PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 10 राष्ट्रीयता का तीर्थ-खटकड़ कलाँ

Punjab State Board PSEB 6th Class Hindi Book Solutions Chapter 10 राष्ट्रीयता का तीर्थ-खटकड़ कलाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Hindi Chapter 10 राष्ट्रीयता का तीर्थ-खटकड़ कलाँ

Hindi Guide for Class 6 राष्ट्रीयता का तीर्थ-खटकड़ कलाँ Textbook Questions and Answers

भाषा-बोध (प्रश्न)

1. शब्दों के अर्थ ऊपर दिए जा चुके हैं।

प्रण =प्रतिज्ञा
प्रसिद्ध = मशहूर
स्मारक = याद में
धूलि = धूल
सम्मान = आदर
उम्र = आयु
प्रतिमा = मूर्ति
पट्टिका = पटिया, तख्ती
पैतृक = पिता का
सहयात्री = साथ यात्रा करने वाली
धरोहर = अमानत
बुलन्द = ऊँचा
कांस्य = ताँबे और टिन से बनी एक धातु

2. समानार्थक लिखिए

1. आजाद = ………………..
2. शहीद = ……………….
3. प्रसिद्ध = …………………
4. क्रान्तिकारी = ………………
5. स्वागत = ……………….
उत्तर:
समानार्थक शब्द
1. आज़ाद = स्वतन्त्र
2. शहीद = बलिदानी
3. प्रसिद्ध = मशहूर
4. क्रान्तिकारी = आन्दोलनकारी, इन्कलाबी
5. स्वागत = अभिनन्दन, शुभागमन

3.शुद्ध रूप लिखें

1. समिती = ………………….
2. परसिद्ध = …………………
3. पैतरिक = ………………….
4. सवतंत्रता = ………………..
5. जलियावाला = ………………..
6. समारक = ………………….
7. सनंवेदनशील = ………………….
उत्तर:
अशुद्ध रूप शुद्ध रूप
1. समिती = समिति
2. पैतरिक = पैतृक
3. परसिद्ध – प्रसिद्ध
4. सवतंत्रता = स्वतंत्रता
5. जलियावाला = जलियाँवाला
6. समारक = स्मारक
7. सनवेदनशील = संवेदनशील

4.’शील’, ‘शाली’, ‘कारी’, ‘ता’ शब्दांशों को जोड़कर दो-दो नए शब्द लिखिए।
उत्तर:
शील-दानशील, प्रगतिशील।
शाली-बलशाली, प्रभावशाली।
कारी-क्रान्तिकारी, चित्रकारी।
ता-समता, भावुकता।

5. वैसे तो खटकड़ कलां ज़िला नवाँशहर का छोटा-सा गाँव है पर यह किसी तीर्थस्थल से कम नहीं। क्या आप ने खटकड़ कलां का नाम सुना है ?
ऊपर लिखे वाक्यों में “वैसे तो” ‘पर’ रेखांकित शब्द दो वाक्यों को परस्पर जोड़ते हैं, अतः सम्बन्धवाचक सर्वनाम के उदाहरण हैं।
‘क्या’ शब्द प्रश्न का बोध कराता है, अत: यह प्रश्नवाचक सर्वनाम का उदाहरण हैं।

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6. भूत और भविष्य काल लिखें

एक छोटा-सा गाँव है – वर्तमानकाल
…………………………… = भूतकाल
…………………………. = भविष्यकाल
उत्तर:
एक छोटा-सा गाँव है = वर्तमानकाल
यहाँ एक द्वीप था = भूतकाल।
मैं कल अमृतसर जाऊँगा = भविष्यकाल।

विचार-बोध (प्रश्न)

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
भगत सिंह के पैतृक गांव का क्या नाम है ?
उत्तर:
भगत सिंह के पैतृक गांव का नाम खटकड़ कलां है। वह नवांशहर बंगा सड़क पर स्थित है।

प्रश्न 2.
भगत सिंह का नारा क्या था ?
उत्तर:
भगत सिंह का नारा था-‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’।

प्रश्न 3.
भगत सिंह कैसा साहित्य पढ़ते थे ?
उत्तर:
भगत सिंह क्रान्तिकारियों का साहित्य पढ़ते थे।

प्रश्न 4.
भगत सिंह के माता-पिता का क्या नाम था ?
उत्तर:
भगत सिंह की माता का नाम श्रीमती विद्यावती और पिता का नाम सरदार किशन सिंह था।

प्रश्न 5.
भगत सिंह को किन साथियों के साथ फांसी की सज़ा मिली ?
उत्तर:
सरदार भगत सिंह को उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी की सज़ा मिली।

प्रश्न 6.
लाला जी की मौत का बदला भगत सिंह ने कैसे लिया ?
उत्तर:
लाला लाजपतराय ने साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में जुलूस निकाला। पुलिस अफसर सांडर्स के आदेश पर लाठीचार्ज किया गया। लाठीचार्ज में लाला जी घायल हो गए। कुछ दिन बाद उनका निधन हो गया। क्रान्तिकारियों ने सांडर्स की हत्या करके लाला जी की मौत का बदला ले लिया।

प्रश्न 7.
अजीत सिंह का निधन कब हुआ ? उत्तर-अजीत सिंह का निधन 15 अगस्त, सन् 1947 को हुआ। 8. पंजाब माता का सम्मान किसे दिया गया ?
उत्तर:
‘पंजाब माता’ का सम्मान भगत सिंह की माता विद्यावती को दिया गया।

(ख)
प्रश्न 1.
जलियांवाला बाग की घटना अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
13 अप्रैल, सन् 1919 को अमृतसर के जलियावाला बाग में जनसभा थी। कांग्रेस के अनेक नेता इसमें सम्मिलित हुए थे। अंग्रेज़ सरकार ने अचानक जनसभा को गैर-कानूनी घोषित कर फायरिंग शुरू करवा दी। निकलने का एक ही मार्ग था। जनता में भगदड़ मच गई। हज़ारों निहत्थे लोग अंग्रेज़ पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए।

प्रश्न 2.
भगत सिंह को अमृतसर की मिट्टी ने किस प्रकार भावुक बना दिया ? जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के आधार पर स्पष्ट करो।
उत्तर:
भगत सिंह को अमृतसर में हुए 13 अप्रैल, सन् 1919 को मुंशस हत्याकाण्ड ने इतना भावुक और दुःखी बना दिया था कि वे उस बाग से रक्त से भीगी मिट्टी लेकर लौटे थे।

प्रश्न 3.
आप कैसे कह सकते हैं कि यदि भगत सिंह क्रान्तिकारी न होते तो बहुत बड़े लेखक होते ?
उत्तर:
शहीद भगत सिंह को बचपन से ही पढ़ने-लिखने का तथा अभिनय करने की बहुत रुचि थी। क्रान्तिकारी साहित्य में वे खूब रुचि लेकर पढ़ते थे। इसी कारण वे क्रान्ति
और जोश से भरी रचनाएं भी रची थीं उन्होंने बलवंत के नाम से अनेक लेख भी लिखे थे। उन्हें उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा पर भी एक समान अधिकार प्राप्त था। इसी कारण कहा जा सकता है कि यदि वे क्रान्तिकारी न होते तो एक लेखक के रूप में ज़रूर प्रसिद्ध होते।

प्रश्न 4.
भगत सिंह जैसे शहीदों की शहादत से देश आज़ाद हुआ। अपने देश की रक्षा के लिए आप क्या कर सकते हैं ?
उत्तर:
भगत सिंह जैसे शहीदों की शहादत से देश आजाद हुआ। इस आजादी को सम्भाल कर रखने की ज़िम्मेदारी अब हमारी है। हमें अपने देश को विकास की ओर लेकर चलना है। हमें अपने देश की आज़ादी की रक्षा अपने प्राणों से भी बढ़कर करनी है।

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प्रश्न 5.
भगत सिंह के कौन-कौन से गुण आप अपनाना चाहेंगे ?
उत्तर:
हम भगत सिंह के देश-प्रेम की भावना जैसे गुण अपनाना चाहेंगे ताकि देश रक्षा करते हुए यदि जान भी देनी पड़े तो हम पीछे न हटें।

आत्म-बोध (प्रश्न)

1. शहीद भगत सिंह का चित्र कक्षा में लगाएं।
2. पंजाब के स्वतन्त्रता सेनानियों की सूची तैयार करें।
3. जब कभी उधर जाओ, तो खटकड़ कलां में भगत सिंह का स्मारक अवश्य देखकर आओ।
4. किसी महान् पुरुष की जीवनी को पढ़ें और उनके गुणों को जीवन में उतारने का प्रयत्न करें।
उत्तर:
अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
भगत सिंह ने कौन-सा नारा दिया ?
(क) इन्कलाब जिन्दाबाद
(ख) जय हो
(ग) भारत छोड़ो
(घ) जय जवान
उत्तर:
(क) इन्कलाब जिन्दाबाद

प्रश्न 2.
भगत सिंह के पैतृक गाँव (जहाँ उनका जन्म हुआ) का क्या नाम है ?
(क) खटकड़
(ख) कलां
(ग) खटकड़ कलां
(घ) अमृतसर
उत्तर:
(ग) खटकड़ कलां

प्रश्न 3.
भगत सिंह कैसा साहित्य पढ़ते थे ?
(क) क्रांतिकारियों का
(ख) अंग्रेजों का
(ग) हिंदुस्तानियों का
(घ) भारत माता का
उत्तर:
(क) क्रांतिकारियों का

प्रश्न 4.
जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना कब घटित हुई ?
(क) 13 अप्रैल, 1919
(ख) 13 अप्रैल, 1920
(ग) 13 अप्रैल, 1921
(घ) 13 अप्रैल, 1922
उत्तर:
(क) 13 अप्रैल, 1919

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से संबंधवाचक सर्वनाम का उदाहरण है
(क) पर
(ख) कहां
(ग) किसने
(घ) वे
उत्तर:
(क) पर

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से प्रश्नवाचक सर्वनाम का उदाहरण कौन-सा है ?
(क) कोई
(ख) कुछ
(ग) क्या
(घ) उन्होंने
उत्तर:
(ग) क्या

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राष्ट्रीयता का तीर्थ खटकड़ कला Summary

राष्ट्रीयता का तीर्थ खटकड़ कला पाठ का सार

अमर शहीद भगत सिंह का जन्म लायलपुर (पाकिस्तान) में बंगा चक में हुआ था, खटकड़ कलाँ में नहीं। अब जन्म स्थल पाकिस्तान में छूट जाने के कारण उनके पैतृक गांव खटकड़ कलाँ (बंगा के निकट) को ही जन्म स्थान के बराबर आदर-सत्कार दिया जा रहा है। इसीलिए इसे तीर्थ स्थल के समान भी माना जाता है। खटकड़ कलाँ गांव नवांशहर-बंगा रोड पर स्थित है। वहां सड़क के किनारे शहीद भगत सिंह की कांसे की मूर्ति स्थापित है। सन् 1919 को वैशाखी के दिन यानी 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक जनसभा का आयोजन हुआ था। उस जनसभा में एकत्रित हुए लोगों पर अंग्रेज़ पुलिस अधिकारी जनरल डायर के आदेश पर अन्धा-धुन्ध गोलियां चलाई गई थीं। उस समय भगत सिंह बहत छोटे थे पर वे अपनी बहन अमरजीत कौर को बताए बिना अमृतसर गए थे और उस बाग के रक्त से भीगी मिट्टी लेकर लौटे थे। भगत सिंह आजादी पाने की उधेड़-बुन में लीन रहते थे। वे घर छोड़ कर कानपुर पहुंच गए। वहां वह गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ के समाचार-पत्र में काम करने लगे। भगत सिंह ‘बलवन्त’ के नाम से लेख लिखते थे।

शहीद भगत सिंह की स्मृति में 23 मार्च को प्रति वर्ष खटकड़ कलाँ और फिरोज़पुर के निकट सतलुज के किनारे हुसैनीवाला में मेले लगते हैं। वे अपने साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च, सन् 1931 को हंसते-हंसते फांसी के तख्ते पर झूल गए थे। सुखदेव पंजाब के लुधियाना नगर में ही जन्मे थे तो राजगुरु महाराष्ट्र, प्रदेश के वासी थे परन्तु भारत माता की गुलामी की बेड़ियां काटने के लिए विभिन्न राज्यों के क्रान्तिकारी एक साथ चले थे और फांसी के फंदे चूमे थे। भगत सिंह के आदर्श शहीद करतार सिंह सराभा थे और वे उनका चित्र हर समय अपनी जेब में रखते थे। सराभा का चित्र भी स्मारक में लगा हुआ है। शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह का चित्र भी देखने को मिलेगा। वे उनसे भी प्रभावित थे। अजीत सिंह का निधन 15 अगस्त, सन् 1947 को हुआ था। जैसे ही उन्होंने डल्हौज़ी में भारत के स्वतन्त्र होने का समाचार सुना तब उन्होंने कहा कि हमारा प्रण पूरा हुआ और प्राण त्याग दिए। __ शहीद भगत सिंह की माता विद्यावती ने स्वतन्त्रता के बाद खटकड़ कला में अपना जीवन बिताया। उन्हें ‘पंजाब माता’ का सम्मान दिया गया था। इसलिए खटकड़ कलाँ एक स्मारक ही नहीं, एक तीर्थ स्थल भी है।

कठिन शब्दों के अर्थ:

पैतृक = बाप-दादाओं का, पूर्वजों का। तीर्थस्थल = पवित्र स्थान। आदर-सत्कार = सम्मान, इज्जत। कांस्य प्रतिमा = कांसे की मूर्ति। स्मारक = यादगार स्थल। रचनात्मक कार्य = रचना सम्बन्धी काम। दुःखान्त = दुःखदायी घटना। जनसभा = लोगों की सभा, जलसा। एकत्रित = इकट्ठी। आदेश = हुक्म। रक्त = खून। भावुक = भावनाशील। संकल्प – कोई कार्य करने का पक्का विचार। स्मृतियों = यादों। सहयात्री = साथ सफर करने वाला। निधन = मृत्यु। प्रण = प्रतिज्ञा। धूलि = धूल। धरोहर = अमानत। बुलन्द = ऊँचा।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Chapter 6 पवनदूत Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Hindi Chapter 6 पवनदूत

Hindi Guide for Class 11 PSEB पवनदूत Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
श्रीकृष्ण के वियोग में राधा की व्यथा का चित्रण करें।
उत्तर:
श्रीकृष्ण के वियोग में राधा दिन-रात रोती रहती थी। उसकी आँखों में सदा आँसू भरे रहते थे और वह अत्यंत उदास दिखाई देती थी। राधा भी चातक की तरह वियोग की पीड़ा की अधिकता के कारण दिन-रात पिउ-पिउ रटती रहती थी। उसके मन में श्रीकृष्ण से मिलन की लालसा दिन-रात बढ़ती जा रही थी। उसे सुखद वस्तुएँ और क्रियाएँ भी दुखदायी प्रतीत होती थीं।

प्रश्न 2.
पवन ने आकर राधा के दुःख को किस प्रकार कम किया ?
उत्तर:
प्रात:कालीन सुगन्धित पवन ने राधा के घर में प्रवेश कर राधा के घर को सुगन्धि से भर दिया। उसने अपनी सुगंध से राधा के व्यथित मन की पीड़ा को कम करने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से पवन ने राधा के आँसुओं को बड़ी शालीनता से पृथ्वी पर गिरा दिया। उसने तरह-तरह की क्रियाओं से उसकी विरह-वियोग से उत्पन्न पीड़ा को कम करना चाहिए।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

प्रश्न 3.
राधा ने पवन को दूत बना कर क्यों भेजा ?
उत्तर:
राधा ने पवन को दूत बनाकर इसलिए भेजा कि जब से श्रीकृष्ण मथुरा गए थे तो उन्होंने वहाँ से उन्हें कोई सन्देश नहीं भेजा था। राधा चाहती थी कि पवन मथुरा में श्रीकृष्ण के पास जाए और उसकी सारी विरह-गाथा उन को कह सुनाये।

प्रश्न 4.
राधा ने पवन को श्रीकृष्ण का परिचय किस प्रकार दिया ?
उत्तर:
राधा ने पवन को श्रीकृष्ण का परिचय देते हुए कहा कि श्रीकृष्ण के शरीर का रंग जल से भरे नए बादलों के समान साँवला, उनके नेत्र कमल के फूल के समान बड़े-बड़े हैं। उनकी मुख-मुद्रा सौम्यता की मूर्ति तथा उनके वचन अमृत रस में भीगे हुए हैं।

प्रश्न 5.
मुरझाये फूल, फूले कमलदल और मलिन लतिका जैसे उपमानों के द्वारा राधा ने अपनी व्यथा किस प्रकार व्यक्त की ?
उत्तर:
प्रस्तुत उपमानों के द्वारा राधा ने अपनी विरह-व्यथा व्यक्त करते हुए कहा है कि वह श्रीकृष्ण के वियोग में मुरझाए फूल के समान हो गयी है। खिले हुए कमल की पत्तियों को श्रीकृष्ण के सामने दुखित भाव से जल-पुंज में डुबा कर अपने आँसुओं को जताना चाहती है तथा सूखी लता को श्रीकृष्ण के कदमों में डालकर अपनी विरह वेदना से उन्हें परिचित करवाना है।

प्रश्न 6.
‘पवन दूत’ कविता का केन्द्रीय भाव लिखें।
उत्तर:
‘पवन दूत’ कविता में कवि ने राधा की विरह-व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवि ने राधा द्वारा पवन को दूती बना कर अपनी विरह-वेदना श्रीकृष्ण तक पहुँचाने का प्रयास किया है। राधा ने पवन से श्रीकृष्ण की चरण धूलि को लेकर आने को कहा है। उस चरण-धूलि को अपने शरीर पर लगाकर अपना जीवन सफल बनाना चाहती है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

PSEB 11th Class Hindi Guide पवनदूत Important Questions and Answers

अति लघसरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘प्रिय प्रवास’ का कौन-सा प्रसंग वायु को दूत बना कर भेजने से सम्बन्धित है ?
उत्तर:
‘पवनदूत प्रसंग’।

प्रश्न 2.
कृष्ण के वियोग में राधा अपना समय कैसे बिताया करती थी ?
उत्तर:
रो-रो कर चिंता सहित।

प्रश्न 3.
राधा के आँस किसे भिगो रहे थे ?
उत्तर:
धरती को।

प्रश्न 4.
सुगंधित वायु ने राधा के घर में कहाँ से प्रवेश किया था ?
उत्तर:
वातायनों से।

प्रश्न 5.
पवन ने राधा के आँस कहाँ से कहाँ गिराये थे ?
उत्तर:
राधा की पलकों से धरती पर।

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प्रश्न 6.
पवन की प्यार वाली क्रियाएँ राधा को कैसी लगी थीं ?
उत्तर:
वैरिणी जैसी।

प्रश्न 7.
राधा ने पवन को कौन-सी गाली दी थी ?
उत्तर:
पापिष्ठे (पापी)।

प्रश्न 8.
श्रीकृष्ण का रंग कैसा था ?
उत्तर:
नव जलद-सा (नए-नए बादलों जैसा)।

प्रश्न 9.
श्रीकृष्ण से बिछुड़ कर राधा को किस पर भरोसा था ?
उत्तर:
वायु पर।

प्रश्न 10.
राधा ने वायु से कौन-सा संबंध जोड़ा था ?
उत्तर:
बहन का (भगिनी)।

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प्रश्न 11.
मथुरा नगरी किस नदी के किनारे बसी हुई थी ?
उत्तर:
यमुना नदी।

प्रश्न 12.
राधा ने किसके कष्टों को कम करने का पवन से आग्रह किया था ?
उत्तर:
मेहनत करने वाले श्रमिकों और किसानों का।

प्रश्न 13.
राधा ने पवन को किस के साथ खेलने के लिए कहा था ?
उत्तर:
कमल के फूलों, पेड़-पौधों और बेलों का।

प्रश्न 14.
मथुरा के मंदिर किस के समान ऊँचे वर्णित किए गए हैं ?
उत्तर:
सुमेरु पर्वत जैसे।

प्रश्न 15.
श्रीकृष्ण की आँखों को क्या कहा गया है ?
उत्तर:
ज्योति उत्कीर्णकारी।

प्रश्न 16.
श्रीकृष्ण के वस्त्र किस रंग के थे ?
उत्तर:
पीले रंग के।

प्रश्न 17.
श्रीकृष्ण की काली-काली लटें कहाँ की शोभा बढ़ा रही थीं ?
उत्तर:
गालों और कनपटियों की (गंडशोभी)।

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प्रश्न 18.
श्रीकृष्ण की भुजाएँ किस के समान शक्तिशाली और लंबी थीं ?
उत्तर:
हाथी की सूंड जैसी।।

प्रश्न 19.
अंभोजनेत्रा’ शब्द के द्वारा किस की ओर संकेत किया गया है ?
उत्तर:
राधा।

प्रश्न 20.
कवि ने किस छंद का प्रयोग किया है ?
उत्तर:
वार्णिक छंद।

प्रश्न 21.
कवि ने किस बोली का प्रमुखता से प्रयोग किया है ?
उत्तर:
खड़ी बोली।

प्रश्न 22.
किस शैली का प्रयोग प्रमुख रूप से किया गया है ?
उत्तर:
अतुकांत।

प्रश्न 23.
कवि ने किस काव्य गुण का प्रमुखता से प्रयोग किया है ?
उत्तर:
प्रसाद गुण।

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प्रश्न 24.
कवि की शब्द-योजना मुख्य रूप से कैसी है ?
उत्तर:
तत्सम-तद्भव शब्दावली का समन्वित प्रयोग।

बहुविकल्पी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का सुप्रसिद्ध महाकाव्य कौन सा है ?
(क) प्रिय प्रवास
(ख) प्रिय प्यार
(ग) प्रिय पाजेब
(घ) प्रिय-प्रिया।
उत्तर:
(क) प्रिय प्रवास

प्रश्न 2.
‘प्रिय प्रवास’ महाकाव्य किस भाषा में रचित है ?
(क) ब्रज
(ख) अवधी
(ग) खड़ी बोली
(घ) बुंदेली।
उत्तर:
(ग) खड़ी बोली

प्रश्न 3.
श्री कृष्ण ब्रज छोड़कर कहां चले गये थे ?
(क) मथुरा
(ख) काशी
(ग) वाराणसी
(घ) अयोध्या।
उत्तर:
(क) मथुरा

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प्रश्न 4.
मथुरा नगरी किस नदी के तट पर विराजमान है ?
(क) गंगा
(ख) यमुना
(ग) सरस्वती
(घ) कावेरी।
उत्तर:
(ख) यमुना।

पवनदूत सप्रसंग व्याख्या

(1) नाना चिन्ता सहित दिनों को राधिका थी बिताती।
आँखों को थी सजल रखती उन्मना थी बिताती।
शोभा वाले जलद-वपु की हो री चातकी थी।
उत्कण्ठा थी परम प्रबल वेदना वर्द्धिता थी॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
सजल = आँसुओं भरे। उन्मना = उदास । जलद-वपु = मेघ जैसे शरीर वाले श्री कृष्ण। उत्कण्ठा = लालसा, बेचैनी । परम प्रबल = तीव्र । वेदना = पीड़ा, कष्ट, दुःख। वर्द्धिता = बढ़ रही।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी द्वारा लिखित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के ‘पवन दूत’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि राधा जी की वियोग दशा का वर्णन कर रहे हैं।

व्याख्या :
कवि कहता है कि श्रीकृष्ण के वियोग में व्यतीत होने वाले प्रत्येक दिन को राधा रोते हुए और नाना प्रकार की दुश्चिंताओं में ग्रस्त होकर व्यतीत करती थी। उसकी आँखों में सदैव आँसू भरे रहते थे और वे अत्यन्त उदास दिखाई देती थी। वह मेघों जैसे कांति के शरीर वाले श्रीकृष्ण की वह चातकी बनी हुई थी, जैसे स्वाति नक्षत्र के बादलों के लिए व्याकुल होकर चातकी पिउ-पिउ रटती रहती थी, उसी प्रकार राधा जी भी श्रीकृष्ण के नाम की रट लगाए रहती थी। उनके मन में श्रीकृष्ण से मिलन की लालसा अधिक बढ़ती जा रही थी और श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति के कारण उनकी पीड़ा बढ़ती ही जा रही थी।

विशेष :

  1. कवि का भाव यह है कि राधा श्रीकृष्ण जी के वियोग में व्याकुल थी। वह चातकी की तरह अपने प्रिय के मिलन के लिए तड़प रही थी।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास तथा रूपक अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(2) बैठी खिन्ना एक दिवस वे गेह में थी अकेली।
आके आँसू युगल दृग में थे धरा को भिगोते।
आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गंध को ले।
प्रातः वाली सुपवन इसी काल-वातायनों से॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
एग दिवस = एक दिन । खिन्ना = उदास। दृग-युगल = दोनों आँखें। धरा = पृथ्वी। सदन = घर। सद्गंध = सुन्दर सुगंध। वातायनों = झरोखों।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी’ द्वारा लिखित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के पवन दूत प्रसंग से लिया गया है। इन पंक्तियों में कवि श्री कृष्ण जी के मथुरा चले जाने पर राधा जी की विरह दशा का वर्णन करता है।

व्याख्या :
कवि राधा जी की विरह दशा का वर्णन करते हुए कहता है कि एक दिन वे बड़ी उदास, अपने घर में अकेली बैठी थीं। उनकी आँखों में बहते आँसू पृथ्वी को भिगो रहे थे कि तभी उस घर में, फूलों की सुगन्धि से युक्त प्रातः वेला की पवन ने झरोखों के मार्ग से प्रवेश किया।

विशेष :

  1. राधा श्रीकृष्ण जी के वियोग में निरन्तर रोए जा रही थी।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. वियोग श्रृंगार रस विद्यमान है।

(3) आके पूरा सदन उसने सौरभीला बनाया।
चाहा सारा कलुष तन का राधिका के मिटाना।
जो बूंदें थीं सजल दृग के पक्ष में विद्यमाना।
धीरे-धीरे क्षिति पर उन्हें सौम्यता से गिराया॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
सौरभीला = सुगन्धित। सदन = घर। कलुष = क्लेश, व्यथा। सजल दृग = आँसू भरे नेत्र। पक्ष = बरौनियों, भवें। क्षिति = पृथ्वी। सौम्यता = मधुरता।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ जी द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के ‘पवन-दूत’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि ने सुगन्धित पवन का वर्णन किया है। यह पवन राधा के मन की पीड़ा दूर करने की चेष्टा कर रही थी।

व्याख्या :
कवि कहता है कि मन्द गति से प्रवाहित प्रात:कालीन सुगन्धित वायु ने राधा जी के घर को सुगन्धि से भर दिया और वह वायु राधा जी के मन की व्यथा को मिटाने की चेष्टा करने लगी। इसी उद्देश्य से उसने राधा जी के आंसू भरे नेत्रों की बरौनियों में विद्यमान अश्रुकणों को बड़ी ही मधुरतापूर्वक अर्थात् शालीनता से पृथ्वी पर गिरा दिया।

विशेष :

  1. प्रकृति भी राधा जी के वियोग दूर करने के लिए उसके आस-पास सुगन्धित हवा बहा रही थी।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास तथा उपमा अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(4) श्री राधा को यह पवन की प्यार वाली क्रियाएँ।
थोड़ी-सी न सुखद हुई हो गई वैरिणी-सी।
भीनी-भीनी महक सिगरी शान्ति उन्मूलती थी।
पीड़ा देती व्यथित चित को वायु की स्निग्धता थी।

कठिन शब्दों के अर्थ :
भीनी-भीनी = हल्की-हल्की। महक = खुशबू। सिगरी = सारी। उन्मूलती = नष्ट कर रही थी। व्यथित = दुःखी। स्निग्धता = सरसता।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के ‘पवनदूत’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि ने सुगन्धित पवन से राधा जी को होने वाली पीड़ा का वर्णन किया है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि वायु की यह प्रेम से भरी शालीन क्रिया भी राधा जी को सुख देने वाली न लग कर दुःखमयी और शत्रुतापूर्ण लग रही थी। वायु से जो हल्की-हल्की खुशबू आ रही थी, उससे उनके मन की शांति नष्ट हो रही थी और वायु की यह सरसता उनके दुखी चित को पीड़ा दे रही थी।

कवि का अभिप्राय यह है कि श्रीकृष्ण के वियोग में राधा जी के मन की व्यथा सुगन्धित वायु के संस्पर्श से और भी अधिक बह गई थी, क्योंकि वायु की इस क्रिया से राधा जी को संयोगकाल में श्रीकृष्ण से संस्पर्श करने की याद ताज़ा हो उठी थी।

विशेष :

  1. सुगन्धित हवा ने राधाजी की व्याकुलता को और बढ़ा दिया। उन्हें उस समय श्री कृष्ण जी के मिलन की याद आने लगी थी।
  2. भाषा प्रवाहमयी संस्कृत तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास तथा उपमा अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

(5) संतापों को विपुल बढ़ता देख के दुःखिता हो।
धीरे बोली सदुख उससे श्रीमती राधिका यो।
“प्यारी प्रातः पवन इतना क्यों मुझे है सताती।
क्या तू भी है कलुषित हुई काल की क्रूरता से॥”

कठिन शब्दों के अर्थ :
संतापों = दुःखों। विपुल = अत्यधिक। कलुषित = दूषित। क्रूरता = कठोरता।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय- प्रवास’ के ‘पवन-दूत’ प्रसंग से ली गई हैं। इसमें कवि ने श्री कृष्ण के वियोग में संतप्त राधा की दशा का वर्णन किया है।

व्याख्या :
प्रात:कालीन सुगंधित वायु के प्रभाव स्वरूप जब राधा जी ने अपने मन की व्यथा को बहते देखा तो बड़े ही दुःखपूर्वक मन्द स्वर में उससे कहने लगी कि अरी ! प्रभातकालीन प्रिय वायु ! तू मुझे इस प्रकार क्यों दुखी कर रही है ? क्या तुम भी मेरी तरह समय की कठोरता से दूषित हो गई हो। क्या तुझ पर भी मेरी विरह की छाया पड़ गई है जिससे तू दूषित होकर क्रूर, कठोर या निर्दय हो गई हो ?

विशेष :

  1. कवि का भाव यह है कि राधाजी सुगन्धित हवा चलने से और अधिक दुःखी हो जाती है। वह प्रभात बेला से उसे और दुःखी नहीं करने के लिए कहती है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास अंलकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(6) मेरे प्यारे नव-जलद-से, कंज-से नेत्रवाले,
जाके आये न मधुवन से औ न भेजा सँदेसा।
मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावरी हो रही हूँ,
जाके मेरी सब कथा स्याम को तू सुना दे॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
नव = नये। जलद = बादल। कंज = कमल। मधुवन = मथुरा। बावरी = पगली। स्याम = श्रीकृष्ण।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय’ हरिऔध द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के पवन-दूत’ प्रसंग से अवतरित है। इसमें कवि ने राधा जी द्वारा पवन को दूत बनाकर श्री कृष्ण जी के पास मथुरा भेजने का वर्णन किया है। वह अपनी पीड़ा श्री कृष्ण जी के पास पहुँचाना चाहती है।

व्याख्या :
राधा प्रातः कालीन वायु की पहले तो तीव्र भर्त्सना करती है फिर उससे सखीपना स्थापित करते हुए कहती है कि हे प्रात:कालीन पवन ! मेरे प्रिय श्रीकृष्ण नए बादल के समान है, उनके शरीर का वर्ण बादलों जैसा सांवला है। वे कमल के समान नेत्रों वाले हैं, जो मथुरा जाकर फिर नहीं लौटे हैं और न ही वहां जाकर कोई सन्देश भेजा है। मैं श्रीकृष्ण के वियोग में रो-रोकर पागल हो रही हूँ। हे पवन ! तू श्रीकृष्ण के पास जाकर मेरी सारी कथा सुना देना।

विशेष :

  1. राधा जिस हवा के बहने के कारण दुखी थी, बाद में उसे ही अपनी दूत बना कर श्री कृष्ण के पास संदेश भेजती है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास तथा रूपक अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

(7) कालिन्दी के तट पर घने रम्य उद्यान वाला।
ऊंचे-ऊंचे धवल-गृह की पंक्तियों से प्रशोभी।
जो है न्यारा नगर मथुरा प्राण प्यारा वहीं है।
मेरा सूना सदन तज के तू वहां शीघ्र ही जा।

कठिन शब्दों के अर्थ :
कालिन्दी = यमुना। रम्य = सुन्दर। उद्यान = बाग-बगीचे। धवल-गृह = सफेद घर। प्रशोभी = शोभायमान न्यारा । न्यारा = अलग। सदन = घर । तज के = छोड़ कर।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय’ हरिऔध द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के ‘पवन दूत’ प्रसंग से अवतरित है। इसमें कवि ने राधा जी द्वारा पवन दूत को मथुरा का मार्ग बताने के विषय का वर्णन किया है।

व्याख्या :
राधा जी वायु को मथुरा जाने का रास्ता बताती हुई कहती है कि मथुरा नगर यमुना के तट पर बना है और वह नगर घने और सुन्दर बाग-बगीचों वाला है। वहां ऊंचे-ऊंचे सफेद घरों की पंक्तियाँ शोभायमान हो रही हैं। जो मथुरा नगर दूसरे नगरों से अलग है वहीं मेरे प्राण प्यारे श्रीकृष्ण रहते हैं। अतः मेरा यह सूना घर छोड़ कर तुम शीघ्र वहां जाओ और श्रीकृष्ण तक पहुँच जाओ।

विशेष :

  1. राधा जी हवा को श्री कृष्ण का पता बता कर शीघ्र वहाँ जाने के लिए कहती है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(8) जाते-जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे।
तो जा के सन्निकट उसकी क्लान्तियों को मिटाना।
धीरे-धीरे परस करके गात उत्ताप खोना।
सद्गंधों से श्रमित जन को हर्षित-सा बनाना॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
क्लान्त = थका हुआ। सन्निकट = पास जाकर। क्लान्तियों = थकावट। परस करके = स्पर्श करके। गात = शरीर के। उत्ताप = दुःख, व्याकुलता। खोना = दूर करना। सद्गंधों से = अपनी सुगन्धि से। श्रमित = थके हुए। दूषित-सा = प्रफुल्लित।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय’ हरिऔध द्वारा रचित महाकाव्य प्रिय-प्रवास के ‘पवन दूत’ प्रसंग से अवतरित है। इसमें कवि ने राधा जी द्वारा पवन दूत को यह समझाने का प्रयास किया है कि मार्ग में यदि कोई थका मुसाफ़िर मिले तो उसे ठण्डक पहुंचाने का प्रयास करने का वर्णन है।

व्याख्या :
राधा जी मथुरा का मार्ग बताती हुई वायु से कहती है कि मथुरा जाते समय यदि तुम्हें रास्ते में थका हुआ व्यथित मुसाफिर दिखाई दे तू उसके समीप जाकर उसकी थकान और कष्टों को दूर करने की कृपा करना। उसके शरीर को धीरे-धीरे मधुर रीति से स्पर्श करते हुए उसकी थकान और कष्टों को दूर करना। अपनी सुगन्धि से उस थके हुए मुसाफ़िर को प्रफुल्लित कर देना।

विशेष :

  1. राधा जी हवा से दूसरे मुसाफ़िरों की सहायता करने के लिए कहती है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(9) तेरे जैसी मृदु पवन से सर्वथा शान्ति-कामी,
कोई रोगी पथिक पथ में जो कहीं भी पड़ा हो।
तो तू मेरे सकल दुख को भूल के, धीर होके,
खोना सारा कलुष उसका शान्ति सर्वांग होना॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
मृदु = कोमल । सर्वथा = भली प्रकार, पूरी तरह । शान्ति-कामी = शान्ति चाहने वाला। कलुष = रुग्णता। सर्वांग = सभी अंगों की।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य प्रिय प्रवास के ‘पवन दूत’ प्रसंग से ली गई हैं। इनमें कवि ने श्री कृष्ण के वियोग में संतप्त राधा की दशा का वर्णन किया है।

व्याख्या :
राधा पवन को दूत बना कर श्रीकृष्ण के पास भेजती हुई कहती है कि हे सखी! तेरे जैसी कोमल पवन से जब कोई शान्ति की कामना करता हुआ रोगी मुसाफ़िर रास्ते में पड़ा हो, तो तू मेरे सारे दुःखों को भूलकर, थोड़ा धीरे होकर उसका सारा रोग और कष्ट हर लेना और उसके शरीर के सब अंगों को शान्ति प्रदान करना।

विशेष :

  1. राधा जी हवा से दूसरे मुसाफ़िरों की सहायता करने के लिए कहती है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

(10) जाते-जाते पहुँच मथुरा-धाम में उत्सुका हो,
न्यारी शोभा वन नगर की देखना मुग्ध होना।
तू होवेगी चकित लख के मेरु-से मन्दिरों को,
आभावाले कलश जिनके दूसरे अर्क-से हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ :
मथुरा-धाम = मथुरा नगरी। न्यारी = अनोखी। लखके = देखकर। मेरु-से = सुमेरु पर्वत से। (कहते हैं कि सुमेरु पर्वत सोने का था।) कलश = मन्दिरों के कलश (छत्र) अर्क-से = सूर्य के समान ।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के ‘पवन दूत’ प्रसंग से अवतरित है। इसमें कवि ने राधा जी द्वारा मथुरा नगरी की सुन्दरता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
राधा पवन को दूत बनाकर श्रीकृष्ण के पास भेजती हुई कहती है कि तू बड़ी उत्सुकता से आगे बढती जाना और मथुरा नगरी पहुँच कर वहां की अनोखी शोभा को देखती हुई मोहित हो उठना। तू वहां के ऊंचे और सुमेरु पर्वत के समान सुनहरी मन्दिरों को देखेगी तो आश्चर्य से चकित रह जाएगी। उन मन्दिरों के चमकते हुए कलश शोभा में दूसरे सूर्य जैसे हैं।

विशेष :

  1. मथुरा नगरी की सुंदरता का वर्णन किया गया है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. उपमा तथा अनुप्रास अलंकार है।
  4. वियोग श्रृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(11) तू देखेगी जलद-तन को जा वहीं तद्गता हो,
होंगे लोने नयन उनके ज्योति-उत्कीर्णकारी।
मुद्रा होगी वह बदन की मूर्ति-सी सौम्यता की,
सीधे-साधे वचन उनके सिक्त पीयूष होंगे।

कठिन शब्दों के अर्थ :
जलद-तन = मेघ की सी कान्ति के शरीर वाले श्रीकृष्ण। तद्गता हो = तन्मय होकर। लोने = सुन्दर । ज्योति उत्कीर्णकारी = जिनमें से ज्योति (प्रकाश) निकल रहा हो। मुद्रा = भाव भंगिमा। बदन = मुख । सौम्यता = शालीनता। सिक्त = भीगे हुए। पीयूष = अमृत।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय’ हरिऔध द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय-प्रवास’ के ‘पवन दूत’ प्रसंग से अवतरित है। इसमें कवि ने श्री कृष्ण जी की सुन्दरता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
राधा पवन से कहती है कि जब तू मथुरा जाएगी तो तुझे मेघों जैसी श्याम कान्ति वाले मेरे प्रिय श्रीकृष्ण इन राजमहलों में ही दिखाई देंगे, जिनकी शारीरिक कान्ति और शोभा इतनी अधिक मनोहर है कि तू उन्हें देखते हुए तन्मय हो उठेगी, अपनी सुध-बुध खो बैठेगी। श्रीकृष्ण के नेत्र बहुत हो सुन्दर दिखाई देंगे, उनमें ज्योति की किरणें फूटती रही होंगी। उनके मुख की भाव भंगिमा तुझे ऐसी दिखाई देगी मानो वह शालीनता की प्रतिमूर्ति है जबकि उनके मुख से निकलने वाली वाणी अमृत रस में डूबी हुई प्रतीत होगी।

विशेष :

  1. कवि का भाव यह है कि राधा जी हवा को श्री कृष्ण जी के रूप-रंग के विषय में बताती है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. उपमा, रूपक अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

(12) नीले कुंजों सदृश उनके गात की श्यामता है,
पीला प्यारा वसन कोटि में पहनते हैं फबीला।
छूटी काली अलक मुख की कान्ति को है बढ़ाती,
सदवस्त्रों में नवल तन की फटती-सी प्रभा है।

कठिन शब्दों के अर्थ :
कुंजों = फूलों का समूह । गात = शरीर। श्यामता = सांवलापन। वसन = वस्त्र। कटि = कमर। फबीला = सजने वाला। अलक = लूट। सद्वस्त्रों = सुन्दर वस्त्रों। नवल-तन = नया शरीर अर्थात् युवावस्था को प्राप्त करता शरीर। प्रभा = प्रकाश, कांति।।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियां अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के ‘पवनदूत’ प्रसंग से ली गई हैं। इनमें कृष्ण वियोग में संतप्त राधा पवन को अपना दूत बना कर श्री कृष्ण के पास भेजती है।

व्याख्या :
राधा पवन को श्रीकृष्ण की रूपाकृति से परिचित करवाती हुई आगे कहती है कि श्रीकृष्ण के शरीर का सांवलापन खिले हुए नील कमलों की पंखुड़ियों के समान है। वे कमर में पीला वस्त्र पहनते हैं जो उनके सांवले शरीर पर अत्यधिक शोभा पाता है। उनके मुख पर धुंघराले बालों की लट उनके मुख से सौन्दर्य और कान्ति को और अधिक बढ़ा रही है। उनके सुन्दर वस्त्रों से युवावस्था में प्रवेश करते हुए शरीर की कांति फूट रही है। उनकी दिव्य शारीरिक कांति उनके वस्त्रों में भी नहीं छिप रही है।

विशेष :

  1. राधा जी हवा को श्री कृष्ण जी के रूप-रंग से परिचित करवा रही है। उन्हें डर है कि हवा उनका संदेश श्री कृष्ण के स्थान पर किसी अन्य को न दे दे।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुप्रास तथा अलंकार है।
  4. शृंगार रस का वर्णन है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(13) जाते ही छू कमल-दल से पाँव को पूत होना,
काली काली अलक मृदुता से कपोलों को हिलाना॥
क्रीड़ायें भी कलित करना ले दुकूलादिकों को,
धीरे-धीरे परस तन को, प्यार की बेलि बोना॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
कमल-दल-से = कमल के पत्तों के समान कोमल। पूत होना = पवित्र होना। अलक = लटें। मृदुता = कोमलता। कपोलों = गालों। क्रीड़ायें = खेल। कलित = सुन्दर। दुकूलदिकों की = दुपट्टे आदि की। परस = स्पर्श करके।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय’ हरिऔध रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के ‘पवन-दूत’ प्रसंग से अवतरित है। इसमें राधा ने पवन दूत को श्री कृष्ण का स्पर्श करने के लिए कहा है।

व्याख्या :
राधा पवन को दूत बना कर श्रीकृष्ण के पास भेजते हुए कह रही है कि तू जैसे ही मेरे प्रिय श्रीकृष्ण के भवन में प्रवेश करे उनके कमल की पंखुड़ियों के समान कोमल चरणों का स्पर्श करके तू अपने को पवित्र कर लेना। उस के बाद तू उनकी काली-काली सुन्दर लटाओं को बड़ी कोमलता से उनके गालों पर लहराना, हिलाना और उनके दुपट्टे आदि के साथ भी सुन्दर खेल खेलना, उन लटाओं को लहरा भी देना। फिर उनके कोमल शरीर का स्पर्श करके प्यार की बेल बोना, उनके हृदय में प्रेमलता अंकुरित कर देना।

विशेष :

  1. राधा जी हवा से श्रीकृष्ण जी को छूने के लिए कहती है। इससे श्रीकृष्ण जी को उनके प्यार का एहसास होगा।
  2. अनुप्रास तथा उपमा अलंकार है।
  3. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  4. श्रृंगार इस का वर्णन है।

(14) कोई प्यारा कुसुम कुम्हला भौन में जो पड़ा हो,
तो प्यारे के चरण पर ला डाल देना उसे तू।
यों देना ए पवन ! बतला फूल-सी एक बाला,
म्लाना हो हो कमल-पग को चूमना चाहती है।

कठिन शब्दों के अर्थ :
कुसुम = फूल। मौन = भवन। बाला = लड़की। म्लाना = दुखी।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के ‘पवन-दूत’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि ने विभिन्न साधनों द्वारा राधा जी की विरह पीड़ा श्रीकृष्ण तक पहुँचाने का वर्णन किया है।

व्याख्या :
राधा पवन से कहती है जो तुझे कोई प्यारा-सा मुरझाया फूल भवन में पड़ा हुआ मिले तो उस मुरझाये फूल को मेरे प्रिय के चरणों में लाकर डाल देना। इस तरह हे पवन ! तू श्रीकृष्ण को यह बतला देना कि एक फूलसी कोमल लड़की दुखी होकर उनके चरण कमलों को चूमना चाहती है।

विशेष :

  1. राधा जी हवा के द्वारा श्रीकृष्ण के चरणों में मुरझाए फूल अर्पित करके अपना दुःख प्रकट करना चाहती है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता।
  3. उपमा तथा अनुप्रास अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(15) लाके फूले कमल-दल को श्याम के सामने ही
थोड़ा-थोड़ा विपुल जल में व्यग्र हो हो डुबाना।
यों देना तू भगिनी जतला एक अंभोजनेत्रा,
आँखों को हो विरह-बिधुरा वारि में बोरती है।

कठिन शब्दों के अर्थ :
फूले = खिले हुए। विपुल = अथाह । बहुत अधिक व्यग्र हो हो = व्याकुल हो-हो कर। भगिनी = बहन। अंभोजनेत्रा = कमल जैसी आंखों वाली। विरह-बिधुरा = विरह में पागल या दुखी। वारि में बोरती है = आंसुओं में डुबोती है।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के ‘पवन दूत’ प्रसंग से ली गई हैं। इनमें कवि ने कृष्ण वियोग में संतप्त राधा के पवन को दूत बना कर श्री कृष्ण के पास भेजने का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
पवन से राधा कहती है कि हे बहन ! तू किसी खिले हुए कमल के फूल की पंखुड़ियों को उड़ाकर श्रीकृष्ण के सामने दुखित भाव से धीरे-धीरे जलपुंज में डुबोना और इस प्रकार श्रीकृष्ण को अहसास करा देना कि कमल जैसी आँखों वाली एक बाला राधा विरह-व्यथा के कारण अपनी आँखों को आँसुओं के जल में इसी प्रकार डुबो रही है तथा विरह कातर होकर वह सदा रोती रहती है।

विशेष :

  1. राधा जी हवा से कहती है कि वह अपने आचरण से श्रीकृष्ण जी को यह अनुभव कराए की राधा जी उनसे बिछुड़ कर बहुत दुखी है।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. रूपक तथा अनुप्रास अलंकार है।
  4. वियोग श्रृंगार रस है।

(16) सूखी जाती मलिन लतिका जो धरा में पड़ी हो,
तो तू पांवों के निकट उसको श्याम के ला गिराना।
यों सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो,
मेरा होना अति मलिन और सूखते नित्य जाना॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
मलिन = दुखी, मुरझाई हुई। लतिका = बेल। धरा = धरती, पृथ्वी। वंचित = रहित।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के पवन दूत’ प्रसंग से ली गई हैं। इनमें कवि ने कृष्ण वियोग में संतप्त राधा के पवन को दूत बना कर श्री कृष्ण के पास भेजने का वर्णन किया गया है।

व्याख्या :
राधा पवन को सम्बोधित करती हुई कहती है कि यदि कोई सूखी हुई मैली-कुचैली, गंदी-सी लता को धरती पर पड़े हुए देखो तो हे बहन ! उस लता को उठा कर श्रीकृष्ण के चरणों के निकट ला गिराना और उस सरल सीधी रीति से यह भाव व्यक्त कर देना कि उनके प्रेम से रहित होकर राधा दिन-रात सूखती जा रही है, क्षीण होती जा रही है।

विशेष :

  1. राधा जी हवा को उनका दुःख व्यक्त करने के साधन बताती है। वह अपने भावों से श्री कृष्ण जी को उनका दुःख बताए।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. उपमा अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(17) यों प्यारे को विदित करके सर्व मेरी व्यथायें,
धीरे-धीरे वहन करके पाँव की धूलि लाना।
थोड़ी-सी भी चरण-रज जो ला न देगी हमें तू,
हा! कैसे तो व्यथित चित को बोध मैं दे सकंगी।

कठिन शब्दों के अर्थ :
विदित करके = जता कर। वहन करके = उठाकर। बोध = आश्वासन, ज्ञान, समझ।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के ‘पवन-दूत’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि ने पवन दूत से श्री कृष्ण के चरणों की धूल लाने का वर्णन किया है।

व्याख्या :
पवन को संबोधित करते हुए राधा कहती है कि इस प्रकार प्रिय श्रीकृष्ण को मेरी सारी पीड़ाएँ बता देना और धीरे से उनके चरणों की धूलि को धीरे-से उठा कर ले आना। यदि तू मुझे श्रीकृष्ण की थोड़ी-सी भी चरण धूलि ला देगी तो मैं किसी प्रकार अपने विरह से दुखी चित्त को आश्वासन दे सकूँगी।

विशेष :

  1. राधा जी हवा से उनका दुःख श्री कृष्ण को व्यक्त करने के लिए कहती है तथा श्रीकृष्ण जी के चरणों की धूल अपने साथ लाने के लिए कहती है। इससे उनका विरह दुःख कम हो जाएगा।
  2. भाषा प्रवाहमयी है।
  3. उपमा अलंकार है।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

(18) जो ला देगी चरण-रज तू तो बड़ा पुण्य लेगी,
पूता हूँगी परम उसको अंग में मैं लगाके।
पोतुंगी जो हृदय-दल में वेदना दूर होगी,
डालूंगी मैं शिर पर उसे आँख में ले मलूंगी।

कठिन शब्दों के अर्थ :
पूता हूँगी = पवित्र हो जाऊंगी। अंग में = शरीर में। पोतूंगी = लिपटाऊँगी, लगाउँगी। ‘वेदना = पीड़ा।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के ‘पवन-दृत’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि ने पवन दूत से श्री कृष्ण के चरणों की धूल लाने का वर्णन किया है।

व्याख्या :
राधा पवन से प्रार्थना करती हुई कहती है कि यदि तू मुझे श्रीकृष्ण के चरणों की धूलि ला देगी तो तेरा बड़ा पुण्य होगा। मैं उसे अपने शरीर के अंगों पर लगाकर पवित्र हो जाऊँगी, जब मैं उस चरण धूलि को अपने शरीर पर लगाऊँगी तो मेरी विरह व्यथा दूर हो जाएगी। मैं उस पवित्र चरण धूलि को सिर पर डालूँगी और उसे अपनी आँखों में भी डालूँगी।

विशेष :

  1. राधा जी श्रीकृष्ण जी के चरणों की धूलि को अपने शरीर पर लगाकर, उनके होने का अनुभव करना चाहती थी।
  2. भाषा प्रवाहमयी है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  3. अनुभव करना चाहती थी।
  4. वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

(19) पूरी होवें न यदि तुझसे अन्य बातें हमारी,
तो तू मेरी विनय इतनी मान ले औ चली जा।
छूके प्यारे कमल पग को प्यार के साथ आ जा,
जी जाऊँगी हृदय तल में मैं तुझी को लगाके॥”

कठिन शब्दों के अर्थ : विनय = प्रार्थना।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के ‘पवन दूत’ प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि ने पवनदूत द्वारा चरणों की धूलि नहीं लाने पर, उसे केवल चरणों के स्पर्श को ही अपने साथ लाने का वर्णन किया है।

व्याख्या :
राधा पवन से प्रार्थना करते हुए कहती है कि यदि तुम से दूसरी बातें पूरी न हो सकें तो तू मेरी इतनी प्रार्थना को मान मथुरा नगरी में श्रीकृष्ण के पास चली जाओ और वहाँ श्रीकृष्ण के प्यारे चरणों को बड़े प्यार के साथ छूकर लौट आना तब मैं तुझे अपने दुखी हृदय से लगा कर सुख पाऊँगी।

विशेष :
श्री राधा जी हवा से कहती है कि यदि वह कुछ भी करने में असमर्थ है तो वह श्रीकृष्ण जी को छूकर ही आ जाए। वह उसके द्वारा उनकी छुवन को महसूस कर लेंगी।
भाषा प्रवाहमयी है।
वियोग शृंगार रस विद्यमान है।

पवनदूत Summary

पवनदूत जीवन परिचय

‘अयोध्या सिंह उपाध्याय’ का जन्म निजामबाद जिला आजमगढ़ उत्तर प्रदेश में सन् 1865 ई० को हुआ था। उन्होंने अपने नाम-क्रम ‘सिंह’ (हरि) तथा अयोध्या (औध) को बदलकर ‘हरिऔध’ उपनाम से काव्य रचना की। ‘हरिऔध’ जी का गद्य और पद्य दोनों पर पूर्ण अधिकार था। किन्तु इन्हें काव्य जगत में विशेष प्रसिद्धि मिली। इनके रचनाकाल के समय खड़ी बोली अपने शैशवकाल में थी। इनकी मृत्यु सन् 1941 ई० में हो गई थी।

इनका प्रिय प्रवास महाकाव्य अत्यंत लोकप्रिय हुआ। इसमें भगवान श्री कृष्ण के ब्रज से मथुरा चले जाने पर गोपियों की विरह का मार्मिक चित्रण हुआ है। खड़ी बोली में इस प्रसंग को लेकर पहला काव्य रचा गया है। कवि ने अपने सभी ग्रन्थों में बड़े उपयुक्त छंदों, रसों और अलंकारों का वर्णन किया है। इन ग्रन्थों में प्राकृतिक छटा के बड़े सुन्दर उदाहरण हैं।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 6 पवनदूत

पवनदूत का सार

कविता का सार ‘पवन दूत’ कविता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित प्रबन्ध काव्य ‘प्रिय-प्रवास’ से ली गई है। इसमें कवि ने राधा जी के विरह का वर्णन किया है। श्री कृष्ण जी के मथुरा जाने के बाद उनके वियोग में उनकी प्रेयसी राधा की हालत दयनीय हो जाती है। एक दिन वह श्री कृष्ण जी के वियोग में घर में बैठी आँसू बहा रही थी, उसी समय प्रातः कालीन सुगंधित पवन आकर सम्पूर्ण वातावरण को सुहावना बना देती है। परन्तु पवन का झोंका राधा जी की विरह वेदना को और बढ़ा देता है। उस समय राधा जी पवन को अपना दूत बनाकर श्री कृष्ण जी के पास अपनी विरह वेदना का संदेश भेजती है। वे पवन को मथुरा और श्री कृष्ण का परिचय देती है। वे पवन को श्री कृष्ण जी के चरणों की धूल लाने के लिए कहती है। क्योंकि राधा जी श्री कृष्ण जी के चरणों की धूलि को अपने तन पर लगाकर अपना जीवन सार्थक बनाना चाहती हैं।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Chapter 4 दोहे Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Hindi Chapter 4 दोहे

Hindi Guide for Class 11 PSEB दोहे Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मानव शरीर की नश्वरता का प्रतिपादन करते हुए रहीम ने क्या कहा है ?
उत्तर:
रहीम जी मानव शरीर की नश्वरता के विषय में कहते हैं कि जब तक मनुष्य का शरीर चलता है तब तक उसके परिजन, मित्र आदि उसे अच्छी तरह पूछते हैं परन्तु जब वह बूढ़ा हो जाता है तब उसे कोई नहीं पूछता है। शरीर का मोल तब तक है जब तक काम आता है इसीलिए इसे नाशवान कहा गया है जिसका मोह नहीं करना चाहिए। इस नाशवान शरीर को तो मिटना ही है पर ईश्वर ही इसकी सदा सहायता करते हैं इसलिए उसे प्रभु को कभी नहीं भुलाना चाहिए।

प्रश्न 2.
रहीम जी ने कुपुत्र को सदैव कुल के लिए अपमान का कारण क्यों कहा है ?
उत्तर:
रहीम जी ने कुपुत्र को कुल के लिए अपमान का कारण इसलिए कहा है क्योंकि उसके बड़ा होने पर कुल में अँधेरा छा जाता है। कुल के दुःख बढ़ जाते हैं और उसके बुरे कर्म कुल के लिए अपमानजनक बनते हैं। जैसे-जैसे वह बढ़ता है वैसे-वैसे उसके द्वारा किए गए कुकर्म भी बढ़ते जाते हैं जिस कारण माता-पिता और परिवार की प्रतिष्ठा मिटती चली जाती है। कुपुत्र अपने पूरे वंश की ख्याति को मिट्टी में मिलाने का कार्य करता है।

प्रश्न 3.
रहीम जी ने मनुष्य को सोच समझ कर बोलने की शिक्षा देते हुए क्या कहा है ?
उत्तर:
रहीम जी कहते हैं कि मनुष्य को सोच समझकर बोलना चाहिए क्योंकि जीभ तो बुरा-भला बोल कर मुँह के अन्दर जाकर छिप जाती है और जूते सिर को खाने पड़ते हैं। बुरा बोलकर मनुष्य अपने रिश्ते-नाते खराब कर लेता है। जिह्वा से निकले हुए ग़लत बोल कभी भी दूसरे भुला नहीं पाते। किसी भी व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति से लड़ाई का मूल कारण सदा बातचीत ही होती है। कड़वा और झगड़ालू व्यवहार बोलने से ही आरंभ होता है इसलिए सोच-समझ कर ही बोलना चाहिए।

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प्रश्न 4.
प्रेमपूर्वक खिलाये जाने वाले भोजन को रहीम जी ने उत्तम क्यों माना है ?
उत्तर:
रहीम जी के अनुसार प्रेमपूर्वक खिलाया गया भोजन उत्तम है क्योंकि उसके सादे भोजन में भी मिठास होती है और तन और मन दोनों को तृप्त कर देता है अपितु मैले मन से खिलाए गए पकवान पेट और मन दोनों खराब कर देते हैं। प्रेमपूर्वक किया गया व्यवहार और बातचीत सदा संबंधों को बढ़ाती है और पारस्परिकता को समृद्ध करती है।

प्रश्न 5.
प्रभु के प्रति विनय-भावना व्यक्त करते हुए रहीम ने क्या कहा ?
उत्तर:
रहीम जी ने प्रभु के प्रति विनय-भावना व्यक्त करते हुए कहा है प्रभु की मन से भक्ति करनी चाहिए और आदर भाव से उन्हें देखना चाहिए तभी वे वश में होते हैं। ईश्वर सदा भक्त की भक्ति ही चाहते हैं। ईश्वर तो दया की खान है। वह तो भक्त की पुकार पर बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाता है और उसकी क्षमा याचना से पहले ही क्षमा कर देता है।

प्रश्न 6.
रहीम जी के अनुसार प्रभु को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर:
रहीम जी के अनुसार प्रभु को प्राप्त करने के लिए मन से स्मरण करना चाहिए, आँखों में आदर लेकर पूर्ण रूप से उनके प्रति समर्पित होना ज़रूरी है। प्रभु की प्राप्ति उसे पुकारने से अवश्य हो जाती है। उसके प्रति मन में सच्चे भाव होने चाहिए। छल-फरेब और लालच से रहित मानव उसे सच्चे मन से चाहने पर अवश्य प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न 7.
रहीम के अनुसार जीवन में सत्संगति का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
रहीम जी के अनुसार सत्संगति का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्त्व है। मनुष्य जिस संगति में बैठता है उसमें वैसे ही गुण आ जाते हैं। सत्संगति में बैठने से मनुष्य सज्जन पुरुष बन जाता है तथा चारों ओर प्रशंसा का पात्र बनता है। सत्संगति से मनुष्य अपने सहायक स्वयं प्राप्त कर लेता है जो सुख-दुःख में उसके सहायक बनते हैं।

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PSEB 11th Class Hindi Guide दोहे Important Questions and Answer

अति लघूतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि रहीम का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर:
सन् 1553 में।

प्रश्न 2.
रहीम का पूरा नाम क्या था ?
उत्तर:
अब्दुर्ररहीम खान खाना।

प्रश्न 3.
कवि रहीम के अनुसार प्रेम में किसका स्थान नहीं है ?
उत्तर:
कवि रहीम के अनुसार प्रेम में दिखावे का स्थान नहीं है।

प्रश्न 4.
किसे इधर-उधर खोजना व्यर्थ है ?
उत्तर:
परमात्मा को इधर-उधर खोजना व्यर्थ है।

प्रश्न 5.
हाथी किस धूल को ढूँढ़ रहा था ?
उत्तर:
हाथी उस धूल को ढूँढ़ रहा था जिससे गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार हुआ था।

प्रश्न 6.
कौन पहले ही अपनी स्थिति के कारण मरा हुआ होता है ?
उत्तर:
माँगने वाला व्यक्ति।

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प्रश्न 7.
मनुष्य पर किसका प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
मनुष्य पर अच्छी बुरी संगति का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 8.
पेट भरने के लिए बलशाली को भी क्या करना पड़ता है ?
उत्तर:
पेट भरने के लिए बलशाली को भी दूसरों के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है।

प्रश्न 9.
ईश्वर स्वयं किनकी चिंता करते हैं ?
उत्तर:
ईश्वर स्वयं उपयोगी तथा अनुपयोगी वस्तुओं की चिंता करते हैं।

प्रश्न 10.
कवि रहीम के अनुसार किसकी जीभ बड़ी पगली है ?
उत्तर:
मनुष्य की जीभ बड़ी पगली है।

प्रश्न 11.
कौन-सा शासक अच्छा होता है ?
उत्तर:
जो शासक चंद्रमा के समान सुख देता है वह अच्छा होता है।

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प्रश्न 12.
अधिकतर व्यक्ति किसके साथी होते हैं ?
उत्तर:
अधिकतर व्यक्ति दुःखों के साथी न होकर सुखों के साथी होते हैं।

प्रश्न 13.
कौन-से लोग मृत समान होते हैं ?
उत्तर:
जो लोग होने के बाद भी दान नहीं देते।

प्रश्न 14.
रहीम जी ने अपने दोहों में ……………… दिया है ।
उत्तर:
गहन संकेत।

प्रश्न 15.
माँगने वाला चाहे कितना ही हो वह ……………….. रहता है ।
उत्तर:
छोटा।

प्रश्न 16.
ईश्वर का वास ……….. में होता है ।
उत्तर:
मन।

प्रश्न 17.
प्रेम में किसका स्थान नहीं होता है ?
उत्तर:
दिखावे का।

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प्रश्न 18.
रहीम जी किस स्थान पर रहना चाहते हैं ?
उत्तर:
जिस स्थान पर लोग चरित्रवान हों।

प्रश्न 19.
सच्ची सेवा, आवभगत और उपकार किससे संभव है ?
उत्तर:
प्रेमभाव से।

प्रश्न 20.
गौतम ऋषि की पत्नी का क्या नाम था ?
उत्तर:
अहिल्या।

प्रश्न 21.
मनुष्य को अपनी …………. की रक्षा करनी चाहिए ।
उत्तर:
मान-मर्यादा।

प्रश्न 22.
तालाब में पानी के साथ और क्या होता है ?
उत्तर:
कीचड़।

प्रश्न 23.
मनुष्य को अपनी जुबान पर क्या रखना चाहिए ?
उत्तर:
संयम।

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प्रश्न 24.
ताड़ और खजूर के पेड़ कैसे होते हैं ?
उत्तर:
बहुत बड़े।

प्रश्न 25.
कौन-से लोग पशु समान होते हैं ?
उत्तर:
जो दूसरों के गुणों पर रीझकर भी उसे कुछ नहीं देते।

प्रश्न 26.
परिवार में अंधेरा कब छा जाता है ?
उत्तर:
जब पुत्र कपूत निकल जाता है।

बहुविकल्पी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रहीम किसके नवरत्नों में से एक थे ?
(क) अकबर
(ख) शाहजहाँ
(ग) बीरबल
(घ) नूरजहां।
उत्तर:
(क) अकबर

प्रश्न 2.
रहीम किसके भक्त माने जाते हैं ?
(क) श्री राम के
(ख) श्री कृष्ण के
(ग) रहीम के
(घ) करीम के।
उत्तर:
(ख) श्री कृष्ण के

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प्रश्न 3.
रहीम के कौन से दोहे सुप्रसिद्ध हैं ?
(क) गीति के
(ख) रीति के
(ग) नीति के
(घ) प्रीति के।
उत्तर:
(ग) नीति के

प्रश्न 4.
रहीम के अनुसार ईश्वर का वास कहां होता है ?
(क) तन में
(ख) मन में
(ग) ब्रहम में
(घ) जगत में।
उत्तर:
(ख) मन में।

दोहों सप्रसंग व्याख्या

1. अमर बेलि बिनु मूल की, प्रति पालत जो ताहि ॥
रहिमन ऐसे प्रभुहि तजि, खोजत फिरिये काहि॥1॥

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ से लिया गया है। इसमें कवि ने मनुष्य को उपदेश दिया है कि उसे ईश्वर की खोज में व्यर्थ नहीं भटकना चाहिए। वह तो स्वयं सहायक बनकर उसके साथ ही मन में रहता

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि हे मनुष्य ! जो, ईश्वर बिना जड़ की अमर बेल का पालन-पोषण करते हैं तथा जिन पौधों की कोई रखवाली नहीं करता, उन्हें भी ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। तू ऐसे ईश्वर को छोड़कर व्यर्थ में उसकी खोज में इधर-उधर भटकता रहता है। वे तो स्वयं ही तेरा ध्यान रखते हैं।

विशेष :

  1. ईश्वर सब पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं। उन्हें इधर-उधर खोजना व्यर्थ है। इसलिए सच्चे मन से उनकी आराधना करनी चाहिए।
  2. भाषा सरल तथा सामान्य बोलचाल की है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. शांत रस है।
  5. गेयता का गुण है।
  6. अनुप्रास अलंकार है।

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काम न काहू आवई, मोल रहीम न लेई।
बाजू टूटे बाज को, साहब चारा देइ ॥2॥

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ से लिया गया है। इसमें में कवि ने कहा है कि जो वस्तु काम में आने वाली न हो उसे कभी भी खरीदना नहीं चाहिए।

व्याख्या :
कवि कहते हैं कि जो वस्तु हमारे काम में आने वाली नहीं होती उसे खरीदना नहीं चाहिए। बेकार की वस्तुओं की चिन्ता ईश्वर स्वयं करते हैं। जैसे टूटे पंख वाले बाज के पेट को भरने की चिन्ता ईश्वर करते हैं। वही उसे खाना प्रदान कराते हैं। उसके लिए किसी को चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।

विशेष :

  1. ईश्वर उपयोगी तथा अनुपयोगी वस्तुओं की चिन्ता स्वयं करते हैं।
  2. भाषा सरल, सहज तथा आम बोलचाल की है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. शान्त रस है।
  5. गेयता का गुण है।
  6. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

धूरि धरत नित सीस पै, कह रहीम केहि काज।
जेहि रज मुनि-पतनी तर, सो ढूंढत गजराज॥3॥

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ से लिया गया है। इसमें कवि ने उस हाथी का वर्णन किया है जो सती अनसूया के चरणों की रज को ढूंढ़ रहा है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि हाथी प्रति दिन अपने सिर पर संड से धरती की धूल धारण करता है। वह ऐसा क्यों कर रहा है क्योंकि हाथी का अपने मस्तक पर धूल लगाने के पीछे भी कुछ कारण होगा। रहीम जी अपने प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि हाथी उस धूल को ढूंढ रहा है जिस धूल के स्पर्श से गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार हो गया। हाथी श्रीराम जी के चरणों की धूल ढूंढ रहा है जिससे उसका उद्धार हो सके।

विशेष :

  1. मानव तो मानव पशु भी श्रीराम के चरणों की धूल प्राप्त करके अपना जीवन सफल बनाना चाहते हैं।
  2. भाषा सरल, सहज तथा आम बोलचाल की है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण है।

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बडे पेट के भरन में है रहीम दख बाढ़ि॥
यातें हाथि हहरि कै, दिये दाँत द्वै काढ़ि ॥4॥

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने खाने और दिखाने के दांत का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि बड़े पेट को भरने के लिए बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसी बड़े पेट को भरने के लिए हाथी जैसे विशाल शरीर वाले जानवर को भी भूख से घबराकर अपने लम्बे दाँत दिखाने पड़ते हैं। दूसरों के सामने सहायता के लिए सभी को प्रार्थना करनी पड़ती है; गिड़गिड़ाना पड़ता है।

विशेष :

  1. पेट भरने के लिए शक्तिशालियों को भी दूसरों के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है; सहायता पाने की इच्छा करनी पड़ती है।
  2. भाषा सरल, सहज तथा आम बोलचाल की है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।
  7. ‘दाँत निकलना’ मुहावरे का प्रयोग सार्थक है।

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रहिमन अपने पेट सों, बहुत कहयो समुझाइ।
जो तू अनखाये रहै, तोसों तो अनखाई॥5॥

शब्दार्थ : कहयो = कहना। अन खाना (अन्न + खाना) = पेट भरा हो। अनखाना = क्रुद्ध होकर बुरा मानना।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने अपने पेट को समझाने की बात कही है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि उन्होंने अपने पेट को बहुत समझाया है कि यदि तेरे साथ अन्य सभी का भी पेट भरा रहेगा तो किसी को किसी से मांगना नहीं पड़ेगा। भाव है कि जब कोई किसी से मांगने जाता है तो उसे बुरा मालूम होता है पर यदि पेट भरा हुआ हो न कोई मांगेगा और न किसी को बुरा लगेगा।

विशेष :

  1. कवि ने पेट की आग को ही सम्बन्धों के अच्छे या बुरे होने का आधार माना है।
  2. भाषा सरल, सहज तथा आम बोलचाल की है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. शांत रस है।
  5. गेयता का गुण विद्यमान है।

रहिमन रहिला की भली, जो परसै चित लाइ।
परसत मन मैला करै, सो मैदा जरि जाई॥6॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
रहिला = चना। मैदा = आटे की एक बारीक प्रकार, जिगर। जरि जाइ = जल जाता है। परसत = स्पर्श से।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ पाठ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने हृदय के प्रेम की निर्मलता की ओर संकेत किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि यदि कोई प्रेमपूर्वक सच्चे हृदय से चने की रोटी खिलाता है तो वह भी अच्छी लगती है। परन्तु यदि कोई बुरे मन से मैदे से बने अनेक व्यंजन खिलाता है तो उससे कोई लाभ नहीं होता अपितु मनुष्य का मैदा खाने से उसका जिगर जल जाता है। सच्ची सेवा, आवभगत और उपकार तो प्रेमभाव से ही संभव होती
मभाव से ही संभव हो

विशेष :

  1. प्रेम में दिखावे का स्थान नहीं है।
  2. भाषा सहल, सहज है। अनुप्रास तथा श्लेष अलंकार है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. शांत रस है।
  5. गेयता का गुण विद्यमान है।

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रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनतै पहिल वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं 7 ॥

प्रसंग :
यह दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि कहते हैं कि माँगना बुरा है परन्तु द्वार पर मांगने आए व्यक्ति को इनकार करना उससे भी अधिक बुरा है।।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि वे मनुष्य मरे हुए के समान हैं जो किसी से कुछ भी मांगने जाते हैं। मांगने वाला व्यक्ति अपना स्वाभिमान त्याग कर दूसरों से सहायता रूप में कुछ मांगने जाता है। परन्तु मांगने वाले से पहले वे व्यक्ति मर गए होते हैं जिनके पास सब कुछ होते हुए भी मांगने वाले को कुछ भी देने से इनकार कर देते हैं।

विशेष :

  1. माँगने वाला तो पहले ही अपनी स्थिति के कारण मरा हुआ होता है परन्तु जिसके पास सब कुछ है और वह देने से इनकार कर दे तो वह मांगने वाले से पहले मर चुका है।
  2. भाषा आम बोलचाल की है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

रहिमन-रहिबो वाँ भलो, जो लौं सील समच।
सील-ढील जब देखिये, तुरत कीजिए कूच।।8॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
रहिबो = रहना। सील = शील, चरित्र। समूच = पूर्ण रूप से। तुरत = तुरन्त, उसी समय, फौरन। कूच करना = चल पड़ना।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें रहीम जी कहते हैं कि जिसका चरित्र, स्वभाव और व्यवहार ठीक नहीं। उनका वहां से चले जाना ही ठीक रहता है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि उस स्थान पर रहना अच्छा होता है जहां पर लोग पूर्ण रूप से चरित्रवान हों। अच्छे चरित्र वाले लोगों की संगति अच्छी रहती है। परन्तु जब ऐसा अनुभव हो कि लोगों के चरित्र में गिरावट आ गई है तो वहां से चले जाना ही अच्छा है। बुरे लोगों की संगति मनुष्य को बुरा बना देती है।

विशेष :

  1. मनुष्य पर अच्छी-बुरी संगति का प्रभाव पड़ता है। इसलिए बुरी संगति वाले लोगों से दूरी अच्छी होती है।
  2. भाषा सरल, सहज तथा आम बोलचाल की है।
  3. अनुप्रास तथा श्लेष अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

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रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून॥
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुस चून॥9॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
पानी = इज्जत, मान-मर्यादा जल, चमक । राखिये = रक्षा करनी चाहिए। पानी = जल, चमक, इज्जत । सून = सूना होना। चून = आटा, सफेदी।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित रहीम सतसई, के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि कहता हैं कि मनुष्य को अपनी मान-मर्यादा की रक्षा करनी चाहिए।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि मनुष्य को पानी, अपनी इज्जत अथवा मान मर्यादा की रक्षा करनी चाहिए। पानी के बिना सब सूना है; व्यर्थ है। चमक (पानी) के चले जाने से मोती का, मनुष्य का और जल (पानी) न रहने से आटा किसी काम का नहीं रहता।

विशेष :

  1. पानी अर्थात् इज्जत मनुष्य के लिए, पानी अर्थात् चमक मोती के लिए और पानी अर्थात् जल आटे को गूंथने के लिए जरूरी है। मान-मर्यादा और सम्मान के बिना मनुष्य, चमक के बिना मोती तथा जल के बिना सूखा आटा सब बेकार है।
  2. भाषा आम बोलचाल की है।
  3. अनुप्रास तथा श्लेष अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण तथा शांत रस हैं।
  5. संगीतात्मकता विद्यमान है।

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग-पतार।
आप तो कहि भीतर भयी, जूती खात कपार॥10॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
जिह्वा = जीभ। बावरी = पगली। सरग = स्वर्ग। पतार = पाताल। कपार = सिर।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने जीभ की महिमा का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि मनुष्य की जीभ बड़ी पगली है। वह स्वर्ग से लेकर पाताल तक की सभी बातें कह जाती हैं। मनुष्य का अपनी जीभ पर नियन्त्रण नहीं होता है। जीभ अच्छी बुरी बात कहकर स्वयं तो मुंह के अन्दर चली जाती है और जिनके विषय में बुरा-भला कहा होता है उनकी मार सिर को खानी पड़ती है।

विशेष :

  1. मनुष्य को अपनी जुबान पर संयम रखना चाहिए।
  2. भाषा आम बोलचाल की है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण तथा शांतरस है।
  5. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

होइ न जाकी छाँह ढिग, फल रहीम अति दूर।
बाढ़ेउ सो बिनु काज ही, जैसे तार-खजूर॥11॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
छाँह = छाया। ढिग = पास में। अति = बहुत । तार = ताड़ का वृक्ष।

प्रसंग :
यह दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि का बड़े होने से अभिप्राय यह है कि पहुंच से दूर किसी अच्छी वस्तु का भी कोई लाभ नहीं होता।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि जिस पेड़ की छाया पास नहीं होती और उस पर फल भी बहुत ऊंचे लगते हों तो उस पेड़ का फलदार होना व्यर्थ है। जिसकी छाया या फल लोगों की पहुंच से दूर होते हैं उनका बड़ा होना व्यर्थ है। जो किसी भी काम नहीं आते जैसे ताड़ और खजूर के पेड़ हैं। ताड़ और खजूर के पेड़ ऊँचाई में बहुत बड़े होते हैं परन्तु न तो उसकी छाया काम आती है और उसका फल लोगों की पहुंच से दूर होता है।

विशेष:

  1. उन लोगों का बड़ा होना व्यर्थ है जो किसी के भी काम नहीं आते।
  2. भाषा आम बोलचाल की है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

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नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत-समेत।
ते रहीम पसु ते अधिक, रीझेहु कछू न देत॥12॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
नाद = शब्द, संगीत। मृग = हिरण। हेत = हित। पसु = पशु। रीझेहु = प्रसन्न होकर।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि न उन लोगों का वर्णन किया है जो दूसरों के गुणों पर प्रसन्न होने के बाद भी पुरस्कार स्वरूप भी कुछ नहीं देते।।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि वीणा की मधुर ध्वनि पर प्रसन्न होकर हिरण जैसा पशु भी अपना शरीर त्यागने को तैयार हो जाता है, मनुष्य प्रसन्न होकर दूसरे के भले के लिए अपना सारा धन दे देता है। रहीम जी के अनुसार वे लोग पशु के समान हैं जो दूसरों के गुणों पर रीझने और प्रसन्न होने पर भी पुरस्कार स्वरूप किसी को कुछ नहीं देते।

विशेष :

  1. जो लोग प्रसन्न होकर दूसरों को कुछ देते हैं उन लोगों का जीना अच्छा रहता है लेकिन जो लोग प्रसन्न होने पर भी किसी को कुछ नहीं देते, वे लोग पशु के समान हैं।
  2. कवि की ब्रज भाषा आम बोलचाल की है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. शांत रस है।
  5. गेयता का गुण विद्यमान है।

रहिमन अँसुआ नयन ढरि, जिय दःख प्रकट करेड़।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ ॥13॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
ढरि = ढलकना। नयन = आँखों से। जिय = मन, हृदय। जाहि = जिसे। निकारो = निकालो। गेह ते = घर से। कस = क्यों।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने उन लोगों का वर्णन किया है जो घर से निकाले जाने पर घर का भेद दूसरों पर प्रकट कर देते हैं।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि आंखों से निकले आँसू मनुष्य के दिल की हर बात कह देते हैं। मनुष्य के आंसू उसके सुख या दुःख को छिपा नहीं पाते। जैसे घर से निकाला गया मनुष्य, घर के सारे भेद कैसे एक-एक करके प्रकट कर देता है। आंख के आंसू तथा घर से निकाला गया मनुष्य दोनों ही अन्दर के भेद बाहर प्रकट कर ही देते हैं।

विशेष :

  1. यदि कोई बात दूसरों पर प्रकट करनी हो तो आंख के आंसू और घर से निकाला गया मनुष्य इस काम को अच्छी तरह से पूरा कर देते हैं।
  2. ब्रज भाषा सरल, सहज एवं आम बोलचाल की है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. शांत रस है।
  5. गेयता का गुण है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पियत अघाइ॥
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पियासो जाई॥14॥

कठिन शब्दों के अर्थ-पंक = कीचड़। लघु = छोटा। जिय = हृदय में। आघाई = तृप्त होना।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने छोटे होने की भी महत्ता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि तालाब में कीचड़ युक्त पानी भी धन्य है जो छोटे होने पर भी लोगों की प्यास बुझाता है परन्तु समुद्र आकार में बड़ा है। उसका पानी खारा होने के कारण वह लोगों की प्यास बुझाने में असमर्थ है और लोग वहां से प्यासे लौटते हैं। बड़ा होने पर भी खारे पानी की उपस्थिति के कारण सारा संसार उसे पीकर अपनी प्यास नहीं बुझा सकता और प्यासा ही रह जाता है। ऐसे बड़प्पन का भी क्या लाभ जो दूसरों के सुख का कारण नहीं बनता।

विशेष :

  1. कभी-कभी बड़ा होना महत्त्वपूर्ण नहीं है। क्योंकि जो काम करने में वह असमर्थ है वह छोटी-सी वस्तु कर देती है।
  2. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमय है।
  3. तत्सम और तद्भव शब्दावली है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

रहिमन राज सराहिये, ससि सम सुखद जो होइ।
कहा बापुरो भानु है तपै तरैयनि खोइ ॥15॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
राज = शासन। सराहिये = प्रशंसा करो। ससि सम = चन्द्रमा के समान। भानु = सूर्य। बापुरो = बेचारा। तरैयनि = नदियां।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने शांत रहने की महत्ता का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि शासक वह अच्छा है जो चन्द्रमा के समान सुख प्रदान करता है। जिस प्रकार चन्द्रमा की शीतलता मनुष्य को शांति प्रदान करती है उसी प्रकार अच्छे शासक की प्रजा भी सुख से रहती है और एक बेचारा सूरज है जो अपनी गर्मी से नदियों के जल को सुखा देता है। क्रोधी स्वभाव वाले शासक की प्रजा सदा दुःखी रहती है।

विशेष :

  1. चन्द्रमा और सूरज के द्वारा मनुष्य को समझाया गया है कि चन्द्रमा के समान शांत रहने से ही वह प्रशंसा का पात्र बन सकता है।
  2. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है।
  3. तत्सम और तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

ज्यों रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोइ।
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होइ॥16॥

कठिन शब्दों के अर्थ : कपूत = बुरा पुत्र। बारे = जलने पर। उजियारो = उजाला।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इन पंक्तियों में कवि ने कपूत की तुलना उस दीपक से की है जिसके बुझने से उसके नीचे ही अँधेरा छा जाता है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि वंश में पैदा हुआ कपूत उस दीपक की तरह है जो जलने पर उजाला तो देता है । पुत्र के पैदा होने पर घर में खुशियों का उजियारा फैल जाता है परन्तु जब दीपक की ज्योति बढ़ जाती है अर्थात् बुझ जाती है तो चारों ओर अँधेरा छा जाता है। उसी प्रकार पुत्र के बड़े होने पर कपूत निकलने पर कुल में परिवार में अंधेरा छा जाता है।

विशेष :

  1. एक पुत्र ही घर का नाश कर देता है या फिर उसे दीपक की रोशनी की तरह संसार में चमका देता है।
  2. भाषा सरल है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास, श्लेष अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण है।

माँगे घटत रहीम पद, कितौ करौ बड़काम।
तीन पैंड बसुधा करी, तऊ बावनै नाम17॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
पद = पदवी। कितौ = कितना ही। पैंड = कदम। बसुधा = धरती। बावनै = छोटा कद।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इन पंक्तियों में कवि ने मांगने वाले को छोटा बताया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि मनुष्य के द्वारा किसी से भी कुछ मांगने पर उसकी पदवी कम हो जाती है। वह मनुष्य चाहे कितना बड़ा ही काम क्यों न करे, बड़े से बड़ा मनुष्य जब मांगने पर आता है तो उसे भी नीचा होना पड़ता है जैसे भगवान विष्णु ने वामन अवतार में राजा बलि से तीन पैर धरती मांगी थी और उन्होंने तीन पैर में पूरा ब्रह्मांड नाप लिया था उनके जैसा महान कार्य और दूसरा नहीं कर सकता था परन्तु फिर भी उन्हें वामन नाम से जाना जाता रहा है।

विशेष :

  1. मांगने वाला मनुष्य कितना ही बड़ा काम क्यों न कर ले, वह मांगने के कारण छोटा ही रहेगा।
  2. भाषा सरल, सहज एवं सरस है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

रहिमन मनहि लगाई कै,देख लेहु किन कोय।
नर को बस करबिो कहा, नारायण बस होय॥18॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
किन कोय = चाहे कोई। नारायण = प्रभु, ईश्वर। प्रस्तुत-प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ में से लिया गया है। इसमें में कवि ने मन को एकाग्र करके प्रभु को प्राप्त करने के लिए कहा है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि कोई भी इसे देख ले; परख ले कि यदि कोई व्यक्ति मन लगाकर काम करता है तो वह मनुष्य को नहीं अपितु प्रभु को भी अपने वश में कर सकता है, प्राप्त कर सकता है।

विशेष :

  1. एकाग्रचित और प्रेमपूर्वक व्यवहार करने वाले मनुष्य के सभी कार्य सफल होते हैं।
  2. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है।
  3. तत्सम और तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुन अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लेहैं कोई ॥19॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
व्यथा = दु:ख। गोय = गुप्त, छिपाकर। अठिलैहैं = हँसी-मजाक करना।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने अपने दुःखों को दूसरों के सामने प्रकट करने से मना किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि अपने मन के दुःखों को मन ही मन में छिपाकर रखना अच्छा होता है। यदि लोगों के सामने अपने दुःखों को सुनाओगे तो वे उन्हें सुनकर दुःख बांटने की अपेक्षा उनका मजाक उड़ाएंगे, अपना दुःख सदा छिपाकर रखना चाहिए। कोई भी किसी के दुःख को बांटने को तैयार नहीं होता।

विशेष :

  1. अधिकतर व्यक्ति दुःखों के नहीं अपितु सुखों के साथी होते हैं इसलिए हमें अपना दुःख दूसरों से छिपाकर रखना चाहिए।
  2. भाषा सरल है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

कदली, सीप, भुजंग-मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसे संगति बैठिये, तैसोई फल दीन ॥20॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
कदली = केले का वृक्ष। सीप = मोती। भुजंग = साँप। स्वाति = नक्षत्र।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ से लिया गया है। इसमें कवि ने संगति के परिणाम का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि केले का पेड़, सीप और साँप का मुख-ये तीनों एक-दूसरे से अलग अलग हैं। स्वाति नक्षत्र में बरसी हुई वर्षा की एक बूंद यदि केले के पत्ते पर पड़ती है तो वह कर्पूर बन जाती है; सीप के खुले मुख में जाती है मोती बन जाती है और यदि सांप के मुख में जाती है तो विष बन जाती है। इस प्रकार स्वाति नक्षत्र में बरसी किसी एक बूंद के गुण तीन हैं परन्तु वह जैसी संगति में जाती है वैसा ही रूप धारण कर लेती है।

विशेष :

  1. मनुष्य जैसी संगति में बैठता है वह वैसे ही अच्छे बुरे. गुण धारण कर लेता है।
  2. भाषा सरल एवं सहज है।
  3. तत्सम तद्भव शब्दावली है।
  4. श्लेष अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।
  8. काव्य रूढ़ि का प्रयोग किया गया है।

कमला थिर न, रहीम कहि, यह जानत सब कोई।
पुरुष पुरातन की वधू, क्यों न चंचला होई॥21॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
कमला = लक्ष्मी, धन की देवी। थिर न = एक जगह टिक कर नहीं रहती। पुरुष पुरातन = बूढ़ा व्यक्ति, भगवान विष्णु। वधू = पत्नी। चंचला = धन की देवी लक्ष्मी।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने धन को देवी लक्ष्मी को चंचला कहा है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि सब जानते हैं कि लक्ष्मी जी धन की देवी है जो एक जगह टिक कर कभी भी नहीं रहती है। जैसे किसी बूढे पुरुष की जवान पत्नी चंचल होती है और वह एक जगह स्थिर नहीं रहती है। भगवान विष्णु की पत्नी होने के कारण लक्ष्मी को चंचला कहा गया है।

विशेष :

  1. चंचल प्रकृति वाले मनुष्य या वस्तु को आप अधिक देर तक एक स्थान पर नहीं रोक सकते।
  2. भाषा सरल है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

जो रहीम ओछो बढै, तो अति ही इतराइ।
प्यादा सों फरजी भयो, टेढ़ी-टेढ़ी जाइ॥22॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
ओछौ = नीच व्यक्ति। इतिराइ = इतराना, घमण्ड करना। प्यादा = शतरंज के खेल की गोट। फर्जी = शतरंज के खेल की गोट-घोड़ा।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने निम्न व्यक्ति को सम्मान देने पर उसकी चाल बदलने का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि जब किसी छोटे व्यक्ति को सम्मान मिलता है तो उसमें घमंड आ जाता है। दूसरों को अपने से छोटा समझने लगता है। जैसे शतरंज के खेल में छोटा-सा प्यादा जब फरजी बन जाता है तो वह घोड़े के समान टेढ़ा-मेढ़ा चलने लगता है।

विशेष :

  1. छोटे व्यक्ति को सम्मान मिलने पर उसे घमण्ड नहीं करना चाहिए।
  2. भाषा सरल है। आम बोलचाल की भाषा है।
  3. पुनरुक्ति प्रकाश, उदाहरण अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

रहिमन सूधी चाल सो, प्यादो होत वजीर।
फरजी मीर न लै सके, गति टेढ़ी तासीर ॥23।।

कठिन शब्दों के अर्थ :
सूधी चाल = सीधी चाल। तासीर = गुण, असर।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने मनुष्य को अपनी चाल सीधी रखने के लिए कहा है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि शतरंज के खेल में प्यादा सीधी चाल चलने के कारण वजीर बन जाता है और जब प्यादा घोड़ा बन जाता है तो उसकी चाल टेढ़ी हो जाती है जिसके कारण वह वजीर नहीं बन पाता है। मनुष्य को जितना मिले उतने में ही शांति रखनी चाहिए नहीं तो मिला हुआ भी समाप्त हो जाता है।

विशेष :

  1. छोटा व्यक्ति अपने गुणों से बड़ा बन जाता है। परन्तु उस समय उसे अपना स्वभाव नहीं बदलना चाहिए। नहीं तो मिला हुआ सम्मान चला जाता है।
  2. भाषा सरल एवं स्वाभाविक है। आम बोलचाल की भाषा है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. शांत रस है।
  5. गेयता का गुण है।

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काज परे कछु और है, काज सरे कछु और।
रहिमन भाँवरि के परे, नदी सिरावत मौर॥24॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
काज = काम। सरे = पूरा होने पर। सिरावत = प्रवाहित करना।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने संसार के चाल चलन का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि संसार में काम पड़ने पर व्यक्ति का स्वभाव भिन्न प्रकार का हो जाता है और काम पूरा हो जाने पर वह किसी और प्रकार का हो जाता है। जब मनुष्य को किसी से काम पड़ता है तो वह उसकी मिन्नतें करता है और जब काम पूरा हो जाता है तो वह परवाह भी नहीं करता और अपना मुंह भी नहीं दिखाता है। रहीम जी ने उदाहरण देते हुए कहा कि विवाह के समय दूल्हे के सिर पर सजा मोर मुकुट भांवर (फेरे और सप्तपदी) तक बहुत सहेज-सम्भाल कर रखा जाता है पर विवाह होने के शीघ्र बाद ही उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

विशेष :

  1. संसार का नियम है कि जब किसी को ज़रूरत पड़ती है तो वह आगे-पीछे चक्कर काटता है परन्तु जब उसका काम निकल जाता है तो वह दिखाई भी नहीं पड़ता।
  2. भाषा स्वाभाविक है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास, उदाहरण अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण, शांत रस एवं गेयता का गुण विद्यमान है।

आवत काज, रहीम कहि, गाढ़े बन्धु सनेह।
जीरन होत न पेड़ ज्यों, थामै बरहि बरेह ॥25॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
काज = काम। आवत = आना। गाढ़े = मुसीबत, संकट। बन्धु = साथी। जीरन = कमज़ोर, पुराना। बरेह-वट वृक्ष की डालों से भूमि तक आने वाली जटाएँ जो पुराने हो जाने पर वट वृक्ष को सहारा देती हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ से लिया गया है। इसमें कवि कहता है कठिनाई में अपने ही साथ देते हैं।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि जीवन में विपत्ति आ जाने पर अपने सगे-सम्बन्धी और मित्र ही काम आते हैं। वही कष्टों-विपत्तियों से मुक्ति पाने में सहायक सिद्ध होते हैं। बरगद (वट) वृक्ष भी भूमि तक लटककर नीचे आने वाली हवाई जटाएं ही उसके मूल तने के कमजोर हो जाने पर आंधियों तूफ़ानों से उसकी रक्षा करती हैं और उसे गिरने से बचा लेती हैं।

विशेष :

  1. कष्ट के समय अपने ही साथ देते हैं और मुसीबत से बचा लेते हैं।
  2. भाषा सरल एवं स्वाभाविक है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

दादुर मोर किसान मन, लग्यो रहै घन माहिं।
रहिमन चातक-रटनि कै, सरवरि को कोउ नाहि ॥26॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
दादुर = मेंढक। घन = बादल। रटनि = पुकारा। सरवरि = तालाब।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने सभी लोग अपने-अपने स्वार्थ को देखते हैं,का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि मेंढक, मोर और किसान का मन बादलों में लगा रहता है। तीनों पानी से भरे बादलों की प्रतीक्षा अपने-अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। किन्तु चातक की पुकार से सरोवर को कोई लेना देना नहीं

विशेष :

  1. मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति करके प्रसन्न होता है। उसे दूसरों के सुख-दुःख से कोई लेना-देना नहीं है।
  2. भाषा सरल है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

मन सो कहाँ रहीम प्रभु, दुग सो कहाँ दिवान।
देखि दृगन जो आदरै, मन तेहि हाथ बिकान ॥27॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
दुगन = आंखों। हाथ बिकान = बिक जाना, वश में होना।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने प्रभु को वश में करने का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि मानव के मन में कैसा भाव-विचार होगा-यह उस पर प्रायः निर्भर नहीं करता। वह ईश्वर की ओर लगता है या नहीं, यह उस के मन पर निर्भर नहीं करता अपितु आँखों पर निर्भर करता है। कवि ने मन को राजा और आँख को दीवान की उपमा देकर कहा है कि जिस प्रकार मन्त्री के परामर्श से राजा काम करता है उसी प्रकार आँख के प्रिय को मन भी अपनाता है; उसी को स्वीकार कर लेता है। भाव है कि मनुष्य अधिकतर आँखों देखी बात पर शीघ्रता से विश्वास कर लेता है।

विशेष :

  1. मनुष्य अपनी आँखों देखी बातों को मन में अधिक जल्दी बिठा लेता है और उन्हीं पर विश्वास करने लगता है।
  2. भाषा सरल है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है शांत रस है।
  6. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

जो रहीम करिबौ हतौ, ब्रज को इहै हवाल।
तो काहे कर पर धरयौ, गोवर्धन गोपाल ॥28॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
इहै = यह। हवाल = वर्तमान अवस्था। कर = हाथ। गोवर्धन = एक पर्वत जिसे ब्रजवासियों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने एक उंगली पर धारण किया था।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ के दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने काम करने की महिमा का वर्णन किया है।

व्याख्या:
रहीम जी श्रीकृष्ण के वियोग से पीड़ित ब्रजवासियों से कहते हैं कि यदि श्रीकृष्ण ने ब्रज-क्षेत्र की हालत को वास्तव में ही दुखदायी बनाना था तो वे गाँवों के रक्षक श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ पर उठाकर उसकी इन्द्र के प्रकोप से रक्षा ही न करते। श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की इन्द्र के क्रोध से रक्षा की थी। उन्होंने ब्रज क्षेत्र के वासियों को सुख दिया था न कि दुःख।

विशेष :

  1. भाषा सरल एवं सरस है।
  2. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।
  4. प्रसाद गुण एवं शांत रस है।
  5. गेयता का गुण है।

हरि रहीम ऐसी करी, ज्यों कमान सर पूरि।
बैंचि आपनी ओर को, डारि दियो पुनि दूरि॥29॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
हरि = ईश्वर। सर = तीर।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ में से लिया गया है। इसमें कवि ने ईश्वर की व्यवस्था का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था की है जैसे तीर और कमान के साथ है। कमान अथवा धनुष की डोरी को जितना ही हम अपनी ओर खींचते हैं तीर उतनी ही दूर जाकर गिरता है अर्थात् जितना हम मोह माया में खींचते जाते हैं उतने ही ईश्वर से दूर हो जाते हैं।

विशेष :

  1. ईश्वर ने मनुष्य के स्वभाव के अनुसार व्यवस्था कर रखी है।
  2. मनुष्य जितनी मोह माया में उलझता है उतना ही ईश्वर से दूर हो जाता है।
  3. ब्रज भाषा का प्रयोग है।
  4. तद्भव शब्दावली का अधिकता से प्रयोग किया गया है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

सर सूखे पंछी उहै, और सरन्ह समाहिं।
दीन मीन बिन पच्छ के, कह रहीम कहँ जाँहि ॥30॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
सर = तालाब। मीन = मछली। पच्छ = पंख।

प्रसंग :
प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा लिखित ‘रहीम सतसई’ में से लिया गया है। इसमें कवि ने असमर्थ प्राणियों का वर्णन किया है।

व्याख्या :
रहीम जी कहते हैं कि सरोवर के सूख जाने पर पक्षी किसी दूसरे सरोवर पर चले जाते हैं परन्तु सूखे सरोवर की मछलियां बहुत लाचार हैं; दीन हैं। वे तो उड़कर कहीं जा भी नहीं सकतीं। इसका कारण यह है कि उनके पंख नहीं हैं। उन्हें तो मृत्यु प्राप्ति तक वहीं तड़पना है।

विशेष :

  1. असमर्थ प्राणी अपनी असमर्थता के कारण स्वयं को लाचार अनुभव करता है।
  2. भाषा सरल है।
  3. तत्सम एवं तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण है।

दोहे Summary

दोहे जीवन परिचय

रहीम जी का जन्म सन् 1553 में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्दुर्ररहीम खानखाना था। वे मुग़ल सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक थे। उनके पिता बैरमखां अकबर के अभिभावक थे। रहीम जी अकबर के दरबारी कवि ही नहीं थे अपितु सेनापति और मंत्री भी रहे थे। अकबर की मृत्यु के बाद जहांगीर ने भी इन्हें अपना सेनानायक और जागीरदार बनाया था। परन्तु राजनैतिक कुचक्रों ने भी उन्हें बड़ा परेशान किया था। उन्हें जहाँगीर को लड़ाई में धोखा देने का झूठा आरोप भी सहना पड़ा था और कुछ समय तक कारावास का दंड भुगतना पड़ा था। उनके जीवन का अन्त अत्यन्त गरीबी में हुआ। इनकी मृत्यु सन् 1627 में हुई।

रहीम जी की रचनाओं में रहीम सतसई, बरवै नायिका भेद, शृंगार सोरठ, मदनाष्टक, रासपंचाध्यायी, नगर शोभा, फुटकल बरवै, फुटकल सवैये प्रसिद्ध हैं। वे जन्म से मुसलमान थे परन्तु उन्होंने भगवान् कृष्ण के संबंध में पूर्ण भक्ति-भाव से युक्त रचनाएं प्रस्तुत की थीं। उनके नीति सम्बन्धी दोहे भी अद्वितीय हैं। उनके दोहे केवल उपदेशप्रद ही नहीं, काव्य गुणों से भी सम्पन्न हैं।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 4 दोहे

दोहों का सार

रहीम जी ने अपने द्वारा रचित दोहों में जीवन से संबंधित तरह-तरह के गहन संकेत दिए हैं। उन्होंने जीवन के सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभव को बहुत कम शब्दों में व्यक्त है। उनके अनुसार मनुष्य ईश्वर की खोज में इधर-उधर भटकता रहता है जबकि ईश्वर तो स्वयं अपनी बनाई सृष्टि की सभी रचनाओं की देखभाल करते हैं। मनुष्य तो मनुष्य पशु भी ईश्वर की प्राप्ति के लिए उनके भक्तों के चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाने को तत्पर हैं। प्रेमपूर्वक खिलाई गई चने की रोटी भी अच्छे से अच्छे पकवान से उत्तम है। रहीम जी मानते हैं कि मांगने वाले से पहले वे लोग मृत के समान हैं जो होते हुए भी मांगने वाले को देने से इनकार कर देते हैं।

मनुष्य को सदा अच्छे लोगों की संगति करनी चाहिए। मनुष्य को अपनी जिह्वा को नियन्त्रित करना आना चाहिए नहीं तो बेकाबू जिह्वा के कारण भरे बाज़ार में अपनी इज्जत गंवानी पड़ती है। बड़े के आगे छोटे की महत्ता से इनकार नहीं करना चाहिए क्योंकि कई बार छोटी-सी वस्तु के आगे बड़ेबड़े हार मान जाते हैं। सूरज की गर्मी से जहां सभी लोग परेशान होते हैं वही चन्द्रमा की शीतलता सभी को शांति प्रदान करती है । कपूत कुल के नाश का कारण बनता है। मांगने वाला कितना ही बड़ा क्यों न हो वह छोटा ही रहता है। काम के प्रति लगन भी असम्भव काम को सम्भव कर देती है। रहीम जी मानते हैं कि अपने गुणों के कारण छोटा-सा प्यादा भी वजीर बन जाता है। संसार के नियम बड़े अनोखे हैं जब किसी को कोई काम पड़ता है तो वह गिड़गिड़ाने लगता है परन्तु काम निकल जाने पर पूछता भी नहीं है। सच्ची भक्ति से प्रभु को भी वश में किया जा सकता है। समय पड़ने पर असमर्थ प्राणी के विषय में कोई नहीं सोचता।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 9 दोहा अंत्याक्षरी

Punjab State Board PSEB 6th Class Hindi Book Solutions Chapter 9 दोहा अंत्याक्षरी Textbook Exercise Questions and Answers.

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Hindi Guide for Class 6 दोहा अंत्याक्षरी Textbook Questions and Answers

भाषा-बोध

1. शब्दार्थशब्दों के अर्थ दोहों के साथ में दिए गये हैं।

रक्षा-बंधन = राखी का त्योहार
प्रवेश = अन्दर आना
अवगत = परिचित होना
अंत्याक्षरी = अन्तिम अक्षर से शुरू होने वाला खेल
उत्साहित = उत्साह से भरपूर
जड़मति = मूर्ख
रसरी = रस्सी
कुम्हार = घड़े बनाने वाला
मुक्ताहार = मोतियों की माला
कुम्भ = घड़ा
पर्व = उत्सव
मनोभाव = मन के भाव
युक्ति = उपाय
शुभारम्भ = अच्छे ढंग से शुरू करना
सुजान = सज्जन
सिल = पत्थर
शिष = शिष्य
खोट = दोष

2. वचन बदलो

1. लड़के = ……………….
2. बच्चों = ……………….
3. कवियों = ……………
4. सदस्यों = ……………….
5. मित्रों = …………………
6. लड़कियाँ = ………………..
7. दोहे = ………………..
8. आवाज़ों = ………………
उत्तर:
बहुवचन = एकवचन
1. लड़के = लड़का
2. बच्चों = बच्चा
3. कवियों = कवि
4. सदस्यों = सदस्य
5. मित्रों = मित्र
6. लड़कियाँ = लड़की
7. दोहे = दोहा
8. आवाज़ों = आवाज़

3. लिंग बदलो

1. कवि = ………………..
2. सदस्य = ………………..
3. गुरु = ………………
4. कुम्हार = …………………..
5. शिष्य = …………………
उत्तर:
पुल्लिग = स्त्रीलिंग
1. कवि = कवयित्री
2. सदस्य = सदस्या
3. गुरु = गुरुआनी
4. कुम्हार = कुम्हारिन
5. शिष्य = शिष्या

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 9 दोहा अंत्याक्षरी

4. विपरीत शब्द लिखो

1. अवकाश = ………………..
2. उपस्थित = ……………….
3. रुचि = …………………..
4. उत्साहित = ……………….
5. प्रेम = ………………..
6. समाप्त = ………………..
7. सुख = …………………..
8. जड़मति = ………………
9. लघु = …………………
उत्तर:
1. अवकाश = अनावकाश
2. उपस्थित = अनुपस्थित
3. रुचि = अरुचि
4. उत्साहित = अनुत्साहित
5. प्रेम = घृणा
6. समाप्त = आरम्भ
7. सुख = दुःख
8. जड़मति = कुशाग्र बुद्धि, सुजान
9. लघु = गुरु

5. पर्यायवाची लिखो

1. मीन = …………………
2. तलवार = …………….
3. हाथ = ………………..
4. धागा = ………………
5. गुरु = ……………….
6. बास = ……………….
7. कुम्भ = ………………
8. उपकार = ……………….
उत्तर:
1. मीन = मछली, मत्स्य
2. तलवार = असि, चंद्रहास
3. हाथ = कर, पाणि
4. धागा = सूत, सूत्र
5. गुरु = अध्यापक, विद्यादाता
6. बास = बदबू, दुर्गन्ध
7. कुम्भ = घड़ा, मटका
8. उपकार = भला, कल्याण

6. पढ़ो और समझो

रसरी = रस्सी
निसान = निशान
आवत = आना
धोय = धोना
बाँटन = बाँटना
गढ़ि-गढ़ि = गढ़ना
काढ़े = निकालना
मनाइए = मनाना
पौइए = पिरोना
बड़ेन = बड़ों
डार = डालना
तोरो= तोड़ना
जुरै = जुड़ना
गाँठि = गाँठ।
उत्तर:
ऊपर तत्सम शब्दों के तद्भव रूप लिखे गए हैं। विद्यार्थी इन्हें भली प्रकार से जानें।

7. वाक्य बनाओ।

1. पर्व = …………….
2. रुचि = ……………
3. अंत्याक्षरी = …………………
4. अभ्यास = ……………..
5. खुसर-पुसर = ………………
6. अवकाश = ……………..
उत्तर:
1. पर्व = त्योहार = दीपावली मेरा प्रिय पर्व है।
2. रुचि = दिलचस्पी = खेलों में मेरी बहुत रुचि है।
3. अंत्याक्षरी= अन्तिम अक्षर से आरम्भ नया अक्षर = अध्यापिका ने कक्षा में आते ही कहा, “आओ बच्चों, अंत्याक्षरी खेलें।”
4. अभ्यास = बार-बार का प्रयास = मैंने खूब अभ्यास करके गेंदबाजी में निपुणता प्राप्त की है।
5. खुसर-पुसर = बहुत धीमे स्वर में आपस में बातें करना = कक्षा में बच्चे अध्यापक को देखकर खुसर-पुसर करने लगे।
6. अवकाश = छुट्टी = आज विद्यालय में अवकाश है।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 9 दोहा अंत्याक्षरी

 विचार-बोध

(क)
प्रश्न 1.
कक्षा में बहुत से विद्यार्थी अवकाश पर क्यों थे ?
उत्तर:
रक्षाबन्धन के पर्व के कारण कक्षा में बहुत से विद्यार्थी उस दिन अवकाश पर थे।

प्रश्न 2.
विद्यार्थी किस अंत्याक्षरी की खुसर-पुसर करने लगे ?
उत्तर:
विद्यार्थी फिल्मों की अंत्याक्षरी के लिए खुसर-पुसर करने लगे।

प्रश्न 3.
मूर्ख सुजान कैसे बन सकता है ? दोहे के आधार पर लिखें।
उत्तर:
अभ्यास के बल पर मूर्ख भी सुजान बन सकता है।

प्रश्न 4.
उपकारी का स्वभाव कैसा होता है ?
उत्तर:
उपकारी का स्वभाव दूसरों का भला करने वाला होता है।

प्रश्न 5.
गुरु और कुम्हार के काम में क्या समानता होती है ?
उत्तर:
गुरु और कुम्हार दोनों ही अपने-अपने कार्य को (विद्यार्थी और मिट्टी को) तब तक गढ़ते रहते हैं जब तक वह पूरी तरह घड़ा नहीं जाता।

प्रश्न 6.
सज्जनों की तुलना किससे की गई है ?
उत्तर:
सज्जनों की तुलना मुक्ता मोतियों से की गई है।

प्रश्न 7.
‘हर वस्तु का अपने-अपने स्थान पर महत्त्व होता है।’ पाठ से चुनकर वह दोहा लिखें।
उत्तर:
रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजै डार। – जहां काम आवे सुई, का करे तलवार ॥

प्रश्न 8.
‘रहिमन धागा ………. गांठि परि जाए।’ इस दोहे का अर्थ लिखें।
उत्तर:
रहीम जी कहते हैं कि आपसी प्रेम के सम्बन्धों को जरा-जरा सी बात पर तोड़ नहीं देना चाहिए क्योंकि एक बार जो सम्बन्ध टूट जाते हैं वे दोबारा नहीं बनते और यदि बन भी जाएं तो फिर भी उसमें एक गांठ पड़ जाती है।

(ख)
प्रश्न 1.
अंत्याक्षरी में गाए जाने वाले दोहों से आपने क्या सीखा, अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
अंत्याक्षरी में गाए गए दोहे हमें सिखाते हैं कि प्रत्येक कार्य में अभ्यास के बल पर निपुणता पाई जा सकती है। मन सदा पवित्र रहना चाहिए। अच्छे व्यक्तियों के साथ सदा अच्छाई मिलती है। अच्छे व्यक्तियों से सम्बन्ध नहीं तोड़ना चाहिए।

प्रश्न 2.
दोहा अंत्याक्षरी के अतिरिक्त ओर कौन-कौन सी अंत्याक्षरी खेली जा सकती
उत्तर:
दोहा अंत्याक्षरी के अतिरिक्त सिनेमा, व्यक्तियों, स्टेशनों आदि के नामों की अंत्याक्षरी, फ़िल्मी गानों की अंत्याक्षरी, शब्दों की अंत्याक्षरी आदमियों के नामों की अंत्याक्षरी भी खेली जा सकती है।

आत्म-बोध

1. पाठ के सभी दोहों के अर्थ समझाते हुए कंठस्थ करें।
2. संत कबीर, रहीम और बिहारी के दोहों का संकलन करें।
3. वर्तमान युग के सन्दर्भ में नए दोहों की रचना करें।
उत्तर:
विद्यार्थी इनके लिए स्वयं प्रयास करें।

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बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
मूर्ख मनुष्य भी किसके द्वारा ज्ञानी बन जाता है ?
(क) अभ्यास
(ख) व्यास
(ग) निराशा
(घ) आशा।
उत्तर:
(क) अभ्यास

प्रश्न 2.
गुरु किसके समान अपने शिष्यों के दोष दूर करते हैं ?
(क) लुहार के
(ख) कुम्हार के
(ग) ईश्वर के
(घ) प्रभु के
उत्तर:
(ख) कुम्हार के

प्रश्न 3.
रहीम जी किसका धागा न तोड़ने की सलाह देते हैं ?
(क) प्रेम का
(ख) ईर्ष्या का
(ग) शैतानी का
(घ) पुण्य का
उत्तर:
(क) प्रेम का

प्रश्न 4.
शिष्य किसके समान है ?
(क) बच्चे के
(ख) कुम्भ के
(ग) भविष्य के
(घ) पौरूष के
उत्तर:
(ख) कुम्भ के

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से ‘मीन’ का पर्याय है:
(क) मछली
(ख) सजली
(ग) उजली
(घ) कुजली
उत्तर:
(क) मछली

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कल्याण का पर्याय शब्द है :
(क) कल्याणकारी
(ख) उपकार
(ग) सत्कार
(घ) गीतकार
उत्तर:
(ख) उपकार

दोहों के सरलार्थ

1. करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात के सिल पर परत निसान।

शब्दार्थ:
करत-करत = करते करते । जड़मति = मूर्ख। सुजान = ज्ञानवान्। रसरी = रस्सी। आवत = आना। जात = जाना। सिल = पत्थर। परत = पड़ जाते हैं।

सरलार्थ:
कविवर रहीम जी कहते हैं कि अभ्यास करते रहने से, निरन्तर परिश्रम करते रहने से धीरे-धीरे मूर्ख मनुष्य भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है। जैसे कुएँ की सिल पर निरन्तर रस्सी के आने-जाने से पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं। ऐसे ही निरन्तर अभ्यास से मूर्ख आदमी विद्वान् बन जाता है।

भावार्थ:
निरन्तर अभ्यास करने से कठिन काम भी किया जा सकता है।

2. ‘नहाये धोये क्या भया, जो मन का मैल न जाय।
मीन सदा जल में रहे, धोय बास न जाय॥’

शब्दार्थ:
नहाये = नहाना। धोये = धोना। भया = होना। मीन = मछली। धोय = धोना। बास = दुर्गन्ध।

सरलार्थ:
कविवर रहीम जी कहते हैं कि हे मनुष्य ! नहा धोकर बाहरी शरीर को साफ कर लेने से भी क्या लाभ यदि तेरे मन का मैल मिटा ही नहीं। मछली चाहे हमेशा जल में ही रहती है लेकिन फिर भी दिन रात पानी में धुलते रहने पर भी उसके शरीर से बदबू तो नहीं जाती। कवि का अभिप्राय है कि मन में स्वच्छता-पवित्रता होनी चाहिए। मन निर्मल होना चाहिए।

भावार्थ:
मानव मन में सदा पवित्रता और स्वच्छता के भाव रहने चाहिए।

3. ‘यो रहीम सुख होत है, उपकारी के संग।
बॉटन बारे को लगे, ज्यों मेंहदी के रंग ।।’

कठिन शब्दों के अर्थ:
सुख = लाभ, भला। उपकारी = उपकार (भला) करने वाला। बाँटन बारे = बाँटने वाले।

सरलार्थ:
रहीम जी कहते हैं कि उपकारी, दूसरों का भला करने वाले आदमियों की संगति करने से बड़ा सुख, लाभ मिलता है ठीक वैसे ही जैसे मेंहदी पीसने वाले के हाथों में भी मेंहदी का रंग स्वतः ही चढ जाता है।

भावार्थ:
परोपकारी व्यक्ति को अपने आप ही लाभ प्राप्त हो जाता है।

4. ‘गुरु कुम्हार सिस कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारै चोट ।’

कठिन शब्दों के अर्थ:
गढ़ि = बनाना। का? = निकालना । खोट = कमी। अंतर = भीतर। सहार = सहारा। कुंम्हार = घड़ा बनाने वाला। कुम्भ = घड़ा।

सरलार्थ:
कवि रहीम गुरु के कोमल और कल्याणकारी व्यवहार का वर्णन करते हुए कहते हैं कि गुरु का व्यवहार उस कुम्हार के समान है जो अपने घड़े को ठीक प्रकार से बनाने के लिए उसे बार-बार गढ़ता है। उसे ठीक से बनाने के लिए भीतर हाथ से सहारा देकर बाहर से चोट मार-मार कर उसे ठीक बनाता है। इसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों को कुशल बनाने के लिए प्यार और डांट कर उसे कुशल विद्यार्थी बनाता है।

भावार्थ:
गुरु अपने शिष्यों का सदा भला ही चाहता है चाहे उसके व्यवहार में कभी कठोरता भी अनुभव होती है।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 9 दोहा अंत्याक्षरी

5. ‘टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पौइए, टूटे मुक्ताहार।’

कठिन शब्दों के अर्थ:
सुजन = सज्जन, अच्छे व्यक्ति । रहिमन = रहीम जी। फिरिफिरि = बार-बार । पौइए = पिरोइए। मुक्ताहार = मोतियों की माला।।

सरलार्थ:
रहीम जी कहते हैं कि जिस प्रकार मोतियों की कीमती माला यदि टूट जाती है तो उसे फिर से पिरो लिया जाता है कि ठीक वैसे ही यदि सज्जन, प्रिय व्यक्ति रुठ जाए तो उसे मना लेना चाहिए। चाहे वह कितनी ही बार रूठे उसे तुरन्त मना लेना चाहिए।

भावार्थ:
अच्छे सगे-सम्बन्धियों और मित्रों को नाराज़गी की स्थिति में सदा मना लेना चाहिए। जीवन में वे बार-बार नहीं मिलते।

6. ‘रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजे डार।
जहाँ काम आवै सुई, का करे तलवार।।’

कठिन शब्दों के अर्थ:
बड़ेन = बड़ा। डार = छोड़ना। लघु = छोटी चीज़। तरवारि = तलवार।

सरलार्थ:
रहीम जी कहते हैं कि बड़ी चीज़ को देखकर छोटी चीज़ को छोड़ना नहीं चाहिए। उनका अनादर नहीं करना चाहिए। जैसे, जहाँ छोटी-सी सूई (सीने के लिए) काम आती है, वहां भला बड़ी तलवार किस काम की ? सूई का काम तलवार और तलवार का काम सूई नहीं कर सकती। दोनों का अपना-अपना अलग-अलग महत्त्व है।

भावार्थ:
हर छोटी-बड़ी चीज़ के उचित मूल्यांकन और महत्त्व को समझना चाहिए।

7. ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरौ चटकाय।
टूटे ते फिरि न जुरै, जुरै गाठि परि जाय॥’

कठिन शब्दों के अर्थ:
तोरौ = तोड़ो। चटकाय = झटके से। जुरै = जुड़ना। फिरि = दोबारा।

सरलार्थ-रहीम जी कहते हैं कि परस्पर प्रेम के सम्बन्धों को नहीं तोड़ देना चाहिए क्योंकि सम्बन्ध यदि एक बार टूट जाए तो फिर से नहीं जुड़ते और यदि जुड़ भी जाए तो एक गांठ अवश्य पड़ जाती है।

भावार्थ:
प्रेम-सम्बन्धों को कभी नहीं तोड़ना चाहिए। वे बहुत मूल्यवान् होते हैं।

दोहा अंत्याक्षरी Summary

दोहा अंत्याक्षरी पाठ का सार

रक्षा बंधन का दिन था। कक्षा में बहुत कम विद्यार्थी आए थे। जो बच्चे आए भी थे उसका भी पढ़ने का मन नहीं था। अध्यापिका ने कक्षा में आकर विद्यार्थियों के मन के भाव समझ लिए और उन्हें अंत्याक्षरी खेलाने की बात सोची। विद्यार्थी प्रसन्न थे कि फ़िल्मी गाने की अंत्याक्षरी होगी पर अध्यापिका ने उन्हें दोहों की अंत्याक्षरी सिखाई जिसमें रहीम के दोहों को ही आधार बनाया गया।

कठिन शब्दों के अर्थ:

रक्षाबंधन = राखी। पर्व = त्योहार। अवकाश = छुट्टी। उपस्थित = हाजिर, प्रस्तुत। रुचि = इच्छा, दिलचस्पी। प्रवेश = आगमन, आना। मनोभावों = मन के भावों या विचारों। अवगत = जानना, परिचित होगा। युक्ति = उपाय, तरीका। खुसर-फुसर = कानों-कान बातें करना, फुसफुसाना। स्मरण = याद। संख्या = गिनती।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 8 पेड़ की कहानी

Punjab State Board PSEB 6th Class Hindi Book Solutions Chapter 8 पेड़ की कहानी Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Hindi Chapter 8 पेड़ की कहानी

Hindi Guide for Class 6 पेड़ की कहानी Textbook Questions and Answers

भाषा-बोध (प्रश्न)

1. शब्दों के अर्थ ऊपर दिए जा चुके हैं।

मिथ्या-कथन = झूठ बोलना,
हलाहल = एक प्रकार का विष,
निवारण = दूर करना,
निरंतर = लगातार
द्वेष = वैर भाव
बखान = कहना
ज्योति = रोशनी, प्रकाश
तृप्त करना = संतुष्ट करना,
अनुकरण = अनुसार कार्य करना,
पतझड़ = जिस ऋतु में पत्ते झड़ जाते हैं।
औषधि = दवाई
सर्वत्र = सब जगह
आत्मकथा = अपनी कहानी

2. वाक्यों में प्रयोग करो

प्रकृति = …………………..
प्राणवायु = ……………….
झुण्ड = ………………..
पंक्तियों = ……………….
प्रहार = …………………..
उत्तर:
प्रकृति = प्रकृति परिवर्तनशील है।
प्राणवायु = वृक्ष हमें प्राणवायु प्रदान करते हैं।
झुण्ड = पशुओं का झुण्ड सारी फसल नष्ट कर गया।
पंक्तियों = सभी छात्र पंक्तियों में खड़े थे।
प्रहार = निःशस्त्र पर प्रहार करना उचित नहीं।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 8 पेड़ की कहानी

3. मुहावरों तथा लोकोक्तियों का वाक्यों में इस प्रकार प्रयोग करें कि अर्थ स्पष्ट हो जाए

आँखों का तारा = ………………………..
चोली-दामन का साथ = …………………..
डींग हाँकना = ……………………..
अपने मुँह मियाँ मिट्ट बनना = …………………..
उत्तर:
आँखों का तारा = मोहन अपने माता-पिता की आँखों का तारा है।
चोली-दामन का साथ = प्रीतम और सुरेन्द्र का चोली-दामन का साथ है।
डींग हाँकना = डींग हाँकने वाला व्यक्ति अपमानित होता है।
अपने मुँह मियाँ मिट्ट बनना = मूर्ख व्यक्ति ही अपने मुँह मियाँ मिट्ट बनते हैं, सज्जन कभी स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करते।

4. शुद्ध रूप लिखो

1. तिपत = ………………….
2. दवेष = ……………………
3. जयोति = …………………
4. नीवारण = …………………….
5. आकसीजन = ……………….
6. आशरय = ………………….
7. प्राणीयों = ……………….
8. सवादिष्ट = …………………..
9. जामून = ………………….
10. खीड़कियाँ = ……………………
उत्तर:
अशुद्ध रूप – शुद्ध रूप
1. तिपत = तृप्त
2. दवेष = द्वेष
3. जयोति = ज्योति
4. नीवारण = निवारण
5. आकसीजन = ऑक्सीजन
6. आशरय = आश्रय
7. प्राणीयों = प्राणियों
8. सवादिष्ट = स्वादिष्ट
9. जामून = जामुन
10. खीडकियाँ = खिड़कियाँ

5. समानार्थक लिखिए

1. ज्योति = …………………..
2. हलाहल = ………………..
3. निवारण = ………………….
4. मज़बूती = ………………….
5. परिचित = …………………..
6. विशाल = …………………..
7. नीरस = ……………….
8. असंख्य = ……………………
9. उपजाऊ = ………………….
10. मूछित = …………………….
उत्तर:
1. ज्योति – प्रकाश
2. हलाहल – विष
3. निवारण – हटाना
4. मज़बूती – दृढ़ता
5. परिचित – जाना-पहचाना
6. विशाल – बड़ा
7. नीरस – रसहीन
8. असंख्य – अनगिनतं
9. उपजाऊ- उर्वर
10. मूछित – बेहोश

6. निम्न वाक्यों में संज्ञा शब्द छाँटकर लिखो और बताओ कि यह किस प्रकार की संज्ञा है ?

प्रश्न 1.
मैं नन्हें से बीज के रूप में धरती के गर्भ में छिपा रहता हूँ।
उत्तर:
बीज-(जातिवाचक संज्ञा), धरती-(व्यक्तिवाचक संज्ञा)

प्रश्न 2.
मैं विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लेता हूँ।
उत्तर:
वृक्ष-(जातिवाचक संज्ञा)

प्रश्न 3.
नगर के बाज़ार में आप फल देखते हैं।
उत्तर:
नगर-(जातिवाचक संज्ञा), बाज़ार (जातिवाचक संज्ञा), फल (जातिवाचक संज्ञा)

प्रश्न 4.
पीपल, नीम, वट, चीड़ आदि मेरे असंख्य भाई हैं।
उत्तर:
पीपल, नीम, वट, चीड़ (व्यक्तिवाचक संज्ञा), भाई (जातिवाचक संज्ञा)

प्रश्न 5.
वेद, पुराण मेरी महिमा गाते हैं।
उत्तर:
वेद, पुराण-(जातिवाचक संज्ञा)।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 8 पेड़ की कहानी

7. विपरीत शब्द लिखो

1. जीव = ………………….
2. रस = ………………….
3. निर्माण = ………………….
4. नगर = ………………….
5. विशाल = ………………….
6. भूमि = ………………….
7. हलाहल = ………………….
8. पतझड़ = ………………….
उत्तर:
1. जीव = अजीव
2. रस = नीरस
3. निर्माण = ध्वंस
4. नगर = ग्राम
5. विशाल = लघु
6. भूमि = आकाश
7. हलाहल = अमृत
8. पतझड़ = वसन्त

8. वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखो

अपना स्वयं लिखा हुआ जीवन चरित्र, फल खाने वाला, जीवन देने वाला, सब में रहने वाला।
उत्तर:
1. अपना स्वयं लिखा हुआ जीवन चरित्र ………….. आत्मकथा।
2. फल खाने वाला ………….. फलाहारी।
3. जीवन देने वाला ………….. जीवनदाता।
4. सब में रहने वाला ………….. सर्वव्यापी।

9. भाववाचक संज्ञा व सर्वनाम छाँटो

(1) ‘वृक्ष’ सचमुच मेरा नाम आपको सुहावना लगता है।
(2) लक्ष्मण के मूच्छित होने पर मैंने ही उनके प्राण बचाये थे।
(3) बुराई का बदला भलाई से देना मेरे जीवन का लक्ष्य है।
(4) हरियाली मेरी आँखों को ज्योति देती हैं और मन को प्रसन्नता।
उत्तर:
(1) मेरा, आपको (सर्वनाम) सुहावना (भाववाचक संज्ञा)
(2) मैंने, उनके (सर्वनाम) मूछित (भाववाचक संज्ञा)
(3) मेरे (सर्वनाम) बुराई, भलाई (भाववाचक संज्ञा)
(4) मेरी, (सर्वनाम) हरियाली, प्रसन्नता (भाववाचक संज्ञा)

विचार-बोध (प्रश्न)

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
पेड़ किस रूप में धरती में छिपा रहता है ?
उत्तर:
पेड़ नन्हें से बीज के रूप में धरती में छिपा रहता है।

प्रश्न 2.
पेड़ कैसे पनपता है ?
उत्तर:
पेड़, जल, लवण, रसायन आदि का भोजन पाकर पनपता है।

प्रश्न 3.
पेड़ किसके जीवन का आधार बनते हैं ?
उत्तर:
पेड़ सभी प्राणियों के जीवन का आधार बनते हैं।

प्रश्न 4.
पेड़ का स्वभाव प्राणी जगत् से किस प्रकार मिलता-जुलता है ?
उत्तर:
पेड़ का जीवन भी प्राणी जगत् की तरह सजीव है। वह भी साँस लेता है। खिलता-मुरझाता है। उस पर भी प्रकृति का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 5.
पेड़ के अंग कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
जड़, पत्ते, तना, फल, फूल, लकड़ी ये सब पेड़ के अंग हैं।

प्रश्न 6.
प्राणी जगत् का जीवनदाता कौन है ?
उत्तर:
प्राणी जगत् का जीवनदाता पेड़ है।

प्रश्न 7.
वायुमण्डल में कौन-कौन सी गैसें मिली होती हैं ?
उत्तर:
वायुमण्डल में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड गैसें मिली होती हैं।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 8 पेड़ की कहानी

प्रश्न 8.
पेड़ के पत्ते हवा में क्या छोड़ते हैं ?
उत्तर:
पेड़ के पत्ते हवा में प्राण वायु (ऑक्सीजन) छोड़ते हैं।

प्रश्न 9.
वर्षा का जल किस प्रकार उपयोगी होता है ?
उत्तर:
पेड़ों के पत्ते हवा में वाष्प-कण छोड़ते हैं, जो हवा को ठण्डा करते हैं। हवा वर्षा लाने में सहायक होती है। वर्षा के जल से प्राणियों को जीवन मिलता है।

प्रश्न 10.
लक्ष्मण को प्राण दान कैसे मिला था ?
उत्तर:
लक्ष्मण को संजीवनी बूटी द्वारा प्राण-दान मिला था।

प्रश्न 11.
कुनीन किस प्रकार प्राप्त होती है ?
उत्तर:
कुनीन सिनकोना नामक एक वृक्ष से प्राप्त होती है। यह भयंकर रोगों से जीवन की रक्षा करती है।

(ख)
प्रश्न 1.
पेड़ किस प्रकार शिव का अनुसरण करते हैं ?
उत्तर:
जिस प्रकार भगवान शिव ने विश्व के कल्याण के लिए समुद्र मंथन से निकले भयंकर हलाहल को स्वयं पी लिया था इसी प्रकार पेड़ भी विश्व के कल्याण के लिए भयंकर दूषित वायु को स्वयं ग्रहण कर हमें स्वच्छ जीवनदायी वायु प्रदान करके हमारा भला करते हैं।

प्रश्न 2.
पेड़ हमें परोपकार का पाठ कैसे पढ़ाते हैं ?
उत्तर:
पेड़ सदा परोपकार ही करते हैं। अगर कोई लकड़हारा अपनी कुल्हाड़ी से उन्हें काटता है तो भी यह उसे लकड़ियाँ प्रदान कर उसके परिवार का पालन-पोषण करते हैं। इसी प्रकार बच्चे उन्हें पत्थर मारते हैं तो उन पर भी उपकार करते हैं और बदले में यह उन्हें मीठे-मीठे फल प्रदान करते हैं। पेड़ अपने फूलों की सुगन्ध से सारा वातावरण महकाते हैं। यह हर कदम पर हमें परोपकार का पाठ पढ़ाते हैं।

आत्म-बोध

(1) अपने घर आँगन को पेड़-पौधों से सजाओ।
(2) एक गमले में तुलसी का पौधा लगाओ और उसकी देखभाल करो।
(3) पेड़ों के समान परोपकारी बनो।
(4) पेड़ों के समान गुणकारी बनो।
उत्तर:
विद्यार्थी उपर्युक्त कार्यों के लिए स्वयं प्रयास करें।

बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पेड़ की कहानी किस विधा की रचना है ?
(क) आत्मकथा
(ख) आत्म कहानी
(ग) आत्म रचना
(घ) जीवनी
उत्तर:
(क) आत्मकथा

प्रश्न 2.
वृक्ष प्राणी मात्र को क्या देते हैं ?
(क) फल
(ख) छाया
(ग) जीवन
(घ) पानी
उत्तर:
(ग) जीवन

प्रश्न 3.
वृक्ष प्राणियों के जीवन हेतु कौन-सी गैस छोड़ते हैं ?
(क) आक्सीजन
(ख) कार्बनडाईआक्साइड
(ग) बोनासाइड
(घ) क्लोरो-फ्लोरो
उत्तर:
(क) आक्सीजन

प्रश्न 4.
पेड़ किस रूप में धरती में छिपा रहता है ?
(क) नन्हें
(ख) मुन्ने
(ग) बीज
(घ) जड़
उत्तर:
(ग) बीज

प्रश्न 5.
लक्ष्मण को प्राण दान किससे मिला?
(क) संजीवनी बूटी से
(ख) वूटी से
(ग) घूटी से
(घ) घुट्टी से
उत्तर:
(क) संजीवनी बूटी से

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा शब्द जातिवाचक संज्ञा नहीं है ?
(क) नगर
(ख) बाजार
(ग) फल
(घ) पीपल
उत्तर:
(घ) पीपल

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा का उदाहरण है ?
(क) भाई
(ख) वृक्ष
(ग) नीम
(घ) बीज
उत्तर:
(ग) नीम

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन-सा शब्द भाववाचक संज्ञा का उदाहरण नहीं है ?
(क) सुहावना
(ख) हरियाली
(ग) बुराई
(घ) धरती
उत्तर:
(घ) धरती

पेड़ की कहानी Summary

पेड़ की कहानी पाठ का सार

‘पेड़ की कहानी’ पाठ में पेड़ अपनी आत्मा-कथा के रूप में अपने महत्त्व तथा गुणों का वर्णन करता है। यह बीज के रूप में धरती के गर्भ में छिपा होता है। समय आने पर बीज से अंकुर निकलता है और फिर बढ़ते-बढ़ते विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है। वृक्ष हमें छाया तथा ताज़गी देते हैं। प्राणी मात्र को जीवन देते हैं। बसन्त में ये फलफूलों से लद जाते हैं तथा पतझड़ में पत्तों से खाली हो जाते हैं।

इसकी लकड़ी रसोई में ईंधन तथा कुर्सियाँ, मेज़, खिडकियाँ, दरवाज़े आदि बनाने के काम आती है। वृक्षों से अन्न, फल-फूल आदि प्राप्त होते हैं। यह हमें साँस लेने के लिए ऑक्सीजन देता है। यह विषैली वायु कार्बन डाइऑक्साइड को शुद्ध करके ऑक्सीजन तथा कार्बन में बदल देते हैं। वृक्ष भूमि तल की उपजाऊ मिट्टी को वर्षा के जल से बहने से रोकते हैं। इन से प्राप्त होने वाले कच्चे माल से बड़े-बड़े कारखाने चलते हैं। अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ तथा कीमती औषधियाँ हमें वृक्षों से ही प्राप्त होती हैं जो हम सब प्राणियों के रोगों का शमन करती हैं। पीपल, नीम, वट, चीड़, ताड़, नारियल, शीशम, देवदार सभी हमारे लिए पूर्ण उपयोगी हैं। अतः हमें वृक्षों की रक्षा करनी चाहिए।

कठिन शब्दों के अर्थ:

अपने मुँह मियाँ मिट्ट बनना = अपनी प्रशंसा आप करना। विश्वास = यकीन। मिथ्या कथन = झूठ कहना। स्वभाव = आदत। बखान = वर्णन। चिर-परिचित = चिरकाल से परिचित। वाटिका = बागीचा। शोभा = सुन्दरता। आँख का तारा = बहुत प्यारा। पुष्ट = मज़बूत। अंकुर = कोंपल। चोली-दामन का साथ = हमेशा का साथ। नीरस = बिना रस के। सर्व-व्यापक = सब जगह विद्यमान। जीवनदाता = जीवन देने वाला। विद्यमान = मौजूद, पाई जाने वाली। सत्व = सार। समुद्र मंथन = सागर को मथने से। कल्याण = भला। अनुकरण = पीछे चलना। गौरव = बड़प्पन। पंक्तियों = लाइनों। आश्रय = सहारा। अमूल्य = कीमती। बसेरा = रहने की जगह। हलाहल = बहुत तीव्र विष। औषधियों = दवाइयों। निवारण = रोकने । स्वास्थ्य = सेहत। सर्वत्र = सब जगह । व्याप्त = फैली हुई। ज्योति = रोशनी। कुटुम्ब = परिवार। द्वेष = शत्रुता, वैर। प्रहार = चोट। सृष्टि = संसार। डींग हांकना = शेखी बघारना। निरन्तर = लगातार। बखान = कहना, वर्णन करना।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 7 देश-प्रेम

Punjab State Board PSEB 6th Class Hindi Book Solutions Chapter 7 देश-प्रेम Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Hindi Chapter 7 देश-प्रेम

Hindi Guide for Class 6 देश-प्रेम Textbook Questions and Answers

भाषा-बोध

1. शब्दार्थ

मानचित्र = नक्शा
संस्कृति = सभ्यता का वह स्वरूप जो आध्यात्मिक एवं मानसिक विशिष्टता का द्योतक होता है
राष्ट्रवंदना = राष्ट्र अथवा देश का गुणगान
स्वाभाविक = प्राकृतिक
परतन्त्र = गुलाम
धर्मनिरपेक्ष = सभी धर्मों को समान मानना
शिष्टता = सभ्य व्यवहार
स्वाभिमान = आत्म-सम्मान
वात्सल्य = संतान के प्रति माता-पिता का स्नेह
संवद्धन = बढ़ाना
वशीभूत = वश में होना, अधीन
उल्लेखनीय = उल्लेख करने योग्य, बताने योग्य
लोकतांत्रिक = लोकतंत्र संबंधी
संरक्षण = रक्षा करना
पर्यावरण = चारों ओर का वातावरण
प्राकृतिक = कुदरती
आपदाओं = विपत्तियाँ
टिप्पणी = संक्षेप में प्रकट की गई राय
भद्दी = बुरी, गंदी

2. लिंग बदलो

1. अध्यापिका = ……………
2. लाला = …………
3. सिंह = ……………….
4. दास = …………….
उत्तर:
1. अध्यापिका – अध्यापक
2. सिंह – सिंहनी
3. लाला – ललाइन
4. दास – दासी

3. वचन बदलो

1. तिरंगा = ……………
2. चेहरा = ………….
3. बेड़ी = ……………
4. रेल = ………….
5. सीमा = ………….
6. चित्र = …………..
7. झील = …………..
8. कक्षा = ……………
उत्तर:
1. तिरंगा = तिरंगे
2. चेहरा = चेहरे
3. बेड़ी = ‘बेड़ियाँ
4. रेल = रेलें
5. सीमा = सीमाएँ
6. चित्र = चित्रो
7. झील = झीलें
8. कक्षा = कक्षाओं

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 7 देश-प्रेम

4. विपरीतार्थक शब्द लिखो

1. पवित्र = ……………..
2. परतन्त्र = ……………..
3. शान्ति = ……………..
4. सहयोग = ………………
5. साकार = ………………
6. उच्च = ………………
7. निर्माण = …………………
8. अव्यवस्था = ……………..
उत्तर:
1. पवित्र = अपवित्र
2. परतन्त्र = स्वतन्त्र
3. शान्ति = अशान्ति
4. सहयोग= असहयोग
5. साकार = निराकार
6. उच्च = नीच
7. निर्माण = विध्वंस
8. अव्यवस्था = व्यवस्था

5. पर्यायवाची शब्द लिखो

1. भूमि = ……………..
2. माँ = ………………
3. सम्पत्ति = ………….
4. जंगल = ……………..
5. नदी = ………………
6. ध्वज = …………………..
7. प्रगति = ……………..
8. मनुष्य = ……………..
उत्तर:
1. भूमि = धरती, भू
2. माँ = माता, मातृ
3. सम्पत्ति = धन, दौलत
4. जंगल = वन, कानन
5. नदी = सरिता, तटिनी
6. ध्वज = झण्डा, पताका
7. प्रगति = तरक्की, उन्नति
8. मनुष्य = मानव, मनुज

6. वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखो

1. विद्या ग्रहण करने का स्थान = ……………………
2. जिसकी आत्मा महान् हो = ……………….
3. तीन रंगों वाला = …………………
4. जो विद्या ग्रहण करे = ………………..
5. अपना राज्य = ……………….
6. शिष्टतापूर्ण आचरण और व्यवहार = ………………………
7. इतिहास से सम्बन्ध रखने वाला = ……………..
8. शहीद होने को तैयार = …………………….
उत्तर:
1. विद्या ग्रहण करने का स्थान – विद्यालय।
2. जिसकी आत्मा महान् हो। – महात्मा।
3. तीन रंगों वाला – तिरंगा।
4. जो विद्या ग्रहण करे – विद्यार्थी।
5. अपना राज्य – स्वराज्य।
6. शिष्टतापूर्ण आचरण और व्यवहार -शिष्टाचार।
7. इतिहास से सम्बन्ध रखने वाला – ऐतिहासिक।
8. शहीद होने को तैयार – शहादतोन्मुख।

7. विशेषण बनाओ

1. भारत = …………….
2. राष्ट्र = ………………
3. देश = ………………
4. शिक्षा = …………….
5. विज्ञान = ………….
6. संस्कृति = …………….
उत्तर:
1. भारत = भारतीय
2. राष्ट्र = राष्ट्रीय
3. देश = देशीय
4. शिक्षा = शिक्षित
5. विज्ञान = वैज्ञानिक
6. संस्कृति = सांस्कृतिक

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7. शुद्ध करो

1. भूकमप = ………………
2. संसकृति = …………..
3. प्रकृतिक = …………..
4. महातमा = ………………
5. शान्ति = ………………
6. शिस्टाचार = ………….
7. सम्पत्ती = ………………
उत्तर:
शुद्ध शब्द
1. भूकमप = भूकम्प
2. संसकृति = प्राकृतिक
3. प्रकृतिक = संस्कृति
4. महातमा = महात्मा
5. शान्ति = शान्ति
6. शिस्टाचार = शिष्टाचार
7. सम्पत्ती = सम्पत्ति

9. वाक्यों में प्रयोग करो

ध्वज = …………….
संकल्प =  …………..
अर्पित = …………..
मातृभूमि = ……………..
विस्फोट ………….
संग्राम = …………………
आकार = ………………….
पर्यावरण = ………….
निमग्न = ……….
उत्तर:
1. ध्वज – लाल किले पर तिरंगा ध्वज लहरा रहा है।
2. संकल्प – मैंने दहेज न लेने का संकल्प किया है।
3. अर्पित – मैं अपनी सेवाएं देश के प्रति अर्पित करता हूँ।
4. मातृभूमि – भारत हमारी मातृभूमि है।
5. विस्फोट – मन्दिर के बाहर भयंकर विस्फोट हुआ।
6. संग्राम – स्वतन्त्रता संग्राम में कई वीर शहीद हुए।
7. आकार – इस बल्ले का आकार ठीक नहीं है।
8. पर्यावरण – हमें अपने आस – पास के पर्यावरण को प्रदूषण से बचाना चाहिए।
9. निमग्न – महात्मा जी प्रभु भक्ति में निमग्न हो गए।

10.(1) ये सब वे देश प्रेमी हैं।
इन दोनों का स्थान उच्च है।
ऊपर लिखे वाक्यों में ‘ये’, ‘इन’ किसी निश्चित व्यक्ति का बोध कराते हैं, अतः निश्चयवाचक सर्वनाम के उदाहरण हैं।
जिस सर्वनाम से दूरवर्ती अथवा समीपवर्ती व्यक्ति, प्राणी, वस्तु और घटना का निश्चित बोध होता है, उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं, जैसे-यह, ये, वह, वे।

(2) कुछ तिरंगा चित्रित कर रहे थे।
आपके पड़ोस में कोई अशिक्षित है।
काव्या कुछ पूछने के लिए खड़ी हो गई।

पीछे दिए वाक्यों में ‘कुछ’, ‘कोई’ किसी निश्चित वस्तु या व्यक्ति का बोध नहीं कराते, अतः अनिश्चयवाचक सर्वनाम के उदाहरण हैं।
जिस सर्वनाम से किसी निश्चित व्यक्ति, प्राणी या वस्तु का बोध नहीं होता उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं, जैसे-कोई, कुछ।

विचार-बोध

(क)
प्रश्न 1.
बच्चे चित्र प्रतियोगिता में क्या-क्या बना रहे थे ?
उत्तर:
चित्र प्रतियोगिता में बच्चे भारत का मानचित्र तथा तिरंगा तथा कुछ महात्मा गांधी, भगत सिंह आदि के चित्र बना रहे थे।

प्रश्न 2.
देश-प्रेम से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
देश प्रेम से अभिप्राय है अपने देश के प्रति प्रेम भाव रखते हुए देश की उन्नति और विकास में योगदान देना और देश के गौरव की रक्षा अपने प्राणों से भी बढ़ कर करना।

प्रश्न 3.
प्रेम के सम्बन्ध में माँ और मातृभूमि का उच्च स्थान कैसे है ?
उत्तर:
जिस प्रकार माँ अपनी ममता, करूणा और स्नेह तथा प्यार से अपने बच्चे का पालन-पोषण करती है। उसी मातृभूमि भी अपनी वायु, अन्न, जल तथा पोषक पदार्थों से सबका पालन करती है। इसीलिए प्रेम के सम्बन्ध में इन दोनों का स्थान उच्च है।

प्रश्न 4.
स्वाधीनता संग्राम के कुछ देशप्रेमियों के योगदान का वर्णन करो।
उत्तर:
लाला लाजपत राय, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरु तथा लाल बहादुर शास्त्री जैसे अनेक देशप्रेमियों ने देश को स्वतन्त्र करवाने के लिए अनेकों कष्ट सहे। लाला लाजपतराय को अंग्रेज़ों की लाठियाँ खानी पड़ी, भगत सिंह ने फाँसी का फंदा हँसते-हँसते चूमा तो सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी फौज बना कर देश को स्वतन्त्र करवाना चाहा। र देश को स्वतन्त्र करवाना चाहा।.

प्रश्न 5.
स्वतन्त्रता के बाद किस प्रकार के नए भारत का निर्माण हुआ ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता के बाद नए भारत का निर्माण सबसे बड़े लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में हुआ। भारत का विकास शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और संचार के साथ-साथ विज्ञान के क्षेत्र में हुआ।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 7 देश-प्रेम

प्रश्न 6.
स्वतंत्रता के बाद देश-प्रेम की परिभाषा कैसे बदली है ?
उत्तर:
स्वतंत्रता, के बाद देश-प्रेम की परिभाषा भी बदली है। आज केवल पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी तथा कुछ राष्ट्रीय पर्वो तक ही देश-प्रेम की भावना सीमित होकर रह गई है। अपने अधिकारों की बात तो हर कोई करता है लेकिन देश के प्रति अपने कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता।

(ख)
प्रश्न 1.
देश, राष्ट्र और देश-प्रेम किसे कहते हैं ?
उत्तर:
देश-भूमि के टुकड़े का वह इलाका जहाँ कई लोग वास करते हैं।
राष्ट्र-राष्ट्र, भूमि, के उस इलाके के रहने वाले लोगों को और उनकी संस्कृति को . कहते हैं।
देश-प्रेम-देश-प्रेम के अभिप्राय है कि मनुष्य अथवा मनुष्यों के वे कार्य जिनसे उनके देश का हित, विकास और कल्याण होता हो, देश-प्रेम कहलाता है।

प्रश्न 2.
नागरिकों के देश के प्रति क्या कर्त्तव्य हैं जिनका पालन कर के देश-प्रेम का परिचय दे सकते हैं ?
उत्तर:
प्रत्येक नागरिक चाहे वह अध्यापक हैं, डॉक्टर है या इंजीनियर हैं अपना कार्य अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ करते हुए देश के विकास में अपना सहयोग दें, राष्ट्र,-गान, राष्ट्रीय झंडे और राष्ट्रीय सम्पति का सम्मान करें तथा इसे हानि होने से बचाकर वह अपने देश-प्रेम का परिचय दे सकता है।

प्रश्न 3.
बच्चे देश-सेवा कैसे कर सकते हैं ?
उत्तर:
बच्चे, किसी अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करके, बाढ़, भूकम्प और सूखा पीड़ितों की रक्षा और सहायता करके देश सेवा कर सकते हैं।

आत्म-बोध

1. घर, समाज और स्कूल-सभी जगह हमारे व्यवहार में देश-प्रेम झलकना चाहिए।
2. स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनियाँ पढ़े और प्रतिदिन प्रार्थना में इस विषय पर चर्चा करें। (विद्यार्थी स्वयं करें)।

बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत कब आज़ाद हुआ ?
(क) 15 अगस्त, 1947 को
(ख) 16 अगस्त, 1945 को
(ग) 15 अगस्त, 1942 को
(घ) 15 अगस्त, 1949 को
उत्तर:
(क) 15 अगस्त, 1947 को

प्रश्न 2.
युवा पीढ़ी को किसके विकास में सहयोग करना चाहिए ?
(क) अपने
(ख) दूसरों के
(ग) देश के
(घ) विदेश के
उत्तर:
(ग) देश के

प्रश्न 3.
आजाद हिंद फौज की स्थापना किसने की ?
(क) सुभाष चन्द्र बोस ने
(ख) लाला लाजपतराय ने
(ग) शहीद भगत सिंह ने
(घ) चंद्रशेखर आजाद ने
उत्तर:
(क) सुभाष चन्द्र बोस ने

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से मनुष्य का पर्याय है :
(क) मानव
(ख) दानव
(ग) रावण
(घ) रावन
उत्तर:
(क) मानव

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन सा शब्द ‘ध्वज’ का पर्याय नहीं है ?
(क) झंडा
(ख) फंडा
(ग) पताका
(घ) तिरंगा
उत्तर:
(ख) फंडा

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से ‘भारत’ का विशेषण छांटिए :
(क) भारतीमाता
(ख) भारतमाता
(ग) भारतीय
(घ) विभारतीय
उत्तर:
(ग) भारतीय

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से विशेषण शब्द चुनें :
(क) राष्ट्रीय
(ख) राष्ट्र
(ग) भारत
(घ) देव
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से निश्चयवाचक सर्वनाम का उदाहरण कौन-सा शब्द है ?
(क) ये
(ख) कोई
(ग) कुछ
(घ) कहाँ
उत्तर:
(क) ये

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 7 देश-प्रेम

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से अनिश्चयवाचक सर्वनाम का उदाहरण है।
(क) ये
(ख) वे
(ग) कोई
(घ) कहां
उत्तर:
(ग) कोई

देश-प्रेम Summary

पाठ का सार

‘देश-प्रेम’ विषय पर ‘चित्र बनाओ’ प्रतियोगिता में बच्चों ने भारत के मानचित्र, तिरंगे झंडे, राष्ट्रीय प्रतीकों और नेताओं के चित्र बनाए थे। अध्यापिका ने देश-प्रेम के विषय में बताया कि देश की रक्षा और इसकी उन्नति और विकास में सहयोग देने के देश-प्रेम कहते हैं। माँ हमें जन्म देती है और मातृभूमि हमारे पालन-पोषण में सहायक सिद्ध होती है। देशप्रेम की डोर से सारे देशवासी मोतियों की माता की तरह गुंथे रहते हैं। इसी भावना के कारण देशवासी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट हो गए थे। महात्मा गांधी, तिलक, लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस आदि सब देश-प्रेमी थे। इनके प्रयत्नों से देश 15 अगस्त, सन् 1947 को स्वतंत्र हुआ था। स्वतंत्रता के बाद देश ने बहुत तेजी से विकास किया है। यह देश हमारा है और हमें इसकी संपत्ति की सदा रक्षा करनी चाहिए। अपनी बातों को मनवाने के लिए कभी भी देश की संपत्ति की तोड़-फोड़ नहीं करनी चाहिए। विद्यार्थियों को एन०सी०सी० और एन०एस०एस० से जुड़ कर देश-सेवा करनी चाहिए। हमें पर्यावरण की रक्षा, प्राकृतिक आपदाओं और विभिन्न दुर्घटनाओं की स्थिति में दूसरों की सहायता में हाथ बंटाना चाहिए। देश के विकास के हर व्यक्ति को अपने-अपने क्षेत्र में परिश्रम और निष्ठा से काम करना चाहिए। युवा पीढ़ी का कर्तव्य है कि वह देश का विकास करने में सहयोग करे।

कठिन शब्दों के अर्थ:
मानचित्र = नक्शा। प्रतीक = चिह्न। उकेर = बनाना, अंकित करना। महज = सिर्फ। उन्नति = तरक्की, विकास, प्रगति। योगदान = सहयोग। गौरव = बड़प्पन। जिज्ञासापूर्वक = उत्सुकता से भरकर। वात्सल्य = माता-पिता का । बालक के प्रति स्नेह। शिष्टता = सभ्य आचरण। संवर्द्धन = बढ़ाना। स्वाभाविक = सहज, प्राकृतिक। निमग्न = लीन। आघात = चोट, हानि। वशीभूत = वश में, अधीन। अर्पित = न्योछावर, वारना। स्वाधीनता संग्राम = आजादी की लड़ाई। उल्लेखनीय = वर्णन के योग्य। अहिंसा = हिंसा न करना। स्वराज = अपना राज्य। परतन्त्रता = गुलामी। लाचार = बेबस, मजबूर। भर्राए = भरे। सार्वजनिक सम्पत्ति = सब लोगों से सम्बन्धित सम्पत्ति। संरक्षण = बचाव। भददी = बुरी, असभ्य। आपदाओं = मुसीबतों, मुश्किलों। जज्बा = भावना। जुनून = उत्साह, जोश। सतत् = लगातार। कोसना = भला-बुरा कहना। संकल्प = प्रण, प्रतिज्ञा।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 6 दृढ़ निश्चयी सुशीला

Punjab State Board PSEB 6th Class Hindi Book Solutions Chapter 6 दृढ़ निश्चयी सुशीला Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Hindi Chapter 6 दृढ़ निश्चयी सुशीला

Hindi Guide for Class 6 मैंदृढ़ निश्चयी सुशीला Textbook Questions and Answers

भाषा-बोध

1. शब्दार्थ

दुर्भाग्य = बुरी किस्मत
उम्र = आयु
कतई = बिल्कुल
दृढ़ = मजबूत
मुक्त = स्वतंत्र
दलील = तर्क
ननिहाल = नाना-नानी का घर
सजगता = सावधानी

2. मुहावरों को वाक्यों में प्रयोग करो

मुहावरा अर्थ वाक्य
हाथ पीले करना शादी करना ………………………
पैरों तले की ज़मीन खिसक जाना होश उड़ जाना,बहुत घबरा जाना ………………………
टस से मस न होना दृढ़ रहना, अनुनय-विनय का कुछ प्रभाव न होना ……………………
दबाव बनाना मजबूर करना ………………….

उत्तर:

मुहावरा अर्थ वाक्य
हाथ पीले करना शादी करना सुशीला की माता छोटी उम्र में ही उसके हाथ पीले कर देना चाहती थी।
पैरों तले की ज़मीन खिसक जाना होश उड़ जाना, बहुत घबरा जाना शादी की ख़बर सुनकर सुशीला के पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गई।
टस से मस न होना दृढ़ रहना, अनुनय-विनय का कुछ प्रभाव न होना दृढ़ रहना-इतने अत्याचारों को सह कर भी सुशीला अपने इरादे से टस से मस न हुई।
दबाव बनाना मजबूर करना शादी के लिए सुशीला पर दबाव बनाया गया।

 

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 6 दृढ़ निश्चयी सुशीला

3. इन शब्दों में अक्षरों के क्रम को ठीक करते हुए शब्द लिखो

1. निलहान = ननिहाल
2. खलरिक = ………………..
3. साखिक = …………………
4. कयला = …………………..
5. सुलरास = ………………….
6. रीदबिरा = ………………….
7. अकक्षधी = ………………
8. प्रनसशा = ………………….
9. ददम = ………………..
10. वदबा = …………………
11. धअराप = …………….
12. रोसहमा = …………………
13. नमहमोन = ……………….
14. तावीर = ……………..
15. यरिपच = ………………
उत्तर:
1. खलरिक = लिखकर
2. साखिक = खिसक
3. कयला = लायक
4. सुलरास = ससुराल
5. रीदबिरा = बिरादरी
6. अकक्षधी = अधीक्षक
7. प्रनसशा = प्रशंसा
8. ददम = मदद
9. वदबा = दबाव
10. धअराप = अपराध
11. रोसहमा = समारोह
12. नमहमोन = मनमोहन
13. तावीर = वीरता
14. यरिपच = परिचय

4. विपरीत शब्द लिखो

1. मुक्त = ……………..
2. जल्दी = ……………
3. लायक = …………..
4. राजी = ……………
5. विश्वास = ……………
6. विचलित = ……………
7. ऊपर = ……………….
8. अन्याय = …………….
9. निर्भीक = ……………
उत्तर:
1. मुक्त = आबद्ध
2. जल्दी = देरी
3. लायक = नालायक
4. राजी = नाराजी
5. विश्वास = अविश्वास
6. विचलित = अविचलित
7. ऊपर = नीचे
8. अन्याय = न्याय
9. निर्भीक = कायर

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 6 दृढ़ निश्चयी सुशीला

5. इन शब्दों को उनके सही स्थान पर लिखो।

कक्षा, निर्भीकता, सुशीला, माँ, हनुमनपुरा, प्रधानमन्त्री, सजगता, नाना, नई दिल्ली, वीरता, मनमोहन सिंह, बहादुरी।
उत्तर:

व्यक्तिवाचक संज्ञा जातिवाचक संज्ञा भाववाचक संज्ञा
सुशीला कक्षा निर्भीकता
हनुमनपुरा माँ सजगता
नई दिल्ली प्रधानमन्त्री वीरता
मनमोहन सिंह नाना बहादुरी

उपयुक्त सर्वनाम लगाकर वाक्य पूरे करो

(क) ……………… पिता का देहान्त हो चुका था।
(ख) ……………….. अपनी माँ से इसका विरोध किया।
(ग) ……………….. ताया ने हिम्मत दिलायी।
(घ) ……………….. खूब मन लगाकर पढ़ती थी।
(ङ) …………….. स्वयं भी अधिकारियों से बात की।
उत्तर:
(क) उसके
(ख) उसने
(ग) उसके
(घ) वह
(ङ) उसने

विचार-बोध

प्रश्न 1.
सुशीला कहाँ की रहने वाली थी ?
उत्तर:
सुशीला राजस्थान के टाँक जिले के हनुमनपुरा गाँव की रहने वाली थी।

प्रश्न 2.
सुशीला ननिहाल क्यों रहती थी ?
उत्तर:
सुशीला के पिता का देहान्त हो गया था। अतः वह अपनी माता के साथ ननिहाल में रहती थी।

प्रश्न 3.
उसकी मां और नाना सुशीला की शादी क्यों जल्दी कर देना चाहते थे ?
उत्तर:
वे सुशीला की शादी जल्दी से करके लड़की की ज़िम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे।

प्रश्न 4.
सुशीला ने अपनी शादी का विरोध क्यों किया ?
उत्तर:
सुशीला अभी नाबालिग थी। वह इतनी छोटी आयु में विवाह नहीं करना चाहती थी। इसीलिए उसने अपनी शादी का विरोध किया।

प्रश्न 5.
बाल-विवाह का विरोध करने पर सुशीला को क्या-क्या अत्याचार सहने पड़े?
उत्तर:
बाल-विवाह का विरोध करने पर सुशीला को बहुत अत्याचार सहने पड़े। उसे भूखा-प्यासा रखा गया और उसे मारा-पीटा भी गया।

प्रश्न 6.
सुशीला घर से भाग कर किसके घर गयी और उसने उसकी क्या सहायता की ?
उत्तर:
सुशीला घर से भाग कर अपने ताया जी के घर गयी और उन्होंने सुशीला की बात सुनकर उसे पुलिस अधीक्षक तथा राजस्थान के मुख्यमन्त्री को पत्र लिखकर इस शादी को रुकवाने के लिए कहा। उन्होंने स्वयं भी प्रशासन के उच्च अधिकारियों से इस मामले में बात की।

प्रश्न 7.
सुशीला का विवाह किस प्रकार रुका ?
उत्तर:
पुलिस के हस्तक्षेप के कारण सुशीला का विवाह रुका।

प्रश्न 8.
सुशीला को किस-किस ने सम्मानित किया और क्यों ?
उत्तर:
अन्याय का बहादुरी से सामना करने तथा अपने पक्के इरादे पर डटे रहने के कारण सुशीला को उसके स्कूल तथा जिले में सम्मानित किया गया।

प्रश्न 9.
सुशीला के चरित्र से आपको क्या शिक्षा मिलती है ? लिखें।
उत्तर:
सुशीला के चरित्र से हमें शिक्षा मिलती है कि अन्याय के आगे झुकना नहीं चाहिए, बहादुरी से उसका सामना करना चाहिए।

PSEB 6th Class Hindi Solutions Chapter 6 दृढ़ निश्चयी सुशीला

आत्म-बोध

1. अन्याय करना और सहना दोनों ही पाप हैं। इस बात को जीवन में धारण करें।
2. सामाजिक बुराइयों के प्रति सदैव जागरूक रहें तथा उनको जड़ से उखाड़ने में जी-जान से जुट जायें।

रचना-बोध

प्रश्न 1.
यदि आप सुशीला की जगह होते तो इस समस्या का कैसे सामना करते ? लिखें।
उत्तर:
यदि सुशीला की जगह, हम होते तो हम पहले तो अपनी माँ और नाना जी को समझाते कि बाल-विवाह कानूनी अपराध है। अभी हमें पढ़ाई करनी है। पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़े होना है। अच्छी नौकरी करनी है उसके बाद ही शादी की बात सोची जा सकती है। यदि वे इस आग्रह को न मानते और अपनी जिद्द पर अड़े रहते तो हम कानून का सहारा लेते लेकिन किसी भी अवस्था में बाल-विवाह नहीं करते।

प्रश्न 2.
इस कहानी के छोटे-छोटे संवाद लिखकर बाल-विवाह की सजगता पर लघु नाटिका का स्कूल में मंचन करें।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं प्रयास करें।

बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
सुशीला कहाँ रहती थी ?
(क) ननिहाल
(ख) ससुराल
(ग) नौनिहाल
(घ) बेसुराल
उत्तर:
(क) ननिहाल

प्रश्न 2.
सुशीला ने शादी रुकवाने के लिए किसको पत्र लिखा ?
(क) मुख्यमंत्री को
(ख) प्रधानमंत्री को
(ग) रक्षामंत्री को
(घ) गृहमंत्री को
उत्तर:
(क) मुख्यमंत्री को

प्रश्न 3.
सुशीला को कौन-सा पुरस्कार मिला ?
(क) राष्ट्रीय
(ख) वीरता
(ग) राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार
(घ) पद्मभूषण पुरस्कार
उत्तर:
(ग) राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से संज्ञा शब्द चुनें :
(क) कक्षा
(ख) वह
(ग) वे
(घ) उनका
उत्तर:
(क) कक्षा

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन सा शब्द जातिवाचक संज्ञा का उदाहरण है ?
(क) वीरता
(ख) बहादुरी
(ग) प्रधानमंत्री
(घ) मनमोहन सिंह
उत्तर:
(ग) प्रधानमंत्री

प्रश्न 6.
निम्न में से कौन-सा शब्द भाववाचक का उदाहरण है ?
(क) वीरता
(ख) सुशीला
(ग) नई दिल्ली
(घ) वे
उत्तर:
(क) वीरता

दृढ़ निश्चयी सुशीला Summary

दृढ़ निश्चयी सुशीला पाठ का सार

कुमारी सुशीला अपनी माँ के साथ अपने ननिहाल राजस्थान में टोंक जिले के हनुमनपुरा में रहती थी। उसके पिता का देहान्त हो चुका था। वह खूब मन लगाकर पढ़ती थी। उसकी माँ और नाना को उसकी शादी की चिन्ता थी। वे उसके लिए वर ढूँढ़ने में लग गए। आठवीं कक्षा में पढ़ रही सुशीला को एक दिन जब उसकी माँ ने बताया कि उसके लिए योग्य वर ढूँढ लिया है और जल्दी ही शादी कर देंगे, सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। तेरह वर्ष की सुशीला ने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी उसकी शादी कर दी जाए। उसने माँ से इसका विरोध किया। सुशीला पर बिरादरी के लोगों के द्वारा भी दबाव बनाया गया। उसे भूखा-प्यासा भी रखा गया और यहाँ तक कि उसे मारा-पीटा भी गया। लेकिन सुशीला अपने इरादे पर डटी रही।।

एक दिन मौका पाकर सुशीला अपने ननिहाल से भाग कर अपने ताया जी के घर पहुँच गई। उसे विश्वास था कि वे उसकी सहायता अवश्य करेंगे। उसके ताया ने उसे राजस्थान के मुख्यमन्त्री और पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखने को कहा। पुलिस ने इस मामले को गम्भीरता से लेते हुए इसमें हस्तक्षेप किया और सुशीला की माँ और नाना को समझाया कि बाल-विवाह एक कानूनी अपराध है। सुशीला के घर वालों को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्हें सुशीला के पक्के इरादों के आगे झुकना ही पड़ा। सुशीला की इस बहादुरी के लिए उसे स्कूल तथा जिले में सम्मानित किया गया। अपनी इसी बहादुरी और पक्के इरादे के कारण उसे नई दिल्ली में 24 जनवरी, सन् 2007 को प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह से राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

कठिन शब्दों के अर्थ:

ननिहाल = नाना-नानी का घर। देहान्त = मृत्यु। दुर्भाग्य = बुरा भाग्य। पैरों तले जमीन खिसकना = घबरा जाना, हैरान रह जाना। लायक = योग्य। विचलित = डगमगाना, घबराना। टस से मस न होना = स्थिर रहना, डटे रहना। दलील = तर्क। मुक्त = स्वतन्त्र। हस्तक्षेप करना = बीच में पड़ना। बाध्य = मजबूर। दृढ़-निश्चय = पक्का इरादा। निर्भीकता = निडरता। नवाजा = सम्मान

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 5 पदावली

Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Chapter 5 पदावली Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Hindi Chapter 5 पदावली

Hindi Guide for Class 11 PSEB पदावली Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
गुरु तेग बहादुर जी के अनुसार गुरमुख में कौन-कौन से गुण होने चाहिए ?
उत्तर:
गुरु तेग बहादुर जी के अनुसार गुरमुख में ये गुण होने चाहिए कि वह मन का मान अहंकार त्याग दें, कामक्रोध और बुरे लोगों की संगति को भी त्याग दें, सुख-दुख को एक जैसा माने, हर्ष-शोक को भी समान माने, उसे प्रशंसा और निन्दा की चिंता नहीं होनी चाहिए। जो गुरमुख संसार में रहते हुए मान-अपमान में अन्तर न करते हुए इन्हें एक समान मानते हैं और विपरीत स्थितियों में अपने पथ से विचलित नहीं होते वे ही मुक्ति के अधिकारी होते हैं।

प्रश्न 2.
कहु नानक प्रभु बिरद पछानउ तब हउ पतित तरउ’ का भावार्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत काव्य पंक्ति का भाव यह है कि कोई विद्वान् पुरुष अथवा सद्गुरु का उपदेश ही मुझ पतित को इस संसार रूपी सागर से पार उतार सकता है। जन्म लेने के बाद गुरु का ज्ञान ही तो प्रभु से मिलने का रास्ता बताता है।

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प्रश्न 3.
गुरु जी ने नाम सिमरन पर बल क्यों दिया है ?
उत्तर:
गुरु जी का कहना है कि यदि सिमरन से हाथी का कष्ट दूर हो गया था तो हमारा क्यों नहीं होगा। इसलिए अभिमान का त्याग कर मनुष्य को नाम सिमरन करना चाहिए। सिमरन से कुबुद्धि भी नष्ट हो जाती है और मनुष्य प्रभु को प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न 4.
संकलित पदों के आधार पर गुरु तेग़ बहादुर जी की भक्ति भावना का वर्णन करें।
उत्तर:
गुरु जी की वाणी में नाम सिमरन की महत्ता पर बल दिया गया है क्योंकि नाम सिमरन से मुक्ति मिल सकती है तथा मनुष्य भव सागर से पार हो सकता है। गुरु जी ने मनुष्य को अभिमान त्याग कर, सुख-दुख को समान जानने का भी उपदेश दिया है। साथ ही उन्होंने अज्ञान के भ्रम को दूर कर मन को स्थिर करके, विषय वासना का त्याग कर प्रभु की शरण में जाने को कहा है।

प्रश्न 5.
गुरु तेग बहादुर जी ने अपने पदों में सांसारिक नश्वरता का संकेत किया है। स्पष्ट करें।
उत्तर;
गुरुजी ने सांसारिक नश्वरता को ध्यान में रख कर मनुष्य को कहा है कि मनुष्य को बार-बार जन्म नहीं मिलता है। इसलिए उसे इस नश्वर संसार से पार पाने के लिए प्रभु का स्मरण करना चाहिए। मन, वचन, कर्म से परम सत्ता के प्रति स्वयं को लगा देना चाहिए। गुरु के ज्ञान से ईश्वर के नाम का परिचय मिल सकता है। आडम्बर रचने से ईश्वर कभी प्राप्त नहीं होता। मनुष्य का शरीर भी बार-बार प्राप्त नहीं होता। इसकी प्राप्ति सद्कर्मों से ही होती है। इसलिए अज्ञान के अन्धकार और मोह-ममता से दूर होकर ईश्वर के प्रति उन्मुख हो जाना चाहिए। गुरु के द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर ही सांसारिक नश्वरता से मुक्ति पाई जा सकती है।

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PSEB 11th Class Hindi Guide पदावली Important Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सिक्ख गुरु-परम्परा में नौवें गुरु कौन हैं ?
उत्तर-गुरु तेग़ बहादुर जी।

प्रश्न 2.
गुरु तेग़ बहादुर जी का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर:
सन् 1621 में अमृतसर में।

प्रश्न 3.
गुरु तेग बहादुर जी ने कौन-सा नगर बसाया था ?
उत्तर:
आनन्दपुर साहिब।

प्रश्न 4.
आनन्दपुर साहिब बाद में किस नाम से प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर:
खालसा की जन्मभूमि।

प्रश्न 5.
गुरु तेग़ बहादुर गुरु पद पर कब शोभायमान हुए ?
उत्तर:
गुरु हरिकृष्ण के पद छोड़ने के बाद।

प्रश्न 6.
गुरु तेग़ बहादर जी ने औरंगजेब के अत्याचारों से किसे बचाया था ?
उत्तर:
कश्मीरी पंडितों को बचाया था।

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प्रश्न 7.
गुरु तेग़ बहादुर जी ने अपने पदों में किसकी संगति न करने पर बल दिया है ?
उत्तर:
दुष्टों की संगति।

प्रश्न 8.
गुरु जी ने किसकी स्थापना पर बल दिया था ?
उत्तर:
गुरु जी ने मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल दिया था।

प्रश्न 9.
गुरु जी ने किसे अनमोल बताया है ?
उत्तर:
गुरु जी ने मनुष्य जन्म को अनमोल बताया है।

प्रश्न 10.
संसार रूपी सागर को पार करने के लिए क्या आवश्यक है ?
उत्तर:
संसार रूपी सागर को पार करने के लिए गुरु के उपदेश को पहचानना ज़रूरी है।

प्रश्न 11.
गुरु जी ने अपने पदों में किसे त्यागने की बात कही है ?
उत्तर:
अहंकार, काम, क्रोध और मोह-माया को।।

प्रश्न 12.
गुरु जी ने भक्तिभावना और …………….. की स्थापना पर बल दिया ।
उत्तर:
सांसारिक नश्वरता।

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प्रश्न 13.
किसे व्यर्थ में नहीं खोना चाहिए ?
उत्तर:
मानव जन्म।

प्रश्न 14.
गुरु जी के अनुसार सुख का आधार क्या है ?
उत्तर:
सांसारिक विषय-विकारों में निर्लिप्त रहना सुख का आधार है।

प्रश्न 15.
प्रभु को कौन पहचान सकता है ?
उत्तर:
कोई भी विद्वान् व्यक्ति।

प्रश्न 16.
गुरु जी ने …………. से अपने आप को शरण में लेने की प्रार्थना की है ।
उत्तर:
प्रभु।

प्रश्न 17.
मानव का मन ………… के अंधेरे में उलझा हुआ है ।
उत्तर:
महामोह और अज्ञान।

प्रश्न 18.
मानव ने अपना सारा जन्म ……………. में भटकते हुए बिता दिया ।
उत्तर:
भ्रम।

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प्रश्न 19.
मानव दिन-रात किसमें डूबा रहा ?
उत्तर:
विषय-वासनाओं में।

प्रश्न 20.
सिमरन से किसका कष्ट दूर हो गया था ?
उत्तर:
हाथी।

प्रश्न 21.
गुरु जी की वाणी में किसकी महत्ता पर बल दिया गया है ?
उत्तर:
नाम सिमरन पर।

प्रश्न 22.
सिमरन से क्या नष्ट हो जाती है ?
उत्तर:
कुबुद्धि।

प्रश्न 23.
पतित का उद्धार कौन करता है ?
उत्तर:
परमात्मा।

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प्रश्न 24.
जन्म लेने के बाद …………… प्रभु से मिलन का रास्ता है ।
उत्तर:
गुरु का ज्ञान।

प्रश्न 25.
गुरु जी ने बाह्य आडम्बरों का विरोध किया था ?
उत्तर:
सत्य।

बहुविकल्पी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गुरु परंपरा में गुरु तेग बहादुर जी कौन-से स्थान पर आते हैं ?
(क) आठवें
(ख) नौंवें
(ग) दसवें
(घ) ग्यारहवें।
उत्तर:
(ख) नौंवें

प्रश्न 2.
गुरु तेग बहादुर जी ने कौन-सा नगर बसाया था ?
(क) आनन्दपुर साहिब
(ख) अमृतसर
(ग) जालंधर
(घ) फतेहगढ़ साहिब।
उत्तर:
(क) आनन्दपुर साहिब

प्रश्न 3.
गुरु जी ने किसको सर्वश्रेष्ठ माना है ?
(क) मानवतावाद
(ख) समाजवाद
(ग) प्रयोगवाद
(घ) प्रगतिवाद।
उत्तर:
(क) मानवतावाद।

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पदावली सप्रसंग व्याख्या

रागु गउड़ी महला 9

1. साधो मन का मानु तिआगउ ॥
कामु क्रोधु संगति दुरजन की ता ते अहनिसि भागउ ॥रहाउ॥
सुख दुख दोनों सम करि जानै अउरु मानु अपमाना ॥
हरख सोग ते रहै अतीता तिनि जगि ततु पछाना ॥1॥
उसतति निंदा दोऊ तिआगै खोजै पदु निरबाना ॥2॥
जनु नानक इहु खेलु कठनु है किनहू गुरमुखि जाना॥
                                      (राग गउड़ी महला-9)॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
मानु = अहँकार ।तिआगउ = छोड़ो, त्यागो । कामु = काम वासना। अहनिसि = दिन-रात। भागउ = भागो, दूर रहो। सम = समान। हरख सोग = हर्ष और शोक। अतीता = दूर, पृथक् । तिनि = उन्होंने। जगि ततु = संसार का सार। उसतति = प्रशंसा । निरबाना = मोक्ष, मुक्ति। इह खेलु = यह खेल।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद श्री गुरु तेग बहादुर द्वारा रचित वाणी के अन्तर्गत ‘रागु गउड़ी महला-9’ से उद्धृत किया गया है। इसमें गुरु जी ने व्यक्ति को सांसारिक विकारों से दूर रहने तथा मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करते रहने का उपदेश दिया है।

व्याख्या :
गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं–अरे सांसारिक लोगो ! अपने मन से अहंकार का भाव त्याग दो। काम, क्रोध तथा दुर्जन की संगति से रात-दिन दूर रहो। किसी भी दिन में किसी भी क्षण दुष्टों की संगति न करो। सुख-दुःख, मान तथा अपमान को समान रूप से जानो। जो हर्ष और शोक की भावना से दूर रहते हैं-उनसे प्रभावित नहीं होते, वे ही संसार के तत्व को तथा संसार की वास्तविकता को जान लेते हैं। जो व्यक्ति स्तुति और निन्दा को त्याग देते हैं भाव यह कि जो लोग विषम परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते, उन्हें ही मुक्ति प्राप्त होती है। नानक के जन, गुरु नानक के भक्त ! सुख-दुःख, मान-अपमान में समान रहने का यह खेल बड़ा कठिन है। सुख-दुःख आदि की अवस्थाओं में समान रहना बड़ा कठिन है। कोई ही अर्थात् बिरला गुरमुख (गुरु का चेला) व्यक्ति इस तत्व को पहचान सकता है।

विशेष :

  1. इन पंक्तियों में गुरु तेग बहादुर जी ने मानसिक विकारों से सदैव दूर रहने का उपदेश दिया है।
  2. सांसारिक विषय-विकारों से निर्लिप्त रहना ही सुख का आधार है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं स्वाभाविक है।
  4. सधुक्कड़ी शब्दावली है।
  5. अनुप्रास अलंकार है।
  6. प्रसाद गुण है।
  7. शान्त रस है।
  8. गेयता का गुण विद्यमान है।

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धनासरी महला 9

2. अब मैं कउनु उपाय करउ ।
जह विधि मन को संसा चूकै भउनिधि पारि परउ ॥ रहाउ॥
जनमु पाइ कछु भलो न कीनो ता ते अधिक डरउ ॥
मन बच क्रम हरि गुन नहीं गाए यह जीअ सोच धरउ ॥
गुरमति सुनि कछु गिआनु न उपजिओ पसु जिउ उदरु भरउ ॥
कहु नानक प्रभ बिरद् पछानउ तब हउ पतित तरउ ॥1॥
                                                    (धनासरी महला)

कठिन शब्दों के अर्थ :
कउनु = कौन सा। जिह विधि = जिस तरीके से । संसा = संशय । चूकै = मिटे। भउनिधि = भवसागर। न कीनो = नहीं किया। ता ते = इस से, इसलिए। वच = वचन। क्रम = कर्म। गुरमति = गुरु के उपदेश। न उपजिओ = नहीं उत्पन्न हुआ। उदरु = पेट। विरद = विद्वान्।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी रागु धनासरी महला 9 में से लिया गया है। इसमें गुरु जी ने गुरु के उपदेश को संशय दूर करने वाला एवं संसार रूपी सागर से पार उतारने वाला बताया है।

व्याख्या:
गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं कि अब मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिस से मेरे मन का संशय दूर हो या मिट जाए और मैं संसार रूपी सागर से पार उतर जाऊँ। मैंने मनुष्य जन्म प्राप्त करके भी शुभ कर्म नहीं किए इसी कारण मैं अधिक डर रहा हूँ। मैंने मन, वचन और कर्म से भगवान् के गुणों का गान नहीं किया। यही मेरे मन में विचार आ रहा है। गुरु के उपदेश को सुन कर भी मेरे मन में कुछ ज्ञान नहीं उत्पन्न हुआ। मेरा जीवन तो पशु समान ही रहा जो केवल पेट भरना ही जानता है। गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं कि प्रभु को कोई विद्वान् व्यक्ति ही पहचान सकता है। तभी मैं पतित तर सकता हूँ अर्थात् इस संसार रूपी सागर से पार जा सकता हूँ।

विशेष :

  1. संसार रूपी सागर को पार करने के लिए गुरु के उपदेश को पहचानना ज़रूरी है।
  2. भाषा सरल, सरस एवं सहज है।
  3. तद्भव, तत्सम एवं पंजाबी शब्दावली है।
  4. अनुप्रास तथा रूपक अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

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3. सोरठि महलामन की मन ही माहि रही।
ना हरि भजे न तीरथ सेवे चोटी काल गही ॥ रहाउ॥
दारा मीत पूत रथ संपति धन पूरन सभ मही ॥
अवर सगल मिथिआ ए जानऊ भजनु राम को सही ॥
फिरत फिरत बहुते जुग हारिओ मानस देह लही॥
नानक कहत मिलन की बरीआ सिमरत कहा नहीं ।
                                            (सोरठि महला 9)

कठिन शब्दों के अर्थ :
चोटि = केश। काल = काल, मृत्यु। गही = पकड़ी।दारा = पत्नी। मीत = मित्र। मही = धरती। अबर = और, दूसरा। सकल = सारा, सब कुछ। सही = ठीक। जुग = समय। लही = ली, मिली। बरीआ = अवसर। सिमरत = स्मरण। कहा नहीं = क्यों नहीं।

प्रसंग : प्रस्तुत पद श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी रागु सोरठि महला 9 में से लिया गया है। इसमें गुरु जी ने मनुष्य को ईश्वर के नाम को स्मरण करने का उपदेश दिया है।

व्याख्या :
गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं कि मेरे मन की बात या इच्छा मन में ही रह गई। क्योंकि जीवन में मैंने ईश्वर का भजन नहीं किया और मृत्यु ने आकर मेरी चोटी (बाल) पकड़ ली। पत्नी, मित्र, पुत्र, रथ, संपत्ति धन आदि से धरती परिपूर्ण थी। मुझे सब कुछ प्राप्त था किन्तु मैंने ईश्वर का भजन नहीं किया। मैंने जाना कि अन्य सारी बातें तो मिथ्या हैं। ईश्वर का भजन ही ठीक है। मुझे भटकते-भटकते बहुत समय बीत गया जबकि मुझे मनुष्य देह मिली थी अर्थात् मनुष्य योनि में जन्म लेकर मुझे ईश्वर का भजन करना चाहिए था। गुरु जी कहते हैं कि ईश्वर से मिलने के लिए इस अवसर का (मनुष्य जन्म लेने का) लाभ उठाते हुए तुम ईश्वर के नाम का स्मरण क्यों नहीं करते।

विशेष :

  1. मनुष्य देह प्राप्त करके मनुष्य को ईश्वर का स्मरण, भजन अवश्य करना चाहिए।
  2. भाषा सरल है।
  3. शब्दावली मिश्रित है।
  4. अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शान्त रस।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

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4. माई मैं किहि बिधि लखउ गुसाईं।
महा मोह अगिआन तिमरि मो मनु रहिओ उरझाई ॥ (रहाउ)
सगल जनम भरम ही भरम खोइओ नह असथिरु मति पाई ॥॥
बिखिआ सकत रहिओ निस बासुर नह छूटी अधमाई ॥
साध संगु कबहु नहीं कीना नह कीरति प्रभ गाई ॥
जन नानक मैं नाहिं कोऊ गुनु राखि लेहु सरनाई ॥2॥
                                               (सोरठि महला  9)

कठिन शब्दों के अर्थ :
माई = हे माँ। किहि बिधि = किस तरीके से।लखउ = दर्शन करूँ। गुसाईं = प्रभु। अगिआन = अज्ञान, अविद्या। तिमिर = अंधकार। खोइओ नह = नष्ट नहीं हुआ।मति = बुद्धि। बिखिआ सकत = विषय वासनाओं में डूबा हुआ।निस वासुर = दिन-रात । अधमाई = नीचता। कीरति = यश । रखिलेहु = रख लो। सरनाई = अपनी शरण में।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी रागु सोरठि महला-9 में से लिया गया है। इस पद में गुरु जी ने प्रभु से अपने आप को शरण में लेने की प्रार्थना की है।

व्याख्या :
गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं कि हे माँ! मैं किस तरीके से प्रभु के दर्शन पाऊँ। महामोह और अज्ञान के अन्धेरे में मेरा मन उलझा हुआ है। भटक रहा है। मैंने अपना सारा जन्म भ्रम में भटकते हुए बिता दिया। इस भ्रम का नाश नहीं किया जिससे मेरी बुद्धि अस्थिर ही रही। मैं दिन-रात विषय वासनाओं में ही डूबा रहा। मेरी नीचता दूर नहीं हुई। मैंने कभी भी या जीवन भर साधुओं की संगति नहीं की और न ही प्रभु के यश का गान किया। गुरु तेग बहादुर जी कहते हैं कि मुझ में कोई गुण नहीं है फिर भी प्रभु आप मुझे अपनी शरण में ले लो।

विशेष :

  1. मनुष्य प्रभु से कहता है कि वह कितना ही बुरा है फिर भी आप मुझे अपनी शरण में अवश्य ले लें।
  2. भाषा सरल, सरस एवं सहज है।
  3. पंजाबी, तत्सम, तद्भव शब्दावली का प्रयोग है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शान्त रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

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5. साधो गोबिन्द के गुन गावह ।
मानस जनम अमोलक पाइओ बिरथा काहि गवावह ॥1॥ रहाउ॥
पतित पुनीत दीन बंध हरि सरनि ताहि तुम आवहु ॥
गज को त्रासु मिटिओ जिह सिमरत तुम काहे बिसरावहु ॥1॥
तजि अभिमान मोह माइआ फुनि भजन राम चितु लावऊ ॥
नानक कहत मुकति पंथ इहु गुरमुखि होइ तुम पावउ ॥ ॥2॥
                                                  (राग गाउड़ी, महला 9)

कठिन शब्दों के अर्थ :
गोबिन्द = ईश्वर। गावहु = गाओ। मानस जनमु = मनुष्य का जन्म । अमोलकु = अनमोल, अमूल्य। बिरथा = व्यर्थ। काहि = किस लिए। पतित = गिरा हुआ, भ्रष्ट। पुनीत = पवित्र। दीन-बन्धु = परमात्मा। सरनि = शरण में। गज = हाथी । त्रास = दुःख। बिसरावहु = भूलता है। फुनि = फिर। मुकति पंथ = मोक्ष का मार्ग। गुरमुखि = गुरु का शिष्य।

प्रसंग :’
प्रस्तुत पद श्री गुरु तेग बहादुर द्वारा रचित वाणी ‘गउड़ी महला 9’ से उद्धृत किया गया है। इसमें गुरु जी ने संसार के लोगों को सन्देश दिया है कि मानव-जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

व्याख्या :
गुरु जी कहते हैं-हे ईश्वर भक्तो ! तुम ईश्वर के गुणों का गायन करो, ईश्वर का भजन करते रहो। यह मनुष्य-जन्म अनमोल है, इसको प्राप्त कर सांसारिक विषयों में पड़कर इसे व्यर्थ क्यों गंवा रहे हो। परम पावन ईश्वर पतित, गिरे हुए, भ्रष्ट लोगों का उद्धार करने वाला दीन बन्धु की शरण में तुम्हें जाना चाहिए। भगवान् का स्मरण करते ही उसने हाथी को मगरमच्छ के मुँह से छुड़ाकर उसका दुःख दूर कर दिया था। ऐसे पतित उद्वारक परमात्मा को तुम क्यों भुला रहे हो। अरे मानव ! तुम अहंकार एवं मोह-माया को छोड़कर फिर से भगवान् राम के स्मरण करने में अपने चित्त को लगा ले। श्री गुरु जी के अनुसार मुक्ति का मार्ग यही है इसलिए गुरु का शिष्य बन कर तुम इसे पा सकते हो।

विशेष :

  1. मनुष्य-जन्म सब प्राणियों से श्रेष्ठ है। यह अनमोल है। इसे सांसारिक विषय-वासना में फंस कर गँवाना अनुचित है।
  2. भाषा सरस, सहज एवं सरल है।
  3. पंजाबी, तत्सम और तद्भव शब्दावली है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है।
  6. शांत रस है।
  7. गेयता का गुण विद्यमान है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 5 पदावली

पदावली Summary

पदावली 

गुरु-परम्परा में नवें गुरु तेग बहादुर जी को संयम, त्याग, सहनशीलता एवं करुणा के कारण अति महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मीरी और पीरी की तलवारें धारण करने वाले गुरु श्री हरगोबिन्द साहिब के घर माता नानकी जी के गर्भ से इनका जन्म सन् 1621 को अमृतसर में हुआ था। गुरु गद्दी पर बैठने के पश्चात् आप कई गुरु धामों की यात्रा करते हुए कीरतपुर साहिब पहुंचे। उन्होंने सन् 1666 ई० में पहाड़ी राजाओं से जमीन खरीदकर आनन्दपुर सहिब नामक नगर बसाया जो बाद में खालसा की जन्मभूमि’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा के साथ इन्होंने अध्यात्म-विद्या तथा शस्त्र-विद्या की शिक्षा ग्रहण की। गुरु हरिकृष्ण जी के बाद वे गुरु पद पर शोभायमान हुए। उस समय गुरु जी की आयु 43 वर्ष की थी।

गुरु तेग बहादुर जी ने औरंगजेब के अत्याचारों से पीडित कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया था। यह बलिदान जिस जगह पर हुआ वह दिल्ली में गुरुद्वारा सीस गंज के नाम से प्रसिद्ध है। गुरु जी अति महान् व्यक्तित्व के स्वामी और तपस्वी थे जिन्होंने निरंकार ईश्वर का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने 59 स्वर तथा 57 श्लोकों की रचना पंजाबी से प्रभावित ब्रजभाषा में की थी। इनकी रचनाओं में संसार की नश्वरता, सांसारिक व्यवहार में कटुता, राम-नाम की महिमा, बाह्य आडम्बरों का विरोध और सहजता की प्रत्यक्षता को महत्त्व दिया गया है। उन्होंने संयम, समभाव, ईश्वर प्रेम, सात्विक व्यवहार, मानवतावाद और शुद्ध चिन्तन को श्रेष्ठतम माना था।

पदावली का सार

प्रस्तुत पदावली में गुरु तेग बहादुर जी के श्रेष्ठ पदों को सम्मिलित किया गया है। गुरु जी ने अपने पदों में अहंकार, काम, क्रोध और मोह-माया को त्यागने के लिए कहा है। उन्होंने भक्ति भावना और सांसारिक नश्वरता के साथ-साथ गुरु जी ने मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल दिया है। मनुष्य सभी बन्धनों से मुक्त होकर साधु संगति में लीन होकर व्यक्ति प्रभु को पा सकता है। मानव जन्म संसार में बहुत दुर्लभ है। फिर इसको व्यर्थ में नहीं खोना चाहिए अपितु इसे सार्थक बनाने के लिए मन को प्रभु में लीन करना आवश्यक है। प्रभु भक्ति से ही मनुष्य संसार रूपी भवसागर से पार हो सकता है और यह सब तभी सम्भव है जब मनुष्य गुरु के बताए उपदेशों को अच्छी तरह समझे। मनुष्य यह समझे कि मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता। यह अनमोल है इसे सांसारिक विषय-वासना में फंसा कर गंवाना अनुचित है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 3 सवैये

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PSEB Solutions for Class 11 Hindi Chapter 3 सवैये

Hindi Guide for Class 11 PSEB सवैये Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
रसखान किस देवता की आराधना करना चाहते हैं और क्यों ?
उत्तर:
रसखान श्रीकृष्ण की आराधना करना चाहते हैं क्योंकि आप श्रीकृष्ण के रूप सौंदर्य पर मुग्ध थे। उनके साधन श्रीकृष्ण थे। वे ही उनके सभी मनोरथ पूरे करते थे। रसखान जी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। वे कदापि नहीं चाहते थे कि किसी भी अवस्था में उनसे दूर रहकर वियोग पीड़ा को प्राप्त करते । वे सजीव या निर्जीव अवस्था में उनकी निकटता ही पाना चाहते थे।

प्रश्न 2.
रसखान के अनुसार भवसागर को किस प्रकार पार किया जा सकता है ?
उत्तर:
रसखान कवि कहते हैं कि व्रत, नियम और सच्चाई का पालन करने पर ही भवसागर पार किया जा सकता है। हमें किसी के प्रति राग-द्वेष नहीं रखना चाहिए। सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। ईश्वर का नाम लेने वाले साधुओं की संगत में रहकर पवित्र भावों से ईश्वर के नाम में लीन रहना चाहिए। प्रभु की भक्ति एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए तभी भवसागर को पार किया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
कवि प्राण, रूप, शीश, पैर, दूध और दही की सार्थकता किसमें समझता है ?
उत्तर:
रसखान प्राणों की सार्थकता इसी में समझते हैं जो श्रीकृष्ण पर रीझे रहें और रूप वही सार्थक है जो उन्हें रिझा सके। सिर वही सार्थक है जो सदा उनके कदमों में झुका रहे और पैर वहीं सार्थक हैं जिन्हें प्रभु श्री कृष्ण का स्पर्श हमेशा प्राप्त होता है। दूध वही सार्थक है जिसे श्रीकृष्ण ने दुहा है और दही वही सार्थक है जिसे श्रीकृष्ण ने ढरकाया है। कवि प्रत्येक उसी वस्तु को सार्थक मानता है जो श्रीकृष्ण की निकटता को प्राप्त कर चुकी थी।

प्रश्न 4.
कवि गोकुल गाँव, नन्द की धेनु, गोवर्धन पर्वत, कदम्ब की डालियों पर निवास क्यों करना चाहता है ?
उत्तर:
कवि अपने किसी भी जन्म में केवल उन्हीं वस्तुओं और स्थानों को पाना चाहता है जिनका सम्बन्ध श्रीकृष्ण से रहा है। गोकुल गाँव, नन्द बाबा की गउएँ, गोवर्धन पर्वत, कंद की डालियों आदि सभी का सम्बन्ध श्रीकृष्ण से था। कवि का अटूट विश्वास है कि ये सभी स्थान क्योंकि श्रीकृष्ण से सम्बन्धित है इसलिए वहां उनके दर्शनों का लाभ हो सकता है इसके लिए वे अगले जन्म में ग्वाला, गाय, पत्थर और पक्षी का जन्म पाने की कामना करता हैं।

प्रश्न 5.
गोपिका पूरा स्वाँग करने को तैयार है, परन्तु बाँसुरी को होंठों से लगाना क्यों नहीं चाहती ?
उत्तर:
गोपियां श्रीकृष्ण की ब्रज से अनुपस्थिति में उन जैसा व्यवहार करते हुए उनसे जुड़ी रहने की कामना करती थीं व सब वे कार्य करने को तैयार थीं जो श्रीकृष्ण की संयोगावस्था में किया करती थीं पर वे उनकी बांसुरी को अपने होठों पर लगाने को तैयार नहीं थी क्योंकि वह श्रीकृष्ण की होंठों लगी थी और सदा उनके साथ बनी रहती थी। सौतिया डाह के कारण गोपी श्रीकृष्ण का पूरा स्वांग करने को तैयार है पर बाँसुरी को अपने होंठों से नहीं लगाना चाहती। जिस प्रकार कोई भी नारी अपने जीवन में कभी भी सौत को नहीं पाना चाहती उसी प्रकार गोपियाँ भी बाँसुरी रूपी सौत को स्वीकार नहीं करना चाहतीं।

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PSEB 11th Class Hindi Guide सवैये Important Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
रसखान ने किस संप्रदाय से अपना संबंध जोड़ा था ?
उत्तर:
किसी से नहीं।

प्रश्न 2.
रसखान की भक्ति किस भाव की पर्याय बन गई थी ?
उत्तर:
माधुर्य भाव की।

प्रश्न 3.
रसखान ने किस कारण दिल्ली छोड़ कर ब्रजक्षेत्र की ओर गमन किया था ?
उत्तर:
राज विप्लव और दुर्भिक्ष के कारण।

प्रश्न 4.
रसखान के द्वारा रचित कितने ग्रंथ मिलते हैं ?
उत्तर:
तीन ग्रंथ।

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प्रश्न 5.
रसखान के द्वारा रचित ग्रंथों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सुजान रसखान, प्रेमवाटिका, दानलीला।

प्रश्न 6.
रसखान की रचनाओं का प्रतिपाद्य क्या है ?
उत्तर:
श्रीकृष्ण की लीला माधुरी का अनुगान।

प्रश्न 7.
रसखान किस प्रकार की कथा कहते हैं ?
उत्तर:
अद्वैत प्रेम की कथा।

बहुविकल्पी पध्नोत्तर

प्रश्न 1.
रसखान किसके अनन्य भक्त थे ?
(क) श्री कृष्ण के
(ख) श्री राम के
(ग) शिव के
(घ) हनुमान के।
उत्तर:
(क) श्री कृष्ण के

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प्रश्न 2.
रसखान का किस संस्कृति के प्रति विशेष अनुराग था ?
(क) मुस्लिम
(ख) हिंदू
(ग) सिक्ख
(घ) ईसाई।
उत्तर:
(ख) हिंदू

प्रश्न 3.
रसखान किस प्रेम की कथा कहते हैं ?
(क) द्वैत
(ख) अद्वैत
(ग) निर्गुण
(घ) सुमन।
उत्तर:
(ख) अद्वैत

प्रश्न 4.
गोपियों के अनुसार श्री कृष्ण किसके वश में रहते हैं ?
(क) बांसुरी के
(ख) राधा के
(ग) कृष्ण के
(घ) मोह के।
उत्तर:
(क) बांसुरी के।

सवैये  सप्रसंग व्याख्या

1. सेष सुरेस दिनेस गनेस प्रजेस धनेस महेस मनायौ ।
कोऊ भवानी भजौ, मन की सब आस सवै विधि जाइ पुरावौ॥
कोऊ रमा भजि लेहु महाधन, कोऊ कहूँ, मन वांछिति पायौ ।
पै रसखानि वही मेरे साधन, और त्रैलोक रहौ कि नसावो॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
सेष = शेषनाग। सुरेस = इन्द्र। दिनेस = सूर्य। गनेस = शिव पुत्र गणेश जी। प्रजेस = प्रजापति, ब्रह्मा जी। धनेस = धन के स्वामी-कुबेर । महेस = भगवान् शंकर । भवानी = दुर्गा माँ । सवै विधि = सब तरह से। पुरावौ = पूर्ण कर ले। रमा = लक्ष्मी जी। मनवांछित = मन चाहा। त्रैलोक = तीनों लोक।

प्रसंग :
प्रस्तुत सवैया कृष्ण भक्त कवि रसखान द्वारा लिखित सवैयों से लिया गया है। प्रस्तुत सवैया में कवि रसखान श्री कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति प्रकट कर रहे हैं।

व्याख्या :
रसखान कवि कहते हैं कि कोई शेषनाग को, कोई इन्द्र देवता को, कोई सूर्य देवता को, कोई गणेश जी को, कोई प्रजापति ब्रह्मा जी को, कोई धन के देवता कुबेर को, कोई शंकर भगवान् को मनाता है। उनसे मन्नत माँगता है। कोई दुर्गा माँ का भजन करके अपने मन की सब इच्छाएँ सब प्रकार से पूर्ण करता है। कोई लक्ष्मी जी की पूजा करके बहुत-सा धन प्राप्त करता है। कोई कहीं और अपना मनचाहा प्राप्त करता है। परन्तु रसखान कवि कहते हैं कि तीनों लोकों में और कुछ रहे न रहे पर मेरे तो साधन श्री कृष्ण ही हैं- भाव यह है कि कवि के लिए तो श्रीकृष्ण ही मनोकामना पूर्ण करने वाले आधार हैं।

विशेष :

  1. प्रत्येक मनुष्य अपनी इच्छानुसार अपने आराध्यदेव को मानता है।
  2. रसखान जी के लिए उनके आराध्य देव श्रीकृष्ण हैं वही उनके सभी काम पूर्ण करते हैं।
  3. ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।
  5. प्रसाद गुण है, शांत रस है।
  6. भक्ति रस का सुन्दर परिपाक है।
  7. संगीतात्मकता विद्यमान है।
  8. सवैया छंद है।

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2. सुनिए सब की कहियै न कछु रहियै इमि या मन-बागर में ।
करियै ब्रत-नेम सचाई लियें, जिनतें तरिय, भव-सागर में।।
मिलियै सब सौं दुरभाव बिना, रहियै सतसंग उजागर में।
रसखानि गुवन्दिहिं यौं भजियै, जिमि नागरि को चित्त गागर में।

कठिन शब्दों के अर्थ :
इमि = इस प्रकार। मन-बागर = मन रूपी जाल । नेम = नियम। भवसागर = संसार रूपी समुद्र । दुरभाव = बुरी भावना। उजागर = दीप्तिमान, सात्विक। नागरि = स्त्री।

प्रसंग :
प्रस्तुत सवैया कृष्ण-भक्त कवि रसखान द्वारा रचित सवैयों में से लिया गया है। प्रस्तुत सवैया में कवि श्रीकृष्ण की भक्ति सच्चे हृदय से, एकाग्रचित होकर, करने के लिए कह रहे हैं।

व्याख्या :
कवि रसखान जी कहते हैं हमें सब की बात सुननी चाहिए परन्तु किसी को कुछ नहीं कहना चाहिए हमें ऐसे रहना चाहिए जैसे मन रूपी जाल में कोई बंद हो। हमें सच्चे हृदय से व्रत-नियम का पालन करना चाहिए जिससे हम इस संसार रूपी समुद्र से पार हो सके। सब से बुरी भावना के बिना मिलना चाहिए तथा सदा सात्विक सत्संग में रहना चाहिए। रसखान कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण का भजन ऐसे करना चाहिए जैसे गागर उठाने वाली स्त्री का मन गागर में ही रहता है। वह किसी भी अवस्था में कहीं और नहीं भटकता। श्री कृष्ण भक्ति हमें दत्तचित्त होकर सच्चे मन से करनी चाहिए जैसे गागर उठाने वाली स्त्री का ध्यान गागर में ही केन्द्रित रहता है कि कहीं उसमें भरा हुआ दूध गिर न जाए।

विशेष :

  1. एकाग्र मन से ही भक्ति करनी चाहिए।
  2. साफ और सच्चे मन का मनुष्य ही भवसागर से पार हो सकता है।
  3. ब्रज भाषा सरस तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. सवैया छंद है।
  5. अनुप्रास तथा रूपक अलंकार है।
  6. प्रसाद गुण है।
  7. शांत रस है।
  8. गेयता का गुण विद्यमान है।

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3. प्राण वही जु रहैं रिझि वा पर रूप वही जिहि वाहि रिझायौ।
सीस वही जिन वे पद परसै पद अंक वही जिन वा परसायौ॥
दूध वही जू दुहायौ री वाही दही सु सही जु वही ढरकायौ।
और कहाँ लौ कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायौ।।

कठिन शब्दों के अर्थ :
रिझि = रीझ जाएँ. मोहित हो जाएँ। वा पर = उस पर (श्री कृष्ण पर)। जिहि = जिससे। वाहि = उसे (श्री कृष्ण को)। रिझायौ = प्रसन्न किया। परसे = छुए। अंक = गोद । वा = उनसे । परसायौ = स्पर्श कराना, सटाना, छू लेना। वाही = उनके लिए। ढरकरायौ = उंडेल दिया। मन भायौ = मन को अच्छा लगे, मन भावत।।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश कृष्ण भक्त कवि रसखान द्वारा रचित सुजान रसखान में संकलित सवैयों से लिया गया है। प्रस्तुत सवैया में रसखान जी श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति एवं श्रद्धा प्रकट कर रहे हैं।

व्याख्या :
कवि रसखान जी अपने मन में अभिलाषा करते हुए कहते हैं कि उसी व्यक्ति के प्राण सफल हैं जो उन श्रीकृष्ण पर प्रसन्न हो जाएँ तथा रूप वही सफल हैं जो उनको रिझा सके तथा अपने प्रति मोहित कर सके। सिर वही सफल है जो उनके चरणों का स्पर्श करता है और गोद वही सफल है जो उससे सटी रहती हैं। जिसे उनका स्पर्श प्राप्त होता है। दूध वही अच्छा है जो उन श्रीकृष्ण के लिए दुहाया जाता है और दही वही अच्छी है जिसे श्रीकृष्ण ढरकाते हैं एवं उंड़ेलते हैं। रसखान कवि कहते हैं कि और मैं कहाँ तक कहँ । बस वही भाव अच्छा है जो उनको पसंद आता है। भाव यह है कि जो बात श्रीकृष्ण को अच्छी लगती हो वही मैं करना चाहता हूँ।

विशेष :

  1. उसी मनुष्य का जन्म सफल है जिसे श्रीकृष्ण की कृपा मिल जाए।
  2. श्रीकृष्ण का भक्त वही करना चाहता है जो उन्हें प्रसन्न कर सकें।
  3. ब्रज भाषा तथा तद्भव शब्दावली है।
  4. प्रसाद गुण है।
  5. शांत रस है।
  6. सवैया छंद है।
  7. अनुप्रास अलंकार है।
  8. गेयता का गुण विद्यमान है।

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4. मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौ ब्रज-गोकुल-गाँव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तो कहां बसु मेरौ, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरों करौ, मिलि कालिंदी कूल-कदंब की डारन।।

कठिन शब्दों के अर्थ :
मानुष = मनुष्य। ग्वारन = गवालों। पसु = पशु। बसु = बस। धेनु = गऊओं। मँझारन = बीच में । पाहन = पत्थर । गिरि = पर्वत । कर = हाथों का। छत्र = छतरी। पुरंदर = इंद्र । खग = पक्षी। कालिंदी कूल = यमुना नदी के किनारे । कदंब की डारन = कदंब वृक्ष की पक्तियों में।

प्रसंग :
प्रस्तुत सवैया श्री कृष्ण भक्त कवि रसखान द्वारा रचित ‘सुजान रसखान’ में संकलित सवैयों में से लिया गया है। प्रस्तुत सवैया में रसखान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति को प्रकट कर रहे हैं।

व्याख्या :
रसखान कवि कहते हैं कि अगले जन्म में यदि मैं मनुष्य ही बनूँ या मनुष्य के रूप में जन्म लूँ तो मेरी यह इच्छा है कि मैं गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच ही बरौं। यदि पशु की योनि में जन्म मिला तो इस पर बस तो कोई नहीं है किन्तु मेरी यह इच्छा है कि मैं सदा नन्द बाबा की गौवों के बीच ही चरता रहूँ, जिन गायों को श्रीकृष्ण चराया करते थे। यदि मैं पत्थर बनूँ तो मेरी यही इच्छा है कि उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनूँ जिसे श्री कृष्ण ने इन्द्र के क्रोध से बचाने के लिए ब्रज वासियों के लिए छत्र बनाकर रक्षा की थी। यदि मेरा अगला जन्म पक्षी के रूप में हो तो मेरी यह इच्छा है कि मैं उन कदंब की डालियों पर बसेरा करूँ जो वृक्ष यमुना नदी के किनारे लगे हुए हैं। कवि हर अवस्था में श्रीकृष्ण से जुड़ी वस्तुओं से संपर्क बनाए रखना चाहता है हर अवस्था में ब्रज के निकट ही बना रहना चाहता है।

विशेष :

  1. श्रीकृष्ण भक्त प्रत्येक स्थिति में अपने प्रभु से जुड़ी हर वस्तु , स्थान तथा व्यक्ति के समीप रहना चाहते हैं।
  2. श्रीकृष्ण भक्त अपनी भक्ति को प्रकट करने के लिए अगला जन्म ब्रजभूमि में लेना चाहते हैं।
  3. ब्रजभाषा है।
  4. तद्भव शब्दावली है।
  5. अनुप्रास अलंकार है।
  6. प्रसाद गुण है।
  7. शांत रस है।
  8. गेयता का गुण विद्यमान है।
  9. सवैया छंद है।

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5. मोर पखा सिर ऊपर राखि हौं, गुंज की माल गरे पहरौंगी।
ओढि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी।
भावतो वोहि मेरो रसखानि, सो तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।

कठिन शब्दों के अर्थ :
मोरपखा = मोर पंख । राखिहौं = धारण करके । गुंज = रत्तक रत्ती। गरे = गले। पितांबर = पीला वस्त्र। लकुटी = लकड़ी। गोधन = वन में गऊओं को चराने वाला गीत। संग = के साथ। भावतो = चाहा हुआ। मुरलीधर = श्री कृष्ण। अधरान धरी = होंठों पर रखी हुई अर्थात् उनकी जूठी। अधरा = होंठों पर। न धरौंगी= नहीं धारण करूँगी।

प्रसंग :
प्रस्तुत सवैया श्री कृष्ण भक्त कवि रसखान द्वारा रचित ग्रन्थ ‘सुजान रसखान’ नामक रचना के सवैयों में से लिया गया है। प्रस्तुत सवैया में कवि ने श्री कृष्ण के प्रति गोपियों के निश्छल तथा निस्वार्थ प्रेम का चित्रण किया है।

व्याख्या :
गोपियाँ श्री कृष्ण की भक्ति के वशीभूत होकर श्री कृष्ण का स्वांग भरने को तैयार हो जाती हैं। इस पर उस गोपी ने कहा कि मैं मोर पंख तो सिर पर धारण कर लूँगी और जंगली बेल पर लगने वाले लाल-काले रंग के गोल आकार के बीज रूपी रत्तियों की बनी माला भी गले में पहन लूँगी। पीले वस्त्र पहनकर गौवों को चराने के लिए लकड़ी हाथ में ले लूँगी। वन में गोधन गीत गाते हुए ग्वालों के साथ घूमूंगी। रसखान कवि कहते हैं जो भी उन्हें अच्छा लगता है वे सभी स्वांग मैं उनके कहे से करूँगी। पर उन श्रीकृष्ण की ओंठों पर धारण की गई इस मुरली को मैं अपने होंठों पर नहीं रखूगी। गोपी श्रीकृष्ण की बाँसुरी अपने होंठों से सौतिया डाह के कारण नहीं लगाना चाहती। गोपी को चिढ़ है कि बाँसुरी तो श्री कृष्ण के मुँह लगी है।

विशेष :

  1. गोपियों के श्रीकृष्ण के प्रति निश्छल प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है।
  2. गोपियों का श्रीकृष्ण का स्वांग भरना परन्तु मुरली को होंठों को न लगाना उनकी सौत के प्रति ईर्ष्या भाव को चित्रित करता है।
  3. ब्रज भाषा है। भाषा सरस तथा प्रवाहमयी है।
  4. अनुप्रास और यमक अलंकार है।
  5. सवैया छंद है।
  6. माधुर्य गुण है।
  7. श्रृंगार रस है।
  8. भक्ति रस का सुंदर परिपाक है।
  9. संगीतात्मकता विद्यमान है।

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सवैये Summary

सवैये जीवन-परिचय

हिन्दी के मुसलमान कवियों में रसखान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने मुस्लिम धर्मावलंबी होने पर भी श्रीकृष्ण के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर अपने हृदय की शुद्धता और विशालता का प्रत्यक्ष प्रमाण दिया है। रसखान का जन्म सन् 1558 के आस-पास दिल्ली के एक संपन्न पठान परिवार में हुआ था। इनका पठान बादशाहों के वंश से संबंध माना जाता है। इनके जन्म-समय, शिक्षा-दीक्षा, व्यवसाय एवं निधन के सम्बन्ध में प्रामाणिक रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। रसखान श्रीकृष्ण जी के अनन्य भक्त थे। श्रीकृष्ण जी की भक्ति इनका सर्वस्व था। ये मुसलमान थे और फ़ारसी के विद्वान थे फिर भी इनका हिन्दू संस्कृति के प्रति अत्यधिक अनुराग था। साधुओं के संगीत के कारण इन्होंने वेदों और शास्त्रों के सिद्धान्तों का अध्ययन किया। सन् 1616 के लगभग इनका स्वर्गवास हो गया।

इनकी रचनाओं को संपादकों ने अनेक रूपों में प्रस्तुत किया है। रसखान दोहावली, रसखान कवितावली, रसखानि ग्रंथावली, रसखान शतक, प्रेमवाटिका सुजान रसखान, रसखान पदावली, रत्नावली आदि इनके अनेक संकलन हैं। इनकी रचनाओं में कृष्ण की लीलाओं को बड़ी तन्मयता से प्रस्तुत किया गया है। इनमें प्रेम का मनोहारी चित्रण हुआ है।

सवैये का सार

रसखान हिन्दी के कृष्ण-भक्त कवियों में अपना अलग ही स्थान रखते हैं। प्रस्तुत सवैये ‘सुजान रसखान’ नामक रचना से लिए गए हैं। रसखान जी के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के अपने-अपने आराध्य देव होते हैं परन्तु उनके आराध्य देव श्रीकृष्ण हैं जो उनके सभी मनोरथ पूरे करते हैं। मनुष्य को सबकी सुननी चाहिए परन्तु उसे वही करना चाहिए जिसमें उसका हित निहित हो। कवि के अनुसार श्रीकृष्ण की भक्ति हमें एकाग्र होकर करनी चाहिए तभी हम संसार रूपी सागर से पार हो सकेंगे। कवि अपनी भक्ति में वह सब करना चाहता है जिससे श्रीकृष्ण जी प्रसन्न होकर उन्हें अपनी शरण में ले लें। कवि वही रहना चाहता है जहां कण-कण में श्रीकृष्ण का वास है। वह श्रीकृष्ण की निकटता के लिए कुछ भी करने या बनने को तैयार हैं। कवि गोपियों के श्रीकृष्ण प्रेम और बांसुरी के प्रति सौतिया ईर्ष्या का वर्णन किया है। गोपियां श्रीकृष्ण के प्रेम में उनका रूप धारण करती हैं परन्तु उनकी प्रिय बांसुरी को अपने होठों पर धारण नहीं करना चाहती।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 2 रामराज्य वर्णन

Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Chapter 2 रामराज्य वर्णन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Hindi Chapter 2 रामराज्य वर्णन

Hindi Guide for Class 11 PSEB रामराज्य वर्णन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
श्रीराम के राज्य में सामाजिक स्थिति किस प्रकार की थी ?
उत्तर:
राम-राज्य में राजनीति के दंड और भेद नहीं थे। दंड केवल संन्यासियों के हाथ में होता था तथा भेद केवल नाचने वालों के समाज में था। उनके राज्य में वनों में वृक्ष सदा फूल-फल से लदे रहते थे तथा हाथी और शेर अपने स्वाभाविक वैर को भुलाकर एक साथ रहते थे। पशु-पक्षी आपस में प्रेमपूर्वक रहते थे। भेद-भाव न होने के कारण सामान्य समाज बिना किसी लड़ाई-झगड़े के परस्पर प्रेमपूर्वक रहता था। निर्धनता और अभाव कहीं नहीं थे।

प्रश्न 2.
राम-राज्य में वनस्पति और पशु-पक्षियों की सुरक्षा का वर्णन करें।
उत्तर:
राम-राज्य में वनों में वृक्ष सदा फूल, फलों से लदे रहते थे। लताएँ और वृक्ष जितना माँगो उतना रस टपका देते थे। पक्षी सदा चहचहाते रहते थे और पशु निर्भय होकर वन में चरते थे और आनन्द मनाते थे। पशु और पक्षी सभीअपने सहज वैर को भुलाकर प्रेमपूर्वक रहते थे। सभी प्राणी और प्रकृति इस प्रकार एक-दूसरे के हितचिंतक बने हुए थे कि किसी का भी ह्रास नहीं होता था।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 2 रामराज्य वर्णन

प्रश्न 3.
‘राम-राज्य’ में प्रकृति का राज्य की समृद्धि में क्या स्थान है?
उत्तर:
राम राज्य में प्रकृति भी राज्य की समृद्धि में पूरा योगदान देती थी। वनों में वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे रहते थे। सदा त्रिविध पवन शीतल, सुगन्धित एवं मंद, बहती रहती थी। लताएँ और वृक्ष जितना माँगो उतना रस टपका देते थे। नदियाँ सदा शीतल, निर्मल, स्वाद और सुख देने वाले जल से भरपूर बहती रहती थीं। पर्वत, विविध मणियों की खानों को अपने आप प्रकट कर देते थे तथा सागर भी सदा अपनी मर्यादा में रहता था।

प्रश्न 4.
चारिउ चरण धर्म जग माहीं’ में धर्म के किन चार चरणों का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
श्री राम जी के राज्य में चारों चरणों का पालन होता था। सत्य, शौच (शुद्धता), दया और दान धर्म के यह चार चरण माने जाते थे। कोई भी पाप नहीं करता था। सत्य का पालन करने के परस्पर झगड़े और क्लेश नहीं होते थे। शुद्धता से भरा आचरण मानसिक ताप को दूर करता था जिससे जीवन से हर तरह का क्लेश दूर हो जाता था। दया और दान एक-दूसरे से मिलकर कल्याण को बढ़ाता था जिससे अपनत्व का भाव बढ़ता था। चारों चरण परस्पर मिलकर सौहार्द बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते थे।

प्रश्न 5.
‘दण्ड जतिन्ह कर भेद जहँ, नर्तक नृत्य समाज’ में राम-राज्य की किस व्यवस्था का वर्णन है ?
उत्तर:
राजनीति में शत्रुओं एवं चोर-डाकुओं का दमन करने के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद यह चार उपाय किए जाते थे। श्री राम चन्द्र के राज्य में दण्ड शब्द तो था, किन्तु वह संन्यासियों के हाथ में डंडे के स्वरूप में था। भेद तो थे किन्तु वह प्रजा के मन में न होकर नाचने वालों के समाज में स्वर एवं ताल के भेद के रूप में थे। राजा का कोई शत्रु न होने के कारण ‘जीत लो’ शब्द का प्रयोग लोग केवल मन को जीतने के लिए करते थे शत्रु को जीतने के लिए नहीं।

प्रश्न 6.
गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ के राम-राज्य का आज की स्थिति में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
राम-राज्य का आज की स्थिति में विशेष महत्त्व है। महात्मा गाँधी ने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् जिस राम-राज्य का सपना देखा था, वह आज पूरी तरह से विफल हो चुका है। देश में आज भी ग़रीबी, भूख, भ्रष्टाचार, भाईभतीजावाद, आपसी मतभेद इस सीमा तक बढ़ गए हैं कि इनका समाधान करना कठिन हो रहा है। काश ! देश में रामराज्य जैसी स्थिति फिर से आ जाए जिसमें कोई दरिद्र न हो, कोई दु:खी न हो और कोई दीन न हो।

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PSEB 11th Class Hindi Guide रामराज्य वर्णन Important Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
तुलसीदास किस काव्य-धारा के कवि हैं ?
उत्तर:
तुलसीदास रामकाव्य धारा के कवि हैं।

प्रश्न 2.
तुलसीदास का जन्म और मृत्यु कब और कहाँ हुई ?
उत्तर:
तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1554 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर गाँव में तथा मृत्यु विक्रम संवत् 1680 में काशी में हुई थी।

प्रश्न 3.
तुलसीदास किस नक्षत्र में पैदा हुए थे ?
उत्तर:
तुलसीदास का जन्म अशुभ अमुक्तभूल नक्षत्र में हुआ था ।

प्रश्न 4.
तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ कितनी और कौन-सी हैं ?
उत्तर:
तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ बारह मानी गई हैं जो वैराग्य संदीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, रामाज्ञा प्रश्न, रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, रामललानहछु गीतावली, कृष्णगीतावली, दोहावली तथा बरवै रामायण हैं।

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प्रश्न 5.
तुलसी परमात्मा के किस स्वरूप की उपासना करते हैं ?
उत्तर:
तुलसी परमात्मा के सगुण-स्वरूप की उपासना करते हैं। राम-सीता उनके आराध्य हैं।

प्रश्न 6.
तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य कौन-सा है ?
उत्तर:
रामचरितमानस तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य है।

प्रश्न 7.
तुलसीदास की काव्य-भाषा कौन-सी है ?
उत्तर:
तुलसीदास ने संस्कृत, अवधी तथा ब्रज भाषा में काव्य रचना की है।

प्रश्न 8.
रामचरितमानस की भाषा तथा मुख्य छंद कौन-से हैं ?
उत्तर:
रामचरितमानस की भाषा अवधी तथा मुख्य छंद दोहा-चौपाई है।

प्रश्न 9.
रामराज की क्या विशेषता है ?
उत्तर:
राम-राज में किसी को दैहिक, दैविक तथा भौतिक संताप नहीं कष्ट देते।

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प्रश्न 10.
धर्म के चार चरण कौन-से हैं ?
उत्तर:
धर्म के चार-चरण सत्य, शौच, दया और दान माने गए हैं।

प्रश्न 11.
‘नभगेस’ कौन है ?
उत्तर:
गरूड़ को नभगेस कहा जाता है।

प्रश्न 12.
श्रुति नीति क्या होती है ?
उत्तर:
वेद-शास्त्रों द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार जीवनयापन करना।

प्रश्न 13.
राम-राज्य के सुखों और संपत्ति का वर्णन कौन नहीं कर सकता ?
उत्तर:
राम-राज्य के सुखों और संपत्ति का वर्णन शेषनाग अपनों सहस्रों मुखों तथा सरस्वती भी अपनी वाणी से नहीं कर सकती।

प्रश्न 14.
राम-राज्य में किस युग की स्थिति बन गई है ?
उत्तर:
रामराज्य में सतयुग की स्थिति बन गई है ।

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प्रश्न 15.
रामराज्य में वनों की क्या दशा है ?
उत्तर:
वन में हाथी-सिंह और पक्षी-पशु परस्पर मिल-जुल कर रहते हैं।

प्रश्न 16.
श्रीराम ने कौन-से यज्ञ किए थे ?
उत्तर:
श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ किए थे।

प्रश्न 17.
श्रीराम को कवि ने कैसा राजा कहा है ?
उत्तर:
श्रीराम वेदमार्ग का पालन करने वाले तथा धर्मानुसार चलने वाले थे।

प्रश्न 18.
राजा दशरथ के द्वार पर जाकर सखी ने क्या देखा ?
उत्तर:
राजा दशरथ बालक राम को गोद में लेकर बाहर आए थे।

प्रश्न 19.
सखी ने बालक राम को क्या कहा है ?
उत्तर:
सखी ने बालक राम को सोच-विमोचन कहा है।

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प्रश्न 20.
बालक राम की वेशभूषा कैसी है ?
उत्तर:
बालक राम ने पैरों में नूपुर तथा कलाई पर पहुँची बाँधी हुई है। उनके हृदय पर मणियों की माला तथा शरीर पर पीला अँगा सुशोभित हो रहा है।

प्रश्न 21.
श्रीराम के शरीर की कांति कैसी है ?
उत्तर:
श्रीराम के शरीर की कांति ‘स्याम सरोरूह’ की तरह है।

प्रश्न 22.
श्रीराम की आँखों में आँसू क्यों आए ?
उत्तर:
‘सीता जी की व्याकुलता तथा वन-मार्ग में चलने की कठिनाई के कारण श्रीराम की आँखों में आँसू आ गए थे।

प्रश्न 23.
राम-राज्य में वृक्ष सदा ……………… से लदे रहते थे ।
उत्तर:
फल तथा फूलों से।

प्रश्न 24.
राम-राज्य में गऊएँ ………….. देती थीं ।
उत्तर:
मनचाहा दूध।

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प्रश्न 25.
श्रीराम के राज्य में दंड किसके हाथ में दिखाई देता था ?
उत्तर:
केवल संन्यासियों के।

बहुविकल्पी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तुलसीदास की माता जी का नाम क्या था ?
(क) हुलसी
(ख) तुलसी
(ग) भोली
(घ) देवी।
उत्तर:
(क) हुलसी

प्रश्न 2.
तुलसीदास किस शाखा के प्रवर्तक माने जाते हैं ?
(क) कृष्ण भक्ति
(ख) रामभक्ति
(ग) निर्गुण भक्ति
(घ) कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) रामभक्ति

प्रश्न 3.
‘रामराज्य वर्णन’ कविता रामचरितमानस के किस कांड में संकलित है ?
(क) अयोध्या कांड
(ख) लंका कांड
(ग) उत्तर कांड
(घ) सुंदर कांड।
उत्तर:
(ग) उत्तर कांड

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प्रश्न 4.
रामचरितमानस किस भाषा में लिखित है।
(क) अवधी
(ख) अवधि
(ग) अवध
(घ) अयोध्या।
उत्तर:
(क) अवधी।

राम-राज्य वर्णन सप्रसंग व्याख्या

1. राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।
बयरु न कर काहु सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि व्यापा।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
त्रैलोका = तीनों लोक। हरषित भए = प्रसन्न हो गए। सोका = शोक । बयरू = वैर। काहूसन = किसी से भी। विषमता = भेदभाव। खोई = नष्ट हो गई। दैहिक = शारीरिक। दैविक = देवताओं द्वारा दिया गया। भौतिक = सांसारिक। तापा = कष्ट, दुःख। व्यापा = होना। प्रीती = प्रेम । स्वधर्म = अपने-अपने धर्म पर। निरत = लीन, लगे हुए, पालन करते थे। श्रुति नीति = वेद की बताई गई नीति (मर्यादा)।

प्रसंग :
प्रस्तुत पद्यांश राम भक्ति शाखा के प्रमुख कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखित महाकाव्य रामचरितमानस के उत्तर कांड के अन्तर्गत दिए गए ‘राम राज्य वर्णन’ प्रसंग में से लिया गया है। इसमें कवि ने राम-राज्य के गुणों एवं प्रभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या :
गोस्वामी तुलसीदास जी राम-राज्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि श्री राम के राज्य सिंहासन पर बैठने पर तीनों लोकों के प्राणी प्रसन्न हो उठे और उनके सब शोक मिट गए। श्री राम के राज्य में कोई किसी से भी वैर नहीं करता था। श्री राम के प्रताप से सब का आंतरिक भेद-भाव मिट गया था। श्री राम के राज्य में किसी को भी शारीरिक, . देवताओं द्वारा दिया गया या सांसारिक कष्ट नहीं था। सभी मनुष्य आपस में प्रेमपूर्वक रहते थे और सदा अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए वेद द्वारा बताई गई नीति पर चलते थे।

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी का भाव यह है कि श्री राम जी के राज्य में किसी को कोई कष्ट नहीं। सभी लोग वेदों द्वारा बताई गई नीतियों पर चलते थे।
  2. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है।
  3. गेयता का गुण विद्यमान है, भाषा अवधी है। तत्सम शब्दावली है। चौपाई छंद है।

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2. चारिउ चरण धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥
अल्प मृत्यु नहिं कवीनउ पीरा। सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
चारिउ = चारों। माहीं = में। पूरि रहा = परिपूर्ण हो रहा है। अघ = पाप। रत = लीन। सकल = सभी। परम गति = मोक्ष पद। अल्प मृत्यु = छोटी अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होना। कवीनउ = किसी को भी। पीरा = दुःख। बिरुज = निरोग। दरिद्र = ग़रीब। अबुध = मूर्ख। लच्छनहीना = शुभ लक्षणों से रहित होना।

प्रसंग :
यह काव्यांश तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड के ‘राम राज्य वर्णन’ नामक प्रसंग से लिया गया है। इसमें कवि ने राम राज्य की विशेषताओं का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के राज्य में धर्म अपने चारों चरणों-सत्य, शौच, दया और दान से जगत् में परिपूर्ण हो रहा था तथा सपने में भी कोई पाप नहीं करता था। सभी स्त्री-पुरुष श्री राम की भक्ति में लीन रहते थे, जो सभी मोक्ष पद (परमपद) को प्राप्त करने के अधिकारी थे।

श्री राम के राज्य में छोटी अवस्था में मृत्यु हो जाने की पीड़ा किसी को नहीं थी। सभी सुंदर थे और निरोग शरीर वाले थे। श्री राम के राज्य में न कोई ग़रीब था, न कोई दुःखी था और न कोई दीन था और न ही कोई मूर्ख था और न ही शुभ लक्षणों से रहित था।

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद्यांश का भाव यह है कि श्री राम जी के राज्य में चारों ओर प्रभु भक्ति की भावना थी। इसीलिए चारों ओर स्वस्थ लोग निवास करते थे।
  2. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है।
  3. भाषा अवधी है। तत्सम शब्दावली का प्रयोग है।
  4. चौपाई छन्द है।

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3. सब निर्दभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुणी।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥
दण्ड जतिन्ह कर भेद जहँ के नर्तक नृत्य समाज।
जीतह मनहिं सुनिअ अस रामचंद्र के राज॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
निर्दभ = अभिमान रहित। पुनी = पुण्यवान । चतुर = सयाने। गुणी = गुणवान् । सयानी = चतुर । दण्ड = डंडा, सज़ा। जतिन्ह = संन्यासियों। कर = हाथों में। भेद = अलगाव का भाव, नृत्य के भेद (तोड़े)। जीतहु = जीत लो। मनहिं = मन को। सुनिअ = सुनाई पड़ता है। अस = ऐसा।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड के ‘राम राज्य वर्णन’ प्रसंग से ली गई हैं, जिसमें कवि ने राम-राज्य की विशेषताओं का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के राज्य में सभी स्त्री-पुरुष अभिमान रहित, धर्मपरायण और पुण्यवान थे। सभी सयाने और गुणवान थे। सभी गुणों को ग्रहण करने वाले, पंडित तथा ज्ञानी थे। सभी किए गए उपकार को मानने वाले तथा कपट करने में चतुर नहीं थे।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के राज्य में दंड (डंडा) केवल संन्यासियों के ही हाथ में दिखाई पड़ता था। दंड अथवा सज़ा देना शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता था। इसी प्रकार भेद केवल नाचने वालों के समाज में ही विद्यमान था। प्रजा में कोई आपसी भेदभाव नहीं था। ‘जीत लो शब्द मन को’-जीतने के लिए सुनाई पड़ता था। ऐसा रामचंद्र जी के राज्य में था।

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी का भाव यह है कि श्री राम जी के राज्य में सभी लोग गुणवान थे। किसी भी व्यक्ति को दंड देने की आवश्यकता नहीं थी।
  2. अनुप्रास तथा उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग है।
  3. गेयता का गुण विद्यमान है। भाषा अवधी है। तत्सम शब्दावली है।
  4. ‘सब निर्दभ …… सयानी’ में चौपाई छंद तथा ‘दण्ड …… राज’ में दोहा छंद है।

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4. फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन।
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।
कूजहिं खग मृग नाना बंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।
सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
तरु = वृक्ष। कानन = वन । गज = हाथी। पंचानन = सिंह। खग = पक्षी। मृग = पशु। सहज = स्वाभाविक। बयरु = वैर। बिसराई = भूलकर। कूजहिं = चहचहाते हैं। बंदा = समूह। अभय = निडर होकर । सुरभि = सुगन्धित। मंदा = धीमी-धीमी। गुंजत = गुंजार करता हुआ। अलि = भंवरा। मकरंदा = फूलों का रस।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड के ‘राम राज्य वर्णन’ प्रसंग से ली गई हैं, जिसमें कवि ने राम-राज्य की विशेषताओं का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के राज्य में वनों में वृक्ष फूलों और फलों से सदा लदे रहते थे। हाथी और सिंह भी अपने स्वाभाविक वैर को भुलाकर एक साथ रहते थे। पशु और पक्षी भी अपने स्वाभाविक वैर को भुलाकर आपस में प्रेमपूर्वक रहते थे। पक्षियों के अनेक समूह चहचहाते थे ! पशु निडर होकर चरते थे और वन में आनन्द मनाते थे। तीन तरह की वायु-शीतल, सुगन्धित और धीमी बहती थी और गुंजार करते हुए भँवरे फूलों के रस को लेकर चलते थे।

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम जी के राज्य में पशु-पक्षी सभी आपसी भेदभाव भुलाकर प्यार से रहते थे। प्रकृति भी अपना भरपूर रूप बरसाती थी।
  2. अनुप्रास अलंकार है।
  3. भाषा अवधी है। तत्सम शब्दावली है।
  4. चौपाई छन्द है।

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5. लता बिटप मांगे मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरणी। हतां मह कृतजुग कै करनी॥
प्रगटी गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।
सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुख कारी॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
बिटप = वृक्ष। मधु = रस। मनभावतो = मनचाहा। धेनु = गाय। पय = दूध । स्त्रवहीं = देती हैं। ससि = फसल। संपन्न = भरी रहती है। धरणी = पृथ्वी। कृतयुग = सतयुग। गिरिन्ह = पर्वतों ने। बिबिध = अनेक प्रकार के। मनि खानी = मणियों की खानें, मणियों के भंडार। भूप = राजा। सरिता = नदियाँ। सकल = सारी। बर बारी = श्रेष्ठ जल। सीतल = ठंडा। अमल = निर्मल, स्वच्छ। सुखकारी = सुख देने वाला।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड के ‘राम राज्य वर्णन’ प्रसंग से ली गई हैं, जिसमें कवि ने राम-राज्य की विशेषताओं का उल्लेख किया है।

व्याख्या :
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के राज्य में लताएँ और वृक्ष जितना चाहो उतना रस टपका देते थे। गऊएँ भी मनचाहा दूध देती थीं। पृथ्वी भी सदा फसल से भरपूर रहती थी। इस तरह त्रेतायुग में भी सतयुग जैसी स्थिति आ गई थी। पर्वत अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर देते थे। राजा राम को जगत् की आत्मा समझकर सभी नदियाँ निर्मल जल से परिपूर्ण बहती थीं, जिनका जल ठंडा, निर्मल, स्वाद वाला था तथा सुख देने वाला था।

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद्यांश में तुलसी दास जी का भाव यह है कि श्री राम जी के राज्य में किसी भी वस्तु की कमी नहीं थी। सभी पदार्थ भरपूर थे। जितनी जिसको आवश्यकता होती थी, उतनी वह प्राप्त कर लेता था।
  2. अनुप्रास अलंकार है। भाषा अवधी है। तत्सम शब्दावली है।
  3. गेयता का गुण विद्यमान है।
  4. चौपाई छन्द है।

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6. सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहिं।
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।
बिधु महि पूर मयूखन्हि रवि तप जेतनेहि काज।
मांगे बारिद देहिं जल, रामचंद्र के राज॥

कठिन शब्दों के अर्थ :
मरजादाँ = मर्यादा। डारहिं = डाल देता है। लहहिं = ले लेते हैं। सरसिज = कमल । संकुल = समूह में। तड़ागा = तालाब। विभागा = प्रदेश। बिधु = चन्द्रमा। महि = पृथ्वी। पूर = परिपूर्ण । मयूखन्हि = किरणें । रवि = सूर्य । तप = गर्मी । जेतनेहि = जितने की। काज = आवश्यकता होती है। बारिद = बादल।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड के ‘राम राज्य वर्णन’ प्रसंग से ली गई हैं, जिसमें कवि ने राम-राज्य के गुणों का वर्णन किया है।

व्याख्या :
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के राज्य में सागर सदा अपनी मर्यादा में रहता था। वह रत्नों को किनारे पर डाल देता था जिसे लोग ले लेते थे। सभी तालाबों में कमल के फूल समूह में खिले रहते थे तथा दसों दिशाओं के प्रदेश अत्यन्त प्रसन्न थे।

श्री रामचन्द्र जी के राज्य में चन्द्रमा अपनी किरणों से पृथ्वी को पूर्ण रखता था तथा सूर्य उतनी ही गर्मी देता था जितनी आवश्यकता होती थी। बादल भी माँगने पर जितना जल चाहिए उतना बरसा देते थे।

विशेष :

  1. प्रस्तुत पद्यांश में तुलसीदास जी का भाव यह है कि श्री राम जी के राज्य में प्रकृति मर्यादा में रहते हए सब का कल्याण करती थी।
  2. अनुप्रास अलंकार है। भाषा अवधी है। तत्सम शब्दावली है।
  3. गेयता का गुण विद्यमान है।
  4. ‘सागर …….. बिभागा’ में चौपाई छंद तथा ‘बिधु ……. राज’ मे दोहा छंद है।

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राम-राज्य वर्णन Summary

राम-राज्य वर्णन जीवन परिचय

हिन्दी-साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास का वर्णन एक महाकवि के रूप में किया जाता है। भक्तिकाल के रामभक्ति शाखा के कवियों में इनको सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। इनका जन्म सन् 1532 ई० के आस-पास राजापुर में हुआ। इनके पिता का नाम आत्मा राम तथा माता का नाम हुलसी था। तुलसी दास जी का बाल्यकाल कठिनाइयों में बीता। इनका विवाह राजापुर में दीन बन्धु पाठक की कन्या रत्नावली के साथ हुआ । रत्नावली से विवाह के बाद वे उनके प्रेम में डूब गए। उन्हें उनके अतिरिक्त कहीं भी कुछ दिखाई नहीं देता था। एक दिन पत्नी की फटकार ने उनका मन बदल दिया और राम भक्ति की ओर अग्रसर हुए। इन की मृत्यु सन् 1623 ई० में काशी में हुई थी।

गोस्वामी जी एक भक्त, साधक एवं महाकवि थे, इनकी अनेक रचनाएँ उपलब्ध हैं जैसे-रामचरितमानस, विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली रामाज्ञा प्रश्न, वैराग्य संदीपिनी, पार्वती-मंगल, रामलला नहछू, बरवै रामायण, कृष्णगीतावली तथा जानकी मंगल आदि है। तुलसीदास जी ने अपने काव्य की रचना अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं में की है। उन्होंने अपने काव्य की रचना तत्कालीन युग में प्रचलित सभी शैलियों में की है। इनके प्रिय छन्द दोहा, चौपाई सोरठा, बरवै, कवित्त सवैया आदि हैं। अलंकारों में कवि ने रूपक, अनुप्रास, उपमा, उत्पेक्षा दृष्टान्त, उदाहरण, यमक आदि अलंकारों का अधिक प्रयोग किया है।

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राम-राज्य वर्णन काव्यांश का सार

प्रस्तुत काव्यांश तुलसीदास जी कृत ‘रामचरितमानस’ के उत्तर कांड में संकलित ‘राम-राज्य वर्णन’ से लिया गया है। ‘रामराज्य’ सभी भारतीयों के लिए एक आदर्श है। सभी अपने राज्य में राम जी जैसा राज्य चाहते हैं। उनके राज्य में चारों ओर प्रसन्नता तथा उल्लास का वातावरण था। धर्म अपनी चरमसीमा पर था। उस समय अधर्म तथा पाप का नाम नहीं था। इसलिए उस समय आर्थिक अभाव, अल्पमृत्यु साम्प्रदायिक द्वेष, दारिद्रय तथा अविवेक नहीं था। मानव ही नहीं अपितु पशु-पक्षी तथा प्रकृति भी प्रेम पूर्वक रहते थे। प्रकृति मानव की आवश्यकतानुसार अपनी समस्त निधियाँ जन-कल्याण के लिए देती थी। समुद्र भी अपनी मर्यादा जानते थे, वे अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते थे। इसलिए मनुष्य प्राकृतिक प्रकोप से बचा रहता था।