिया गया। जब वह सिखों को कुचलने में असफल रहा तो उसने 1733 ई० में सिखों के साथ समझौता कर लिया। कुछ समय के पश्चात् सिखों ने मुग़लों पर पुनः आक्रमण करने शुरू कर दिए। इस कारण जकरिया खाँ को सिखों के प्रति अपनी नीति बदलनी पड़ी। उसने सिखों का फिर से कत्लेआम शुरू कर दिया।

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प्रश्न 4.
तारा सिंह वाँ कौन था ? उसकी शहीदी का सिख इतिहास में क्या महत्त्व है ?
(Who was Tara Singh Van ? What is the importance of his martyrdom in Sikh History ?)
अथवा
भाई तारा सिंह जी वाँ पर संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on Bhai Tara Singh Ji Van.)
उत्तर-
भाई तारा सिंह जी वाँ अपनी पंथ सेवा और वीरता के कारण सिखों में बहुत लोकप्रिय थे। नौशहरा का चौधरी साहिब राय जानबूझ कर सिखों के खेतों में अपने घोड़े छोड़ देता था। एक दिन भाई तारा सिंह वाँ ने साहिब राय की एक घोड़ी को पकड़कर बेच दिया और उन पैसों को लंगर के लिए दे दिया। जब साहिब राय को पता चला तो उसने सिखों को सबक सिखाने के लिए उन पर आक्रमण कर दिया। भाई तारा सिंह वाँ और उसके 22 साथी रात भर मुग़ल सेनाओं से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। यह घटना फरवरी, 1726 ई० की है।

प्रश्न 5.
भाई मनी सिंह जी कौन थे ? उनकी शहीदी का सिख इतिहास में क्या प्रभाव पड़ा ?
(Who was Bhai Mani Singh Ji ? What is the impact of his martyrdom in Sikh History ?).
अथवा
भाई मनी सिंह जी के बलिदान के कारण लिखो। (What were the causes of the martyrdom of Bhai Mani Singh Ji ?)
अथवा
भाई मनी सिंह जी तथा उनकी शहीदी बारे आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Bhai Mani Singh Ji and his martyrdom ?)
अथवा
भाई मनी सिंह जी की शहीदी के कोई तीन कारण बताओ।
(Write any three causes of the martyrdom of Bhai Mani Singh Ji.)
अथवा
भाई मनी सिंह जी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Bhai Mani Singh Ji.)
अथवा
भाई मनी सिंह जी कौन थे ? उनके बलिदान के कारण लिखें। (Who was Bhai Mani Singh Ji ? What were the causes of his martyrdom ?)
उत्तर-
भाई मनी सिंह जी दरबार साहिब, अमृतसर में मुख्य ग्रंथी थे। जकरिया खाँ ने सिखों पर दरबार साहिब जाने पर रोक लगा दी। भाई मनी सिंह जी ने दीवाली के अवसर पर सिखों को दरबार साहिब में एकत्रित होने की जकरिया खाँ से अनुमति ले ली। इसके बदले उन्होंने 5,000 रुपये जकरिया खाँ को देने का वचन दिया। परंतु दीवाली के एक दिन पूर्व ही जकरिया खाँ ने अमृतसर पर आक्रमण कर दिया। इस कारण भाई मनी सिंह जी जकरिया खाँ को 5000 रुपए न दे सके। अत: 1738 ई० में उनको लाहौर में बड़ी निर्ममता के साथ शहीद कर दिया गया। इस शहीदी के कारण सिख भड़क उठे।

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प्रश्न 6.
भाई तारू सिंह जी कौन थे ? उनकी शहीदी का सिख इतिहास में क्या महत्त्व है ?
(Who was Bhai Taru Singh Ji ? What is the significance of his martyrdom in Sikh History ?)
अथवा
भाई तारू सिंह जी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on Bhai Taru Singh Ji.)
उत्तर-
भाई तारू सिंह जी गाँव पूहला के निवासी थे। वह खेती-बाड़ी का व्यवसाय करते थे और इससे होने वाली आय से सिखों की सहायता करते थे। सरकार की दृष्टि में यह एक घोर अपराध था। परिणामस्वरूप भाई साहिब को गिरफ्तार कर लिया गया। जकरिया खाँ ने भाई तारू सिंह जी को इस्लाम ग्रहण करने के लिए कहा। भाई साहिब जी ने इन दोनों बातों से इंकार कर दिया। इस कारण भाई साहिब जी की खोपड़ी को उतार कर 1 जुलाई, 1745 ई० को शहीद कर दिया गया।

प्रश्न 7.
नादिर शाह कौन था ? उसने भारत पर कब आक्रमण किया ? उसके इस आक्रमण का पंजाब पर क्या प्रभाव पड़ा ?
(Who was Nadir Shah ? When did he invade India ? What was the effect of his invasion on the Punjab ?)
अथवा
नादिर शाह के पंजाब पर आक्रमण तथा इसके प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन करो।
(Give a brief account of Nadir Shah’s invasion on Punjab and its impact.)
उत्तर-
नादिरशाह ईरान का बादशाह था। उसने 1739 ई० में भारत पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के दौरान उसने भयंकर लूटमार मचाई। ईरान लौटते समय जब वह पंजाब में से गुजर रहा था तो सिखों ने उसका बहुत सा खजाना लूट लिया। इस घटना से नादिरशाह आश्चर्यचकित रह गया। नादिरशाह ने जकरिया खाँ को चेतावनी दी कि यदि उसने सिखों के विरुद्ध कठोर पग न उठाए तो सिख शीघ्र ही पंजाब पर अपना अधिकार कर लेंगे। परिणामस्वरूप जकरिया खाँ ने सिखों पर अधिक अत्याचार आरंभ कर दिए।

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प्रश्न 8.
बुड्डा दल और तरुणा दल पर एक सक्षिप्त नोट लिखो।
(Write a brief note on Buddha Dal and Taruna Dal.)
अथवा
बुड्डा दल और तरुणा दल का गठन कब किया गया ? सिख इतिहास में इनका क्या महत्त्व है ?
(When were Buddha Dal and Taruna Dal organised ? What is their importance in Sikh History ?)
अथवा बुड्डा दल तथा तरुणा दल से क्या अभिप्राय है ? संक्षेप में वर्णन करें। (What do you mean by ‘Buddha Dal’ and ‘Taruna Dal’ ? Explain in brief.)
अथवा
तरुणा दल पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
(Write a brief note on Taruna Dal.)
उत्तर-
1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिखों की शक्ति को मजबूत करने के उद्देश्य से उन्हें दो दलों में संगठित कर दिया। ये दल थे बुड्डा दल और तरुणा दल। बुड्ढा दल में 40 वर्ष से अधिक आयु के सिखों को शामिल किया गया। तरुणा दल में चालीस वर्ष से कम आयु वाले अर्थात् युवा सिखों को भर्ती किया गया। तरुणा दल को आगे पाँच भागों में बाँटा गया था। बुड्डा दल धार्मिक स्थानों की देखभाल करता था जबकि तरुणा दल शत्रुओं का मुकाबला करता था। इस प्रकार नवाब कपूर सिंह ने सिखों को भविष्य में होने वाले संघर्ष के लिए तैयार कर दिया।

प्रश्न 9.
याहिया खाँ कौन था ? उसके शासनकाल के संबंध में संक्षेप जानकारी दें। (Who was Yahiya Khan ? Give a brief information of his rule.)
उत्तर-
याहिया खाँ 1746 ई० से 1747 ई० में पंजाब का नया सूबेदार रहा। उसने सिखों के प्रति दमनकारी नीति जारी रखी। 1746 ई० में सिखों के साथ हुई एक लड़ाई में लाहौर के दीवान लखपत राय का भाई जसपत राय मारा गया था। इसका बदला लेने के लिए लखपत राय ने याहिया खाँ के साथ मिलकर काहनूवान (गुरदासपुर) में सिखों पर अचानक आक्रमण कर दिया। परिणामस्वरूप सात हजार सिख शहीद हुए। सिख इतिहास में इस खूनी घटना को ‘छोटा घल्लूघारा’ के नाम से याद किया जाता है। 1747 ई० में याहिया खाँ का तख्ता पलट दिया गया।

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प्रश्न 10.
प्रथम अथवा छोटे घल्लूघारे (1746 ई०) के विषय में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the First Holocaust or the Chhota Ghallughara of 1746 ?)
अथवा
पहले घल्लूघारे के बारे में आप क्या जानते हैं?
(What do you know about First Holocaust ?)
अथवा
‘छोटा घल्लूघारा’ पर संक्षेप नोट लिखो। (Write a short note on ‘Chhota Ghallughara’.)
अथवा
‘छोटा घल्लूघारा’ के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the ‘Chhota Ghallughara’.).
उत्तर-
याहिया खाँ और लखपत राय ने सिखों को कुचलने के लिए एक विशाल सेना तैयार की। इस सेना ने सिखों को अचानक काहनूवान ने घेर लिया। इस आक्रमण में 7,000 सिख शहीद हो गए और 3,000 को बंदी बना लिया गया। सिखों को प्रथम बार इतनी भारी प्राण हानि उठानी पड़ी थी। इसके कारण इस घटना को इतिहास में पहला अथवा छोटा घल्लूघारा कहा जाता है। यह घल्लूघारा मई, 1746 ई० को हुआ। इस घल्लूघारे के बावजूद सिखों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई।

प्रश्न 11.
मीर मन्नू द्वारा सिखों के विरुद्ध की गई कार्यवाहियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Describe briefly the sikh persecution under Mir Mannu.)
अथवा
मीर मन्नू द्वारा सिखों के द्रमन का अध्ययन करें।
(Study the persecution of Sikhs by Mir Mannu.)
अथवा
मार मन्नू आर सिखा के संबंधों का वर्णन कीजिए। (Write briefly the relations of Mir Mannu with the Sikhs.)
उत्तर-
मीर मन्नू 1748 ई० से लेकर 1753 ई० तक पंजाब का सूबेदार रहा। उसने सिखों की शक्ति को । कुचलने के लिए हर संभव प्रयास किए। सिखों को प्रतिदिन बंदी बनाकर लाहौर में शहीद किया जाने लगा। मीर मन्नू के इन अत्याचारों से बचने के लिए सिखों ने जंगलों और पहाड़ों में शरण ली। सिखों के हाथ न आने के कारण मीर मन्नू के सैनिकों ने सिख स्त्रियों और बच्चों को बंदी बनाना आरंभ कर दिया। उन पर अति निर्मम अत्याचार किए गए। इन घोर अत्याचारों के बावजूद मीर मन्नू सिखों की शक्ति को कुचलने में असफल रहा।

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प्रश्न 12.
मीर मन्नू सिखों की शक्ति को कुचलने में क्यों असफल रहा ? (Why did Mir Mannu fail to crush the Sikh power ?)
अथवा
मीर मन्नू की सिखों के विरुद्ध असफलता के क्या कारण थे ?
(What were the causes of the failure of Mir Mannu against the Sikhs ?)
उत्तर-

  1. मीर मन्नू की असफलता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि सिख भारी कठिनाइयों के बावजूद कभी साहस नहीं छोड़ते थे।
  2. सिखों की छापामार युद्ध नीति ने मीर मन्नू को असफल बनाने में मुख्य भूमिका निभाई।
  3. मीर मन्नू का दीवान कौड़ा मल सिखों के साथ सहानुभूति रखता था।
  4. जालंधर दोआब के फ़ौजदार अदीना बेग की दुरंगी नीति के कारण भी मीर मन्नू असफल रहा।
  5. मीर मन्नू को अपने शासन काल में बहुतसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ा था। परिणामस्वरूप वह सिखों को कुचलने में कामयाब न हो सका।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
1716 ई० से 1752 ई० तक लाहौर के किसी एक मुग़ल सूबेदार का नाम बताएँ।
अथवा
पंजाब के किसी एक सूबेदार का नाम बताएँ जिसने सिखों पर अत्याचार किए।
उत्तर-
अब्दुस समद खाँ।

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प्रश्न 2.
अब्दुस समद खाँ लाहौर का सूबेदार कब नियुक्त हुआ था ?
उत्तर-
1713 ई०।

प्रश्न 3.
अब्दुस समद खाँ की सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता कौन-सी थी ?
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर क्रो बंदी बनाना।

प्रश्न 4.
अब्दुस समद खाँ को मुग़ल सम्राट् फ़र्रुखसियर ने कौन-सी उपाधि दी ?
उत्तर-
‘राज्य की तलवार’

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प्रश्न 5.
बंदा सिंह बहादुर की मृत्यु के बाद सिखों के जो दो संप्रदाय बन गए थे, उनके नाम बताओ।
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की मृत्यु के पश्चात् सिख कौन-से दो दलों में बँट गए ?
उत्तर-
बंदई खालसा एवं तत्त खालसा।

प्रश्न 6.
बंदई और तत्त खालसा में क्या अंतर था ?
अथवा
बंदई खालसा से आपका क्या अभिप्राय है ?
अथवा
तत्त खालसा से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बंदई खालसा बंदा सिंह बहादुर के सिद्धांतों में तथा तत्त खालसा गुरु गोबिंद सिंह जी के सिद्धांतों में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 7.
बंदई खालसा एवं तत्त खालसा के मध्य झगड़ा कब खत्म हुआ ?
उत्तर-
1721 ई०

प्रश्न 8.
बंदई खालसा एवं तत्त खालसा के मध्य मतभेदों को किसने समाप्त करवाए ?
उत्तर-
भाई मनी सिंह जी।

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प्रश्न 9.
सहजधारी सिख किन्हें कहा जाता था?
उत्तर-
ये वो गैर-सिख थे जो सिख पंथ के सिद्धांतों में तो विश्वास रखते थे, परन्तु इसमें प्रविष्ट नहीं हुए थे।

प्रश्न 10.
जकरिया खाँ कौन था ?
उत्तर-
लाहौर का सूबेदार।

प्रश्न 11.
जकरिया खाँ कब लाहौर का सूबेदार बना ?
उत्तर-
1726 ई०।

प्रश्न 12.
जकरिया खाँ के शासनकाल में शहीद किए जाने वाले किसी एक प्रसिद्ध सिख का नाम बताएँ।
उत्तर-
भाई मनी सिंह जी।

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प्रश्न 13.
जकरिया खाँ ने सिखों के साथ समझौता कब किया ?
उत्तर-
1733 ई०।

प्रश्न 14.
सिखों के उस नेता का नाम बताएँ जिसे 1733 ई० के समझौते के अनुसार नवाब की उपाधि से सम्मानित किया गया था ?
उत्तर-
सरदार कपूर सिंह।

प्रश्न 15.
सिखों के दो दलों के नाम बताओ।
उत्तर-
बुड्डा दल और तरुणा दल।

प्रश्न 16.
बुड्डा दल एवं तरुणा दल की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर-
1734 ई०।

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प्रश्न 17.
बुड्डा दल तथा तरुणा दल की स्थापना कहाँ की गई थी ?
उत्तर-
अमृतसर।

प्रश्न 18.
बुड्डा दल तथा तरुणा दल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह।

प्रश्न 19.
बुड्डा दल से क्या भाव है ?
उत्तर-
बुड्ढा दल 40 वर्ष से अधिक आयु वाले सिखों का दल था।

प्रश्न 20.
तरुणा दल से क्या भाव है ?
उत्तर-
तरुणा दल सिख नौजवानों का दल था।

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प्रश्न 21.
हैदरी झंडे की घटना किसके शासनकाल में हुई ?
उत्तर-
ज़करिया खाँ।

प्रश्न 22.
भाई तारा सिंह जी वाँ कब शहीद हुए ?
उत्तर-
1726 ई०

प्रश्न 23.
भाई मनी सिंह जी कौन थे ?
उत्तर-
हरिमंदिर साहिब, अमृतसर के मुख्य ग्रंथी।

प्रश्न 24.
भाई मनी सिंह जी को कब शहीद किया गया था ?
उत्तर-
1738 ई०।

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प्रश्न 25.
भाई मनी सिंह जी को किसने शहीद करवाया था ?
उत्तर-
ज़करिया खाँ ने।

प्रश्न 26.
नादिर शाह कौन था ?
उत्तर-
ईरान का शासक।

प्रश्न 27.
नादिर शाह ने भारत पर कब आक्रमण किया ?
उत्तर-
1739 ई०।

प्रश्न 28.
नादिर शाह के भारतीय आक्रमण का कोई एक कारण बताओ।
उत्तर-
वह भारत पर विजय प्राप्त कर एक महान् विजेता बनना चाहता था।

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प्रश्न 29.
मस्सा रंगड़ कौन था ?
उत्तर-
अमृतसर जिले के मंडियाला गाँव का चौधरी।

प्रश्न 30.
बाल हकीकत राय जी को कब शहीद किया गया था ?
उत्तर-
1742 ई०।

प्रश्न 31.
बाल हकीकत राय जी की शहीदी का क्या कारण था ?
उत्तर-
क्योंकि उसने बीबी फातिमा के संबंध में कुछ अपमानजनक शब्द कहे थे।

प्रश्न 32.
जकरिया खाँ की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर-
1745 ई० में।

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प्रश्न 33.
याहिया खाँ लाहौर का सूबेदार कब बना ?
उत्तर-
1746 ई० में।

प्रश्न 34.
छोटा अथवा पहला घल्लूघारा कब हुआ ?
उत्तर-
1746 ई०।

प्रश्न 35.
छोटा घल्लूघारा कहाँ हुआ ?
उत्तर-
काहनूवान।

प्रश्न 36.
मीर मन्नू लाहौर का सूबेदार कब बना ?
उत्तर-
1748 ई० में।

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प्रश्न 37.
पंजाब में मुगल शासन का अंत कब हुआ?
उत्तर-
1752 ई०।

प्रश्न 38.
मुइनुल-मुल्क किस अन्य नाम से विख्यात हुआ ?
उत्तर-
मीर मन्नू।

प्रश्न 39.
पंजाब में मुग़लों का अंतिम सूबेदार कौन था ?
अथवा
पंजाब में अफ़गानों का प्रथम सूबेदार कौन था ?
उत्तर-
मीर मन्नू।

प्रश्न 40.
मीर मन्नू कौन था?
उत्तर-
दिल्ली के वज़ीर कमरुद्दीन का पुत्र।

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प्रश्न 41.
मीर मन्नू सिखों का विरोधी क्यों था ?
उत्तर-
क्योंकि वह पंजाब में सिखों का बढ़ता हुआ प्रभाव सहन करने को तैयार नहीं था।

प्रश्न 42.
मुग़लों के विरुद्ध सिखों की सफलता के क्या कारण थे ? कोई एक बताएँ।
उत्तर-
सिखों का गुरिल्ला युद्ध नीति को अपनाना।

प्रश्न 43.
कौड़ा मल कौन था ?
उत्तर-
मीर मन्नू का दीवान।

प्रश्न 44.
मीर मन्नू की सिखों के विरुद्ध असफलताओं का कोई एक कारण बताएँ।
अथवा
मीर मन्नू सिखों की ताकत को खत्म करने में क्यों असफल रहा ? कोई एक कारण लिखो।
उत्तर-
सिखों की गुरिल्ला युद्ध नीति।।

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प्रश्न 45.
सिख कौड़ा मल को मिट्ठा मल क्यों कहते थे ?
उत्तर-
क्योंकि वह सिखों से सहानुभूति रखता था

प्रश्न 46.
मीर मन्नू की मृत्यु कब हुई थी ?
उत्तर-
1753 ई०।

प्रश्न 47.
अदीना बेग कौन था ?
उत्तर-
मीर मन्नू के समय जालंधर दोआब का फ़ौजदार।

प्रश्न 48.
मुगलानी बेगम कौन थी?
उत्तर-
पंजाब के सूबेदार मीर मन्नू की विधवा।

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प्रश्न 49.
मीर मन्नू की विधवा का क्या नाम था?
उत्तर-
मुग़लानी बेगम।

प्रश्न 50.
मुग़लानी बेगम पंजाब की सूबेदार कब बनी थी ?
उत्तर-
1753 ई०।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
अब्दुस समद खाँ को………में लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया गया।
उत्तर-
(1713 ई०)

प्रश्न 2.
अब्दुस समद खाँ को सिखों के विरुद्ध दमन की नीति के लिए उसे ……….की उपाधि के साथ सम्मानित किया गया।
उत्तर-
(राज्य की तलवार)

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प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद सिख……तथा ……..नामक दो संप्रदायों में बंट गए।
उत्तर-
(तत्त खालसा, बंदई खालसा)

प्रश्न 4.
1721 ई० में……ने तत्त खालसा व बंदई खालसा में समझौता करवाया।
उत्तर-
(भाई मनी सिंह जी)

प्रश्न 5.
जकरिया खाँ से पहले पंजाब का सूबेदार …………. था।
उत्तर-
(अब्दुस समद खाँ)

प्रश्न 6.
जकरिया खाँ……..में लाहौर का सूबेदार नियुक्त हुआ।
उत्तर-
(1726 ई०)

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प्रश्न 7.
जकरिया खाँ ने……में सिखों के साथ समझौता किया।
उत्तर-
(1733 ई०)

प्रश्न 8.
1733 ई० के समझौते अनुसार नवाब का खिताब………को दिया गया।
उत्तर-
(सरदार कपूर सिंह)

प्रश्न 9.
बुड्ढा दल और तरुणा दल का गठन ………… ई० में किया गया।
उत्तर-
(1734 ई०)

प्रश्न 10.
भाई मनी सिंह जी को…..में शहीद किया गया।
उत्तर-
(1738 ई०)

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प्रश्न 11.
मस्सा रंगड़ ……………. गाँव का चौधरी था।
उत्तर-
(मंडियाला)

प्रश्न 12.
अमृतसर जिले के मंडियाला गाँव के चौधरी …….. ने हरिमंदिर साहिब की पवित्रता को भंग कर दिया था।
उत्तर-
(मस्सा रंगड़)

प्रश्न 13.
……….में नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण किया।
उत्तर-
(1739 ई०)

प्रश्न 14.
नादिर शाह………..का शासक था।
उत्तर-
(ईरान)

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प्रश्न 15.
पहला या छोटा घल्लूघारा…….में घटित हुआ।
उत्तर-
(1746 ई०)

प्रश्न 16.
पहले घल्लूघारे के समय पंजाब का सूबेदार………था।
उत्तर-
(याहिया खाँ)

प्रश्न 17.
मीर मन्नू को………के नाम से भी जाना जाता है। .
उत्तर-
(मुइन-उल-मुल्क)

प्रश्न 18.
मीर मन्नू पंजाब का सूबेदार………में नियुक्त हुआ।
उत्तर-
(1748 ई०)

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प्रश्न 19.
मीर मन्नू ……..को जालंधर दोआब का फ़ौजदार नियुक्त किया।
उत्तर-
(अदीना बेग)

प्रश्न 20.
मीर मन्नू की मृत्यु. ….में हुई।
उत्तर-
(1753 ई०)

(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
अब्दुस समद खाँ 1716 ई० में पंजाब का सूबेदार बना।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
अब्दुस समद खाँ को मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर ने पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 3.
अब्दुस समद खाँ को ‘राज की तलवार’ कहा जाता था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के बाद पंजाब के सिख तत्त खालसा और बंदई खालसा नामक दो संप्रदायों में बँट गए थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
भाई मनी सिंह जी ने तत्त खालसा और बंदई खालसा में आपसी समझौता करवाया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
तत्त खालसा और बंदई खालसा के मध्य समझौता 1721 ई० में हुआ।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 7.
जकरिया खाँ 1720 ई० में लाहौर का सूबेदार नियुक्त हुआ।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 8.
1726 ई० में भाई तारा सिंह जी वाँ को शहीद किया गया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 9.
जकरिया खाँ ने सिखों के साथ 1733 ई० में समझौता किया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
बुड्डा दल व तरुणा दल का गठन सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया ने किया।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 11.
बुड्ढा दल और तरुणा दल की स्थापना 1734 ई० में की गई थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
जकरिया खाँ ने 1738 ई० में भाई मनी सिंह जी को शहीद किया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 13.
नादिर शाह ने 1739 ई० में भारत पर आक्रमण किया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 14.
बाल हकीकत राय जी को अब्दुस समद खाँ के समय शहीद किया गया था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 15.
भाई तारू सिंह जी को 1745 ई० में शहीद किया गया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 16.
जकरिया खाँ की मौत 1745 ई० में हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 17.
पहला या छोटा घल्लूघारा 1746 ई० में घटित हुआ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 18.
मीर मन्नू 1748 ई० में पंजाब का नया सूबेदार बना।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 19.
अहमद शाह अब्दाली ने 1752 ई० में पंजाब पर कब्जा कर लिया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 20.
मीर मन्नू की मृत्यु 1754 ई० में हुई।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 21.
मीर मन्नू के समय अदीना बेग जालंधर दुआब का फ़ौजदार था।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
1716 ई० में पंजाब का सूबेदार कौन था ?
(i) अब्दुस समद खाँ
(ii) अहमद शाह अब्दाली
(iii) मीर मन्नू
(iv) जकरिया खाँ।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 2.
फर्रुखसियर ने अब्दुस समद खाँ को किस उपाधि से सम्मानित किया ?
(i) खान बहादुर
(ii) राज्य की तलवार
(ii) नासिर खान
(iv) मिट्ठा मल।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 3.
बंदई खालसा और तत्त खालसा में समझौता कब हुआ ?
(i) 1711 ई० में
(ii) 1716 ई० में
(iii) 1721 ई० में
(iv) 1726 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 4.
बंदई खालसा और तत्त खालसा में समझौता किसने करवाया था ?
(i) बाबा दीप सिंह जी ने
(ii) नवाब कपूर सिंह ने
(iii) भाई मनी सिंह जी ने
(iv) भाई तारू सिंह जी ने।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 5.
जकरिया खाँ पंजाब का सूबेदार कब बना ?
(i) 1716 ई० में
(ii) 1717 ई० में
(iii) 1726 ई० में
(iv) 1728 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 6.
हैदरी ध्वज की घटना किसके शासन काल में हुई ?
(i) अब्दुस समद ख़ाँ
(ii) याहिया खाँ
(iii) अहमद शाह अब्दाली
(iv) जकरिया खाँ।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 7.
सिखों और मुग़लों में समझौता कब हुआ ?
(i) 1721 ई० में
(ii) 1724 ई० में
(ii) 1733 ई० में
(iv) 1734 ई० में।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 8.
बुडा दल एवं तरुणा दल का गठन कब किया गया था ?
(i) 1730 ई० में
(ii)- 1735 ई० में
(iii) 1733 ई० में
(iv) 1734 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 9.
बुडा दल एवं तरुणा दल का गठन किसने किया था ?
(i) नवाब कपूर सिंह ने
(ii) भाई मनी सिंह जी ने
(iii) बाबा दीप सिंह जी ने
(iv) भाई मेहताब सिंह ने।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 10.
भाई मनी सिंह जी को कब शहीद किया गया था ?
(i) 1721 ई० में
(ii) 1733 ई० में
(iii) 1734 ई० में
(iv) 1738 ई० में।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 11.
नादिर शाह ने भारत पर कब आक्रमण किया ?
(i) 1736 ई० में
(ii) 1737 ई० में
(iii) 1738 ई० में
(iv) 1739 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 12.
नादिर शाह कहाँ का शासक था ?
(i) अफ़गानिस्तान
(ii) ईराक
(iii) बलोचिस्तान
(iv) ईरान।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 13.
मस्सा रंगड़ कौन था ?
(i) मंडियाला गाँव का चौधरी
(ii) वाँ गाँव का चौधरी
(iii) जालंधर का फ़ौजदार
(iv) सरहिंद का फ़ौजदार।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 14.
बाल हकीकत राय जी को कब शहीद किया गया था ?
(i) 1739 ई० में
(ii) 1740 ई० में
(iii) 1741 ई० में
(iv) 1742 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 15.
जकरिया खाँ की मृत्यु कब हुई ?
(i) 1742 ई० में
(ii) 1743 ई० में
(iii) 1744 ई० में
(iv) 1745 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 16.
पहला घल्लूघारा अथवा छोटा घल्लूघारा कहाँ हुआ था ?
(i) काहनूवान
(ii) कूप
(iii) सरहिंद
(iv) मंडियाला।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 17.
पहला अथवा छोटा घल्लूघारा कब हुआ ?
(i) 1733 ई० में
(ii) 1734 ई० में
(iii) 1739 ई० में
(iv) 1746 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 18.
मीर मन्नू पंजाब का सूबेदार कब बना ?
(i) 1748 ई० में
(ii) 1751 ई० में
(iii) 1752 ई० में
(iv) 1753 ई० में।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 19.
अदीना बेग कौन था ?
(i) मीर मन्नू का परामर्शदाता
(ii) जकरिया खाँ का दीवान
(iii) जालंधर दोआब का फ़ौजदार
(iv) गाँव मंडियाला का चौधरी।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 20.
मीर मन्नू की मृत्यु कब हुई ?
(i) 1750 ई० में
(ii) 1751 ई० में
(iii) 1752 ई० में
(iv) 1753 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 21.
मीर मन्नू सिखों के विरुद्ध क्यों असफल रहा ?
(i) अदीना बेग़ की दोहरी नीति के कारण
(ii) सिखों की गुरिल्ला युद्ध नीति के कारण
(iii) मीर मन्नू के अत्याचार के कारण
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 22.
मुगलानी बेगम पंजाब की सूबेदार कब बनी ? ”
(i) 1751 ई० में
(ii) 1752 ई० में
(iii) 1753 ई० में
(iv) 1754 ई० में।
उत्तर-
(iii)

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Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
अब्दुस समद खाँ पर एक नोट लिखो।
(Write a note on Abdus Samad Khan.)
अथवा
1713 से 1726 ई० के दौरान अब्दुस समद खाँ और सिखों के संबंधों की व्याख्या करें।
(Explain Abdus Samad Khan relations with the Sikhs from 1713-1726.)
उत्तर-
पंजाब में सिखों की बढ़ती हुई शक्ति को कुचलने के लिए मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर ने 1713 ई० में अब्दुस समद खाँ को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। अब्दुस समद खाँ 1715 ई० में बंदा सिंह बहादुर तथा उसके अन्य साथियों को पकड़ने में सफल हुआ। इससे अब्दुस समद खाँ के हौंसले बुलंद हो गए और उसने सिखों पर अत्याचारों का दौर प्रारंभ कर दिया। प्रतिदिन सिखों को बंदी बनाकर लाहौर लाया जाता और वहाँ शहीद कर दिया जाता। उसकी यह मनकारी नीति बड़ी सफल रही। उसकी सफलता से प्रसन्न होकर मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर ने उसको ‘राज्य की तलवार’ का खिताब दिया। उसके अत्याचारों से बचने के लिए बहुत-से सिख जंगलों तथा पहाड़ों की ओर भाग गए थे पर बाद में उन्होंने मुग़लों पर छापामार आक्रमण कर दिया। अब्दुस समद खाँ सिखों के आक्रमण को रोकने में असफल रहा। परिणामस्वरूप 1726 ई० में उसको उसके पद से हटा दिया गया।

प्रश्न 2.
बंदई खालसा तथा तत्त खालसा से क्या अभिप्राय है ? उनके बीच मतभेद कैसे समाप्त हुआ ? (What do you mean by Bandai and Tat Khalsa ? How were their differences resolved ?)
अथवा
तत्त खालसा और बंदई खालसा में क्या मतभेद था? इनके बीच समझौता किसने करवाया ?
(What was the difference between Tat Khalsa and Bandai Khalsa ? Who compromised them ?)
उत्तर-
1. तत्त खालसा-तत् खालसा कट्टर सिखों का एक संप्रदाय था। यह एक सर्वाधिक शक्तिशाली गुट था। तत् खालसा के सदस्य गुरु ग्रंथ साहिब में पूर्ण विश्वास रखते थे तथा उसके नियमों के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते थे। वे गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा निर्धारित नीले वस्त्र पहनते थे। वे एक-दूसरे को मिलते समय वाहेगुरु जी का खालसा एवं वाहेगुरु जी की फतेह’ कहकर सम्बोधन करते थे। वे बंदा सिंह बहादुर द्वारा सिख धर्म में किए गए परिवर्तनों को स्वीकार नहीं करते थे। वे किसी भी प्रकार के चमत्कार दिखाने के विरुद्ध थे। वे बंदा सिंह बहादुर को गुरु की पदवी दिए जाने के विरुद्ध थे।

2. बंदई खालसा-बंदई खालसा सिखों का दूसरा महत्त्वपूर्ण सम्प्रदाय था। बंदा सिंह बहादुर के सैनिक अभियानों ने उनके दिलों पर जादुई प्रभाव डाला था। 1716 ई० में बंदा सिंह बहादुर द्वारा दी गई अद्वितीय शहीदी से वे बहुत प्रभावित हुए। इस कारण बंदई खालसा के लोग बंदा सिंह बहादुर को गुरु समझ कर उसकी उपासना करने लगे। अनेक लोगों का यह विश्वास था कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने ज्योति-जोत समाने से पूर्व बंदा बहादुर को गुरुगद्दी सौंप दी थी। वे बंदा सिंह बहादुर द्वारा दिए गए दो नारों ‘फतेह धर्म’ एवं ‘फतेह दर्शन’ में विश्वास रखते थे। वे बंदा सिंह बहादुर द्वारा निर्धारित लाल रंग के वस्त्र पहनते थे।

3. समझौता-1721 ई० में हरिमंदिर साहिब के प्रमुख ग्रंथी भाई मनी सिंह जी ने दोनों दलों के मध्य समझौता करवा दिया। इस समझौते के परिणामस्वरूप बंदई खालसा व तत्त खालसा एक हो गए। यह समझौता सिख धर्म के विकास के लिए एक मील पत्थर सिद्ध हुआ।

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प्रश्न 3.
जकरिया खाँ ने सिखों के साथ निपटने की किस प्रकार कोशिश की ?
(How did Zakariya Khan try to deal with the Sikhs ?)
अथवा
ज़करिया खाँ के अधीन सिखों के दमन का संक्षिप्त वर्णन करें। (Discuss briefly the persecution of the Sikhs under Zakariya Khan.)
उत्तर-
ज़करिया खाँ 1726 ई० में पंजाब का गवर्नर बना। उसने सिखों के प्रति दमन की नीति अपनाई।
1. उसने अपना पद सम्भालते ही सिखों के विरुद्ध दमनकारी कार्यवाहियाँ आरम्भ कर दी। उसने सिखों की शक्ति का पूर्णतः दमन करने के लिए 20,000 सैनिकों को भर्ती किया।

2. उसने गाँवों के मुकद्दमों, चौधरियों और ज़मींदारों को इस बात के लिए चेतावनी दी कि वे सिखों को अपने अधीन क्षेत्र में शरण न लेने दें और यदि कोई सिख कहीं दिखाई दे तो उसकी सूचना तुरंत सरकार को दी जाए। इसके अतिरिक्त जकरिया खाँ ने एक आदेश द्वारा यह घोषणा की कि किसी सिख के संबंध में सूचना देने वाले को, बंदी बनाने वाले को और सिर काटकर सरकार को भेट करने वाले को विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया जाएगा।

3. सैंकड़ों सिखों को प्रतिदिन लाहौर के दिल्ली गेट में शहीद किया जाने लगा। इस कारण इस स्थान का नाम ‘शहीद गंज’ पड़ गया।

4. इसके बावजूद जब वह अपने उद्देश्य में असफल रहा तो उसने सिखों को प्रसन्न करने की योजना बनाई। उसने 1733 ई० में सिखों के नेता सरदार कपूर सिंह को नवाब का खिताब और एक बड़ी जागीर प्रदान की।

5. सिखों ने इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी शक्ति को पुनः संगठित करना प्रारंभ कर दिया। जकरिया खाँ इसे सहन करने को तैयार न था। अतः उसने सिखों को पुनः कुचलने का प्रयत्न किया। उसने सिखों को दी गई जागीर वापस ले ली और सिखों को पकड़ कर कत्ल करने के आदेश दिए। परिणामस्वरूप भाई मनी सिंह जी, भाई महताब सिंह जी, भाई तारू सिंह जी और बाल हकीकत राय जी जैसे प्रसिद्ध व्यक्तियों को शहीद कर दिया गया। इसके बावजूद जकरिया खाँ अपने अंत तक सिखों की शक्ति को कुचलने में असफल रहा।

प्रश्न 4.
तारा सिंह वाँ कौन थे ? उनकी शहीदी का सिख इतिहास में क्या महत्त्व है ? ।
(Who was Tara Singh Van ? What is the importance of his martyrdom in Sikh History ?)
उत्तर-
तारा सिंह अमृतसर जिला के गांव वाँ के निवासी थे। वह अपनी सिख पंथ की सेवा और वीरता के कारण सिखों में बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने बंदा सिंह बहादुर की लड़ाइयों में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। अब वह अपने गाँव में कृषि करने लग पड़े थे। नौशहरा का चौधरी साहिब राय सिखों के खेतों में अपने घोड़े छोड़ देता जिसके कारण वे फसलों को नष्ट कर देते। जब सिख इस बात पर आपत्ति उठाते तो वह सिखों का बड़ा अपमान करता। सिख इस अपमान को सहन नहीं कर सकते थे। एक दिन तारा सिंह वाँ ने साहिब राय की एक घोड़ी को पकड़ कर बेच दिया और उन पैसों का राशन खरीदकर लंगर के लिए दे दिया। जब साहिब राय को इस संबंध में ज्ञात हुआ तो उसने जकरिया खाँ से सहायता की माँग की। जकरिया खाँ ने 2200 घुड़सवार सिखों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए भेजे। तारा सिंह वाँ और उनके 22 साथियों ने रात भर मुग़ल सेनाओं के खूब छक्के छुड़ाए तथा अंत में शहीद हो गए। इससे पूर्व उन्होंने 300 मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुँचा दिया था और बहुत-से अन्य को घायल कर दिया था। यह घटना फरवरी, 1726 ई० की है। तारा सिंह वां की शहीदी ने सिखों में एक नया जोश उत्पन्न किया।

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प्रश्न 5.
भाई मनी सिंह जी कौन थे ? उनकी शहीदी का सिख इतिहास में क्या प्रभाव पड़ा ? (Who was Bhai Mani Singh Ji ? What is the impact of his martyrdom in Sikh History ?)
अथवा
भाई मनी सिंह जी के बलिदान के कारण लिखो। (What were the causes of the martyrdom of Bhai Mani Singh Ji ?)
अथवा
भाई मनी सिंह जी तथा उनकी शहीदी के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Bhai Mani Singh Ji and his martyrdom ?)
अथवा भाई मनी सिंह जी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Bhai Mani Singh Ji.).
उत्तर-
ज़करिया खाँ के काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना भाई मनी. सिंह जी की शहीदी थी। भाई मनी सिंह जी दरबार साहिब, अमृतसर में मुख्य ग्रंथी थे। सिख उनका बहुत मान-सम्मान करते थे। जकरिया खाँ ने सिखों पर दरबार साहिब जाने पर रोक लगा दी। भाई मनी सिंह जी ने 5 हज़ार रुपये के बदले दीवाली के अवसर पर सिखों को दरबार साहिब में एकत्रित होने की जकरिया खाँ से अनुमति ले ली। बड़ी संख्या में सिख अमृतसर में एकत्रित होने शुरू हो गए। परंतु दीवाली के एक दिन पूर्व ही जकरिया खाँ ने अमृतसर पर आक्रमण कर दिया। इस कारण सिखों में भगदड़ मच गई और दीवाली पर सिख एकत्रित न हो सके। जकरिया खाँ ने भाई मनी सिंह जी को बंदी बना लिया और उनसे 5 हज़ार रुपए की माँग की। मेला न हो सकने के कारण वह इतनी बड़ी राशि नहीं दे सकते थे। इसके बदले उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा गया। भाई मनी सिंह जी के इंकार करने पर 1738 ई० में उनको लाहौर में बड़ी निर्ममता के साथ शहीद कर दिया गया। इस शहीदी के कारण सिख भड़क उठे। उन्होंने मुग़ल साम्राज्य को जड़ से उखाड़ने का निर्णय कर लिया।

प्रश्न 6.
भाई तारू सिंह जी कौन थे ? उनकी शहीदी का सिख इतिहास में क्या महत्त्व है ?
(Who was Bhai Taru Singh Ji ? What is the significance of his martyrdom in Sikh History ?)
अथवा
भाई तारू सिंह जी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Bhai Taru Singh Ji.)
उत्तर-
भाई तारू सिंह जी गाँव पूहला के निवासी थे। वह खेती-बाड़ी का व्यवसाय करते थे और इससे होने वाली आय से सिखों की सहायता करते थे। सरकार की दृष्टि में यह एक घोर अपराध था। जंडियाला के हरिभगत नामक व्यक्ति ने भाई साहिब को गिरफ्तार करवा दिया। उनको लाहौर ले जाया गया जहाँ जकरिया खाँ ने भाई तारू सिंह जी को इस्लाम धर्म ग्रहण करने के लिए कहा। इसके बदले उनको दुनिया भर की खुशियाँ देने का लालच दिया गया। भाई साहिब ने इन दोनों बातों से इंकार कर दिया। इस कारण जकरिया खाँ ने भाई तारू सिंह जी की खोपड़ी उतारने के आदेश दिए। आदेश की पालना करते हुए जल्लादों ने भाई साहिब की खोपड़ी उतारनी प्रारंभ कर दी। जब भाई साहिब की खोपड़ी उतारी जा रही थी तब वह जपुजी साहिब का पाठ कर रहे थे। उनका शरीर लहू-लुहान हो गया था पर वह अपने निश्चय पर अटल रहे। वह इसके 22 दिनों बाद 1 जुलाई, 1745 ई० को शहीद हो गए। इस अभूतपूर्व शहीदी ने सिखों में एक नया जोश भर दिया।

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प्रश्न 7.
नादिर शाह कौन था ? उसके आक्रमण का पंजाब पर क्या प्रभाव पड़ा ?
(Who was Nadir Shah ? What was the effect of his invasion on the Punjab ?)
अथवा
नादिर शाह के पंजाब पर आक्रमण तथा इसके प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन करो। (Give a brief account of Nadir Shah’s invasion on Punjab and its impact.)
उत्तर-
नादिर शाह ईरान का बादशाह था। उसने भारत पर 1739 ई० में आक्रमण किया। इस आक्रमण के दौरान उसने भारत में भारी लूटमार मचाई। वह इतना क्रूर था कि शत्रु उसका नाम सुनते ही थर-थर काँपने लग जाते थे। वापसी के दौरान जब वह दिल्ली से लूटमार कर पंजाब में से गुजर रहा था तो सिखों ने उस पर अचानक हमला करके उसका बहुत-सा खज़ाना लूट लिया। इस घटना से नादिर शाह आश्चर्यचकित रह गया। उसने इन सिखों के संबंध में पंजाब के सूबेदार जकरिया खाँ से पूछताछ की। उसने जकरिया खाँ को यह चेतावनी दी कि यदि उसने सिखों के विरुद्ध कठोर पग न उठाए तो सिख शीघ्र ही पंजाब पर अपना अधिकार कर लेंगे। परिणामस्वरूप जकरिया खाँ ने सिखों पर अधिक अत्याचार आरंभ कर दिए पर नादिर शाह के आक्रमण के बाद पंजाब में अव्यवस्था फैल गई थी। इस स्थिति का लाभ उठाकर सिखों ने अपनी शक्ति को अधिक संगठित करना आरंभ कर दिया था। शीघ्र ही पंजाब में उनका प्रभुत्व बढ़ गया।

प्रश्न 8.
बड़ा दल और तरुणा दल पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a brief note on Buddha Dal and Taruna Dal.)
अथवा
बुड्डा दल और तरुणा दल के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Buddha Dal and Taruna Dal ?)
अथवा
बुड्डा दल तथा तरुणा दल से क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by ‘Buddha Dal’ and ‘Taruna Dal’ ?)
उत्तर-
1733 ई० में सिखों का मुग़लों से समझौता हो जाने के कारण सिखों को अपनी शक्ति संगठित करने का सुनहरी अवसर मिला। नवाब कपूर सिंह ने सिखों को यह संदेश भेजा कि वे जंगलों और पहाड़ों को छोड़कर पुनः अपने घरों को लौट आएँ। इस प्रकार पिछले दो दशकों से मुग़लों और सिखों में चले आ रहे संघर्ष का अंत हुआ और सिखों को कुछ राहत मिली। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिखों की शक्ति को मज़बूत करने के उद्देश्य से उन्हें दो दलों में संगठित कर दिया। ये दल थे बुड्डा दल और तरुणा दल। बुड्डा दल में 40 वर्षों से अधिक आयु के सिखों को शामिल किया गया और इससे कम आयु के सिखों को तरुणा दल में। तरुणा दल को आगे पाँच भागों में बाँटा गया था। प्रत्येक भाग में 1300 से लेकर 2000 सिख थे और प्रत्येक भाग का अपना एक अलग नेता था। बुड्ढा दल धार्मिक स्थानों की देख-भाल करता था जबकि तरुणा दल शत्रुओं का मुकाबला करता था।

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प्रश्न 9.
याहिया खाँ कौन था ? उसके शासन काल के संबंध में संक्षेप जानकारी दें। (Who was Yahiya Khan ? Give a brief information of his rule.)
उत्तर-
ज़करिया खाँ की मृत्यु के बाद याहिया खाँ दिल्ली के वज़ीर कमरुद्दीन के सहयोग से 1746 ई० में लाहौर का सूबेदार बना। वह 1747 ई० तक इस पद पर रहा। सिखों पर अत्याचार करने के लिए वह अपने पिता जकरिया खाँ से एक कदम आगे था। उसके सिखों के साथ संबंधों का वर्णन इस प्रकार है—
1. सिखों की गतिविधियाँ-जकरिया खाँ की मृत्यु का लाभ उठाकर सिखों ने अपनी शक्ति को संगठित कर लिया था। उन्होंने पंजाब के कई गाँवों में चौधरियों तथा मुकद्दमों की सिखों के विरुद्ध कार्यवाही करने के कारण हत्या कर दी थी। इसके अतिरिक्त सिख पंजाब के कई क्षेत्रों में खूब लूटपाट करते थे।

2. जसपत राय की मृत्यु-1746 ई० में सिखों के एक जत्थे ने गोंदलावाला गाँव से बहुत-सी भेड़-बकरियों को पकड़ लिया। लोगों की शिकायत पर जसपत राय ने सिखों को ये भेड़-बकरियाँ लौटाने का आदेश दिया। सिखों के इंकार करने पर उसने सिखों पर आक्रमण कर दिया। लड़ाई के दौरान जसपत राय मारा गया। इस कारण मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई।

3. लखपत राय की सिखों के विरुद्ध कार्यवाही-जसपत राय की मृत्यु का समाचार पाकर उसके भाई दीवान लखपत राय का खून खौल उठा। उसने यह प्रण किया कि वह सिखों का नामो-निशान मिटा कर ही दम लेगा। याहिया खाँ ने सिखों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए। इन आदेशों का उल्लंघन करने वालों को मृत्यु दंड दिया जाता था। उसने बहुत-से सिखों को बंदी बनाया और उनको लाहौर लाकर शहीद कर दिया।

4. पहला घल्लूघारा-1746 ई० में याहिया खाँ और लखपत राय के नेतृत्व में मुग़ल सेना ने लगभग 15,000 सिखों को काहनूवान में घेर लिया। इस आक्रमण में 7,000 सिख शहीद हो गए और 3,000 सिखों को बंदी बना लिया गया। सिखों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब सिखों की एक बार में ही इतनी भारी प्राण-हानि हुई। इस दर्दनाक घटना को सिख इतिहास में पहला अथवा छोटा घल्लूघारा के नाम से याद किया जाता है।

प्रश्न 10.
प्रथम अथवा छोटे घल्लूघारे (1746 ई०) के विषय में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the First Holocaust or the Chhota Ghallughara of 1746 ?)
अथवा
‘छोटा घल्लूघारा’ पर संक्षेप नोट लिखो। (Write a short note on ‘Chhota Ghallughara.’)
उत्तर-
सिखों का सर्वनाश करने के लिए याहिया खाँ और लखपत राय ने एक भारी सेना तैयार की। इस सेना ने लगभग 15,000 सिखों को अचानक काहनूवान में घेर लिया। सिख वहाँ से बचकर बसोली की पहाड़ियों की ओर चले गए। मुग़ल सैनिकों ने उनका बड़ी तेजी से पीछा किया। यहाँ पर सिख बहुत मुश्किल में फंस गए। एक ओर ऊँची पहाड़ियाँ थीं और दूसरी ओर रावी नदी में बाढ़ आई हुई थी। पीछे की ओर मुग़ल सैनिक उनका पीछा कर रहे थे तथा आगे पहाड़ी राजा और लोग भी उनके कट्टर शत्रु थे। सिखों के पास खाद्य सामग्री बिल्कुल नहीं थी। चारे की कमी के कारण घोड़ों की भी भूख से बुरी दशा थी। इस आक्रमण में 7,000 सिख शहीद हो गए और मुग़लों ने 3,000 सिखों को बंदी बना लिया। इन सिखों को लाहौर में शहीद कर दिया गया। सिखों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब सिखों की एक बार में इतनी भारी प्राण-हानि हुई। इसके कारण इस घटना को इतिहास में पहला अथवा छोटा घल्लूघारा के नाम से स्मरण किया जाता है। यह घल्लूघारा मई, 1746 ई० को हुआ। इस विनाशकारी घल्लूघारे के बावजूद सिखों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई।

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प्रश्न 11.
मीर मन्नू कौन था ? उसने अपने शासन काल में सिखों के विरुद्ध क्या कार्यवाही की ? (Who was Mir Mannu ? What steps did he take against the Sikhs during his rule ?)
अथवा
मीर मन्नू द्वारा सिखों के उत्पीड़न का अध्ययन करें। (Study the persecution of Sikhs by Mir Mannu.)
अथवा
मीर मन्नू को और किस नाम से जाना जाता है ? इसका शासन काल सिख शक्ति के उत्थान के लिए कैसे सफल हुआ?
(What was the other name of Mir Mannu ? How did the rule of Mir Mannu help in the rise of Sikh power ?)
अथवा
मीर मन्नू और सिखों के संबंधों का वर्णन कीजिए। (Write briefly the relations of Mir Mannu with the Sikhs.)
उत्तर-
मीर मन्नू को मुइन-उल-मुल्क के नाम से भी जाना जाता था। वह 1748 ई० से लेकर 1752 ई० तक मुगल बादशाह की ओर से तथा 1752 ई० से लेकर 1753 ई० तक अहमदशाह अब्दाली की ओर से पंजाब का सूबेदार रहा। मीर मन्नू सिखों का बहुत कट्टर शत्रु था। अत: मीर मन्नू ने अपना पद संभालने के पश्चात् सर्वप्रथम अपना ध्यान सिखों की ओर लगाया। उन्होंने समूचे पंजाब में बहुत गड़बड़ी फैलाई हुई थी। मीर मन्नू ने सिखों का दमन करने के लिए पंजाब के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में अपनी सैन्य-टुकड़ियाँ भेजीं। उसने जालंधर के फ़ौजदार अदीना बेग को सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने के आदेश दिए। ऐसे ही आदेश पहाड़ी राजाओं को भी दिए गए। फलस्वरूप सिखों को प्रतिदिन बंदी बनाया जाने लगा और उन्हें लाहौर में शहीद किया जाने लगा। जून, 1748 ई० में अदीना बेग और सिखों में हुई एक लड़ाई में 600 सिख शहीद हो गए। अतः सिखों ने आत्म-रक्षा के लिए पर्वतों और वनों में जाकर शरण ली। वे अवसर मिलने पर मुग़ल सेनाओं पर आक्रमण करते और लूटपाट करके पुनः लौट जाते। मीर मन्नू ने सिखों का सर्वनाश करने के लिए बड़े जोरदार प्रयास आरंभ कर दिए। सिखों के सिरों के मूल्य निश्चित किए गए। सिखों को शरण देने वालों को कठोर दंड दिए गए। मार्च, 1753 ई० में जब सिख होला मोहल्ला के अवसर पर माखोवाल में एकत्रित हुए थे तो अदीना बेग ने अचानक आक्रमण करके बहुत-से सिखों की हत्या कर दी। सिख स्त्रियों और बच्चों को बंदी बनाकर लाहौर ले जाया गया। इन स्त्रियों और बच्चों पर जो अत्याचार किए गए, उनका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। प्रत्येक स्त्री को सवा-सवा मन अनाज प्रतिदिन पीसने के लिए दिया जाता। दूध पीते बच्चों को उनकी माताओं से बलपूर्वक छीनकर उनके सामने हत्या की जाती। इन घोर अत्याचारों के बावजूद सिखों की संख्या कम होने की अपेक्षा बढ़ती चली गई। उस समय यह लोकोक्ति बहुत प्रचलित थी—

“मन्नू असाडी दातरी, असीं मन्नू दे सोए।
ज्यों-ज्यों मन्नू वड्दा, असीं दून सवाए होए।”

प्रश्न 12.
मीर मन्नू सिखों की शक्ति को कुचलने में क्यों असफल रहा ? (Why did Mir Mannu fail to crush the Sikh Power ?)
अथवा
मीर मन्नू की सिखों के विरुद्ध असफलता के क्या कारण थे ? कोई छः कारण बतायें।
(What were the causes of the failure of Mir Mannu against the Sikhs ? Write any six Causes.)
अथवा
मीर मन्नू सिखों के विरुद्ध क्यों असफल रहा ?
(Why Mir Mannu was unsuccessful against the Sikhs ?)
उत्तर-
मीर मन्नू ने सिखों का अंत करने के लिए अथक प्रयास किए, परंतु इसके बावजूद वह सिखों का दमन करने में विफल रहा। उसकी विफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
1. दल खालसा का संगठन—मीर मन्नू की विफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण दल खालसा का संगठन था। सिख दल खालसा का अत्यधिक सम्मान करते थे और इसके आदेश पर कोई भी बलिदान देने के लिए तैयार रहते थे। परिणामस्वरूप मीर मन्नू के लिए सिखों का दमन करना कठिन हो गया।

2. सिखों के असाधारण गुण सिखों में अपने धर्म के लिए दृढ़ निश्चय, अपार जोश और असीमित बलिदान की भावनाएँ थीं। वे अत्यधिक मुश्किलों की घड़ी में भी अपने धैर्य का त्याग नहीं करते थे। मीर मन्नू ने सिखों पर असीमित अत्याचार किए, परंतु वह सिखों को विचलित करने में विफल रहा।

3. सिखों की गुरिल्ला युद्ध नीति-सिखों ने मुग़ल सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई अर्थात् सिखों को जब अवसर मिलता, वे मुग़ल सेना पर आक्रमण करते और लूटपाट करने के बाद पुनः वनों में जाकर शरण ले लेते। अतः आमने-सामने की टक्कर के अभाव में मीर मन्नू सिखों की शक्ति का दमन करने में विफल रहा।

4. दीवान कौड़ा मल्ल का सिखों से सहयोग-दीवान कौड़ा मल्ल मीर मन्नू का प्रमुख परामर्शदाता था। सहजधारी सिख होने के कारण वह सिखों से सहानुभूति रखता था। अतः जब भी मीर मन्नू ने सिखों के विरुद्ध कठोर कार्यवाई करने का निर्णय किया तो दीवान कौड़ा मल्ल उसे सिखों से समझौता करने के लिए मना लेता था। अतः दीवान कौड़ा मल्ल का सहयोग भी सिख शक्ति को बचाए रखने में बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ।।

5. मीर मन्नू की समस्याएँ-मीर मन्नू अपने शासनकाल के दौरान कई समस्याओं से घिरा रहने के कारण भी मीर मन्नू सिखों का पूर्ण दमन करने में विफल रहा। उसकी पहली बड़ी समस्या अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण थे। इन आक्रमणों के कारण उसे सिखों के विरुद्ध कार्यवाई स्थगित करनी पड़ती थी। दूसरा, दिल्ली का वज़ीर सफदरजंग भी उसे पदच्युत करने के लिए षड्यंत्र रचता रहता था। फलस्वरूप मीर मन्नू इन समस्याओं से जूझने में ही व्यस्त रहा।

6. मीर मन्नू के अत्याचार-मीर मन्नू ने सिखों की शक्ति का दमन करने के लिए निर्दोष लोगों पर भारी अत्याचार किए। इस कारण ये लोग सिखों के साथ मिल गए। इस कारण सिखों की शक्ति बहुत बढ़ गई। परिणामस्वरूप मीर मन्नू सिखों की शक्ति को कुचलने में असफल रहा।

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Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
शाही आदेश जारी होने के पश्चात् अब्दुस समद खाँ ने सिखों पर घोर अत्याचार आरंभ कर दिए। सैंकड़ों निर्दोष सिखों को प्रतिदिन बंदी बनाकर लाहौर लाया जाता। उन्हें इस्लाम धर्म में शामिल होने पर प्राण-दान का लोभ दिया जाता। किंतु गुरु के सिख ऐसे जीवन से शहीद होना अधिक अच्छा समझते थे। जल्लाद इन सिखों को घोर यातनाएँ देने के पश्चात् उनको शहीद कर देते। अब्दुस समद खाँ की इस कठोर नीति से बचने के लिए बहुत-से सिखों ने लक्खी वन और शिवालिक पहाड़ियों में जाकर शरण ली। यहाँ पर उन्हें भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्हें कई-कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता था अथवा वे वृक्षों के पत्ते और छाल खाकर अपनी भूख मिटाते रहे। मुग़ल अधिकारियों ने पीछे रह गई स्त्रियों और बच्चों पर कहर ढाना आरंभ कर दिया। इस प्रकार अपने शासनकाल के आरंभिक कुछ वर्षों तक अब्दुस समद खाँ की सिखों के विरुद्ध दमनकारी नीति बहुत सफल रही। इससे प्रसन्न होकर फर्रुखसियर ने उसे ‘राज्य की तलवार’ की उपाधि से सम्मानित किया।

  1. अब्दुस समद खाँ कौन था ?
  2. शाही आदेश जारी होने के पश्चात् ……….. ने सिखों पर घोर अत्याचार आरंभ कर दिए।
  3. सिखों को कहाँ शहीद किया जाता था ?
  4. अब्दुस समद खाँ के अत्याचारों से बचने के लिए सिखों ने क्या किया ?
  5. फर्रुखसियर ने अब्दुस समद खाँ को किस उपाधि से सम्मानित किया था ?

उत्तर-

  1. अब्दुस समद खाँ लाहौर का सूबेदार था।
  2. अब्दुस समद खाँ।
  3. सिखों को लाहौर में शहीद किया जाता था।
  4. अब्दुस समद खाँ के अत्याचारों से बचने के लिए सिखों ने जंगलों व शिवालिक पहाड़ियों में जाकर शरण ली।
  5. फर्रुखसियर ने अब्दुस समद खाँ को ‘राज्य की तलवार’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

2
ज़करिया खाँ सिखों की दिन-प्रतिदिन बढ़ रही कार्यवाइयों से बहुत परेशान था। उसने सिखों की शक्ति का दमन करने के लिए जेहाद का नारा लगाया। फलस्वरूप हज़ारों की संख्या में मुसलमान उसके ध्वज तले एकत्रित हो गए। इस सेना का नेतृत्व मीर इनायत उल्ला खाँ को सौंपा गया। उन्हें ईद के शुभ दिन एक हैदरी ध्वज दिया गया और यह घोषणा की गई कि इस ध्वज तले लड़ने वालों को अल्ला अवश्य विजय देगा। जब सिखों को इस संबंध में ज्ञात हुआ तो उन्होंने पुनः वनों और पहाड़ों की शरण ली। एक दिन लगभग 7 हज़ार सिखों ने इन गाज़ियों पर अचानक आक्रमण करके भारी विनाश किया। हज़ारों गाज़ियों की हत्या कर दी गई। इसके अतिरिक्त सिख उनका सामान भी लूटकर ले गए। इस घटना से जहाँ सरकार की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा वहीं इस अद्वितीय सफलता से सिखों का प्रोत्साहन बढ़ गया।

  1. जकरिया खाँ कौन था ?
  2. जेहाद से क्या भाव है ?
  3. हैदरी झंडे की कमान किसे सौंपी गई थी?
  4. हैदरी झंडे की घटना समय पंजाब का सूबेदार कौन था ?
    • अब्दुस समद खाँ
    • मीर मन्नू
    • जकरिया खाँ
    • अहमद शाह अब्दाली।
  5. सिखों ने कहाँ शरण ली थी ?

उत्तर-

  1. जकरिया खाँ लाहौर का सूबेदार था।
  2. जेहाद से भाव है धार्मिक लड़ाई।
  3. हैदरी झंडे की कमान मीर इनायत उल्ला खाँ को सौंपी गई थी।
  4. जकरिया खाँ।
  5. सिखों ने जंगलों तथा पहाड़ों में जाकर शरण ली।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध

3
मुग़लों से समझौता हो जाने पर सिखों को अपनी शक्ति को संगठित करने का स्वर्ण अवसर मिला। नवाब कपूर सिंह ने सिखों को यह संदेश भेजा कि वे वनों और पर्वतों को छोड़कर पुन: अपने घरों में लौट आएँ। इस प्रकार गत दो दशक से मुग़लों और सिखों में चले आ रहे संघर्ष का अंत हुआ और सिखों ने सुख की साँस ली। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिखों की शक्ति दृढ़ करने के उद्देश्य से उन्हें दो जत्थों में संगठित कर दिया। ये जत्थे थे-बुड्डा दल और तरुणा दल। बुड्डा दल में 40 वर्ष से बड़ी आयु के सिखों को सम्मिलित किया गया और इससे कम आयु वाले सिखों को तरुणा दल में। तरुणा दल को आगे पाँच जत्थों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक जत्थे में 1300 से 2000 सिख थे और प्रत्येक जत्थे का अपना एक अलग नेता तथा झंडा था। बुड्डा दल धार्मिक स्थानों की देख-रेख करता था जबकि तरुणा दल शत्रुओं का सामना करता था। इन दलों ने भविष्य में सिख इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  1. मुग़लों तथा सिखों के मध्य समझौता कब हुआ ?
  2. मुगलों तथा सिखों के मध्य समझौते समय पंजाब का सूबेदार कौन था ?
    • अहमद शाह अब्दाली
    • मीर मन्नू
    • जकरिया खाँ
    • उपरोक्त में से कोई नहीं।
  3. नवाब कपूर सिंह कौन था ?
  4. बुड्डा दल तथा तरुणा दल का गठन कब किया गया था ?
  5. बुड्डा दल तथा तरुणा दल में कौन-कौन शामिल थे ?

उत्तर-

  1. मुग़लों तथा सिखों के मध्य समझौता 1733 ई० में हुआ था।
  2. जकरिया खाँ।
  3. नवाब कपूर सिंह 18वीं सदी में सिखों का एक प्रसिद्ध नेता था।
  4. बुड्ढा दल तथा तरुणा दल का गठन 1734 ई० में किया गया था।
  5. बुड्डा दल में 40 वर्ष से अधिक आयु के सिख तथा तरुणा दल में नौजवानों को शामिल किया गया था।

4
भाई मनी सिंह जी के बलिदान को सिख इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सिख पंथ की अद्वितीय सेवा के कारण उनका सिखों में बहुत सम्मान था। वे 1721 ई० से हरिमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी चले आ रहे थे। जकरिया खाँ के सैनिकों द्वारा हरिमंदिर साहिब पर अधिकार और वहाँ पर सिखों को न जाने देने के लिए स्थापित की गई सैनिक चौकियों के कारण वे बहत निराश हुए। 1738 ई० में भाई मनी सिंह जी ने जकरिया खाँ को यह निवेदन किया कि यदि वह सिखों को दीवाली के अवसर पर हरिमंदिर साहिब आने की अनुमति दे तो वे 5,000 रुपये भेट करेंगे। जकरिया खाँ ने यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया। वास्तव में उसके दिमाग में एक योजना आई। इस योजनानुसार वह अमृतसर में दीवाली के अवसर पर एकत्रित होने वाले सिखों पर अचानक आक्रमण करके उनका सर्वनाश करना चाहता था।

  1. भाई मनी सिंह जी कौन थे ?
  2. भाई मनी सिंह जी ने किसे विनती की कि सिखों को अमृतसर में दीवाली के अवसर पर इकट्ठे होने की आज्ञा दी जाए ?
  3. भाई मनी सिंह जी ने सिखों को अमृतसर आने के लिए जकरिया खाँ को कितने रुपये देने का निवेदन किया ?
    • 2,000 रुपये
    • 3,000 रुपये
    • 4,000 रुपये
    • 5,000 रुपये।
  4. भाई मनी सिंह जी को कब शहीद किया गया था ?
  5. भाई मनी सिंह जी की शहीदी का क्या परिणाम निकला ?

उत्तर-

  1. भाई मनी सिंह जी 1721 ई० में हरिमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी थे।
  2. लाहौर के सूबेदार जकरिया खाँ को।
  3. 5,000 रुपये।
  4. भाई मनी सिंह जी को 1738 ई० में शहीद किया गया था।
  5. इस कारण सिखों में एक नया जोश पैदा हुआ।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 12 अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध

5
सिखों का सर्वनाश करने के लिए याहिया खाँ और लखपत राय ने एक भारी सेना तैयार की। उनके नेतृत्व में मुग़ल सेना ने लगभग 15,000 सिखों को अचानक काहनूवान में घेर लिया। सिख वहाँ से बचकर बसोली की पहाड़ियों की ओर चले गए। मुग़ल सैनिकों ने उनका बड़ी तेज़ी से पीछा किया। यहाँ पर सिख भारी संकट में फंस गए। एक ओर ऊँची पहाड़ियाँ थीं और दूसरी ओर रावी नदी में बाढ़ आई हुई थी। पीछे की ओर मुग़ल सैनिक उनका पीछा कर रहे थे तथा आगे पहाड़ी राजा और लोग भी उनके कट्टर शत्रु थे। सिखों के पास खाद्य सामग्री बिल्कुल नहीं थी। चारे की कमी के कारण घोड़ों की भी भूख से बुरी दशा थी। इस आक्रमण में 7,000 सिख शहीद हो गए और मुग़लों ने 3,000 सिखों को बंदी बना लिया। इन सिखों को लाहौर में शहीद कर दिया गया। सिखों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब सिखों की एक बार में ही इतनी भारी प्राण-हानि हुई। इस दर्दनाक घटना को सिख इतिहास में पहला अथवा छोटा घल्लूघारा के नाम से स्मरण किया जाता है। यह घल्लूघारा मई, 1746 ई० को हुआ।

  1. पहला घल्लूघारा कब घटित हुआ ?
  2. पहले घल्लूघारे के समय लाहौर का सूबेदार कौन था ?
  3. पहले घल्लूघारे में कितने सिखों ने शहीदी प्राप्त की थी ?
  4. पहले घल्लूघारे में मुगलों ने …………… सिखों को बंदी बना लिया।
  5. पहले घल्लूघारे को अन्य किस नाम से जाना जाता है ?

उत्तर-

  1. पहला घल्लूघारा मई, 1746 ई० में घटित हुआ।
  2. पहले घल्लूघारे के समय लाहौर का सूबेदार याहिया खाँ था।
  3. पहले घल्लूघारे में 7000 सिखों ने शहीदी प्राप्त की थी।
  4. 3000.
  5. पहले घल्लूघारे को छोटे घल्लूघारा के नाम से भी जाना जाता है।

अब्दुस समद खाँ, जकरिया खाँ और मीर मन्नू-उनके सिखों के साथ संबंध PSEB 12th Class History Notes

  • अब्दुस समद खाँ (Abdus Samad Khan)-अब्दुस समद खाँ 1713 ई० में लाहौर का सूबेदार बना-उसने सिखों पर घोर अत्याचार किए-इससे प्रसन्न होकर मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने उसे ‘राज्य की तलवार’ की उपाधि से सम्मानित किया-मुग़ल अत्याचारों से बचने के लिए सिखों ने स्वयं को जत्थों में संगठित कर लिया-अब्दुस समद खाँ अपने तमाम प्रयासों के बावजूद सिखों का दमन करने में विफल रहा-1726 ई० में उसे पद से हटा दिया गया।
  • जकरिया खाँ (Zakariya Khan)—जकरिया खाँ 1726 ई० में लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया गया-प्रतिदिन लाहौर के दिल्ली गैट पर सैंकड़ों सिखों को शहीद किया जाने लगा था-1726 ई० में भाई तारा सिंह वाँ ने अपने 22 साथियों के साथ जकरिया खाँ के सैनिकों के खूब छक्के छुड़ाए-सिख जत्थों ने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली अपनाकर जकरिया खाँ की रातों की नींद हराम की-सिखों को प्रसन्न करने के लिए जकरिया खाँ ने उनके नेता सरदार कपूर सिंह को एक लाख रुपए की जागीर तथा नवाब की उपाधि प्रदान की-संबंधों के पुनः बिगड़ जाने पर जकरिया खाँ ने हरिमंदिर साहिब पर अधिकार कर लिया-1738 ई० में जकरिया खाँ ने हरिमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी भाई मनी सिंह जी को शहीद कर दिया-जकरिया खाँ के काल में ही हुई भाई बोता सिंह जी, भाई मेहताब सिंह जी, भाई सुखा सिंह जी, बाल हकीकत राय जी तथा भाई तारू सिंह जी की शहीदी ने सिखों में एक नया जोश उत्पन्न कर दिया-परिणामस्वरूप सिखों ने जकरिया खाँ को कभी चैन की साँस न लेने दी-1 जुलाई, 1745 ई० को जकरिया खाँ की मृत्यु हो गई।
  • याहिया खाँ (Yahiya Khan)—याहिया खाँ 1746 ई० में लाहौर का सूबेदार बना-उसने सिखों के विरुद्ध कठोर पग उठाए–याहिया खाँ और दीवान लखपत राय ने मई, 1746 ई० को लगभग 7,000 सिखों को काहनूवान के निकट शहीद कर दिया-इस घटना को छोटा घल्लूघारा के नाम से स्मरण किया जाता है-1747 ई० में याहिया खाँ के छोटे भाई शाहनवाज़ खाँ ने उसे बंदी बना लिया।
  • मीर मन्नू (Mir Mannu)-मीर मन्नू को मुइन-उल-मुल्क के नाम से भी जाना जाता था वह 1748 ई० से 1753 ई० तक पंजाब का सूबेदार रहा-वह अपने पूर्व अधिकारियों से अधिक सिखों का कट्टर शत्रु सिद्ध हुआ-वह 1752 ई० में अब्दाली की ओर से पंजाब का सूबेदार नियुक्त हुआ-मीर मन्नू अपनी समस्त कारवाईयों के बावजूद सिखों की शक्ति का अंत करने में विफल रहा-1753 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।
  • मीर मन्नू की विफलता के कारण (Causes of Failure of Mir Mannu)-सिखों ने दल खालसा का संगठन कर लिया था-सिखों में पंथ के लिए दृढ़ निश्चय, अपार जोश, निडरता और बलिदान की भावनाएँ थीं-सिख गुरिल्ला युद्ध नीति से लड़ते थे-मीर मन्नू का परामर्शदाता दीवान कौड़ा मल सिखों से सहानुभूति रखता था-मीर मन्नू अपने शासन से संबंधित कई समस्याओं से घिरा रहा था।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध : कारण, परिणाम तथा पंजाब का विलय

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 23 द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध : कारण, परिणाम तथा पंजाब का विलय Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 23 द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध : कारण, परिणाम तथा पंजाब का विलय

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

द्वितीय एंग्लो-सिरव युद्ध के कारण (Causes of the Second Anglo-Sikh War)

प्रश्न 1.
उन परिस्थितियों का वर्णन करो जिनके कारण द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध हुआ। इस युद्ध के लिए अंग्रेज़ कहाँ तक उत्तरदायी थे ?
(Discuss the circumstances leading to the Second Anglo-Sikh War. How far were the British responsible for it ?)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के मुख्य कारण क्या थे ? ।
(What were the main causes of Second Anglo-Sikh War ?)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के महत्त्वपूर्ण कारणों की व्याख्या करें। (Explain the important causes of Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध के कारण लिखें।
(Write the reasons of Second Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध में अंग्रेजों की विजय हई और सिखों को पराजय का सामना करना पड़ा। अंग्रेज़ों द्वारा सिखों के साथ किया गया अपमानजनक व्यवहार और थोपी गई संधियों से सिखों में रोष भड़क उठा। इसका परिणाम द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध के रूप में सामने आया। इस युद्ध के मुख्य कारण निम्नलिखित थे—

1. सिखों की अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने की इच्छा (Sikh desire to avenge their defeat in the First Anglo-Sikh War)—यह सही है कि अंग्रेजों के साथ प्रथम युद्ध में सिख पराजित हो गए थे, परंतु इससे उनका साहस किसी प्रकार कम नहीं हुआ था। इस पराजय का मुख्य कारण सिख नेताओं लाल सिंह तथा तेजा सिंह द्वारा की गई गद्दारी थी। सिख सैनिकों को अपनी योग्यता पर पूर्ण विश्वास था। वे अपनी पराजय का प्रतिशोध लेना चाहते थे। उनकी यह प्रबल इच्छा द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध का एक मुख्य कारण बनी।

2. लाहौर तथा भैरोवाल की संधियों से पंजाबी असंतुष्ट (Punjabis were dissatisfied with the Treaties of Lahore and Bhairowal)-अंग्रेज़ों तथा सिखों के बीच हुए प्रथम युद्ध के पश्चात् अंग्रेज़ों ने लाहौर दरबार के साथ लाहौर तथा भैरोवाल नामक दो संधियाँ कीं। इन संधियों द्वारा जालंधर दोआब जैसे प्रसिद्ध उपजाऊ प्रदेश को अंग्रेजों ने अपने अधिकार में ले लिया था। कश्मीर के क्षेत्र को अंग्रेजों ने अपने मित्र गुलाब सिंह के सुपुर्द कर दिया था। पंजाब के लोग महाराजा रणजीत सिंह के अथक प्रयासों से निर्मित साम्राज्य का विघटन होता देख सहन नहीं कर सकते थे। इसलिए सिखों को अंग्रेजों से एक और युद्ध लड़ना पड़ा।

3. सिख सैनिकों में असंतोष (Resentment among the Sikh Soldiers) लाहौर की संधि के अनुसार अंग्रेजों ने खालसा सेना की संख्या 20,000 पैदल तथा 12,000 घुड़सवार निश्चित कर दी थी। इस कारण हजारों की संख्या में सिख सैनिकों को नौकरी से हटा दिया गया था। इससे इन सैनिकों के मन में अंग्रेजों के प्रति रोष उत्पन्न हो गया तथा वे अंग्रेजों के साथ युद्ध की तैयारियाँ करने लगे।

4. महारानी जिंदां से दुर्व्यवहार (Harsh Treatment with Maharani Jindan)-अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह की विधवा महारानी जिंदां से जो अपमानजनक व्यवहार किया, उसने सिखों में अंग्रेजों के प्रति व्याप्त रोष को और भड़का दिया। महारानी जिंदां को अंग्रेज़ों ने लाहौर की संधि द्वारा अवयस्क महाराजा दलीप सिंह की संरक्षक माना था। परंतु अंग्रेजों ने भैरोवाल की संधि के द्वारा महारानी के समस्त अधिकार छीन लिए। 1847 ई० में अंग्रेजों ने महारानी को शेखूपुरा के दुर्ग में नज़रबंद कर दिया। 1848 ई० में महारानी जिंदां को देश निकाला देकर बनारस भेज दिया। महारानी जिंदां के साथ किए गए दुर्व्यवहार के कारण समूचे पंजाब में अंग्रेजों के प्रति रोष की लहर दौड़ गई।

5. दीवान मूलराज का विद्रोह (Revolt of Diwan Moolraj)-द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध को आरंभ करने में मुलतान के दीवान मूलराज के विद्रोह को विशेष स्थान प्राप्त है। 1844 ई० में मूलराज को मुलतान का नया नाज़िम बनाया गया। परंतु अंग्रेजों की गलत नीतियों के कारण दिसंबर, 1847 ई० को दीवान मूलराज ने अपना त्याग-पत्र दे दिया। 1848 ई० में सरदार काहन सिंह को मुलतान का नया नाज़िम नियुक्त किया गया। मूलराज से चार्ज लेने के लिए काहन सिंह के साथ दो अंग्रेज़ अधिकारियों वैनस एग्नयू तथा एंड्रसन को भेजा गया। मूलराज ने उनका स्वागत किया किन्तु मूलराज के कुछ सिपाहियों ने 20 अप्रैल, 1848 ई० को आक्रमण करके उनकी हत्या कर दी तथा काहन सिंह को बंदी बना लिया। उनकी हत्या के लिए मूलराज को दोषी ठहराया गया। इस कारण उसने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का ध्वज उठा लिया। भारत का गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ऐसे ही अवसर की प्रतीक्षा में था। वह चाहता था कि यह विद्रोह अधिक भड़क उठे तथा उसे पंजाब पर अधिकार करने का अवसर मिल जाए। डॉक्टर कृपाल सिंह के अनुसार,
“वह चिंगारी जिसने अग्नि प्रज्वलित की तथा जिसमें पंजाब का स्वतंत्र राज्य जलकर भस्म हो गया, मुलतान से उठी थी।”1

6. चतर सिंह का विद्रोह (Revolt of Chattar Singh)-सरदार चतर सिंह अटारीवाला हज़ारा का नाज़िम था। उसके एक सिपाही ने एक अंग्रेज़ अधिकारी कर्नल कैनोरा की उसके द्वारा चतर सिंह को अपमानित करने के कारण हत्या कर दी। इस पर अंग्रेजों ने सरदार चतर सिंह को पदच्युत कर दिया तथा उसकी जागीर ज़ब्त कर ली। इस कारण चतर सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप चारों ओर विद्रोह की अग्नि फैल गई।

7. शेर सिंह का विद्रोह (Revolt of Sher Singh)—शेर सिंह सरदार चतर सिंह का पुत्र था। जब शेर सिंह को अपने पिता के विरुद्ध किए गए अंग्रेज़ों के दुर्व्यवहार का पता चला तो उसने भी 14 सितंबर, 1848 ई० को अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह करने की घोषणा कर दी। उसकी अपील पर कई सिख सिपाही उसके ध्वज तले एकत्रित हो गए।

8. लॉर्ड डल्हौज़ी की नीति (Policy of Lord Dalhousie)-जनवरी, 1848 ई० में लॉर्ड डलहौज़ी भारत का नया गवर्नर-जनरल बना था। उसने लैप्स की नीति द्वारा भारत की बहुत-सी रियासतों को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। केवल पंजाब ही एक ऐसा राज्य था, जिसे अभी तक अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित नहीं किया जा सका था। वह किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में था। यह अवसर उसे दीवान मूलराज, चतर सिंह तथा शेर सिंह द्वारा किए गए विद्रोहों से मिला।

जब पंजाब में विद्रोह की आग भड़कती दिखाई दी तो लॉर्ड डलहौज़ी ने विद्रोहियों के विरुद्ध कार्यवाई करने का आदेश दिया। अंग्रेज़ कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड ह्यूग गफ 16 नवंबर को सेना लेकर शेर सिंह का सामना करने के लिए चनाब नदी की ओर चल पड़ा।

1. “The spark which arose from Multan kindled the conflagration and reduced the sovereign state of the Punjab to ashes” Dr. Kirpal Singh, History and Culture of the Punjab (Patiala : 1978) Vol. 3, p. 80..

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युद्ध की घटनाएं (Events of the War)

प्रश्न 2.
अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य हुए दूसरे युद्ध की घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन करें। . (Discuss in brief the events of the Second Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
अंग्रेज़ों की कुटिल नीतियों ने अंग्रेज़-सिख संबंधों को एक और युद्ध के कगार पर ला के खड़ा कर दिया। मूलराज, चतर सिंह तथा शेर सिंह के विद्रोह को देखते हुए लॉर्ड डलहौज़ी ने लॉर्ड ह्यूग गफ को सिखों का दमन करने के लिए भेजा। परिणामस्वरूप, दूसरा ऐंग्लो-सिख युद्ध आरंभ हो गया। इस युद्ध की मुख्य घटनाएँ निम्नलिखित थीं—

1. रामनगर की लड़ाई (Battle of Ramnagar)-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की पहली लड़ाई 22 नवंबर, 1848 ई० को रामनगर के स्थान पर हुई। अंग्रेजी सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था। उसके अधीन 20,000 सैनिक थे। सिख सेनाओं का नेतृत्व शेर सिंह कर रहा था। उसके साथ 15,000 सैनिक थे। सिंखों के आक्रमण ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। इस लड़ाई से लॉर्ड गफ को पता चला कि सिखों का सामना करना कोई सहज काम नहीं है।

2. चिल्लियाँवाला की लड़ाई (Battle of Chillianwala)—चिल्लियाँवाला की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों में से एक थी। यह 13 जनवरी, 1849 ई० को लड़ी गई थी। जब लॉर्ड ह्यूग गफ़ को यह सूचना मिली कि चतर सिंह अपने सैनिकों सहित शेर सिंह की सहायता को पहुँच रहा है तो उसने 13 जनवरी को शेर सिंह के सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। यह लड़ाई बहुत भयानक थी। इस लड़ाई में अंग्रेज़ी सेना के 695
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MAHARAJA DALIP SINGH
सैनिक, जिनमें 132 अफ़सर भी मारे गए। अंग्रेजों की चार तोपें भी सिखों के हाथ लगीं। सीताराम कोहली के अनुसार,
“जब से भारत पर अंग्रेज़ों ने अधिकार किया था, चिल्लियाँवाला की लड़ाई में यह उनकी सबसे कड़ी पराजय थी।”2

3. मुलतान की लड़ाई (Battle of Multan)—मुलतान में दीवान मूलराज के विद्रोह करने के बाद शेर सिंह । उसके साथ जा मिला था। अंग्रेजों ने एक चाल चली। उन्होंने नकली पत्र लिखकर शेर सिंह तथा मूलराज में भाँति उत्पन्न कर दी। परिणामस्वरूप, शेर सिंह ने मूलराज का साथ छोड़ दिया। दिसंबर, 1848 ई० में जनरल विश ने मुलतान के किले को घेरा डाल दिया। अंग्रेज़ों की ओर से फेंका गया एक गोला भीतर रखे बारूद पर जा गिरा। इस कारण बहुत-सा बारूद नष्ट हो गया तथा मूलराज के 500 सैनिक भी मारे गए। इस भारी क्षति के कारण मूलराज के लिए युद्ध जारी रखना बहुत कठिन हो गया। अंततः विवश होकर 22 जनवरी, 1849 ई० को मूलराज ने अंग्रेजों के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया। मुलतान की इस विजय से चिल्लियाँवाला में अंग्रेजों का जो अपमान हुआ था, उसकी काफ़ी सीमा तक पूर्ति हो गई।

4. गुजरात की लड़ाई (Battle of Gujarat)—गुजरात की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो -सिख युद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक लड़ाई थी। इस लड़ाई में चतर सिंह तथा भाई महाराज सिंह शेर सिंह की सहायता के लिए आ गए। अफ़गानिस्तान के बादशाह दोस्त मुहम्मद खाँ ने भी सिखों की सहायता के लिए 3,000 घुडसवार सेना भेजी। सिख सेना की संख्या 40,000 थी। दूसरी ओर अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व लॉर्ड गफ ही कर रहा था। अंग्रेज़ों इतिहास में तोपों की लड़ाई के नाम से विख्यात है।

यह लड़ाई 21 फरवरी, 1849 ई० को हुई थी। सिखों की तोपों का बारूद शीघ्र ही समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने अपनी तोपों से सिख सेनाओं पर भारी आक्रमण कर दिया। इस लड़ाई में सिख सेना को भारी क्षति पहुँची। उनके 3,000 से 5,000 तक सैनिक इस लड़ाई में मारे गए। इस लड़ाई के पश्चात् सिख सैनिकों में भगदड़ मच गई। 10 मार्च, 1849 ई० को चतर सिंह, शेर सिंह ने रावलपिंडी के निकट जनरल गिल्बर्ट के सम्मुख हथियार डाल दिए। प्रसिद्ध इतिहासकार पतवंत सिंह के अनुसार,
“इस प्रकार द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध का अंत हुआ तथा इसके साथ रणजीत सिंह के गौरवशाली साम्राज्य पर पर्दा पड़ गया।”3

2. “Chillianwala was the worst defeat the British had suffered since their occupation of India.” Sita Ram Kohli, Sunset of the Sikh Empire (Bombay : 1967) p. 175.
3. “Thus ended the Second Sikh War, and with it the curtain came down on Ranjit Singh’s proud empire.” Patwant Singh, The Sikhs (New Delhi : 1999) p. 172.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध : कारण, परिणाम तथा पंजाब का विलय

युद्ध के परिणाम (Consequences of the War)

प्रश्न 3.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिए। (Discuss the main results of the Second Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के बड़े दूरगामी परिणाम निकले। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
1. महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का अंत (End of the Empire of Maharaja Ranjit Singh)दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का पूर्णतः अंत हो गया। अंतिम सिख महाराजा दलीप सिंह को सिंहासन से उतार दिया गया। उसे पंजाब को छोड़कर देश के किसी भी भाग में रहने की छूट दी गई। लाहौर दरबार की समस्त संपत्ति पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। विख्यात कोहेनूर हीरा दलीप सिंह से लेकर महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। कुछ समय के पश्चात् महाराजा दलीप सिंह को इंग्लैंड भेज दिया गया। 1893 ई० में उनकी पेरिस में मृत्यु हो गई।

2. सिख सेना भंग कर दी गई (Sikh Army was Disbanded)-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के पश्चात् सिख सेना को भी भंग कर दिया गया। अधिकाँश सिख सैनिकों को कृषि व्यवसाय में लगाने का प्रयत्न किया गया। कुछ को ब्रिटिश-भारतीय सेना में भर्ती कर लिया गया।

3. दीवान मूल राज तथा भाई महाराज सिंह को निष्कासन का दंड (Banishment of Diwan Moolraj and Bhai Maharaj Singh)-दीवान मूलराज को पहले मृत्यु दंड दिया गया था। बाद में इसे काले पानी की सज़ा में बदल दिया गया। परंतु उनकी 11 अगस्त, 1851 ई० को कलकत्ता (कोलकाता) में मृत्यु हो गई। भाई महाराज सिंह को पहले इलाहाबाद तथा बाद में कलकत्ता (कोलकाता) के बंदीगृह में रखा गया। तत्पश्चात् उसे सिंगापुर जेल भेज दिया गया जहाँ 5 जुलाई, 1856 ई० को उसकी मृत्यु हो गई।

4. चतर सिंह तथा शेर सिंह को दंड (Punishment to Chattar Singh and Sher Singh)-अंग्रेज़ों ने स० चतर सिंह तथा उसके पुत्र शेर सिंह को बंदी बना लिया था। उन्हें पहले इलाहाबाद तथा बाद में कलकत्ता (कोलकाता) की जेलों में रखा गया। 1854 ई० में सरकार ने उन दोनों को मुक्त कर दिया।

5. पंजाब के लिए नया प्रशासन (New Administration for the Punjab)-पंजाब के अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय के पश्चात् अंग्रेजों ने पंजाब का प्रशासन चलाने के लिए प्रशासनिक बोर्ड की स्थापना की। यह 1849 ई० से 1853 ई० तक बना रहा। अंग्रेज़ों ने पंजाब की प्रशासनिक संरचना में कई परिवर्तन किए। उत्तर-पश्चिमी सीमा को अधिक सुरक्षित बनाया गया। न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ बनाया गया। पंजाब में सड़कों तथा नहरों का जाल बिछा दिया गया। कृषि को प्रोत्साहन दिया गया। जागीरदारी प्रथा समाप्त कर दी गई। व्यापार वृद्धि के प्रयत्न किए गए। पंजाब में पश्चिमी-ढंग की शिक्षा प्रणाली आरंभ की गई। इन सुधारों ने पंजाबियों के दिलों को जीत लिया। परिणामस्वरूप वे 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों के प्रति वफ़ादार रहे।

6. पंजाब की रियासतों से मित्रता का व्यवहार (Friendly attitude towards Princely States of the Punjab)-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पटियाला, नाभा, जींद, मालेरकोटला, फरीदकोट तथा कपूरथला की रियासतों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया था। अंग्रेजों ने इनसे मित्रता बनाए रखी तथा इन रियासतों को अंग्रेज़ी राज्य में सम्मिलित न किया गया।

प्रश्न 4.
अंग्रेज़ों तथा सिखों के मध्य हुए दूसरे युद्ध के कारणों तथा परिणामों का वर्णन करें।
(Discuss the causes and results of Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के कारण तथा परिणामों का वर्णन करें। (What were the causes and results of the 2nd Anglo-Sikh War ? Explain.)
उत्तर-
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के बड़े दूरगामी परिणाम निकले। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
1. महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का अंत (End of the Empire of Maharaja Ranjit Singh)दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का पूर्णतः अंत हो गया। अंतिम सिख महाराजा दलीप सिंह को सिंहासन से उतार दिया गया। उसे पंजाब को छोड़कर देश के किसी भी भाग में रहने की छूट दी गई। लाहौर दरबार की समस्त संपत्ति पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। विख्यात कोहेनूर हीरा दलीप सिंह से लेकर महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। कुछ समय के पश्चात् महाराजा दलीप सिंह को इंग्लैंड भेज दिया गया। 1893 ई० में उनकी पेरिस में मृत्यु हो गई।

2. सिख सेना भंग कर दी गई (Sikh Army was Disbanded)-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के पश्चात् सिख सेना को भी भंग कर दिया गया। अधिकाँश सिख सैनिकों को कृषि व्यवसाय में लगाने का प्रयत्न किया गया। कुछ को ब्रिटिश-भारतीय सेना में भर्ती कर लिया गया।

3. दीवान मूल राज तथा भाई महाराज सिंह को निष्कासन का दंड (Banishment of Diwan Moolraj and Bhai Maharaj Singh)-दीवान मूलराज को पहले मृत्यु दंड दिया गया था। बाद में इसे काले पानी की सज़ा में बदल दिया गया। परंतु उनकी 11 अगस्त, 1851 ई० को कलकत्ता (कोलकाता) में मृत्यु हो गई। भाई महाराज सिंह को पहले इलाहाबाद तथा बाद में कलकत्ता (कोलकाता) के बंदीगृह में रखा गया। तत्पश्चात् उसे सिंगापुर जेल भेज दिया गया जहाँ 5 जुलाई, 1856 ई० को उसकी मृत्यु हो गई।

4. चतर सिंह तथा शेर सिंह को दंड (Punishment to Chattar Singh and Sher Singh)-अंग्रेज़ों ने स० चतर सिंह तथा उसके पुत्र शेर सिंह को बंदी बना लिया था। उन्हें पहले इलाहाबाद तथा बाद में कलकत्ता (कोलकाता) की जेलों में रखा गया। 1854 ई० में सरकार ने उन दोनों को मुक्त कर दिया।

5. पंजाब के लिए नया प्रशासन (New Administration for the Punjab)-पंजाब के अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय के पश्चात् अंग्रेजों ने पंजाब का प्रशासन चलाने के लिए प्रशासनिक बोर्ड की स्थापना की। यह 1849 ई० से 1853 ई० तक बना रहा। अंग्रेज़ों ने पंजाब की प्रशासनिक संरचना में कई परिवर्तन किए। उत्तर-पश्चिमी सीमा को अधिक सुरक्षित बनाया गया। न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ बनाया गया। पंजाब में सड़कों तथा नहरों का जाल बिछा दिया गया। कृषि को प्रोत्साहन दिया गया। जागीरदारी प्रथा समाप्त कर दी गई। व्यापार वृद्धि के प्रयत्न किए गए। पंजाब में पश्चिमी-ढंग की शिक्षा प्रणाली आरंभ की गई। इन सुधारों ने पंजाबियों के दिलों को जीत लिया। परिणामस्वरूप वे 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों के प्रति वफ़ादार रहे।

6. पंजाब की रियासतों से मित्रता का व्यवहार (Friendly attitude towards Princely States of the Punjab)-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पटियाला, नाभा, जींद, मालेरकोटला, फरीदकोट तथा कपूरथला की रियासतों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया था। अंग्रेजों ने इनसे मित्रता बनाए रखी तथा इन रियासतों को अंग्रेज़ी राज्य में सम्मिलित न किया गया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध : कारण, परिणाम तथा पंजाब का विलय

पंजाब का विलय (Annexation of the Punjab)

प्रश्न 5.
“पंजाब का विलय एक घोर विश्वासघात था।” संक्षिप्त व्याख्या करें।
(“Annexation of the Punjab was a violent breach of trust.” Discuss briefly.)
अथवा
लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा पंजाब विलय का आलोचनात्मक वर्णन करें।
(Explain critically Lord Dalhousie’s annexation of Punjab.)
अथवा
“लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा पंजाब का अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय सिद्धांतहीन तथा अनुचित था।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? अपने पक्ष में तर्क दें।
(“The annexation of Punjab by Lord Dalhousie to the British Empire was unprincipled and unjustified.” Do you agree to this view ? Give arguments in your favour.)
उत्तर-
लॉर्ड डलहौज़ी भारत में 1848 ई० में गवर्नर-जनरल बनकर आया था। वह भारत के गवर्नर-जनरलों में सबसे बड़ा साम्राज्यवादी था। पंजाब को भी उसकी साम्राज्यवादी नीति का शिकार होना पड़ा। 29 मार्च, 1849 ई० को लाहौर को अंग्रेज़ी साम्राज्य में शामिल करने की घोषणा की गई। इसके पश्चात् लाहौर दुर्ग से सिखों का झंडा उतार दिया गया तथा अंग्रेज़ों का झंडा फहराया गया। इस प्रकार पंजाब के सिख राज्य का अंत हो गया।
I. डलहौज़ी की विलय की नीति के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of Dalhousie’s Policy of Annexation)
डब्ल्यू डब्ल्यू० हंटर, मार्शमेन तथा एस० एम० लतीफ आदि इतिहासकारों ने लॉर्ड डलहौजी द्वारा पंजाब के अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए हैं—

1. सिखों ने वचन भंग किया (Sikhs had broken their Promises)-लॉर्ड डलहौज़ी ने यह आरोप लगाया कि सिखों ने भैरोवाल संधि की शर्ते भंग की। सिख सरदारों ने यह वचन दिया था कि वे अंग्रेज़ रेजीडेंट को पूर्ण सहयोग देंगे। परंतु उन्होंने राज्य में अशाँति तथा विद्रोह भड़काने का प्रयत्न किया। लॉर्ड डलहौज़ी ने दीवान मूलराज के विद्रोह को पूरी सिख जाति का विद्रोह बताया। उसके अनुसार यह विद्रोह सिख राज्य की स्थापना के लिए किया गया था। सरतार चतर सिंह तथा उसके पुत्र शेर सिंह ने विद्रोह करके मूलराज का साथ दिया। इस प्रकार बिगड़ रही परिस्थितियों पर नियंत्रण पाने के लिए पंजाब का अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय आवश्यक था। इसी कारण लॉर्ड डलहौज़ी ने कहा था,
“निस्संदेह मुझे यह पक्का विश्वास है कि मेरी कार्यवाई समयानुसार, न्यायपूर्ण तथा आवश्यक थी।”4

2. पंजाब अच्छा मध्यवर्ती राज्य न रहा (Punjab remained no more a useful Buffer State)लॉर्ड हार्डिंग का विचार था कि पंजाब एक लाभप्रद मध्यवर्ती राज्य प्रमाणित होगा। इससे ब्रिटिश राज्य को अफ़गानिस्तान की ओर से किसी ख़तरे का सामना नहीं करना पड़ेगा। परंतु उनका यह विचार गलत प्रमाणित हुआ क्योंकि सिखों तथा अफ़गानों में मित्रता स्थापित हो गई। इसीलिए लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित करना आवश्यक समझा।

3. ऋण न लौटाना (Non-payment of the Loans)-लॉर्ड डलहौज़ी ने यह आरोप लगाया कि भैरोवाल की संधि की शर्तों के अनुसार लाहौर दरबार ने अंग्रेज़ों को 22 लाख रुपए वार्षिक देने थे। परंतु लाहौर दरबार ने एक पाई भी अंग्रेज़ों को न दी। इसलिए पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में सम्मिलित करना उचित था।

4. पंजाब पर अधिकार करना लाभप्रद था (It was advantageous to annex Punjab)-प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध में विजय के पश्चात् अंग्रेज़ों का मत था कि आर्थिक दृष्टि से पंजाब कोई लाभप्रद प्राँत नहीं है। परंतु पंजाब में दो वर्ष तक रह कर उन्हें ज्ञात हो गया कि यह राज्य तो कई दृष्टियों से भी अंग्रेजों के लिए लाभप्रद प्रमाणित हो सकता है। इन कारणों से लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब को हड़प करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

5. पंजाब के लोगों के लिए लाभप्रद (Advantageous for the people of Punjab) लॉर्ड डलहौज़ी . का पंजाब पर अधिकार करना पंजाब के लोगों के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। महाराजा रणजीत सिंह के बाद लाहौर दरबार षड्यंत्रों का अखाड़ा बन चुका था। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर चोरों, डाकुओं तथा ठगों ने अपना धंधा जोरों से शुरू कर दिया था। अंग्रेज़ों ने पंजाब का अपने राज्य में विलय करके वहाँ फिर से शाँति स्थापित की। पुलिस तथा न्याय प्रणाली को अधिक कुशल बनाया गया। कृषि तथा व्यापार को प्रोत्साहन दिया गया। पंजाब में सड़कों तथा नहरों का जाल बिछाया गया। लोगों को पश्चिमी शिक्षा देने की व्यवस्था की गई।

6. पंजाब का अधिकार आवश्यक था (Annexation of the Punjab was Inevitable)-यह कहा जाता है कि यदि पंजाब का विलय न किया जाता तो सिखों ने अंग्रेज़ी साम्राज्य के विरुद्ध सदैव षड्यंत्र रचते रहना था। इसका प्रभाव भारत के अन्य भागों में भी पड़ सकता था। इसलिए लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित करना आवश्यक समझा।

4. “I have an undoubting conviction of the expediency, the justice and necessity of my act.”. Lord Dalhousie.

II. डलहौज़ी की विलय की नीति के विरुद्ध तर्क (Arguments against Dalhousie’s Policy of Annexation)
ईवांज बैल, जगमोहन महाजन, गंडा सिंह और खुशवंत सिंह आदि इतिहासकारों द्वारा लॉर्ड डलहौजी द्वारा पंजाब के विलय के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क दिए गए हैं—

1. सिखों को विद्रोह के लिए भड़काया (Sikhs were Provoked to Revolt)—प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के बाद बहुत-सी ऐसी घटनाएँ घटीं जिन्होंने सिखों को विद्रोह के लिए भड़काया। लाहौर की संधि के अनुसार पंजाब के कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अंग्रेज़ों ने छीन लिए थे। परिणामस्वरूप उसके कोष पर कुप्रभाव पड़ा। लाहौर दरबार की अधिकाँश सेना को भंग कर दिया गया। अंग्रेज़ों ने महारानी जिंदां से बहुत बुरा व्यवहार किया। उन्होंने दीवान मूलराज तथा सरदार चतर सिंह को विद्रोह के लिए भड़काया। परिणामस्वरूप सिखों को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह के लिए विवश किया गया।

2. विद्रोह समय पर न दबाया गया (Revolt was not suppressed in Time)-जब मुलतान में विद्रोह की आग भड़की तो उस पर तुरंत नियंत्रण न किया गया। आठ माह तक विद्रोह फैलने देना, एक गहरी राजनीतिक चाल थी। इसी मध्य चतर सिंह, शेर सिंह तथा महाराज सिंह ने विद्रोह कर दिया था। इस तरह अंग्रेज़ों को पंजाब में सैनिक कार्यवाही करने का बहाना मिल गया तथा पंजाब को हड़प लिया गया।

3. अंग्रेजों ने संधि की शर्ते पूरी न की (British had not fulfilled the terms of the Treaty)अंग्रेज़ों का कहना था कि उन्होंने संधि की शर्ते पूरी की हैं। परंतु अंग्रेज़ों ने संधि की केवल वही शर्ते पूरी की जो उनके लिए लाभप्रद थीं। उदाहरणतया लाहौर की संधि के अनुसार अंग्रेजों ने यह शर्त मानी थी कि वे दिसंबर, 1846 ई० के पश्चात् लाहौर से अपनी सेनाएँ हटा लेंगे। जब यह समय आया तो उन्होंने भैरोवाल की संधि अनुसार इस अवधि में वृद्धि कर दी। इस प्रकार हम देखते हैं कि अंग्रेज़ों का यह कहना कि उन्होंने संधि की शर्तों को पूरा किया, नितांत झूठ है।

4. लाहौर दरबार ने संधि की शर्ते पूरी करने में पूर्ण सहयोग दिया (Lahore Darbar gave full Cooperation in fulfilling the terms of the Treaty)-लाहौर दरबार ने तो पंजाब पर अंग्रेज़ों का अधिकार होने तक संधि की शर्ते पूरी निष्ठा से पूरी की। लाहौर सरकार पंजाब में रखी गई अंग्रेजी सेना का पूरा खर्च दे रही थी। उसने दीवान मूलराज, चतर सिंह और शेर सिंह द्वारा की गई बगावतों की निंदा की और इनके दमन में अंग्रेज़ी सेना को पूर्ण सहयोग दिया।

5. ऋण के संबंध में वास्तविकता (Facts about Loans) लॉर्ड डलहौज़ी का यह आरोप कि लाहौर दरबार ने ऋण की एक पाई भी वापिस नहीं की, तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है। लाहौर में अंग्रेज़ रेजीडेंट फ्रेडरिक करी ने लॉर्ड डलहौजी को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि लाहौर दरबार ने 13,56,837 रुपए मूल्य का सोना जमा करवा दिया है। यदि लाहौर दरबार ने अपना सारा ऋण नहीं लौटाया तो इसका उत्तरदायित्व अंग्रेज़ रेजीडेंट पर था।

6. पूरी सिख सेना तथा लोगों ने विद्रोह नहीं किया था (The whole Sikh Army and the People did not Revolt)-लॉर्ड डलहौज़ी ने यह आरोप लगाया था कि पंजाब की सारी सिख सेना तथा लोगों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। परंतु यह कथन भी सत्य नहीं है। पंजाब के केवल मुलतान तथा हज़ारा प्रांतों में ही अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह हआ था। अधिकाँश सिख सेना तथा लोग अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान् रहे।

7. पंजाब पर अधिकार एक विश्वासघात था (Annexation of Punjab was a breach of Trust)दिसंबर 1846 ई० में हुई भैरोवाल की संधि के अनुसार अंग्रेजों ने पंजाब का सारा शासन अपने हाथों में ले लिया था। इस प्रकार पंजाब की सत्ता का वास्तविक स्वामी अंग्रेज़ रेजीडेंट फ्रेडरिक करी था। अंग्रेजों ने पंजाब में शाँति व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से लाहौर में अंग्रेज सेना भी रख ली थी। ऐसी स्थिति में मुलतान तथा हज़ारा में हुए विद्रोह के दमन का समस्त दायित्व अंग्रेज़ रेजीडेंट का था। यदि इन विद्रोहों में कोई विफल रहा था तो वह अंग्रेज़ रेजीडेंट था। अपने अपराध के लिए दलीप सिंह को सज़ा देना अन्यायपूर्ण बात थी। यह एक घोर विश्वासघात नहीं तो और क्या था ?

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय राजनीतिक तथा नैतिक दृष्टि से बिल्कुल गलत था। अंत में हम मेजर ईवांज़ बैल के इन शब्दों से सहमत हैं,
“यह वास्तव में कोई विजय नहीं, अपितु नितांत विश्वासघात था।”5

5. “It was in fact, no conquest, but a violent breach of trust.”Major Evans Bell, The Annexation of the Punjab and the Maharaja Daleep Singh (Patiala : 1970) p. 6.

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संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के कारणों का संक्षिप्त वर्णन करें। (Explain in brief the causes of Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के प्रमुख कारणों का संक्षिप्त ब्योरा दें। (Give a brief description of the main causes of the Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के तीन मुख्य कारण क्या थे ?
(What were the three main causes for the Second Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-

  1. सिख प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध में हुई अपनी पराजय का प्रतिशोध लेना चाहते थे।
  2. अंग्रेज़ों ने महारानी जिंदां से जो अपमानजनक व्यवहार किया, उससे सिख भड़क उठे।
  3. मुलतान के दीवान मूलराज ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था।
  4. लॉर्ड डलहौज़ी पंजाब को जल्द-से-जल्द अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित करना चाहता था।
  5. चतर सिंह एवं शेर सिंह के विद्रोह ने अग्नि में घी डालने का काम किया।

प्रश्न 2.
दीवान मूलराज के विद्रोह पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a note on the revolt of Diwan Moolraj.)
अथवा
मुलतान के दीवान मूलराज के विद्रोह के संबंध में संक्षिप्त जानकारी दें। (Give a brief account of the revolt of Diwan Moolraj of Multan.)
उत्तर-
दीवान मूलराज 1844 ई० में मुलतान का नया गवर्नर बना था। उससे लिया जाने वाला वार्षिक लगान बढ़ा दिया गया। इस कारण दीवान मूलराज ने गवर्नर के पद से त्याग-पत्र दे दिया। काहन सिंह को मुलतान का नया गवर्नर नियुक्त किया गया। दो अंग्रेज़ अधिकारियों एगन्यू और एंडरसन को उसकी सहायता के लिए भेजा गया। अंग्रेज़ों ने इनके कत्ल का झूठा आरोप मूलराज पर लगाया। परिणामस्वरूप वह विद्रोह करने के लिए मजबूर हो गया।

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प्रश्न 3.
हज़ारा के चतर सिंह के विद्रोह के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the revolt of Chattar Singh of Hazara ?)
उत्तर-
सरदार चतर सिंह अटारीवाला हजारा का नाज़िम था। उसके द्वारा भड़काए गए हज़ारा के मुसलमानों ने 6 अगस्त, 1848 ई० को सरदार चतर सिंह के निवास स्थान पर आक्रमण कर दिया। यह देख कर सरदार चतर सिंह ने कर्नल कैनोरा को विद्रोहियों के विरुद्ध कार्रवाही करने का आदेश दिया। कर्नल कैनोरा ने चतर सिंह के आदेश को मानने से इंकार कर दिया। कैप्टन ऐबट ने सरदार चतर सिंह को. पदच्युत कर दिया। इस कारण चतर सिंह का खून खौल उठा तथा उसने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की घोषणा कर दी।

प्रश्न 4.
चिलियाँवाला की लड़ाई पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a note on the battle of Chillianwala.)
अथवा
चिलियाँवाला की लड़ाई के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the battle of Chillianwala ?)
उत्तर-
चिलियाँवाला की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की एक महत्त्वपूर्ण लड़ाई थी। लॉर्ड ह्यग गफ़, जो अंग्रेजी सेनापति था को यह सूचना मिली कि चतर सिंह उसके प्रतिद्वंद्वी शेर सिंह की सहायता के लिए आ रहा है। इसलिए ह्यग गफ़ ने चतर सिंह के पहुंचने से पहले ही 13 जनवरी, 1849 ई० को चिलियाँवाला में शेर सिंह की सेना पर आक्रमण कर दिया। इस घमासान लड़ाई में सिखों ने अंग्रेजों के खूब छक्के छुड़ाए।

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प्रश्न 5.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के दौरान हुई गुजरात की लड़ाई का क्या महत्त्व था ? (What was the importance of the battle of Gujarat in the Second Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-
गुजरात की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की अंतिम तथा निर्णायक लड़ाई थी। यह लड़ाई 21 फरवरी, 1849 ई० को लड़ी गई थी। इस लड़ाई में सिख सैनिकों की संख्या 40,000 थी तथा उनका नेतृत्व चतर सिंह, शेर सिंह तथा महाराज सिंह कर रहे थे। दूसरी ओर अंग्रेज़ सैनिकों की संख्या 68,000 थी और लॉर्ड ह्यूग गफ़ उनका सेनापति था। इस युद्ध में सिखों की हार हुई। परिणामस्वरूप पंजाब को 29 मार्च, 1849 ई० को अंग्रेज़ी साम्राज्य में शामिल कर लिया गया।

प्रश्न 6.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के क्या प्रभाव पड़े ?(What were the results of the Second Anglo-Sikh War ?)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के कोई तीन प्रभाव लिखें। (Explain any three effects of Social Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के प्रभावों का अध्ययन संक्षेप में करें। (Study in brief the results of Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के तीन प्रभाव लिखें।
(Explain the three effects of Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के क्या परिणाम निकले? (What were the results of the Second Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-

  1. दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि 29 मार्च, 1849 ई० को पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में शामिल कर लिया गया।
  2. पंजाब के अंतिम शासक महाराजा दलीप सिंह को 50,000 पौंड वार्षिक पेंशन देकर सिंहासन से उतार दिया गया।
  3. उससे प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा लेकर महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया।
  4. दीवान मूलराज तथा महाराजा दलीप सिंह को देश निष्कासन का दंड दिया गया
  5. पंजाब का शासन प्रबंध चलाने के लिए प्रशासनिक बोर्ड की स्थापना की गई।

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प्रश्न 7.
क्या लॉर्ड डलहौजी द्वारा पंजाब का अंग्रेजी राज्य में विलय उचित था ? अपने पक्ष में तर्क दें।
(Was it justified for Lord Dalhousie to annex Punjab to the British empire ? Give arguments in support of your answer.)
अथवा
“पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित करना एक घोर विश्वासघात था।” व्याख्या करें।
(“Annexation of Punjab was a violent breach of trust.” Explain.)
अथवा
क्या पंजाब का विलय उचित था ? कारण लिखो।
(Was the annexation of Punjab justified ? Give reasons.)
अथवा
क्या पंजाब का संयोजन न्याय संगत था ? कारण बताओ।
(Was the annexation of Punjab justified ? Give reasons.)
उत्तर-
लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में शामिल करना किसी प्रकार भी उचित नहीं था। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम लाहौर संधि के अंतर्गत पंजाब के कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र छीन लिए। लाहौर दरबार की अधिकाँश सेना भंग कर दी गई, जिससे सैनिकों में रोष उत्पन्न हो गया। अंग्रेजों ने महारानी जिंदां को राज्य के प्रशासन से अलग कर दिया। मुलतान के गवर्नर दीवान मूलराज तथा हज़ारा के गवर्नर चतर सिंह को पहले विद्रोह के लिए उकसाया गया तथा फिर उनके विद्रोह को फैलने दिया गया ताकि बहाना बनाकर पंजाब को अधिकार में ले सकें।

प्रश्न 8.
डलहौज़ी के इस पक्ष में तर्क दें कि उसके द्वारा पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में सम्मिलित करना उचित था।
(Give arguments in favour of Dalhousie’s annexation of the Punjab to the British Empire.)
अथवा
डलहौज़ी की पंजाब विलय की नीति के पक्ष में तर्क दीजिए। (Give arguments in favour of Dalhousie’s policy of the annexation of the Punjab.)
अथवा
क्या पंजाब का विलय उचित था ? कारण लिखो। (Was the annexation of Punjab justified ? Give reasons.)
उत्तर-

  1. सिखों ने भैरोवाल की संधि की शर्तों को भंग किया था।
  2. दीवान मूलराज ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था।
  3. पंजाब में शांति स्थापित करने के लिए उसको अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाना अनिवार्य था।
  4. पंजाब अंग्रेज़ी साम्राज्य के लिए ख़तरा बन सकता था।
  5. पंजाब पर अधिकार अंग्रेजी साम्राज्य के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता था।

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प्रश्न 9.
महाराजा दलीप सिंह पर नोट लिखें। (Write a note on Maharaja Dalip Singh.)
उत्तर-
महाराजा दलीप सिंह रणजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र था। वह 15 सितंबर, 1843 ई० को पंजाब का नया महाराजा बना था। महाराजा दलीप सिंह ने लाल सिंह को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया जो गद्दार निकला। परिणामस्वरूप पहले तथा दूसरे एंग्लो-सिख युद्धों में सिखों को पराजय का मुख देखना पड़ा। अंग्रेजों ने महाराजा दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया। 22 अक्तूबर, 1893 ई० को महाराजा दलीप सिंह की पेरिस में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 10.
महारानी जींद कौर (जिंदां) पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
[Write a brief note on Maharani Jind Kaur (Jindan).] .
अथवा
महारानी जिंदां के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Maharani Jindan ?)
उत्तर-
महारानी जिंदां, महाराजा रणजीत सिंह की रानी थी। उसे 15 सितंबर, 1843 ई० को पंजाब के नवनियुक्त महाराजा दलीप सिंह की संरक्षिका बनाया गया था । इसीलिए अंग्रेजों ने दिसंबर, 1846 ई० में भैरोवाल की संधि के अंतर्गत महारानी जिंदां के सभी अधिकार छीन लिए तथा उसकी डेढ़ लाख रुपए वार्षिक पेंशन निश्चित कर दी गई। महारानी भेष बदल कर नेपाल पहुँचने में सफल हो गई। यहाँ अंग्रेजों ने दोनों को एक साथ न रहने दिया। 1 अगस्त, 1863 ई० को महारानी जिंदां इंग्लैंड में इस संसार से चल बसीं।

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प्रश्न 11.
भाई महाराज सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a brief note on Bhai Maharaj Singh.)
उत्तर-
भाई महाराज सिंह नौरंगाबाद के प्रसिद्ध संत भाई बीर सिंह के शिष्य थे। वह पंजाब की स्वतंत्रता के पक्ष में थे। अतः उन्होंने मुलतान के दीवान मूलराज, हज़ारा के सरदार. चतर सिंह अटारीवाला तथा उसके पुत्र शेर सिंह को अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की सभी लड़ाइयों में भाग लिया। उनको पहले कलकत्ता (कोलकाता) तथा बाद में सिंगापुर की जेल में रखा गया। वहीं पर उनकी 5 जुलाई, 1856 ई० को मृत्यु हो गई।

बहु-विकल्पीय प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
दूसरा ऐंग्लो-सिख युद्ध कब लड़ा गया ?
उत्तर-
1848-49 ई०।

प्रश्न 2.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था ?
उत्तर-
लॉर्ड डलहौज़ी।

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प्रश्न 3.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध का कोई एक कारण लिखिए।
उत्तर-
सिख प्रथम युद्ध में हुई अपनी पराजय का प्रतिशोध लेना चाहते थे।

प्रश्न 4.
महारानी जिंदां कौन थी ?
अथवा
महारानी जिंदां (जिंद कौर) कौन थी ?
उत्तर-
वह महाराजा दलीप सिंह की माँ।

प्रश्न 5.
दीवान मूलराज कौन था ?
उत्तर-
मुलतान का नाज़िम (गवर्नर)।

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प्रश्न 6.
दीवान मूलराज द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर-
अंग्रेजों ने दीवान मूलराज से वसूल किए जाने वाले वार्षिक लगान की राशि में भारी वृद्धि कर दी थी।

प्रश्न 7.
सावन मल कौन था ?
उत्तर-
दीवान मूलराज का पिता व मुलतान का नाज़िम

प्रश्न 8.
चतर सिंह अटारीवाला कौन था ?
उत्तर-
हज़ारा का नाज़िम।

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प्रश्न 9.
शेर सिंह कौन था ?
उत्तर-
चतर सिंह अटारीवाला का पुत्र।

प्रश्न 10.
शेर सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा क्यों खड़ा किया था ?
उत्तर-
वह अंग्रेजों द्वारा उसके पिता के साथ किए गए दुर्व्यवहार के कारण।

प्रश्न 11.
भाई महाराज सिंह कौन था ?
उत्तर-
वह नौरंगाबाद के प्रसिद्ध संत थे।

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प्रश्न 12.
दूसरा ऐंग्लो-सिख युद्ध किसके विद्रोह से शुरू हुआ ?
अथवा
किसके विद्रोह ने द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध को आरंभ किया ?
उत्तर-
दीवान मूलराज।

प्रश्न 13.
रामनगर की लड़ाई कब हुई ?
उत्तर-
22 नवंबर, 1848 ई०

प्रश्न 14.
चिल्लियाँवाला की लड़ाई कब हुई ?
उत्तर-
13 जनवरी, 1849 ई०

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प्रश्न 15.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की अंतिम लड़ाई कौन-सी थी ?
उत्तर-
गुजरात की लड़ाई।

प्रश्न 16.
गुजरात की लड़ाई कब लड़ी गई थी ?
उत्तर-
21 फरवरी, 1849 ई०।

प्रश्न 17.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के दौरान लड़ी गई उस लड़ाई का नाम बताएँ जो तोपों की लड़ाई के नाम से विख्यात है ?
उत्तर-
गुजरात की लड़ाई।।

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प्रश्न 18.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध का कोई एक महत्त्वपूर्ण परिणाम बताएँ।
उत्तर-
पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में शामिल कर लिया गया।

प्रश्न 19.
पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में कब शामिल किया गया ?
अथवा
पंजाब को अंग्रेजी सामाज्य में कब मिलाया गया?
उत्तर-
29 मार्च, 1849 ई०।

प्रश्न 20.
लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में शामिल करने के पक्ष में दिए जाने वाला कोई एक तर्क बताएँ।
उत्तर-
पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में शामिल करना पंजाब के लोगों के लिए लाभप्रद था।

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प्रश्न 21.
लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में शामिल करने के विरुद्ध दिए जाने वाला एक तर्क बताएँ।
उत्तर-
अंग्रेजों ने सिखों को विद्रोह के लिए भड़काया।

प्रश्न 22.
भाई महाराज सिंह कौन था ?
उत्तर-
वह नौरंगाबाद के प्रसिद्ध संत भाई बीर सिंह का शिष्य था।

प्रश्न 23.
भाई महाराज सिंह की मौत कब हुई थी ?
उत्तर-
1856 ई०।

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प्रश्न 24.
भाई महाराज सिंह की मौत कहाँ हुई थी ?
उत्तर-
सिंगापुर।

प्रश्न 25.
पंजाब का अंतिम सिख महाराजा कौन था ?
अथवा
पंजाब का आखिरी सिख शासक कौन था ?
अथवा
सिखों का अंतिम सिख महाराजा कौन था?
उत्तर-
महाराजा दलीप सिंह।

प्रश्न 26.
महाराजा दलीप सिंह की मृत्य कहाँ हुई थी ?
उत्तर-
पेरिस में।

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प्रश्न 27.
महाराजा दलीप सिंह की मौत कब हुई थी ?
उत्तर-
1893 ई०

प्रश्न 28.
महारानी जिंदां की मृत्य कब हुई थी ?
उत्तर-
1863 ई०।

प्रश्न 29.
सिख साम्राज्य के पतन का कोई एक मुख्य कारण बताएँ ।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारी अयोग्य निकले।

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(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
अंग्रेज़ों एवं सिखों के बीच दूसरी लड़ाई ………….. ई० में हुई।
उत्तर-
(1848-49)

प्रश्न 2.
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय भारत का गवर्नर जनरल……….था।
उत्तर-
(लॉर्ड डलहौज़ी)

प्रश्न 3.
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पंजाब का महाराजा…………….था।
उत्तर-
(दलीप सिंह)

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प्रश्न 4.
महाराजा दलीप सिंह की माँ का नाम…………..था।
उत्तर-
(महारानी जिंदां)

प्रश्न 5.
1844 ई० में……………मुलतान का नाजिम नियुक्त हुआ।
उत्तर-
(दीवान मूलराज)

प्रश्न 6.
सरदार चतर सिंह अटारीवाला………का नाज़िम था।
उत्तर-
(हज़ारा)

प्रश्न 7.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की पहली लड़ाई का नाम……..था। .
उत्तर-
(रामनगर)

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प्रश्न 8.
रामनगर की लड़ाई………….को हुई।
उत्तर-
(22 नवंबर, 1848 ई०)

प्रश्न 9.
चिल्लियाँवाला की लड़ाई……….को हुई।
उत्तर-
(13 जनवरी, 1849 ई०)

प्रश्न 10.
गुजरात की लड़ाई इतिहास में…………..की लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध है।
उत्तर-
(तोपों)

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प्रश्न 11.
अंग्रेजों ने पंजाब को अपने साम्राज्य में………….को सम्मिलित किया था।
उत्तर-
(29 मार्च, 1849 ई०)

(ii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध 1848-49 ई० में लड़ा गया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय लॉर्ड डलहौज़ी भारत का गवर्नर जनरल था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 3.
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पंजाब का महाराजा दलीप सिंह था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 4.
महारानी जिंदां महाराजा दलीप सिंह की माँ थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
दीवान मूलराज 1846 ई० में मुलतान का नाज़िम बना।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 6.
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध रामनगर की लड़ाई से आरंभ हुआ था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 7.
राम नगर की लड़ाई 12 नवंबर, 1846 ई० को हुई।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 8.
चिल्लियाँवाला की लड़ाई 13 जनवरी, 1849 ई० को हुई।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 9.
चिल्लियाँवाला की लड़ाई में अंग्रेज़ी सेना को एक कड़ी पराजय का सामना करना पड़ा।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध गुजरात की लड़ाई के साथ समाप्त हुआ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 11.
गुजरात की लड़ाई 21 फरवरी, 1849 ई० को हुई।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 12.
पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में 29 मार्च, 1849 ई० में शामिल किया गया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 13.
महाराजा दलीप सिंह पंजाब का अंतिम सिख महाराजा था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 14.
सिखों का अंतिम महाराजा रणजीत सिंह था।
उत्तर-
गलत

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(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध कब लड़ा गया ?
(i) 1844-45 ई० में
(ii) 1845-46 ई० में
(iii) 1847-48 ई० में
(iv) 1848-49 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 2.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था ?
(i) लॉर्ड लिटन
(ii) लॉर्ड रिपन
(iii) लॉर्ड डलहौज़ी
(iv) लॉर्ड हार्डिंग।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 3.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पंजाब का महाराजा कौन था?
(i) महाराजा शेर सिंह
(ii) महाराजा रणजीत सिंह
(iii) महाराजा दलीप सिंह
(iv) महाराजा खड़क सिंह।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 4.
महारानी जिंदां कौन थी ?
(i) महाराजा दलीप सिंह की माता
(ii) महाराजा खड़क सिंह की बहन
(iii) महाराजा शेर सिंह की पत्नी
(iv) राजा गुलाब सिंह की पुत्री।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 5.
दीवान मूलराज कौन था ?
(i) गुजरात का नाज़िम
(ii) मुलतान का नाज़िम
(iii) कश्मीर का नाज़िम
(iv) पेशावर का नाज़िम।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 6.
दीवान मूलराज ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कब किया था ?
(i) 1844 ई० में
(ii) 1845 ई० में
(iii) 1846 ई० में
(iv) 1848 ई० में।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 7.
सरदार चतर सिंह अटारीवाला कहाँ का नाज़िम था ?
(i) हज़ारा
(ii) मुलतान
(iii) कश्मीर
(iv) पेशावर।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 8.
दूसरा ऐंग्लो-सिख युद्ध किस लड़ाई के साथ आरंभ हुआ ?
(i) मुलतान की लड़ाई
(ii) चिल्लियाँवाला की लड़ाई
(iii) गुजरात की लड़ाई
(iv) रामनगर की लड़ाई।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 9.
रामनगर की लड़ाई कब हुई थी ?
(i) 12 नवंबर, 1846 ई०
(ii) 15 नवंबर, 1847 ई०
(iii) 17 नवंबर, 1848 ई०
(iv) 22 नवबर, 1848 ई०
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 10.
चिल्लियाँवाला की लड़ाई कब हुई ?
(i) 22 नवंबर, 1848 ई०
(ii) 3 जनवरी, 1848 ई०
(iii) 10 जनवरी, 1849 ई०
(iv) 13 जनवरी, 1849 ई०।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 11.
मुलतान का युद्ध कब समाप्त हुआ ?
(i) 22 जनवरी, 1849 ई०
(ii) 23 जनवरी, 1849 ई०
(iii) 24 जनवरी, 1849 ई०
(iv) 25 जनवरी, 1849 ई०
उत्तर-
(i)

प्रश्न 12.
दूसरा ऐंग्लो-सिख युद्ध किस लड़ाई के साथ समाप्त हुआ ?
अथवा
उस लड़ाई का नाम लिखें जो इतिहास में ‘तोपों की लड़ाई’ के नाम से प्रसिद्ध है।
(i) मुलतान की लड़ाई
(ii) रामनगर की लड़ाई
(iii) गुजरात की लड़ाई
(iv) चिल्लियाँवाला की लड़ाई।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 13.
गुजरात की लड़ाई कब लड़ी गई थी ?
(i) 22 नवंबर, 1848 ई०
(ii) 13 जनवरी, 1849 ई०
(iii) 22 जनवरी, 1849 ई०
(iv) 21 फरवरी, 1849 ई०।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 14.
पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में कब सम्मिलित किया गया ?
(i) 1849 ई०
(ii) 1850 ई०
(iii) 1848 ई०
(iv) 1947 ई०
उत्तर-
(i)

प्रश्न 15.
पंजाब का अंतिम सिख महाराजा कौन था ?
(i) महाराजा दलीप सिंह
(i) महाराजा रणजीत सिंह
(iii) महाराजा खड़क सिंह
(iv) महाराजा शेर सिंह।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 16.
महाराजा दलीप सिंह की मृत्यु कब हुई थी ?
(i) 1857 ई० में
(ii) 1893 ई० में
(iii) 1849 ई० में
(iv) 1892 ई० में।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 17.
महाराजा दलीप सिंह की मृत्यु कहाँ हुई थी ?
(i) पंजाब
(ii) पेरिस
(iii) नेपाल
(iv) लंदन।
उत्तर-
(ii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के छः कारणों का संक्षिप्त वर्णन करें। (Explain in brief the six causes of Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के क्या कारण थे ?
(What were the causes of the Second Anglo-Sikh War ?)
अथवा
दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के छः मुख्य कारण क्या थे ?
(What were the six main causes for the Second Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के मुख्य कारण निम्नलिखित थे—
1. सिखों की अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने की इच्छा—यह सही है कि अंग्रेज़ों के साथ प्रथम युद्ध में सिख पराजित हो गए थे, परंतु इससे उनका साहस किसी प्रकार कम नहीं हुआ था। इस पराजय का मुख्य कारण सिख नेताओं द्वारा की गई गद्दारी थी। सिख सैनिकों को अपनी योग्यता पर पूर्ण विश्वास था। वे अपनी पराजय का प्रतिशोध लेना चाहते थे। उनकी यह इच्छा द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध का एक मुख्य कारण बनी।

2. लाहौर तथा भैरोवाल की संधियों से पंजाबी असंतुष्ट-अंग्रेजों तथा सिखों के बीच हुए प्रथम युद्ध के पश्चात् अंग्रेजों ने लाहौर दरबार के साथ लाहौर तथा भैरोवाल नामक दो संधियाँ कीं। पंजाब के लोग महाराजा रणजीत सिंह के अथक प्रयासों से निर्मित साम्राज्य का इन संधियों द्वारा किया जा रहा विघटन होता देख सहन नहीं कर सकते थे। इसलिए सिखों को अंग्रेजों से एक और युद्ध लड़ना पड़ा।

3. सिख सैनिकों में असंतोष-लाहौर की संधि के अनुसार अंग्रेजों ने खालसा सेना की संख्या 20,000 पैदल तथा 12,000 घुड़सवार निश्चित कर दी थी। इस कारण हज़ारों की संख्या में सिख सैनिकों को नौकरी से हटा दिया गया था। इससे इन सैनिकों के मन में अंग्रेजों के प्रति रोष उत्पन्न हो गया तथा वे अंग्रेजों के साथ युद्ध की तैयारियाँ करने लगे।

4. महारानी जिंदां से दुर्व्यवहार अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह की विधवा महारानी जिंदां से जो अपमानजनक व्यवहार किया, उसने सिखों में अंग्रेजों के प्रति व्याप्त रोष को और भड़का दिया। वह इस अपमान का बदला लेने चाहते थे।

5. दीवान मूलराज का विद्रोह-द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध को आरंभ करने में मुलतान के दीवान मूलराज के विद्रोह को विशेष स्थान प्राप्त है। 20 अप्रैल, 1848 ई० को मुलतान में दो अंग्रेज़ अधिकारियों वैनस एग्नय तथा एंडरसन के किए गए कत्लों के लिए मूलराज को दोषी ठहराया गया। इस कारण उसने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का ध्वज उठा लिया।

6. लॉर्ड डलहौज़ी की नीति-1848 ई० में लॉर्ड डलहौज़ी भारत का नया गवर्नर-जनरल बना था। वह बहुत बड़ा साम्राज्यवादी था। वह पंजाब को अपने अधीन करने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में था। यह अवसर उसे दीवान मूलराज, चतर सिंह तथा शेर सिंह द्वारा किए गए विद्रोहों से मिला।

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प्रश्न 2.
दीवान मूलराज के विद्रोह पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a note on the revolt of Diwan Mulraj.)
अथवा
मुलतान के दीवान मूलराज के विद्रोह के संबंध में संक्षिप्त जानकारी दें। (Give a brief account of the revolt of Diwan Mulraj of Multan.)
उत्तर-
दीवान मूलराज 1844 ई० में मुलतान का नया गवर्नर बना था। वह लगभग 1372 लाख रुपए वार्षिक लगान लाहौर दरबार को देता था। बाद में यह राशि बढ़ाकर 20 लाख रुपए वार्षिक कर दी गई थी, परंतु इसके साथ ही उसके प्राँत का तीसरा भाग भी उससे ले लिया गया। इस कारण दीवान मूलराज ने गवर्नर के पद से त्यागपत्र दे दिया। मार्च, 1848 ई० में रेजीडेंट फ्रेडरिक करी ने मूलराज का त्याग-पत्र स्वीकार कर लिया। उसने काहन सिंह को मुलतान का नया गवर्नर नियुक्त करने का निर्णय किया। उसकी सहायता के लिए दो अंग्रेज अधिकारियों एग्नयू और एंडरसन को उसके साथ भेजा गया। मूलराज ने बिना किसी विरोध के 19 अप्रैल, 1848 ई० को किले की चाबियाँ काहन सिंह को सौंप दी, परंतु 20 अप्रैल को मूलराज के सिपाहियों ने दोनों अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या कर दी। अंग्रेजों ने इसके लिए मूलराज को दोषी ठहराया। इसलिए मूलराज ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। अंग्रेज़ों ने इस विद्रोह का दमन करने की अपेक्षा इसे फैलने दिया ताकि उन्हें लाहौर दरबार पर आक्रमण करने का अवसर मिल सके।

प्रश्न 3.
हज़ारा के चतर सिंह के विद्रोह के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the revolt of Chattar Singh of Hazara ?)
उत्तर-
सरदार चतर सिंह अटारीवाला हज़ारा का नाज़िम था। उसकी लड़की की सगाई महाराजा दलीप सिंह के साथ हुई थी, परंतु अंग्रेज़ इस रिश्ते के विरुद्ध थे, क्योंकि इससे सिखों की राजनीतिक शक्ति बढ़ जानी थी। यह शक्ति अंग्रेजों की पंजाब को हड़पने की नीति के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर सकती थी। कैप्टन ऐबट जिसे सरदार चतर सिंह का परामर्शदाता नियुक्त किया गया था, सिख राज्य को नष्ट करने की योजना तैयार कर रहा था। उस द्वारा भड़काए गए हज़ारा के मुसलमानों ने 6 अगस्त, 1848 ई० को सरदार चतर सिंह के निवास स्थान पर आक्रमण कर दिया। यह देख कर सरदार चतर सिंह ने कर्नल कैनोरा को विद्रोहियों के विरुद्ध कार्यवाही करने का आदेश दिया। कर्नल कैनोरा जो कैप्टन ऐबट के साथ मिला हुआ था, ने चतर सिंह के आदेश को मानने से इन्कार कर दिया। उसने अपनी पिस्तौल से गोलियाँ चलाकर दो सिख सिपाहियों को मार डाला। उसी समय एक सिख सिपाही ने आगे बढ़कर अपनी तलवार से कैनोरा की जान ले ली। जब इस घटना का समाचार ऐबट ने पाया तो वह क्रोध से आग बबूला हो उठा। उसने सरदार चतर सिंह को पदच्युत कर दिया तथा उसकी जागीर ज़ब्त कर ली। इस कारण चतर सिंह का खून खौल उठा तथा उसने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की घोषणा कर दी।

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प्रश्न 4.
चिलियाँवाला की लड़ाई पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a note on the battle of Chillianwala.)
उत्तर-
चिलियाँवाला की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों में से एक थी। लॉर्ड ह्यग गफ, जो अंग्रेजी सेनापति था, शेर सिंह की सेना का मुकाबला करने के लिए और सैनिक सहायता पहुँचने की प्रतीक्षा कर रहा था। इसी बीच ह्यग गफ को यह सूचना मिली कि चतर सिंह ने अटक के किले पर अधिकार कर लिया है और वह शेर सिंह की सहायता के लिए आ रहा है। ऐसा होने पर अंग्रेजों के लिए घोर संकट पैदा हो सकता था। इसलिए ह्यग गफ ने चतर सिंह के पहुंचने से पहले ही 13 जनवरी, 1849 ई० को चिलियाँवाला में शेर सिंह की सेना पर आक्रमण कर दिया। इस घमासान लड़ाई में शेर सिंह के सैनिकों ने अंग्रेजों के खूब छक्के छुड़ाए। इस लड़ाई में अंग्रेजों की इतनी अधिक क्षति हुई कि इंग्लैंड में भी हाहाकार मच गई। इस अपमानजनक पराजय के कारण सेनापति लॉर्ड ह्यग गफ के सम्मान को भारी आघात पहुँचा। उसके स्थान पर चार्ल्स नेपियर को अंग्रेज़ी सेना का नया सेनापति नियुक्त करके भारत भेजा गया।

प्रश्न 5.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के दौरान हुई गुजरात की लड़ाई का क्या महत्त्व था ? (What was the importance of the battle of Gujarat in the Second Anglo-Sikh War ?)
उत्तर-
गुजरात की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो सिख युद्ध की अंतिम तथा निर्णायक लड़ाई थी। यह लड़ाई 21 फरवरी, 1849 ई० को लड़ी गई थी। इस लड़ाई में सिख सैनिकों की संख्या 40,000 थी तथा उनका नेतृत्व चतर सिंह, शेर सिंह तथा महाराज सिंह कर रहे थे। दूसरी ओर अंग्रेज़ सैनिकों की संख्या 68,000 थी और लॉर्ड ह्यग गफ उनका सेनापति था। क्योंकि इस लड़ाई में दोनों पक्षों की ओर से तोपों का खूब प्रयोग किया गया इसलिए गुजरात की लड़ाई को तोपों की लड़ाई भी कहा जाता है। सिखों ने अंग्रेजों का बड़ी वीरता से सामना किया, परंतु उनका गोला-बारूद समाप्त हो जाने पर अंततः उन्हें पराजित होना पड़ा। इस लड़ाई में सिखों की भारी क्षति हुई और उनमें भगदड़ मच गई। चतर सिंह, शेर सिंह तथा महाराज सिंह रावलपिंडी की ओर भाग गए। अंग्रेज़ सैनिकों ने उनका पीछा किया। उन्होंने 10 मार्च को शस्त्र डाल दिए जबकि शेष सैनिकों ने 14 मार्च को अंग्रेजों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। इस लड़ाई में विजय के पश्चात् 29 मार्च, 1849 ई० को पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में : सम्मिलित कर लिया गया। इस प्रकार महाराजा रणजीत सिंह के राज्य का अंत हो गया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध : कारण, परिणाम तथा पंजाब का विलय

प्रश्न 6.
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के क्या प्रभाव पड़े ? (What were the results of the Second Anglo-Sikh War ?)
अथवा
दसरे ऐंग्लो-सिख यद्ध के प्रभावों का अध्ययन संक्षेप में करें। (Study in brief the results of Second Anglo-Sikh War.)
अथवा
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के कोई छः प्रभाव बताएँ। (Write six effects of Second Anglo-Sikh War.)
उत्तर-
दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के बड़े दूरगामी परिणाम निकले। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार—
1. महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का अंत-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का पूर्णतः अंत हो गया। अंतिम सिख महाराजा दलीप सिंह को सिंहासन से उतार दिया गया।

2. सिख सेना भंग कर दी गई—दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के पश्चात् सिख सेना को भी भंग कर दिया गया। अधिकाँश सिख सैनिकों को कृषि व्यवसाय में लगाने का प्रयत्न किया गया। कुछ को ब्रिटिश-भारतीय सेना में भर्ती कर लिया गया।

3. दीवान मूल राज तथा भाई महाराज सिंह को निष्कासन का दंड दीवान मूलराज के मृत्यु दंड को काले पानी की सज़ा में बदल दिया गया। परंतु उनकी 11 अगस्त, 1851 ई० को कलकत्ता (कोलकाता) में मृत्यु हो गई। भाई महाराज सिंह को सिंगापुर जेल भेज दिया गया जहाँ 5 जुलाई, 1856 ई० को उसकी मृत्यु हो गई।

4. चतर सिंह तथा शेर सिंह को दंड-अंग्रेजों ने स० चतर सिंह तथा उसके पुत्र शेर सिंह को बंदी बना लिया था। उन्हें पहले इलाहाबाद तथा बाद में कलकत्ता (कोलकाता) की जेलों में रखा गया। 1854 ई० में सरकार ने उन दोनों को मुक्त कर दिया।

5. पंजाब के लिए नया प्रशासन —पंजाब के अंग्रेजी साम्राज्य में विलय के पश्चात् अंग्रेज़ों ने पंजाब का प्रशासन चलाने के लिए प्रशासनिक बोर्ड की स्थापना की। यह 1849 ई० से 1853 ई० तक बना रहा। इन सुधारों ने पंजाबियों के दिलों को जीत लिया। परिणामस्वरूप वे 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों के प्रति वफ़ादार रहे।

6. पंजाब की रियासतों में मित्रता का व्यवहार-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध के समय पटियाला, नाभा, जींद, मालेरकोटला, फरीदकोट तथा कपूरथला की रियासतों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया था। इससे अंग्रेज़ों ने इनसे मित्रता बनाए रखीं और इन रियासतों को अंग्रेज़ी राज्य में सम्मिलित न किया गया।

प्रश्न 7.
क्या लॉर्ड डलहौजी द्वारा पंजाब का संयोजन न्याय संगत था ? अपने पक्ष में तर्क दें।
(Was the annexation of Punjab by Lord Dalhousie Justified ? Give reasons in your favour.)
अथवा
“पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित करना एक घोर विश्वासघात था।” व्याख्या करें। (“Annexation of Punjab was a violent breach of trust.” Explain.)
अथवा
क्या पंजाब का विलय उचित था ? कारण लिखो। (Was the annexation of Punjab justified ? Give reasons.)
अथवा
क्या पंजाब का संयोजन न्याय संगत था ? इसके पक्ष में छः तर्क दें। (P.S.E.B. July 2019) (Was the annexation of Punjab justified ? Give six reasons for it.)
उत्तर-
1. सिखों को विद्रोह के लिए भड़काया-प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध के बाद बहुत-सी ऐसी घटनाएँ घटीं जिन्होंने सिखों को विद्रोह के लिए भड़काया। लाहौर की संधि के अनुसार पंजाब के कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अंग्रेज़ों ने छीन लिए थे। अंग्रेज़ों ने महारानी जिंदां से बहुत बुरा व्यवहार किया। उन्होंने दीवान मूलराज तथा सरदार चतर सिंह को विद्रोह के लिए भड़काया। परिणामस्वरूप सिखों को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह के लिए विवश किया गया।

2. विद्रोह समय पर न दबाया गया-जब मुलतान में विद्रोह की आग भड़की तो उस पर तुरंत नियंत्रण न किया गया। आठ माह तक विद्रोह फैलने देना, एक गहरी राजनीतिक चाल थी। इस तरह अंग्रेज़ों को पंजाब में सैनिक कार्यवाही करने का बहाना मिल गया तथा पंजाब को हड़प लिया गया।

3. अंग्रेजों ने संधि की शर्ते पूरी न की-अंग्रेजों का कहना था कि उन्होंने संधि की शर्ते पूरी की हैं। परंतु अंग्रेज़ों ने संधि की केवल वही शर्ते पूरी की जो उनके लिए लाभप्रद थीं। इस प्रकार हम देखते हैं कि अंग्रेज़ों का यह कहना कि उन्होंने संधि की शर्तों को पूरा किया, नितांत झूठ है।

4. लाहौर दरबार ने संधि की शर्ते पूरी करने में पूर्ण सहयोग दिया-लाहौर दरबार ने तो पंजाब पर अंग्रेज़ों का अधिकार होने तक संधि की शर्ते पूरी निष्ठा से पूरी की। लाहौर सरकार पंजाब में रखी गई अंग्रेज़ी सेना का पूरा खर्च दे रही थी। उसने दीवान मूलराज, चतर सिंह और शेर सिंह द्वारा की गई बगावतों की निंदा की और इनके दमन में अंग्रेजी सेना को पूर्ण सहयोग दिया।

5. पूरी सिख सेना तथा लोगों ने विद्रोह नहीं किया था-लॉर्ड डलहौज़ी ने यह आरोप लगाया था कि पंजाब की सारी सिख सेना तथा लोगों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। परंतु यह कथन भी सत्य नहीं है। पंजाब के केवल मुलतान तथा हज़ारा प्रांतों में ही अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह हुआ था। अधिकाँश सिख सेना तथा लोग अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान् रहे।

6. पंजाब पर अधिकार एक विश्वासघात था-पंजाब पर अंग्रेजों द्वारा अधिकार एक घोर विश्वासघात था। 1846 ई० में हुई भैरोवाल की संधि अनुसार पंजाब में शांति व्यवस्था बनाए रखने की सारी ज़िम्मेदारी अंग्रेज़ों की थी। परन्तु अंग्रेजों ने पंजाब में बिगड़ती हुई परिस्थितियों के लिए महाराजा दलीप सिंह को दोषी माना।

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प्रश्न 8.
डलहौज़ी के इस पक्ष में कोई छः तर्क दें कि उसके द्वारा पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित करना उचित था।
(Give any six arguments in favour of Dalhousie’s annexation of the Punjab to the British Empire.)
अथवा
डलहौज़ी की पंजाब विलय की नीति के पक्ष में तर्क दीजिएवं (Give arguments in favour of Dalhousie’s policy of the annexation of Punjab.)
उत्तर-
1. सिखों ने वचन भंग किया-लॉर्ड डलहौजी ने यह आरोप लगाया कि सिखों ने भैरोवाल संधि की शर्ते भंग की। सिख सरदारों ने यह वचन दिया था कि वे अंग्रेज़ रेजीडेंट को पूर्ण सहयोग देंगे। परंतु उन्होंने राज्य में अशांति तथा विद्रोह भड़काने का प्रयत्न किया। लॉर्ड डलहौज़ी ने दीवान मूलराज के विद्रोह को पूरी सिख जाति का विद्रोह बताया। सरतार चतर सिंह तथा उसके पुत्र शेर सिंह ने विद्रोह करके मूलराज का साथ दिया। इस प्रकार बिगड़ रही परिस्थितियों पर नियंत्रण पाने के लिए पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय आवश्यक था।

2. पंजाब अच्छा मध्यवर्ती राज्य न रहा-लॉर्ड हार्डिंग का विचार था कि पंजाब एक लाभप्रद मध्यवर्ती राज्य प्रमाणित होगा। इससे ब्रिटिश राज्य को अफ़गानिस्तान की ओर से किसी ख़तरे का सामना नहीं करना पड़ेगा। परंतु उनका यह विचार गलत प्रमाणित हुआ क्योंकि सिखों तथा अफ़गानों में मित्रता स्थापित हो गई। इसीलिए लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित करना आवश्यक समझा।

3. ऋण न लौटाना-लॉर्ड डलहौज़ी ने यह आरोप लगाया कि भैरोवाल की संधि की शर्तों के अनुसार लाहौर दरबार ने अंग्रेजों को 22 लाख रुपए वार्षिक देने थे। परंतु लाहौर दरबार ने एक पाई भी अंग्रेजों को न दी। इसलिए पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में सम्मिलित करना उचित था।

4. पंजाब पर अधिकार करना लाभप्रद था-प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध में विजय के पश्चात् अंग्रेजों का मत था कि आर्थिक दृष्टि से पंजाब कोई लाभप्रद प्राँत नहीं है। परंतु पंजाब में दो वर्ष तक रह कर उन्हें ज्ञात हो गया कि यह राज्य तो कई दृष्टियों से भी अंग्रेजों के लिए लाभप्रद प्रमाणित हो सकता है। इन कारणों से लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब को हड़प करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

5. पंजाब पर अधिकार आवश्यक था-यह कहा जाता है कि यदि पंजाब का विलय न किया जाता तो सिखों ने अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध सदैव षड्यंत्र रचते रहना था। इसका प्रभाव भारत के अन्य भागों में भी पड़ सकता था। इसलिए लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित करना आवश्यक समझा।

6. पंजाब के लोगों के लिए लाभप्रद-लॉर्ड डलहौज़ी के पंजाब पर अधिकार करने के पक्ष में एक तर्क यह दिया जाता है कि ऐसा करके उसने पंजाब के लोगों के लिए एक अच्छा कार्य किया। ऐसा करके उन्होंने पंजाब में फैली अराजकता को दूर किया। प्रशासन में महत्त्वपूर्ण सुधारों को लागू किया। इस तरह पंजाब का अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय पंजाब के लोगों के लिए वरदान प्रमाणित हुआ।

प्रश्न 9.
महाराजा दलीप सिंह पर एक नोट लिखें।
(Write a note on Maharaja Dalip Singh.)
उत्तर-
महाराजा दलीप सिंह रणजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र था। वह 15 सितंबर, 1843 ई० को पंजाब का नया महाराजा बना था। उस समय उसकी आयु 5 वर्ष की थी, इसलिए महारानी जिंदां को उसका संरक्षक बनाया गया। महाराजा दलीप सिंह ने राज्य का प्रशासन चलाने के लिए हीरा सिंह को राज्य का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। यद्यपि वह बहुत समझदार था, परंतु उसने पंडित जल्ला को मुशीर-ए-खास (विशेष परामर्शदाता) नियुक्त करके बहुत-से दरबारियों को रुष्ट कर लिया था। 1844 ई० में हीरा सिंह की हत्या के पश्चात् जवाहर सिंह को नया प्रधानमंत्री बनाया गया, परंतु वह बड़ा हठी तथा अयोग्य था। उसे सितंबर, 1845 ई० में कंवर पिशौरा सिंह की हत्या के कारण सैनिकों ने मृत्यु दंड दे दिया था। उसके पश्चात् लाल सिंह को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किया गया। वह पहले से ही अंग्रेजों से मिला हुआ था। परिणामस्वरूप पहले तथा दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्धों में सिखों को पराजय का मुख देखना पड़ा। अंग्रेज़ों ने महाराजा दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया और 29 मार्च, 1849 ई० को पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। 22 अक्तब्रूर, 1893 ई० को महाराजा दलीप सिंह की पेरिस में मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 10.
महारानी जींद कौर (जिंदां) पर एक नोट लिखो। [Write a note on Maharani Jind Kaur (Jindan).]
अथवा
महारानी जिंदां के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Maharani Jindan ?)
उत्तर-
महारानी जिंदां, महाराजा दलीप सिंह की माता तथा महाराजा रणजीत सिंह की रानी थी। जब 15 सितंबर, 1843 ई० को दलीप सिंह पंजाब का नया महाराजा बना तो महारानी जिंदां को उसका संरक्षक बनाया गया। क्योंकि महारानी जिंदां पंजाब को स्वतंत्र रखना चाहती थी इसलिए वह अंग्रेज़ों की आँखों में खटकती थी। इसीलिए अंग्रेज़ों ने दिसंबर, 1846 ई० में लाहौर दरबार से हुई भैरोवाल की संधि के अंतर्गत महारानी जिंदां के सभी अधिकार छीन लिए तथा उसकी डेढ़ लाख रुपए वार्षिक पेंशन निश्चित कर दी गई। अगस्त, 1847 ई० में अंग्रेज़ों ने महारानी को शेखूपुरा के किले में नज़रबंद कर दिया और मई, 1848 को देश निकाला देकर बनारस भेज दिया। जेल में महारानी से क्रूर व्यवहार किया गया। अप्रैल, 1849 ई० में महारानी भेष बदल कर नेपाल पहुँचने में सफल हो गई। 1861 ई० में जब महाराजा दलीप सिंह इंग्लैंड से भारत आया तो महारानी जिंदां उससे मिलने नेपाल से भारत आई। महाराजा दलीप सिंह अपनी माता को इंग्लैंड ले गया। यहाँ अंग्रेजों ने दोनों को एक साथ न रहने दिया। अंततः 1 अगस्त, 1863 ई० को महारानी इस संसार से चल बसीं।

प्रश्न 11.
भाई महाराज सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a brief note on Bhai Maharaj Singh.)
उत्तर-
भाई महाराज सिंह नौरंगाबाद के प्रसिद्ध संत भाई बीर सिंह के शिष्य थे। 1845 ई० में वह भाई बीर सिंह की मृत्यु के पश्चात् गद्दी पर बैठे। वह पंजाब की स्वतंत्रता को बनाए रखने के पक्ष में थे। इस उद्देश्य के साथ उन्होंने गाँव-गाँव जाकर प्रचार करना आरंभ किया। अत: सरकार ने उनकी संपत्ति जब्त कर ली तथा उनको बंदी करवाने वाले को 10,000 रुपए ईनाम देने की घोषणा की। इसके बावजूद भाई महाराज सिंह बिना किसी भय के अपना प्रचार करते रहे। उन्होंने मुलतान के दीवान मूलराज, हज़ारा के सरदार चतर सिंह अटारीवाला तथा उसके पुत्र शेर सिंह को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की सभी लड़ाइयों में भाग लिया। वह गुजरात की लड़ाई के पश्चात् सिख सैनिकों द्वारा अंग्रेजों के समक्ष हथियार डालने के विरुद्ध थे। ऐसा किया जाने पर वह जम्मू चले गए। उन्होंने काबुल के शासक के साथ मिलकर 3 जनवरी, 1850 ई० को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई। इस योजना के बारे में अंग्रेजों को पूर्व ही सूचना मिल गई। परिणामस्वरूप भाई महाराज सिंह को 28 दिसंबर, 1849 ई० को बंदी बना लिया गया। उनको पहले कलकत्ता तथा बाद में सिंगापुर की जेल में रखा गया। यहाँ उनकी 5 जुलाई, 1856 ई० को मृत्यु हो गई।

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Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध को आरंभ करने में मुलतान के दीवान मूलराज के विद्रोह को विशेष स्थान प्राप्त है। मुलतान सिख राज्य का एक प्राँत था। 1844 ई० में यहाँ के नाज़िम (गवर्नर) सावन मंल की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र मूलराज को नया नाज़िम बनाया गया। इस अवसर पर अंग्रेज़ रेज़िडेंट ने मुलतान प्राँत द्वारा लाहौर दरबार को दिया जाने वाला वार्षिक लगान 13,47,000 रुपए से बढ़ाकर 19,71,500 रुपए कर दिया। 1846 ई० में इसमें वृद्धि करके इसे 30 लाख रुपए कर दिया गया। दूसरी ओर अंग्रेजों ने मुलतान में बिकने वाली कुछ आवश्यक वस्तुओं पर से कर हटा लिया और मुलतान का 1/3 भाग भी वापस ले लिया। इन कारणों से दीवान मूलराज सरकार को बढ़ा हुआ लगान नहीं दे सकता था। अतः उसने इस संबंध में ब्रिटिश सरकार के पास अनेक बार प्रार्थना की परंतु इन्हें रद्द कर दिया गया। अतः विवश होकर दिसंबर, 1847 ई० को दीवान मूलराज ने अपना त्यागपत्र दे दिया। मार्च 1848 ई० में नए रेज़िडेंट फ्रेड्रिक करी ने सरदार काहन सिंह को मुलतान का नया नाज़िम नियुक्त करने का निर्णय किया। मूलराज से चार्ज लेने के लिए काहन सिंह के साथ दो अंग्रेज़ अधिकारियों वैनस एग्नयू तथा एंड्रसन को भेजा गया। मूलराज ने उनका अच्छा स्वागत किया। 19 अप्रैल को मूलराज ने दुर्ग की चाबियाँ काहन सिंह को सौंप दी, परंतु अगले दिन 20 अप्रैल को मूलराज के कुछ सिपाहियों ने आक्रमण करके दोनों अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या कर दी तथा काहन सिंह को बंदी बना लिया। प्रैड्रिक करी ने मुलतान के विद्रोह के लिए मूलराज को दोषी ठहराया।

  1. दीवान मूलराज को कब मुलतान का नया नाज़िम नियुक्त किया गया था ?
  2. दीवान मूलराज ने किस कारण अपना अस्तीफ़ा दिया था ?
  3. 1848 ई० में रेजिडेंट फ्रेड्रिक करी ने किसे मुलतान का नया नाजिम नियुक्त किया था ?
  4. अंग्रेज़ों ने किन दो अफ़सरों के कत्ल की जिम्मेवारी दीवान मूलराज पर डाली ?
  5. प्रैड्रिक करी ने मुलतान के विद्रोह के लिए …………. को दोषी ठहराया।

उत्तर-

  1. दीवान मूलराज को 1844 ई० में मुलतान का नया नाज़िम नियुक्त किया गया था।
  2. उसके द्वारा दिए जाने वाले वार्षिक लगान में बहुत अधिक बढ़ौत्तरी कर दी गई थी।
  3. सरदार काहन सिंह को।
  4. वैनस एग्नयू तथा एंड्रसन।
  5. मूलराज।

2
चिल्लियाँवाला की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों में से एक थी। यह लड़ाई 13 जनवरी, 1849 ई० को लड़ी गई थी। लॉर्ड ह्यूग गफ़ का कहना था कि उसके पास शेर सिंह का सामना करने के लिए शक्तिशाली सेना नहीं है। इसलिए वह और सैन्य शक्ति के पहुंचने की प्रतीक्षा कर रहा है परंतु जब लॉर्ड ह्यूग गफ़ को यह सूचना मिली कि चतर सिंह ने अटक के किले पर अधिकार कर लिया है और वह अपने सैनिकों सहित शेर सिंह की सहायता को पहुँच रहा है तो उसने 13 जनवरी को शेर सिंह के सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। यह लड़ाई बहुत भयानक थी। इस लड़ाई में शेर सिंह के सैनिकों ने अंग्रेज़ी सेना में खलबली मचा दी। उनके 695 सैनिक, जिनमें 132 अफसर थे, इस लड़ाई में मारे गए तथा अन्य 1651 घायल हो गए। अंग्रेजों की चार तोपें भी सिखों के हाथ लगीं।

  1. दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण लड़ाई कौन-सी थी ?
  2. चिल्लियाँवाला की लड़ाई कब हुई ?
  3. शेर सिंह कौन था ?
  4. चिल्लियाँवाला की लड़ाई में किसकी हार हुई ?
  5. चिल्लियाँवाला की लड़ाई में कितने अंग्रेज़ अफसर मारे गए थे ?
    • 132
    • 142
    • 695
    • 165

उत्तर-

  1. दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण लड़ाई चिल्लियाँवाला की लड़ाई थी।
  2. यह लड़ाई 13 जनवरी, 1849 ई० को हुई।
  3. शेर सिंह हज़ारा के नाज़िम सरदार चतर सिंह का पुत्र था।
  4. चिल्लियाँवाला की लड़ाई में अंग्रेजों की पराजय हुई।
  5. 132

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3
गुजरात की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की सब से महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक लड़ाई प्रमाणित हुई। इस लड़ाई में चतर सिंह के सैनिक शेर सिंह के सैनिकों से आ मिले थे। उनकी सहायता के लिए भाई महाराज सिंह भी गुजरात पहुँच गया था। इसके अतिरिक्त अफ़गानिस्तान के बादशाह दोस्त मुहम्मद खाँ ने सिखों की सहायता के लिए अपने पुत्र अकरम खाँ के नेतृत्व में 3000 घुड़सवार सेना भेजी। इस लड़ाई में सिख सेना की संख्या 40,000 थी। दूसरी ओर अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व अभी भी लॉर्ड ह्यग गफ़ ही कर रहा था क्योंकि सर चार्ल्स नेपियर अभी भारत नहीं पहुंचा था। अंग्रेजों के पास 68,000 सैनिक थे। इस लड़ाई में दोनों ओर से तोपों का भारी प्रयोग किया गया था जिससे यह लड़ाई इतिहास में तोपों की लड़ाई नाम से विख्यात है। यह लड़ाई 21 फरवरी, 1849 ई० को प्रातः 7.30 बजे आरंभ हुई थी। सिखों की तोपों का बारूद शीघ्र ही समाप्त हो गया। जब अंग्रेजों को इस संबंध में ज्ञात हुआ तो उन्होंने अपनी तोपों से सिख सेनाओं पर भारी आक्रमण कर दिया। सिख सैनिकों ने अपनी तलवारें निकाल ली परंतु तोपों का मुकाबला वे कब तक कर सकते थे। इस लड़ाई में सिख सेना को भारी क्षति पहुँची।

  1. गुजरात की लड़ाई दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण तथा ……… लड़ाई प्रमाणित हुई।
  2. गुजरात की लड़ाई कब लड़ी गई थी ?
  3. गुजरात की लड़ाई में अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व कौन कर रहा था ?
  4. गुजरात की लड़ाई को तोपों की लड़ाई क्यों कहा जाता था ?
  5. गुजरात की लड़ाई में कौन विजयी रहे ?

उत्तर-

  1. निर्णायक।
  2. गुजरात की लड़ाई 21 फरवरी, 1849 ई० में लड़ी गई थी।
  3. गुजरात की लड़ाई में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था।
  4. गुजरात की लड़ाई को तोपों की लड़ाई इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें दोनों ओर से भारी तोपों का प्रयोग किया गया था।
  5. गुजरात की लड़ाई में अंग्रेज़ विजयी रहे।

द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध : कारण, परिणाम तथा पंजाब का विलय PSEB 12th Class History Notes

  • द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध के कारण (Causes of the Second Anglo-Sikh War)-सिख प्रथम ऐंग्लो-सिख युद्ध में हुई अपनी पराजय का प्रतिशोध लेना चाहते थे-लाहौर तथा भैरोवाल की संधियों ने सिख राज्य की स्वतंत्रता को लगभग समाप्त कर दिया था-सेना में से हजारों की संख्या में निकाले गए सिख सैनिकों के मन में अंग्रेज़ों के प्रति भारी रोष था-अंग्रेजों द्वारा महारानी जिंदां के साथ किए गए दुर्व्यवहार के कारण समूचे पंजाब में रोष की लहर दौड़ गई थी-मुलतान के दीवान मूलराज द्वारा किए गए विद्रोह को अंग्रेजों ने जानबूझ कर फैलने दिया-चतर सिंह और उसके पुत्र शेर सिंह द्वारा किए गए विद्रोह ने ऐंग्लो-सिख युद्ध को और निकट ला दिया-लॉर्ड डलहौज़ी की साम्राज्यवादी नीति द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध का तत्कालीन कारण बनी।
  • युद्ध की घटनाएँ (Events of the War)—सिखों तथा अंग्रेज़ों के मध्य हुए द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध की प्रमुख घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है—
    • रामनगर की लड़ाई (Battle of Ramnagar)-रामनगर की लड़ाई 22 नवंबर, 1848 ई० को लड़ी गई थी-इसमें सिख सेना का नेतृत्व शेर सिंह तथा अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था-द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध की इस प्रथम लड़ाई में सिखों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।
    • चिल्लियाँवाला की लड़ाई (Battle of Chillianwala)—चिल्लियाँवाला की लड़ाई 13 जनवरी, 1849 ई० को लड़ी गई थी-इसमें भी सिख सेना का नेतृत्व शेर सिंह तथा अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व लॉर्ड ह्यूग गफ़ कर रहा था-इस लड़ाई में अंग्रेजों को भारी पराजय का सामना करना पड़ा।
    • मुलतान की लड़ाई (Battle of Multan) दिसंबर, 1848 ई० में जनरल विश ने मुलतान के किले को घेर लिया-अंग्रेजों द्वारा फेंके गए एक गोले ने मुलतान के दीवान मूलराज की सेना का बारूद नष्ट कर दिया – परिणामस्वरूप मूलराज ने 22 जनवरी, 1849 ई० को आत्म-समर्पण कर दिया।
    • गुजराते की लड़ाई (Battle of Gujarat)—गुजरात की लड़ाई द्वितीय ऐंग्लो-सिख युद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण और निर्णायक लड़ाई थी-इसमें सिखों का नेतृत्व कर रहे शेर सिंह की सहायता के लिए चतर सिंह, भाई महाराज सिंह और दोस्त मुहम्मद खाँ का पुत्र अकरम खाँ आ गए थे-अंग्रेज़ सेना का नेतृत्व लॉर्ड गफ कर रहा था–इस लड़ाई को ‘तोपों की लड़ाई’ भी कहा जाता है-यह लड़ाई 21 फरवरी, 1849 ई० को हुई-इस लड़ाई में सिख पराजित हुए और उन्होंने 10 मार्च, 1849 ई० को हथियार डाल दिए।
  • युद्ध के परिणाम (Consequences of the War)-दूसरे ऐंग्लो-सिख युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि 29 मार्च, 1849 ई० को पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला दिया गया-सिख सेना को भंग कर दिया गया-दीवान मूलराज और भाई महाराज सिंह को निष्कासन का दंड दिया गया पंजाब का प्रशासन चलाने के लिए 1849 ई० में प्रशासनिक बोर्ड की स्थापना की गई।
  • पंजाब के विलय के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of Annexation of the Punjab) लॉर्ड डलहौज़ी का आरोप था कि सिखों ने भैरोवाल की संधि की शर्ते भंग की-लाहौर दरबार ने संधि में किए गए वार्षिक 22 लाख रुपए में से एक पाई भी न दी-लॉर्ड डलहौज़ी का आरोप था कि मूलराज तथा चतर सिंह का विद्रोह पुनः सिख राज्य की स्थापना के लिए था अतः पंजाब का अंग्रेज़ी साम्राज्य में विलय आवश्यक था।
  • पंजाब के विलय के विरोध में तर्क (Arguments against Annexation of the Punjab) इतिहासकारों का मानना है कि अंग्रेजों ने सिखों को जानबूझ कर विद्रोह के लिए भड़काया-मूलराज के विद्रोह को समय पर न दबाना एक सोची समझी चाल थी-लाहौर दरबार ने संधि की शर्तों का पूरी निष्ठा से पालन किया था-विद्रोह केवल कुछ प्रदेशों में हुआ था इसलिए पूरे पंजाब को दंडित करना पूर्णतः अनुचित था।