PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

SST Guide for Class 10 PSEB गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द/एक पंक्ति (1-15 शब्दों) में लिखो

प्रश्न 1.
भाई लहना किस गुरु का पहला नाम था?
उत्तर-
गुरु अंगद साहिब का।

प्रश्न 2.
लंगर प्रथा से क्या भाव है?
उत्तर-
लंगर प्रथा अथवा पंगत से भाव उस प्रथा से है जिसके अनुसार सभी जातियों के लोग बिना किसी भेदभाव के एक ही पंगत में इकट्ठे बैठकर खाना खाते थे।

प्रश्न 3.
गोइन्दवाल में बाऊली (जल स्त्रोत) की नींव किस गुरु ने रखी थी?
उत्तर-
गोइन्दवाल में बाऊली की नींव गुरु अंगद देव जी ने रखी थी।

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प्रश्न 4.
अकबर कौन-से गुरु को मिलने गोइन्दवाल आया?
उत्तर-
अकबर गुरु अमरदास जी से मिलने गोइन्दवाल आया था।

प्रश्न 5.
मसन्द प्रथा के उद्देश्य लिखिए।
उत्तर-
मसन्द प्रथा के मुख्य उद्देश्य थे-सिक्ख धर्म के विकास कार्यों के लिए धन एकत्रित करना तथा सिक्खों को संगठित करना।

प्रश्न 6.
सिक्खों के चौथे गुरु कौन थे तथा उन्होंने कौन-सा शहर बसाया?
उत्तर-
गुरु रामदास जी सिक्खों के चौथे गुरु थे जिन्होंने रामदासपुर (अमृतसर) नामक नगर बसाया।

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प्रश्न 7.
हरिमंदिर साहिब की नींव कब तथा किसने रखी?
उत्तर-
हरिमंदिर साहिब की नींव 1589 ई० में उस समय के प्रसिद्ध सूफ़ी सन्त मियां मीर ने रखी।

प्रश्न 8.
हरिमंदिर साहिब के चारों तरफ दरवाज़े रखने से क्या भाव है?
उत्तर-
हरिमंदिर साहिब के चारों तरफ दरवाज़े रखने से भाव यह है कि यह पवित्र स्थान सभी वर्गों, सभी जातियों और सभी धर्मों के लिए समान रूप से खुला है।

प्रश्न 9.
गुरु अर्जन देव जी द्वारा स्थापित किए गए चार शहरों के नाम लिखिए।
उत्तर-
तरनतारन, करतारपुर, हरगोबिन्दपुर तथा छहरटा।

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प्रश्न 10.
‘दसवन्ध’ से क्या भाव है?
उत्तर-
‘दसवन्ध’ से भाव यह है कि प्रत्येक सिक्ख अपनी आय का दसवां भाग गुरु जी के नाम भेंट करे।

प्रश्न 11.
‘आदि ग्रन्थ’ का संकलन क्यों किया गया?
उत्तर-
आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन सिक्खों को गुरु साहिबान की शुद्धतम तथा प्रामाणिक वाणी का ज्ञान करवाने के लिए किया गया।

प्रश्न 12.
लंगर प्रथा के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
लंगर प्रथा का आरम्भ गुरु नानक साहिब ने सामाजिक भाईचारे के लिए किया।

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प्रश्न 13.
गुरु अंगद देव जी संगत प्रथा के द्वारा सिक्खों को क्या उपदेश देते थे?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी संगत प्रथा के द्वारा सिक्खों को ऊंच-नीच के भेदभाव को भूल कर प्रेमपूर्वक रहने की शिक्षा देते थे।

प्रश्न 14.
गुरु अंगद देव जी की पंगत-प्रथा के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने गुरु नानक देव जी के द्वारा चलाई गई पंगत-प्रथा (लंगर) को आगे बढ़ाया जिसका खर्च सिक्खों की कार सेवा से चलता था।

प्रश्न 15.
गुरु अंगद देव जी द्वारा स्थापित अखाड़े के बारे में लिखिए।
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने सिक्खों को शारीरिक रूप से मज़बूत बनाने के लिए खडूर साहिब के स्थान पर एक अखाड़ा बनवाया।

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प्रश्न 16.
गोइन्दवाल के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
गोइन्दवाल नामक नगर की स्थापना गुरु अंगद देव जी ने की जो सिक्खों का एक प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र बन गया।

प्रश्न 17.
गुरु अमरदास जी के जाति-पाति के बारे में विचार बताओ।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी जातीय भेदभाव तथा छुआछूत के विरोधी थे।

प्रश्न 18.
सती प्रथा के बारे में गुरु अमरदास जी के क्या विचार थे?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने सती प्रथा का खण्डन किया।

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प्रश्न 19.
गुरु अमरदास जी ने जन्म, विवाह तथा मृत्यु सम्बन्धी क्या सुधार किए?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने जन्म तथा विवाह के अवसर पर ‘आनन्द’ वाणी का पाठ करने की प्रथा चलाई और सिक्खों को आदेश दिया कि वे मृत्यु के समय ईश्वर का स्तुति तथा भक्ति के शब्दों का गायन करें।

प्रश्न 20.
रामदासपुर या अमृतसर की स्थापना की महत्ता बताइए।
उत्तर-
रामदासपुर की स्थापना से सिक्खों को एक अलग तीर्थ-स्थान तथा महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र मिल गया।

प्रश्न 21.
लाहौर की बाऊली (जल स्त्रोत) के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर-
लाहौर के डब्बी बाज़ार में बाऊली का निर्माण गुरु अर्जन देव जी ने करवाया।

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प्रश्न 22.
गुरु अर्जन देव जी को आदि ग्रन्थ साहिब की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी सिक्खों को एक पवित्र धार्मिक ग्रन्थ देना चाहते थे, ताकि वे गुरु साहिबान की शुद्ध वाणी को पढ़ तथा सुन सकें।

प्रश्न 23.
गुरु अर्जन देव जी के समय घोड़ों के व्यापार के लाभ बताएं।
उत्तर-
इस व्यापार से सिक्ख धनी बने और गुरु साहिब के खज़ाने में भी धन की वृद्धि हुई।

प्रश्न 24.
गुरु अर्जन देव जी के समाज सुधार के कोई दो काम लिखो।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी ने विधवा विवाह के पक्ष में प्रचार किया और सिक्खों को शराब तथा अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन करने से मना किया।

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प्रश्न 25.
गुरु अर्जन देव जी तथा अकबर के सम्बन्धों का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव के सम्राट अकबर के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे।

प्रश्न 26.
जहांगीर गुरु अर्जन देव जी को क्यों शहीद करना चाहता था?
उत्तर-
जहांगीर को गुरु अर्जन देव जी की बढ़ती हुई ख्याति से ईर्ष्या थी।
अथवा
जहांगीर को इस बात का दुःख था कि हिन्दुओं के साथ-साथ कई मुसलमान भी गुरु साहिब से प्रभावित हो रहे हैं।

प्रश्न 27.
मीरी तथा पीरी तलवारों की विशेषताएं बताएं।
उत्तर-
‘मीरी’ तलवार सांसारिक विषयों में नेतृत्व का प्रतीक थी, जबकि पीरी’ लकार आध्यात्मिक विषयों में नेतृत्व का प्रतीक थी।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

प्रश्न 28.
अमृतसर की किलाबन्दी बारे गुरु हरगोबिन्द जी ने क्या किया?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द साहिब ने अमृतसर की रक्षा के लिए इसके चारों ओर एक दीवार बनवाई और नगर में ‘लोहगढ़’ नामक एक किले का निर्माण करवाया।

(ख) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 30-50 शब्दों में लिखिए

प्रश्न 1.
गोइन्दवाल की बाऊली (जल स्रोत) का वर्णन करो।
उत्तर-
गोइन्दवाल नामक स्थान पर बाऊली (जल स्रोत) का निर्माण कार्य गुरु अमरदास जी ने पूरा किया जिसका शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय में किया गया था। गुरु अमरदास जी ने इस बावली में 84 सीढ़ियां बनवाईं। उन्होंने अपने शिष्यों को बताया कि जो सिक्ख प्रत्येक सीढ़ी पर श्रद्धा और सच्चे मन से ‘जपुजी साहिब’ का पाठ करके 84वीं सीढ़ी पर स्नान करेगा वह जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो जाएगा और मोक्ष को प्राप्त करेगा। डॉ० इन्दू भूषण बनर्जी लिखते हैं, “इस बाऊली की स्थापना सिक्ख धर्म के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण कार्य था।” गोइन्दवाल की बाऊली सिक्ख धर्म का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गई। इस बाऊली पर एकत्रित होने से सिक्खों में आपसी मेल-जोल की भावना भी बढ़ी और वे परस्पर संगठित होने लगे।

प्रश्न 2.
मंजी-प्रथा से क्या भाव है तथा इसका क्या उद्देश्य था?
उत्तर-
मंजी प्रथा की स्थापना गुरु अमरदास जी ने की थी। उनके समय में सिक्खों की संख्या काफ़ी बढ़ चुकी थी। परन्तु गुरु जी की आयु अधिक होने के कारण उनके लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करना कठिन हो गया था। अत: उन्होंने अपने सारे आध्यात्मिक प्रदेश को 22 भागों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक भाग को ‘मंजी’ कहा जाता था। प्रत्येक मंजी छोटे-छोटे स्थानीय केन्द्रों में बंटी हुई थी जिन्हें पीढ़ियां (Piris) कहते थे। मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चन्द नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में इसका प्रचार कार्य को बढ़ाने में विशेष योगदान दिया।”

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प्रश्न 3.
गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी मत से कैसे अलग किया?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र श्रीचन्द जी ने उदासी सम्प्रदाय की स्थापना की थी। उसने संन्यास का प्रचार किया। यह बात गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के विरुद्ध थी। गुरु अंगद देव जी ने सिक्खों को स्पष्ट किया कि सिक्ख धर्म गृहस्थियों का धर्म है। इसमें संन्यास का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वह सिक्ख जो संन्यास में विश्वास रखता है, सच्चा सिक्ख नहीं है। इस प्रकार उदासियों को सिक्ख सम्प्रदाय से अलग करके गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख धर्म को ठोस आधार प्रदान किया।

प्रश्न 4.
गुरु अमरदास जी ने ब्याह की रस्मों में क्या सुधार किए?
उत्तर-गुरु अमरदास जी के समय समाज में जाति मतभेद का रोग इतना बढ़ चुका था कि लोग अपनी जाति से बाहर विवाह करना धर्म के विरुद्ध मानने लगे थे। गुरु जी का विश्वास था कि ऐसे रीति-रिवाज लोगों में फूट डालते हैं। इसीलिए उन्होंने सिक्खों को जाति-मतभेद भूल कर अन्तर्जातीय विवाह करने का आदेश दिया। उन्होंने विवाह की रीतियों में भी सुधार किया। उन्होंने विवाह के समय रस्मों, फेरों के स्थान पर ‘लावां’ की प्रथा आरम्भ की।

प्रश्न 5.
आनन्द साहिब बारे लिखो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने एक नई वाणी की रचना की जिसे आनन्द साहिब कहा जाता है। गुरु साहिब ने अपने सिक्खों को आदेश दिया कि जन्म, विवाह तथा खुशी के अन्य अवसरों पर ‘आनन्द’ साहिब का पाठ करें। इस राग के प्रवचन से सिक्खों में वेद-मन्त्रों के उच्चारण का महत्त्व बिल्कुल समाप्त हो गया। आज भी सभी सिक्ख जन्म-विवाह तथा प्रसन्नता के अन्य अवसरों पर इसी राग को गाते हैं।

प्रश्न 6.
रामदासपुर या अमृतसर की स्थापना का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने रामदासपुर की नींव रखी। आजकल इस नगर को अमृतसर कहते हैं। गुरु साहिब ने 1577 ई० में यहां अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक दो सरोवरों की खुदाई आरम्भ की, परन्तु उन्होंने देखा कि गोइन्दवाल में रहकर खुदाई के कार्य का निरीक्षण करना कठिन है। अत: उन्होंने यहीं डेरा डाल दिया। कई श्रद्धालु लोग भी यहीं आ कर बस गए और कुछ ही समय में सरोवर के चारों ओर एक छोटा-सा नगर बस गया। इसे रामदासपुर का नाम दिया गया। गुरु जी ने इस नगर को हर प्रकार से आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बाज़ार की स्थापना की जिसे आजकल ‘गुरु का बाज़ार’ कहते हैं। इस नगर के निर्माण से सिक्खों को एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान मिल गया जिससे सिक्ख धर्म के विकास में सहायता मिली।

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प्रश्न 7.
सिक्खों तथा उदासियों में हुए समझौते के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी तथा गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी सम्प्रदाय से अलग कर दिया था, परन्तु गुरु रामदास जी ने उदासियों से बड़ा विनम्रतापूर्ण व्यवहार किया। उदासी सम्प्रदाय के संचालक बाबा श्री चन्द जी एक बार गुरु रामदास जी से मिलने गए। उनके बीच एक महत्त्वपूर्ण वार्तालाप भी हुआ। श्री चन्द जी गुरु साहिब की विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गुरु जी की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार उदासियों ने सिक्ख गुरु साहिबान का विरोध करना छोड़ दिया।

प्रश्न 8.
हरिमंदिर साहिब बारे में जानकारी दीजिए ।
उत्तर-
गुरु रामदास जी के ज्योति जोत समाने के पश्चात् गुरु अर्जन देव जी ने ‘अमृतसर’ सरोवर के बीच हरिमंदिर साहिब का निर्माण करवाया। इसका नींव पत्थर 1589 ई० में सूफी फ़कीर मियां मीर जी ने रखा। गुरु जी ने इसके चारों ओर एक-एक द्वार रखवाया। ये द्वार इस बात के प्रतीक हैं कि यह धर्म-स्थल सभी जातियों तथा धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से खुला है। हरमंदर साहिब का निर्माण कार्य भाई बुड्डा जी की देख-रेख में 1601 ई० में पूरा हुआ। 1604 ई० में हरिमंदिर साहिब में आदि ग्रन्थ साहिब की स्थापना की गई और भाई बुड्डा जी वहां के पहले ग्रन्थी बने।
हरिमंदिर साहिब शीघ्र ही सिक्खों के लिए मक्का’ तथा ‘गंगा-बनारस’ अर्थात् एक बहुत बड़ा तीर्थ-स्थल बन गया।

प्रश्न 9.
तरनतारन साहिब के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
तरनतारन का निर्माण गुरु अर्जन देव जी ने करवाया। इसके निर्माण का सिक्ख इतिहास में बड़ा महत्त्व है। अमृतसर की भान्ति तरनतारन भी सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गया। हजारों की संख्या में यहां सिक्ख यात्री स्नान करने के लिए आने लगे। उनके प्रभाव में आकर माझा प्रदेश के अनेक जाट सिक्ख धर्म के अनुयायी बन गए। इन्हीं जाटों ने आगे चल कर मुग़लों के विरुद्ध युद्धों में बढ़-चढ़ कर भाग लिया और असाधारण वीरता का परिचय दिया। डॉ० इन्दू भूषण बनर्जी ठीक ही लिखते हैं, “जाटों के सिक्ख धर्म में प्रवेश से सिक्ख इतिहास को एक नया मोड़ मिला।”

प्रश्न 10.
गुरु साहिबों के समय दौरान बनी बाऊलियों (जल स्रोतों) का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
गुरु साहिबों के समय में निम्नलिखित बाऊलियों का निर्माण हुआ

  1. गोइन्दवाल की बाऊली-गोइंदवाल की बाऊली का शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय में हुआ था। गुरु अमरदास जी ने इस बाऊली को पूर्ण करवाया। उन्होंने इसके जल तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियां बनवाईं। उन्होंने अपने शिष्यों को बताया कि जो सिक्ख प्रत्येक सीढ़ी पर श्रद्धा और सच्चे मन से जपुजी साहिब (Japuji Sahib) का पाठ करेगा वह जन्म-मरण की चौरासी लाख योनियों के चक्कर से मुक्त हो जाएगा।
  2. लाहौर की बाऊली-लाहौर के डब्बी बाज़ार में स्थित इस बाऊली का निर्माण गुरु अर्जन साहिब ने करवाया। यह बाऊली सिक्खों का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गई।

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प्रश्न 11.
मसन्द प्रथा से सिक्ख धर्म को क्या लाभ हुए?
उत्तर-
सिक्ख धर्म के संगठन तथा विकास में मसन्द प्रथा का विशेष महत्त्व रहा। इसके महत्त्व को निम्नलिखित बातों से जाना जा सकता है —

  1. गुरु जी की आय अब नियमित तथा लगभग निश्चित हो गई। आय के स्थायी हो जाने से गुरु जी को अपने रचनात्मक कार्यों को पूरा करने में बहुत सहायता मिली। उन्होंने इस धन राशि से न केवल अमृतसर तथा सन्तोखसर के सरोवरों का निर्माण कार्य सम्पन्न किया अपितु अन्य कई नगरों, तालाबों, कुओं आदि का भी निर्माण किया।
  2. मसन्द प्रथा के कारण जहां गुरु जी की आय निश्चित हुई वहां सिक्ख धर्म का प्रचार भी ज़ोरों से हुआ। गुरु अर्जन देव जी ने पंजाब से बाहर भी मसन्दों की नियुक्ति की। इससे सिक्ख धर्म का प्रचार क्षेत्र बढ़ गया।
  3. मसन्द प्रथा से प्राप्त होने वाली स्थायी आय से गुरु जी अपना दरबार लगाने लगे। वैशाखी के दिन जब दूरदूर से आए मसन्द तथा श्रद्धालु गुरु जी से भेंट करने आते तो वे बड़ी नम्रता से गुरु जी के सम्मुख शीश झुकाते थे। उनके ऐसा करने से गुरु जी का दरबार वास्तव में शाही दरबार-सा बन गया और गुरु जी ने ‘सच्चे पातशाह’ की उपाधि धारण कर ली।

प्रश्न 12.
गुरु हरगोबिन्द साहिब की सेना के संगठन का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी ने आत्मरक्षा के लिए सेना का संगठन किया। इस सेना में अनेक शस्त्रधारी सैनिक तथा स्वयं सेवक सम्मिलित थे। माझा के अनेक युद्ध प्रिय युवक गुरु जी की सेना में भर्ती हो गए। मोहसिन फानी के मतानुसार, गुरु जी की सेना में 800 घोड़े, 300 घुड़सवार तथा 60 बन्दूकची थे। उनके पास 500 ऐसे स्वयं सेवक भी थे जो वेतन नहीं लेते थे। यह सिक्ख सेना पांच जत्थों में बंटी हुई थी। इनके जत्थेदार थे-विधिचंद, पीराना, जेठा, पैरा तथा लंगाह । इसके अतिरिक्त पैंदा खां के नेतृत्व में एक पृथक् पठान सेना भी थी।

प्रश्न 13.
गुरु हरगोबिन्द जी के रोज़ाना जीवन के बारे में लिखें।
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी की नवीन नीति के अनुसार उनकी दिनचर्या में भी कुछ परिवर्तन आए। नई दिनचर्या के अनुसार वह प्रात:काल स्नान आदि करके हरमंदर साहिब में धार्मिक उपदेश देने के लिए चले जाते थे और फिर अपने सिक्खों तथा सैनिकों को प्रातःकाल का लंगर कराते थे। इसके पश्चात् वह कुछ समय के लिए विश्राम करके शिकार के लिए निकल पड़ते थे। गुरु जी ने अब्दुल तथा नत्था मल को वीर रस की वारें सुनाने के लिए नियुक्त किया। उन्होंने दुर्बल मन को सबल बनाने के लिए अनेक गीत मंडलियां बनाईं। इस प्रकार गुरु जी ने सिक्खों में नवीन चेतना और नये उत्साह का संचार किया।

प्रश्न 14.
अकाल तख्त के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द साहिब हरमंदर साहिब में सिक्खों को धार्मिक शिक्षा देते थे। उन्हें राजनीति की शिक्षा देने के लिए गुरु साहिब ने हरमंदर साहिब के सामने पश्चिम की ओर एक नया भवन बनाया जिसका नाम अकाल तख्त (ईश्वर की गद्दी) रखा गया। इस नए भवन के अन्दर 12 फुट ऊंचे एक चबूतरे का निर्माण भी करवाया गया। इस चबूतरे पर बैठ कर वह सिक्खों की सैनिक तथा राजनीतिक समस्याओं का समाधान करने लगे। इसी स्थान पर वह अपने सैनिकों को वीर रस के जोशीले गीत सुनवाते थे। अकाल तख्त के निकट वह सिक्खों को व्यायाम करने के लिए प्रेरित करते थे।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

प्रश्न 15.
गुरु अंगद देव जी द्वारा सिक्ख संस्था (पंथ) के विकास के लिए किए गए किन्हीं चार कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
श्री गुरु नानक देव जी महाराज (1539 ई०) के पश्चात् गुरु अंगद देव जी गुरुगद्दी पर आसीन हुए। उनका नेतृत्व सिक्ख धर्म के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उन्होंने निम्नलिखित कार्यों द्वारा सिक्ख धर्म के विकास में योगदान दिया —

  1. गुरुमुखी लिपि में सुधार-गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी लिपि में सुधार किया। कहते हैं कि गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी के प्रचार के लिए गुरुमुखी वर्णमाला में ‘बाल बोध’ की रचना की।
  2. गुरु नानक देव जी की जन्म-साखी-श्री गुरु अंगद देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी की सारी वाणी को एकत्रित करके भाई बाला से गुरु जी की जन्म-साखी (जीवन-चरित्र) लिखवाई। इससे सिक्ख गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पालन करने लगे।
  3. लंगर प्रथा-श्री गुरु अंगद देव जी ने लंगर प्रथा जारी रखी। इस प्रथा से जाति-पाति की भावनाओं को धक्का लगा और सिक्ख धर्म के प्रसार में सहायता मिली।
  4. गोइन्दवाल का निर्माण-गुरु अंगद देव जी ने गोइन्दवाल नामक नगर की स्थापना की। गुरु अमरदास के समय में यह नगर एक प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र बन गया। आज भी यह सिक्खों का एक पवित्र धार्मिक स्थान है।

प्रश्न 16.
‘मसन्द प्रथा’ सिक्ख धर्म के विकास के लिए किस प्रकार लाभदायक सिद्ध हुई?
उत्तर-
प्रश्न नं० 11 देखें।

प्रश्न 17.
गुरु अर्जन देव जी की शहादत पर एक नोट लिखिए।
उत्तर-
मुग़ल सम्राट अकबर के पंचम पातशाह (सिक्ख गुरु) गुरु अर्जन देव जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे, परन्तु अकबर की मृत्यु के पश्चात् जहांगीर ने सहनशीलता की नीति छोड़ दी। वह उस अवसर की खोज में रहने लगा जब वह सिक्ख धर्म पर करारी चोट कर सके। इसी बीच जहांगीर के पुत्र खुसरो ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। खुसरो पराजित होकर गुरु अर्जन देव जी के पास आया। गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया। इस आरोप में जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया। परन्तु गुरु अर्जन देव जी ने जुर्माना देने से इन्कार कर दिया। इसलिए उन्हें बन्दी बना लिया गया और अनेक यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया। गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से सिक्ख भड़क उठे। वे समझ गए कि उन्हें अब अपने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने पड़ेंगे।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

(ग) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 100-120 शब्दों में लिखिए

प्रश्न 1.
गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या योगदान दिया?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी सिक्खों के दूसरे गुरु थे। उनका नेतृत्व सिक्ख धर्म के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उन्होंने निम्नलिखित ढंग से सिक्ख धर्म के विकास में योगदान दिया —

  1. गुरुमुखी लिपि में सुधार-गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी लिपि में सुधार किया। कहते हैं कि गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी के प्रचार के लिए गुरुमुखी वर्णमाला में ‘बाल बोध’ की रचना की। जनसाधारण की भाषा होने के कारण इससे सिक्ख धर्म के प्रचार के कार्य को बढ़ावा मिला। आज सिक्खों के सभी धार्मिक ग्रन्थ इसी भाषा में हैं।
  2. गुरु नानक देव जी की जन्म-साखी-श्री गुरु अंगद देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी की सारी वाणी को एकत्रित करके भाई बाला से गुरु जी की जन्म-साखी (जीवन-चरित्र) लिखवाई। इससे सिक्ख गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पालन करने लगे।
  3. लंगर प्रथा-श्री गुरु अंगद देव जी ने लंगर प्रथा जारी रखी। उन्होंने यह आज्ञा दी कि जो कोई उनके दर्शन को आए, उसे पहले लंगर में भोजन कराया जाए। यहां प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेद-भाव के भोजन करता था। इससे जाति-पाति की भावनाओं को धक्का लगा और सिक्ख धर्म के प्रसार में सहायता मिली।
  4. उदासियों को सिक्ख धर्म से निकालना-गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र श्रीचन्द जी ने उदासी सम्प्रदाय की स्थापना की थी। उन्होंने संन्यास का प्रचार किया। यह बात गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के विरुद्ध थी। अतः गुरु अंगद देव जी ने उदासियों से नाता तोड़ लिया।
  5. गोइन्दवाल का निर्माण-गुरु अंगद देव जी ने गोइन्दवाल नामक नगर की स्थापना की। गुरु अमरदास जी के समय में यह नगर सिक्खों का एक प्रसिद्ध धार्मिक केन्द्र बन गया। आज भी यह सिक्खों का एक पवित्र धार्मिक स्थान है।
  6. अनुशासन को बढ़ावा-गुरु जी बड़े ही अनुशासन प्रिय थे। उन्होंने सत्ता और बलवंड नामक दो प्रसिद्ध रबाबियों को अनुशासन भंग करने के कारण दरबार से निकाल दिया, परन्तु बाद में भाई लद्धा के प्रार्थना करने पर गुरु जी ने उन्हें क्षमा कर दिया।
    सच तो यह है कि गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख धर्म को पृथक् पहचान प्रदान की।

प्रश्न 2.
गुरु अमरदास जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या-क्या कार्य किए?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी को सिक्ख धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गुरु नानक देव जी ने धर्म का जो बीज बोया था वह गुरु अंगद देव जी के काल में अंकुरित हो गया। गुरु अमरदास जी ने अपने कार्यों से इस नये पौधे की रक्षा की। संक्षेप में, गुरु अमरदास जी के कार्यों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. गोइन्दवाल की बावली का निर्माण-गुरु अमरदास जी ने सर्वप्रथम गोइन्दवाल के स्थान पर एक बावली (जल-स्रोत) का निर्माण कार्य पूरा किया जिसका शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय रखा गया था। गुरु अमरदास जी ने इस बावली की तह तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियां बनवाईं। गुरु जी के अनुसार प्रत्येक सीढ़ी पर जपुजी साहिब का पाठ करने से जन्म-मरण की चौरासी लाख योनियों के चक्कर से मुक्ति मिलेगी। गोइन्दवाल की बावली सिक्ख धर्म का एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थान बन गई।
  2. लंगर प्रथा-गुरु अमरदास जी ने लंगर प्रथा का विस्तार करके सिक्ख धर्म के विकास की ओर एक और महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। उन्होंने लंगर के लिए कुछ विशेष नियम बनाए। अब कोई भी व्यक्ति लंगर में भोजन किए बिना गुरु जी से नहीं मिल सकता था। लंगर प्रथा से जाति-पाति तथा रंग-रूप के भेदभावों को बड़ा धक्का लगा और लोगों में समानता की भावना का विकास हुआ। परिणामस्वरूप सिक्ख एकता के सूत्र में बंधने लगे।
  3. सिक्ख गुरु साहिबान के शब्दों को एकत्रित करना-गुरु नानक देव जी के शब्दों तथा श्लोकों को गुरु अंगद देव जी ने एकत्रित करके उनके साथ अपने रचे हुए शब्द भी जोड़ दिए थे। यह सारी सामग्री गुरु अंगद देव जी ने गुरु अमरदास जी को सौंप दी थी। गुरु अमरदास जी ने कुछ-एक नए श्लोकों की रचना की और उन्हें पहले वाले संकलन (collection) के साथ मिला दिया। इस प्रकार विभिन्न गुरु साहिबान के शब्दों तथा उपदेशों के एकत्र हो जाने से ऐसी सामग्री तैयार हो गई जो आदि-ग्रन्थ साहिब के संकलन का आधार बनी।
  4. मंजी प्रथा-वृद्धावस्था के कारण गुरु साहिब जी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करना कठिन हो गया था। अतः उन्होंने अपने पूरे आध्यात्मिक साम्राज्य को 22 प्रान्तों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक प्रान्त को मंजी’ कहा जाता था। प्रत्येक मंजी सिक्ख धर्म के प्रचार का एक केन्द्र थी। गुरु अमरदास जी द्वारा स्थापित मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चन्द नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में प्रचार कार्य बढ़ाने में विशेष योगदान दिया।”
  5. उदासियों से सिक्खों को पृथक करना-गुरु साहिब ने उदासी सम्प्रदाय के सिद्धान्तों का जोरदार शब्दों में खण्डन किया। उन्होंने अपने अनुयायियों को समझाया कि कोई भी व्यक्ति, जो उदासी नियमों का पालन करता है, सच्चा सिक्ख नहीं हो सकता। गुरु जी के इन प्रयत्नों से सिक्ख उदासियों से पृथक् हो गए और सिक्ख धर्म का अस्तित्व मिटने से बच गया।
  6. नई परम्पराएं-गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को व्यर्थ के रीति-रिवाजों का त्याग करने का उपदेश दिया। हिन्दुओं में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर खूब रोया-पीटा जाता था। परन्तु गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को रोने-पीटने के स्थान पर ईश्वर का नाम लेने का उपदेश दिया। उन्होंने विवाह की भी नई विधि आरम्भ की जिसे आनन्द कारज कहते हैं।
  7. आनन्द साहिब की रचना-गुरु अमरदास जी ने एक नई वाणी की रचना की जिसे आनन्द साहिब कहा जाता है।
    सच तो यह है कि गुरु अमरदास जी का गुरु काल सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। गुरु जी के द्वारा बाऊली का निर्माण, मंजी प्रथा के आरम्भ, लंगर प्रथा के विस्तार तथा नए रीति-रिवाजों ने सिक्ख धर्म के संगठन में बड़ी मज़बूती प्रदान की।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

प्रश्न 3.
गुरु अमरदास जी के द्वारा किए गए सुधारों का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी के समय में समाज अनेकों बुराइयों का शिकार हो चुका था। गुरु जी इस बात को भलीभान्ति समझते थे, इसलिए उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुधार किए। सामाजिक क्षेत्र में गुरु जी के कार्यों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. जाति-पाति का विरोध-गुरु अमरदास जी ने जाति-मतभेद का खण्डन किया। उनका विश्वास था कि जातीय तभेद परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध है।
  2. छुआछूत की निन्दा-गुरु अमरदास जी ने छुआछूत को समाप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके लंगर में जाति-पाति का कोई भेदभाव नहीं था। वहां सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते थे।
  3. विधवा विवाह-गुरु अमरदास के समय में विधवा विवाह निषेध था। किसी स्त्री को पति की मृत्यु के पश्चात् सारा जीवन विधवा के रूप में व्यतीत करना पड़ता था। गुरु जी ने विधवा विवाह को उचित बताया और इस प्रकार स्त्री जाति को समाज में योग्य स्थान दिलाने का प्रयत्न किया।
  4. सती-प्रथा की भर्त्सना-उस काल के समाज में एक और बड़ी बुराई सती-प्रथा की थी। जी० वी० स्टॉक के अनुसार, गुरु अमरदास जी ने सती-प्रथा की सबसे पहले निन्दा की। उनका कहना था कि वह स्त्री सती नहीं कही जा सकती जो अपने पति के मृत शरीर के साथ जल जाती है। वास्तव में वही स्त्री सती है जो अपने पति के वियोग की पीड़ा को सहन करे।
  5. पर्दे की प्रथा का विरोध-गुरु जी ने स्त्रियों में प्रचलित पर्दे की प्रथा की भी घोर निन्दा की। वह पर्दे की प्रथा को समाज की उन्नति के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा मानते थे। इसलिए उन्होंने स्त्रियों को बिना पर्दा किए लंगर की सेवा करने तथा संगत में बैठने का आदेश दिया।
  6. नशीली वस्तुओं की निन्दा-गुरु अमरदास जी ने अपने अनुयायियों को नशीली वस्तुओं से दूर रहने का उपदेश दिया। उन्होंने अपने एक ‘शब्द’ में शराब सेवन की खूब निन्दा की है। गुरु अमरदास जी गुरु नानक देव जी की भान्ति ऐसी शराब का सेवन करना चाहते थे जिसका नशा कभी न उतरे। वह नशा बेहोश करने वाला न होकर, समाज सेवा के लिए प्रेरित करने वाला होना चाहिए।
  7. सिक्खों में भ्रातृत्व की भावना-गुरु जी ने सिक्खों को यह आदेश दिया कि वे माघी, दीपावली और वैशाखी आदि त्योहारों को एक साथ मिलकर नई परंपरा के अनुसार मनायें। इस प्रकार उन्होंने सिक्खों में भ्रातृत्व की भावना जागृत करने का प्रयास किया।
  8. जन्म तथा मृत्यु के सम्बन्ध में नये नियम-गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को जन्म-मृत्यु तथा विवाह के अवसरों पर नये रिवाजों का पालन करने को कहा। ये रिवाज हिन्दुओं के रीति-रिवाजों से बिल्कुल भिन्न थे। इनके लिए ब्राह्मण वर्ग को बुलाने की कोई आवश्यकता न थी। इस प्रकार गुरु साहिब ने सिक्ख धर्म को पृथक् पहचान प्रदान की।
    सच तो यह है कि गुरु अमरदास जी ने अपने कार्यों से सिक्ख धर्म को नया बल दिया।

प्रश्न 4.
गुरु रामदास जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या यल किए?
उत्तर-
गुरु रामदास जी सिक्खों के चौथे. गुरु थे। उन्होंने सिक्ख पंथ के विकास में निम्नलिखित योगदान दिया —

  1. अमृतसर का शिलान्यास-गुरु रामदास जी ने रामदासपुर की नींव रखी। आजकल इस नगर को अमृतसर कहते हैं। 1577 ई० में गुरु जी ने यहां अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक दो सरोवरों की खुदाई आरम्भ की। कुछ ही समय में सरोवर के चारों ओर एक छोटा-सा नगर बस गया। इसे रामदासपुर का नाम दिया गया। गुरु जी इस नगर को हर प्रकार से आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। अत: उन्होंने 52 अलग-अलम प्रकार के व्यापारियों को आमन्त्रित किया। उन्होंने एक बाजार की स्थापना की जिसे आजकल ‘गुरु का बाज़ार’ कहते हैं।
  2. मसन्द प्रथा का आरम्भ-गुरु रामदास जी को अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक सरोवरों की खुदाई के लिए काफ़ी धन की आवश्यकता थी। अतः उन्होंने मसन्द प्रथा का आरम्भ किया। इन मसन्दों ने विभिन्न प्रदेशों में सिक्ख धर्म का खूब प्रचार किया तथा काफ़ी धन राशि एकत्रित की।
  3. उदासियों से मत-भेद की समाप्ति-गुरु अंगद देव जी तथा गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी.सम्प्रदाय से अलग कर दिया था। परन्तु गुरु रामदास जी ने उदासियों से बड़ा विनम्रतापूर्ण व्यवहार किया। उदासी सम्प्रदाय के संचालक बाबा श्री चन्द जी एक बार गुरु रामदास जी से मिलने आए। दोनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण वार्तालाप हुआ। श्री चन्द जी गुरु साहिब की विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गुरु जी की. श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया।
  4. सामाजिक सुधार-गुरु रामदास जी ने गुरु अमरदास जी द्वारा आरम्भ किए गए नए सामाजिक रीति-रिवाजों को जारी रखा। उन्होंने सती प्रथा की घोर निन्दा की, विधवा पुनर्विवाह की अनुमति दी तथा विवाह और मत्यु-सम्बन्धी कुछ नए नियम जारी किए।
  5. अकबर के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध -मुग़ल सम्राट अकबर सभी धर्मों के प्रति सहनशील था। वह गुरु रामदास जी का बड़ा सम्मान करता था। कहा जाता है कि गुरु रामदास जी के समय में एक बार पंजाब बुरी तरह अकाल की चपेट में आ गया जिससे किसानों की दशा बहुत खराब हो गई, परन्तु गुरु जी के कहने पर अकबर ने पंजाब के कृषकों. का पूरे वर्ष का लगान माफ कर दिया।’
  6. गुरुगद्दी का पैतृक सिद्धान्त-गुरु रामदास जी ने गुरुगद्दी को पैतृक रूप प्रदान किया। उन्होंने ज्योति जोत समाने से कुछ समय पूर्व गुरु-गद्दी अपने छोटे, परन्तु सबसे योग्य पुत्र अर्जन देव जी को सौंप दी।
    गुरु रामदास जी ने गुरुगद्दी को पैतृक बनाकर सिक्ख इतिहास में एक नवीन अध्याय का श्रीगणेश किया। परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है कि गुरु पद का आधार गुण तथा योग्यता ही रहा।
    सच तो यह है कि गुरु रामदास जी ने बहुत ही कम समय तक सिक्ख मत का मार्ग-दर्शन किया। परन्तु इस थोड़े समय में ही उनके प्रयत्नों से सिक्ख धर्म के रूप में विशेष निखार आया।

प्रश्न 5.
गुरु अर्जन देव जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या योगदान दिया?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी के गुरुगद्दी सम्भालते ही सिक्ख धर्म के इतिहास ने नवीन दौर में प्रवेश किया। उनके प्रयास से हरमंदर साहिब बना और सिक्खों को अनेक तीर्थ स्थान मिले। यही नहीं उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब का संकलन किया जिसे आज सिक्ख धर्म में वही स्थान प्राप्त है जो हिन्दुओं में रामायण, मुसलमानों में कुरान शरीफ तथा इसाइयों में बाइबिल को प्राप्त है। संक्षेप में, गुरु अर्जन देव जी के कार्यों तथा सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है —

  1. हरमंदर साहिब का निर्माण-गुरु रामदास जी के ज्योति जोत समाने के पश्चात् गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक तालाबों का निर्माण कार्य पूरा किया। उन्होंने ‘अमृतसर’ तालाब के बीच हरमंदर साहिब का निर्माण करवाया। गुरु जी ने इसके चारों ओर एक-एक द्वार रखवाया। ये द्वार इस बात का प्रतीक हैं कि यह मंदर सभी जातियों तथा धर्मों के लोगों के लिए खुला है।
  2. तरनतारन की स्थापना-गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर के अतिरिक्त अन्य अनेक नगरों, सरोवरों तथा स्मारकों का निर्माण करवाया। तरनतारन भी इनमें से एक था। उन्होंने इसका निर्माण प्रदेश के ठीक मध्य में करवाया। अमृतसर की भान्ति तरनतारन भी सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गया।
  3. लाहौर में बाऊली का निर्माण-गुरु अर्जन देव जी ने अपनी लाहौर यात्रा के दौरान डब्बी बाज़ार में एक बाऊली का निर्माण करवाया। इस बाऊली के निर्माण से निकटवर्ती प्रदेशों के सिक्खों को एक तीर्थ स्थान की प्राप्ति हुई।
  4. हरगोबिन्दपुर तथा छरहटा की स्थापना-गुरु जी ने अपने पुत्र हरगोबिन्द के जन्म की खुशी में ब्यास नदी के तट पर हरगोबिन्दपुर नामक नगर की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अमृतसर के निकट पानी की कमी को दूर करने के लिए एक कुएं का निर्माण करवाया। इस कुएं पर छः रहट चलते थे। इसलिए इसको छहरटा के नाम से पुकारा जाने लगा।
  5. करतारपुर की नींव रखना-गुरु जी ने 1593 ई० में जालन्धर दोआब में एक नगर की स्थापना की जिसका नाम करतारपुर रखा गया। यहां उन्होंने एक तालाब का निर्माण करवाया जो गंगसर के नाम से प्रसिद्ध है।
  6. मसन्द प्रथा का विकास-गुरु अर्जन देव जी ने सिक्खों को आदेश दिया कि वे अपनी आय का 1/10 भाग (दशांश अथवा दसवंद) आवश्यक रूप से मसन्दों को जमा कराएं। मसन्द वैसाखी के दिन इस राशि को अमृतसर के केन्द्रीय कोष में जमा करवा देते थे। राशि को एकत्रित करने के लिए वे अपने प्रतिनिधि नियुक्त करने लगे। इन्हें ‘संगती’ . कहते थे।
  7. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन-गुरु अर्जन देव जी ने आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन करके सिक्खों को एक धार्मिक ग्रन्थ प्रदान किया। गुरु जी ने रामसर में आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कार्य आरम्भ कर दिया। इस कार्य में भाई गुरदास जी ने गुरु जी को सहयोग दिया। अन्त में आदि ग्रन्थ साहिब की रचना का कार्य 1604 ई० में सम्पन्न हुआ। इस पवित्र ग्रन्थ में उन्होंने अपने से पहले चार गुरु साहिबान की वाणी, फिर अपने भक्तों की वाणी तथा उसके पश्चात् भट्टों की वाणी का संग्रह किया।
  8. घोड़ों का व्यापार-गुरु जी ने सिक्खों को घोड़ों का व्यापार करने के लिए प्रेरित किया। इससे सिक्खों को निम्नलिखित लाभ हुए
    (i) उस समय घोड़ों के व्यापार से बहुत लाभ होता था। परिणामस्वरूप सिक्ख लोग भी धनी हो गए। अब उनके लिए दसवंद (1/10) देना कठिन न रहा।
    (ii) इस व्यापार से सिक्खों को घोड़ों की अच्छी परख हो गई। यह बात उनके लिए सेना संगठन के कार्य में बड़ी काम आई।
  9. धर्म प्रचार कार्य-गुरु अर्जन देव जी ने धर्म-प्रचार द्वारा भी अनेक लोगों को अपना शिष्य बना लिया। उन्होंने अपनी आदर्श शिक्षाओं, सद्व्यवहार, नम्र स्वभाव तथा सहनशीलता से अनेक लोगों को प्रभावित किया।
    संक्षेप में, इतना कहना ही काफ़ी है कि गुरु अर्जन देव जी के काल में सिक्ख धर्म ने बहुत प्रगति की। आदि ग्रन्थ साहिब की रचना हुई, तरनतारन, करतारपुर तथा छहरटा अस्तित्व में आए तथा हरमंदर साहिब सिक्ख धर्म की शोभा बन गया।

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प्रश्न 6.
मसन्द प्रथा के आरम्भ, विकास तथा लाभों का वर्णन करो।
उत्तर-
आरम्भ-मसन्द प्रथा को चौथे गुरु रामदास जी ने आरम्भ किया। जब गुरु जी ने सन्तोखसर तथा अमृतसर के तालाबों की, खुदवाई आरम्भ करवाई तो उन्हें बहुत-से धन की आवश्यकता अनुभव हुई। अतः उन्होंने अपने सच्चे शिष्यों को अपने अनुयायियों से चन्दा एकत्रित करने के लिए देश के विभिन्न भागों में भेजा। गुरु जी द्वारा भेजे गए ये लोग मसन्द कहलाते थे।
विकास-गुरु अर्जन साहिब ने मसन्द प्रथा को नया रूप प्रदान किया ताकि उन्हें अपने निर्माण कार्यों को पूरा करने के लिए निरन्तर तथा लगभग निश्चित धन राशि प्राप्त होती रहे। उन्होंने निम्नलिखित बातों द्वारा मसन्द प्रथा का रूप निखारा —

  1. गुरु जी ने अपने अनुयायियों से भेंट में ली जाने वाली धन राशि निश्चित कर दी। प्रत्येक सिक्ख के लिए अपनी आय का दसवां भाग (दसवन्द) प्रतिवर्ष गुरु जी के लंगर में देना अनिवार्य कर दिया गया।
  2. गुरु अर्जन देव जी ने दसवन्द की राशि एकत्रित करने के लिए अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए जिन्हें मसन्द कहा जाता था। ये मसन्द एकत्रित की गई धन राशि को प्रति वर्ष वैशाखी के दिन अमृतसर में स्थित गुरु जी के कोष में जमा करते थे। जमा की गई राशि के बदले मसन्दों को रसीद दी जाती थी।
  3. इन मसन्दों ने दसवन्द एकत्रित करने के लिए अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए हुए थे जिन्हें संगतिया कहते थे। संगतिये दूर-दूर के क्षेत्रों से दसवन्द एकत्रित करके मसन्दों को देते थे जो उन्हें गुरु जी के कोष में जमा कर देते थे।
  4. मसन्द अथवा संगतिये दसवन्द की राशि में से एक पैसा भी अपने पास रखना पाप समझते थे। इस बात को स्पष्ट करते हुए गुरु जी ने कहा था कि जो कोई भी दान की राशि खाएगा, उसे शारीरिक कष्ट भुगतना पड़ेगा।
  5. ये मसन्द न केवल अपने क्षेत्र में दसवन्द एकत्रित करते थे अपितु धर्म प्रचार का कार्य भी करते थे। मसन्दों की नियुक्ति करते समय गुरु जी इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि वे उच्च चरित्र के स्वामी हों तथा सिक्ख धर्म में उनकी अटूट श्रद्धा हो।

महत्व अथवा लाभ-सिक्ख धर्म के संगठन तथा विकास में मसन्द प्रथा का विशेष महत्त्व रहा है। सिक्ख धर्म के संगठन में इस प्रथा के महत्त्व को निम्नलिखित बातों से जाना जा सकता है —

  1. गुरु जी की आय अब निरन्तर तथा लगभग निश्चित हो गई। आय के स्थायी हो जाने से गुरु जी को अपने रचनात्मक कार्यों को पूरा करने में बहुत सहायता मिली। उनके इन कार्यों ने सिक्ख धर्म के प्रचार तथा प्रसार में काफ़ी सहायता दी।
  2. पहले धर्म प्रचार का कार्य मंजियों द्वारा होता था। ये मंजियां पंजाब तक ही सीमित थीं। परन्तु गुरु अर्जन देव जी ने पंजाब के बाहर भी मसन्दों की नियुक्ति की। इससे सिक्ख धर्म का प्रचार क्षेत्र बढ़ गया।
  3. मसन्द प्रथा से प्राप्त होने वाली स्थायी आय से गुरु जी अपना दरबार लगाने लगे। वैशाखी के दिन जब दूर-दूर से आए मसन्द तथा श्रद्धालु भक्त गुरु जी को भेंट करने आते तो वे बड़ी नम्रता से गुरु जी के सम्मुख शीश झुकाते थे। उनके ऐसा करने से गुरु जी का दरबार वास्तव में शाही दरबार सा बन गया और गुरु जी ने ‘सच्चे पातशाह’ की उपाधि धारण कर ली।
    सच तो यह है कि एक विशेष अवधि तक मसन्द प्रथा ने सिक्ख धर्म के प्रचार तथा प्रसार में प्रशंसनीय योगदान दिया।

प्रश्न 7.
गुरु हरगोबिन्द जी की नई नीति का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के पश्चात् उनके पुत्र हरगोबिन्द जी सिक्खों के छठे गुरु बने। उन्होंने एक नई नीति को जन्म दिया। इस नीति का प्रमुख उद्देश्य सिक्खों को शान्ति-प्रिय होने के साथ निडर तथा साहसी बनाना था। गुरु साहिब द्वारा अपनाई गई नवीन नीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं —

  1. राजसी चिह्न तथा ‘सच्चे पातशाह’ की उपाधि धारण करना–नवीन नीति का अनुसरण करते हुए गुरु हरगोबिन्द जी ने ‘सच्चे.पातशाह’ की उपाधि धारण की तथा अनेक राजसी चिह्न धारण करने आरम्भ कर दिए। उन्होंने शाही वस्त्र धारण किए और सेली तथा टोपी पहनना बन्द कर दिया क्योंकि ये फ़कीरी के प्रतीक थे। इसके विपरीत उन्होंने दो तलवारें, छत्र और कलगी धारण कर ली। गुरु जी अब अपने अंगरक्षक भी रखने लगे।
  2. मीरी तथा पीरी-गुरु हरगोबिन्द जी अब सिक्खों के आध्यात्मिक नेता होने के साथ-साथ उनके सैनिक नेता भी बन गए। वे सिक्खों के पीर भी थे और मीर भी। इन दोनों बातों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने पीरी तथा मीरी नामक दो तलवारें धारण की। उन्होंने सिक्खों को व्यायाम करने, कुश्तियां लड़ने, शिकार खेलने तथा घुड़सवारी करने की प्रेरणा दी। इस प्रकार उन्होंने सन्त सिक्खों को सन्त सिपाहियों का रूप भी दे दिया।
  3. अकाल तख्त का निर्माण-गुरु जी सिक्खों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के अतिरिक्त सांसारिक विषयों में भी उनका पथ-प्रदर्शन करना चाहते थे। हरमंदर साहिब में वे सिक्खों को धार्मिक शिक्षा देने लगे। परन्तु सांसारिक विषयों में सिक्खों का पथ-प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने हरमंदर साहिब के सामने एक नया भवन बनाया जिसका नाम अकाल तख्त (ईश्वर की गद्दी) रखा गया।
  4. सेना का संगठन-गुरु हरगोबिन्द जी ने आत्मरक्षा के लिए सेना का संगठन किया। इस सेना में अनेक शस्त्रधारी सैनिक तथा स्वयं सेवक सम्मिलित थे। माझा, मालवा तथा दोआबा के अनेक युद्ध प्रिय युवक गुरु जी की सेना में भर्ती हो गए। उनके पास 500 ऐसे स्वयं सेवक भी थे जो वेतन नहीं लेते थे। ये पांच जत्थों में विभक्त थे। इसके अतिरिक्त पैंदे खां नामक पठान के अधीन पठानों की एक पृथक सेना थी।
  5. घोड़े तथा शस्त्रों की भेंट-गुरु हरगोबिन्द जी ने अपनी नवीन-नीति को अधिक सफल बनाने के लिए एक अन्य महत्त्वपूर्ण पग उठाया। उन्होंने अपने सिक्खों से आग्रह किया कि वे जहां तक सम्भव हो शस्त्र तथा घोड़े ही उपहार में भेट करें। परिणामस्वरूप गुरु जी के पास काफ़ी मात्रा में सैनिक सामग्री इकट्ठी हो गई। .
  6. अमृतसर की किलेबन्दी-गुरु जी ने सिक्खों की सुरक्षा के लिए रामदासपुर (अमृतसर) के चारों ओर एक दीवार बनवाई। इस नगर में दुर्ग का निर्माण भी किया गया जिसे लोहगढ़ का नाम दिया गया। इस किले में काफ़ी सैनिक सामग्री रखी गई।
  7. गुरु जी की दिनचर्या में परिवर्तन-गुरु हरगोबिन्द जी की नवीन नीति के अनुसार उनकी दिनचर्या में भी कुछ परिवर्तन आए। नई दिनचर्या के अनुसार वे प्रातःकाल स्नान आदि करके हरमंदर साहिब में धार्मिक उपदेश देने के लिए चले जाते थे और फिर अपने सैनिकों में प्रात:काल का भोजन बांटते थे। इसके पश्चात् वे कुछ समय के लिए विश्राम करके शिकार के लिए निकल पड़ते थे। गुरु जी ने अब्दुल तथा नत्थामल को जोशीले गीत ऊंचे स्वर में गाने के लिए नियुक्त किया। इस प्रकार गुरु जी ने सिक्खों में नवीन चेतना और नये उत्साह का संचार किया।
  8. आत्मरक्षा की भावना-गुरु हरगोबिन्द जी की नवीन नीति आत्मरक्षा की भावना पर आधारित थी। वह सैनिक बल द्वारा न तो किसी के प्रदेश पर अधिकार करने के पक्ष में थे और न ही वह किसी पर जबरदस्ती आक्रमण करने के पक्ष में थे। यह सच है कि उन्होंने मुग़लों के विरुद्ध अनेक युद्ध किए। परन्तु इन युद्धों का उद्देश्य मुग़लों के प्रदेश छीनना नहीं था, बल्कि उनसे अपनी रक्षा करना था।

प्रश्न 8.
नई नीति के अतिरिक्त गुरु हरगोबिन्द जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए अन्य क्या कार्य किए ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी पांचवें गुरु अर्जन देव जी के इकलौते पुत्र थे। उनका जन्म जून,1595 ई० में अमृतसर जिले के एक गांव वडाली में हुआ था। अपने पिता जी की शहीदी पर 1606 ई० में वह गुरु गद्दी पर बैठे और 1645 ई० तक सिक्ख धर्म का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। गुरु साहिब द्वारा किए कार्यों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. कीरतपुर में निवास-कहलूर का राजा कल्याण चन्द गुरु हरगोबिन्द साहब का भक्त था। उसने गुरु साहिब को कुछ भूमि भेंट की। गुरु साहिब ने इस भूमि पर कीरतपुर नगर का निर्माण करवाया। 1635 ई० में गुरु जी ने इस नगर में निवास कर लिया। उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम दस वर्ष यहीं पर धर्म का प्रचार करते हुए व्यतीत किए।
  2. पहाड़ी राजाओं को सिक्ख बनाना-गुरु हरगोबिन्द साहब ने अनेक पहाड़ी लोगों को अपना सिक्ख बनाया। . यहां तक कि कई पहाड़ी राजा भी उनके सिक्ख बन गए। परन्तु यह प्रभाव अस्थायी सिद्ध हुआ। कुछ समय पश्चात् पहाड़ी राजाओं ने पुनः हिन्दू धर्म की मूर्ति-पूजा आदि प्रथाओं को अपनाना आरम्भ कर दिया। ये प्रथाएं गुरु साहिबान की शिक्षाओं के अनुकूल नहीं थीं।
  3. गुरु हरगोबिन्द जी की धार्मिक यात्राएं-ग्वालियर के किले से रिहा होने के पश्चात् गुरु हरगोबिन्द साहब के मुग़ल सम्राट् जहांगीर से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो गए। इस शान्तिकाल में गुरु जी ने धर्म प्रचार के लिए यात्राएं की। सबसे पहले वह अमृतसर से लाहौर गए। वहाँ पर आप ने गुरु अर्जन देव जी की स्मृति में गुरुद्वारा डेरा साहब बनवाया। लाहौर से गुरु जी गुजरांवाला तथा भिंभर (गुजरात) होते हुए कश्मीर पहुंचे। यहाँ पर आप ने ‘संगत’ की स्थापना की। भाई सेवा दास जी को इस संगत का मुखिया नियुक्त किया गया।
    गुरु हरगोबिन्द जी ननकाना साहब भी गए। वहाँ से लौट कर उन्होंने कुछ समय अमृतसर में बिताया। वह उत्तर प्रदेश में नानकमता (गोरखमता) भी गए। गुरु जी की राजसी शान देखकर वहां के योगी नानकमता छोड़ कर भाग गए। वहाँ से लौटते समय गुरु जी पंजाब के मालवा क्षेत्र में गए। तख्तूपुरा, डरौली भाई (फिरोजपुर) में कुछ समय ठहर कर गुरु जी पुनः अमृतसर लौट आए।
  4. धर्म-प्रचारक भेजना-गुरु हरगोबिन्द जी 1635 ई० तक युद्धों में व्यस्त रहे। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र बाबा गुरदित्ता जी को सिक्ख धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए नियुक्त किया। बाबा गुरदित्ता जी ने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए चार मुख्य प्रचारकों-अलमस्त, फूल, गौंडा तथा बलु हसना को नियुक्त किया। इन प्रचारकों के अतिरिक्त गुरु हरगोबिन्द जी ने भाई विधिचन्द को बंगाल तथा भाई गुरदास को काबुल तथा बनारस में धर्म-प्रचार के लिए भेजा।
  5. हरराय जी को उत्तराधिकारी नियुक्त करना-अपना अन्तिम समय निकट आते देख गुरु हरगोबिन्द जी ने अपने पौत्र हरराय (बाबा गुरुदित्ता जी के छोटे पुत्र) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

प्रश्न 9.
सिक्ख धर्म के विकास के लिए गुरु हरराय जी के कामों (कार्यों) का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु हरराय जी सिक्खों के सातवें गुरु थे। उन्होंने गुरु हरगोबिन्द साहिब के ज्योति जोत समाने के पश्चात् गुरुगद्दी सम्भाली। वह स्वभाव से कोमल मन तथा शान्तिप्रिय व्यक्ति थे। उनके गुरु काल (1645-1661 ई०) में सिक्ख धर्म के विकास का वर्णन इस प्रकार है —

  1. सिक्ख धर्म के प्रति सेवाएं-गुरु हरराय जी ने युद्ध की नीति को त्याग दिया और सदा शान्ति की नीति का अनुसरण किया। वह जीवन भर गुरु नानक देव जी के पद-चिह्नों पर चले। उनका अधिकतर समय कीरतपुर में व्यतीत हुआ। उन्होंने सिक्ख धर्म का खूब प्रचार किया। वे लोगों को धार्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करते थे और उन्हें सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा देते थे। उन्होंने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए निम्नलिखित कार्य किए
    1. वह प्रतिदिन प्रातः तथा सायंकाल धर्म सभाएं करके सिक्ख धर्म का प्रचार करते थे। वह लोगों को धार्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।
    2. उन्होंने अनेक लोगों को सिक्ख धर्म का अनुयायी बनाया। उनके नए शिष्यों में प्रमुख व्यक्तियों के नाम थेबैरागी भक्त गीर, भाई संगतिया, भाई गोंदा तथा भाई भगत।
    3. उन्होंने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए स्थान-स्थान पर प्रचारक भेजे। उन्होंने ‘भक्त गीर’ नाम के एक बैरागी को अपना चेला बना लिया। गुरु जी ने उसका नाम भक्त भगवान् रखा और उसे पूर्व में धर्म प्रचार का कार्य सौंप दिया। वह इतना प्रभावशाली प्रचारक सिद्ध हुआ कि उसने भारतवर्ष में लगभग 360 गद्दियां स्थापित की। इनमें से कुछ गद्दियां आज भी मौजूद हैं। गुरु हरराय जी स्वयं भी धर्म प्रचार के लिए पंजाब में कई स्थानों पर गए और उन्होंने वहां अनेक अनुयायी बनाए। उन्होंने मुख्य रूप से करतारपुर, मुकन्दपुर (जालन्धर), दोसांझ तथा मालवा में धर्म-प्रचार का कार्य किया। इस प्रकार गुरु हरराय जी के काल में सिक्ख धर्म में बड़ी उन्नति हुई।
  2. फूल और उसके परिवार को आशीर्वाद देना-गुरु हरराय जी एक बार मालवा के एक गांव नथाना (Nathana) में गए। वहां उन्होंने फूल नामक एक गूंगे बालक को आशीर्वाद दिया कि वह बड़ा धनवान् तथा प्रसिद्ध व्यक्ति बनेगा और उसकी सन्तान के घोड़े यमुना का पानी पीयेंगे। इसके अतिरिक्त वे कई पीढ़ियों तक राज करेंगे और जितनी गुरु की सेवा करेंगे उतना ही उनका सम्मान बढ़ेगा। गुरु जी की भविष्यवाणी सत्य निकली। फूल की सन्तान ने नाभा, जींद और पटियाला के राज्यों पर राज किया।
  3. दारा शिकोह को आशीर्वाद-गुरु हरराय जी बड़े शान्तिप्रिय व्यक्ति थे और लड़ाई-झगड़े से दूर ही रहना चाहते थे। शाहजहां के बड़े पुत्र दारा शिकोह के साथ उनके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। 1657-58 ई० में शाहजहां के बेटों में सिंहासन प्राप्ति के लिए युद्ध आरम्भ हो गया। इसमें औरंगजेब की जीत हुई और दारा को पराजय का मुंह देखना पड़ा। दारा अपने बच्चों सहित पंजाब की ओर भाग निकला। दारा गुरु जी से परिचित था। अतः गुरु जी से आशीर्वाद प्राप्त करने तथा उनसे सहायता लेने के लिए वह उनके पास गया। गुरु जी बहुत शान्तिप्रिय व्यक्ति थे। वह दारा को सैनिक सहायता नहीं दे सकते थे। अत: उन्होंने दारा को केवल शरण और आशीर्वाद दिया।
  4. गुरु हरराय जी का दिल्ली बुलाया जाना-मुग़ल सम्राट औरंगजेब गुरु हरराय जी द्वारा दारा शिकोह को दी जाने वाली सहायता के बारे में जानना चाहता था। अतः उसने गुरु जी को दिल्ली बुलवा भेजा। गुरु जी ने स्वयं जाने की बजाए अपने पुत्र रामराय को औरंगजेब के दरबार में भेज दिया। औरंगजेब ने रामराय से बहुत-से प्रश्न किए जिनका रामराय ने बड़ी योग्यतापूर्वक उत्तर दिया। औरंगजेब यह सिद्ध करना चाहता था कि कुछ बातें ग्रन्थ साहिब में मुसलमानों के विरुद्ध लिखी हुई हैं। इसी उद्देश्य से उसने गुरु नानक देव जी की ‘आसा दी वार’ के एक श्लोक की ओर इशारा किया जिसका भाव इस प्रकार है-“मुसलमान की मिट्टी कुम्हार के भट्टे में जाकर जल सकती है, क्योंकि इससे बर्तन और ईंट बनता है। ज्यों-ज्यों यह जलती है, यह चिल्लाती है।” रामराय ने चतुराई दिखाते हुए जान-बूझ कर कुछ शब्द बदल दिये। रामराय ने औरंगजेब को बताया कि श्लोक में ‘मुसलमान’ शब्द भूल से लिखा गया है। वास्तव में यह शब्द ‘बेइमान’ है, परन्तु जब गुरु जी को इस बात का पता चला तो वे बड़े दुःखी हुए। उन्होंने रामराय के विषय में यह घोषणा की कि ऐसे डरपोक को गुरुगद्दी पर बैठने का कोई हक नहीं है।
  5. हरकृष्ण जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करनी-गुरुं हरराय जी रामराय को उसकी कायरता के कारण क्षमा न कर सके। अतः उन्होंने रामराय को गुरुगद्दी से वंचित कर दिया और अपने पांच वर्षीय पुत्र हरकृष्ण को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। लगभंग सत्रह वर्ष तक गुरुगद्दी सम्भालने के पश्चात् 6 अक्तूबर, 1661 को गुरु हरराय जी ज्योति-जोत समा गए।

प्रश्न 10.
गुरु हरकृष्ण जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या योगदान दिया?
उत्तर-
गुरु हरकृष्ण जी का जन्म 7 जुलाई, 1656 ई० को कीरतपुर में हुआ। उनकी माता का नाम सुलखणी तथा पिता का नाम गुरु हरराय जी था। वह 1661 ई० में सिक्खों के आठवें गुरु बने। इस समय उनकी आयु केवल पांच वर्ष की थी। एक बालक होने के कारण गुरु हरकृष्ण जी को ‘बाल गुरुं’ के नाम से भी याद किया जाता है। उनके गुरुकाल की प्रमुख घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है

  1. रामराय का विरोध-गुरु हरकृष्ण जी को अपने स्वार्थी भाई रामराय के विरोध का सामना भी करना पड़ा। रामराय सातवें गुरु हरराय जी का बड़ा पुत्र होने के नाते गुरुगद्दी पर अपना अधिकार समझता था। वह किसी भी मूल्य पर गुरुगद्दी के अधिकार को खोना नहीं चाहता था। अत: उसने औरंगजेब के दरबार में न्याय की मांग की। औरंगजेब उस समय विद्रोहों को दबाने में लगा हुआ था। इसलिए वह इस ओर कोई विशेष ध्यान न दे सका, परन्तु कुछ समय पश्चात् उसने दोनों भाइयों का झगड़ा निपटाने का फैसला कर लिया। उसने गुरु हरकृष्ण जी को दिल्ली आने के लिये आमन्त्रित किया।
  2. गुरु जी दिल्ली में-गुरु हरकृष्ण जी मार्ग में सिक्ख धर्म का प्रचार करते हुए दिल्ली पहुंचे। वहां वह मिर्जा राजा जय सिंह के घर ठहरे। राजा जय सिंह ने गुरु साहिब की सूझ-बूझ देखने के लिए अपनी महारानी को एक दासी के वस्त्र पहना कर अन्य दासियों के बीच बिठा दिया। तब गुरु जी को महारानी की गोद में बैठने के लिये कहा गया। गुरु जी ने सभी स्त्रियों के चेहरों को ध्यानपूर्वक देखा और महारानी को पहचान गए। वह झट से उसकी गोद में जा बैठे। राजा जय सिंह गुरु साहिब की सूझबूझ से बहुत प्रभावित हुआ। इस स्थान पर आजकल गुरुद्वारा बंगला साहिब बना हुआ है।
  3. ज्योति-जोत समाना-उन दिनों दिल्ली में चेचक तथा हैजे की बीमारियां फैली हुई थीं। गुरु जी ने बीमारों और ज़रूरतमन्दों की अथक सेवा की परन्तु गुरु जी को चेचक के भयंकर रोग ने जकड़ लिया । उन्होंने अपना अन्त समय निकट जान अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का प्रयास किया। वह केवल ‘बाबा बकाला’ के ही शब्द बोल सके तथा उस परम ज्योति में समा गए। बाबा बकाला से अभिप्राय यह था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला गांव (अमृतसर) में है। यह घटना 30 मार्च, 1664 ई० की थी। गुरु जी की याद में यमुना के किनारे गुरुद्वारा बाला साहिब का निर्माण करवाया गया।

प्रश्न 11.
गुरु तेग बहादुर जी की मालवा-यात्रा का वर्णन करो।
उत्तर-
1673 ई० के मध्य में गुरु तेग़ बहादुर साहिब मालवा प्रदेश की यात्रा पर गए। इस यात्रा में उनकी पत्नी गुजरी जी तथा पुत्र गोबिन्द दास भी उनके साथ थे।

  1. गुरु साहिब सर्वप्रथम सैफ़ाबाद पहुंचे। सैफ़ाबाद में गुरु साहिब की यह दूसरी यात्रा थी। यहां के मनसबदार – नवाब सैफूद्दीन ने उनका पुनः हार्दिक स्वागत किया। उसने गुरु साहिब तथा उनके परिवार को दुर्ग में ठहराया। गुरु साहिब यहां तीन मास तक रहे। यहां रहकर उन्होंने सिख धर्म का प्रचार किया।
  2. सैफ़ाबाद के पश्चात् गुरु साहिब ने मालवा तथा बांगर प्रदेश के अनेक गांवों तथा नगरों की यात्रा की। डॉ० त्रिलोचन सिंह के अनुसार, इस प्रदेश में गुरु साहिब ने लगभग 10 स्थानों का भ्रमण किया। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण स्थान ये थे : मूलोवाल, सेखों, ढिल्लवां, जोगा, भीखी, खीवा, समऊं, खियाला, मौंड, तलवंडी साबो, भठिंडा, बराह, धमधान आदि। इन सभी स्थानों पर आज भी गुरुद्वारे बने हुए हैं जो गुरु साहिब की यात्रा की याद दिलाते हैं। मूलोवाल में गुरु साहिब में पानी की कमी को दूर करने के लिए एक कुआं खुदवाया। अन्य गांव भी काफ़ी पिछड़े हुए थे। गुरु साहिब ने इन सभी गांवों में लोगों के कष्टों को दूर करने का प्रयास किया। गुरु साहिब 1673 से 1675 ई० के बीच इस प्रदेश के गांवों का भ्रमण करते रहे और यहां के लोगों में धर्म का प्रचार करते रहे।

प्रभाव-मालवा में गुरु साहिब की यात्राओं का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा

  1. गुरु साहिब के प्रेमपूर्वक व्यवहार से प्रभावित होकर वहां के ज़मींदारों ने किसानों के साथ अच्छा व्यवहार करना आरम्भ कर दिया।
  2. गुरु साहिब ने स्थान-स्थान पर धर्म-प्रचार केन्द्र स्थापित किए। उनके आकर्षक व्यक्तित्व तथा मधुर वाणी से प्रभावित होकर हज़ारों लोग उनके शिष्य बन गए।
  3. उनके उपदेशों के फलस्वरूप लोगों में नई चेतना का संचार हुआ। उनमें नया धार्मिक उत्साह उत्पन्न हुआ और वे साहसी एवं निडर बने। सिक्खों में ऐसे उत्साह एवं एकता को देखकर मुग़ल सरकार भी चिन्ता में पड़ गई।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

PSEB 10th Class Social Science Guide गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
गुरु अंगद देव जी का नाम अंगद देव कैसे पड़ा?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी गुरु नानक देव जी के लिए सर्दी की रात में दीवार बना सकते थे तथा कीचड़ से भरी घास की गठरी उठा सकते थे, इसलिए गुरु जी ने उनका नाम अंगद अर्थात् शरीर का एक अंग रख दिया।

प्रश्न 2.
लहना (गुरु अंगद साहिब) के माता-पिता का नाम क्या था?
उत्तर-
लहना (गुरु अंगद साहिब) के पिता का नाम फेरूमल और माता का नाम सभराई देवी था।

प्रश्न 3.
गुरु अंगद साहिब का बचपन किन दो स्थानों पर बीता?
उत्तर-
गुरु अंगद साहिब का बचपन हरिके तथा खडूर साहिब में बीता।

प्रश्न 4.
लहना जी का विवाह किसके साथ हुआ और उस समय उनकी आयु कितनी थी?
उत्तर-
लहना जी का विवाह 15 वर्ष की आयु में ‘मत्ते दी सराय’ के निवासी श्री देवीचन्द जी की सुपुत्री बीबी खीवी से हुआ।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

प्रश्न 5.
लहना जी के कितने पुत्र और पुत्रियां थीं ? उनके नाम भी लिखो।
उत्तर-
लहना जी के दो पुत्र दत्तू तथा दस्सू तथा दो पुत्रियां बीबी अमरों तथा बीबी अनोखी थीं।

प्रश्न 6.
‘उदासी’ मत किसने स्थापित किया?
उत्तर-
‘उदासी’ मत गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र बाबा श्री चन्द जी ने स्थापित किया।

प्रश्न 7.
गुरु अंगद साहिब ने ‘उदासी’ मत के प्रति क्या रुख अपनाया?
उत्तर-
गुरु अंगद साहिब ने उदासी मत को गुरु नानक साहिब के उद्देश्यों के प्रतिकूल बताया और इस मत का विरोध किया।

प्रश्न 8.
गुरु अंगद देव जी की धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र कौन-सा स्थान था?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी की धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र अमृतसर जिले में खडूर साहिब था।

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प्रश्न 9.
गुरु अमरदास जी का जन्म कब और कहां हुआ था?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी का जन्म 1479 ई० में जिला अमृतसर में स्थित बासरके नामक गाँव में हुआ था।

प्रश्न 10.
गुरु अमरदास जी को गद्दी सम्भालते समय किस कठिनाई का सामना करना पड़ा?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी को गुरु अंगद देव जी के पुत्रों दासू और दातू के विरोध का सामना करना पड़ा।
अथवा
गुरु जी को गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र बाबा श्रीचन्द के विरोध का भी सामना करना पड़ा।

प्रश्न 11.
सिक्खों के दूसरे गुरु कौन थे?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी।

प्रश्न 12.
गुरु अंगद देव जी का पहला नाम क्या था?
उत्तर-
भाई लहना।

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प्रश्न 13.
गुरु अंगद देव जी को गुरु-गही कब सौंपी गई?
उत्तर-
1538 ई० में।

प्रश्न 14.
लंगर प्रथा किसने चलाई?
उत्तर-
लंगर प्रथा गुरु नानक देव जी ने चलाई।

प्रश्न 15.
उदासी सम्प्रदाय किसने चलाया?
उत्तर-
श्रीचन्द जी ने।

प्रश्न 16.
गोइन्दवाल की स्थापना (1546 ई०) किसने की?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने।

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प्रश्न 17.
गुरु अंगद देव जी ज्योति-जोत कब समाये?
उत्तर-
1552 ई० में।

प्रश्न 18.
गुरु अंगद देव जी ने अखाड़े का निर्माण कहाँ करवाया?
उत्तर-
खडूर साहिब में।

प्रश्न 19.
गोइन्दवाल में बाऊली का निर्माण कार्य किसने पूरा करवाया?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने।

प्रश्न 20.
जहांगीर के काल में कौन-से सिख गुरु शहीद हुए थे?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी।

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प्रश्न 21.
गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी किस मुगल शासक के काल में हुई?
उत्तर-औरंगज़ेब।

प्रश्न 22.
मंजी प्रथा किस गुरु जी ने आरम्भ करवाई?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने।

प्रश्न 23.
‘आनन्द’ नामक बाणी की रचना किसने की?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने।

प्रश्न 24.
अमृतसर शहर की नींव किसने रखी?
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने।

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प्रश्न 25.
सिक्खों के चौथे गुरु कौन थे?
उत्तर-
श्री गुरु रामदास जी।

प्रश्न 26.
मसंद प्रथा का आरम्भ सिक्खों के किस गुरु ने आरम्भ किया?
उत्तर-
श्री गुरु रामदास जी ने।

प्रश्न 27.
सिक्खों के पांचवें गरु कौन थे?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी।

प्रश्न 28.
अमृतसर में हरमंदर साहिब का निर्माण किसने करवाया?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी ने।

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प्रश्न 29.
गुरु अर्जन देव जी ने कौन-कौन से शहर बसाये?
उत्तर-
तरनतारन, करतारपुर तथा हरगोबिन्दपुर।

प्रश्न 30.
‘दसवंद’ (आय का दसवां भाग) का सम्बन्ध किस प्रथा से है?
उत्तर-
मसंद प्रथा से।

प्रश्न 31.
‘आदि ग्रन्थ’ साहिब का संकलन कार्य कब पूरा हुआ?
उत्तर-
1604 ई० में।

प्रश्न 32.
‘आदि ग्रन्थ’ साहिब का संकलन कार्य किसने किया?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी ने।

प्रश्न 33.
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी कब हुई?
उत्तर-
1606 ई० में।

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प्रश्न 34.
मीरी तथा पीरी नामक दो तलवारें किसने धारण की?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी ने।

प्रश्न 35.
गुरु हरगोबिन्द जी का पठान सेनानायक कौन था?
उत्तर-
पैदा खां।

प्रश्न 36.
अकाल तख़्त का निर्माण, लोहगढ़ का निर्माण तथा सिक्ख सेना का संगठन सिक्खों के किस गुरु ने किया?
उत्तर-
गरु हरगोबिन्द जी ने।

प्रश्न 37.
अमृतसर की किलाबन्दी किसने करवाई?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी ने।

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प्रश्न 38.
कीरतपुर शहर के लिए जमीन किसने भेंट की थी?
उत्तर-
राजा कल्याण चन्द ने।

प्रश्न 39.
किस मुग़ल बादशाह ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बनाया?
उत्तर-
जहांगीर ने।

प्रश्न 40.
सिक्खों के सातवें गुरु कौन थे?
उत्तर-
श्री गुरु हरराय जी।

प्रश्न 41.
शाहजहां के किस पुत्र को गुरु हरराय जी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ?
उत्तर-
दारा शिकोह को।

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प्रश्न 42.
‘आसा-दी-वार’ के एक श्लोक का अर्थ बदलने की ग़लती किसने की?’
उत्तर-
रामराय ने।

प्रश्न 43.
गुरु हरकृष्ण जी गुरु-गद्दी पर कब बैठे?
उत्तर-
1661 ई० में।

प्रश्न 44.
दिल्ली में गुरु हरकृष्ण जी किसके बंगले पर ठहरे?
उत्तर-
गुरु हरकृष्ण जी दिल्ली में राजा जयसिंह के बंगले पर ठहरे।

प्रश्न 45.
बालगुरु के नाम से कौन विख्यात है?
उत्तर-
गुरु हरकृष्ण जी।

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प्रश्न 46.
गुरुद्वारा बंगला साहिब कहाँ स्थित है?
उत्तर-
दिल्ली में।

प्रश्न 47.
‘बाबा बकाला’ वास्तव में कौन थे?
उत्तर-
गुरु तेग़ बहादुर जी।

प्रश्न 48.
गुरु तेग़ बहादुर जी ने घूके वाली गाँव का नाम क्या रखा?
उत्तर-
गुरु का बाग।

प्रश्न 49.
गुरु तेग़ बहादुर जी की शहादत कब हुई?
उत्तर-
1675 ई० में।

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प्रश्न 50.
गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर-
पटना में।

प्रश्न 51.
गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म कब हुआ?
उत्तर-
22 दिसम्बर, 1666.

प्रश्न 52.
गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी कहाँ हुई?
उत्तर-
दिल्ली में।

प्रश्न 53.
गुरु अमरदास जी के कितने पुत्र तथा पुत्रियां थीं? उनके नाम लिखो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी के दो पुत्र थे। मोहन तथा मोहरी तथा उनकी दो पुत्रियां दानी और भानी थीं।

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प्रश्न 54.
गोइन्दवाल की बावली में कितनी सीढ़ियां बनवाई गईं और क्यों?
उत्तर-
इस बावली में 84 सीढ़ियां बनवाई गईं क्योंकि गुरु साहिब ने घोषणा की थी कि प्रत्येक सीढ़ी पर बैठ कर जपुजी साहिब का पाठ करने वाले को 84 लाख योनियों के चक्कर से मुक्ति मिल जाएगी।

प्रश्न-55.
‘मंजियों’ की स्थापना किस गुरु साहिब ने की?
उत्तर-
‘मंजियों’ की स्थापना गुरु अमरदास जी ने की।

प्रश्न 56.
गुरु अमरदास जी ने किन दो अवसरों के लिए सिक्खों के लिए विशिष्ट रीतियां निश्चित की?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने आनन्द विवाह की पद्धति आरम्भ की जिसमें जन्म तथा मरण के अवसरों पर सिक्खों के लिए विशिष्ट रीतियां निश्चित की गईं।

प्रश्न 57.
गुरु अमरदास जी द्वारा सिक्ख मत के प्रसार के लिए किया गया कोई एक कार्य लिखो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने गोइन्दवाल में बावली का निर्माण किया।
अथवा
उन्होंने मंजी प्रथा की स्थापना की तथा लंगर प्रथा का विस्तार किया।

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प्रश्न 58.
गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को कौन-कौन से तीन त्योहार मनाने का आदेश दिया?
उत्तर-
उन्होंने सिक्खों को वैशाखी, माघी तथा दीवाली के त्योहार मनाने का आदेश किया।

प्रश्न 59.
गुरु अमरदास जी के काल में सिक्ख अपने त्योहार मनाने के लिए कहां एकत्रित होते थे?
उत्तर-
सिक्ख अपने त्योहार मनाने के लिए गुरु अमरदास जी के पास गोइन्दवाल में एकत्रित होते थे।

प्रश्न 60.
गुरु अमरदास जी ज्योति-जोत कब समाए?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी 1574 ई० में ज्योति-जोत समाए।

प्रश्न 61.
गुरुगद्दी को पैतृक रूप किसने दिया?
उत्तर-
गुरुगद्दी को पैतृक रूप गुरु अमरदास जी ने दिया।

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प्रश्न 62.
गुरु अमरदास जी ने गुरु-गद्दी किस घराने को सौंपी?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने यह गद्दी गुरु रामदास जी तथा बीबी भानी जी के सोढी घराने को सौंपी।

प्रश्न 63.
गुरु रामदास जी की पत्नी का क्या नाम था?
उत्तर-
गुरु रामदास जी की पत्नी का नाम बीबी भानी था।

प्रश्न 64.
गुरु रामदास जी के कितने पुत्र थे? पुत्रों के नाम भी बताओ।
उत्तर-
गुरु रामदास जी के तीन पुत्र थे-पृथी चन्द, महादेव तथा अर्जन देव।

प्रश्न 65.
गुरु रामदास जी द्वारा सिक्ख धर्म के विस्तार के लिए किया गया कोई एक कार्य बताओ।
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने अमृतसर नगर बसाया। इस नगर के निर्माण से सिक्खों को एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान मिल गया।
अथवा
उन्होंने मसन्द प्रथा को आरम्भ किया। मसन्दों ने सिक्ख धर्म का खूब प्रचार किया।

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प्रश्न 66.
अमृतसर नगर का प्रारम्भिक नाम क्या था? इसकी स्थापना किसने की थी?
उत्तर-
अमृतसर नगर का प्रारम्भिक नाम रामदासपुर था तथा इस नगर की स्थापना चौथे गुरु रामदास जी ने की।

प्रश्न 67.
गुरु रामदास जी द्वारा खुदवाए गए दो सरोवरों के नाम लिखो।
उत्तर-
गुरु रामदास जी द्वारा खुदवाए गए दो सरोवर संतोखसर तथा अमृतसर हैं।

प्रश्न 68.
गुरु रामदास जी ने अमृतसर सरोवर के चारों ओर जो बाज़ार बसाया वह किस नाम से प्रसिद्ध हुआ?
उत्तर-
गुरु रामदास जी द्वारा बसाया गया यह बाज़ार ‘गुरु का बाज़ार’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न 69.
गुरु रामदास जी ने “गुरु का बाज़ार’ की स्थापना किस उद्देश्य से की?
उत्तर-
गुरु रामदास जी अमृतसर नगर को हर प्रकार से आत्म-निर्भर बनाना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने 52 अलग-अलग प्रकार के व्यापारियों को आमन्त्रित किया और इस बाज़ार की स्थापना की।

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प्रश्न 70.
गुरु अर्जन देव जी का जन्म कब और कहां हुआ?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई० को गोइन्दवाल में हुआ।

प्रश्न 71.
गुरु अर्जन देव जी के माता-पिता का नाम लिखो।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी के पिता का नाम गुरु रामदास जी तथा उनकी माता जी का नाम बीबी भानी था।

प्रश्न 72.
गुरु रामदास जी ने महादेव को गुरु गद्दी के अयोग्य क्यों समझा?
उत्तर-
महादेव फ़कीर स्वभाव का था तथा उसे सांसारिक विषयों से कोई लगाव नहीं था।

प्रश्न 73.
गुरु रामदास जी ने पृथी चन्द को गुरु गद्दी के अयोग्य क्यों समझा?
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने पृथी चंद को गुरुपद के अयोग्य इसलिए समझा क्योंकि वह धोखेबाज़ और षड्यन्त्रकारी था।

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प्रश्न 74.
गुरु गद्दी की प्राप्ति में गुरु अर्जन देव जी की कोई एक कठिनाई बताओ।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी को अपने भाई पृथिया की शत्रुता तथा विरोध का सामना करना पड़ा।
अथवा
गुरु अर्जन देव जी का ब्राह्मणों तथा कट्टर मुसलमानों ने विरोध किया।

प्रश्न 75.
शहीदी देने वाले प्रथम सिक्ख गुरु का नाम बताओ।
उत्तर-
शहीदी देने वाले प्रथम गुरु का नाम गुरु अर्जन साहिब था।

प्रश्न 76.
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी का एक प्रभाव लिखो।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी ने सिक्खों को शस्त्र उठाने के लिए प्रेरित किया। वे समझ गए कि धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना आवश्यक है।
अथवा
गुरु जी की शहीदी के परिणामस्वरूप सिक्खों और मुग़लों के सम्बन्ध बिगड़ गए।

प्रश्न 77.
हरमंदर साहिब की योजना को कार्य रूप देने में किन दो व्यक्तियों ने गुरु अर्जन साहिब की सहायता की?
उत्तर-
हरमंदर साहिब की योजना को कार्य रूप देने में भाई बुड्डा जी तथा भाई गुरदास जी ने गुरु अर्जन साहिब की सहायता की।

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प्रश्न 78.
हरमंदर साहब का निर्माण कार्य कब पूरा हुआ?
उत्तर-
हरमंदर साहिब का निर्माण कार्य 1601 ई० में पूरा हुआ।

प्रश्न 79.
गुरु जी के प्रतिनिधियों को क्या कहते थे और वे संगतों से उनकी आय का कौन-सा भाग एकत्र करते थे?
उत्तर-
गुरु जी के प्रतिनिधियों को मसन्द कहा जाता था तथा वे संगतों से उनकी आय का दसवां भाग एकत्र करते थे।

प्रश्न 80.
आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन किन्होंने किया?
उत्तर-
आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कार्य गुरु अर्जन देव जी ने किया।

प्रश्न 81.
आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कब सम्पूर्ण हुआ?
उत्तर-
आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कार्य 1604 ई० में सम्पूर्ण हुआ।

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प्रश्न 82.
‘आदि ग्रन्थ साहिब’ को कहां स्थापित किया गया?
उत्तर-
आदि ग्रन्थ साहिब को अमृतसर के हरमंदर साहिब में स्थापित किया गया। .

प्रश्न 83.
हरमंदर साहिब का पहला ग्रन्थी किस व्यक्ति को नियुक्त किया गया?
उत्तर-
हरमंदर साहिब का पहला ग्रन्थी बाबा बुड्डा जी. को नियुक्त किया गया।

प्रश्न 84.
‘आदि ग्रन्थ साहिब’ में क्रमशः गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव जी, गुरु अमरदास जी तथा गुरु रामदास जी के कितने-कितने शब्द हैं?
उत्तर-
आदि ग्रन्थ साहिब में गुरु नानक देव जी के 976, गुरु अंगद देव जी के 61, गुरु अमरदास जी के 907 तथा गुरु रामदास जी के 679 शब्द हैं।

प्रश्न 85.
गुरु हरगोबिन्द जी ने धार्मिक तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा किससे प्राप्त की?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी ने धार्मिक तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा भाई बुड्डा जी से प्राप्त की।

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प्रश्न 86.
गुरु हरगोबिन्द जी की गद्दी पर बैठते समय आयु कितनी थी?
उत्तर-
गुरु गद्दी पर बैठते समय उनकी आयु केवल ग्यारह वर्ष की थी।

प्रश्न 87.
गुरु हरगोबिन्द जी द्वारा नवीन नीति (सैन्य-नीति) अपनाने की कोई एक कारण बताओ।
उत्तर-
मुग़लों और सिक्खों के आपसी सम्बन्ध बिगड़ चुके थे। अतः सिक्खों की रक्षा के लिए गुरु जी ने नवीन नीति का सहारा लिया।
अथवा
सिक्ख धर्म में जाटों के प्रवेश से भी सैन्य-नीति को बल मिला।

प्रश्न 88.
गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय तक कौन-कौन से चार स्थान सिक्खों के तीर्थ स्थान बन चुके थे?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय तक गोइन्दवाल, अमृतसर, तरनतारन तथा करतारपुर सिक्खों के तीर्थ स्थान बन चुके थे।

प्रश्न 89.
सिक्ख धर्म के संगठन एवं विकास में किन चार संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई?
उत्तर-
सिक्ख धर्म के संगठन एवं विकास में ‘पंगत’, ‘संगत’, ‘मंजी’ तथा ‘मसन्द’ संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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प्रश्न 90.
गुरु हरगोबिन्द साहिब के किन्हीं चार सेनानायकों के नाम बताओ।
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द साहिब के चार सेनानायकों के नाम विधिचन्द, पीराना, जेठा और पैंदे खां थे।

प्रश्न 91.
गुरु हरगोबिन्द साहिब ने अपने दरबार में किन दो संगीतकारों को वीर रस के गीत गाने के लिए नियुक्त किया?
उत्तर-
उन्होंने अपने दरबार में अब्दुल तथा नत्थामल नामक दो संगीतकारों को वीर रस के गीत गाने के लिए नियुक्त किया।

प्रश्न 92.
गुरु हरगोबिन्द जी को बन्दी बनाए जाने का एक कारण बताओ।
उत्तर-
जहांगीर को गुरु साहिब की नवीन नीति पसन्द न आई।
अथवा
चन्दू शाह ने जहांगीर को गुरु जी के विरुद्ध भड़काया जिससे वह गुरु जी का विरोधी हो गया।

प्रश्न 93.
गुरु हरगोबिन्द जी को ‘बन्दी छोड़ बाबा’ की उपाधि क्यों प्राप्त हुई?
उत्तर-
52 बन्दी राजाओं को मुक्त कराने के कारण।

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प्रश्न 94.
गुरु हरगोबिन्द जी के समय में मुगलों और सिक्खों के बीच कितने युद्ध हुए? यह युद्ध कब और कहां हुए?
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी के समय में मुग़लों और सिक्खों के बीच तीन युद्ध हुए। लहिरा (1631), अमृतसर (1634) तथा करतारपुर (1635)।

प्रश्न 95.
गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय के चार प्रमुख प्रचारकों (उदासियों) के नाम लिखो।
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द साहिब के समय के चार प्रमुख प्रचारकों (उदासियों) के नाम अलमस्त, फूल, गौड़ा तथा बलु हसना थे।

प्रश्न 96.
गुरु हरराय जी के माता-पिता का नाम बताओ।
उत्तर-
गुरु हरराय जी के पिता का नाम बाबा गुरदित्ता जी तथा उनकी माता का नाम निहाल कौर जी था।

प्रश्न 97.
गुरु हरराय जी के बेटों के नाम बताएं।
उत्तर-
गुरु हरराय जी के बेटों के नाम थे-रामराय तथा हरकृष्ण।

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प्रश्न 98.
गुरु हरराय जी के किन्हीं चार प्रमुख नवीन शिष्यों के नाम बताओ।
उत्तर-
गुरु हरराय जी के चार प्रमुख नवीन शिष्यों के नाम थे-बैरागी भक्त गीर, भाई संगतिया, भाई गौंडी तथा भाई भगतू।

प्रश्न 99.
गुरु हरराय जी ने धर्म प्रचार के लिए किन तीन व्यक्तियों को नियुक्त किया?
उत्तर-
गुरु हरराय जी ने धर्म प्रचार के लिए कई व्यक्तियों को नियुक्त किया जिनमें से प्रमुख थे-भक्त भगवान, भाई फेरू और भाई गौंडा।

प्रश्न 100.
दिल्ली में गुरु हरकृष्ण जी जहां रुके थे आज वहां कौन-सा गुरुद्वारा है?
उत्तर-
दिल्ली में गुरु हरकृष्ण जी मिर्जा राजा जय सिंह के घर ठहरे, वहां उस स्थान पर आजकल गुरुद्वारा बंगला साहिब बना हुआ है।

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. गुरु …………. का पहला नाम भाई लहना था।
  2. ……………. सिक्खों के चौथे गुरु थे।
  3. ……………. नामक नगर की स्थापना गुरु अंगद देव जी ने की।
  4. गुरु हरगोबिन्द साहिब ने अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष …………. में धर्म प्रचार में व्यतीत किए।
  5. गुरु अंगद देव जी के पिता का नाम श्री …………….. और मां का नाम माता ………….. था।
  6. ‘उदासी’ मत गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र ………… जी ने स्थापित किया।
  7. मंजियों की स्थापना गुरु ………….. ने की।
  8. गुरु अर्जन देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई० को ………… में हुआ।
  9. ……….. शहीदी देने वाले प्रथम सिक्ख गुरु थे।
  10. हरमंदर साहब का निर्माण कार्य …………. ई० में पूरा हुआ।

उत्तर-

  1. अंगद साहिब,
  2. गुरु रामदास जी,
  3. गोइंदवाल साहिब,
  4. कीरतपुर साहिब,
  5. फेरूमल तथा सभराई देवी,
  6. बाबा श्रीचंद,
  7. अमर दास जी,
  8. गोइंदवाल साहिब
  9. गुरु अर्जन साहिब,
  10. 1601.

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III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गोइंदवाल साहिब में बाऊली (जल-स्रोत) की नींव रखी-
उत्तर –
(A) गुरु अर्जन देव जी ने
(B) गुरु नानक देव जी ने
(C) गुरु अंगद देव जी ने
(D) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-
(C) गुरु अंगद देव जी ने

प्रश्न 2.
गुरु रामदास जी ने नगर बसाया-
(A) अमृतसर
(B) जालंधर
(C) कीरतपर साहिब
(D) गोइंदवाल साहिब।
उत्तर-
(A) अमृतसर

प्रश्न 3.
गुरु अर्जन देव जी ने रावी तथा ब्यास के बीच किस नगर की नींव रखी?
(A) जालंधर
(B) गोइंदवाल साहिब
(C) अमृतसर
(D) तरनतारन।
उत्तर-
(D) तरनतारन।

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प्रश्न 4.
गुरु अंगद देव जी को गुरुगद्दी मिली
(A) 1479 ई० में
(B) 1539 ई० में
(C) 1546 ई० में
(D) 1670 ई० में।
उत्तर-
(B) 1539 ई० में

प्रश्न 5.
गुरु अंगद देव जी ज्योति-जोत समाये
(A) 1552 ई० में
(B) 1538 ई० में
(C) 1546 ई० में
(D) 1479 ई० में।
उत्तर-
(A) 1552 ई० में

प्रश्न 6.
जहांगीर के काल में शहीद होने वाले सिख गुरु थे
(A). गुरु अंगद देव जी
(B) गुरु अमरदास जी
(C) गुरु अर्जन देव जी
(D) गुरु राम दास जी।
उत्तर-
(C) गुरु अर्जन देव जी

प्रश्न 7.
गुरु हरकृष्ण जी गुरु गद्दी पर बैठे
(A) 1661 ई० में
(B) 1670 ई० में
(C) 1666 ई० में
(D) 1538 ई० में।
उत्तर-
(A) 1661 ई० में

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प्रश्न 8.
बालगुरु के नाम से विख्यात हैं
(A) गुरु तेग़ बहादुर जी
(B) गुरु हरकृष्ण जी
(C) गुरु गोबिन्द सिंह जी
(D) गुरु अमरदास जी।
उत्तर-
(B) गुरु हरकृष्ण जी

प्रश्न 9.
‘बाबा बकाला’ वास्तव में थे
(A) गुरु तेग़ बहादुर जी
(B) गुरु हरकृष्ण जी
(C) गुरु गोबिन्द सिंह जी
(D) गुरु अमरदास जी।
उत्तर-
(A) गुरु तेग़ बहादुर जी

प्रश्न 10.
गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म हुआ
(A) कीरतपुर साहिब में
(B) पटना में
(C) दिल्ली में
(D) तरनतारन में।
उत्तर-
(B) पटना में

प्रश्न 11.
गुरु अमरदास जी ज्योति-जोत समाए
(A) 1564 ई० में
(B) 1538 ई० में
(C) 1546 ई० में
(D) 1574 ई० में।
उत्तर-
(D) 1574 ई० में।

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प्रश्न 12.
गुरुगद्दी को पैतृक रूप दिया
(A) गुरु अमरदास जी ने
(B) गुरु रामदास जी ने
(C) गुरु गोबिन्द सिंह जी ने
(D) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-
(A) गुरु अमरदास जी ने

प्रश्न 13.
आदि ग्रंथ साहिब का संकलन किया-
(A) गुरु अमरदास जी ने
(B) गुरु अर्जन देव जी ने
(C) गुरु रामदास जी ने
(D) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-
(B) गुरु अर्जन देव जी ने

प्रश्न 14.
हरमंदर साहिब का पहला ग्रन्थी नियुक्त किया गया
(A) भाई पृथिया को
(B) श्री महादेव जी को
(C) बाबा बुड्डा जी को
(D) नत्थामल जी को।
उत्तर-
(C) बाबा बुड्डा जी को

प्रश्न 15.
दिल्ली में गुरु हरराय जी किस के घर-ठहरे?
(A) राजा जय सिंह के
(B) गुरु हरगोबिन्द जी के
(C) बैरागी भक्त गीर के
(D) मुगल शासक जहांगीर के।
उत्तर-
(A) राजा जय सिंह के

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IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/ग़लत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. गुरु अंगद साहिब का पहला नाम भाई लहना था।
  2. अकबर गुरु अमरदास जी से मिलने गोइन्दवाल आया था।
  3. गुरु रामदास जी सिखों के छठे गुरु थे।
  4. हरमंदर साहिब की नींव गुरु रामदास जी ने रखी।
  5. गुरु अर्जन देव जी ने रावी और ब्यास नदियों के बीच तरनतारन नगर की नींव रखी।
  6. गोइन्दवाल नामक नगर की स्थापना गुरु तेग बहादुर जी ने की थी।
  7. जहांगीर को गुरु अर्जन देव जी की बढ़ती हुई ख्याति से ईर्ष्या थी।
  8. गुरु हरगोबिन्द साहिब ने अपने जीवन के अन्तिम दस वर्ष कीरतपुर में धर्म प्रचार में व्यतीत किए।
  9. गुरुद्वारा बंगला साहिब पटना में स्थित है।
  10. गुरु तेग़ बहादुर जी की शहादत 1675 ई० में हुई।

उत्तर-

  1. (✓),
  2. (✓),
  3. (✗),
  4. (✗),
  5. (✓),
  6. (✗),
  7. (✓),
  8. (✓)
  9. (✗),
  10. (✓)

V. उचित मिलान

  1. भाई लहना – गुरु रामदास जी
  2. अकबर गोइन्दवाल में मिलने आया – सूफी संत मियां मीर
  3. सिक्खों के चौथे गुरु – गुरु अंगद साहिब
  4. हरमंदर साहिब की नींव रखी – गुरु अमरदास जी

उत्तर-

  1. भाई लहना-गुरु अंगद साहिब,
  2. अकबर गोइन्दवाल में मिलने आया-गुरु अमरदास जी,
  3. सिक्खों के चौथे गुरु-गुरु रामदास जी,
  4. हरमंदर साहिब की नींव रखी-सूफी संत मियां मीर।

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छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सिक्ख पन्थ में गुरु और सिक्ख (शिष्य) की परम्परा कैसे स्थापित हुई?
उत्तर-
गुरु नानक साहिब के 1539 में ज्योति-जोत समाने से पूर्व एक विशेष धार्मिक भाई-चारा अस्तित्व में आ चुका था। गुरु नानक देव जी इसे जारी रखना चाहते थे इसीलिए उन्होंने अपने जीवन काल में ही अपने शिष्य भाई लहना जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। भाई लहना जी ने गुरु नानक साहिब के ज्योति-जोत समाने के पश्चात् गुरु अंगद देव जी के नाम से गुरुगद्दी सम्भाली। इस प्रकार गुरु और सिक्ख (शिष्यों) की परम्परा स्थापित हुई और सिक्ख इतिहास के बाद के समय में यह विचार गुरु पन्थ के सिद्धान्त के रूप में विकसित हुआ।

प्रश्न 2.
गुरु नानक साहिब ने अपने पुत्रों के होते हुए भाई लहना जी को अपना उत्तराधिकारी क्यों बनाया?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने अपने दो पुत्रों श्री चन्द तथा लक्षमी दास के होते हुए भी भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। उसके पीछे कुछ विशेष कारण थे

  1. आदर्श गृहस्थ जीवन का पालन गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का मुख्य सिद्धान्त था, परन्तु उनके दोनों पुत्र गुरु जी के इस सिद्धान्त का पालन नहीं कर रहे थे। इसके विपरीत भाई लहना गुरु नानक देव जी के सिद्धान्त का पालन सच्चे मन से कर रहे थे।
  2. नम्रता तथा सेवा-भाव भी गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का मूल मन्त्र था, परन्तु बाबा श्री चन्द नम्रता तथा सेवा-भाव दोनों ही गुणों से खाली थे। दूसरी ओर, भाई लहना नम्रता तथा सेवा-भाव की साक्षात् मूर्ति थे।
  3. गुरु नानक देव जी को वेद-शास्त्रों तथा ब्राह्मण वर्ग की सर्वोच्चता में विश्वास नहीं था। वे संस्कृत को भी पवित्र भाषा स्वीकार नहीं करते थे, परन्तु उनके पुत्र श्रीचन्द जी को संस्कृत भाषा तथा वेद-शास्त्रों में गूढ़ विश्वास था।

प्रश्न 3.
गुरु अंगद देव जी के समय में लंगर प्रथा तथा उसके महत्त्व का वर्णन करो।
उत्तर-
लंगर में सभी सिक्ख मिल कर भोजन करते थे। गुरु अंगद देव जी ने इस प्रथा को काफ़ी प्रोत्साहन दिया। लंगर प्रथा के विस्तार तथा प्रोत्साहन के कई महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। यह प्रथा धर्म प्रचार कार्य का एक शक्तिशाली साधन बन गई। निर्धनों के लिए एक आश्रय स्थान का कार्य करने के अतिरिक्त यह प्रचार तथा प्रसिद्धि का एक महान् यन्त्र बनी। गुरु जी के अनुयायियों द्वारा दिए गए अनुदानों, चंढ़ावे इत्यादि को इसने निश्चित रूप दिया। हिन्दुओं द्वारा अकेले में स्थापित की गई दान संस्थाएं अनेक थीं, परन्तु गुरु जी का लंगर सम्भवतः पहली संस्था थी जिसका खर्च समस्त सिक्खों के संयुक्त दान तथा भेटों से चलाया जाता था। इस बात ने सिक्खों में ऊंच-नीच की भावना को समाप्त करके एकता की भावना जागृत की।

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प्रश्न 4.
गुरु अंगद देव जी के जीवन की किस घटना से उनके अनुशासनप्रिय होने का प्रमाण मिलता है?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने सिक्खों के समक्ष अनुशासन का एक बहुत बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया। कहा जाता है कि सत्ता और बलवण्ड नामक दो प्रसिद्ध रबाबी उनके दरबार में रहते थे। उन्हें अपनी कला पर इतना अभिमान हो गया कि वे गुरु जी के आदेशों का उल्लंघन करने लगे। वे इस बात का प्रचार करने लगे कि गुरु जी की प्रसिद्धि केवल हमारे ही मधुर रागों और शब्दों के कारण है। इतना ही नहीं उन्होंने तो गुरु नानक देव जी की महत्ता का कारण भी मरदाना का मधुर संगीत बताया। गुरु जी ने इस अनुशासनहीनता के कारण सत्ता और बलवण्ड को दरबार से निकाल दिया। अन्त में श्रद्धालु भाई लद्धा जी की प्रार्थना पर ही उन्हें क्षमा किया गया। इस घटना का सिक्खों पर गहरा प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप सिक्ख धर्म में अनुशासन का महत्त्व बढ़ गया।

प्रश्न 5.
गुरु अमरदास जी गुरु अंगद देव जी के शिष्य कैसे बने? उन्हें गुरु गद्दी कैसे मिली?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने एक दिन गुरु अंगद देव जी की पुत्री बीबी अमरो के मुंह से गुरु नानक देव जी की वाणी सुनी। वे वाणी से इतने प्रभावित हुए कि तुरन्त गुरु अंगद देव जी के पास पहुंचे और उनके शिष्य बन गये। इसके पश्चात् गुरु अमरदास जी ने 1541 से 1552 ई० तक (गुरुगद्दी मिलने तक) खडूर साहिब में रह कर गुरु अंगद देव जी की खूब सेवा की। एक दिन कड़ाके की ठण्ड में अमरदास जी गुरु अंगद देव जी के स्नान के लिए पानी का घड़ा लेकर आ रहे थे। मार्ग में ठोकर लगने से वह गिर पड़े। यह देख कर एक बुनकर की. पत्नी ने कहा कि यह अवश्य निथावां (जिसके पास कोई स्थान न हो) अमरू ही होगा। इस घटना की सूचना जब गुरु अंगद देव जी को मिली तो उन्होंने अमरदास को अपने पास बुलाकर घोषणा की कि, “अब से अमरदास निथावां नहीं होगा, बल्कि अनेक निथावों का सहारा होगा।” मार्च, 1552 ई० में गुरु अंगद देव जी ने अमरदास जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। इस प्रकार गुरु अमरदास जी सिक्खों के तीसरे गुरु बने।

प्रश्न 6.
गुरु अमरदास जी के समय में लंगर प्रथा के विकास का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने लंगर के लिए कुछ विशेष नियम बनाये। अब कोई भी व्यक्ति लंगर में भोजन किए बिना गुरु जी से नहीं मिल सकता था। कहा जाता है कि सम्राट अकबर को गुरु जी के दर्शन करने से पहले लंगर में भोजन करना पड़ा था। गुरु जी का लंगर प्रत्येक जाति, धर्म और वर्ग के लोगों के लिए खुला था। लंगर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी जातियों के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे। इससे जाति-पाति तथा रंग-रूप के भेद-भावों को बड़ा धक्का लगा और लोगों में समानता की भावना का विकास हुआ। परिणामस्वरूप सिक्ख एकता के सूत्र में बंधने लगे।

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प्रश्न 7.
गुरु अमरदास जी के समय में मंजी प्रथा के विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मंजी प्रथा की स्थापना गुरु अमरदास जी ने की थी। उनके समय में सिक्खों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी। परन्तु गुरु जी की आयु अधिक होने के कारण यह बहुत कठिन हो गया कि वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करें। अत: उन्होंने अपने सारे आध्यात्मिक प्रदेश को 22 भागों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक भाग को ‘मंजी’ कहा जाता था। प्रत्येक मंजी छोटे-छोटे स्थानीय केन्द्रों में बंटी हुई थी जिन्हें पीड़ियां (Piris) कहते थे। मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चन्द नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में प्रचार कार्य को बढ़ाने में विशेष योगदान दिया होगा।”

प्रश्न 8.
“गुरु अमरदास जी एक महान् समाज सुधारक थे।” इस कथन के पक्ष में कोई चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुधार किए-

  1. गुरु अमरदास जी ने जाति मतभेद का खण्डन किया। गुरु जी का विश्वास था कि जाति मतभेद परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध है। इसलिए गुरु जी के लंगर में जाति-पाति का कोई भेद-भाव नहीं रखा जाता था।
  2. उस समय सती प्रथा जोरों से प्रचलित थी। गुरु जी ने इस प्रथा के विरुद्ध जोरदार आवाज़ उठाई।
  3. गुरु जी ने स्त्रियों में प्रचलित पर्दे की प्रथा की भी घोर निन्दा की। वे पर्दे की प्रथा को समाज की उन्नति के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा मानते थे।
  4. मुरु अमरदास जी नशीली वस्तुओं के सेवन के भी घोर विरोधी थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को सभी नशीली वस्तुओं से दूर रहने का निर्देश दिया।

प्रश्न 9.
पंथ के विकास में गुरु अर्जन देव जी के योगदान की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी सिक्खों के पांचवें गुरु थे। उन्होंने सिक्ख धर्म के विकास के लिए अनेक कार्य किये

  1. उन्होंने अमृतसर में हरमंदर साहिब का निर्माण कार्य पूरा करवाया।
  2. उन्होंने तरनतारन और करतारपुर नगरों की नींव रखी।
  3. उन्होंने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की बीड़ तैयार की और उसे हरमंदर साहिब में स्थापित किया। उन्होंने बाबा बुड्डा जी को वहां का प्रथम ग्रन्थी नियुक्त किया।
  4. सिक्ख पहले अपनी इच्छा से गुरु जी को भेंट देते थे, परन्तु अब गुरु जी ने सिक्खों से आय का दसवां भाग एकत्रित करने के लिए स्थान-स्थान पर सेवक रखे। इन सेवकों को मसन्द कहते थे।

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प्रश्न 10.
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। सिक्ख इतिहास में इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
मुग़ल सम्राट अकबर के गुरु अर्जन देव जी के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। परन्तु अकबर की मृत्यु के पश्चात् जहांगीर ने सहनशीलता की नीति को छोड़ दिया। वह उस अवसर की खोज में रहने लगा जब वह सिक्ख धर्म पर करारी चोट कर सके। इसी बीच जहांगीर के पुत्र खुसरो ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। खुसरो पराजित होकर गुरु अर्जन देव जी के पास आया। गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया। इस आरोप में जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी पर दो लाख रुपये जुर्माना लगा दिया। परन्तु गुरु जी ने जुर्माना देने से इन्कार कर दिया। इसलिए उन्हें बन्दी बना लिया गया और अनेक यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया। गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से सिक्ख भड़क उठे। वे समझ गए कि उन्हें अब अपने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने पड़ेंगे।

प्रश्न 11.
आदि ग्रन्थ साहिब का सिक्ख इतिहास में क्या महत्त्व है?
उत्तर-
आदि ग्रन्थ साहिब के संकलन से सिक्ख इतिहास को एक ठोस आधारशिला मिली। यह सिक्खों के लिए पवित्र और प्रमाणिक बन गया। उनके जन्म, नामकरण, विवाह, मृत्यु आदि सभी संस्कार इसी ग्रन्थ को साक्षी मान कर सम्पन्न होने लगे। इसके अतिरिक्त आदि ग्रन्थ साहिब के प्रति श्रद्धा रखने वाले सभी सिक्खों में जातीय प्रेम की भावना जागृत हुई और वे एक अलग पंथ के रूप में उभरने लगे। आगे चल कर इसी ग्रन्थ साहिब को ‘गुरु पद’ प्रदान किया गया और सभी सिक्ख इसे गुरु मान कर पूजने लगे। आज सभी सिक्ख गुरु ग्रन्थ साहिब में संग्रहित वाणी को आलौकिक ज्ञान का भण्डार मानते हैं। उनका विश्वास है कि इसका श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने से सच्चा आनन्द प्राप्त होता है।

प्रश्न 12.
आदि ग्रन्थ साहिब के ऐतिहासिक महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
आदि ग्रन्थ साहिब सिक्खों का पवित्र धार्मिक ग्रन्थ है। यद्यपि इसे ऐतिहासिक दृष्टिकोण से नहीं लिखा गया, तो भी इसका अत्यन्त ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके अध्ययन से हमें 16वीं तथा 17वीं शताब्दी के पंजाब के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन की अनेक बातों का पता चलता है। गुरु नानक देव जी ने अपनी वाणी में लोधी शासन तथा पंजाब के लोगों पर बाबर द्वारा किये गये अत्याचारों की घोर निन्दा की। उस समय की सामाजिक अवस्था के विषय में पता चलता है कि देश में जाति-प्रथा जोरों पर थी, नारी का कोई आदर नहीं था तथा समाज में अनेक व्यर्थ के रीति-रिवाज प्रचलित थे। इसके अतिरिक्त धर्म माम की कोई चीज नहीं रही थी। गुरु नानक देव जी ने स्वयं लिखा है “न कोई हिन्दू है, न कोई मुसलमान” अर्थात् दोनों ही धर्मों के लोग पथ भ्रष्ट हो चुके थे।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

प्रश्न 13.
किन्हीं चार परिस्थितियों का वर्णन करो जो गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के लिए उत्तरदायी थीं।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के मुख्य कारण निम्नलिखित थे —

  1. जहांगीर की धार्मिक कट्टरता-मुग़ल सम्राट जहांगीर गुरु जी से घृणा करता था। वह या तो उन्हें मारना चाहता था या फिर उन्हें मुसलमान बनने के लिए बाध्य करना चाहता था।
  2. पृथिया की शत्रुता-गुरु रामदास जी ने गुरु अर्जन देव जी की बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, परन्तु यह बात गुरु अर्जन देव जी का बड़ा भाई पृथिया सहन न कर सका। इसलिए वह गुरु साहिब के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगा।
  3. गुरु जी का शाही ठाठ-बाठ-गुरु जी ने एक शानदार दरबार की स्थापना कर ली थी और वह शाही ठाठ-बाठ से रहने लगे थे। उन्होंने अब ‘सच्चा पातशाह’ की उपाधि धारण कर ली थी। मुग़ल सम्राट् जहांगीर इस बात को सहन न कर सका और उसने गुरु जी के विरुद्ध कार्यवाही करने का निश्चय कर लिया।
  4. गुरु अर्जन देव जी पर जुर्माना-धीरे-धीरे जहांगीर की धर्मान्धता चरम सीमा पर पहुंच गई। उसने विद्रोही राजकुमार खुसरो की सहायता करने के अपराध में गुरु जी पर दो लाख रुपये जुर्माना कर दिया। परंतु गुरु जी ने यह जुर्माना देने से इन्कार कर दिया। इस पर उसने गुरु जी को कठोर शारीरिक कष्ट देकर शहीद कर दिया।

प्रश्न 14.
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी की महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया हुई —

  1. गुरु अर्जन देव जी ने ज्योति-जोत समाने से पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द के नाम यह सन्देश छोड़ा, “वह समय बड़ी तेजी से आ रहा है जब भलाई और बुराई की शक्तियों की टक्कर होगी। अतः मेरे पुत्र तैयार हो जा, आप शस्त्र पहन और अपने अनुयायियों को शस्त्र पहना।” गुरु जी के इन अन्तिम शब्दों ने सिक्खों में सैनिक भावना को जागृत कर लिया। अब सिक्ख ‘सन्त सिपाही’ बन गए जिनके एक हाथ में माला थी और दूसरे हाथ में तलवार।।
  2. गुरु जी की शहीदी से पूर्व सिक्खों तथा मुग़लों के आपसी सम्बन्ध अच्छे थे। परन्तु इस शहीदी ने सिक्खों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया जिससे उनके मन में मुगल राज्य के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई।
  3. इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हो गए। निःसन्देह गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

प्रश्न 15.
गुरु अर्जन देव जी के चरित्र तथा व्यक्तित्व के किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
पांचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव जी उच्च कोटि के चरित्र तथा व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके चरित्र के चार विभिन्न पहलुओं का वर्णन इस प्रकार है —

  1. गुरु जी एक बहुत बड़े धार्मिक नेता और संगठनकर्ता थे। उन्होंने सिक्ख धर्म का उत्साहपूर्वक प्रचार किया और मसन्द प्रथा में आवश्यक सुधार करके सिक्ख समुदाय को एक संगठित रूप प्रदान किया।
  2. गुरु साहिब एक महान् निर्माता भी थे। उन्होंने अमृतसर नगर का निर्माण कार्य पूरा किया, वहां के सरोवर में हरमंदर साहिब का निर्माण करवाया और तरनतारन, हरगोबिन्दपुर आदि नगर बसाये। लाहौर में उन्होंने एक बावली बनवाई।
  3. उन्होंने ‘आदि ग्रन्थ साहिब’ का संकलन करके एक महान् सम्पादक होने का परिचय दिया।
  4. उनमें एक समाज सुधारक के भी सभी गुण विद्यमान थे। उन्होंने विधवा विवाह का प्रचार किया और नशीली वस्तुओं के सेवन को बुरा बताया। उन्होंने एक बस्ती की स्थापना करवाई जहां रोगियों को औषधियों के साथ-साथ मुफ्त भोजन तथा वस्त्र भी दिए जाते थे।

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प्रश्न 16.
किन्हीं चार परिस्थितियों का वर्णन करो जिनके कारण गुरु हरगोबिन्द जी को नवीन नीति अपनानी पड़ी।
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी ने निम्नलिखित कारणों से नवीन नीति को अपनाया

  1. मुगलों की शत्रुता तथा हस्तक्षेप-मुग़ल सम्राट् जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के बाद भी सिक्खों के प्रति दमन की नीति जारी रखी। फलस्वरूप नए गुरु हरगोबिन्द जी के लिए सिक्खों की रक्षा करना आवश्यक हो गया और उन्हें नवीन नीति का आश्रय लेना पड़ा।
  2. गुरु अर्जन देव जी की शहीदी-गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से यह स्पष्ट हो गया था कि यदि सिक्ख धर्म को बचाना है तो सिक्खों को माला के साथ-साथ शस्त्र भी धारण करने पड़ेंगे। इसी उद्देश्य से गुरु जी ने ‘नवीन नीति’ अपनाई।
  3. गुरु अर्जन देव जी के अन्तिम शब्द-गुरु अर्जन देव जी ने शहीदी से पहले अपने सन्देश में सिक्खों को शस्त्र धारण करने के लिए कहा था। अतः गुरु हरगोबिन्द जी ने सिक्खों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के साथ-साथ सैनिक शिक्षा भी देनी आरम्भ कर दी।
  4. जाटों का सिक्ख धर्म में प्रवेश-जाटों के सिक्ख धर्म में प्रवेश के कारण भी गुरु हरगोबिन्द जी को नवीन नीति अपनाने पर विवश होना पड़ा। ये लोग स्वभाव से ही स्वतन्त्रता प्रेमी थे और युद्ध में उनकी विशेष रुचि थी।

प्रश्न 17.
गुरु हरगोबिन्द जी के जीवन तथा कार्यों पर प्रकाश डालो।
उत्तर-
गुरु हरगोबिन्द जी सिक्खों के छठे गुरु थे। उन्होंने सिक्ख पन्थ को एक नया मोड़ दिया। –

  1. उन्होंने गुरुगद्दी पर बैठते ही दो तलवारें धारण की। एक तलवार मीरी की और दूसरी पीरी की। इस प्रकार सिक्ख गुरु धार्मिक नेता होने के साथ-साथ राजनीतिक नेता भी बन गये।
  2. उन्होंने हरमंदर साहिब के सामने एक नया भवन बनवाया। यह भवन अकाल तख्त के नाम से प्रसिद्ध है। गुरु हरगोबिन्द जी ने सिक्खों को शस्त्रों का प्रयोग करना भी सिखलाया।
  3. जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया। कुछ समय के पश्चात् जहांगीर को पता चल गया कि गुरु जी निर्दोष हैं। इसलिए उनको छोड़ दिया गया। परन्तु गुरु जी के कहने पर जहांगीर को उनके साथ के बन्दी राजाओं को भी छोड़ना पड़ा।
  4. गुरु जी ने मुग़लों के साथ युद्ध भी किए। मुग़ल सम्राट् शाहजहां ने तीन बार गुरु जी के विरुद्ध सेना भेजी। गुरु जी ने बड़ी वीरता से उनका सामना किया। फलस्वरूप मुग़ल विजय प्राप्त करने में सफल न हो सके।

प्रश्न 18.
सिक्ख धर्म के प्रति गुरु हरराय जी की कोई चार सेवाएं बताओ।
उत्तर-
गुरु हरराय जी ने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए निम्नलिखित कार्य किए

  1. वे प्रतिदिन प्रातः तथा सायंकाल को धर्म सभाएं करके सिक्ख धर्म का प्रचार करते थे। वे लोगों को धार्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।
  2. उन्होंने अनेक लोगों को इस धर्म का अनुयायी बनाया। उनके नवीन शिष्यों में प्रमुख व्यक्तियों के नाम थेबैरागी भक्त गीर, भाई संगतिया, भाई गौंडा तथा भाई भगतु।
  3. उन्होंने सिक्ख धर्म के प्रचार के लिए स्थान-स्थान पर प्रचारक भेजे। उन्होंने ‘भक्त गीर’ नामक एक बैरागी साधु को अपना शिष्य बना लिया और उसका नाम भक्त भगवान् रखा। उसने भारतवर्ष में लगभग 360 गद्दियां स्थापित की। इनमें से कुछ गद्दियां आज भी मौजूद हैं।
  4. गुरु हरराय जी स्वयं भी धर्म प्रचार के लिए पंजाब में कई स्थानों पर गए और उन्होंने वहां अनेक अनुयायी बनाए।

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बड़े उत्तर वाले प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
उन परिस्थितियों का वर्णन करो जो गुरु अर्जन देव जी की शहीदी के लिए उत्तरदायी थीं। इस शहीदी का क्या महत्त्व है?
अथवा
“गुरु अर्जन देव जी के बलिदान ने सिक्ख इतिहास के पन्ने पलट दिए।” इस कथन की पुष्टि करो।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी उन महापुरुषों में से एक थे जिन्होंने धर्म की खातिर अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी शहीदी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं.

  1. सिक्ख धर्म का विस्तार-गुरु अर्जन देव जी के समय सिख धर्म का तेजी से विस्तार हो रहा था। कई नगरों की स्थापना, श्री हरमंदर साहिब के निर्माण तथा आदि ग्रंथ साहिब के संकलन के कारण लोगों की सिक्ख धर्म में आस्था बढ़ती जा रही थी। दसबंध प्रथा के कारण गुरु साहिब की आय में वृद्धि हो रही थी। अतः लोग गुरु अर्जन देव जी को ‘सच्चे पातशाह’ कह कर पुकारने लगे थे। मुग़ल सम्राट् जहांगीर इस स्थिति को राजनीतिक संकट के रूप में देख रहा था।
  2. जहांगीर की धार्मिक कट्टरता-1605 ई० में जहांगीर मुग़ल सम्राट् बना। यह सिक्खों के प्रति घृणा की भावना रखता था। इसलिए वह गुरु जी से घृणा करता था। वह या तो उनको मारना चाहता था और या फिर उन्हें मुसलमान बनने के लिए बाध्य करना चाहता था। अत: यह मानना ही पड़ेगा कि गुरु जी की शहीदी में जहांगीर का पूरा हाथ था।
  3. पृथिया (पिरथी चन्द) की शत्रुता-गुरु रामदास जी ने गुरु अर्जन देव जी की बुद्धिमता से प्रभावित होकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। परन्तु यह बात गुरु अर्जन देव जी का बड़ा भाई पृथिया सहन न कर सका। उसने मुगल सम्राट अकबर से यह शिकायत की कि गुरु अर्जन देव जी एक ऐसे धार्मिक ग्रंथ (आदि ग्रंथ साहिब) की रचना कर रहे हैं, जो इस्लाम धर्म के सिद्धांतों के विरुद्ध है, परन्तु सहनशील अकबर ने गुरु जी के विरुद्ध कोई कार्यवाही न की। इसके बाद पृथिया लाहौर के गवर्नर सुलेही खां तथा वहां के वित्त मंत्री चंदुशाह से मिलकर गुरु अर्जन देव जी के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगा। मरने से पहले वह मुग़लों के मन में गुरु जी के विरुद्ध घृणा के बीज बो गया।
  4. नक्शबंदियों का विरोध-नक्शबंदी लहर एक मुस्लिम लहर थी जो गैर मुसलमानों को कोई भी सुविधा दिए जाने के विरुद्ध थे। इस लहर के एक नेता शेख अहमद सरहिंदी के नेतृत्व में मुसलमानों ने गुरु अर्जन देव जी के विरुद्ध सम्राट अकबर से शिकायत की। परन्तु एक उदारवादी शासक होने के कारण अकबर ने नक्शबंदियों की शिकायतों की ओर कोई ध्यान न दिया। अत: अकबर की मृत्यु के बाद नक्शबंदियों ने जहांगीर को गुरु साहिब के विरुद्ध भड़कना शुरु कर दिया।
  5. चन्दू शाह की शत्रुता-चन्दू शाह लाहौर का दीवान था। गुरु अर्जन देव जी ने उसकी पुत्री के साथ अपने पुत्र का विवाह करने से इन्कार कर दिया था। अतः उसने पहले सम्राट अकबर को तथा बाद में जहांगीर को गुरु जी के विरुद्ध यह कह कर भड़काया कि उन्होंने विद्रोही राजकुमार की सहायता की है। जहांगीर पहले ही गुरु जी के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना चाहता था। इसलिए वह गुरु जी के विरुद्ध कठोर पग उठाने के लिए तैयार हो गया।
  6. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन-गुरु जी ने आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन किया था। गुरु जी के शत्रुओं ने जहांगीर को बताया कि आदि ग्रन्थ साहिब में इस्लाम धर्म के विरुद्ध बहुत कुछ लिखा गया है। अत: जहांगीर ने गुरु जी को आदेश दिया कि आदि ग्रन्थ साहिब में से ऐसी सभी बातें निकाल दी जाएं जो इस्लाम धर्म के विरुद्ध हों। इस पर गुरु जी ने उत्तर दिया, “आदि ग्रन्थ साहिब से हम एक भी अक्षर निकालने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि इसमें हमने कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो किसी धर्म के विरुद्ध हो।” कहते हैं कि यह उत्तर पाकर जहांगीर ने गुरु अर्जन देव जी से कहा कि वे इस ग्रन्थ में मुहम्मद साहिब के विषय में भी कुछ लिख दें। परन्तु गुरु जी ने जहांगीर की यह बात स्वीकार न की और कहा कि इस विषय में ईश्वर के आदेश के सिवा किसी अन्य के आदेश का पालन नहीं किया जा सकता।
  7. राजकुमार खुसरो का मामला (तात्कालिक कारण)-खुसरो जहांगीर का सबसे बड़ा पुत्र था। उसने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। जहांगीर की सेनाओं ने उसका पीछा किया। वह भाग कर गुरु अर्जन देव जी की शरण में पहुंचा। कहते हैं कि गुरु जी ने उसे आशीर्वाद दिया और उसे लंगर भी छकाया। परन्तु गुरु साहिब के विरोधियों ने जहांगीर के कान भरे कि गुरु साहिब ने खुसरो की धन से सहायता की है। इसे गुरु जी का अपराध माना गया और उन्हें बंदी बनने का आदेश दिया गया।
  8. शहीदी-गुरु साहिब को 24 मई, 1606 ई० को बंदी के रूप में लाहौर लाया गया। उपर्युक्त बातों के कारण जहांगीर की धर्मान्धता चरम सीमा पर थी। अतः उसने गुरु अर्जन देव जी को शहीद करने का आदेश जारी कर दिया। शहीदी से पहले गुरु साहिब को कठोर यातनाएं दी गईं। कहा जाता है कि उन्हें तपते लोहे पर बिठाया गया और उनके शरीर पर गर्म रेत डाली गई। 30 मई 1606 ई० को गुरु जी शहीदी को प्राप्त हुए। उन्हें शहीदों का ‘सरताज’ कहा जाता है।
    शहीदी का महत्त्व-गुरु अर्जन देव जी की शहीदी को सिक्ख इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

    1. गुरु जी की शहीदी ने सिक्खों में सैनिक भावना जागृत की। अतः शान्तिप्रिय सिक्ख जाति ने लड़ाकू जाति का रूप धारण कर लिया। वास्तव में वे ‘सन्त सिपाही’ बन गए।
    2. गुरु जी की शहीदी से पूर्व सिक्खों तथा मुगलों के आपसी सम्बन्ध अच्छे थे। परन्तु इस शहीदी ने सिक्खों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया और उनके मन में मुग़ल राज्य के प्रति घृणा पैदा हो गई।
    3. इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार हो गए।
      निःसन्देह गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई। इसने शान्तिप्रिय सिक्खों को सन्त सिपाही बना दिया। उन्होंने समझ लिया कि यदि उन्हें अपने धर्म की रक्षा करनी है तो उन्हें शस्त्र धारण करने ही पड़ेंगे।

प्रश्न 2.
उन परिस्थितियों का वर्णन करो जो गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के लिए उत्तरदायी थीं। सिक्ख इतिहास में इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी निम्नलिखित कारणों से हुई.

  1. सिक्खों और मुगलों में बढ़ता हुआ विरोध-जहांगीर ने सिक्ख गुरु अर्जन देव जी को शहीद किया था। अतः सिक्खों ने आत्मरक्षा के लिए शस्त्र धारण करने आरम्भ कर दिए थे। उनके शस्त्र धारण करते ही मुग़लों तथा सिक्खों में शत्रुता इतनी गहरी हो गई जो आगे चलकर गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदान का कारण बनी।
  2. औरंगजेब की असहनशीलता की नीति-औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने अपनी हिन्दू जनता । पर अत्याचार करने शुरू कर दिए और उन पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए। उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाने का प्रयास भी किया। औरंगज़ेब द्वारा निर्दोष लोगों पर लगाए जा रहे प्रतिबन्धों ने गुरु तेग बहादुर जी के मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने निश्चय कर लिया कि वे अपनी जान देकर भी इन अत्याचारों से लोगों की रक्षा करेंगे। आखिर उन्होंने यही किया।
  3. सिक्ख धर्म का उत्साहपूर्ण प्रचार-गुरु नानक देव जी के पश्चात् गुरु तेग़ बहादुर जी ही सिक्खों के एक ऐसे गुरु थे जिन्होंने स्थान-स्थान पर भ्रमण करके सिक्ख मत का प्रचार किया। औरंगजेब सिक्ख धर्म के इस प्रचार को सहन न कर सका। वह मन ही मन सिक्ख गुरु तेग बहादुर जी से ईर्ष्या करने लगा।
  4. राम राय की शत्रुता-गुरु हरकृष्ण जी के भाई रामराय ने औरंगजेब से शिकायत की कि गुरु जी का धर्म प्रचार का कार्य राष्ट्र हित के विरुद्ध है। उसकी बातों में आकर औरंगजेब ने गुरु जी को सफ़ाई पेश करने के लिए मुग़ल दरबार में (दिल्ली) बुलाया और यहां गुरु जी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
  5. कश्मीरी ब्राह्मणों की पुकार-कुछ कश्मीरी ब्राह्मण मुसलमानों के अत्याचारों से तंग आ चुके थे। गुरु साहिब ने महसूस किया कि धर्म को बलिदान की आवश्यकता है। अतः उन्होंने ब्राह्मणों से कहा कि वे औरंगजेब से जाकर कहें कि “पहले गुरु तेग़ बहादुर को मुसलमान बनाओ, फिर हम सब लोग भी आपके धर्म को स्वीकार कर लेंगे।”

इस प्रकार आत्म-बलिदान की भावना से प्रेरित होकर गुरु तेग़ बहादुर जी दिल्ली की ओर चल पड़े जहां उन्हें शहीद कर दिया गया। महत्त्व-इतिहास में गुरु तेग़ बहादुर साहिब की शहीदी के महत्त्व को निम्नलिखित बातों के आधार पर जाना जा सकता है

  1. धर्म की रक्षा के लिए बलिदान की परम्परा को बनाये रखना-गुरु तेग़ बहादुर जी ने धर्म की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान देकर गुरु साहिबान द्वास बलिदान की परम्परा को बनाए रखा।
  2. मुग़लों के अत्याचारों के विरुद्ध घृणा तथा बदले की भावनाएं-गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान से सारे पंजाब में मुग़लों के अत्याचारों के विरुद्ध घृणा तथा बदले की भावनाएं भड़क उठीं।
  3. खालसा की स्थापना-गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदान से गुरु गोबिन्द सिंह जी इस परिणाम पर पहुंचे कि जब तक भारत में मुग़ल राज्य रहेगा, तब तक धार्मिक अत्याचार समाप्त नहीं होंगे। मुग़ल अत्याचारों का सामना करने के लिए उन्होंने 1699 ई० में आनन्दपुर साहिब में खालसा की स्थापना की।
  4. मुगल साम्राज्य को धक्का-गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान ने मुग़ल साम्राज्य की नींव हिला दी। गुरु गोबिन्द सिंह जी के वीर खालसा मुग़ल साम्राज्य से निरन्तर जूझते रहे जिससे मुग़लों की शक्ति को भारी धक्का लगा।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 4 गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान

गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु तेग बहादुर जी तक सिक्ख गुरुओं का योगदान PSEB 10th Class History Notes

  • गुरु अंगद देव जी-दूसरे सिक्ख गुरु अंगद देव जी ने गुरु नानक साहिब की वाणी एकत्रित की और इसे गुरुमुखी लिपि में लिखा। उनका यह कार्य गुरु अर्जन साहिब द्वारा संकलित ‘ग्रन्थ साहिब’ की तैयारी का पहला चरण सिद्ध हुआ। गुरु अंगद देव जी ने स्वयं भी गुरु नानक देव जी के नाम से वाणी की रचना की। इस प्रकार उन्होंने गुरु पद की एकता को दृढ़ किया। संगत और पंगत की संस्थाएं गुरु अंगद साहिब के अधीन भी जारी रहीं।
  • गुरु अमरदास जी-गुरु अमरदास जी सिक्खों के तीसरे गुरु थे। वह 22 वर्ष तक गुरुगद्दी पर रहे। वह खडूर साहिब से गोइन्दवाल चले गए। वहां उन्होंने एक बावली बनवाई जिसमें उनके सिक्ख (शिष्य) धार्मिक अवसरों पर स्नान करते थे। गुरु अमरदास जी ने विवाह की एक साधारण विधि प्रचलित की और इसे आनन्द-कारज का नाम दिया। उनके समय में सिक्खों की संख्या काफ़ी बढ़ गई।
  • गुरु रामदास जी-चौथे गुरु रामदास जी ने रामदासपुर (आधुनिक अमृतसर) में रह कर प्रचार कार्य आरम्भ किया। इसकी नींव गुरु अमरदास जी के जीवन-काल के अन्तिम वर्षों में रखी गई थी। श्री रामदास जी ने रामदासपुर में एक बहुत बड़ा सरोवर बनवाया जो अमृतसर अर्थात् अमृत के सरोवर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्हें अमृतसर तथा सन्तोखसर नामक तालाबों की खुदाई के लिए काफ़ी धन की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने मसन्द प्रथा का श्रीगणेश किया। उन्होंने गुरुगद्दी को पैतृक रूप भी प्रदान किया।
  • गुरु अर्जन देव जी-गुरु अर्जन देव जी सिक्खों के पांचवें गुरु थे। आपने अमृतसर में हरमंदर साहिब का निर्माण कार्य पूरा करवाया। आपने तरनतारन और करतारपुर नगरों की नींव रखी। आपने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की बीड़ तैयार की और उसे हरमंदर साहिब में स्थापित किया। बाबा बुड्डा जी को वहां का प्रथम ग्रन्थी नियुक्त किया गया। गुरु साहिब ने धर्म की रक्षा के लिए अपनी शहीदी देकर सिक्ख धर्म को सुदृढ़ बनाया।
  • गुरु हरगोबिन्द जी-गुरु हरगोबिन्द जी सिक्खों के छठे गुरु थे। उन्होंने गुरुगद्दी पर बैठते ही ‘नवीन नीति’ अपनाई। इसके अनुसार वह सिक्खों के धार्मिक नेता होने के साथ-साथ राजनीतिक नेता भी बन गये। उन्होंने हरमंदर साहिब के सामने एक नया भवन बनवाया। यह भवन अकाल तख्त के नाम से प्रसिद्ध है। गुरु हरगोबिन्द जी ने सिक्खों को शस्त्रों का प्रयोग करना भी सिखलाया।
  • श्री गुरु हरराय जी तथा श्री हरकृष्ण जी-गुरु हरगोबिन्द जी के पश्चात् श्री गुरु हरराय जी तथा श्री गुरु हरकृष्ण जी ने सिक्खों का धार्मिक नेतृत्व किया। उनका समय सिक्ख इतिहास में शान्तिकाल कहलाता है।
  • श्री गुरु तेग बहादुर जी-नौवें गुरु तेग़ बहादुर जी गुरु नानक देव जी की भान्ति शान्त स्वभाव, गुरु अर्जन देव जी की भान्ति आत्म-त्यागी तथा पिता गुरु हरगोबिन्द जी की भान्ति साहसी तथा निर्भीक थे। उन्होंने बड़ी निर्भीकता से सिक्ख धर्म का नेतृत्व किया। उन्होंने अपनी शहीदी द्वारा सिक्ख धर्म में एक नवीन क्रान्ति पैदा कर दी।
  • मसन्द प्रथा-‘मसन्द’ फ़ारसी भाषा के शब्द मसनद से लिया गया है। इसका अर्थ है-‘उच्च स्थान’। गुरु रामदास जी द्वारा स्थापित इस संस्था को गुरु अर्जन देव जी ने संगठित रूप दिया। परिणामस्वरूप उन्हें सिक्खों से निश्चित धन-राशि प्राप्त होने लगी।
  • आदि ग्रन्थ का संकलन-आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कार्य गुरु अर्जन देव जी ने किया। गुरु अर्जन देव जी लिखवाते जाते थे और उनके प्रिय शिष्य भाई गुरदास जी लिखते जाते थे। आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन कार्य 1604 ई० में सम्पूर्ण हुआ।
  • मीरी तथा पीरी-गुरु हरगोबिन्द साहिब ने ‘मीरी’ और ‘पीरी’ नामक दो तलवारें धारण कीं। उनके द्वारा धारण की गई ‘मीरी’ तलवार सांसारिक विषयों में नेतृत्व का प्रतीक थी। ‘पीरी’ तलवार आध्यात्मिक विषयों में नेतृत्व का प्रतीक थी।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 5 फसलों में खरपतवार और उनकी रोकथाम

Punjab State Board PSEB 7th Class Agriculture Book Solutions Chapter 5 फसलों में खरपतवार और उनकी रोकथाम Textbook Exercise Questions and Answers.

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(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
धान-गेहूँ फसली चक्र वाले खेतों में आने वाले किसी एक खरपतवार का नाम लिखो।
उत्तर-
गुल्ली डंडा।

प्रश्न 2.
गेहूँ में चौड़ी पत्ती वाला कौन-सा खरपतवार आता है ?
उत्तर-
मैना, मैनी, तकला, जंगली पालक।

प्रश्न 3.
धान में कौन-सा खरपतवार आता है ?
उत्तर-
सवांक, मोथा, घरिल्ला, सनी।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 5 फसलों में खरपतवार और उनकी रोकथाम

प्रश्न 4.
फसल और खरपतवार उगने से पहले कौन-से खरपतवार-नाशक का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर-
ट्रेफलान।

प्रश्न 5.
खड़ी फसल में जब खरपतवार उगे हों, तब कौन-से खरपतवार-नाशक का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर-
टोपिक।

प्रश्न 6.
सुरक्षित हुड लगाकर कौन-से खरपतवार-नाशक का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
राऊंड अप।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 5 फसलों में खरपतवार और उनकी रोकथाम

प्रश्न 7.
गुडाई में काम आने वाले दो खेती यंत्रों के नाम लिखो।
उत्तर-
खुरपा, कसौला, व्हील हो, त्रिफाली।

प्रश्न 8.
खरपतवार को काबू करने के लिए उपयोग में आने वाले कोई एक काश्तकारी ढंग का नाम लिखो।
उत्तर-
फसलों की अदला-बदली।

प्रश्न 9.
खरपतवार-नाशकों के छिड़काव के लिए उपयोग में आने वाली नोज़ल का नाम लिखो।
उत्तर-
फ्लैट फैन या फ्लड जैट नोज़ल।

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प्रश्न 10.
क्या एक खेत में लगातार एक ही किस्म के खरपतवार-नाशक का छिड़काव करना चाहिए ?
उत्तर-
एक ही किस्म के खरपतवार-नाशकों का छिड़काव नहीं करना चाहिए।

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
खरपतवार क्या होते हैं ?
उत्तर-
मुख्य फसल में उगे अवांछित, पौधे जो फसल की काश्त के साथ उग जाते हैं तथा फसल का भोजन, पानी तथा प्रकाश खींच लेते हैं उन्हें खरपतवार कहा जाता है।

प्रश्न 2.
घास वाले खरपतवारों की पहचान कैसे की जाती है ?
उत्तर-
घास वाले खरपतवारों के पत्ते लम्बे, पतले तथा नाडियां सीधी लम्बी-लम्बी होती हैं।

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प्रश्न 3.
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की पहचान कैसे की जाती है ?
उत्तर-
इन खरपतवारों के पत्ते चौड़े होते हैं तथा नाड़ियों का समूह होता है।

प्रश्न 4.
फसलों में खरपतवारों की किस्म और बहुलता किस पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
खरपतवारों की किस्म तथा बहुलता फसली चक्र, खादों की मात्रा, पानी के साधन, मिट्टी की किस्म पर निर्भर करती है।

प्रश्न 5.
गुडाई करने में कौन-सी मुश्किलें आती हैं ?
उत्तर-
गुडाई महंगी पड़ती है, समय भी अधिक लगता है, कई बार गुडाई करने के लिए मज़दूर नहीं मिलते तथा सावन की ऋतु में वर्षा के कारण गुडाई करनी संभव नहीं होती।

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प्रश्न 6.
खरीफ के खरपतवार बड़ी समस्या क्यों पैदा करते हैं ?
उत्तर-
खरीफ की फसलों के समय वर्षा अधिक होने के कारण पानी की कमी नहीं आती तथा खरपतवार बढ़िया ढंग से फलते-फूलते हैं, इसलिए एक बड़ी समस्या पैदा करते हैं।

प्रश्न 7.
खरपतवार-नाशकों का छिड़काव कैसे मौसम में करना चाहिए ?
उत्तर-
खरपतवार-नाशकों का छिड़काव शांत मौसम वाले दिन करना चाहिए तथा जब हवा न चलती हो।

प्रश्न 8.
गेहूँ में गुल्ली डंडे की रोकथाम काश्तकारी ढंग से कैसे की जाती है ?
उत्तर-
गेहूँ में गुल्ली डंडे की रोकथाम काश्तकारी ढंग से की जा सकती है। इसमें फसलों की अदला-बदली कर के इस खरपतवार की रोकथाम की जा सकती है।

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प्रश्न 9.
रबी की फसलों में आने वाले खरपतवारों के नाम लिखो।
उत्तर-
रबी की फसलों में गुल्ली डंडा, जौंघर, जंगली जवी, मैना, मैनी, जंगली पालक, कंटीली पालक, बटन बूटी, जंगली मटरी, बिल्ली बूटी, तकला, पित्त पापड़ा आदि।

प्रश्न 10.
खरपतवार फसलों से कौन-कौन से ऊर्जा-स्रोतों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं ?
उत्तर-
खरपतवार खादों, पानी, सूर्य के प्रकाश, भोजन आदि ऊर्जा स्रोतों के लिए फसलों से प्रतिस्पर्धा (मुकाबला) करते हैं।

(ग) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
फसलों में खरपतवारों की रोकथाम करना क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर-
फसलों में कुछ अवांछित तथा अनावश्यक पौधे अपने आप उग पड़ते हैं जिन्हें खरपतवार कहा जाता है। इनका खेतों में मुख्य फसल के साथ उगना हानिकारक होता है। यह मुख्य फसल के साथ खादों, पानी, सूर्य के प्रकाश पोषक तत्त्वों को लेने के लिए मुकाबला करते हैं। खरपतवारों के कारण मुख्य फसलों की गुणवत्ता पर खराब प्रभाव पड़ता है तथा इसकी पैदावार भी कम हो जाती है। इसलिए फसलों में नदीनों (खरपतवारों) की रोकथाम करना ज़रूरी है।

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प्रश्न 2.
काश्तकारी ढंग से खरपतवारों को कैसे काबू किया जा सकता है ?
उत्तर-
खरपतवारों को काबू करने के लिए कई बार काश्तकारी ढंग का प्रयोग किया जाता है। कई खरपतवार एक ही फसल के बोने पर आते हैं, ऐसा इसलिए होता है कि खरपतवार की प्राथमिक आवश्यकताएं इसी मुख्य फसल से पूरी होती हैं। जैसे गेहूँ की फसल में गुल्ली डंडा। ऐसे खरपतवार की रोकथाम के लिए फसलों की अदला-बदली करके बुआई की जाती है। अधिक फैलने वाली फसलों को बोकर तथा उनकी दोहरी रौणी बोई जाए तो भी खरपतवार कम होते हैं। खाद को छींटा (छट्टा) की बजाय पोरा करने से, दोनों ओर बिजाई करने से, सियाड़ों में फासला घटाने से भी नदीनों पर काबू करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 3.
खरपतवार-नाशक क्या होते हैं और इनके उपयोग के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
यह रासायनिक दवाइयां होती हैं, जो खरपतवारों को मार देती हैं । यह खरपतवारों की रोकथाम का एक प्रभावशाली ढंग है। इसमें फसल में खरपतवार जमने से पहले ही मारे जा सकते हैं, इस तरह यह फसल के साथ खाद, हवा, पानी, प्रकाश, पोषक तत्त्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करने के योग्य नहीं रहते तथा इस तरह फसल की पैदावार भी बढ़ती है और गुणवत्ता भी परन्तु इन दवाइयों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 4.
उपयोग के समय के अनुसार खरपतवार-नाशकों की कितनी श्रेणियां हैं ?
उत्तर-
उपयोग के समय के अनुसार खरपतवार-नाशक की चार श्रेणियां होती हैं—

  1. बुआई के लिए खेत तैयार करके फसल बोने से पहले उपयोग
  2. फसल उगने से पहले उपयोग
  3. खड़ी फसल में उपयोग
  4. खाली स्थान पर उपयोग।

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प्रश्न 5.
खरपतवार-नाशकों का छिड़काव करते समय कौन-सी सावधानियां रखनी चाहिएं ?
उत्तर-
खरपतवार-नाशक के छिड़काव के समय सावधानियां—

  1. खरपतवारों के प्रयोग के समय हाथों में दस्ताने अवश्य पहनने चाहिएं।
  2. खरपतवार दवाइयों के छिड़काव के लिए सदा फ्लैट फैन या फ्लड जैट नोज़ल का प्रयोग करना चाहिए।
  3. खरपतवार-नाशकों का प्रयोग शांत मौसम वाले दिन ही करना चाहिए।
  4. फसल उगने से पहले प्रयोग किए जाने वाले खरपतवार-नाशकों का प्रयोग सुबह या शाम के समय ही करना चाहिए, दोपहर के समय नहीं करना चाहिए।
  5. खरपतवार-नाशकों को बच्चों से दूर ताले में रखना चाहिए।
  6. खरपतवार-नाशकों को खरीदते समय दुकानदार से पक्का बिल अवश्य ही लें।
  7. खरपतवार-नाशकों का घोल छिड़काव वाले पम्प में डालने से पहले ही तैयार करना चाहिए।
  8. खरपतवार-नाशकों का छिड़काव सारी फसल के ऊपर एक जैसा करना चाहिए।

Agriculture Guide for Class 7 PSEB फसलों में खरपतवार और उनकी रोकथाम Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
घास वाले खरपतवारों में नाड़ियां कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर-
लम्बी तथा सीधी।

प्रश्न 2.
चौड़े पत्ते वाले खरपतवार की नाड़ियां कैसी होती हैं ?
उत्तर-
इनमें नाड़ियों का समूह होता है।

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प्रश्न 3.
खरीफ की फसल में खरपतवारों के कारण पैदावार कितनी कम हो जाती है ?
उत्तर-
20-25%.

प्रश्न 4.
कद् किए धान के खेत में कुछ खरपतवार बताओ।
उत्तर-
संवाक, मोथा, कनकी।

प्रश्न 5.
खरीफ की कुछ अन्य फसलों में खरपतवार बताएं।
उत्तर-
खब्बल घास, कौआ मक्की, सलारा, मकरा।

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प्रश्न 6.
धान फसली चक्र वाले खेतों में कौन-सा खरपतवार अधिक होता है ?
उत्तर-
गुल्ली डंडा/सिट्टी खरपतवार।

प्रश्न 7.
रबी में दूसरे फसली चक्रों में कौन-से खरपतवार होते हैं ?
उत्तर-
जौंधर/जंगली जई आदि।

प्रश्न 8.
गेहूँ में कौन-से खरपतवार देखे जा सकते हैं ?
उत्तर-
मैना, मैनी, जंगली पालक, कंटीली पालक, तकला आदि।

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प्रश्न 9.
खरपतवारों की रोकथाम के लिए कितने ढंग हैं ?
उत्तर-
तीन, गुडाई, काश्तकारी ढंग, खरपतवार-नाशक दवाइयां।

प्रश्न 10.
खरपतवार पैदा होने से पहले प्रयोग किए जाने वाले खरपतवारनाशकों के नाम बताओ।
उत्तर-
ट्रेफ्लान।

प्रश्न 11.
बुवाई से 24 घण्टे के अन्दर-अन्दर छिड़काव किए जाने वाले नदीननाशक बताओ।
उत्तर-
स्टोंप।

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प्रश्न 12.
खड़ी फसल में नदीनों के लिए कौन-सी दवाई का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
टोपिक।

प्रश्न 13.
सुरक्षित हुड्ड लगा कर कौन-सा खरपतवार-नाशक प्रयोग किया जाता
उत्तर-
राऊंड अप।

प्रश्न 14.
फसल उगने से पहले खरपतवार-नाशक किस समय छिड़कना चाहिए ?
उत्तर-
सुबह या शाम के समय।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
धान-गेहूँ फसली चक्र में गुल्ली डंडा के फलने-फूलने का क्या कारण
उत्तर-
धान-गेहूँ का फसली चक्र इसके फलने-फूलने के लिए अनुकूल परिस्थिति देता है।

प्रश्न 2.
खरपतवार की गुडाई करके काबू करने के लिए कौन-से यन्त्र प्रयोग किए जाते हैं ?
उत्तर-
खुरपा, कसौला, व्हील हो, त्रिफाली या ट्रैक्टर से चलने वाले हल, टिल्लर।

प्रश्न 3.
खाद डालने का ढंग, बुआई का ढंग आदि से खरपतवारों की रोकथाम करने का क्या ढंग हैं ?
उत्तर-
खाद को छींटे के स्थान पर पोरे से डालना, दोनों तरफ बुआई करना, सियाडों में फासला कम करना आदि से खरपतवारों की रोकथाम की जा सकती है।

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प्रश्न 4.
खरपतवार-नाशक क्या हैं ?
उत्तर-
खरपतवार-नाशक रासायनिक दवाइयां हैं जो खरपतवारों को मार देती हैं, परन्तु मुख्य फसल को नुकसान नहीं करतीं।

प्रश्न 5.
खरपतवार-नाशकों का प्रयोग किसकी सिफ़ारिश से तथा कितना तथा कब करना चाहिए ?
उत्तर-
इन दवाइयों का प्रयोग पी०ए०यू० लुधियाना की सिफारिशों के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर तथा उचित मात्रा में समय पर ही करना चाहिए। इनके अनावश्यक उपयोग से बचना चाहिए।

बड़े उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-
खरपतवारों की रोकथाम के दो ढंग विस्तारपूर्वक बताएं।
उत्तर-
खरपतवारों की रोकथाम के लिए गुडाई, काश्तकारी ढंग, खरपतवार-नाशकों का प्रयोग किया जाता है।
गुडाई-खरपतवारों को गुडाई करके समाप्त किया जा सकता है। इस कार्य के लिए खुरपा, कसौली, व्हील हो, त्रिफाली, ट्रैक्टर से चलने वाले हल का प्रयोग किया जाता है। परन्तु गुडाई सही समय तथा सही ढंग से करनी चाहिए। इस ढंग के कुछ नुकसान भी हैं; जैसे-कई बार गुडाई करने के लिए मज़दूर नहीं मिलते, वर्षा में गुडाई करनी मुश्किल होती है। यह ढंग महंगा है तथा समय भी अधिक लगता है।

खरपतवार-नाशकों का प्रयोग-ये रासायनिक दवाइयां हैं जो खरपतवारों को नष्ट कर देती हैं परन्तु मुख्य फसल को हानि नहीं पहुंचाते। भिन्न-भिन्न फसलों में भिन्न-भिन्न खरपतवारों के लिए तथा खरपतवारों के उगने के समय के अनुसार भिन्न-भिन्न खरपतवारनाशकों का प्रयोग किया जाता है। यह दवाइयां कुछ सीमा तक ज़हरीली होती हैं तथा इनका प्रयोग पी.ए.यू. लुधियाना की सिफारिशों के अनुसार ही आवश्यकता अनुसार करना चाहिए। एक ही खरपतवार-नाशक का एक ही खेत में लगातार प्रयोग नहीं करना चाहिए।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 5 फसलों में खरपतवार और उनकी रोकथाम

फसलों में खरपतवार और उनकी रोकथाम PSEB 7th Class Agriculture Notes

  • मुख्य फसल में उगे अवांछित पौधे जो फसल की काश्त के साथ उगते हैं तथा भोजन खाते हैं, उन्हें खरपतवार कहते हैं।
  • खरपतवार के कारण फसल की पैदावार कम होती है तथा इसकी गुणवत्ता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • खरपतवार को दो भागों में बांटा गया है।
  • घास वाले खरपतवार के पत्ते लम्बे, पतले तथा नाड़ियां सीधी तथा लम्बी होती
  • चौड़े पत्तों वाले खरपतवार के पत्ते चौड़े तथा नाड़ियों का समूह होता है।
  • सावन में वर्षा आम होती रहती है इसके कारण खरपतवार एक बड़ी समस्या पैदा करते हैं। इनको पानी की कोई कमी नहीं होती तथा अधिक फलते-फूलते हैं।
  • खरीफ ऋतु में कद्रू किए धान के खेत में खरपतवार हैं-घरिल्ला, सावंकी, सवांक, सनी, कनकी, मोंथा आदि।
  • खरीफ ऋतु के अन्य खरपतवार हैं-बलवती घास, कुत्ता घास, मकरा, मधाना, अरैकनी घास, खब्बल घास, कौआ मक्की, बरु, डिला, सलारा, माकरू बेल
    चौलाई, तांदला आदि।
  • रबी की फसलों में गुल्ली डंडा, जौंधर, जंगली जवी, मैना, मैनी, जंगली पालक, कंटीली पालक, बटन बूटी, जंगली मटरी, बिल्ली बूटी, तकला, पित्त पापड़ा आदि।
  • गुल्ली डंडा गेहूँ में बहुत नुकसान करता है।
  • खरपतवार की रोकथाम के ढंग हैं-गुडाई करना, फसलों की अदला-बदली, खरपतवार-नाशक दवाइयों का प्रयोग।
  • स्टौंप जैसे खरपतवारनाशक का प्रयोग बुवाई के 24 घण्टे के अन्दर-अन्दर किया जाता है।
  • टोपिक जैसे खरपतवारनाशक का प्रयोग जब खड़ी फसल में खरपतवार उगे हों, तब किया जाता है।
  • राऊंड अप जैसे खरपतवारनाशक का प्रयोग नोज़ल को ढककर सीधे ही खरपतवार पर किया जाता है।
  • कई खरपतवारनाशक ज़हरीले होते हैं। इसलिए इनका प्रयोग करते समय बहुत सावधानी रखनी चाहिए।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 5 संस्कृति

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions Chapter 5 संस्कृति Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology Chapter 5 संस्कृति

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
संस्कृति के मूल तत्त्वों को बताओ।
उत्तर-
परंपराएं, सामाजिक परिमाप तथा सामाजिक कीमतें संस्कृति के मूल तत्त्व हैं।

प्रश्न 2.
संस्कृति ‘लोगों के रहने का सम्पूर्ण तरीका’ है, किसका कथन है ?
उत्तर-
यह शब्द क्लाईड कल्ककोहन (Clyde Kluckhohn) के हैं।

प्रश्न 3.
किस तरीके से अनपढ़ समाज में संस्कृति को हस्तांतरित किया जाता है ? .
उत्तर-
क्योंकि संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है, इसलिए अनपढ़ समाजों में संस्कृति को सीख कर हस्तांतरित किया जाता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 5 संस्कृति

प्रश्न 4.
संस्कृति के वर्गीकरण को विस्तृत रूप में लिखिए ?
उत्तर-
संस्कृति के दो भाग होते हैं-भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति।

प्रश्न 5.
अभौतिक संस्कृति के कुछ उदाहरणों के नाम लिखो ?
उत्तर-
विचार, परिमाप, कीमतें, आदतें, आदर्श, परंपराएं इत्यादि।

प्रश्न 6.
सांस्कृतिक पिछड़ेपन का सिद्धांत किसने दिया है।
उत्तर-
सांस्कृतिक पिछड़ेपन का सिद्धांत विलियम एफ० आगबर्न (William F. Ogburn) ने दिया था।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 5 संस्कृति

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
संस्कृति क्या है ?
उत्तर-
हमारे रहने-सहने के ढंग, फिलास्फी भावनाएं, विचार, मशीनें, कार, पेन, किताबें इत्यादि सभी अभौतिक तथा भौतिक वस्तुएं हैं तथा यह ही संस्कृति है। ये सभी वस्तुएं समूहों द्वारा ही उत्पन्न तथा प्रयोग की जाती हैं। इस प्रकार संस्कृति वह वस्तु है जिस पर हम कार्य करते हैं, विचार करते हैं तथा अपने पास रखते हैं।

प्रश्न 2.
सांस्कृतिक पिछड़ापन क्या है ?
उत्तर-
संस्कृति के दो भाग होते हैं-भौतिक तथा अभौतिक। नए आविष्कारों के कारण भौतिक संस्कृति में तेजी से परिवर्तन आते हैं परन्तु हमारे विचार, परंपराएं, अर्थात् अभौतिक संस्कृति में उतनी तेज़ी से परिवर्तन नहीं आता है। इस कारण दोनों में अंतर उत्पन्न हो जाता है जिसे सांस्कृतिक पिछड़ापन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
सामाजिक मापदंड क्या है ?
उत्तर–
प्रत्येक समाज ने अपने सदस्यों के व्यवहार करने के लिए कुछ नियम बनाए होते हैं जिन्हें परिमाप कहा जाता है। इस प्रकार परिमाप व्यवहार के लिए कुछ दिशा निर्देश हैं। परिमाप समाज के सदस्यों के व्यवहार को निर्देशित तथा नियमित करते हैं। यह संस्कृति का बहुत ही महत्त्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।

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प्रश्न 4.
आधुनिक भारत के केन्द्रित मूल्य क्या हैं ?
उत्तर-
आधुनिक भारत की प्रमुख केन्द्रित मूल्य हैं-लोकतान्त्रिक व्यवहार, समानता, न्याय, स्वतन्त्रता, धर्मनिष्पक्षता इत्यादि। अलग-अलग समाजों की अलग-अलग प्रमुख कीमतें होती हैं। छोटे समुदाय किसी विशेष कीमत पर बल देते हैं परन्तु बड़े समाज सर्वव्यापक कीमतों पर बल देते हैं।

प्रश्न 5.
पारम्परिक भारतीय समाज के सन्तुष्ट मूल्यों को बताइए।
उत्तर-
प्रत्येक समाज की अलग-अलग प्रमुख कीमतें होती हैं। कोई समाज किसी कीमत पर बल देता है तो . कोई किसी पर। परंपरागत भारतीय समाज की प्रमुख कीमतें हैं-सब कुछ छोड़ देना (detachment), दुनियादारी तथा धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के चार पुरुषार्थों की प्राप्ति।

प्रश्न 6.
संस्कृति के ज्ञानात्मक घटकों को कैसे दर्शाया जाता है ?
उत्तर-
संस्कृति के भौतिक भाग को कल्पनाओं, साहित्य, कलाओं, धर्म तथा वैज्ञानिक सिद्धांतों की सहायता से दर्शाया जाता है। विचारों को साहित्य में दर्शाया जाता है तथा इस प्रकार एक संस्कृति की बौद्धिक विरासत को संभाल कर रखा जाता है।

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III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
किस प्रकार संस्कृति लोगों का सम्पूर्ण जीवन है ?
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं है कि संस्कृति लोगों के जीवन का सम्पूर्ण तरीका है। संस्कृति और कुछ नहीं बल्कि जो कुछ भी हमारे पास है, वह ही संस्कृति है। हमारे विचार, आदर्श, आदतें, कपड़े, पैसे, जायदाद इत्यादि सब कुछ जो मनुष्य ने आदि काल से लेकर आज तक प्राप्त किया है वह उसकी संस्कृति है। अगर इन सभी चीजों को मनुष्य के जीवन में से निकाल दिया जाए तो मनुष्य के जीवन में कुछ भी नहीं बचेगा तथा वह दोबारा आदि मानव. के स्तर पर पहुंच जाएगा। चाहे प्रत्येक समाज की संस्कृति अलग-अलग होती है परन्तु सभी संस्कृतियों में कुछेक तत्त्व ऐसे भी हैं, जो सर्वव्यापक होते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संस्कृति लोगों के जीवन का सम्पूर्ण तरीका है।

प्रश्न 2.
भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति को विस्तृत रूप में लिखो।
उत्तर-
भौतिक संस्कृति का अर्थ है वह संस्कृति जिसमें व्यक्ति द्वारा बनी सभी वस्तुओं को शामिल किया जाता है। यह संस्कृति मूर्त होती है क्योंकि हम इसको देख सकते हैं, स्पर्श सकते हैं, जैसे-स्कूटर, टी० वी०, मेज़, कुर्सी, बर्तन, बस, कार, जहाज़ आदि उपरोक्त सब वस्तुएं मूर्त हैं पर भौतिक संस्कृति है।

अभौतिक संस्कृति अर्थात् वह संस्कृति जिसमें वह सब वस्तुओं को शामिल किया जाता है जो अमूर्त होती हैं। इन सबको न तो हम पकड़ सकते हैं और न ही देख सकते हैं बल्कि इनको केवल महसूस ही किया जाता है। जैसे परंपराएं (Traditions), रीति-रिवाज (Customs), मूल्य (Values), कलाएं (Skills), परिमाप (Norms) आदि। वे सब वस्तुएं अमूर्त होती हैं। इनको अभौतिक संस्कृति में शामिल किया जाता है।

प्रश्न 3.
संस्कृति के मूल तत्त्वों पर विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर-

  • रिवाज तथा परंपराएं (Customs and Traditions)—सामाजिक व्यवहार के प्रकार हैं जो संगठित होते हैं तथा दोबारा प्रयोग किए जाते हैं। यह व्यवहार करने के स्थायी तरीके हैं। प्रत्येक समाज तथा संस्कृति . के रिवाज तथा परंपराएं अलग-अलग होती हैं।
  • परिमाप (Norms) भी संस्कृति का आवश्यक तत्त्व होते हैं। समाज के प्रत्येक व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह किस प्रकार से व्यवहार करे। परिमाप व्यवहार करने के वह तरीके हैं जिन्हें मानने की सभी से आशा की जाती है।
  • कीमतें (Values) भी इसका एक अभिन्न अंग होती हैं। प्रत्येक समाज की कुछ कीमतें होती हैं जो मुख्य होती हैं तथा सभी से यह आशा की जाती है कि वह इन कीमतों को माने। इससे उसे यह पता चलता है कि क्या ग़लत है तथा क्या ठीक है।

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प्रश्न 4.
“संस्कृति एक सीखा व्यवहार है।” इस कथन का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं है कि संस्कृति मनुष्यों द्वारा सीखी जाती है। यह कोई जैविक गुण नहीं है जो व्यक्ति जन्म से ही लेकर पैदा होता है। उसे यह अपने माता-पिता से नहीं बल्कि समाज में रहकर धीरे-धीरे समाजीकरण की प्रक्रिया के साथ मिलता है। कोई भी पैदा होने के साथ विचार, भावनाएं साथ लेकर नहीं आता बल्कि वह उस समाज के अन्य लोगों के साथ अन्तक्रियाएं करते हुए सीखता है। हम किसी भी प्रकार का कार्य ले सकते हैं, प्रत्येक कार्य को समाज में रहते हुए सीखा जाता है। इससे यह स्पष्ट है कि संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें :

प्रश्न 1.
किस प्रकार सामाजिक विश्लेषण में संस्कृति रोज़मर्रा में प्रयोग किए जा रहे शब्द संस्कृति से भिन्न है ?
उत्तर-
दैनिक प्रयोग के शब्द ‘संस्कृति’ के अर्थ समाजशास्त्र के शब्द ‘संस्कृति’ से निश्चित रूप से ही अलग है। दैनिक प्रयोग में संस्कृति कला तक ही सीमित है अथवा कुछ वर्गों, देशों की जीवन शैली के बारे में बताती है। परन्तु समाजशास्त्र में इसके अर्थ कुछ अलग ही हैं। समाजशास्त्र में इसके अर्थ हैं-व्यक्ति ने प्राचीन काल से लेकर आजतक जो कुछ भी प्राप्त किया है या पता किया है वह उसकी संस्कृति है। संस्कार, विचार, आदर्श, प्रतिमान, रूढ़ियां, कुर्सी, मेज़, कार, पैन, किताबें, लिखित ज्ञान इत्यादि जो कुछ भी व्यक्ति ने समाज में रह कर प्राप्त किया है वह उसकी संस्कृति है। इस प्रकार संस्कृति शब्द के अर्थ समाजशास्त्र की दृष्टि में तथा दैनिक प्रयोग में अलग-अलग हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 5 संस्कृति

प्रश्न 2.
संस्कृति से आप क्या समझते हैं ? संस्कृति की विशेषताओं को बताइए।
उत्तर-
पशुओं एवं मनुष्यों में सबसे महत्त्वपूर्ण जो वस्तु अलग है वह है ‘संस्कृति’ जो मनुष्य के पास है, जानवरों के पास नहीं है। मनुष्य के पास सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु जो है वह है संस्कृति । यदि मनुष्य से उसकी संस्कृति ले ली जाए तो उसके पास कुछ नहीं बचेगा। संसार के सभी प्राणियों में से केवल मानव के पास ही योग्यता है कि संस्कृति को बना कर उसे बचाकर रख सके। संस्कृति केवल मनुष्य की अन्तक्रियाओं से ही पैदा नहीं होती है बल्कि मनुष्य की अगली अन्तक्रियाओं को भी रास्ता दिखाती है। संस्कृति व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायता करती है और उसको समाज में रहने योग्य बनाती है। संस्कृति ऐसे वातावरण का निर्माण करती है, जिसमें रहकर व्यक्ति समाज में कार्य करने के योग्य बन जाता है।

इस तरह संस्कृति और व्यक्ति के एक-दूसरे के साथ काफ़ी गहरे सम्बन्ध होते हैं क्योंकि संस्कृति ही व्यक्तियों को पशुओं से और समूहों को एक-दूसरे से अलग करती साधारण भाषा में संस्कृति को पढ़ाई के समानार्थक अर्थों में लिया गया है कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति सांस्कृतिक एवं अनपढ़ व्यक्ति असांस्कृतिक है परन्तु संस्कृति का यह अर्थ ठीक नहीं है। समाजशास्त्री संस्कृति का अर्थ काफ़ी व्यापक शब्दों में लेते हैं। समाजशास्त्रियों के अनुसार जिस किसी भी वस्तु का निर्माण व्यक्ति ने अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये किया है वह संस्कृति है।

संस्कृति में दो तरह की वस्तुएं होती हैं-(i) भौतिक एवं (ii) अभौतिक। भौतिक वस्तुओं में वह सब कुछ आ जाता है जिसको हम देख सकते हैं और स्पर्श कर सकते हैं। परन्तु अभौतिक वस्तुओं में वह वस्तुएं शामिल होती हैं जिनको हम न तो देख सकते हैं, न ही स्पर्श सकते हैं केवल महसूस (Feel) कर सकते हैं। भौतिक वस्तुओं में मेज़, कुर्सी, किताब, स्कूटर, कार इत्यादि सब कुछ आ जाते है, परन्तु अभौतिक वस्तुओं में हम अपने विचार, संस्कार, तौर-तरीके, भावनाओं एवं भाषाओं को ले सकते हैं। संक्षेप में संस्कृति का अर्थ रहने के ढंग, विचार, भावनाएं, वस्तुएं, मशीनों, कुर्सियों इत्यादि सभी भौतिक एवं अभौतिक पदार्थों से है, अर्थात् व्यक्ति द्वारा प्रयोग की जाने वाली प्रत्येक वस्तु से है चाहे उसने उस वस्तु को बनाया है या नहीं। संस्कृति एक ऐसी वस्तु है जिसके भीतर सभी वह वस्तुएं हैं, जिनके ऊपर समाज के सदस्य विचार करते हैं, कार्य करते हैं और अपने पास रखते हैं।

परिभाषाएं (Definitions) –
1. मैकाइवर व पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “हमारे रहने-सहने के ढंगों में, हमारे दैनिक व्यवहार एवं सम्बन्धों में, विचारों के तरीकों में, हमारी कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन के आनन्द में हमारी प्रकृति का जो प्रकटाव होता है, उसे संस्कृति कहते हैं।”

2. बीयरस्टैड (Bierstdt) के अनुसार, “संस्कृति उन वस्तुओं की जटिल समग्रता है, जो समाज के सदस्य के रूप में हम सोचते, करते और रखते हैं।”

3. ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “संस्कृति मानवीय वातावरण का वह भाग है, जिसमें वह केवल पैदा हुआ है। इसमें इमारतें, हथियार, पहनने वाली वस्तुएं, धर्म एवं वह सभी कार्य करने के तरीके आते हैं, जो व्यक्ति सीखता है।”

4. मजूमदार (Mazumdar) के अनुसार, “संस्कृति मानव की प्राप्तियों भौतिक एवं अभौतिक का सम्पूर्ण मेल होती है जो समाज वैज्ञानिक रूप से भाव जो परम्परा एवं ढांचे क्षितिज एवं लम्ब रूप में संचलित होने के योग्य होती है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि संस्कृति में वह सब शामिल है, जो व्यक्ति समाज के बीच रहते हुए सीखता है जैसे-कला कानून, भावनाएं, रीति-रिवाज, पहरावा, खाने-पीने, साहित्य, ज्ञान, विश्वास इत्यादि। ये सभी संस्कृति का भाग हैं और संस्कृति के यह सभी भाग अलग-अलग न होकर बल्कि एक-दूसरे से मिलकर कार्य करते हैं और संगठन बनाते हैं। इस संगठन को ही संस्कृति कहते हैं। संक्षेप में जो वस्तुएं व्यक्ति ने सीखी हैं, या जो कुछ व्यक्ति को अपने पूर्वजों से मिला है इसे संस्कृति कहते हैं । विरासत में हथियार, व्यवहार के तरीके, विज्ञान के तरीके, कार्य करने के तरीके इत्यादि सभी शामिल हैं।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि संस्कृति समूह के द्वारा पैदा की गई, प्रयोग की गई, विचार की गई, प्रत्येक वस्तु के साथ शामिल है। मनुष्य अपने जन्म के पश्चात् कुछ न कुछ सीखना आरम्भ कर देता है और व्यवहार के तौरतरीकों के द्वारा कार्य करने लग पड़ता है। इस कारण इसको सांस्कृतिक पशु भी कहते हैं।

संस्कृति की विशेषताएं तथा कार्य (Functions and Characteristics of Culture)-

1. संस्कति पीढी दर पीढी आगे बढ़ती है (Culture Move from Generation to Generation)संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जाता है क्योंकि बच्चा अपने माता-पिता से ही व्यवहार के तरीके सीखता है। मनुष्य अपने पूर्वजों की प्राप्तियों से ही काफ़ी कुछ सीखता है। कोई भी किसी कार्य को शुरू से आरम्भ नहीं करना चाहता है। इसलिये वह अपने पूर्वजों के द्वारा किए गये कार्यों को ही आगे बढ़ाता है। इस पीढ़ी दर पीढ़ी का संचार सदियों से चला आ रहा है। इसी कारण ही प्रत्येक व्यक्ति को अलग व्यक्तित्व प्राप्त होता है। कोई भी व्यक्ति पैदा होने के वक्त से अपने साथ कुछ नहीं लेकर आता है, उसको धीरे-धीरे समाज में रहते हएं अपने मातापिता, दादी-दादा, नाना-नानी से बहुत कुछ प्राप्त होता है। इस तरह संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होती रहती है।

2. संस्कृति सामाजिक है (Culture is Social)-संस्कृति कभी भी किसी की व्यक्तिगत मनुष्य की जायदाद नहीं होती। यह तो सामाजिक होती है क्योंकि न तो कोई व्यक्ति संस्कृति को बनाता है और न ही संस्कृति उसकी जायदाद होती है। जब भी कोई व्यक्ति किसी वस्तु का अनुसंधान करता है तो यह वस्तु उसकी न होकर समाज की हो जाती है क्योंकि उस वस्तु को वह अकेला प्रयोग नहीं करता बल्कि सम्पूर्ण समाज प्रयोग करता है। कोई भी वस्तु संस्कृति का भाग तभी कहलाती है जब उस वस्तु को समाज के बहुसंख्यक लोग स्वीकार कर लेते हैं। इस तरह उस वस्तु की सर्वव्यापकता संस्कृति का आवश्यक तत्त्व है। इस तरह हम कह सकते हैं कि संस्कृति व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक है।

3. संस्कृति सीखी जाती है (Culture can be Learned)–संस्कृति मनुष्यों के द्वारा सीखी जाती है। यह कोई जैविक गुण नहीं है जो कि व्यक्ति को अपने माता-पिता से मिलता है। संस्कृति तो व्यक्ति धीरे-धीरे समाजीकरण द्वारा सीखता है। कोई भी पैदा होने के साथ-साथ विचार एवं भावनाएं अपने साथ लेकर नहीं आता बल्कि यह तो वह समाज के अन्य लोगों के साथ अन्तक्रिया करते हुए सीखता है। हम किसी भी प्रकार का कार्य ले सकते हैं। प्रत्येक कार्य को समाज में रहते हुए सीखा जाता है। इससे स्पष्ट है कि संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है।

4. संस्कृति आवश्यकताएं पूरी करती हैं (Culture fulfills needs)-यदि किसी वस्तु का अनुसंधान होता है, तो वह अनुसंधान इसलिये किया जाता है क्योंकि वह उसकी आवश्यकता है। इस तरह संस्कृति के प्रत्येक पक्ष को किसी-न-किसी समय मनुष्यों के सामने किसी-न-किसी की तरफ़ से ले आया गया हो, ताकि अन्य मनुष्यों की आवश्यकता पूरी की जा सके। व्यक्ति गेहूं की पैदावार करनी क्यों सीखा ? क्योंकि मनुष्य को अपनी भूख दूर करने के लिये इसकी आवश्यकता थी। इस तरह व्यक्ति भोजन पैदा करना सीख गया और यही सीखा हुआ व्यवहार संस्कृति का एक हिस्सा बन कर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता गया। आवश्यकता केवल जैविक नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कृतियां भी हो सकती हैं। भूख के साथ-साथ व्यक्ति को प्यार एवं हमदर्दी की भी आवश्यकता होती है, जो व्यक्ति समाज में रहते हुआ सीखता है। इस तरह संस्कृति के भिन्न-भिन्न हिस्से समाज की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं को पूर्ण करते हैं। संस्कृति का जो भाग लोगों की आवश्यकताएं पूरा नहीं करता वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

5. संस्कृति में परिवर्तन आते रहते हैं (Changes often comes in Culture)-संस्कृति कभी भी एक स्थान पर खड़ी नहीं रहती बल्कि उसमें परिवर्तन आते रहते हैं क्योंकि कोई भी वस्तु एक जगह नहीं रुकती। यह प्रत्येक वस्तु की प्रकृति होती है कि उसमें परिवर्तन आये और जब प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन होना निश्चित ही है, तो वह वस्तु परिवर्तनशील है। संस्कृति समाज की प्रत्येक आवश्यकताएं पूरी करती है और समाज की आवश्यकताओं में परिवर्तन आते रहते हैं क्योंकि अवस्थाएं सदैव एक-सी नहीं रहतीं। अवस्थाओं में परिवर्तन आने से आवश्यकताएं भी बदल जाती हैं और आवश्यकताओं में परिवर्तन होने से उनकी पूर्ति करने वाले साधनों में परिवर्तन लाना आवश्यक है। उदाहरण के लिये पहले जनसंख्या कम होने के कारण कृषि हल की सहायता से की जाती थी। परन्तु जनसंख्या के बढ़ने से आवश्यकताएं बढ़ गईं जिससे प्रयुक्त साधन भी बदल गये और हल की जगह ट्रैक्टरों, कम्बाइनों आदि ने ले ली और इससे आवश्यकताएं पूरी की गईं। इस तरह अवस्थाओं के परिवर्तन से संस्कृति में परिवर्तन भी आवश्यक है।

6. एक ही संस्कृति में कई संस्कृतियां होती हैं (One culture consists of many culture)-प्रत्येक संस्कृति के बीच हम कुछ साझे परिमाप, परम्पराएं, भावनाएं, रीति-रिवाज, व्यवहार आदि देख सकते हैं। परन्तु उसके साथ-साथ हम कई तरह के अलग-अलग रहन-सहन के तरीके, खाने-पीने के तरीके, व्यवहार करने के तरीके भी देख सकते हैं जिससे पता चलता है कि एक संस्कृति के बीच ही कई संस्कृतियां विद्यमान होती हैं। उदाहरणार्थ भारतीय संस्कृति में ही कई तरह की संस्कृतियां मिल जायेंगी। क्योंकि भारतवर्ष में कई प्रकार के लोग रहते हैं प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने खाने-पीने के तरीके, रहने-सहने का ढंग, व्यवहार करने का ढंग है जिससे पता चलता है कि हमारी संस्कृति में कई संस्कृतियां हैं।

प्रश्न 3.
संस्कृति के दो प्रकारों की विस्तृत रूप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
संस्कृति के दो प्रकार हैं तथा वह हैं भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति । इनका वर्णन इस प्रकार है-

(i) भौतिक संस्कृति (Material Culture)-भौतिक संस्कृति अप्राकृतिक संस्कृति होती है। इसकी मुख्य विशेषता यह होती है कि व्यक्ति द्वारा बनाई गई सभी वस्तुओं को इसमें शामिल किया जाता है। इस कारण से ही भौतिक संस्कृति मूर्त (concrete) वस्तुओं से संबंध रखती है। इस संस्कृति में पाई जाने वाली सभी वस्तुओं को हम देख या स्पर्श कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मशीनें, औज़ार, यातायात के साधन, बर्तन, किताब, पैन इत्यादि। भौतिक संस्कृति मनुष्यों द्वारा किए गए अविष्कारों से संबंधित होती है।

भौतिक संस्कृति में संस्कृति में आया नया तकनीकी ज्ञान भी शामिल है। भौतिक संस्कृति में वह सब कुछ शामिल है जो कुछ आज तक बना है, सुधरा है अथवा हस्तांतरित किया गया है। संस्कृति के यह भौतिक पक्ष अपने सदस्यों को अपने व्यवहार को परिभाषित करने में सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए चाहे अलग-अलग क्षेत्रों में कृषि करने वाले लोगों का कार्य चाहे एक जैसा होता है परन्तु वह अलग-अलग प्रकार की मशीनों का प्रयोग करते हैं।

(ii) अभौतिक संस्कृति (Non-material Culture)-अभौतिक संस्कृति की मुख्य विशेषता यह होती है कि यह अमूर्त (Abstract) होती है। अमूर्त का अर्थ उन वस्तुओं से है जिन्हें न तो हम पकड़ सकते हैं तथा न ही स्पर्श कर सकते हैं। उदाहरण के लिए धर्म, परंपराएं, संस्कार, रीति-रिवाज, कला, साहित्य, परिमाप, आदर्श, कीमतें इत्यादि को अभौतिक संस्कृति में शामिल किया जाता है। इन सबके कारण ही समाज में निरन्तरता बनी रहती है। परिमाप तथा कीमतें व्यवहार के तरीकों के आदर्श हैं जो समाज में स्थिरता लाने में सहायता करते हैं।

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प्रश्न 4.
सांस्कृतिक विलम्बना या पिछड़पन को विस्तृत रूप में लिखो।
उत्तर-
सबसे पहले सांस्कृतिक पिछड़ेपन के संकल्प को ऑगबर्न (Ogburn) ने प्रयोग किया ताकि समाज के बीच पैदा हुई समस्याएं और तनाव की स्थितियों को जान सकें। ऑगबर्न पहला समाजशास्त्री था जिसने सांस्कृतिक पिछड़ेपन के संकल्प के विस्तृत अर्थ दिए थे।

यद्यपि स्पैन्सर, समनर, मूलर आदि ने अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक पिछड़ेपन शब्द का प्रयोग किया। परन्तु ऑगबन ने सर्वप्रथम ‘सांस्कृतिक पिछड़ेपन’ शब्द का प्रयोग अपनी पुस्तक ‘सोशल चेंज’ (Social change) में 1921 में किया जिसके द्वारा सामाजिक असंगठन तनाव इत्यादि को समझा गया। ऑगबन ऐसा पहला समाजशास्त्री था जिसने सांस्कृतिक पिछड़ेपन को एक सिद्धान्त के रूप में पेश किया। समाजशास्त्रीय विषय में इस सिद्धान्त को अधिकतर स्वीकार किया गया। . सांस्कृतिक पिछड़ेपन का अर्थ (Meaning of Cultural lag)-आधुनिक संस्कृति के दोनों भागों में परिवर्तन समान गति के साथ नहीं होता है। एक भाग में परिवर्तन दूसरे भाग से अधिक गति से होता है। परन्तु संस्कृति एक व्यवस्था है, यह विभिन्न अंगों से मिलकर बनती है। इसके विभिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्ध और अन्तर्निर्भरता होती है। संस्कृति की यह व्यवस्था तब तक बनी रह सकती है, जब तक इसके एक भाग में तेजी से परिवर्तन हो और दूसरे भाग में बराबर गति के साथ परिवर्तन हो। वास्तव में होता यह है कि जब संस्कृति का एक भाग किसी अनुसंधान के कारण बदलता है तो उससे सम्बन्धित या उस पर निर्भर भाग में परिवर्तन होता है। परन्तु दूसरे भाग में परिवर्तन होने में काफ़ी समय लग जाता है। दूसरे भाग में परिवर्तन होने में कितना समय लगेगा ये दूसरे भाग की प्रकृति के ऊपर निर्भर करता है। ये पिछड़ापन कई वर्षों तक चलता रहता है जिस कारण संस्कृति में अव्यवस्था पैदा हो जाती है। संस्कृति के दो परस्पर सम्बन्धित या अन्तर्निर्भर भागों के परिवर्तनों में यह पिछड़ापन सांस्कृतिक पिछड़ापन कहलाता है।

पिछड़ापन शब्द अंग्रेजी के शब्द LAG का हिन्दी रूपान्तर है। पिछड़ापन का अर्थ है पीछे रह जाना। इस पिछड़ेपन के अर्थ को ऑगबन ने उदाहरण देकर समझाया है। उनके अनुसार कोई भी वस्तु कई भागों से मिलकर बनती है। यदि उस वस्तु के किसी हिस्से में परिवर्तन आयेगा तो उस वस्तु के दूसरे हिस्से में भी परिवर्तन अवश्य आयेगा तो वह परिवर्तन उस वस्तु के अन्य भागों को भी प्रभावित करेगा। यह भाग जिन पर उस परिवर्तन का प्रभाव पड़ता है धीरे-धीरे समय के साथ आप भी परिवर्तित हो जाते हैं। यह जो परिवर्तन धीरे-धीरे आते हैं इसमें कुछ समय लग जाता है। इस समय के अन्तर से पिछड़ जाना या पीछे रह जाना या पिछड़ापन कहते हैं।

ऑगबर्न ने अपने सांस्कृतिक पिछड़ापन के सिद्धान्त की भी व्याख्या इसी ढंग से की है। उनके अनुसार संस्कृति के दो पक्ष होते हैं जो आपस में सम्बन्धित होते हैं। यदि एक पक्ष में परिवर्तन आता है तो वह दूसरे पक्ष को प्रभावित करता है। यह दूसरे पक्ष धीरे-धीरे अपने आप को इन परिवर्तनों के अनुसार ढाल लेते हैं व उसके अनुकूल बन जाते हैं परन्तु इस ढालने में कुछ समय लग जाता है। इस समय के अन्तर को जो परिवर्तन के आने व अनुकूलन के समय में होता है, सांस्कृतिक पिछड़ापन कहते हैं। जब संस्कृति का कोई भाग तरक्की करके आगे निकल जाता है व दूसरा भाग गति के कारण पीछे रह जाता है तो यह कहा जाता है कि सांस्कृतिक पिछड़ापन मौजूद है।

ऑगबन के अनुसार संस्कृति के दो भाग होते हैं-(1) भौतिक संस्कृति (2) अभौतिक संस्कृति। भौतिक संस्कृति में वह सभी चीजें शामिल हैं जो हम देख सकते हैं या छू सकते हैं जैसे-मशीनें, मेज़, कुर्सी, किताब, टी० वी०, स्कूटर आदि। अभौतिक संस्कृति में वह सभी वस्तुएं शामिल हैं जो हम देख नहीं सकते केवल महसूस कर सकते हैं जैसे-आदतें, विचार, व्यवहार, भावनाएं, तौर-तरीके, रीति-रिवाज इत्यादि। यह दोनों संस्कृति के भाग एक-दूसरे से गहरे रूप में सम्बन्धित हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। यदि एक भाग में परिवर्तन आता है, तो दूसरे भाग में परिवर्तन आना अनिवार्य है। यह नियम भौतिक व अभौतिक संस्कृति पर लागू होना भी अनिवार्य है। भौतिक संस्कृति में परिवर्तन आते रहते हैं और यह परिवर्तन अति शीघ्र आते रहते हैं। चूंकि नवीन खोजें होती रहती हैं इसलिए भौतिक संस्कृति तो काफ़ी तेजी से बदल जाती है। यह अभौतिक संस्कृति जिसमें भावनाएं, विचार, रीतिरिवाज आदि शामिल हैं उनमें परिवर्तन नहीं आते या परिवर्तन की गति काफ़ी धीमी होती है। इस कारण भौतिक संस्कृति, जिसमें परिवर्तन की गति कम होती है, पीछे रह जाती है। इस प्रकार भौतिक संस्कृति से अभौतिक संस्कृति के पीछे रह जाने को ही सांस्कृतिक पिछड़ापन कहते हैं।

उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृति पिछड़ेपन के लिए कई कारण ज़िम्मेदार होते हैं, जिनमें से एक कारण यह भी होता है कि भिन्न-भिन्न संस्कृति के तत्त्वों में परिवर्तन का सामर्थ्य भी भिन्न-भिन्न है। अभौतिक संस्कृति तेजी से परिवर्तन को अपनाने में असफल रह जाती है, जिसके परिणामस्वरूप सांस्कृतिक पिछड़ापन पैदा हो जाता है। 19वीं और 20वीं सदी में औद्योगिक परिवर्तन पहले हुए व परिवार इस परिवर्तन में पिछड़ेपन की वजह से रह गया। मानव के विचार अभी भी हर तरह के परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होते अर्थात् लोग वैज्ञानिक खोजों को देखते हैं, पढ़ते हैं परन्तु फिर भी वह अपनी पुरानी परम्पराओं, रीति-रिवाजों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions) :

प्रश्न 1.
पशुओं एवं मनुष्यों में पृथकता करने वालों की कौन-सी वस्तु है ?
(A) संस्कृति
(B) A & C
(C) समूह
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(A) संस्कृति।

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प्रश्न 2.
किस वस्तु को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित किया जा सकता है ?
(A) समाज
(B) स्कूटर
(C) संस्कृति
(D) कार।
उत्तर-
(C) संस्कृति।

प्रश्न 3.
संस्कृति के प्रसार के लिए कौन-सी वस्तु आवश्यक नहीं है?
(A) देश का टूटना
(B) लड़ाई
(C) सांस्कृतिक रुकावट
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(C) सांस्कृतिक रुकावट।

प्रश्न 4.
संस्कृतिकरण के लिए क्या आवश्यक है ?
(A) समूह के मूल्य
(B) मनोवैज्ञानिक तैयारी
(C) सामूहिक संस्कृति
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(B) मनोवैज्ञानिक तैयारी।

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प्रश्न 5.
किस समाजशास्त्री ने संस्कृति को भौतिक एवं अभौतिक संस्कृतियों में बांटा था ?
(A) आगबर्न
(B) गिडिंग्ज़
(C) मैकाइवर
(D) पारसन्ज।
उत्तर-
(A) आगबर्न।

प्रश्न 6.
अभौतिक संस्कृति ……………. होती है ?
(A) मूर्त
(B) मूर्त एवं अमूर्त
(C) अमूर्त
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(C) अमूर्त।

प्रश्न 7.
भौतिक संस्कृति ……………… होती है ?
(A) मूर्त
(B) मूर्त एवं अमूर्त
(C) अमूर्त
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(A) मूर्त।

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प्रश्न 8.
कौन-से वर्ष में ऑगबर्न ने ‘संस्कृति पिछड़ापन’ शब्द का प्रयोग किया था?
(A) 1911
(B) 1921
(C) 1931
(D) 1941.
उत्तर-
(B) 1921.

प्रश्न 9.
समीकरण में क्या मिल जाता है ?
(A) समाज
(B) संस्कृतियां
(C) देश
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(B) संस्कृतियां।

प्रश्न 10.
संस्कृति का विकसित रूप क्या है ?
(A) सभ्यता
(B) भौतिक संस्कृति
(C) देश समाज
(D) अभौतिक संस्कृति।
उत्तर-
(A) सभ्यता।

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II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. …………………… ने संस्कृति को जीने का संपूर्ण ढंग कहा है।
2. संस्कृति के ……… भाग होते हैं।
3. विचार, आदर्श, कीमतें संस्कृति के ………. भाग के उदाहरण हैं।
4. ………….. वह नियम है जिन्हें मानने की सभी से आशा की जाती है।
5. सांस्कृतिक पिछड़ेपन का सिद्धांत …………. ने दिया था।
6. ………… को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है।
7. कुर्सी, टेबल, कार संस्कृति के ……….. भाग का हिस्सा होते हैं।
उत्तर-

  1. क्लाइड कल्ककोहन,
  2. दो,
  3. अभौतिक,
  4. करें-कीमतें,
  5. विलियम एफ० आगबर्न,
  6. संस्कृति,
  7. भौतिक।

III. सही/गलत (True/False):

1. अरस्तु के अनुसार मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है।
2. आदिकाल से लेकर मनुष्य ने आज तक जो कुछ प्राप्त किया है, वह संस्कृति है।
3. जिन वस्तुओं को हम देख सकते हैं वह भौतिक संस्कृति है।
4. जिन वस्तुओं को हम देख नहीं सकते, वह अभौतिक संस्कृति है।
5. संस्कृति के दो भाग-भौतिक व अभौतिक होते हैं।
6. संस्कृति के अविकसित रूप को सभ्यता कहते हैं।
7. संस्कृति मनुष्यों के बीच अन्तक्रियाओं का परिणाम होती है।
उत्तर-

  1. गलत
  2. सही
  3. सही
  4. सही
  5. सही
  6. गलत
  7. सही।

IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1.
‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, यह शब्द किसके हैं ?
उत्तर-
यह शब्द अरस्तु (Aristotle) के हैं।

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प्रश्न 2.
मनुष्यों तथा पशुओं के बीच सबसे अलग वस्तु क्या है ?
उत्तर-
मनुष्यों तथा पशुओं के बीच सबसे अलग वस्तु मनुष्यों की संस्कृति है।

प्रश्न 3.
मनुष्य किस प्रकार के वातावरण में रहता है ?
उत्तर-
मनुष्य दो प्रकार के वातावरण–प्राकृतिक तथा अप्राकृतिक में रहता है।

प्रश्न 4.
संस्कृति क्या है ?
उत्तर-
आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य ने जो कुछ भी प्राप्त किया है, वह संस्कृति है।

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प्रश्न 5.
संस्कृति किस चीज़ का परिमाप है ?
उत्तर-
संस्कृति मनुष्यों के बीच अन्तक्रियाओं का परिमाप होती है।

प्रश्न 6.
संस्कृति कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-
संस्कृति दो प्रकार की होती है-भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति।

प्रश्न 7.
भौतिक संस्कृति क्या होती है ?
उत्तर-
जिन वस्तुओं को हम देख या स्पर्श कर सकते हैं, वह भौतिक संस्कृति होती है।

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प्रश्न 8.
हम भौतिक संस्कृति में क्या शामिल कर सकते हैं ?
उत्तर-
हम भौतिक संस्कृति में पुस्तकें, कुर्सी, मेज़, जहाज़, टी० वी०, कार इत्यादि जैसी सभी वस्तुएं शामिल कर सकते हैं।

प्रश्न 9.
अभौतिक संस्कृति क्या होती हैं ? ।
उत्तर-
जिन वस्तुओं को हम देख या स्पर्श नहीं कर सकते, वह अभौतिक संस्कृति का हिस्सा होते हैं।

प्रश्न 10.
हम अभौतिक संस्कृति में क्या शामिल कर सकते हैं ?
उत्तर-
इसमें हम विचार, आदर्श, प्रतिमान, परंपराएं इत्यादि शामिल कर सकते हैं।

प्रश्न 11.
सभ्यता क्या होती है ?
उत्तर-
संस्कति के विकसित रूप को सभ्यता कहते हैं।

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अति लघु उतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संस्कृति क्या है ?
उत्तर-
हमारे रहन-सहन के ढंग, फिलासफी, भावनाएं, विचार, मशीनें इत्यादि सभी भौतिक तथा अभौतिक वस्तुएं संस्कृति का हिस्सा होती हैं। यह सभी वस्तुएं समूह की तरफ से उत्पन्न तथा प्रयोग की जाती हैं। इस प्रकार संस्कृति ऐसी वस्तु है जिस पर हम विचार तथा कार्य करके अपने पास रख सकते हैं।

प्रश्न 2.
संस्कृति की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है क्योंकि बच्चा अपने माता-पिता के व्यवहार से ही सीखता है।
  2. संस्कृति व्यक्ति की आवश्यकताएं पूर्ण करती है क्योंकि अगर किसी चीज़ का आविष्कार होता है तथा वह आविष्कार सभी की आवश्यकताएं पूर्ण करता है।

प्रश्न 3.
सभ्यता क्या होती है ?
उत्तर-
संस्कृति के विकसित रूप को ही सभ्यता कहा जाता है। जो भौतिक अथवा उपयोगी वस्तुओं के संगठन, जिनकी सहायता से मनुष्य ने प्राकृतिक तथा अप्राकृतिक वातावरण के ऊपर विजय प्राप्त की है तथा उस पर नियन्त्रण किया है, उसे ही सभ्यता कहा जाता है।

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प्रश्न 4.
पर संस्कृति ग्रहण क्या होता है ?
उत्तर-
पर संस्कृति ग्रहण एक प्रक्रिया है जिसमें दो संस्कृतियों के लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं तथा वह एक-दूसरे के सभी नहीं तो बहुत से तत्त्वों को ग्रहण करते हैं। इन तत्त्वों को ग्रहण करने की प्रक्रिया के साथ दोनों संस्कृतियों के बीच एक-दूसरे के प्रभाव के अन्तर्गत काफ़ी परिवर्तन आ जाता है।

प्रश्न 5.
सांस्कृतिक प्रसार।
उत्तर-
जब किसी एक समूह के सांस्कृतिक पैटर्न दूसरे समूह में भी प्रचलित हो जाते हैं तो इस प्रकार के प्रसार को सांस्कृतिक प्रसार कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है। पहला सांस्कृतिक प्रसार अचानक तथा संयोग से होता है परन्तु दूसरी प्रकार का सांस्कृतिक प्रसार निर्देशित ढंग से प्रसारित किया जाता है।

प्रश्न 6.
सांस्कृतिक पैटर्न।
उत्तर-
जब तत्त्व तथा सांस्कृतिक परिवार आपस में काफ़ी हद तक संबंधित हो जाते हैं तो सांस्कृतिक पैटर्नो का निर्माण होता है। प्रत्येक सांस्कृतिक पैटर्न की समाज में कोई-न-कोई भूमिका अवश्य होती है जो उसे निभानी ही पड़ती है। उदाहरण के लिए परंपराएं।

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प्रश्न 7.
उप-संस्कृति।
उत्तर-
प्रत्येक विशेष समूह के कुछ सांस्कृतिक तत्त्व होते हैं । हिन्दुओं की अपनी एक संस्कृति होती है। हिन्दू संस्कृति भारतीय संस्कृति का ही एक भाग है। एक संस्कृति का एक हिस्सा, जो कुछ विशेषताओं पर आधारित होता है, उप-संस्कृति होता है।

लघु उतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संस्कृति।
उत्तर-
संस्कृति मानवीय समाज की विशेषता है, जो मानवीय समाज को पशु समाज से भिन्न करती है। व्यक्ति को सामाजिक व्यक्ति भी संस्कृति के द्वारा बनाया जा सकता है व एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को, एक समूह या एक समुदाय को दूसरे समूह या समुदायों द्वारा भिन्न भी किया जाता है। संस्कृति में हम वह सब चीजें शामिल करते हैं, जो कुछ भी मनुष्य समाज से ग्रहण करता है व सीखता है। जैसे रीति-रिवाज, कानून, पहरावा, संगीत, भाषा साहित्य, ज्ञान, आदर्श, लोकाचार, लोक रीतें इत्यादि। सामाजिक विरासत में शामिल हुई हर चीज़ संस्कृति कहलाती है।

प्रश्न 2.
क्या संस्कृति अमूर्त है ?
उत्तर-
संस्कृति मूर्त भी होती है व अमूर्त भी। इसमें जब हम भौतिक तत्त्वों जैसे कुर्सी, मकान, स्कूटर आदि के बारे में बात करते हैं अर्थात् ये सब वस्तुएं अमूर्त हैं। इसी कारण यह संस्कृति को मूर्त बताते हैं। परन्तु जब हम विश्वास, रीति-रिवाजों आदि की बात करते हैं तो ये सब वस्तुएं अमूर्त होती हैं। भाव कि इन्हें हम देख नहीं सकते। कहने का अर्थ यह है कि संस्कृति न केवल मूर्त है बल्कि अमूर्त भी है क्योंकि इसमें उपरोक्त दोनों तत्त्व पाए जाते है।

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प्रश्न 3.
संस्कृति की दो विशेषताएं।
उत्तर-
1. संस्कृति का संचार पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता है (Transmited from generation to generation)—व्यक्ति अपनी पिछली पीढ़ियों के लिए कुछ न कुछ कर सकता है। कोई भी वस्तु नए सिरे से आरम्भ नहीं होती। यह संचार की प्रक्रिया होती है।

2. संस्कृति सामाजिक है (Culture is social) संस्कृति व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक है क्योंकि समाज के अधिक संख्या वाले व्यक्ति उसको अपनाते हैं। सर्व व्यापक संस्कृति का अपनाया जाना ही इसका एक ज़रूरी तत्त्व है।

प्रश्न 4.
संस्कृति कैसे सामाजिक मानी जा सकती है ?
उत्तर-
संस्कृति व्यक्तिगत न होकर सामाजिक होती है। इसको समाज में बहु-गणना के द्वारा स्वीकारा जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी भौतिक या अभौतिक तत्त्व को समूह के दो या चार व्यक्ति ही अपनाएं तो यह तत्त्व संस्कृति नहीं कहे जा सकते। – परन्तु यदि इन तत्त्वों को समूह के सारे ही सदस्य स्वीकार कर लेते हैं तो यह संस्कृति बन जाती है। इसी कारण इसको सामाजिक कहा जाता है।

प्रश्न 5.
‘सांस्कृतिक पिछड़ापन’।
अथवा
सांस्कृतिक पश्चतता।
उत्तर-
अंग्रेजी के शब्द ‘lag’ का शाब्दिक अर्थ है to fall behind पीछे रह जाना। इसका अर्थ पीछे रह जाना या पिछड़ जाने से है। समाज में प्रत्येक वस्तु भिन्न-भिन्न भागों से मिल कर बनी होती है व समाज में पाए गए सभी भाग आपस में एक-दूसरे के साथ अन्तर्सम्बन्धी (Inter-related) भी होते हैं जब एक भाग में परिवर्तन आता है। डब्ल्यू० जी० ऑगबर्न (W. G. Ogburn) ने संस्कृति को दो भागों में बांटा-भौतिक संस्कृति व अभौतिक संस्कृति। इसके अनुसार एक हिस्से में पाया गया परिवर्तन दूसरे हिस्से को भी प्रभावित करता है। अर्थात् एक हिस्से में परिवर्तन तेज़ी से आता है व दूसरे में धीमी रफ्तार से। धीमी रफ़्तार से सम्बन्धित भाग कुछ देर पीछे रह जाता है परन्तु कुछ समय बीतने पर अपने आप परिवर्तन के अनुकूल बन जाता है। इनमें पाई गई यह दूरी सांस्कृतिक पिछड़ना कहलाती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 5 संस्कृति

प्रश्न 6.
संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है।
उत्तर-
समाज में जब व्यक्ति जन्म लेता है। वह जैविक मानव कहलाता है। परन्तु समाज में रह कर वह समाज के दूसरे व्यक्तियों से सम्पर्क स्थापित कर लेता है। इस सम्पर्क से उसकी बाकी समाज के मैम्बरों से अन्तक्रिया (Interaction) शुरू हो जाती है। इसके शुरू होने के बाद सीखने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। यह सीखने की प्रक्रिया व्यक्ति को मानवीय जीव से सांस्कृतिक जीव बना देती है। इस प्रकार संस्कृति सीखा गया व्यवहार होती है।

प्रश्न 7.
पर संस्कृति ग्रहण।
अथवा
सांस्कृतिक संक्रमण।
उत्तर-
पर संस्कृति ग्रहण एक ऐसी प्रक्रिया है जो अलग-अलग पृष्ठभूमियों तथा व्यक्तियों के लगातार सम्पर्क के कारण विकसित होती है। इस कारण मूल संस्कृति तथा दूसरी संस्कृति में परिवर्तन होती है। मैलिनोवस्की के अनूसार पर संस्कृति ग्रहण करने के दो कारण होते हैं। पहला तो वह कारण है जिनका विकास स्वाभाविक रूप में होता है तथा दूसरा जब अलग-अलग संस्कृतियां एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।

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बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
सभ्यता क्या होती है ? संस्कृति एवं सभ्यता में क्या अन्तर होता है ? .
उत्तर-
संस्कृति के दो भाग होते हैं-(1) भौतिक (2) अभौतिक। भौतिक वस्तुओं में वह सभी वस्तुएं आती हैं, जिन्हें हम स्पर्श कर सकते हैं, देख सकते हैं, जैसे-कुर्सी, मेज़, किताब, इमारत एवं कार, जहाज़ इत्यादि। अभौतिक वस्तुओं में वह वस्तुएं शामिल हैं जिन्हें हम न देख सकते हैं, न ही स्पर्श कर सकते हैं केवल महसूस कर सकते हैं जैसे-विचार, भावनाएं, व्यवहार करने के तरीके, धर्म, संस्कार, आदर्श, इत्यादि। भौतिक संस्कृति मूर्त (Concrete) होती है और अभौतिक संस्कृति अमूर्त होती है। इससे ही सभ्यता का अर्थ भी निकाला जाता है। जो भौतिक एवं उपयोगी वस्तुएं या हथियारों एवं संगठनों, जिनकी सहायता के साथ मनुष्य ने प्राकृतिक और अप्राकृतिक वातावरण के ऊपर विजय प्राप्त की और उस पर नियन्त्रण किया है, को सभ्यता कहते हैं। ये सभी वस्तुएं हमारी सभ्यता का ही भाग हैं। सभ्यता को वास्तव में संस्कृति का विकसित रूप ही कहा जाता है। संस्कृति में वह सब कुछ शामिल होता है, जो व्यक्ति ने आरम्भ से लेकर अब तक प्राप्त किया, पर सभ्यता वह है जिससे मनुष्य आधुनिक बना। सभ्यता का सही अर्थ जानने के लिये यह आवश्यक है कि हम प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों की सभ्यता के बारे में दी गई परिभाषाएं जान लें। समाज के अनुसार, “सभ्यता संस्कृति का विकसित एवं जटिल रूप है और यह एक तुलनात्मक शब्द है।”

1. वैबर (Weber) के अनुसार, “सभ्यता में उपयोगी भौतिक पदार्थ और उसका निर्माण करने और प्रयोग करने वाली विधियां शामिल होती हैं।”

2. फिचटर (Fichter) के अनुसार, “सभ्यता को Civilized या सभ्य व्यक्तियों के साथ जोड़ा गया है। उनके अनुसार सभ्य व्यक्ति वह लोग हैं, जो अपने विचारों में स्थिर, पढ़े-लिखे एवं जटिल होते हैं।”

3. ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार, “परजीवी संस्कृति के पश्चात् की अवस्था के रूप में सभ्यता की परिभाषा दी जा सकती है।”
इन परिभाषाओं से पता चलता है ऑगबर्न एवं निमकौफ के अनुसार, “सभ्यता संस्कृति का सुधरा हुआ रूप और बाद की अवस्था है।”

4. ग्रीन (Green) के अनुसार, “एक संस्कृति सभ्यता तब बनती है जब उसके पास एक लिखित भाषा, विज्ञान, दर्शन, बहुत अधिक विशेषीकरण वाला श्रम विभाजन, एक जटिल, तकनीकी एवं राजनीतिक पद्धति हो।”

5. गिलिन एवं गिलिन (Gillen and Gillen) के अनुसार, “संस्कृति के अधिक विकसित एवं जटिल रूप को ही सभ्यता कहा जाता है।”

6. मैकाइवर (MacIver) के अनुसार, “सभ्यता आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन है। मैकाइवर कहता है कि सभ्यता भौतिक संस्कृति होती है और इसमें वे सब वस्तुएं आती हैं जो उपयोगी हों। इसी प्रकार पुनः मैकाइवर के अनुसार, “सभ्यता का अर्थ उपयोगी वस्तुएं जीवन की स्थितियों को नियन्त्रित करने के लिये मानव के द्वारा योजित सभी संगठन एवं पत्रकर्ता है।”

इस तरह इन परिभाषाओं को देखने के पश्चात् हम कह सकते हैं कि संस्कृति का सुधरा हुआ रूप ही सभ्यता है तथा समाजशास्त्रियों ने सभ्यता को संस्कृति से उच्च स्तर का माना है। परन्तु यहां पर आकर एक मुश्किल खड़ी हो जाती है और वह मुश्किल है कि समाजशास्त्री ‘मैकाइवर और पेज’ इस बात से सहमत नहीं कि केवल भौतिक वस्तुएं ही सभ्यता का भाग हैं। उनके अनुसार भौतिक, धार्मिक, विचारों, भावनाओं, आदर्शों इत्यादि की उन्नति व तरक्की भी संस्कृति का भाग बननी चाहिए।

मैकाइवर व पेज के अनुसार मानव द्वारा बनाई गई सभी वस्तुएं जैसे-मोटर कार, बैंक, पैसा, नोट, इमारतें इत्यादि सभी सभ्यता का भाग हैं। परन्तु यह सब वस्तुएं समाज के बीच रहते हुए, सामाजिक अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए विकसित हुईं। इसके लिये मनुष्य के भौतिक पक्ष के अतिरिक्त सामाजिक पक्ष को भी इसमें शामिल करना चाहिये। इसलिये संस्कृति में धर्म, कला, दर्शन, साहित्य, भावनाएं आदि वस्तुओं को शामिल करना चाहिये। इस तरह उनके अनुसार मानव निर्मित भौतिक वस्तुएं सभ्यता ही हैं और मानव निर्मित अभौतिक वस्तुएं संस्कृति ही है। यहां आकर हमें संस्कृति एवं सभ्यता में कई प्रकार के अंतरों का पता चलता है जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

1. सभ्यता उन्नति करती है पर संस्कृति नहीं (Civilization always develops But not the Culture) यदि हम अपने पुराने समय और आजकल के आधुनिक समय की तुलना करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सभ्यता तो उन्नति करती है परन्तु संस्कृति नहीं करती। क्योंकि मशीनें, कारें, मोटरें या आप कह सकते हैं कि भौतिक वस्तुओं में तो समय-समय पर उन्नति आई है, परन्तु धर्म, कला, विचारों आदि के बारे में आप ऐसा नहीं कह सकते जो अभौतिक संस्कृति का ही भाग है। क्या आजकल के लोगों के विचार, धार्मिक भावनाएं आदि पहले समय के लोगों से अधिक ऊंचे एवं उन्नत हैं ? शायद नहीं। इस तरह हम कह सकते हैं कि सभ्यता उन्नति करती है, संस्कृति नहीं।

2. सभ्यता को बिना परिवर्तन के ग्रहण किया जा सकता है, परन्तु संस्कृति को नहीं (Civilization can be taken without change but not Culture)—यह बात बिल्कुल नहीं कि सभ्यता को बिना परिवर्तन के ग्रहण किया जा सकता है परन्तु संस्कृति को नहीं। किसी भी मशीन, ट्रेक्टर, मोटर कार इत्यादि को बिना परिवर्तन के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित किया जा सकता है कि नहीं, यही वस्तुओं, विचार, आदर्शों इत्यादि में भी हो सकता है। शायद नहीं। विचारों, धर्म, आदर्शों इत्यादि को बिना परिवर्तन आदि के ग्रहण नहीं किया जा सकता। क्योंकि विचार धर्म, आदर्श, जैसे-जैसे अगली पीढ़ी को सौंप दिये जाते हैं, उनमें परिवर्तन आना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिये अरब देशों के मुसलमानों में और भारतीय मुसलमानों में काफ़ी अन्तर है। इस तरह भारतीय इसाइयों एवं यूरोपीय इसाइयों में काफ़ी अन्तर है।

3. संस्कति आन्तरिक होती है पर सभ्यता बाहरी है (Culture is Internal but Civilization is External)-सभ्यता में बाहर की बहुत-सी वस्तुएं शामिल हैं। इसलिये यह मूर्त (Concrete) है। संस्कृति के बीच व्यक्ति के अन्दर की वस्तुएं जैसे-विचार, भावना, धर्म, आदर्श, व्यवहार के तरीके आदि शामिल हैं। इसलिये यह बाहरी है और अमूर्त (Abstract) है। सभ्यता संस्कृति को प्रकट करती है।

4. सभ्यता को मापा जा सकता है पर संस्कृति को नहीं (Civilization can be measured But not Culture)-सभ्यता को मापा जा सकता है पर संस्कृति को नहीं। सभ्यता के बीच आने वाली सभी वस्तुएं उपयोग होने वाली होती हैं और इनको निश्चित मापदण्डों में रखकर मापा जा सकता है। पर संस्कृति में आने वाली वस्तुएं जैसे-आदर्शों, धर्म, व्यवहार के तरीके, भावनाएं इत्यादि को कौन-से मापदण्डों में रखकर मापेंगे। ये तो बनाये ही नहीं जा सकते। इस तरह हम कह सकते हैं कि सभ्यता को मापा जा सकता है पर संस्कृति को नहीं।

5. सभ्यता बिना कोशिशों से संचारित हो सकती है पर संस्कृति नहीं (Civilization can be passed without efforts but not Culture)-सभ्यता में वह सभी वस्तुएं आती हैं जिनका व्यक्तियों द्वारा उपयोग होता है। क्योंकि इनका सम्बन्ध व्यक्ति के बाहरी जीवन के साथ होता है इसलिये इनको अगली पीढ़ी या किसी और देश को देने के लिये किसी कोशिश की आवश्यकता नहीं पड़ती। पर संस्कृति इसके विपरीत है। संस्कृति का सम्बन्ध उन सभी वस्तुओं से है, जो हमारे अन्दर हैं, जिनको कोई देख नहीं सकता। इनको एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक न पहुंचाया जाए तो यह उस व्यक्ति तक ही समाप्त हो जाएंगी। इसलिये इनको एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाने के लिये किसी विशेष प्रयत्न की आवश्यकता होती है। सभ्यता बिना किसी कोशिश के अपनाई जा सकती है परन्तु संस्कृति को इस तरह अपनाया नहीं जा सकता।

6. सभ्यता बिना हानि के ग्रहण की जा सकती है परन्तु संस्कृति नहीं (Civilization borrowed without change But not Culture)-सभ्यता के कारण ही संचार के साधन विकसित हुए हैं जिसके कारण सभ्यता के सभी साधन संसार में फैल जाते हैं। कितने टी०वी०, रेडियो, किसी एक देश के अधिकार में नहीं हैं। प्रत्येक देश तकनीकी अनुसंधान कर रहा है और प्रत्येक देश इन अनुसंधानों का आपस में आदान-प्रदान कर रहे हैं। सभ्यता को अपनी परिस्थिति के अनुसार थोड़ा-बहुत बदला जा सकता है परन्तु संस्कृति का पूरी तरह त्याग नहीं कर सकते। इस तरह सभ्यता का विस्तार आसानी से, जल्दी और अच्छे बुरे की चिन्ता के बिना होता है परन्तु संस्कृति में परिवर्तन संकोच के साथ होता है।

यद्यपि उपरोक्त संस्कृति एवं सभ्यता में परिवर्तन बताया गया है परन्तु फिर भी दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकते। सभ्यता की कई वस्तुएं संस्कृति की तरफ से प्रभावित होती हैं। सभ्यता की कई वस्तुएं संस्कृति का स्वरूप धारण कर लेती हैं। संस्कृति का उत्पादन किसी-न-किसी तकनीकी प्रक्रिया के ऊपर निर्भर करता है। संक्षेप में सभ्यता समाज की चालक शक्ति है और संस्कृति समाज को दिशा दिखाती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 5 संस्कृति

संस्कृति PSEB 11th Class Sociology Notes

  • मनुष्य को जो वस्तु जानवरों से अलग करती है वह है संस्कृति जो मनुष्यों के पास है परन्तु जानवरों के पास नहीं है। अगर मनुष्यों से संस्कृति छीन ली जाए तो वह भी जानवरों के समान ही हो जाएगा। इस प्रकार संस्कृति तथा समाज दोनों ही एक-दूसरे साथ गहरे रूप से अन्तर्सम्बन्धित हैं।
  • मनुष्य ने आदि काल से लेकर आज तक जो कुछ भी प्राप्त किया है वह उसकी संस्कृति है। संस्कृति एक सीखा हुआ व्यवहार है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित किया जाता है। व्यक्ति इसको केवल उस समय ही प्राप्त कर सकता है जब वह किसी समाज का सदस्य होता है।
  • संस्कृति के दो प्रकार होते हैं-भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति । भौतिक संस्कृति में वह सब कुछ शामिल है जिसे हम देख या स्पर्श कर सकते हैं जैसे कि कुर्सी, टेबल, कार, पैन, घर इत्यादि। अभौतिक संस्कृति में वह सब कुछ शामिल है जिसे हम देख या स्पर्श नहीं कर सकते जैसे कि हमारे विचार, नियम, परिमाप इत्यादि।
  • संस्कृति तथा परंपराएं एक दूसरे से गहरे रूप से संबंधित हैं। इस प्रकार सामाजिक परिमाप तथा कीमतें भी संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। अगर इन्हें संस्कृति में से निकाल दिया जाए तो शायद संस्कृति में कुछ भी नहीं बचेगा।
  • संस्कृति के दो भाग होते हैं-भौतिक तथा अभौतिक। इन दोनों भागों में परिवर्तन आते हैं परन्त भौतिक संस्कृति में परिवर्तन तेज़ी से आते हैं तथा अभौतिक संस्कृति में धीरे-धीरे। इस कारण दोनों भागों में अंतर उत्पन्न हो जाता है। भौतिक भाग आगे निकल जाता है तथा अभौतिक भाग पीछे रह जाता है। इस अंतर को सांस्कृतिक पिछड़ापन कहा जाता है।
  • संस्कृति में परिवर्तन आने का अर्थ है समाज के पैटर्न में परिवर्तन आना। यह परिवर्तन अंदरूनी तथा बाहरी कारकों के कारण आता है।
  • संस्कृति (Culture)-आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य ने जो कुछ भी प्राप्त किया है वह उसकी संस्कृति है।
  • भौतिक संस्कृति (Material Culture)-संस्कृति का वह भाग जिसे हम देख या स्पर्श कर सकते हैं।
  • अभौतिक संस्कृति (Non-Material Culture)—संस्कृति का वह भाग जिसे हम देख या स्पर्श नहीं कर सकते।
  • सांस्कृतिक पिछड़ापन (Cultural Lag)—संस्कृति के दोनों भागों में परिवर्तन आने से भौतिक संस्कृति आगे निकल जाती है तथा अभौतिक संस्कृति पीछे रह जाती है। दोनों के बीच उत्पन्न हुए अंतर को सांस्कृतिक पिछड़ापन कहते हैं।
  • परिमाप (Norms)-समाज में स्थापित व्यवहार करने के वह तरीके जिन्हें सभी लोग मानते हैं।
  • कीमतें (Values)—वह नियम जिन्हें मानने की सबसे आशा की जाती है।
  • सांस्कृतिक परिवर्तन (Cultural Change)—वह तरीका जिसमें समाज अपनी संस्कृति के पैटर्न बदल लेता है।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules.

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. बॉस्केट बाल कोर्ट की लम्बाई और चौड़ाई = 28 × 15 मीटर
  2. बॉस्केट बाल टीम के खिलाड़ी = 12 खिलाड़ी खेलते हैं, सात बदलवें
  3. कोर्ट के केन्द्रीय चर्क का अर्धव्यास = 1.80 मीटर सैं०मी०
  4. रेखाओं की चौड़ाई = 5 सैं० मी०
  5. बोर्ड की मोटाई = 3 सैं० मी०
  6. बोर्ड की ज़मीन से निचले भाग की ऊंचाई = 2.90 मीटर
  7. बोर्ड का आकार = 180 × 120 मीटर
  8. बाल का घेरा = 75 से 78 सै० मी०
  9. बाल का भार = 600 से 650 ग्राम
  10. बोर्ड के आयात का साइज़ = 49 × 45 ग्राम
  11. पोलों की दूरी = 2 मीटर
  12. खेल का समय = 40 मिनट के चार क्वाटर 10-2-10 (10) 10-2-10
  13. बास्केट बाल के अधिकारी = एक टेबल कमिश्नर, एक रैफरी, एक अम्पायर, एक चीफ रैफरी, एक टाइम कीपर, एक स्कोरर कम 24 सैकिण्ड आपरेटर
  14. फालतू समय की मियाद = 5 मिनट
  15. दो मध्य के बीच आराम = 10 मिनट।

बास्केट बाल खेल की संक्षेप रूपरेखा
(Brief outline of the Basket-Ball)

  1. बॉस्केट बाल का मैच दो टीमों के मध्य होता है। प्रत्येक टीम में पाँच-पाँच खिलाड़ी होते हैं। इसके अतिरिक्त सात अतिरिक्त खिलाड़ी होते हैं जिन्हें हम बदलवें खिलाड़ी (Substitutes) कहते हैं।
  2. प्रत्येक टीम चाहती है कि वह विरोधी टीम की बॉस्केट में गेंद डाल दे तथा विरोधी टीम को न ही गेंद मिले और न ही प्वाईंट।
  3. बॉस्केट बाल खेल का मैदान आयताकार होता है। मैदान की लम्बाई 28 मीटर तथा चौड़ाई 15 मीटर होती है।
  4. टीम के प्रत्येक खिलाड़ी की बनियान के सामने और पीछे नम्बर लगे होते हैं। एक टीम के दो खिलाड़ी एक ही नम्बर नहीं डाल सकते।
  5. जब तक मध्यान्तर (Interval) न हो या अधिकारी आज्ञा न दे कोई भी खिलाड़ी मैदान से बाहर नहीं जा सकता।
  6. खेल 10 – 2 – 10, 10, 10 – 2- 10 की चार अवधियों की होती है तथा दो अवधियों के पश्चात् 10 मिनट का विश्राम होता है।
  7. बॉस्केट बाल के खेल में खिलाड़ियों को जितनी बार चाहे बदला जा सकता है।
  8. जब कोई टीम 4 फ़ाऊल कर जाती है तो विरोधी टीम को 2 या 3 फ्री-थ्रोज़ हालात अनुसार दी जाती हैं।
  9. किसी टीम का एक खिलाड़ी यदि 5 फ़ाऊल कर दे तो उसे मैच में से बाहर निकाल दिया जाता है।
  10. खेल के मध्य किसी समय भी कोई खिलाड़ी बदला जा सकता है परन्तु शर्त यह है कि थ्रो उस टीम की हो।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
बॉस्केट बाल का संक्षिप्त परिचय दीजिए। रैस्ट्रिक्टेड एरिया से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
खेल-बॉस्केट बाल खेल दो टीमों के बीच खेला जाता है। प्रत्येक टीम में पांच-पांच खिलाड़ी होते हैं। प्रत्येक टीम का यह लक्ष्य होता है कि वह विरोधी टीम की बॉस्केट में गेंद फेंक दे, न विरोधी टीम के हाथ गेंद लगने दे और न ही अंक प्राप्त करने दे।

कोर्ट-बॉस्केट बाल कोर्ट 28 मीटर लम्बा और 15 मीटर चौड़ा होगा। यह आयताकार और ठोस धरातल वाला होगा। यदि खेल हाल कमरे में हो तो हाल की छत की ऊंचाई कम-से-कम 7 मीटर होनी चाहिए। सम्बन्धित अधिकारी दो मीटर की लम्बाई और दो मीटर चौड़ाई की सीमा के अन्दर परिवर्तन (यह परिवर्तन एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं) की आज्ञा दे सकता है। फिर भी फीबा (FIBA-International Amateur Basketball Federation) की बड़ी सरकारी प्रतियोगिताओं के लिए निर्णित लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार नई कोर्ट (Court) बनाई जाएगी। कोर्ट में पर्याप्त मात्रा में एक-सा प्रकाश रहना चाहिए।

सीमा-रेखाएं-कोर्ट की परिधि स्पष्ट रेखाओं द्वारा अंकित की जाएगी जो प्रत्येक स्थान से बाधाओं से कम-से-कम 2 मीटर की दूरी पर होगी। इन रेखाओं और दर्शकों के बीच दूरी कम-से-कम 3 मीटर की होगी।
केन्द्रीय वृत्त-कोर्ट के मध्य में एक वृत्त अंकित किया जाएगा। उसका अर्द्धव्यास 1.80 मीटर होगा। इसे केन्द्रीय वृत्त कहा जाता है।
केन्द्रीय रेखा-अन्त रेखाओं के समानान्तर केन्द्रीय रेखा खींची जाएगी जो कोर्ट को आगे वाली कोर्ट और पीछे वाली कोर्ट में विभक्त करेगी। यह रेखा 15 सम बाहर दोनों तरफ होगी।
BASKET-BALL GROUND
बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
तीन अंक मैदानी गोल-क्षेत्र-एक नई मार्किंग “तीन अंक मैदानी गोल क्षेत्र” की जाती है। यह दो सीमित चापें होती हैं जिनमें से प्रत्येक का बाहरी किनारों से अर्द्धव्यास 6.25 मीटर होता है। केन्द्र फर्श पर बिन्दु होता है, टोकरी के केन्द्र के ठीक लम्ब रूप होता है और किनारे वाली लकीरों पर समाप्त होती हुई पार्श्व रेखाओं के समानान्तर रहती है। केन्द्र अन्तिम लकीर के केन्द्रीय बिन्दु से 1.20 मीटर 0.225 मीटर + 0.10 मीटर + 1.525 मीटर होता है।
नोट-यह चाप केवल अर्द्ध वृत्त तक ही है और इसके पश्चात् पार्श्व रेखा के समानान्तर है (देखो चित्र)
फ्री-थो रेखाएं-प्रत्येक अन्त-रेखा के समानान्तर एक फ्री-थ्रो रेखा खींची जाएगी जो अन्त-रेखा के भीतर किनारे से 5.80 मीटर दूर होगी। इसकी लम्बाई 3.60 मीटर होगी तथा केन्द्र बिन्दु दोनों अन्त-रेखाओं के मध्य बिन्दुओं को जोड़ने वाली रेखा पर होगा।

प्रतिबद्ध क्षेत्र (रिस्ट्रिकटेड एरिया) तथा फ्री-थो रेखाएं-ये स्थान जिन पर परिधि अन्त-रेखाओं, फ्री-थ्रो रेखाओं से निकलने वाली रेखाओं से निर्धारित होती है, उन्हें प्रतिबद्ध क्षेत्र कहते हैं। सिरों की ओर फ्री-थ्रो रेखाएं इसके अर्द्धव्यास को अंकित करती हैं। इन रेखाओं का बाहरी किनारा अन्त-रेखाओं के मध्य बिन्दु से 3 मीटर होगा औरफ्री-थ्रो रेखाओं के सिरों पर आकर समाप्त हो जाएगा।
RESTRUCT AREA
REGULATION FREE THROW LANE
बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2
फ्री-थ्रो रेखाएं वे प्रतिबद्ध स्थान हैं जो कोर्ट में 1.80 मीटर के अर्द्धव्यास वाले अर्द्ध-वृत्त में फैले होते हैं।
पहली रेखा सिरे वाली रेखा के भीतरी किनारे में 1.75 मीटर है। पहली गली के स्थान से आगे एक उदासीन क्षेत्र (Neutral Zone) होगा जिसकी चौड़ाई 30 सैंटीमीटर होगी। दूसरी गली का स्थान 85 सैंटीमीटर चौड़ा होगा और उदासीन क्षेत्र के साथ लगता होगा। तीसरी गली का स्थान दूसरी गली के साथ लगता है और इसकी चौड़ाई 85 सैंटीमीटर होगी। जहां तक टूटे हुए अर्द्ध वृत्त का सम्बन्ध है, प्रत्येक अंकित क्षेत्र की लम्बाई 35 सैंटीमीटर होगी और दोनों भागों के बीच की दूरी 40 सम होगी।

पिछले बोर्ड का आकार, पदार्थ और स्थिति (Back Board-Size, Material and Position)-पीछे वाले बोर्ड कठोर लकड़ी के बनाए जाएंगे या फाइबर ग्लास के भी हो सकते हैं जिनकी मोटाई 3 सम होगी। ये टेढ़े रुख 1.80 मीटर तथा खड़े रुख में 1.20 मीटर होंगे। यहां रिंग लगता है, उसके पीछे बोर्ड पर 59 सैंटीमीटर x 45 सैंटीमीटर की आयत बनाई जाती है। किनारा रिंग की सतह के बराबर होगा। बोर्ड की सीमाएं 5 सैंटीमीटर चौड़ी रेखाओं द्वारा अंकित की जाएंगी।
यह बोर्ड के रंग के उलट वाले रंग की होगी। बोर्ड का निचला किनारा ज़मीन से 2.75 मीटर ऊंचा होगा। पीछे बोर्ड के आधार स्तम्भ सीमा के बाहरी क्षेत्र में अन्त-रेखाओं के बाह्य किनारे से कम-से-कम 1.00 मीटर दूर गाड़े जाएंगे।

बॉस्केट-बॉस्केट छल्लों और जाली की बनी होती है। बॉस्केट नारंगी रंग वाले अन्दर से 45 सैंटीमीटर व्यास के लोहे के घेरे होते हैं। घेरे की धातु 20 मिलीमीटर मोटी होगी। जाल सफ़ेद रस्सी का बना होता है जोकि छल्लों से लटकता है। यह छल्ले इस प्रकार के बने होते हैं कि जब गेंद इनसे गुजरती है, वह इसे थोड़ी देर के लिए रोक लेते हैं।
बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 3
गेंद-गेंद गोलाकार होगी। यह चमड़े की बनी होगी और इसके अन्दर का ब्लैडर रबड़ का होगा। इसकी परिधि 75 सम से 78 सम होगी। इसका भार 600 ग्राम से 650 ग्राम होगा।
अब नियम यह आज्ञा देता है कि प्रयुक्त गेंद भी प्रयोग की जा सकती है। फिर भी गेंद के विषय रैफरी ने सहमति प्रकट की हो। रैफरी प्रयुक्त गेंद चुन सकता है। जब गेंद एक बार चुन ली गई हो तो कोई भी टीम खेल की गेंद का प्रयोग नहीं करती। यदि उचित पुरानी गेंद न मिल सकती हो तो नई गेंद प्रयुक्त की जा सकती है।

बॉस्केट बॉल का इतिहास (History of Basket Ball)
बॉस्केट बॉल एक उत्तेजना पूर्ण खेल है तथा इसका मूल स्थान अमेरिका है। इसका आविष्कार “अन्तर्राष्ट्रीय YMCA” के शिक्षक डॉ० स्मिथ (Dr. Smith) ने सन् 1891 में स्प्रिंगफील्ड मैसाशसटस (Spring filed Massa Chussets U.S.A.) में किया था। इसके नियम बाद में संशोधित (Revised) किए गए, जिनके अन्तर्गत ‘गोल’ (Goals) को कोर्ट (Court) के ठीक बाहर रखा गया, शारीरिक सम्पर्क (Body Contact) को स्वीकृति नहीं दी गई तथा गेंद के साथ-साथ दौड़ने को ‘फाऊल’ (Foul) घोषित कर दिया गया। अनुभवहीन खिलाड़ियों को खेल में शामिल करने के प्रयोजन से खेल को अधिक सरल बनाया गया। डॉ० स्मिथ ने खेल क्षेत्र के दोनों ओर दो बाक्स (Reach Baskets) दोनों ओर एक-एक, एक निश्चित ऊंचाई पर टांग दिए तथा खिलाड़ियों को स्कोर के लिए गेंद उन बाक्सों में फेंकनी पड़ती थी।

अब गेंद के बाक्स से वापस आने की समस्या थी इसलिए ‘बाक्स’ के स्थान पर आज की तरह के ‘गोल’ प्रयोग किए गए। इस प्रकार यह खेल अमेरिका में शुरू हुआ तथा इसके नियमों को सन् 1934 में मानक (Standardized) रूप दिया गया।
बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 4

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
बॉस्केट बाल खेल में तकनीकी उपकरण (सामान) क्या-क्या होते हैं ?
उत्तर-
तकनीकी उपकरण (सामान)
(क) (1) खेल की घड़ी (गेम-वाच)
(2) टाइम-आऊट के लिए घड़ी (टाइम-आऊट वाच)-एक
(3) स्टाप घड़ियां (स्टाप वाचिज़)

  1. टाइम कीपर के पास कम-से-कम दो घड़ियां होनी चाहिएं और खेल घड़ी मेज़ पर रखी जाएगी।
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  2. स्कोर-शीट
  3. कम-से-कम 20 सम × 10 सम आकार के एक से पांच तक अंक-एक से चार तक के काले रंग के अंक तथा पांच के लिए लाल रंग के अंक।
  4. 24 सैकिंड नियम के प्रबन्ध के लिए एक योग्य यन्त्र जिसको खिलाड़ी और दर्शक देख सकें।
  5. सब को दिखाई देने वाला एक खेल अंक बोर्ड स्कोर बोर्ड होगा जिस पर दोनों टीमों के खेल अंक लिखे जाएंगे।
  6. स्कोरर के पास दो लाल झण्डे दोनों टीमों के फाऊल मार्कर के हाथ में होंगे। इसे आठ फाऊल एक अवधि में होने की अवस्था में इस टीम की तरफ लिया जाएगा तथा खिलाड़ियों, कोच साहिब और खेल अधिकारियों को दिखाई दे सकेगा।

टीमें-प्रत्येक टीम में दस खिलाड़ी होंगे और सात खिलाड़ी प्रतिस्थापन के लिए होते हैं। प्रत्येक खिलाड़ी की कमीज़ के सामने और पिछली ओर कमीज़ के रंग से अलग नम्बर लगे होते हैं। यह नम्बर 4 से 15 तक होते हैं।
एक टीम के सभी खिलाड़ी ऐसी कमीजें पहनेंगे जिनका रंग आगे और पीछे की ओर एक जैसा होगा।
खिलाड़ी द्वारा कोर्ट छोड़ना-जब तक मध्यान्तर (Interval) न हो जाए अथवा नियम स्वीकृति न दे कोई भी खिलाड़ी बिना अधिकारियों की आज्ञा के कोर्ट छोड़ कर बाहर नहीं जा सकता।
कप्तान-इसके अधिकार और कर्त्तव्य-केवल कप्तान की सूचना लेने के लिए या किसी तरह की व्याख्या के लिए अधिकारी से बातचीत कर सकता है। खिलाड़ी बदलने का अधिकार कोच या कोच के स्थान पर काम कर रहे अधिकारी का होता है। _खेल की अवधि-खेल 10-2-10-10-2-10 मिनट की चार अवधियों में खेला जाएगा। इन दोनों अवधियों में 10 मिनट का अवकाश होगा।

खेल का आरम्भ-खेल का आरम्भ रैफरी द्वारा किया जाएगा। वह दोनों विरोधियों के बीच केन्द्र में गेंद को ऊपर उछालेगा। खेल उस समय तक आरम्भ नहीं होगा जब तक एक टीम पांच खिलाड़ियों सहित मैदान में खेलने के लिए प्रस्तुत न हो जाए। यदि खेल आरम्भ होने के समय तक कोई अनुपस्थित टीम मैदान में नहीं पहंचती तो उसकी विरोधी टीम को वॉक ओवर मिल जाता है, अर्थात् उसे बिना खेल के ही विजयी घोषित कर दिया जाता है।

प्रश्न
जम्प बाल और जम्प बाल के समय फाऊल बताएं।
उत्तर-
जम्प बाल-जम्प बाल के समय दो कूदने वाले अर्द्ध-वृत्त के अन्दर पांव रख कर अपनी-अपनी बॉस्केट के समीप खड़े होंगे तथा उनका एक पांव बीच में पड़ी रेखा के केन्द्र के पास होगा। उस समय कोई अधिकारी गेंद को इतनी ऊंचाई से ऊपर फैंकेगा कि उनमें से कोई खिलाड़ी उछल कर गेंद न पकड़ सके और गेंद उन दोनों के मध्य में गिरे। कोई खिलाड़ी गेंद को उस समय तक थपथपाने का यत्न नहीं करेगा जब तक उसने अधिकतम ऊंचाई प्राप्त न कर ली हो। कूदने वाला खिलाड़ी केवल दो बार ही गेंद को थपथपा सकता है।
जिस समय जम्प बाल (Jump Ball) में नियम तोड़ा जाता है इसके दण्ड-स्वरूप पार्श्व रेखा (Side line) पर से थ्रो-इन (Throw-in) दी जाती है। यह अपने विरोधियों के लिए केन्द्र बिन्दु होता है।

कोच (Coach)-खेल के आरम्भ होने के निश्चित समय से लगभग 20 मिनट पहले कोच (Coach) फलांकन कर्ता (Scorer) को उन खिलाड़ियों के नाम और गिनती जिन्होंने खेल में खेलना है, के अतिरिक्त कप्तान, कोच और सहायक कोच के नाम देगा। _ खेल के आरम्भ होने से स्कोर शीट (Score-Sheet) पर यह हस्ताक्षर करके खिलाड़ियों के नाम और गिनती से अपनी सहमति प्रकट करेंगे और उसी समय पांच खिलाडियों के नाम बताएंगे जिन्होंने खेल आरम्भ करना है।
ए (A) टीम का कोच यह जानकारी पहले देगा।
नोट-ऐसा न करने पर और जिससे खेल आरम्भ होने में देरी हो, कोच पर तकनीकी फाऊल (Technical Foul) का दोष लग सकता है और खेल दो फ्री-थ्रो (Free Throws) करने के पश्चात् आरम्भ होगा।
गोल-जब गेंद बास्केट में ऊपर से जाकर रुक जाए या निकल जाए तब गोल बन जाता है। रेखा के क्षेत्र से किए गए गोल के दो अंक तथा फ्री-थ्रो द्वारा किए गए गोल का एक अंक होता है।
बिन्दु रेखा से परे फील्ड गोल लगाने के लिए प्रयत्न करने के तीन अंक दिए जाएंगे।

आक्रमण के समय बाधा उत्पन्न करना-जिस समय गेंद बॉस्केट के समतल के ऊपर से नीचे की ओर आती है तो कोई खिलाड़ी अपने सीमित क्षेत्र में न तो गेंद को छु सकता है और न ही वह इसे पकड़ सकता है चाहे वह गोल बनाने की कोशिश में हो।
प्रतिरक्षा के समय गेंद में बाधा-जब विरोधी खिलाड़ी गोल करने के लिए गेंद फेंकता है तथा सारी गेंद बॉस्केट के घेरे की सतह के ऊपर हो, उस समय जैसे ही गेंद नीचे
आना शुरू करे, प्रतिरक्षा खिलाड़ी उसको छूने की बिल्कुल कोशिश नहीं करेगा। उल्लंघन होने पर गेंद मृत (Dead) हो जाती है। यदि फ्री-थ्रो के समय उल्लंघन हो तो फेंकने वाले के पक्ष में एक अंक यदि गोल की चेष्टा के समय हो तो फेंकने वाले के पक्ष में जोड़ दिए जाते हैं।
गोल के पश्चात् गेंद खेल में-गोल बनाने के 5 सैकिंड बाद विरोधी टीम का कोई खिलाड़ी, कोर्ट के अन्त में, परिधि से बाहर किसी भी बिन्दु से, जहां गोल बना था, गेंद खेल में डालेगा।

पिवटिंग
(Pivoting)
जब गेंद पकड़े हुए कोई खिलाड़ी एक ही पैर से एक बार या अधिक बार किसी दिशा में बढ़ता (घूमता) है तो इसे “पिवटिंग” (Pivoting) कहते हैं। खिलाड़ी के दूसरे पैर को जो ज़मीन के साथ सम्पर्क में रहता है-‘पिवट’ कहा जाता है।
बॉस्केट बॉल में पिवटिंग अग्रलिखित तीन प्रकार की होती है—
1. स्थित पिवट (Stationary Pivot)—इस पिवट में-

  1. एक खिलाड़ी दोनों पैरों को ज़मीन पर टिकाए हुए गेंद प्राप्त करता है।
  2. यह रिबाउण्ड (Rebound) लेता है।
  3. हवा में पास (Pass) देता है तथा दोनों पैरों को एक साथ ही भूमि पर टिकाते हुए वापस आता है। चाहे पैर एक-दूसरे के समान्तर हैं अथवा एक पैर दूसरे के सामने है। खिलाड़ी किसी भी पैर का प्रयोग करते हुए पिवट (रिवर्स अथवा रेयर पिवट) ले सकता है। यदि कोई खिलाड़ी ड्रिबलिंग (Dribbling) कर रहा है अर्थात् वह गतिशील है तो वह गेंद प्राप्त करके एक पैर को दूसरे पैर के सामने रखते हुए तथा सामने वाले पैर को किसी भी दिशा में गतिशील करते हुए स्ट्राइड स्टॉप (Stride Stop) में आ जाता है। इस पिवट का प्रयोग विपक्ष के खिलाड़ी से दूर जाने तथा अपने ही किसी साथी को खेल में लाने के लिए किया जाता है।

सामने या भीतरी पिवट
(Front or Inside Pivot)
इसकी तकनीक वही है जो रेयर पिवट (Rare Pivot) की है किन्तु इसमें अपने सामने के विपक्षी खिलाड़ी की तरफ टर्न (Turn) लिया जाता है अर्थात् गेंद पकड़े हुए खिलाड़ी एक पैर को आगे रख कर खड़ा होता है तथा दूरवर्ती पैर को विपक्षी खिलाड़ी के लगभग निकट रखते हुए अपने सामने के पैर पर पिवट लेता है।

आधिकारिक संकेत
(Official Signals)

  1. जब स्वतन्त्र थ्रो की संख्या का संकेत देता हो तो उंगलियों को अपने चेहरे की ऊंचाई पर रख कर कलाई से नीचे की ओर बार-बार गति दी जाती है।
  2. टाइम चार्ज (Charged Time Out) के लिए अधिकारी अपनी हथेली पर उंगलियों से T का चिह्न बनाता है।
  3. जम्प बॉल (Jump Ball) के संकेत के लिए अधिकारी अपने दोनों अंगूठे ऊपर करते हैं।
  4. त्रुटिपूर्ण ड्रिबल (Illegal dribble) के लिए वह Patting motion देता है।
  5. तीन सैकेण्ड के नियम (Three second rule) का उल्लंघन होने पर अधिकारी अपनी तीन उंगलियों (अंगूठा सहित) को साइड की तरफ करके संकेत करता है।
  6. किसी क्षेपण को निरस्त (Cancellation of a throw) करने के लिए अधिकारी अपने बाजुओं को अपने शरीर पर स्थानान्तरित करता है।
  7. स्टैपिंग (Stepping or travelling) के संकेत के लिए अधिकारी अपनी मुट्ठी घुमाता है।
  8. व्यक्तिगत फाऊल के लिए रैफरी बन्द मुट्ठी (Close fist) द्वारा संकेत करता है।
  9. व्यक्तिगत फाऊल की स्थिति में यदि कोई स्वतन्त्र क्षेपण न देता हो तो अधिकारी अपनी उंगली को साइड रेखा की तरफ कर देता है।
  10. किसी तकनीकी फाऊल का संकेत देने के लिए अधिकारी खुली हथेली से ‘T’ बनाता है तथा उसे दूसरी हथेली पर दिखाता है।
  11. दोहरे फाऊल के संकेत के लिए वह अपनी बन्द मुट्ठियों को अपने सिर के ऊपर हिलाता है।
  12. जानबूझ कर किए गए फाऊल के लिए रैफरी अपनी मुट्ठियों को बन्द रखते हुए अपनी कलाई को पकड़ कर संकेत करता है।
  13. धकेलने तथा चार्जिंग के संकेत के लिए रैफरी धकेलने जैसी नकल करता है।
  14. सीमाओं के उल्लंघन के लिए रैफरी हाथ हिला कर सीमा के बाहर संकेत करता है तत्पश्चात् उस टीम की बॉस्केट की तरफ संकेत करता है-जिसे “आऊट ऑफ़ बाऊण्ड-बॉल” दी गई है।
  15. टाइम आऊट के लिए अधिकारी सिर के ऊपर खुली हथेली से संकेत करता है।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
बॉस्केट बाल खेल के विभिन्न पासों के विषय में लिखें ।
उत्तर-
पास के प्रकार
(Types of Passes)
पासिंग (Passing)-बॉस्केट बॉल के खिलाड़ी को उन सभी प्रकार के पास (Passes) देने में निपुण होना चाहिए जिनका प्रयोग गेंद को अपने साथी को देने के लिए विपक्षी खिलाड़ी के ऊपर से, नीचे से अथवा उसके पास से फेंका जाता है।

पास देने के लिए आवश्यक बातें
(Some Essentials of Passing)
पास देने के लिए कुछ आवश्यक बातें निम्नलिखित हैं—

  1. पास देने से पहले सामने देखने की आदत बनाओ।
  2. पास प्राप्त करने वाले साथी की दूरी का अनुमान लगाना तथा साथ ही यह अनुमान भी लगाना कि कितने समय में गेंद उसके पास पहुंचेगी।
  3. पास करने से पहले विपक्षी खिलाड़ी की स्थिति का अनुमान लगाना। (4) “पास” सही तथा शीघ्र होना चाहिए।

दो हाथ का छाती वाला या पुश पास
(Two Handed Chest Pass or Push Pass)
बॉस्केट बॉल में यह सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाला पास है। कम या मध्यम दूरियों के लिए इस पास का प्रयोग होता है तथा इसमें कलाई द्वारा अतिरिक्त शक्ति लगाई जाती है। गेंद को छाती की ऊंचाई पर लाना चाहिए ताकि इसे सरलता से प्राप्त (Catch) किया जा सके। पास देने के लिए गेंद को छाती के सामने दोनों हाथों में पकड़ा जाता है, कोहनियां काफ़ी दूर होती हैं ताकि गति में अवरोध न हो। इस स्थिति में खिलाड़ी गेंद को पास, शूट या स्टार्ट (Pass, Shoot or Start) कर सकता है। भुजाओं को फैला कर तथा हथेली को पास की दिशा में घुमाकर गेंद को शक्ति के साथ आगे की ओर धकेलना चाहिए।

दो हाथ का बाउन्स पास (Two Handed Bounce Pass) यह पास भी लगभग “Chest Pass” की तरह ही है। इसमें गेंद को ठीक पहले की तरह ही फेंका जाता है किन्तु इसे ज़मीन की तरफ प्राप्तकर्ता खिलाड़ी के यथासम्भव निकट फेंकते हैं ताकि वह गेंद को घुटनों तथा कमर के बीच किसी ऊंचाई पर प्राप्त करके ले। “बाउन्स पास” का प्रयोग साधारणतया छोटी दूरियों के लिए किया जाता है। बाउन्स पास देने के लिए गेंद को अपनी छाती या कभर की ऊंचाई पर दोनों हाथों में पकड़े कोहनियों को सीधा करें तथा हथेली से शक्ति के साथ गेंद को ज़मीन की तरफ इस प्रकार फेंको कि विपक्षी के पास से होकर जैसे ही गेंद जमीन को छुए, वह उछल कर प्राप्तकर्ता के हाथ में गिरे।

दो हाथों का अण्डर हैण्ड पास
(Two Handed Under Hand Pass)
इसे शौवल पास (Shoval Pass) भी कहते हैं। यह तब प्रयोग किया जाता है जब खिलाड़ी (Passer) अपने साथी खिलाड़ी के निकट ही हो। गेंद शीघ्र देने के लिए यह एक छोटा पास है। यह पास देने के लिए कोहनियों को बाहर की तरफ़ मोड़ते हुए दाएं या बाएं तरफ से दोनों हाथों का प्रयोग करो। दाईं साइड के पास के लिए बायां तथा बाईं साइड के पास के लिए तुम्हें दायां पैर आगे धकेलना चाहिए।

बेस बॉल पास
(Base Ball Pass)
यह पास बहुत प्रभावशाली है। इसका प्रयोग गेंद को पिवट खिलाड़ी (Pivot Player) को देने अथवा लम्बा पास देने के लिए होता है। सुविधा के अनुसार दायां या बायां हाथ प्रयोग किया जा सकता है। पास को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए गेंद को अपने कन्धों के ऊपर तथा दाएं कान के निकट रखो। अब गेंद को पूरी शक्ति के साथ आगे फेंको। इस पूरी क्रिया में तुम्हारा दायां हाथ पीछे रहना चाहिए। इस पास में देखने की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गेंद को कलाई (न कि बाजुओं) की मदद से कितनी शक्ति से धकेला जाता है।

दो हाथों वाला साइड पास
(Two Handed Side Pass)
सिवाय हाथों की स्थिति के, यह पास “बेस बॉल पास” की तरह ही है। इसमें हाथों को गेंद के दोनों तरफ फैलाना चाहिए। इसे हुक के दाएं या बाएं किसी तरफ से भी खेला जा सकता है।
बैक पास
(Back Pass)
अपने असुरक्षित साथी (Unguarded) को गेंद देने के लिए यह सर्वोत्तम पास है। इसमें गेंद को पीछे से, कलाई से तथा उंगलियों की मदद से पास किया जाता है। क्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए कूल्हों (Hips) को थोड़ा हिलाया जा सकता है। किसी भी हाथ से यह पास प्रभावशाली ढंग से दिया जा सकता है।

एक हाथ का बाऊन्स पास
(One Handed Bounce Pass)
यह दाएं या बाएं हाथ से दिया जाता है। इसका प्रयोग दो स्थितियों में किया जाता है।

  1. जब “गार्ड” खिलाड़ी (Guard Player) पासर खिलाड़ी (Passer Player) को बहुत निकट से गार्ड कर रहा है।
  2. जब गतिशील प्राप्तकर्ता खिलाड़ी बहुत निकट से गार्ड किया जा रहा हो।

इस ‘पास’ की तकनीक स्थिति के साथ बदलती रहती है। पहली स्थिति में पास को प्रभावशाली बनाने के लिए इसे शीघ्रता से तथा अकस्मात् (Suddenness and Surprise) किया जाता है। इसकी साधारण विधि में इसे शुरू करके आवश्यकतानुसार किसी भी साइड में शीघ्रता से हट जाना होता है। ठीक उसी समय गार्ड खिलाड़ी से बचने के लिए बाजू को कदम की दिशा में बढ़ा कर गेंद प्राप्तकर्ता की तरफ आवश्यकतानुसार स्विग (Swing) के साथ उछाल दिया जाता है। दूसरे प्रकार का ‘एक हाथ वाला पास’ तब आवश्यक होता है जब दौड़ता हुआ प्राप्तकर्ता (Receiver) खिलाड़ी बहुत निकट से गार्ड हो रहा हो। इस स्थिति में ‘गार्ड’ द्वारा इसी प्रकार का सीधा पुश पास प्रयोग करना सम्भावित है। इस पास (Pass) को फेंकने के लिए गेंद को थोड़ा-सा कन्धों के ऊपर कानों के पास रखा जाता है। इसके बाद बाजू को आगे तथा नीचे की तरफ इस तरह फैलाया जाता है कि गेंद को सामने स्विंग किया जा सके परन्तु गेंद ‘गार्ड’ (जो प्राप्तकर्ता को कवर किए हैं) की पहुंच के बाहर होनी चाहिए।

फ्लिप पास
(Flip Pass) ‘फ्लिप पास’ का प्रयोग गेंद को निकट से ‘पास’ के लिए किया जाता है। यह आवश्यकतानुसार दोनों हाथों से या एक हाथ से किया जा सकता है। थोड़ी दूरी पर खड़े खिलाड़ी को गेंद फ्लिप करने के लिए झुकी हुई कलाई (Flexed Wrist) का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि यह एक छोटा ‘पास’ है गेंद को केवल कलाई द्वारा ही ‘फ्लिप’ किया जाता है ताकि गेंद को केवल इतना बल ही मिले कि प्राप्तकर्ता इसे सरलता से तथा निश्चित रूप से दबोच सके। क्योंकि दूरी कम होती है इसलिए प्रतिपक्षी खिलाड़ी इसे रोक नहीं सकता तथा प्राप्तकर्ता इसे सरलता से पकड़ लेता है।

एक हाथ का साइड पास
(One Handed Side Pass)
जब अधिक शुद्धता (Accuracy) तथा गति (Speed) की आवश्यकता न हो तो उस स्थिति में यह ‘पास’ प्रयोग किया जाता है। इस पास की तकनीक इस प्रकार है—
गेंद को अपने हाथों में पकड़ो, हाथों की उंगलियां अच्छी तरह फैली हुई हों ताकि पूरे गेंद को ढक सकें। अपने शरीर को थोड़ा-सा घुमाते हुए गेंद को दाएं कान के पास ले जाओ। कोहनियों को खोलते हुए तथा उसी समय बाएं पैर को आगे बढ़ाओ। कोहनी को नीचे की तरफ खोलते हुए दाएं हाथ से गेंद को आगे की ओर फेंको। विश्राम सहित (Relaxed) शरीर तथा कलाई द्वारा इसका पीछा करो। पास देते समय बाईं भुजा, दाईं भुजा की मदद करती है। परन्तु बाईं कोहनी छाती की ऊंचाई पर मुड़ी रहती है।

टिप अर्थात् वॉली पास
(Tip or Volley Pass)
किसी दिशा में भी एक कदम लेकर फ्रन्ट लाइन की स्थिति से यह पास दिया जा सकता है। गेंद पकड़ते समय एक हाथ गेंद के नीचे तथा दूसरा उसकी मदद करते हुए होता है। गेंद को उंगलियों के सिरों से या कलाई द्वारा फ्लिप करके थोड़ी दूर पर खड़े अपने साथी खिलाड़ी को लुढ़का दिया जाता है।

पासिंग क्रिया की आवश्यक बातें
(Some Hints on Passing Strategy)

  1. ‘पासर’ खिलाड़ी को प्राप्तकर्ता खिलाड़ी की स्थिति तथा उसके द्वारा की जाने वाली सम्भावित कार्यवाही का पूर्व अनुमान लगा लेना चाहिए।
  2. पास देते समय शीघ्रता नहीं करनी चाहिए विशेषकर जब उसका साथी विपक्षी खिलाड़ियों से घिरा हुआ हो।
  3. टीम का आफैन्स (Offence) मुख्य रूप से छोटे पासों (Short Passes) पर ‘निर्भर होता है।

बॉस्केटबाल में प्रयुक्त शब्दावली
पिछला कोर्ट-कोर्ट का आधा भाग जहां से आक्रामक टीम आती है। अन्य शब्दों में, वह अर्द्ध भाग है जिसमें कि बॉस्केट होती है जिसको उन्होंने बचाना होता है।
ब्लाईंड पास–एक दिशा में देखते हुए बाल को पृथक् दिशा का प्रयोग करते हुए दूसरी दिशा में पास देना।
स्पष्ट शॉट-यह शॉट जो बोर्डों या रिंग को बिना छुए सीधा बॉस्केट में जाता है।

क्षेत्र से क्षेत्र की प्रतिरक्षा (Zone to Zone defence) यह एक प्रकार की प्रतिरक्षा प्रणाली है जिसमें खिलाड़ी किसी क्षेत्र की केवल प्रतिरक्षा के ज़िम्मेदार होते हैं। इनका ध्यान केवल गेंद की तरफ होता है, प्रतिपक्षी खिलाड़ी की तरफ नहीं।
खिलाड़ी से खिलाड़ी की प्रतिरक्षा (Man to Man defence)-यह वह प्रतिरक्षा प्रणाली है जिसमें प्रत्येक खिलाड़ी की ज़िम्मेदारी किसी विशेष शत्रु खिलाड़ी से प्रतिरक्षा की होती है।
मिश्रित प्रतिरक्षा (Combined defence)—यह प्रतिरक्षा प्रणाली दोनों प्रणालियों ‘क्षेत्र से क्षेत्र’ तथा ‘खिलाड़ी से खिलाड़ी’ का मिश्रण है।
कट इन (Cut in)-किसी खिलाड़ी का दो या अधिक शत्रु खिलाड़ियों के मध्य से होकर गेंद प्राप्त करने के लिए किसी बॉस्केट की ओर तेज़ी से भागना ‘कट इन’ कहलाता है।

चार्जिंग (Charging)-किसी खिलाड़ी के साथ अनावश्यक शारीरिक सम्पर्क। किसी खिलाड़ी के बीच से निकलना तथा उससे बचने की कोशिश करना।
फाऊल आऊट (Fouled Out)-पांच फाऊलों के बाद खिलाड़ी को क्षेत्र से बाहर कर दिया जाता है। इसे फाऊल आऊट कहते हैं।
फ्रीज या हैल्ड गेंद (Freeze or Held ball)-गेंद को बजाय खेलने की कोशिश करने के उसे अपने पास ही रख लेना।
ओवर लोडिंग (Over Loading)-‘क्षेत्र से क्षेत्र प्रतिरक्षा’ के विरुद्ध विरोधी खिलाडियों की आक्रामक प्रणाली। इस हेतु एक ही तरफ अधिक आक्रामक खिलाड़ियों को खड़े करने की प्रणाली को ओवरलोडिंग कहा जाता है।
पोस्ट खिलाड़ी (Post Player)—स्वतन्त्र थ्रो के क्षेत्र में खड़े आक्रामक खिलाड़ी को पोस्ट खिलाड़ी कहते हैं।
स्क्रीन (Screen)-जब कोई खिलाड़ी अपने साथी की रक्षा के लिए उसके गार्ड के मार्ग में स्वयं को खड़ा कर लेता है।
खेल का निर्णय-खेल में अधिक अंक प्राप्त करने वाली टीम को विजयी घोषित किया जाएगा।

खेल का अधिकार छिन जाना—मध्यान्तर या टाइम-आऊट के पश्चात् यदि कोई टीम रैफरी के बुलाने के बाद एक मिनट के अन्दर खेल के लिए मैदान में नहीं उतरती तो गेंद खेल में लाई जाएगी और अनुपस्थित टीम खेल अधिकार खो देगी। यदि खेल के दौरान किसी टीम के खिलाड़ियों की संख्या दो से कम रह जाए तो खेल समाप्त हो जाएगा और टीम भी खेल अधिकार खो देगी।

स्कोर तथा अतिरिक्त समय—यदि दूसरे खेल अर्द्धक की समाप्ति तक दोनों टीमों के अंक बराबर हों तो पांच मिनटों की अधिक अवधि दी जाएगी और ऐसी अवधि जब तक खेल का फैसला न हो, दी जाएगी। अतिरिक्त समय में बॉस्केट के चुनाव के लिए टॉस होगा और उसके बाद प्रत्येक अतिरिक्त समय के लिए बॉस्केट बदल लिया जाएंगे।
टाइम-आऊट-मध्यान्तर तक प्रत्येक टीम को दो टाइम-आऊट मिल सकते हैं तथा अतिरिक्त समय में एक टाइम-आऊट मिल सकता है। किसी खिलाड़ी को चोट लगने की दशा में एक मिनट का टाइम-आऊट मिलता है। यदि इस बीच घायल खिलाड़ी ठीक नहीं होता तो उसकी जगह नया खिलाड़ी ले लिया जाता है।

खेल की समाप्ति-टाइम कीपर द्वारा खेल की समाप्ति की सूचना दिए जाने पर खेल समाप्त कर दिया जाएगा।
खिलाड़ी का बदलना-स्थानापन्न खिलाड़ी (Substitute Player) मैदान में उतरने से पहले स्कोरर के पास रिपोर्ट करेगा और तुरन्त खेलने के लिए प्रस्तुत रहेगा। अधिकारी का संकेत पाते ही मैदान में तुरन्त उतरेगा। स्थानापन्न को मैदान में उतरने के लिए 20 सैकिंड से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। यदि उसे अधिक समय लगता है तो टाइमआऊट माना जाएगा और विरोधी दल के विरुद्ध अंकित कर दिया जाएगा।

मृत गेंद (Dead Ball)—गेंद उस समय भी मृत होती है जब गेंद जो पहले ही गोल के लिए शॉट (Shot) के लिए उड़ान में होती है और खिलाड़ी के द्वारा उस समय के पश्चात् छुई जाती है जब बाधा या फाऊल समय पूरा हो चुका होता है या जब फाऊल बुलाया जा चुका होता है। (ऊपर की ओर उड़ान में जब गेंद को छुआ जाता है, बॉस्केट यदि असफल हो, नहीं गिनी जाती।)

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
बास्केट बाल खेल में तीन सैकिण्ड, पांच सैकिण्ड, आठ सैकिण्ड और चौबीस सैकिण्ड नियम क्या हैं ?
उत्तर-
तीन सैकिण्ड नियम-जब गेंद किसी टीम के अधिकार में हो तो उस टीम का कोई भी खिलाड़ी विरोधी टीम के प्रतिबद्ध क्षेत्र में तीन सैकिण्ड से अधिक नहीं रहेगा। पांच सैकिण्ड नियम-जब पास का कोई रक्षक खिलाड़ी गेंद को खेलने से रोकता है और वह पांच सैकिण्ड के अन्दर गेंद को खेल में डालने की कोई सामान्य कोशिश नहीं करता तो वह ब्लॉकिंग कहलाता है।
आठ सैकिण्ड नियम -जब किसी टीम को मैदान के पिछले भाग में गेंद प्राप्त हो जाता है तो उसे आठ सैकिण्ड के अन्दर गेंद को अगले भाग में डालना पड़ता है।
चौबीस सैकिण्ड नियम-नये नियम के अनुसार पार्श्व रेखा (Side line) पर आऊट ऑफ बाऊंड्ज़ (Out of bounds) से थ्रो-इन के पश्चात् एक नई चौबीस (26) सैकिण्ड की अवधि तब तक आरम्भ नहीं होती जब तक

  1. गेंद आऊट ऑफ बाऊंड्ज़ (Out of bounds) नहीं जाती है और उसी टीम के खिलाड़ी के द्वारा थ्रो-इन नहीं ली जाती।
  2. अधिकारी (Officials) ने किसी आहत को बचाने के लिए खेल को रोक (Suspend) कर दिया हो और आहत खिलाड़ी वाली टीम के खिलाड़ी ने थ्रो-इन (Throw-in) ली हो।

24 सैकिण्ड आप्रेटर (Operator) उस समय से घड़ी को रोके हुए समय से चलाये जब तक वह टीम थ्रो-इन (Throw-in) किये जाने के पश्चात् पुनः काबू पा लेती है।
फाऊल के बाद गेंद खेल में-जब गेंद किसी फाऊल के साथ खेल से बाहर हो जाए तो इस स्थिर गेंद को—

  1. बाहर से थ्रो करके, या
  2. किसी एक वृत्त में जम्प बाल द्वारा, या
  3. एक या अधिक फ्री-थ्रो द्वारा फिर खेल में लाया जाएगा।

थो-इन-जब किसी नियम का उल्लंघन हो जाए तो गेंद स्थिर समझी जाती है और विरोधी टीम को साइड-लाइन के समीपवर्ती बिन्दु से थ्रो-इन के लिए दी जाती है।।
अब नियम उस खिलाड़ी को आज्ञा देता है जिसने थ्रो-इन (Throw-in) करना है कि वह समाप्ति रेखा (End line) को छुए और यह नियम का उल्लंघन नहीं है।
फ्री-थो-जिस खिलाड़ी पर फाऊल किया गया हो वह फ्री-थ्रो लेता है परन्तु किसी तकनीकी फाऊल होने की दशा में कोई भी खिलाड़ी फ्री-थ्रो ले सकता है। जब फ्री-थ्रो ली जाती है, तो खिलाड़ियों की स्थिति इस प्रकार होती है—

  1. विरोधी टीम के दो खिलाड़ी बॉस्केट के समीप खड़े होंगे।
  2. अन्य खिलाड़ी भिन्न-भिन्न पोजीशन लेंगे।
  3. बाकी के खिलाड़ी कोई भी और पोजीशन ले सकते हैं परन्तु वे फ्री-थ्रो के समय बाधक नहीं बनने चाहिएं।

फ्री-थ्रो के उल्लंघन-फ्री-थ्रो करने वाले सैकिण्ड खिलाड़ी के अधिकार में गेंद देने के पश्चात्

  1. इन पांच सैकिण्ड के अन्दर गेंद को इस तरह फेंकेगा कि खिलाड़ी द्वारा छुए जाने से पहले गेंद बॉस्केट में चली जाए या घेरे का स्पर्श कर ले।
  2. गेंद के बॉस्केट की ओर जाते समय या अन्दर पहुंचने पर न तो वह और न ही कोई दूसरा खिलाड़ी गेंद या बॉस्केट को छुएगा।
  3. वह फ्री-थ्रो लाइन या उसके परे भूमि को छुएगा और न ही किसी टीम का कोई दूसरा खिलाड़ी फ्री-थ्रो लाइन को छुएगा या फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी को बाधा पहुंचाएगा।

खेल को प्रतिबन्धित करना (Game to be Forefeited)-नये नियम के अनुसार रैफरी को अब यह आवश्यक नहीं है कि वह गेंद को उस विधि से खेल में रखे जैसे कि दोनों टीमें फर्श पर खेलने के लिए और खेल को प्रतिबन्धित करने के लिए तैयार हों। अब रैफरी के खेल में बुलाने के पश्चात् यदि एक टीम खेलने से इन्कार कर देती है तो खेल प्रतिबन्धित हो जाता है।
गेंद का पिछली कोर्ट को वापिस जाना (Ball Return to Back Court)-नये नियम के अनुसार गेंद को टीम ए (A) को पिछली कोर्ट की ओर भेजा जाता है, शर्त यह है कि इसको टीम ए (A) का एक खिलाड़ी छूता है जबकि टीम ‘A’ सामने की कोर्ट में गेंद को नियन्त्रित रखती है। इसके अनुसार A, खिलाड़ी को छूना जबकि गेंद टीम ए के सामने की कोर्ट में टीम बी (B) के नियन्त्रण में है। यदि गेंद टीम ए (A) के सामने की कोर्ट में जाता है उसको ऐसा नहीं समझा जाता है कि पिछली कोर्ट में जाने दिया जाए।
इसके आगे केन्द्र (Mid-Point) से थ्रो-इन (Throw-in) के बीच अधिकारी (Official) यह निश्चित बताएगा कि खिलाड़ी बढ़ाई गई पार्श्व रेखा (Side-line) के दोनों ओर एक पैर रख कर पोजीशन स्थापित करता है।

आऊट आफ बाऊंड खेल पर नियम का उल्लंघन (Violation on out of bounds play)-यह नियम को तोड़ना नहीं है जबकि थ्रो-इन (Throw-in) दी गई है, खिलाड़ी गेंद को छोड़ते समय लकीर पर पांव रखता है।
दण्ड—

  1. फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी द्वारा उल्लंघन होने पर कोई अंक रिकार्ड न होगा। फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी के विपक्षी की गेंद फ्री-थ्रो लाइन के सामने दे दी जाएगी।
  2. फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी को टीम के अन्य खिलाड़ी द्वारा नियम का उल्लंघन होने पर भी अंक रिकार्ड होगा। यदि नियम (ख) का बन दोनों टीमों द्वारा होता है तो कोई अंक दर्ज नहीं होगा और फ्री-थ्रो लाइन पर जम्प बाल द्वारा खेल जारी किया जाएगा।
  3. यदि नियम (ग) का उल्लंघन फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी के साथी द्वारा होता है तथा फ्री-थ्रो सफल हो जाती है तो उल्लंघन की उपेक्षा करके गोल गिन लिया जाएगा और उसका दण्ड दिया जाएगा।
  4. यदि (ग) नियम का उल्लंघन फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी के विरोधियों से होता है तो फ्री-थ्रो सफल होने पर उल्लंघन की उपेक्षा करके गोल गिना जाएगा।
  5. यदि नियम (ग) का उल्लंघन दोनों टीमों द्वारा होता है और फ्री-थ्रो सफल हो जाती है तो उल्लंघन की उपेक्षा करके गोल गिना जाएगा। फ्री-थ्रो सफल न होने की दशा में फ्री-थ्रो लाइन पर जम्प बाल के साथ खेल पुनः जारी किया जाएगा।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
बॉस्केट बाल खेल में खिलाड़ी के तकनीकी फाऊल लिखें।
उत्तर-
खिलाड़ी द्वारा तकनीकी फाऊल-कोई भी खिलाड़ी अधिकारियों द्वारा दी गई चेतावनी की अवहेलना नहीं करेगा और न ही ऐसा व्यवहार करेगा जो एक खिलाड़ी को शोभा न दे, जैसे—

  1. अधिकारी को अपमानजनक ढंग से सम्बोधित करना या मिलना।
  2. असभ्य व्यवहार करना।
  3. विरोधी खिलाड़ी को तंग करना या उसकी आंखों के आगे हाथ करके उसे देखने में रुकावट डालना।
  4. खेल को अनुसूचित ढंग से विलम्बित करना।
  5. फाऊल का संकेत मिलने पर ठीक ढंग से बाजू न उठाना।
  6. स्कोरर या रैफरी को बिना सूचित किए अपना नम्बर बदलना।
  7. स्कोरर को सूचित किए बिना स्थानापन्न (Substitute) की तरह कोर्ट में प्रवेश करना।

दण्ड-प्रत्येक अपराध को एक फाऊल माना जाएगा और प्रत्येक फाऊल के लिए विरोधी को दो फ्री-थ्रो दी जाएंगी। इस नियम का बार-बार उल्लंघन किए जाने पर खिलाड़ी को अयोग्य घोषित करके खेल से निकाल दिया जाएगा।
कोच का स्थानापन्न (Substitute) द्वारा तकनीकी फाऊल-कोई कोच या स्थानापन्न बिना अधिकारी की आज्ञा के कोर्ट में दाखिल नहीं हो सकता, न ही कोर्ट के कार्यों को जानने के लिए अपना स्थान छोड़ सकता है और न ही किसी अधिकारी या विरोधी को अपमानजक ढंग से बुला सकता है।

दण्ड-कोच द्वारा इस नियम का उल्लंघन करने पर उसके नाम फाऊल दर्ज किया जाएगा। प्रत्येक अपराध के लिए एक फ्री-थ्रो दी जाएगी और बाल उसी टीम को केन्द्रीय रेखा पर थ्रो-इन करने के लिए मिलेगा। इस नियम के बार-बार उल्लंघन किए जाने पर कोच को क्षेत्र की सीमाओं से बाहर निकाला जा सकता है।
निजी फाऊल-निजी फाऊल उस खिलाड़ी का होता है तो विरोधी खिलाड़ी को ब्लॉक करता है, पकड़ता है, धक्का देता है तथा उस पर आक्रमण करता है।
दण्ड-यदि शूटिंग करते समय खिलाड़ी पर फाऊल देता है तो—

  1. यदि गोल हो जाता है तो उसकी गिनती की जाएगी और एक फ्री-थ्रो दी जाएगी।
  2. यदि गोल (2 अंक) असफल हो, दो फ्री-थ्रो (Free Throw) दिए जाएंगे।
  3. यदि गोल (Goal) के लिए शाट (Shot) असफल होता है तो तीन फ्री-थ्रो (Free Throws) दिये जाएंगे।

जानबूझ कर (साभिप्राय) फाऊल-यह वह शारीरिक फाऊल है जो किसी खिलाड़ी द्वारा जानबूझ कर दिया जाता है। जो खिलाड़ी बार-बार साभिप्राय फाऊल करता है उसे अयोग्य करार देकर खेल से निकाला जा सकता है।
दण्ड-अपराधी पर शारीरिक फाऊल का दोष लगाया जाएगा और दो फ्री-थ्रो दिए जाएंगे। यदि यह फाऊल ऐसे खिलाड़ी पर होता है तो गोल बनाता है तो यह गोल माना जाएगा और एक अतिरिक्त फ्री-थ्रो दी जाएगी।
डबल फाऊल-डबल फाऊल उस स्थिति में होता है जब दो खिलाड़ी एक-दूसरे के प्रति लगभग एक ही समय फाऊल करते हैं। डबल फाऊल होने पर निकटतम वृत्त से जम्प बाल द्वारा खेल पुनः शुरू करवा दी जाएगी।
बहुपक्षीय (Multiple) फाऊल-बहुपक्षीय फाऊल उस समय होता है जब एक टीम के दो या तीन खिलाड़ी एक ही विरोधी खिलाड़ी पर निजी फाऊल कर देते हैं।
इस स्थिति में प्रत्येक अपराधी खिलाड़ी पर एक फाऊल लगेगा और जिस खिलाड़ी के प्रति अपराध हुआ है उसे दो फ्री-थ्रो दी जाएगी। यदि फेंकने की प्रक्रिया में किसी खिलाड़ी के प्रति फाऊल हुआ है तो गोल बनने पर किया जाएगा और एक फ्री-थ्रो दी जाएगी।

पांच फाऊल-यदि कोई खिलाड़ी पांच फाऊल (निजी या तकनीकी) करता है तो उसे नियमानुसार बाहर निकाल देना चाहिए।
तीन और दो नियम (Three for two Rule)-जब खिलाड़ी गोल करने लगा हो तो उस पर विरोधी टीम का खिलाड़ी फाऊल कर दे और यदि गोल बन जाए तो एक और फ्री-थ्रो मिलेगा। गोल न होने की अवस्था में दोनों फ्री-थ्रो में से एक भी न होने पर अतिरिक्त फ्री-थ्रो मिलेगा।
चयन का अधिकार (Right of Option) केन्द्र बिन्दु (Mid Point) से थ्रो-इन के लिए चयन का अधिकार एक, दो और तीन थ्रो की दशा में लागू होता है। चयन करने से पहले कप्तान को कोच के साथ संक्षिप्त परामर्श करने की आज्ञा होती है।
टीम के द्वारा चार फाऊल (Four fouls by the Team)-जब टीम किसी अवधि में चार खिलाड़ियों का फ़ाऊल (निजी और तकनीकी) कर चुकती है, इस अवधि समय में सभी बाद के खिलाड़ियों को फाऊल होने पर दो फ्री-थ्रो मिलती है।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

PSEB 10th Class Physical Education Practical बॉस्केट बाल (Basket Ball)

प्रश्न 1.
बास्केट-बाल टीम में कितने खिलाड़ी होते हैं ?
उत्तर-
बास्केट-बाल टीम में 12 खिलाड़ी होते हैं जिनमें 5 खिलाड़ी खेलते हैं और 7 खिलाड़ी अतिरिक्त (Substitutes) होते हैं।

प्रश्न 2.
बास्केट-बाल का कोर्ट बनाओ और लम्बाई-चौड़ाई बताओ।
उत्तर-
बास्केट-बाल कोर्ट की लम्बाई 28 मीटर और चौड़ाई 15 मीटर होती है। इसकी लम्बाई 2 मीटर और चौड़ाई एक मीटर कम की जा सकती है।

प्रश्न 3.
बास्केट-बाल के खेल का कितना समय होता है ? बराबर की स्थिति में आप क्या करोगे ?
उत्तर-
बास्केट-बाल खेल का समय 10-2-10,-10-10-2-10 मिनट की चार अवधियों का होता है। बराबर की स्थिति में 5-2-5 मिनट दिए जाते हैं। यदि फिर भी बराबर रह जाए तो 5-5 मिनट दिए जाते हैं। परन्तु आराम का समय नहीं होता। 5 मिनट के पश्चात् केवल साइड ही बदलते हैं। उतनी देर तक 5-5 मिनट दिए जाएंगे जब तक फैसला नहीं होता।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 4.
बास्केट-बाल के खेल में हार-जीत का फैसला कैसे होता है ?
उत्तर-
बास्केट-बाल में हार-जीत का फैसला इस प्रकार होता है कि जो टीम अधिक प्वाईंट बना लेती है उसे विजयी घोषित किया जाता है।

प्रश्न 5.
बास्केट-बाल के खेल में कितने फाऊल होते हैं ?
उत्तर-
बास्केट-बाल में 5 फाऊल होते हैं; जैसे—

  1. निजी फाऊल (Personal Foul)
  2. तकनीकी फाऊल (Technical Foul)
  3. दोहरा फाऊल (Double Foul)
  4. बहुमुखी फाऊल (Multiple Foul)
  5. जानबूझ कर फाऊल (Attentional Foul)

प्रश्न 6.
खिलाड़ी को कितने फाऊलों के बाद टीम में से निकाला जाता है ?
उत्तर-
बास्केट-बाल के खेल में जब एक खिलाड़ी पांच फाऊल कर देता है तो उसको टीम से बाहर निकाल दिया जाता है।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 7.
बास्केट-बाल की खेल में टाइम आऊट कितने होते हैं ? उनका समय बताओ।
उत्तर-
बास्केट-बाल के खेल में दो टाइम आऊट आराम से पहले दोनों अवधियों में और दो बाद में लिए जाते हैं। टाइम आऊट का समय एक मिनट का होता है।

प्रश्न 8.
कितने खिलाड़ियों को बास्केट-बाल के खेल में बदला जा सकता है और कितना समय लिया जाता है ?
उत्तर-
बास्केट-बाल के खेल में किसी समय भी खिलाड़ी को बदला जा सकता है । शर्त यह है कि साइड थ्रो उनकी हो तथा समय 30 सैकिंड का होता है।

प्रश्न 9.
बास्केट-बाल के खेल में तकनीकी सामान का वर्णन करो।
उत्तर-
तकनीकी सामान (Technical Equipments)

  1. खेल की घड़ी (Game Watch)
  2. टाइम आऊट के लिए घड़ी (Time out watch)
  3. 24 सैकिण्ड रूल स्कोर शीट के लिए 24 सैकिण्ड आप्रेटर (24 Second Operator for Twenty four second Rule Score Sheet)

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 10.
बास्केट-बाल का भार कितना होता है और उसका घेरा बताओ।
उत्तर-
बास्केट-बाल का भार 600 से 650 ग्राम और घेरा 75 सैंटीमीटर से 78 सैंटीमीटर तक होता है।

प्रश्न 11.
बास्केट-बाल की ग्राऊंड में कितने चक्कर होते हैं और कितने चौड़े होते हैं ?
उत्तर-
बास्केट-बाल के खेल में तीन चक्कर होते हैं और चौड़ाई 1.80 मीटर होती है।

प्रश्न 12.
बास्केट-बाल की ग्राऊंड में पोल ग्राऊंड से कितनी दूरी पर बाहर होते
उत्तर-
बास्केट-बाल की ग्राऊंड में पोल ग्राऊंड से एक मीटर बाहर होते हैं।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 13.
बास्केट-बाल के खेल में स्कोर कैसे लिए जाते हैं ?
उत्तर-
बास्केट-बाल के खेल में यदि सीधी बास्केट हो तो 2 अंक होते हैं। Free Throw हो तो एक अंक माना जाता है। यदि सर्कल के बाहर से गोल हो तो तीन अंक मिलते हैं।

प्रश्न 14.
7 फाऊल रूल क्या है ?
उत्तर-
जो टीम 7 फाऊल कर देती है उसकी विरोध टीम को Free Throws दी जाती हैं।

प्रश्न 15.
आठ सैकिण्ड नियम किसे कहते हैं ?
उत्तर-
इसके आधार पर एक टीम को अपने कोर्ट में आठ सैकिण्ड के अन्दर बाल को दूसरे कोर्ट में देना पड़ता है। दूसरे कोर्ट में वह दूसरी बार बाल अपने कोर्ट में नहीं दे सकता।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 16.
तीन सैकिण्ड रूल किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जब कोई खिलाड़ी वर्जित क्षेत्र (Restricted Area) में तीन सैकिण्ड से अधिक ठहरता है तो उस समय रैफरी द्वारा विरोधी को थ्रो दी जाती है।

प्रश्न 17.
24 सैकिण्ड से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब एक टीम बाल को नियन्त्रित रखती है तो वह उस टीम को 24 सैकिण्ड के अन्दर गेंद स्कोर करने के लिए हाथ में से नहीं छोड़नी चाहिए। फिर दूसरी टीम को बाल दे दिया जाता है। यह अवसर कभी-कभी ही खेल में आता है।

प्रश्न 18.
बास्केट-बाल के खेल में अधिकारियों की संख्या बताओ।
उत्तर-
बास्केट-बाल के खेल में निम्नलिखित अधिकारी होते हैं—

  1. रैफ़री = 1
  2. अम्पायर = 1
  3. स्कोरर = 1
  4. टाइम कीपर = 1
  5. 24 सैकिण्ड = 1
  6. ओप्रेटर = 1
  7. इंडीकेटर = 1

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 19.
बास्केट-बाल की खेल में बनियान के नम्बर किससे आरम्भ होते हैं ?
उत्तर-
बास्केट-बाल की खेल में 4 से लेकर 15 तक बनियान के नम्बर लगाए जाते

प्रश्न 20.
बास्केट-बाल के रिंग की जाली की लम्बाई बताएं।
उत्तर-
बास्केट-बाल के रिंग की जाली की लम्बाई 40 सैंटीमीटर लम्बी होती है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

Punjab State Board PSEB 11th Class Agriculture Book Solutions Chapter 6 पशु पालन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Agriculture Chapter 6 पशु पालन

PSEB 11th Class Agriculture Guide पशु पालन Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
पंजाब में गौओं और भैंसों की संख्या बताओ।
उत्तर-
पंजाब में लगभग 17 लाख गायें तथा 50 लाख भैंसें हैं।

प्रश्न 2.
मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन कितने दूध की आवश्यकता होती
उत्तर-
मनुष्य को तन्दुरुस्त रहने के लिए प्रतिदिन 250 ग्राम दूध की ज़रूरत होती है।

प्रश्न 3.
दूध देने वाली उत्तम गाय की नस्ल का नाम बताएं।
उत्तर-
दूध देने वाली सबसे बढ़िया भारतीय नस्ल की गाय है साहीवाल।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

प्रश्न 4.
लाल सिन्धी गाय एक सूए में कितना दूध देती है ?
उत्तर-
यह एक प्रसूतिकाल में 1800 किलो दूध देती है।

प्रश्न 5.
गर्भवती गाय को प्रसूतन तिथि से कितने दिन पहले दूध से हटा लेना चाहिए ?
उत्तर-
गर्भवती गाय को प्रसूतन तिथि से लगभग 60 दिन पहले दूध से हटा लेना चाहिए।

प्रश्न 6.
400 किलो भार वाली गाय या भैंस को प्रतिदिन कितने चारे की आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
400 किलो भार वाली गाय या भैंस को 35 किलो हरे चारे की ज़रूरत होती है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

प्रश्न 7.
युवा गाय का 300 किलोग्राम भार कितने महीने बाद हो जाता है ?
उत्तर-
बछड़ी का 300 कि०ग्रा० भार 18 महीने की आयु में हो जाता है।

प्रश्न 8.
मुर्रा नस्ल की भैंस का एक सूए का दूध कितना होता है ?
उत्तर-
औसतन 1700-1800 किलोग्राम।

प्रश्न 9.
डेयरी फार्म के प्रशिक्षण के लिए कहां सम्पर्क करना चाहिए ?
उत्तर-
जिले के डिप्टी डायरैक्टर डेयरी विकास, कृषि विज्ञान केन्द्र या गडवासु, लुधियाना से।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

प्रश्न 10.
पंजाब में भैंसों की कौन-कौन सी नस्लें मिलती हैं ?
उत्तर-
मुर्रा तथा नीली रावी।

(ख) एक दो वाक्यों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
साहीवाल नस्ल की गाय का विस्तारपूर्वक वर्णन करो।
उत्तर –

गुण साहीवाल
मूल घर इसका घर ज़िला मिंटगुमरी (पाकिस्तान) है।
रंग तथा कद रंग भूरा लाल, चमड़ी ढीली, शरीर मध्यम से भारी, टांगें छोटी, झालर बड़ी, सींग छोटे तथा भारी, मुहाना बड़ा।
बैल बैल बड़े सुस्त तथा धीमे होते हैं।
एक सूए का औसत दूध 1800 किलो
दूध में चर्बी 5.5%

 

प्रश्न 2.
होलस्टीन फ्रीजीयन गाय के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर –

गुण होलस्टीयन फ्रीजीयन
मूल घर हालैंड, अब अन्य देशों में भी मिलती है
रंग काला-सफ़ेद अथवा लाल
शरीर यह सबसे भारी तथा सबसे अधिक दूध देने वाली नसल है। इसका शरीर लम्बा तथा मुहाना बड़ा होता है।
एक प्रसवकाल में दूध 5500-6500 किलो
दूध में चर्बी 3.5-4.0%

 

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

प्रश्न 3.
बढ़िया गाय का चुनाव कैसे किया जा सकता है ?
उत्तर-
बढ़िया गाय का चुनाव निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखकर किया जाता

  • एक साधारण संकर गाय को पहला गर्भ धारण 24-30 महीने की आयु में करना चाहिए।
  • पहली बार गर्भ धारण के समय भार 400 किलो होना चाहिए।
  • गाय प्रसूतन के पश्चात् 60-70 दिनों में दुबारा गर्भाधारन योग्य हो जाए।
  • 3000 किलो से अधिक दूध दे तथा सूखे का समय 60 दिन हो।
  • गाय के दो सूए में अन्तर 12-14 महीने होना चाहिए।
  • दूध में चिकनाहट की मात्रा 4.0% 4.5% होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
प्रसूतन के बाद गाय की सम्भाल कैसे की जाती है ?
उत्तर-
प्रसूतन के बाद उपरान्त गाय को एक बाल्टी गुनगुने पानी में 50 ग्राम नमक मिलाकर पिलाना चाहिए। इसे प्रतिदिन चार दिनों तक 2 किलोग्राम पिसी गेहूं तथा एक किलोग्राम गुड़ का दलिया पका कर दो बार दो। प्रसव के बाद गाय की 2 घण्टे के भीतर चुआई कर लेनी चाहिए। अधिक दूध देने वाली गाय की पहले 2-3 दिन पूरी तरह चुआई नहीं करनी चाहिए।

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प्रश्न 5.
गौओं के शैड का फर्श कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
पशुओं के खड़े होने के लिए 180-210 सेंटीमीटर (6-7 फुट) लम्बी जगह तथा चौड़ाई वाली तरफ 120 सेंटीमीटर (4 फुट) की आवश्यकता होती है। मल-मूत्र के सही निकास के लिए खुरली से नाली तक ढलान होनी चाहिए। नाली लगभग 1 फुट चौड़ी होनी चाहिए तथा हर पांच-छ: फुट दूरी पर एक इंच ढलान होनी चाहिए। फर्श ईंटों तथा सीमेन्ट का पक्का अच्छा रहता है। फर्श फिसलन वाला न हो इसलिए उस पर गहरी झर्रियां निकाल देनी चाहिएं। बिना छत वाली जगह पर फर्श पर ईंटें लगा देनी चाहिए।

प्रश्न 6.
वंड किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
वंड एक मिश्रण होता है। यह अनाज, तेल वाले बीजों की खल्ल तथा दूसरे कृषि औद्योगिक बाइप्राडक्टों को मिलाकर बनाया जाता है जिससे जानवरों को अनिवार्य ऊर्जा तथा प्रोटीन तत्त्वों की सन्तुलित खुराक मिल जाती है। साधारणतः दो तरह के बनाए जाते हैं। एक प्रकार में कम पाचन योग्य कच्चे प्रोटीन (13-15%) होते हैं तथा इसे फलीदार चारों जैसे बरसीम, लूसण तथा रवाह के साथ मिलाकर डाला जाता है। दूसरी किस्म के पाचन योग्य कच्चे प्रोटीन (16-18%) होते हैं तथा इसको गैर-फलीदार चारों जैसे कि हरी मक्की, बाजरा, चरी आदि से मिलाकर डाला जाता है।

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प्रश्न 7.
पशुओं के गोबर की सम्भाल कैसे करनी चाहिए ?
उत्तर-
गोबर प्रतिदिन निकाल कर शैड से दूर गड्ढे में फेंक देना चाहिए। गड्ढे का आकार 20 x 14 x 4 फुट होना चाहिए। इसे एक तरफ से भरना आरम्भ करें तथा भरी हुई जगह को मिट्टी से ढांप देना चाहिए, इस तरह गोबर की शक्ति नष्ट नहीं होती। पूरी तरह गली हुई रूढ़ी ही गड्ढे से निकालकर खेतों में डालनी चाहिए। ख़रीफ की फसल बोने के समय गर्मी कम होती है, इस तरह कूड़े के खाद के तत्त्व उड़ते नहीं।

प्रश्न 8.
दूध वाले बर्तनों की सफ़ाई कैसे की जाती है ?
उत्तर-
बर्तनों को 2-3 बार साफ़ ठण्डे पानी से धोना चाहिए। बर्तन की धातु अनुसार कपड़े धोने वाला सोडा सोडियम हैक्सामैटा फॉस्फेट, ट्राई सोडियम फॉस्फेट तथा सोडियम मैटासिलीकेट आदि प्रयोग करना चाहिए। सोडे को गुनगुने पानी में घोल कर बर्तन साफ़ करने चाहिए। बर्तन को 2-3 बार गुनगुने पानी से धोकर सोडा निकाल दो तथा फिर ठण्डे पानी से धोना चाहिए।

बर्तनों को गर्म पानी, भाप अथवा रसायन जैसे कैल्शियम तथा सोडियम हाइपोक्लोराइड आदि के प्रयोग से कीटाणु रहित करना चाहिए। रसायनों से साफ़ करके बर्तनों को अच्छी तरह साफ पानी से धोना चाहिए।

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प्रश्न 9.
कटड़ओं की संभाल के बारे में जानकारी दें।
उत्तर-
नवजात नाड़ 10 सें०मी० छोड़ कर कीटाणु रहित कैंची से काट देना चाहिए तथा कटङ्क को सूखे कपड़े से साफ़ करना चाहिए। हर रोज़ नाड़ को कीटाणु रहित करने के लिए टिंक्चर आयोडीन अथवा डिटोल 2-3 बार लगाओ जब तक यह सूख कर गिर न जाएं। बच्चे को जन्म से दो घण्टे के बीच दूध अवश्य पिलाएं। यदि कटड़ को किसी सहायता की जरूरत हो तो उसके मुंह में चूसने के लिए थन डाल दें। यदि माँ की प्रसव के पश्चात् मृत्यु हो जाए तो कटड़ को किसी अन्य गाय के दूध में 5 मिलीमीटर अरण्डी का तेल, पाँच मिलीमीटर मछली का तेल तथा एक अण्डा घोल कर 4 दिनों के लिए देना चाहिए। कटड़ओं को छोटी आयु में ही दाना तथा नर्म चारा खाने की आदत डाल देनी चाहिए, पर उन्हें ज़रूरत से अधिक नहीं खिलाना चाहिए। 15 दिन की आयु से कटड़ओं को बंड देनी आरम्भ कर दें। हरा चारा खाना शुरू कर देने पर बंड नहीं देनी चाहिए।

प्रश्न 10.
दूध दोहते समय कौन-से नुक्ते अपनाने चाहिए ?
उत्तर-

  • दूध की दुहाइ अलग-अलग कमरे में करनी चाहिए।
  • शांत तथा साफ-सुथरी जगह पर बर्तनों में दुहाइ करनी चाहिए।
  • दूध की दुहाइ से पहले थनों को डिटोल या लाल दवाई में भिगोकर कपड़े से साफ करना चाहिए।
  • दुहाइ पूरी मुट्ठी से करनी चाहिए तथा अंगूठा मोड़ कर दुहाइ नहीं करनी चाहिए।

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(ग) पांच-छ: वाक्यों में उत्तर दो –

प्रश्न 1.
दुधारु पशुओं की सम्भाल कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
पंजाब में जलवायु के अनुसार पशुओं के निवास का विशेष ध्यान रखना चाहिए। निवास ऐसा होना चाहिए, जिसमें चारा खाने के समय तथा दूध निकालते समय पशुओं को बांधा जा सके तथा बाकी समय के दौरान खुले रहें। इस तरह सारा समय बांधने तथा सारा समय खुले रखने के अवगुणों से पशुओं को बचाया जा सकता है। शैड का . दरवाजा पूर्व-पश्चिम की ओर होना चाहिए तथा खुरली उत्तर की ओर ठीक रहती है।

1. स्थान की ज़रूरत-बड़े जानवरों के लिए 12-14 वर्ग मीटर स्थान काफ़ी है। इसमें से 4.25 मीटर स्थान छत वाला होना चाहिए तथा 8.6 वर्ग मीटर स्थान खुला होना चाहिए।

2. फर्श-पशु के खड़े होने के लिए 180-210 सेंटीमीटर की लम्बाई तथा चौड़ाई 120 सेंटीमीटर काफ़ी होती है। फर्श ईंटों तथा सीमेन्ट का न फिसलने योग्य होना चाहिए। फर्श में इसलिए गहरी झर्रियां निकाल देनी चाहिएं।

3. मल-मूत्र के निकास की नाली-मल-मूत्र के निकास के लिए खुरली से नाली तक ढलान रखनी चाहिए। यह नाली अवश्य बनाई जानी चाहिए।

4. दीवारें-शैड के इर्द-गिर्द दीवारें बना देनी चाहिएं।

5. छत-निवास वाले स्थान पर ईंट-बालों की छत सस्ती तथा आरामदायक रहती है। छत 3.6 मीटर ऊंची होनी चाहिए तथा उसे लीप देना चाहिए। छत की मिट्टी के नीचे पॉलीथीन कागज़ बिछा देना चाहिए ताकि वर्षा के समय छत में से पानी न टपके, दीमक से बचाव के लिए बलियों को कीटनाशक के घोल में डुबो देना चाहिए तथा छिड़काव करते रहना चाहिए।

6. पानी की खुरली-यह बड़े जानवरों के लिए लगभग 75 सेंटीमीटर (2.5 फुट) ऊंची तथा छोटे जानवरों के लिए 45 सेंटीमीटर (1.5 फुट) ऊंची होनी चाहिए। इसकी चौड़ाई लगभग 1-1.25 मीटर तक होनी चाहिए तथा लम्बाई चारे वाली खुरली का दसवां हिस्सा होनी चाहिए।

7. चारे के आचार वाला खड्डा-इसे चारा काटने वाली मशीन के नज़दीक बनाएं।

8. गोबर की सम्भाल-गोबर की सम्भाल 20 x 14 x 4 फुट के गड्ढे में करें तथा भर जाने पर इसे मिट्टी से ढक दें। गलने पर यह रूढ़ी खाद का काम देगा।

9. शैड को कीटाणु रहित करना-पशुओं के रहने वाली शैड को कीटाणु रहित करने के लिए 4% फिनायल के घोल से धोएं तथा छिड़काव करें। 6 घण्टे बाद दीवारों, फर्श तथा सामान को जहां फिनायल का छिड़काव किया था, पानी से धो दें।

10. गर्मियों तथा सर्दियों में पशुओं की सम्भाल-शैड के गिर्द छाया के लिए वृक्ष लगाएं तथा 3-4 बार गर्मियों में पशुओं को नहलाएं। पंखे तथा कूलर भी लगाए जा सकते हैं। सर्दियों में पशुओं को छत के नीचे रखो तथा अधिक सर्दी के वक्त अधिक शक्ति वाला चारा दें।

प्रश्न 2.
दुधारु पशुओं को खुराक खिलाने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-

  • जानवर को उसकी आवश्यकतानुसार ही खिलाना चाहिए।
  • जानवर को समय पर ही खिलाना चाहिए। यह वंड या तो दूध निकालने से पहले अथवा दूध देते समय खिलाना चाहिए। दोनों बार पहले आधा-आधा करके वंड खिलाया जा सकता है।
  • अधिक खिलाने से जानवर खाना बन्द कर देते हैं।
  • वंड में अचानक परिवर्तन न लाएं।
  • दानों का हमेशा दलिया बना कर खिलाएं।
  • नेपियर बाजरा, बाजरा, मक्की आदि को कुतर कर खिलाना चाहिए।
  • 5-6 किलोग्राम हरे चारे के स्थान पर एक किलोग्राम सूखा चारा भी प्रयोग किया जा सकता है। अच्छी किस्म के हरे चारे वंड की बचत करते हैं।
  • पर कुछ पचने लायक तत्त्व गैर-फलीदार चारों में अधिक होते हैं। इसलिए दोनों तरह के चारों को ध्यान में रखते हुए वंड की बचत करनी चाहिए। आवश्यकता से अधिक प्रोटीन को जानवर ऊर्जा के लिए प्रयोग कर लेते हैं।
  • जिन चारों में नमी अधिक हो उन्हें कुछ समय धूप में रखकर अथवा इसमें तूड़ी आदि मिला कर खिलाना चाहिए।
  • अफारे तथा बदहजमी से बचाव के लिए फलीदार चारे खिलाने से पहले उनमें तूड़ी अथवा अन्य चारे मिला लेने चाहिएं।
  • साधारणतः हरे पत्तों का आचार दूध निकालने के पश्चात् खिलाना चाहिए, नहीं तो इसके दूध में गन्ध आने लगती है।
  • जानवरों के खाने वाले पदार्थ को सूखी हवा वाली जगह पर अच्छे ढंग से रखें।
  • फंगस लगे अथवा खराब खुराक पशुओं को न खिलाएं।

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प्रश्न 3.
दूध दोहने के बाद दूध की सम्भाल पर नोट लिखें।
उत्तर-
1. निकाले दूध की सम्भाल-दूध निकालने के तुरन्त पश्चात् शैड में से बाहर निकाल लें क्योंकि दूध में शैड के वातावरण की बदबू मिल सकती है। दूध छान कर उसमें से तूड़ी अथवा चारे के कण, बाल, धूड़, पतंगे आदि निकाले जा सकते हैं। दूध लोहे अथवा प्लास्टिक की छननी अथवा मलमल के कपड़े से छाना जा सकता है। हर बार छानने के पश्चात् छननी को अच्छी तरह धो लेना चाहिए तथा इसे हर बार कीटाणु रहित करना चाहिए। इस तरह दूध में बैक्टीरिया कम पैदा होंगे तथा दूध को देर तक सम्भाल कर रखा जा सकता है।

2. दूध को ठण्डा करना-दूध ठण्डा करने से बैक्टीरिया कम पैदा होते रहते हैं। दूध को 5°C तक ठण्डा करना चाहिए। दूध ठीक ढंग से ठण्डा न करने की हालत में दूध फट जाता है। ठण्डा करने के तरीके हैं-ड्रम तथा दूध के कैनों को बड़े टब में ठण्डे पानी में इस तरह डूबो कर रखें ताकि टब में पानी की सतह कैनों में दूध की सतह से ऊंची हो। दूध को गर्मियों में 2-3 घण्टे में एकत्र केन्द्र अथवा बेचने के स्थान पर ड्रम में डालकर उसकी ढुलाई करो। सारे कैन पूरी तरह भरे होने चाहिएं, ताकि उसमें दूध न हिले। गांवों में साइकिल, स्कूटर, बैलगाड़ी, टैम्पू आदि द्वारा दूध ढोकर शहरों में लाया जाता है।

प्रश्न 4.
सींग दागना पर नोट लिखें।
उत्तर-
सींग दागने से पशु सुन्दर लगते हैं। वे आपस में एक-दूसरे से भिड़ते नहीं है। इनके लिए कम स्थान की आवश्यकता पड़ती है। इनको खुले में भी रखा जा सकता है। सींग दागने के लिए लाल सुर्ख गर्म लोहे की दागनी का प्रयोग किया जाता है। कटड़ी के सींग 7-10 दिनों में तथा बछड़ी के सींग 15-20 दिनों की आयु में दागे जाते हैं।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

प्रश्न 5.
दुधारु पशु खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
एक पंजाबी कहावत मशहूर है कि ‘लवेरी लो चो के हाली लो जोत के’। इससे साफ़ है कि पशु खरीदते समय उससे दूध दुह कर खरीदो। कम-से-कम तीन बार दूध दुहने के बाद खरीदना चाहिए।

जानवर आगे-पीछे तथा ऊपर से देखने पर तिकोना लगे तथा उसकी चमड़ी पतली होनी चाहिए। दूध दुहने के पश्चात् मुहाना नींबू की तरह निचुड़ जाना चाहिए तथा यह भी देख लें कि मुहाने में कोई गांठ न हो। पशु हमेशा दूसरे-तीसरे सूए का ही खरीदें तथा अगर पीछे बछड़ी या कटड़ी हो तो इससे अच्छी कोई बात नहीं।

Agriculture Guide for Class 11 PSEB पशु पालन Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अच्छी भैंस की पहली बार सूए के समय आयु कितनी होती है ?
उत्तर-
36-40 माह।

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प्रश्न 2.
बढ़िया भैंस के दो सूयों में अंतर बताओ।
उत्तर-
15-16 माह।

प्रश्न 3.
हरियाणा नस्ल की गाय एक सूए में कितना दूध देती है ?
उत्तर-
1000 किलोग्राम दूध।

प्रश्न 4.
थारपार्कर गाय एक सूए में कितना दूध देती है ?
उत्तर-
1400 किलोग्राम।

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प्रश्न 5.
गाय का प्रसूतन के पश्चात् कितनी देर में दूध निकाल लेना चाहिए ?
उत्तर-
2 घण्टे में।

प्रश्न 6.
पांच साल से कम आयु के दुधारू जानवर को कितनी वंड फालतू देना चाहिए ?
उत्तर-
0.5 से 1.0 किलो।

प्रश्न 7.
पानी वाली खुरली की ऊंचाई छोटे जानवर के लिए लगभग कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर-
1.5 फुट ऊंची।

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प्रश्न 8.
नीली रावी का मूल घर बताओ।
उत्तर-
मिंटगुमरी (पाकिस्तान)।

प्रश्न 9.
दुधारू पशु का 305 दिनों के सुए का कम-से-कम दूध कितना होना चाहिए ?
उत्तर-
भैंस का 2500 किलोग्राम तथा गाय का 4000 किलोग्राम।

प्रश्न 10.
भैंस की पहले सूए के समय आयु बताओ।
उत्तर-
36 माह।

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प्रश्न 11.
गाय के पहले प्रसव की आयु बताओ।
उत्तर-
30 माह।

प्रश्न 12.
गाय का दोगलाकरण (संकरन) कौन-सी नस्ल से किया जाता है ?
उत्तर-
जर्सी नसल से।

प्रश्न 13.
नसलकशी का लाभ अथवा हानि कितने वर्षों बाद स्पष्ट होता है ?
उत्तर-
5-7 वर्ष बाद।

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प्रश्न 14.
दुधारु पशु खरीदते समय लगातार कितनी बार दुहाई के बाद खरीदना चाहिए ?
उत्तर–
तीन बार लगातार ।

प्रश्न 15.
साहीवाल के सींग तथा मुहाने के बारे में बताओ।
उत्तर-
सींग छोटे तथा मुहाना बड़ा होता है।

प्रश्न 16.
हरियाणा नसल के दूध तथा फैट की मात्रा बताओ।
उत्तर-
औसत दूध 1000 किलो (एक प्रसव का) फैट 4% ।

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प्रश्न 17.
साहीवाल की दूध की मात्रा तथा फैट के बारे बताओ।
उत्तर-
औसत दूध 1800 किलो (एक प्रसव) फैट 5% ।

प्रश्न 18.
लाल सिंधी का मूल घर बताओ।
उत्तर-
सिंध (पाकिस्तान)।

प्रश्न 19.
कच्छ (गुजरात) कौन-सी गाय का मूल घर है ?
उत्तर-
थारपार्कर।

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प्रश्न 20.
होलसटीन-फरीजीयन का औसत दूध तथा फैट बताओ।
उत्तर-
5500-6500 किलो दूध, फैट 3.5-4.0% 1

प्रश्न 21.
जरसी का मूल घर बताओ।
उत्तर-
इंग्लैंड का जरसी टापू।

प्रश्न 22.
जरसी का दूध तथा फैट बताओ।
उत्तर-
3000-5000 किलो, फैट 5%।

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प्रश्न 23.
डेयरी जानवर 80% ऊर्जा की आवश्यकता कहां से पूरी होती है ?
उत्तर-
निशास्ता।

प्रश्न 24.
कटड़ियों के सींग कितनी आयु में सींग दागने चाहिए ?
उत्तर-
7-10 दिन की आयु।

प्रश्न 25.
बछड़ी के सींग कितनी आयु में सींग दागने चाहिए ?
उत्तर-
15-20 दिन की आयु।

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प्रश्न 26.
बछड़ा, बछड़ी को कौन-सी बीमारियों से बचाव के लिए टीके लगाए जाने चाहिए ?
उत्तर-
मुँह खुर, गलघोंटु।

प्रश्न 27.
दूध की दुहाई कितनी देर में पूरी हो जाती है ?
उत्तर-
एक पशु को 6-8 मिनट लगते हैं।

प्रश्न 28.
गाय के शैड की दिशा किस तरफ होनी चाहिए ?
उत्तर-
पूर्व-पश्चिम की तरफ।

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प्रश्न 29.
बड़े जानवर के लिए कितने स्थान की आवश्यकता है ?
उत्तर-
12-14 वर्ग फुट।

प्रश्न 30.
150 क्विंटल हरे चारे का आचार बनाने के लिए गड्ढे का आकार बताओ।
उत्तर-
20 x 12 x 5 फुट।

प्रश्न 31.
भारत में भैंसों के एक सूए का औसत दूध बताओ।
उत्तर-
500 किलोग्राम।

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प्रश्न 32.
पंजाब में भैंसों के एक सूए का औसत दूध बताओ।
उत्तर-
1500 किलोग्राम।

प्रश्न 33.
मुर्रा का एक सुए का औसत दूध तथा फैट की मात्रा बताओ।
उत्तर-
1700-1800 किलोग्राम, 7% फैट।

प्रश्न 34.
पंजाब में ग्रामीण जनसंख्या कितनी है ?
उत्तर-
पंजाब में 70% जनसंख्या ग्रामीण है।

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प्रश्न 35.
दुधारु पशुओं से हर वर्ष कितना दूध पैदा किया जाता है ?
उत्तर-
इनसे लगभग 94 लाख टन दूध वार्षिक पैदावार होती है।

प्रश्न 36.
पंजाब में प्रति पशु औसतन कितना दूध पैदा होता है ?
उत्तर-
यह औसत 937 ग्राम प्रति पशु रोज़ाना है।

प्रश्न 37.
राष्ट्रीय स्तर पर प्रति पशु रोज़ाना औसतन कितना दूध पैदा होता है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत 291 ग्राम प्रति पशु रोज़ाना है।

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प्रश्न 38.
संसार में भारत का दूध की पैदावार में कौन-सा स्थान है ?
उत्तर-
संसार में भारत का दूध पैदावार में पहला स्थान है।”

प्रश्न 39.
पंजाब में दोगले नसलीकरण का कार्य बड़े स्तर पर चलाने के लिए क्या किया गया है ?
उत्तर-
विदेशों से होल्स्टीयन फ्रीजियन तथा जरसी नसल की गायें तथा इस नसल के बैलों के टीके मंगवाने का प्रबन्ध किया गया है। ……..

प्रश्न 40.
देसी गाय एक प्रसव पश्चात् कितना दूध देती है ?
उत्तर-
देसी गाय एक प्रसव के पश्चात् लगभग 1000 से 1800 किलोग्राम दूध देती है।

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प्रश्न 41.
हरियाणा नसल की तथा साहीवाल तथा लाल सिन्धी गायों के दूध में चिकनाहट (फैट) कितनी होती है ?
उत्तर-
हरियाणा 4.0%, साहीवाल 5.0%, लाल सिन्धी 5.0%।

प्रश्न 42.
होल्स्टीयन-फ्रीजियन नसल की गाय एक प्रसव के पश्चात् कितना दूध देती है तथा इसमें कितनी चिकनाहट होती है ?
उत्तर-
यह 5500-6500 किलो दूध देती है। इसमें चिकनाहट 3.5 से 4.0% होती है।

प्रश्न 43.
जरसी नसल की गाय एक प्रसव काल में कितना दूध देती है तथा इसमें कितनी चिकनाहट (फैट) होती है ?
उत्तर-
यह एक प्रसवकाल में औसतन 3000-5000 किलो दूध देती है। इसमें चिकनाहट (फैट) 5% होती है।

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प्रश्न 44.
बरसीम से जानवरों को मोक (आफरा ) न लगे इसके लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
बरसीम में तूड़ी मिलाकर डालनी चाहिए।

प्रश्न 45.
बच्चे को खीस किस हिसाब में खिलानी चाहिए ?
उत्तर-
बच्चे के शरीर में वज़न के 10वें हिस्से के हिसाब से सर्दियों में 3-4 दिन तथा गर्मियों में 3 बार खिलानी चाहिए।

प्रश्न 46.
बछड़े को वंड कब से देनी आरम्भ करनी चाहिए ?
उत्तर-
बछड़े को वंड 15 दिन की आयु में देनी आरम्भ कर दो।

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प्रश्न 47.
कटड़ियों तथा बछड़ियों के सींग किस आयु में दागने चाहिए ?
उत्तर-
कटड़ियों के सींग 7-10 दिन की आयु में तथा बछड़ियों के सींग 15-20 दिन की आयु में ही लाल सुर्ख लोहे की दागनी से दागने चाहिएं।

प्रश्न 48.
18 महीने में बछड़े का भार कितना हो जाता है ?
उत्तर-
बछड़े का भार 300 कि०ग्रा० तक हो जाता है।

प्रश्न 49.
अगर दूध मशीन से निकालना हो तो थनों को किस घोल से साफ़ करना चाहिए ?
उत्तर-
50% बीटाडीन तथा 50% ग्लिसरीन के घोल से।

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प्रश्न 50.
पानी की खुरली कितनी ऊंची होनी चाहिए ?
उत्तर-
बड़े जानवरों तथा छोटे जानवरों के लिए क्रमशः 2.5 फुट तथा 1.5 फुट होनी चाहिए।

प्रश्न 51.
गोबर की सम्भाल के लिए खड्डे का आकार बताओ।
उत्तर-
इसका आकार 20 x 14 x 4 फुट होना चाहिए।

प्रश्न 52.
पंजाब में तथा भारत में भैंस के एक प्रसव का औसत दूध कितना है ?
उत्तर-
पंजाब में यह औसत 1500 किलोग्राम तथा भारत में 500 किलोग्राम है।

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प्रश्न 53.
भारत में भैंसों की कितनी नसलें हैं ?
उत्तर-
भारत में भैंसों की 15 नसलें हैं।

प्रश्न 54.
दूध के लिए किस धातु के बने बर्तन सबसे बढ़िया रहते हैं ?
उत्तर-
दूध के लिए सबसे बढ़िया बर्तन एल्यूमीनियम के रहते हैं।

प्रश्न 55.
बर्तनों को कीटाणु रहित करने के लिए रसायन का नाम लिखो।
उत्तर-
सोडियम तथा कैल्शियम हाइपोक्लोराइड।

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प्रश्न 56.
सबसे बढ़िया दो उद्देशीय गाय कौन-सी है ?
उत्तर-
गाय की हरियाणा नसल इस तरह की है।

प्रश्न 57.
निशास्ते के मुख्य स्रोत कौन-से हैं ?
उत्तर-
निशास्ते के मुख्य स्रोत पौधों के बीज की सेलुलोज़ तथा स्टार्च हैं।

प्रश्न 58.
अफारे तथा बदहज़मी से बचने के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
फलीदार चारा खिलाने से पहले इनमें तूड़ी अथवा अन्य चारे मिला लेने चाहिए।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दूध की बढ़ रही मांग को कैसे पूरा किया जा सकता है ?
उत्तर-
दूध की बढ़ रही मांग को पशुओं की संख्या बढ़ाकर तथा दूसरी उनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता को बढ़ा कर भी किया जा सकता है। दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए दोगली नसलीकरण करने के लिए बढ़िया किस्म के विदेशी बैलों का प्रयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
लाभदायक डेयरी फार्म के व्यवसाय के लिए आर्थिक पक्ष से दुधारू पशुओं में कौन-से म्यार होने चाहिएं ?
उत्तर –

305 दिन के सूए का कम-से-कम दूध (किलोग्राम) 2500 4000
पूरे यौवन में एक दिन का कम से कम दूध (किलोग्राम) 12-13 19.20
पहले सूए की आयु (वर्ष) 3 (36 माह) 2 1/2 (30 माह)
दूध देने से हटने का समय (महीने) (प्रसव से पहले) 2 2

प्रश्न 3.
गायों का दूध बढ़ाने के लिए नस्ल सुधार किस तरह किया जा सकता
उत्तर-
पंजाब के मैदानी इलाकों में गायों का दूध बढ़ाने के लिए इस नस्ल सुधार होलस्टीन फ्रीजियन नस्ल के बैलों से देसी तथा दोगली गायों को मिला कर किया जा सकता है। अर्द्ध पहाड़ी क्षेत्रों में जहां हरे चारे की कमी है, गायों का नस्लीकरण जरसी नसल के प्रयोग से किया जाता है। होलस्टीन फ्रीजियन नस्ल का दूध अधिक होता है तथा जरसी के दूध में चर्बी की प्रतिशत मात्रा अधिक है।

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प्रश्न 4.
गर्भवती वाली तथा दूध से हटी गाय की सम्भाल कैसे करोगे ?
उत्तर-
गर्भवती वाली गाय को प्रसव की तारीख से 60 दिन पहले दूध से हटा लेना चाहिए। ऐसा करने के लिए 5-7 दिन के लिए बंड बंद कर दो तथा हरा चारा भी घटा देना चाहिए। थनों की सूजन छिछड़ा रोग से बचाव के लिए कीटाणु नाशक दवाई लगा देनी चाहिए। पहले दो प्रसवों में इन गायों को एक किलो अतिरिक्त वंड डालनी चाहिए, क्योंकि उनकी शारीरिक वृद्धि भी हो रही होती है।

प्रसव के दो सप्ताह पहले गाय को अन्य गाय से अलग कर देना चाहिए। उसको साफ़ कमरे में रखें जहां आराम के लिए सूखी पुआल डाली हो। उम्मीद वाली गाय की ढुलाई नहीं करनी चाहिए। भीड़-भाड़ से गुरेज़ करें तथा पशु न फिसले। इस समय मुहाना काफ़ी बड़ा हो जाता है। इसलिए ध्यान रखें कि मुहाने पर कोई चोट अथवा ज़ख्म न लगे।

प्रश्न 5.
भैंसों की देखभाल बारे क्या जानते हो ?
उत्तर-
भैंसों की सम्भाल साधारणतः गाय जैसी ही होती है। भैंसों में दो प्रसवों का अन्तर अधिक होता है तथा कटड़ों की मृत्यु-दर अधिक होती है। कटड़ों की मौत को घटाने के लिए उनकी जन्म से पहले तथा बाद में अच्छी देखभाल करनी चाहिए। कमज़ोर भैंसें विशेषतः कम भार वाली भैंसों को प्रजनन नहीं करवाना चाहिए। भैंस के प्रसव से पहले अच्छी खुराक देनी चाहिए। गर्भ के आखिरी 3 महीने में उसकी अच्छी तरह देखभाल बहुत ज़रूरी है। नए पैदा हुए कटड़ों की खुराक की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। कटड़ों को छोटे ग्रुपों में बढ़िया सूखा बिछाए कमरों में रखें तथा जन्म से लेकर नियमबद्ध तरीके से क्रीम रहित करने वाली दवाई तथा बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीके लगवाने चाहिएं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गाय की विदेशी नस्ल ( जर्सी) का वर्णन करो।
उत्तर-

गुण जर्सी
मूल घर इंग्लैंड में जर्सी टापू
रंग भूसला अथवा भूरे लाल धब्बे
शरीर यह सबसे छोटे कद वाली नसल है
एक सूए का औसतन दूध 3000-5000 किलो
दूध में चिकनाई फैट 5%

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प्रश्न 2.
भारत में बढ़ रही दूध की मांग कैसे पूरी हो सकती है ?
उत्तर-
दूध की बढ़ रही मांग को पूरा करने के लिए दो कार्य किए जा सकते हैं –

  1. दूध देने वाली गायों-भैंसों की संख्या में वृद्धि की जानी चाहिए।
  2. दूध देने वाली गायों-भैंसों की नसल में सुधार करके भी दूध बढ़ाया जा सकता है।

लवेरों की संख्या तो पहले ही हमारे पास अधिक है तथा दूसरे ढंग के लिए विदेशी नसल की बढ़िया गायें मंगवाई जा सकती हैं परन्तु इनमें भी हमारे वातावरण को सहन करने की शक्ति कम है तथा ये शीघ्र ही बीमार हो जाती हैं। इसलिए मौजूदा लवेरों के दूध के सामर्थ्य को बढ़ाना इनका सही ढंग है। इसलिए लवेरों की नसल सुधार तथा अच्छी देखभाल की ज़रूरत है।
नसल सुधार के लिए बढ़िया किस्म के होलस्टीन फ्रीजियन तथा जर्सी नस्ल के बैलों की अच्छी सम्भाल की जाती है।

परन्तु भैंसें तो भारत में पहले ही दुनिया की सबसे बढ़िया किस्म की हैं। इसलिए इनमें दोगली नसलकशी के लिए कोई गुन्जाइश नहीं। इसलिए जो नसलें भारत में मौजूद हैं, उनका चुनाव करके सुधार भी किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
जानवरों के शरीर के संचालन के लिए खुराक की जानकारी दें।
उत्तर-
अधिक दूध की पैदावार के लिए जानवरों की खुराक तथा शरीर का संचालन ठीक ढंग से होना चाहिए। जानवरों के लिए अनिवार्य खुराकी तत्त्वों को चार भागों में बांटा जा सकता है –

  1. ऊर्जा देने वाले पदार्थ
  2. प्रोटीन
  3. खनिज पदार्थ
  4. विटामिन।

सभी जानवर अपनी ऊर्जा की आवश्यकता खाद्य तत्त्वों निशास्ता, प्रोटीन तथा चिकनाई से प्राप्त करते हैं। डेयरी जानवर 80% ऊर्जा आवश्यकता निशास्ते से पूरी करते हैं।

400 किलो वज़न की गाय अथवा भैंस के शरीर संचालन की ज़रूरत 35 किलो हरे चारे (बरसीम, लूसण, मक्की, ज्वार अथवा बाजरा) से पूरी हो सकती है। भारी जानवरों के लिए जैसे कि 500 किलो वज़न वाली गाय के लिए 45 किलो हरा चारा काफ़ी है। इसमें 10% तक तूड़ी मिलानी ठीक रहती है। क्योंकि हरे बरसीम अथवा लूसण में प्रोटीन अधिक होती है तथा सूखा मादा कम होता है। दूध की पैदावार के लिए अथवा बढ़ रहे बछड़े तथा बछड़ियों की ज़रूरत हरे चारे तथा सन्तुलित वंड मिश्रण से पूरी का जा सकती है। जो भैंसें 5 किलो तथा गायें 7 किलो दूध दे सकती हैं, उन्हें 40-60 किलो फलीदार हरा चारा काफ़ी है। बरसीम की पहली कटाइयों में तुडी मिलानी चाहिए ताकि जानवरों को अफारा न लगे। अधिक दूध देने वाली गायों को अधिक हरा चारा नहीं डालना चाहिए नहीं तो वह वंड नहीं खा सकेंगी।

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प्रश्न 4.
बछड़े के दूध छुड़ाने के बारे में बताओ।
उत्तर-
दूध छुड़ाना-बछड़ों को दूध चुसवाने की जगह पिलाना चाहिए। इसके लिए बछड़ों को जन्म से ही माँ से अलग कर दो। इस तरह दूध की पैदावार का सही अनुमान लग जाता है तथा बछड़े को आवश्यकतानुसार दूध भी पिलाया जा सकता है। दूध हमेशा ताज़ा तथा शारीरिक तापमान (30-40°C) पर ही पिलाना चाहिए। इस तरह थन ज़ख्मी नहीं होते तथा छूत की बीमारियां भी नहीं लगती। इसके साथ-साथ यदि बच्चा मर जाए तो पशु दूध आसानी से देते हैं।

प्रश्न 5.
बछड़े-बछड़ियों की पहचान तथा बछड़ों की सम्भाल तथा दुधारू पशुओं की देख-रेख के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
बछड़े-बछड़ियों की पहचान-जानवरों की संख्या अधिक होने की सूरत में उनकी ठीक-ठाक पहचान के लिए प्रबन्ध होना अनिवार्य है। छोटे जानवरों के कानों में नंबर लगा कर अथवा गले में रस्सी अथवा जंजीर में नम्बर लटका कर इनकी पहचान आसानी से की जा सकती है। बछड़ों तथा बड़े जानवरों की पहचान के लिए कानों में नम्बर वाली मुर्कियां (वालियां) डाली जा सकती हैं। अथवा गर्म लोहे से पीठ पर नम्बर लगाए जा सकते हैं।

बछड़ों की सम्भाल-अगर बछड़ों को बढ़िया राशन मिले तो उनकी प्रतिदिन 500700 ग्राम शारीरिक वृद्धि हो सकती है। साधारणत: उनके शरीर का भार 15 महीने की आयु में 200-250 किलो ग्राम तथा 18 महीने में 300 किलोग्राम हो जाता है। एक वर्ष की आयु से पशुओं में गर्भ धारण की निशानियों के लिए ध्यान से देखें।

दुधारू पशुओं की देख-रेख-प्रसव से 5 दिन पश्चात् दुधारु पशुओं को साधारण वंड डालना चाहिए। दूध की पैदावार तथा हरे चारे की मात्रा तथा क्वालिटी अनुसार वंड की मात्रा बढ़ा लेनी चाहिए। दुधारु पशुओं का (खासकर दूध देने वाले) प्रसव से पहले तीन महीने साधारणतः भार घटता है जो कि चिन्ता की बात नहीं।।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

प्रश्न 6.
पंजाब में भैंसों की दो नसलों के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
मुर्रा नसल-इसका मूल घर रोहतक (हरियाणा) में है। मुर्रा का अर्थ है मुड़ा हुआ। इस नसल का नाम इसके मुड़े हुए सींगों के कारण पड़ा है। इस नसल का रंग काला होता है। इसकी पूंछ की दुम (सिरा) सफेद तथा सींग मुड़े (कुण्डलदार), गर्दन तथा सिर पतले, भारी मुहाना तथा थन लम्बे होते हैं। भैंसों के शरीर का भार 430 किलोग्राम तथा नरों का 575 किलोग्राम होता है। यह नसल औसतन एक प्रसव में 1700-1800 किलोग्राम दूध देती है। इसके दूध में चिकनाहट 7% होती है।

नीली रावी-इसका मूल घर मिंटगुमरी (पाकिस्तान) में है। इसका रंग काला, माथा सफ़ेद (फूलदार), घुटनों तक टांगें सफ़ेद, पूंछ की दुम सफ़ेद होती है। इसका एक अन्य नाम पाँच कल्याणी भी है। इसका कद मध्यम, सींग छोटे तथा तेज़, आंखें बिल्ली होती हैं। भैंस का भार 450 किलोग्राम तथा नरों का 600 किलोग्राम होता है। एक प्रसव में औसतन दूध 1600-1800 किलोग्राम प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 7.
दूध वाले बर्तनों की सफाई के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
दूध वाले बर्तन-दूध वाले बर्तन कई तरह की धातुओं से बनाए जा सकते हैं। पर लोहे अथवा तांबे आदि धातुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह कुछ मात्रा में दूध में घुल जाती हैं तथा अवांछनीय रासायनिक क्रिया द्वारा दूध में मिल कर घटिया स्वाद तथा बदबू पैदा करती हैं। अच्छी तरह कलई किए तांबे, गैल्वेनाईज्ड लोहे तथा क्रोम निक्कल के बर्तन दूध के बर्तनों के तौर पर बहुत तस्सली बख्स रहते हैं। पर यह बहुत महँगे पड़ते हैं, जबकि एल्यूमीनियम के बर्तन सबसे बढ़िया सस्ते तथा अधिक देर तक चलने वाले होते हैं । यह दूध पर बुरा प्रभाव नहीं डालते। इन्हें आसानी से साफ़ तथा कीटाणु रहित किया जा सकता है।

बर्तनों की सफ़ाई-बढ़िया दूध पैदा करने के लिए बर्तनों को साफ़ तथा कीटाणु रहित करना . बहुत ज़रूरी है। दूध वाले बर्तनों को प्रयोग के तुरन्त पश्चात् धोकर साफ़ कर लेना चाहिए।

बर्तनों को तब तक धोते रहें, जब तक धोने वाला पानी साफ़ आना न शुरू हो जाए। धोने के लिए सोडे का प्रयोग किया जा सकता है। घोल में सोडा इतना ही डालें कि वह हाथों पर बुरा प्रभाव न डाले। बर्तन की धातु अनुसार सफ़ाई के लिए कपड़े धोने वाला सोडा, सोडियम हैक्सामैटाफॉस्फेट, ट्राई सोडियम फॉस्फेट, सोडियम मैटासिलीकेट आदि प्रयोग की जा सकती है।

सोडे को गुनगुने पानी (40°C) में घोल कर बर्तन में डालकर ब्रुश अथवा हाथों से अच्छी तरह अन्दर-बाहर से रगड़ कर साफ़ करें। बाद में बर्तन को 2-3 बार गुनगुने पानी से धोकर सोडा निकाल दें तथा अन्त में ठण्डे पानी से धो दें। साफ़ किए बर्तनों को उल्टे रखकर सुखा लेना चाहिए।

कीटाणु रहित करने से बीमारियां फैलाने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। कीटाण रहित करने के लिए उबलता हुआ पानी, भाप तथा रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए। बर्तनों को 2-3 मिनट भाप की फुहार में रखकर कीटाणु रहित किया जा सकता है। दूध के बर्तनों में उबलता पानी डाल कर आधे घण्टे के लिए बन्द कर दें तथा बर्तन का तापमान लगभग 85°C होना चाहिए। सोडियम तथा कैल्शियम हाइपोक्लोराइड जैसे रसायन पदार्थ भी बर्तनों को कीटाणु रहित करने के लिए प्रयोग किए जा सकते हैं। इन रसायनों की 200 ग्राम मात्रा 1000 लिटर पानी में घोल कर बर्तन में 2 मिनट के लिए डालना काफ़ी है। अगर कुआर्टनरी अमोनियम प्रयोग करना हो तो यह 50 ग्राम प्रति 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रयोग किया जा सकता है। रसायनों को साफ़ करने के पश्चात् बर्तन अच्छी तरह साफ़ पानी से धोने चाहिए नहीं तो इनकी गन्दगी दूध अथवा पदार्थों को खराब कर सकती है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन

प्रश्न 8.
देशी गायों की नस्लों का विस्तारपूर्वक वर्णन करो।
उत्तर-
PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 6 पशु पालन 1

पशु पालन PSEB 11th Class Agriculture Notes

  • पंजाब में लगभग 70% जनसंख्या ग्रामीण है।
  • पंजाब में 17 लाख गायें तथा 50 लाख भैंसें हैं।
  • पंजाब में प्रति जीव औसतन 937 ग्राम दूध प्रतिदिन पैदा किया जाता है जबकिराष्ट्रीय स्तर पर यह 291 ग्राम है।
  • होलस्टीन-फ्रीज़ियन दूध देने वाली सबसे बढ़िया विदेशी नस्ल है।
  • देसी गाय एक सुए में लगभग 1000 से 1800 किलोग्राम दूध देती है।
  • गाय की देसी नसलें हैं हरियाणा, साहीवाल, लाल सिन्धी तथा थारपार्कर।
  • थारपार्कर तथा हरियाणा द्विउद्देशीय नसलें हैं।
  • गाय की विदेशी नसलें हैं होलस्टीयन-फ्रीज़ियन, जरसी। क्रमशः इनके एक सूए से औसतन 5500-6500, 3000-5000 किलो दूध मिल जाता है।
  • लगभग 35 किलो हरा चारा 400 किलो भारी गाय अथवा भैंस के शरीर के संचालन की आवश्यकता पूरी करता है।
  • जानवरों के लिए आवश्यक खुराकी तत्त्वों को मोटे तौर पर 4 भागों में बांट सकते हैं, जैसे ऊर्जा देने वाले पदार्थ, प्रोटीन, खनिज, पदार्थ तथा विटामिन।
  • जानवरों को पौष्टिक तत्व पूरे मिलें इसलिए बंड, जोकि अनाज, तेल वाले बीजों की खल्ल आदि मिश्रण है, दिया जाता है।
  • अगर दुहाई दूध निकालने वाली मशीन से करनी हो तो थनों को 50% बीटाडीन + 50% ग्लिसरीन के घोल में डुबो लेना चाहिए।
  • दूध से हट चुकी गर्भवती गाय को इधर-उधर नहीं ले जाना चाहिए तथा फिसलने से बचाना चाहिए।
  • गाय की प्रसूतन के 2 घण्टे बाद दुहाई कर लेनी चाहिए।
  • नये जन्मे बछड़े के नाड़ को प्रतिदिन 2-3 बार टिंचर आयोडीन या डीटोल लगा देनी चाहिए।
  • बछड़े को दूध पीलाना चाहिए तथा चूसवाना नहीं चाहिए।
  • कटड़ी तथा बछड़ी के क्रमश : 7-10 दिन तथा 15-20 दिनों की आयु में सिंग दाग देने चाहिए।
  • युवा गाय को अच्छा राशन मिले तो भार 18 महीने में 300 किलोग्राम हो जाता है।।
  • दूध दोहन का काम 6-8 मिनट में पूरी मुट्ठी से करना चाहिए।
  • बड़े पशु को लगभग 12-14 वर्ग फुट स्थान की आवश्यकता होती है।
  • फालतू फलीदार चारे को सुखा कर हेय तथा गैर-फलीदार का आचार बना कर संभाला जा सकता है।
  • भारत में भैंस के एक सूए का औसतन दूध 500 किलोग्राम है। पंजाब में यह , 1500 किलोग्राम है।
  • भारत में भैंसों की 15 नसलें हैं। पंजाब में साधारणत: दो नसलें मिलती हैं मुर्रा तथा नीली रावी।
  • बढ़िया भैंस को पहले सूए में 2000 तथा दूसरे में 2500 किलोग्राम दूध देना चाहिए।
  • दूध को 5°C तक ठण्डा करके रखें, इस तरह बैक्टीरिया फलते फूलते नहीं।
  • दूध वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ़ करना चाहिए।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया

PSEB 11th Class Geography Guide नमी और वर्षण क्रिया Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो शब्दों में दें-

प्रश्न (क)
विशिष्ट नमी का अंग्रेज़ी में क्या नाम लिया जाता है?
उत्तर-
Specific Humidity.

प्रश्न (ख)
अगर वाष्पीकरण काफी हो, तो हवा में कौन-सी नमी बढ़ती है?
उत्तर-
निरपेक्ष नमी।

प्रश्न (ग)
नमी का तरल रूप क्या है?
उत्तर-
जल।

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प्रश्न (घ)
ओले ठोस होते हैं, इनका पहला गैस रूप क्या होता है?
उत्तर-
जल वाष्प।

प्रश्न (ङ)
अग्रभागी वर्षा का पंजाबी नाम क्या है ?
उत्तर-
चक्रवाती वर्षा।

2. प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1. (क)
नमी क्या होती है? इसकी किस्मों के नाम लिखें।
उत्तर-
वायुमंडल में मौजूद नमी (जलवाष्प) को नमी कहते हैं। यह पानी के गैसीय रूप में विद्यमान रहती है। वायुमंडल में मौजूद नमी तीन प्रकार की होती है

  1. निरपेक्ष नमी
  2. विशिष्ट नमी
  3. सापेक्ष नमी।

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प्रश्न (ख)
वर्षा से क्या अभिप्राय है? इसकी किस्मों के नाम लिखें।
उत्तर-
वायुमंडल में मौजूद जल वाष्प संघनन होकर जब बूंदों के रूप में भू-तल पर गिरते हैं, तो उसे वर्षा कहते हैं। वर्षा की तीन किस्में हैं-

  1. संवहन वर्षा
  2. पर्वतीय वर्षा
  3. चक्रवाती वर्षा।

प्रश्न (ग)
वर्षण और वर्षा में क्या अंतर है? बताएं।
उत्तर-
जब वायु का तापमान ओस बिंदु से भी नीचे गिरता है, तो उसमें जलवाष्प जल में बदलकर किसी-न-किसी रूप में भू-तल पर गिरते हैं, उसे वर्षण कहते हैं। इसके तीन रूप हैं-बर्फबारी, ओले और वर्षा, परंतु जब ये जलवाष्प जल की बूंदों के रूप में भू-तल पर गिरते हैं, तो उसे वर्षा कहते हैं।

प्रश्न (घ)
संतृप्त वायु क्या होती है ? व्याख्या करें।
उत्तर-
जब हवा का तापमान इतना कम हो जाए कि हवा जल वाष्प को संभाल न सके तो उसे संतृप्त हवा कहते हैं। हवा में जितना सामर्थ्य होता है, यदि हवा में उतनी नमी मौजूद हो, तो उस हवा को संतृप्त हवा कहते हैं। इस हालत में हवा में संघनन क्रिया आरंभ हो जाती है।

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प्रश्न (ङ)
वायु, नमी व तापमान का क्या संबंध है ? संक्षेप में बताएँ।
उत्तर-
तापमान के बढ़ने से हवा में जलवाष्प (नमी) धारण करने का सामर्थ्य बढ़ जाता है। तापमान कम होने पर नमी कम हो जाती है। गर्म हवा में नमी का सामर्थ्य बढ़ जाता है, परंतु वास्तविक नमी कम होती है।

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 100 से 250 शब्दों में दें-

प्रश्न (क)
नमी की किस्मों की विस्तृत व्याख्या करें।
उत्तर-
1. निरपेक्ष नमी या वास्तविक नमी (Absolute Humidity)—किसी समय में किसी तापमान पर हवा में जितनी नमी मौजूद हो, उसे हवा की निरपेक्ष या वास्तविक नमी कहते हैं। यह एक ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर द्वारा प्रकट की जाती है। तापमान बढ़ने या कम होने पर भी हवा की वास्तविक नमी वही रहेगी, जब तक उसमें और अधिक जलवाष्प शामिल न हों या कुछ जल-कण अलग न हो जाएँ। वाष्पीकरण द्वारा वास्तविक नमी बढ़ जाती है और वर्षा द्वारा कम हो जाती है। हवा के ऊपर उठकर फैलने पर अथवा नीचे उतरकर सिकुड़ने से भी यह मात्रा बढ़ या कम हो जाती है। इस प्रकार की वायु की निरपेक्ष या वास्तविक नमी कभी भी स्थिर नहीं रहती।

विभाजन (Distribution)-

  • भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक निरपेक्ष नमी होती है और यह ध्रुवों की ओर कम होती जाती है।
  • गर्मी की ऋतु में सर्दियों की तुलना में और दिन में रात की तुलना में हवा की निरपेक्ष नमी अधिक होती है।
  • थल खंडों की अपेक्षा महासागरों में निरपेक्ष नमी अधिक होती है।
  • उच्च वायुदाब के क्षेत्रों में नीचे उतरती हुई हवाओं के कारण निरपेक्ष नमी कम होती है।
  • इससे वर्षा के संबंध में अनुमान लगाने में सहायता नहीं मिलती।

2. सापेक्ष नमी (Relative Humidity)-किसी तापमान पर हवा में कुल जितनी नमी समा सकती है, उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष नमी कहते हैं।

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दूसरे शब्दों में, यह हवा की निरपेक्ष नमी और उसकी नमी धारण करने के सामर्थ्य का प्रतिशत अनुपात है।

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उदाहरण (Example)-यदि किसी हवा में 70° F पर 4 grain प्रति घन फुट नमी मौजूद है, परंतु यदि यह हवा 70°F तापमान पर 8 grain प्रति घन फुट नमी सहन कर सकती है, तो उस हवा की सापेक्ष नमी = 4/8 x 100 = 50 प्रतिशत होगी।
नोट-सापेक्ष नमी को भिन्न (Fraction) की अपेक्षा % से प्रकट किया जाता है।

इसे हवा की संतृप्तता का प्रतिशत अंश भी कहा जाता है। हवा के फैलने या सिकुड़ने से विशेष नमी बदल जाती है। तापमान के बढ़ने से हवा का वाष्प ग्रहण करने का सामर्थ्य बढ़ जाता है और सापेक्ष नमी कम हो जाती है। तापमान कम होने से हवा ठंडी हो जाती है और वाष्प धारण करने का सामर्थ्य कम हो जाता है। इस प्रकार सापेक्ष नमी बढ़ जाती है।

विभाजन (Distribution)—

  • भूमध्य रेखा पर सापेक्ष नमी अधिक होती है।
  • गर्म मरुस्थलों में सापेक्ष नमी कम हो जाती है।
  • निम्न वायु दाब वाले क्षेत्रों में सापेक्ष नमी अधिक परंतु उच्च वायु दाब वाले क्षेत्रों में सापेक्ष नमी कम होती है।
  • महाद्वीपों के भीतरी क्षेत्रों में सापेक्ष नमी कम होती है।
  • दिन को सापेक्ष नमी कम होती है, पर रात को यह बढ़ जाती है।
  • वर्षा ऋतु में सापेक्ष नमी बढ़ जाती है।

3. विशिष्ट नमी (Specific Humidity)-हवा के प्रति इकाई भार में मौजूद जल वाष्प के भार को विशिष्ट नमी कहते हैं अथवा हवा में मौजूद जल वाष्प के भार और उस वायु के भार के अनुपात को विशिष्ट नमी कहते हैं। वायु के आयतन के बढ़ने या कम होने से वायु का भार बढ़ या कम हो जाता है और विशिष्ट नमी बदल जाती है। भूमध्य रेखा और सागरों पर विशिष्ट नमी अधिक होती है।

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प्रश्न (ख)
वर्षा की किस्मों की व्याख्या करें।
उत्तर-
वायु में मौजूद जल वाष्प जब संघनन द्वारा जल का रूप धारण करके भू-तल पर गिरते हैं, तो उसे वर्षा कहते हैं। हवा की नमी ही वर्षा का आधार है। वर्षा होने का मुख्य कारण है-संतृप्त हवा का ठंडा होना। (Rainfall is caused due to the cooling of saturated air.) इस प्रकार जल-कणों का धरती पर गिरना ही वर्षा कहलाता है। वर्षा के लिए जरूरी है कि

  1. हवा में पर्याप्त नमी हो।
  2. हवा का किसी प्रकार ठंडा होना या द्रवीकरण क्रिया का होना।
  3. हवा में धूल के कणों का होना।

वर्षा की किस्में (Types of Rainfall) हवा तीन दशाओं में ठंडी होती है-

  1. गर्म और नम हवा का संवाहक धाराओं के रूप में ऊपर उठना।
  2. किसी पर्वत से टकराकर नम हवा का ऊपर उठना।
  3. ठंडी और गर्म वायु समूह का आपस में मिलना।

इन दशाओं के आधार पर वर्षा तीन प्रकार की होती है-
इसे चक्रवाती वर्षा (Cylonic Rainfall) कहते हैं। यह वर्षा लगातार बहुत देर तक परंतु थोड़ी मात्रा में होती है।

उदाहरण (Examples)

  • शीतोष्ण कटिबंध में सर्दी की ऋतु में पश्चिमी यूरोप में इसी प्रकार की वर्षा होती है।
  • पंजाब में सर्दी ऋतु में कुछ वर्षा रोम सागर से आने वाले चक्रवातों द्वारा होती है।

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प्रश्न (ग)
विश्वभर में वर्षा के विभाजन की व्याख्या करें।
उत्तर-
विश्व में वर्षा का विभाजन (World Distribution of Rainfall)-

तापमान, वायु दाब और पवनें वर्षा की मात्रा को निर्धारित करते हैं। ये सभी दशाएँ विभिन्न कटिबंधों में भिन्न होती हैं। इसी कारण वर्षा का विभाजन भी इन्हीं कटिबंधों में एक समान नहीं होता है। ऋतु वैज्ञानिक पैटर्सन ने वर्षा का विभाजन कटिबंधों के अनुसार किया है, जो कि नीचे लिखे अनुसार है-

1. भूमध्य रेखीय प्रदेश (Equatorial Region)-भूमध्य रेखीय या डोलड्रम प्रदेश का विस्तार लगभग 7° उत्तरी और 7° दक्षिणी अक्षांशों के बीच होता है। यहाँ निरंतर संवहन धाराएँ उठती रहती हैं, जिसके कारण सारा साल वर्षा होती रहती है। यहाँ शुष्क ऋतु नहीं होती। इस प्रदेश में मुख्य रूप में संवहन वर्षा होती है, परंतु प्रदेश के पर्वतीय भागों में पर्वतीय वर्षा भी होती है। इस प्रदेश में वार्षिक वर्षा का औसत 200 सैंटीमीटर से अधिक होता है।

2. व्यापारिक पवन पेटी (Trade Winds Belt)-ये कटिबंध दोनों गोलार्डों में 7° से 22° अक्षांशों के बीच _फैले हुए हैं। इन कटिबंधों में व्यापारिक और मानसूनी पवनों द्वारा वर्षा होती है। व्यापारिक पवनें महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर वर्षा करती हैं। इन कटिबंधों में वर्षा की मात्रा गर्मी की ऋतु में अधिक होती है। वार्षिक वर्षा का औसत 100 से 200 सैंटीमीटर के बीच होता है परंतु कम वर्षा वाले क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा का औसत 50 सैंटीमीटर से भी कम होता है।

3. उपोष्ण शुष्क कटिबंध (Sub-Tropical Dry Belt) दोनों गोलार्डों में 22° से 33° के बीच ये कटिबंध फैले हुए हैं। इनमें वर्षा की मात्रा कम होती है। वर्ष में 50° सैंटीमीटर से भी कम वर्षा होती है। इन कटिबंधों के पश्चिमी भागों में विशाल मरुस्थल स्थित हैं क्योंकि यहाँ पहुँचते-पहुँचते पवनें शुष्क हो जाती हैं। इनके निकट शीतल धाराएँ भी बहती हैं।

4. भूमध्य सागरीय प्रदेश (Mediterranean Regions)—ये प्रदेश 33° से 44° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में स्थित हैं। शीतकाल में ये उच्च वायु दाब का केंद्र होते हैं, इसीलिए यहाँ वर्षा नहीं होती। परंतु सर्दी की ऋतु में पश्चिमी पवनों की पेटी के प्रभाव में आ जाने के कारण यहाँ वर्षा होती है।

5. पश्चिमी पवन कटिबंध (Westerlies Belt) दोनों गोलार्डों में 40° से 61° अक्षांशों के बीच विस्तृत इन कटिबंधों में पश्चिमी पवनों द्वारा सारा साल वर्षा होती है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 150 से 200 सैंटीमीटर के बीच होती है।

6. ध्रुवीय प्रदेश (Polar Region)—ये प्रदेश दोनों गोलार्डों में 60°–90° अक्षांशों के बीच स्थित हैं। यहाँ वर्षा हिम के रूप में होती है।

1. संवहन वर्षा (Convectional Rainfall)-थल पर अधिक गर्मी के कारण हवा गर्म होकर फैलती है और हल्की हो जाती है। आस-पास की ठंडी हवा इस हवा का स्थान ले लेती है और गर्म होकर ऊपर उठ जाती है। इस प्रकार संवाहक धाराएँ पैदा हो जाती हैं। इन धाराओं के कारण कुछ ही ऊँचाई पर हवा ठंडी हो जाती है और वर्षा होती है। इसे संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall) कहते हैं। यह वर्षा घनघोर, अधिक मात्रा में और तेज़ बौछारों के रूप में होती है। यह वर्षा स्थानीय गर्मी के कारण होती है। .

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उदाहरण (Examples)-

  • भूमध्य रेखा पर हवा प्रतिदिन दोपहर तक गर्म होकर ऊपर उठती है और शाम को वर्षा होती है।
  • उत्तरी महाद्वीपों के भीतरी भागों में गर्मियों की ऋतु तु चित्र-संवहन वर्षा में कभी-कभी इस प्रकार की वर्षा होती है।

2. पर्वतीय वर्षा (Orographic or Relief Rainfal)—किसी पर्वत के ऊपर उठती हुई, जल वाष्पों से लदी हुई हवा से होने वाली वर्षा को पर्वतीय वर्षा (Relief Rainfall) कहते हैं। इस प्रकार की वर्षा के लिए ज़रूरी है कि हवा में काफी मात्रा में नमी हो और पर्वतों का विस्तार पवन-दिशा में लंबवत् हो। विश्व में अधिकांश वर्षा इसी प्रकार की होती है, पर यह वर्षा पर्वतों की पवनमुखी ढलानों (windward slopes) पर अधिक होती है। पर्वतों की पवन-विमुखी या दूसरी ओर की ढलानों (Leeward Slopes) पर बहुत कम वर्षा होती है। ऐसे प्रदेश वर्षा छाया (Rain Shadow) के प्रदेश कहलाते हैं। पर्वत के दूसरी तरफ नीचे उतर रही हवाएँ (Descending winds) वर्षा नहीं करती हैं। उतरने की क्रिया में दबाव से हवा का तापमान बढ़ जाता है और द्रवीकरण क्रिया नहीं होती। पर्वत के पीछे तक पहुँचते-पहुँचते हवा की नमी समाप्त हो जाती है।

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उदाहरण (Example)-

  • भारत में पश्चिमी घाट पर समुद्र की ओर से आने वाली पवनें लगभग 400 सें०मी० वर्षा करती हैं, परंतु पूर्वी ढलानों पर वर्षा छाया (Rain Shadow) के कारण केवल 65 सें०मी० वर्षा होती है।
  • हिमालय के पीछे स्थित होने के कारण तिब्बत एक वर्षा छाया (Rain Shadow) वाला क्षेत्र है।

3. चक्रवाती वर्षा (Cyclonic Rainfall)-चक्रवातों में गर्म और नम तथा ठंडी और शुष्क हवा के मिलने से एक शक्ति पैदा होती है और यह एक निम्न वायु भार केंद्र बन जाता है। इसके मध्य भाग में ठंडी हवा गर्म हवा को ऊपर उठा देती है। ऊपर उठने पर गर्म हवा के जल वाष्प ठंडे होकर वर्षा के रूप में गिरते हैं।

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PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया

Geography Guide for Class 11 PSEB नमी और वर्षण क्रिया Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न तु (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
सापेक्ष नमी कितने % होती है ?
उत्तर-
100%.

प्रश्न 2.
संघनन के अलग-अलग रूप लिखें।
उत्तर-
हिम, पाला, ओस, धुंध और बादल।

प्रश्न 3.
नमी मापने वाले यंत्र का नाम बताएँ।
उत्तर-
हाइग्रो मीटर।

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प्रश्न 4.
नमी के दो प्रकार बताएँ।
उत्तर-

  1. सापेक्ष नमी
  2. निरपेक्ष नमी।

प्रश्न 5.
सापेक्ष नमी किस इकाई में मापी जाती है ?
उत्तर-
प्रतिशत में।

प्रश्न 6.
वर्षण के भिन्न-भिन्न रूप बताएँ।
उत्तर-
वर्षा, हिम और ओले।

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प्रश्न 7.
वर्षा होने का क्या कारण होता है ?
उत्तर-
संतृप्त हवा का ठंडा होना।

प्रश्न 8.
वर्षा मापने वाले यंत्र का नाम बताएँ।
उत्तर-
रेन-गेज़।

प्रश्न 9.
भूमध्य रेखीय खंड में हर रोज़ की वर्षा किस प्रकार की होती है ?
उत्तर-
संवहनीय वर्षा।

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प्रश्न 10.
पर्वत की ओट की शुष्क ढलान को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
वर्षा छाया।

प्रश्न 11.
भारत में किसी एक वर्षा छाया क्षेत्र का नाम बताएँ।
उत्तर-
दक्षिण पठार।

प्रश्न 12.
शीतकाल में उत्तर-पश्चिमी भारत में किस प्रकार की वर्षा होती है ?
उत्तर-
चक्रवाती।

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प्रश्न 13.
किस प्राकृतिकखंड में सबसे अधिक वर्षा होती है ?
उत्तर-
भूमध्य-रेखीय खंड में।

बहुविकल्पीय प्रश्न

नोट-सही उत्तर चुनकर लिखें-

प्रश्न 1.
विश्व में सबसे अधिक वर्षा के क्षेत्र बताएँ।
(क) भूमध्य रेखीय खंड
(ख) ध्रुवीय प्रदेश
(ग) 20°-30° अक्षांश
(घ) उष्ण कटिबंध।
उत्तर-
भूमध्य रेखीय खंड।

प्रश्न 2.
किस खंड में सबसे अधिक निरपेक्ष नमी होती है ?
(क) भूमध्य रेखा
(ख) मरुस्थल
(ग) ध्रुवीय खंड
(घ) पर्वतीय खंड।
उत्तर-
भूमध्य रेखा।

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प्रश्न 3.
हवा के जलवाष्प के जल में बदलने की क्रिया है
(क) संघनन
(ख) वाष्पीकरण
(ग) विकिरण
(घ) संवहन।
उत्तर-
संघनन।

प्रश्न 4.
सापेक्ष नमी मापक है-
(क) हाइड्रो मीटर
(ख) हाइग्रो मीटर
(ग) बैरोमीटर
(घ) एनिमो मीटर।
उत्तर-
हाइग्रो मीटर।

प्रश्न 5.
पंजाब में शीतकाल की वर्षा किस प्रकार की होती है ?
(क) संवहनीय
(ख) पर्वतीय
(ग) चक्रवाती
(घ) वातावरणीय।
उत्तर-
चक्रवाती।

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अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
नमी किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वायु में जलवाष्प की मात्रा को नमी कहते हैं।

प्रश्न 2.
वाष्पीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जिस क्रिया के द्वारा जल द्रव अवस्था से जलवाष्प के रूप में बदल जाता है, उसे वाष्पीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 3.
वाष्पीकरण की मात्रा किन कारकों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-

  1. शुष्क हवा
  2. तापमान
  3. वायु संचार
  4. जल खंड।

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प्रश्न 4.
संतृप्त वायु से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब वायु किसी निश्चित तापमान पर अपने सामर्थ्य के अनुसार अधिकतम जल वाष्प ग्रहण कर लेती है, उसे संतृप्त वायु कहते हैं।

प्रश्न 5.
निरपेक्ष नमी से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी भी समय वायु के किसी निश्चित आयतन में मौजूद जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष नमी कहते हैं।

प्रश्न 6.
विशिष्ट नमी (Specific Humidity) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वायु में मौजूद जलवाष्प के भार और वायु के भार के अनुपात को विशिष्ट नमी कहा जाता है।

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प्रश्न 7.
सापेक्ष नमी की परिभाषा दें।
उत्तर-
किसी निश्चित तापमान पर वायु में स्थित जलवाष्प की मात्रा और उस तापमान पर अधिकतम जलवाष्प ग्रहण करने के सामर्थ्य के अनुपात को सापेक्ष नमी कहते हैं।

प्रश्न 8.
सापेक्ष नमी ज्ञात करने का फार्मूला लिखें।
उत्तर-
PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया 7

प्रश्न 9.
संघनन क्या होता है ?
उत्तर-
वायु में मौजूद जलवाष्प के जल रूप धारण करने की क्रिया को संघनन कहते हैं।

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प्रश्न 10.
ओस बिंदु (Dew Point) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जिस तापमान पर संघनन क्रिया शुरू होने लगती है, उस तापमान को ओस बिंदु कहते हैं।

प्रश्न 11.
संघनन के अलग-अलग रूपों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. ओस
  2. पाला
  3. धुंध
  4. कोहरा।

प्रश्न 12.
धुंध और कोहरे में क्या अंतर है ?
उत्तर-
हल्के कोहरे को धुंध कहते हैं, जिसमें 2 किलोमीटर की दूरी तक की वस्तुएँ दिखाई देती हैं। घने बादलों के रूप को कोहरा कहते हैं, जिसमें 200 मीटर से अधिक दूर की वस्तुएँ नहीं दिखाई देतीं।

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प्रश्न 13.
स्मॉग (Smog) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
Smoke + Fog के सुमेल से Smog शब्द बनता है। औद्योगिक क्षेत्रों में धुएँ और जलवाष्प जम जाने से घना कोहरा बनता है, जिसे Smog कहते हैं।

प्रश्न 14.
बादल कैसे बनते हैं ?
उत्तर-
जब संघनन क्रिया के बाद जल की बूंदें धूल कणों पर लटकने लगती हैं, तो बादल बनते हैं।

प्रश्न 15.
वर्षण किसे कहते हैं ? इसके अलग-अलग रूप बताएँ।
उत्तर-
किसी क्षेत्र में वायुमंडल से नीचे बरसने वाले कुल पानी की मात्रा को वर्षण कहते हैं। वायुमंडल से वर्षा. जल, बर्फबारी और ओलों का गिरना ही वर्षण कहलाता है। इसके तीन रूप हैं

  1. वर्षा – (Rainfall)
  2. बर्फबारी – (Snowfall)
  3. 37147 – (Hail Stones)

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प्रश्न 16.
एक सैंटीमीटर वर्षा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब वर्षा बिल्कुल सपाट धरती पर पड़े और वर्षा होने के बाद न उसके वाष्प बनें, न ज़मीन ही उसे सोखे और न ही पानी बह जाए और एक सैंटीमीटर पानी की परत धरती पर हो, तब उसे एक सैंटीमीटर वर्षा कहा जाता है।

प्रश्न 17.
सम वर्षा रेखा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सम वर्षा रेखा (Isohyet)-‘Isohyet’ दो शब्दों “Iso’ और ‘hyetos’ के मेल से बना है। ‘ISO’ शब्द का अर्थ है-‘समान’ और ‘hyetos’ शब्द का अर्थ है-‘वर्षा’। इस प्रकार किसी निश्चित समय में हुई समान वर्षा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को सम वर्षा रेखा कहते हैं। (“Isohyetos are the lines joining the places of equal rainfall.”)

प्रश्न 18.
‘वर्षा की छाया’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पर्वतों के सामने वाली पवन-मुखी ढलान पर बहुत वर्षा होती है, परंतु पर्वतों की ओट वाली ढलान शुष्क रह जाती है। पवन-मुखी ढलान के ऊपर उठती पवनें ठंडी होकर वर्षा करती हैं, परंतु ओट वाली ढलान से नीचे उतरती पवनें गर्म होकर शुष्क हो जाती हैं और वर्षा नहीं करतीं। इसलिए पर्वतों की ओट वाली ढलान को वर्षा की छाया (Rain Shadow) कहते हैं।

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लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
वाष्पीकरण किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-
वायु जब जल के संपर्क में आती है, तो जल के कुछ कणों को यह सोख लेती है। जो जल वायु सोखता है, वह जल वायुमंडल में अदृश्य रूप में वायु में मौजूद रहता है। वायुमंडल में इस अदृश्य जल को जलवाष्प (Watervapour) का नाम दिया जाता है। जल के द्रव्य अवस्था से वाष्प रूप में बदल कर वायुमंडल में विलीन हो जाने को वाष्पीकरण (Evaporation) कहा जाता है। वाष्पीकरण की मात्रा और दर चार कारकों पर निर्भर करती है-

  1. शुष्क हवा (Dry Air)-शुष्क हवा में वाष्प सोख लेने का अधिक सामर्थ्य होता है। नम हवा के कारण वाष्पीकरण की मात्रा और दर कम हो जाती है।
  2. तापमान (Temperature)–धरातल पर तापमान के बढ़ जाने से वाष्पीकरण बढ़ जाता है, जबकि ठंडे धरातल पर कम वाष्पीकरण होता है।
  3. वायु संचार (Movement of Air)-वायु की हिलजुल के कारण वाष्पीकरण की मात्रा बढ़ जाती है।
  4. जल खंड (Water Bodies)-बड़े या विशाल महासागरों पर थल भाग की अपेक्षा अधिक वाष्पीकरण होता है।

प्रश्न 2.
नमी से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नमी (Humidity) वायुमंडल में मौजूद नमी को जलवायु मंडलीय नमी (Atmospheric Humidity) कहा जाता है। वायुमंडल में पाई जाने वाली विभिन्न गैसों का अनुपात भू-तल के निकट स्थानों पर लगभग समान रहता है, परंतु जलवाष्प की मात्रा समय और स्थान के अनुसार बदलती रहती है। उदाहरण के तौर पर मरुस्थलीय और शुष्क प्रदेशों में इसकी मात्रा बहुत कम और उष्ण सागरों में बहुत अधिक होती है। जंगलों से ढकी वनस्पति, इनसे रहित भूमि की तुलना में वायुमंडल को अधिक नमी प्रदान करती है। जलवाष्प का आधे से अधिक भाग वायुमंडल की निचली सतहों में लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई तक होता है। वायुमंडल में नमी रखने की शक्ति वायु की गर्मी पर निर्भर करती है। अधिक गर्म वायु जलवाष्प को अधिक मात्रा में सोखने का सामर्थ्य रखती है। इस प्रकार वह कम नम होती है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया

प्रश्न 3.
संवहन वर्षा और पर्वतीय वर्षा में अंतर बताएँ।
उत्तर-
संवहन वर्षा (Convectional Rainfall) –

  1. जब संवहन धाराओं के कारण ऊपर उठती हवा से हवा ठंडी होकर वर्षा करती है, तो उसे संवहन |
  2. यह वर्षा स्थानीय गर्मी के कारण होती है।
  3. यह वर्षा तेज़ बौछार के रूप में थोड़े समय के लिए होती है।
  4. भूमध्य रेखीय खंड में हर रोज़ संवहन वर्षा होती है।

पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall)

  1. किसी पर्वत के सहारे ऊपर उठती हुई नम होने वाली वर्षा को पर्वतीय वर्षा कहते हैं। वर्षा कहते हैं।
  2. यह वर्षा समुद्र से आने वाली नम हवा से होती है।
  3. पर्वतों के सामने वाली ढलान पर अधिक वर्षा होती है और पर्वतों की ओट वाली ढलान शुष्क रहती है।
  4. भारत में मानसून पवनें पश्चिमी घाट पर पर्वतीय वर्षा करती हैं।

प्रश्न 4.
निरपेक्ष नमी और सापेक्ष नमी में क्या अंतर है ? सापेक्ष नमी और वर्षा में संबंध बताएँ। .
उत्तर-
निरपेक्ष नमी (Absolute Humidity) किसी समय किसी तापमान पर हवा में जितनी नमी मौजूद हो, उसे हवा की निरपेक्ष नमी कहते हैं। यह एक ग्राम प्रति घन सैंटीमीटर द्वारा प्रकट की जाती है। तापमान बढ़ने या कम होने पर भी हवा की वास्तविक नमी उतनी ही रहेगी, जब तक कि उसमें और अधिक जल कण शामिल न हों, या कुछ जल कण अलग न हो जाएँ। वाष्पीकरण द्वारा वास्तविक नमी बढ़ जाती है और वर्षा द्वारा कम हो जाती है। हवा के ऊपर उठकर फैलने या नीचे उतरकर सिकुड़ने से भी यह मात्रा कम या बढ़ जाती है। इस प्रकार की वायु की वास्तविक नमी कभी भी स्थिर नहीं रहती है। भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक निरपेक्ष या वास्तविक नमी होती है और ध्रुवों की ओर कम हो जाती है।

सापेक्ष नमी (Relative Humidity)-किसी तापमान पर हवा में कुल जितनी नमी समा सकती है, उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष नमी कहते हैं।
PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया 8

नोट-सापेक्ष नमी को भिन्न की अपेक्षा % से प्रकट किया जाता है।
भूमध्य रेखा पर सापेक्ष नमी अधिक होती है। गर्म मरुस्थलों में सापेक्ष नमी कम होती है। महाद्वीपों के भीतरी क्षेत्रों में सापेक्ष नमी कम होती है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 8 नमी और वर्षण क्रिया

प्रश्न 5.
द्रवीकरण क्या होता है ?
उत्तर-
द्रवीकरण (Condensation)-जिस क्रिया के द्वारा हवा के जल-कण पानी रूप में बदल जाएँ, उसे द्रवीकरण कहते हैं। जल-कणों के वाष्प की स्थिति से तरल स्थिति में बदलने की क्रिया को द्रवीकरण कहते हैं। (“Change of Water-Vapours in to water is called Condensation”.) वायु का तापमान कम होने से, उस वायु की वाष्प ज़ब्त करने की शक्ति कम हो जाती है। कई बार तापमान उस अंक से नीचे इतना कम हो जाता है कि वायु जल-कणों को संभाल नहीं सकती और जल-कण द्रव बनकर वर्षा के रूप में गिरते हैं। इस क्रिया के उत्पन्न होने के कई कारण हैं-

  1. जब हवा लगातार ऊपर उठकर ठंडी हो जाए।
  2. जब नमी से भरी हवा किसी पर्वत के सहारे ऊँची उठकर ठंडी हो जाए।
  3. जब गर्म और ठंडी वायु-राशियाँ आपस में मिलती हों।

प्रश्न 6.
कोहरा और धुंध में अतंर बताएँ।
उत्तर-
कोहरा (Fog)-वायु में अनेक प्रकार के जल-कण, मिट्टी और रेत के कण तैरते रहते हैं। कोहरा एक प्रकार का बादल है, जो धरातल के निकट हवा में धूल के कणों पर लटके हुए जल की बूंदों से बनता है। (Fog is Condensed vapours hanging in the air.”) ठंडे धरातल या ठंडी हवा के संपर्क में आकर नमी से भरी हुई हवा जल्दी ठंडी हो जाती है। हवा में उड़ते रहने वाले धूल-कणों और जल-कणों का कुछ भाग जल की बूंदों के रूप में जमा हो जाता है, जिससे वातावरण धुंधला हो जाता है और दो सौ मीटर से अधिक दूर की वस्तु दिखाई नहीं देती और हवाई जहाज़ों की उड़ानें बंद करनी पड़ती हैं। ऐसा आम तौर पर साफ और शांत मौसम में सर्दी ऋतु की लंबी रातों के कारण होता है, जबकि धरातल पूरी तरह ठंडा हो जाता है। इसे धरती का कोहरा (Ground Fog) भी कहते हैं। नदियों, झीलों और समुद्रों के निकट के प्रदेशों में भी कोहरा मिलता है। औद्योगिक नगरों में धुएँ के साथ उड़ी हुई राख पर जल-बिंदु टिकने से कोहरा छाया रहता है। ऐसी धुएँ से मिली हुई धुंध को Smog कहते हैं। न्यू फांउडलैंड (New Found Land) के किनारे पर खाड़ी की गर्म धारा और लैबरेडोर की ठंडी धारा मिलने के कारण भी कोहरा छाया रहता है।

धुंध (Mist)-हल्के कोहरे को धुंध कहते हैं। (“A thin fog is called a mist.”) कोहरे और धुंध मे कोई बहुत अधिक अंतर नहीं होता क्योंकि दोनों एक जैसी स्थितियों में बनते हैं। कोहरे की अपेक्षा धुंध में घनापन कम होता है और 2 किलोमीटर की दूरी तक की वस्तुएँ दिखाई दे जाती हैं। कोहरे में शुष्कता अधिक होती है, परंतु धुंध में नमी अधिक होती है, पानी की बूंद बड़े आकार की होती हैं। सर्दी की ऋतु में शीतोष्ण कटिबंध में धुंध एक आम बात है। सूर्य निकलने या तेज़ हवाओं के कारण धुंध जल्दी ही समाप्त हो जाती है।

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प्रश्न 7.
ओलों की रचना कैसे होती है ?
उत्तर-
ओले (Hail Stones) जब द्रवीकरण की क्रिया 0°C या 32°F से कम तापमान पर होती है, तो जल वाष्प हिम-कणों में बदल जाते हैं। कई बार तूफान (Thunder Storm) के कारण होने वाली वर्षा में ये हिम-कण ठोस ओलों के रूप में गिरते हैं। नीचे से ऊपर जाने वाली संवहन धाराएँ जल-कणों को बार-बार हिम-कणों के संपर्क में ले आती हैं और उनका आकार बड़ा हो जाता है। धाराओं के वेग के कम होने पर ये नीचे गिरने लगते हैं। जब ओले गिरते हैं, तो बिजली चमकती है, गर्जना होती है और तेज़ हवा चलती है।

प्रश्न 8.
वर्षा किस प्रकार होती है ?
उत्तर-
हवा की नमी ही वर्षा का आधार है। वर्षा होने का प्रमुख कारण है-संतृप्त हवा का ठंडा होना। (“Rainfall is caused due to the cooling of Saturated air.”) वर्षा होने की क्रिया कई चरणों (Stages) में होती है-

1. द्रवीकरण (Condensation) होना-नम हवा के ऊपर उठने से उसका तापमान प्रति 1000 फुट पर 50°C कम हो जाता है। तापमान के लगातार कम होने से हवा की वाष्प शक्ति कम हो जाती है। हवा संतृप्त हो जाती है और द्रवीकरण क्रिया (Condensation) होती है।

2. बादलों का बनना (Formation of Clouds) हवा में लाखों धूल-कण तैरते रहते हैं। जल वाष्प इन कणों पर जमा हो जाते हैं। ये बादलों का रूप धारण कर लेते हैं।

3. जल-कणों का बनना (Formation of Rain Drops)-छोटे-छोटे बादल-कणों के आपस में मिलने से पानी की बूंदें (Rain drops) बनती हैं। जब इन जल कणों का आकार और भार बढ़ जाता है, तो हवा इन्हें संभाल नहीं सकती। ये जल-कण धरती पर वर्षा के रूप में गिरते हैं।

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प्रश्न 9.
ओस और ओस बिंदु में अंतर बताएँ।
उत्तर-
ओस (Dew)-

  1. धरातल और वनस्पति पर जमा पानी की छोटी छोटी बूंदों को ओस कहते हैं।
  2. ओस बनने के लिए लंबी रातें, साफ आकाश और शांत वायुमंडल की ज़रूरत होती है।
  3. धरातलीय विकिरण के कारण हवा ठंडी और संतृप्त हो जाती है तथा जल वाष्प बूंदों में बदल जाते हैं।
  4. ओस बनने के लिए तापमान 0°C से अधिक होता है।

ओस बिंदु (Dew Point)

  1. जिस तापमान पर संघनन की क्रिया शुरू होती है, उसे ओस बिंदु कहते हैं।
  2. तापमान कम होने से हवा ओस बिंदु पर पहुँच जाती है।
  3. जब संतृप्त हवा जल वाष्प जब्त नहीं कर सकती, तो उस तापमान को ओस बिंदु कहते हैं।
  4. ओस बिंदु पर सापेक्ष नमी 100% होती है।

प्रश्न 10.
वर्षा और वर्षण में अंतर बताएँ।
उत्तर-
वर्षा (Rainfall)-

  1. जल-कणों का धरती पर गिरना वर्षा कहलाता है।
  2. वर्षा मुख्य रूप में संवाहक, पर्वतीय और चक्रवाती होती है।
  3. जब जल-कणों का आकार बड़ा हो जाता है, तो वे धरती पर वर्षा के रूप में गिरते हैं।

वर्षण (Precipitation)-

  1. वायुमंडल से नीचे बरसने वाली कुल जल-राशि को वर्षण कहते हैं।
  2. वर्षण मुख्य रूप में तरल और ठोस रूप में होता है।
  3. संघनन के बाद वर्षा, बर्फबारी और ओले वर्षण के प्रमुख प्रकार हैं।

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प्रश्न 11.
कोहरे और धुंध में अंतर बताएँ।
उत्तर-
कोहरा (Fog)

  1. कोहरा एक प्रकार का घना बादल होता है, जो धरातल के निकट हवा में धूल के कणों पर लटके हुए जल की बूंदों से बनता है।
  2. कोहरा घना होता है और इसमें 200 मीटर से अधिक दूर की वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं।
  3. कोहरा शुष्क होता है।
  4. सर्दी ऋतु की लंबी रातों के कारण धरती पर कोहरा बनता है।

धुंध (Mist)

  1. हल्के कोहरे को धुंध कहते हैं। इसमें भी जल-वाष्प के लटके हुए कण होते हैं।
  2. धुंध में घनापन कम होता है और 2 किलोमीटर दूर तक की वस्तुएँ दिखाई देती हैं।
  3. धुंध में नमी अधिक होती है।
  4. सर्दी की ऋतु में शीतोष्ण कटिबंध में धुंध एक साधारण बात है।

प्रश्न 12.
संवहन वर्षा और पर्वतीय वर्षा में अंतर बताएँ।
उत्तर –
संवहन (Convectional Rainfall)

  1. जब संवहन धाराओं के कारण ऊपर उठती हुई हवा ठंडी होकर वर्षा करती है, तो उसे संवहन वर्षा कहते हैं।
  2. यह वर्षा स्थानीय गर्मी के कारण होती है।
  3. यह वर्षा तेज़ बौछार के रूप में थोड़े समय के लिए होती है।
  4. भूमध्य रेखीय खंड में हर रोज़ संवहन वर्षा होती है।

पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall)

  1. किसी पर्वत के सहारे ऊपर उठती हई नम हवा से होने वाली वर्षा को पर्वतीय वर्षा कहते हैं।
  2. यह वर्षा समुद्र से आने वाली नम हवा से होती है।
  3. पर्वतों के सामने की ढलान पर अधिक वर्षा होती है परंतु पर्वतों की ओट वाली ढलान शुष्क रहती है।
  4. भारत में मानसून पवनें पश्चिमी घाट पर पर्वतीय वर्षा करती हैं।

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निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
किसी स्थान की वर्षा किन बातों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
किसी स्थान की वर्षा नीचे लिखी बातों पर निर्भर करती है-
1. भूमध्य रेखा से दूरी (Lattitude)-वर्षा का सीधा संबंध तापमान से होता है। (“Rain follows the sun”) अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में अधिक नमी और अधिक वर्षा होती है। भूमध्य रेखा पर पूरा वर्ष अधिक गर्मी के कारण औसत वार्षिक वर्षा 200 सें०मी० से अधिक होती है, परंतु भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है।

2. समुद्र से दूरी (Distance from the sea)-तट के निकट के स्थानों पर भीतरी स्थानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है। देश के भीतरी भागों तक पहुँचते-पहुँचते पवनों की नमी सूख जाती है।

3. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)-समुद्र से आने वाली पवनें जल-कणों से भरी होती हैं और अधिक वर्षा करती हैं, परंतु थल से आने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

4. पवनों की दिशा (Direction of the Winds)-जिस तरफ से पवनें चलती हैं, उसके निकट के क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है, परंतु दूर के प्रदेशों तक पहुँचने पर हवा की नमी समाप्त हो जाती है और वर्षा नहीं होती।

5. पर्वतों की दिशा (Direction of the Mountains)—पर्वतों की स्थिति और दिशा भी वर्षा पर प्रभाव डालते हैं। यदि कोई पर्वत पवनों की लंबवत् दिशा में स्थित हो, तो वह पवनों को रोक लेता है। अरावली पर्वत के मानसून पवनों के समानांतर होने के कारण राजस्थान में वर्षा नहीं होती।

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प्रश्न 2.
वर्षण से क्या अभिप्राय है ? इसकी किस्में लिखें।
उत्तर-
वर्षण (Precipitation)—जब वायु का तापमान ओस बिंदु से नीचे गिरता है, तो उसमें संघनन क्रिया द्वारा जलवाष्प जल में परिवर्तित हो जाते हैं। जब यह जल किसी-न-किसी रूप में भू-तल पर गिरता है, तो उसे वर्षण कहते हैं। वर्षण तीन रूपों में धरती पर गिरता है। इसके तीन रूप हैं-हिमपात या बर्फ गिरना, ओले और वर्षा ।

1. हिमपात या बर्फ गिरना (Snowfall)—वायु में संघनन होते समय जब इसका तापमान हिम अंक से कम हो जाता है, तो जलवाष्प जल-कणों में नहीं बदलते, बल्कि हिमकणों में बदल जाते हैं। दूसरे शब्दों में, ओस अंक के हिम अंक से नीचे हो जाने पर जलवाष्प ठोस हिमकणों का रूप धारण कर लेते हैं। आरंभ में, हिमकण सूक्ष्म होते हैं, परंतु आपस में मिलकर बड़े आकार के हो जाते है और रूई की तरह भूतल पर गिरते हैं। इन्हें बर्फ के फाहे (Snow flakes) कहते हैं। ध्रुवीय और उच्च अक्षांशों के प्रदेशों और उच्च पर्वतों पर बहुत अधिक सर्दी के कारण भारी हिमपात होता है।

2. ओले (Hail Stones)-संघनन द्वारा जलवाष्प से बनी जल की बूंदें भूतल पर आ रही होती हैं, तो कभी कभी इनके मार्ग में ऐसी वायु-सतह आ जाती है जिसका तापमान हिम अंक से नीचे होता है। इस वायु-सतह को पार करते समय जल की बूंदें ठोस हिम का रूप धारण कर लेती हैं और भूतल पर गिरती हैं। इन्हें ओले कहते हैं। कभी-कभी जलवाष्प से बनी जल की बूंदों को तेजी से ऊपर उठने वाली संवहन धाराएँ इतनी ऊँचाई पर ले जाती हैं, जहाँ तापमान हिम अंक से कम होता है। फलस्वरूप ये बूंदें जमकर ठोस रूप धारण लेती हैं और अपने भार के करण भूतल पर ओलों के रूप में गिरती हैं।

3. वर्षा (Rainfall) वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प घने होकर जब बूंदों का रूप धारण करके भू-तल पर गिरते हैं, तो उसे वर्षा कहते हैं। वायु का तापमान जब ओस से नीचे हो जाता है, तो उसके जलवाष्प सूक्ष्म जलकणों में परिवर्तित होकर बादलों का रूप धारण कर लेते हैं। बादलों में जलकण अत्यंत सूक्ष्म होते हैं, जिनका व्यास एक मिलीमीटर के 100वें भाग के बराबर होता है। ये सूक्ष्म जल-कण आसानी से लटके रहते हैं और भूतल पर गिरने में असमर्थ होते हैं।

यदि वे किसी प्रकार नीचे गिर भी जाते हैं, तो भूतल तक पहुँचने से पहले ही इनका वाष्पीकरण हो जाता है। इन जलकणों का आकार तब बढ़ता है, जब जलवाष्प अधिक मात्रा में जल का रूप धारण करें, भाव उसका तापमान ओस अंक से अधिक नीचे हो जाए। जब जलकणों का आकार एक मिलीमीटर के पाँचवें भाग के बराबर होता है, तो वे वर्षा की बंदों के रूप में भू-तल पर आ गिरते हैं।

गतका (Gattka) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions गतका (Gattka) Game Rules.

गतका (Gattka) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें (TIPS TO REMEMBER)

  1. गतके के प्लेटफार्म का आकार = गोल
  2. प्लेटफार्म का व्यास = 30”- 34″
  3. गतके छड़ की लम्बाई = 39 इंच
  4. छड़ी का भार = 500 ग्राम (लगभग)
  5. छड़ी बनी है = बैंत की
  6. छड़ी की मोटाई = लगभग % इंच
  7. बाउट का समय = 5 मिनट
  8. खिलाड़ियों की पोशाक = जर्सी या कमीज़, सिर पर पटका आवश्यक
  9. अधिकारी = 4 सदस्यों की रैफरी काउंसिल (1 मैदान के भीतर 3 बाहर साईड रैफरी) 2 स्कोरर, 1 टाइम कीपर
  10. फ्री का आकार = 9 इंच व्यास (लगभग)
  11. प्रतियोगिता का समय = 3 मिन्ट (1.5 मिन्ट + 1.5 मिनट)(अन्तराल 30 सैकंड)
  12. गतके के मैदान का परिमाप (घेरा) = भीतरी परिमाप (घेरा) 30 फुट व्यास, बाहरी परिमाप (घेरा) 34 फुट व्यास

शस्त्रों (हथियारों) की सूची

  1. तलवार
  2. ढाल
  3. वर्षा
  4. गंडासी
  5. कमंद तोड़
  6. छड़ी
  7. कटार
  8. गदा
  9. खण्डा
  10. तेग।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

गतका खेल की संक्षेप रूप-रेखा (Brief outline of the Gattka)

  1. गतके की खेल में सात खिलाड़ी होते हैं जिनमें पांच प्रतियोगिता में भाग लेते हैं। दो खिलाड़ी बदलने होते हैं।
  2. गतके का प्लेटफार्म गोल और यह 71 मीटर रेडियम का होता है।
  3. गतके की लम्बाई हत्थी से तीन फुट (3′) की होती है जो बैंत की बनी होती है।
  4. गतके की बाऊट का समय पांच मिनट होता है।
  5. गतके की खेल में तीन जज, एक रैफरी और एक टाईम कीपर होता है।

PSEB 11th Class Physical Education Guide गतका (Gattka) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
गतके की प्रतियोगिता में कौन-कौन से आय वर्ग होते हैं ?
उत्तर-
अंडर 17 वर्ष, अंडर 19 वर्ष, अंडर 22 वर्ष, अंडर 25 वर्ष।

प्रश्न 2.
गतके की प्रतियोगिता में सिंगल लाठी टीम इवेंट में कुल कितने खिलाड़ी होते हैं ?
उत्तर-
गतके की प्रतियोगिता में सिंगल लाठी टीम इवेंट में खिलाड़ियों की गिनती 3 + 1 = 4.

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 3.
गतके की प्रतियोगिता में ग्राउंड को कितने भागों में बांटा जाता है ?
उत्तर-
तीन भागों में खेल क्षेत्र, बाहर का क्षेत्र और आरक्षित क्षेत्र।

प्रश्न 4.
गतके की प्रतियोगिता में बाहरी क्षेत्र क्या होता है ?
उत्तर-
गतके के खेल क्षेत्र से बाहर वाले भाग को खेल का बाहरी क्षेत्र कहते हैं।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 5.
गतके की प्रतियोगिता के लिये साधारण नियम कौन से हैं ?
उत्तर-

  1. सभी प्रतियोगिता के लिए ड्रा निकालने से पहले बाऊट के लिए खिलाड़ियों के नाम A, B, C, D, E लिए जाते हैं।
  2. गतके की प्रतियोगिता में A नाम वाला खिलाड़ी विरोधी की टीम के A वाले खिलाड़ी से बाऊट में भाग लेना।
  3. उन मुकाबलों में जिनमें चार से अधिक प्रतियोगी हों पहली सीरीज़ के लिए बाई निकाली जाती है ताकि दूसरी सीरीज़ में प्रतियोगियों की संख्या कम हो जाए।
  4. पहली सीरीज़ में जिन खिलाड़ियों को बाई मिलती है वह दूसरी सीरीज़ में पहले गतका खेलेंगे। यदि बाइयों की संख्या विषम हो तो अंतिम बाई प्राप्त करने वाला खिलाड़ी दूसरी सीरीज़ में पहले मुकाबले के विजेता से बाऊट में भाग लेगा।
  5. कोई भी प्रतियोगी पहली सीरीज़ में बाई और दूसरी सीरीज़ में Walk Over नहीं ले सकता न ही किसी को लगातार दो वाक ओवर मिलते हैं।

प्रश्न 6.
गतके के खेल को सिक्खों के किस गुरु का आशीर्वाद प्राप्त है?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी और गुरु गोबिंद सिंह जी का।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

Physical Education Guide for Class 11 PSEB गतका (Gattka) Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
गतका के प्लेटफार्म, पोशाक और समय के बारे में लिखें।
उत्तर-
प्लेटफार्म-गतके का प्लेटफार्म गोल दायरा होता है जो 15 मीटर का होता है। पोशाक-प्रतियोगी जर्सी अथवा कमीज़ पहन सकता है परन्तु सिर पर पटका होना आवश्यक है।
गतके का साइज़-गतका बैत का होता है जिसकी हत्थी होती है और उस से लगी तीन फुट की बैत की छड़ लगी होती है।
समय-प्रत्येक बाऊट का समय पांच मिनट होता है।

प्रश्न 2.
गतका में ड्रा, बाई और वाक ओवर के बारे में बताइए।
उत्तर-
डा, बाई और वाक ओवर
Draw, Byes and Walkover

  1. सभी प्रतियोगिता के लिए ड्रा निकालने से पहले बाऊट के लिए खिलाड़ियों के नाम A, B, C, D, E लिये जाते
  2. गतके की प्रतियोगिता के A नाम वाला खिलाड़ी विरोधी की टीम के A वाले खिलाड़ी से बाऊट में भाग लेगा।
  3. उन मुकाबलों में जिनमें चार से अधिक प्रतियोगी हों। पहली सीरीज़ के लिए बाई निकाली जाती है ताकि दूसरी सीरीज़ से प्रतियोगियों की संख्या कम हो जाए।
  4. पहली सीरीज़ में जिन खिलाडियों को बाई मिलती है वह दूसरी सीरीज़ के पहले गतका खेलेंगे यदि बाइयों की संख्या विषम हो तो अन्तिम बाई प्राप्त करने वाला खिलाड़ी दूसरी सीरीज़ में पहले मुकाबले के जेतू के बाऊट में भाग लेगा।
    गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 1
  5. कोई भी प्रतियोगी पहली सीरीज़ में बाईं और दूसरी सीरीज़ में walkover नहीं ले सकता न ही किसी को लगातार दो वाक ओवर मिलते हैं।
    गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 2

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 3.
गतका खेल में 20 प्रतियोगियों की बाऊट निकालने की सारणी बनाओ।
उत्तर-
सारणी-बाऊट की बाइयां निकालना

प्रविष्टियों की संख्या बाऊट बाई
5. 1 3
6. 2 2
7. 3 1
8. 4
9. 1 7
10. 2 6
11. 3 5
12. 4 4
13. 5 3
14. 6 2
15. 7 1
16. 8
17. 1 15
18. 2 14
19. 3 13
20. 4 12

 

प्रश्न 4.
गतका खेल की प्रतियोगिता कैसे करवाई जाती है ?
उत्तर-
गतके की प्रतियोगिता
(Competition of Gattka)
प्रतियोगिताओं की सीमा-किसी भी प्रतियोगिता में पांच प्रतियोगियों को भाग लेने की आज्ञा है।
नया ड्रा (Fresh Draw)—यदि किसी एक ही स्कूल/कॉलेज/अथवा क्लब के दो सदस्यों का पहली सीरीज़ में ड्रा निकल जाए तो उनमें एक-दूसरे के पक्ष में प्रतियोगिता से निकलना चाहे तो नया ड्रा निकाला जाएगा।

वापसी (Withdraw)-ड्रा निकालने के बाद यदि प्रतियोगी बिना किसी कारण के प्रतियोगिता से हटना चाहे तो अधिकारी प्रबन्धकों को इसकी सूचना देगा।

रिटायर होना (Retirement)—यदि कोई प्रतियोगी किसी कारण मुकाबले से रिटायर होना चाहता है तो उसे अधिकारी को सूचित करना होगा।

बाई (Byes)—पहली सीरीज़ के बाद उत्पन्न होने वाली बाइयों के लिए वह विरोधी छोड़ दिया जाता है जिससे अधिकारी सहमत हो।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 5.
गतका प्रतियोगिता में बाऊट को कौन नियन्त्रण करता है ?
उत्तर-
बाऊट का नियन्त्रण
(Bout’s Control)

  1. सभी प्रतियोगिताओं के मुकाबले एक रैफरी, तीन जजों, एक टाइम कीपर द्वारा करवाए जाते हैं। जब तीन से कम जज हों तो रैफरी स्कोरिंग पेपर को पूरा करेगा। प्रदर्शनी बाऊट एक रैफरी द्वारा कण्ट्रोल किया जाएगा।
  2. रैफरी एक स्कोर पैड या जानकारी स्लिप का प्रयोग खिलाड़ियों के नाम के लिए करेगा। इन सब स्थितियों को जब कि बाऊट चोट लगने के कारण या किसी अन्य कारणवश स्थगित हो जाए तो रैफरी इस पर रिपोर्ट करके अधिकारी को देगा।
  3. टाइम कीपर प्लेटफार्म के एक ओर बैठेगा तथा जज तीन ओर बैठेंगे।

सीटें इस प्रकार की होंगी कि वे खिलाड़ियों को संतोषजनक ढंग से देख सके। ये दर्शकों से अलग होंगे।

प्वाईंट देना
(Awarding of Points)

  1. सभी प्रतियोगिताओं में जज प्वाईंट देंगे।
  2. प्रत्येक राऊंड के अन्त में प्वाईंट स्कोरिंग पेपर पर लिखे जाएंगे तथा बाऊट के अन्त में जमा किए जाएंगे।
  3. प्रत्येक जज को विजेता मनोनीत करना होगा उसे अपने स्कोरिंग पेपर पर हस्ताक्षर करने होंगे।

स्कोरिंग
(Scoring)

  1. जो गतके का खिलाड़ी अपने विरोधी को सबसे अधिक बार गतके से छूएगा उसे उतने ही अंक मिलेंगे। सिर पर छू लेने के 2 अंक बाकी एक अंक मिलेगा।
  2. यदि बाऊट में दोनों खिलाड़ियों के मिले अंक बराबर हों तो सिर को जिस खिलाड़ी ने अधिक बार छूआ हो उसे विजेता घोषित किया जाएगा। यदि जज यह सोचे कि वह इन दोनों पक्षों में बराबर है तो वह अपना निर्णय उस खिलाड़ी के पक्ष में देगा जिसने अच्छी सुरक्षा (Defence) का प्रदर्शन किया हो।

बाऊट रोकना
(Stopping the Bout)

  1. यदि रैफरी के मतानुसार एक खिलाड़ी को चोट लगने के कारण खेल जारी नहीं रख सकता या बाऊट बन्द कर देता है तो उसके विरोधी को विजेता घोषित कर दिया जाता है।
  2. रैफरी को बाऊट रोकने का अधिकार है।
  3. यदि कोई प्रतियोगी समय पर बाऊट को शुरू करने में असमर्थ होता है तो वह बाऊट हार जाएगा।

शक्ति फाऊल
(Suspected Foul)
यदि रैफरी को फाऊल का सन्देह हो जाए जिसे उसने स्वयं साफ नहीं देखा वह जजों की सलाह ले सकता है तथा उसके अनुसार अपना फैसला दे सकता है ।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 6.
गतका खेल में त्रुटियां लिखें।
उत्तर-
त्रुटियां
(Fouls)

  1. कोहनी को मारना
  2. गर्दन या सिर के नीचे जान-बूझ कर चोट लगाना।
  3. गिरे हुए प्रतियोगी को मारना।
  4. पकड़ना।
  5. सिर या शरीर के भार लेटना।
  6. रफिंग।
  7. कन्धे मारना।
  8. कुश्ती करना।
  9. निरन्तर सिर ढक कर रखना।
  10. कानों पर दोहरी चोट मारना।

PSEB 6th Class Agriculture Objective Questions and Answers

Punjab State Board PSEB 6th Class Agriculture Book Solutions Agriculture Objective Questions and Answers.

PSEB 6th Class Agriculture Objective Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

पंजाब में कृषि-एक झलक

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाब में कितने क्षेत्रफल में कृषि होती है ?
(i) 40 लाख हैक्टेयर
(ii) 14.34 लाख हैक्टेयर
(iii) 100 लाख हैक्टेयर
(iv)64.43 लाख हैक्टेयर।
उत्तर-
(i) 40 लाख हैक्टेयर।

प्रश्न 2.
सफेद क्रांति का संबंध किससे है ?
(i) मछली पालन
(ii) फसलों से
(iii) दूध पैदावार
(iv)धान से।
उत्तर-
(iii) दूध पैदावार।

रिक्त स्थान भरें-

  1. पंजाब में …………. प्रतिशत क्षेत्र सिंचाई के अधीन है।
  2. पंजाब दूध की पैदावार में …… स्थान पर है।
  3. …………… सहकारी संस्था गांव में से दूध ले लेती है।

उत्तर-

  1. 98
  2. चौथे
  3. मिल्कफेड।

गलत/ठीक –

  1. 1980 में कृषि वृद्धि दर 4.6% थी।
  2. पराली को आग लगाने से मिट्टी के उपजाऊ तत्त्व भी जल जाते हैं।
  3. पंजाब में 50% से अधिक क्षेत्रफल में पानी का स्तर 20 मीटर से गहरा हो गया है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✓)।

भूमि

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डाकर भूमि को ……… भूमि भी कहा जाता है।
(i) भारी
(ii) हल्की
(iii) काली
(iv) रेतली।
उत्तर-
(i) भारी।

प्रश्न 2.
रेतली भूमि कौन-से इलाके में मिलती है।
(i) राजस्थान
(ii) ओडिशा
(iii) आसाम
(iv) बिहार।
उत्तर-
(i) राजस्थान।

प्रश्न 3.
दक्षिण पश्चिमी पंजाब में कैसी मिट्टी मिलती है ?
(i) रेतली
(ii) चिकनी
(iii) मैरा से चिकनी
(iv) मैरा।
उत्तर-
(i) रेतली।

रिक्त स्थान भरें –

  1. भूमि बनने में कई कारक सहायता करते हैं जैसे ……….।
  2. लाल मिट्टी में ………. की मात्रा अधिक होती है।
  3. उत्तर पूर्वी इलाके में ………… से भूमिक्षरण की समस्या बहुत अधिक है।
  4. दक्षिण-पश्चिमी पंजाब में मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा ……….. की कमी ___ होती है।

उत्तर-

  1. चट्टानें तथा जलवायु
  2. आयरन ऑक्साइड
  3. पानी
  4. पोटाशियम।

गलत/ठीक –

  1. रेतली भूमि में पानी रोकने की क्षमता सब से कम होती है।
  2. कपास के लिए काली मिट्टी अच्छी रहती है।
  3. मैरा भूमि में जैविक मादा अधिक होता है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✓)।

फ़सलों का विभाजन

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गर्म जलवायु की फसल है।
(i) कमाद
(ii) कपास
(iii) धान
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

प्रश्न 2.
तेल बीज फसलें हैं।
(i) अलसी
(ii) गेहूँ
(ii) अदरक
(iv) चने।
उत्तर-
(i) अलसी।

प्रश्न 3.
सावनी की फसलें हैं।
(i) कपास
(i) बाजरा
(iii) मूंगी
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

प्रश्न 4.
करुसीफरी फैमिली की फसलें हैं।
(i) सरसों
(ii) तोरिया
(ii) मूली
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

रिक्त स्थान भरें –

  1. भिंडी ……….. फैमिली की फसल है।
  2. मक्की ………….. फैमिली की फसल है।
  3. गन्ना …………. वर्षीय फसल है।
  4. गन्ना तथा ……… चीनी वाली फसलें हैं।
  5. राजस्थान में होने वाली फसलें ……… होती हैं।

उत्तर-

  1. मालवेसी
  2. घास
  3. बहु
  4. चुकंदर
  5. बरानी।

गलत/ठीक –

  1. हल्दी मसाले वाली फसल है।
  2. सट्ठी मूंगी संकटकाल की फसल है।
  3. गेहूँ गर्म जलवायु की फसल है।
  4. बरसीम चारे वाली फसल है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✗)
  4. (✓)।

बहुविकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
पौधों में लगभग कितने प्रतिशत पानी होता है –
(i) 60%
(ii) 90%
(iii) 50%
(iv) 80%।
उत्तर-
(ii) 90%।

प्रश्न 2.
घरेलू आवश्यकताओं के लिए कितने प्रतिशत पानी प्रयोग होता है –
(i) 50%
(ii) 20%
(iii) 8%
(iv) 15%।
उत्तर-
(iii) 8%।

प्रश्न 3.
पानी निकालने के लिए प्रयोग में आते हैं –
(i) पशु
(ii) मछली मोटर
(iii) पंखे वाले पम्प
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

रिक्त स्थान भरें –

  1. सबमर्सीबल पम्प को ……… पम्प भी कहते हैं।
  2. हल्की मिट्टी में ………. सिंचाई की आवश्यकता है।
  3. ………….. के समय मिट्टी में उचित नमी होनी चाहिए।
  4. खड़े पानी में खेत की जुताई करने को …………. कहते हैं।

उत्तर-

  1. मछली
  2. अधिक
  3. बुआई
  4. कद्दू करना।

गलत/ठीक –

  1. खड़े पानी में खेत की जुताई को कद्दू करना कहते हैं।
  2. पानी फसल को लू से बचाता है।
  3. 1980 में ट्यूबवेलों की संख्या 6 लाख से अधिक थी।
  4. बनावटी ढंग से फसलों को पानी देने को सिंचाई कहते हैं।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✓)
  4. (✓)।

खादें

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पौधों को कितने पोषक तत्त्वों की आवश्यकता है –
(i) 10
(ii) 17
(iii) 20
(iv) 25
उत्तर-
(ii) 17

प्रश्न 2.
हरी खाद के लिए प्रयोग होने वाली फसल है –
(i) चा
(ii) गेहूँ
(iii) धान
(iv) कोई नहीं।
उत्तर-
(i) लैंचा।

प्रश्न 3.
फॉस्फोरस तत्त्व वाली खाद है –
(i) यूरिया
(ii) म्यूरेट ऑफ पोटाश
(iii) जिंक कार्बोनेट
(iv) कोई नहीं।
उत्तर-
(iv) कोई नहीं।

प्रश्न 4.
यूरिया में कितने प्रतिशत नाइट्रोजन होती है –
(i) 50%
(ii) 46%
(iii) 70%
(iv) 16%
उत्तर-
(ii) 46%

रिक्त स्थान भरें-

  1. म्यूरेट ऑफ पोटाश में पोटाश तत्त्व ………. प्रतिशत होता है।
  2. नाइट्रोजन खाद की अधिक मात्रा में प्रयोग से भूमि में …………. पन बढ़ जाता है
  3. फॉस्फोरस खादें ………………….. नाम के खनिज पदार्थों से बने हैं।
  4. डी.ए.पी. में ………….. तत्त्व होता है।

उत्तर-

  1. 60%
  2. खारा
  3. एक फास्फेट
  4. फॉस्फोरस।

गलत/ठीक

  1. खादें 10 प्रकार की होती हैं।
  2. हवा में 78% नाइट्रोजन गैस के रूप में है।
  3. म्यूरेट ऑफ पोटाश में 60% पोटाश तत्त्व होता है।

उत्तर-

  1. (✗)
  2. (✓)
  3. (✓)

कृषि के लिए मशीनरी तथा यन्त्र

बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
ट्रैक्टर की हार्स पावर ……. होती है।
(i) 2
(ii) 5-90
(iii) 1000
(iv) कोई नहीं।
उत्तर-
(i) 5-901

प्रश्न 2.
पंजाब में कितने ट्रैक्टर हैं –
(i) 2 लाख
(ii) 10 लाख
(iii) 4.76 लाख
(iv) 7.46 लाख।
उत्तर-
(iii) 4.76 लाख।

प्रश्न 3.
पंजाब में ……. ट्यूबवेल बिजली से चलते हैं
(i) 11.5 लाख
(ii) 15 लाख
(iii) 17.9 लाख
(iv) 13.17 लाख।
उत्तर-
(i) 11.5 लाख।

प्रश्न 4.
जंदरा …………… काम आता है –
(i) जुताई में
(ii) मेढ़ बनाने में
(iii) समतल करने में
(iv) बुआई में।
उत्तर-
(ii) मेढ़ बनाने में।

रिक्त स्थान भरें –

  1. सुहागा भूमि को ………… तथा ………….. करने के काम आता है।
  2. कल्टीवेटर का प्रयोग तवियों के बाद ……… जुताई के लिए किया जाता है।
  3. ट्रांसप्लांटर द्वारा ………. की बुआई होती है।
  4. खुरपी से ………… की जाती है।
  5. रीपर का प्रयोग ………. के लिए होता है।

उत्तर-

  1. समतल/भुरभुरा
  2. दूसरी
  3. धान
  4. गुड़ाई
  5. कटाई।

गलत/ठीक –

  1. ट्रांसप्लांटर का प्रयोग धान की बुआई के लिए होता है।
  2. जंदरे का प्रयोग खेत में मेढ़ें बनाने के लिए होता है।
  3. डीज़ल ईंजन ट्रैक्टर से बड़ी मशीन होती है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✗)।

पंजाब के मुख्य फल

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमरूद की किस्म नहीं है –
(i) सरदार
(ii) कलकत्तिया
(iii) इलाहाबाद सफैदा
(iv) पंजाब पिंक।
उत्तर-
(ii) कलकत्तिया।

प्रश्न 2.
फलों का राजा है
(i) अमरूद
(ii) आँवला
(iii) आम
(iv) बेर।
उत्तर-
(iii) आम।

प्रश्न 3.
टमाटर की तुलना में अमरूद में विटामिन-सी कितना अधिक है –
(i) 5 गुणा
(ii) 20 गुणा
(iii) 10 गुणा
(iv) 2 गुणा।
उत्तर-
(iii) 10 गुणा।

प्रश्न 4.
लीची की किस्म है
(i) प्रभात
(ii) सनौर-2
(iii) देहरादून
(iv) बग्गुगोशा।
उत्तर-
(ii) देहरादून।

प्रश्न 5.
बेर की किस्में हैं’
(i) उमरान
(ii) विलायती
(iii) सनौर-2
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

रिक्त स्थान भरें –

  1. गरेपफ्रूट …………. जाति का फल है।
  2. पंजाब का, आम की पैदावार में ………. स्थान है।
  3. ………. औरतों के स्तन कैंसर के लिए लाभदायक है।
  4.  ……….. रक्त साफ करता है।
  5. ………… ठण्डे इलाके का फल है।
  6.  पंजाब पिंक …………. की किस्म है।

उत्तर-

  1. नींबू
  2. तीसरा
  3. लीची
  4. बेर
  5. आड़
  6. अमरूद।

गलत/ठीक –

  1. उमरान आम की किस्म है।
  2. आम की कृषि में पंजाब तीसरे स्थान पर है।
  3. केले में पोटाशियम अधिक होता है।

उत्तर-

  1. (✗)
  2. (✓)
  3. (✓)।

पंजाब की मुख्य सब्जियाँ

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भिण्डी की किस्म है
(i) पंजाब-7
(ii) पंजाब-छुहारा
(iii) पूसा स्नोवाल-1
(iv) पंजाब-88।
उत्तर-
(i) पंजाब-7

प्रश्न 2.
प्याज की किस्म है
(i) पंजाब व्हाइट
(ii) पंजाब नरोया
(iii) पी.आर.ओ-6
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

प्रश्न 3.
बैंगन की वर्ष में कितनी फसलें ली जा सकती हैं –
(i) 2
(ii) 3
(iii) 10
(iv) 4.
उत्तर-
(iv) 4.

प्रश्न 4.
पत्तेदार सब्जी नहीं हैं –
(i) शलगम
(ii) धनिया
(iii) मेथी
(iv) पालक।
उत्तर-
(i) शलगम।

प्रश्न 5.
कदू जाति की सब्जी नहीं है –
(i) करेला
(i) टमाटर
(iii) खरबूजा
(iv) खीरा
उत्तर-
(ii) टमाटर।

रिक्त स्थान भरें –

  1. कुफरी पुखराज ……… की किस्म है।
  2. पालक ………. ऋतु की सब्जी है।
  3. पंजाब नगीना ………….. की किस्म है।
  4. मटर के बीज को ……………… का टीका लगाया जाता है।
  5. गोभी की फसल ………. दिनों में तैयार हो जाती है।

उत्तर-

  1. आलू
  2. सर्द
  3. बैंगन
  4. राइज़ोबीयम
  5. 90-100।

गलत/ठीक –

  1. पी.सी. 34 गाजर की किस्म है।
  2. मिर्च के लिए 200 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है।
  3. पंजाब छुहारा टमाटर की किस्म है।
  4. पंजाब सदाबहार आलू की किस्म है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✓)
  4. (✗)।

मुख्य फूल और

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पौधे हवा में से …… गैस खींचते हैं।
(i) ऑक्सीजन
(ii) नाइट्रोजन
(iii) कार्बन डाइआक्साइड
(iv) कोई नहीं।
उत्तर-
(iii) कार्बन डाइआक्साइड।

प्रश्न 2.
सर्द ऋतु का फूल है –
(i) फ्लाक्स
(ii) वरबीना
(iii) गेंदा
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

प्रश्न 3.
कुक्कड़ कलगा को ………. माह में लगाया जाता है –
(i) मार्च
(ii) जुलाई
(iii) दिसम्बर
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(ii) जुलाई।

प्रश्न 4.
छिपकली लता ………… की सहायता से दीवार पर चढ़ती है –
(i) काँटे
(ii) रिस रहे पदार्थ
(iii) टैंडरिल
(iv) कोई नहीं।
उत्तर-
(ii) रिस रहे पदार्थ।

प्रश्न 5.
सजावट के लिए गमलों में लगाए जाने वाले पौधे हैं –
(i) मनी प्लांट
(ii) रबड़ प्लांट
(iii) पालक
(iv) सभी।
उत्तर-
(iv) सभी।

रिक्त स्थान भरें –

  1. गमफरीना …………. ऋतु का फूल है।
  2. …………. को पतझड़ की रानी कहा जाता है।
  3. हिवसकस के फूल का रंग …….. है।
  4. गोल्डन शावर को दीवार पर चढ़ने में ………. सहायक हैं।
  5. ……….. झुकी शाखाओं वाला वृक्ष है।

उत्तर-

  1. गर्मी
  2. गुलदौदी
  3. लाल
  4. टैंडरिल
  5. बोतल ब्रश।

गलत/ठीक –

  1. फलाक्स की पनीरी अक्तूबर-नवम्बर में तैयार की जाती है।
  2. रजनीगंधा फूलों का तेल निकाला जाता है।
  3. बोतल ब्रश के फूल लाल रंग के होते हैं।
  4. गुलाब से गुलकंद बनता है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✓)
  4. (✓)।

कृषि सहायक व्यवसाय

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गर्मी ऋतु की खुम्ब है –
(i) बटन
(ii) मिल्की खुम्ब
(iii) औइस्टर
(iv) शिटाकी।
उत्तर-
(i) मिल्की खुम्ब।

प्रश्न 2.
मधु-मक्खी पालन से शहद के इलावा मिलता है –
(i) बी-वैनम
(ii) रॉयल-जैली
(iii) वी-वैक्स
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीक।

प्रश्न 3.
दोगली किस्म की गाय है
(i) होलसटीन फ्रीजीयन
(ii) जर्सी
(iii) दोनों ठीक
(iv) दोनों गलत।
उत्तर-
(iii) दोनों ठीक।

प्रश्न 4.
फलों तथा सब्जियों से क्या बनाया जाता है –
(i) अचार
(ii) मुरब्बे
(iii) सक्वै श
(iv) सभी ठीक।
उत्तर-
(iv) सभी ठीका

रिक्त स्थान भरें-

  1. पंजाब में ……… बटन खुम्बों की कृषि की जाती है।
  2. ………. मक्खी की किस्म पंजाब में अधिक प्रचलित है।
  3. जरसी तथा …………. दोगली गाय है।

उत्तर-

  1. 90%
  2. इटैलिटयन
  3. होलसटीन फ्रीजीयन।

गलत/ठीक –

  1. बटन गर्मी ऋतु की खुम्बें हैं।
  2. पंजाब में इटैलियन मक्खी प्रचलित है।
  3. जर्सी दोगली किस्म की गाय है।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✓)।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीतिक व प्रणाली शब्द का अलग-अलग अर्थ स्पष्ट करते हुए राजनीतिक प्रणाली की कोई र विशेषताएं बताएं।
(Describe the word Political and System separately and also write any three features of Political System.)
अथवा राजनैतिक प्रणाली की परिभाषा लिखो। इसकी मुख्य विशेषताओं का विस्तार सहित वर्णन करो। (Define Political System. Write main characteristics of Political System.)
उत्तर-
आलमण्ड (Almond) तथा पॉवेल (Powell) के अनुसार, तुलनात्मक राजनीति से सम्बन्धित प्रकाशित पुस्तकों में राजनीतिक व्यवस्था (Political System) शब्दावली का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जा रहा है। पुरानी पाठ्य-पुस्तकें आमतौर पर राजनीतिक व्यवस्था के लिए ‘सरकार’, ‘राष्ट्र’ या ‘राज्य’ जैसे शब्दों का प्रयोग करती थीं। यह नवीन शब्दावली उस नए दृष्टिकोण का प्रतिबिम्ब है जो राजनीतिक व्यवस्था को एक नए ढंग से देखते हैं। आलमण्ड तथा पॉवेल आदि लेखकों का विचार है कि प्राचीन युग में प्रयोग होने वाले ये शब्द वैधानिक और संस्थात्मक अर्थों (Legal and Institutional Meanings) द्वारा सीमित है। आलमण्ड तथा पॉवेल का कहना है कि यदि वास्तव में राजनीति विज्ञान को प्रभावशाली बनाना है तो हमें विश्लेषण के अधिक व्यापक ढांचे की आवश्यकता है और वह ढांचा व्यवस्था विश्लेषण (System Analysis) का है। आलमण्ड तथा पॉवेल ने लिखा है, “राजनीतिक व्यवस्था की अवधारणा अधिक लोकप्रिय होती जा रही है क्योंकि यह किसी भी समाज के राजनीतिक क्रियाओं के सम्पूर्ण क्षेत्र की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है।”

राजनीतिक व्यवस्था का अर्थ (Meaning of the Political System)-राजनीतिक व्यवस्था शब्द के दो भाग हैं-राजनीति तथा व्यवस्था। इन दोनों के अर्थ को समझने के बाद ही राजनीतिक व्यवस्था अथवा प्रणाली का अर्थ समझा जा सकता है। – 1. राजनीतिक (Political)-राजनीतिक शब्द सत्ता अथवा शक्ति का सूचक है। किसी भी समुदाय या संघ को राजनीतिक उस समय कहा ज सकता है जबकि उसकी आज्ञा का पालन प्रशासकीय कर्मचारी वर्ग द्वारा शारीरिक बल प्रयोग के भय से करवाया जात है । अरस्तु ने राजनीतिक समुदाय को अत्यधिक प्रभुत्व-समन्न तथा अन्तर्भावी र गठन’ (The most sovereign and inclusive association) परिभाषित किया है।” अरस्तु के मतानुसार, “राजनीतिक समुदाय के पास सर्वोच्च शक्ति होती है जो इसको अन्य समुदायों अथवा संघों से अलग करती है। अरस्तु के बाद अनेक विद्वानों ने इस बात को स्वीकार किया है कि राजनीतिक सम्बन्धों में सत्ता, शासन और शक्ति किसी-न-किसी प्रकार । निहित है।

आलमण्ड तथा पॉवेल (Almond and Powell) ने राजनीतिक समुदाय की इस शक्ति को कानूनी शारीरिक बलात् शक्ति (Legitimate Physical Coercive Powers) का नाम दिया है।
मैक्स वैबर (Max Webber) के अनुसार, “किसी भी समुदाय को उस समय राजनीतक माना जा सकतज उसके आदेशों को एक निश्चित भू-क्षेत्र में लगातार शक्ति के प्रयोग अथवा शक्ति-प्रयोग की धमकी द्वारा मनवाया । सकता हो।”

डेविड ईस्टन (David Easton) ने राजनीतिक जीवन को इस प्रकार परिभाषित किया है- “यह अन्तक्रियाओं का समूह अथवा प्रणाली है जो इस तथ्य से अलंकृत है कि यह एक समाज के लिए सत्तात्मक मूल्य निर्धारण से कम या अधिक सम्बन्धित है।” (“A set or system of interactions defined by the fact that they are more or less directly related to the authoritative allocation of values for a society.”) लॉसवैल तथा कॉप्लान (Lasswell and Kaplan) ने ‘घोर-हानि’ (Severe Deprivation) की बात की है। राबर्ट ए० डाहल (Robert A. Dahl) ने ‘शक्ति , शासन तथा सत्ता’ (Power, Rule and Authority) का वर्णन किया है।

विभिन्न विद्वानों के विचारों के आधार पर हम कह सकते हैं कि राजनीति का सम्बन्ध ‘शक्ति’, ‘शासन’ तथा ‘सत्ता’ से होता है और जिस समुदाय के पास ये गुण होते हैं उसे राजनीतिक समुदाय कहा जाता है।

2. व्यवस्था या प्रणाली (System)—व्यवस्था (System) शब्द का प्रयोग अन्तक्रियाओं (Interaction) के समूह ) का संकेत करने के लिए किया जाता है।

ऑक्सफोर्ड शब्दकोष (Concise Oxford Dictionary) के अनुसार, “प्रणाली एक पूर्ण समाप्ति है, सम्बद्ध वस्तुओं अथवा अंशों का समूह है, भौतिक या अभौतिक वस्तुओं का संगठित समूह है।” (A system is a complex whole, a set of connected things or parts, organised body of material or immaterial things.”)

वान बर्टलैंफी (Von Bertalanffy) के अनुसार, “प्रणाली (System) पारस्परिक अन्तक्रिया (Interaction) में बन्धे हुए तत्त्वों का समूह है।” (“System is a set of elements standing in interaction.”)

ए० हाल एवं आर० फैगन (A. Hall and R. Fagen) के अनुसार, “प्रणाली” पात्रों (Objects), पात्रों में पारस्परिक सम्बन्धों तथा पात्रों के लक्षणों के पारस्परिक सम्बन्धों का समूह है।” (“System is a set of objects together with relations between the objects and between their attitudes.”)

कालिन चैरे (Colin Cheray) के अनुसार, “प्रणाली” कई अंशों से मिलकर बनी एक समष्टि (Whole) कई लक्षणों का समूह है।” (“System is a whole which is compounded of many parts-an ensemble of attitudes.”)

आलमण्ड तथा पॉवेल (Almond and Powell) के अनुसार, “एक व्यवस्था से अभिप्राय भागों (Parts) की परस्पर निर्भरता और उसके तथा उसके वातावरण के बीच किसी प्रकार की सीमा से है।” (A system implies interdependence of parts of boundary of some kind between it and its environment.”)

विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं की विवेचना से स्पष्ट है कि व्यवस्था (System) एक पूर्ण इकाई होती है, जिसके कई भाग होते हैं और ये भाग एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। उदाहरणस्वरूप मानव शरीर एक व्यवस्था है। मानव शरीर के अनेक अंग हैं और ये सभी अंग अथवा भाग एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं तथा एक-दूसरे को और सम्पूर्ण मानव शरीर को भी प्रभावित करते हैं। ___ एक व्यवस्था के अन्दर कुछ आधारभूत विशेषताएं होती हैं जैसे कि एकता, नियमितता, सम्पूर्णता, संगठन, सम्बद्धता (Coherence), संयुक्तता (Connection) तथा अंशों अथवा भागों का अन्योन्याश्रय (Interdependence of parts)।

इस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था उन अन्योन्याश्रित सम्बन्धों के समूह को कहा जा सकता है जिसके संचालन में सत्ता या शक्ति का भी हाथ है।

व्यवस्था में निम्नलिखित विशेषताएं पाई जाती हैं-

  • व्यवस्था भिन्न-भिन्न अंगों या हिस्सों के जोड़ों से बनती है।
  • व्यवस्था के भिन्न-भिन्न अंगों में परस्पर निर्भरता होती है।
  • व्यवस्था के अंगों में एक-दूसरे को प्रभावित करने की समर्थता होती है।
  • व्यवस्था की अपनी सीमाएं होती हैं।
  • व्यवस्था में उप-व्यवस्थाएं (Sub-System) भी पाई जाती हैं।
  • प्रत्येक व्यवस्था में सम्पूर्णता का गुण होता है।
  • प्रत्येक व्यवस्था में एक इकाई के रूप में कार्य करने की योग्यता होती है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था

प्रश्न 2.
राजनीतिक प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें। (Describe the main characteristics of Political System.)
अथवा
आलमण्ड के अनुसार राजनीतिक प्रणाली की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (Describe the characteristics of Political System according to Almond.)
अथवा
राजनीतिक प्रणाली की मुख्य विशेषताओं की व्याख्या करें। (Explain main characteristics of Political System.)
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था की विभिन्न परिभाषाओं से राजनीतिक व्यवस्था की विशेषताओं का पता चलता है। आलमण्ड के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं अग्रलिखित हैं-

1. मानवीय सम्बन्ध (Human Relations)–जिस प्रकार राज्य के लिए जनसंख्या का होना अनिवार्य है, उसी प्रकार राजनीतिक व्यवस्था के लिए मनुष्यों के परस्पर स्थायी सम्बन्धों का होना आवश्यक है। बिना मानवीय सम्बन्धों के राजनीतिक व्यवस्था नहीं हो सकती। परन्तु सभी प्रकार के मानवीय सम्बन्धों को राजनीतिक व्यवस्था का अंग नहीं माना जा सकता। केवल उन्हीं मानवीय सम्बन्धों को राजनीतिक व्यवस्था का अंग माना जाता है जो राजनीतिक व्यवस्था की कार्यशीलता को किसी-न-किसी तरह प्रभावित करते हों।

2. औचित्यपूर्ण शक्ति का प्रयोग (Use of Legitimate Force)-राजनीतिक व्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण शारीरिक दण्ड देने की शक्ति के प्रयोग करने के अधिकार के अस्तित्व को स्वीकार किया जाना है। इस गुण के आधार पर ही राजनीतिक व्यवस्था को अन्य व्यवस्थाओं से अलग किया जाता है। जिस प्रकार प्रभुसत्ता राज्य का अनिवार्य तत्त्व है और प्रभुसत्ता के बिना राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह औचित्यपूर्ण शारीरिक दबाव शक्ति (Legitimate Physical Coercive Power) के बिना राजनीतिक व्यवस्था का अस्तित्व सम्भव नहीं है। प्रत्येक समाज में शान्ति और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तथा अपराधियों को दण्ड देने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है, परन्तु शक्ति का प्रयोग औचित्यपूर्ण होना चाहिए। औचित्यपूर्ण शक्ति के द्वारा ही राजनीतिक व्यवस्था के सभी कार्य चलते हैं।

3. व्यापकता (Comprehensiveness)-आलमण्ड के विचारानुसार, व्यापकता का अर्थ है कि राजनीतिक व्यवस्था में निवेश तथा निर्गत (Inputs and Outputs) की वे सभी प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जो शक्ति के प्रयोग या शक्ति प्रयोग की धमकी को किसी भी रूप में प्रभावित करती हैं। अन्य शब्दों में आलमण्ड के मतानुसार राजनीतिक व्यवस्था में केवल संवैधानिक अथवा कानूनी ढांचों जैसे कि-विधानमण्डल, न्यायपालिका, नौकरशाही आदि को ही सम्मिलित नहीं किया जाता बल्कि इसमें अनौपचारिक (Informal) संस्थाओं जैसे कि राजनीतिक दल, दबाव समूह, निर्वाचक मण्डल आदि के साथ-साथ सभी प्रकार के राजनीतिक ढांचों के राजनीतिक पहलुओं को भी शामिल किया जाता है।

4. उप-व्यवस्थाओं का अस्तित्व (Existence of Sub-System)-राजनीतिक व्यवस्था में कई उप-व्यवस्थाएं भी पाई जाती हैं, जिनके सामूहिक रूप को राजनीतिक व्यवस्था कहा जाता है। इन उप-व्यवस्थाओं में परस्पर निर्भरता होती है तथा वे एक-दूसरे की कार्यविधि को प्रभावित करती हैं। जैसे-विधानपालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल, प्रशासनिक विभाग तथा दबाव समूह इत्यादि राजनीतिक व्यवस्था की उप-व्यवस्थाएं हैं। इन उप-व्यवस्थाओं की कार्यशीलता से राजनीतिक व्यवस्था की कार्यशीलता प्रभावित होती है।

5. अन्तक्रिया (Interaction)-राजनीतिक व्यवस्था के सदस्यों अथवा इकाइयों में अन्तक्रिया हमेशा चलती रहती है। राजनीतिक व्यवस्था के सदस्यों में व्यक्तिगत अथवा विभिन्न समूहों के रूप में सम्पर्क बना रहता है तथा वे एक-दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। इकाइयों में अन्तक्रिया न केवल निरन्तर होती है बल्कि बहुपक्षीय होती है।

6. अन्तर्निर्भरता (Interdependence) अन्तर्निर्भरता राजनीतिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण गुण है। आलमण्ड (Almond) के मतानुसार राजनीतिक व्यवस्था में अनेक उप-व्यवस्थाओं (Sub-systems) के राजनीतिक पहलू भी सम्मिलित हैं। उसके विचारानुसार राजनीतिक व्यवस्था की जब एक उप-व्यवस्था में परिवर्तन आता है तो इसका प्रभाव अन्य व्यवस्थाओं पर भी पड़ता है। उदाहरणस्वरूप आधुनिक युग में संचार के साधनों का बहुत विकास हुआ है। संचार के साधनों के विकास के साथ चुनाव विधि, चुनाव व्यवहार, राजनीतिक दलों की विशेषताओं, विधानमण्डल तथा कार्यपालिका की रचना तथा कार्यों पर काफ़ी प्रभाव पड़ा है। इसी प्रकार श्रमिक वर्ग को मताधिकार देने में राजनीतिक दलों, दबाव समूहों, सरकारों के वैधानिक तथा कार्यपालिका अंगों पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

7. सीमाओं की विद्यमानता (Existence of Boundaries)-सीमाओं की विद्यमानता राजनीतिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण गुण है। सीमाओं की विद्यमानता का अर्थ है कि प्रत्येक व्यवस्था किसी एक स्थान से शुरू होती है और किसी दूसरे स्थान पर समाप्त होती है। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था की कुछ सीमाएं होती हैं जो उसको अन्य व्यवस्थाओं से अलग करती हैं। राजनीतिक व्यवस्था की सीमाएं राज्य की तरह क्षेत्रीय सीमाएं नहीं होतीं। ये मानवीय सम्बन्धों तथा क्रियाओं की सीमाएं होती हैं। सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं की सीमाएं सदैव एक-जैसी अथवा निश्चित नहीं होतीं। प्राचीन तथा परम्परागत समाज में राजनीतिक व्यवस्था की सीमाएं इतनी स्पष्ट नहीं होती जितनी कि आधुनिक समाज में। जैसे-जैसे किसी व्यवस्था का आधुनिकीकरण तथा विकास होता है वैसे ही कार्यों के विशेषीकरण के कारण ये सीमाएं स्पष्ट होती जाती हैं। राजनीतिक व्यवस्था की सीमाओं में समयानुसार परिवर्तन आते रहते हैं। कई बार राजनीतिक व्यवस्था की सीमाएं किसी घटना के कारण बढ़ भी सकती हैं और कम भी हो सकती हैं।

8. खुली व्यवस्था (Open System)-राजनीतिक व्यवस्था एक खुली व्यवस्था होती है, “जिस कारण समय, वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार उसमें परिवर्तन होता रहता है। यदि राजनीतिक व्यवस्था बन्द व्यवस्था हो तो उस पर परिस्थितियों का प्रभाव ही न पड़े और ऐसी व्यवस्था में राजनीतिक व्यवस्था टूट सकती है।”

9. अनुकूलता (Adaptability)-राजनीतिक व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता अनुकूलता है। राजनीतिक व्यवस्था समय और परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको परिवर्तित करने की विशेषता रखती है। उदाहरणस्वरूप भारत की राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप शान्ति के समय कुछ और होता है और संकटकाल में उसका स्वरूप बदल जाता है और संकटकाल समाप्त होने के बाद फिर परिवर्तित हो जाता है। वही राजनीतिक व्यवस्था स्थायी रह पाती है जो समय और परिस्थितियों के अनुसार बदल जाती है।

10. वातावरण (Environment) किसी भी व्यवस्था पर उसके वातावरण का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक तथा आवश्यक है। वातावरण से तात्पर्य है वे परिस्थितियां जो उसे चारों ओर से घेरे हुए हों। समाज के वातावरण या परिस्थितियों का राजनीतिक प्रणाली पर प्रभाव पड़ता है और उसे हम सामान्य रूप से राजनीतिक प्रणाली का वातावरण भी कह सकते हैं । व्यक्ति अपने समाज की आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से बचे रहते हैं और इस प्रकार उनका राजनीतिक प्रणाली पर प्रभाव पड़ता है। समाज में स्थित सभी समुदाय या संस्थाएं कभी-न-कभी, किसी-न-किसी रूप में राजनीतिक प्रणाली के वातावरण में रहती हैं और कभी-कभी यह उसका अंग भी बन जाती हैं। जैसे कि कोई मजदूर संघ वैसे तो राजनीतिक प्रणाली का वातावरण है, परन्तु जब वे सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करते हैं या सरकार पर कोई कानून बनाने के लिए जोर देते हैं तो वे राजनीतिक प्रणाली का अंग भी बन जाते हैं।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था

प्रश्न 3.
राजनीतिक प्रणाली के निकास कार्य लिखें। (Describe the output functions of Political System.)
अथवा
राजनीतिक प्रणाली के निवेश और निकास कार्यों का वर्णन करो।
(Write input and output functions of Political System.)
अथवा
राजनीतिक प्रणाली का अर्थ बताते हुए इसके निवेश कार्यों की व्याख्या करें।
(Describe the meaning of ‘Political System’ and also explain its ‘Input Functions’.)
उत्तर-
राजनीतिक प्रणाली की परिभाषा-इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें।
राजनीतिक प्रणाली के कार्य-आलमण्ड ने राजनीतिक व्यवस्था के दो प्रकार के कार्यों का वर्णन किया हैनिवेश कार्य (Input Functions) तथा निर्गत कार्य (Output Functions)।

(क) निवेश कार्य (Input Functions)-निवेश कार्य गैर-सरकारी उप-प्रणालियों, समाज तथा सामान्य वातावरण द्वारा पूरे किए जाते हैं। जैसे-दल, दबाव समूह, समाचार-पत्र आदि।
आलमण्ड ने राजनीतिक व्यवस्था के चार निवेश कार्य बतलाए हैं – (1) राजनीतिक समाजीकरण तथा भर्ती, (2) हित स्पष्टीकरण, (3) हित समूहीकरण, (4) राजनीतिक संचारण।

1. राजनीतिक समाजीकरण तथा भर्ती (Political Socialisation and Recruitment) आरम्भ में बच्चे राजनीति से अनभिज्ञ होते हैं और उसमें रुचि भी नहीं लेते परन्तु जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं उनके मन में भी धीरे-धीरे राजनीतिक वृत्तियां बैठती जाती हैं। वे राजनीति में भाग लेना आरम्भ करते हैं और अपनी भूमिका निभानी आरम्भ करते हैं। इसे ही राजनीतिक समाजीकरण कहते हैं।

आलमण्ड व पॉवेल के अनुसार, राजनीतिक समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा राजनीतिक संस्कृतियां (Political Cultures) स्थिर रखी जाती हैं अथवा उनको परिवर्तित किया जाता है। इस प्रकार के सम्पादन के माध्यम से पृथक्-पृथक् व्यक्तियों को राजनीतिक संस्कृति में प्रशिक्षित किया जाता है तथा राजनीतिक उद्देश्य की ओर उनके उन्मुखीकरण (Orientations) निर्धारित किए जाते हैं। राजनीति संस्कृति के ढांचे में परिवर्तन भी राजनीतिक समाजीकरण के माध्यम से आते हैं। अतः राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया का उपयोग, परिवर्तन लाने अथवा यथास्थिति बनाए रखने, दोनों ही के लिए हो सकता है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। कभी बन्द नहीं होती। राजनीतिक दल, हितसमूह व दबाव-समूह आदि राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा अधिक-से-अधिक लोगों को अपनी मान्यताओं के प्रति जागरूक कर, लोगों को इनकी ओर आकर्षित करते हैं। लोकतन्त्रात्मक व्यवस्थाओं में राजनीतिक समाजीकरण का महत्त्व और भी अधिक होता है क्योंकि राजनीतिक दलों का सफल होना अथवा न होना इसी पर निर्भर करता है।

राजनीतिक व्यवस्था में समाजीकरण के साथ-साथ भर्ती का काम भी चलता रहता है। पुरानी भूमिकाएं बदलती रहती हैं और उनका स्थान नई भूमिकाएं लेती रहती हैं। पदाधिकारी बदल दिए जाते हैं, मर जाते हैं और उनका स्थान स्वाभाविक रूप से नए व्यक्ति ले लेते हैं। आलमण्ड व पॉवेल के अनुसार, “राजनीतिक भर्ती से अभिप्राय उस कार्य से है जिसके माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था की भूमिकाओं की पूर्ति की जाती है।” (“We use the term political recruitment to refer to the function by means of which the rolls of political system are filled.”) राजनीतिक भर्ती सामान्य आधार पर भी हो सकती है और विशिष्ट आधार पर भी। पदाधिकारियों का चुनाव जब योग्यता के आधार पर किया जाता है तो उसे सामान्य आधार पर ही हुई भर्ती कहा जाता है। जब कोई भर्ती किसी विशेष वर्ग या कबीले या दल से की जाती है तो विशिष्ट आधार पर हुई भर्ती कही जाती है।

2. हित स्पष्टीकरण (Interest Articulation) अपने-अपने हितों की रक्षा करने के लिए प्रत्येक राजनीतिक प्रणाली के सदस्य अपनी प्रणाली की कुछ मांगें पेश किया करते हैं। जिस तरीके से इन मांगों को सही रूप प्रदान किया जाता है तथा जिस प्रकार से ये मांगें प्रणाली के निर्णयकर्ताओं को प्रस्तुत की जाती हैं उसे हित स्पष्टीकरण की प्रक्रिया कहा जाता है। आलमण्ड व पॉवेल के अनुसार, पृथक्-पृथक् व्यक्तियों तथा समूहों द्वारा राजनीतिक निर्णयकर्ताओं से मांग करने की प्रक्रिया को हम हित स्पष्टीकरण कहते हैं।” (“The process by which individuals and groups make demands upon the political decision makers we call interest articulation.”) राजनीतिक व्यवस्था में जिन अधिकारियों के पास नीति निर्माण व निर्णय लेने का अधिकार होता है, उनके सामने विभिन्न व्यक्ति तथा समूह अपनी मांगें पेश करते हैं अर्थात् अपने हित का स्पष्टीकरण करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था में हित स्पष्टीकरण एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया होती है क्योंकि समाज के अन्तर्गत जब तक समूह या संघ अपने हित को स्पष्ट नहीं कर पाते, तब तक उनके हित की पूर्ति के लिए कानून या नीति निर्माण करना सम्भव नहीं। यदि समूह या संघ को अपने हित का स्पष्टीकरण करने का अवसर नहीं दिया जाता तो उसका परिणाम हिंसात्मक कार्यविधियां होता है। हित स्पष्टीकरण के कई साधन हैं। लिखित आवेदन-पत्रों, सुझावों, वक्तव्यों और कई बार प्रदर्शनियों द्वारा यह कार्य होता है। मजदूर संघ या छात्र संघ आदि हड़ताल भी करते हैं और कई बार हिंसात्मक तरीके भी अपनाते हैं। हित स्पष्टीकरण के समुचित एवं स्वस्थ साधन वर्तमान विशेषतः प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाओं की विशेषता होती है।

3. हित समूहीकरण (Interest Aggregration)-विभिन्न संघों के हितों की पूर्ति के लिए अलग-अलग कानून या नीति का निर्माण नहीं किया जा सकता। विभिन्न संघों या समूहों के हितों को इकट्ठा करके उनकी पूर्ति के लिए एक सामान्य नीति निर्धारित की जाती है। विभिन्न हितों को इकट्ठा करने की क्रिया को ही हित समूहीकरण कहा जाता है। आलमण्ड व पॉवेल के शब्दों में, “मांगों को सामान्य नीति स्थानापन्न (विकल्प) में परिवर्तित करने के प्रकार्य को हित समूहीकरण कहा जाता है।” (“The function of converting demands into general policy alternatives is called interest aggregation.”) यह प्रकार्य दो प्रकार से सम्पादित हो सकता है। प्रथम, विभिन्न हितों को संयुक्त और समायोजित करके तथा द्वितीय, एक देश नीति के प्रतिमान में निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों की राजनीतिक भर्ती द्वारा। यह प्रकार्य राजनीतिक व्यवस्था में नहीं बल्कि सभी कार्यों में पाया जाता है। मानव अपने विभिन्न हितों को इकट्ठा करके एक बात कहता है। हित-समूह अपने विभिन्न उपसमूहों या मांगों का समूहीकरण करके अपनी मांग रखते हैं। राजनीतिक दल विभिन्न समुदायों या संघों की मांगों को ध्यान में रखकर अपना कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। इस प्रकार हित समूहीकरण राजनीतिक व्यवस्था में निरन्तर होता रहता है।

4. राजनीतिक संचार (Political Communication) राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार का बहुत महत्त्व है, क्योंकि इसके द्वारा ही अन्य सभी कार्य सम्पादित होते हैं। सभी व्यक्ति चाहे वे नागरिक हों या अधिकारी वर्ग से सम्बन्धित हों, सूचना पर ही निर्भर रहते हैं और उनके अनुसार ही उनकी गतिविधियों का संचालन होता है। इसलिए प्रजातन्त्र में प्रेस तथा भाषण की स्वतन्त्रता पर जोर दिया जाता है जबकि साम्यवादी राज्यों एवं तानाशाही राज्यों में उन पर प्रतिबन्ध लगाने की बात की जाती है। संचार के साधन निश्चय ही राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। संचार के बिना हित स्पष्टीकरण का काम हो ही नहीं सकता। आधुनिक प्रगतिशील समाज में संचार-व्यवस्था को जहां तक हो सका है, तटस्थ बनाने की कोशिश की गई है और इसकी स्वतन्त्रता एवं स्वायत्तता को स्वीकार कर लिया गया है।

लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था में संचार-व्यवस्था बहुमुखी, शक्तिशाली, समाज एवं शासक वर्ग में तटस्थ, लोचशील और प्रसारात्मक होती है। आलमण्ड एवं पॉवेल (Almond and Powell) के शब्दों में, “विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं का परीक्षण करने के लिए, राजनीतिक संचार के निष्पादन (Performance) का विश्लेषण एवं तुलना अत्यन्त रुचिपूर्ण एवं उपयोगी माध्यम है।” (“The analysis and comparison of the performance of political communication is one of the most interesting and useful means of examining different political systems.”) तुलनात्मक अध्ययनों में राजनीतिक संचार पर चार दृष्टियों से विचार किया जाता है-सूचनाओं में समरसता (Homogeneity), गतिशीलता (Mobility), मात्रा (Volume) तथा दिशा (Direction)

(ख) निर्गत कार्य (Output Functions)–राजनीतिक व्यवस्था के निर्गत कार्य शासकीय क्रिया-कलापों में काफ़ी समानता रखते हैं। यद्यपि आलमण्ड ने स्वयं स्वीकार किया है कि निर्गत कार्य परम्परागत सक्ति पृथक्करण सिद्धान्त में वर्णित सरकारी अंगों के कार्यों से काफ़ी मिलते-जुलते हैं। फिर भी उसने इनको सरकारी कार्य-कलापों के स्थान पर निर्गत कार्य ही कहना अधिक उपयुक्त समझा है। डेविस व लीविस (Davis and Lewis) के शब्दों में, “इसका उद्देश्य संस्थाओं के विवरण पर अधिक बल देने के विचार को परिवर्तित करता है क्योंकि विभिन्न देशों में एक ही प्रकार की संस्थाओं के अलग-अलग प्रकार्य हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त इसके पीछे इन संस्थाओं द्वारा सम्पादित किए जाने वाले कार्य-कलापों की व्याख्या करने के लिए प्रकार्यात्मक अवधारणाओं का एक सैट प्रस्तुत करने की भावना भी उपस्थित है।”

जिस प्रकार सरकार के मुख्य कार्य तीन हैं-कानून-निर्माण, कानूनों को लागू करना और विवादों को निपटाना है, उसी प्रकार निर्गत कार्य तीन हैं
(1) नियम बनाना। (2) नियम लागू करना। (3) नियम निर्णयन कार्य।

1. नियम बनाना (Rule Making)-समाज में व्यक्तियों के रहने के लिए आवश्यक है कि उनके पारस्परिक सम्बन्धों को नियमित करने के लिए नियम होने चाहिएं। राजनीतिक व्यवस्था में नियम बनाने का कार्य मुख्यतः व्यवस्थापिकाओं तथा उप-व्यवस्थापन अभिकरणों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में इस कार्य को किया जाता है। आलमण्ड के विचारानुसार, ‘विधायन’ (Legislation) शब्द के स्थान पर ‘नियम निर्माण’ शब्द का प्रयोग उचित है क्योंकि ‘विधायन’ शब्द से कुछ विशेष संरचना तथा निश्चित प्रक्रिया का बोध होता है जबकि अनेक राजनीतिक व्यवस्थाओं में नियम निर्माण कार्य एक उलझी हुई (Diffuse) प्रक्रिया है जिसे सुलझाना तथा उसका विवरण देना कठिन होता है।

विधायन का काम औपचारिक तौर पर स्थापित संरचनाएं ही किया करती हैं जिन्हें संसद् अथवा कांग्रेस अथवा विधानपालिका कहा जाता है और जो सुनिश्चित एवं औपचारिक प्रक्रियाओं द्वारा ही काम करती हैं। परन्तु कुछ ऐसी राजनीतिक व्यवस्थाएं भी होती हैं जिनमें ऐसी औपचारिक संरचनाएं अथवा ऐसी औपचारिक प्रक्रियाएं होती ही नहीं। इस प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में नियम निर्धारण का कार्य एक अलग ढंग से किया जाता है। आधुनिक लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं में नियम निर्धारण का कार्य प्रायः कई जगहों पर कई पात्रों द्वारा किया जाता है। एल० ए० हठ ने नियमों के ऐसे प्रकारों का वर्णन किया है-प्राथमिक तथा अनुपूरक। प्रारम्भिक समाज में कुछ ऐसे प्राथमिक नियम थे जो व्यक्तियों के यौन सम्बन्धों, बल प्रयोग, आज्ञा पालन आदि के कामों को नियमित करते थे। ये नियम अटल थे और इनको बदला नहीं जा सकता था।

ऐसे नियमों को लागू करने के लिए तथा उनके उल्लंघन किए जाने पर दण्ड के नियम बनाए गए जिन्हें अनुपूरक नियम कहते हैं। यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो संविधान भी अनुपूरक नियमों का समूह है, प्राथमिक नियमों का नहीं। आलमण्ड एवं पॉवेल के मतानुसार, संविधानवाद की यह मान्यता है, “नियमों का निर्माण निश्चित प्रकार की सीमाओं के अन्तर्गत विशिष्ट संस्थाओं द्वारा निश्चित विधियों से होना चाहिए।” (“Rule must be made in certain ways and by specific institutions and within certain kinds of limitations.”)

2. नियम लागू करना (Rule Application)-राजनीतिक व्यवस्था का कार्य केवल नियम बनाना ही नहीं है, बल्कि उन नियमों को लागू करना भी है। नियमों को यदि सही ढंग से लागू नहीं किया जाता तो नियम बनाने का लक्ष्य ही समाप्त हो जाता है और उचित परिणामों की उम्मीद नहीं की जा सकती। राजनीतिक व्यवस्था में नियमों को लागू करने की ज़िम्मेदारी पूर्णतः सरकारी कर्मचारियों या नौकरशाही की होती है। यहां तक कि न्यायालयों के निर्णय भी कर्मचारी वर्ग द्वारा लागू किए जाते हैं। कभी-कभी नियम निर्माण करने वाली संरचनाओं द्वारा भी यह कार्य किया जाता है, परन्तु विकसित राजनीतिक व्यवस्थाओं के नियम प्रयुक्त संरचनाएं नियम निर्माण करने वाली संरचनाओं से पृथक् होती हैं।

3. नियम निर्णयन कार्य (Rule Adjudication)—समाज में जब कोई नियम बनाया जाता है, उसके उल्लंघन की भी सम्भावना सदैव बनी रहती है। अत: यह आवश्यक हैं-जो व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता है उसे दण्ड अवश्य मिलना चाहिए। इसलिए नियमों में ही उसकी अवहेलना करने पर दण्ड देने का प्रावधान रहता है, परन्तु यह निर्णय करना पड़ता है कि नियमों को वास्तव में ही भंग किया गया है अथवा नहीं और अगर नियम भंग हुआ है तो किस सीमा तक तथा उसे कितना दण्ड दिया जाना चाहिए ? इसके अतिरिक्त कई बार नियमों के अर्थ पर विवाद उत्पन्न हो जाता है। ऐसी स्थिति में नियमों के अर्थ को भी स्पष्ट करना पड़ता है। प्रायः सभी आधुनिक लोकतन्त्रात्मक राज्यों में यह कार्य न्यायालयों द्वारा किए जाते हैं, परन्तु सर्वसत्तावादी (Totalitarian) प्रणालियों में गुप्त पुलिस केवल लोगों पर निगरानी रखने एवं उन पर दोषारोपण करने का ही काम नहीं करती बल्कि वह तो उन पर चलाया गया मुकद्दमा भी सुनती हैं और उन्हें सज़ा सुना कर स्वयं सजा को लागू भी करती है। व्यवस्था (System) को बनाए रखने के लिए नियम निर्णयन का कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण है। अतः एक अच्छी राजनीतिक व्यवस्था में न्यायालयों को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र रखा जाता है ताकि न्यायाधीशों का निष्पक्षता को कायम रखा जा सके और नागरिकों का विश्वास बना रहे।

निष्कर्ष (Conclusion) उपर्युक्त कार्य प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था को अवश्य करने पड़ते हैं। इन कार्यों के अतिरिक्त प्रत्येक देश की राजनीतिक व्यवस्था को विशेष परिस्थितियों में अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विशेष कार्य करने पड़ते हैं। सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं के कार्य समान नहीं होते क्योंकि देश की राजनीतिक व्यवस्था को अपने देश की परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार नीतियों का निर्माण करना पड़ता है और उनके अनुसार कार्य करने पड़ते हैं।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था

प्रश्न 4.
निवेश-निकास प्रक्रिया के रूप में डेविड ईस्टन के राजनीतिक प्रणाली के मॉडल (रूप) की व्याख्या कीजिए।
(Explain David Easton’s model of Political system as input and output Process.)
अथवा
डेविड ईस्टन के विचारानुसार राजनीतिक प्रणाली के कार्यों की व्याख्या करो।
(Discuss the functions of Political System according to David Easton.)
अथवा
डेविड ईस्टन के अनुसार राजनीतिक प्रणाली के कार्यों का वर्णन कीजिए। (Discuss the functions of Political System with reference to the views of David Easton.)
उत्तर-
डेविड ईस्टन ने 1953 में ‘राजनीतिक प्रणाली’ (Political System) नामक पुस्तक प्रकाशित करवाई थी। उस पुस्तक में डेविड ईस्टन ने राजनीतिक प्रणाली की धारणा की विवेचना की थी। डेविड ईस्टन ने राजनीतिक प्रणाली को निवेशों (Inputs) को निकासों (Outputs) में बदलने की प्रक्रिया बताया है।

निवेश क्या हैं? (What are Inputs ?)-डेविड ईस्टन ने एक विशेष रूप में विचार अभिव्यक्त किया है। उसके मतानुसार, “निवेश उस कच्चे माल के समान है जो राजनीतिक प्रणाली नामक मशीन में पाये जाते हैं।” जिस तरह किसी मशीन में कच्चे माल के बिना कोई तैयार माल अथवा वस्तु प्राप्त नहीं हो सकती है, उसी तरह निवेश रूपी कच्चा माल राजनीतिक प्रणाली रूपी मशीन में डालने के बिना राजनीतिक प्रणाली कोई सत्ताधारी निर्णय नहीं ले सकती है। ऐसे सत्ताधारी निर्णयों को डेविड ईस्टन ने निकास (Outputs) का नाम दिया है। निवेशों के दो रूप (Two Types of Inputs)-डेविड ईस्टन के अनुसार, निवेश दो प्रकार के होते हैं

(क) मांगों के रूप में निवेश (Inputs in the form of demands)-जब लोग राजनीतिक प्रणाली से कुछ मांगों की पूर्ति की मांग करते हैं तो मांगों के रूप में निवेश होते हैं। डेविड ईस्टन ने मांगों के रूप में निवेशों को चार प्रकार का माना है

1. वस्तुओं तथा सेवाओं के विभाजन के लिये मांगें (Demands for the allocation of goods and services)-व्यक्ति सरकार से उचित वेतन, कार्य करने के लिये निश्चित समय, शिक्षा प्राप्त करने की सुविधाएं, यातायात के साधन, स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएं इत्यादि की मांग करते हैं। इनको डेविड ईस्टन ने वस्तुओं तथा सेवाओं को व्यवस्था की मांगें कहा है।

2. व्यवहार को नियमित करने के लिए मांगें (Demands for regulation of behaviour)—व्यक्ति राजनीतिक प्रणाली से सार्वजनिक सुरक्षा, सामाजिक व्यवहार सम्बन्धी नियमों के निर्माण आदि की मांगें करते हैं। कुशल और नियमित सामाजिक जीवन के लिये ऐसी मांगें प्रायः की जाती हैं।

3. राजीतिक प्रणाली में भाग लेने सम्बन्धी मांगें (Demands regarding participation in the political System)-लोग मांग करते हैं कि उनको मताधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, सार्वजनिक पद प्राप्त करने का अधिकार, राजनीतिक संगठन बनाने का अधिकार इत्यादि दिये जाएं। ये ऐसी मांगें हैं जिनके फलस्वरूप लोग राजनीतिक प्रणाली के कार्यों में भाग ले सकते हैं।

4. संचार तथा सूचना प्राप्त करने सम्बन्धी मांगें (Demands for Communication and Information)लोग राजनीतिक प्रणाली का संचार करने वाले विशिष्ट वर्ग से नीति निर्माण सम्बन्धी सूचनाएं प्राप्त करने, सिद्धान्त अथवा नियम निश्चित करने, संकट अथवा औपचारिक अवसरों पर राजनीतिक प्रणाली द्वारा शक्ति के दिखावे इत्यादि के लिये मांगें करते हैं। इन मांगों को डेविड ईस्टन ने संचार तथा सूचना प्राप्त करने सम्बन्धी मांगों का नाम दिया है।

(ख) समर्थन के रूप में निवेश (Inputs in the form of Support)-उपर्युक्त चार प्रकार के निवेश मांगों के रूप में हैं। ये ऐसे कच्चे माल के समान हैं जो राजनीतिक प्रणाली रूपी मशीन में पाया जाता है। कोई भी मशीन उस समय तक कार्य नहीं कर सकती जब तक उसको विद्युत् अथवा तेल अथवा किसी अन्य साधन द्वारा शक्ति न दी जाए। इसी तरह डेविड ईस्टन ने निवेशों के दूसरे रूप को समर्थन निवेश (Support Inputs) का नाम दिया है। ऐसे समर्थन
निवेशों के बिना राजनीतिक प्रणाली कार्य नहीं कर सकती है क्योंकि ये समर्थन निवेश ही राजनीतिक प्रणाली को ऐसी शक्ति देते हैं जिसके बल से राजनीतिक प्रणाली निवेश मांगों (Demand Inputs) सम्बन्धी योग्य कार्यवाही कर सकती है।

निकास क्या होते हैं? (What are Outputs ?) डेविड ईस्टन ने निकासों (Outputs) का बड़ा सरल अर्थ बताया है। लोगों द्वारा निवेशों के रूप में सरकार के पास कुछ मांगें पेश की जाती हैं। राजनीतिक प्रणाली अपने साधन तथा सामर्थ्य के अनुसार उन मांगों सम्बन्धी निर्णय लेती है। इन निर्णयों को डेविड ईस्टन ने निकास (Outputs) बताया है। निकास अनेक प्रकार के हो सकते हैं। जब सरकार मानवीय व्यवहार को नियमित करने के लिये कोई कानूनी निर्णय लेती है उनको भी निकास कहा जाता है। जब सरकार सार्वजनिक सेवाएं अथवा पदों की व्यवस्था करती है उसके ऐसे निर्णय भी निकास कहलाते हैं। संक्षेप में, राजनीतिक प्रणाली के सत्ताधारी निर्णयों को निकास (Outputs) का नाम दिया जाता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था

प्रश्न 5.
राज्य और राजनीतिक प्रणाली में मुख्य अन्तरों का वर्णन करो।
(Write main differences between State and Political System.)
अथवा
राज्य तथा राजनीतिक प्रणाली में अंतर बताओ।
(Make a distinction between State and Political System.)
उत्तर-
प्राचीनकाल में राज्य को राजनीतिशास्त्र का मुख्य विषय माना जाता था। गार्नर की भान्ति ब्लंटशली (Bluntschli), गैटेल (Gettell), गैरिस (Garies), गिलक्राइस्ट (Gilchrist), लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) इत्यादि विद्वानों ने राज्य को ही राजनीतिशास्त्र का केन्द्र-बिन्दु माना। परन्तु आधुनिक विद्वान् इस परम्परागत विचार से सहमत नहीं होते। वे राज्य की अपेक्षा राजनीतिक व्यवस्था को आधुनिक राजनीति अथवा राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय मानते हैं। आधुनिक विद्वानों का विचार है कि राजनीति शास्त्र के क्षेत्र को राज्य तक ही सीमित करना उसकी व्यावहारिकता को बिल्कुल नष्ट करने वाली बात है। इन विद्वानों में आलमण्ड तथा पॉवेल, चार्ल्स मेरियम (Charles Meriam), हैरल्ड लॉसवैल (Harold Lasswell), डेविड ईस्टन (David Easton), स्टीफन एल० वास्बी (Stephen L. Wasbi) इत्यादि के नाम मुख्य हैं। राज्य और राजनीतिक व्यवस्था में अन्तर पाए जाते हैं, परन्तु दोनों में अन्तर करने से पहले राज्य और राजनीतिक व्यवस्था का अर्थ स्पष्ट करना अति आवश्यक है।

राज्य का अर्थ (Meaning of State)-प्रो० गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “राज्य उसे कहते हैं जहां कुछ लोग एक निश्चित प्रदेश में एक सरकार के अधीन संगठित होते हैं। यह सरकार आन्तरिक मामलों में अपनी जनता की प्रभुसत्ता को प्रकट करती है और बाहरी मामलों में अन्य सरकारों से स्वतन्त्र होती है।” इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि जनसंख्या, निश्चित भूमि, सरकार तथा प्रभुसत्ता राज्य के चार मूल तत्त्व हैं जिनके बिना राज्य की स्थापना नहीं हो सकती। यदि इन चार तत्त्वों में से कोई भी तत्त्व विद्यमान नहीं है तो राज्य की स्थापना नहीं हो सकती।

राजनीतिक व्यवस्था का अर्थ (Meaning of Political System)-राजनीतिक व्यवस्था में सरकार की संस्थाओं के अतिरिक्त वे सभी औपचारिक अथवा अनौपचारिक संस्थाएं अथवा समूह अथवां संगठन सम्मिलित हैं जो किसीन-किसी तरह राजनीतिक जीवन को प्रभावित करते हैं। राजनीतिक व्यवस्था का सम्बन्ध केवल कानून बनाने और लागू करने से ही नहीं बल्कि वास्तविक रूप में बल प्रयोग द्वारा उनका पालन करवाने से भी है।

राज्य और राजनीतिक व्यवस्था में अन्तर (Difference between State and Political System)-राज्य और राजनीतिक व्यवस्था में मुख्य अन्तर निम्नलिखित हैं-

1. राज्य के चार अनिवार्य तत्त्व हैं जबकि राजनीतिक व्यवस्था के अनेक तत्त्व हैं (State has four essential elements whereas political system has many elements)-राज्य तथा राजनीतिक व्यवस्था में मुख्य अन्तर यह है कि राज्य के अनिवार्य तत्त्व चार हैं जबकि राजनीतिक व्यवस्था के तत्त्व अनेक हैं। जनसंख्या, निश्चित भूमि, सरकार तथा प्रभुसत्ता-राज्य के चार अनिवार्य तत्त्व हैं। इनमें से यदि एक तत्त्व भी न हो तो राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। परन्तु राजनीतिक व्यवस्था के निश्चित तत्त्व होते हैं जैसे कि इसमें राजनीतिक प्रभावों की खोज, वैधता की प्राप्ति, परिवर्तनशीलता, अन्य विषयों तथा अन्य राजनीतिक व्यवस्थाओं का प्रभाव तथा प्रतिक्रियाओं का अध्ययन इत्यादि सम्मिलित होता है।

2. राज्य कानूनी तथा संस्थात्मक ढांचे से सम्बन्धित होता है जबकि राजनीतिक व्यवस्था प्रक्रियाओं से सम्बन्धित होती है (State deals with legal and Institutional structure but political system deals with the processes)-राज्य का सम्बन्ध कानूनी तथा संस्थात्मक ढांचे से होता है जबकि राजनीतिक व्यवस्था का सम्बन्ध प्रक्रियाओं (Processes) से होता है। कई लेखकों ने प्रक्रियाओं से सम्बन्धित मॉडल (Models) पेश किए जिनका सम्बन्ध राजनीतिक व्यवस्था से है।

3. राजनीतिक व्यवस्था का क्षेत्र राज्य के क्षेत्र से अधिक व्यापक है (Scope of Political System is broader than the Scope of State)-राजनीतिक व्यवस्था का क्षेत्र राज्य के क्षेत्र से कहीं अधिक विशाल है। राज्य का मुख्य सम्बन्ध औपचारिक संस्थाओं से होता है जबकि राजनीति व्यवस्था में समाज में होने वाली प्रत्येक राजनीतिक प्रक्रिया, औपचारिक और अनौपचारिक भी शामिल की जाती हैं। राजनीतिक व्यवस्था की सीमाएं व्यावहारिक (Practical) तथा नीति (Policy) विज्ञान पर आधारित होने के कारण बड़ी विस्तृत होती हैं।

4. राज्य की मुख्य विशेषता प्रभुसत्ता है जबकि राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य गुण वैध शारीरिक शक्ति है (Sovereignty is the main feature of State while legitimate Physical coercive force is the main feature of Political System)-आन्तरिक तथा बाहरी प्रभुसत्ता राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है अर्थात् राज्य सर्वशक्तिमान् होता है और सभी नागरिकों तथा संस्थाओं को राज्य के आदेशों का पालन करना पड़ता है। परन्तु राजनीतिक व्यवस्था में प्रभुसत्ता की धारणा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। आधुनिक राजनीतिक विद्वान् इस बात को नहीं मानते कि कोई भी राजनीतिक व्यवस्था आन्तरिक और बाहरी प्रभावों से बिल्कुल स्वतन्त्र होती है। आधुनिक वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं कि राजनीतिक व्यवस्था आन्तरिक-समाज (Intra-Societal) और बाह्य-समाज (Extra-Societal) के वातावरण से अवश्य प्रभावित होती है। इसके साथ ही आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय युग में बाहरी प्रभुसत्ता का महत्त्व बहुत कम रह गया है। प्रत्येक देश की राजनीतिक व्यवस्था पर दूसरे देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ता है। आधुनिक राजनीतिक वैज्ञानिक आन्तरिक प्रभुसत्ता की धारणा के स्थान पर वैध शारीरिक दण्ड देने की शक्ति (Legitimate Physical Coercive Force) शब्द का प्रयोग करते हैं अर्थात् उनके कथनानुसार राजनीतिक व्यवस्था के पास वैध शारीरिक दण्ड देने की शक्ति है।

5. राज्य एक परम्परागत धारणा है जबकि राजनीतिक व्यवस्था एक आधुनिक धारणा है (State is a traditional concept while Political System is a modern one)-राज्य एक परम्परागत धारणा है और परम्परागत राजनीति में प्रायः राज्य, राष्ट्र, सरकार, संविधान, कानून, प्रभुसत्ता और धारणाओं का इस्तेमाल होता रहा है। परन्तु आजकल राज्य शब्द तथा इसके साथ सम्बन्धित धारणाओं का प्रयोग बहुत घट गया है। आधुनिक युग में यदि कोई विद्वान् राजनीतिक व्यवस्था के स्थान पर राज्य शब्द का प्रयोग करता है तो उसे परम्परावादी कहा जाता है।

6. राजनीतिक व्यवस्था में आत्म-निर्भर अंगों का अस्तित्व होता है जबकि राज्य की धारणा में ऐसी कोई विशेषता नहीं है (Political system implies the existence of interdependent parts while the concept of State is devoid of such Character)-सरकार की संस्थाएं अर्थात् विधानमण्डल, न्यायपालिका, कार्यपालिका, राजनीतिक दल, हित समूह, संचार के साधन इत्यादि राजनीतिक व्यवस्था के भाग माने जाते हैं। जब किसी एक भाग में किसी कारण से महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होता है तो उसका प्रभाव राजनीतिक व्यवस्था के अन्य भागों पर भी पड़ता है तथा सम्पूर्ण व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ता है। परन्तु राज्य की धारणा में ऐसी कोई विशेषता नहीं पाई जाती।।

7. राज्य की क्षेत्रीय सीमाएं निश्चित होती हैं जबकि राजनीतिक व्यवस्था को क्षेत्रीय सीमाओं में नहीं बांधा GT HOAT (Boundaries of State are fixed whereas it is not possible to restrict the boundaries of Political System)-राज्य की क्षेत्रीय सीमाएं होती है। किसी भी राज्य के बारे में यह पता लगाया जा सकता है कि उसकी सीमाएं कहां से शुरू होती हैं और कहां समाप्त होती हैं। परन्तु राजनीतिक व्यवस्थाओं को क्षेत्रीय सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। राजनीतिक व्यवस्था की सीमाएं उसकी क्रियाओं की सीमाएं होती हैं। ये सीमाएं बदलती रहती हैं।

8. राज्य एक से होते हैं, राजनीतिक व्यवस्थाओं का स्वरूप विभिन्न प्रकार का होता है (States are the same everywhere, but political systems are Different)-सभी राज्य एक से होते हैं। वे छोटे हों या बड़े, उनमें चार तत्त्वों का होना अनिवार्य है-जनसंख्या, निश्चित भूमि, सरकार तथा प्रभुसत्ता। भारत, इंग्लैण्ड, जापान, चीन, श्रीलंका, बर्मा (म्यनमार), रूस आदि सभी राज्यों में ये चार तत्त्व पाए जाते हैं। परन्तु राजनीतिक व्यवस्थाओं का स्वरूप विभिन्न राज्यों में विभिन्न होता है।

9. राज्य स्थायी है, राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तनशील (State is permanent while Political System is Dynamic)-राज्य स्थायी है जबकि राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तनशील है। राज्य का अन्त तब होता है जब उससे प्रभुसत्ता छीन ली जाती है। फिर प्रभुसत्ता मिलने पर दोबारा राज्य की स्थापना हो जाती है, परन्तु राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तनशील होती है। समय तथा परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था बदलती रहती है।

10. राजनीतिक व्यवस्था में निवेशों को निर्गतों में परिवर्तित करने की क्रिया का विशिष्ट स्थान है, परन्तु राज्य की धारणा कुछ विशेष कार्यों से सम्बन्धित है (The concept of political system involves the process of conversion of inputs into outputs, while the concept of state deals with some specific functions)—निवेशों (Inputs) को निर्गतों (Output) में परिवर्तन करने की क्रिया राजनीतिक व्यवस्था की एक . महत्त्वपूर्ण विशेषता है। निवेशों और निर्गतों में परिवर्तन की प्रक्रिया राजनीतिक व्यवस्था में निरन्तर चलती रहती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राजनीतिक व्यवस्था को नियम बनाने का कार्य (Rule Making Functions), नियम लागू करने (Rule application) तथा नियमों के अनुसार निर्णय करने से सम्बन्धित कार्य (Rule adjudication functions) भी करने पड़ते हैं। परन्तु राज्य को कुछ विशेष प्रकार के कार्य ही करने पड़ते हैं। राजनीतिक विद्वानों ने राज्य के कार्यों को अनिवार्य कार्य (Compulsory functions) और ऐच्छिक कार्यों (Optional functional) में बांटा है। इसके अतिरिक्त सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक क्षेत्र और सामाजिक जीवन के कुछ पक्ष राज्य के अधिकार क्षेत्र से पृथक् माने जाते हैं। परन्तु जीवन के किसी पहलू को राजनीतिक व्यवस्था से अलग नहीं माना जा सकता यदि किसी भी रूप में उसका कोई पक्ष या कार्य राजनीति से सम्बन्धित हो।

11. राजनीतिक व्यवस्था राज्य की अपेक्षा अधिक विश्लेषणात्मक धारणा है (Concept of Political System is more analytical than State)-राज्य के वर्णनात्मक विचार हैं। इसकी व्याख्या की जा सकती है, परन्तु इसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। परन्तु राज्य के विपरीत राजनीतिक व्यवस्था एक विश्लेषणात्मक धारणा है। इसका अस्तित्व व्यक्तियों के मन में होता है। यह वास्तविक जीवन में प्राप्त होने वाली चीज़ नहीं है।

12. राजनीतिक व्यवस्था राज्य की अपेक्षा अधिक एकता तथा सामंजस्य लाने का साधन है (Political system is a better means of bringing integration and adoption than the State)-राज्य और राजनीतिक व्यवस्था में एक अन्य अन्तर यह है कि राजनीतिक व्यवस्था राज्य की अपेक्षा अधिक सामंजस्य उत्पन्न करती है। आलमण्ड तथा पॉवेल (Almond and Powell) के अनुसार, “राजनीतिक व्यवस्था स्वतन्त्र राज्यों में एकीकरण
और सामंजस्य उत्पन्न करने के लिए एक साधन है।”

13. राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक समाजीकरण तथा राजनीतिक संस्कृति का विशेष महत्त्व है, राज्य के लिए नहीं (Political Socialisation and Political culture have special importance in Political System, not for the State)राजनीतिक व्यवस्था की धारणा में राजनीतिक समाजीकरण और राजनीतिक संस्कृति की धारणाओं को विशेष महत्त्व दिया जाता है क्योंकि राजनीतिक समाजीकरण और राजनीतिक संस्कृति की क्रियाएं राजनीतिक व्यवस्था को निरन्तर प्रभावित करती रहती हैं और इसलिए राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन होते रहते हैं। परन्तु राज्य की धारणा में राजनीतिक समाजीकरण और राजनीतिक संस्कृति को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता।
निष्कर्ष (Conclusion)-अन्त में हम यह कह सकते हैं कि राज्य एक परम्परागत धारणो है जबकि राजनीतिक व्यवस्था आधुनिक धारणा है और राजनीतिक व्यवस्था का क्षेत्र राज्य के क्षेत्र से बहुत अधिक व्यापक है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक व्यवस्था

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीतिक तथा प्रणाली शब्दों के अर्थों की व्याख्या करें।
अथवा
राजनीतिक (पोलिटिकल) शब्द का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
राजनीतिक प्रणाली शब्द के दो भाग हैं-राजनीतिक तथा प्रणाली।
राजनीतिक शब्द का अर्थ-राजनीतिक शब्द सत्ता अथवा शक्ति का सूचक है। किसी भी समुदाय या संघ को राजनीतिक उस समय कहा जा सकता है जबकि उसकी आज्ञा का पालन प्रशासकीय कर्मचारी वर्ग द्वारा शारीरिक बल प्रयोग के भय से करवाया जाता है। अरस्तु ने राजनीतिक समुदाय को ‘अत्यधिक प्रभुत्व-सम्पन्न तथा अन्तर्भावी संगठन’ (The most sovereign and inclusive association) परिभाषित किया है। अरस्तु के मतानुसार राजनीतिक समुदाय के पास सर्वोच्च शक्ति होती है जो इसको अन्य समुदायों से अलग करती है। आल्मण्ड तथा पॉवेल ने राजनीतिक समुदाय की इस शक्ति को कानूनी शारीरिक बलात् शक्ति (Legitimate Physical Coercive Power) का नाम दिया है।

व्यवस्था या प्रणाली-प्रणाली शब्द का प्रयोग अन्तक्रियाओं के समूह का संकेत करने के लिए किया जाता है। ऑक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार, “प्रणाली एक पूर्ण समाप्ति है, सम्बद्ध वस्तुओं अथवा अंशों का समूह है, भौतिक या अभौतिक वस्तुओं का संगठित समूह है। आल्मण्ड तथा पॉवेल के अनुसार, “एक ब्यवस्था से अभिप्राय भागों की परस्पर निर्भरता और उसके तथा उसके वातावरण के बीच किसी प्रकार की सीमा से है।” एक प्रणाली के अन्दर कुछ आधारभूत विशेषताएं होती हैं जैसे कि एकता, नियमितता, सम्पूर्णता, संगठन, सम्बद्धता (Coherence), संयुक्तता (Connection) तथा अंशों अथवा भागों की पारस्परिक निर्भरता।

प्रश्न 2.
राजनीतिक प्रणाली का अर्थ लिखिए।
अथवा
राजनीतिक प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
राजनीतिक प्रणाली में सरकारी संस्थाओं जैसे विधानमण्डल, न्यायालय, प्रशासकीय एजेन्सियां ही सम्मिलित नहीं होती बल्कि इनके अतिरिक्त सभी पारस्परिक ढांचे जैसे रक्त सम्बन्ध,जातीय समूह, अव्यवस्थित घटनाएं जैसे प्रदर्शन, लड़ाई-झगड़े, हत्याएं, डकैतियां, औपचारिक राजनीतिक संगठन आदि राजनीतिक पहलुओं सहित सभी सम्मिलित हैं। इस प्रकार राजनीतिक प्रणाली का सम्बन्ध उन सब बातों, क्रियाओं, संस्थाओं से है जो किसी-न-किसी प्रकार से राजनीतिक जीवन को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक प्रणाली का सम्बन्ध केवल कानून बनाने और लागू करने से ही नहीं बल्कि वास्तविक रूप से बल प्रयोग द्वारा उनका पालन करवाने से भी है।

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प्रश्न 3.
राजनीतिक प्रणाली की परिभाषाएं दीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था की परिभाषाएं अलग-अलग राजनीति-शास्त्रियों ने अलग-अलग ढंग से दी हैं, फिर भी एक बात पर इन विद्वानों का एक मत है कि राजनीतिक व्यवस्था का सम्बन्ध न्यायसंगत शारीरिक दमन के प्रयोगों के साथ जुड़ा हुआ है। राजनीतिक व्यवस्था की इन सभी परिभाषाओं में न्यायपूर्ण प्रतिबन्धों, दण्ड देने की अधिकारपूर्ण शक्ति लागू करने की शक्ति और बाध्य करने की शक्ति आदि शामिल है।

  • डेविड ईस्टन का कहना है, “राजनीतिक व्यवस्था अन्तक्रियाओं का समूह है जिसे सामाजिक व्यवहार की समग्रता में से निकाला गया है तथा जिसके द्वारा समाज के लिए सत्तात्मक मूल्य निर्धारित किए जाते हैं।”
  • आल्मण्ड तथा पॉवेल का कथन है, “जब हम राजनीतिक व्यवस्था की बात कहते हैं तो हम इसमें उन समस्त अन्तक्रियाओं को शामिल कर लेते हैं, जो वैध बल प्रयोग को प्रभावित करती हैं।”
  • रॉबर्ट डाहल के अनुसार, “राजनीतिक व्यवस्था मानवीय सम्बन्धों का वह दृढ़ मान है जिसमें पर्याप्त मात्रा में शक्ति, शासन या सत्ता सम्मिलित हो।”
  • लॉसवेल और कॉप्लान के अनुसार, “राजनीतिक व्यवस्था गम्भीर वंचना है जो राजनीतिक व्यवस्था को अन्य व्यवस्थाओं से अलग करती है।”

प्रश्न 4.
राजनीतिक प्रणाली की कोई चार विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • मानवीय सम्बन्ध-राजनीतिक व्यवस्था के लिए मनुष्य के परस्पर सम्बन्ध का होना आवश्यक है, परन्तु सभी प्रकार के मानवीय सम्बन्धों को राजनीतिक व्यवस्था का अंग नहीं माना जा सकता। केवल उन्हीं मानवीय सम्बन्धों को राजनीतिक व्यवस्था का अंग माना जाता हैं जो राजनीतिक व्यवस्था की कार्यशीलता को किसी-न-किसी तरह प्रभावित करते हों।
  • औचित्यपूर्ण शक्ति का प्रयोग-औचित्यपूर्ण शारीरिक दबाव शक्ति के बिना राजनीतिक व्यवस्था का अस्तित्व सम्भव नहीं है। औचित्यपूर्ण शक्ति के द्वारा ही राजनीतिक व्यवस्था के सभी कार्य चलते हैं।
  • अन्तक्रिया-राजनीतिक व्यवस्था के सदस्यों अथवा इकाइयों में अन्तक्रिया हमेशा चलती रहती है। राजनीतिक व्यवस्था के सदस्यों में व्यक्तिगत अथवा विभिन्न समूहों के रूप में सम्पर्क बना रहता है तथा वे एक-दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। इकाइयों में अन्तक्रिया न केवल निरन्तर होती है, बल्कि बहपक्षीय होती है।
  • सर्व-व्यापकता-सर्व-व्यापकता का भाव यह है कि विश्व में कोई ऐसा समाज नहीं होगा जहां राजनीतिक प्रणाली का अस्तित्व न हो। सांस्कृतिक एवं असांस्कृतिक समाजों में भी राजनीतिक प्रणाली का अस्तित्व अवश्य होता है। यह ठीक है कि हर समाज में राजनीतिक प्रणाली का स्वरूप एक समान नहीं होता, परन्तु राजनीतिक प्रणाली का स्वरूप प्रत्येक समाज में अवश्य होता है।

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प्रश्न 5.
राज्य और राजनीतिक प्रणाली में चार मुख्य अन्तर लिखो। .
अथवा
राज्य व राजनैतिक प्रणाली में कोई चार अंतर बताइए।
उत्तर-
राज्य और राजनीतिक व्यवस्था में मुख्य अन्तर निम्नलिखित हैं-

  • राज्य के चार अनिवार्य तत्त्व हैं जबकि राजनीतिक व्यवस्था के अनेक तत्त्व हैं। जनसंख्या, निश्चित भूमि, सरकार तथा प्रभुसत्ता राज्य के चार अनिवार्य तत्त्व हैं। इनमें से यदि एक तत्त्व भी न हो, तो राज्य की स्थापना नहीं की जा सकती है, परन्तु राजनीतिक व्यवस्था के निश्चित तत्त्व न होकर अनेक तत्त्व होते हैं।
  • राज्य की मुख्य विशेषता प्रभुसत्ता है जबकि राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य गुण वैध शारीरिक शक्ति है। आन्तरिक तथा बाहरी प्रभुसत्ता राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, परन्तु राजनीतिक व्यवस्था में प्रभुसत्ता की धारणा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है। आधुनिक राजनीतिक विद्वान् आन्तरिक प्रभुसत्ता की धारणा के स्थान पर ‘वैध शारीरिक दण्ड देने की शक्ति’ शब्दों का प्रयोग करते हैं।
  • राज्य स्थायी है जबकि राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तनशील है। राज्य स्थायी है और इसका अन्त तब होता है जब उससे प्रभुसत्ता छीन ली जाती है। प्रभुसत्ता मिलने पर राज्य की स्थापना दुबारा हो जाती है, परन्तु राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तनशील होती है। समय तथा परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था बदलती रहती है।
  • राजनीतिक व्यवस्था का क्षेत्र राज्य के क्षेत्र से अधिक व्यापक है-राजनीतिक व्यवस्था का क्षेत्र राज्य के क्षेत्र से कहीं अधिक विशाल है।

प्रश्न 6.
फीडबैक लूप व्यवस्था किसे कहा जाता है ?
अथवा
डेविड ईस्टन की कच्चा माल फिर देने (Feed back loop) की प्रक्रिया का वर्णन करें।
अथवा
फीडबैक लूप (Feedback Loop) व्यवस्था से आपका क्या अभिप्राय है ।
उत्तर-
डेविड ईस्टन के अनुसार, निवेशों और निर्गतों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोनों में निरन्तर सम्पर्क रहता है। फीड बैक का अर्थ है-निर्गतों के प्रभावों और परिणामों को पुनः व्यवस्था में निवेश के रूप में ले जाना। ईस्टन के अनुसार निर्गतों के परिणामों को निवेशों के साथ जोड़ने तथा इस प्रकार निवेश तथा निर्गतों के बीच निरन्तर सम्बन्ध बनाने के कार्य को फीड बैक लूप कहते हैं। यदि राजनीतिक व्यवस्था के व्यावहारिक रूप को देखा जाए तो आधुनिक युग में राजनीतिक संस्थाएं और राजनीतिक दल फीड बैक लूप व्यवस्था का कार्य करते हैं। इस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था में वह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक एक राजनीतिक व्यवस्था इस पर डाले गए दबावों और मांगों को सहन करती है, परन्तु जब यह खतरनाक सीमा को पार कर जाती है तो राजनीतिक व्यवस्था में दबाव और मांगों को सहन करने की शक्ति नहीं रहती और इससे राजनीतिक व्यवस्था का पतन हो जाता है।

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प्रश्न 7.
राजनीतिक प्रणाली के निकास कार्यों के बारे में लिखिए।
अथवा
राजनैतिक प्रणाली के किन्हीं तीन निकास कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. नियम बनाना-समाज में व्यक्तियों के रहने के लिए आवश्यक है कि उनके पारस्परिक सम्बन्धों को नियमित करने के लिए नियम होने चाहिए। राजनीतिक व्यवस्था में नियम बनाना मुख्यतः विधानपालिकाओं तथा उपव्यवस्थापन अभिकरणों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में इस कार्य को किया जाता है।

2. नियम लागू करना-राजनीतिक व्यवस्था का कार्य केवल नियम बनाना ही नहीं है, बल्कि उन्हें लागू करना है। नियमों को यदि सही ढंग से लागू नहीं किया जाता तो नियम बनाने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है और उचित परिणामों की आशा नहीं की जा सकती। राजनीतिक व्यवस्था में नियमों को लागू करने की जिम्मेवारी पूर्णतया सरकारी कर्मचारियों या नौकरशाही की होती है।

3. नियम निर्णयन कार्य-समाज में जब भी कोई नियम बनाया जाता है, उसके उल्लंघन की भी सम्भावना सदैव बनी रहती है। अत: यह आवश्यक है कि जो व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता है, उसे दण्ड मिलना चाहिए। प्रायः सभी आधुनिक लोकतन्त्रात्मक अच्छी राजनीतिक व्यवस्था में न्यायालयों को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र रखा जाता है ताकि न्यायाधीशों की निष्पक्षता को कायम रखा जा सके जिससे नागरिकों का विश्वास बना रहे।

प्रश्न 8.
राजनैतिक प्रणाली के निवेश कार्यों का वर्णन करो।
अथवा
राजनैतिक प्रणाली के कोई तीन निवेश कार्य लिखिए।
उत्तर-
निवेश कार्य-निवेश कार्य गैर-सरकारी उप-प्रणालियों, समाज तथा सामान्य वातावरण द्वारा पूरे किए जाते हैं, जैसे-दल, दबाव समूह, समाचार-पत्र आदि। आल्मण्ड ने राजनीतिक व्यवस्था के चार निवेश कार्य बतलाए हैं-

1. राजनीतिक समाजीकरण तथा भर्ती-आरम्भ में बच्चे राजनीति से अनभिज्ञ होते हैं और उसमें रुचि भी नहीं लेते, परन्तु जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं उनके मन में धीरे-धीरे राजनीतिक वृत्तियां बैठती जाती हैं। वे राजनीति में भाग लेना आरम्भ करते हैं और अपनी भूमिका निभानी आरम्भ करते हैं। इसे ही राजनीतिक समाजीकरण कहते हैं। राजनीतिक व्यवस्था में समाजीकरण के साथ-साथ भर्ती का काम भी चलता रहता है। राजनीतिक भर्ती से अभिप्राय उस कार्य से है जिसके माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था की भूमिकाओं की पूर्ति की जाती है।

2. हित स्पष्टीकरण-अपने-अपने हितों की रक्षा करने के लिए प्रत्येक राजनीतिक प्रणाली के सदस्य अपनी प्रणाली में कुछ मांगें पेश किया करते हैं। जिस तरीके से इन मांगों को सही रूप प्रदान किया जाता है तथा जिस प्रकार से ये मांगें प्रणाली के निर्णयकर्ताओं को प्रस्तुत की जाती हैं, उसे हित स्पष्टीकरण की प्रक्रिया कहा जाता है।

3. हित समूहीकरण-विभिन्न हितों को इकट्ठा करने की क्रिया को ही हित समूहीकरण कहा जाता है। यह प्रकार्य दो प्रकार से सम्पादित हो सकता है। प्रथम, विभिन्न हितों को संयुक्त और समायोजित करके तथा द्वितीय, एक देशी नीति के प्रतिमान में निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों की राजनीतिक भर्ती द्वारा।

4. राजनीतिक संचार-राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार का बहुत महत्त्व है, क्योंकि उसके द्वारा ही अन्य सभी कार्य सम्पादित होते हैं। संचार के साधन निश्चित ही राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। संचार के बिना हित स्पष्टीकरण का काम हो ही नहीं सकता।

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प्रश्न 9.
“राजनीतिक प्रणाली” की सीमाएं क्या हैं ?
उत्तर-
प्रत्येक राज्य का वातावरण अन्य राज्यों से अलग होता है। इसी वातावरण में रहकर किसी राज्य की राजनीतिक व्यवस्था अपनी भूमिका निभाती है। वास्तव में राजनीतिक व्यवस्था निर्बाध रूप से कार्य नहीं कर सकती। उस पर आन्तरिक व बाहरी वातावरण का प्रभाव अवश्य पड़ता है। यही वातावरण राजनीतिक व्यवस्था की भूमिका या कार्यों को सीमित कर देता है। आल्पण्ड और पॉवेल के अनुसार प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था की अपनी सीमाएं होती हैं जो इसको अन्य प्रणालियों से अलग करती हैं। राजनीतिक प्रणाली की सीमाएं क्षेत्रीय नहीं बल्कि कार्यात्मक होती हैं और यह सीमाएं समय-समय पर बदलती रहती हैं। उदाहरणतया युद्ध के समय राजनीतिक प्रणाली की सीमाओं में विस्तार हो जाता है, लेकिन युद्ध समाप्त होते ही ये सीमाएं संकुचित हो जाती हैं।

प्रश्न 10.
कानून की दबावकारी शक्ति क्या होती है ?
अथवा
कानून की दबावकारी शक्ति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रत्येक राज्य व्यवस्था के सुचारु रूप से संचालन के लिए कानूनों का निर्माण किया जाता है। कानूनों के पीछे राज्य की शक्ति होती है। प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के कानून के अधीन होता है। सभी व्यक्तियों के साथ एक-जैसी परिस्थितियों में समान व्यवहार किया जाता है। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है अथवा कानून का पालन नहीं करता तो उसे राज्य शक्ति द्वारा दण्डित किया जा सकता है। कानून नागरिकों को किसी कार्य को करने अथवा न करने पर बाध्य कर सकता है। ऐसा न करने पर दण्ड दिया जा सकता है। इसे कानून की बाध्यकारी शक्ति कहा जाता है।

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प्रश्न 11.
राजनीतिक प्रणाली का हित स्पष्टीकरण कार्य क्या है ?
अथवा
राजनैतिक प्रणाली के हित स्पष्टीकरण के कार्य की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
हित स्वरूपीकरण या स्पष्टीकरण राजनीतिक प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। समाज में रहते सभी लोगों अथवा सभी वर्गों की मांगें तथा हित एक समान नहीं हो सकते। इसलिए यह अनिवार्य होता है कि विभिन्न वर्गों के लोग अपने हितों अथवा अपनी मांगों का स्पष्टीकरण करें ताकि सरकार उस सम्बन्धी योग्य निर्णय ले सके। जब राजनीतिक दल अथवा अन्य संगठन लोगों की मांगें सरकार तक पहुंचाते हैं तो वह हितों का स्पष्टीकरण कर रहे होते हैं। राजनीतिक दल तथा ऐसे अन्य संगठन राजनीतिक प्रणाली के अंग है। इसलिए उनके द्वारा किए कार्य राजनीतिक प्रणाली के कार्य माने जाते हैं। हित स्पष्टीकरण कार्य व्यापारिक संघों (Trade Unions) तथा अन्य दबाव समूहों (Pressure Groups) द्वारा भी किया जाता है।

प्रश्न 12.
राजनीतिक प्रणाली का राजनीतिक संचार कार्य लिखो।
उत्तर-
राजनीतिक संचार का भाव है सूचनाओं का आदान-प्रदान करना। राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार का बहुत महत्त्व है, क्योंकि इसके द्वारा ही अन्य सभी कार्य सम्पादित होते हैं। सभी व्यक्ति चाहे वे नागरिक हों या अधिकारी वर्ग से सम्बन्धित हों, सूचना पर ही निर्भर रहते हैं और उनके अनुसार ही उनकी गतिविधियों का संचालन होता है। इसलिए प्रजातन्त्र में प्रेस तथा भाषण की स्वतन्त्रता पर जोर दिया जाता है जबकि साम्यवादी राज्यों एवं तानाशाही राज्यों में उन पर प्रतिबन्ध लगाने की बात की जाती है। संचार के साधन निश्चय ही राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। संचार के बिना हित स्पष्टीकरण का काम हो ही नहीं सकता। आधुनिक प्रगतिशील समाज में संचारव्यवस्था को जहां तक हो सका है, तटस्थ बनाने की कोशिश की गई है और इसकी स्वतन्त्रता एवं स्वायत्तता को स्वीकार कर लिया गया है।

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प्रश्न 13.
राजनीतिक प्रणाली का हित समूहीकरण कार्य क्या है?
अथवा
हित समूहीकरण से क्या भाव है ? यह कार्य कौन करता है ?
उत्तर-
विभिन्न संघों के हितों की पूर्ति के लिए अलग-अलग कानून या नीति का निर्माण नहीं किया जा सकता। विभिन्न संघों या समूहों के हितों को इकट्ठा करके उनकी पूर्ति के लिए एक सामान्य नीति निर्धारित की जाती है। विभिन्न हितों को इकट्ठा करने की क्रिया को ही हित समूहीकरण कहा जाता है। आलमण्ड व पॉवेल के शब्दों में, “मांगों को सामान्य नीति स्थानापन्न (विकल्प) में परिवर्तित करने के प्रकार्य को हित समूहीकरण कहा जाता है।” (“The function of converting demands into general policy alternatives is called interest aggregation.”) यह प्रकार्य दो प्रकार से सम्पादित हो सकता है। प्रथम, विभिन्न हितों को संयुक्त और समायोजित करके तथा द्वितीय, एक देश नीति के प्रतिमान में निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों की राजनीतिक भर्ती द्वारा । यह प्रकार्य राजनीतिक व्यवस्था में नहीं बल्कि सभी कार्यों में पाया जाता है। मानव अपने विभिन्न हितों को इकट्ठा करके एक बात कहता है। हित-समूह अपने विभिन्न उपसमूहों या मांगों का समूहीकरण करके अपनी मांग रखते हैं। राजनीतिक दल विभिन्न समुदायों या संघों की मांगों को ध्यान में रखकर अपना कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। इस प्रकार हित समूहीकरण राजनीतिक व्यवस्था में निरन्तर होता रहता है।

प्रश्न 14.
निवेशों से आपका क्या भाव है ?
अथवा
निवेश समर्थन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था का अपना राजनीतिक ढांचा होता है। राजनीतिक ढांचा तभी कार्य कर सकता है यदि इसके लिए उसे आवश्यक सामग्री प्राप्त हो। राजनीतिक व्यवस्था निवेशों के बिना नहीं चल सकती। डेविड ईस्टन ने निवेशों को दो भागों में बांटा है

1.निवेश मांगें- प्रत्येक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह अथवा संगठन राजनीतिक प्रणाली से कुछ मांगों की पूर्ति की आशा रखते हैं और इसीलिए वे राजनीतिक व्यवस्था के सामने कुछ मांगें प्रस्तुत करते हैं। डेविड ईस्टन के अनुसार ये मांगें चार प्रकार की हो सकती हैं-(1) राजनीतिक व्यवस्था में भाग लेने की मांग (2) वस्तुओं और सेवाओं के वितरण की मांग (3) व्यवहार को नियमित करने के सम्बन्ध में मांग (4) संचारण और सूचना प्राप्त करने के सम्बन्ध में मांग।

2. निवेश समर्थन-डेविड ईस्टन के अनुसार समर्थन उन क्रियाओं को कहा जाता है जो राजनीतिक व्यवस्था की मांगों का मुकाबला करने की क्षमता प्रदान करती है। यदि किसी राजनीतिक व्यवस्था के पास किसी मांग के लिए समर्थन प्राप्त नहीं है अर्थात् उसके पास उसे पूरा करने की क्षमता नहीं है तो वह उसे पूरा नहीं कर सकती। समर्थन निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-(1) भौतिक समर्थन (2) वैधानिक समर्थन (3) सहभागी समर्थन (4) सम्मान समर्थन।

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प्रश्न 15.
निकासों के अर्थों की व्याख्या कीजिए।
अथवा
निकासों से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था में मांगों तथा समर्थनों द्वारा आरम्भ की गई गतिविधियों के परिणामों को ही निर्गत या निकास कहा जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि मांगों की पूर्ति के ही निकास होते हैं। निकास मांगों के अनुकूल भी हो सकते हैं और उनके विरुद्ध भी। निकास अग्रलिखित प्रकार के हो सकते हैं

  • निकालना-यह लगान, कर, जुर्माना, लूट का माल और व्यक्तिगत सेवाओं के रूप में हो सकती है।
  • व्यवहार का नियमन-व्यवहार का नियम जो मनुष्यों के सम्पूर्ण व्यवहारों तथा सम्बन्धों को प्रभावित करता है।
  • वस्तुओं या सेवाओं का वितरण-निर्गत का एक अन्य रूप वस्तुओं, सेवाओं के अवसर और पदवियों का वितरण आदि है।
  • सांकेतिक निर्गत-इसमें मूल्यों तथा आदर्शों का पुष्टिकरण, राजनीतिक चिह्नों का प्रदर्शन, नीतियों की घोषणा आदि को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 16.
राजनीतिक प्रणाली के छः कार्य लिखें।
उत्तर-
इसके लिए प्रश्न नं० 7 एवं 8 देखें।

1. नियम बनाना-समाज में व्यक्तियों के रहने के लिए आवश्यक है कि उनके पारस्परिक सम्बन्धों को नियमित करने के लिए नियम होने चाहिए। राजनीतिक व्यवस्था में नियम बनाना मुख्यतः विधानपालिकाओं तथा उपव्यवस्थापन अभिकरणों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में इस कार्य को किया जाता है।

2. नियम लागू करना-राजनीतिक व्यवस्था का कार्य केवल नियम बनाना ही नहीं है, बल्कि उन्हें लागू करना है। नियमों को यदि सही ढंग से लागू नहीं किया जाता तो नियम बनाने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है और उचित परिणामों की आशा नहीं की जा सकती। राजनीतिक व्यवस्था में नियमों को लागू करने की जिम्मेवारी पूर्णतया सरकारी कर्मचारियों या नौकरशाही की होती है।

3. नियम निर्णयन कार्य-समाज में जब भी कोई नियम बनाया जाता है, उसके उल्लंघन की भी सम्भावना सदैव बनी रहती है। अत: यह आवश्यक है कि जो व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता है, उसे दण्ड मिलना चाहिए। प्रायः सभी आधुनिक लोकतन्त्रात्मक अच्छी राजनीतिक व्यवस्था में न्यायालयों को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र रखा जाता है ताकि न्यायाधीशों की निष्पक्षता को कायम रखा जा सके जिससे नागरिकों का विश्वास बना रहे।

निवेश कार्य-निवेश कार्य गैर-सरकारी उप-प्रणालियों, समाज तथा सामान्य वातावरण द्वारा पूरे किए जाते हैं, जैसे-दल, दबाव समूह, समाचार-पत्र आदि। आल्मण्ड ने राजनीतिक व्यवस्था के चार निवेश कार्य बतलाए हैं-

1. राजनीतिक समाजीकरण तथा भर्ती-आरम्भ में बच्चे राजनीति से अनभिज्ञ होते हैं और उसमें रुचि भी नहीं लेते, परन्तु जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं उनके मन में धीरे-धीरे राजनीतिक वृत्तियां बैठती जाती हैं। वे राजनीति में भाग लेना आरम्भ करते हैं और अपनी भूमिका निभानी आरम्भ करते हैं। इसे ही राजनीतिक समाजीकरण कहते हैं। राजनीतिक व्यवस्था में समाजीकरण के साथ-साथ भर्ती का काम भी चलता रहता है। राजनीतिक भर्ती से अभिप्राय उस कार्य से है जिसके माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था की भूमिकाओं की पूर्ति की जाती है।

2. हित स्पष्टीकरण-अपने-अपने हितों की रक्षा करने के लिए प्रत्येक राजनीतिक प्रणाली के सदस्य अपनी प्रणाली में कुछ मांगें पेश किया करते हैं। जिस तरीके से इन मांगों को सही रूप प्रदान किया जाता है तथा जिस प्रकार से ये मांगें प्रणाली के निर्णयकर्ताओं को प्रस्तुत की जाती हैं, उसे हित स्पष्टीकरण की प्रक्रिया कहा जाता है।

3. हित समूहीकरण-विभिन्न हितों को इकट्ठा करने की क्रिया को ही हित समूहीकरण कहा जाता है। यह प्रकार्य दो प्रकार से सम्पादित हो सकता है। प्रथम, विभिन्न हितों को संयुक्त और समायोजित करके तथा द्वितीय, एक देशी नीति के प्रतिमान में निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों की राजनीतिक भर्ती द्वारा।

4. राजनीतिक संचार-राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार का बहुत महत्त्व है, क्योंकि उसके द्वारा ही अन्य सभी कार्य सम्पादित होते हैं। संचार के साधन निश्चित ही राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। संचार के बिना हित स्पष्टीकरण का काम हो ही नहीं सकता।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीतिक प्रणाली से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
राजनीतिक प्रणाली का सम्बन्ध उन सब बातों, क्रियाओं तथा संस्थाओं से है जो किसी-न-किसी प्रकार से राजनीतिक जीवन को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक व्यवस्था का सम्बन्ध केवल कानून बनाने और लागू करने से ही नहीं बल्कि वास्तविक रूप से बल प्रयोग द्वारा उनका पालन करवाने से भी है।

प्रश्न 2.
राजनीतिक व्यवस्था की दो परिभाषाएं लिखो।
उत्तर-

  • डेविड ईस्टन का कहना है, “राजनीतिक व्यवस्था अन्तक्रियाओं का समूह है जिसे सामाजिक व्यवहार की समग्रता में से निकाला गया है तथा जिसके द्वारा समाज के लिए सत्तात्मक मूल्य निर्धारित किए जाते
  • आल्मण्ड तथा पॉवेल का कथन है, “जब हम राजनीतिक व्यवस्था की बात कहते हैं तो हम इसमें उन समस्त अन्तक्रियाओं को शामिल कर लेते हैं जो वैध बल प्रयोग को प्रभावित करती है।”

प्रश्न 3.
प्रणाली की दो मुख्य विशेषताएं बताइए।
उत्तर-

  1. प्रणाली भिन्न-भिन्न अंगों या हिस्सों के जोड़ों से बनती है।
  2. प्रणाली के भिन्न-भिन्न अंगों में परस्पर निर्भरता होती है।

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प्रश्न 4.
राज्य और राजनीतिक प्रणाली में दो मुख्य अन्तर लिखो।
उत्तर-

  1. राज्य के चार अनिवार्य तत्त्व हैं जबकि राजनीतिक व्यवस्था के अनेक तत्त्व हैं। जनसंख्या, निश्चित भूमि, सरकार तथा प्रभुसत्ता राज्य के चार अनिवार्य तत्त्व हैं। परन्तु राजनीतिक व्यवस्था के निश्चित तत्त्व न होकर अनेक तत्त्व होते हैं।
  2. राज्य की मुख्य विशेषता प्रभुसत्ता है जबकि राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य गुण वैध शारीरिक शक्ति है। आन्तरिक तथा बाहरी प्रभुसत्ता राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, परन्तु राजनीतिक व्यवस्था में प्रभुसत्ता की धारणा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता है। आधुनिक राजनीतिक विद्वान् आन्तरिक प्रभुसत्ता की धारणा के स्थान पर ‘वैध शारीरिक दण्ड देने की शक्ति’ शब्दों का प्रयोग करते हैं।

प्रश्न 5.
राजनीतिक प्रणाली में फीडबैक लूप व्यवस्था किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
डेविड ईस्टन के अनुसार, निवेशों और निर्गतों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोनों में निरन्तर सम्पर्क रहता है। फीड बैक का अर्थ है-निर्गतों के प्रभावों और परिणामों को पुनः व्यवस्था में निवेश के रूप में ले जाना। ईस्टन के अनुसार निर्गतों के परिणामों को निवेशों के साथ जोड़ने तथा इस प्रकार निवेश तथा निर्गतों के बीच निरन्तर सम्बन्ध बनाने के कार्य को फीड बैक लूप कहते हैं। यदि राजनीतिक व्यवस्था के व्यावहारिक रूप को देखा जाए तो आधुनिक युग में राजनीतिक संस्थाएं और राजनीतिक दल फीड बैक लूप व्यवस्था का कार्य करते हैं।

प्रश्न 6.
‘शासन की प्रक्रिया’ (The Process of Government) नामक पुस्तक किसने व कब लिखी ?
उत्तर-
‘शासन की प्रक्रिया’ नामक पुस्तक आर्थर बेंटले ने लिखी।

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प्रश्न 7.
‘राजनीतिक प्रणाली’ (The Political System) नाम की पुस्तक किसने व कब लिखी ?
उत्तर-
राजनीतिक प्रणाली (The Political System) नाम की पुस्तक डेविड ईस्टन ने सन् 1953 में लिखी।

प्रश्न 8.
राजनीतिक प्रणाली के दो निकास (Output) कार्यों के बारे में लिखिए।
उत्तर-

  1. नियम बनाना-समाज में व्यक्तियों के रहने के लिए आवश्यक है कि उनके पारस्परिक सम्बन्धों को नियमित करने के लिए नियम होने चाहिएं। राजनीतिक व्यवस्था में नियम बनाना मुख्यतः विधानपालिकाओं तथा उप-व्यवस्थापन अभिकरणों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में इस कार्य को किया जाता है।
  2. नियम लागू करना-राजनीतिक व्यवस्था का कार्य केवल नियम बनाना ही नहीं है, बल्कि उन्हें लागू करना है। राजनीतिक व्यवस्था में नियमों को लागू करने की ज़िम्मेवारी पूर्णतया सरकारी कर्मचारियों या नौकरशाही की होती है।

प्रश्न 9.
राजनीतिक प्रणाली के दो निवेश कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. राजनीतिक समाजीकरण तथा भर्ती-जब लोग राजनीति में भाग लेना आरम्भ करते हैं और अपनी भूमिका निभानी आरम्भ करते हैं। इसे ही राजनीतिक समाजीकरण कहते हैं। राजनीतिक व्यवस्था में समाजीकरण के साथ-साथ भर्ती का काम भी चलता रहता है। राजनीतिक भर्ती से अभिप्राय उस कार्य से है जिसके माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था की भूमिकाओं की पूर्ति की जाती है।
  2. हित स्पष्टीकरण-अपने-अपने हितों की रक्षा करने के लिए प्रत्येक राजनीतिक प्रणाली के सदस्य अपनी प्रणाली में कुछ मांगें पेश किया करते हैं। जिस तरीके से इन मांगों को सही रूप प्रदान किया जाता है तथा जिस प्रकार से ये मांगें प्रणाली के निर्णयकर्ताओं को प्रस्तुत की जाती हैं उसे हित स्पष्टीकरण की प्रक्रिया कहा जाता है।

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प्रश्न 10.
राजनीतिक संचार से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजनीतिक संचार का भाव है सूचनाओं का आदान-प्रदान करना। राजनीतिक व्यवस्था में राजनीतिक संचार का बहुत महत्त्व है, क्योंकि इसके द्वारा ही अन्य सभी कार्य सम्पादित होते हैं। सभी व्यक्ति चाहे वे नागरिक हों या अधिकारी वर्ग से सम्बन्धित हों, सूचना पर ही निर्भर रहते हैं और उनके अनुसार ही उनकी गतिविधियों का संचालन होता है। इसलिए प्रजातन्त्र में प्रेस तथा भाषण की स्वतन्त्रता पर जोर दिया जाता है जबकि साम्यवादी राज्यों एवं तानाशाही राज्यों में उन पर प्रतिबन्ध लगाने की बात की जाती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीतिक व्यवस्था की अवधारणा का जन्म कब हुआ?
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था की अवधारणा का जन्म 20वीं शताब्दी में हुआ।

प्रश्न 2.
राजनीतिक प्रणाली शब्द का प्रयोग सबसे पहले किस राजनीतिक विज्ञानी ने किया ?
उत्तर-
डेविड ईस्टन ने।

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प्रश्न 3.
राजनीतिक प्रणाली के अधीन ‘राजनीतिक’ शब्द का अर्थ बताएं।
उत्तर-
किसी भी समुदाय या संघ को राजनीतिक उसी समय कहा जा सकता है जबकि उसकी आज्ञा का पालन प्रशासकीय कर्मचारी वर्ग द्वारा शारीरिक बल प्रयोग के भय से करवाया जाता है।

प्रश्न 4.
व्यवस्था शब्द का अर्थ लिखिए।
अथवा
प्रणाली शब्द का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
व्यवस्था (प्रणाली) शब्द का प्रयोग अन्तक्रियाओं (interactions) के समूह का संकेत करने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 5.
राजनीतिक प्रणाली का अर्थ लिखें।
उत्तर-
राजनीतिक प्रणाली का अर्थ उन अन्योन्याश्रित सम्बन्धों के समूह से लिया जाता है, जिसके संचालन में सत्ता या शक्ति का हाथ होता है।

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प्रश्न 6.
राजनीतिक प्रणाली की कोई एक परिभाषा दें।
उत्तर-
डेविड ईस्टन का कहना है, “राजनीतिक व्यवस्था अन्तक्रियाओं का समूह है जिसे सामाजिक व्यवहार की समग्रता में निकाला गया है तथा जिसके द्वारा समाज के लिए सत्तात्मक मूल्य निर्धारित किए जाते हैं।”

प्रश्न 7.
राजनीतिक प्रणाली की कोई एक विशेषता लिखें।
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था प्रत्येक समाज में पाई जाती है।

प्रश्न 8.
राजनीतिक प्रणाली का एक निवेश कार्य लिखें।
उत्तर-
राजनीतिक समाजीकरण और प्रवेश या भर्ती।

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प्रश्न 9.
राजनीतिक प्रणाली का एक निकास कार्य लिखें।
उत्तर-
नियम निर्माण कार्य।

प्रश्न 10.
राजनीतिक प्रणाली एवं राज्य में कोई एक अन्तर लिखो।
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था में आत्मनिर्भर अंगों का अस्तित्व होता है जबकि राज्य की धारणा में ऐसी कोई विशेषता नहीं है।

प्रश्न 11.
फीड बैक लूप व्यवस्था का अर्थ लिखें।
उत्तर-
फीड बैक लूप व्यवस्था का अर्थ है-निर्गतों के प्रभावों के परिणामों को पुन: व्यवस्था में निवेश के रूप में ले जाना।

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प्रश्न 12.
राजनीतिक प्रणाली की धारण को लोकप्रिय बनाने वाले किसी एक आधुनिक लेखक का नाम लिखें।
उत्तर-
डेविड ईस्टन।

प्रश्न 13.
राजनीतिक व्यवस्था का वातावरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
समाज के वातावरण या परिस्थितियों का राजनीतिक प्रणाली पर जो प्रभाव पड़ता है, उसे हम सामान्य रूप से राजनीतिक प्रणाली का वातावरण कहते हैं।

प्रश्न 14.
‘नियम निर्माण कार्य’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
परम्परावादी दृष्टिकोण के अनुसार विधानमण्डल को सरकार का एक महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है। इस अंग का मुख्य कार्य कानून बनाना है। इसी कार्य को ही आल्मण्ड ने राजनीतिक प्रणाली के नियम निर्माण के कार्य का स्वरूप बताया है।

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प्रश्न 15.
‘नियम निर्णय कार्य’ क्या होता है ?
उत्तर-
समाज में जब भी कोई नियम बनाया जाता है, उसके उल्लंघन की भी सम्भावना सदैव बनी रहती है। अतः यह आवश्यक है कि जो व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता है, उसे दण्ड मिलना चाहिए। प्रायः सभी आधुनिक लोकतन्त्रात्मक राज्यों में यह कार्य न्यायालयों द्वारा किए जाते हैं।

प्रश्न 16.
‘नियम लागू करने का कार्य’ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था का कार्य केवल नियम बनाना ही नहीं है, बल्कि उन नियमों को लागू करना भी है। राजनीतिक व्यवस्था में नियमों को लागू करने की ज़िम्मेदारी पूर्णतः सरकारी कर्मचारियों या नौकरशाही की होती है। यहां तक कि न्यायालयों के निर्णय भी कर्मचारी वर्ग द्वारा लागू किए जाते हैं।

प्रश्न 17.
आल्मण्ड के अनुसार राजनीतिक व्यवस्था की कोई एक विशेषता लिखिए।
उत्तर-
राजनीतिक व्यवस्था की सार्वभौमिकता।

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प्रश्न 18.
राजनीतिक प्रणाली के कौन-से निकास कार्य हैं ?
उत्तर-
(1) नियम बनाना
(2) नियम लागू करना
(3) नियम निर्णयन कार्य।

प्रश्न 19.
राजनीतिक प्रणाली की सीमाएं क्या हैं ?
उत्तर-
राजनीतिक प्रणाली पर आन्तरिक व बाहरी वातावरण का प्रभाव अवश्य पड़ता है, जोकि राजनीतिक प्रणाली की भूमिका को सीमित कर देता है। इसकी सीमाएं क्षेत्रीय नहीं, बल्कि कार्यात्मक होती हैं।

प्रश्न 20.
राजनीतिक प्रणाली के किसी एक अनौपचारिक ढांचे का नाम लिखें।
उत्तर-
राजनीतिक दल।

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प्रश्न 21.
राजनीतिक प्रणाली के किसी एक औपचारिक ढांचे का नाम लिखें। ।
उत्तर-
विधानपालिका।

प्रश्न 22.
राजनीतिक प्रणाली के दो कार्यों के नाम लिखो।
उत्तर-
(1) राजनीतिक समाजीकरण तथा भर्ती
(2) हित स्पष्टीकरण।

प्रश्न 23.
डेविड ईस्टन के अनुसार राजनैतिक समुदाय का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जो समूह सामूहिक क्रियाओं और प्रयत्नों द्वारा अपनी समस्याओं को हल करने का प्रयास करते हैं, उन्हें राजनीतिक समुदाय कहा जाता है।

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प्रश्न 24.
हित स्पष्टीकरण क्या होता है ?
उत्तर-
आल्मण्ड व पावेल के अनुसार अलग-अलग व्यक्तियों तथा समूहों द्वारा राजनीतिक निर्णयकर्ताओं से मांग करने की प्रक्रिया को हित स्पष्टीकरण कहते हैं।

प्रश्न 25.
राजनीतिक संचार से क्या अभिप्राय है ? .
उत्तर-
राजनीतिक संचार का भाव है, सूचनाओं का आदान-प्रदान करना।

प्रश्न 26.
हित समूहीकरण क्या होता है ?
उत्तर-
विभिन्न हितों को एकत्र करने की क्रिया को हित समूहीकरण कहते हैं।

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प्रश्न 27.
राजनीतिक भर्ती से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
राजनीतिक भर्ती से अभिप्राय उस कार्य से है, जिसके माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था की भूमिकाओं की पूर्ति की जाती है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें –

1. राजनीतिक व्यवस्था के दो भाग-राजनीतिक एवं ………………
2. राजनीतिक शब्द ……………….. का सूचक है।
3. व्यवस्था शब्द का प्रयोग …………….. के समूह का संकेत करने के लिए किया जाता है।
4. राजनीतिक समाजीकरण एक …………….. कार्य है।
5. नियम निर्माण एक ……………….. कार्य है।
उत्तर-

  1. व्यवस्था
  2. सत्ता
  3. अन्तक्रियाओं
  4. निवेश
  5. निर्गत ।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. व्यवस्था भिन्न अंगों या हिस्सों से बनती है।
2. प्रत्येक व्यवस्था में एक इकाई के रूप कार्य करने की योग्यता होती है।
3. आल्मण्ड पावेल ने राजनीतिक समुदाय की शक्ति को कानूनी शारीरिक बलात् शक्ति का नाम दिया है।
4. मूल्यों के सत्तात्मक आबंटन की धारणा आल्मण्ड पावेल से सम्बन्धित है।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. सही
  4. ग़लत।

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प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
राजनीतिक व्यवस्था का मुख्य गुण है –
(क) शक्ति या सत्ता
(ख) संगठन
(ग) मानव व्यवहार
(घ) राबर्ट ई० रिग्स।
उत्तर-
(क) शक्ति या सत्ता

प्रश्न 2.
राजनीतिक व्यवस्था शब्द के दो भाग कौन-कौन से हैं ?
(क) राज्य एवं सरकार
(ख) अधिकार एवं कर्त्तव्य
(ग) राजनीतिक एवं व्यवस्था
(घ) स्वतन्त्रता एवं समानता।
उत्तर-
(ग) राजनीतिक एवं व्यवस्था

प्रश्न 3.
“राजनीतिक व्यवस्था अन्तक्रियाओं का समूह है, जिसे सामाजिक व्यवहार की समग्रता में से निकाला गया है, तथा जिसके द्वारा समाज के लिए सत्तात्मक मूल्य निर्धारित किए जाते हैं।” यह कथन किसका है।
(क) आल्मण्ड पावेल
(ख) डेविड ईस्टन
(घ) राबर्ट डहल।
(ग) लासवैल
उत्तर-
(ख) डेविड ईस्टन

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प्रश्न 4.
राजनीतिक व्यवस्था की विशेषता है
(क) मानवीय सम्बन्ध
(ख) औचित्यपूर्ण शक्ति का प्रयोग
(ग) व्यापकता
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
राजनीतिक व्यवस्था का निवेश कार्य है
(क) हित स्पष्टीकरण
(ख) हित समूहीकरण
(ग) राजनीतिक संचारण
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

PSEB 11th Class Geography Guide नदी के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-चार शब्दों में दें-

प्रश्न (क)
विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा कौन-सा है ?
उत्तर-
गंगा-ब्रह्मपत्र डेल्टा।

प्रश्न (ख)
विश्व की सबसे बड़ी कैनियन कौन-सी है ?
उत्तर-
अमेरिका की कोलोरा नदी पर ग्रांड कैनियन।

प्रश्न (ग)
डेल्टा और मियाँडर (Meander) (घुमाव ) शब्द कहाँ से लिए गए हैं ?
उत्तर-
डेल्टा यूनानी भाषा के चौथे अक्षर (A) से लिया गया है। मियाँडर तुर्की भाषा का शब्द है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न (घ)
कोसी नदी के जलोढ़ पंखे की लंबाई-चौड़ाई लिखें।
उत्तर-
154 किलोमीटर लंबा और 143 किलोमीटर चौड़ा।

प्रश्न (ङ)
डेल्टा किसे कहते हैं ? इसकी कोई एक उदाहरण लिखें।
उत्तर-
समुद्र के निकट दरिया के निक्षेप से बने त्रिकोण आकार के मलबे को डेल्टा कहते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा इसका उदाहरण है।

2. नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60 से 80 शब्दों में दें-

प्रश्न (क)
भौतिक मौसमीकरण।
उत्तर-
जब यांत्रिक साधनों के द्वारा चट्टानें अपने ही स्थान पर टूट-फूट कर चूरा-चूरा हो जाती हैं, तब उसे भौतिक मौसमीकरण कहते हैं। इस प्रकार मौसमीकरण से चट्टानों की टूट-फूट (Disintegration) होती है। इससे रासा

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न (ख)
ऑक्सीकरण।
उत्तर-
इस प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन गैस लौहयुक्त धातुओं पर प्रभाव डालकर लोहे को जंग लगा देती है। जंग लगने से चट्टानों का रंग पीला या लाल हो जाता है और ये टूटकर बारीक-बारीक कण बन जाती हैं, इसे ऑक्सीकरण कहते हैं।

प्रश्न (ग)
जैविक मौसमीकरण।
उत्तर-
पौधों, जानवरों और मनुष्यों की गतिविधियों के कारण जब चट्टानों का विघटन हो जाता है, तब इसे जैविक मौसमीकरण कहते हैं। पौधे अपनी जड़ों से चट्टानों में दरारें डाल देते हैं।

प्रश्न (घ)
अपरदन।
उत्तर-
भू-तल पर काट-छाँट, कुरेदने और तोड़-फोड़ की क्रिया को अपरदन कहते हैं। नदी, हवा, हिमनदी इसके प्रमुख कारक हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न (ङ)
मानवीय गतिविधियों का मौसमीकरण पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
मनुष्य मकानों, सुरंगों, रेलमार्गों, खदानों आदि को बनाने के लिए चट्टानों को तोड़-फोड़ कर कमज़ोर कर देता है।

प्रश्न (च)
मौसमीकरण की क्रिया से क्या अभिप्राय है ? विस्तार सहित लिखें।
उत्तर-
बाहरी शक्तियों के कारण धरती के आकार को बदलने की क्रिया को मौसमीकरण कहते हैं। इस प्रकार धरती की सतह के ऊपर मौसम के प्रभाव से होने वाली तोड़-फोड़ को मौसमीकरण कहते हैं। जलवायु, नमी, वर्षा, कोहरे आदि के कारण चट्टानें टूटती, फैलती अथवा सिकुड़ती हैं, जिसे मौसमीकरण कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

3. नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150 से 250 शब्दों में दें-

प्रश्न (क)
अनावृत्तिकरण से क्या अभिप्राय है ? भू-निर्माण (Aggragation) और भू-निमान (निम्न) (Degradation) में अंतर व्याख्या सहित स्पष्ट करें।
उत्तर-
भीतरी और बाहरी शक्तियाँ- भूपटल पर भीतरी (Endogenetic) और बाहरी (Exogenetic) दो प्रकार की शक्तियाँ परिवर्तन लाती हैं। भीतरी शक्तियों द्वारा भूपटल के कुछ भाग ऊँचे उठकर पर्वत, पठार और मैदान बन जाते हैं। कई भाग नीचे धंस जाते हैं और दरारों, घाटियों आदि का रूप धारण कर लेते हैं। इस प्रकार धरातल समतल नहीं होता बल्कि ऊँचा-नीचा हो जाता है। भूपटल की इस असमानता को बाहरी शक्तियाँ (Exogenetic or External Forces) दूर करती हैं। वास्तव में भीतरी और बाहरी शक्तियाँ एक-दूसरे के विपरीत काम करती हैं। जैसे ही धरातल पर भीतरी शक्तियों द्वारा किसी भू-स्थल की रचना होती है, तो बाहरी शक्तियाँ उसे घिसाने का काम आरम्भ कर देती हैं। इन शक्तियों का एक ही काम होता है-धरातल की असमानता को दूर करके भूतल को समतल बनाना। बाहरी शक्तियों को परिवर्तन के बाहरी कारक (External Agents of change) भी कहते हैं।

अनावरण (Denudation)-

मौसमीकरण (Weathering) भूपटल पर परिवर्तन लाने वाली वह बाहरी शक्ति है, जो चट्टानों का विघटन और अपघटन करके उन्हें नष्ट करती है। इसके अलावा एक और प्रक्रिया है, जो चट्टानों को धीरे-धीरे घिसाकर उन्हें नंगा कर देती है और इन चट्टानों से प्राप्त सामग्री को उठाकर ले जाती है, इस प्रक्रिया को अनावरण (Denudation) कहते हैं। मौसमीकरण और अपरदन के मिले-जुले प्रभाव को अनावरण कहते हैं। अनावरण चट्टानों को अलग-अलग साधनों द्वारा तोड़-फोड़ कर नंगा करने और फिर उन्हें सपाट करने की क्रिया को कहते हैं। (Denudation means to lay the rocks bare.)

अनावरण के कार्य (Works of Denudation)—अनावरण की क्रिया में नीचे लिखे तीन प्रकार के कार्य होते हैं-

1. अपरदन (Erosion) बहता जल, हिमनदी, वायु आदि शक्तियों के साथ बहते पत्थर, कंकर, रेत आदि भू तल को घिसाते और कुरेदते हैं। इस क्रिया को अपरदन कहते हैं।

2. स्थानांतरण (Transportation)-ये कारक अपनी अपरदन क्रिया द्वारा प्राप्त सामग्री को उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं। सामग्री को इस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की क्रिया को ,स्थानांतरण कहते हैं। स्थानांतरण की इस क्रिया में चट्टानों के टुकड़े, पत्थर, कंकड़ आदि आपस में
टकराकर टूटते भी रहते हैं।

3. निक्षेपण (Deposition)—ये कारक अपरदन से प्राप्त मलबे को ले जाकर दूसरे स्थान पर जमा कर देते हैं। इसे निक्षेपण कहते हैं।

इसी प्रकार निचले स्थान को सपाट करने की क्रिया को भू-निर्माण (Aggaradation) कहते हैं और ऊँचे भाग को नीचा करने की क्रिया को भू-निमान (Degradation) कहते हैं।

प्रश्न (ख)
नदी की युवा अवस्था क्या है ? इस अवस्था में नदी कौन-कौन सी आकृतियाँ बनाती है ?
उत्तर-
नदी की युवा अवस्था अथवा प्राथमिक भाग नदी के स्रोत से लेकर मैदानी भाग तक होता है। इस भाग में जल की गति तेज़ होती है, तेज़ ढलान के कारण गहरा कटाव होता हैं और तंग घाटी बनती है। नदी का प्रमुख कार्य अपरदन होता है और इसे युवा नदी कहते हैं।

नदी के कार्य (Works of River)-

भूमि-तल को समतल करने वाली बाहरी शक्तियों में से नदी का सबसे अधिक महत्त्व है। वर्षा का जो पानी धरातल पर बहते हुए पानी (Run-off ) के रूप में बह जाता है, वह नदियों का रूप धारण कर लेता है। नदी के कार्य तीन प्रकार के होते हैं-

  1. अपरदन (Erosion)
  2. स्थानांतरण (Transportation)
  3. निक्षेप (Deposition)

1. अपरदन (Erosion)-नदी का प्रमुख कार्य अपने तल और किनारों पर अपरदन करना है। नदियों का मुख्य . उद्देश्य धरती को समुद्र तक ले जाना है। (Rivers carry the land to the sea.)

अपरदन की विधियाँ (Methods of Erosion)-नदी का अपरदन नीचे लिखे तरीकों से होता है-

(i) रासायनिक अपरदन (Chemical Erosion)—यह अपरदन घुलन क्रिया (Solution) द्वारा होता है। नदी के जल के संपर्क में आने वाली चट्टानों के नमक (Salts) घुलकर पानी में मिल जाते हैं।

(ii) भौतिक अपरदन (Mechanical Erosion)-नदी के साथ बहने वाले कंकड़, पत्थर आदि नदी के तल और किनारों को काटते हैं। किनारों के कटने से नदी चौड़ी और तल के कटने से नदी गहरी होती है। भौतिक कटाव तीन प्रकार के होते हैं –

(क) तल का कुरेदना (Down cutting)
(ख) किनारों का कुरेदना अथवा तटीय अपरदन (Side Cutting)
(ग) तोड़-फोड़ (Attrition)

नदी के अपरदन की मात्रा आगे लिखी बातों पर निर्भर करती है

यनिक परिवर्तन नहीं होता। सूर्य का ताप और कोहरा इसके प्रमुख कारक हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न (ख)
ऑक्सीकरण।
उत्तर-
इस प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन गैस लौहयुक्त धातुओं पर प्रभाव डालकर लोहे को जंग लगा देती है। जंग लगने से चट्टानों का रंग पीला या लाल हो जाता है और ये टूटकर बारीक-बारीक कण बन जाती हैं, इसे ऑक्सीकरण कहते हैं।

  1. पानी का परिमाण (Volume of water)
  2. धरातल की ढलान (Slope of the land)
  3. पानी का वेग (Velocity of water)
  4. नदी का भार (Load of water)
  5. चट्टानों की रचना (Nature of the Rocks)

नदी में पानी की मात्रा अधिक होने के कारण अपरदन अधिक होता है।
यदि नदी का वेग दुगुना हो जाए, तो अपरदन शक्ति चौगुनी हो जाती हैं। नदी के वेग और अपरदन शक्ति में वर्ग (square) का अनुपात होता है-

अपरदन शक्ति = (नदी का वेग)2
नदी के अपरदन के द्वारा नीचे लिखे भू-आकार बनते हैं-

1. ‘V’ आकार की घाटी (‘V’ Shaped valley)—नदी पहाड़ी भाग में अपने तल को गहरा करती है, जिसके कारण ‘V’ आकार की गहरी घाटी बनती है। ऐसी तंग, गहरी घाटियों को कैनियन (Canyons) अथवा प्रपाती घाटी भी कहते हैं।
उदाहरण-संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) में कोलोराडो घाटी में ग्रैंड कैनियन (Grand Canyon) 480 किलोमीटर लंबी और 2000 मीटर गहरी है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य 1

2. गहरी घाटी/गॉर्ज (Gorges)—पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत गहरे और तंग नदी मार्गों को गॉर्ज (Gorge) अथवा कंदरा कहते हैं। पहाड़ी क्षेत्र ऊँचे उठते रहते हैं, परन्तु नदियाँ निरंतर गहरे कटाव करती रहती हैं। इस प्रकार ऐसे नदी मार्गों का निर्माण होता है, जिनकी दीवारें लंबरूप में होती हैं। उदाहरण-हिमालय पर्वत में सिंध नदी, असम में ब्रह्मपुत्र नदी और हिमाचल प्रदेश में सतलुज नदी गहरे गॉर्ज बनाती है।

3. चश्मे और झरने (Rapids and Water-falls)-जब अधिक ऊँचाई से पानी अधिक वेग के साथ सीधी ढलान वाले क्षेत्र से नीचे गिरता है, तो उसे जल का झरना अथवा जल-प्रपात कहते हैं। जल-प्रपात चट्टानों की अलग-अलग रचना के कारण बनते हैं।

(क) जब कठोर चट्टानों की परत नरम चट्टानों की परत पर क्षैतिज (Horizontal) रूप में हो, तो निचली नरम चट्टानें जल्दी कट जाती हैं, तब चट्टानों के सिरे पर जल-प्रपात बनता है।

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उदाहरण-

(i) यू० एस० ए० में नियागरा (Niagra) जल-प्रपात जो कि 167 फुट (51 मीटर) ऊँचा है। (ii) नर्मदा नदी पर कपिलधारा जल-प्रपात (Kapildhara Falls) 100 फुट ऊँचा है। (iii) जब कठोर और नरम चट्टानें एक-दूसरे के समानांतर लंब रूप (vertical) में हों, तब कठोर चट्टानों की ढलान पर जल-प्रपात बनता है। इस प्रकार एक स्थायी जल-प्रपात का निर्माण होता है।

उदाहरण-अमेरिका में यैलो स्टोन नदी (Yellow Stone River) का जल-प्रपात।
चश्मे (Rapids)—जब कठोर और मुलायम चट्टानों की परतें एक-दूसरे के ऊपर बिछी हों और कुछ झुकी हों, तो चश्मों की एक लड़ी बन जाती है।

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उदाहरण-कांगो नदी (Cango River) में लिविंगस्टोन फॉल्ज़ (Living Stone Falls) नामक 32 झरनों की एक लड़ी है।

प्रश्न (ग)
जमा करने की क्रिया के दौरान नदी का भू-आकृतियों का धरातल (Topography) पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
नदी का परिवहन कार्य (Transportation Work of River) –
नदी अपनी अपरदन क्रिया द्वारा प्राप्त सामग्री (Load) को उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। नदी द्वारा इस सामग्री के स्थान-परिवर्तन की क्रिया को नदी-परिवहन कहते हैं। इस सामग्री का स्थान-परिवर्तन अनेक प्रकार से होता है, जो आगे लिखे अनुसार है

1. जल में रगड़ के साथ (Traction)—इसमें बड़े चट्टानी टुकड़े, भारी पत्थर आदि नदी के तल के साथ साथ आगे बढ़ते जाते हैं।

2. जल में उठाया हुआ मलबा (Load in Suspension)—मध्यवर्ती और सूक्ष्म श्रेणी की सामग्री नदी के जल के साथ तैरती जाती है।

3. जल में घुलकर (Solution)—जो सामग्री घुलनशील होती है, वह जल-धारा में घुले हुए रूप में प्रवाह करती है। नदी की परिवहन शक्ति दो तत्त्वों पर निर्भर करती है –

(i) नदी का वेग (Velocity of the River)
(ii) नदी के जल की मात्रा (Volume of water)-नदी के परिवहन और वेग में छठी शक्ति का अनुपात होता है –

नदी की परिवहन शक्ति = (नदी का वेग)6

नदी का निक्षेपण कार्य (Depositional Work of River)-

नदी का वेग जब कम हो जाता है और उसमें सामग्री की अधिकता हो जाती है, तो इस सामग्री का निक्षेप आरंभ हो जाता है। नदी की इस क्रिया को नदी का निक्षेपण (River Deposition) कहते हैं। इस प्रकार नदियों द्वारा निक्षेपण उनकी अपरदन क्रिया का प्रतिफल है। भारी पदार्थों का मैदानी मार्ग के ऊपरी भागों में और सूक्ष्म कणों का डेल्टा के भागों में निक्षेपण होता है।

नदी का निक्षेपण तब होता है, जब-

1. नदी का जल और अपरदन शक्ति कम हो जाए। 2. मुख्य नदी और सहायक नदियों का भार बढ़ जाए। 3. नदी की ढलान कम हो। 4. नदी का वेग धीमा हो।

नदी निक्षेपण द्वारा बनी भू-आकृतियाँ (Land forms produced by River Deposition)-

नदी अपने मैदानी मार्ग में अपरदन और निक्षेपण दोनों काम करती है, परंतु डेल्टाई भागों में इसका एक ही निक्षेपण का काम होता है। निक्षेपण क्रिया के फलस्वरूप नीचे लिखी भू-आकृतियों का निर्माण होता है-

1. जलोढ़ पंखे अथवा कोन (Alluvial Fan or Cone)–नदी जब पर्वतीय भागों को छोड़कर मैदान में प्रवेश करती है, तो भूमि की ढलान के कम हो जाने के कारण इसका बहाव धीमा हो जाता है। परिणामस्वरूप नदी अपने साथ बहाकर लाए चट्टानों के टुकड़ों, पत्थरों, कंकड़ों आदि को आगे ले जाने में असमर्थ हो जाती है और इस सामग्री को पर्वतों के पैरों में छोड़ देती है। यह निक्षेप ढेर के रूप में पर्वतों के सहारे एकत्र हो जाता है। यह ढेर एक कोण के आकार का होता है। इसे जलोढ़ी पंखा भी कहा जाता है।

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2. नदी विसर्पण अथवा नदी में घुमाव (River Meanders)—प्रौढ़ अवस्था में नदी की ढाल कम हो जाती है और नदी का प्रवाह धीमा हो जाता है। नदी की धाराएँ अपने मार्ग में आने वाली छोटी-सी रुकावट के कारण भी मुड़ जाती हैं और एक किनारे की ओर से दूसरे किनारे की तरफ बहने लगती हैं। ये रुकावट वाले किनारे पर निक्षेपण और दूसरे किनारे पर अपरदन करती हैं। अपरदित किनारे से फिर पहले किनारे की ओर मुड़ जाती हैं और फिर वे किनारों को काटती हैं। इस प्रकार ये दोनों किनारे क्रम से कट जाते हैं। साथ-हीसाथ अपरदित सामग्री का किनारों पर निक्षेप भी होता है। इस प्रकार यदि किनारे का एक भाग कट के पीछे हटता है, तो इसी किनारे का दूसरा भाग इस पदार्थ को प्राप्त करके नदी की ओर बढ़ता है। ऐसी ही क्रिया दूसरे किनारे पर भी होती है। परिणामस्वरूप नदी में घुमाव आने शुरू हो जाते हैं। इन घुमावों को ही नदी विसर्पण कहते हैं। तुर्की देश की मिएंडर (Meanders) नदी के मार्ग में ऐसे अनेक घुमाव या विसर्पण हैं। इसीलिए इस नदी के घुमावों को मिएंडर (Meanders) कहते हैं।

3. धनुषदार झील (Oxbow Lake)-ज्यों-ज्यों नदी में विसर्प बड़े हो जाते हैं, वैसे-वैसे उनका आकार वृत्ताकार होता जाता है। इस अवस्था में नदी बाढ़ के समय मोड़ों को छोड़कर इसके निकटवर्ती भाग को काटकर बहने लगती है। यह सीधा प्रवाह-मार्ग बाढ़ के बाद भी बना रहता है। ऐसी अवस्था में मोड़ वाला भाग झील का रूप धारण कर लेता है। इसे धनुषदार झील कहते हैं। आकार में यह बैल के खुर या धनुष के समान प्रतीत होती है, इसलिए इसे गाय-खुर झील भी कहते हैं।

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4. प्राकृतिक बाँध अथवा तटीय बाँध और बाढ़ के मैदान (Natural Embankments or Levees and Flood Plains)-वर्षा ऋतु में नदी में अचानक बाढ़ आ जाती है, जिसके कारण नदी का जल तटों को पार करके निकटवर्ती क्षेत्र में फैलने का यत्न करता है परंतु ये तट उसके फैलने पर रोक लगाते हैं, इसलिए वह अपना अधिकतर मलबा तटों पर ही इकट्ठा कर देती है। इससे ये किनारे ऊँचे उठ जाते हैं और बाँध के रूप में बाढ़ के पानी को निकटवर्ती क्षेत्र में फैलने से रोकते हैं। इन्हें तटीय बाँध कहते हैं। ह्वांग-हो, गंगा और मिसीसिपी नदियों की निचली घाटियों में कई तटीय बाँध बन गए हैं। भयंकर बाढ़ के कारण जब ये बाँध टूट जाते हैं, तो उनकी रेत को नदी निकटवर्ती क्षेत्र में निक्षेप कर देती है। इस क्षेत्र को बाढ़ का मैदान कहते हैं।

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5. डेल्टा (Delta) सागर में प्रवेश करने से पहले ढलान बहुत कम होने के कारण नदी की शक्ति और वेग बहुत कम हो जाता है। फलस्वरूप नदी अपने साथ बहाकर लाई सामग्री को अपने मुहाने पर ही एकत्र कर देती है और अपना मार्ग बंद कर लेती है। नदी अपना प्रवाह बनाए रखने के लिए नया मार्ग खोजती है। इस स्थल आकृति को डेल्टा कहा जाता है। इसका आकार यूनानी भाषा की वर्णमाला का चौथा अक्षर डेल्टा (Δ) से मिलता है।गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बने सुंदर वन डेल्टा और नील नदी का डेल्टा इसके विशेष उदाहरण हैं। डेल्टा के निर्माण के लिए नीचे लिखी स्थितियों का होना ज़रूरी है –
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  • नदी का स्रोत पर्वतों में हो, जहाँ से यह काफ़ी मात्रा में सामग्री बहाकर ला सके।
  • पर्वत और मैदानी मार्गों में कई सहायक नदियाँ मिलनी चाहिए, ताकि अधिक सामग्री प्राप्त हो सके।
  • नदी का मैदानी मार्ग अधिक लंबा होना चाहिए, ताकि उसका प्रवाह धीमा हो जाए और नदी द्वारा लाई सामग्री सीधी सागर में न जा गिरे।
  • नदी के मार्ग में कोई झील नहीं होनी चाहिए। मार्ग में यदि कोई झील होगी, तो सामग्री का निक्षेप उसमें हो जाएगा और डेल्टा के निर्माण के लिए सामग्री नहीं रहेगी।
  • नदी के मुहाने के पास सागर शांत होना चाहिए, नहीं तो सागर की धाराएँ, लहरें और ज्वारभाटा सामग्री को गहरे सागर में ले जाएंगे और मुहाने के पास निक्षेप नहीं होगा।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न (घ)
नदी अपरदन की क्रिया को निर्धारित करने वाले तत्त्वों के बारे में लिखें।
उत्तर-
नदी का अपरदन कार्य (Erosional Work of the River)-

नदी द्वारा प्रवाहित पत्थर, कंकड़, रेत आदि नदी घाटी को घिसाते, कुरेदते और चट्टानों की तोड़-फोड़ करते हैं। इस क्रिया को अपरदन कहते हैं।
नदी सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य करती है। नदी का मुख्य उद्देश्य धरती को काटकर समुद्र तक ले जाना है। (Rivers carry the land to the sea.) नदी आगे लिखे तरीकों से अपरदन करती है-

  1. भौतिक अपरदन (Physical Erosion)—इसमें नदी किनारों के कटाव (Side Cutting) और तल के कटाव (Down Cutting) का काम करती है।
  2. रासायनिक अपरदन (Chemical Erosion)—नदी घुलनशील चट्टानों को घोलकर नष्ट कर देती है।

नदी के अपरदन के प्रकार (Types of River Erosion)-

  1. रगड़न (Abrasion)–नदी बहते पत्थर, कंकड़, बज़री आदि के साथ रगड़ने की क्रिया करती है।
  2. सहरगड़न (Attrition)—पत्थर, कंकड़ आदि आपस में टकराते हैं।
  3. घुलकर (Solution)-नदी का जल कई चट्टानों को घोल देता है। अनुमान है कि नदियाँ हर वर्ष 500 करोड़ टन खनिज पदार्थ घोलकर समुद्र में ले जाती हैं।
  4. जल-दबाव क्रिया (Hydraulic action) नदी के जल के दबाव के साथ भी चट्टानें टूटती रहती हैं।

नदी अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors Controlling River Erosion)-नदी अपरदन को नीचे लिखे कारक नियंत्रित करते हैं-

1. नदी में जल की मात्रा (Volume of water in a River) नदी में जल की मात्रा अधिक होने से अपरदन भी अधिक होता है। यही कारण है कि जिन नदियों में बाढ़ें अधिक आती हैं, उनमें अपरदन भी अधिक होता है।

2. नदी के जल की गति (Velocity of River Water)—तेज़ी से प्रवाह करती हुई नदी में अधिक शक्ति होती है। नदी का वेग नदी घाटी की ढलान और जल प्राप्ति पर निर्भर करता है। यदि नदी का वेग दुगुना हो जाए, तो अपरदन शक्ति चौगुनी हो जाती है। नदी के वेग और अपरदन शक्ति में वर्ग (Square) का अनुपात होता है
अपरदन शक्ति = (नदी का वेग)2

3. नदी जल में सामग्री की मात्रा (Volume of Load in a River)–नदी अपने जल के साथ घाटी से प्राप्त अनेक प्रकार की सामग्री का प्रवाह करती है। कुछ सामग्री जल में घुली हुई, कुछ तैरती हुई अवस्था में और कुछ तल के साथ-साथ लुढ़कती हुई चलती है। यह सामग्री नदी के उपकरण (Tools) होते हैं।

4. चट्टानों की कठोरता (Solidity of Rocks) नदी तल पर चट्टानों की संरचना और उनके लक्षणों पर भी अपरदन निर्भर करता है। तल की चट्टानों के कठोर होने के कारण कटाव धीरे-धीरे होता है। नदी तल पर चट्टानों में दरारें अपरदन में सहायता करती हैं।

प्रश्न (ङ)
अंतर बताएं :
(i) झरना-चश्मा (उछलकायें)
(ii) जलोढ़ कोन-जलोढ़ पंखा
(iii) जल कुंड-प्राकृतिक बांध
(iv) बाढ़ के मैदान-डेल्टा
उत्तर-
(i) झरना (Waterfall)

  1. जब नरम चट्टानों के ऊपर क्षैतिज अवस्था में कठोर चट्टानों की परत हो, तो झरना बनता है।
  2. नील नदी इसका उदाहरण है।

चश्मा (Rapid)-

  1. जब कठोर और नरम चट्टानों की परतें लंब रूप में होती हैं, जिसके फलस्वरूप जल चश्मे के रूप में बहना शुरू हो जाता है।
  2. नियागरा झरना इसका उदाहरण है।

(ii) जलोढ़ कोन (Alluvial Cone)-

  1. जब नदी पर्वतीय भाग से निकलकर पहाड़ों के दामन में निक्षेप करती है, तो जलोढ़ कोन बनते हैं।
  2. हिमालय के दामन में कई जलोढ़ कोन हैं।

जलोढ़ पंखे (Alluvial Fans)-

  1. कई जलोढ़ी कोन मिलकर एक जलोढ़ी पंखे का निर्माण करते हैं।
  2. कोसी नदी का जलोढ़ पंखा।

(iii) जलकुंड-
नदी के मार्ग में छोटे-छोटे गड़े बन जाते हैं। धीरे-धीरे ये गड्ढे बड़े होकर जलकुंड बन जाते हैं।

प्राकृतिक बाँध-
नदी के निचले भाग में नदी घाटी के मार्ग में निक्षेप के कारण एक बाँध बन जाता है जिसे प्राकृतिक बाँध कहते हैं।

(iv) बाढ़ के मैदान-
नदी का पानी अपने निचले मार्ग पर किनारों के बाहर बहता है, तब तलछट के निक्षेप से बाढ़ का मैदान बन जाता है।

डेल्टा –
समुद्र में गिरने से पहले नदी एक त्रिकोण के आकार की भू-आकृति बनाती है, जिसे डेल्टा कहते हैं।

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Geography Guide for Class 11 PSEB नदी के अनावृत्तिकरण कार्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
किन्हीं तीन बाहरी शक्तियों के नाम बताएँ।
उत्तर-
हवा, नदी, हिमनदी।

प्रश्न 2.
अनावृत्तिकरण की क्रिया के दो कारक बताएँ।
उत्तर-
सूर्य का ताप और गुरुत्वाकर्षण शक्ति।

प्रश्न 3.
Mass Wasting से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
फ्लाक के अनुसार मलबे का परिवहन।

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प्रश्न 4.
कार्बनीकरण की क्रिया किन क्षेत्रों में होती है ?
उत्तर-
चूने की चट्टानों के क्षेत्र में।

प्रश्न 5.
जलकरण की क्रिया का एक क्षेत्र बताएँ।
उत्तर-
विंध्याचल पहाड़ियाँ।

प्रश्न 6.
मौसमीकरण के दो साधन बताएँ।
उत्तर-
सूर्य का ताप और वर्षा।

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प्रश्न 7.
मौसमीकरण में सहायक एक तत्त्व बताएँ।
उत्तर-
ढलान।

प्रश्न 8.
सूर्य के ताप के माध्यम से मौसमीकरण किस प्रदेश में अधिक होता है ?
उत्तर-
मरुस्थल।

प्रश्न 9.
कोहरा पड़ने पर पानी के जम जाने से आयतन कितना बढ़ जाता है ?
उत्तर-
1/11 गुणा।

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प्रश्न 10.
भारत में खाइयाँ (Ravines) किस प्रदेश में मिलती हैं ?
उत्तर-
चंबल घाटी।

प्रश्न 11.
भारत में मिट्टी के काम किस प्रदेश में मिलते हैं ?
उत्तर-
स्पीति घाटी।

प्रश्न 12.
ऑक्सीकरण की क्रिया के लिए कौन-सी गैस काम करती है ?
उत्तर-
ऑक्सीजन।

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प्रश्न 13.
कार्बनीकरण का एक प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
गुफाओं का बनना।

बहुविकल्पी प्रश्न नोट-सही उत्तर चुनकर लिखें-

प्रश्न 1.
ऑक्सीकरण क्रिया में कौन-सी गैस काम करती है ?
(क) ऑक्सीजन
(ख) नाइट्रोजन
(ग) कार्बन-डाइऑक्साइड
(घ) ओज़ोन।
उत्तर-
ऑक्सीजन।

प्रश्न 2.
मिट्टी का निर्माण किस क्रिया से होता है?
(क) मौसमीकरण
(ख) अपरदन
(ग) परिवहन
(घ) निक्षेप।
उत्तर-
मौसमीकरण।

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प्रश्न 3.
जम जाने पर पानी का आयतन कितना बढ़ जाता है।
क) \(\frac{1}{2}\)
(ख) \(\frac{2}{3}\)
(ग) \(\frac{3}{4}\)
(घ) \(\frac{1}{10}\)
उत्तर-
\(\frac{1}{10}\)

प्रश्न 4.
कार्बन-डाइऑक्साइड किस चट्टान को घोल देती है ?
(क) चूने का पत्थर
(ख) ग्रेनाइट
(ग) बसालट
(घ) शैल।
उत्तर-
चूने का पत्थर।

प्रश्न 5.
वर्षा के जल से कौन-सी क्रिया होती है ?
(क) भूमि का खिसकना
(ख) घोल
(ग) जलकरण
(घ) ऑक्सीकरण।
उत्तर-
भूमि का खिसकना।

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अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न – (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
मौसमीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
मौसमीकरण (Weathering)—वायुमंडल की शक्तियों द्वारा चट्टानों के टूटने, भुरने और घुलने की क्रिया को मौसमीकरण कहते हैं।

प्रश्न 2.
अनावरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
अनावरण (Denudation)-चट्टानों को तोड़-फोड़ कर नंगा करके समतल करने की क्रिया को अनावरण कहते हैं।

प्रश्न 3.
अपरदन की परिभाषा लिखें।
उत्तर-
अपरदन (Erosion)—दरियाओं के मौसमीकरण द्वारा हुई टूट-फूट को अपने साथ बहाकर ले जाना अपरदन कहलाता है।

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प्रश्न 4.
विघटन की परिभाषा दें।
उत्तर-
विघटन (Disintegration)—जब चट्टानें अपने स्थान पर ही टूटती हैं, तो उसे विघटन कहते हैं।

प्रश्न 5.
अपघटन किसे कहते हैं ?
उत्तर-
अपघटन (Decomposition)—जब चट्टानों के टूटने से उनकी रासायनिक संरचना बदल जाती है, तो उसे अपघटन कहते हैं।

प्रश्न 6.
भौतिक मौसमीकरण की परिभाषा दें।
उत्तर-
भौतिक मौसमीकरण (Physical Weathering)-जब यांत्रिक शक्तियों के कारण चट्टानें टूट-फूट जाती हैं, तो उसे भौतिक मौसमीकरण कहते हैं।

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प्रश्न 7.
रासायनिक मौसमीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
रासायनिक मौसमीकरण (Chemical Weathering)-जब गैसों के प्रभाव से चट्टानें टूटती हैं, तो उसे रासायनिक मौसमीकरण कहते हैं।

प्रश्न 8.
जैविक मौसमीकरण क्या है ?
उत्तर-
जैविक मौसमीकरण (Biological Weathering)-जब मनुष्य, पेड़-पौधे, जीव-जंतु आदि चट्टानों को तोड़ने-फोड़ने में मदद करते हैं, तो उसे जैविक मौसमीकरण कहते हैं।

प्रश्न 9.
अपवाह क्षेत्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
वह प्रदेश, जिसका समूचा जल उसमें बहने वाली नदी और सहायक नदियों में बहता है, उसे नदी का अपवाह क्षेत्र कहते हैं।

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प्रश्न 10.
नदी के मार्ग को तीन भागों में बाँटें।
उत्तर-

  • ऊपरी भाग
  • मैदानी भाग
  • डेल्टा भाग।

प्रश्न 11.
नदी के अपरदन के अनुसार तीन अवस्थाएँ लिखें।
उत्तर-

  • युवावस्था (Young Stage)
  • प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)
  • वृद्धावस्था (Old Stage)।

प्रश्न 12.
नदी अपरदन के दो तरीके बताएँ।
उत्तर-

  • भौतिक अपरदन
  • रासायनिक अपरदन।

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प्रश्न 13.
नदी के अपरदन और नदी के वेग में क्या संबंध है ?
उत्तर-
नदी की अपरदन शक्ति = (नदी का वेग)। इस प्रकार नदी के अपरदन और वेग में वर्ग का अनुपात है।

प्रश्न 14.
नदी का अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है?
उत्तर-

  • नदी में जल की मात्रा
  • नदी में जल की गति
  • नदी में उठाया सामान
  • चट्टानों की कठोरता।

प्रश्न 15.
गहरी घाटी से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नदी के पर्वतीय भाग में गहरे और तंग मार्ग को गहरी घाटी (Gorge) कहते हैं।

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प्रश्न 16.
भारत में गहरी घाटियों के दो उदाहरण दें।
उत्तर-
सतलुज नदी का गॉर्ज और ब्रह्मपुत्र नदी का गॉर्ज।

प्रश्न 17.
ग्रैंड कैनियन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
तंग और गहरी नदी घाटी को कैनियन कहते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलोराडो नदी का ग्रैंड कैनियन 480 कि०मी० लम्बा और 1906 मीटर गहरा है।

प्रश्न 18.
झरना किसे कहते हैं ? ।
उत्तर-
जब अधिक ऊँचाई से पानी अधिक वेग से सीधी ढलान वाले क्षेत्र से नीचे गिरता है, तो उसे झरना कहते हैं। अमेरिका में नियागरा झरना बहुत प्रसिद्ध है।

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प्रश्न 19.
नदी के घुमाव से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नदी जब मोड़ खाती हुई चक्कर बना कर बहती है, तो उन्हें घुमाव अथवा मिएंडर (Meauders) कहते हैं।

प्रश्न 20.
किन्हीं तीन बाढ़ के मैदानों के नाम बताएँ।
उत्तर-
गंगा नदी, मिसीसिपी नदी और ह्वांग हो नदी के मैदान।

प्रश्न 21.
गो-खुर झील (Oxbow Lake) कैसे बनती है ?
उत्तर-
नदी में बाढ़ के समय एक मोड़ का किनारा जब दूसरे मोड़ के किनारे के निकट आ जाता है, तो नदी के मार्ग में एक मोड़ अलग होकर रह जाता है। इस नाम के खुर जैसे मोड़ को गो-खुर झील कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न 22.
डेल्टा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
नदी जब समुद्र में निक्षेप करती है, तो त्रिकोण आकार का थल रूप बनता है, जिसे डेल्टा कहते हैं।

प्रश्न 23.
संसार के प्रमुख डेल्टा के नाम बताएँ।
उत्तर-
नील नदी का डेल्टा, गंगा नदी का डेल्टा, मिसीसिपी नदी का डेल्टा, नाईज़र नदी का डेल्ट, यंगसी नदी का डेल्टा।

प्रश्न 24.
पंजा डेल्टा क्या होता है?
उत्तर-
जब नदी कई शाखाओं में बँटकर निक्षेप करती है, तो उसकी धाराएँ उँगली के समान फैल जाती हैं, उसे पंजा डेल्टा कहते हैं।

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लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
अपरदन और मौसमीकरण में अंतर बताएँ-
उत्तर-
अपरदन (Erosion)-

  1. भू-तल पर काट-छाँट, खुरचन और तोड़-फोड़ की क्रिया को अपरदन कहते हैं।
  2. अपरदन एक बड़े क्षेत्र में होता है।
  3. अपरदन गतिशील कारकों के द्वारा होता है जैसे नदी, हिमनदी, हवा आदि।
  4. मौसमीकरण अपरदन की क्रिया में मदद करता है।

मौसमीकरण (Weathering)-

  1. चट्टानों के अपने ही स्थान पर टूटने, भुरने और घुलने की क्रिया को मौसमीकरण कहते हैं।
  2. मौसमीकरण एक छोटे क्षेत्र की क्रिया है।
  3. मौसमीकरण सूर्य के ताप, कोहरा और रासायनिक क्रियाओं के द्वारा होता है।
  4. मौसमीकरण चट्टानों को कमज़ोर करके अपरदन में मदद करता है।

प्रश्न 2.
भौतिक मौसमीकरण और रासायनिक मौसमीकरण में अंतर बताएँ।
उत्तर-
भौतिक मौसमीकरण (Physical Weathering)-

  1. इसमें यांत्रिक साधनों द्वारा चट्टानें टूटकर चूर चूर-चूर हो जाती हैं।
  2. इसमें चट्टानों की खनिज रचना में कोई अंतर नहीं आता।
  3. यह मौसमीकरण शुष्क और ठंडे प्रदेशों में अधिक होता है।
  4. भौतिक मौसमीकरण की मुख्य शक्तियाँ ताप, कोहरा, वर्षा और हवा हैं।

रासायनिक मौसमीकरण (Chemical Weathering)-

  1. इसमें रासायनिक क्रिया द्वारा चट्टानें टूट-फूट कर चूर हो जाती हैं।
  2. इसमें चट्टानों के खनिज भी बदल जाते हैं।
  3. यह मौसमीकरण उष्ण और नमी वाले प्रदेशों में अधिक होता है।
  4. रासायनिक मौसमीकरण में कार्बन-डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैसों का प्रभाव होता है।

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प्रश्न 3.
सूर्य का ताप किस प्रकार मौसमीकरण का काम करता है ?
उत्तर-
सूर्य का ताप (Temperature) सूर्य की गर्मी से दिन के समय चट्टानें एकदम गर्म होकर फैलती हैं और रात को तेज़ी से ठंडी होकर सिकुड़ती हैं। बार-बार फैलने और सिकुड़ने से चट्टानों में दरारें पड़ जाती हैं फलस्वरूप ये टूटती हैं और चूरा-चूरा हो जाती है। इस मलबे को Talus कहते हैं।
सूर्य के ताप के द्वारा मौसमीकरण कई बातों पर निर्भर करता है-

  • मोटे कणों वाली चट्टानों पर अधिक और जल्दी मौसमीकरण होता है।
  • काले रंग की चट्टानों पर अधिक मौसमीकरण होता है।
  • पहाड़ी ढलानों और मरुस्थलों में मौसमीकरण महत्त्वपूर्ण है।

उदाहरण-राजस्थान के मरुस्थल में ताप में अधिक अंतर के कारण चट्टानों के टूटने की आवाज़ पिस्तौल की आवाज़ जैसी होती है।

प्रश्न 4.
शीत प्रदेशों में कोहरा किस प्रकार मौसमीकरण का कार्य करता है ?
उत्तर-
कोहरा (Frost)—पहाड़ी ठंडे प्रदेशों में कोहरा मौसमीकरण का महत्त्वपूर्ण साधन है। चट्टानों की दरारों में पानी भर जाता है। यह पानी सर्दी के कारण रात को जम जाता है। जमने से पानी का आयतन (Volume) 1/11 गुणा बढ़ जाता है। जमा हुआ पानी आस-पास की चट्टानों पर 2000 पौंड प्रति वर्ग से दबाव डालता है। इस दबाव के साथ चट्टानें टूटती रहती हैं। यह मलबा पर्वत की ढलान के साथ रोड़ी (Scree) के रूप में जमा होता रहता है। हिमालय के पहाड़ी प्रदेशों में ऐसा होता है। चट्टानें बड़े-बड़े टुकड़ों (Blocks) के रूप में टूटती रहती हैं।

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प्रश्न 5.
ऑक्सीकरण किस प्रकार मौसमीकरण की क्रिया में सहायक है ?
उत्तर-
रासायनिक मौसमीकरण (Chemical Weathering)-ऑक्सीजन, कार्बन-डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन गैसों के प्रभाव से चट्टानों के खनिजों तथा रासायनिक तत्त्वों में परिवर्तन हो जाता है। चट्टानें ढीली हो जाती हैं और अलग-अलग नहीं होतीं। इसे विघटन (Decomposition) भी कहते हैं। यह रासायनिक मौसमीकरण कई प्रकार से होता है आक्सीकरण (Oxidation)-चट्टानों के लौह खनिज के साथ ऑक्सीजन के मिलने से चट्टानों को जंग (Rust) लग जाता है और ये भुरभुरा कर नष्ट हो जाती हैं।

उदाहरण-मिस्र की शुष्क जलवायु में Cleoptra needle लगभग 4000 वर्ष ठीक हालत में रही, पर इंग्लैंड की नम जलवायु में उसे केवल 60 वर्षों में ही जंग लग गया।

प्रश्न 6.
मौसमीकरण के प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
मौसमीकरण के प्रभाव (Effects of Weathering)-

  1. कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी का निर्माण मौसमीकरण से होता है। यह मिट्टी वनस्पति और कृषि का आधार है।
  2. बहुमूल्य धातु-कण घुलकर एक स्थान पर इकट्ठे होते रहते हैं।
  3. मौसमीकरण चट्टानों को कमज़ोर बनाकर अपरदन में सहायक होता है।
  4. मरुस्थलों की रेत इस क्रिया से बनती है।
  5. मौसमीकरण के कारण ही पर्वत घिस-घिस कर मैदान बने हैं।
  6. मौसमीकरण के कारण ही घाटियाँ चौडी होती रहती हैं।

प्रश्न 7.
अपरदन और मौसमीकरण में अन्तर बताएँ।
नोट-
उत्तर के लिए प्रश्न नं० 1 (लघु उत्तरात्मक प्रश्न) देखें।

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प्रश्न 8.
भू-निर्माण (Aggradation) और भू-निमान (Degradation) में क्या अंतर है ?
उत्तर-
धरती की बाहरी शक्तियाँ लगातार परिवर्तन करती रहती हैं। धरती का आकार बदलता रहता है। भू-आकार मिटते रहते हैं और नए भू-आकार बनते रहते हैं। भीतरी शक्तियाँ भू-आकारों का निर्माण करती है और बाहरी शक्तियां भू-आकारों को समतल करने का काम करती रहती हैं। इस प्रकार चट्टानों को तोड़-फोड़ और नंगा करके समतल करने की क्रिया को अनावरण (Denudation) कहते हैं।

भू-निर्माण (Aggradation) वह क्रिया है, जिसमें निक्षेप के द्वारा ऊँचे प्रदेशों का निर्माण होता है। बाहरी शक्तियाँ कुरेदे हुए मलबे को अपने साथ बहाकर ले जाती हैं और निचले स्थानों पर जमा कर देती हैं। इस प्रकार एक नए स्तर का अथवा तल का निर्माण होता है।

भू-निमान (Degradation) वह क्रिया है, जिसमें बाहरी शक्तियाँ अपरदन और मौसमीकरण के द्वारा ऊँचे प्रदेशों की ऊँचाई को कम कर देती हैं। इसमें अपरदन और मौसमीकरण किसी तल को नीचा करने का काम करते हैं। इस प्रकार भू-निर्माण और भू-निमान एक-दूसरे की विपरीत क्रियाएँ हैं, पर एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करती हैं।

प्रश्न 9.
नदी मार्ग को स्रोत से लेकर मुहाने तक अलग-अलग भागों में बाँटें।
उत्तर-
नदी के भाग (Sections of a river)-
नदी का विस्तार किसी पहाड़ी प्रदेश से लेकर समुद्र तक होता है। नदी के निकास से लेकर नदी के मुहाने तक नदी को तीन भागों (Sections) में बाँटा जाता है। प्रत्येक भाग में नदी का कार्य, घाटी का रूप और भू-आकार अलग-अलग होते हैं।

1. पहाड़ी भाग अथवा आरंभिक भाग (Mountain Stage or Upper Course)—इस भाग में नदी की गति 10 मीटर प्रति कि०मी० से अधिक होती है। इसे युवा भाग (Young Stage) भी कहते हैं।

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2. घाटी वाला भाग अथवा मध्य भाग (Valley Stage or Middle Course)-इस भाग में नदी की गति 2 मीटर प्रति किलोमीटर होती है। इसे नदी की प्रौढ़ अवस्था (Mature Stage) भी कहते हैं।

3. मैदानी भाग अथवा निचला भाग (Plain Stage or Lower Course)—इस भाग में नदी की गति मीटर प्रति किलोमीटर होती है। इसे नदी की वृद्धावस्था (Old Stage) भी कहते हैं।

प्रश्न 10.
“नदी का अपरदन पानी की मात्रा और धरती की ढलान पर निर्भर करता है।” व्याख्या करें।
उत्तर-
नदी का अपरदन मुख्य रूप में पानी के वेग की मात्रा और घाटी की ढलान पर निर्भर करता है। अधिक ढलान के कारण नदी का वेग बढ़ जाता है और पर्वतीय भाग में कटाव अधिक होता है। बर्फ से ढके ऊँचे पर्वतों से निकलने वाली नदियाँ अधिक पानी के कारण गहरी घाटियाँ बनाती हैं। यदि नदी का वेग दुगुना हो जाए, तो नदी की अपरदन-शक्ति चौगुनी हो जाती है।

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प्रश्न 11.
धनुषदार झील (Ox-bow Lake) कैसे बनती है ?
उत्तर-
नदी-मार्ग में बनने वाले मोड़ बड़े होकर पूरी तरह गोल हो जाते हैं। इनका आकार अंग्रेज़ी अक्षर ‘S’ जैसा हो जाता है। कई बार दो मोड़ एक-दूसरे के बहुत नज़दीक आ जाते हैं, तो गर्दन जैसे आकार का मोड़ बन जाता है। नदी के एक मोड़ का किनारा दूसरे किनारे से मिल जाता है। इस प्रकार नदी का एक मोड़ धनुष के आकार की झील के रूप में नदी से कट जाता है।

प्रश्न 12.
डेल्टा की रचना किन बातों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
समुद्र में गिरने से पहले नदी अपने मलबे के साथ डेल्टा की रचना करती है। नदी का अंतिम भाग समतल और धीमी ढलान वाला होता है। इसलिए मलबे का निक्षेप आसानी से हो जाता है। डेल्टा तब बनता है, यदि नदी के मुहाने पर ज्वारभाटे की कमी हो, समुद्र कम गहरा हो, कोई तेज़ धारा न बहती हो और नदी के मार्ग में कोई झील न हो, ताकि नदी का भार कम न हो जाए।

प्रश्न 13.
भारत के पश्चिमी तट पर नर्मदा और ताप्ती नदियाँ डेल्टा क्यों नहीं बनाती हैं ?
उत्तर-
पश्चिमी तट पर नदियों के निचले भाग में तेज़ ढलान होती है। यहाँ नदियां तेज़ गति से समुद्र में गिरती हैं, इसलिए मिट्टी का निक्षेप नहीं होता। मलबे की कमी के कारण डेल्टा नहीं बनता। पश्चिमी तट की चौड़ाई भी कम है, इसलिए डेल्टा की रचना के लिए समतल भूमि की कमी है।

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प्रश्न 14.
जल-प्रपात की रचना के बारे में बताएँ।
उत्तर-
जल-प्रपात (Water-Falls)-जब अधिक ऊँचाई से पानी अधिक वेग के साथ सीधी ढलान वाले क्षेत्र में नीचे गिरता है, तो उसे जल-प्रपात कहते हैं। जल-प्रपात चट्टानों की अलग-अलग रचना के कारण बनते हैं।

1. जब कठोर चट्टानों की परत नर्म चट्टानों की परत पर क्षैतिज (Horizontal) अवस्था में हो, तो नीचे की नर्म चट्टानें जल्दी कट जाती हैं। उन चट्टानों के सिरे पर जल-प्रपात बनता है।
उदाहरण-(i) यू०एस०एस० में नियागरा जल-प्रपात, जो कि 167 फुट (51 मीटर) ऊँचा है।
(ii) नर्मदा नदी पर कपिलधारा जल-प्रपात (Kapildhara Falls) 100 फुट ऊँचा है।

2. जब कठोर और नर्म चट्टानें एक-दूसरे के समानांतर लंब रूप (Vertical) हों, तो कठोर चट्टानों की ढलान पर जल-प्रपात बनता है। इस प्रकार एक स्थायी जल-प्रपात का निर्माण होता है।

प्रश्न 15.
‘V’ आकार घाटी और ‘U’ आकार घाटी में अंतर बताएँ।
उत्तर-
‘V’ आकार की घाटी (V-Shaped Valley)-

  1. नदी के अपरदन से ‘V’ आकार घाटी बनती है।
  2. जब यह घाटी और अधिक गहरी हो जाती है, तो ‘I’ आकार की बन जाती है और इसे कैनियन कहते हैं।
  3. इसके किनारे पूरी तरह लंब रूप नहीं होते।
  4. नदी अपने गहरे कटाव से इस घाटी की रचना करती है।

‘U’ आकार की घाटी (U-Shaped Valley)-

  1. हिमनदी के अपरदन से ‘U’ आकार घाटी बनती है।
  2. यह घाटी अधिक गहरी नहीं होती। इससे ऊँचाई से बनने वाली घाटी को लटकती घाटी कहते हैं।
  3. इसकी दीवारें लंब रूप में होती हैं।
  4. हिमनदी नदी घाटी का रूप बदलकर ‘U’ आकार की घाटी बना देती है।

प्रश्न 16.
घुमाव/मोड़ (Meanders) कैसे बनते हैं ?
उत्तर-
घुमाव/मोड़ (Meanders)—जब नदी मोड़ खाती हुई बहती है, तो उसके टेढ़े-मेढ़े रास्तों में छोटे-मोटे मोड़ पड़ जाते हैं, जिन्हें नदी के मोड़/घुमाव (Meanders) कहते हैं। नदी के अवतल किनारों (Concave Sides) के बाहरी तट पर तेज़ धारा के कारण कटाव होते हैं, पर नदी के उत्तल किनारों (Convex Sides) के भीतरी तट पर धीमी धारा के कारण निक्षेप होता है। इस प्रकार ये मोड़ और घुमाव धीरे-धीरे आकार में बढ़ जाते हैं। तुर्की में मिएंडर (Meander) नदी के घुमाव को देखकर ही यह नाम रखा गया है।

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निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
मौसमीकरण की परिभाषा दें। इसकी अलग-अलग शक्तियों के कार्य बताएँ।
उत्तर-
मौसमीकरण (Weathering)—मौसम के भिन्न-भिन्न तत्त्वों द्वारा चट्टानों की टूट-फूट के कारण चट्टानों के टूटने, भुरने और घुलने की क्रिया को मौसमीकरण का नाम दिया जाता है। (Weathering is the breaking up of Rocks by the elements of weather.) प्रसिद्ध भूगोलकार लॉबेक (Lobeck) के अनुसार, “मौसमीकरण चट्टानों के विघटन और अपघटन की प्रक्रियाओं के द्वारा होता है।” (Weathering results from the processes of rock disintegration and decomposition.)

चट्टानों की यह तोड़-फोड़ अथवा मौसमीकरण नीचे दी गई क्रियाओं से होती है-

  • विघटन (Disintegration)-ताप-अंतर के कारण जब चट्टानें टुकड़े-टुकड़े हो जाती हैं, तो उसे विघटन कहा जाता है।
  • अपघटन (Decomposition)-रासायनिक क्रियाओं द्वारा जब चट्टानें धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं, तो उसे अपघटन कहा जाता है। इस प्रकार चट्टानें ताप-अंतर द्वारा टूटती हैं और रासायनिक क्रिया द्वारा घिसती हैं और नष्ट होती हैं। इन चट्टानों का विघटन और अपघटन उनके अपने स्थान पर ही होता है।

मौसमीकरण को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors Controlling Weathering)-

प्रत्येक स्थान पर मौसमीकरण एक समान नहीं होता क्योंकि भूतल पर चट्टानें और जलवायु सदा एक जैसी नहीं होतीं। मौसमीकरण नीचे लिखे तत्त्वों पर निर्भर करता है-

1. चट्टानों की संरचना (Structure of Rocks) असंगठित, घुलनशील और मुसामदार चट्टानों पर मौसमीकरण का प्रभाव बड़ी तेजी से होता है। नर्म चट्टानें जल्दी ही टूट जाती हैं, पर कठोर चट्टानें धीरे-धीरे टूटती हैं।

2. भूमि की ढलान (Slope of the Land)—वे क्षेत्र, जिनकी ढलान अधिक होती है, वहां मौसमीकरण तेज़ी से होता है। ढलान के कारण चट्टानों का संगठन कमज़ोर पड़ जाता है क्योंकि गुरुत्वा शक्ति के फलस्वरूप नीचे को खिसककर चट्टानें अपने आप ही टूटने लगती हैं और मार्ग में आने वाली चट्टानों को भी तोड़ देती हैं।

3. जलवायु में भिन्नता (Difference in Climate)-संसार के उष्ण और नमी वाले प्रदेशों में तापमान की अधिकता और जल की अधिकता के कारण नर्म और घुलनशील चट्टानें आसानी से टूट जाती हैं। इसके विपरीत उष्ण और शुष्क जलवायु के क्षेत्रों में दिन और रात के ताप में अंतर होने के कारण चट्टानें फैलती और सिकुड़ती हैं। इस कारण इनका भौतिक मौसमीकरण होता है।

4. वनस्पति का प्रभाव (Effect of Vegetation) वनस्पति से रहित प्रदेशों में दिन के समय सूर्य-ताप के प्रभाव के कारण चट्टानें फैलती हैं और रात के समय ताप कम होने के कारण वही चट्टानें सिकुड़ने लगती हैं। इसी कारण उनका भौतिक विघटन होता है। इसके विपरीत वनों वाले क्षेत्रों में पेड़-पौधों की जड़ें चट्टानों को पकड़ कर रखती हैं।

5. चट्टानों के जोड़ व दरारें (Joints)-चट्टानों में जोड़ और दरारें तोड़-फोड़ में मदद करती हैं। इन दरारों में उगे पेड़ चट्टानों को चौड़ा करके उन्हें तोड़ देते हैं।

मौसमीकरण के प्रकार (Types of Weathering)-

मौसमीकरण निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है-

  1. भौतिक मौसमीकरण (Mechanical or Physical Weathering)
  2. रासायनिक मौसमीकरण (Chemical Weathering)
  3. जैविक मौसमीकरण (Biological Weathering)

1. भौतिक मौसमीकरण (Mechanical or Physical Weathering)-जब चट्टानें भौतिक क्रिया द्वारा विघटित (Disintegrate) होती हैं और उनकी टूट-फूट होती है, तो उसे भौतिक मौसमीकरण का नाम दिया जाता है। इसके कारण चट्टानों के खनिजों और गुणों में परिवर्तन नहीं होता, बल्कि उनके खनिजों के टुकड़े हो जाते हैं। यांत्रिक साधनों के द्वारा चट्टानें अपने स्थान पर ही टूट-फूट कर चूरा हो जाती हैं। इसे भौतिक मौसमीकरण (Physical Weathering) अथवा यांत्रिक मौसमीकरण (Mechanical Weathering) कहते हैं। भौतिक मौसमीकरण के नीचे लिखे तीन कारक हैं –

(i) सूर्य का ताप (Insolation) चट्टानों के भौतिक मौसमीकरण में सूर्य के ताप (Insolation) का बहुत महत्त्व है, जो कि उष्ण और शुष्क मरुस्थल में अपना प्रभाव डालता है।

(क) पिंड विघटन (Block Disintegration)—इन प्रदेशों में वर्षा की कमी और दिन-रात के तापमान में बहुत अंतर होने के कारण दिन में चट्टानें फैलती रहती हैं और रात के समय सिकुड़ती हैं। चट्टानों के इस प्रकार टूटने को पिंड विघटन (Block Disintegration) कहते हैं। उदाहरण-राजस्थान के मरुस्थल में अधिक तापमान के कारण चट्टानों के टूटने की आवाज़ पिस्तौल की गोली की आवाज़ जैसी होती है।

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(ख) अपशल्कन अथवा पल्लवीकरण (Exfoliation)—दिन के समय मरुस्थलों में तीखी गर्मी पड़ती है, जिसमें चट्टानों की ऊपरी परत गर्म हो जाती है व फैल जाती है। इस प्रकार उनका आयतन बढ़ जाता है और उनकी बाहरी परत छिलके के समान अलग हो जाती है। चट्टानों के इस प्रकार टूटने की क्रिया को अपशल्कन अथवा पल्लवीकरण (Exfoliation) कहा जाता है।
उदाहरण-चट्टानों के टूट कर चूर्ण होने के कारण बने मलबे को टालस (Talus) कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य 11

(ii) कोहरा (Frost)—ऊँचे अक्षांशों और ऊँचे पर्वतों पर अत्यधिक सर्दी होती है और बर्फ पड़ती है। दिन के समय सूर्य-ताप के कारण कुछ बर्फ पिघलकर जल का रूप धारण कर लेती है और फिर वह जल चट्टानों की दरारों में प्रवेश कर जाता है। ठंड होने पर फिर यह जल बर्फ का रूप धारण कर लेता है और इसका फैलाव बढ़ जाता है। जमने से पानी का आयतन 1/11 गुणा बढ़ जाता है। जमा हुआ पानी अपने आस-पास की चट्टानों पर 2000 पौंड प्रति वर्ग इंच दबाव डालता है। इस फैलाव के कारण चट्टानों पर दबाव पड़ता है और दरारें बड़ी हो जाती हैं और टूट जाती हैं। ढलान पर पड़ी चट्टानें नीचे को लुढ़क जाती हैं और पर्वतों के पैरों में इकट्ठी हो जाती हैं। इस एकत्र हुए पदार्थ को चट्टानी मलबा (Scree or Talus) कहा जाता है।
उदाहरण-हिमालय पर्वत के पहाड़ी प्रदेश में इस मौसमीकरण के कारण बड़े-बड़े टुकड़े टूटते रहते हैं।

(iii) वर्षा (Rainfall)-वर्षा का पानी बहते हुए पानी का रूप धारण कर लेता है और प्रभाव डालता है।
(क) मिट्टी का अपरदन (Soil Erosion)-ढलान वाली भूमि और नदी घाटियों में वर्षा का पानी उपजाऊ मिट्टी बहाकर ले आता है। जैसे भारत में गंगा नदी हर रोज़ 10 लाख टन मिट्टी समुद्र तक बहाकर ले जाती है।

(ख) ऊबड़-खाबड़ भूमि (Bad Land)-ज़ोर से वर्षा होने के कारण जल नालियाँ (Gullies) और खाइयाँ (Ravines) बन जाती हैं जिसके फलस्वरूप बंजर बिखरा हुआ धरातल बन जाता है, जैसे-भारत की चंबल घाटी में।

(ग) मिट्टी के खंभे (Earth Pillars)-वर्षा के प्रहार से नर्म मिट्टी कट जाती है, पर कठोर चट्टानें एक टोपी (Cap) का काम करती हैं और मिट्टी के खंभे खड़े हो जाते हैं, जैसे–इटली के बोलज़ानो (Bolzano) प्रदेश में तथा हिमाचल के स्पीति प्रदेश में।

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(घ) भू-स्खलन (Landslides)—वर्षा का पानी नर्म चट्टानों के नीचे जाकर उन्हें भारी बना देता है और चट्टानें ढलान की तरफ फिसल जाती हैं। सड़क मार्ग रुक जाते हैं। गढ़वाल क्षेत्र में भू-स्खलन के कारण सैंकड़ों मनुष्य दबकर मर गए थे।

(iv) हवा (Wind) हवा के कारण मौसमीकरण मरुस्थलों, शुष्क प्रदेशों अथवा वनस्पति-रहित प्रदेशों में होता है। रेत युक्त हवाएँ एक रेगमार (Sand Paper) के समान चट्टानों को चूर-चूर कर देती हैं।

(क) मरुस्थलों में से निकलने वाली रेलगाड़ियों को हर वर्ष रंग (Paint) करना पड़ता है।
(ख) टेलीग्राफ की तारें हवा के प्रहार से जल्दी घिस जाती हैं।
(ग) समुद्र तट की ओर के साधारण शीशे ऐसे दिखाई देते हैं,जैसे दानेदार शीशे (Frosted Glass) हों।
(घ) चट्टानों का आकार अजीब-सा हो जाता है। जैसे-राजस्थान में मांऊट आबू के पास Toad Rock |
(ङ) कई बार आकाशीय बिजली भी चट्टानों को तोड़-फोड़ देती है या पिघला देती है।

2. रासायनिक मौसमीकरण (Chemical Weathering)-ऑक्सीज़न, कार्बन-डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन गैसों के प्रभाव से चट्टानों के खनिजों और रासायनिक तत्त्वों में परिवर्तन हो जाता है। चट्टानें ढीली हो जाती हैं और अलग-अलग नहीं होतीं। इसे विघटन (Decomposition) कहते हैं। वर्षा का जल और गैसें रासायनिक मौसमीकरण के प्रमुख कारण हैं। मौसमीकरण अम्ल (Acid) और गैस मिले जल द्वारा होता है। रासायनिक मौसमीकरण कई प्रकार से होता है-

(क) ऑक्सीकरण (Oxidation)—इस प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन गैस लौह युक्त धातुओं पर प्रभाव डालकर लोहे को जंग (Rust) लगा देती है और ये भुरभुरा कर नष्ट हो जाती हैं। उदाहरण-मिस्र की शुष्क जलवायु में Cleoptra needle लगभग 4000 वर्ष तक ठीक हालत में रही, पर इंग्लैंड की नम जलवायु में उसे केवल 60 वर्ष में ही जंग लग गया।

(ख) कार्बनीकरण (Carbonation)-कार्बन-डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide) और पानी मिलकर चूने के पत्थर, जिप्सम, संगमरमर आदि को घोल देते हैं। चट्टानों के नष्ट होने से गुफाएँ बनती हैं।
उदाहरण-(i) यू०एस०ए० में Mammoth Caves (ii) भारत में खासी और चेरापूंजी, देहरादून प्रदेश।

(ग) जलकरण (Hydration)-हाइड्रोजन गैस से मिला हुआ जल चट्टानों को भारी बना देता है। दबाव के कारण चट्टानें अंदर ही अंदर घिसकर चूर्ण बन जाती हैं। जबलपुर की पहाड़ियों में कैयोलिन (Keolin) का जन्म इस प्रकार फैलसपार (Felespar) चट्टानों के विघटन से हुआ है।

(घ) घोल (Solution)—पानी कई खनिजों को घोल देता है। ये खनिज घुलकर बह जाते हैं, जैसे चूना मिट्टी में से घुलकर निकल जाता है। भारत में केरल प्रदेश में लेटराइट (Latrite) मिट्टी इसी प्रकार बनी है।

3. जैविक मौसमीकरण (Biological Weathering)-वनस्पति, जीव-जंतुओं और मानवों द्वारा चट्टानों का जो मौसमीकरण होता है,उसे जैविक मौसमीकरण (Biological Weathering) अथवा (OrganicWeathering) कहा जाता है।
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  • वनस्पति (Vegetation)-वनस्पति जैविक मौसमीकरण का महत्त्वपूर्ण कारक है। वनस्पति द्वारा चट्टानों का मौसमीकरण यांत्रिक और रासायनिक दोनों प्रकार से होता है। चट्टानों की दरारों में पेड़-पौधे उग आते हैं। उनकी जड़ें चट्टानों को कमजोर कर देती हैं।
  • जीव-जंतु (Animals)-चट्टानों में मांदें बनाकर रहने वाले जीव जैसे-चूहे, खरगोश, लोमड़ी, चींटियां, कीड़े-मकौड़े, केंचुए, दीमक आदि चट्टानों को खोखला बना देते हैं। इससे चट्टानें असंगठित होकर टूट जाती हैं। इसके बाद वायु, जल आदि उन्हें बहाकर ले जाते हैं। चित्र-जैविक मौसमीकरण होमज़ के अनुसार प्रति एकड़ मिट्टी में 1,50,000 केंचुए हो सकते हैं, जो एक वर्ष के समय में 10 से 15 चट्टानों को उत्तम प्रकार की मिट्टी में बदल कर नीचे से ऊपर ले आते हैं।
  • मनुष्य (Man)-मनुष्य भी भूमि पर अनेक प्रकार के परिवर्तन करता है। वह भूमि से खनिज प्राप्त करने के लिए खदानें खोदकर चट्टानों को नर्म कर देता है। इमारतें और बाँध बनाने के लिए सामग्री जैसे-ईंटें, पत्थर, चूना, सीमेंट आदि चट्टानों को तोड़कर ही प्राप्त करता है।

मौसमीकरण के प्रभाव (Affects of Weathering)-

  1. कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी का निर्माण मौसमीकरण से होता है। वह मिट्टी वनस्पति और खेती का आधार है।
  2. बहुमूल्य धातु-कण घुलकर एक स्थान पर इकट्ठे होते रहते हैं।
  3. मौसमीकरण चट्टानों को कमज़ोर बना कर अपरदन में सहायक होता है।
  4. मरुस्थलों की रेत इस क्रिया से बनती है।
  5. मौसमीकरण के कारण ही पर्वत घिस-घिस कर मैदान बने हैं।
  6. मौसमीकरण से ही नदी घाटियाँ चौड़ी होती रहती हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(i) नदी के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न 2.
नदी और नदी बेसिन की परिभाषा बताएँ। अलग-अलग अवस्थाओं में नदी के कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर-
नदी (River)-
भूमि पर वर्षा के जल का कुछ भाग वाष्पीकरण द्वारा वायुमंडल में लोप हो जाता है और कुछ भाग भूमि की पारगामी चट्टानों में से होता हुआ धरती में चला जाता है, परंतु जल का अधिकतर भाग धरातल पर प्रवाहित (Run off ) होकर बह जाता है। वह प्रदेश जिसका समूचा जल उसमें बहने वाली नदी और उसकी सहायक नदियों में बहता हो, वह प्रदेश नदी का अपवाह क्षेत्र (Drainage Area) अथवा बेसिन (Basin) कहलाता है।
जिन नदियों में पूरा वर्ष पानी बहता रहता है, उन्हें स्थायी नदियाँ (Perennial Rivers) कहा जाता है। जिन नदियों में जल केवल वर्षा ऋतु में ही बहता हो, उन्हें मौसमी नदियाँ (Seasonal Rivers) कहते हैं।

नदी की तीन अवस्थाएँ (Three Stages of a River)-

नदी के स्रोत (Source) से लेकर मुहाने (Mouth) तक इसके विकासक्रम को तीन अवस्थाओं में बांटा जा सकता है। ये तीन अवस्थाएं नीचे लिखी हैं-

1. युवावस्था (Youthful Stage)—इस अवस्था में नदी पर्वतों में प्रवाह करती है, इसलिए नदी के इस मार्ग को पर्वतीय मार्ग (Mountain Track) भी कहते हैं। नदी की ढलान 50 फुट प्रति मील होती है। ढलान सीधी होने के कारण जल का बहाव तेज़ होता है। वेग तेज़ होने के कारण अपरदन कार्य तेज़ी से होता है और घाटी गहरी होती है। इस अवस्था में नदी का कार्य प्रमुख रूप से अपरदन का ही होता है। (The mountain stage as a whole, is the stage of erosion) नदी के पर्वतीय भाग को युवा नदी घाटी (Young River Valley) कहते हैं। इस भाग में कैनियन, गॉर्ज, चश्मे और झरने बनते हैं।

2. प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)-इस अवस्था में नदी मैदानों में से बहती है, इसलिए नदी के इस भाग को मैदानी मार्ग (Plain Track) भी कहते हैं। यहां भूमि की ढलान कम होती है, जो कि 10 फुट प्रति मील होती है। इस भाग की प्रमुख नदी में अनेक सहायक नदियाँ आकर मिल जाती हैं, इसलिए नदी में पानी की मात्रा काफ़ी अधिक हो जाती है, परंतु प्रवाह की गति कम हो जाने के कारण भारी पदार्थों और कंकड़ आदि का प्रवाह रुक जाता है और इसका निक्षेप होना शुरू हो जाता है। नदी के मैदानी भाग को प्रौढ़ नदी घाटी (Mature River Valley) भी कहते हैं। इस भाग में नदी, किनारे पर अपरदन (Lateral Erosion) द्वारा घाटी को निरंतर चौड़ा करती रहती है। इस भाग में U-आकार घाटी, घुमाव, मोड़, गोखुर झील, तट, बांध आदि बनते हैं। वृद्धावस्था (Old Stage)-नदी-मुहाने (River Mouth) से पहले, मैदान के निचले भाग में ढलान बहुत ही कम हो जाने के कारण जल का प्रवाह अत्यंत मद्धम हो जाता है। नदी की ढलान 1 फुट प्रति मील हो जाती है, फलस्वरूप अपरदन कार्य बिल्कुल समाप्त हो जाता है और निक्षेप तेज़ी से होने लगता है। यह ही नदी की वृद्धावस्था है। नदी के इस मार्ग को डेल्टा मार्ग (Delta Track) भी कहते हैं और नदी की घाटी यहां प्रौढ़ नदी घाटी (Old River Valley) कहलाती है। प्रौढ़ नदी घाटी में नदी का केवल एक काम निक्षेप करना होता है।

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