PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 8 सजावटी पौधे

Punjab State Board PSEB 7th Class Agriculture Book Solutions Chapter 8 सजावटी पौधे Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Agriculture Chapter 8 सजावटी पौधे

PSEB 7th Class Agriculture Guide सजावटी पौधे Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
बहूपयोगी वृक्ष का कोई एक उदाहरण दें।
उत्तर-
पैगोड़ा, अमलतास आदि।

प्रश्न 2.
खुशबूदार फूलों वाले किसी एक वृक्ष का नाम बताएं।
उत्तर-
पैगोड़ा, सोनचंपा, बड़ा चम्पा आदि।

प्रश्न 3.
बाड़ बनाने के लिए किसी एक उपयुक्त झाड़ी का नाम बताएं।
उत्तर-
कामिनी, केशिया, पीली कनेर।

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प्रश्न 4.
दो फूलदार झाड़ियों के नाम बताएं।
उत्तर-
रात की रानी, चांदनी, पीली कनेर।

प्रश्न 5.
खुशबूदार फूलों वाली झाड़ी का नाम लिखें।
उत्तर-
रात की रानी।

प्रश्न 6.
सजावटी पौधे लगाने के लिए उपयुक्त समय कौन-सा होता है ?
उत्तर-
बहार के मौसम में तथा वर्षा के दिनों में।

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प्रश्न 7.
परदा करने के लिए किस बेल का उपयोग करना चाहिए ?
उत्तर-
परदाबेल (वरनोनिया लता), गोल्डन शावर।

प्रश्न 8.
घरों के अंदर सजावट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली किसी एक बेल का नाम बताएं।
उत्तर-
मनी प्लांट।

प्रश्न 9.
मर्मी की ऋतु वाले किसी एक मौसमी फूल का नाम लिखो।
उत्तर-
सूरजमुखी, दोपहर खिली, जीनीया।

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प्रश्न 10.
सर्द ऋतु वाले मौसमी फूलों का बीज कौन-से महीने बीजा जाता है ?
उत्तर-
सितम्बर के मध्य।

(ख) एक-दो वाक्य में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
छायादार वृक्ष के क्या गुण होने चाहिएं ?
उत्तर-
इन वृक्षों का फैलाव गोल, छतनुमा तथा पत्ते घने होने चाहिएं।

प्रश्न 2.
चार फूलदान झाड़ियों के नाम लिखें।
उत्तर-
चाइना रोज़, रात की रानी, पीली कनेर, बोगनविलिया, चांदनी आदि।

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प्रश्न 3.
बेलों को कहाँ लगाया जाता है ?
उत्तर-
बेलों को सहारे की आवश्यकता होती है, इनको दीवारों, वृक्षों आदि के पास लगाया जाता है ताकि इनकों सहारे से ऊपर चढ़ाया जा सके।

प्रश्न 4.
खुशबूदार फूलों वाली दो बेलों के नाम लिखें।
उत्तर-
चमेली, माधवी लता खुशबूदार फूल वाली बेलें हैं।

प्रश्न 5.
सजावटी झाड़ियों के क्या गुण होते हैं ?
उत्तर-
जिन स्थानों पर वृक्ष लगाने का स्थान न हो वहां झाड़ियां सरलता से लग जाती

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प्रश्न 6.
मौसमी फूल कौन-से होते हैं ?
उत्तर-
मौसमी फूल एक साल या एक मौसम में अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।

प्रश्न 7.
सड़कों के पास वृक्ष किस उद्देश्य के लिए लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
यह आसपास की सुंदरता में वृद्धि करते हैं तथा मिट्टी क्षरण से बचाते हैं।

प्रश्न 8.
ऊंची बाड़ तैयार करने के लिए कैसे वृक्षों का चुनाव करना चाहिए ?
उत्तर-
ऊंची बाड़ तैयार करने के लिए सीधे तथा लम्बे जाने वाले वृक्ष पास-पास लगाए जाते हैं।

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प्रश्न 9.
श्रृंगार वृक्ष किस उद्देश्य के लिए लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
ये वृक्ष खूबसूरत फूलों के लिए लगाए जाते हैं।

प्रश्न 10.
झाड़ियों का प्रयोग आसानी से कहां किया जा सकता है ?
उत्तर-
जहां वृक्ष लगाने के लिए आवश्यकतानुसार स्थान न हो, वहां झाड़ियों का प्रयोग सरलता से हो जाता है।

(ग) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
सजावटी वृक्षों को लगाने के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-

  1. सजावटी वृक्ष आसपास की सुंदरता में वृद्धि करते हैं।
  2. सजावटी वृक्ष मिट्टी क्षरण को रोकते हैं।
  3. वृक्ष वातावरण को भी शुद्ध रखने में भूमिका निभाते हैं।
  4. वृक्ष वातावरण को ठण्डा रखने में सहायक हैं।
  5. कई वृक्षों के फूल सुंगध वाले होते हैं जिससे वातावरण महक उठता है।
  6. कई वृक्ष यात्रियों को छाया देते हैं।

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प्रश्न 2.
सजावटी झाड़ियों का चुनाव कैसे किया जाता है ?
उत्तर-
सजावटी झाड़ियों के चुनाव के लिए किस्में इस प्रकार हैं—

  1. फूलदार झाड़ियां-रात की रानी, चाइना रोज़, बोगनविलिया,चांदनी, पीली कनेर आदि।
  2. सुंदर पत्तों वाली झाड़ियां-अलीयर, कामनी, क्लैरोडेंडरौन, पीली कनेर, केशिया आदि। .
  3. भू-ढपनी झाड़ियां-लैंटाना। .
  4. दीवारों के निकट लगने वाली झाड़ियां-टीकोमा, अकलिफा आदि।

प्रश्न 3.
सजावटी बेलों का चुनाव अलग-अलग स्थानों के लिए कैसे किया जाता है ?
उत्तर-
बेलों का चुनाव नीचे लिखे अनुसार किया जाता है’

  1. धूप वाले स्थान के लिए-बोगनविलिया, झुमका बेल, लसन बेल, गोल्डन शावर आदि।
  2. घर के अन्दर रखने के लिए-मनी प्लांट।
  3. बाड़ बनाने के लिए-बोगनविलिया, क्लैरोडेंडरौन, एस्प्रेगस आदि।
  4. हल्की बेलें-लोनीसोरा, मिठी मटरी आदि।
  5. खुशबूदार फूलों वाली बेलें-चमेली, माधवी लता।
  6. गमलों में लगाई जाने वाली-बोगनविलिया।
  7. भारी बेल-बिग़नोनिया, बोगनविलिया, माधवी लता, झुमका बेल, गोल्डन शावर।

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प्रश्न 4.
मौसमी फूलों का मौसम के आधार पर वर्गीकरण करें।
उत्तर-
मौसम के आधार पर फूलों का वर्गीकरण—

  1. गर्मी ऋतु के फूल-इन की बोवाई फरवरी-मार्च में की जाती है तथा खेत में लगाने के लिए पनीरी चार सप्ताह में तैयार हो जाती है। इस मौसम के मुख्य फूल हैंकोचिया, जीनीया, गेलारडिया, दोपहर खिली, गौंफरीना आदि।
  2. वर्षा ऋतु के फूल-इनकी जून के पहले सप्ताह बोवाई की जाती है तथा खेत में लगाने के लिए पनीरी जुलाई के पहले सप्ताह में तैयार हो जाती है। बाल्सम, कुक्कड़ कल्गी इस मौसम के फूल हैं।
  3. सर्दी ऋतु के फूल-इनको सितम्बर के मध्य में बोया जाता है तथा पनीरी अक्तूबर के मध्य में तैयार हो जाती है। इस ऋतु के फूल हैं-कैलैंडूला, डेहलिया, पटूनिया, गेंदा आदि।

प्रश्न 5.
सजावटी वृक्षों का चुनाव किन-किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है? उदाहरण सहित लिखें।
उत्तर-
सजावटी वृक्षों का चुनाव अग्रलिखित उद्देश्यों के लिए किया जाता है—

  1. छाया के लिए-इन वृक्षों का फैलाव गोल तथा पत्ते घने तथा छाया देने वाले होते हैं। इनका उदाहरण है-नीम, सत्तपत्तिया, पीपल, पिलकन आदि।
  2. श्रृंगार के लिए-ये वृक्ष सुंदर फूलों के लिए लगाए जाते हैं; जैसे-कचनार, नीली गुलमोहर, लाल गुलमोहर आदि।
  3. सड़कों के आसपास लगाने वाले वृक्ष-ये वृक्ष छाया तथा शृंगार दोनों उद्देश्यों के लिए लगाए जाते हैं; उदाहरण, अमलतास, डेक, पिलकन, सिल्वर ओक आदि।
  4. बाड़ के तौर पर लगाए जाने वाले वृक्ष-इन का उद्देश्य ऊंची बाड़ तैयार करना है। यह मुख्य फसल को तेज़ हवा से बचाते हैं। इनको पास-पास लगाया जाता है तथा यह पर्दे का रूप धारण कर लेते हैं। उदाहरण सिल्वर ओक, सफैदा, पाप्लर, अशोका आदि।
  5. वायु प्रदूषण रोकने के लिए-कारखानों में से निकलता धुआं तथा रासायनिक गैसें वातावरण को दूषित करती हैं। इसलिए इस उद्देश्य के लिए पतझड़ वृक्ष जिनके पत्ते मोटे तथा चमकदार हों, लगाए जाते हैं; जैसे-शहतूत, पाप्लर, पैगोड़ा आदि।
  6. औषधी गुणों वाले वृक्ष-ये दवाई वाले वृक्ष हैं। इनका उदाहरण है-नीम, जामुन, अर्जुन, महुया, अशोका आदि।

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Agriculture Guide for Class 7 PSEB सजावटी पौधे Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कांटों की सहायता से ऊपर चढ़ने वाली दो लताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
गुलाब और बोगनविलिया।

प्रश्न 2.
खुशबू के लिए लगाई जाने वाली दो लताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
जैसमीन, माधवी लता।

प्रश्न 3.
हल्के जामुनी रंग के घंटियों जैसे फूल किस लता पर लगते हैं ?
उत्तर-
एडीन्कोलाइमा।

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प्रश्न 4.
बुरे स्थानों को छिपाने के लिए कौन-सी लता लगाई जाती है ?
उत्तर-
अरिस्टोलोचिया।

प्रश्न 5.
माधवी लता पर किस रंग के फूल होते हैं ?
उत्तर-
सफेद रंग के।

प्रश्न 6.
गोल्डन शावर पर लगने वाले फूल किस रंग के होते हैं ?
उत्तर-
संतरी रंग के।

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प्रश्न 7.
पर्दै जैसा प्रभाव डालने वाली लता कौन-सी है ?
उत्तर-
वरनोनिया (पर्दा लता)।

प्रश्न 8.
छायादार स्थान पर कौन सी लता लगानी ठीक है ?
उत्तर-
फाइक्स रैप्नस।

प्रश्न 9.
पत्ते झड़ने वाली लताएं किस महीने में लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
जनवरी-फरवरी में।

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प्रश्न 10.
धूप वाले स्थान पर लगाई जाने वाली दो लताओं के नाम बताओ ।
उत्तर-
गोल्डन शावर, झुमका बेल।

प्रश्न 11.
झुमका लता को और क्या कहते हैं ?
उत्तर-
रंगून क्रीपर।

प्रश्न 12.
बाजा लता कौन-सी है ?
उत्तर-
कैंपसिस ग्रैंडीफ्लोरा।

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प्रश्न 13.
बिना सहारे के उगाई जाने वाली किसी लता का नाम बताओ।
उत्तर-
बाजा लता।

प्रश्न 14.
ईंडरॉन लता किस काम आती है ?
उत्तर-
छायादार स्थान पर बाड़ लगाने के काम आती है।

प्रश्न 15.
गोल्डन शावर लता किस काम आती है ?
उत्तर-
धूप वाले स्थान के लिए, पर्दा लता और र ‘समी लताओं के रूप में काम आती है।

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प्रश्न 16.
भारी लताओं के नाम बताएं ।
उत्तर-
पीली चमेली, रेगमार और गुलाब।

प्रश्न 17.
पर्दा लताएं कौन-सी हैं ?
उत्तर-
गोल्डन शावर व बरनोनिया।

प्रश्न 18.
आन्तरिक सजावट के लिए प्रयोग की जाने वाली लताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
एसपैरेगश, सिंगोनियम, मनीप्लांट।

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प्रश्न 19.
सारा वर्ष हरी रहने वाली लताएं कब लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
फरवरी-मार्च और जुलाई-सितम्बर में।

प्रश्न 20.
पतझड़ वाली लताएं कब लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
जनवरी-फरवरी में।

प्रश्न 21.
सारा वर्ष हरी-भरी रहने वाली लता का नाम बताओ
उत्तर-
वरनोनिया, फाइक्स रैप्नस।

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प्रश्न 22.
इसको बाजा लता क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
इसके फूल बाजों की तरह होते हैं।

प्रश्न 23.
वरनोनिया को पर्दा लता क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
क्योंकि उसको जब बरामदे में लगाया जाता है तो पर्दे की तरह प्रभाव पड़ता है।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
लता किसे कहते हैं ?
उत्तर-
लता ऐसे पौधे हैं जिनका तना कमज़ोर होता है।

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प्रश्न 2.
दीवारों, वृक्षों आदि पर चढ़ने के लिए लताओं द्वारा अपनाई जाने वाली विधियां बताओ।
उत्तर-
इस कार्य के लिए लताएं अपने कांटों, टेंड्रिल और जड़ों की सहायता लेती हैं।

प्रश्न 3.
लताएं किस प्रकार की मिट्टी में लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
उपजाऊ और पानी को देर तक समा कर रखने वाली किसी भी ज़मीन में लताओं को लगाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
लताएं लगाने के लिए किस आकार के गड्ढे खोदने चाहिएं ?
उत्तर-
लताएं लगाने के लिए 60 सें० मी० चौड़े , लम्बे और गहरे गड्डे खोदने चाहिएं।

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प्रश्न 5.
लताओं की सूखी और बीमार टहनियों को क्यों काटते रहना चाहिए ?
उत्तर-
लताएं अच्छी तरह फल-फूल सकें इसलिए इनकी सूखी और बीमार टहनियों को काट देना चाहिए।

प्रश्न 6.
ब्यूमोनसिया लता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
इसे मार्च मास में बड़े और सफ़ेद रंग के फूल लगते हैं। इस लता को वृक्षों पर चढ़ाया जाता है। इसे बीज या कलम द्वारा उगाया जा सकता है।

प्रश्न 7.
एडीन्कोलाइमा और एंटीगोनोन लताओं को लगने वाले फूलों की तुलना करो।
उत्तर-
एडीन्कोलाइमा के फूल नवम्बर में हल्के जामुनी रंग के घंटियों जैसे होते हैं। एंटीगोनोन के फूल सितम्बर से मार्च तक सफ़ेद, गुलाबी रंग के होते हैं।

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प्रश्न 8.
अरिस्टोलोचिया लता के फूल किस प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
इसके फूल सितम्बर में बत्तख जैसे बड़े और सफ़ेद रंग के होते हैं और इसके बीच जामुनी रंग के धब्बे भी होते हैं।

प्रश्न 9.
ऊंची इमारतों की सजावट के लिए प्रायः कौन-सी लता लगाई जाती है?
उत्तर-
बिगलोनिया लता ऊंची इमारतों की सजावट के लिए प्रयोग में लाई जाती है। यह हमेशा हरी ही रहती है।

प्रश्न 10.
बोगनविलिया लता की विभिन्न किस्मों के नाम बताओ।
उत्तर-
बोगनविलिया लता की किस्में हैं-विजय, पार्था, ग्लैबरा और सुभरा।

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प्रश्न 11.
एंटीगोनोन लता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
इसको नवम्बर में जामुनी रंग के घंटियों जैसे फूल लगते हैं। इसके पत्तों को रगड़ने पर लहसुन की सुगन्ध आती है। पत्ते साफ़ और चमकदार होते हैं। इन्हें कलमों के द्वारा बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 12.
बाजा लता के बारे में क्या जानते हो ?
उत्तर-
इसे कैंपसिस ग्रैंडीफ्लोरा भी कहा जाता है। इसको संतरी रंग के बच्चों के बाजों की तरह फूल मई से अगस्त तक लगते हैं जो कि अक्तूबर से नवम्बर तक रहते हैं। इसके पत्ते सर्दियों में झड़ जाते हैं।
इस लता को कलमों के द्वारा लगाया जाता है। इसकी शाखा सख्त होती है और बिना सहारे चल सकती है।

प्रश्न 13.
अरिस्टोलोचिया के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
इस लता को खराब स्थानों को ढकने के लिए लगाया जाता है। इसको बत्तख की तरह बड़े और सफेद रंग के फूल लगते हैं। इनके बीच में जामुनी रंग के धब्बे जैसे भी होते हैं। इसके बीज लगाए जाते हैं।

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प्रश्न 14.
बिगलोनिया के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
इसको ऊँची इमारतों को सजाने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह हमेशा हरी रहती है। इसे पीले फूल जनवरी-फरवरी में लगते हैं। इसकी कलमें और बीज दोनों ही लगाए जा सकते हैं।

प्रश्न 15.
पीली चमेली के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
इसे दीवारों पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है। इसको 15-20 दिन के लिए मार्च में पीले फूल लगते हैं। इसकी वृद्धि कलमों के द्वारा की जाती है।

प्रश्न 16.
माधवी लता के बारे में जानकारी दो ।
उत्तर-
इस लता के पत्ते चमकदार होते हैं और फूल फरवरी-मार्च में लगते हैं। फूल सफ़ेद रंग के खुशबूदार होते हैं। इसको बीजों या कलमों द्वारा दोनों विधियों से लगाया जा सकता है।

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प्रश्न 17.
फाइक्स रैजस लता के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
इस लता को शानदार स्थानों के लिए चुना जाता है। यह हमेशा हरी रहती है। यह जड़ों के द्वारा दीवारों पर चिपक जाती है। इसको पत्तों के लिए लगाया जाता है और काट कर कोई भी आकार दिया जा सकता है।

प्रश्न 18.
ब्यूमोनसिया लता के बारे में जानकारी दो ?
उत्तर-
यह लता वृक्षों पर चढ़ाने के लिए लगाई जाती है। इसे मार्च में बड़े सफ़ेद रंग के फूल लगते हैं। यह लता कलमों और बीजों के द्वारा भी लगाई जा सकती है।

प्रश्न 19.
एंटीगोनॉन लता के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
इसको स्थान ढकने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसको सितम्बर से मार्च तक सफेद गुलाबी रंग के फूल लगते हैं। इसको बीज तथा कलमों के द्वारा लगाया जा सकता है।

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प्रश्न 20.
गोल्डन शावर के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
यह सबसे सुन्दर बेल है। इसको सर्दियों में संतरी रंग के फूल लगते हैं। इसको इमारतों, घरों और बरामदों की सजावट के लिए लगाया जाता है।

प्रश्न 21.
झुमका लता के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
झुमका लता का दूसरा नाम रंगून क्रीपर भी है। इसको दीवारों, परगलों या वृक्षों पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है। इसको सारा साल ही सफ़ेद, लाल या गुलाबी फूल लगे रहते हैं। इसको कलमों और जड़ों के हिस्सों के साथ उगाया जा सकता है।

प्रश्न 22.
पर्दा लता के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
इसको बरामदे में लगाया जाता है और पर्दा लगा होने का भ्रम देती है। यह सारा साल ही हरी भरी रहती है। इस लता को दीवारों, बालकोनी पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है।

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बडे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
लताओं का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
लताओं से घरों, स्कूलों, कोठियों, कार्यालयों और सड़कों की सुन्दरता बढ़ती है। फूलों वाली लताएं बच्चों का मन मोह लेती हैं और उनके कोमल मन पर अच्छा प्रभाव डालती हैं। इससे बच्चों का मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास भी बढ़िया ढंग से होता है।

प्रश्न 2.
भिन्न-भिन्न स्थानों पर लगाई जाने वाली लताओं का विवरण दो।
उत्तर-
विभिन्न स्थानों पर लगाई जाने वाली लताएं हैं—

  1. धूप वाले स्थान के लिए-गोल्डन शावर, बोगनविलिया, झुमका लता इत्यादि।
  2. छायादार स्थान के लिए-मनीप्लांट, क्लैरोडेंडरॉन, सिंगोनीयम इत्यादि।
  3. बाड़ लगाने के लिए-क्लैरोडेंडरॉन, बोगनविलिया।
  4. मौसमी लताएं-गोल्डन शावर, बोगनविलिया।
  5. सुगन्ध के लिए-माधवी लता, जैसमीन (मोतिया-चमेली) इत्यादि।
  6. पर्दा लताएं-गोल्डन शावर, बरनोनिया।
  7. गमलों के लिए–सिंगोनीयम, बोगनविलिया, मनीप्लांट इत्यादि।
  8. अंदरूनी सजावट के लिए-ऐस्प्रेगस, मनीप्लांट, सिंगोनियम।
  9. भारी लताएं-रेगमार, गुलाब, पीली चमेली इत्यादि।

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प्रश्न 3.
लताएं लगाने की विधि क्या है ? इनकी देखभाल कैसे की जाती है ?
उत्तर-
भूमि-कोई भी उपजाऊ और देर तक पानी समा कर रखने वाली भूमि इन लताओं के लिए ठीक रहती है।
लताएं लगाने का समय-सारा वर्ष हरी रहने वाली लताओं के लिए उचित समय जुलाई-सितम्बर का मास होता है। पत्ते झड़ने वाली लताओं को जनवरी-फरवरी में लगाते हैं।

गड्ढे तैयार करना-लताओं के लिए 60 सें० मी० चौड़े लम्बे और गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं और एक गड्ढे में 10 ग्राम बी० एच० सी० का पाऊडर और 8-10 कि० ग्रा० गली रूड़ी गोबर खाद मिला दें।

सिंचाई-लताएं लगाने के बाद ही लगातार पानी लगाएं और इन्हें आवश्यकता अनुसार ही सहारा दें।
देखभाल-बीमार और सूखी शाखाओं को काट दें। अच्छी तरह बढ़ फूल सकें इसके लिए इनकी कांट-छांट भी करते रहें। कीड़े-मकौड़े और रोगों से बचाव के लिए दवाइयों का छिड़काव करें।

प्रश्न 4.
बोगनविलिया लता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
किस्में-बोगनविलिया की विभिन्न किस्में हैं-ग्लैबरा, पार्था, सुभरा और विजय। लगाने की विधि-सभी किस्मों को कलम के द्वारा लगाया जाता है। लगाने का समय-कलमों को जुलाई-अगस्त या जनवरी से फरवरी तक लगाया जाता है। रंगदार फूलों के लगने का समय-सफेद, जामुनी, लाल, पीले, संतरी रंगों के फूल मार्च-अप्रैल और नवम्बर-दिसम्बर में लगते हैं।

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प्रश्न 5.
रंगून क्रीपर किस लता को कहते हैं ? इसके फूल किस तरह के होते हैं और इसे कौन-से स्थान पर और किस विधि से लगाया जाता है ?
उत्तर-
झुमका लता को रंगून क्रीपर कहा जाता है। इसके फूल सफ़ेद गुलाबी या लाल रंग के होते हैं। फूल खुशबूदार होते हैं और सारा वर्ष लगे रहते हैं। इन लताओं को दीवारों, वृक्षों या परगलों पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है। इसे कलमों या जड़ों के भाग से उगाया जाता है।

प्रश्न 6.
अलग-अलग लताओं के नाम और फूलों के रंग बताओ और फूल कब लगते हैं ?
उत्तर-

  1. एंडीन्कोलाइमा-हल्के जामुनी रंग के घण्टियों के आकार के, नवम्बर में।
  2. व्यूमोनसिया लता-सफ़ेद रंग के, मार्च में।
  3. माधवी लता-सफ़ेद खुशबूदार, फरवरी-मार्च में।
  4. बिगलोनिया-पीले रंग के, जनवरी-फरवरी में।
  5. एंटीगोनान-सफ़ेद, गुलाबी, सितम्बर से मार्च। .
  6. अरिस्टोलोचिया-बत्तख की तरह बड़े और सफ़ेद, इनके बीच में जामुनी रंग के धब्बे होते हैं, सितम्बर में।
  7. झुमका लता-सफ़ेद, गुलाबी या लाल, सारा वर्ष।
  8. गोल्डन शावर-सर्दियों में, संतरी रंग के।
  9. पीली चमेली-मार्च में, पीले रंग के।
  10. बोगनविलिया-सफेद, जामुनी, लाल, नाभी, संतरी, पीले। मार्च-अप्रैल और नवम्बर-दिसम्बर में।
  11. कैम्पसिस ग्रैंडीफ्लोरा-मई से अगस्त में संतरी रंग के।

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प्रश्न 7.
धूप वाली जगह के लिए भारी बेलों, अंदरूनी सजावट वाली बेलों के बारे में बताओ।
उत्तर-

  1. धूप वाली जगह के लिए-गोल्डन शावर, झुमका बेल।
  2. भारी बेल-रेगमार, पीली चमेली।
  3. अंदरूनी सजावट-ऐस्प्रेगस, मनी प्लांट।

सजावटी पौधे PSEB 7th Class Agriculture Notes

  • वृक्ष, झाड़ियां, बेलें और मौसमी फूल आसपास की सुंदरता बढ़ाने में सहायक हैं तथा मिट्टी को क्षरण से भी बचाते हैं।
  • बहुपयोगी वृक्ष हैं-पैगोड़ा, अमलतास, लाल गुलमोहर, ऐरोकेरिया आदि।
  • छायादार वृक्ष हैं-नीम, सातपत्तिया, मोलसरी, सुखचैन, जामुन, पिलकन, पीपल आदि।
  • शृंगार वृक्ष हैं-नीली गुलमोहर, सिल्वर ओक, अमलतास, पिलकन, डेक आदि।
  • बाड़ के तौर पर लगाए जाने वाले वृक्ष हैं-सफैदा, पाप्लर, अशोका आदि।
  • सड़कों के आसपास लगाए जाने वाले वृक्ष हैं-डेक, पिलकन, सिल्वर ओक, नीली गुलमोहर आदि।
  • वायु प्रदूषण रोकने के लिए वृक्ष हैं-शहतूत, पाप्लर, पैगोड़ा आदि।
  • औषधि गुण वाले वृक्ष हैं-नीम, जामुन, अशोका, महुआ, अर्जुन आदि।
  • खुशबूदार फूलों वाले वृक्ष हैं-पैगोड़ा, सोनचंपा, बड़ा चम्पा।
  • फूलदार झाड़ियां हैं-रात की रानी, चांदनी, पीली कनेर, चाइमा रोज़, बोगनविलिया आदि।
  • सुंदर पत्तों वाली झाड़ियां हैं-अलीयर, कामिनी, केशिया आदि।
  • भू-ढपनी झाड़ियां हैं-लैंटाना।
  • दीवारों के निकट लगाने वाली झाड़ियां हैं-टीकोमा, अकलिफा आदि।
  • धूप वाले स्थान के लिए सजावटी बेलें हैं-गोल्डन शावर, झुमका बेल, बोगनविलिया।
  • भारी बेलें हैं-बिगनोनिया, माधवी लता, झुमका बेल, गोल्डन शावर आदि।
  • हल्की बेलें हैं-लोनीसोरा, मीठी मटरी आदि।
  • खुशबूदार फूलों वाली बेलें-चमेली, माधवी लता आदि।
  • बोगनविलिया को गमले में भी लगाया जा सकता है।
  • बाड़ लगाने वाली बेलें हैं-बोगनविलिया, क्लैरोडैडरोन, ऐस्प्रेगस आदि।
  • घर के अन्दर रखने वाली बेलें हैं-मनी प्लांट आदि।
  • पर्दा करने के लिए-परदा बेल, गोल्डन शावर आदि।
  • गर्मी ऋतु के फूल-कोचिया, जीनीया, सूरजमुखी, गेलारडिया, गौंफरीना, दोपहर खिली आदि।
  • वर्षा ऋतु के फूल हैं-बाल्सम, कुक्कड़ कल्गी आदि।
  • सर्दी ऋतु के फूल हैं-कैलेंडुला, डेहलीया, पहूनिया, गेंदा आदि।

PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 3 हॉकी का जादूगर-मेजर ध्यानचंद

Punjab State Board PSEB 6th Class Physical Education Book Solutions Chapter 3 हॉकी का जादूगर-मेजर ध्यानचंद Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Physical Education Chapter 3 हॉकी का जादूगर-मेजर ध्यानचंद

PSEB 6th Class Physical Education Guide हॉकी का जादूगर-मेजर ध्यानचंद Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मेजर ध्यानचंद का जन्म कब हुआ ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त, 1905 ई० में इलाहाबाद में पिता सोमेश्वर दत्त के घर हुआ।

प्रश्न 2.
भारतीय हॉकी टीम ने पहली बार ओलम्पिक खेलों में कब भाग लिया ? इन खेलों में भारत ने कौन-सा तमगा प्राप्त किया ?
उत्तर-
13 मई, 1926 में न्यूज़ीलैंड में पहले अंतर्राष्ट्रीय खेल में भाग लिया और जीत हासिल की। 1928 ई० में एम्बरूडर्म ओलम्पिक खेलों में भाग लिया और सोने का तमगा जीता। 1932 ई० में लॉस ऐंजलस ओलम्पिक में ध्यानचंद ने भाग लिया और सैंटर फारवर्ड के रूप में अहम् भूमिका निभाई। फाइनल मैच अमेरिका के साथ हुआ। मेजर ध्यानचंद ने निजी 8 गोल किये और मैच 24-1 गोल के साथ जीत लिया। इस ओलम्पिक में भारतीय टीम ने 262 गोल किये। जिसमें 101 गोल ध्यानचंद ने किये थे, जिसके लिए ध्यानचंद का नाम हॉकी के क्षेत्र में चोटी के खिलाड़ियों में शामिल हुआ।

PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 3 हॉकी का जादूगर-मेजर ध्यानचंद

प्रश्न 3.
मेजर ध्यानचंद के जीवन से जुड़ी कहानियों में से किसी एक का वर्णन करें।
अथवा
मेजर ध्यानचंद की जीवनी के बारे में एक नोट लिखो।
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद भारत का हॉकी खेल का एक प्रसिद्ध खिलाड़ी था, जिसने अपनी खेल शैली के कारण भारत का नाम दुनिया में चमकाया। हॉकी में मेजर ध्यानचंद ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोने और चांदी के तमगे जीते। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 ई० में इलाहाबाद में पिता समेश्वर दत्त के घर हुआ। पिता और बड़ा भाई रूप सिह भी हॉकी के उभरे खिलाड़ी थे। इस तरह ध्यानचंद का हॉकी की खेल विरासत में मिला। इनके पिता जी ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी करते थे। मेजर ध्यानचंद 16 साल की उम्र में फौज में भर्ती हुए और वहां पर सूबेदार मेजर तिवारी ने हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। वहां फौज की ड्यूटी करने के बाद देर रात तक चांद की रोशनी में प्रैकटिस करते थे।

1922 से लेकर 1926 तक सेना के खेल मुकाबले में भाग लिया। इन खेल मुकाबलों में ध्यानचंद के खेल की बहुत प्रशंसा हुई। इस महान् खिलाड़ी के साथ चंद कथाएं जुड़ी हुईं हैं। एक बार हालैंड में ध्यानचंद की हॉकी तोड़ कर देखी गई कि इस खिलाड़ी ने अपनी स्टिक में कोई चुम्बक जैसी चीज़ न फिट की हो। वास्तव में ध्यानचंद का गेंद पर बहुत काबू था।

उसकी गेंद उसकी हॉकी से अलग नहीं होती थी। कई लोग मानते हैं कि उसकी हॉकी एक जादू की हॉकी है। ध्यानचंद ने अपनी कमाल की खेल के साथ जर्मनी के तानाशाह हिटलर का भी दिल जीत लिया था। हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी की तरफ से खेलने की पेशकश की थी और फौज में बड़ा पद देने का लालच भी दिया। ध्यानचंद ने भारत की तरफ से खेलना ही अपना गौरव समझा था।

ध्यानचंद जी को भारत सरकार ने 1956 ई० में पद्म भूषण के साथ सम्मानित किया। इंडियन ओलम्पिक ऐसोसिएशन की तरफ से शताब्दी का सर्वोत्तम खिलाड़ी घोषित किया । अब ध्यानचंद जी का जन्म दिन बतौर नैशनल स्पोर्टस के तौर पर भारत देश में मनाया जाता है। इस महान् खिलाड़ी की उपलब्धियों को देखते हुए यह तय है कि उनका जन्म दिन हॉकी खेलों के लिए हुआ था और खेल जीवन में 1000 से ज्यादा गोल किये, जिसमें 400 गोल अंतर्राष्ट्रीय और अलग-अलग देशों की टीमों के विरुद्ध किये गये जिसके द्वारा उनको फौज में तरक्की मिलती गई।

ध्यानचंद जी ने नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ पटियाला के चीफ़ कोच होने का मान प्राप्त किया। 3 दिसम्बर 1979 में मेजर ध्यानचंद का देहांत हो गया। भारतीय डाक विभाग ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी जारी किया था और दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय खेल स्टेडियम उसके नाम से बनाया गया। सारे खिलाड़ियों को दिली ख्वाहिश है कि उनको मरने के बाद भारत रत्न’ दिया जाए।

प्रश्न 4.
मेजर ध्यानचंद ने पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच कब और कहां खेला ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद ने 13 मई, 1926 को न्यूजीलैंड में पहले अंतर्राष्ट्रीय मैच खेला जिसमें 18 मैच भारतीय टीम ने मेजर ध्यानचंद की बेहतरीन खेल से जीते।

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प्रश्न 5.
मेजर ध्यानचंद का बुत कौन-से देश में लगाया हुआ है ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद का बुत ऑस्ट्रेलिया के शहर वियाना में लगा हुआ है। इस बुत के चार हाथ बनाये गये हैं और चारों हाथों में चार हाकियां पकड़ाई हुई हैं। यह बुत उसके अनोखे खेल का प्रतीक है।

प्रश्न 6.
मेजर ध्यानचंद की याद को समर्पित भारत सरकार की ओर से कौनकौन से कदम उठाये गए हैं ?
उत्तर-

  1. भारत सरकार द्वारा मेजर ध्यानचंद की अनोखी खेल प्रतिभा को देखते हुए उनको 1956 ई० में पद्म भूषण देकर सम्मानित किया गया।
  2. ध्यानचंद का जन्म दिन बतौर ‘नैशनल स्पोर्टस डे’ के तौर पर भारत में मनाया जाता है।
  3. भारतीय डाक विभाग ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी जारी किया था।
  4. भारत सरकार ने दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय खेल स्टेडियम उनके नाम से बनाया।

Physical Education Guide for Class 6 PSEB हॉकी का जादूगर-मेजर ध्यानचंद Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मेजर ध्यानचंद किस खेल के साथ जुड़े हुए थे ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद हॉकी’ खेल के साथ जुड़े हुए थे।

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प्रश्न 2.
ध्यानचंद ने हॉकी कहाँ खेलना शुरू किया ?
उत्तर-
फौज में।

प्रश्न 3.
हॉकी का जादूगर किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद जी को।

प्रश्न 4.
मेजर ध्यानचंद का जन्म कब हुआ ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद जी का जन्म 29 अगस्त, 1905 में इलाहाबाद में हुआ।

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प्रश्न 5.
मेजर ध्यानचंद के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर-
सोमेश्वर दत्त।

प्रश्न 6.
क्या उनके बड़े भाई रूप सिंह भी हॉकी के खिलाड़ी थे ?
उत्तर-
हाँ।

प्रश्न 7.
मेजर ध्यानचंद जी के पिता कहाँ नौकरी करते थे ?
उत्तर-
उनके पिता जी ‘ब्रिटिश इंडियन आर्मी’ में नौकरी करते थे।

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प्रश्न 8.
मेजर ध्यानचंद ने किस उम्र में फौज की नौकरी की ?
उत्तर-
16 साल की उम्र में फौज की नौकरी की।

प्रश्न 9.
पहली बार मेजर ध्यानचंद ने किस अंतर्राष्ट्रीय मैच में भाग लिया ?
उत्तर-
13 मई, 1926 ई० में।

प्रश्न 10.
ध्यानचंद जी ने किस ओलम्पिक में पहली बार भाग लिया ?
उत्तर-
1928 में एमस्टरडर्म में भाग लिया।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मेजर ध्यानचंद जी का जन्म कब और कहाँ हुआ और उनका देहांत कब हुआ ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद जी का जन्म 29 अगस्त, 1905 ई० में इलाहाबाद में हुआ। 3 दिसम्बर, 1979 ई० में मेजर ध्यानचंद का देहांत हो गया।

प्रश्न 2.
हॉकी खेल जीवन में मेजर ध्यानचंद जी ने अपने विरोधियों में कितने गोल किये ?
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद जी ने अपने विरोधियों में 1000 गोल किये।

प्रश्न 3.
ध्यानचंद अंतर्राष्ट्रीय मैचों में कितने गोल किये ?
उत्तर-
ध्यानचंद अंतर्राष्ट्रीय मैचों में 400 गोल किये।

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प्रश्न 4.
ध्यानचंद ने हॉकी खेलना कहां शुरू किया ?
उत्तर-
ध्यानचंद ने हॉकी खेलना फौज में शुरू किया।

प्रश्न 5.
ध्यानचंद को हिटलर ने क्या कहा था ?
उत्तर-
उसको जर्मनी की तरफ से खेलने को कहा।

प्रश्न 6.
जर्मनी की हिटलर ने मेजर ध्यानचंद को जर्मनी की फौज में आने पर कौन-सा पद देने के लिए कहा ? ।
उत्तर-
बड़ा पद देने के लिए कहा।

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प्रश्न 7.
ब्रैडमैन ने ध्यानचंद को क्या पूछा था ?
उत्तर-
हॉकी के साथ वह इतने गोल कैसे कर लेते हैं।

प्रश्न 8.
पद्म भूषण के साथ सम्मानित करने के पीछे इंडियन ओलम्पिक ऐसोसिएशन ने उनको किस पद से विभूषित किया?
उत्तर-
शताब्दी का सर्वोत्तम खिलाड़ी घोषित किया।

प्रश्न 9.
ध्यानचंद जी का बुत कौन-से देश में है ?
उत्तर-
ऑस्ट्रेलिया शहर वियाना में है।

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प्रश्न 10.
ध्यानचंद की हॉकी क्यों तोड़ी गई थी ?
उत्तर-
यह देखने के लिए कि उसकी हॉकी में कोई चुम्बक तो नहीं लगा है।

बडे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मेजर ध्यानचंद के जीवन के साथ जुड़ी कहानी का वर्णन करो।
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद ने महान् क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना प्रशंसक बना लिया। ब्रैडमैन ने ध्यानचंद को सवाल किया कि वह इतने गोल कैसे कर लेता है। ध्यानचंद ने कहा कि कि जैसे बल्ले के साथ दौड़ें बन जाती हैं। इस तरह स्टिक के साथ गोल हो जाते हैं।

प्रश्न 2.
ध्यानचंद ने अपने खेल जीवन में क्या-क्या उपलब्धियां हासिल की ?
उत्तर-
भारत सरकार ने ध्यानचंद को 1956 ई० में पद्म भूषण देकर सम्मानित किया। इंडियन ओलम्पिक ऐसोसिएशन की तरफ शताब्दी का सर्वोत्तम खिलाड़ी घोषित किया गया और उनका जन्म दिन बतौर “नैशनल स्पोर्टस डे” के तौर पर सारे भारत में मनाया जाता है। ध्यानचंद के सुपुत्र अशोक कुमार ने भारतीय हॉकी टीम को वर्ल्ड कप, ओलम्पिक और एशियन खेलों में बहुत सारे तगमे दिये थे। ध्यानचंद का सम्मान सारी दुनिया में हुआ।

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प्रश्न 3.
1932 ई० में ओलम्पिक खेलों में ध्यानचंद की उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर-
1932 ई० में लॉस ऐंजल्स ओलम्पिक में भारतीय टीम ने भाग लिया। ध्यानचंद ने सैंटर फारवर्ड के रूप में अहम भूमिका निभाई। इन ओलम्पिक खेलों में फाइनल मैच अमेरिका और भारत में हुआ, जिसमें भारत ने अमेरिका की टीम को 24-1 गोलों से हराया। इन 24 गोलों में 8 गोल अकेले ध्यानचंद ने किये। अमेरिका की इस शर्मनाक हार पर अमेरिका ने ही एक अखबार में छपवाया कि भारतीय हॉकी टीम तो पूर्व से आया तूफ़ान थी। इन ओलम्पिक खेलों के दौरान भारतीय टीम ने कुल 262 गोल किये, जिसमें 101 गोल अकेले ध्यानचंद ने दागे। इन खेलों के बाद मेजर ध्यानचंद का नाम दुनिया के चोटी के खिलाड़ियों में शामिल हो गया।

प्रश्न 4.
ध्यानचंद जी के परिवार के बारे में दो लाइनें लिखें।
उत्तर-
मेजर ध्यानचंद जी का जन्म 29 अगस्त, 1905 में इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता का नाम सोमेश्वर दत्त था और बड़े भाई रूप सिंह थे, जो हॉकी के उभरे हुए खिलाड़ी थे। इस तरह ध्यानचंद को हॉकी की खेल विरासत में मिली। उनके पिता जी ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी करते थे। ध्यानचंद जी के सुपुत्र अशोक कुमार ने भारतीय हॉकी टीम को वर्ल्ड कप और ओलम्पिक और एशियन खेलों में भी तमगे जीत कर दिये। इस तरह ध्यानचंद जी का सारा परिवार हॉकी के साथ जुड़ा हुआ था।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

Punjab State Board PSEB 10th Class Agriculture Book Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Agriculture Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

PSEB 10th Class Agriculture Guide कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो शब्दों में उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर-
वर्ष 1962 में।

प्रश्न 2.
देश में पहला कृषि विश्वविद्यालय कब स्थापित किया गया ?
उत्तर-
वर्ष 1960 में।

प्रश्न 3.
कल्याण, सोना तथा डब्ल्यू० एल० 711 किस फसल की किस्में हैं ?
उत्तर-
गेहूँ की।

प्रश्न 4.
गेहूँ के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक का नाम बताइए।
उत्तर-
डॉ० नोरमान ई० बोरलाग।

प्रश्न 5.
पी० ए० यू० में किसान मेलों का आरम्भ कब हुआ ?
उत्तर-
1967 में।

प्रश्न 6.
विश्वविद्यालय द्वारा विकसित कितनी किस्मों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली ?
उत्तर-
वर्ष 2017 तक 161 किस्मों को।

प्रश्न 7.
देश में सर्वप्रथम कौन-सी फसल के लिए हाइब्रीड विकसित हुआ ?
उत्तर-
बाजरे का एच० बी० 1.

प्रश्न 8.
विश्वविद्यालय द्वारा कौन-सी फसलों के लिए उपयुक्त कृषि तकनीकें विकसित की गयीं ?
उत्तर-
शिमला मिर्च, टमाटर, बैंगन आदि।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

प्रश्न 9.
किन्नू को पंजाब में कहां से लाया गया था ?
उत्तर-
कैलिफोर्निया से।

प्रश्न 10.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के किस विभाग के द्वारा किसानों को मौसम के बारे में जानकारी दी जाती है ?
उत्तर-
विश्वविद्यालय का कृषि मौसम विभाग।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
पी० ए० यू० में से कौन-कौन से अन्य विश्वविद्यालय बने ?
उत्तर-
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में से हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार तथा हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय बना।

प्रश्न 2.
कौन-कौन सी फ़सलों की अलग-अलग किस्मों ने हरित क्रान्ति लाने में योगदान दिया ?
उत्तर-
गेहूँ की-कल्याण, सोना, डब्ल्यू० एल० 711 चावल की-पी० आर 106 मक्की की-वी० जे०। गेहूँ, चावल तथा मक्की की इन किस्मों ने हरित क्रान्ति लाने में योगदान डाला।

प्रश्न 3.
पी० ए० यू० के कौन-कौन से मुख्य काम हैं ?
उत्तर-
पी० ए० यू० का मुख्य कार्य अनाज सुरक्षा को पक्का करना तथा अधिक पैदावार देने वाली, रोग रहित फसलों की खोज करना है। कृषकों को नई किस्मों तथा नई तकनीकों से अवगत करवाना है।

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प्रश्न 4.
पी० ए० यू० द्वारा विकसित किफायती कृषि तकनीकों के नाम बताइए।
उत्तर-
पी० ए० यू० द्वारा विकसित कृषि तकनीक हैं-ज़ीरो टिलेज, पत्ता रंगचार्ट, टैंशीयोमीटर, हैपी सीडर तथा लेज़र कराहा आदि।

प्रश्न 5.
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की दो संस्थाओं के नाम बताइए, जिनसे विश्वविद्यालय ने सांझ डाली।
उत्तर-
मैक्सिको स्थित अन्तर्राष्ट्रीय गेहूँ तथा मक्की सुधार केन्द्र, सीमट, चावल की खोज के लिए मनीला (फिलीपीन्स) की अन्तर्राष्ट्रीय खोज संस्था, इंटरनैशनल राईस रिसर्च इंस्टीच्यूट (IRRI)।

प्रश्न 6.
पी० ए० यू० संदेशवाहक क्या काम करते हैं ?
उत्तर-
पी० ए० यू० संदेशवाहक विशेषज्ञों तथा कृषकों में मोबाइल फोन तथा इंटरनेट द्वारा पुल का कार्य करते हैं।

प्रश्न 7.
पी० ए० यू० का खेलों में क्या योगदान है ?
उत्तर-
पी० ए० यू० का खेलों में भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। विश्वविद्यालय के तीन विद्यार्थियों को ओलम्पिक खेलों में भारतीय हाकी टीम का कप्तान बनने का मान प्राप्त हैं।

प्रश्न 8.
पी० ए० यू० बनाने का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
विश्वविद्यालय बनाने का मुख्य उद्देश्य देश की अनाज सुरक्षा को विश्वसनीय बनाना था। कृषि के क्षेत्र में पैदा चुनौतियों का हल खोजना तथा स्थाई कृषि विकास के लिए कृषि खोज का पक्का ढांचा बनाना था।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

प्रश्न 9.
पी० ए० यू० को कौन-सी फसलों के प्रथम हाइब्रिड बनाने का गौरव प्राप्त किया है ?
उत्तर-
बाजरे का हाइब्रिड एच० बी-1, मक्की का सिंगल क्रास हाइब्रिड पारस, गोभी सरसों का पहला हाइब्रिड (पी० जी० एम० एच० 51)।

प्रश्न 10.
पी० ए० यू० का मशरूम उत्पादन में क्या योगदान है ?
उत्तर-
विश्वविद्यालय द्वारा मशरूम की अधिक पैदावार देने वाली तथा सारा वर्ष उत्पादन देने वाली विधियों को विकसित किया गया है। देश में पैदा हुई मशरूम में से 40% केवल पंजाब में ही पैदा होती है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के पांच-छः वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
पी० ए० यू० में हो रहे प्रसार के कामों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
पी० ए० यू० द्वारा उच्च-कोटि की शिक्षा प्रदान की जाती है जिस के कारण विश्वविद्यालय का नाम विदेशों में भी गूंज रहा है। विश्वविद्यालय द्वारा खोज, प्रसार तथा अध्यापन के क्षेत्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान दिया गया है। विश्वविद्यालय अपने खोज तथा प्रसार के कार्यों के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। विश्वविद्यालय ने कृषकों के साथसाथ राज्य के विकास से सम्बन्धित अन्य विभागों के साथ भी अच्छा सम्पर्क बना कर रखा हुआ है। किसान सेवा केन्द्रों का संकल्प भी विश्वविद्यालय द्वारा शुरू किया गया जिसको भारतीय कृषि खोज परिषद की तरफ से देश भर में लागू किया गया। प्रसार शिक्षा डायरैक्टोरेट का भिन्न-भिन्न जिलों में स्थापित कृषि विज्ञान केन्द्रों तथा किसान सलाहकार सेवा स्कीमों द्वारा किसान भाइयों के साथ सीधा सम्पर्क बना कर रखा जाता है। किसान भाइयों को समय-समय पर प्रशिक्षण, प्रदर्शनियों द्वारा जागरूक किया जाता है। विश्वविद्यालय द्वारा किए गए खोज, प्रयोगों की जानकारी भी किसानों को मेलों, खेत दिवस में किसानों को उपलब्ध करवाई जाती है। विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की गई प्रकाशनाएं तथा पौधा रोग अस्पताल भी सम्पर्क के मुख्य साधन हैं। विश्वविद्यालय द्वारा कृषि दूत भी तैनात किए गए है जो इंटरनेट तथा मोबाइल फोन द्वारा कृषकों तथा विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के बीच पुल का कार्य कर रहे हैं।

प्रश्न 2.
पी० ए० यू० द्वारा लगाए जाने वाले किसान मेलों के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए।
उत्तर-
किसान मेलों का शुभारंभ 1967 में विश्वविद्यालय द्वारा किया गया। यह मेले इतने प्रसिद्ध हुए कि किसान समूहों में किसान मेलों का हिस्सा बनने लगे। इन मेलों का ज़िक्र गीतों में होने लग पड़ा था, जैसे

जिंद माही जे चलिओं लुधियाणे,
उथों वधिया बीज लिआणे।

विश्वविद्यालय द्वारा प्रत्येक वर्ष आषाढी तथा सावनी की काशत से पहले मार्च तथा सितम्बर के महीनों में किसान मेले लुधियाना में तथा अन्य भिन्न-भिन्न स्थानों पर लगाए जाते हैं। इन मेलों में भिन्न-भिन्न विषयों के विशेषज्ञों द्वारा किसानों के साथ विचार चर्चा की जाती है। विश्वविद्यालय की प्रकाशनियों के स्टाल लगाए जाते हैं। नई किस्मों के बीज,फूलदार पौधे तथा घरेलू बगीची के लिए सब्जियों के बीज छोटी-छोटी किस्तों में किसानों को दिए जाते हैं। इन मेलों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मशीनों को प्रदर्शित किया जाता है। इन मेलों में प्रत्येक वर्ष लगभग तीन लाख किसान भाई तथा बहन भाग लेते हैं।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

प्रश्न 3.
पी० ए० यू० के लिए आने वाली चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय का उद्देश्य देश की अनाज सुरक्षा को पक्का करना तथा कृषि से संबंधित समस्याओं तथा चुनौतियों का हल निकालना तथा स्थाई विकास के लिए कृषि खोज का पक्का ढांचा तैयार करना है। विश्वविद्यालय ने लगभग 50 वर्षों से अधिक का लम्बा सफर बहुत ही सफलतापूर्वक तय किया है। देश में हरित क्रान्ति लाने में भी विश्वविद्यालय का भरपूर योगदान रहा है। हरित क्रान्ति से देश अनाज में स्वै-निर्भर बन गया है। आने वाले समय की मांग है कि कृषि में उभर रही चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया जाए। उभर रही चुनौतियों में उत्पादन को बनाए रखना, फसलीय विभिन्नता द्वारा प्राकृतिक स्रोतों की संभाल करना, मौसमी बदलाव के खतरे का सामना करने के लिए खोज कार्य शुरू करने तथा इन सभी कार्यों के लिए मानवीय स्राोतों को विकसित करना मुख्य है। विश्वविद्यालय द्वारा अगले बीस वर्षों की आवश्यकताओं को सम्मुख रखते हुए कृषि खोज, अध्यापन तथा प्रसार के लिए कार्य नीतियां बनाई गई हैं। आने वाले समय का उत्तरदायित्व संभालने के लिए इस विश्वविद्यालय को अधिक शक्ति से अग्रणी बनकर भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

प्रश्न 4.
पी० ए० यू० का शहद उत्पादन में क्या योगदान है ?
उत्तर-
पंजाब शहद उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य है। इस समय देश में कुल शहद उत्पादन में से 37% शहद की पैदावार पंजाब में हो रही है। ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा इतालवी मधु मक्खी का पालन शुरू किया गया, जिसके कारण पंजाब में शहद की नदियां बहने लगी हैं। मधुमक्खी पालन एक कृषि सहायक धंधा है। शहद के अलावा अन्य पदार्थों को प्राप्त करने के लिए भी खोज कार्य किए गए तथा चल रहे हैं। शहद उत्पादन का धंधा अपना कर किसानों की आय में भी वृद्धि हुई है।

प्रश्न 5.
कृषि अनुसंधान के लिए पी० ए० यू० का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्या योगदान है ?
उत्तर-
पी० ए० यू० ने कृषि अनुसंधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कृषि खोज से सम्बन्धित वैज्ञानिकों तथा भिन्न-भिन्न विश्वविद्यालयों अथवा संस्थानों से अच्छी सांझेदारी डाली हुई है। विश्वविद्यालय ने गेहूँ की खोज के लिए मैक्सिको स्थित अन्तर्राष्ट्रीय गेहूँ तथा मक्की सुधार केन्द्र सीमट (CIMMYT) तथा चावल की खोज के लिए मनीला (फिलीपीन्स) की अन्तर्राष्ट्रीय अनुसंधान संस्था, इंटरनैशनल राईस रिसर्च इंस्टीच्यूट (IRRI) से पक्की साँझेदारी की हुई है। अब विश्वविद्यालयों का कई प्रसिद्ध संस्थाओं तथा विश्वविद्यालयों से सहयोग चल रहा है।

गेहूँ की बौनी किस्मों के पितामाह तथा नोबल पुरस्कार विजेता डॉ नौरमन ई० बोरलाग ने इस विश्वविद्यालय से ऐसी घनिष्ठता थी जो उन्होंने आखिरी सांस तक निभाई। डॉ० गुरदेव सिंह खुश ने अन्तर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान केन्द्र में कार्य करते हुए भी इस विश्वविद्यालय से प्यार तथा समर्पण की भावना रखी। यह विश्वविद्यालय अपनी उच्च गुणवत्ता शिक्षा के लिए विदेशों में प्रसिद्ध है। अन्य देशों के विद्यार्थी भी इस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

Agriculture Guide for Class 10 PSEB कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहु-विकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
कल्याण सोना किसकी किस्म है?
(क) गेहूँ
(ख) चावल
(ग) मक्की
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) गेहूँ

प्रश्न 2.
पहली फसल जिसके लिए देश में हाइब्रिड विकसित हुआ ?
(क) बाजरा
(ख) गेहूँ
(ग) चावल
(घ) मक्की ।
उत्तर-
(क) बाजरा

प्रश्न 3.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय कहां स्थापित है?
(क) अमृतसर
(ख) लुधियाना
(ग) जालन्धर
(घ) कपूरथला।
उत्तर-
(ख) लुधियाना

प्रश्न 4.
पी० ए० यू० द्वारा विकसित कृषि तकनीकें हैं-
(क) जीरो टिलेज़
(ख) टैंशियोमीटर
(ग) हैपीसीडर
(घ) सभी।
उत्तर-
(घ) सभी।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

प्रश्न 5.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से रबी की फसलों के लिए किसान मेले किस महीने लगाए जाते हैं ?
(क) मार्च
(ख) दिसम्बर
(ग) सितम्बर
(घ) जून।
उत्तर-
(ग) सितम्बर

प्रश्न 6.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से ख़रीफ की फसलों के लिए किसान मेले किस महीने लगाए जाते हैं ?
(क) मार्च
(ख) दिसम्बर
(ग) सितम्बर
(घ) जून।
उत्तर-
(क) मार्च

प्रश्न 7.
किस नोबल पुरस्कार विजेता विज्ञानी को “बौनी गेहूँ का पितामह’ कहा जाता है ?
(क) डॉ० गुरदेव सिंह खुश
(ख) डॉ० नौरमन ई० बोरलाग
(ग) डॉ० एन० एस० रंधावा
(घ) डॉ० जी० एस० कालकट।
उत्तर-
(ख) डॉ० नौरमन ई० बोरलाग

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

II. ठीक/गलत बताएँ-

1. कृषि मशीनरी के लिए पंजाब देश का अग्रणी राज्य है।
2. देश के कुल शहद का 80% पंजाब में पैदा होता है ।
3. गेहूँ की बौनी किस्मों के पितामह डॉ० नौरमान ई० बोरलाग थे।
4. कल्याण सोना चावलों का किस्म है।
5. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना में है।
उत्तर-

  1. ठीक
  2. गलत
  3. ठीक
  4. गलत
  5. ठीक।

III. रिक्त स्थान भरें –

1. पी० आर० 106 …………….. की किस्म है।
2. एच० बी० 1 ……………….. की हाइब्रिड किस्म है।
3. पी० ए० यू० के पहले कुलपति …………….. हैं।
4. किन्नू की कृषि का आरम्भ ………………. में हुआ।
उत्तर-

  1. धान
  2. बाजरा
  3. डॉ० प्रेम नाथ थापर
  4. 1955-56.इण

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
पंजाब में कृषि और शिक्षा का कार्य देश के विभाजन से पहले कौन-से वर्ष में शुरू हुआ ?
उत्तर-
वर्ष 1906 में कृषि महाविद्यालय और खोज संस्था लायलपुर में।

प्रश्न 2.
पंजाब में कृषि महाविद्यालय लुधियाना कब खोला गया ?
उत्तर-
वर्ष 1957 में।

प्रश्न 3.
पी० ए० यू० के कैम्पस कौन-से थे ?
उत्तर-
लुधियाना और हिसार में।

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प्रश्न 4.
पालमपुर कैम्पस कब बना ?
उत्तर-
वर्ष 1966 में।

प्रश्न 5.
पालमपुर कैम्पस हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी का हिस्सा कब बना ?
उत्तर-
जुलाई 1970 में।

प्रश्न 6.
पी० ए० यू० की स्थापना के समय इसमें कितने महाविद्यालय थे ?
उत्तर-
पांच महाविद्यालय।

प्रश्न 7.
पी० ए० यू० के कौन-से कॉलेज को गडवासु में बदला गया ?
उत्तर-
वैटरनरी कॉलेज को।।

प्रश्न 8.
गडवासु की स्थापना कब हुई ?
उत्तर-
वर्ष 2005 में।

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प्रश्न 9.
देश में पहला कृषि विश्वविद्यालय कब और कहाँ बना ?
उत्तर-
वर्ष 1960 में उत्तर प्रदेश में पंत प्रदेश में।

प्रश्न 10.
देश में दूसरी कृषि विश्वविद्यालय उड़ीसा में कब और कहां स्थापित की गई?
उत्तर-
1961 में भुवनेश्वर में।

प्रश्न 11.
देश में तीसरा कृषि विश्वविद्यालय कब और कहां स्थापित किया गया ?
उत्तर-
1962 में लुधियाना में।

प्रश्न 12.
पी० ए० यू० के पहले कुलपति कौन थे ?
उत्तर-
डॉ० प्रेमनाथ थापर।

प्रश्न 13.
गेहूँ की कौन-कौन सी किस्मों ने हरित क्रांति में योगदान डाला ?
उत्तर-
कल्याण सोना, डब्ल्यू० एल० 711.

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प्रश्न 14.
चावल की कौन-सी किस्म ने हरित क्रान्ति में योगदान डाला ?
उत्तर-
पी० आर० 106.

प्रश्न 15.
मक्की की कौन-सी किस्म ने हरित क्रान्ति में योगदान डाला ?
उत्तर-
वी० जे०।

प्रश्न 16.
गेहूँ की बौनी किस्मों के पितामाह कौन थे ?
उत्तर-
डॉ० नौरमान ई० बोरलाग।

प्रश्न 17.
चावल की अधिक पैदावार वाली बौनी किस्में पैदा करने वाले वैज्ञानिक के नाम बताओ।
उत्तर-
डॉ० गुरदेव सिंह ‘खुश’।

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प्रश्न 18.
वर्ष 2013 तक पी०ए०यू० की तरफ से भिन्न-भिन्न फसलें, फल, सब्जियों की कितनी किस्में विकसित कर ली हैं ?
उत्तर-
730 किस्में।

प्रश्न 19.
खरबूजे की कौन-सी किस्म विश्वविद्यालय की देन है ?
उत्तर-
हरामधु।

प्रश्न 20.
विश्वविद्यालय की तरफ से कौन-सी मधुमक्खी को पालना शुरू किया ?
उत्तर-
इतालवी मधुमक्खी।

प्रश्न 21.
किन्नू की कृषि की शुरुआत कब की गई ?
उत्तर-
1955-56 में।

प्रश्न 22.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय किस शहर में स्थापित है ?
उत्तर-
लुधियाना।

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प्रश्न 23.
विश्वविद्यालय द्वारा किए गए तकनीकी प्रयासों द्वारा कितनी कलराठी भूमि का सुधार हुआ ?
उत्तर-
6 लाख हेक्टेयर कलराठी भूमि।

प्रश्न 24.
ड्रिप सिंचाई और फुव्वारा सिंचाई विधि के अलावा कौन-सी विधि से पानी की बचत होती है ?
उत्तर-
बैड प्लाटिंग तकनीक से।

प्रश्न 25.
खादों की संकोच से प्रयोग के लिए तकनीक का नाम बताओ ।
उत्तर-
पत्ता रंग चार्ट तकनीक।।

प्रश्न 26.
नरमा तथा बासमती फ़सलों में रसायनों के छिड़काव से 30 से 40% की कमी कौन-सी तकनीक के कारण आई है ?
उत्तर-
सर्व पक्षी-कीट प्रबन्ध तकनीक से।

प्रश्न 27.
सूक्ष्म कृषि की एक तकनीक बताओ।
उत्तर-
नैट हाऊस तकनीक।

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प्रश्न 28.
कटाई किए हुए चावल के खेत में गेहूँ की बिजाई के लिए कौन-सी मशीन का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
हैपी सीडर।

प्रश्न 29.
विश्वविद्यालय की तरफ से बायोटैक्नालॉजी विधि के द्वारा चावल की कौन-सी किस्म तैयार की जाती है ?
उत्तर-
बासमती-31

प्रश्न 30.
विश्वविद्यालय के पुराने विद्यार्थी के नाम बताओ, जो देश की कृषि की सबसे बड़ी संस्था भारतीय कृषि खोज संस्था (ICAR) के डायरैक्टर बने ?
उत्तर-
डॉ० एन० एस० रंधावा।

प्रश्न 31.
भारतीय कृषि खोज परिषद् की तरफ से पी०ए०यू० को सर्वोत्तम विश्वविद्यालय होने का सम्मान कब दिया गया ?
उत्तर-
वर्ष 1995 में।

प्रश्न 32.
हैप्पी सीडर से गेहूँ की बिजाई के दो लाभ लिखो।
उत्तर-

  • इसमें 20% खर्चा कम हो जाता है।
  • धान की पुआल को जलाने से पैदा होने वाले प्रदूषण पर नियन्त्रण में सहायता मिलती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाब में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय कैसे अस्तित्व में आया ?
उत्तर-
देश की आज़ादी के बाद वर्ष 1957 में लुधियाना में कृषि कॉलेज खोला गया। इसको वर्ष 1962 में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय बनाया गया।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

प्रश्न 2.
पी०ए०यू० की स्थापना के समय इसमें कितने तथा कौन-से कॉलेज थे ?
उत्तर-
पी०ए०यू० की स्थापना के समय इसमें पांच कॉलेज थे-कृषि कॉलेज, बेसिक साईस कॉलेज और ह्यूमेनेटीस कॉलेज, कृषि इंजीनियरिंग कॉलेज, होम साईंस कॉलेज और वैटरनटी कॉलेज।

प्रश्न 3.
चावल की कृषि का क्षेत्रफल बढ़ने का क्या कारण है ?
उत्तर-
चावल की कृषि का क्षेत्रफल बढ़ने का कारण चावल की अधिक पैदावार देने वाली किस्मों का विकसित होना था।

प्रश्न 4.
1970 के दशक में अनाज संभालना क्यों मुश्किल हो गया था ?
उत्तर-
गेहूँ और चावल की अधिक पैदावार वाली किस्मों के कारण ढेरियों का आकार शिखरों को छू गया, जिसके कारण हरित क्रान्ति के समय 1970 के दशक में दानों की पैदावार बढ़ गई और इनको सम्भालना मुश्किल हो गया।

प्रश्न 5.
पी०ए०यू० की तरफ से वर्ष 2013 तक भिन्न-भिन्न प्रकार की कितनी किस्में विकसित की गई और इनमें से कितनी किस्मों की राष्ट्रीय स्तर पर सिफ़ारिश की गई ?
उत्तर-
वर्ष 2013 तक पी०ए०यू० की तरफ से भिन्न-भिन्न फसलों, फलों, फूलों और सब्जियों की 730 प्रकार की किस्में विकसित की गईं और इनमें से 130 किस्मों की राष्ट्रीय स्तर पर सिफ़ारिश की गई।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 2 कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय

प्रश्न 6.
किफ़ायती कृषि तकनीकों के बारे में बताओ।
उत्तर-
जीरो टिलेज़, पत्ता रंग चार्ट, टैंशियोमीटर, हैपी सीडर और लेज़र कराहा।

प्रश्न 7.
पंजाब में किन्नू की कृषि की शुरुआत कब की गई ?
उत्तर-
किन्नू की कृषि 1955-56 में कैलिफोर्निया से लाकर आरंभ की गई और ये पंजाब की प्रमुख बागबानी फ़सल बन चुकी है।

प्रश्न 8.
नरमा तथा बासमती फसलों में सर्वपक्षीय कीट प्रबन्ध व तकनीक के प्रयोग से क्या लाभ हुआ है ?
उत्तर-
इस तकनीक से रसायनों के छिड़काव में 30 से 40% कमी आई है तथा इस तरह वातावरण में प्रदूषण भी कम हुआ है।

प्रश्न 9.
कटाई किए चावल के खेत में गेहूँ की बिजाई के लिए कौन-सी मशीन का प्रयोग किया जाता है तथा क्या लाभ है ?
उत्तर-
इस कार्य के लिए हैपी सीडर मशीन का प्रयोग किया जाता है और इसके साथ 20% खर्चा कम हुआ है। चावल की पुआल को जलाने के बाद प्रदूषण पर भी काबू पाने में मदद मिलती है।

कृषि ज्ञान-विज्ञान का स्रोत : पंजाब कृषि विश्वविद्यालय PSEB 10th Class Agriculture Notes

  • पंजाब में कृषि खोज तथा शिक्षा का कार्य 1906 में कृषि कॉलेज तथा खोज संस्था लायलपुर की स्थापना से हुआ था, जो अब फैसलाबाद पाकिस्तान में है।
  • पंजाब में 1957 में खोज का कार्य कृषि कॉलेज लुधियाना में शुरू हुआ जो 1962 में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय बना।
  • उस समय विश्वविद्यालय के दो कैम्पस लुधियाना तथा हिसार में थे।
  • 1966 में तीसरा कैम्पस पालमपुर में बनाया गया।
  • यह तीनों कैम्पस बाद में तीनों राज्य पंजाब, हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में विश्वविद्यालय बना दिए गए।
  • पी० ए० यू० की स्थापना के समय इसमें पांच कॉलेज-कृषि कॉलेज, बेसिक साईंस तथा ह्यूमैनटीज़ कॉलेज, कृषि इंजीनियरिंग कॉलेज, होम साइंस कॉलेज तथा वैटरनरी कॉलेज थे।
  • वर्ष 2005 में वैटरनरी कॉलेज को गुरु अंगद देव वेटरनरी तथा एनीमल साईंसज़ , विश्वविद्यालय बना दिया गया।
  • देश में पहला कृषि विश्वविद्यालय 1960 में उत्तर प्रदेश के पंत नगर में, दूसरा 1961 में उड़ीसा कृषि विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर में तथा तीसरा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना में 1962 में स्थापित किया गया।
  • पी० ए० यू० ने गेहूँ की खोज के लिए मैक्सिको के अंतर-राष्ट्रीय गेहूँ तथा मक्की सुधार केन्द्र सिमट (CIMMYT) से साँझेदारी की।
  • चावल की खोज के लिए मनीला (फिलीपीन्स) की अन्तर्राष्ट्रीय खोज संस्था, इंटरनैशनल राईस रिसर्च इंस्टीच्यूट (IRRI) से पक्का समझौता किया।
  • हरित क्रांति लाने के लिए गेहूँ की कल्याण सोना, डब्ल्यू० एल० 711 तथा चावल की ,पी० आर० 106 किस्म तथा मक्की की वी० जे० किस्म का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
  • बौनी किस्म के गेहूँ के पितामा तथा नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ० नौरमान ई० बोरलाग की विश्वविद्यालय के साथ ऐसी घनिष्ठता थी जिसे उन्होंने अपनी । अन्तिम सांस तक निभाया।
  • चावल की अधिक पैदावार वाली बौनी किस्मों को वैज्ञानिक डॉ० गुरदेव सिंह खुश ने विकसित किया।
  • कृषक मेलों का आरम्भ विश्वविद्यालय द्वारा 1967 में किया गया।
  • विश्वविद्यालय द्वारा 2013 तक भिन्न-भिन्न फसलों, फलों, फूलों तथा सब्जियों की 730 किस्में विकसित की गई हैं।
  • 1960-61 में गेहूँ तथा चावल की पैदावार 12 तथा 15 क्विटल प्रति हेक्टेयर थी जो अब बढ़कर 51 से 60 क्विटल हो गई है।
  • पी० ए० यू० द्वारा विश्व का पहला बाजरे का हाइब्रिड (संकर) एच० बी० तथा देश का पहला मक्की का सिंगल क्रासहाइब्रिड पारस तथा गोभी सरसों का , पहला हाइब्रिड पी० जी० एस० एच० 51 विकसित किया गया।
  • देश के कुल शहद उत्पादन में से 37% शहद पंजाब में पैदा होता है।
  • पंजाब में किन्नू की कृषि का आरम्भ कैलीफोर्निया से लाकर 1955-56 में किया गया।
  • देश में पैदा हुई मशरूम में से 40% मशरूम केवल पंजाब में ही पैदा होती ।
  • विश्वविद्यालय द्वारा पंजाब की छ: लाख हेक्टेयर कलराठी भूमि का सुधार किया गया है।
  • कृषि मशीनरी के लिए पंजाब देश का अग्रणी राज्य है।
  • विश्वविद्यालय द्वारा रोगों का मुकाबला करने वाली बासमती की बढ़िया किस्म पंजाब बासमती-3 तैयार की गई है।
  • विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी तथा नैनो विज्ञान प्रयोगशाला एक उच्च गुणवत्ता वाली प्रयोगशाला है।
  • विश्वविद्यालय के पुराने विद्यार्थियों ने बहुत ऊँचे पद प्राप्त किए हैं। इनमें से डॉ० एन० एस० रंधावा देश की कृषि की सब से ऊँची संस्था भारतीय कृषि खोज  परिषद् के निदेशक जनरल बने।
  • विश्वविद्यालय द्वारा तैनात किए संदेशवाहक मोबाइल फोन तथा इंटरनैट द्वारा किसानों तथा विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के मध्य पुल का कार्य करते हैं।
  • विश्वविद्यालय द्वारा आषाढ़ तथा सावनी की काश्त से पहले किसान मेले लगाए जाते हैं।
  • पी० ए० यू० को 1995 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा देश का सबसे पहला सर्वोत्तम विश्वविद्यालय होने का मान दिया गया।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व

Punjab State Board PSEB 10th Class Home Science Book Solutions Chapter 6 भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व

PSEB 10th Class Home Science Guide भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन हमारे शरीर में कौन-कौन से काम करता है?
उत्तर-
भोजन प्राणियों को जीवित रखने के अतिरिक्त शरीर में अग्रलिखित कार्य करता है

  1. शरीर को शक्ति देता है-मशीनों की तरह मानवीय शरीर को भी शक्ति की आवश्यकता होती है जोकि भोजन से प्राप्त होती है।
  2. शरीर की वृद्धि-जन्म से लेकर जवानी तक मानवीय शरीर में लगातार वृद्धि होती है। इस वृद्धि के पीछे भोजन की शक्ति ही कार्य करती है।
  3. टूटे तन्तुओं की मुरम्मत- भोजन शरीर के नष्ट हुए तन्तुओं के स्थान पर नए तन्तु बनाता है।

प्रश्न 2.
भोजन के कौन-से पौष्टिक तत्त्वों से हमें ऊर्जा मिलती है?
उत्तर-
भोजन के कार्बोज, चिकनाई और प्रोटीन से शरीर को ऊर्जा मिलती है।

प्रश्न 3.
भोजन जीवन का मूल आधार माना जाता है। क्यों?
उत्तर-
भोजन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और शरीर की अन्दरूनी तोड़-फोड़ की मुरम्मत करता है। ऊर्जा से शरीर अपनी आवश्यक क्रियाएं करने योग्य होता है और साथ-साथ शरीर की मुरम्मत भी होती रहती है। ये दोनों क्रियाएं शरीर को जीवित रखती हैं। इसलिए भोजन को जीवन का मूल आधार कहा जाता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व

प्रश्न 4.
शक्ति या ऊर्जा देने वाले भोजन पदार्थों के नाम लिखें।
उत्तर-
शक्ति निम्नलिखित भोजन पदार्थों से मिलती है, जैसे

  1. कार्बोज युक्त पदार्थ-गुड़, शक्कर, चीनी और जड़ों वाली सब्जियां।
  2. चिकनाई युक्त पदार्थ-जैसे मक्खन, घी, तेल और तले हुए भोजन पदार्थ ।
  3. प्रोटीन युक्त पदार्थ- भोजन पदार्थ जैसे दूध, दही, मक्खन, अण्डे, मीट आदि।

प्रज्ञ 5.
शरीर का निर्माण तथा टूटी-फूटी कोशिकाओं की मुरम्मत करने के लिए वन-से पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है तथा कौन-से भोजन पदार्थों से प्राई किए जा सकते हैं?
उत्तर-
भिन्न-भिन्न शारीरिक क्रियाएं करते समय शरीर के सैल टूटते, घिसते और नष्ट होते रहते हैं। इसलिए नए सैलों के निर्माण के लिए हमें प्रोटीन युक्त भोजन पदार्थ खाने चाहिएं जैसे अण्डा, दूध, मीट, मछली अनाज। सोयाबीन प्रोटीन का एक मुख्य और सस्ता स्रोत है।

प्रश्न 6.
भोजन के पौष्टिक तत्त्व कौन-से हैं ? उनके नाम लिखो।
उत्तर-
पौष्टिक तत्त्व भोजन का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। ये भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्त्वों का मिश्रण होते हैं। इनकी शरीर को काफ़ी मात्रा में आवश्यकता होती है। एक सन्तुलित भोजन में निम्नलिखित पौष्टिक तत्त्व होते हैं-प्रोटीन, कार्बोज, चिकनाई, विटामिन, लवण और पानी है।

प्रश्न 7.
प्रोटीन कौन-से तत्त्वों का मिश्रण है?
उत्तर-
प्रोटीन पौष्टिक तत्त्वों में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इसको मानवीय जीवन का आधार कहा जाता है। प्रोटीन कई प्रकार के अमीनो अम्लों के मिश्रण से बनता है। यह अमीनो अम्ल, कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कई सल्फर के संयोग से बनते हैं।

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प्रश्न 8.
कौन-सा तत्त्व केवल प्रोटीन में ही मिलता है?
उत्तर-
नाइट्रोजन तत्त्व केवल प्रोटीन में ही मिलता है।

प्रश्न 9.
कार्बोहाइड्रेट के मुख्य स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर-
यह हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन का मिश्रण है। यह शरीर को गर्मी और शक्ति देने का सबसे सस्ता स्रोत है। कार्बोहाइड्रेट, गेहूँ, चावल, मक्की, जौ, फल, सूखे मेवे, गुड़, शक्कर, चीनी, शहद आदि से प्राप्त होता है।

प्रश्न 10.
विटामिन हमारे जीवन तत्त्व क्यों हैं?
उत्तर-
विटामिन पौष्टिक तत्त्वों में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। ये बढ़िया स्वास्थ्य, शारीरिक वृद्धि और बीमारियों का मुकाबला करने के लिए आवश्यक हैं। ये हमारे शरीर को थोड़ी मात्रा में चाहिए। परन्तु शरीर इनकी रचना नहीं कर सकता है इसलिए इनको भोजन में शामिल करना आवश्यक है।

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प्रश्न 11.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
घुलनशीलता के आधार पर विटामिनों को दो भागों में विभाजित किया जाता है-चर्बी में घुलनशील और पानी में घुलनशील विटामिन। पानी में घुलनशील विटामिनों का एक ग्रुप बी समूह होता है जो पानी में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त विटामिन ‘सी’ तथा विटामिन ‘बी’ भी पानी में घुलनशील हैं।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 12.
विटामिन ‘ए’ की कमी से शरीर को क्या हानि होती है? मुख्य स्त्रोत कौन-से हैं?
उत्तर-
विटामिन ‘ए’ की कमी से शरीर पर हानिकारक प्रभाव होता है जो इस प्रकार है

  1. अन्धराता (Night Blindness)-विटामिन ‘ए’ की कमी से मनुष्य की अन्धेरे में देखने की शक्ति कम हो जाती है। रोशनी वाले स्थान या बाहर तेज़ धूप से अन्धेरे या अन्दर कमरे में आने पर कुछ समय के लिए देखने में रुकावट आती है। इसकी कमी से रंगों को ठीक तरह पहचानने में भी रुकावट होती है।
  2. जीरोसिस (Xerosis)—विटामिन ‘ए’ की कमी से आंसू ग्रन्थियां सूख जाती हैं। आंखों के सफेद भाग पर धुंधलापन और कार्निया (Cornea) पर छोटे-छोटे दाने हो जाते हैं। इनमें सफ़ेद चिपचिपा पदार्थ निकलता है और पलकें बन्द हो जाती हैं। अधिक समय तक विटामिन ‘ए’ की कमी से मनुष्य अन्धा हो जाता है।
  3. चमड़ी का खुरदरापन (Toad’s skin)
  4. प्रजनन क्रिया पर प्रभाव (Effect on reproduction system)
  5. गर्दे में पत्थरी की सम्भावना (Chances of Stone formation in kidney)
  6. वृद्धि में रुकावट (Effect on growth)
  7. दांतों और हड्डियों के विकार (Effects on teeth and bones)।

इसके अतिरिक्त गर्भ के समय और बच्चे को दूध देते समय विटामिन ‘ए’ की आवश्यकता अधिक होती है और ताज़ी सब्जियों में बासी सब्जियों से अधिक विटामिन ‘ए’ मिलता है। शरीर में इसका अधिक होना भी नुकसानदायक होता है।
मुख्य स्रोत-मछली, दूध, मक्खन, देसी घी, आम, पपीता, गाजर, टमाटर, अनानास आदि।

प्रश्न 13.
क्या विटामिन ‘के’ पानी में घुलनशील है ? इसका सबसे सस्ता स्त्रोत कौन-सा है?
उत्तर-
नहीं, विटामिन ‘के’ पानी में घुलनशील नहीं बल्कि यह चर्बी में घुलनशील है। यह अधिकतर वनस्पति वर्ग में पाया जाता है। इस की कमी से बहते खून का बन्द होना कठिन हो जाता है क्योंकि यह खून के जमने में सहायक है। यह हरी पत्तेदार सब्जियों में पाया जाता है। इसका सब से सस्ता स्रोत फूलगोभी, बन्द गोभी और गण्ड गोभी है।

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प्रश्न 14.
कौन-से विटामिन प्रकाश तथा गर्मी से जल्दी नष्ट हो जाते हैं?
उत्तर-
राइबोफ्लेविन (विटामिन B.) गर्मी और रोशनी से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 15.
कौन-कौन से खनिज पदार्थ हमारे शरीर के लिए आवश्यक हैं? नाम बताओ।
उत्तर-
हमारे शरीर को दो प्रकार के खनिज पदार्थों की आवश्यकता होती है। एक मैक्रोमिनरल्ज़ जैसे-कैल्शियम, फॉस्फोरस, सल्फर, सोडियम और क्लोरीन आदि। दूसरे माइक्रोमिनरल्ज़ हैं जैसे-लोहा, आयोडीन, तांबा, जिंक, कोबाल्ट आदि।

प्रश्न 16.
आयोडीन नमक लेने का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
जिन स्थानों पर ज़मीन में आयोडीन की कमी हो वहां सभी व्यक्तियों को आयोडाइज़्ड नमक (Iodised salt) ही प्रयोग करना चाहिए। भारत में पोटाशियम आयोडेट से नमक को आयोडाइज्ड किया जाता है। जिन स्थानों पर ज़मीन में आयोडीन की कमी है वहां केवल यही नमक बेचा जा सकता है। व्यस्कों में 100-150 माइक्रो ग्राम आयोडीन की आवश्यकता होती है। विशेष हालतों जैसे कि गर्भ अवस्था में इसकी आवश्यकता बढ़ जाती है। गिल्लड़ होने की स्थिति में आयोडीन की गोलियां दी जाती हैं।

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प्रश्न 17.
पानी की कमी से हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर–
पानी की कमी का प्रभाव (Effects of deficiency of Water)—जिस मात्रा में पानी शरीर में से निकलता है उतनी मात्रा में द्रव्य पदार्थों या भोजन पदार्थों द्वारा यदि पूरा न किया जाए तो हानिकारक प्रभाव होता है। इससे शरीर के पानी की मात्रा कम हो जाती है और शरीर के द्रव्य पदार्थों में परिवर्तन आ जाते हैं। शरीर की क्रियाओं की गति कम हो जाती है और फोक पदार्थों का विकास नहीं हो सकता। यदि पानी की बहुत कमी हो जाए तो मृत्यु भी हो सकती है।

प्रश्न 18.
बढ़ने वाले बच्चों के भोजन में प्रोटीन का होना क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
बढ़ रहे बच्चों को प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि उनके शरीर में नए सैलों का निर्माण होना होता है और बच्चों के शरीर में सैलों की तोड़-फोड़ भी अधिक होती है। इसलिए नए सैलों को बनाने और टूटे सैलों की मुरम्मत के लिए बच्चों को प्रोटीन की आवश्यकता अधिक होती है।

प्रश्न 19.
प्रोटीन के मुख्य कार्य क्या हैं तथा इसकी कमी का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
प्रोटीन के कार्य (Functions of Protein)-प्रोटीन एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। यह हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है

  1. शरीर की सुरक्षा और विकास का कार्य
  2. शरीर को ऊर्जा देने का कार्य
  3. रोगों से मुकाबला करने के लिए शक्ति को बढ़ाना
  4. खून बनाने में सहायक
  5. अम्ल और क्षार में सन्तुलन रखना
  6. हार्मोन्ज़ और एन्जाइमज़ (Enzymes) बनाने का कार्य
  7. मानसिक शक्ति प्रदान करना।

प्रोटीन की कमी से होने वाले नुकसान (Effect of deficiency of Protein) —
प्रोटीन की कमी का प्रभाव बच्चों, गर्भवती औरतों और दूध पिलाने वाली माताओं पर अधिक पड़ता है। इसकी कमी से निम्नलिखित नुकसान होते हैं —

  1. शरीर की वृद्धि और विकास में रुकावट-प्रोटीन की कमी से शरीर की वृद्धि और बढ़ोत्तरी की रफ्तार कम हो जाती है। इससे शरीर कमजोर हो जाता है और बच्चों में शारीरिक वृद्धि रुक जाती है।
  2. खून की कमी-भोजन में प्रोटीन की कमी से खून की कमी (Anaemia) हो जाती है।
  3. रोग प्रतिरोधक (Antibodies) पदार्थ की कमी-प्रोटीन शरीर में रोग प्रतिरोधक तत्त्वों का निर्माण करता है। प्रोटीन की कमी से शरीर में बीमारियों से मुकाबला करने की शक्ति कम हो जाती है जिससे कई रोग लग जाते हैं।
  4. हड्डियां कमज़ोर होना-इसकी कमी हड्रियों को भी कमजोर करती है। इसलिए इनके जल्दी टूटने का डर रहता है।
  5. चमड़ी का खुशक होना-शरीर में प्रोटीन की कमी से चमड़ी खुशक हो जाती है और इससे शरीर पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
  6. बच्चे का कमज़ोर पैदा होना-गर्भवती और दूध पिलाने वाली औरतों में इसकी कमी होने से बच्चा कमजोर होता है और उसकी वृद्धि ठीक नहीं होती।
  7. प्रोटीन की कमी से बच्चे क्वाशियोरकॉर और मरास्मस (सूखा) रोगों का शिकार हो जाते हैं।

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प्रश्न 20.
प्रोटीन के स्त्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
प्रोटीन की प्राप्ति के स्रोत (Sources of Protein)

    1. पशु जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Animal Sources)-जैसे दूध और दूध से बने पदार्थ, पनीर, दही, खोया, मक्खन आदि, मीट और मीट से बने पदार्थ अण्डे और मछली।
    2. वनस्पति जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Vegetable Sources)-जैसे दालें, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, बादाम, पिस्ता, नारियल, मटर और अनाज आदि।
      चित्र-प्रोटीन की प्राप्ति के स्रोत

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प्रश्न 21.
कार्बोहाइड्रेट्स हमारे शरीर में क्या काम करते हैं?
उत्तर-

  1. शक्ति प्रदान करना-कार्बोहाइड्रेट का मुख्य कार्य शारीरिक कार्यों के लिए गर्मी और शक्ति देना है। एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट से 4 कैलोरी ऊर्जा मिलती है। शरीर को शक्ति प्रदान करने के लिए यह सबसे अच्छा स्रोत है। भोजन से प्राप्त होने वाली शक्ति का 50% से 60% भाग कार्बोहाइड्रेट द्वारा ही प्राप्त होता है।
  2. प्रोटीन एक महंगा स्रोत है और कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन की बचत करते हैं ताकि प्रोटीन शरीर के निर्माण का कार्य कर सके।
  3. यह चिकनाई की कमी को भी पूरा करते हैं और चिकनाई के पाचन में भी सहायक हैं।
  4. ग्लूकोज़ आवश्यक अमीनो एसिड के निर्माण में भी सहायक होता है।
  5. कार्बोहाइड्रेट्स भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  6. सैलुलोज फोक का कार्य करता है जिससे शरीर में से मल निकालने के लिए सहायता मिलती है और कब्ज दूर होती है।
  7. कार्बोहाइड्रेट चिकनाई से मिल कर भूख की तृप्ति (Satiety) महसूस कराते हैं। इससे काफ़ी देर भूख महसूस नहीं होती।

प्रश्न 22.
भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स की उचित मात्रा होना क्यों जरूरी है?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट का मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा प्रदान करना है। इसकी कमी के कारण शरीर में प्रोटीन और चर्बी इस कार्य के लिए प्रयोग की जाती है और शरीर कमज़ोर होना शुरू हो जाता है। लगातार भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स की कमी होने से शारीरिक वृद्धि रुक जाती है और मरास्मस नाम का रोग हो जाता है। इसलिए कार्बोज़ का भोजन में उचित मात्रा में होना बहुत आवश्यक है।

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प्रश्न 23.
कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का प्रभाव (Effect of deficiency of Carbohydrates) — कार्बोहाइड्रेट्स की कमी प्रायः कम ही देखने को मिलती है, परन्तु यदि इसकी कमी हो जाए तो शरीर पर कई तरह से प्रभाव होता है।

  1. बच्चों पर कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का प्रभाव (Effect of deficiency of Carbohydrates on children)-प्रायः पांच साल से कम आयु के बच्चों में इसकी कमी के लक्षण दिखाई देते हैं। जब बच्चों से दूध छुड़वाया जाता है तो उनके भोजन में पूर्ण पौष्टिक तत्त्व शामिल नहीं किए जाते या अधिक समय के लिए बच्चों को मां के दूध पर ही रखे जाने से भी शरीर में इसकी कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में शरीर कार्बोहाइड्रेट के स्थान पर ऊर्जा के लिए प्रोटीन का प्रयोग करता है और इससे प्रोटीन की कमी भी आ जाती है। इस अवस्था को मरास्मस या सूखा (Marasmus) कहा जाता है।
  2. भार की कमी (Loss of Weight) भोजन में जब कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम हो जाए तो शरीर कमजोर हो जाता है। इससे काम करने के लिए दिल नहीं करता। भार कम होने लग पड़ता है और थकावट महसूस होती है।
  3. किटोसिस (Ketosis)-कार्बोहाइड्रेट्स की कमी से शरीर में कीटोन-बॉडीज़ (Ketone Bodies) बढ़ जाती हैं। खून में अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है। इससे मनुष्य को बेहोशी होने लगती है और मृत्यु भी हो सकती है।
  4. मांसपेशियों का ढीला पड़ना (Loosening of Muscles)-कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का प्रभाव मांसपेशियों पर भी दिखाई देता है। चमड़ी ढीली पड़ने के कारण झुर्रियां पड़ जाती हैं और चेहरे की चमक भी कम हो जाती है।
    कार्बोहाइड्रेट्स की उचित मात्रा ही लेनी चाहिए। आवश्यकता से अधिक कार्बोज़ खाने से यह शरीर में जाकर चर्बी का रूप धारण करके कोशिका में इकट्ठा हो जाता है और मोटापे का रोग हो जाता है। इससे आदमी आलसी हो जाता है और खून का दौरा तेज़ होने का डर रहता है।

प्रश्न 24.
निशास्ते में कौन-सा पौष्टिक तत्त्व होता है और यह तत्त्व और कौनसे भोजन पदार्थों से प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर-
निशास्ते में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं। यह अनाजों, जड़ों वाली सब्जियां और कंदमूल जैसे शकरकंदी और आलू में होता है।

प्रश्न 25.
चर्बी हमारे शरीर में क्या काम करती है?
अथवा
चिकनाई के शरीर के लिए कार्य बताएं।
उत्तर-
चर्बी के कार्य (Functions of Fat)-चर्बी हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है

  1. ऊर्जा का साधन (Source of energy)
  2. आवश्यक वसा अम्लों का साधन (Sources of essential fatty acids)
  3. चर्बी में घुलनशील विटामिनों का स्रोत (Source of fat soluble vitamins)
  4. कोमल अंगों की सुरक्षा (Protection of sensitive body organs)
  5. भोजन को स्वादिष्ट बनाती है (Help in making food tasty)
  6. सन्तुष्टि देती है (Give satisfaction)
  7. शरीर का तापमान बनाए रखती है (Helps in regulating body temperature)
  8. चमड़ी के स्वास्थ्य के लिए (For healthy skin)।

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प्रश्न 26.
चर्बी की कमी तथा अधिक मात्रा का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
चर्बी की कमी से हानियां (Effects of deficiency of fats)-चर्बी की कमी से निम्नलिखित नुकसान होते हैं

  1. चर्बी की कमी से चिकनाई में घुलनशील विटामिन शरीर को नहीं मिलते और उनकी कमी से होने वाले रोग हो जाते हैं।
  2. आवश्यक वसा अम्लों (Fatty acids) की कमी हो जाती है, जिसका असर आंखों और चमड़ी पर पड़ता है। इसलिए चमड़ी खुशक हो जाती है। दाद और खुजली रोग होने का डर रहता है।
  3. चर्बी की कमी से शारीरिक ऊर्जा के लिए प्रोटीन का प्रयोग शुरू हो जाता है जिससे शारीरिक निर्माण का कार्य रुक जाता है।
  4. इसकी कमी से पाचन प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ता है और कब्ज रहने लग पड़ती है।
  5. चर्बी की कमी से मनुष्य का शरीर हड्डियों का ढांचा बन जाता है।

एक बात ध्यान रखने योग्य यह है कि यदि चर्बी का अधिक प्रयोग किया जाए तो मोटापा हो जाता है और हाजमा भी खराब हो जाता है। आज-कल की खोजों से यह सिद्ध हुआ है कि चिकनाई से प्राप्त की कोलेस्ट्रॉल स्वास्थ्य के लिए गम्भीर समस्या पैदा कर सकती है। जिससे खून का दबाव बढ़ जाता है और दिल का रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है इसलिए हमें वनस्पति तेलों का प्रयोग अधिक करना चाहिए।

प्रश्न 27.
(i) विटामिन ‘ए’ का मुख्य काम क्या है तथा भोजन स्रोत बताएं।
(ii) विटामिन ‘ए’ का हमारे शरीर में क्या काम है ?
उत्तर-
(i) विटामिन ‘ए’ के कार्य (Functions of Vitamin ‘A’) शरीर में विटामिन ‘ए’ निम्नलिखित कार्यों के लिए आवश्यक है

  1. शारीरिक विकास के लिए (For Physical growth)
  2. स्वस्थ आंखों के लिए (For healthy eyes)
  3. स्वस्थ चमड़ी के लिए (For healthy skin)
  4. प्रजनन क्रिया के लिए (For reproduction)
  5. छूत के रोगों की रक्षा के लिए (For protection against contagious diseases)
  6. स्वस्थ हड्डियों और दांतें के लिए (For healthy bones and teeth)।

विटामिन ‘ए’ के स्रोत (Sources of Vitamin ‘A’)

  1. मछली के जिगर का तेल, कुछ समुद्री मछलियां जैसे शार्क, काड, हैलीबुल के जिगर के तेल में इस विटामिन की बहुत मात्रा पाई जाती है।
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  2. दूध, मक्खन और देसी घी
  3. अण्डे और कलेजी
  4. हरे पत्ते वाली सब्जियां
  5. पीले, संतरी और लाल फल और सब्जियां जैसे आम, पपीता, अनानास, बेर, गाजर और टमाटर में यह विटामिन कैरोटीन के रूप में पाया जाता है।

(ii) देखें भाग (i)

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प्रश्न 28.
विटामिन ‘डी’ के कार्य तथा कमी के बारे में बताएं।
उत्तर-
विटामिन ‘डी’ शरीर के लिए निम्नलिखित कार्य करता है

  1. कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है। (Helps in absorption of Calcium and phosphorus)
  2. हड्डियों के विकास के लिए (For development of bones)
  3. शरीर के पूर्ण विकास के लिए (For development of body)।

विटामिन ‘डी’ की कमी के प्रभाव (Effects of the Deficiency of Vitamin’D’) – विटामिन ‘डी’ की कमी से निम्नलिखित रोग हो जाते हैं

  1. रिकेट्स रोग (Rickets)
  2. ओस्टोमलेशिया (Osteomalacia)
  3. ओस्टियोपरोसिस (Osteoporosis)।

प्रश्न 29.
विटामिन ‘ई’ का मुख्य कार्य क्या है तथा इसकी कमी का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
विटामिन ‘ई’ के कार्य-शरीर में विटामिन ‘ई’ निम्नलिखित कार्य करता है

  1. प्रजनन क्रिया में सहायता करता है।
  2. मांसपेशियों के विकास के लिए आवश्यक है।
  3. विटामिन ‘ए’ के बनने में सहायता करता है।

विटामिन ‘ई’ की कमी के शरीर पर प्रभाव

  1. प्रजनन सम्बन्धी बिकार (Effect on reproduction system)
  2. गर्भपात (Miscarriage)
  3. भ्रूण की मृत्यु (Death of the foetus)
  4. दिल का रोग (Disease of heart)।

प्रश्न 30.
विटामिन ‘के’ का मुख्य काम क्या है तथा इसकी कमी का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
विटामिन ‘के’ भी मनुष्य के पोषण के लिए बहुत आवश्यक है क्योंकि यह खून को जमाने में सहायता करता है।
विटामिन ‘के’ के कार्य (Functions of Vitamin ‘K’)-इसका मुख्य कार्य खून को जमाने में सहायता करना है।
विटामिन ‘के’ की कमी के प्रभाव-प्रायः विटामिन ‘के’ की कमी कम ही होती है क्योंकि यह विटामिन छोटी आन्त में बनता है। सल्फा दवाइयों का अधिक प्रयोग करने से शरीर में इसका निर्माण रुक जाता है और यदि खून बहने लगे तो रुकता नहीं।

प्रश्न 31.
विटामिन ‘बी’ समूह में कौन-कौन से विटामिन आते हैं? नाम बताएं।
उत्तर-
ग्यारह विटामिन ‘बी’ समूह को बनाते हैं परन्तु इनमें 7 बहुत महत्त्वपूर्ण हैंथायामिन, राइबोफ्लेविन, निकोटिनिक एसिड, पैंटोथिनिक एसिड, पिरिडाक्सिन, फौलिक एसिड, विटामिन ‘बी’ 12, कोलीन, इनोसीटोल और बायोटिन आते हैं। ये सभी विटामिन पानी में घुलनशील होते हैं।

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प्रश्न 32.
निम्नलिखित के काम और स्रोत लिखें
(1) थायामिन
(2) राइबोफ्लेविन
उत्तर-
1. थायामिन (B) – यह विटामिन पनीर, साबुत दालें, अनाज, अंकुरित दालों और चावलों की ऊपरी सतह पर काफ़ी मात्रा में होता है। यह विटामिन तन्त्रिका प्रणाली (Nervous system) के लिए शरीर की वृद्धि और विकास के लिए और रोगों से मुकाबला करने की शक्ति के लिए चाहिए। इसकी कमी से मनुष्य को बेरी-बेरी रोग हो जाता है। यह रोग दो प्रकार होता है सूखी बेरी-बेरी और गीली बेरी-बेरी। सूखी बेरी-बेरी में भूख कम लगती है, कब्ज हो जाती है, टांगें, बाहें ठण्डी पड़ जाती हैं और जोड़ों में दर्द होने लग जाता है।
गीली बेरी-बेरी में टांगों और पेट में पानी भर जाता है। सांस लेने के लिए मुश्किल आती है और दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है और कई बार दिल की गति रुक जाने की सम्भावना होती है। अधिक संख्त कार्य करने वालों में, गर्भवती और बच्चे को दूध देने वाली माताओं को इस विटामिन की आवश्यकता अधिक होती है। चावल पालिश करने से थायामिन कम हो जाती है। साबुत दालों और अन-छने आटे का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इसमें थायामिन होती है। खाना अधिक देर तक पकाने और उसमें सोडे का प्रयोग करने से भी थायामिन नष्ट हो जाता है।

2. राइबोफ्लेविन (B), यह विटामिन पानी में घुलनशील है और प्रकाश से जल्दी नष्ट हो जाता है। भोजन को उबालने और भूनने के दौरान यह विटामिन काफ़ी मात्रा में . नष्ट हो जाता है। यह विशेषकर पट्ठों और नसों में काम करता है। इसकी कमी से आंखों और चमड़ी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। होठों के कोने फट जाते हैं चमड़ी सूखी और खुशक हो जाती है। यह विटामिन दूध या दूध से बने पदार्थ मूंगफली, खमीर, दालों, मास, अण्डा और हरे पत्ते वाली सब्जियों में होता है।

प्रश्न 33.
विटामिन ‘सी’ के कार्य, स्रोत तथा कमी का प्रभाव बतायो।
उत्तर-
यह पानी में घुलनशील है और इसको एसकार्बिक एसिड भी कहा जाता है।
1. विटामिन ‘सी’ के कार्य शरीर में विटामिन ‘सी’ अग्रलिखित कार्य करता है —

  1. यह कोलेजन के निर्माण के लिए कार्य करता है। (It helps in the formation and maintenance of collagen.)
    कोलेजन एक प्रकार का सीमेंट जैसा पदार्थ है जो शरीर की कोशिकाओं को स्थिर रखता है। हड्डियों और दांतों के सख्त पदार्थ मैट्रिक और डैनटाइन का निर्माण भी करता है।
    जख्मों के जल्दी भरने और टूटी हड्डियों को जोड़ने के लिए भी विटामिन ‘सी’ ही कार्य करता है।
  2. फौलिक अम्ल के पाचन के लिए (For the metabolism of folic acid)
  3. कैल्शियम और लोहे के अवशोषण करने के लिए (For the absorption of calcium and iron)
  4. टाइरोसिन के ऑक्सीकरण के लिए (For the Oxidation of tyrosine)
  5. रोगों से लड़ने की शक्ति देता है। (Give resistance against disease)।

2. विटामिन ‘सी’ के स्रोत —

  1. सबसे अधिक विटामिन आंवले में मिलता है। इसके अतिरिक्त खट्टे फल जैसे नींबू, संतरा, गलगल, चिकोतरा आदि।
    PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व 3
  2. हरे पत्ते वाली सब्जियां और टमाटर आदि।
  3. अंकुरित दालें और अनाज।
  4. मां का दूध।

विटामिन ‘सी’ की कमी से होने वाले रोग —

  1. इसकी कमी से सकर्वी नामक रोग हो जाता है जिससे मसूड़े सूज जाते हैं और कोशिकाओं में से खून बहने लग जाता है।
  2. दांतों में पाइयोरिया नामक रोग हो जाता है और दांत हिलने लग पड़ते हैं।
  3. जख्म जल्दी ठीक नहीं होते।
  4. खून कम और अशुद्ध हो जाता है।
  5. हड्डियां और शरीर कमज़ोर हो जाता है।
  6. थकावट महसूस होती है।

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प्रश्न 34.
कैल्शियम तथा फॉस्फोरस महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ हैं। कैसे?
उत्तर-
1. कैल्शियम-यह बहुत महत्त्वपूर्ण खनिज लवण है। शरीर में पाए जाने वाले कुल लवणों का 75% भाग कैल्शियम और फॉस्फोरस में होता है। शरीर के कुल कैल्शियम का 99% भाग हड्डियों और दांतों में पाया जाता है।
कैल्शियम के कार्य-कैल्शियम के दो महत्त्वपूर्ण कार्य हैं —

  1. हड्डियों और दांतों का निर्माण (Building Bones and Teeth) — कैल्शियम और फॉस्फोरस दोनों मिल कर हड्डियों और दांतों का निर्माण करते हैं। इससे हड्डियों और दांतों का ढांचा मज़बूत होता है। दांतों के डैनटिन (Dentin) में 27 प्रतिशत कैल्शियम और एनमल (Enamel) में 36 प्रतिशत कैल्शियम होता है।
  2. शारीरिक क्रियाओं को चलाना (Regulating Body Processes) — शरीर में होने वाली क्रियाओं के लिए कैल्शियम फॉस्फोरस के साथ मिलकर सहायता करता _है। ये क्रियाएं इस प्रकार हैं

(क) कैल्शियम खून को जमाने में सहायता करता है।
(ख) पेशियों के सिकुड़ने पर दिल की गति को बनाए रखने के लिए भी कैल्शियम आवश्यक है। कैल्शियम की प्राप्ति के साधन.
भोजन में कैल्शियम निम्नलिखित साधनों से प्राप्त होता है —

  1. दूध और दूध से बने पदार्थ।
  2. हरे पत्ते वाली सब्जियां जैसे पालक, सरसों, पुदीना, मूली और गाजर आदि।
  3. छोटी मछलियां जो हड्डियों समेत खाई जाती हैं।

कैल्शियम की कमी के प्रभाव (Effects of deficiency of Calcium) —

  1. बच्चों के दांत देरी से निकलते हैं या ठीक नहीं निकलते।।
  2. हड्डियों कमज़ोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं।
  3. बच्चों में रिकेट्स (Rickets) और बड़ों में औस्टोमलेशिया (Osteomalacia) रोग हो जाता है। इनका विवरण विटामिन ‘डी’ की कमी से हानियों (प्र० 28) में दिया गया है।

3. फॉस्फोरस (Phosphorus)-कैल्शियम के साथ-साथ फॉस्फोरस का भी बहुत महत्त्व है। फॉस्फोरस लगभग शरीर के भार का 1 प्रतिशत भाग होता है। यह कैल्शियम में मिल कर हड्डियों और दांतों का निर्माण करता है।
फॉस्फोरस के कार्य (Functions of Phosphorus)-शरीर की रचना के लिए फॉस्फोरस बहुत कार्य करता है, जैसे

  1. हड्डियों और दांतों का निर्माण (Building bones and teeth)
  2. कोशिकाओं की बनावट (Formation of Cells)
  3. एन्ज़ाइम बनाना (Formation of Enzymes) फॉस्फोरस के स्रोत-अनाज, अण्डा, मांस, मछली, दूध।

फॉस्फोरस की कमी के प्रभाव (Effects of deficiency of Phosphorus) —
फॉस्फोरस की कमी बहुत कम होती है क्योंकि यह अनाज में काफ़ी मात्रा में पाया जाता है। परन्तु यदि कहीं इसकी कमी हो जाए तो हड्डियां और दांत कमजोर हो जाते हैं। इसकी कमी से कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया में खराबी आ जाती है।

प्रश्न 35.
लोहे की दैनिक आवश्यकता बहुत कम होने के बावजूद यह बहुत महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ है । कैसे?
अथवा
लोहा हमारे शरीर के लिये कैसे आवश्यक है ? इसकी प्राप्ति के साधनों के बारे में बताएं।
उत्तर-
लोहा (Iron) — शरीर में लोहा बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। परन्तु शरीर की वृद्धि और शारीरिक क्रियाओं को ठीक ढंग से चलाने में इसका बहुत योगदान है।
लोहे के कार्य (Functions of Iron) — लोहा हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करता है

  1. होमोग्लोबिन का निर्माण।
  2. मांसपेशियों का आवश्यक तत्त्व।
  3. ऑक्सीकरण की क्रियाओं के लिए यह फेफड़ों के लिए ऑक्सीजन कोशिकाओं तक और कोशिकाओं से फेफड़ों तक पहुंचाता है।

लोहे की प्राप्ति के स्रोत (Sources of Iron) —
लोहे की प्राप्ति के स्रोत निम्नलिखित हैं
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  1. अण्डे का पीला भाग, कलेजी या मांस।
  2. गुड़, शक्कर और सूखे मेवे।
  3. हरे पत्ते वाली सब्जियां।।

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प्रश्न 36.
आयोडीन की कमी से क्या होता है तथा प्राप्ति के साधनों के बारे में बताओ।
उत्तर-
आयोडीन की कमी से

  1. घेघा रोग हो जाता है।
  2. थाइराइड ग्रन्थियों में थायराक्सिन कम निकलता है, जिससे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास पूरा नहीं होता। बालिग व्यक्तियों में भी मानसिक विकास कम हो जाता है। शरीर सूज जाता है और ढीला पड़ जाता है।
  3. अधिक कमी होने से मिक्सोडीमा हो जाता है। आंखें बाहर को आ जाती हैं।
  4. बच्चों में क्रेटिनिज्म (Cretinism) अर्थात् बच्चे बौने और भद्दे लगते हैं। चमड़ी मोटी और खुरदरी हो जाती है। जीभ बढ़ जाने से मुंह बन्द नहीं होता।

आयोडीन की प्राप्ति के स्रोत – आयोडीन की आवश्यक मात्रा का 75% भाग ज़मीन पर पैदा हुई सब्जियों, दालों और अनाज से पूरी हो जाती और शेष पानी से। परन्तु कई पहाड़ी स्थानों पर ज़मीन और पानी में आयोडीन नहीं होती, वहां आवश्यक आयोडाइज्ड नमक खाना चाहिए। अधिक नमी की स्थिति में इसकी गोलियां भी दी जाती हैं।

प्रश्न 37.
पानी मनुष्य के शरीर के लिए कैसे महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर-
पानी (Water) — पानी हमारे भोजन का एक बड़ा भाग है। यद्यपि पानी को हम भोजन नहीं कह सकते क्योंकि न तो यह शक्ति देता है और न ही शरीर में होने वाली क्रियाओं का निर्माण करता है। परन्तु फिर भी हर कोश (Cell) में पौष्टिक तत्त्व पहुंचाने का कार्य पानी ही करता है। शरीर के भार का लगभग 61% भाग पानी ही है।
पानी के कार्य (Functions of Water)—पानी हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करता है

  1. घोलक के रूप में (Water act as a solvent)
  2. पाचन क्रियाओं में सहायता (Helps in the process of digestions)
  3. फोक को बाहर निकालने में सहायता (Helps in the removal of waste products)
  4. कोमल अंगों की सुरक्षा (Helps in the protection of sensitive organs)
  5. तापमान को स्थिर रखने में सहायता करना (Helps in the temperature regulation)
  6. स्नेहक के रूप में कार्य करता है (Act as a lubricant)।

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प्रश्न 38.
फोक का अपना महत्त्व कैसे है तथा प्राप्ति के क्या स्त्रोत हैं?
अथवा
फोक का सन्तुलित भोजन में क्या महत्त्व है?
उत्तर-
फोक (Roughage)-फल और सब्जियों के रेशे और अनाजों के छिलके फोक बनाते हैं, यह स्टार्च के कणों को बांध कर रखते हैं। ये पदार्थ आप नहीं पचते इनको चाहे जितना भी पचाया जाए फिर भी ये घुलते नहीं।
फोक के कार्य (Functions of Roughage) — ये शरीर को कोई पौष्टिक तत्त्व नहीं देते फिर भी इनका शरीर के लिए बहुत महत्त्व है।

  1. इनसे भोजन की मात्रा बढ़ जाती है।
  2. फोक से भोजन को पाचन प्रणाली को चलाने में सहायता मिलती है।
  3. आंतों और पट्ठों को क्रियाशील रखने में मदद करते हैं।
  4. पाचन के पश्चात् मल बाहर निकालने में सहायता करते हैं।
  5. कब्ज़ को दूर करते हैं।
  6. ये कुछ ऐसे जीवाणु के बनने में सहायता करते हैं जो कि पित एसिड को तोडते हैं।

फोक की प्राप्ति के स्त्रोत (Sources of Roughage) —

  1. हरी सब्ज़ियाँ जैसे बन्द गोभी, गाजर के पत्ते, हरा धनिया, कड़ी पत्ता, पुदीना आदि।
  2. फल जैसे-अंजीर, संतरा, अनार, टमाटर, अंगूर और अमरूद।
  3. सम्पूर्ण अनाज।

प्रश्न 39.
लोहे की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है? लोहे के हमारे शरीर में क्या कार्य हैं?
अथवा
लोहे की कमी का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
लोहे की कमी से अनीमिया हो जाता है। खून में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। इससे भूख कम लगना, सांस फूलना, दिल की धड़कन बढ़ना, नाखून सफेद होना और शारीरिक कमजोरी हो जाती है।
यह रोग विटामिन बी कम्पलैक्स की कमी से भी हो जाता है। लोहे के कार्य

  1. हीमोग्लोबिन का निर्माण
  2. मांसपेशियों की आवश्यकता
  3. ऑक्सीकरण की क्रियाओं के लिए ये फेफड़ों के लिए ऑक्सीजन और कोशिकाओं से ऑक्सीजन फेफड़ों तक पहुँचाता है।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 40.
भोजन के पौष्टिक तत्त्व कौन-कौन से हैं? प्रोटीन के कार्य, कमी के परिणाम और स्रोत लिखो।
उत्तर-
पौष्टिक तत्त्व, वे रासायनिक तत्त्व हैं जो हमें भोजन से प्राप्त होते हैं और ये शारीरिक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा और शरीर के प्रत्येक कोश की बनावट और देखभाल के लिए आवश्यक योगदान देते हैं।
पौष्टिक तत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. प्रोटीन (Protein)
  2. कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)
  3. चर्बी (Fat)
  4. विटामिन (Vitamin)
  5. खनिज पदार्थ (Mineral)
  6. पानी (Water)
  7. फोक (Roughage)।

लाभ-पौष्टिक तत्त्वों में से प्रोटीन एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इसको मानवीय जीवन का आधार कहा जाता है। जैसे मकान बनाने के लिए ईंटें, सीमेंट और मिट्टी की आवश्यकता होती है ठीक उसी तरह की शरीर की रचना के लिए कोशों (Cells) की आवश्यकता होती है। इन कोशों के अन्दर प्रोटोप्लाज़म (Protoplasm) होता है जिस को जीवन का आधार माना जाता है। प्रोटोप्लाज़म प्रोटीन से ही बनता है।

प्रोटीन कई प्रकार के अमीनो अम्लों (Amino acids) के मिश्रण से बनता है। ये अमीनो अम्ल कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कई सल्फर के संयोग से बनते हैं अमीनो अम्ल दो प्रकार के होते हैं
(क) आवश्यक (Essential)
(ख) अनावश्यक (Non-essential)
(क) आवश्यक (Essential)-ये शरीर के निर्माण के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल हैं जिनको भोजन में से लेना आवश्यक हो जाता है। बच्चों के लिए 10 और बड़ों के लिए 8 अमीनो अम्ल आवश्यक हैं। बच्चों में इन 8 अमीनो अम्लों के अतिरिक्त हिस्टीडी (Histidi) और आरजनीन (Argnine) भी आवश्यक हैं। यह अमीनो अम्ल शारीरिक और मानसिक विकास करते हैं।।
(ख) अनावश्यक (Non-essential) ये अम्ल शरीर में ही पैदा हो जाते हैं यह भी बहुत आवश्यक हैं।
प्रोटीन के वर्गीकरण का आधार-प्रोटीन का वर्गीकरण तीन बातों के आधार पर किया जाता है

  1. साधन के आधार पर
  2. गुणों के आधार पर
  3. भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के आधार पर।

1. साधन के आधार पर (On the basis of Source)
(क) वनस्पति से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Vegetables Protein)-जैसे दालें, अनाज, मूंगफली, सोयाबीन, तिल और मटर आदि।
(ख) पशु-जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Animal Protein)-जैसे दूध और दूध से बने पदार्थ, मीट और मीट से बने पदार्थ, मछली, अण्डे आदि।

2. गुणों के आधार पर (On the basis of Qualities)
(क) पूर्ण प्रोटीन (Complete Protein) — यह दूध, अण्डे, मछली और मांस में पाई जाती है। इसको ‘ए’ श्रेणी की प्रोटीन कहा जाता है।
(ख) अपूर्ण प्रोटीन (Incomplete Protein) — यह अनाज, दालों और सूखे मेवों में होती है। इसको ‘बी’ श्रेणी का प्रोटीन कहा जाता है।
(ग) अर्द्ध-पूर्ण प्रोटीन (Partial Protein) — यह घटिया किस्म की प्रोटीन होती है। यह मक्की की जीन और जैलेटिन में पाई जाती है।

3. भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के आधार पर (On the basis of Physical and Chemical properties) —
(क) साधारण प्रोटीन (Simple Protein) — यह अण्डे के सफेद भाग (Albumin) में पाई जाती हैं।
(ख) मिश्रित प्रोटीन (Conjugated Protein) — इस तरह की प्रोटीन में प्रोटीन के साथ और प्रोटीन पदार्थ मिले होते हैं जैसे दूध में एजील (फॉस्फोरस + प्रोटीन) खून की हीमोग्लोबिन (लोहा + प्रोटीन)।
(ग) प्राप्त की गई प्रोटीन (Derivated Protein) — ये पैप्टोन, पैप्टाइड और अमीनो अम्लों जैसे पदार्थ हैं। प्रोटीन के कार्य (Functions of Protein)-प्रोटीन एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। यह हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है

  1. शरीर की सुरक्षा और विकास का कार्य
  2. शरीर को ऊर्जा देने का कार्य
  3. रोगों से लड़ने के लिए शक्ति बढ़ाना
  4. खून बनाने में सहायक
  5. अम्ल और क्षार में सन्तुलन रखना
  6. हार्मोन्ज़ और एन्जाइम्ज़ (Enzymes) बनाने का कार्य
  7. मानसिक शक्ति प्रदान करना।

प्रोटीन की प्राप्ति के स्रोत (Sources of Protein) —

  1. पशु जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Animal Sources) — जैसे दूध और दूध से बने पदार्थ, पनीर, दही, खोया, मक्खन आदि मीट और मीट से बने पदार्थ, अण्डे और मछली।
  2. वनस्पति जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Vegetable Sources) — जैसे दालें, सोयाबीन, मूंगफली, तिल. बादाम. पिस्ता, नारियल, मटर और अनाज आदि।
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प्रोटीन की कमी से होने वाले नुकसान (Effects of deficiency of Protein) —
प्रोटीन की कमी का असर बच्चों, गर्भवती औरतों और दूध पिलाने वाली माताओं पर अधिक पड़ता है। इसकी कमी से निम्नलिखित नुकसान होते हैं —

  1. शरीर की वृद्धि और विकास में रुकावट-प्रोटीन की कमी से शरीर के विकास और वृद्धि की रफ्तार कम हो जाती है। इससे शरीर कमजोर हो जाता है और बच्चों में शारीरिक वृद्धि रुक जाती है।
  2. खून की कमी होना-भोजन में प्रोटीन की कमी से खून की कमी (Anaemia) हो जाती है।
  3. रोग प्रतिरोधक (Antibodies) पदार्थ की कमी-प्रोटीन शरीर में रोग प्रतिरोधक तत्त्वों का निर्माण करती है। प्रोटीन की कमी से शरीर में बिमारियों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है जिससे कई रोग लग जाते हैं।
  4. हड्डियां कमज़ोर होना- इसकी कमी हड्डियों को भी कमज़ोर करती है इसलिए इनके जल्दी टूटने का डर रहता है।
  5. चमड़ी का खुशक होना-शरीर में प्रोटीन की कमी से चमड़ी खुशक हो जाती है और इससे शरीर पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
  6. बच्चे का कमज़ोर पैदा होना-गर्भवती और दूध पिलाने वाली औरतों में इसकी कमी होने से बच्चा कमज़ोर होता है और उसकी वृद्धि ठीक नहीं होती।
  7. प्रोटीन की कमी से बच्चे क्वाशियोरकॉर और मरास्मस (सूखा) रोगों के शिकार हो जाते हैं।

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प्रश्न 41.
वसा में घुलनशील विटामिन कौन-से हैं और हमारे शरीर में क्या कार्य करते हैं और कहां से प्राप्त किए जा सकते हैं?
अथवा
चर्बी क्या है? इसके कार्यों तथा प्राप्तियों के साधनों के बारे में लिखें।
उत्तर-
चर्बी (Fat)-चर्बी भी मनुष्य की खुराक का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। यह हाइड्रोजन, कार्बन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। यह शरीर को शक्ति प्रदान करती है
और पानी में अघुलनशील है। इसमें कार्बोज़ प्रोटीन से दुगुनी शक्ति होती है। एक ग्राम चर्बी से 9 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारे शरीर को 15 से 20 प्रतिशत ऊर्जा चर्बी से मिलनी चाहिए। मनुष्य को रोज़ना 20 से 30 ग्राम चर्बी की आवश्यकता होती है। चर्बी में घुलनशील विटामिन ए, डी और के हैं।
चर्बी का वर्गीकरण-चर्बी को उसके स्रोत के आधार पर दो वर्गों में विभाजित किया जाता है
1. पशु चिकनाई या चर्बी (Animal fats)-जैसे घी, मक्खन, मछली का तेल, अण्डे की जर्दी, जानवरों की चर्बी आदि।
2. वनस्पति या चर्बी (Vegetable fats)-जैसे मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों, तिल, नारियल, बिनोले आदि के तेल।
3. चर्बी के कार्य (Functions of fat)-चर्बी हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है

  1. ऊर्जा का स्रोत (Source of energy)
  2. आवश्यक वसा अम्लों का स्रोत (Source of essential fatty acids)
  3. चर्बी में घुलनशील विटामिनों का स्रोत (Source of fat soluble Vitamins)
  4. कोमल अंगों की सुरक्षा (Protection of sensitive body organs)
  5. भोजन को स्वादिष्ट बनाती है (Help in making food tasty)
  6. सन्तुष्टि देती है (Give satisfaction)
  7. शरीर का तापमान बनाए रखती है (Helps is regulating body temperature)
  8. चमड़ी के स्वास्थ्य के लिए (For healthy skin)
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चर्बी की प्राप्ति के स्रोत (Sources of fat) —
चर्बी निम्नलिखित भोजन पदार्थ में अधिक पाई जाती है

  1. घी, मक्खन, क्रीम और तेल।
  2. वनस्पति तेल पदार्थ जैसे-सरसों, तिल, मूंगफली, नारियल, बिनौलों का तेल और वनस्पति घी।
  3. सूखे फल और मेवे जैसे-बादाम, अखरोट, सूखी गिरी और काजू।
  4. मीट वाले पदार्थ जैसे-अण्डा, जिगर, गुर्दे और मांस।
  5. दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे-दूध का पाऊडर और खोया आदि।

Home Science Guide for Class 10 PSEB भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सन्तुलित भोजन में कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व होते हैं?
उत्तर-
प्रोटीन, कार्बोज़, विटामिन, चिकनाई, लवण, पानी आदि।

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प्रश्न 2.
प्रोटीन का क्या काम है?
उत्तर-
शरीर के तन्तुओं का निर्माण तथा मुरम्मत।

प्रश्न 3.
ऊर्जा प्रदान करने वाले पौष्टिक तत्त्व कौन-से हैं?
उत्तर-
कार्बोज़, चिकनाई।

प्रश्न 4.
नाइट्रोजन तत्त्व किस तत्त्व में होता है?
उत्तर-
प्रोटीन में।

प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट्स के स्रोत बताओ।
उत्तर-
चावल, मक्की, गुड़, शक्कर, चीनी आदि।

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प्रश्न 6.
पानी में घुलनशील विटामिन का नाम बताओ।
उत्तर-
विटामिन बी, सी आदि।

प्रश्न 7.
चर्बी में घुलनशील विटामिन का नाम बताओ।
उत्तर-
विटामिन ए।

प्रश्न 8.
विटामिन B, का दूसरा नाम बताओ।
उत्तर-
राईबोफेलबीन।

प्रश्न 9.
अन्धराता कौन-से विटामिन की कमी से होता है?
उत्तर-
विटामिन ए।

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प्रश्न 10.
जिरोसिस किस विटामिन की कमी से होता है?
उत्तर-
विटामिन ए।

प्रश्न 11.
बहते खून का बन्द न होना किस विटामिन की कमी से होता है?
उत्तर-
विटामिन ‘के’ की कमी से।

प्रश्न 12.
जीवन तत्त्व किन पौष्टिक तत्त्वों को कहते हैं?
उत्तर-
विटामिनों को।

प्रश्न 13.
कौन-से खनिज की कमी के कारण रक्त की कमी हो जाती है?
उत्तर-
लोहे की कमी के कारण।

प्रश्न 14.
प्रोटीन की प्राप्ति के स्त्रोत बताओ।
उत्तर-
पशु जगत् तथा वनस्पति जगत्।

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प्रश्न 14.
A. भोजन में लगातार प्रोटीन की कमी से कौन सी बिमारी हो जाती है?
उत्तर-
क्वाशियोरकर।

प्रश्न 15.
पशु जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन बताओ।
उत्तर-
दही, दूध, अण्डे, मछली आदि।

प्रश्न 16.
एक ग्राम कार्बोज से हमें कितनी ऊर्जा मिलती है?
उत्तर-
4 कैलोरी।

प्रश्न 17.
एक ग्राम चर्बी से हमें कितनी ऊर्जा (कैलोरी) मिलती है?
उत्तर-
9 कैलोरी।

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प्रश्न 18.
भोजन से प्राप्त होने वाली शक्ति का कितने प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट से मिलना चाहिए?
उत्तर-
50% से 60% तक।

प्रश्न 19.
नशासते वाले पदार्थों का नाम बताओ।
उत्तर-
अनाज, कंदमूल, शकरकन्दी, आलू।

प्रश्न 20.
विटामिन ‘ई’ का एक काम बताओ।
उत्तर-
विटामिन ‘ए’ के बनने में सहायता करता है।

प्रश्न 21.
थायमीन क्या है?
उत्तर-
यह विटामिन B, का नाम है।

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प्रश्न 21.
A. विटामिन B, का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर-
थायमीन

प्रश्न 22.
खट्टे फलों में कौन-सा विटामिन होता है?
उत्तर-
विटामिन सी।

प्रश्न 23.
शरीर में कैल्शियम की कितनी मात्रा हड्डियों तथा दांतों में होती है?
उत्तर-
99%.

प्रश्न 24.
बच्चों में क्रेटीनिज्म किसकी कमी से होता है?
उत्तर-
आयोडीन की कमी से।

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प्रश्न 25.
अमीनो अम्ल कितनी प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
दो प्रकार के आवश्यक तथा 20-22 प्रकार के अनावश्यक अम्ल होते हैं।

प्रश्न 26.
पूर्ण प्रोटीन के स्रोत बताओ।
उत्तर-
मास, मछली, अण्डे।

प्रश्न 27.
चर्बी के प्राप्ति के साधन बताओ।
उत्तर-
घी, मक्खन, क्रीम आदि।

प्रश्न 28.
शरीर का कितना भाग खनिजों से बना है?
उत्तर-
पच्चीसवां भाग।

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प्रश्न 29.
मैकरोमिनरलज़ की उदाहरण दें।
उत्तर-
कैल्शियम, सल्फर, फॉस्फोरस, क्लोरीन आदि।

प्रश्न 30.
माइक्रोमिनरलज की उदाहरण दें।
उत्तर-
लोहा, ताँबा, कोबाल्ट, आयोडीन आदि।

प्रश्न 31.
एक आम आदमी की ज़िन्दगी में पानी की क्या आवश्यकता है?
उत्तर-
आम आदमी को प्रतिदिन 7-8 गिलास पानी की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 32.
त्वचा में विटामिन D का निष्क्रिय रूप क्या है?
उत्तर-
विटामिन D3 (कोलकैलसीफिरोल)।

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प्रश्न 33.
खनिज क्या होते हैं?
उत्तर-
खनिज ऐसे पदार्थ हैं जो शरीर के लिए आवश्यक हैं तथा यह खाद्य पदार्थों में ही मौजूद होते हैं यह हैं सोडियम, कैल्शियम, लोहा, फास्फोरस, आयोडीन आदि।

प्रश्न 34.
हिमोग्लोबिन की संरचना लिखें।
उत्तर-
हिमोग्लोबिन में प्रोटीन तथा लोहा होता है।

प्रश्न 35.
आयोडीन की कमी से हमारे शरीर में कौन-सा रोग (बीमारी) हो जाता
उत्तर-
घेघा रोग।

प्रश्न 36.
लोहे की कमी से होने वाले रोग का नाम बताओ।
उत्तर-
अनीमिया।

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प्रश्न 37.
विटामिन के (K) की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है?
उत्तर-
चोट लग जाने पर रक्त बहता रहता है, रुकता नहीं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-से हैं? यह हमारे शरीर में क्या काम करते हैं तथा प्राप्ति के स्त्रोत बताएं।
उत्तर-
देखें विटामिन C, B तथा K वाले प्रश्न।

प्रश्न 2.
भोजन के पौष्टिक तत्त्व कौन-कौन-से हैं ? किन्हीं दो के काम, कमी से नतीजों के बारे में बताएं।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 3.
अमीनो एसिड किसको कहते हैं और कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
अमीनो एसिड वह छोटी-छोटी इकाइयां हैं जिनसे प्रोटीन बनते हैं। अमीनो अम्ल 20-22 प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 4.
प्रॉक्सिमेट प्रिंसीपल्ज़ किसे कहते हैं?
उत्तर-
भोजन से प्राप्त होने वाले कार्बोहाइड्रेट्स, वसा तथा प्रोटीन वाले तत्त्वों को प्रॉक्सिमेट प्रिंसीपल्ज़ कहा जाता है क्योंकि ये हमारे शरीर का निर्माण करने वाले तत्त्वों से मिलते हैं तथा पचने के बाद ये तत्त्व शारीरिक तत्त्वों के अनुरूप ही बन जाते हैं।

प्रश्न 5.
भोजन शरीर में टूटे तन्तुओं की मुरम्मत किस प्रकार करता है?
उत्तर-
हमारे शरीर में हर समय तन्तुओं की टूट-फूट होती रहती है। तन्तु, कोशिकाओं के समूह, घिसते तथा नष्ट होते रहते हैं। भोजन में मौजूद प्रोटीन इन टूटे हुए तन्तुओं तथा कोशिकाओं की मुरम्मत करने में सहायता करते हैं तथा नए तन्तु उत्पन्न भी करते हैं।

प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेट और चर्बी की शरीर को कितनी आवश्यकता है?
उत्तर-
भोजन से प्राप्त होने वाली ऊर्जा का 50-60% भाग कार्बोहाइड्रेट्स से प्राप्त होनी चाहिए। एक साधारण व्यक्ति के भोजन में 400-450 ग्राम कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा प्रतिदिन उचित मानी जाती है। परन्तु शर्करा के रोगी के लिए इसकी मात्रा 90-110 ग्राम कार्बोज़ प्रतिदिन ठीक है।
प्रतिदिन कैलोरी की आवश्यकता का लगभग 15% भाग चर्बी से मिलना चाहिए। यह मात्रा 40-45 ग्राम प्रतिदिन होनी चाहिए।

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प्रश्न 7.
काम के अनुसार खनिज पदार्थों का वर्गीकरण करें।
उत्तर-

काम खनिज पदार्थ
1. अम्ल-क्षार का सन्तुलन सोडियम, पोटाशियम
2. खून का निर्माण लोहा, कोबाल्ट, कॉपर
3. हड्डियों, दाँतों का निर्माण तथा शारीरिक वृद्धि कैल्शियम, फॉस्फोरस
4. आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा दाँतों के इनेमल के लिए। क्लोरीन, आयोडीन, फ्लोरीन
5. हार्मोन पैदा करने के लिए उत्प्रेरक मैग्नीशियम, मैंगनीज़, जिंक, सल्फर।

प्रश्न 8.
निकोटिनिक एसिड के स्रोत और कमी से होने वाली हानियों के बारे में बताएं।
उत्तर-
स्रोत-अंकुरित दालें, सम्पूर्ण अनाज, मूंगफली, खमीर उठा भोजन, यकृत आदि।
कमी से हानियाँ-

  1. प्लैगरा नामक रोग हो जाता है। त्वचा का रंग काला हो जाता है, खुजली तथा सूजन हो जाती है।
  2. मुँह का स्वाद खराब हो जाता है।
  3. अनीमिया के साथ-साथ मानसिक परेशानी भी हो सकती है।
  4. दस्त लग जाते हैं।

प्रश्न 9.
आवश्यक अमीनो एसिड की मात्रा और गिनती के हिसाब से प्रोटीन को कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-
आवश्यक अमीनो एसिड की मात्रा और गिनती के हिसाब से प्रोटीन को तीन भागों में बांटा जा सकता है
(i) सम्पूर्ण प्रोटीन, (ii) असम्पूर्ण प्रोटीन, (iii) अपूर्ण प्रोटीन।

  1. सम्पूर्ण प्रोटीन-इनमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल उचित मात्रा तथा गिनती में होते हैं, जैसे मछली, अण्डा, दूध आदि।
  2. असम्पूर्ण प्रोटीन-इनमें कुछ आवश्यक अमीनो अम्ल नहीं होते, जैसे-गेहूँ, दाल, फलियाँ आदि में।
  3. अपूर्ण प्रोटीन-इनमें आवश्यक अमीनो अम्ल नहीं होते जैसे मक्की।

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प्रश्न 10.
मैक्रोमिनरल्ज तथा माइक्रोमिनरल्ज़ क्या होता है?
उत्तर-
शरीर का पच्चीसवां भाग (1/25 भाग) खनिज पदार्थों से बना होता है। ये खनिज पदार्थ शरीर के निर्माण, स्वास्थ्य तथा शारीरिक क्रियाओं को ठीक ढंग से चलाने के लिए आवश्यक हैं। ये दो प्रकार के होते हैं

  1. बृहत खनिज पदार्थ (Macrominerals) — ये अधिक मात्रा में शरीर को चाहिए होते हैं, जैसे कि कैल्शियम, सल्फर, फॉस्फोरस, क्लोरीन, सोडियम आदि।
  2. लघु खनिज पदार्थ (Microminerals) — ये शरीर में बहुत कम मात्रा में चाहिए होते हैं। इन्हें नाममात्र (Trace) खनिज पदार्थ भी कहा जाता है। परन्तु इनकी शरीर में उपस्थिति अति आवश्यक है, जैसे-लोहा, तांबा, जिंक, आयोडीन, कोबाल्ट आदि।

प्रश्न 11.
फास्फोरस तथा लोहे के शरीर के लिए काम बताओ।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 12.
भोजन की परिभाषा देते हुए इसके कार्यों का वर्णन करो।
अथवा
भोजन के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 13.
लोहे तथा आयोडीन की कमी से शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 14.
भोजन हमारे शरीर के लिए क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 15.
अनाज और दालों में से हमें कौन-से पौष्टिक तत्त्व मिलते हैं?
अथवा
भोजन में अनाज और दालों को क्यों शामिल करना चाहिए?
उत्तर-
अनाज से हमें कार्बोज़ तथा प्रोटीन प्राप्त होते हैं तथा दालों में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है तथा दालों में कुछ मात्रा में विटामिन भी होते हैं। अनाज जैसे गेहूँ, मक्की, बाजरा आदि में कार्बोज़ अधिक तथा प्रोटीन 6-12% होते हैं। दालों में 20-25% प्रोटीन होती है। दालों में विटामिन बी तथा खनिज पदार्थ जैसे कैल्शियम की मात्रा भी अधिक होती है। अंकुरित दालों में विटामिन सी भी होता है। इसलिए भोजन में अनाज तथा दालों की उचित मात्रा होनी चाहिए।

प्रश्न 16.
पानी के शरीर के लिए क्या काम हैं तथा उसकी कमी का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 17.
रेशे और फोकट का शरीर के लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर-
हम अपने भोजन में पौष्टिक तत्त्वों के अलावा कुछ ऐसे पदार्थ भी लेते हैं जिन्हें हम रेशे और फोकट कहते हैं। इसमें पौधों के रेशे, अनाज का चौकर, फलों का छिलका, हरे पत्तेदार साग-सब्जी आदि शामिल हैं। इनका हमारे शरीर में विशेष महत्त्व है। रेशे शरीर में पचते नहीं तथा आंतड़ियों को ठीक प्रकार से अपना कार्य करने में सहायक हैं तथा व्यक्ति को कब्ज नहीं होती।

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प्रश्न 18.
पानी के स्रोत और इसकी शरीर के लिए ज़रूरत के बारे में बताएं।
उत्तर-
पानी के स्त्रोत-शरीर के लिए पानी के स्रोत इस प्रकार हैं-हम प्यास लगने पर सीधे ही पानी पी लेते हैं। सब्जियों में 60-90%, फलों, लस्सी, चाय, शकंजवी, शरबत, कोका कोला, लिम्का आदि में से भी काफ़ी पानी मिलता है। दूध में भी 87% पानी होता है।

पानी की ज़रूरत-पानी की सभी को अपनी आयु, लिंग, कार्य, मौसम के तापमान आदि के अनुसार आवश्यकता होती है। एक साधारण व्यक्ति को प्रतिदिन 7-8 गिलास पानी लेना चाहिए। पानी शरीर के तापमान को ठीक रखने के लिए ज़रूरी है तथा पाचन क्रिया के लिए भी ज़रूरी है। गर्भ के समय, दूध पिलाने वाली मां को तथा रोगी को पानी की अधिक आवश्यकता होती है।

प्रश्न 18 A.
एक व्यक्ति को रोजाना कितने पानी की जरूरत है। विस्तारपूर्वक र्णन करो।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 19.
प्रोटीन के स्रोत तथा इसकी आवश्यकता के बारे में बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 20.
लोहे के स्रोत तथा इसके शरीर के लिए कार्य बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 21.
भोजन हमें शक्ति कैसे देता है?
उत्तर-
हम भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स, चर्बी का प्रयोग करते हैं। इन दोनों की शरीर में रासायनिक क्रियाएं होती हैं तथा ऊर्जा पैदा होती है। एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट्स से 4 कैलोरी तथा एक ग्राम चर्बी से 9 कैलोरी ऊर्जा मिलती है।

प्रश्न 22.
चिकनाई की अधिकता से हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
चिकनाई का अधिक प्रयोग मोटापा पैदा करता है। इससे पाचन क्रिया खराब हो जाती है। इसके अधिक प्रयोग से मनुष्य का लीवर खराब हो जाता है। कलैस्ट्रोल बढ़ जाना है, रक्त दबाव बढ़ जाता है तथा दिल के रोग की सम्भावना हो जाती है। इसलिए चिकनाई का प्रयोग आवश्यकता अनुसार ही करें।

प्रश्न 23.
प्राणी के अस्तित्व के लिए जल की क्या उपयोगिता है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 24.
वसा में उच्च संतृप्ता मूल्य होता है, वर्णन कीजिए।
उत्तर-
वसा के एक ग्राम में से 9 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। इस प्रकार कम वसा के प्रयोग से अधिक संतृप्ता प्राप्त हो जाती है तथा लम्बे समय तक पेट भरा रहता है।

प्रश्न 25.
विटामिन D व B के दो-दो अच्छे स्रोत बताइए।
उत्तर-
विटामिन D के स्रोत हैंजिगर का तेल, अण्डे की जर्दी, धूप विटामिन B के स्त्रोत हैं- अंकुरित दालें, दूध, अण्डे, जिगर, सूखे मेवे आदि।

प्रश्न 26.
स्तम्भ A के तथ्यों का स्तम्भ B के तथ्यों से मिलान कीजिए।

स्तम्भ A स्तम्भ B
1. कैल्शियम रक्तक्षीणता
2. लोहा स्कर्वी
3. आयोडीन रिकेट्स
4. विटामिन D बेरी बेरी
5. थायमीन गलगंड
6. विटामिन मज़बूत दांत

उत्तर-
1. कैल्शियम – मज़बूत दांत
2. लोहा – रक्तक्षीणता
3. आयोडीन – गलगंड
4. विटामिन D – रिकेट्स
5. थायमीन – बेरी बेरी
6. विटामिन C – स्कर्वी

प्रश्न 27.
कार्बोज़ के प्रोटीन बचाव क्रिया के बारे में बताइये। कार्बोज़ से कितने प्रतिशत कैलोरी प्राप्त होनी चाहिये?
उत्तर-
जब शरीर में कार्बोज़ की कमी हो जाती है तो ऊर्जा की प्राप्ति प्रोटीन से शुरू हो जाती है तथा प्रोटीन अपने वास्तविक कार्य, शरीर के निर्माण तथा तंतुओं की मुरम्मत नहीं कर पाते। इसलिए कार्बोज़ की उचित मात्रा का शरीर में होना, प्रोटीन को शरीर की मुरम्मत के लिए बचाता है।
कार्बोज़ के 1 ग्राम से 4 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है।

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प्रश्न 28.
आयोडीन के कार्यों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर-
आयोडीन गल ग्रंथियों की क्रियाशीलता के लिए महत्त्वपूर्ण है। गल ग्रंथियों का रस थायरोक्सान शरीर की क्रियाओं को नियमित करता है।
आयोडीन बच्चों की वृद्धि तथा विकास के लिए बहुत आवश्यक है तथा प्रजनन के लिए भी आवश्यक है।

प्रश्न 29.
कार्बोहाइड्रेट्स तथा वसा हमारे लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 30.
क्वाशियोरकर पर नोट लिखें।
उत्तर-
यह एक रोग है जो बच्चों में कुपोषण के कारण तथा भोजन में प्रोटीन की लगातार कमी के कारण होता है। यह रोग अधिकतर विकासशील देशों में गरीबी तथा अज्ञानता के कारण होता है। कई बार भोजन में प्रोटीन की मात्रा बिल्कुल नहीं ली जाती है। इस रोग के कारण बच्चे के शरीर में कई कमियां तथा अयोग्यताएं पैदा हो सकती हैं तथा ध्यान न दिया जाए तो मृत्यु भी हो सकती है। इस रोग से बचाव के लिए दूध पिलाने वाली माताओं को अच्छा सन्तुलित भोजन लेना चाहिए तथा जब बच्चा मां का दूध छोड़. दे तो उसे प्रोटीन की कमी नहीं होने दें तथा उसे सन्तुलित भोजन दें।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व

प्रश्न 31.
पानी के कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 32.
पानी हमारे शरीर के लिए कैसे महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 33.
फोक का हमारे शरीर के लिए क्या महत्त्व है? इसकी प्राप्ति के क्या साधन हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व

प्रश्न 34.
मोहन को पेलाग्रा रोग हो गया है? यह कौन से पौष्टिक तत्त्व की कमी से होता है और कौन-कौन से खाद्य पदार्थों को खुराक में शामिल करके इस रोग से बचा जा सकता है?
उत्तर-
यह रोग निकोटिनीक एसिड की कमी के कारण होता है। इसकी कमी दूर करने के लिए अंकुरित दालें, संपूर्ण अनाज, मूंगफली, खमीर, जिगर आदि लेने चाहिएं।

प्रश्न 35.
शीना का बेटा 6 महीने का है। शीना को ऑस्टियोमलेशिया का रोग हो गया है। इसके होने का क्या कारण है और किन-किन खाद्य पदार्थों को खुराक में शामिल करके इस रोग की रोकथाम की जा सकती है?
उत्तर-
यह रोग विटामिन डी तथा कैल्शियम की कमी के कारण होता है। भोज्य पदार्थों की आवश्यकता-स्वयं करें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
थाईयामीन (बी,) तथा राईब्रोफलेनिन (बी,) की कमी से शरीर में क्या हानियां होती हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 2.
कार्बोहाइड्रेट्स को कौन-से मुख्य भागों में बांटा जा सकता है? वर्णन करो।
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेटस को तीन भागों में बांटा जा सकता है
(i) इकहरी शक्कर
(ii) दोहरी शक्कर
(iii) बहुभांती शक्कर।

  1. इकहरी शक्कर-यह साधारण शक्कर है इसमें अणु सरल तथा छोटे होते हैं। यह पानी में घुल सकती है, रवेदार होती है तथा स्वाद में मीठी होती है। ग्लूकोज़, फ्रेक्टोज़, गलैक्टोज़ तीन ऐसी मुख्य शक्करें हैं।
  2. दोहरी शक्कर-दो इकहरी शक्करें आपस में मिल कर दोहरी शक्कर बनाती हैं। यह भी पानी में घुलनशील हैं, रवेदार तथा मीठी होती हैं। सुक्रोज, मालटोज़ आदि इस प्रकार की शक्कर हैं।
  3. बहुभांती शक्कर-यह स्वाद में मीठी नहीं होती तथा पानी में नहीं घुलती। यह कई इकहरी तथा दोहरी शक्करों के मिलकर बनी होती हैं। ग्लाईकोजन, सैलुलोज़ आदि इस के उदाहरण हैं निशस्ता पानी में घुलनशील नहीं है पर उबालने पर गाढ़ा घोल बनाता है। ग्लाईकोजन प्राणियों के ज़िगर में तथा सैलूलोज़ पौधों के रेशों में होते हैं।

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प्रश्न 3.
(A) प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट के शरीर में काम बताएं।
(B) प्रोटीन के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट्स के कार्य

  1. यह शरीर को ऊर्जा तथा गर्मी देता है।
  2. यह शरीर के लिए प्रोटीन की बचत करता है।
  3. ग्लूकोज़ आवश्यक अमीनो एसीड के निर्माण में सहायक है।
  4. यह भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  5. सैलूलोज़ फोम का कार्य करता है।
  6. चिकनाई से मिल कर शरीर को सन्तुष्टि प्रदान करते हैं। नोट : प्रोटीन के कार्यों के लिए देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 4.
विटामिन ‘ई’ तथा ‘के’ के मुख्य कार्य क्या हैं? तथा इनकी कमी से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 5.
पानी हमारे शरीर के लिये कैसे महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर-
मनुष्य के शरीर के भार का लगभग 70 प्रतिशत भार पानी का ही है। पानी हमारे खून के अतिरिक्त हर कोश की बनावट के लिये आवश्यक है। शरीर के बीच की क्रियाओं तथा रासायनिक परिवर्तनों के लिये भी पानी एक मुख्य अंश है। पानी में घुलनशील पोषक तत्त्व केवल पानी को मौजूदगी में ही शरीर को पोषण दे सकते हैं। पानी शरीर में से फालतू रसायन, अम्ल तथा फोक बाहर निकालने का भी कार्य करता है।

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प्रश्न 6.
चिकनाई की अधिकता से हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
चिकनाई का अधिक प्रयोग करने से मोटापा हो जाता है तथा हाजमा भी बिगड़ जाता है। इसके ज्यादा प्रयोग से मनुष्य का लिवर खराब हो जाता है, कलैस्ट्रोल बढ़ने से खून का दबाव बढ़ जाता हैं तथा दिल के रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। इसलिये भोजन में चिकनाई का प्रयोग आवश्यकता अनुसार ही करना चाहिये।

प्रश्न 7.
चर्बी तथा विटामिन D हमारे शरीर में क्या कार्य करते हैं?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 8.
स्तम्भ A के तथ्यों का स्तम्भ B से मिलान करें:

क्रम सं० स्तम्भ-A स्तम्भ-B
1. विटामिन डी किटोसिस
2. कार्बोहाइड्रेट भूख लगना
3. विटामिन ए अंधराता
4. थायमिन रिकेट्स
5. विटामिन बी बेरी-बेरी

उत्तर-

क्रम सं० स्तम्भ-A स्तम्भ-B
1. विटामिन डी रिकेट्स
2. कार्बोहाइड्रेट किटोसिस
3. विटामिन ए अंधराता
4. थायमिन बेरी-बेरी
5. विटामिन बी भूख लगना

प्रश्न 9.
निम्न लिखे रोगों का वर्णन करें।
(क) अन्धराता
(ख) जीरोसीस।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 10.
विटामिन D हमारे शरीर में क्या कार्य करते हैं?
उत्तर-
स्वयं करें।

प्रश्न 11.
भोजन मे कौन-से तत्व हैं? कार्बोज़ के कार्य बताओ।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 12.
विटामिन डी के कार्यों, स्रोत और कमी के प्रभाव के बारे में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
स्वयं करें।

प्रश्न 13.
शरीर में विटामिन ए (A) के कार्य, स्रोत और कमी के असर के बारे में बताओ।
उत्तर-
स्वयं करें।

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प्रश्न 14.
विटामिन सी के कार्य, स्रोत और कमी के प्रभाव का वर्णन करें।
उत्तर-
स्वयं करें।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. रिक्त स्थान भरें

1. कार्बोज़ कार्य करने के लिए ………. प्रदान करते हैं।
2. विटामिन ‘के’ …………….. में घुलनशील है।
3. प्रजनन सम्बन्धी विकार …………….. विटामिन की कमी से आते हैं।
4. राइबोफ्लेविन ……………… विटामिन का नाम है।
5. खट्टे फलों में ………………. विटामिन अधिक होता है।
6. शरीर का ……………….. भाग खनिजों से बना होता है।
7. विटामिन B, का नाम ………………… है।
8. आयोडीन …………….. ग्रंथी की सामान्य क्रिया में सहायक है।
9. थायमीन की कमी से …………. बीमारी होती है।
10. पशुजन्य खाद्य व सोयाबीन में अनिवार्य …………… की मात्रा अधिक होती है।
11. ………………. शरीर की वृद्धि तथा तंतुओं की मुरम्मत में सहायक है।
12. ………………. और ………………. समूह के विटामिन पानी में घुलनशील हैं।
13. वसा ………………. अम्ल से बनाई जाती है।
14. ……………… की कमी से क्वाशियोरकर रोग होता है।
15. अपने दांतों व मसूढ़ों को स्वस्थ रखने के लिए हमें ………. लेना चाहिए।
16. कैल्शियम मज़बूत ………. और …….. के लिए ज़रूरी है।
17. अंधराता …….. विटामिन की कमी से होता है।
18. विटामिन ए का एक कार्य ………. को स्वस्थ्य रखना है।
19. यदि आप पाचन में सुधार लाना चाहते हों तो …………. विटामिन लें।
20. विटामिन ए ………………. में होता है।
21. कैल्शियम मज़बूत ………… तथा दांतों के लिए आवश्यक है।
22. स्कर्वी रोग ……… विटामिन की कमी से होता है।

उत्तर-

1. ऊर्जा,
2. चर्बी,
3. ई,
4. B
5. सी,
6. पच्चीसवां,
7. थाईयामीन,
8. थाइराइड,
9. बेरी-बेरी,
10. प्रोटीन,
11. प्रोटीन,
12. विटामिन C तथा विटामिन B,
13. फैटी,
14. प्रोटीन,
15. विटामिन सी,
16. हड्डियों, दांतों,
17. विटामिन ए,
18. आंखों,
19. विटामिन बी (थायमिन),
20. मक्खन,
21. हड्डियों,
22. विटामिन C

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II. ठीक/ग़लत बताएं

  1. भोजन शरीर को ऊर्जा देता है।
  2. विटामिन ‘के’ पानी में घुलनशील है।
  3. नाइट्रोजन तत्व प्रोटीन में होता है।
  4. दालों में 20-25% प्रोटीन होता है।
  5. प्रोटीन की कमी से क्वाशियोरकर रोग हो जाता है।
  6. अनाज, कंदमूल, शक्करकंदी, आलू आदि निशास्ते वाले पदार्थ हैं।
  7. हिमोग्लोबिन में प्रोटीन तथा लोहा होता है।
  8. लोहा, तांबा, कोबाल्ट माइक्रोमिनरलज़ हैं।
  9. अमीनो अमल 30-40 प्रकार के हैं।

उत्तर-

  1. ठीक,
  2. ग़लत,
  3. ठीक,
  4. ठीक,
  5. ठीक,
  6. ठीक,
  7. ठीक,
  8. ठीक,
  9. ग़लत।

III. बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कोलकैलसी फिरोल किसे कहते हैं?
(क) विटामिन A
(ख) विटामिन D
(ग) विटामिन C
(घ) विटामिन K
उत्तर-
(ख) विटामिन D

प्रश्न 2.
मरास्मस रोग ……….. की कमी के कारण होता है।
(क) प्रोटीन
(ख) आयोडीन
(ग) कार्बोज
(घ) नमक।
उत्तर-
(ग) कार्बोज

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प्रश्न 3.
ज़ीरोसिस ………. की कमी से होता है।
(क) विटामिन A
(ख) विटामिन D
(ग) विटामिन C
(घ) विटामिन K
उत्तर-
(क) विटामिन A

प्रश्न 4.
खट्टे फलों में कौन-सा विटामिन होता है?
(क) विटामिन A
(ख) विटामिन D
(ग) विटामिन C
(घ) विटामिन K
उत्तर-
(ग) विटामिन C

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भोजन तथा पौष्टिक तत्त्व PSEB 10th Class Home Science Notes

  • भोजन मानवीय जीवन का मूल आधार है।
  • भोजन शरीर को शक्ति प्रदान करता है।
  • भोजन शरीर की आन्तरिक मुरम्मत करता है।
  • सन्तुलित भोजन में शरीर के सभी आवश्यक पौष्टिक तत्त्व होते हैं।
  • प्रोटीन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।
  • विटामिन शरीर को बीमारियों से बचाते हैं।
  • विटामिन ए की कमी से अन्धराता हो सकता है।
  • प्रोटीन, कार्बोज़, चिकनाई, विटामिन, लवण और पानी शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्त्व हैं।
  • कार्बोहाइड्रेट्स गेहूं, चावल, मक्की, सूखे मेवे, गुड़, शक्कर, चीनी, शहद आदि से प्राप्त होते हैं।
  •  विटामिन B, गर्मी और प्रकाश से नष्ट हो जाते हैं।
  • प्रोटीन की कमी से शारीरिक विकास रुक जाता है।
  • विटामिन ‘ए’ आँखों और चमड़ी के लिए लाभदायक होता है।
  • विटामिन ‘सी’ शरीर को बीमारियों से बचाता है और यह खट्टे फलों जैसे नींबू, संतरा, मालटा आदि में मिलता है।

PSEB 6th Class Home Science Practical अपने कपड़ों को धोना

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Practical अपने कपड़ों को धोना Notes.

PSEB 6th Class Home Science Practical अपने कपड़ों को धोना

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
वस्त्रों की धुलाई में टब, बाल्टियों तथा चिलमची की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
उत्तर–
पानी भरने, साबन को फेन बनाने, वस्त्रों को फुलाने, वस्त्रों को धोने, खंगालने, नील, क्लफ लगाने तथा रंगने के लिए इनकी आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 2.
वस्त्रों की धुलाई में कटोरों का क्या उपयोग होता है?
उत्तर-
स्टार्च का पेस्ट बनाने, दाग-धब्बे छुड़ाने के लिए पेस्ट बनाने, नील बनाने तथा धब्बों को डुबाकर रखने के लिए।

प्रश्न 3.
स्क्रबिंग बोर्ड क्या होता है?
उत्तर-
यह एक प्रकार का तख्ता होता है जिसकी आवश्यकता अधिक गन्दे कपड़ों को उस पर रखकर रगड़ने के लिए पड़ती है।

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प्रश्न 4.
स्क्रबिंग बोर्ड किसके बने होते हैं?
उत्तर-
लकड़ी, जिंक, स्टील या शीशे के।

प्रश्न 5.
सबसे अच्छा स्क्रबिंग बोर्ड किसका होता है ?
उत्तर-
लकड़ी का।

प्रश्न 6.
सक्शन वाशर क्या होता है?
उत्तर-
यह एक उपकरण है जिसमें एक हैंडिल तथा नीचे की ओर से एक कटोरे के समान गोलाकार छिद्रयुक्त उन्नतोदर तल होता है। इसमें धुलाई किए जा रहे वस्त्रों पर दबाव डालकर उनमें से बार-बार साबुन के पानी को निकालना और पुनः प्रवेश कराना पड़ता है।

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प्रश्न 7.
धुलाई के साबुनों के स्वरूप बताओ।।
उत्तर-

  1. टिक्की या बार साबुन,
  2. साबुन का घोल,
  3. साबुन की चिप्पी या फ्लेक,
  4. साबुन की जैली,
  5. साबुन के चूर्ण,
  6. द्रावण चूर्ण।

प्रश्न 8.
रीठे का प्रयोग किन वस्त्रों की धुलाई के लिए उपयुक्त रहता है ?
उत्तर-
जिन वस्त्रों के रंग छूटने की सम्भावना रहती है तथा रेशमी व ऊनी वस्त्रों के लिए।

प्रश्न 9.
शिकाकाई से वस्त्रों को धोने का क्या लाभ है?
उत्तर-
वस्त्रों से सटी चिकनाई भरी अशुद्धि की सफ़ाई इसके द्वारा आसानी से हो जाती है। इससे वस्त्रों के रंगों की सुरक्षा भी होती है। यह सूती, रेशमी तथा ऊनी सभी वस्त्रों के लिए उपयोगी है।

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प्रश्न 10.
कपड़ों की धुलाई में ब्रश का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
रगड़कर गन्दे कपड़ों से मैल छुड़ाने में।

प्रश्न 11.
सक्शन वाशर की क्या उपयोगिता है?
उत्तर-
यह गन्दे कपड़े धोने के काम आता है।

प्रश्न 12.
सक्शन वाशर का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर-
टब में साबुन का पानी तैयार करके सक्शन वाशर को ऊपर-नीचे चलाकर कपड़ों की धुलाई की जाती है।

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प्रश्न 13.
कपड़े सुखाने की रैक किन घरों के लिए उपयोगी होती है?
उत्तर-
जिन घरों में बाहर कपड़े सुखाने के लिए उचित स्थान नहीं होता।

प्रश्न 14.
बिजली की प्रैस (इस्तरी) कोयले की प्रैस से क्यों अच्छी मानी जाती है?
उत्तर-
क्योंकि बिजली की प्रैस में सूती, ऊनी, रेशमी कपड़ों पर इस्तरी करने के लिए ताप का नियन्त्रण किया जा सकता है।

प्रश्न 15.
माँड़ (कलफ) बनाने के लिए सामान्यतः किन पदार्थों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर-
चावल, मैदा, अरारोट, साबूदाना।

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प्रश्न 16.
कपड़ों में नील क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
कपड़ों पर सफेदी लाने के लिए।

प्रश्न 17.
टिनोपाल का प्रयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर-
कपड़ों पर सफेदी लाने के लिए।

प्रश्न 18.
वस्त्रों की धुलाई में धुलाई के विभिन्न उपकरणों के प्रयोग का क्या लाभ होता है?
उत्तर-
धुलाई का काम सरलता से हो जाता है और परिश्रम तथा समय की बचत होती

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प्रश्न 19.
वस्त्रों की रंगाई का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
फीके पड़े हुए वस्त्रों को फिर से सुन्दर बनाया जा सकता है तथा मैचिंग के लिए वस्त्र को रंग कर तैयार किया जा सकता है।

प्रश्न 20.
मानव-निर्मित अथवा मानकृत तन्तुओं के कुछ उदाहरण दो।
उत्तर-
नायलॉन, पॉलिएस्टर, टेरीलीन, डेक्रॉन, ऑरलॉन, एक्रीलिक आदि।

प्रश्न 21.
रेयॉन किस प्रकार का तन्तु है-प्राकृतिक या मानव-निर्मित ?
उत्तर-
रेयॉन प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित दोनों ही प्रकार का तन्तु है।

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प्रश्न 22.
सबसे पुराना मानवकृत तन्तु कौन-सा है ?
उत्तर-
रेयॉन।

प्रश्न 23.
सेल्युलोज से कौन-सा तन्तु मानव-निर्मित है?
उत्तर-
रेयॉन।

प्रश्न 24.
जानवरों के बालों से प्राप्त होने वाला प्रमुख वस्त्रीय तन्तु कौन-सा
उत्तर-
ऊन।

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प्रश्न 25.
प्राकृतिक तन्तु वाले पदार्थों से रासायनिक विधियों से नए प्रकार का कौन-सा मुख्य तन्तु प्राप्त किया जाता है?
उत्तर-
रेयॉन।

प्रश्न 26.
नायलॉन किस प्रकार का तन्तु है ?
उत्तर-
तन्तुविहीन रसायनों से प्राप्त किया जाने वाला।

प्रश्न 27.
तन्तु स्रोत को कितने भागों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर-
दो भागों में-

  1. प्राकृतिक तथा
  2. मानव-निर्मित।

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प्रश्न 28.
रेशमी वस्त्रों पर कड़ापन लाने के लिए अन्तिम खगाल के पानी में क्या मिलाना चाहिए?
उत्तर-
सिरका या नींबू का रस।

प्रश्न 29.
रेशमी वस्त्रों पर कड़ापन लाने के लिए किस घोल का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
गोंद के पानी का (गम वाटर)।

प्रश्न 30.
रेशमी वस्त्रों को धूप में क्यों नहीं सुखाना चाहिए?
उत्तर-
धूप में सुखाने से रेशमी वस्त्र पीले पड़ जाते हैं तथा रंगीन वस्त्रों का रंग फीका पड़ जाता है।

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प्रश्न 31.
थोड़ी नमी की स्थिति में ही रेशमी वस्त्रों पर प्रैस क्यों करनी चाहिए?
उत्तर-
पूर्ण सूखे रेशमी वस्त्रों पर प्रेस करने से तन्तु ढीले पड़ जाते हैं।

प्रश्न 32.
ऊन का तन्तु आपस में किन कारणों से जुड़ जाता है ?
उत्तर-
नमी, क्षार, दबाव तथा गर्मी के कारण।।

प्रश्न 33.
ऊन के तन्तुओं की सतह कैसी होती है?
उत्तर-
खुरदरी।

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प्रश्न 34.
ऊन के रेशों की सतह खुरदरी क्यों होती है?
उत्तर-
क्योंकि ऊन की सतह पर परस्पर व्यापी शल्क होते हैं।

प्रश्न 35.
ऊन के रेशों की सतह के शल्कों की प्रकृति कैसी होती है?
उत्तर-
लसलसी, जिससे शल्क जब पानी के सम्पर्क में आते हैं तो फूलकर नरम हो जाते हैं।

प्रश्न 36.
ताप के अनिश्चित परिवर्तन से रेशों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
रेशों में जमाव व सिकुड़न हो जाती है।

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प्रश्न 37.
ऊनी वस्त्रों को किस प्रकार के साबुन से धोना चाहिए?
उत्तर-
कोमल प्रकृति के शुद्ध क्षाररहित साबुन से।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्टार्च या कलफ क्या होता है?
उत्तर-
स्टॉर्च या कलफ का प्रयोग धुले वस्त्रों पर, उन पर कड़ापन लाने के लिए किया जाता है। स्टॉर्च का प्रयोग विशेष रूप से सूती वस्त्रों के लिए ही किया जाता है। सूती वस्त्र धोने पर ढीले हो जाते हैं। कलफ लगाने से उनमें कड़ापन आ जाता है और इस्तरी के बाद उनमें सुन्दरता व ताज़गी दिखाई देती है।

प्रश्न 2.
धुलाई में नील का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
सूती वस्त्रों की सफेदी बढ़ाने के लिए नील लगायी जाती है। सफ़ेद वस्त्र पहनने अथवा धोने के पश्चात् पीले पड़े जाते हैं क्योंकि उनकी सफेदी जाती रहती है। इस पीले रंग को दूर करने के लिए नील का प्रयोग किया जाता है। इससे वस्त्र में सफेदी व नवीनता पुनः आ जाती है।

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प्रश्न 3.
वस्त्रों पर इस्तरी करने की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर-
वस्त्रों की धुलाई के पश्चात् सभी कपड़ों पर प्रायः सिलवटें पड़ जाती हैं। कुछ वस्त्र ऐसे भी होते हैं जो मैले न होते हुए भी सिलवटों के कारण पहनने योग्य नहीं होते। ऐसे वस्त्रों को मूलरूप व आकर्षण देने के लिए इन पर इस्तरी करने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
वस्त्रों की रंगाई का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
रंगाई द्वारा फीके पड़े हुए वस्त्रों को फिर से आकर्षक व सुन्दर बनाया जा सकता है। किसी भी वस्त्र को इच्छित रंग में बदला जा सकता है।

प्रश्न 5.
रेयॉन की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
भौतिक विशेषताएँ-रेयॉन का तन्तु भारी, कड़ा तथा कम लचकदार होता है। जब रेयॉन के धागे को जलाया जाता है तो सरलता से जल जाता है। सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखने पर इसके तन्तु लम्बाकार, चिकने एवं गोलाकार दिखाई देते हैं। रेयॉन में प्राकृतिक तन्यता नहीं होती है। यह वस्त्र रगड़ने से कमजोर हो जाता है तथा इसकी चमक नष्ट हो जाती है। यदि धोते समय, वस्त्र को रगड़ा जाये तो छेद होने का भय रहता है। पानी से रेयॉन की शक्ति नष्ट हो जाती है। जब रेयॉन सूख जाता है तो पुनः अपनी शक्ति को प्राप्त कर लेता है।
रेयॉन ताप का अच्छा संचालक है। यह उष्णता को शीघ्र निकलने देता है, अतः यह ठण्डा होता है।
PSEB 6th Class Home Science Practical अपने कपड़ों को धोना 1
चित्र 4.1 सूक्ष्मदर्शी में रेयॉन की रचना
ताप के प्रभाव से रेयॉन के तन्तु पिघल जाते हैं तथा उनकी चमक नष्ट हो जाती है। धूप रेयॉन की शक्ति को नष्ट करती है।

रासायनिक विशेषताएँ-रेयॉन की रासायनिक विशेषताएँ कुछ-कुछ रूई के समान ही हैं। क्षार के प्रयोग से रेयॉन की चमक नष्ट हो जाती है। द्रव अम्ल व अम्लीय क्षार का रेयॉन पर प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि यह रेयॉन को कोई हानि नहीं पहुँचाता

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प्रश्न 6.
टेरीलीन की भौतिक तथा रासायनिक विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
भौतिक विशेषताएँ-टेरीलीन के तन्तु भारी एवं मज़बूत होते हैं।
सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा देखा जाये तो ये रेयॉन एवं नायलॉन के तन्तुओं की भाँति दिखाई देते हैं। ये तन्तु सीधे, चिकने एवं चमकदार होते हैं।
टेरीलीन में नमी को शोषित करने की शक्ति नहीं होती, इसलिए पानी से इसके रूप में कोई परिवर्तन नहीं आता है।
टेरीलीन तन्तु जलाने पर धीरे-धीरे जलते हैं व धीरे-धीरे पिघलते भी हैं। यह प्रकाशअवरोधक होते हैं।
टेरीलीन के वस्त्र को धोने पर उसमें सिकुड़न नहीं आती है। रासायनिक विशेषताएँ
टेरीलीन पर अम्ल का प्रभाव हानिकारक नहीं होता परन्तु अधिक तीव्र आम्लिक क्रिया वस्त्र को नष्ट कर देती है। क्षार का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। किसी भी प्रकार के रंग में इन्हें रंगा जा सकता है।

प्रश्न 7.
ऑरलॉन तन्तुओं की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखने पर ये हड्डी के समान दिखाई देते हैं। ऑरलॉन में ऊन तथा रूई के कम अपघर्षण प्रतिरोधन-शक्ति होती है।
ऑरलॉन में उच्च श्रेणी की स्थाई विद्युत् शक्ति होती है। जलाने पर यह जलता है व साथ-साथ पिघलता भी है।
ऑरलॉन का तन्तु आसानी से नहीं रंगा जा सकता। रंग का पक्कापन रंगाई की विधि पर तथा वस्तु की बनावट पर निर्भर करता है। इस तन्तु को रंगने के लिए ताँबा-लोहा विधि बहुत सफल हुई है। वस्त्र का सिकुड़ना उसकी बनावट पर निर्भर करता है।
ऑरलॉन के वस्त्र को धोने के पश्चात् लोहा करने की आवश्यकता नहीं रहती है। ये शीघ्रता से सूख जाते हैं। इन वस्त्रों में टिकाऊपन अधिक होता है।

प्रश्न 8.
ऊनी बुने हुए स्वेटर की धुलाई आप किस प्रकार करेंगी?
उत्तर-
ऊनी स्वेटर पर प्रायः बटन लगे होते हैं। यदि कुछ ऐसे फैन्सी बटन हों जिनको धोने से खराब होने की सम्भावना हो तो उतार लेते हैं। यदि स्वेटर कहीं से फटा हो तो सी लेते हैं। अब स्वेटर का खाका तैयार करते हैं। इसके उपरान्त गुनगुने पानी में आवश्यकतानुसार लक्स का चूरा अथवा रीठे का घोल मिलाकर हल्के दबाव विधि से धो लेते हैं। तत्पश्चात् गुनगुने साफ़ पानी से तब तक धोते हैं जब तक सारा साबुन न निकल जाए। ऊनी वस्त्रों के लिए पानी का तापमान एक-सा रखते हैं तथा ऊनी वस्त्रों को पानी में बहुत देर तक नहीं भिगोना चाहिए वरना इनके सिकुड़ने का भय हो सकता है। इसके बाद एक रोंएदार (टर्किश) तौलिये में रखकर उसको हल्के हाथों से दबाकर पानी निकाल लेते हैं। फिर खाके पर रखकर किसी समतल स्थान पर छाया में सुखा लेते हैं।
PSEB 6th Class Home Science Practical अपने कपड़ों को धोना 2
चित्र 4.2. ऊनी वस्त्र का खाका बनाना

PSEB 6th Class Home Science Practical अपने कपड़ों को धोना

प्रश्न 9.
रेशमी व ऊनी वस्त्रों की धुलाई करने में क्या अन्तर है ? कारण सहित बताओ।
उत्तर-
रेशमी व ऊनी वस्त्रों की धुलाई में निम्नलिखित अन्तर हैं-

रेशमी वस्त्रों की धुलाई ऊनी वस्त्रों की धुलाई
1. पानी गुनगुना होना चाहिए। धोते समय पानी का तापमान बदलने से कोई हानि नहीं होती। अन्तिम बार इसको अवश्य ही ठण्डे पानी में से निकालना चाहिए। यदि ऐसा किया जाता है तो जो गोंद रेशम में होता है, वह ऊपर की सतह पर आ जाता है। 1. पानी तो गुनगुना ही होना चाहिए परन्तु धोते समय पानी का तापमान एकसा ही होना चाहिए। यदि ऐसा न किया जाए तो ऊन के तन्तु सिकुड़ जाते हैं।
2. धोने से पूर्व वस्त्र का खाका तैयार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। 2. धोने से पूर्व वस्त्र का खाका तैयार कर लेना चाहिए। इससे वस्त्र का आकार बना रहता है।
3. हल्की दबाव विधि से धोना चाहिए। 3. हल्की दबाव विधि से जल्दी से जल्दी धोना चाहिए जिससे वस्त्र सिकुड़े नहीं।
4. कलफ लगाने के लिए गोंद का घोल प्रयोग किया जता है। 4. कलफ लगाने की आवश्यकता नहीं होती।
5. हल्के दबाव से निचोड़ना चाहिए। 5. सूखे रोंएदार तौलिए में लपेटकर हल्के हाथों से दबाना चाहिए।
6. वस्त्र को उल्टा करके छाया में सुखाना चाहिए। 6. रेखांकित स्थानों पर कपड़े के सिरे रखकर छाया में उल्टा करके समतल स्थान पर सुखाना चाहिए जहाँ चारों ओर से कपड़े पर हवा लगे।
7. जब वस्त्र में थोड़ी नमी रह जाए तो उस पर हल्की गर्म इस्तरी करनी चाहिए। 7. यदि रेखांकित स्थानों पर वस्त्र को ठीक प्रकार से सुखाया जाए तो प्रेस की आवश्यकता नहीं होती।

 

बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
वस्त्रों को धोने के लिए किस-किस सामान की आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
वस्त्रों को धोने के लिए निम्नलिखित सामान की आवश्यकता होती है-
1. चिलमची, टब, बेसिन या बाल्टियाँ-ये वस्त्र धोने के प्रयोग में आते हैं। इनका आकार इतना बड़ा होना चाहिए कि पाँच-छः कपड़े आसानी से धुल सकें। इसका प्रयोग पानी भरने, साबुन का फेन बनाने, वस्त्रों को धोने, खंगालने, नील व माँड़ लगाने में भी किया जाता है। यह बर्तन प्लास्टिक या तामचीनी के होने चाहिएं ताकि बर्तन की धातु का वस्त्र पर कोई प्रभाव न पड़े। बाल्टी और टब प्लास्टिक के भी अच्छे होते हैं।

2. सिंक-कपड़े धोने के लिए सिंक अच्छा रहता है। धोने का काम सिंक में बड़ी सुविधा से होता है, मेहनत कम लगती है। सिंक की आकृति, आकार, ऊँचाई, समाई तथा स्थिति सभी धुलाई को सुविधाजनक और कम समय एवं श्रम में करने में योगदान देते हैं। 36 इंच ऊँचे, 20 इंच लम्बे, 20 इंच चौड़े तथा 12 इंच गहरे सिंक अच्छे होते हैं।

3. तामचीनी के कटोरे-इसका प्रयोग नील या माँड़ घोलने के लिए किया जाता है। धब्बे छुड़ाते समय भी ऐसे कटोरों की आवश्यकता होती है।

4. लकड़ी या धातु के चम्मच-नील घोलने के लिए या माँड़ बनाने के लिए प्रयोग में आते हैं।
5. ब्रुश-वस्त्र पर जहाँ अधिक गन्दगी लगी हो, ब्रुश द्वारा साफ़ की जाती है।

6. स्क्रबिंग बोर्ड या रगड़ने का तख्ता-पत्थर पर वस्त्र रगड़ने की बजाय वस्त्र को रगड़ने के लिए लकड़ी का तख्ता रखना चाहिए। इस तख्ते पर कपड़ा रगड़ने से मैल शीघ्रता से निकल जाती है। स्क्रबिंग बोर्ड लकड़ी के अलावा जिंक, शीशे तथा स्टील के भी बनते हैं, परन्तु लकड़ी के ही सबसे अच्छे रहते हैं।

7. सक्शन वाशर-इसका निचला भाग धातु का एवं हैंडिल लकड़ी का बना होता है। इससे भारी कपड़े जैसे कम्बल, दरी, सूट आदि धोने में सरलता होती है।

8. साइफन ट्रेनर-यह वाशिंग मशीन में पानी भरने के प्रयोग में आता है। इसी के द्वारा मशीन से पानी भी निकाला जाता है।

9. वस्त्र सुखाने का रैक-बहुत से ऐसे मकान जहाँ पर वस्त्र सुखाने की सुविधा नहीं होती है, लकड़ी के रैक प्रयोग में लाए जाते हैं। यह कमरे में या बरामदे में रखे जा सकते हैं। छोटे मकानों में रैक घरों की छत पर लटका दिए जाते हैं जिन्हें रस्सी द्वारा ऊपर-नीचे किया जा सकता है।

10 .सोप केस (साबुनदानी)-यह चिलमची के ऊपर एक तरफ रखी जाती है।

11. कपड़े धोने की मशीन (वाशिंग मशीन)- यह मशीन कई प्रकार की होती है। सभी एक ही सिद्धान्त पर बनी हैं। इसमें साबुन के घोल में बिजली द्वारा कम्पन पैदा करके कपड़ों की धुलाई की जाती है। मशीन के साथ निचोड़क भी लगा होता है। मशीन में पानी और साबुन का घोल तैयार कर लिया जाता है तथा इसे पाँच से दस मिनट तक चलाते हैं। जब कपड़ों की मैल निकल जाती है तो कपड़ों को निचोड़क से निकाला जाता है। इसके बाद कपड़ों को साफ़ पानी से खंगालना चाहिए। उपयोग के बाद मशीन को सुखाकर रखना चाहिए।

12. इस्तरी-बिजली या कोयले की इस्तरी प्रेस करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। बिजली की इस्तरी का प्रयोग कोयले की इस्तरी की अपेक्षा सुविधाजनक है। इसमें विभिन्न प्रकार के तन्तुओं से बने वस्त्रों को प्रैस करते समय आवश्यकता के अनुसार ताप का नियन्त्रण किया जा सकता है। बिजली की इस्तरी से गन्दगी भी नहीं फैलती।

13. इस्तरी करने की मेज़-इस मेज़ की बनावट प्रैस करने की सुविधा के अनुकूल होती है जिसमें गुदगुदा करने के लिए फलालेन व कम्बल लगा होता है। इसके ऊपर एक चादर फैला दी जाती है।

14. बाँह प्रैस करने का तख्ता-यह आगे से कम चौड़ा या पीछे से ज्यादा चौड़ा होता है। यह कोट की बाजू तथा गोल चीज़ों पर प्रेस करने के काम आता है।

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प्रश्न 2.
वस्त्रों की धुलाई में आवश्यक साबुन तथा अन्य सहायक पदार्थों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. साबुन-धूल के कण जो चिकनाई के माध्यम से कपड़ों पर चिपके होते हैं, साबुन लगाने से ही दूर होते हैं। साबुन पाउडर, तरल और ठोस रूपों में मिलता है।
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चित्र 4.3. धुलाई के उपकरण
अच्छा साबुन नरम होता है तथा बहुत झाग देता है। अच्छा साबुन हल्के रंग का होता है और कपड़ों को भली-भाँति साफ़ कर देता है। डिटरजेन्ट साबुन कपड़ों की धुलाई के लिए अधिक प्रभावशाली होता है।

2. रीठे-रीठों का घोल बनाने के लिए रीठों को तोड़कर उनकी गुठली निकाल दी जाती है। तत्पश्चात् उन्हें पीसकर पाउडर बना लिया जाता है। इस पाउडर को पानी के साथ उबाल लिया जाता है। फिर यह घोल कपड़े धोने के प्रयोग में लाया जाता है। यह रेशमी व ऊनी कपड़ों को धोने के काम में आता है। एक पिन्ट पानी में आठ औंस रीठा लेना चाहिए।

3. शिकाकाई-यह भी रीठे के समान होता है। इसकी सहायता से सूती, ऊनी व रेशमी वस्त्रों पर जो कोई चिकनाई लगी होती है, सरलतापूर्वक हटाई जा सकती है। शिकाकाई का भी रीठे की तरह महीन पाउडर बना लिया जाता है। एक चम्मच शिकाकाई को एक पिन्ट पानी में घोलकर उबाला जाता है। इसी घोल को वस्त्रों की धुलाई के प्रयोग में लाया जाता है।

4. माँड़ (कलफ)-माँड़ बनाने के लिए साधारणतः चावल, मैदा, अरारोट एवं साबूदाने का प्रयोग किया जाता है। वस्तु के अनुपात में पानी डालकर उबालते हैं, जब पक जाता है तो छलनी में छानकर प्रयोग में लाते हैं।
माँड़ से वस्त्र में सख्ती या कड़ापन आ जाता है। यह धागों के बीच के रिक्त स्थानों की पूर्ति करता है। वस्त्र में धूल व गन्दगी नहीं लगने देता है। इसके प्रयोग से वस्त्र में चमक एवं नवीनता आ जाती है।

5. नील-बार-बार धुलाई से सफ़ेद कपड़े पीले पड़ जाते हैं। ऐसे कपड़ों में सफेदी लाने के लिए नील लगाया जाता है। नील बाज़ार में बना-बनाया मिलता है।

6. टिनोपाल-सफ़ेद कपड़ों में अधिक चमक लाने के लिए टिनोपाल का प्रयोग किया जाता है।

7. धब्बे छुड़ाने के रसायन-बैंजीन, पेट्रोल, पैराफीन, जेवली का घोल तथा अन्य बहुत से रसायन वस्त्रों पर पड़े दाग-धब्बे छुड़ाने के काम आते हैं।

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अपने कपड़ों को धोना PSEB 6th Class Home Science Notes

  • कपड़े धोना, बर्तन और मकान की सफ़ाई की तरह ही आवश्यक है।
  • कपड़े मनुष्य की सुन्दरता को बढ़ा देते हैं।
  • मैले कपड़े पहनना एक बुरी आदत है। इससे छूत की कई बीमारियाँ हो जाती हैं। ।
  • कपड़े धोने के लिए हमें पहले प्रयोग में आने वाला सामान इकट्ठा कर लेना चाहिए, जैसे-पानी के लिए टब, बाल्टी, मग, नील लगाने के लिए टब या । चिलमची, माया लगाने के लिए बर्तन, साबुन, माया, नील, रानीपाल, सर्फ या लक्स का चूरा आदि।
  • कपड़े धोने के लिए हमेशा कोमल पानी प्रयोग करना चाहिए। यदि पानी कठोर हो तो उसको उबाल लेना चाहिए।
  • सूती और भारी कपड़े ज़मीन पर रखकर ब्रुश से या रगड़ने वाले तख्ते पर रखकर हाथों से धोना चाहिए।
  • सूती और बनावटी कपड़ों के लिए सर्फ या डैट का प्रयोग करना चाहिए।
  • सफ़ेद सूती कपड़ों को धोने के बाद नील या रानीपाल लगाना चाहिए।
  • सूती कपड़ों को मैदे या अरारोट की माया बनाकर लगाई जाती है।
  • कपड़ों को मुरम्मत करने के बाद छाँट लेना चाहिए।
  • रंगदार और सफ़ेद कपड़े अलग-अलग कर लेने चाहिएं।
  • यदि कपड़ों को स्याही, हल्दी, घी, दूध या कोई और दाग लगे हों तो तुरन्त साफ़ कर लेने चाहिएं।
  • निजी कपड़े किसी भी तन्तु और रंग के हो सकते हैं।
  • कृत्रिम रेशों वाले कपड़े बहुत मज़बूत होते हैं।
  • रेशमी कपड़े भी ऊनी कपड़ों की तरह धोये जाते हैं।
  • सूती कपड़े जैसे फ्रॉक, जांघिया, सलवार और कमीज़ आदि को किसी कपड़े धोने वाले साबुन से धोया जा सकता है।
  • रंगदार कपड़ों को कभी भी गर्म पानी में नहीं जलाना चाहिए।
  • कच्चे और पक्के रंगों वाले कपड़े अलग-अलग करके धोने चाहिएं। |
  • दुपट्टे को साड़ी की तरह ही धोना चाहिए।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 9 दक्षिण के राज्य

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 9 दक्षिण के राज्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 9 दक्षिण के राज्य

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
शासक वर्ग के सन्दर्भ में बाहमनी राज्य की स्थापना, विकास तथा विघटन के बारे में बताएं।
उत्तर-
बाहमनी राज्य दक्षिण भारत का एक महत्त्वपूर्ण राज्य था जिसका संस्थापक हसन गंगू था। इस राज्य की स्थापना 11347 ई० में तुग़लक वंश की कमजोरी का परिणाम था। तत्पश्चात् 1526 ई० तक यह राज्य दक्षिण भारत के राजनीतिक भानचित्र का अभिन्न अंग बना रहा। इस सारी अवधि में इस राज्य पर अठारह शासकों ने राज्य किया। 1422 ई० तक इस राज्य की राजधानी गुलबर्गा रही, परन्तु इसके पश्चात् बीदर को बाहमनी राज्य की राजधानी बनने का श्रेय प्राप्त हुआ।

I. स्थापना एवं विकास-

बहमनी राज्य की स्थापना एवं विकास का अध्ययन निम्नलिखित तीन चरणों में किया जा सकता है
पहला चरण-मुहम्मद तुग़लक के शासन काल में दिल्ली सल्तनत का विघटन आरम्भ हो गया था। प्रान्तीय गवर्नर अपने आप को स्वतन्त्र घोषित करने लगे थे। इसी समय दक्षिण में दौलताबाद के दरबारियों ने ‘इस्माइल मख’ को राजगद्दी पर बिठाया। चूंकि इस्माइल खां अब वृद्ध हो चला था, इसलिए उसने 1347 ई० में हसन गंगू नामक एक नवयुवक तथा शक्तिशाली दरबारी को अपना राज्य सौंप दिया। हसन ने “अलाऊद्दीन बहमन शाह” की उपाधि धारण की और बाहमनी राज्य की नींव रखी। उसने अनेक छोटे-छोटे अभियान किए तथा कोटगीर, मोरण, मोहिन्दर तथा कल्याणी के नगर व दुर्ग अपने अधिकार में लिए। इस प्रकार उत्तर-पूर्व में माहूर तक तथा दक्षिण में तेलंगाना तक का सारा प्रदेश उसके राज्य का अंग बन गया।

तत्पश्चात् उसने वारंगल के एक हिन्दू शासक को पराजित करके कौलास के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अपने राज्यकाल के अन्तिम वर्षों में उसने कोल्हापुर, गोआ, माण्डू, मालवा आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। हसन की मृत्यु के बाद उसने पुत्र मुहम्मद शाह प्रथम ने भी अपने पिता के विजय कार्य को जारी रखा। उसने वारंगल और विजयनगर के हिन्दू शासकों को परास्त किया तथा गोलकुण्डा के प्रदेशों को अपने राज्य का अंग बना लिया। उसके शासन काल में बाहमनी राज्य का विजयनगर राज्य के साथ एक लम्बा संघर्ष आरम्भ हो गया।

विस्तार का दूसरा चरण-मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु के बाद लगभग 20 वर्षों तक बाहमनी राज्य की सीमाओं में कोई विस्तार न हो सका। तत्पश्चात् 1397 ई० में फिर फिरोजशाह बाहमनी साम्राज्य का शासक बना। उसने एक बार फिर से वारंगल तथा विजयनगर के राज्यों पर आक्रमण किया तथा अपने राज्य का राजामुन्द्री तक विस्तार कर लिया। परन्तु 1420 ई० में यह विजयनगर के शासक देवराय द्वितीय से पराजित हुआ और बाहमनी राज्य के पूर्वी तथा दक्षिणी ज़िले विजयनगर राज्य के अंग बन गए। फिरोजशाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह बाहमनी ने गुलबर्गा के स्थान पर बीदर को अपनी राजधानी बनाया। उसने वारंगल के राजा पर आक्रमण करके 1425 ई० में उसके राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने विजयनगर के बुक्का तृतीय से भी नज़राना प्राप्त किया।

तीसरा चरण तथा सबसे बड़ी सीमाएं-अहमदशाह के पश्चात् अलाऊद्दीन द्वितीय बाहमनी राज्य का शासक बना। उसकी गुजरात तथा मालवा के शासकों से टक्कर हुई। उसने विजयनगर राज्य से मिलने वाला वार्षिक कर भी वसूल किया। उसकी एक अन्य सफलता कोंकण प्रदेश की विजय थी। भले ही उसने कोंकण प्रदेश के कुछ ही भागों को विजय किया था, परन्तु उसके एक उत्तराधिकारी मुहम्मदशाह तृतीय ने यह सारे का सारा प्रदेश बाहमनी राज्य में मिला लिया। मुहम्मदशाह तृतीय ने अपने योग्य प्रधानमन्त्री महमूद गवां की सहायता से वारंगल के पूर्व में स्थित राजामुन्द्री के प्रदेश पर भी विजय प्राप्त की। इस प्रकार 15वीं शताब्दी के अन्त तक बाहमनी राज्य की सीमाएं समुद्र के एक किनारे से दूसरे किनारे तक ताप्ती नदी के ऊपरी प्रदेश से लेकर तुंगभद्रा नदी तक फैल गईं। यही इस राज्य की सबसे बड़ी सीमाएं थीं।

II. बाहमनी राज्य का विघटन

बाहमनी राज्य का पतन महमूदशाह के समय में आरम्भ हुआ। वह बड़ा ही ऐश्वर्य प्रिय राजा था तथा सदा सुरा तथा सुन्दरी के चक्कर में पड़ा रहता था। शासन-कार्यों में उसकी कोई रुचि न थी। अतः शासन की वास्तविक शक्ति उसके मन्त्री बरीद के हाथों में रही। सुल्तान अपने 36 वर्ष (1482 ई० से 1518 ई०) के लम्बे शासन काल में विद्रोहों में उलझे रहने के अतिरिक्त कुछ न कर सका। सारे साम्राज्य में अव्यवस्था फैल गई। प्रान्तीय गवर्नरों ने अपने आप को बाहमनी राज्य से स्वतन्त्र घोषित कर दिया। इनमें से सबसे पहले 1490 ई० में अहमदनगर का शासक मलिक अहमद स्वतन्त्र हुआ। उसका अनुसरण करते हुए बीजापुर के तर्फदार यूसुफ़ आदिल खां तथा बरार के तर्फदार फतेह उल्लाह इमादुलमुल्क ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। तत्पश्चात् गोलकुण्डा का राज्य स्वतन्त्र हुआ। बीदर में बरीद के पुत्र ने अपने आप को स्वतन्त्र घोषित करके बरीदुलमुल्क की उपाधि धारण कर ली। इस प्रकार 16वीं शताब्दी के आरम्भ तक बाहमनी राज्य पांच स्वतन्त्र मुस्लिम रियासतों में बंट गया।

पतन के कारण (शासन-प्रबन्ध तथा शासक वर्ग की भूमिका)-बाहमनी राज्य की पतन की प्रक्रिया में यों तो अनेक कारणों का हाथ रहा, परन्तु शासन-प्रबन्ध के गलत संगठन तथा शासक वर्ग के विवेकहीन कार्यों से इस राज्य का पतन बड़ी तीव्रता से होने लगे। बाहमनी शासक अपनी विवेकपूर्ण नीति के कारण शासन को संगठित एवं स्थायी रूप प्रदान करने में असफल रहे। फलस्वरूप अमीरों के आपसी मतभेद काफ़ी बढ़ गए। दूसरे, सुल्तानों ने हिन्दुओं के प्रति असहनशीलता की नीति अपनाई जिससे राज्य की बहुसंख्यक हिन्दू जनता आरम्भ से ही बाहमनी शासकों के विरुद्ध हो गई। बाहमनी शासकों ने देशी अमीरों की अपेक्षा विदेशी अमीरों पर अधिक विश्वास किया। अतः उन्होंने यहां अनेक विदेशी अमीरों को भर्ती कर लिया। फलस्वरूप एक तो देशी और विदेशी अमीरों में आपसी शत्रुता पैदा हो गई। दूसरे, महमूद गवां को छोड़कर अन्य किसी भी अमीर ने राजभक्ति न दिखाई। अतः बाहमनी सुल्तानों को न तो देशी अमीरों का ही साथ मिल सका और न ही विदेशी अमीरों का। यह बात भी बाहमनी शासकों की असफलता का कारण बनी और बाहमनी राज्य का पतन तीव्रता से होने लगा।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 9 दक्षिण के राज्य

प्रश्न 2.
राज्य प्रबन्ध के सन्दर्भ में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना, विकास तथा पतन की चर्चा करें।
उत्तर-
विजयनगर का राज्य कृष्णा और कावेरी नदियों के मध्य स्थित था। इस राज्य की नींव संगम वंश के दो भाइयों हरिहर तथा बक्का राय ने रखी। इस राज्य की स्थापना के विषय में दो किंवदन्तियां प्रचलित हैं। पहली किंवदन्ती के अनुसार मुहम्मद तुग़लक ने 1323 ई० में जब वारंगल पर आक्रमण किया तो वह वहाँ से हरिहर तथा बुक्का राय नामक दो भाइयों को बन्दी बना कर अपने साथ दिल्ली ले गया।

ये दोनों भाई वारंगल के शासक प्रताप रुद्रदेव तृतीय के यहां नौकरी करते थे। मुहम्मद तुग़लक ने दक्षिण के विद्रोही राज्यों में कई गर्वनर भेजे। यह बात वहां के हिन्दुओं से सहन न हुई। उन्होंने मुस्लिम साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। स्थिति पर नियन्त्रण पाने के लिए मुहम्मद तुग़लक ने हरिहर तथा बुक्का को दक्षिण में भेजा। उन्होंने रायचूर दोआब में फैली अराजकता का दमन करके शान्ति की स्थापना की। इस कार्य में उनकी सहायता उस समय के प्रकाण्ड पण्डित विद्यारण्य (Vidyaranya) ने की। अपने इसी गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उन्होंने तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर एक नगर की स्थापना की तथा उसका नाम विद्यानगर अथवा ‘विजयनगर’ रखा। मुहम्मद तुग़लक के शासन के उत्तरार्द्ध (later half) में दिल्ली सल्तनत का पतन आरम्भ हो गया। दक्षिण राज्यों के मुसलमान गवर्नरों ने दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। अवसर का लाभ उठा कर इन दोनों भाइयों ने भी अपने आपको स्वतन्त्र घोषित कर दिया। __ इनके द्वारा स्थापित विद्यानगर आगे चलकर एक विशाल साम्राज्य की राजधानी बनी जो विजयनगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

विजयनगर साम्राज्य तीन शताब्दियों से भी अधिक समय तक स्थापित रहा। इस समय में इस साम्राज्य पर चार राजवंशों ने शासन किया-

  1. संगम वंश, 1336-1485 ई०
  2. सल्लुव वंश, 1485-1505 ई०
  3. तल्लुव वंश, 1505-1570 ई० तक
  4. अरवीदु वंश, 1570-1674 ई०।

साम्राज्य का विकास एवं विघटन-

संगम वंश का प्रथम शासक हरिहर (1336-1357 ई०) था। उसने अपनी शक्ति दृढ़ करने के लिए विजयनगर में एक विशाल दुर्ग का निर्माण करवाया तथा सभी महत्त्वपूर्ण सैनिक स्थानों की किलेबन्दी की। हरिहर की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई बुक्का (1357-1377 ई०) विजयनगर का शासक बना। उसने पड़ोसी राज्यों से युद्ध करके अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसका अधिकांश समय बाहमनी सुल्तान से युद्ध करने में ही व्यतीत हुआ। बुक्का की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई०) विजयनगर राज्य का प्रथम स्वतन्त्र शासक बना जिसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। अपने शासन काल में उसने केरल, त्रिचनापल्ली तथा कांची हिन्दू राज्यों पर विजय पाकर विजयनगर राज्य का विस्तार किया। इस राजवंश का एक अन्य प्रसिद्ध शासक देवराज प्रथम (1406-1422 ई०) था। 1420 ई० में उसने बाहमनी शासक फिरोज़ को पराजित किया। देवराज द्वितीय संगम वंश का एक महान् शासक था। उसने रायचूर दोआब पर विजय प्राप्त की और राजामुन्द्री के सामन्तों को पराजित किया। इस प्रकार विजयनगर साम्राज्य कन्याकुमारी से लेकर कृष्णा नदी तक तथा दक्षिणी उड़ीसा से मलाबार तट तक फैल गया। देवराय द्वितीय के उत्तराधिकारियों के समय में विजयनगर साम्राज्य के बाहमनी शासकों ने बड़ी क्षति पहुंचाई।

विजयनगर साम्राज्य का दूसरा राजवंश सल्लुव वंश था। इसकी नींव नरसिंह वर्धन ने रखी थी। उसने संगम वंश के अन्तिम शासक वीरुपक्ष को गद्दी से उतार कर स्वयं को विजयनगर का शासक घोषित किया तथा विजयनगर में सल्लुव वंश की स्थापना की। नरसिंह वर्धन ने केवल छः वर्ष तक शासन किया। वह बड़ा वीर तथा योग्य शासक था। उसने उड़ीसा के कुछ भाग पर अधिकार करके अपने राज्य की सीमा का विस्तार किया। नरसिंह वर्धन की मृत्यु के पश्चात् उसका अयोग्य पुत्र शासन की बागडोर अधिक देर तक न सम्भाल सका।

शेष भाग पर 1570 ई० में रामराय के भाई तिरुमल ने अपना अधिकार करके वहां अरवीदु वंश की नींव रखी। यह वंश लगभग 1674 ई० तक सत्तारूढ़ रहा। इस वंश के लगभग सभी शासक अयोग्य तथा दुर्बल सिद्ध हुए। वे अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा करने में असफल रहे। उनकी दुर्बलता का लाभ उठाकर धीरे-धीरे सभी प्रान्तीय गवर्नर स्वतन्त्र होते गए। कुछ प्रदेश बीजापुर और गोलकुण्डा के राज्यों ने अपने अधिकार में ले लिए। अरवीदु वंश का अन्तिम शासक इंग तृतीय तो बिल्कुल ही निर्बल सिद्ध हुआ। उसके शासनकाल में राज्य का उत्तरी भाग मुसलमानों ने हथिया लिया और दक्षिणी भाग के बचे-खुचे प्रदेशों में नायकों ने अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिए। इस प्रकार 1674 ई० तक विजयनगर राज्य का अस्तित्व ही मिट गया।

पतन के कारण-

  1. इस राज्य की सारी शक्ति राजा के हाथ में थी। शासन में प्रजा का कोई योगदान नहीं था। इसलिए संकट के समय प्रजा ने अपने राजा का साथ न दिया।
  2. इस राज्य में सिंहासन प्राप्ति के लिए प्रायः गृह युद्ध चलते रहते थे। इन युद्धों ने राज्य की शक्ति नष्ट कर दी।
  3. कृष्णदेव राय के पश्चात् इस राज्य के सभी शासक निर्बल थे।
  4. विजयनगर के शासकों को बाहमनी राजवंश के साथ युद्ध करने पड़े। इन युद्धों में विजयनगर राज्य की शक्ति को बड़ी क्षति पहुंची।
  5. तालीकोटा की लड़ाई में विजयनगर का शासक मारा गया। इस लड़ाई के तुरन्त पश्चात् इस राज्य का पूरी तरह पतन हो गया।

शासन (राज्य) प्रबन्ध-

विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट् था। उसके पास असीम शक्तियां तथा अधिकार थे। अपनी सहायता के लिए उसने एक मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। इसमें मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि सम्मिलित थे। इनकी नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था। उसका सारा राज्य लगभग 200 प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त का शासन प्रबन्ध एक प्रान्तपति के हाथ में होता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्धित होते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर होते थे। प्रत्येक प्रान्त को जिलों में बांटा गया था। इन्हें नाडू तथा कोट्टम कहा जाता था। जिले परगनों में तथा परगने गांवों में बंटे होते थे। गांव का शासन प्रबन्ध ग्राम पंचायतों को सौंपा हुआ था। इन सभी संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी को आयगर कहा जाता था। गांवों में आयगर तथा प्रान्तों में प्रान्तपति अथवा सूबेदार न्याय कार्य करते थे। परन्तु न्याय का मुख्य अधिकारी स्वयं सम्राट् था। दण्ड बड़े कठोर थे। घोर अपराधों के लिए अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था, परन्तु साधारण अपराधों पर जुर्माना किया जाता था। राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि कर था। किसानों की उपज का 1/6 से 1/4 भाग भूमि कर के रूप में भूमिपति को देना पड़ता था। विजयनगर राज्य के शासकों के पास एक शक्तिशाली सेना भी थी।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 9 दक्षिण के राज्य

प्रश्न 3.
विजयनगर तथा बाहमनी साम्राज्यों के प्रशासन काल तथा भवन निर्माण पर लेख लिखें।
उत्तर-
विजयनगर तथा बाहमनी दोनों ही साम्राज्य 14वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत के महत्त्वपूर्ण राज्य थे। विजयनगर एक हिन्दू राज्य था परन्तु बाहमनी एक मुस्लिम राज्य था। इन साम्राज्यों के प्रशासन, कला तथा भवन निर्माण का अलग-अलग वर्णन इस प्रकार है

I. विजयनगर साम्राज्य-

1. प्रशासन-विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट होता था। शासन की सभी शक्तियां उसके हाथ में होती थीं। राजा की सहायता के लिए मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था भी की हुई थी। विजयनगर राज्य 200 से भी अधिक प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रान्त के मुखिया को प्रान्तपति अथवा नायक कहा जाता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्ध रखते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर होते थे। शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक प्रान्त को जिलों में बांटा गया था। जिले आगे परगनों में तथा परगने गांवों में बंटे होते थे। राज्य की सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली सेना की व्यवस्था थी। सेना में हाथी, घोड़े तथा पैदल सैनिक होते थे। राज्य का मुख्य न्यायाधीश स्वयं राजा होता था। प्रान्तों में प्रान्तपति अथवा सूबेदार न्याय करते थे। दण्ड बहुत कठोर थे। भूमिकर राज्य की आय का मुख्य साधन था।

2. कला तथा भवन-निर्माण-विजयनगर के शासक बड़े ही कला-प्रेमी थे। उन्होंने मूर्तिकला और भवन निर्माण को विशेष रूप से संरक्षण प्रदान किया। चोल राज्य की भान्ति विजयनगर के मूर्तिकाल भी कांसे की मूर्तियां ढालने में बड़े निपुग थे। राजा कृष्णदेव राय का कांसे का बुत विजयनगर राज्य की मूर्तिकला का सबसे सुन्दर नमूना था। विजयनगर राज्य की भवन निर्माण की झलक हमें उनके बनवाए गए दुर्गों, भव्य महलों और सुन्दर मन्दिरों में दिखाई देती है। यहां के शासकों ने अनेक प्राचीन मन्दिरों को विशाल रूप दिया और कई नए मन्दिरों का निर्माण करवाया। उनके द्वारा बनवाए गए मन्दिर केवल विजयनगर तक ही सीमित नहीं हैं। ये तुंगभद्रा नदी के दक्षिण के सारे प्रदेशों में बने हुए हैं। इन मन्दिरों के उत्कृष्ट नमूने वैलोर, कांचीपुरम तथा श्रीरंगपट्टम में देखे जा सकते हैं। कृष्णदेव राय ने विजयनगर के निकट एक बहुत बड़ा तालाब भी खुदवाया जो सिंचाई के काम आता था।

II. बाहमनी साम्राज्य-

1. प्रशासन-बाहमनी शासकों ने जहां अपने राज्य का विस्तार किया वहां अपने राज्य में एक कुशल शासन प्रणाली स्थापित करने का भी प्रयास किया। इस क्षेत्र में गुलबर्गा से शासन करने वाले बाहमनी शासकों ने विशेष प्रयत्न किए। दूसरी ओर बीदर से शासन करने वाले बाहमनी शासकों ने केवल महमूद गवां की सहायता से ही कुछ आवश्यक सुधार किए। बाहमनी शासकों की सामूहिक शासन-व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है-

(i) सुल्तान-बाहमनी वंश के प्रथम शासक अलाऊद्दीन बाहमनशाह ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाते समय केन्द्रीय सरकार की स्थापना की। केन्द्रीय सरकार का मुखिया सुल्तान था। वह राज्य की सारी शक्तियों को स्रोत था। उसके अधिकार काफ़ी विस्तृत थे। वह राज्य का मुख्य न्यायाधीश था और सेना का मुख्य सेनापति भी था। वास्तव में सुल्तान पूर्ण रूप से निरंकुश था और स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर की छाया मानता था।

(ii) मन्त्री-सुल्तान को शासन कार्यों में परामर्श तथा सहयोग देने के लिए कुछ मन्त्री होते थे। इन मन्त्रियों की संख्या आठ थी। प्रधानमन्त्री को ‘वकील-उल-सत्तनत’ कहते थे। राज्य के सभी आदेश वही जारी करता था। प्रत्येक सरकारी पत्र पर भी उसकी मोहर होनी आवश्यक थी। न्याय विभाग का मन्त्री ‘सदर-ए-जहां’ कहलाता था। वह धर्मार्थ विभाग का भी अध्यक्ष था। मन्त्री अपने सभी कार्य सुल्तान की आज्ञा से करते थे और अपने कार्यों के लिए उसी के प्रति उत्तरदायी होते थे। इन आठ मन्त्रियों के अतिरिक्त कुछ निम्न स्तर के मन्त्री भी थे जिनमें कोतवाल तथा नाज़िर प्रमुख थे।

(iii) प्रान्तीय शासन-बाहमनी सुल्तानों के शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए राज्य को भागों तथा उपभागों में विभक्त किया हुआ था। शासन की प्रमुख इकाई प्रान्त अथवा ‘तरफ’ थी। ‘तरफ’ को आगे चलकर सरकारों तथा परगनों में बांटा गया था । प्रत्येक परगने में कुछ गांव सम्मिलित होते थे। प्रारम्भ में बाहमनी राज्य चार तरफों में विभक्त था-गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार तथा बीदर। कालान्तर में राज्य विस्तार हो जाने के कारण प्रान्तों की संख्या आठ हो गई। तरफ का मुखिया तरफदार कहलाता था। वह अनेक कार्य करता था। प्रान्त में राजस्व कर एकत्रित करवाना, सैनिक भर्ती करना, सेना का नेतृत्व करना आदि उसके प्रमुख कार्य थे। वह पूर्ण रूप से सुल्तान के अधीन था और सभी कार्य उसी की आज्ञा से करता था। उसके कार्यों का निरीक्षण करने के लिए सुल्तान स्वयं भी समय-समय पर तरफों का दौरा किया करता था। परगनों का शासन प्रबन्ध चलाने के लिए भी कई कर्मचारी नियुक्त थे। वे भी अपने सभी कार्य सुल्तान के आदेश द्वारा करते थे।

2. कला तथा भवन-निर्माण-बाहमनी शासकों ने चित्रकला तथा भवन निर्माण कला के विकास में बड़ी ही योगदान दिया। इस समय की चित्रकारी के सर्वोत्तम नमूने अलाऊद्दीन द्वितीय द्वारा बनवाए गए अहमदशाह के मकबरे की छत और दीवारों पर मिलते हैं। यह चित्रकारी फूलदार है और बड़ी सजीव तथा आकर्षक लगती है। बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला के मुख्य केन्द्र गुलबर्गा तथा बीदर हैं। इन स्थानों पर अनेक आकर्षक मस्जिदें, मकबरे, मदरसे तथा महल मिलते हैं। इनमें से कुछ भवनों को निर्माण में पुरानी शैली का अनुसरण किया गया है। परन्तु कुछ इमारतें फारसी शैली में बनाई गई हैं। गुलबर्गा में फिरोजशाह का मकबरा बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य में

प्रश्न 1.
बाहमनी शासकों में सबसे महान् शासक किसे माना जाता है?
उत्तर-
फिरोजशाह को।

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प्रश्न 2.
विजयनगर राज्य की स्थापना करने वाले दो भाइयों के नाम बताओ।
उत्तर-
हरिहर तथा बुक्का।

प्रश्न 3.
विजयनगर राज्य की स्थापना कब हुई?
उत्तर-
विजयनगर राज्य की स्थापना 1336 ई० में हुई।

प्रश्न 4.
विजयनगर के दो प्रतापी राजाओं के नाम बताओ।
उत्तर-
कृष्णदेव राय तथा हरिहार द्वितीय।

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प्रश्न 5.
किस युद्ध के परिणामस्वरूप विजयनगर सामाज्य का विघटन हुआ?
उत्तर-
तालिकोट का युद्ध।

प्रश्न 6.
बाहमनी साम्राज्य राज्य की स्थापना किसने तथा कब की?
उत्तर-
बाहमनी साम्राज्य की स्थापना हसन गंगू ने 1347 ई० में की।

प्रश्न 7.
बाहमनी साम्राज्य के दो शासकों के नाम बताओ।
उत्तर-
मुहम्मद शाह द्वितीय (1387 से 1397 ई०) अहमद शाह (1422 से 1435 ई०)।

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प्रश्न 8.
बाहमनी साम्राज्य का सबसे योग्य प्रधानमन्त्री कौन था?
उत्तर-
बाहमनी साम्राज्य का सबसे योग्य प्रधान मन्त्री महमूद गावाँ था।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति-

(i) महमूद गावाँ………..देश से आया था।
(ii) बाहमनी राज्य की दो राजधानियां गुलबर्गा तथा…………..
(iii) तालिकोट का युद्ध………..ई० में हुआ था।
(iv) अरविंदु वंश का सम्बन्ध……….राज्य से था।
(v) दक्षिण में सामंतों को…………..कहते थे।
उत्तर-
(i) ईरान
(ii) बीदर
(iii) 1565
(iv) विजय नगर
(v) नायक।

3. सही/ग़लत कथन

(i) कृष्णदेव राय बाहमनी वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था।(✗)
(ii) विजयनगर के शासक बड़े कला प्रेमी थे। ( ✓ )
(iii) गुलबर्गा में फ़िरोज़शाह का मकमरा बाहमनी वंश की देन है। ( ✓ )
(iv) गोलकुण्डा के कुतुबशाही शासकों द्वारा बनाई गई प्रसिद्ध इमारत हैदराबाद स्थित चार मीनार है।( ✓ )
(v) महमूद गावाँ विजयनगर के शासक देवराय का प्रधानमन्त्री था। (✗)

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4. बहु-विकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न (i)
गोल गुम्बज स्थित है-
(A) हैदराबाद में
(B) बीजापुर में
(C) बीकानेर में
(D) जयपुर में।
उत्तर-
(B) बीजापुर में

प्रश्न (ii)
विजयनगर राज्य में प्रचलित कुप्रथा थी
(A) सती प्रथा
(B) वेश्यावृत्ति
(C) पशु बलि
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न (iii)
विजयनगर राज्य का राजवंश नहीं था
(A) संगम
(B) सल्लु व
(C) पल्लव
(D) तल्लु व।
उत्तर-
(C) पल्लव

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प्रश्न (iv)
‘गोल गुम्बज’ मकबरा है
(A) आदिलशाह का
(B) शेरशाह सूरी का
(C) कुतुबशाह का
(D) हुसैन बेग का।
उत्तर-
(A) आदिलशाह का

प्रश्न (v)
विजयनगर राज्य में सिक्के प्रचलित थे
(A) ताँबे के
(B) सोने-चाँदी के
(C) पीतल के
(D) इस्पात के।
उत्तर-
(B) सोने-चाँदी के

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
13वीं सदी में दक्षिण के चार प्रमुख राजवंशों के नाम बताएं।
उत्तर-
13वीं सदी में दक्षिण के चार प्रमुख राजवंश थे-देवगिरि के यादव, वारंगल के काकतीय, द्वारसमुद्र के होयसाल ल तथा मदुरई के पाण्डेय।

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प्रश्न 2.
देवगिरि के राजवंश के दो शासकों के नाम बताएं।
उत्तर-
देवगिरि पर यादव वंश का राज्य था। इस वंश के दो शासक थे-रामदेव तथा हरपाल देव।

प्रश्न 3.
ग्यासुद्दीन तुग़लक के समय वारंगल तथा द्वारसमुद्र के शासकों के नाम बताएं।
उत्तर-
ग्यासुद्दीन तुग़लक के समय वारंगल का शासक प्रताप रुद्र द्वितीय तथा द्वारसमुद्र का शासक बल्लाल तृतीय था।

प्रश्न 4.
कम्पिली की स्थापना किसने और किस नदी के इर्द-गिर्द के क्षेत्र में की थी ?
उत्तर-
कम्पिली की स्थापना कम्पिल देव ने की थी। इसकी स्थापना तुंगभद्रा नदी के इर्द-गिर्द के क्षेत्र में की गई थी।

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प्रश्न 5.
मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय में दक्षिण में स्वतन्त्र होने वाले दो राज्यों तथा उनके संस्थापकों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय में दक्षिण में स्वतन्त्र होने वाले दो राज्य थे- विजयनगर तथा बाहमनी राज्य। विजयनगर राज्य के संस्थापक हरिहर तथा बुक्का और बाहमनी राज्य का संस्थापक हसन गंगू था।

प्रश्न 6.
दौलताबाद के अधिकारियों के गिरोह को क्या कहा जाता था और उन्होंने किस वर्ष में एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की ?
उत्तर-
दौलताबाद के अधिकारियों के गिरोह का नाम ‘अमीरान-ए-सदाह’ था। उन्होंने 1347 ई० में स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया।

प्रश्न 7.
बाहमनी साम्राज्य की दो राजधानियों के नाम बताएं।
उत्तर-
बाहमनी साम्राज्य की दो राजधानियों के नाम क्रमश: गुलबर्गा तथा बीदर थे।

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प्रश्न 8.
लम्बे समय तक राज्य करने वाले किन्हीं चार बाहमनी सुल्तानों के नाम बताएं। …
उत्तर-
लम्बे समय तक राज्य करने वाले चार बाहमनी सुल्तान मुहम्मद प्रथम (1358-77 ई०), मुहम्मद द्वितीय (137897 ई०), फिरोज़शाह (1397-1422 ई) तथा अहमदशाह (1422-35 ई०) थे।

प्रश्न 9.
बाहमनी सल्तनत के सबसे योग्य मन्त्री का नाम क्या था और वह किस देश से आया था ?
उत्तर-
बाहमनी सल्तनत का सबसे योग्य मन्त्री ‘महमूद गवाँ’ था। वह ईरान से आया था।

प्रश्न 10.
बाहमनी सल्तनत के प्रशासनिक भागों तथा उसके प्रशासकों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
बाहमनी सल्तनत के प्रशासनिक भागों को ‘तरफ’ तथा इसके प्रशासकों के ‘तरफदार’ कहा जाता था।

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प्रश्न 11.
बाहमनी सल्तनत में शासक वर्ग कौन-से दो गुटों में बंट गए थे ?
उत्तर-
बाहमनी सल्तनत में शासक वर्ग ‘विदेशी अमीर’ तथा ‘दक्कनी अमीर’ नामक दो गुटों में बंट गए थे।

प्रश्न 12.
महमूद शाह के शासन काल में बाहमनी साम्राज्य जिन पांच राज्यों में बंट गया, उनके नाम बताएं।
उत्तर-
महमूद शाह के शासनकाल में बाहमनी साम्राज्य बीजापुर, गोलकुण्डा, अहमदनगर, बरार तथा बीदर नामक राज्यों में बंट गया।

प्रश्न 13.
बाहमनी साम्राज्य के उत्तराधिकारी सल्तनतों के संस्थापकों के नाम बताएं।
उत्तर-
बाहमनी साम्राज्य के उत्तराधिकारी सल्तनतों के संस्थापक थे-मलिक अहमद (अहमद नगर), आदिल खां (बीजापुर), फतहउल्ला इमाद-उल-मुल्क (बरार), कुतुब-उल-मुल्क (गोलकुण्डा) तथा कासिम बरीद (बीदर)।

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प्रश्न 14.
दक्कन की पांच सल्तनतों में से दो सबसे शक्तिशाली तथा दो सबसे छोटे राज्यों के नाम बताएं।
उत्तर-
दक्कन की पाँच सल्तनतों में से दो सबसे शक्तिशाली सल्तनतें ‘बीजापुर’ तथा ‘गोलकुण्डा’ थीं। इनमें से दो सबसे छोटे राज्य ‘बरार’ और ‘बीदर’ थे।

प्रश्न 15.
बरार तथा बीदर को किन वर्षों में दक्कन की कौन-सी अन्य दो सल्तनतों ने हड़प लिया ?
उत्तर-
1574 ई० में अहमद नगर के सुल्तान ने बरार को अपने अधिकार में ले लिया तथा 1619 ई० में बीजापुर के सुल्तान ने बीदर को हड़प लिया।

प्रश्न 16.
औरंगजेब ने किन वर्षों में दक्कन की कौन-सी दो सल्तनतों को मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया ?
उत्तर-
औरंगज़ेब ने 1686-87 में दक्षिण की बीजापुर और गोलकुण्डा रियासतों को मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया।

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प्रश्न 17.
दक्षिण में ‘सामन्तों’ तथा ‘चौधरियों’ के स्थान पर किन नामों का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर-
दक्षिण में सामन्तों को ‘नायक’ तथा चौधरियों को ‘देशमुख’ और ‘देसाई’ कहा जाता था।

प्रश्न 18.
कौन-से दो नगर बाहमनी भवन निर्माण कला के केन्द्र थे ?
उत्तर-
गुलबर्गा और बीदर बाहमनी भवन निर्माण कला के केन्द्र थे ।

प्रश्न 19.
बाहमनी सल्तनत के भवनों में किन चार प्रकार के नमूने मिलते हैं ?
उत्तर-
बाहमनी सल्तनत के भवनों में पुरानी मस्जिदों, मकबरों, मदरसों और महलों के नमूने मिलते हैं।

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प्रश्न 20.
गोल गुम्बज कहां हैं और यह कौन-से सुल्तान का मकबरा है तथा यह कितने क्षेत्र में फैला हुआ है ?
उत्तर-
गोल गुम्बज बीजापुर में है। यह आदिलशाह का मकबरा है जो 2000 वर्ग गज़ के क्षेत्र में फैला हुआ है।

प्रश्न 21.
कुतुबशाही सुल्तानों ने कौन-से चार प्रकार के भवन बनवाए तथा उनके द्वारा बनवाई गई हैदराबाद की सबसे शानदार इमारत कौन-सी है ?
उत्तर-
कुतुबशाही सुल्तानों ने किले, महल, पुस्तकालय और मस्जिदें बनवाई। उनके द्वारा बनवाई गई हैदराबाद की शानदार इमारत ‘चारमीनार’ है।।

प्रश्न 22.
विजयनगर साम्राज्य के चार राजवंशों के नाम बताएं।
उत्तर-
विजयनगर साम्राज्य के चार राजवंश थे-‘संगम’, ‘सल्लुव’, ‘तल्लुव’ तथा ‘अरविंदु’।

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प्रश्न 23.
विजयनगर शहर किस नदी के किनारे बसाया गया तथा उसका संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
विजयनगर शहर तुंगभद्रा नदी के किनारे बसाया गया। इसके संस्थापक हरिहर और बुक्का नामक दो भाई थे।

प्रश्न 24.
विजयनगर साम्राज्य के विस्तार तथा उन्नति से सम्बन्धित दो राजवंशों के नाम बताएं।
उत्तर-
विजयनगर साम्राज्य के विस्तार तथा उन्नति से सम्बन्धित दो राजवंश हैं-‘संगम वंश’ तथा ‘सल्लव वंश’ ।

प्रश्न 25.
विजयनगर के पहले राजवंश के चार सबसे योग्य शासकों के नाम बताएं।
उत्तर-
पहले राजवंश (संगम वंश) के चार योग्य शासक बुक्का (1357-77 ई०), हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई०), देवराय (1406-22 ई०) तथा देवराय द्वितीय (1422-46 ई०) थे।

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प्रश्न 26.
विजयनगर तथा बाहमनी राज्य में झगड़ा मुख्यतः किस प्रदेश के कारण था और यह कौन-सी नदियों के बीच स्थित है ?
उत्तर-
विजयनगर तथा बाहमनी राज्यों में झगड़ा मुख्यत: उसके सीमावर्ती रायचूर दोआब पर अधिकार के कारण था। यह प्रदेश कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित है।

प्रश्न 27.
विजयनगर साम्राज्य का पुनर्निर्माण तथा पतन किन दो राजवंशों से सम्बन्धित है ?
उत्तर-
विजयनगर साम्राज्य का पुनर्निर्माण तथा पतन तल्लुव वंश तथा अरविंदु वंश से सम्बन्धित है।

प्रश्न 28.
विजयनगर राज्य का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था और वह कौन-से वंश से था ?
उत्तर-
विजयनगर का सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्ण देवराय था। वह तल्लुव राजवंश से सम्बन्धित था।

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प्रश्न 29.
कृष्णदेव राय का राजकाल क्या था और उसने बाहमनी सल्तनत के किन दो नगरों पर अधिकार कर लिया था ?
उत्तर-
कृष्णदेव राय का शासनकाल 1509 से 1529 ई० तक था। उसने गुलबर्गा और बीदर पर अपना अधिकार कर लिया था।

प्रश्न 30.
तालीकोटा का युद्ध कब और किन के बीच हुआ ? इसमें हारने वाले राज्य का नाम बताएं।
उत्तर-
तालीकोटा का युद्ध 1565 ई० में दक्षिण के सुल्तानों के संगठन तथा विजयनगर के शासक सदाशिव राय के बीच हुआ। इसमें विजयनगर की हार हुई।

प्रश्न 31.
अरविंदु वंश के राजकाल में कौन-से तीन प्रदेशों के नायक स्वतन्त्र हो गए थे ?
उत्तर-
अरविंदु वंश के राजकाल में मदुरई, तंजौर तथा जिंजी प्रदेशों के नायक स्वतन्त्र हो गए थे।

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प्रश्न 32.
विजयनगर के प्रशासन में सबसे महत्त्वपूर्ण तीन विभाग कौन-से थे ?
उत्तर-
विजयनगर के प्रशासन में सबसे महत्त्वपूर्ण तीन विभाग सेना, राजस्व और धर्मार्थ विभाग थे।

प्रश्न 33.
विजयनगर साम्राज्य में नायकों की संख्या क्या थी और वे सम्राट् को अधीनता के प्रतीक के रूप में क्या देते थे ?
उत्तर-
विजयनगर साम्राज्य में नायकों की संख्या 200 से भी अधिक थी। वे सम्राट् को अधीनता के प्रतीक के रूप में नज़राना तथा युद्ध के समय सैनिक सहायता देते थे।

प्रश्न 34.
विजयनगर साम्राज्य में अधिकारियों को वेतन किस रूप में दिया जाता था ?
उत्तर-
विजयनगर साम्राज्य में अधिकारियों को वेतन ‘जागीर’ के रूप में दिया जाता था।

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प्रश्न 35.
विजयनगर साम्राज्य में भूमि से इकट्ठा किए जाने वाले लगान की अधिकतम तथा न्यूनतम में क्या थीं ?
उत्तर-
विजयनगर साम्राज्य में भूमि से कर इकट्ठा किए जाने वाले लगान की न्यूनतम दर उपज का छठा भाग तथा अधिकतम दर उपज का आधा भाग थी।

प्रश्न 36.
विजयनगर साम्राज्य से सम्बन्धित मन्दिर किन चार नगरों में देखे जा सकते हैं ?
उत्तर-
विजयनगर साम्राज्य से सम्बन्धित मन्दिर वैलोर, विजयनगर शहर, काँचीपुरम तथा श्रीरंगपट्टम में देखे जा सकते

प्रश्न 37.
मराठी, कन्नड़, तमिल तथा मलयालम किन चार राज्यों तथा प्रदेशों की मुख्य भाषाएं थीं ? ये प्रदेश वर्तमान के कौन-से चार राज्यों में हैं ?
उत्तर-
अहमद नगर में मराठी, बीजापुर में कन्नड़, विजयनगर में तमिल तथा सुदूर दक्षिण में मलयालम भाषाएं बोली जाती थीं। ये प्रदेश वर्तमान भारत में क्रमश: महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल राज्यों में हैं।

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III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न-

प्रश्न 1.
बाहमनी साम्राज्य के विघटन में प्रशासनिक व्यवस्था तथा शासक वर्ग का क्या हाथ था ?
उत्तर-
बाहमनी राज्य के पतन की प्रक्रिया में यों तो अनेक कारणों का हाथ रहा, परन्तु प्रशासनिक व्यवस्था के गलत संगठन तथा शासक वर्ग के विवेकहीन कार्यों से इस राज्य का पतन बड़ी तीव्रता से होने लगा। बाहमनी शासक अपनी अविवेकपूर्ण नीति के कारण शासन को संगठित एवं स्थायी रूप प्रदान करने में असफल रहे। फलस्वरूप अमीरों के आपसी मतभेद काफ़ी बढ़ गए। दूसरे, सुल्तानों ने हिन्दुओं के प्रति असहनशीलता की नीति अपनाई जिससे राज्य की बहुसंख्यक हिन्दू जनता आरम्भ से ही बाहमनी शासकों के विरुद्ध हो गई। बाहमनी शासकों ने देशी अमीरों की अपेक्षा विदेशी अमीरों पर अधिक विश्वास किया। अतः उनके अपने यहां अनेक अमीरों में आपसी शत्रुता पैदा हो गई। दूसरे, महमूद गवां को छोड़कर अन्य किसी भी अमीर ने राजभक्ति न दिखाई। अतः बाहमनी सुल्तानों को न तो देशी अमीरों का ही साथ मिल सका और न ही विदेशी अमीरों का। यह बात भी बाहमनी शासकों की असफलता का कारण बनी और बाहमनी राज्य का पतन तीव्रता से होने लगा।

प्रश्न 2.
बाहमनी सल्तनत तथा उत्तराधिकारी राज्यों के अधीन कला तथा भवन निर्माण कला की मुख्य विशेषताएं क्या थीं?
उत्तर-
बाहमनी शासकों ने चित्रकला तथा भवन निर्माण कला के विकास में बड़ा योगदान दिया। इस समय की चित्रकारी के सर्वोत्तम नमूने अलाऊद्दीन द्वितीय द्वारा बनवाए गए अहमदशाह के मकबरे की छत और दीवारों पर मिलते हैं। बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला के मुख्य केन्द्र गुलबर्गा तथा बीदर हैं। इन स्थानों पर अनेक आकर्षक मस्जिदें, मकबरे, मदरसे तथा महल मिलते हैं। ये इमारतें पुरानी शैली तथा फारसी शैली में बनाई गई हैं। गुलबर्गा में फिरोजशाह का मकबरा बाहमनी राज्य की भवन निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है। बीजापुर के आदिलशाही शासकों के समय में बीजापुर अपनी सुन्दर इमारतों के लिए सारे भारत में प्रसिद्ध हो गया। यहां का गोल गुम्बज और इब्राहीम रोजा भवन निर्माण कला के सबसे सुन्दर नमूने हैं। गोलकुण्डा के कुतुबशाही शासकों ने भी भवन निर्माण कला के विकास में अपना विशेष योगदान दिया। उनकी सबसे प्रसिद्ध इमारत हैदराबाद में स्थित चारमीनार है।

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प्रश्न 3.
विजयनगर साम्राज्य की उन्नति में कृष्णदेव राय का क्या योगदान था ?
उत्तर-
कृष्णदेव राय तुल्लुव वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा था। उसने 1509 ई० से 1529 ई० तक शासन किया। वह एक महान् योद्धा था। उसने मैसूर (कर्नाटक) के कुछ भाग को विजित किया तथा उड़ीसा के राजा को हरा कर काफ़ी लूट का माल प्राप्त किया। उसने बीजापुर के आदिलशाह से युद्ध करके रायचूर दोआब छीन लिया। उसके द्वारा बीजापुर की विजय से दक्षिण के मुस्लिम राज्यों के शासक इतने भयभीत हो उठे कि उन्हें उसके जीवन काल में फिर विजयनगर पर आक्रमण करने का कभी साहस न हुआ। कृष्णदेव राय एक महान् शासक प्रबन्धक भी था। उसने धार्मिक सहनशीलता की नीति अपनाई तथा देश की अर्थव्यवस्था में सुधार किया। इस प्रकार विजयनगर एक समृद्ध राज्य बन गया।

प्रश्न 4.
विजयनगर के राज्य प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएं क्या थी ?
उत्तर-
विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट् था। उसके पास असीम शक्तियां तथा अधिकार थे। अपनी सहायता के लिए उसने एक मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। इसमें मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि सम्मिलित थे। इनकी नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था। उसका सारा राज्य लगभग 200 प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त का शासन प्रबन्ध एक प्रान्तपति के हाथ में होता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्धित होते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर होते थे। प्रत्येक प्रान्त को जिलों में बांटा गया था। इन्हें नाडू तथा कोट्टम कहा जाता था। जिले परगनों में तथा परगने गांवों में बंटे होते थे। गांव का शासन प्रबन्ध ग्राम पंचायतों को सौंपा हुआ था। इन सभी संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी को आयगर कहा जाता था। न्याय का मुख्य अधिकारी स्वयं सम्राट् था। दण्ड बड़े कठोर थे। राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि कर था। विजयनगर राज्य के शासकों के पास एक शक्तिशाली सेना भी थी।

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प्रश्न 5.
बाहमनी राज्य के पतन के कारण बताओ।
उत्तर-
बाहमनी राज्य के पतन में अनेक तत्त्वों का हाथ था। प्रथम, बाहमनी शासक असहनशील थे। उन्होंने हिन्दुओं के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया। दूसरे, बाहमनी शासक सदा अपने पड़ोसी राज्यों के साथ लड़ते-झगड़ते रहते थे। इन युद्धों से बाहमनी वंश की शक्ति कम हो गई। तीसरे, अधिकतर बाहमनी शासक विलासी थे। वे राज कार्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे। चौथे, बाहमनी राज्य का अन्तिम शासक महमूदशाह बड़ा ही अयोग्य था। उसकी अयोग्यता का लाभ उठाकर प्रान्तीय गवर्नरों ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। पांचवें, महमूद गावां को फांसी दिए जाने से बाहमनी राज्य को सबसे अधिक क्षति पहुंची और इस राज्य का पतन हो गया।

प्रश्न 6.
विजयनगर राज्य के पतन के कारण बताओ।
उत्तर-

  1. इस राज्य की सारी शक्ति राजा के हाथ में थी। शासन में प्रजा का कोई योगदान नहीं था। इसलिए संकट के समय प्रजा ने अपने राजा का साथ न दिया।
  2. इस राज्य में सिंहासन प्राप्ति के लिए प्रायः गृह-युद्ध चलते रहते थे। इन युद्धों ने राजा की शक्ति नष्ट कर दी।
  3. कृष्णदेव राय के पश्चात् ३५ गज्य के सभी शासक निर्बल थे।
  4. विजयनगर राज्य को बाहमनी राज्य के शासकों के साथ युद्ध करने पड़े। इन युद्धों में विजयनगर राज्य की शक्ति को बड़ी क्षति पहुंची।
  5. तालीकोट की लड़ाई में विजयनगर का शासक मारा गया। इस लड़ाई के तुरन्त पश्चात् इस का पूरी तरह पतन हो गया।

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प्रश्न 7.
आप विजयनगर राज्य की कला और भवन निर्माण कला के विषय में क्या जानते हैं ?
उत्तर-
विजयनगर के शासक बड़े ही कला-प्रेमी थे। उन्होंने मूर्ति कला और भवन निर्माण कला को विशेष रूप से संरक्षण प्रदान किया। चोल राज्य की भान्ति विजयनगर के मूर्तिकार भी कांसे की मूर्तियां ढालने में बड़े निपुण थे। राजा कृष्णदेव राय का कांसे का बुत विजयनगर राज्य की मूर्ति कला का सबसे सुन्दर नमूना है। विजयनगर कला भवन निर्माण की झलक हमें उनके द्वारा बनवाये गए दुर्गों, भव्य महलों और सुन्दर मन्दिरों में दिखाई देती है। यहां के शासकों ने अनेक प्राचीन मन्दिरों को विशाल रूप दिया और कई नए मन्दिरों का निर्माण करवाया। उनके द्वारा बनवाए गए मन्दिर केवल विजयनगर तक ही सीमित नहीं हैं। ये तुंगभद्रा नदी के दक्षिण के सारे प्रदेश में बने हुए हैं। इन मन्दिरों के उत्कृष्ट नमूने वैलोर, कांचीपुरम तथा श्रीरंगापट्टम में देखे जा सकते हैं। कृष्णदेव राय ने विजयनगर के निकट एक बहुत बड़ा तालाब भी खुदवाया जो सिंचाई के काम आता था।

प्रश्न 8.
14वीं शताब्दी के अन्त से लेकर 17वीं शताब्दी के आरम्भ तक दक्षिण में कौन-सी नई भाषाओं और साहित्य का विकास हुआ ?
उत्तर-
14वीं शताब्दी के अन्त से 17वीं शताब्दी के आरम्भ तक दक्षिण में अनेक प्रादेशिक भाषाओं तथा साहित्य का विकास हुआ। गोलकुण्डा के सुल्तानों ने तेलगू भाषा और तेलगू साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। उनके राज्य की सीमाएं लगभग वहीं थीं जो तेलगू-भाषी क्षेत्र की थीं। इसके विपरीत अन्य राज्यों की सीमाएं भले ही उन राज्यों में विकसित भाषाओं से सम्बन्धित क्षेत्र से मेल नहीं खाती थीं तो भी यहां के शासकों ने अलग-अलग भाषाओं के विकास में सहायता पहुंचाई। अहमदनगर में मराठी, बीजापुर में कन्नड़, विजयनगर में तमिल तथा सुदूर दक्षिण में मलयालम भाषा ने खूब उन्नति की। इन प्रादेशिक भाषाओं के साथ-साथ प्रादेशिक साहित्य का विकास भी हुआ। इस साहित्य के विकास में शासकों की अपेक्षा भक्ति लहर के अनुयायियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। इसका कारण यह था कि भक्ति लहर के प्रचारकों ने अपने सन्देश के प्रचार के लिए जन-साधारण की भाषाओं को ही अपनाया।

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प्रश्न 9.
महमूद गावां पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर-
महमूद गावां बाहमनी शासक मुहम्मद शाह तृतीय का प्रधानमन्त्री था। उसने बाहमनी राज्य को बहुत ही शक्तिशाली बनाया। उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक कार्य किये। उसने कोंकण, संगमेश्वर, उड़ीसा और विजयनगर के शासकों को हराया। उसने सेना को फिर से संगठित किया और किसानों की कई प्रकार से सहायता की। वह विद्वानों तथा कलाकारों का आदर करता था। वह स्वयं भी बड़ा विद्वान् और योग्य व्यक्ति था। इतना कुछ करने पर भी महमूद गावां का अन्त बड़ा दुःखद था। बाहमनी शासक मुहम्मद शाह तृतीय ने उसके शत्रुओं के बहकावे में आकर उसे मृत्यु दण्ड दे दिया।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर राज्य के शासन प्रबन्ध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-
विजयनगर राज्य के शासन प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताओं का विवरण इस प्रकार है
1. सम्राट्-विजयनगर के केन्द्रीय शासन का मुखिया सम्राट होता था। उसके पास असीम शक्तियाँ तथा अधिकार होते थे। अपनी सहायता के लिए उसने एक मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। परन्तु उसका कार्य केवल सम्राट को परामर्श देना होता था।

2. मन्त्रिपरिषद्-अपनी सहायता तथा परामर्श के लिए सम्राट ने मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की हुई थी। इसमें मन्त्री, पुरोहित, सेनापति आदि सम्मिलित होते थे। इन सभी सदस्यों की नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था।

3. प्रान्तीय शासन-विजयनगर राज्य लगभग 200 प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त का प्रबन्ध एक प्रान्तपति के हाथ में होता था। ये प्रान्तपति या तो राज घराने से सम्बन्धित होते थे या फिर कोई शक्तिशाली अमीर (Nobles) होते थे। इनकी नियुक्ति भी सम्राट् स्वयं करता था।

4. स्थानीय शासन-शासन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पान्द को जिलों में बांटा गया था। ज़िले आगे परगनों में तथा परगने गाँवों में बँटे होते थे। गाँव का शासन प्रबन्ध ग्राम पंचायतों को सौंपा हुआ था। इन सभी संस्थाओं के प्रमुख अधिकारी को आयंगर कहा जाता था।

5. सैनिक संगठन-विजयनगर का बाहमनी सुल्तानों के साथ निरन्तर संघर्ष चलता रहता था। अतः यहाँ के शासकों को अपने सैनिक संगठन की ओर विशेष ध्यान देना पड़ा।
विजयनगर राज्य की सेना दो प्रकार की थी। प्रान्तीय सेना तथा केन्द्रीय सेना। सेना में हाथी, घोड़े तथा पैदल सैनिक होते थे। अश्वारोही सेना का प्रमुख अंग थे।

6. न्याय-प्रणाली-विजयनगर राज्य में सम्राट् मुख्य न्यायाधीश का कार्य करता था। गाँवों में आयंगर तथा प्रान्तों में प्रान्तपति अथवा सूबेदार न्याय कार्य करते थे। दण्ड बड़े कठोर थे और गम्भीर अपराधों के लिए अंग-भंग का दण्ड दिया जाता था, परन्तु साधारण अपराधों पर जुर्माना किया जाता था।

7. भूमि कर प्रणाली-विजयनगर राज्य की समस्त भूमि का स्वामी सम्राट होता था। वह इसे आगे भूमिपतियों में तथा भूमिपति इसे किसानों में बाँट देते थे। किसानों की उपज का 1/6 से 1/4 भाग कर के रूप में भूमिपति को देना पड़ता था। किसानों की आर्थिक अवस्था बड़ी अच्छी थी। उन्हें जीवन का प्रत्येक सुख प्राप्त था।

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प्रश्न 2.
विजयनगर राज्य की सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का वर्णन करो।
उत्तर-
विजयनगर की सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का वर्णन निम्नलिखित है

I. सामाजिक अवस्था-
1. ब्राह्मणों का मान-विजयनगर राज्य में ब्राह्मणों को बड़ा सम्मान प्राप्त था। उन्हें राज्य में उच्च पद प्राप्त थे। अपराधी होने पर भी उन्हें मृत्यु दण्ड नहीं दिया जा सकता था। उनका जीवन बड़ा पवित्र होता था। वे शाकाहारी होते थे तथा माँस, मदिरा आदि को छूते तक न थे। इस प्रकार ब्राह्मण लोग अन्य वर्गों के लोगों के लिए एक आदर्श थे।

2. नारी का स्थान-विजयनगर में नारी का भी बड़ा सम्मान था। योग्यता होने पर वे उच्च शिक्षा भी ग्रहण कर सकती थीं। उनमें पर्दे का रिवाज नहीं था। स्त्रियों को युद्ध-कला और ललित-कलाओं भी भी शिक्षा दी जाती थी।

3. कुप्रथाएँ-विजयनगर का समाज कुप्रथाओं से वंचित नहीं था। उस समय देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशु बलि दी जाती थी। समाज में सती प्रथा भी जोरों पर थी। यहाँ तक कि तेलगू स्त्रियों को अपने पति की मृत्यु पर धरती में जीवित गाड़ दिया जाता था। इसके अतिरिक्त राज्य में वेश्याओं की भी कमी नहीं थी। देवराज द्वितीय की 12 हज़ार रानियाँ थीं। इनमें से तीन हजार के साथ तो उसने केवल इस शर्त पर विवाह किया था कि वे उसकी मृत्यु के बाद उसके साथ सती होंगी।

II. आर्थिक दशा-

विजयनगर की आर्थिक अवस्था बड़ी उन्नत थी। यहाँ की धरती उपजाऊ थी। परिणामस्वरूप आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार खूब विकसित थे। उनके पुर्तगालियों से अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध थे। अरबी घोड़ों का भी व्यापार खूब होता था। विजयनगर के समुद्री तटों पर अच्छी-अच्छी बन्दरगाहें थीं। कालीकट यहाँ की प्रमुख बन्दरगाह थी। यहाँ से बर्मा, चीन, ईरान, अरब, पुर्तगाल तथा दक्षिणी अफ्रीका के साथ देश का व्यापार चलता था। इस बन्दरगाह से कपड़ा, चावल, चीनी, लोहा, गर्म मसाले तथा शोरा विदेशों में भेजा जाता था और वहां से घोड़े, हाथी, ताँबा, जवाहरात तथा रेशम आदि का आयात किया जाता था। व्यापारियों ने अपने संघ स्थापित किए हुए थे। लेन-देन की सुविधा के लिए अनेक सोने-चांदी के सिक्के प्रचलित थे। व्यापार के साथ-साथ देश में कृषि तथा अन्य उद्योग-धन्धे भी काफ़ी उन्नत थे। कपड़ा बुनना, खानों से खनिज निकालना, धातुओं की वस्तुएँ बनाना तथा इत्र निकालना उस समय के लोगों के प्रमुख उद्योग थे।

II. सांस्कृतिक जीवन विजयनगर के हिन्दू शासकों ने हिन्दू संस्कृति तथा कला के विकास की ओर भी विशेष ध्यान दिया। कई विद्वानों तथा साहित्यकारों को इन राजाओं ने आश्रय प्रदान कर रखा था। संस्कृत तथा तेलगू के कई विद्वान् इन शासकों के दरबार की शोभा बढ़ाते थे। इन विद्वानों में से सयन का नाम लिया जा सकता था जिसने ऋग्वेद संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण तथा आरण्यक आदि ग्रन्थों की टीकाएँ लिखीं। इसके अतिरिक्त तेलगू भाषा का अलसनी कवि भी विजयनगर के राजदरबार की शोभा था।

साहित्य के साथ-साथ विजयनगर के शासकों को कला से भी विशेष प्रेम था। भवन निर्माण कला के प्रति उनके प्रेम के दर्शन हमें विजयनगर की राजधानी में बने भव्य भवनों को देखकर होते हैं जिसके अब अवशेष ही रह गए हैं।

सच तो यह है कि विजयनगर साम्राज्य की शासन व्यवस्था उच्चकोटि की थी। लोगों का जीवन समृद्ध था, समाज उच्च आदर्शों में ढला हुआ था तथा कलाएँ उन्नति की चरम सीमा पर थीं।

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प्रश्न 3.
बाहमनी राज्य की शासन-व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
बाहमनी शासकों ने अपने राज्य में कुशल शासन प्रणाली स्थापित करने का भी प्रयास किया। उनकी शासनव्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है

I. केन्द्रीय सरकार-

सुल्तान-बाहमनी वंश के प्रथम शासक अलाउद्दीन बहमनशाह ने गुलबर्गा को अपनी राजधानी बनाते समय केन्द्रीय सरकार की स्थापना की। केन्द्रीय सरकार का मुखिया सुल्तान था। वह राज्य की सारी शक्ति का स्रोत था। उसके अधिकार काफ़ी विस्तृत थे। वह राज्य का मुख्य न्यायाधीश और सेना का मुख्य सेनापति था। वास्तव में, सुल्तान पूर्ण रूप से निरंकुश था और स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर की छाया मानता था।

मन्त्री-सुल्तान को शासन कार्यों में परामर्श तथा सहयोग देने के लिए कुछ मन्त्री होते थे। इन मन्त्रियों की संख्या आठ थी। प्रधानमन्त्री को ‘वकील उल-सुल्तान’ कहते थे। राज्य के सभी आदेश वही जारी करता था। प्रत्येक सरकारी पत्र पर उसकी मोहर का होना आवश्यक था। न्याय विभाग का मन्त्री सदर-ए-जहां’ कहलाता था। वह धर्मार्थ विभाग का भी अध्यक्ष था। मन्त्री अपने सभी कार्य सुल्तान की आज्ञा से करते थे और अपने कार्यों के लिए उसी के प्रति उत्तरदायी होते थे। इन आठ मन्त्रियों के अतिरिक्त कुछ निम्न स्तरों के मन्त्री भी थे जिनमें कोतवाल तथा नाजिर प्रमुख थे।

II. प्रान्तीय शासन-

बाहमनी सुल्तानों ने शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए राज्य को कई भागों तथा उपभागों में विभक्त किया हुआ था। शासन की प्रमुख इकाई प्रान्त अथवा तर्फ थी। ‘तर्फ’ को आगे चल कर सरकारों तथा परगनों में बांटा गया था। प्रत्येक परगने में कुछ गांव सम्मिलित होते थे।

प्रारम्भ में बाहमनी राज्य चार तर्कों में विभक्त था-गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार तथा बीदर। बाद में इनकी संख्या आठ हो गई। तर्क का मुखिया तर्कदार कहलाता था। वह अनेक कार्य करता था। प्रान्त में राजस्व कर एकत्रित करवाना, सैनिक भर्ती करना, सेना का नेतृत्व करना आदि उसके प्रमुख कार्य थे। वह पूर्णरूप से सुल्तान के अधीन था और सभी कार्य उसी की आज्ञा से करता था। उसके कार्यों का निरीक्षण करने के लिए सुल्तान स्वयं भी समय-समय पर तर्कों का दौरा किया करता था।
परगनों का शासन प्रबन्ध चलाने के लिए कई कर्मचारी नियुक्त थे। वे भी अपने सभी कार्य सुल्तान के आदेश द्वारा करते थे।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 7 रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions History Chapter 7 रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 7 रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध

SST Guide for Class 10 PSEB रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द/एक पंक्ति (1-15 शब्दों) में लिखो

प्रश्न 1.
रणजीत सिंह का जन्म कब हुआ ? उसके पिता का क्या नाम था?
उत्तर-
रणजीत सिंह का जन्म 13 नवम्बर, 1780 को हुआ। उसके पिता का नाम सरदार महा सिंह था।

प्रश्न 2.
महताब कौर कौन थी?
उत्तर-
महताब कौर रणजीत सिंह की पत्नी थी।

प्रश्न 3.
‘तिकड़ी की सरपरस्ती’ का काल किसे कहा जाता है?
उत्तर-
यह वह काल था (1792 ई० से 1797 ई० तक) जब शुकरचकिया मिसल की बागडोर रणजीत सिंह की सास सदा कौर, माता राज कौर तथा दीवान लखपतराय के हाथों में रही।

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प्रश्न 4.
लाहौर के नागरिकों ने रणजीत सिंह को लाहौर पर आक्रमण करने का निमन्त्रण क्यों दिया?
उत्तर-
क्योंकि लाहौर के निवासी वहां के शासन से तंग आ चुके थे।

प्रश्न 5.
भसीन के युद्ध में रणजीत सिंह के खिलाफ कौन-कौन से सरदार थे?
उत्तर-
भसीन की लड़ाई में रणजीत सिंह के विरुद्ध जस्सा सिंह रामगढ़िया, गुलाब सिंह भंगी, साहब सिंह भंगी तथा जोध सिंह नामक सरदार थे।

प्रश्न 6.
अमृतसर तथा लोहगढ़ पर रणजीत सिंह ने क्यों आक्रमण किया?
उत्तर-
क्योंकि अमृतसर सिक्खों की धार्मिक राजधानी बन चुका था तथा लोहगढ़ का अपना विशेष सैनिक महत्त्व था।

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प्रश्न 7.
तारा सिंह घेबा कहां का नेता था?
उत्तर-
तारा सिंह घेबा डल्लेवालिया मिसल का नेता था।

(ख) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 30-50 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
रणजीत सिंह के बचपन तथा शिक्षा के बारे में लिखो।
उत्तर-
रणजीत सिंह अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र था। उसे बचपन में बड़े लाड-प्यार से पाला गया। पाँच वर्ष की आयु में उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुजरांवाला में भाई भागू सिंह की धर्मशाला में भेजा गया। परन्तु उसने पढ़ाई-लिखाई में कोई विशेष रुचि न ली। इसलिए वह अनपढ़ ही रहा। वह अपना अधिकतर समय शिकार खेलने, घुड़सवारी करने तथा तलवारबाजी सीखने में ही व्यतीत करता था। अतः वह बचपन में ही एक अच्छा घुड़सवार, तलवारबाज़ तथा कुशल तीरअंदाज़ बन गया था।
बचपन में ही रणजीत सिंह को चेचक के भयंकर रोग ने आ घेरा। इस रोग के कारण उसके चेहरे पर गहरे दाग पड़ गए और उसकी बाईं आँख भी जाती रही।

प्रश्न 2.
रणजीत सिंह के बचपन की बहादुरी की घटनाओं का वर्णन करो।
उत्तर-
बचपन से ही रणजीत सिंह बड़ा वीर था। वह अभी दस वर्ष का ही था जब वह सोहदरा पर आक्रमण करने के लिए अपने पिता जी के साथ गया। उसने न केवल शत्रु को बुरी तरह पराजित किया अपितु उसका गोला-बारूद आदि भी अपने अधिकार में ले लिया। एक बार रणजीत सिंह अकेला घोड़े पर सवार होकर शिकार से लौट रहा था।
उसके पिता के शत्रु हशमत खां ने उसे देख लिया। वह रणजीत सिंह को मारने के लिए झाड़ी में छुप गया। ज्योंही रणजीत सिंह उस झाड़ी के पास से गुज़रा, हशमत खां ने उस पर तलवार से प्रहार किया। वार रणजीत सिंह पर न लगकर रकाब पर पड़ा जिसके उसी समय दो टुकड़े हो गए। बस फिर क्या था, बालक रणजीत सिंह ने ऐसी सतर्कता से हशमत खां पर वार किया कि उसका सिर धड़ से अलग हो गया।

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प्रश्न 3.
रणजीत सिंह के लाहौर पर कब्जे का वर्णन करो।
उत्तर-
लाहौर विजय रणजीत सिंह की सबसे पहली विजय थी। उस समय लाहौर पर भंगी मिसल के सरदार चेत सिंह, मोहर सिंह और साहिब सिंह का अधिकार था। लाहौर के निवासी इन सरदारों के शासन से तंग आ चुके थे। इसलिए उन्होंने रणजीत सिंह को लाहौर पर आक्रमण करने का आमन्त्रण भेजा। रणजीत सिंह ने शीघ्र ही विशाल सेना लेकर लाहौर पर धावा बोल दिया। आक्रमण का समाचार पाकर मोहर सिंह और साहिब सिंह लाहौर छोड़ कर भाग निकले। अकेला चेत सिंह ही रणजीत सिंह का सामना करता रहा, परन्तु वह भी पराजित हुआ। इस प्रकार 7 जुलाई, 1799 ई० को लाहौर रणजीत सिंह के अधिकार में आ गया।

प्रश्न 4.
अमृतसर की जीत (महाराजा रणजीत सिंह द्वारा) का महत्त्व बतलाओ।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह के लिए अमृतसर की जीत का निम्नलिखित महत्त्व था —

  1. वह सिक्खों की धार्मिक राजधानी अर्थात् सबसे बड़े तीर्थ स्थल का संरक्षक बन गया।
  2. अमृतसर की विजय से महाराजा रणजीत सिंह की सैनिक शक्ति बढ़ गई। उसके लिए लोहगढ़ का किला बहुमूल्य सिद्ध हुआ। उसे तांबे तथा पीतल से बनी ज़मज़मा तोप भी प्राप्त हुई।
  3. महाराजा को प्रसिद्ध सैनिक अकाली फूला सिंह तथा उसके 2000 निहंग साथियों की सेवाएं प्राप्त हुईं। निहंगों के असाधारण साहस तथा वीरता के बल पर रणजीत सिंह ने शानदार विजय प्राप्त की।
  4. अमृतसर विजय के परिणामस्वरूप रणजीत सिंह की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। फलस्वरूप ईस्ट इंडिया कम्पनी की नौकरी करने वाले अनेक भारतीय वहां नौकरी छोड़ महाराजा के पास कार्य करने लगे। कई यूरोपियन सैनिक भी महाराजा की सेवा में भर्ती हो गए।

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह ने मित्र मिसलों पर कब तथा कैसे अधिकार किया?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह एक चतुर कूटनीतिज्ञ था। आरम्भ में उसने शक्तिशाली मिसलदारों से मित्रता करके कमज़ोर मिसलों पर अधिकार कर लिया। परन्तु उचित अवसर पाकर उसने मित्र मिसलों को भी जीत लिया। इन मिसलों पर महाराजा की विजय का वर्णन इस प्रकार है —

  1. कन्हैया मिसल-कन्हैया मिसल की बागडोर महाराजा रणजीत सिंह की सास सदा कौर के हाथ में थी। 1821 ई० में रणजीत सिंह ने वदनी को छोड़ कर इस मिसल के सभी प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया।
  2. रामगढ़िया मिसल-1815 ई० में रामगढ़िया मिसल के नेता जोध सिंह रामगढ़िया की मृत्यु हो गई। अतः रणजीत सिंह ने इस मिसल को अपने राज्य में विलीन कर लिया।
  3. आहलूवालिया मिसल-1825-26 ई० में महाराजा रणजीत सिंह तथा फतह सिंह आहलूवालिया के सम्बन्ध बिगड़ गए। परिणामस्वरूप महाराजा ने आहलूवालिया मिसल के सतलुज के उत्तर-पश्चिम में स्थित प्रदेशों पर अधिकार जमा लिया। परन्तु 1827 ई० में रणजीत सिंह की फतह सिंह से पुनः मित्रता हो गई।

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प्रश्न 6.
मुलतान की विजय (महाराजा रणजीत सिंह की) के परिणाम लिखो।
उत्तर-
मुलतान की विजय महाराजा रणजीत सिंह के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण विजय थी। इसके निम्नलिखित परिणाम निकले —

  1. अफ़गान शक्ति की समाप्ति-मुलतान विजय के साथ ही पंजाब में अफ़गान शक्ति का प्रभाव सदा के लिए समाप्त हो गया, क्योंकि रणजीत सिंह ने अफ़गानों की शक्ति को बुरी तरह से नष्ट कर दिया था।
  2. व्यापारिक और सामरिक लाभ-मुलतान विजय से भारत का अफ़गानिस्तान और सिन्ध से व्यापार इसी मार्ग से होने लगा। इसके अतिरिक्त मुलतान का प्रदेश हाथ में आ जाने से रणजीत सिंह की सैन्य क्षमता में काफ़ी वृद्धि हो गई।
  3. आय में वृद्धि-मुलतान विजय से रणजीत सिंह की धन-सम्पत्ति में भी वृद्धि हुई। एक अनुमान के अनुसार मुलतान नगर से रणजीत सिंह को सात लाख रुपये वार्षिक आय होने लगी।
  4. रणजीत सिंह के यश में वृद्धि-मुलतान विजय से रणजीत सिंह का यश सारे पंजाब में फैल गया और सभी उसकी शक्ति का लोहा मानने लगे।

प्रश्न 7.
अटक की लड़ाई का वर्णन करो।
उत्तर-
1813 ई० में रणजीत सिंह तथा काबुल के वज़ीर फतह खां के बीच एक समझौता हुआ। इसके अनुसार रणजीत सिंह ने कश्मीर विजय के लिए 12 हज़ार सैनिक फतह खां की सहायता के लिए भेजने और इसके बदले फतह खां ने उसे जीते हुए प्रदेश तथा वहां से प्राप्त किए धन का तीसरा भाग देने का वचन दिया। इसके अतिरिक्त रणजीत सिंह ने फतह खां को अटक विजय में और फतह खां ने रणजीत सिंह को मुलतान विजय में सहायता देने का वचन भी दिया।
दोनों की सम्मिलित सेनाओं ने मिलकर कश्मीर पर आसानी से विजय प्राप्त कर ली। परन्तु फतह खां ने अपने वचन का पालन न किया। इसलिए रणजीत सिंह ने अटक के शासक को एक लाख रुपये वार्षिक आय की जागीर देकर अटक का प्रदेश ले लिया। फतह खां इसे सहन न कर सका। उसने शीघ्र ही अटक पर चढ़ाई कर दी। अटक के पास हज़रो के स्थान पर सिक्खों और अफ़गानों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में सिक्ख विजयी रहे।

प्रश्न 8.
सिंध के प्रश्न के बारे में बताओ।
उत्तर-
सिंध पंजाब के दक्षिण-पश्चिम में स्थित अति महत्त्वपूर्ण प्रदेश है। यहां के निकटवर्ती प्रदेशों को विजित करने के पश्चात् 1830-31 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने सिंध पर अधिकार करने का निर्णय किया। परन्तु भारत के गवर्नर-जनरल ने महाराजा की इस विजय पर रोक लगाने का प्रयास किया। इस सम्बन्ध में उसने अक्तूबर, 1831 ई० को महाराजा से रोपड़ में भेंट की। परन्तु दूसरी ओर उसने कर्नल पेटिंगर (Col-Pottinger) को सिंध के अमीरों के साथ व्यापारिक संधि करने के लिए भेज दिया। जब रणजीत सिंह को इस बात का पता चला तो उसे बड़ा दुःख हुआ। परिणामस्वरूप अंग्रेज़-सिक्ख सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न होने लगा।

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प्रश्न 9.
शिकारपुर का प्रश्न क्या था?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह 1832 ई० से सिंध के प्रदेश शिकारपुर को अपने आधिपत्य में लेने के लिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में था। यह अवसर उसे मजारी कबीले के लोगों द्वारा लाहौर राज्य के सीमान्त प्रदेशों पर किये जाने वाले आक्रमणों से मिला। रणजीत सिंह ने इन आक्रमणों के लिए सिन्ध के अमीरों को दोषी ठहरा कर शिकारपुर को हड़पने का प्रयत्न किया। शीघ्र ही राजकुमार खड़क सिंह के नेतृत्व में मजारियों के प्रदेश पर अधिकार कर लिया गया। परन्तु जब महाराजा ने सिन्ध के अमीरों से संधि की शर्तों को पूरा करवाने का प्रयास किया, तो अंग्रेज़ गवर्नर जनरल आकलैंड ने उसे रोक दिया। फलस्वरूप महाराजा तथा अंग्रेजों के सम्बन्ध बिगड़ गए।

प्रश्न 10.
फिरोजपुर का मामला क्या था?
उत्तर-
फिरोजपुर नगर सतलुज तथा ब्यास के संगम पर स्थित बहुत ही महत्त्वपूर्ण नगर है। ब्रिटिश सरकार फिरोजपुर के महत्त्व से भली-भान्ति परिचित थी। यह नगर लाहौर के समीप स्थित होने के कारण अंग्रेज़ यहां से न केवल महाराजा रणजीत सिंह की गतिविधियों पर नज़र रख सकते थे अपितु विदेशी आक्रमणों की रोकथाम भी कर सकते थे। अत: अंग्रेज़ सरकार ने 1835 ई० में फिरोज़पुर पर अपना अधिकार कर लिया और तीन वर्ष बाद इसे अपनी स्थायी सैनिक छावनी बना दिया। अंग्रेजों की इस कार्यवाही से महाराजा गुस्से से भर उठा।

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(ग) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 100-120 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
रणजीत सिंह ने कमज़ोर रियासतों को कैसे जीता?
उत्तर-
रणजीत सिंह चतुर राजनीतिज्ञ था। उसने शक्तिशाली मिसलों से मित्रता कर ली। उनकी सहायता से उन्होंने कमज़ोर रियासतों को अपने अधीन कर लिया। 1800 से 1811 ई० तक उसने अग्रलिखित रियासतों पर विजय प्राप्त की-

  1. अकालगढ़ की विजय, 1801 ई०-अकालगढ़ के दल सिंह (रणजीत सिंह के पिता का मामा) तथा गुजरात के साहिब सिंह ने लाहौर पर आक्रमण करने की योजना बनाई। जब इस बात का पता रणजीत सिंह को चला तो उसने अकालगढ़ पर आक्रमण कर दिया और दल सिंह को बंदी बना लिया। बाद में उसे तो छोड़ दिया गया, परन्तु शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गयी। अत: रणजीत सिंह ने अकालगढ़ को अपने राज्य में मिला लिया।
  2. डल्लेवालिया मिसल पर अधिकार, 1807 ई०-डल्लेवालिया मिसल का नेता तारा सिंह घेबा था। जब तक वह जीवित रहा, महाराजा रणजीत सिंह ने इस मिसल पर अधिकार जमाने का कोई प्रयास न किया। परन्तु 1807 ई० में तारा सिंह घेबा की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु का समाचार मिलते ही महाराजा ने राहों पर आक्रमण कर दिया। तारा सिंह घेबा की विधवा ने रणजीत सिंह का सामना किया परन्तु वह पराजित हुई और महाराजा ने डल्लेवालिया मिसल के प्रदेशों को अपने राज्य में मिला लिया।
  3. करोड़सिंधिया मिसल पर अधिकार, 1809 ई०-1809 ई० में करोड़ सिंघिया मिसल के सरदार बघेल सिंह का देहान्त हो गया। उसकी मृत्यु का समाचार मिलते ही महाराजा ने अपनी सेना करोड़सिंघिया मिसल की ओर भेज दी। बघेल सिंह की विधवाएं (राम कौर तथा राज कौर) महाराजा की सेना का अधिक देर तक सामना न कर सकीं। परिणामस्वरूप महाराजा ने इस मिसल के प्रदेशों को अपने राज्य में मिला लिया।
  4. नकई मिसल के प्रदेशों पर विजय, 1810 ई०-1807 ई० में महाराजा की रानी राज कौर का भतीजा काहन सिंह नकई मिसल का सरदार बना। महाराजा ने उसे कई बार अपने दरबार में उपस्थित होने के लिए संदेश भेजा। परन्तु . वह सदैव महाराजा के आदेश की अवहेलना करता रहा। अत: 1810 ई० में महाराजा ने मोहकम चंद के नेतृत्व में उसके विरुद्ध सेना भेज दी। मोहकम चन्द ने जाते ही नकई मिसल के चूनीयां, शक्करपुर, कोट कमालिया आदि प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। काहन सिंह को निर्वाह के लिए 20,000 रु० वार्षिक आय वाली जागीर दे दी गई।
  5. फैजलपुरिया मिसल के इलाकों पर अधिकार, 1811 ई०-1811 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने फैजलपुरिया मिसल के सरदार बुध सिंह को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा। उसके इन्कार करने पर महाराजा ने उसके विरुद्ध अपनी सेना भेज दी। इस सेना का नेतृत्व भी मोहकम चंद ने किया। इस अभियान में फतह सिंह आहलूवालिया तथा जोध सिंह रामगढ़िया ने महाराजा का साथ दिया। बुध सिंह शत्रु का सामना न कर सका और उसने भाग कर अपनी जान बचाई। परिणामस्वरूप फैज़लपुरिया मिसल के जालन्धर, बहरामपुर, पट्टी आदि प्रदेशों पर महाराजा का अधिकार हो गया।

प्रश्न 2.
रणजीत सिंह की कश्मीर की विजय का वर्णन करो।
उत्तर-
कश्मीर की घाटी अपनी सुन्दरता के कारण पूर्व का स्वर्ग’ कहलाती थी। महाराजा रणजीत सिंह इसे विजय करके अपने राज्य को स्वर्ग बनाना चाहता था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने निम्नलिखित प्रयास किए

  1. काबुल के वजीर फतह खां से समझौता-1811-12 ई० में सिक्खों ने कश्मीर के निकट स्थित भिंबर तथा राजौरी की रियासतों पर अधिकार कर लिया। अब वे कश्मीर घाटी पर अधिकार करना चाहते थे। परन्तु इसी समय काबुल के वज़ीर फतह खां बरकज़ाई ने भी कश्मीर विजय की योजना बनाई। अंतत: 1813 ई० में रोहतास नामक स्थान पर फतह खां तथा रणजीत सिंह के मध्य यह समझौता हुआ कि दोनों पक्षों की सेनाएं मिलकर कश्मीर पर आक्रमण करेंगी। यह भी निश्चित हुआ कि कश्मीर विजय के बाद फतह खां मुलतान की विजय में महाराजा की तथा महाराजा अटक विजय में फतह खां की सहायता करेगा। समझौते के पश्चात् महाराजा ने मोहकम चंद के नेतृत्व में 12,000 सैनिक कश्मीर विजय के लिए फतह खां की सहायता के लिए भेज दिए। परन्तु फतह खां चालाकी से सिक्ख सेनाओं को पीछे ही छोड़ गया और स्वयं कश्मीर घाटी में प्रवेश कर गया। उसने कश्मीर के शासक अत्ता मुहम्मद को सिक्खों की सहायता के बिना ही पराजित कर दिया। इस प्रकार उसने महाराजा के साथ हुए समझौते को तोड़ दिया।
  2. कश्मीर पर आक्रमण-जून, 1814 ई० में सिक्ख सेना ने राम दयाल के नेतृत्व में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। उस समय कश्मीर का सूबेदार फतह खां का भाई आज़िम खां था। वह एक योग्य सेनापति था। जैसे ही रामदयाल की सेना ने पीर पंजाल दर्रे को पार करके कश्मीर घाटी में प्रवेश किया, आज़िम खां ने थकी हुई सिक्ख सेना पर धावा बोल दिया। फिर भी रामदयाल ने बड़ी वीरता से शत्रु का सामना किया। अन्त में आज़िम खां तथा रामदयाल में समझौता हो गया।
  3. कश्मीर पर अधिकार-1819 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने मौका पाकर मिसर दीवान चन्द के अधीन 12,000 सैनिकों को कश्मीर भेजा। उसकी सहायता के लिए खड़क सिंह के नेतृत्व में एक अन्य सैनिक टुकड़ी भी भेजी गयी। महाराजा स्वयं भी तीसरा दस्ता लेकर वजीराबाद चला गया। मिसर दीवान चन्द ने भिंबर पहुंच कर राजौरी, पुंछ तथा पीर पंजाल पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् सिक्ख सेना ने कश्मीर में प्रवेश किया। वहां के कार्यकारी सूबेदार जबर खां ने सपीन (स्पाधन) नामक स्थान पर सिक्खों का डट कर सामना किया। फिर भी सिक्ख सेना ने 5 जुलाई, 1819 ई० को कश्मीर को सिक्ख राज्य में मिला लिया। दीवान मोती राम को कश्मीर का सूबेदार नियुक्त किया गया। . महत्त्व-महाराजा के लिए कश्मीर विजय बहुत ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई-
    1. इस विजय से महाराजा की प्रसिद्धि में वृद्धि हुई।
    2. इस विजय से महाराजा को 36 लाख रुपए की वार्षिक आय होने लगी
    3. इस विजय ने अफ़गानों की शक्ति पर भयंकर प्रहार किया।

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प्रश्न 3.
रणजीत सिंह की मुलतान की विजय का वर्णन करो।
उत्तर-
मुलतान का प्रदेश आर्थिक तथा सैनिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। इसे प्राप्त करने के लिए महाराजा ने कई आक्रमण किये जिनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

  1. पहला आक्रमण-1802 ई० में महाराजा ने मुलतान पर पहला आक्रमण किया। परन्तु वहां के शासक नवाब मुजफ्फर खां ने महाराजा को नज़राने के रूप में बड़ी राशि देकर वापस भेज दिया।
  2. दूसरा आक्रमण-मुलतान के नवाब ने अपने वचन के अनुसार महाराजा को वार्षिक कर न भेजा। इसलिए महाराजा रणजीत सिंह ने 1805 ई० में पुनः मुलतान पर आक्रमण कर दिया। परन्तु मराठा सरदार जसवन्त राय होल्कर के अपनी सेना के साथ पंजाब में आने से महाराजा को वापस जाना पड़ा।
  3. तीसरा आक्रमण-1807 में महाराजा रणजीत सिंह ने मुलतान पर तीसरी बार आक्रमण किया। सिक्ख सेना ने मुलतान के कुछ प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। परन्तु बहावलपुर के नवाब ने महाराजा तथा नवाब मुजफ्फर खान में समझौता करवा दिया।
  4. चौथा आक्रमण-24 फरवरी, 1810 ई० को महाराजा की सेना ने मुलतान के कुछ प्रदेशों पर पुनः अपना अधिकार कर लिया। 25 फरवरी को सिक्खों ने मुलतान के किले को भी घेर लिया। परन्तु सिक्ख सैनिकों को कुछ क्षति उठानी पड़ी। इसके अतिरिक्त मोहकम चन्द भी बीमार हो गया। अत: महाराजा को किले का घेरा उठाना पड़ा।
  5. पांचवां प्रयास-1816 ई० में महाराजा ने अकाली फूला सिंह को सेना सहित मुलतान तथा बहावलपुर के शासकों से कर वसूल करने के लिए भेजा। उसने मुलतान के कुछ बाहरी क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। अतः मुलतान के नवाब ने तुरन्त फूला सिंह से समझौता कर लिया।
  6. अन्य प्रयास-(i) 1817 ई० में भवानी दास के नेतृत्व में सिक्ख सेना ने मुलतान पर आक्रमण किया परन्तु उसे सफलता न मिली।
    (ii) जनवरी, 1818 ई० में 20,000 सैनिकों के साथ मिसर दीवान चन्द ने मुलतान पर आक्रमण कर दिया। नवाब मुजफ्फर खां किले के अन्दर जा छिपा। सिक्ख सैनिकों ने नगर को जीतने के पश्चात् किले को घेर लिया। आखिर मुलतान पर सिक्खों का अधिकार हो गया।
    महत्त्व-

    1. मुलतान की विजय से रणजीत सिंह के सम्मान में वृद्धि हुई
    2. दक्षिण पंजाब में अफ़गानों की शक्ति को आघात पहुंचा।
    3. डेराजात तथा बहावलपुर के दाऊद पुत्र महाराजा के अधीन हो गए।
    4. महाराजा के लिए आर्थिक रूप से भी यह विजय लाभदायक सिद्ध हुई। इससे राज्य के व्यापार में वृद्धि हुई।

सच तो यह है कि मुलतान विजय ने महाराजा को अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए उत्साहित किया।

प्रश्न 4.
रणजीत सिंह की पेशावर की जीत का वर्णन करो।
उत्तर-
पेशावर पंजाब के उत्तर-पश्चिम में सिंध नदी के पार स्थित था। यह नगर अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सैनिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। महाराजा रणजीत सिंह पेशावर के महत्त्व को समझता था। इसलिए वह इस प्रदेश को अपने राज्य में मिलाना चाहता था।

  1. पेशावर पर पहला आक्रमण-15 अक्तूबर 1818 को महाराजा रणजीत सिंह ने अकाली फूला सिंह तथा हरी सिंह नलवा को साथ लेकर लाहौर से पेशावर की ओर कूच किया। खटक कबीले के लोगों ने उनका विरोध किया। परन्तु सिक्खों ने उन्हें पराजित करके खैराबाद तथा जहांगीर नामक किलों पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् सिक्ख सेना पेशावर की ओर बढ़ी। उस समय पेशावर का शासक यार मुहम्मद खान था। वह पेशावर छोड़ कर भाग गया। इस प्रकार 20 नवम्बर, 1818 ई० को महाराजा ने बिना किसी विरोध के पेशावर पर अधिकार कर लिया।
  2. पेशावर का दूसरा आक्रमण-सिक्ख सेना के पेशावर से लाहौर जाते ही यार मुहम्मद फिर से पेशावर पर अपना अधिकार जमाने में सफल हो गया। इसकी सूचना मिलने पर महाराजा ने राजकुमार खड़क सिंह तथा मिसर दीवान चन्द के नेतृत्व में 12,000 सैनिकों की विशाल सेना पेशावर भेज दी। परन्तु यार मुहम्मद ने महाराजा की अधीनता स्वीकार कर ली।
  3. पेशावर पर तीसरा आक्रमण-इसी बीच काबुल के नये वज़ीर आज़िम खां ने पेशावर पर आक्रमण कर दिया। जनवरी 1823 ई० में उसने यार मुहम्मद खां को पराजित करके पेशावर पर अपना अधिकार कर लिया। इस बात की सूचना मिलते ही महाराजा ने शेर सिंह, दीवान किरपा राम, हरी सिंह नलवा तथा अतर दीवान सिंह के अधीन एक विशाल सेना पेशावर भेजी। आज़िम खान ने सिक्खों के विरुद्ध ‘जेहाद’ का नारा लगा दिया। 14 मार्च, 1823 ई० को नौशहरा नामक स्थान पर सिक्खों तथा अफ़गानों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इसे ‘टिब्बा टेहरी’ का युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध में अकाली फूला सिंह मारा गया। अतः सिक्खों का उत्साह बढ़ाने के लिए महाराजा स्वयं आगे बढ़ा। शीघ्र ही सिक्खों ने आज़िम खां को पराजित कर दिया।
  4. सैय्यद अहमद खां को कुचलना-1827 ई० से 1831 ई० तक पेशावर तथा उसके आस-पास के प्रदेशों में सैय्यद अहमद खां नामक व्यक्ति ने विद्रोह किया। 1829 में उसने पेशावर पर आक्रमण कर दिया। यार मुहम्मद, जो महाराजा के अधीन था, उसका सामना न कर सका। उसे जून, 1830 ई० में हरी सिंह नलवा ने सिंध नदी के तट पर हराया। इसी बीच सैय्यद अहमद खां ने फिर से शक्ति प्राप्त कर ली। इस बार उसे मई, 1831 ई० में राजकुमार शेर सिंह ने बालाकोट की लड़ाई में परास्त किया।
  5. पेशावर का लाहौर राज्य में विलय-1831 ई० के पश्चात् महाराजा रणजीत सिंह ने पेशावर को लाहौर राज्य में सम्मिलित करने की योजना बनाई। इस उद्देश्य से उसने हरी सिंह नलवा तथा राजकुमार नौनिहाल सिंह के नेतृत्व में 9,000 सैनिकों को पेशावर की ओर भेजा। 6 मई, 1834 को सिक्खों ने पेशावर पर अधिकार कर लिया और महाराजा ने पेशावर की लाहौर राज्य में विलय की घोषणा कर दी। हरी सिंह नलवा को पेशावर का सूबेदार नियुक्त किया गया।
  6. दोस्त मुहम्मद खां का पेशावर को वापस लेने का असफल प्रयास-1834 ई० में काबुल के दोस्त मुहम्मद खां ने शाह शुजा को पराजित करके सिक्खों से पेशावर वापस लेने का निर्णय किया। उसने अपने पुत्र मुहम्मद अकबर खान के नेतृत्व में 18,000 सैनिकों को सिक्खों के विरुद्ध भेजा। दोनों पक्षों में जम कर लड़ाई हुई। अन्त में सिक्ख विजयी रहे।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 7 रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध

प्रश्न 5.
किन-किन मसलों पर रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों की आपस में न बनी?
उत्तर-
रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के सम्बन्धों में विशेष रूप से तीन मसलों ने तनाव उत्पन्न किया। ये मसले थेसिंध का प्रश्न, शिकारपुर का प्रश्न तथा फिरोजपुर का प्रश्न। इनका अलग-अलग वर्णन इस प्रकार है —

  1. सिन्ध का प्रश्न-सिन्ध पंजाब के दक्षिण-पश्चिम में स्थित अति महत्त्वपूर्ण प्रदेश है। यहां के निकटवर्ती प्रदेशों को विजित करने के पश्चात् 1830-31 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने सिन्ध पर अधिकार करने का निर्णय किया। परन्तु भारत के गवर्नर-जनरल विलियम बंटिक ने महाराजा की इस विजय पर रोक लगाने का प्रयास किया। इस सम्बन्ध में उसने अक्तूबर, 1831 ई० को महाराजा से रोपड़ में भेंट की। परन्तु दूसरी ओर उसने कर्नल पोटिंगर (Col. Pottinger) को सिन्ध के अमीरों के साथ व्यापारिक सन्धि करने के लिए भेज दिया। जब रणजीत सिंह को इस बात का पता चला तो उसे बड़ा दुःख हुआ। परिणामस्वरूप अंग्रेज़-सिक्ख सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न होने लगा।
  2. शिकारपुर का प्रश्न-महाराजा रणजीत सिंह 1832 ई० से सिंध के प्रदेश शिकारपुर को अपने आधिपत्य में लेने के लिए एक उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में था। यह अवसर उसे मजारी कबीले के लोगों द्वारा लाहौर राज्य के सीमान्त प्रदेशों पर किए जाने वाले आक्रमणों से मिला। रणजीत सिंह ने इन आक्रमणों के लिए सिन्ध के अमीरों को दोषी ठहरा कर शिकारपुर को हड़पने का प्रयत्न किया। शीघ्र ही सिक्खों ने राजकुमार खड़क सिंह के नेतृत्व में मजारियों . के प्रदेश पर अधिकार कर लिया। परन्तु जब महाराजा ने सिन्ध के अमीरों से संधि की शर्तों को पूरा करवाने का प्रयास , किया तो अंग्रेज़ गवर्नर जनरल ऑकलैंड ने उसे रोक दिया। फलस्वरूप महाराजा तथा अंग्रेजों के संबंध बिगड़ गए।
  3. फिरोजपुर का प्रश्न-फिरोजपुर नगर सतलुज तथा ब्यास के संगम पर स्थित था। वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण नगर था। ब्रिटिश सरकार फिरोजपुर के महत्त्व से भली-भान्ति परिचित थी। यह नगर लाहौर के समीप स्थित होने से अंग्रेज़ : यहां से न केवल महाराजा रणजीत सिंह की गतिविधियों की देख-रेख कर सकते थे अपितु विदेशी आक्रमणों की . रोकथाम भी कर सकते थे। अत: अंग्रेज़ सरकार ने 1835 ई० में फिरोजपुर पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और ; तीन वर्ष बाद इसे अपनी स्थायी सैनिक छावनी बना दिया। अंग्रेजों की इस कार्यवाही से महाराजा गुस्से से भर उठा।

PSEB 10th Class Social Science Guide रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
(i) रणजीत सिंह ने लाहौर पर विजय कब पाई?
(ii) उस समय लाहौर पर किसका अधिकार था?
उत्तर-
(i) रणजीत सिंह ने जुलाई, 1799 ई० में लाहौर पर विजय पाई।
(ii) उस समय लाहौर पर भंगी मिसल के सरदार चेत सिंह, मोहर सिंह और साहिब सिंह का अधिकार था।

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प्रश्न 2.
1812 ई० से पूर्व रणजीत सिंह द्वारा जीते गए किन्हीं चार प्रदेशों के नाम बताओ।
उत्तर-
लाहौर, अमृतसर, स्यालकोट, जालन्धर।

प्रश्न 3.
रणजीत सिंह ने
(i) मुलतान
(i) कश्मीर तथा
(ii) पेशावर पर कब-कब अधिकार किया?
उत्तर-
रणजीत सिंह ने मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर पर क्रमशः
(i) 1818 ई०,
(ii) 1819 ई० तथा
(iii) 1834 ई० में अधिकार किया।

प्रश्न 4.
रणजीत सिंह की लाहौर विजय का क्या महत्त्व था?
उत्तर-
लाहौर की विजय ने रणजीत सिंह को पूरे पंजाब का शासक बनाने में सहायता दी।

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प्रश्न 5.
रणजीत सिंह की माता का क्या नाम था?
उत्तर-
राजकौर।

प्रश्न 6.
चेचक का रणजीत सिंह के शरीर पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
उसके चेहरे पर चेचक के दाग पड़ गए और उसकी बाईं आंख जाती रही।

प्रश्न 7.
बाल रणजीत सिंह ने किस चट्ठा सरदार को मार गिराया था?
उत्तर-
हशमत खां को।

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प्रश्न 8.
सदा कौर कौन थी?
उत्तर-
सदा कौर रणजीत सिंह की सास थी।

प्रश्न 9.
रणजीत सिंह के बड़े बेटे का क्या नाम था?
उत्तर-
खड़क सिंह।

प्रश्न 10.
रणजीत सिंह के पिता महासिंह का देहान्त कब हुआ?
उत्तर-
1792 ई० में।

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प्रश्न 11.
रणजीत सिंह ने सुकरचकिया मिसल की बागडोर कब संभाली?
उत्तर-
1797 ई० में।

प्रश्न 12.
रणजीत सिंह महाराजा कब बने?
उत्तर-
1801 ई० में।

प्रश्न 13.
महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी सरकार को क्या नाम दिया?
उत्तर-
सरकार-ए-खालसा ।

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प्रश्न 14.
महाराजा रणजीत सिंह के समय पंजाब की राजधानी कौन-सी थी?
उत्तर-
लाहौर।

प्रश्न 15.
महाराजा रणजीत सिंह ने अपने सिक्के किसके नाम पर जारी किए?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह ने अपने सिक्के श्री गुरु नानक देव जी तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी के नाम पर जारी किए।

प्रश्न 16.
अमृतसर की विजय के परिणामस्वरूप महाराजा रणजीत सिंह को कौन-सी बहुमूल्य तोप प्राप्त हुई?
उत्तर-
जम-जमा तोप।

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प्रश्न 17.
महाराजा रणजीत सिंह को किस विजय के परिणामस्वरूप अकाली फूला सिंह की सेवाएं – प्राप्त हुई?
उत्तर-
अमृतसर की विजय।

प्रश्न 18.
महाराजा रणजीत सिंह ने गुजरात विजय किसके नेतृत्व में प्राप्त की?
उत्तर-
फ़कीर अजीजुद्दीन के।

प्रश्न 19.
जम्मू विजय के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने वहां का गवर्नर किसे बनाया?
उत्तर-
जमादार खुशहाल सिंह को।

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प्रश्न 20.
संसार चन्द कटोच कहां का राजा था?
उत्तर-
कांगड़ा का।

प्रश्न 21.
महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा का गवर्नर किसे बनाया?
उत्तर-
देसा सिंह मजीठिया को।

प्रश्न 22.
महाराजा रणजीत सिंह की अन्तिम विजय कौन-सी थी?
उत्तर-
पेशावर की विजय।

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प्रश्न 23.
किस स्थान के युद्ध को ‘टिब्बा-टेहरी’ का युद्ध कहा जाता है?
उत्तर-
नौशहरा के युद्ध को।

प्रश्न 24.
महाराजा रणजीत सिंह का सेनानायक अंकाली फूला सिंह किस युद्ध में मारा गया?
उत्तर-
नौशहरा के युद्ध में।

प्रश्न 25.
हरी सिंह नलवा कौन था?
उत्तर-
हरी सिंह नलवा महाराजा रणजीत सिंह का प्रसिद्ध सेनानायक था।

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प्रश्न 26.
महाराजा रणजीत सिंह ने पेशावर का सूबेदार किसे बनाया?
उत्तर-
हरी सिंह नलवा को।

प्रश्न 27.
अमृतसर की संधि कब हुई?
उत्तर-
1809 ई० में।

प्रश्न 28.
अंग्रेजों, रणजीत सिंह तथा शाहशुजा के बीच त्रिपक्षीय सन्धि कब हुई?
उत्तर-
1838 ई० में।

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प्रश्न 29.
महाराजा रणजीत सिंह का देहान्त कब हुआ?
उत्तर-
जून, 1839 ई० में।

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. रणजीत सिंह के पिता का नाम ………….. था।
  2. महाराजा रणजीत सिंह ने गुजरात विजय ………… के नेतृत्व में प्राप्त की।
  3. जम्मू विजय के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने …………… को वहां का गवर्नर बनाया।
  4. महाराजा रणजीत सिंह ने अंतिम विजय ………… पर की थी।
  5. ………. के युद्ध को टिब्बा-टेहरी का युद्ध भी कहा जाता है।
  6. ……….. महाराजा रणजीत सिंह का प्रसिद्ध सेनानायक था।
  7. ……….. ई० में अमृतसर की संधि हुई।

उत्तर-

  1. सरदार महा सिंह,
  2. फ़कीर अजीजुद्दीन,
  3. जमादार खुशहाल सिंह,
  4. पेशावर,
  5. नौशहरा,
  6. हरी सिंह नलवा,
  7. 1809.

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रणजीत सिंह का जन्म हुआ
उत्तर-
(A) 13 नवंबर, 1780 ई० को
(B) 23 नवंबर, 1780 ई० को
(C) 13 नवंबर, 1870 ई० कों
(D) 23 नवंबर, 1870 ई० को।
उत्तर-
(A) 13 नवंबर, 1780 ई० को

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प्रश्न 2.
रणजीत सिंह की पत्नी थी
(A) प्रकाश कौर
(B) सदा कौर
(C) दया कौर
(D) महताब कौर।
उत्तर-
(D) महताब कौर।

प्रश्न 3.
डल्लेवालिया मिसल का नेता था
(A) विनोद सिंह
(B) तारा सिंह घेबा
(C) अब्दुससमद
(D) नवाब कपूर सिंह।
उत्तर-
(B) तारा सिंह घेबा

प्रश्न 4.
रणजीत सिंह ने लाहौर पर विजय प्राप्त की
(A) 1801 ई० में
(B) 1812 ई० में
(C) 1799 ई० में
(D) 1780 ई० में।
उत्तर-
(C) 1799 ई० में

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प्रश्न 5.
बाल रणजीत सिंह ने किस चट्ठा सरकार को मार गिराया?
(A) चेत सिंह को
(B) हशमत खां को
(C) मोहर सिंह को
(D) मुहम्मद खां को।
उत्तर-
(B) हशमत खां को

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह के समय पंजाब की राजधानी थी
(A) इस्लामाबाद
(B) अमृतसर
(C) सियालकोट
(D) लाहौर।
उत्तर-
(D) लाहौर।

IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/ग़लत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. महा सिंह कन्हैया मिसल का सरदार था।
  2. रणजीत सिंह ने शुकरचकिया मिसल की बागडोर 1792 ई० में सम्भाली।
  3. तारा सिंह घेबा डल्लेवालिया मिसल का नेता था।
  4. हरि सिंह नलवा पेशावर का सूबेदार था।
  5. महाराजा रणजीत सिंह तथा विलियम बैंटिक के बीच भेंट कपूरथला में हुई।

उत्तर-

  1. (✗),
  2. (✓),
  3. (✓),
  4. (✓),
  5. (✗).

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 7 रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध

V. उचित मिलान

  1. सरकार-ए-खालसा कांगड़ा का राजा
  2. गुजरात (पंजाब) विजय – कांगड़ा का गवर्नर
  3. संसार चन्द कटोच – महाराजा रणजीत सिंह
  4. ढेसा सिंह मजीठिया – फ़कीर अजीजुद्दीन।

उत्तर-

  1. सरकार-ए-खालसा-महाराजा रणजीत सिंह,
  2. गुजरात (पंजाब) विजय-फकीर अजीजुद्दीन,
  3. संसार चन्द कटोच-कांगड़ा का राजा,
  4. ढेसा सिंह मजीठिया-कांगड़ा का गवर्नर।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
रणजीत सिंह का महाराजा बनना’ इस पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
12 अप्रैल, 1801 ई० को वैशाखी के शुभ अवसर पर लाहौर में रणजीत सिंह के महाराजा बनने की रस्म बड़ी धूमधाम से मनाई गई। उसने अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ का नाम दिया। महाराजा बनने पर भी रणजीत सिंह ने ताज ग्रहण न किया। उसने अपने सिक्के गुरु नानक साहिब तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी के नाम पर जारी किये। इस प्रकार से रणजीत सिंह ने खालसा को ही सर्वोच्च शक्ति माना। इमाम बख्श को लाहौर का कोतवाल नियुक्त किया गया।

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प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह द्वारा डेराजात की विजय का वर्णन करो।
उत्तर-
मुलतान तथा कश्मीर की विजयों के पश्चात् महाराजा रणजीत सिंह ने डेरा गाजी खान को विजय करने का निर्णय किया। उस समय वहां का शासक ज़मान खान था। महाराजा ने जमादार खुशहाल सिंह के नेतृत्व में ज़मान खान के विरुद्ध सेना भेजी। इस सेना ने ज़मान खान को परास्त करके डेरा गाज़ी खान पर अपना अधिकार कर लिया।
डेरा गाजी खां की विजय के पश्चात् महाराजा रणजीत सिंह डेरा इस्मायल खान तथा मानकेरा की ओर बढ़ा। उसने इन क्षेत्रों पर अधिकार करने के लिए 1821 ई० में मिसर दीवान चंद को भेजा। वहां के शासक अहमद खां ने महाराजा को नज़राना देकर टालना चाहा। परन्तु मिसर दीवान चंद ने नज़राना लेने से इन्कार कर दिया और आगे बढ़ कर मानकेरा पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न 3.
रणजीत सिंह की किन्हीं चार आरम्भिक विजयों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
रणजीत सिंह की चार आरम्भिक विजयों का वर्णन इस प्रकार है

  1. लाहौर की विजय-रणजीत सिंह ने सबसे पहले लाहौर पर विजय प्राप्त की। मोहर सिंह और साहिब सिंह लाहौर छोड़ कर भाग निकले। रणजीत सिंह ने चेत सिंह को पराजित कर जुलाई, 1799 ई० में लाहौर पर अधिकार कर लिया।
  2. सिक्ख-मुस्लिम संघ की पराजय-रणजीत सिंह की लाहौर विजय को देख कर आस-पास के सिक्ख तथा मुस्लिम शासकों ने संगठित होकर उससे लड़ने का निश्चय किया। 1800 ई० में भसीन नामक स्थान पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में बिना किसी खून-खराबे के रणजीत सिंह विजयी रहा।
  3. अमृतसर की विजय-अमृतसर पर रणजीत सिंह के आक्रमण के समय वहां के शासन की बागडोर माई सुक्खां के हाथों में थी। माई सुक्खां ने कुछ समय तक विरोध करने के बाद हथियार डाल दिए और अमृतसर पर रणजीत सिंह का अधिकार हो गया।
  4. सिक्ख मिसलों पर विजय-रणजीत सिंह ने अब स्वतन्त्र सिक्ख मिसलों के नेताओं के साथ मित्रता स्थापित की। उनके सहयोग से उसने छोटी-छोटी मिसलों पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न 4.
किन्हीं चार सिक्ख मिसलों पर रणजीत सिंह की विजय का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  1. 1802 ई० रणजीत सिंह ने अकालगढ़ के दल सिंह को पराजित करके उसके प्रदेश को अपने राज्य में मिला लिया।
  2. 1807 ई० में डल्लेवालिया मिसल के नेता सरदार तारा सिंह घेबा की मृत्यु पर रणजीत सिंह ने इस मिसल के कई प्रदेशों को जीत लिया।
  3. अगले ही वर्ष उसने स्यालकोट के जीवन सिंह को हरा कर उसके अधीनस्थ प्रदेशों को अपने राज्यों में मिला लिया।
  4. 1810 ई० में उसने नक्कई मिसल के सरदार काहन सिंह तथा गुजरात के सरदार साहिब सिंह के प्रदेशों को अपने अधिकार में ले लिया।

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प्रश्न 5.
अमृतसर की सन्धि की क्या शतें थीं?
उत्तर-
अमृतसर की सन्धि पर 25 अप्रैल, 1809 ई० को हस्ताक्षर हुए। इस सन्धि की प्रमुख शर्ते इस प्रकार थीं

  1. दोनों सरकारें एक-दूसरे के प्रति मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखेंगी।
  2. अंग्रेज़ सतलुज नदी के उत्तरी क्षेत्र के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे जब कि रणजीत सिंह इसके दक्षिणी क्षेत्रों के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  3. ब्रिटिश सरकार ने रणजीत सिंह को सबसे प्यारा राजा मान लिया। उसे विश्वास दिलाया गया कि वे उसके राज्य अथवा प्रजा से कोई सम्बन्ध नहीं रखेंगे। दोनों में से कोई आवश्यकता से अधिक सेना नहीं रखेगा।
  4. सतलुज के दक्षिण में रणजीत सिंह उतनी ही सेना रख सकेगा जितनी उस प्रदेश में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक होगी।
  5. यदि कोई भी पक्ष इस सन्धि के विरुद्ध कोई कार्य करेगा तो सन्धि को भंग समझा जाएगा।

प्रश्न 6.
अमृतसर की सन्धि ( 1809) का क्या महत्त्व था?
उत्तर-
अमृतसर की सन्धि ने महाराजा रणजीत सिंह के समस्त पंजाब पर अधिकार करने के स्वप्न को भंग कर दिया। सतलुज नदी उसके राज्य की सीमा बन कर रह गई। यही नहीं इससे रणजीत सिंह की प्रतिष्ठा को भी भारी धक्का लगा। अपने राज्य में उसका दबदबा कम होने लगा, फिर भी इस संधि से उसे कुछ लाभ भी हए। इस सन्धि के द्वारा उसने पंजाब को अंग्रेजों के आक्रमण से बचा लिया। जब तक वह जीवित रहा, अंग्रेजों ने पंजाब की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। इस प्रकार रणजीत सिंह को उत्तर-पश्चिम की ओर अपने राज्य को विस्तृत करने का समय मिला। उसने मुलतान, अटक, कश्मीर, पेशावर तथा डेराजात के प्रदेशों को जीत कर अपनी शक्ति में खूब वृद्धि की।

प्रश्न 7.
किन्हीं चार बिन्दुओं के आधार पर नौशहरा की लड़ाई के महत्त्व को समझाए।
उत्तर-

  1. नौशहरा की लड़ाई में आज़िम खां पराजित हुआ था और मरने से पहले वह अपने पुत्रों को इस अपमान का बदल लेने की शपथ दिला गया। इस प्रकार अफ़गानों तथा सिक्खों के बीच चिरस्थायी शत्रुता आरम्भ हो गई।
  2. इस विजय से सिक्खों की वीरता की धाक जम गई। सिक्खों में आत्म-विश्वास का संचार हुआ और उन्होंने अफ़गानों के प्रति और भी उग्र नीति को अपना लिया।
  3. इस लड़ाई के परिणामस्वरूप सारे पंजाब में रणजीत सिंह की शक्ति का लोहा माना जाने लगा। इसके अतिरिक्त नौशहरा की लड़ाई के कारण सिन्ध तथा पेशावर के बीच स्थित अफ़गान प्रदेशों पर महाराजा रणजीत सिंह की सत्ता दृढ़ हो गई।
  4. इस युद्ध के पश्चात् उत्तर-पश्चिमी भारत में अफ़गानों की शक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई।

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प्रश्न 8.
अंग्रेजों, शाहशुजा तथा महाराजा रणजीत सिंह के बीच होने वाली त्रिदलीय संधि पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर-
1837 ई० में रूस, एशिया की ओर बढ़ने लगा था। अंग्रेजों को यह भय हो गया कि कहीं रूस अफ़गानिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण न कर दे। अतः उन्होंने अफ़गानिस्तान के साथ मित्रता स्थापित करनी चाही। इस उद्देश्य से कैप्टन बन्ज (Burnes) को काबुल भेजा गया। परन्तु वहां के शासक दोस्त मुहम्मद ने इस शर्त पर समझौता करना स्वीकार किया कि अंग्रेज़ उसे रणजीत सिंह से पेशावर का प्रदेश लेकर दें। अंग्रेजों के लिए रणजीत सिंह की मित्रता भी महत्त्वपूर्ण थी। इसलिए उन्होंने इस शर्त को न माना और अफ़गानिस्तान के भूतपूर्व शासक शाह शुजा के साथ एक समझौता कर लिया। इस समझौते में रणजीत सिंह को भी शामिल किया गया। यही समझौता त्रिदलीय संधि के नाम से प्रसिद्ध है।

बड़े उत्तर वाले प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
रणजीत सिंह की लाहौर, अमृतसर, अटक, मुलतान तथा कश्मीर की विजयों का वर्णन कीजिए।
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह की प्रमुख विजयों का वर्णन करें।
उत्तर-
रणजीत सिंह की लाहौर, अमृतसर, अटक, मुलतान तथा कश्मीर की प्रमुख विजयों का वर्णन इस प्रकार है

  1. लाहौर की विजय-लाहौर पर भंगी मिसल के सरदार चेत सिंह, मोहर सिंह और साहिब सिंह का अधिकार था। लाहौर के निवासी इन सरदारों के शासन से तंग आ चुके थे। इसीलिए उन्होंने रणजीत सिंह को लाहौर पर आक्रमण करने का निमन्त्रण भेजा। रणजीत सिंह ने एक विशाल सेना लेकर लाहौर पर धावा बोल दिया। मोहर सिंह और साहिब सिंह लाहौर छोड़ कर भाग निकले। अकेला चेत सिंह ही रणजीत सिंह का सामना करता रहा, परन्तु वह भी पराजित हुआ। इस प्रकार 7 जुलाई, 1799 ई० को लाहौर रणजीत सिंह के अधिकार में आ गया।
  2. अमृतसर की विजय-अमृतसर के शासन की बागडोर गुलाब सिंह की विधवा माई सुक्खां के हाथ में थी। रणजीत सिंह ने माई सुक्खां को सन्देश भेजा कि वह अमृतसर स्थित लोहगढ़ का दुर्ग तथा प्रसिद्ध ज़मज़मा तोप उसके हवाले कर दे। परन्तु माई सुक्खां ने उसकी यह मांग ठुकरा दी। इसलिए रणजीत सिंह ने अमृतसर पर आक्रमण कर दिया और माई सुक्खां को पराजित करके अमृतसर को अपने राज्य में मिला लिया।
  3. मुलतान विजय-मुलतान उस समय व्यापारिक और सैनिक दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। 1818 ई० तक रणजीत सिंह ने मुलतान पर छ: आक्रमण किए, परन्तु हर बार वहां का पठान शासक मुजफ्फर खां रणजीत सिंह को भारी नज़राना देकर पीछा छुड़ा लेता था। 1818 ई० में रणजीत सिंह ने मुलतान को सिक्ख राज्य में मिलाने का दृढ़ निश्चय कर लिया। उसने मिसर दीवान चन्द तथा अपने पुत्र खड़क सिंह के अधीन 25 हज़ार सैनिक भेजे। सिक्ख सेना ने मुलतान के किले पर घेरा डाल दिया। मुजफ्फर खां ने किले से सिक्ख सेना का सामना किया, परन्तु अन्त में वह मारा गया और मुलतान सिक्खों के अधिकार में आ गया।
  4. कश्मीर विजय-अफ़गानिस्तान के वज़ीर फतह खां ने कश्मीर विजय के बाद रणजीत सिंह को उसका हिस्सा नहीं दिया था। अत: अब रणजीत सिंह ने कश्मीर विजय के लिए रामदयाल के अधीन एक सेना भेजी। इस युद्ध में रणजीत सिंह स्वयं भी रामदयाल के साथ गया, परन्तु सिक्खों को सफलता न मिल सकी। 1819 ई० में उसने मिसर दीवान चन्द तथा राजकुमार खड़क सिंह के नेतृत्व में एक बार फिर सेना भेजी। कश्मीर का नया गवर्नर जाबर खां सिक्खों का सामना करने के लिए आगे बढ़ा परन्तु सुपान के स्थान पर उसकी करारी हार हुई।

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प्रश्न 2.
रणजीत सिंह की अमृतसर विजय का वर्णन करते हुए इसका महत्त्व बताएं।
उत्तर-
गुलाब सिंह भंगी की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र गुरदित्त सिंह अमृतसर का शासक बना। उस समय वह नाबालिग. था। इसीलिए राज्य की सारी शक्ति उसकी मां माई सुक्खां के हाथ में थी। महाराजा रणजीत सिंह अमृतसर पर अपना अधिकार करने का अवसर ढूंढ रहा था।
1805 ई० को उसे यह अवसर मिल गया। उसने माई सुक्खां को संदेश भेजा कि वह जमजमा तोप उसके हवाले कर दे। उसने उससे लोहगढ़ के किले की मांग भी की। परन्तु माई सुक्खां ने महाराजा की मांगों को अस्वीकार कर दिया। महाराजा पहले ही युद्ध के लिए तैयार बैठा था। उसने तुरन्त अमृतसर पर आक्रमण करके लोहगढ़ के किले को घेर लिया। इस अभियान में सदा कौर तथा फतह सिंह आहलूवालिया ने रणजीत सिंह का साथ दिया। महाराजा विजयी रहा और उसने अमृतसर तथा लोहगढ़ के किले पर अधिकार कर लिया। माई सुक्खां तथा गुरदित्त सिंह को जीवन-निर्वाह के लिए जागीर दे दी गई। अमृतसर का अकाली फूला सिंह अपने 2000 निहंग साथियों के साथ रणजीत सिंह की सेना में शामिल हो गया। – अमृतसर की विजय का महत्त्व-

  1. अमृतसर की विजय लाहौर की विजय के बाद महाराजा रणजीत सिंह की सबसे महत्त्वपूर्ण विजय थी। इसका कारण यह था कि जहां लाहौर पंजाब की राजधानी था, वहीं अमृतसर अब सिक्खों की धार्मिक राजधानी बन गया था।
  2. अमृतसर की विजय से महाराजा रणजीत सिंह की सैनिक शक्ति बढ़ गई। उसके लिए लोहगढ़ का किला बहुमूल्य सिद्ध हुआ। उसे तांबे तथा पीतल से बनी ज़मज़मा तोप भी प्राप्त हुई।
  3. महाराजा को प्रसिद्ध सैनिक अकाली फूला सिंह तथा उसके 2000 निहंग साथियों की सेवाएं प्राप्त हुईं। निहंगों के असाधारण साहस तथा वीरता के बल पर रणजीत सिंह को कई शानदार विजय प्राप्त हुईं।
  4. अमृतसर विजयं के परिणामस्वरूप रणजीत सिंह की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। फलस्वरूप बहुत-से भारतीय उसके राज्य में नौकरी करने के लिए आने लगे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौकरी करने वाले अनेक भारतीय वहां की नौकरी छोड़ कर महाराजा के पास कार्य करने लगे। कई यूरोपियन सैनिक भी महाराजा की सेना में भर्ती हो गए।

रणजीत सिंह : प्रारम्भिक जीवन, प्राप्तियां तथा अंग्रेजों से सम्बन्ध PSEB 10th Class History Notes

  1. जन्म तथा माता-पिता-रणजीत सिंह का जन्म 1780 ई० में गुजरांवाला में हुआ था। उसके पिता का नाम महा सिंह था जो शुकरचकिया मिसल का सरदार था। उसकी माता का नाम राजकौर था।
  2. बचपन-बचपन में चेचक के कारण रणजीत सिंह की एक आँख खराब हो गई थी। वह 10 वर्ष की आयु में ही अपने पिता के साथ युद्ध में जाया करता था। इसलिए बहुत छोटी आयु में वह युद्ध-विद्या में कुशल हो गया था।
  3. विवाह-अपनी मृत्यु से पूर्व महा सिंह ने पंजाब में अपनी शक्ति काफ़ी बढ़ा ली थी। उसने रणजीत सिंह का विवाह जय सिंह कन्हैया की पोती और रानी सदा कौर की पुत्री महताब कौर के साथ किया। जब उसने शुकरचकिया मिसल की बागडोर सम्भाली तो यह विवाह सम्बन्ध उसकी शक्ति के उत्थान में काफ़ी सहायक सिद्ध हुआ।
  4. लाहौर का गवर्नर बनना-रणजीत सिंह ने 1792 ई० में शुकरचकिया मिसल की बागडोर सम्भाली। 19 वर्ष की आयु में उसको अफ़गानिस्तान के शासक शाहजमां ने लाहौर का गवर्नर बना दिया और उसे राजा की उपाधि दी। इस तरह रणजीत सिंह की शक्ति काफ़ी बढ़ गई।
  5. आरम्भिक विजय-1802 ई० में उसने अमृतसर पर अधिकार कर लिया। अगले चार-पाँच वर्षों में उसने छ: मिसलों को अपने अधिकार में ले लिया। फिर उसने सतलुज और यमुना नदी के मध्य सरहिन्द की ओर बढ़ना आरम्भ कर दिया, परन्तु अंग्रेज़ों ने उसे उस ओर न बढ़ने दिया।
  6. अमृतसर की सन्धि-1809 ई० में उसने अंग्रेज़ों से सन्धि (अमृतसर की सन्धि) कर ली। सन्धि के पश्चात् रणजीत सिंह ने सतलुज के पश्चिम में स्थित प्रदेशों में अपने राज्य का विस्तार करना आरम्भ कर दिया।
  7. महत्त्वपूर्ण विजयें-महाराजा रणजीत सिंह ने मुलतान (1818), कश्मीर (1819) और पेशावर (1834) पर अधिकार कर लिया। इस तरह रणजीत सिंह एक विशाल राज्य स्थापित करने में सफल हुआ।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 11 कुछ नए कृषि विषय

Punjab State Board PSEB 11th Class Agriculture Book Solutions Chapter 11 कुछ नए कृषि विषय Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Agriculture Chapter 11 कुछ नए कृषि विषय

PSEB 11th Class Agriculture Guide कुछ नए कृषि विषय Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
जी० एम० का पूरा नाम लिखो।
उत्तर-
जनैटिकली मोडीफाइड फसलें।

प्रश्न 2.
बी०टी० का पूरा नाम लिखो।
उत्तर-
बैसिलस थुरिजैनिसस।

प्रश्न 3.
बी० टी० कपास में कौन-सा कीटनाशक पदार्थ पैदा होता है ?
उत्तर-
रवेदार प्रोटीन पैदा होता है जिसको खाकर सूंडी मर जाती है।

प्रश्न 4.
पी० पी० वी० और एफ० आर० का पूरा नाम लिखो।
उत्तर-
पौध किस्म और किसान अधिकार सुरक्षा एक्ट (Protection of Plant Variety and Farmers Rights)।

प्रश्न 5.
पौध प्रकार एवं किसान अधिकार सुरक्षा अधिनियम किस वर्ष पास किया गया ?
उत्तर-
वर्ष 2001 में।

प्रश्न 6.
खेत को समतल करने वाली नवीनतम मशीनों का नाम लिखें।
उत्तर-
लेजर कराहा।

प्रश्न 7.
धान में पानी की बचत करने वाले यंत्र का नाम लिखें।
उत्तर-
टैंशीओमीटर।

प्रश्न 8.
गत एक शताब्दी में धरती की सतह के तापमान में कितनी वृद्धि हो चुकी है ?
उत्तर-
0.5 डिग्री सैंटीग्रेड।

प्रश्न 9.
प्रमुख ग्रीन हाऊस गैसों के नाम लिखो।
उत्तर-
कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मीथेन आदि।

प्रश्न 10.
सी० एफ० सी० का पूरा नाम लिखें।
उत्तर-
क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (Chlorofloro Carbon)।

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
जी० एम० फसल की परिभाषा लिखें।
उत्तर-
जी० एम० फसल का अर्थ है ऐसी फ़सलें जिनमें किसी ओर फ़सल या जीवजंतु का जीन डाल कर सुधार किया गया हो। जी० जैम० का पूरा नाम है जनेटिकली मोडीफाइड फ़सलें।

प्रश्न 2.
बी०टी०-1 और बी० टी०-2 प्रकार में क्या अंतर है ?
उत्तर-
बी० टी०-1 और बी० टी०-2 से अर्थ है बालगार्ड-1 और बालगार्ड-2 किस्में, ये कपास की किस्में हैं। बी० टी०-1 में सिर्फ एक बी० टी० जीन डाला गया है जबकि बी० टी०-2 में दो बी० टी० जीन डाले गए हैं। बी० टी०-1 सिर्फ़ अमरीकन सूंडी का मुकाबला कर सकती थी जबकि बी० टी०-2 अमरीकन सूंडी के अलावा अन्य इंडियों का भी मुकाबला कर सकती है।

प्रश्न 3.
बी० टी० कपास की टिंडे की सुंडियां हानि क्यों नहीं पहुंचाती ?
उत्तर-
बी० टी० कपास में वैसिलस थरिजैनिसस नाम के बैक्टीरिया के जीन डाले जाते हैं। यह जीन कपास के पौधे में रवेदार प्रोटीन पैदा करता है। यह प्रोटीन टिंडे की सुंडियों के लिए विषैला होता है, इसे खाकर सुंडियां मर जाती हैं तथा कपास को हानि नहीं पहुंचातीं।

प्रश्न 4.
बारीकी की कृषि से क्या अभिप्राय है? इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
बारीकी की कृषि से भाव है प्राकृतिक स्रोतों का उचित प्रयोग करना तथा कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुओं जैसे कीटनाशक, खादें, नदीननाशक आदि का भी उचित प्रयोग करना। खेत को एक जैसा न समझ कर उपरोक्त वस्तुओं की कुछ स्थानों पर अधिक तथा कुछ स्थानों पर कम प्रयोग की आवश्यकता होती है। इस प्रकार एक ही खेत में भिन्नभिन्न स्थानों पर आवश्यकता अनुसार कीड़े-मकौड़े तथा रोगों से प्रभावित भाग में स्प्रे, खादों का प्रयोग करके वातावरण भी दूषित नहीं होता तथा पैदावार भी बढ़ती है तथा दवाइयां, खादों पर अनावश्यक खर्चा भी नहीं होता।

प्रश्न 5.
पानी की बचत करने के लिए क्या पद्धति अपनाओगे ?
उत्तर-
लेज़र कराहे का प्रयोग करके खेत को समतल किया जाए तो पानी की काफ़ी बचत की जा सकती है। इस प्रकार धान की फसल में टैंशीयोमीटर का प्रयोग करके भी पानी की बचत की जा सकती है।

प्रश्न 6.
मौसमी (ऋतु) परिवर्तन का गेहूँ की कृषि पर क्या प्रभाव हो सकता है ?
उत्तर-
मौसमी (ऋतु) परिवर्तन के कारण फरवरी-मार्च में तापमान में वृद्धि होने के कारण पैदावार पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

प्रश्न 7.
ग्रीन हाऊस के भीतर तापमान में क्यों वृद्धि होती है ?
उत्तर-
शीशे या प्लास्टिक के बने घरों में जिनके अन्दर पौधे उगाए जाते हैं ; इनको हरे घर कहा जाता है। शीशे या प्लास्टिक में सूर्य की किरणें अन्दर प्रवेश कर सकती हैं परन्तु अन्दर से इनफ्रारेड किरणें बाहर नहीं निकल सकी। इस प्रकार शीशे या प्लास्टिक के घर के अन्दर गर्मी बढ़ जाती है तथा तापमान बढ़ जाता है।

प्रश्न 8.
ग्रीन हाऊस गैसों के नाम लिखो।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 9.
बी० टी० किस्मों ने पंजाब में कपास उत्पादन को किस प्रकार प्रभावित किया है ?
उत्तर-
बी० टी० किस्मों को पंजाब में वर्ष 2006 से बोना शुरू किया गया। इस फ़सल से पहले पंजाब में नरमे की फसल लगभग तबाह हो गई थी। अमरीकन सूंडी के हमले के कारण नरमे की पैदावार सिर्फ 2-3 क्विटल रुई प्रति एकड़ रह गई थी परन्तु बी० टी० नरमा बोने के बाद पैदावार 5 क्विटल रुई प्रति एकड़ से भी बढ़ गया है। कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग भी कम हो गया है जिस कारण वातावरण भी प्रदूषित नहीं होता तथा किसानों का अधिक खर्चा भी नहीं होता है।

प्रश्न 10.
सूक्ष्म कृषि में कौन सी उच्च तकनीकें प्रयोग में लाई जाती हैं ?
उत्तर-
सूक्ष्म कृषि में कई उच्च तकनीकों का प्रयोग किया जाता है ; जैसे-सैंसर्स, जी० पी० एस० अन्तरिक्ष तकनीक आदि।

(ग) पांच-छ: वाक्यों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
पंजाब में कौन-सी जी० एम० फसल बोई जाती है और इसके क्या लाभ
उत्तर-
पंजाब में जी० एम० फसलों में नरमे की फसल बोई जाती है। इस को बी० टी० नरमा कहा जाता है। अब कई अन्य जी० एम० फसल ; जैसे बैंगन, मक्की, सोयाबीन तथा धान आदि भी तैयार कर लिया जाता है। बी० टी० फसलों में बैसीलस थुरैजीनिसेंस नामक बैक्टीरिया का जीन डाला जाता है। इस कारण फसल में रवेदार प्रोटीन पैदा होता है जो कि सूंडियों के लिए ज़हर का काम करता है तथा सूंडिया इसको खा कर 3-4 दिन में मर जाती हैं। बी० टी० किस्में अमेरिकन सूंडी, गुलाबी सूंडी और तंबाकू की सूंडी का मुकाबला कर सकती है। पर कोई ओर सूंडी का नहीं। इसलिए बालगार्ड-1 किस्म जिसमें एक बी० टी० जीन था। इसकी जगह पर बालगार्ड-2 किस्म तैयार की गई है जिसमें बी० टी० जीन की दो किस्में हैं। ये किस्म अमेरिकन सूंडी और अन्य अन्य सूंडियों का मुकाबला कर सकती हैं। . बी० टी० नरमे को कृषि पंजाब में 2006 में शुरू की गई है। इस की कृषि से पहले नरमे की पैदावार 2-3 क्विटल रुई प्रति एकड़ रह गई थी। बी० टी० किस्म का प्रयोग करने के कारण कीटनाशक की ज़रूरत कम हो गई है जिसके साथ वातावरण शुद्ध रहता है।

प्रश्न 2.
जी० एम० फसलों से होने वाली संभावित संकट कौन-से हैं ?
उत्तर-
जी० एम० फसलों की जब से खोज हुई तब से ही बहुत सारी संस्थाओं ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया था। ये संस्थाएं वातावरण भलाई, सामाजिक, मनुष्य के स्वास्थ्य के साथ संबंधित संस्थाएं और कई वैज्ञानिक भी इसके विरोध में हैं। उनके अनुसार जी० एम० मनुष्य की स्वास्थ्य, वातावरण, फ़सलों की प्रजातियाँ और अन्य पौधों के लिए हानिकारक हैं और उन पर बुरा असर पड़ता है। कई देशों में इन फ़सलों की पैदावार पर रोक लगाई गई है। पर इनके बुरे असर का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।

प्रश्न 3.
पौध प्रकार एवं किसान अधिकार सुरक्षा अधिनियम के मुख्य उद्देश्य क्या
उत्तर-
पौध प्रकार एवं किसान अधिकार सुरक्षा अधिनयम के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित-

  • प्लांट ब्रीडर द्वारा पैदा की गई नई पौध किस्म के ऊपर अधिकार स्थापित करना।
  • किसान का कई सालों से संभाली और सुधारी पौध किस्म पर उसका अधिकार स्थापित करना।
  • किसान को सुधरी किस्मों का अच्छा बीज और पौध सामग्री की प्राप्ति करवाना।

प्रश्न 4.
ग्रीन हाऊस गैसों का वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
ग्रीन हाऊस गैसों का वातावरण पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। ग्रीन हाऊस गैसों के बढ़ने के कारण धरती की सतह का तापमान बढ़ रहा है, पिछले 100 सालों में इसके तापमान में 0.5°C की बढ़ोत्तरी हुई है और साल 2050 तक इसमें 3.2°C की बढ़ोत्तरी होने की संभावना है। इस तरह तापमान में वृद्धि के कारण आगे लिखे बुरे प्रभाव पड़ सकते हैं। बाढ़, अकाल पढ़ना, ग्लेशियर पिघलना, जिसके साथ समुद्री पानी के स्तर का बढ़ना, मानसून वर्षा में उतार-चढ़ाव तथा अनिश्चितता का बढ़ना, समुद्री तूफ़ान और चक्रवात आदि में वृद्धि होना।

प्रश्न 5.
मौसमी (ऋतु) परिवर्तन के कृषि पर क्या प्रभाव पड़ सकते हैं ?
उत्तर-
मौसमी बदलाव के कारण खेतीबाड़ी में कई तरह के बुरे प्रभाव पड़ सकते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती की सतह का तापमान बढ़ रहा है जिस कारण कई तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं।

  • तापमान में वृद्धि के कारण फसलों का जीवन काल, फसली चक्कर और फ़सलों की कृषि के समय पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • तापमान और हवा में नमी के बढ़ने के कारण कई तरह की नई बीमारियाँ और नए कीड़े-मकौड़े फसलों की हानि कर सकते हैं।
  • गेहूँ की पैदावार को फरवरी-मार्च में तापमान में हुई वृद्धि कम कर सकती है।
  • मानसून की अनिश्चितता के कारण खेती पैदावार कम हो सकती है।
  • रात के तापमान में वृद्धि के कारण खेती पैदावार कम हो सकता है।
  • कई देशों में तापमान में वृद्धि के कारण फसल की पैदावार पर अच्छे-प्रभाव भी हो सकते हैं।

Agriculture Guide for Class 11 PSEB कुछ नए कृषि विषय Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जी० एम० फसलों को ओर क्या कहा जाता है ?
उत्तर-
ट्रांसजेनिक फसलें।

प्रश्न 2.
फसलों में अन्य किसी फसल या जीव के जीन को किस तकनीक के द्वारा डाला जाता है ?
उत्तर-
जैनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक द्वारा।

प्रश्न 3.
बी० टी० का पूरा नाम बताओ।
उत्तर-
बैसिलस थुरिजैनिसस।

प्रश्न 4.
बी० टी० क्या है ?
उत्तर-
ज़मीन में मिलने वाला एक बैक्टीरिया।

प्रश्न 5.
बी० टी० नरमे (कपास) के अलावा और कौन-सी फसलें तैयार की गई हैं ?
उत्तर-
बैंगन, मक्की, सोयाबीन, धान आदि।

प्रश्न 6.
किस तकनीक का प्रयोग करने के बाद कौन-सी किस्म को रजिस्टर नहीं कर सकते ? …
उत्तर-
टर्मीनेटर,तकनीक वाली फसल को।

प्रश्न 7.
फसली किसम की रजिस्ट्रेशन कितने समय के लिए करवाई जा सकती है ?
उत्तर-
6 साल के लिए जिसको 15 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 8.
फसल की किस्म को रजिस्टर कराने के लिए जानकारी प्राप्त करने के लिए वैबसाइट बताओ।
उत्तर-
www. plantauthority. gov.in

प्रश्न 9.
सूक्ष्म कृषि का सिद्धान्त कौन-से किसानों के लिए लागू होता है ?
उत्तर-
छोटे और बड़े किसानों दोनों के लिए।

प्रश्न 10.
विकसित देशों में कौन-से यंत्र की सहायता से सही मात्रा में खाद डाली जाती है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन सैंसर यंत्र।

प्रश्न 11.
विकसित देशों में किस तकनीक की सहायता से खेतों को मापा जाता
उत्तर-
जी० पी० एस० तकनीक के साथ।

प्रश्न 12.
धान के खेत में लंबे समय तक पानी खड़ा रहने से कौन-सी गैस पैदा होती है ?
उत्तर-
मीथेन गैस।

प्रश्न 13.
नाइट्रोजन की खाद के अधिक प्रयोग के कारण कौन-सी ग्रीन हाऊस गैस पैदा होती है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन ऑक्साइड।

प्रश्न 14.
रात के तापमान में वृद्धि के कारण फ़सलों की पैदावार पर क्या असर पड़ता है ?
उत्तर-
पैदावार कम हो सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बालगार्ड-2 की कौन-सी किस्में हैं ?
उत्तर-
एम० आर० सी० 7017, एम० आर० सी०-7031, आर० सी० एच०-650, एन० सी० एस०-855 आदि बालगार्ड-2 की किस्में हैं।

प्रश्न 2.
PPV तथा FR एक्ट के अनुसार कौन-सी फसलों को रजिस्टार करवाया जा सकता है ?
उत्तर-
इस एक्ट के अनुसार ज्वार, मक्की , बाजरा, गेहूं, धान, गन्ना, कपास, मटर, अरहर, मसर, हल्दी, चने आदि फ़सलों को रजिस्टर करवाया जा सकता है।

प्रश्न 3.
PPV तथा FR एक्ट के अनुसार कौन-सी फसलों की रजिस्ट्रेशन नहीं हो सकती ?
उत्तर-
ऐसी कोई भी किस्म जो मनुष्य के स्वास्थ्य, वातावरण या पौधों के लिए हानिकारक हो। टर्मीनेटर तकनीक वाली किस्मों को भी रजिस्टर नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 4.
टर्मीनेटर तकनीक किस्मों द्वारा पैदा की गई किस्मों को रजिस्टर क्यों नहीं करवाया जा सकता ?
उत्तर-
टर्मीनेटर तकनीक के साथ तैयार की गई बीजों की फसल के बीज में उगने की शक्ति नहीं होती है।

प्रश्न 5.
PPV तथा FR एक्ट के उल्लंघन की सजा के बारे में बताओ।
उत्तर-
गलत जानकारी देना जैसे रजिस्ट्रर्ड किस्म का गलत नाम, देश का गलत नाम या प्रजनन करता का गलत नाम और पता देने से एक्ट का उल्लंघन होता है। इसकी सजा के तौर पर जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

प्रश्न 6.
सूक्ष्म कृषि का स्पष्ट संदेश क्या है ?
उत्तर-
सूक्ष्म कृषि का स्पष्ट संदेश यह है कि खेत के किसी भाग में क्या कमी है, इसको जाने बगैर केवल अधिक खादों का प्रयोग करके इन कमियों को पूरा नहीं किया जा सकता।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न-
ग्रीन हाऊस गैसों और ग्रीन हाऊस के सिद्धांत के बारे में बताओ। धरती के लिए इसका संबंध बताओ।
उत्तर-
ग्रीन हाऊस गैसें हैं-कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस डाइऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मीथेन आदि।
शीशे या प्लास्टिक के बने घरों को जिनके अंदर पौधे उगाए जाते हैं, इनको हरे घर कहा जाता है। शीशे या प्लास्टिक में सूरज की किरणें अंदर तो आ जाती हैं पर अंदर से इनफ्रारेड किरणे बाहर नहीं निकल सकतीं, इस तरह शीशे या प्लास्टिक के घर में गर्मी बढ़ जाती है और तापमान अधिक हो जाता है।
ग्रीन हाऊस गैसों ने शीशे की तरह धरती को सभी तरफ से घेरा हुआ है और सूरज की गर्मी को धरती पर आने देती हैं पर धरती से बाहर नहीं जाने देती जिससे धरती का तापमान बढ़ जाता है जिसको ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। धरती का तापमान बढ़ने के कारण कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं, जैसे-बाढ़ों में वृद्धि, सूखा पड़ना, मानसून के समय में अंतर आना आदि।

कुछ नए कृषि विषय PSEB 11th Class Agriculture Notes

  • आदिकाल से ही मनुष्य कृषि का व्यवसाय करता आ रहा है।
  • नई तकनीकों का प्रयोग करके किसी ओर फ़सल या जीव जंतु का जीन किसी फ़सल में डाल कर इसको संशोधित जाता है।
  • जीन डाल कर संशोधित फ़सल को जी० एम० या ट्रांसजीनक फ़सलें कहा जाता है।
  • बी० टी० का अर्थ बैसिलस थुरिजैनिसस नाम के बैक्टीरिया से है।
  • बी० टी० नरमे (कपास) में एक रवेदार प्रोटीन पैदा होता है जिसको खाकर – सुंडियां मर जाती हैं।
  • बी० टी० नरमे (कपास) की बोलगार्ड-1 किस्म में सिर्फ एक बी० टी० जीन डाला गया था पर बोलगार्ड-2 में दो बी० टी० जीन डाले गए हैं।
  • बी० टी० नरमे की किस्म से पैदावार पाँच क्विंटल कपास प्रति एकड़ से भी ज्यादा मिलता है।
  • बी० टी० किस्मों के प्रयोग के कारण कीटनाशकों के प्रयोग पर भी रोक लगी
  • बैंगन, सोयाबीन, मक्की, चावल आदि की भी जी० एम० फ़सलें तैयार की जा चुकी हैं।
  • कई संस्थाएं जी० एम० फसलों को मनुष्यों के स्वास्थ्य, वातावरण, फ़सलों की । प्रजातियाँ तथा अन्य पौधों के लिए हानिकारक मानते है और इसका विरोध करते हैं।
  • किसानों के अधिकार और पौधे किस्मों के संबंध में 2001 में भारत सरकार ने पौध किस्म और किसान अधिकार सुरक्षा एक्ट पास किया।
  • फ़सली किस्मों की रजिस्ट्रेशन की सीमा शुरू में 6 वर्ष और बाद में अर्जी दे कर सीमा ज्यादा-से-ज्यादा 15 साल तक बढ़ायी जा सकती है।
  • वृक्ष और बेलदार वाली फ़सलों का समय पहले 9 साल तथा बढ़ा कर 18 साल तक हो सकता है।
  • रजिस्ट्रेशन की जानकारी वैबसाइट www. plantauthority. gov.in से प्राप्त हो सकती है।
  • विकसित देशों में सूक्ष्म कृषि के लिए सैंसरज, जी० पी० एस०, अंतरिक्ष ) तकनीकों आदि का प्रयोग किया जाता है।
  • विकसित देशों में नाइट्रोजन सैंसर यंत्रों के प्रयोग से खाद की सही मात्रा का प्रयोग किया जाता है।
  • लेज़र कराहा और टैंशीयोमीटर के प्रयोग से हम पानी की बचत कर सकते हैं।
  • कई विकसित देशों में जी० पी० एस० तकनीक के प्रयोग से खेतों को नापा जाता है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले सौ सालों में ग्लोबल वार्मिंग हुई है और धरती की सतह पर तापमान 0.5°C बढ़ गया है।
  • ग्रीन हाऊस गैसें हैं-कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रसऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, मिथेन आदि।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 निर्वाचक

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 9 निर्वाचक Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 9 निर्वाचक

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
स्त्री मताधिकार से क्या अभिप्राय है ? स्त्री मताधिकार के विपक्ष में अपने चार तर्क दें। (What is Woman suffrage ? Write four arguments against women suffrage.) (P.B. 2017)
अथवा
स्त्री मताधिकार के पक्ष और विपक्ष में तर्क दें। (Give arguments for and against the Women Franchise.)
अथवा
स्त्री मताधिकार के पक्ष में तर्क दीजिए। (Give arguments for Women Suffrage.)
अथवा
स्त्री मताधिकार के पक्ष व विपक्ष में तर्क दीजिए। (Make a case for and against Women Suffrage.)
उत्तर-
महिला मताधिकार का अर्थ महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार देना है। लोगों में इस बात पर काफ़ी मतभेद रहा है कि स्त्रियों को मत का अधिकार मिलना चाहिए या नहीं। आधुनिक युग में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो स्त्रियों को मताधिकार देने के पक्ष में नहीं हैं। इंग्लैण्ड जैसे उदारवादी देश में भी स्त्रियों को समानता के आधार पर मताधिकार सन् 1928 में दिया गया था। अमेरिका में सन् 1920 में और फ्रांस में सन् 1946 में, स्विट्ज़रलैण्ड में जिसे प्रजातन्त्र का घर माना जाता है, स्त्रियों को मत डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार सन् 1971 तक प्राप्त नहीं था लेकिन भारतीय संविधान में 1950 से ही स्त्रियों को मताधिकार दिया गया है। स्त्री मताधिकार के पक्ष तथा विपक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं.

स्त्री मताधिकार के विपक्ष में तर्क (Arguments against Women Suffrage)-स्त्री मताधिकार के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं
1. स्त्री का कार्य क्षेत्र घर है-यदि स्त्री को मत देने का अधिकार दिया जाए तो वह घर की ओर ठीक से ध्यान न दे सकेगी। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा घर की शान्ति समाप्त हो जाएगी।

2. स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति-अधिकतर स्त्रियां, अपने पति, पिता या भाई अदि के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं। वे अपनी ओर से यह सोचने का प्रयत्न नहीं करतीं कि वोट किसे देना चाहिए।

3. घरेलू शान्ति के भंग होने का खतरा-यदि स्त्री मताधिकार लागू किया जाए तो इससे घरेलू शान्ति भंग होने का बहुत भय रहता है।

4. स्त्रियां शारीरिक तौर पर दुर्बल होती हैं-यह भी कहा जाता है कि स्त्रियां शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होती हैं और अधिक परिश्रम नहीं कर सकतीं। वे पुरुष के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर राजनीति में भाग नहीं ले सकतीं।

5. स्त्रियां राजनीति के प्रति उदासीन रहती हैं-यह देखा गया है कि प्रायः स्त्रियां राजनीति के प्रति उदासनी रहती हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें अपने घरेलू मामलों से ही अवकाश नहीं मिलता।

6. स्त्रियों में आत्म-विश्वास नहीं होता-स्त्रियों में आत्म-विश्वास और आत्म-निर्णय की भावना नहीं होती क्योंकि वे पुरुषों पर निर्भर रहती आई हैं। स्त्रियों के विचार भी रूढ़िवादी होते हैं और उन्हें राजनीतिक जीवन का अनुभव भी नहीं होता।

7. भ्रष्टाचार-राजनीति में कई प्रकार की चालबाजियां प्रयोग करके ही व्यक्ति सफल होते हैं। स्त्रियों के वे गुण जिनके कारण उनका आदर-मान है, समाज में समाप्त हो जाएगा।

8. स्त्रियां रूढ़िवादी होती हैं-इस प्रकार उनको मताधिकार देने का अर्थ है प्रगति के रास्ते में बाधाएं उत्पन्न करना।

9. स्त्रियां भावुक होती हैं-भावना में बहकर स्त्रियां मताधिकार का उचित प्रयोग नहीं कर सकतीं। राजनीति में भावनाओं का कोई स्थान नहीं है।

10. स्त्रियों के सम्मान में कमी-वर्तमान समय में राजनीति में गलत आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं, जिसके चलते स्त्रियां भी इस प्रकार की गंदी राजनीति से बच नहीं पायेंगी। इससे स्त्रियों के सम्मान में कमी आयेगी।

11. प्राकृतिक गुणों का नाश-स्त्रियों में दया, सहानुभूति, प्रेम, सहनशीलता तथा कोमलता जैसे प्राकृतिक गुण पाए जाते हैं, राजनीति में आने के कारण इन गुणों के समाप्त होने की सम्भावना बनी रहती है। – स्त्री मताधिकार के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of Woman Suffrage)-प्रायः सभी देशों में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं, मत डालने का भी और चुनाव लड़ने का भी।

स्त्री मताधिकार के पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं-
1. लिंग के आधार पर मताधिकार से वंचित रखना उचित नहीं-मिल (Mill) का कहना है कि मत का अधिकार स्वाभाविक है, अतः स्त्री को केवल लिंग के आधार पर मताधिकार से वंचित रखना न्याय-संगत नहीं है।

2. यह लोकतन्त्रात्मक है-स्त्रियों को मत का अधिकार देना लोकतन्त्र के सिद्धान्त के अनुसार है। लोकतन्त्र में समस्त जनता को शासन में भाग लेने का अधिकार मिलता है और जनता में जितना भाग पुरुष का है उतना ही स्त्री का

3. स्त्रियों को मताधिकार की अधिक आवश्यकता-शारीरिक दृष्टि से निर्बल व्यक्ति को कानून की रक्षा की अधिक आवश्यकता होती है। जो सबल है वह तो कानून को भी अपने हाथ में ले सकता है।

4. स्त्रियां दूसरे सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं-इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रशासन के क्षेत्र में भी स्त्रियों ने बड़ा प्रशंसनीय कार्य किया है। आजकल पुलिस और सेना में भी स्त्रियां काम कर रही हैं, फिर राजनीति के क्षेत्र में वे कार्य क्यों नहीं कर सकेंगी।

5. कानून मानने वालों को ही कानून बनाने का अधिकार होना चाहिए-राज्य के कानून स्त्री-पुरुष दोनों पर ही समान रूप में लागू होते हैं, दोनों पर समान रूप से ही कर लगते हैं। फिर पुरुष को ही कानून बनाने का अधिकार क्यों ? यह अधिकार दोनों को समान रूप से मिलना चाहिए।

6. स्त्रियां शान्तिप्रिय होती हैं-स्त्रियां स्वभाव से ही शान्ति-प्रिय होती हैं और इससे राजनीति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

7. स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति नहीं होता-यदि स्त्री अपने पति के अनुसार ही अपना मत देती है तो उसमें हानि क्या है। स्त्री का राजनीतिक क्षेत्र में महत्त्व बना रहता है।

8. राजनीति शुद्ध होगी-स्त्रियां अपनी कोमलता, मृदु भाषण और सहानुभूति से राजनीतिक क्षेत्र में व्यस्त पुरुषों की कठोरता, निर्दयता, बेईमानी और चालबाज़ी को दूर कर देंगी।

9. मताधिकार स्त्री के प्राकृतिक कार्यों में कोई रुकावट नहीं-भारत, इंग्लैण्ड, रूस, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अनेक देशों में स्त्रियों को मताधिकार दिया गया है और इन देशों में स्त्रियां अपने प्राकृतिक कार्यों को बड़ी सफलता से पूरा कर रही हैं।

10. नागरिक अधिकार तथा राजनीतिक अधिकार साथ-साथ चलते हैं- यदि स्त्रियों को राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होंगे तो उनको नागरिक अधिकार देने का कोई महत्त्व नहीं रहेगा।

11. स्त्रियां पुरुषों से पीछे नहीं-अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति में भी स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा पीछे नहीं हैं। जिस प्रकार पुरुष जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है उसी तरह स्त्रियां भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं। भारत में स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गान्धी, इंग्लैण्ड में एलिज़ाबेथ द्वितीय एवं मारग्रेट थैचर, इज़रायल में स्वर्गीय प्रधानमन्त्री गोल्डा मायर और श्रीलंका की भूतपूर्व एवं स्वर्गीय प्रधानमन्त्री श्रीमती भण्डारनायके जैसी महिलाएं इस बात के स्पष्ट उदाहरण हैं।

12. मानसिक रूप से भी दृढ़-स्त्रियां मानसिक रूप से भी पुरुषों के समान ही दृढ़ हैं। जिस प्रकार की सुविधाएं पुरुषों को मिलती हैं, यदि वैसी ही सुविधाएं स्त्रियों को भी मिलें तो स्त्रियां बेशक पुरुषों से आगे भी जा सकती हैं। वर्तमान समय में बहुत-सी स्त्रियां अच्छी शिक्षा प्राप्त करके राजनीतिक एवं प्रशासनिक पदों पर विराजमान हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)-स्त्री मताधिकार के विरोध में कई तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं, उनमें अधिक जान नहीं है। स्त्री मताधिकार के लाभ बहत होते हैं और प्रायः सभी लोकतन्त्रीय देशों में स्त्रियों को पुरुषों के साथ समान रूप से मत डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार दिया जाता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 निर्वाचक

प्रश्न 2.
व्यस्क मताधिकार से क्या अभिप्राय है ? वयस्क मताधिकार के पक्ष तथा विपक्ष में दो-दो तर्क दीजिए।
(What is meant by Adult Franchise ? Write two arguments in favour and two in against Adult Franchise.)
अथवा
वयस्क मताधिकार के पक्ष और विपक्ष में दलीलें दो। (Write arguments in favour of and against Adult Franchise.).
अथवा
वयस्क मताधिकार के पक्ष व विपक्ष में तर्क दो।। (Give arguments for and against Adult Franchise.)
उत्तर-
वयस्क मताधिकार किसे कहते हैं ? (What is Franchise or Adult Suffrage ?) आज प्रजातन्त्र का युग है और सभी नागरिकों को समान रूप से मत डालने तथा चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया है अर्थात् आज सभी लोकतन्त्रात्मक देशों में वयस्क मताधिकार (Adult Franchise) का सिद्धान्त अपनाया गया है।

जब देश के सभी वयस्कों (Adults) जाति, धर्म, रंग, वंश, धन, स्थान आदि के आधार पर उत्पन्न भेदभाव के बिना, समान रूप से मतदान का अधिकार दे दिया जाए तो उस व्यवस्था को वयस्क मताधिकार या सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के नाम से पुकारा जाता है। वयस्क होने की उम्र राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। इंग्लैण्ड और रूस में यह आयु 18 वर्ष है जबकि स्विट्ज़रलैण्ड में यह आयु 20 वर्ष है। भारत में पहले यह आयु 21 वर्ष की थी परन्तु 61वें संशोधन द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है। निश्चित आयु होने के पश्चात् प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के मत डालने का अधिकार बन जाता है। हां, एक निश्चित समय तक निवास की शर्त भी रखी जाती है।।

वयस्क मताधिकार के पक्ष में तर्क (Arguments in Favour of Adult Franchise)-आधुनिक युग में वयस्क मताधिकार को ही उचित तथा न्यायसंगत माना गया है। इसके पक्ष में अग्रलिखित तर्क दिए जाते हैं

1. प्रभुसत्ता जनता के पास है (Sovereignty is possessed by the People)-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता के पास होती है और जनता की इच्छा तथा कल्याण के लिए शासन चलाया जाता है। जनता में अमीर-गरीब तथा अशिक्षित-शिक्षित सभी सम्मिलित हैं। इसलिए मत डालने का अधिकार सबको समानता के साथ मिलना चाहिए। यदि वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त लागू न किया जाए तो जनता की प्रभुसत्ता की बात सत्य सिद्ध नहीं होती।।

2. कानून का प्रभाव सब पर पड़ता है (Laws of State affects all the People)-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। कानून की दृष्टि में सब नागरिक समान समझे जाते हैं और एक ही कानून सब लोगों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सब को समान रूप से मिलना चाहिए। मिल (Mill) का कहना है कि, “लोकतन्त्र व्यक्ति की समानता का समर्थन करता है और राजनीतिक समानता उसी समय मिल सकती है जब सब नागरिकों को वोट का अधिकार दिया जाए। सरकार के कानूनों और नीतियों का सम्बन्ध सब लोगों के साथ है और जो सब पर प्रभाव डालता है। अतः इसका निर्णय सब के द्वारा होना चाहिए।”

3. समानता के सिद्धान्त पर आधारित (Based on the Principles of Equality)-संविधान नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है और समानता का सिद्धान्त लोकतन्त्र का मूल सिद्धान्त है। वयस्क मताधिकार समानता के सिद्धान्त पर आधारित है क्योंकि सभी नागरिकों को जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के भेदभाव के बिना मताधिकार दिया जाता है।

4. कानूनों का प्रभाव सब पर पड़ता है (Laws effect all the people)-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। कानून की दृष्टि में सब नागरिक समान समझे जाते हैं और एक ही कानून सब लोगों पर समान रूप से लागू होते हैं इसलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सबको समान रूप से मिलना चाहिए। मिल (Mill) का कहना है कि, “लोकतन्त्र व्यक्ति की समानता का समर्थन करता है और राजनीतिक समानता उसी समय मिल सकती है जब सब नागरिकों को वोट का अधिकार दिया जाए। सरकार के कानूनों और नीतियों का सम्बन्ध सब लोगों के साथ है और यह सब पर प्रभाव डालता है, अतः सबके द्वारा ही उसका निर्णय होना चाहिए।”

5. व्यक्ति के विकास के लिए मताधिकार आवश्यक (Right to vote is essential for the development of an individual)-लोकतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का विकास करने के लिए कई प्रकार के अधिकार मिलते हैं। उन अधिकारों में मताधिकार भी आवश्यक है और इनके बिना कोई भी व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता। दूसरे अधिकारों की रक्षा के लिए मताधिकार आवश्यक है। जिन लोगों के पास राजनीतिक अधिकार नहीं होते, उनके नागरिक और आर्थिक अधिकार भी सुरक्षित नहीं रह सकते।

6. सरकार को अधिक बल मिलता है (Government becomes strong)-समस्त जनता अर्थात् वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी गई सरकार अधिक शक्तिशाली रहती है। इसका कारण यह है कि ऐसी सरकारों को यह विश्वास रहता है कि उसके साथ समस्त जनता है और वह जो भी कार्य करेगी सभी नागरिक उसे मानेंगे। यदि कुछ नागरिकों को मत का अधिकार न होगा तो सरकार समस्त जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती और उसे भय रहेगा कि ऐसे नागरिक कहीं उसके विरुद्ध न हों।

7. लोगों में राजनीतिक जागृति (Political awakening among the people)-वयस्क मताधिकार से लोगों में राजनीतिक जागृति उत्पन्न होती है और उन्हें राजनीतिक शिक्षा भी मिलती है। जिस व्यक्ति को मत डालने का अधिकार नहीं मिलता, वह राजनीतिक कार्यों के प्रति उदासीन रहता है परन्तु चुनाव के दिनों में राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदाताओं की राजनीतिक निद्रा को भंग करके उनमें सार्वजनिक कार्यों के प्रति रुचि उत्पन्न करते हैं।

8. लोगों में स्वाभिमान की जागृति (Self-respect among the people)-मताधिकार द्वारा लोगों में स्वाभिमान की भावना जागृत होती है। चुनावों के समय प्रत्येक उम्मीदवार को चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, धनी-निर्धनों सभी के पास जा कर वोट के लिए निवेदन करना पड़ता है। इससे लोग यह समझने लगते हैं उनका शासन में भाग है, सरकार को बनाने में उनका भी हाथ है। वे अपने को देश का महत्त्वपूर्ण अंग समझने लगते हैं। उनमें हीनता की भावना नहीं रहती।

9. राष्ट्रीय एकता (National Unity)-राष्ट्रीय एकता के लिए भी वयस्क मताधिकार का होना आवश्यक है। यदि कुछ व्यक्तियों को ही मताधिकार प्राप्त होगा तो समस्त जनता सरकार को अपना नहीं समझ सकती। जनता दो गुटों में बंट जाएगी और जिन लोगों को वोट का अधिकार न होगा, वे कभी भी सरकार का साथ देने से इन्कार कर सकते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति नहीं हो सकती, परन्तु वयस्क मताधिकार के कारण सभी नागरिक राज्य को अपना समझने लगेंगे। भारत में वयस्क मताधिकार ने राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन दिया है।

10. क्रान्ति का भय नहीं रहता (No danger of revolution)—वयस्क मताधिकार के अनुसार चुनी हुई सरकार समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करती है और इस सरकार के द्वारा जनता के हितों का पूरा-पूरा आदर किया जाना स्वाभाविक ही है। दूसरे, यदि सरकार जनमत का उल्लंघन करे तो लोगों के पास साधन है जिसके द्वारा यह उसे अपदस्थ कर सकते हैं। इन कारणों के परिणामवस्वरूप देश में शान्ति और व्यवस्था बनी रहती है और क्रान्ति का भय नहीं रहता। भारत में वयस्क मताधिकार के कारण क्रान्ति नहीं हुई। मताधिकार द्वारा जनता जब चाहे सरकार बदल सकती है। 1977 में जनता ने कांग्रेस सरकार को हरा कर सत्ता जनता पार्टी को सौंप दी। इसी प्रकार अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन शान्तिपूर्ण ढंग से हुआ।

11. सभी लोग कर देते हैं (All people are tax payers)-सभी लोग कर देते हैं। आज कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो कर न देता हो। बिक्री कर, उत्पादन शुल्क आदि सभी लोग देते हैं। इसलिए यह अधिकार सभी वयस्कों को मिलना चाहिए।

12. शान्ति और व्यवस्था स्थापित रहती है (Peace and order remain established)-वयस्क मताधिकार के सिद्धान्त को लागू करने से देश में शान्ति और व्यवस्था स्थापित होती है। कानून जनता के प्रतिनिधियों द्वारा उनकी इच्छानुसार बनाए जाते हैं। इस कारण उसका पालन सहज भाव से ही होता है। जनता का सरकार के साथ पूर्ण सहयोग होता है और इन बातों के कारण कानूनों का उल्लंघन बहुत कम होता है और शान्ति व व्यवस्था बनी रहती है।

13. अल्पसंख्यक सन्तुष्ट (Minorities feel satisfied)—प्रत्येक देश में अल्पसंख्यक पाए जाते हैं और भारत में धार्मिक, भाषायी व सांस्कृतिक अल्पसंख्यक रहते हैं। वयस्क मताधिकार के कारण अल्पसंख्यकों को अपने हितों एवं अधिकारों की रक्षा का अवसर मिल जाता है। वयस्क मताधिकार से अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व मिल जाता है। मताधिकार प्राप्त करके अल्पसंख्यक सन्तुष्ट रहते हैं और बहुसंख्यक भी उन पर किसी प्रकार की ज्यादती नहीं कर सकते हैं।

14. नागरिक-कल्याण के लिए सरकार की स्थापना (Establishment of a Government for the welfare of all) यदि मताधिकार कुछ व्यक्तियों को ही प्राप्त होगा तो सरकार केवल कुछ व्यक्तियों के कल्याण के लिए ही कानून बनाएगी परन्तु वयस्क मताधिकार के कारण सरकार सभी के कल्याण के लिए कार्य करेगी जोकि उचित भी है।

वयस्क मताधिकार के विपक्ष में तर्क (Arguments against Adult Franchise)-बहुत-से व्यक्ति ऐसे भी हैं जो वयस्क मताधिकार के विरुद्ध हैं और अपनी बात की पुष्टि के लिए बहुत-से-तर्क प्रस्तुत करते हैं-

1. शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए (Right to Vote only to the Educated)-बहुतसे लोगों का कहना है कि शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए। शिक्षित व्यक्ति अपने मत का ठीक प्रयोग कर सकता है। मिल का कहना है कि वयस्क मताधिकार से पहले शिक्षा को अनिवार्य बनाना आवश्यक है और जिसे लिखना-पढ़ना नहीं आता उसे वोट देने का अधिकार कभी नहीं मिलना चाहिए।

2. मूों का शासन (Government of the Fools)-वयस्क मताधिकार द्वारा मूल् का शासन स्थापित हो जाता है क्योंकि समाज में अनपढ़ और मूरों की संख्या अधिक होती है। सर जेम्स स्टीफेन (Sir James Stephen) का कहना है कि इससे जो वास्तविक तथा स्वाभाविक सम्बन्ध बुद्धि और मूर्खता में रहता है वह उल्ट जाएगा अर्थात् बुद्धिमानों को मूर्तों पर शासन करना चाहिए परन्तु इनसे मूर्ख बुद्धिमानों पर शासन करेंगे । (It inverts the time and national relation between wisdom and folly.) लेकी (Lecky) का भी यह मत है कि वयस्क मताधिकार द्वारा सत्ता उन व्यक्तियों के हाथों में चली जाएगी जो कंगाल, मूर्ख तथा निकम्मे हैं क्योंकि इनकी संख्या ही समाज में सबसे अधिक होती है।

3. मताधिकार सम्पत्ति के आधार पर मिलना चाहिए (Franchise should be Based on Property)कुछ लोगों का कहना है कि सम्पत्तिशाली व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए नहीं तो दूसरे लोग राष्ट्र के धन का दुरुपयोग करेंगे। मैकाले (Macaulay) का मत है कि ऐसी अवस्था में भूखे नंगे लोग सारी सम्पत्ति और वैभव को नष्ट करके आपस में छीना झपटी करके खा जाएंगे।

4. सब नागरिक समान नहीं (AII Citizens are not Equal)-इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि सभी नागरिक समान नहीं होते। प्रकृति ने सब व्यक्तियों को समान उत्पन्न नहीं किया। कुछ जन्म से मोटे, कुछ पतले, कुछ बुद्धिमान्, कुछ चतुर और कुछ बुद्धिहीन होते हैं। इसलिए समानता के आधार पर सभी वयस्कों को मताधिकार देना उचित नहीं है।

5. मत का दुरुपयोग (Misuse of Votes)–यदि अशिक्षित और निर्धन व्यक्तियों को भी मताधिकार दे दिया जाए तो वे इसका ठीक प्रयोग नहीं करेंगे। अशिक्षित व्यक्ति बिना सोचे-समझे अपने मत का प्रयोग कर अयोग्य व्यक्तियों का शासन स्थापित करेंगे और निर्धन व्यक्ति कुछ पैसों के लालच में आकर अपना वोट बेचने को तैयार हो जाएंगे। जाति, धर्म, वंश आदि के आधार पर भी मत का प्रयोग होगा और योग्यता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा।

6. स्त्रियों को मताधिकार नहीं मिलना चाहिए (No Right to Vote to Women)-कुछ लोगों का विचार है कि स्त्रियों को मत डालने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। इससे घरेलू शान्ति नष्ट होने का भय रहता है। वैसे भी स्त्रियां अपने मत का प्रयोग अपनी इच्छा से नहीं करतीं और न ही उनमें इतनी सूझ-बूझ होती है कि वे मत का उचित प्रयोग कर सकें।

7. शासन एक कला है (Governing is an Art) आज शासन.को एक कला माना जाता है जिसके सामने बहुत-सी जटिल समस्याएं होती हैं। इसलिए योग्य और अयोग्य का विचार किए बिना मताधिकार देना बुद्धिमत्ता नहीं कहा जा सकता। मत का अधिकार उसे ही दिया जाना चाहिए जो इसके योग्य हो।

8. मताधिकार एक पवित्र राष्ट्रीय कर्त्तव्य है (Franchise is a sacred National Duty) मताधिकार कोई खिलौना नहीं कि बच्चा उसके साथ जैसे चाहे खेलता रहे और जैसे चाहे उसका प्रयोग करे। मताधिकार एक राष्ट्रीय कर्तव्य है। इसका प्रयोग बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ किया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि यह अधिकार सोचसमझ कर केवल योग्य नागरिकों को ही मिलना चाहिए।

9. वैज्ञानिक उन्नति के विरुद्ध (Against Scientific Progress)—सर हैनरी मेन का यह विश्वास है कि वयस्क मताधिकार वैज्ञानिक उन्नति के विरुद्ध कार्य करेगा। साधारण व्यक्तियों को गुमराह करके चालाक और रूढ़िवादी लोग सत्ता में आ जाते हैं जिनके अधीन वैज्ञानिक उन्नति नहीं हो पाती।

10. मताधिकार कोई जन्म-सिद्ध अधिकार नहीं (Franchise is not a Birthright)-मिल तथा लेकी (Mill and Lecky) जैसे लेखकों का विचार था कि मतदान का अधिकार कोई जन्म-सिद्ध अधिकार नहीं है। वह तो केवल उनको ही मिलना चाहिए जो इसके ठीक प्रयोग के लिए योग्यता रखते हैं।

11. केवल मताधिकार से अन्य अधिकार सुरक्षित नहीं हो जाते (Suffrage alone does not protect other rights)—यह विचार ठीक नहीं है कि मताधिकार नागरिक के अन्य अधिकारों की आधारशिला है। केवल नागरिक को मताधिकार दे देने से उसके सामाजिक तथा आर्थिक अधिकार सुरक्षित नहीं हो जाते। नागरिकों के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए नागरिकों की सतत् जागरूकता, स्वतन्त्र न्यायपालिका, स्वतन्त्र प्रेस, स्वस्थ लोकमत, संगठित विरोधी दल आदि का होना अधिक आवश्यक है।

12. अधिक खर्चीला (More Expensive)—वयस्क मताधिकार से बहुत अधिक नागरिकों को मताधिकार प्राप्त हो जाता है। चुनाव के समय सरकार को बहुत अधिक व्यापक स्तर पर मतदान केन्द्रों की व्यवस्था करनी पड़ती है और उतने अधिक चुनाव अधिकारी नियुक्त करने पड़ते हैं। इससे बहुत अधिक खर्चा होता है और यह खर्चा अन्तिम रूप से गरीब जनता पर पड़ता है। उदाहरण के लिए 16वीं लोकसभा के चुनाव के समय भारत में मतदाताओं की संख्या 81 करोड़ से अधिक थी, जिस कारण चुनाव पर करोड़ों रुपए खर्च हुए।

जिन व्यक्तियों को मताधिकार नहीं मिलना चाहिए (Persons who should not be given the Right to Vote)-वयस्क मताधिकार लागू करने का यह अर्थ नहीं कि सभी वयस्क नागरिकों को पूर्ण रूप से मताधिकार दिया जाए। समाज में कुछ व्यक्ति या नागरिक ऐसे भी होते हैं जिन्हें मताधिकार नहीं दिया जा सकता-

  • नाबालिग (Minors). किसी भी राज्य में नाबालिग को मताधिकार नहीं दिया जा सकता।
  • पागल (Isane Persons)-ऐसे व्यक्तियों को भी जो पागल हों मताधिकार से वंचित रखा जाता है उन्हें मत प्रयोग के बारे में पता नहीं होता।
  • घोर अपराधी (Criminals)—घोर अपराधियों को भी मताधिकार से वंचित रखा जाता है ताकि उन्हें यह बात महसूस हो और भविष्य में अपराध न करें। अपने मत का दुरुपयोग करने वाले व्यक्तियों को भी इस अधिकार से वंचित रखा जाता है।
  • दिवालिए (Insolvent) दिवालिए को भी मतदान का अधिकार नहीं दिया जाता।
  • सरकारी कर्मचारी (Government Officials) कुछ विद्वानों का विचार है कि सरकारी कर्मचारी को भी मताधिकार नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि इससे वे राजनीति को भ्रष्ट करते हैं, परन्तु केवल कुछ ही देशों में सरकारी कर्मचारियों को मताधिकार से वंचित किया गया है।
  • धार्मिक नेता (Religious Leaders)-धार्मिक नेताओं को भी कई देशों में मताधिकार प्राप्त नहीं होता।
  • विदेशी (Aliens)-विदेशियों को भी मताधिकार प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि वे अपने देश के प्रति वफादार होते है।

निष्कर्ष (Conclusion) वयस्क मताधिकार के बिना लोकतन्त्र न तो पूर्ण है और न ही सफल हो सकता है। लोकतन्त्र जनता का शासन होता है किसी वर्ग विशेष का नहीं, इसलिए आवश्यक है कि अपनी सरकार चुनने का अधिकार सब को एक समान होना चाहिए। वयस्क मताधिकार ही प्रजातन्त्र का प्रतीक और सूचक है। आज प्रायः सभी लोकतन्त्रीय राष्ट्रों में वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त अपनाया गया है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 निर्वाचक

प्रश्न 3.
अनुपातिक प्रतिनिधिता का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके दो गुणों व दो दोषों का वर्णन करें।
(What do you understand by the term. ‘Proportional Representation ? Describe its two merits and two demerits.)
अथवा
आनुपातिक प्रतिनिधित्व के गुण और दोषों का वर्णन कीजिए। (Write down the merits and demerits of proportional representational system.)
उत्तर-
प्रजातन्त्रात्मक शासन में चुनी गई विधानपालिका के लिए आवश्यक है कि इसमें जनता के हर वर्ग और दल को पूरा-पूरा प्रतिनिधित्व मिले। परन्तु चुनाव के लिए जो प्रणाली आमतौर पर अपनाई जाती है, वह इस उद्देश्य की प्राप्ति में सफल नहीं हो सकती। यह प्रणाली है एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र और साधारण बहुमत की। इस प्रणाली के अनुसार एक निर्वाचन क्षेत्र में जितने भी उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हों, उनमें से जिसको दूसरे से अधिक वोटें प्राप्त हों वह विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस प्रणाली के कुछ गम्भीर दोष हैं जैसे कि-

(1) मान लो कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या एक हज़ार है और दो उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। मान लो चुनाव में एक उम्मीदवार को 501 वोटें मिली और दूसरे को 499। चूंकि पहले उम्मीदवार को दूसरे की अपेक्षा अधिक वोटें मिली हैं, वह निर्वाचित घोषित किया जाएगा। इसका दोष यह हुआ कि विधानमण्डल में 499 मतदाताओं को प्रतिनिधित्व नहीं प्राप्त हो सका।

(2) सन् 1971 के संसद् के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 43 प्रतिशत वोटें पड़ीं, परन्तु इसको संसद् में 68 प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं। इसी चुनाव में जनसंघ को 7 प्रतिशत वोटें पड़ी परन्तु संसद् में केवल चार प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं। इसी प्रकार कांग्रेस (संगठन) को 10 प्रतिशत से भी अधिक वोटें पड़ीं, परन्तु संसद् में इसे केवल 3 प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं। इसका दोष यह हुआ कि संसद् भारतीय जनता का ठीक अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं करती। इन दोषों को दूर करने के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का सुझाव दिया जाता है।

प्रश्न 4.
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व से क्या भाव है ? अल्पसंख्यओं को प्रतिनिधित्व देने वाली किन्हीं चार विधियों का वर्णन करें।
(What is meant by Minority Representation ? Explain any four methods by which minority representation can be possible.)
उत्तर-
हर देश में लोग कई आधार पर बंटे होते हैं। कई समूहों या वर्गों के लोग संख्या में दूसरे वर्गों के लोगों से कम होते हैं। ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक कहा जाता है जैसे कि भारत में ईसाई और पारसी लोग हैं।

लोकतन्त्र को वास्तविक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि देश के हर वर्ग व समूह को विधानमण्डल में उचित प्रतिनिधित्व मिले । उचित प्रतिनिधित्व का भाव यह है कि चुनाव प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि हर वर्ष में अपने प्रतिनिधि विधानपालिका में भिजवा सके ताकि हर वर्ग अपनी विचारधारा और दृष्टिकोण को पेश कर सके। यदि ऐसा नहीं हो सकेगा तो विधानमण्डल में कुछ ही बहुसंख्यक दलों या वर्गों के प्रतिनिधि होंगे और विधानमण्डल जनमत का दर्पण (Mirror of the Public Opinion) नहीं कहला सकेगा। मिल (Mill) ने भी कहा है कि, “लोकतन्त्र के लिए यह आवश्यक है कि अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।”

आजकल प्रायः सभी देशों में एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र (Single member Constituency) है और चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होता है। उसका एक काफ़ी बड़ा दोष है कि इस प्रणाली में बहुमत वर्ग को ही सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिलता है अर्थात् जिस वर्ग या राजनीतिक दल के मतदाताओं की संख्या बहुमत में हो उसका सभी क्षेत्रों में सफल होना स्वाभाविक है। इस तरह अल्पसंख्यक वर्ग या राजनीतिक दल के उम्मीदवार सभी क्षेत्रों में हार जाते हैं। कभी-कभी तो जहां कई राजनीतिक दल हों एक उम्मीदवार थोड़े से मत लेकर भी प्रतिनिधि चुना जाता है। मान लो एक दल को लगभग सभी क्षेत्रों में 60% मत प्राप्त होते हैं। इससे तो यह पता चलता है कि राज्य में केवल 60% मतदाताओं का ही वह दल प्रतिनिधित्व करता है और न्यायसंगत बात यह है कि संसद् में उस दल के कुल 60% सदस्य होने चाहिएं परन्तु वास्तव में उस दल को लगभग सभी स्थान प्राप्त हो जाते हैं। इसमें शेष 40 प्रतिशत लोगों को संसद् में कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलता और उनके हितों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। इससे लोकतन्त्र वास्तविक नहीं बन सकता। प्रजातन्त्र को वास्तविक प्रजातन्त्र बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उन 40 प्रतिशत लोगों को भी सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाए। एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र प्रणाली में तो अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलना सम्भव नहीं और कई बार तो उन्हें प्रतिनिधित्व मिलता ही नहीं। इसलिए कुछ ऐसे तरीके निकाले गए हैं जिसके द्वारा अल्पसंख्यक, वर्गों को कुछ उनकी संख्या के अनुसार, व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। इन तरीकों की विस्तारपूर्वक व्याख्या नीचे दी जा रही है-

1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation System)-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा सभी वर्गों या राजनीतिक दलों को उनकी संख्या के अनुपात से व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व मिलने की काफ़ी सम्भावना रहती है। बहुत ही छोटे दल या महत्त्वहीन दल को बेशक प्रतिनिधित्व न मिले, परन्तु अल्पसंख्यक कहे जाने वाले वर्गों को अवश्य स्थान मिल जाता है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के भी दो तरीके हैं—’एकल संक्रमणीय मत प्रणाली या प्राथमिकता मत प्रणाली तथा सूची प्रणाली।’

2. सीमित मत प्रणाली (Limited Vote System)-सीमित मत प्रणाली भी अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने का तरीका है। इस प्रणाली में बहु-सदस्यीय चुनाव क्षेत्र होते हैं और कम-से-कम तीन सदस्य चुने जाते हैं। प्रत्येक मतदाता को एक से अधिक परन्तु स्थानों की संख्या से कम मत दिए जाते हैं। मान लो एक क्षेत्र में 5 सदस्य चुने जाते हैं तो एक मतदाता को तीन वोटे मिलेंगे और वह अपने तीन वोट एक ही उम्मीदवार को नहीं दे सकता। बल्कि तीन अलग-अलग उम्मीदवारों को ही दे सकता है। इससे बहुसंख्यक वर्ग पांच में से तीन स्थान तो प्राप्त कर लेगा परन्तु दो स्थान फिर भी अल्पसंख्यक वर्गों को प्राप्त हो जाते हैं।

इसके गुण (Its Merits)-इस प्रणाली में कई गुण पाए जाते हैं-

(1) इस प्रणाली द्वारा अल्पसंख्यकों को व्यवस्थापिका में कुछ स्थान प्राप्त हो जाते हैं।
(2) यह तरीका आसान भी है क्योंकि इसमें मतों के संक्रमण की आवश्यकता नहीं होती। इसके दोष (Its Demerits)-इस प्रणाली के कई दोष भी हैं-

  • इससे अल्पसंख्यक वर्ग को संसद् में एक-दो स्थान बेशक मिल जाएं परन्तु अपनी संख्या के अनुपात में स्थान नहीं मिल सकते।
  • जिस देश में कई अल्पसंख्यक वर्ग हों, वहां यह प्रणाली उचित रूप से कार्य नहीं कर पाती। थोड़ी-थोड़ी संख्या वाले वर्गों को कोई स्थान प्राप्त होने की कोई सम्भावना नहीं होती, क्योंकि उनकी वोटें बंट जाती हैं।
  • यह प्रणाली एक सदस्यीय क्षेत्र में लागू नहीं हो सकती।
  • इस प्रणाली के अन्दर उप-चुनाव की कोई व्यवस्था नहीं हो सकती। जापान और इटली में इस प्रणाली को कुछ समय बाद बंद कर दिया गया था।

3. संचित मत प्रणाली (Cumulative Vote System)—संचित मत प्रणाली में बहु सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं। एक मतदाता को उतने ही मत मिलते हैं जितने कि सदस्य चुने जाने हों। मान लो उस क्षेत्र में 15 सदस्य चुने जाने हैं तो एक मतदाता को 15 वोट मिलते हैं। मतदाता को यह स्वतन्त्रता होती है कि वे अपने इन सभी वोटों का जैसे चाहे प्रयोग करे अर्थात् वह अपने सब वोट एक ही उम्मीदवार को दे सकता है और अलग-अलग उम्मीदवारों को भी।

इसके लाभ (Its Merits)-इस प्रणाली के कई गुण हैं। इस प्रणाली का यह लाभ है कि इसके द्वारा अल्पसंख्यक वर्गों को कुछ स्थान प्राप्त हो जाते हैं। अल्पसंख्यक मतदाता अपने सब मत एक ही उम्मीदवार को देंगे और इससे उसके पास काफ़ी मात्रा में वोट हो जाएंगे और उसके चुने जाने की सम्भावना हो जाएगी।

इसके दोष (Its Demerits)—इस प्रणाली में कई दोष पाए जाते हैं-

  • इस प्रणाली में भी अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी संख्या के अनुपात के अनुसार स्थान नहीं मिलते।
  • इस प्रणाली में बहुत-से मतों के व्यर्थ जाने की सम्भावना भी रहती है।
  • इस प्रणाली में राजनीतिक दलों का अच्छा संगठन होना चाहिए जिनके बिना अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकता। इससे राजनीतिक दलों की बुराइयां भी बढ़ जाती हैं।

4. द्वितीय मतदान प्रणाली (Second Ballot System)–इस प्रणाली के लिए एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र होना चाहिए। उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए कुल डाले गए वोटों का पूर्ण बहुमत प्राप्त होना चाहिए। यदि चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हो तो उस उम्मीदवार को जिसने चुनाव में सबसे कम मत प्राप्त किए हों चुनाव से निकाल दिया जाता है और दूसरी बार मतदान करवाया जाता है। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक किसी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हो जाए।

5. पृथक् निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorate System)-अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का एक और तरीका भारत में अंग्रेजों ने लागू किया था। इसे पृथक् निर्वाचन प्रणाली कहा जाता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न धर्मों और जातियों के लिए उनकी संख्या के अनुसार व्यवस्थापिका में स्थान सुरक्षित (Reserve) किए जाते हैं और उन विभिन्न धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने प्रतिनिधि अलग-अलग चुनते हैं अर्थात् मुसलमान मतदाता मुसलमान उम्मीदवारों को वोट देते हैं और दूसरे धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने उम्मीदवारों को। 1909 के एक्ट के अनुसार भारत में मुसलमानों को अपने प्रतिनिधि अलग चुनने का अधिकार दिया गया था। 1919 के एक्ट द्वारा सिक्खों को भी अपने प्रतिनिधि अलग चुनने का अधिकार दिया गया था। 1935 के एक्ट द्वारा इसे और फैलाया गया। इस प्रणाली को साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व (Communal Representation) भी कहा जाता था।

इस प्रणाली के गुण व दोष (Its Merits and Demerits)-इस प्रणाली का गुण तो केवल यही है कि प्रत्येक जाति और धर्म को लोगों के उनकी संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व मिल जाता है, परन्तु इस प्रणाली के दोष अधिक हैं। इससे लोगों में राष्ट्रीय एकता उत्पन्न नहीं होती बल्कि वे जाति और धर्म के नाम पर छोटे-छोटे गुटों में बंट जाते हैं। लोगों में आपसी झगड़े होते हैं जैसे कि भारत में हिन्दू और मुसलमानों में हुए और बाद में देश के दो टुकड़े हो गए।

6. सुरक्षित स्थान सहित संयुक्त निर्वाचन (Reservation of Seats with Joint Electorate)-भारत में संविधान द्वारा अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का एक और तरीका अपनाया गया है। यह तरीका पृथक् निर्वाचन प्रणाली से अच्छा माना जाता है। इस तरीके के अनुसार अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के लिए उनकी जनसंख्या के आधार पर कुछ स्थान सुरक्षित कर दिए जाते हैं। उन सुरक्षित स्थानों के लिए उम्मीदवार उसी जाति या वर्ग से खडे हो सकते हैं, परन्तु मतदाता सभी नागरिक होते हैं अर्थात् अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य समस्त मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं।

इसका लाभ यह है कि इससे अल्पसंख्यक वर्ग को प्रतिनिधित्व भी मिल जाता है और राष्ट्रीय एकता भी नष्ट नहीं होने पाती, परन्तु इसका दोष यह है कि इससे ऐसी जातियों और वर्गों में हीनता की भावना आ जाती है।

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प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली तथा अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के गुणों तथा अवगुणों की विस्तार सहित व्याख्या कीजिए।
(Discuss in details the Merits and Demerits of Direct Election System and indirect Election system.)
अथवा
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के गुणों तथा अवगुणों का वर्णन करो।
(Write merits and demerits of Direct Election System.)
उत्तर-
आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। प्रजातन्त्र जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा चलाया हुआ शासन होता है। प्रजातन्त्र के दो रूप होते हैं-एक प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र तथा दूसरा अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र। प्राचीन यूनान में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र प्रचलित था। आधुनिक युग में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र सम्भव नहीं है क्योंकि आधुनिक राज्यों की जनसंख्या इतनी अधिक है कि इसके लिए एक स्थान पर एकत्रित होकर कानून बनाना तथा नीति का निर्माण करना असम्भव है। इसलिए सरकार का काम लोगों के प्रतिनिधियों की ओर से चलाया जाता है। जनता द्वारा एक निश्चित समय के पश्चात् अपने प्रतिनिधियों को स्थानीय संस्थाओं के लिए तथा विधानसभाओं के लिए चुनकर भेजने के ढंग को चुनाव (Election) कहा जाता है। भारत में विधानसभाओं तथा संसद् के लोकसभा के सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं। नगरपालिका, जिला परिषद् तथा पंचायतों के सदस्य भी चुने जाते हैं। बिना चुनावों के लोकतन्त्रीय शासन के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। आज प्रायः सभी देशों में वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त अपनाया गया है। प्रतिनिधियों को चुनने के दो तरीके हैं-प्रत्यक्ष चुनाव तथा अप्रत्यक्ष चुनाव। .

प्रत्यक्ष चुनाव (Direct Election)-प्रायः निचले अर्थात् लोकप्रिय सदनों (Popular House) का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होता है। मतदाताओं के मतों के आधार पर ही सदस्य चुने जाते हैं। जब मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधि चुनें और वे प्रतिनिधि ही संसद् या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। भारत में पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोकसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार से आपका क्या भाव है ? ।
उत्तर-
सार्वभौम वयस्क मताधिकार का अभिप्राय यह है कि एक निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को बिमा किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार देना है। वयस्क होने की आयु राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। इंग्लैण्ड में पहले 21 वर्ष के नागरिक को मताधिकार प्राप्त था, परन्तु अब यह 18 वर्ष है। रूस और अमेरिका में वयस्क मताधिकार की आयु 18 वर्ष है। भारत में मताधिकार की आयु पहले 21 वर्ष थी, परन्तु 61वें संशोधन एक्ट द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है। सार्वभौम मताधिकार में पागलों, दिवालियों, बच्चों, सज़ा प्राप्त व्यक्तियों इत्यादि को मत देने का अधिकार प्राप्त नहीं होता। निश्चित आयु के होने के पश्चात् प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के मत डालने का अधिकारी बन जाता है, पर इसके साथ एक निश्चित समय तक निवास की शर्त भी रखी जाती है। आधुनिक युग में सार्वभौम वयस्क मताधिकार को ही उचित और न्यायसंगत माना गया है।

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प्रश्न 2.
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने से क्या अभिप्राय है ? अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने वाली दो विधियों के नाम लिखें।
अथवा
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रत्येक देश में लोग कई आधारों पर बंटे होते हैं। कई समूहों या वर्गों के लोग किसी राज्य में दूसरे वर्गों के लोगों से कम होते हैं। ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक कहा जाता है जैसे कि भारत में ईसाई, मुस्लिम और पारसी लोग। लोकतन्त्र को वास्तविक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि देश के हर वर्ग तथा समूह को विधानमण्डल में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों को अपनी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। एक सदस्यीय चुनाव प्रणाली के अन्तर्गत अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। अतः अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देना आवश्यक है ताकि विधानमण्डल जनमत का दर्पण कहला सके।
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने वाली दो विधियां-इसके लिए प्रश्न नं. 19 देखें।

प्रश्न 3.
स्त्री मताधिकार के पक्ष में चार दलीलें लिखो।
उत्तर-
स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त होना चाहिए। स्त्री मताधिकार के पक्ष में मुख्यत: निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

  • यह लोकतन्त्रात्मक है-स्त्रियों को मत का अधिकार देना लोकतन्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार है। लोकतन्त्र में समस्त जनता को शासन में भाग लेने का अधिकार मिलता है और जनता में जितना भाग पुरुष का है, उतना ही स्त्री का है।
  • स्त्रियों को मताधिकार की अधिक आवश्यकता-शारीरिक दृष्टि से निर्बल व्यक्ति को कानून की रक्षा की अधिक आवश्यकता होती है। जो सबल है वह तो कानून को भी अपने हाथ में ले सकता है।
  • स्त्रियां दूसरे सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं-इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रशासन के क्षेत्र में स्त्रियों ने बड़ा प्रशंसनीय कार्य किया है। आजकल पुलिस और सेना में भी स्त्रियां कार्य कर रही हैं, फिर राजनीति के क्षेत्र में वे कार्य क्यों नहीं कर सकेंगी।
  • स्त्रियां शान्तिप्रिय होती हैं-स्त्रियां स्वभाव से ही शान्ति प्रिय होती हैं और इससे राजनीति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 4.
स्त्री मताधिकार के विपक्ष में चार तर्क दें।
अथवा
स्त्री मताधिकार के विरुद्ध चार तर्क दो।
उत्तर-
स्त्री मताधिकार के विरुद्ध मुख्य तर्क निम्नलिखित दिए जाते हैं

  • स्त्री का कार्य क्षेत्र घर है- यदि उसे मत देने का अधिकार दिया जाए तो वह घर की ओर ठीक ध्यान न दे सकेगी। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा घर की शान्ति समाप्त हो जाएगी।
  • स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति है-अधिकतर स्त्रियां अपने पति, पिता या भाई आदि के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं। वे अपनी ओर से यह सोचने का प्रयत्न नहीं करतीं कि वोट किसे देना चाहिए।
  • घरेलू शान्ति के भंग होने का खतरा–यदि स्त्री मताधिकार लागू किया जाए तो इससे घरेलू शान्ति के भंग होने का बहुत डर रहता है।
  • उदासीनता-स्त्रियां प्रायः राजनीति के प्रति उदासीन रहती हैं। इसलिए वे अपने वोट का उचित प्रयोग नहीं कर पातीं।

प्रश्न 5.
बालिग मताधिकार के पक्ष में चार तर्क दें।
अथवा
सार्वजनिक वयस्क (बालिग) मताधिकार के पक्ष में कोई चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
वयस्क मताधिकार के पक्ष में मुख्य निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-

  • प्रभुसत्ता जनता के पास है-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता के पास होती है और जनता की इच्छा तथा कल्याण के लिए शासन चलाया जाता है। इसलिए मत डालने का अधिकार सबको समानता के साथ मिलना चाहिए। यदि वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त लागू न किया जाए तो जनता की प्रभुसत्ता की बात सत्य सिद्ध नहीं होती।
  • कानून का प्रभाव सब पर पड़ता है-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। इसीलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सबको समान रूप से मिलना चाहिए।
  • व्यक्ति के विकास के लिए मताधिकार आवश्यक-लोकतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का विकास करने के लिए कई प्रकार के अधिकार मिलते हैं। उन अधिकारों में मताधिकार भी आवश्यक है और इसके बिना कोई भी व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता। दूसरे अधिकारों की रक्षा के लिए मताधिकार आवश्यक है।
  • रकार को अधिक बल मिलता है-वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी गई सरकार अधिक शक्तिशाली होती है।

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प्रश्न 6.
सार्वभौम वयस्क मताधिकार के विरोध में चार तर्क लिखिए।
उत्तर-
वयस्क मताधिकार के विरुद्ध मुख्य तर्क निम्नलिखित दिए जाते हैं

  • शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए-बहुत से लोगों का कहना है कि शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए। शिक्षित व्यक्ति अपने मत का ठीक प्रयोग कर सकता है। मिल का कहना है कि वयस्क मताधिकार से पहले शिक्षा को अनिवार्य बनाना आवश्यक है। जिसे लिखना-पढ़ना नहीं आता उसे वोट देने का अधिकार कभी नहीं मिलना चाहिए।
  • मूों का शासन-वयस्क मताधिकार द्वारा मूों का शासन स्थापित हो जाता है, क्योंकि समाज में अनपढ़ और मूों की संख्या अधिक होती है।
  • मत का दुरुपयोग- यदि अशिक्षित और निर्धन व्यक्तियों को भी मताधिकार दे दिया जाए तो वे इसका ठीक प्रयोग नहीं करेंगे। अशिक्षित व्यक्ति बिना सोचे-समझे अपने मत का प्रयोग कर अयोग्य व्यक्तियों का शासन स्थापित करेंगे और निर्धन व्यक्ति कुछ पैसों के लालच में आकर अपना वोट बेचने को भी तैयार हो जाएंगे।
  • खर्चीली व्यवस्था-वयस्क मताधिकार से बहुत अधिक लोगों को मताधिकार प्राप्त हो जाता है, जिससे चुनाव प्रक्रिया बहुत खर्चीली हो जाती है।

प्रश्न 7.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है ?
अथवा
क्षेत्रीय प्रतिनिधत्व से क्या भाव है ? क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के कोई दो गुण बताएं।
उत्तर-
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त प्रायः सभी देशों में पाया जाता है। इसके अनुसार सारे देश के मतदाताओं को प्रादेशिक इकाइयों में विभाजित कर दिया जाता है जिन्हें निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र से एक या अधिक प्रतिनिधि चुने जाते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र या प्रदेश में रहने वाले सभी मतदाता उस क्षेत्र के प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और प्रतिनिधि उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रादेशिक प्रतिनिधित्व में प्रतिनिधि क्षेत्र के समस्त मतदाताओं की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। निर्वाचन क्षेत्रों का विभाजन प्रायः भौगोलिक आधार पर किया जाता है। इन निर्वाचन क्षेत्रों का निश्चित समय के पश्चात् बढ़ती हुई जनसंख्या के आधार पर परिसीमन किया जाता है। यह कार्य परिसीमन आयोग के द्वारा किया जाता . है। भारत में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों का चुनाव प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर होता है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है।

क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के निम्नलिखित दो गुण हैं –

  1. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व से प्रादेशिक एकता को बढ़ावा मिलता है।
  2. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व से अधिक विकास की सम्भावना बनी रहती है।

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प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
अथवा
प्रत्यक्ष निर्वाचन विधि से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
लोकतन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधि निर्वाचन द्वारा चुनती है। प्रतिनिधियों को चुनने के दो तरीके हैं-प्रत्यक्ष चुनाव तथा अप्रत्यक्ष चुनाव।
जब मतदाता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तौर पर अपने प्रतिनिधि चुने और वे प्रतिनिधि ही संसद् या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। उदाहरण के लिए भारत में पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोक सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं। इंग्लैण्ड में कॉमन सदन (House of Common) तथा अमेरिका में प्रतिनिधि सदन (House of Representative) के सदस्य जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं।

प्रश्न 9.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के कोई चार गुण लिखें।
उत्तर-
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-

  • मतदाताओं और प्रतिनिधियों में सीधा सम्पर्क-प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि इसमें मतदाताओं तथा प्रतिनिधियों के बीच सीधा सम्बन्ध रहता है, क्योंकि प्रतिनिधि मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं। प्रत्यक्ष सम्पर्क से प्रतिनिधि और मतदाता एक-दूसरे की भावनाओं और विचारों को समझते हैं।
  • यह प्रणाली अधिक लोकतन्त्रात्मक है-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और समस्त शक्तियां अन्तिम रूप में जनता में निहित होती हैं। मतदाता प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। अतः प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का सिद्धान्त लोकतन्त्र के अनुकूल है।।
  • मतदाता की प्रतिष्ठा में वृद्धि-प्रत्यक्ष चुनाव में मतदाता प्रत्यक्ष तौर पर चुनाव में भाग लेते हैं। चुनाव के समय प्रत्येक उम्मीदवार को चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, धनी-निर्धन सभी के पास जाकर वोट के लिए निवेदन करना पड़ता है। इससे लोग यह समझने लगते हैं कि उनका शासन में भाग है, सरकार को बनाने में उनका भी हाथ है। इस तरह मतदाताओं की प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।
  • समानता की भावना-प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप में मताधिकार प्रयोग करने का अवसर मिलता है।

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प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में अन्तर बताइए।
अथवा
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव विधि में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
जब मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधि चुनें और वे प्रतिनिधि ही संसद् या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। परन्तु अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता के चुने प्रतिनिधि संसद् या विधानसभा के सदस्यों का चुनाव करते हैं। संसद् के निम्न सदन का चुनाव आमतौर पर प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा होता है जबकि ऊपरि सदन के सदस्य अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं। भारत में राज्यसभा के सदस्य इसी प्रकार से चुने जाते हैं, जबकि पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोकसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।

प्रश्न 11.
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से क्या भाव है ?
उत्तर-
प्रजातन्त्र के लिए चुनाव का होना अनिवार्य है। जनता निश्चित अवधि के पश्चात् अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। प्रतिनिधियों को चुनने के दो तरीके हैं-प्रत्यक्ष चुनाव तथा अप्रत्यक्ष चुनाव। जब वे प्रतिनिधि जिनके हाथ में शासन सत्ता रहती हो, जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से न चुने जाकर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हों तो उस प्रणाली को अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली कहा जाता है। अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में जनता निर्वाचक मण्डल के सदस्यों को चुन लेती है और वे सदस्य मुख्य प्रतिनिधियों को चुन लेते हैं। भारत में राज्य सभा के सदस्य अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं। राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति तथा राज्यों की विधान परिषदों के सदस्य भी अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं।

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प्रश्न 12.
चुनाव प्रणाली में अप्रत्यक्ष चुनाव के चार गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. योग्य प्रतिनिधियों के चुनाव की अधिक सम्भावना – अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के अन्तर्गत मतदाताओं की संख्या पर्याप्त कम होती है। अल्प मतदाता उम्मीदवारों की योग्यताओं सम्बन्धी परस्पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। प्रत्येक मतदाता का उम्मीदवार के साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क भी सम्भव हो सकता है। इस प्रकार योग्य प्रतिनिधियों के चुनाव की अधिक सम्भावना हो सकती है।

2. राजनीतिक दलों के प्रभावों की कम सम्भावना-अप्रत्यक्ष चुनाव के अधीन राजनीतिक दलों के कुप्रभावों की सम्भावना पर्याप्त कम हो जाती है। मताधिकार अल्प-मात्र बुद्धिमान् व्यक्तियों तक ही सीमित होता है इसलिए राजनीतिक दलों को विशाल स्तर पर जलसे, जुलूस का प्रबन्ध अथवा प्रचार करने की आवश्यकता नहीं होती।

3. कम खर्चीली विधि-इस प्रणाली अधीन अत्यधिक धन व्यय नहीं किया जाता। अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में मतदाताओं की संख्या कम तथा चुनाव क्षेत्र का आकार छोटा होने के कारण अत्यधिक धन व्यय करने की आवश्यकता नहीं होती।

4. सार्वजनिक उत्तेजना की कम सम्भावना-प्रत्यक्ष चुनाव प्राय: लोगों को उकसाते हैं। उनमें दल गुटबन्दी की भावना इतनी अधिक होती है कि छोटे-छोटे मामलों सम्बन्धी झगड़े करने के लिए तैयार रहते हैं। इसी कारण विभिन्न उम्मीदवारों के समर्थकों में दंगे-फसाद प्रायः होते रहते हैं परन्तु ऐसी स्थिति अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में कम ही सम्भव हो सकती है।

प्रश्न 13.
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के कोई चार दोष लिखें।
उत्तर-
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के निम्नलिखित दोष हैं-

  • अलोकतन्त्रीय प्रणाली-अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अलोकतन्त्रीय है, क्योंकि इस प्रणाली के द्वारा जनता को अपनी इच्छा को प्रकट करने का अवसर नहीं मिलता। सरकार के निर्माण में मतदाताओं का सीधा हाथ नहीं होता।
  • लोगों को राजनीतिक शिक्षा नहीं मिलती-अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के कारण लोगों को राजनीतिक शिक्षा नहीं मिलती, क्योंकि प्रतिनिधियों का चुनाव जनता के हाथ में नहीं होता है। मतदाता अपने आपको शासन का अंग और भागीदार अनुभव नहीं करते और वे चुनाव के प्रति उदासीन ही रहते हैं।
  • कम खर्चीली नहीं-यह प्रणाली उतनी कम खर्चीली नहीं जितनी कि सोची जाती है। इसका कारण यह है कि पहले निर्वाचक मण्डल के सदस्यों का चुनाव किया जाता है और बाद में निर्वाचक मण्डल के सदस्य प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। इस प्रकार इस प्रणाली में काफ़ी खर्चा होता है, जिस तरह प्रत्यक्ष प्रणाली में होता है।
  • इस प्रणाली में मतदाताओं एवं प्रतिनिधियों के बीच सीधा सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता।

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प्रश्न 14.
पेशेवर प्रतिनिधित्व क्या है ? पेशेवर प्रतिनिधित्व के कोई दो गुण बताएं।
उत्तर-
व्यावसायिक प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि एक क्षेत्र में रहने वाले सभी नागरिक एक प्रतिनिधि न चुनें बल्कि एक व्यवसाय से सम्बन्धित सारे नागरिक अपना प्रतिनिधि चुन कर भेजें और दूसरे व्यवसाय से सम्बन्धित नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनें अर्थात् सभी व्यवसायों को विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो ताकि प्रत्येक व्यवसाय के लोगों के हितों की रक्षा की जा सके। इस प्रणाली के अन्तर्गत डॉक्टर, अध्यापक, वकील, मज़दूर, पूंजीपति और व्यापारी अपने-अपने अलग प्रतिनिधि चुनेंगे जो उन व्यवसायों से सम्बन्धित होंगे। अतः इस प्रणाली के अनुसार प्रत्येक व्यवसाय को विधानमण्डल में अपना प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिल जाता है। इस प्रणाली का समर्थन सबसे पहले एक फ्रैंच लेखक ‘मिराबो’ ने किया था। फ्रांस की क्रान्ति के समय उसने यह घोषणा की थी कि विधानमण्डल को समाज के सब हितों का एक छोटा-सा दर्पण होना चाहिए। संसार के कई देशों में इस प्रणाली को लाग भी किया गया है। इस प्रणाली को पंजाब विश्वविद्यालय की सीनेट के चुनाव में भी अपनाया गया है।

पेशेवर प्रतिनिधित्व के दो गुण निम्नलिखित हैं-

  1. पेशेवर प्रतिनिधित्व में राष्ट्र के प्रत्येक वर्ग को प्रतिनिधत्व मिलता है।
  2. पेशेवर प्रतिनिधित्व अधिक प्रजातांत्रिक है।

प्रश्न 15.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
यह एक ऐसी चुनाव प्रणाली है जिसके अनुसार जनता के हर वर्ग या दल को विधानमण्डल में उतना ही प्रतिनिधित्व मिलता है जितना उनके समर्थकों का अनुपात होता है। एक वर्ग या दल के पीछे जितने प्रतिशत मतदाता होंगे उसे विधानमण्डल में उतने ही प्रतिशत सीटें प्राप्त होंगी। इस प्रणाली के तीन मुख्य लक्षण हैं-

  • बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र-निर्वाचन क्षेत्रों का बहु-सदस्यीय (Multi-member) होना आवश्यक है। आम मत यह है कि एक निर्वाचन क्षेत्र में तीन से लेकर पन्द्रह तक प्रतिनिधियों के चुने जाने की व्यवस्था है।
  • वोट की तरजीह-हर मतदाता के पास केवल एक ही वोट होती है, परन्तु पर्ची (Ballot-Paper) पर उस वोट के लिए भिन्न-भिन्न उम्मीदवारों के प्रति अपनी तरजीह या पसन्द (जैसे कि प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि) को अंकित कर सकता है।
  • वोटों की निश्चित संख्या-चुनाव में विजयी होने के लिए उम्मीदवार को वोटों की एक निश्चित संख्या (Quota) प्राप्त करनी होती है। इस संख्या को निर्धारित करने के लिए कुछ भिन्न-भिन्न नियम प्रचलित हैं।

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प्रश्न 16.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कोई चार गुण लिखो।
उत्तर-

  • प्रत्येक वर्ग या दल को उचित प्रतिनिधित्व-इस प्रणाली के अनुसार समाज का कोई वर्ग या देश का कोई भी दल प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रह जाता है। जिस वर्ग या दल के पीछे जितने मतदाता होते हैं उसको उसी अनुपात में विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व मिल जाता है।
  • अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है, जिससे उनके हितों की रक्षा होती है।
  • एक राजनीतिक दल की निरंकुशता स्थापित नहीं होती-इस प्रणाली के अधीन किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता। विधानमण्डल में लगभग सभी दलों को कुछ-न-कुछ सीटें प्राप्त होती हैं जिससे कोई एक दल अपनी निरंकुशता स्थापित नहीं कर पाता।
  • कोई भी वोट व्यर्थ नहीं जाती-इस प्रणाली के अधीन प्रत्येक वोट की गिनती की जाती है।

प्रश्न 17.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कोई चार अवगुण लिखो।
उत्तर-

  • यह प्रणाली बहुत जटिल है-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली बहुत जटिल है। साधारण वोटर इसे समझ नहीं सकता। वोटों पर पसन्द अंकित करना, कोटा निश्चित करना, वोटों की गिनती करना और वोटों को पसन्द के अनुसार हस्तान्तरित करना आदि बातें एक साधारण पढ़े-लिखे व्यक्ति की समझ से बाहर हैं।
  • राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अन्तर्गत छोटे-छोटे दलों को प्रोत्साहन मिलता है। अल्पसंख्यक जातियां भी अपनी भिन्नता बनाये रखती हैं और दूसरी जातियों के साथ अपने हितों को मिलाना नहीं चाहतीं। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्र छोटे-छोटे वर्गों और गुटों में बंटकर रह जाता है और राष्ट्रीय एकता पनप नहीं पाती।
  • राजनीतिक दलों का अधिक महत्त्व-आनुपातिक प्रतिनिधित्व की सूची प्रणाली के अन्तर्गत राजनीतिक दलों का महत्त्व बहुत अधिक हो जाता है। मतदाता को किसी-न-किसी दल के पक्ष में वोट डालना होता है। निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकते।
  • उत्तरदायित्व का अभाव-इस प्रणाली के अधीन निर्वाचन क्षेत्र बहुसदस्यीय होते हैं और एक क्षेत्र में कई प्रतिनिधि होते हैं। चूंकि एक क्षेत्र का प्रतिनिधि निश्चित नहीं होता, इसलिए प्रतिनिधियों में उत्तरदायित्व की भावना पैदा नहीं होती।

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प्रश्न 18.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के विरुद्ध चार तर्क दें।
उत्तर-

  • योग्य प्रतिनिधियों के निर्वाचन की कम सम्भावना-प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के अधीन साधारण मतादाताओं को ग़लत प्रचार के द्वारा प्रभावित किया जा सकता है। परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष चुनाव विधि के अधीन योग्य उम्मीदवारों के निर्वाचित होने की सम्भावना होती है।
  • गुणवान् व्यक्ति ऐसे चुनावों से भयभीत होते हैं-प्रत्यक्ष चुनाव विधि के अधीन राजनीतिक गतिविधियों का स्तर निम्न स्तर पर पहुंच जाता है। ऐसी विधि के अधीन हिंसक घटनाएं भी प्रायः होती हैं। इस प्रकार की अवस्थाओं में बुद्धिमान् तथा गुणवान् व्यक्ति चुनाव लड़ने से भयभीत होते हैं।
  • यह चुनाव विधि धनवानों के लिए-इस प्रकार की चुनाव प्रणाली में अत्यधिक धन व्यय किया जाता है। ऐसी प्रणाली में कोई निर्धन गुणवान् व्यक्ति चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं करता।
  • खर्चीली विधि-यह प्रणाली बहुत अधिक खर्चीली है।

प्रश्न 19.
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की चार विधियां लिखो।
अथवा
अल्प (कम) गिनती को प्रतिनिधित्व देने की किन्हीं तीन मुख्य विधियों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर-
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने वाले विभिन्न तरीके निम्नलिखित हैं-
1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा सभी वर्गों या राजनीतिक दलों को उनकी संख्या के अनुपात से व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व मिलने की काफ़ी सम्भावना रहती है।

2. सीमित मत प्रणाली-सीमित मत प्रणाली भी अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने का तरीका है। इस प्रणाली में बहु-सदस्यीय चुनाव क्षेत्र होते हैं और कम-से-कम तीन सदस्य चुने जाते हैं। प्रत्येक मतदाता को एक से अधिक परन्तु स्थानों की संख्या से कम मत दिए जाते हैं।

3. संचित मत प्रणाली-संचित मत प्रणाली में बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं। एक मतदाता को उतने ही मत मिलते हैं जितने कि सदस्य चुने जाते हैं।

4. पृथक निर्वाचन प्रणाली-अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का एक और तरीका भारत में अंग्रेजों ने लाग किया था। इसे पृथक निर्वाचन प्रणाली कहा जाता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न धर्मों और जातियों के लिए उनकी संख्या के अनुसार व्यवस्थापिका में स्थान आसुरक्षित (Reserve) किए जाते हैं और उन विभिन्न धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने प्रतिनिधि अलग-अलग चुनते हैं अर्थात् मुसलमान मतदाता मुसलमान उम्मीदवारों को वोट देते हैं और दूसरे धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने उम्मीदवारों को। 1909 के एक्ट के अनुसार भारत में मुसलमानों को अपने प्रतिनिधि अलग चुनने का अधिकार दिया गया था।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सार्वभौम वयस्क मताधिकार का अभिप्राय यह है कि एक निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार देना है। वयस्क होने की आयु राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। भारत में मताधिकार की आयु पहले 21 वर्ष थी परन्तु 61वें संशोधन एक्ट द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है।

प्रश्न 2.
अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
प्रत्येक देश में लोग कई आधार पर बंटे होते हैं। कई समूह या वर्गों के लोग किसी संस्था में दूसरे वर्गों के लोगों से कम होते हैं। ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक कहा जाता है जैसे कि भारत में ईसाई, मुस्लिम और पारसी लोग। लोकतन्त्र को वास्तविक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि देश के हर वर्ग तथा समूह को विधानमण्डल में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों को अपनी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

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प्रश्न 3.
स्त्री मताधिकार के पक्ष में दो तर्क दें।
उत्तर-
स्त्री मताधिकार के पक्ष में मुख्यतः निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-

  1. यह लोकतन्त्रात्मक है-स्त्रियों को मत का अधिकार देना लोकतन्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार है।
  2. स्त्रियों को मताधिकार की अधिक आवश्यकता-शारीरिक दृष्टि से निर्बल व्यक्ति को कानून की रक्षा की अधिक आवश्यकता होती है। जो सबल है वह तो कानून को भी अपने हाथ में ले सकता है।

प्रश्न 4.
स्त्री मताधिकार के विरुद्ध दो तर्क दें।
उत्तर-

  1. स्त्री का कार्य क्षेत्र घर है-यदि उसे मत देने का अधिकार दिया जाए तो वह घर की ओर ठीक ध्यान न दे सकेगी। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा घर की शान्ति समाप्त हो जाएगी।
  2. स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति है-अधिकतर स्त्रियां अपने पति, पिता या भाई आदि के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं। वे अपनी ओर से यह सोचने का प्रयत्न नहीं करतीं कि वोट किसे देना चाहिए।

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प्रश्न 5.
सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के पक्ष में दो तर्क दें।
उत्तर-

  1. प्रभुसत्ता जनता के पास है-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता के पास होती है और जनता की इच्छा तथा कल्याण के लिए शासन चलाया जाता है। इसके मत डालने का अधिकार सबको समानता के साथ मिलना चाहिए। यदि वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त लागू न किया जाए तो जनता की प्रभुसत्ता की बात सत्य सिद्ध नहीं होती।
  2. कानून का प्रभाव सब पर पड़ता है-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। इसीलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सबको समान रूप से मिलना चाहिए।

प्रश्न 6.
सार्वभौम वयस्क मताधिकार के विपक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर-

  • शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए-बहुत से लोगों का कहना है कि शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए। शिक्षित व्यक्ति अपने मत का ठीक प्रयोग कर सकता है।
  • मूों का शासन-वयस्क मताधिकार द्वारा मूों का शासन स्थापित हो जाता है क्योंकि समाज में अनपढ़ और मूों की संख्या अधिक होती है।

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प्रश्न 7.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के अनुसार सारे देश के मतदाताओं को प्रादेशिक इकाइयों में विभाजित कर दिया जाता है जिन्हें निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र से एक या अधिक प्रतिनिधि चुने जाते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र या प्रदेश में रहने वाले सभी मतदाता उस क्षेत्र के प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और प्रतिनिधि उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रादेशिक प्रतिनिधित्व में प्रतिनिधि क्षेत्र के समस्त मतदाताओं की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते
हैं।

प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब मतदाता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तौर पर अपने प्रतिनिधि चुने और वे प्रतिनिधि ही संसद या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। उदाहरण के लिए भारत में पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोक सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।

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प्रश्न 9.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
यह एक ऐसी चुनाव प्रणाली है जिसके अनुसार जनता के हर वर्ग या दल को विधानमण्डल में उतना ही प्रतिनिधित्व मिलता है जितना उनके समर्थकों का अनुपात होता है। एक वर्ग या दल के पीछे जितने प्रतिशत मतदाता होंगे उसे विधानमण्डल में उतने ही प्रतिशत सीटें प्राप्त होंगी।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष चुनाव के कोई दो गुण लिखें।
उत्तर-

  1. प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में मतदाताओं एवं प्रतिनिधियों के बीच सीधा सम्बन्ध रहता है।
  2. प्रतिनिधियों में अधिक उत्तरदायित्व की भावना पाई जाती है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
मताधिकार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
वोट डालने के अधिकार को मताधिकार कहा जाता है।

प्रश्न 2.
वयस्क मताधिकार से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
वयस्क मताधिकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
वयस्क मताधिकार से भाव सभी बालिग व्यक्तियों को बिना किसी भेद-भाव के मताधिकार देना है।

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प्रश्न 3.
बालग मताधिकार के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
अथवा
वयस्क मताधिकार के पक्ष में कोई एक तर्क लिखिए।
उत्तर-

  1. प्रजातन्त्र में सभी व्यक्ति समान माने जाते हैं।
  2. बालग मताधिकार द्वारा चुनी गई सरकार अधिक शक्तिशाली होती है।

प्रश्न 4.
वयस्क मताधिकार के विरुद्ध एक दलील दीजिए।
उत्तर-
सभी व्यक्तियों को समान रूप से अधिकार देना तर्कहीन है।

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प्रश्न 5.
महिला मताधिकार का क्या भाव है ?
उत्तर-
महिला मताधिकार का अर्थ है बिना किसी भेदभाव के महिलाओं को मतदान का अधिकार देना।

प्रश्न 6.
जन-सहभागिता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जन-सहभागिता का अर्थ है, राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना।

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प्रश्न 7.
स्त्री मताधिकार के विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर-
अधिकतर स्त्रियां अपने पति, पिता या भाई के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं. उनमें इतनी सोच-विचार करने की क्षमता नहीं होती कि वोट किसे दी जानी चाहिए।

प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का क्या अर्थ है ?
अथवा
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जिस चुनाव प्रणाली में मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं उसे प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली कहते

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प्रश्न 9.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का कोई एक गुण लिखिए।
उत्तर-
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अधिक लोकतान्त्रिक है।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के दो दोष लिखें।
अथवा
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का एक दोष लिखिए।
उत्तर-

  1. आम नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं कर सकता।
  2. प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अधिक खर्चीली है।

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प्रश्न 11.
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का क्या अर्थ है ?
अथवा
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब वे प्रतिनिधि जिनके हाथ में शासन सत्ता रहती है, जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से न चुने जा कर जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हों तो उस प्रणाली को अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली कहा जाता है।

प्रश्न 12.
स्त्री मताधिकार के पक्ष में कोई एक तर्क दें।
उत्तर-
स्त्री को केवल लिंग के आधार पर मताधिकार से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।

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प्रश्न 13.
गुप्त मतदान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
गुप्त मतदान मत-पत्र द्वारा मतदान की वह पद्धति है जिसमें किसी को यह पता न चले कि मत किस पक्ष अथवा उम्मीदवार को दिया गया है।

प्रश्न 14.
किसी एक आधार पर निर्वाचक सहभागिता का महत्त्व लिखिए।
उत्तर-
निर्वाचक सहभागिता से लोगों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है।

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प्रश्न 15.
क्या स्त्री मताधिकार आवश्यक है ?
उत्तर-
हां, स्त्री मताधिकार आवश्यक है।

प्रश्न 16.
अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के अनुपात में विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व कहलाता है।

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प्रश्न 17.
जन-सहभागिता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जन-सहभागिता का अर्थ है, राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना।

प्रश्न 18.
चुनाव मण्डल क्या होता है ?
उत्तर-
कुल जनसंख्या का वह भाग जो प्रतिनिधियों के चुनाव में भाग लेता है, सामूहिक रूप से निर्वाचक मण्डल कहलाता है।

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प्रश्न 19.
जन सहभागिता की क्या महत्ता है ?
उत्तर-
जन सहभागिता से लोकतन्त्र मज़बूत होता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली ……………. प्रणाली की एक विधि है।
2. ……….. को प्रत्यक्ष लोकतन्त्र का घर कहा जाता है।
3. ………. विधानपालिका द्वारा बनाए गए कानूनों के विषय में लोगों की राय जानने का एक साधन होता है।
4. जब संसद् या विधानसभा का कोई स्थान किसी कारणवश खाली हो जाए तो उस स्थान की पूर्ति के लिए करवाया . गया चुनाव …………. कहलाता है।
5. चुनाव में सफल उम्मीदवार को …………………. कहा जाता है।
उत्तर-

  1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व
  2. स्विट्ज़रलैण्ड
  3. जनमत संग्रह
  4. उप-चुनाव
  5. प्रतिनिधि।

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प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. इंग्लैण्ड में स्त्रियों को सन् 1928 में मताधिकार प्रदान किया गया।
2. अमेरिका में स्त्रियों को सन् 1950 में मताधिकार प्रदान किया गया।
3. भारतीय संविधान में सन् 1950 में ही स्त्रियों को मताधिकार दिया गया।
4. वयस्क मताधिकार से लोगों में राजनीतिक जागृति पैदा नहीं होती।
5. वयस्क मताधिकार द्वारा राष्ट्रीय एकता बनी रहती है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
Franchise का अर्थ है
(क) चुनाव लड़ने का अधिकार
(ख) मतदान करने का अधिकार
(ग) सार्वजनिक पद प्राप्त करने का अधिकार
(घ) समुदाय बनाने का अधिकार।
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 2.
चुनाव प्रक्रिया वह साधन है, जिसके द्वारा
(क) नौकरशाही नियुक्त की जाती है
(ख) न्यायाधीश नियुक्त किए जाते हैं
(ग) राजनीतिक दल कार्य करते हैं
(घ) चुनाव करवाए जाते हैं।
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 3.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किसने किया?
(क) जे० एस० मिल
(ख) गार्नर (ग) लॉस्की
(घ) नेहरू।
उत्तर-
(क)

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प्रश्न 4.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का अर्थ है कि
(क) संपूर्ण जनसंख्या को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है
(ख) निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है।
(ग) केवल शिक्षित व्यक्तियों को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है।
(घ) केवल अमीरों को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है।
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा तर्क सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के विरुद्ध है-
(क) यह प्रजातन्त्रिक है
(ख) राजनीतिक समानता
(ग) राजनीतिक जागरूकता
(घ) राष्ट्र विरोधी।
उत्तर-
(घ)

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules.

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

खेल सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारी: (Important Information Related Athletics)

  1. ऐथलैटिक्स प्रतियोगिताओं में कोई भी खिलाड़ी नशीली चीज़ों या दवाइयों का प्रयोग करके भाग नहीं ले सकता।
  2. जो खिलाड़ी अन्य खिलाड़ियों के लिए किसी प्रकार की बाधा प्रस्तुत करे, उसे अयोग्य घोषित किया जाता है। जो खिलाड़ी दौड़ते हुए अपनी इच्छा से ट्रैक को छोड़ता है, वह पुन: दौड़ जारी नहीं कर सकता।
  3. फील्ड इवेंट्स में दो तरह के इवेंट्स आते हैं-जम्पिंग इवेंट्स और थ्रो इवैंट्स। ट्रैक इवेंट्स में वह दौड़ आती हैं जो ट्रैक में दौड़ी जाती हैं।
  4. 200 मीटर ट्रैक की लम्बाई 40 मीटर तथा चौड़ाई 38.18 मीटर होती है, 400 मीटर ट्रैक की लम्बाई 77 मीटर तथा चौड़ाई 67 मीटर होती है।
  5. जैवलिन थ्रो का भार 805 से 825 ग्राम होता है और लड़कियों के लिए चौड़ाई 605 से 620 ग्राम तक होता है। डिसक्स का भार लड़कों के लिए 2 कि० ग्राम होता है। गोला, हैमर या डिसक्स थ्रो के समय यह आवश्यक है कि 40° के सैक्टर में लैंड करे। गोला फेंकने का भार 7 किलोग्राम निश्चित किया गया है।

PSEB 11th Class Physical Education Guide ऐथलैटिक्स (Athletics) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
ऐथलैटिक्स इवेंटस को कितने भागों में बांटा गया है ?
उत्तर-
ऐथलैटिक्स इवेंटस को दो भागों में बांटा जाता है-ट्रेक इवेंटस और फील्ड इवैंटस।

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 2.
ऐथलैटिक्स में ट्रैक इवेंटस कौन-कौन से होते हैं ?
उत्तर-

  1. छोटी दूरी वाली दौड़ें,
  2. बीच की दूरी वाली दौड़ें,
  3. लम्बी दूरी वाली दौड़ें।

प्रश्न 3.
ऐथलैटिक्स में पुरुषों के लिये जैवलिन का भार कितना होता है ?
उत्तर-
800 ग्राम।

प्रश्न 4.
ऐथलैटिक्स में पुरुषों के लिए डिसकस का घेरा लिखें।
उत्तर-
219 से 221 मिलीमीटर।

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 5.
ऐथलैटिक्स में हैमर थ्रो के कोई पांच नियम लिखें।
उत्तर-

  1. हैमर थ्रो में एथलीट को थ्रो के लिये तीन अवसर दिए जाते हैं।
  2. सबसे अधिक दूरी पर फैंकने वाले को विजयी घोषित किया जाता है।
  3. हैमर थ्रो में हैमर थ्रो पूरा करने के लिए 1.30 मिनट का समय दिया जाता है।
  4. हैमर मार्क सेक्टर में ही गिरना चाहिए अन्यथा थ्रो अयोग्य मानी जाएगी।
  5. हैमर को फेंकते हुए हैमर को चक्कर के अन्दर ही रखा जा सकता है।

प्रश्न 6.
ऐथलैटिक्स में थ्रोइंग इवेंटस कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर-

  1. गोला फेंकना,
  2. हैमर थ्रो,
  3. जैवलिन थ्रो,
  4. डिस्कस थ्रो।

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Physical Education Guide for Class 11 PSEB ऐथलैटिक्स (Athletics) Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
ऐथलैटिक्स प्रतियोगिता करवाने के लिए कौन-कौन से अधिकारियों की आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
ऐथलैटिक्स प्रतियोगिता करवाने के लिए आगे लिखे अधिकारियों की आवश्यकता होती है—
ऐथलैटिक्स के लिए अधिकारी
(Officials for the meet)

  1. रैफ़री ट्रैक के लिए (Referee for Track Events)
  2. रैफ़री फील्ड इवेंट्स के लिए (Referee for Field Events)
  3. रैफ़री वाकिंग इवेंट्स (Referee for Walking Events)
  4. जज ट्रैक इवेंट्स (Judge for Track Events)
  5. जज फील्ड इवैंट्स (Judge for Field Events)
  6. जज वाकिंग इवेंट्स (Judge for Events)
  7. अम्पायर (Umpire)
  8. टाइम कीपर (Time Keeper)
  9. स्टार्टर (Starter)
  10. सहायक र्टाटर (Asst. Starter)
  11. मार्क मैन (Markman)
  12. लैप स्कोरर (Lap Scorer)
  13. रिकॉर्डर (Recorder)
  14. मार्शल (Marshall)

दूसरे अधिकारी
(Additional Officials)

  1. अनाउंसर (Announcer)
  2. आफिशल सर्वेयर (Official Surveyer)
  3. डॉक्टर (Doctor)
  4. सटुअरडज़ (Stewards)

ट्रैक इवेंट्स पुरुषों के लिए

  • 100 — मीटर रेस
  • 200 — मीटर रेस
  • 400 — मीटर रेस
  • 800 — मीटर रेस
  • 1500 — मीटर रेस
  • 3,000 — मीटर दौड़
  • 5,000 — मीटर दौड़
  • 10,000 — मीटर दौड़
  • 42,195 — मीटर या 26 मील दौड
  • 3,000 — मीटर स्टीपल चेज़
  • 20,000 — मीटर वाकिंग
  • 30,000 — मीटर वाकिंग
  • 50,000 — मीटर वाकिंग

महिलाओं के लिए ट्रैक इवेंट्स

  • 100 — मीटर रेस
  • 200 — मीटर रेस
  • 400 — मीटर रेस
  • 800 — मीटर रेस
  • 1500 — मीटर रेस

हर्डल दौड़ें पुरुषों के लिए

  • 110 — मीटर हर्डल दौड़
  • 200 — मीटर हर्डल दौड़
  • 400 — मीटर हर्डल दौड़

महिलाओं के लिए हर्डल दौड़

  • 100 — मीटर हर्डल दौड़
  • 200 — मीटर हर्डल दौड़

रीले दौड़ें पुरुषों के लिए

  • 4 × 100 — मीटर
  • 4 × 200 — मीटर
  • 4 × 400 — मीटर
  • 4 × 800 — मीटर
  • 4 × 1500 — मीटर

महिलाओं के लिए रिले दौड़

  • 4 × 100 — मीटर
  • 4 × 200 — मीटर
  • 4 × 400 मीटर

मैडल रिले रेस

  • 800 × 200 × 200 × 400

6. 110 मीटर हर्डल्ज लड़कों के लिए हर्डलों की ऊंचाई 1.06 मीटर होती है। जूनियर लड़कियों के लिए 1.00 मीटर हर्डल्ज़ की ऊंचाई, 0.76 मीटर और सीनियर लड़कियों के लिए 0.89 मीटर होती है।

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प्रश्न 2.
ट्रैक इवेंट्स के लिए एथलीटों के लिए निर्धारित नियमों के बारे लिखें।
उत्तर-
ट्रैक इवेंटस के लिये एथलीटों के लिए निर्धारित नियम इस प्रकार हैं—

  1. एथलीट ऐसे वस्त्र पहने जो किसी किस्म के आपत्तिजनक न हों और वह साफ-सुथरे भी हों।
  2. कोई भी एथलीट नंगे पांव नहीं दौड़ सकता।
  3. यदि कोई खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी के लिये किसी तरह की रुकावट पैदा करता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  4. प्रत्येक खिलाड़ी को अपने आगे तथा पीछे स्पष्ट रूप में नम्बर लगाने चाहिए।
  5. लाइनों (Lines) में दौड़ी जाने वाली दौड़ों में खिलाड़ी को शुरू से अंत तक अपनी लाइन में ही रहना होगा।
  6. यदि कोई खिलाड़ी जान-बूझ कर अपनी लेन में से बाहर दौड़ता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जाता है।
  7. यदि खिलाड़ी अपनी मर्जी से ट्रैक को छोड़ता है तो उसको दोबारा दौड़ जारी रखने का अधिकार नहीं।
  8. खिलाड़ी को नशीली वस्तुओं तथा दवाइयों का प्रयोग करने की आज्ञा नहीं होगी और न ही खेलते समय इसको अपने पास रख सकता है।
  9. यदि ट्रैक तथा फील्ड दोनों इटस एक ही साथ शुरू हो चुके हों तो जज इसको अलग-अलग ढंगों से भाग लेने की आज्ञा दे सकता है।
  10. 800 मीटर दौड़ का स्टार्टर अपनी भाषा में कहेगा “On your marks” पिस्तौल चला दिया जाता है तथा खिलाड़ी दौड़ पड़ते हैं। 800 मीटर से अधिक दौड़ों में केवल “On your marks’शब्द कहे जाएंगे तथा फिर तैयार होने पर पिस्तौल चला दिया जाएगा।
  11. खिलाड़ी को “On your marks” की स्थिति में अपने सामने वाली ग्राऊंड पर आरम्भ रेखा (Start Line) को हाथों अथवा पैरों द्वारा छूना नहीं चाहिए।
  12. यदि कोई एथलीट दो बार फाऊल स्टार्ट लेता है तो उसको दौड़ से बाहर निकाल दिया जाता है।

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प्रश्न 3.
ट्रैक इवेंट्स में कितने इवेंट्स होते हैं ?
उत्तर-
ऐथलैटिक्स दो प्रकार की होती है-Track Events और Field Events । भाव कुछ एथलीट Track Events में भाग लेते हैं और कुछ Field Events में।
ट्रैक इवेंट्स में छोटी दौड़ें (Sprint or Short Distance Races), मध्य दूरी वाली दौड़ें (Middle Distance Races) और लम्बी दौड़ें (Long Distance Races) आती हैं। फील्ड इवेंट्स में कूदने वाली इवेंट्स जैसे लम्बी छलांग (Long Jump), ऊंची छलांग (High Jump), पोल वाल्ट जम्प (Pole Vault Jump) और ट्रिपल्ल जम्प (Triple Jump) और फेंकने वाले इवेंट्स जैसे गोला फेंकना (Short put or Putting the Shot), पाथी फेंकना (Discuss : Throw), भाला फेंकना (Javelin Throw) और हैमर फैंकना (Hammer Throw) आदि सम्मिलित हैं।

ट्रैक
(TRACK)
ट्रैक दो प्रकार के होते हैं-एक 400 मीटर वाला ट्रैक और दूसरा 200 मीटर का ट्रैक। Standard ट्रैक का नाम 400 मीटर वाले ट्रैक को ही दिया जा सकता है। इस ट्रैक में कम-से-कम 6 लेन (Lanes) और अधिक-से-अधिक 8 लेन (Lanes) होती हैं।
Track Events Races : Short Middle and Long
SPRINTING
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 1
स्प्रिंटिंग (Sprinting) स्प्रिंट वह रेस होती है जो प्रायः पूरी शक्ति और पूरी गति से दौड़ी जाती है। इसमें 100 मीटर और 200 मीटर की दौड़ें आती हैं। आजकल तो 400 मीटर रेस को भी इसमें गिना जाने लगा है। इस प्रकार की दौड़ों में प्रतिक्रिया (Reaction), टाइम और गति (Speed) का बहुत महत्त्व है।
(1) स्टार्ट्स (Starts) कम दूरी की दौड़ों में प्राय: निम्नलिखित प्रकार के तीन स्टार्ट लिये जाते हैं—

  1. बंच स्टार्ट (Bunch Start)
  2. मीडियम स्टार्ट (Medium Start)
  3. इलोंगेटेड स्टार्ट (Elongated Start)

बंच स्टार्ट (Bunch Start)-इस प्रकार के स्टार्ट के लिए ब्लाकों के बीच दूरी 8 इंच से 10 इंच के बीच होनी चाहिए और आगे वाला स्टार्ट स्टार्टिंग लाइन से लगभग 19 इंच के करीब होना चाहिए। एथलीट इस प्रकार ब्लाक में आगे को झुकता है कि पिछले पांव की टो और अगले पांव की एड़ी एक-दूसरे के समान स्थित हों। हाथ स्टार्टिंग लाइन पर ब्रिज बनाए हुए हों और स्टार्टिंग लाइन से पीछे हों। इस प्रकार के स्टार्ट में जब Set Position का आदेश होता है, Hips को ऊंचा ले जाया जाता है। यह स्टार्ट सबसे अधिक अस्थिर होता है।

मीडियम स्टार्ट (Medium Start) इस प्रकार के स्टार्ट में ब्लाकों के बीच की दूरी 10 से 13 इंच के बीच होती है और स्टार्टिंग लाइन से पहले ब्लाक की दूरी लगभग 15 इंच के बीच होती है। प्रायः एथलीट इस प्रकार के स्टार्ट का प्रयोग करते हैं। इसमें पिछले पांव का घुटना और अगले पांव का बीच वाला भाग एक सीध में होते हैं और Set Position पर Hips तथा कंधे लगभग एक-सी ऊंचाई पर ही होते हैं।

इलोंगेटेड स्टार्ट (Elongated Start)-इस प्रकार का स्टार्ट बहुत कम लोग लेते हैं। इसमें ब्लाकों (Starting Block) के बीच की दूरी 25 से 28 इंच के बीच होती है। पिछले पांव का घुटना लगभग अगले पांव की एड़ी के सामने होता है।
स्टार्ट लेना (Start)—जब किसी भी रेस के लिए स्टार्ट लिया जाता है तो तीन प्रकार के आदेशों पर कार्य करना पड़ता है।

  1. आन यूअर मार्क (On Your Mark)
  2. सैट पोजीशन (Set Position)
  3. पिस्तौल की आवाज़ पर जाना (Go)

दौड़ का अन्त (Finish of the Race)-दौड़ का अन्त बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। आमतौर पर खिलाड़ी तीन प्रकार से दौड़ को समाप्त करते हैं। ये इस प्रकार हैं—

  1. दौड़ कर सीधा आगे निकल जाना (Run Through)
  2. आगे को झुकना (Lunge)
  3. कन्धा आगे करना (The shoulders String)

मध्यम दूरी की दौड़ें (Middle Distance Races)—ट्रैक इवेंटों में कुछ दौड़ें मध्यम दूरी की होती हैं। आमतौर पर उन दौड़ों को, जो 400 गज़ के ऊपर और 1000 गज़ से नीचे की होती हैं, इस श्रेणी में गिना जाता है। ये दौडें 400 मीटर और 800 मीटर की होती हैं। इन दौड़ों में गति और सहनशीलता दोनों की आवश्यकता होती है, और वही एथलीट इसमें सफल होता है जिसके पास ये दोनों चीजें हों। इस प्रकार की दौड़ों में आमतौर पर एक-जैसी गति बनाए रखी जाती है और अन्त में पूरा जोर लगा कर दौड़ को जीता जाता है। 400 मीटर का स्टार्ट तो स्प्रिंग की तरह ही लिया जाता है जबकि 800 मीटर का स्टार्ट केवल खड़े होकर ही लिया जा सकता है। जहां तक हो सके इस दौड़ में कदम (Strides) बड़े होने चाहिएं।

लम्बी दूरी की दौड़ें (Long Distance Races)-लम्बी दूरी की दौड़ों जैसे कि नाम से ही मालूम होता है, दूरी बहुत अधिक होती है और प्रायः ये दौड़ें एक मील से ऊपर की होती हैं। 1500 मीटर, 3000 मीटर और 5000 मीटर दूरी वाली दौड़ें लम्बी दूरी वाली रेसें हैं। इनमें एथलीट की सहनशीलता (Endurance) का अधिक योगदान है। लम्बी दूरी की दौड़ों में एथलीट को अपनी शक्ति और सामर्थ्य का प्रयोग एक योजनाबद्ध ढंग से करना होता है और जो एथलीट इस कला को प्राप्त कर जाते हैं वे लम्बी दूरी की दौड़ों में सफल हो जाते हैं।

इस प्रकार की दौड़ों में दौड़ के आरम्भ को छोड़ कर सारी दौड़ में एथलीट का शरीर सीधा और आगे की और कुछ झुका रहता है तथा सिर सीधा रखते हुए ध्यान ट्रैक की ओर रखा जाता है। बाजू ढीली सी आगे की ओर लटकी होती है जबकि कोहनियों के पास से बाजू मुड़े होते हैं और हाथ बिना किसी तनाव के थोड़े से बन्द होते हैं। बाजू और टांगों के एक्शन जहां तक हो सके बिना किसी अधिक शक्ति व प्रयत्न के होने चाहिएं। दौड़ते समय पांव का आगे वाला भाग धरती पर आना चाहिए और एड़ी भी मैदान को छूती है, परन्तु अधिक पुश (Push) टो से ही ली जाती है। इस प्रकार की दौड़ों में कदम (Strides) छोटे और अपने आप बिना अधिक बढ़ाए होने चाहिएं। सारी दौड़ में शरीर बहुत Relaxed होना चाहिए।
इस प्रकार की दौड़ को समाप्त करते समय शरीर में इतना बल (Stamina) और गति होनी चाहिए कि एथलीट अपनी रेस को लगभग फिनिश लाइन से पांच-सात गज़ आगे तक समाप्त करने का इरादा रखे तो ही अच्छे परिणामों की आशा की जा सकती है।
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ट्रैक इवेंट्स में 100, 200, 400 तथा 800 मीटर तक की दौड़ आती है।

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प्रश्न 4.
200 मीटर और 400 मीटर के ट्रैक की चित्र के साथ बनावट लिखें।
उत्तर-
200 मीटर के ट्रैक की बनावट
(Track for 200 Metre)
200 मीटर के ट्रैक की लम्बाई 94 मीटर तथा चौड़ाई 53 मीटर होती है। इसकी बनावट का विवरण नीचे दिया गया है—
ट्रैक की कुल दूरी = 200 मीटर
दिशाओं की लम्बाई = 40 मीटर दिशाओं
द्वारा रोकी गई दूरी = 40 × 2 = 80 मीटर
कोनों में रोकी जाने वाली दूरी = 120 मीटर
व्यास 120 मीटर ÷ 2r = 19.09 मीटर
दौड़ने वाली दूरी का व्यास = 19.09 मीटर
प्रतिफल मार्किंग व्यास = 18.79 मीटर
1.22 मीटर (4 फुट) चौड़ी लाइनों के लिए स्टैगर्ज
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लेन मीटर
पहली 0.00
दूसरी 3.52
तीसरी 7.35
चौथी 11.19
पांचवीं 15.02
छठी 18.86
सातवीं 26.52
आठवीं 26.52

400 मीटर ट्रैक की बनावट

कम-से-कम माप = 170.40 × 90.40 मीटर
ट्रैक की कुल दूरी = 600 मीटर
सीधी लम्बाई = 80 मीटर
दोनों दिशाओं की दूरी = 80 × 2 = 160 मीटर
वक्रों (Curves) की दूरी = 240 मीटर
व्यास 240 मीटर : 2r = 38.18 मीटर
छोड़ने वाली दूरी का अर्द्धव्यास = 38.18 मीटर
मार्किंग अर्द्धव्यास = 37.88 मीटर
(i) 400 मीटर लेन [चौड़ाई 1.22 (4 फुट)] के लिए स्टैगर्ज

लेन मीटर
पहली 0.00
दूसरी 7.04
तीसरी 14.71
चौथी 22.38
पांचवीं 30.05
छठी 37.72
सातवीं 45.39
आठवीं 53.06

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 4

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 5.
हर्डल दौड़ों के विषय में आप संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
100 मीटर बाधा महिला दौड़
(100 Metre Women Hurdle)
100 मी० बाधा दौड 1968 से प्रारम्भ की गई है। सामान्यतः महिला धाविका 13 मीटर दूर स्थित प्रथम बाधा तक की दूरी 8 डगों में पूरी कर लेती है। उछाल 1.95 मीटर से लेकर बाधा को पार कर 11 मीटर की दूरी पर उनके ये डग पूरे होते हैं। बाधा के बीच तीन डग पूरे करने पर पुनः उछाल 200 मी० की दूरी से लिया जाता है। इस प्रकार वे 8.50 मी० की दूरी तय करती है।

बाधा पार करते समय महिला धाविकाओं को अपने शरीर के ऊपरी भाग को आगे की ओर अधिक नहीं झुकाना चाहिए और न ही उछाल के समय अपने घुटने को अधिक ऊंचा उठाना चाहिए। बाधा को पार करने की विधि वही अपनानी चाहिए जो 400 मी० हर्डल में अपनायी जाती है।
भिन्न-भिन्न प्रतियोगिता के लिए हर्डल की गिनती, ऊंचाई और दूरी निम्नलिखित हैं—
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110 मीटर बाधा दौड़
(110 Metre Hurdle Race)
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सामान्यत: बाधा दौड़ के धावक (Runner) पहली बाधा तक पहुंचने में 8 कदम लेते हैं। प्रारम्भ स्थल (Starting Block) पर बैठते समय अधिक शक्ति वाले पैर (Take off Foot) को आगे रखा जाता है। धावक यदि लम्बा है और अधिक तेज़ दौड़ सकने की क्षमता रखता है तो उस स्थिति में यह दूरी उसके लिए कम पड़ सकती है। उस दशा में थोड़ा अन्तर होने पर प्रारम्भ स्थल की दूरी के बीच की दूरी कम करके तालमेल बैठाने का प्रयास होना चाहिए, किन्तु ऐसा करने पर | यदि धावक असुविधा अनुभव करता है तो बाधा को मात्र कदमों में ही पार कर लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में शक्तिशाली पैर पीछे के स्थल (Block) पर रख कर धावक दौड़ेगा। अत: शक्तिशाली पैर बाधा से लगभग 2 मीटर पीछे आयेगा। आरम्भ में धावक को उसे 5 कदम तक अपनी दृष्टि नीचे रखनी चाहिए और बाद में हर्डल पर ही दृष्टि केन्द्रित होनी चाहिए। आरम्भ से अन्त तक कदमों के बीच का अन्तर निरन्तर बढ़ता ही जायेगा। किन्तु अन्तिम कदम उछाल कदम से लगभग 6 इंच (10 सैं० मी०) छोटा ही रहेगा। सामान्य दौड़ों की तुलना में बाधा दौड़ में दौड़ते समय धावक के घुटने अपेक्षाकृत अधिक ऊपर आयेंगे और जमीन पर पूरा पैर न रख कर केवल पैर के अगले भाग (पंजों) को ही रखना चाहिए।
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बाधा को पार करते समय उछाल पैर को सीधा रखना चाहिए तथा आगे के पैर को घुटने से ऊपर उठाना चाहिए। पैर का पंजा जमीन की ओर नीचे की ओर झुका हुआ रखना चाहिए, आगे के पैर को एक साथ सीधा करते हुए बाधा के ऊपर से लाना चाहिए, और शरीर का ऊपर का भाग आगे की ओर झुका हुआ रखना चाहिए। हर्डिल को पार करते ही अगले पैर की जांघ को नीचे दबाते रहना चाहिए कि जिस से बाधा पार हो जाने के बाद पंजा बाधा से अधिक दूरी पर न पड़ कर उसके पास ही ज़मीन पर पड़े। इसके साथ ही पीछे के पैर को घुटने से झुका कर बाधा के ऊपर से ज़मीन के समानान्तर रख कर घुटने को सीने के पास से आगे लाना चाहिए। इस प्रकार पैर आगे आते ही धावक तेज़ दौड़ने के लिए तत्पर रहेगा।

बाधा पार करने के उपरान्त पहला डग (कदम) 1.55 से 1.60 मीटर की दूरी पर, दूसरा 2.10 मीटर का तथा तीसरा . लगभग 2.20 मीटर के अन्तर पर पड़ना चाहिए। (13.72 मी०, 9.14 मी०, 14.20 मी०)
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400 मीटर बाधा (परुष तथा महिला)
(400 Metres Hurdles Men and Women)
सामान्यतः धावक को इस दौड़ में सर्वाधिक असुविधा अपने डगों के बीच तालमेल बैठाने में होती है। प्रारम्भ में प्रथम बाधा के बीच की दूरी को लोग सामान्यतः 21 से 23 डगों में पूरा कर लेते हैं और बाधा के बीच में 13-15 अथवा 17 डग रखते हैं। कुछ धावक प्रारम्भ में 14 और बाद में 16 कदमों में इस दूरी को पूरा कर लेते हैं। दाहिने पैर से उछाल लेने से लाभ होने की अधिक सम्भावना होती है। सामान्यतः उछाल 2.00 मीटर से लिया जाता है और पहला डग बाधा को पार कर जो ज़मीन पर पड़ता है, वह 1.20 मीटर का होता है। इसकी तकनीक 110 व 100 मीटर बाधाओं की ही भान्ति होती है। 400 मीटर दौड़ के समय से (सैकण्ड) 2-5 से 3-5 से 400 मीटर बाधा का समय अधिक आता है। 200 मीटर तथा प्रथम (220-2-5 से) = 25-5 से हर्डिल का समय।
200 मीटर दूसरा भाग (24-5-3-0 से) – 27-5 से = 52-00 में 400 मीटर हिडिल का समय।
अभ्यास के समय प्रत्येक हर्डिल पर समय लेकर पूरी दौड़ का समय निकालने की विधि।

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प्रश्न 6.
फील्ड इवेंट्स में कौन-कौन से इवेंट्स होते हैं ? संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
लम्बी कूद
(Long Jump)

  1. रनवे की लम्बाई = 40 मीटर से 45 मीटर
  2. रनवे की चौड़ाई = 1.22 मीटर
  3. पिट की लम्बाई = 10 मीटर
  4. पिट की चौड़ाई = 2.75 से 3 मीटर
  5. टेक ऑफ बोर्ड की लम्बाई = 1.22 मीटर
  6. टेक ऑफ बोर्ड की चौड़ाई = 20 सैंटी मीटर
  7. टेक ऑफ बोर्ड की गहराई = 10 सैंटी मीटर।

लम्बी कूद की विधि
(Method of Long Jump)
1. कूदने वाले पैर को मालूम करने के लिए लम्बी कूद में उसी प्रकार से करेंगे जैसे ऊंची कूद में किया गया था।
सर्वप्रथम कूदने वाले पैर को आगे सीधा रखेंगे और स्वतन्त्र पैर को इसके पीछे। यदि आप का कूदने वाला पैर बायां है तो बाएं पैर को आगे और दायें पैर को पीछे रख कर दायें घुटने से झुका कर ऊपर की ओर ले जायेंगे। और इसके साथ ही दायें हाथ को कुहनी से झुका कर रखेंगे। विधि उसी प्रकार से होगी जैसे कि तेज दौड़ने वाले करते हैं।
इस क्रिया को पहले खड़े होकर और बाद में चार-पांच कदम चल कर करेंगे। जब यह क्रिया ठीक प्रकार से होने लगे तब थोड़ा दौड़ते हुए यही क्रिया करनी चाहिए। इस समय ऊपर जाते समय ज़मीन को छोड़ देना चाहिए।
Long Jump
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2. छः या सात कदम दौड़ कर आगे आयेंगे और ऊपर जा कर कूदने वाले पैर पर ही नीचे ज़मीन पर आयेंगे। इसमें शरीर का भाग सीधा रहेगा जैसे कि ऊंची कूद में रहता है।
अगले स्वतन्त्र पैर जमीन पर आयेंगे। इस क्रिया को कई बार दुहराने के बाद ज़मीन पर आते समय कूदने वाले पैर को भी स्वतन्त्र पैर के साथ ही ज़मीन पर ले आएंगे।

3. ऊपर की क्रिया को कई बार करने के पश्चात् एक रूमाल लकड़ी में बांध कर कूदने वाले स्थान से थोड़ी ऊंचाई पर लगाएंगे और कूदने वाले बालकों को रूमाल को छूने को कहेंगे। ऐसा करने से एथलीट (Athlete) ऊपर जाना तथा शरीर के ऊपरी भाग को सीधा रखना सीख जाएगा।

अखाड़े में गिरने की विधि (लैंडिंग)
(Method of Landing)
1. दोनों पैरों को एक साथ करके एथलीट पिट (Pit) के किनारे पर खड़े हो जाएंगे। भुजाओं को आगे-पीछे की ओर हिलाएंगे और (Swing) करेंगे। साथ में घुटने भी झुकाएंगे और भुजाओं को एक साथ पीछे ले जाएंगे।

इसके पश्चात् घुटने को थोड़ा अधिक झुका कर भुजाओं को तेजी के साथ आगे और ऊपर की ओर ले जाएंगे और दोनों पैरों के साथ अखाड़े (Pit) में जम्प करेंगे। इस समय इस बात का ध्यान रहे कि पैर गिरते समय जहां तक सम्भव हो, सीधे रखने चाहिएं और इसके साथ ही पुट्ठों को आगे धकेलना चाहिए जिससे कि शरीर में पीछे झुकाव (Arc) बन सके जो कि हैंग स्टाइल (Hang Style) के लिए बहुत ही आवश्यक है।

2. एथलीट्स (Athletes) को सात कदम कूदने को कहेंगे। कूदते समय स्वतन्त्र पैर के घुटने को हिप (Hip) के बराबर लाएंगे। जैसे ही एथलीट (Athlete) हवा में थोड़ी ऊंचाई लेगा, स्वतन्त्र पैर को पीछे की ओर तथा नीचे की ओर लाएंगे जिससे वह कूदने वाले पैर के साथ मिल सके। कूदने वाला पैर घुटने से जुड़ा होगा और शरीर का ऊपरी भाग सीधा होगा। दोनों भुजाओं को पीछे की और तथा ऊपर की ओर गोलाई में ले जाएंगे। जब खिलाड़ी हवा में ऊंचाई लेता है, उस समय उसके दोनों घुटनों से झुके हुए पैर जांघ की सीध में होंगे। दोनों भुजाएं सिर की बगल में ओर ऊपर की ओर होंगी। शरीर पीछे की ओर गिरती हुई दशा में होगा तथा जैसे ही एथलीट्स (Athletes) अखाड़े (Pit) में गिरने को होंगे, वे स्वतन्त्र पैर घुटने से झुका कर आगे को तथा ऊपर को ले जाएंगे, पेट के नीचे की ओर लाएंगे तथा पैरों को,सीधा करके ऊपर की दशा में हवा में रोकने का प्रयास करेंगे।
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हिच किक की विधि
(Method of Hitch Kick)
1. जम्प करने के पश्चात् Split हवा में, पैरों को आगे-पीछे करके, स्वतन्त्र पैर पर लैंडिंग (Landing) करना, परन्तु ऊपरी भाग तथा सिर सीधा रहेगा, पीछे की ओर नहीं आएगा।

2. इस बार हवा में स्वतन्त्र पैर को रखेंगे और कूदने वाले पैर को आगे ले जाकर लैंडिंग (Landing) करेंगे।

3. अन्य सभी विधियां उसी प्रकार से होंगी जैसे कि ऊपर बताया गया है। केवल स्वतन्त्र पैर को लैंडिंग (Landing) करते समय टेक ऑफ पैर के साथ ले जाएंगे और दोनों पैरों पर एक साथ ज़मीन पर आएंगे। अन्य सभी शेष विधियां उसी प्रकार से होंगी जैसे कि हैंग (Hang) में दर्शाया गया है। एथलीट्स (Athletes) को दौड़ने का पथ (Approach run) धीरे-धीरे बढ़ाते रहना चाहिए।

4. ऊपर की क्रिया को कई बार करने के पश्चात् इस क्रिया को स्प्रिंग बोर्ड (Spring Board) की सहायता से करना चाहिए जैसा कि जिमनास्टिक (Gymnastic) वाले करते हैं। स्प्रिंग बोर्ड (Spring-Board) के अभाव में इस क्रिया को किसी अन्य ऊंचे स्थान से भी किया जा सकता है जिससे एथलीट्स को हवा में सही क्रिया विधि करने का अभ्यास हो जाए।

ट्रिपल जम्प
(Triple Jump)
अप्रोच रन (Approach Run) लम्बी कूद की भान्ति इसमें भी अप्रोच रन लिया जाएगा, परन्तु स्पीड (Speed) न अधिक तेज़ और न अधिक धीमी होगी।
अप्रोच रन की लम्बाई (Length of Approach Run) ट्रिपल जम्प में 18 से 22 कदम या 40 से 45 मीटर के लगभग अप्रोच रन लिया जाता है। यह कूदने वाले पर निर्भर करता है कि उसके दौड़ने की गति कैसी है। धीमी गति वाला लम्बा अप्रोच लेगा जबकि अधिक गति वाला छोटा अप्रोच लेगा। दोनों पैरों को एक साथ रखकर दौड़ना प्रारम्भ करेंगे तथा दौड़ने की गति को सामान्य रखेंगे। शरीर का ऊपरी भाग सीधा रहेगा।

  1. रनवे की लम्बाई = 40 मी० से 45 मीटर
  2. रनवे की चौड़ाई = 1.22 मीटर
  3. पिट की लम्बाई = टेक आफ बोर्ड से पिट समेत 21 मीटर
  4. पिट की चौड़ाई = 2.75 मीटर से 3 मीटर
  5. टेक ऑफ बोर्ड से पिट तक लम्बाई = 11 मीटर से 13 मीटर
  6. टेक ऑफ बोर्ड की लम्बाई = 1.22 मीटर
  7. टेक ऑफ बोर्ड की चौड़ाई = 20 सैंटी मीटर
  8. टेक ऑफ बोर्ड की गहराई = 10 सैंटी मीटर।

TRIPLE JUMP
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टेक ऑफ (Take off) लेते समय घुटना लम्बी कूद की अपेक्षा इसमें कम झुका होगा। शरीर का भार टेक ऑफ एवं होप स्टेप (Hop, Step) लेते समय पीछे रहेगा तथा दोनों बाजू भी पीछे रहेंगे। दूसरी टांग तेज़ी से हवा में आकर सप्लिट पोजीशन (Split Position) बनाएगी।
ट्रिपल जम्प में मुख्यतया तीन प्रकार की तकनीक (Technique) प्रचलित है—

  1. फ्लैट तकनीक
  2. स्टीप तकनीक
  3. मिक्सड तकनीक

ऊंची कूद
(High Jump)

  1. रनवे की लम्बाई = 15 मी० से 25 मी०
  2. तिकोनी क्रॉस बार की प्रत्येक भुजा = 30 मि०मी०
  3. क्रॉस बार की लम्बाई = 3.98 मी० से 4.02 मी०
  4. क्रॉस बार का वज़न = 2 कि० ग्राम०
  5. पिट की लम्बाई = 5 मी०
  6. पिट की चौड़ाई = 4 मी०
  7. पिट की ऊंचाई = 60 सैं०मी०

(1) समस्त प्रतियोगियों को पहले दोनों पैरों पर एक साथ अपने स्थान पर ही कूदने को कहेंगे। कुछ समय उपरान्त एक पैर पर कूदने के आदेश देंगे। ऊपर उछलते समय यह ध्यान रहे कि शरीर का ऊपरी भाग सीधा रहे एवं दस बार ही कूदा जाए। इस तरह जिस पैर पर कूदने पर आसानी प्रतीत हो उसी को उछाल (उठना) पैर (Take off foot) मान कर प्रशिक्षक को निम्नलिखित दो भागों में बांट देना चाहिए

  • बायें पैर पर कूदने वाले तथा
  • दायें पैर पर कूदने वाले।

(2) दो रेखाओं में प्रतियोगी अपने उछाल पैर (Take off Foot) को आगे रख कर दूसरे पैर को पीछे रखेंगे। दोनों भुजाओं को एक साथ पीछे से आगे, कुहनियों से मोड़ करके आगे, ऊपर की ओर तेजी से जाएंगे। इसके साथ ही पीछे रखे पैर को भी ऊपर किक (Kick) करेंगे, और ज़मीन से उछाल कर पुनः अपने स्थान पर वापस उसी पैर पर आएंगे। इस समय उछाल पैर (Take off Foot) वाले पैर का घुटना भी ऊपर उठते समय थोड़ा मुड़ा होगा। परन्तु शरीर का ऊपरी भाग सीधा रहेगा, एवं आगे न जा कर ऊपर उठेगा तथा उसी स्थान पर वापस आयेगा। ऊपर जाते समय कमर । तथा आगे का पैर सीधा रखने का प्रयास किया जाए।

(3) प्रतियोगियों को 45° पर बायें पैर वाले बाएं और दायें पैर से कूदने वाले दायीं ओर खड़े होकर क्रॉस छड़ (Cross bar) को लगभग दो फुट (60 सम) की ऊंचाई पर रख कर आगे चलते हुए ऊपर की भान्ति ही उछाल कर क्रॉस छड़ (Cross bar) को पार करेंगे और ऊपर जाकर नीचे आते समय उसी उछाल पैर (Take off Foot) पर वापिस आएंगे। केवल भिन्नता इतनी होगी कि अपने स्थान पर वापस न आकर आगे क्रॉस छड़ को पार करके गिरेंगे तथा दूसरा पैर पहले पैर के आने के उपरान्त आगे 10 या 12 इंच (25 सम) पर आएगा तथा आगे चलते जाएंगे, परन्तु यह ध्यान रखा जाए कि किक करते समय घुटना झुका हो। शरीर का ऊपरी भाग सीधा रखने का प्रयास किया जाए तथा दोनों भुजाओं को तेजी से ऊपर ले जाएंगे, परन्तु जब दोनों हाथ कंधों की सीध में पहुंचेंगे तो उसी स्थान पर वापिस गिरना होगा।
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HIGH JUMP
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(4) क्रॉस बार (Cross Bar) की ऊंचाई को बढ़ाएंगे तथा प्रशिक्षकों को टेक ऑफ़ (take off) पर आते समय टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) को लम्बा करने को कहेंगे, परन्तु यह ध्यान में रखेंगे कि इस समय एड़ी पहले ज़मीन पर आये। दोनों भुजाएं कुहनियों से मुड़ी हुई हों।
कूदते समय ध्यान क्रॉस बार (Cross Bar) पर होगा। सिर शरीर से कुछ पीछे की ओर झुका होगा तथा पीछे के पैर को ऊपर करते समय पैर का पंजा ऊपर की ओर कर सीधा होगा।

इस समय क्रॉस बार (Cross Bar) को प्रशिक्षक के सिर से दो फुट (60 से०मी०) ऊंचा रखेंगे तथा प्रत्येक को ऊपर बताई गई क्रिया के अनुसार क्रॉस बार को अपनी फ्री लैग (Free Leg) से किक (Kick) करने को कहेंगे।
इसमें निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेंगे—

  • दोनों भुजाओं को एक साथ तेज़ी से ऊपर ले जाएगा।
  • टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) उस समय ज़मीन छोड़ेगा जबकि फ्री लैग अपनी पूर्ण ऊंचाई तक पहुंच जाएगी।
  • ऊपर बताई गई प्रक्रिया को जोगिंग (Jogging) के साथ भी किया जाएगा।

(5) क्रॉस बार (Cross bar) को दो फुट (60 सेमी०) के ऊपर रख कर खिलाड़ी को नं० 3 की भान्ति क्रॉस छड (Cross bar) पार करने को कहेंगे। केवल इतना अन्तर होगा कि क्रॉस बार पार करने के उपरान्त अखाड़े में आते समय हवा में 90 डिग्री पर घूमेंगे। बायें पैर से टेक ऑफ़ (Take off) लेने वाले बायीं तरफ घूमेंगे तथा दायें पैर पर टेक ऑफ़ (Take off) लेने वाले दायीं तरफ घूमेंगे।
इसमें निम्नलिखित दो बातों का विशेष ध्यान रखा जाएगा—

  1. खिलाड़ी उछाल (Take Off) लेते समय ही न घूमें तथा
  2. पूर्ण ऊंचाई प्राप्त करने से पहले घूमें।

स्टैडल रोल
(Straddle Roll)
(6) टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) को आगे रख कर खड़े होंगे, पर यह ध्यान रहे कि शरीर का भार एड़ी पर होना चाहिए तथा फ्री लैग को पीछे रखेंगे। दोनों हाथों को एक साथ तेज़ी से आगे लायेंगे और फ्री लैग (Free Leg) को ऊपर की ओर किक (Kick) करेंगे जिससे शरीर का समस्त भाग ज़मीन से ऊपर उठ जाये।

(7) ज़मीन पर चूने की समानान्तर रेखा डालेंगे। एथलीट इस चूने की रेखा के दाहिनी ओर खड़े होकर उपर्युक्त प्रक्रिया को करेंगे। ऊपर हवा में पहुंचते ही बायीं ओर टेक ऑफ़ (Take off) को घुमायेंगे, चेहरा नीचे करेंगे तथा पिछले पैर को किक (Kick) पर उठायेंगे।

इसमें मुख्यत: यह ध्यान रखा जाए कि फ्री लैग (Free Leg) को सीधी किक (kick) किया जाए। टेक ऑफ़ लैग (Take off Leg) को सीधा किक करके घुटना मोड़ (Bend) पर ऊपर ले जायेंगे। खिलाड़ी क्रॉस बार (Cross bar) पार करने के उपरान्त अखाड़े में रोज़ अभ्यास कर सकते हैं क्योंकि टेक ऑफ़ किक (Take off Kick) तेज़ होने के कारण सन्तुलन भी बिगड़ सकता है।

(8) तीन कदम आगे आ कर जम्प करना (Jumping from Three Steps) क्रॉस बार के समानान्तर डेढ़ फुट से 2 फुट (45 सम से 60 सम) की दूरी पर रेखा खींचेंगे। इस रेखा से 30° पर दोनों पैर रख कर खड़े होंगे तथा टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) को आगे निकालते हुए मध्यम गति से आगे को भागेंगे। जहां पर तीसरा पैर आये वहां निशान लगा दें और अब उस स्थान पर दोनों पैर रख कर क्रॉस बार (Cross bar) की ओर चलेंगे और ऊपर बताई गई प्रक्रिया को दोहरायेंगे। क्रॉस बार की ऊंचाई एथलीट की सुविधा के अनुसार बढ़ाते जायेंगे।

बांस कूद
(Pole Vault)

  1. रनवे की लम्बाई = 40 से 45 मीटर
  2. रनवे की चौड़ाई = 1.22 मीटर
  3. लैडिंग ऐरिया = 5 × 5 मी०
  4. तिकोनी क्रास बार की लम्बाई = 4.48 मीटर से 4.52 मीटर
  5. तिकोनी क्रास बार प्रत्येक भुजा = 3.14 मीटर
  6. क्रास बार का वजन = 2.25 किलो ग्राम
  7. लैडिंग एरिया की ऊचाई = 6 सैं०मी० से 9 सैं०मी०
  8. बाक्स की लम्बाई = 1.08 मी०
  9. बाक्स की चौड़ाई रनवे की तरफ से = 60 सैं०मी०

ऐथलैटिक्स में बांस कूद (Pole Vault) बहुत ही उलझा हुआ इवेंट है। किसी भी इवेंट में टेक ऑफ़ (Take off) से अखाड़े में आते समय तक इतनी क्रियाओं की आवश्यकता नहीं होती, जितनी कि पोल वाल्ट में। इसलिए इस इवेंट को पढ़ाने तथा सिखाने दोनों में ही परेशानी होती है।

बांस कूद के लिए एथलीट का चयन
(Selection of Athlete for Pole Vault)
अच्छा बांस कूदक एक सर्वांग (आल राऊण्डर) खिलाड़ी ही हो सकता है। क्योंकि यह ऐसी स्पर्धा (Event) है जोकि सभी प्रकार से शरीर की क्षमता को बनाये रखती है, जैसे कि गति (Speed), शक्ति (Strength), सहनशीलता (Endurance) तथा तालमेल (Coordination) । अच्छे बांस कूदक का एक अच्छा जिमनास्ट भी होना आवश्यक है। जिससे वह सभी क्रियाओं को एक साथ कर सके।

पोल की पकड़ तथा लेकर चलना
(Holding.and Carrying the Pole)
बहुधा बायें हाथ से शरीर के सामने हथेली को ज़मीन की ओर रखते हुए पोल को पकड़ते हैं। दायां हाथ शरीर के पीछे पुढे (Hip) के पास दायीं ओर बांस (pole) के अन्तिम सिरे की ओर होता है।

बांस को पकड़ते समय बायां बाजू कुहनी से 100 अंश का कोण बनाता है तथा शरीर से दूर कलाई को सीधा रखते हुए बांस को पकड़ते हैं। दायां हाथ, जो कि बांस के अन्तिम सिरे की ओर होता है, बांस को अंगूठे के अन्दरूनी भाग और तर्जनी अंगुली के बीच में ऊपर से नीचे को दबाते हुए पकड़ते हैं। दोनों कुहनियां 100 अंश के कोण बनाए हुई होती हैं। हाथों के बीच की दूरी 24 इंच (60 सैं० मी०) से 36 इंच (80 सैं० मी०) तक होती है। यह बांस कूदक के शरीर की बनावट पर और पोल को लेकर दौड़ते समय जिसमें उसको आराम अनुभव हो, उस पर निर्भर करता है।

पोल के साथ दौड़ने की विधियां
(Running with the Pole)
1. बांस को सिर के ऊपर रख कर चलना (Walking with Pole keeping over head)-इसमें बांस को बाक्स के पास लाते समय अधिक समय लगता है। इसलिए यह विधि अधिक उपयुक्त नहीं है।

2. बांस को सिर के बराबर रख कर चलना (Walking with pole keeping at the level of head)विश्व के अधिकतर बांस कूदक इसी विधि को अपनाते हैं। इसमें चलते समय बांस का सिरा सिर के बराबर और बायें कंधे की सीध में होता है।
दायें से बायें-इसमें कंधे तथा बाजू साधारण अवस्था में रहते हैं।

3. बांस को सिर से नीचे लेकर चलना (Walking with pole keeping below the head)—इस अवस्था में बाजुओं पर अधिक ताकत पड़ती है, जिसके कारण बाक्स तक आते समय शरीर थक जाता है। बहुत ही कम संख्या में लोग इसको काम में लाते हैं। अप्रोच रन (Approach run) एथलीट को अपने ऊपर विश्वास तब होता है जबकि उस का अप्रोच रन सही आना शुरू होता है। आगे की क्रिया पर इसके बाद ही विचार किया जा सकता है। इसके लिए सबसे अच्छी विधि (The best method) यह है कि एक चूने की लाइन लगा कर एथलीट को पोल के साथ लगभग 150 फुट (50 मी०) तक भागने को कहना। इस क्रिया को कई दिन तक करने से एथलीट का पैर एक स्थान पर ठीक आने लगेगा। उस समय आप उस दूरी को फीते से नाप लें, फिर बांस कूद के रन-वे (Run-way) पर काम करें। पैरों को तेजी के साथ अप्रोच रन को भी घटाना बढ़ाना पड़ता है।

बांस कूद के अप्रोच रन में केवल एक ही चिह्न होना चाहिए। अधिक चिह्न होने से कूदने वाला अपने स्टाइल (Style) को न सोच कर चेक मार्क (Check Mark) को सोचता रहता है। अप्रोच रन (Approach Run) की लम्बाई 40 से 45 मी० के लगभग होनी चाहिए और अन्तिम 4 या 6 कदम में अधिक तेजी होनी चाहिए।

पोल प्लाण्ट
(Pole Plant)
यह सम्भव नहीं कि आप पूरी तेजी के साथ पोल (Pole) को प्लांट (Plant) कर सकें उसके लिए गति को सीमित करना पड़ता है। स्टील पोल (Steel Pole) में प्लांट जल्दी होना चाहिए तथा फाइबर ग्लास (Fibre Glass) में देरी से।’ स्टील पोल में प्लांट करते समय एथलीट को “एक और दो” गिनना चाहिए। एक के कहने पर बायां पैर आगे टेक ऑफ़ के लिए आयेगा और दायें पैर का घुटना ऊपर की ओर जायेगा। दो कहने पर शरीर की स्विग (Swing) शुरू हो जाती है। इस समय वाल्टर (Vaulter) को अपनी दायीं टांग को स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिए जिससे कि वह बायीं टांग के साथ मिल सके। इस विधि से अच्छी स्विग लेने में सुविधा होती है।

टेक ऑफ़
(Take Off)
टेक ऑफ़ के समय दायां घुटना आगे आना चाहिए। इससे शरीर को ऊपर पोल की ओर ले जाते हैं तथा सीने को । . पोल की ओर खींचते हैं। पोल को सीने के सामने रखते हैं। स्विंग (Swing) के समय दायीं टांग शरीर के आगे ऊपर की ओर उठेगी।

नोट-पोल करते समय एथलीट अपने हिप को ऊंचा ले जाते हैं, जबकि टांगों को ऊपर आना चाहिए व हिप को नीचे रखना चाहिए। पोल वाल्टरों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जब तक पोल सीधा नहीं होता, उनको पोल के साथ ही रहना चाहिए। पोल छोड़ते समय नीचे का हाथ पहले छोड़ना चाहिए। यह देखा गया है कि बहुत ही नये पोल वाल्टर . अपनी पीठ को क्रास बार के ऊपर से ले जाते हैं। यह केवल ऊपर के हाथ को पहले छोड़ने से होता है।
POLE VAULT
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प्रश्न 7.
श्री इवेंट्स कौन-कौन से होते हैं ? इनकी तकनीक और नियमों के बारे में लिखें।
उत्तर-

  1. गोले का भार = 7.260 कि०ग्राम + 5 ग्राम पुरुषों के लिए 4 कि० + 5 ग्राम स्त्रियों के लिए
  2. थरोईंग सैक्टर का कोना = 34.92°
  3. सर्कल का व्यास = 2.135 मी० + 5 मि०मी०
  4. स्टॉप बोर्ड की लम्बाई = 1.21 मी० से 1.23 मी०
  5. स्टॉप बोर्ड की चौड़ाई = 112 मि०मी० से 200 मि०मी०
  6. स्टॉप बोर्ड की ऊँचाई = 98 मि०मी० से 102 मि०मी०
  7. गोले का व्यास = 110 मि०मी० से 130 मि०मी०
  8. गोले का व्यास स्त्रियों के लिए = 95 मि०मी० से 110 मि०मी०।

शाट पुट-पैरी ओवरेइन विधि
(Shot Put-Peri Oberrain Method)
1. प्रारम्भिक स्थिति (Initial Position)-थ्रोअर गोला फेंकने की दशा में अपनी पीठ करके खड़ा होगा। शरीर
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का भार दायें पैर पर होगा। शरीर के ऊपरी भाग को नीचे लाते समय दायें पैर की एड़ी ऊपर उठेगी तथा बाएं पैर को घुटने से मुड़ी दशा में पीछे ऊपर जाकर तुरन्त पैर के पास पुनः लायेंगे। दोनों पैर मुड़े होंगे तथा ऊपरी भाग आगे को झुका होगा।

2. ग्लाइड (Glide)-दायां पैर सीधा करेंगे तथा दायें पैर के पंजे बाईं एड़ी से पीछे आयेंगे। बायां पैर स्टॉप बोर्ड (Stop Board) की ओर तेजी से किक करेंगे। बैठी हुई अवस्था में पुट्ठों को पीछे व नीचे की ओर गिरायेंगे। दायां पैर जमीन से ऊपर उठेगा तथा शरीर के नीचे ला कर बायीं ओर को पंजा मोड़ कर रखेंगे। बायां पैर इसी के लगभग साथ ही स्टॉप बोर्ड (Stop Board) पर थोड़ा दायीं ओर ज़मीन पर लगेगा। दोनों पैरों के पंजों को ज़मीन पर गोली दोनों कन्धे पीछे की ओर झुके होंगे। शरीर का समस्त भार दायें पैर पर होगा।

3. अन्तिम चरण (Final Phase)-दायें पैर के पंजे एवं घुटने को एक साथ बायीं ओर घुमायेंगे तथा दोनों पैरों को सीधा करेंगे। पुट्ठों को भी आगे बढ़ायेंगे। शरीर का भार दोनों पैरों पर होगा। बायां कन्धा सामने को खुलेगा। दायां कन्धा दायीं तरफ को ऊपर उठेगा तथा घूमेगा। पेट की स्थिति धनुष के आकार की तरह पीछे को झुकी हुई होगी।
SHOT PUT
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4. गोला फेंकना/थो करना (Putting throwing the Shot)-दायां कन्धा एवं दायीं भुजा को गोले के आगे की ओर ले जायेंगे। बायां कन्धा आगे को बढ़ता रहेगा। शरीर का समस्त भार बायें पैर पर होगा जोकि पूर्ण रूप से सीधा होगा। जैसे ही दाहिने हाथ द्वारा गोले को आगे फेंका जायेगा, दोनों पैरों की स्थिति भी बदलेगी। बायां पैर पीछे आयेगा तथा दायां पैर आगे आयेगा। शरीर का भार दायें पैर पर होगा। ऊपरी भाग एवं दायां पैर दोनों आगे को झुके होंगे।
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घूम कर गोला फेंकना या चक्के की भान्ति फेंकना
(Throwing the Shot by rotating or like a Discus)
1. प्रारम्भिक स्थिति (Initial Position)—प्रारम्भ करने के लिए गोले के दूसरे भाग पर गोला फेंकने की दशा में पीठ करके खड़े होंगे। बायां पैर मध्य रेखा पर तथा दायां भाग दायीं ओर होगा। दायां पैर लोहे की रिम (Rim) से 5 से 8 से०मी० पीछे रखेंगे जिससे कि वे घूमते समय फाउल (Foul) न हो। गोला गर्दन के नीचे भाग में होगा, कोहनी ऊपर उठी होगी। प्रारम्भ करने से पहले कन्धा, पेट, बायां बाजू, गोला सभी पहले बायीं तरफ को घूमेंगे तथा बाद में दायीं तरफ जायेगा। ऐसा करते समय दोनों घुटने झुके होंगे।

2. घूमना (Rotation)—दोनों पैरों पर शरीर का भार होगा तथा ऊपर की स्थिति से केवल एक स्विंग लेने के उपरान्त घूमना प्रारम्भ हो जायेगा। कन्धा एवं धड़ दायें को पूर्ण रूप से घूमते शरीर का भाग भी दायें पैर पर चला जायेगा। इस स्थिति में बायीं तरफ भुजा को ज़मीन के समानान्तर रखते हुए बायें पैर के पंजे पर शरीर का भार लाते हुए दोनों घुटने घूमेंगे। दायें पैर के पंजे पर भी 90 अंश तक घूमेंगे। दायें पैर को घुटने से झुकी हुई अवस्था में बायें पैर के टखने के ऊपर से गोले के बीच में पहुंचने पर लायेंगे।
बायें पैर पर घूमते समय चक्र समाप्त होने पर हवा में दोनों पैर होंगे तथा कमर को घुमाएंगे। दायां पैर केन्द्र में दाएं पैर के पंजे पर आएगा। दाएं पैर के पंजे की स्थिति उसी प्रकार से होगी जैसी कि घड़ी में 2 बजे की दशा में सुई होती है। बहादुर सिंह का पैर 10 बजे की स्थिति में आता है। वह हवा में ही कमर को मोड़ लेता है। 2 बजे की स्थिति में बायां पैर टो बोर्ड पर कुछ विलम्ब से आयेगा। परन्तु ऊपरी भाग को केन्द्र में रखा जा सकता है। 10 बजे की स्थिति में बायां पैर ज़मीन पर तेजी से आयेगा तथा अधिकतर यह सम्भावना रहती है कि शरीर का ऊपरी भाग शीघ्र ऊपर आ जाता है।
निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेंगे—

  • प्रारम्भ में सन्तुलन ठीक बनाकर चलेंगे, बायां पैर नीचे रखेंगे।
  • दाएं पैर से पूरी ग्लाइड (Glide) लेंगे, जम्प नहीं करेंगे। शरीर के ऊपरी भाग को ऊपर नहीं उठायेंगे।
  • दायां पैर केन्द्र में आते समय अन्दर को घूम जाएगा।
  • बायें कन्धे एवं पुढे को जल्दी ऊपर नहीं लाना है।
  • बायीं भुजा को शरीर के पास रखेंगे।
  • बायां पैर ज़मीन पर न शीघ्र लगेगा और न अधिक विलम्ब से।

सामान्य नियम
(General Rules)
1. पुरुष वर्ग में 7.26 किग्रा०, महिला में 4.00 कि०ग्रा० । गोले के व्यास पुरुष वर्ग में 110 से 130 व महिलाओं में 95 से 110 सैंटीमीटर।

2. गोला व तारगोला को 2.135 मीटर के चक्र से फेंका जाता है। अन्दर का भाग पक्का होगा, बाहरी मैदान से 25 मिलीमीटर नीचा होगा। स्टॉप बोर्ड (Stop Board) 1.22 मीटर लम्बा, 114 मिलीमीटर चौड़ा और 100 मिलीमीटर ऊंचा होगा।
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3. सैक्टर 40 अंश का गोला, तार गोला एवं चक्का होगा। केन्द्र से एक रेखा सीधी 20 मीटर की खींचेंगे। इस रेखा के 18.84 पर एक बिन्दु लगाएंगे, इस बिन्दु से दोनों ओर 6.84 की दूरी पर दो बिन्दु डाल देंगे तथा इन्हीं दो बिन्दुओं से सीधी रेखायें खींचने पर 40 अंश का कोण बनेगा।

4. गोला फेंकते समय शरीर का सन्तुलन होना चाहिए, गोला फेंक कर गोला ज़मीन पर गिरने के उपरान्त 75 सैंटीमीटर की दोनों रेखायें जो कि गोला फेंकने के क्षेत्र को दो भागों में विभाजित करती हैं, उसके पीछे के भाग से बाहर आयेंगे। गोला एक हाथ से फेंक दिया जाएगा। गोला कन्धे के पीछे नहीं आयेगा, केवल गर्दन के पास रहेगा। सही पुट उसी को मानेंगे जो कि सैक्टर के अन्दर हो। सैक्टर की रेखाओं को काटने पर फाऊल (Foul) माना जायेगा। यदि आठ प्रतियोगी (Competitors) हैं, तब सभी को 6 अवसर देंगे अन्यथा टाई पड़ने पर 9 भी हो सकते हैं।

चक्का फेंकने का प्रारम्भ
(Initial Stance of Discus Throw)

  1. चक्के का वजन = 2 कि० ग्राम पुरुषों के लिए 1 कि० ग्राम स्त्रियों के लिए
  2. सर्कल का व्यास _ = 2.5 मी० ± 5 मि०मी०
  3. थ्रोईंग सैक्टर का कोण = 34.92° चक्के का ऊपर का व्यास = 219 मि०मी० से 2.21 मि० मी० पुरुषों के लिए 180 से 182 स्त्रियों के लिए

चक्का फेंकने की दिशा के विरुद्ध पीठ करके छल्ले (Ring) के पास चक्र में खड़े होंगे। दायीं भुजा को घुमाते हुए एक या दो स्विग (Swing) भुजा तथा धड़ को भी साथ में घुमाते हुए लेंगे। ऐसा करते समय शरीर का भार भी एक पैर से दूसरे पैर पर जायेगा जिस से पैरों की एड़ियां मैदान के ऊपर उठेंगी। जब चक्का दाईं ओर होगा तथा शरीर का ऊपरी भाग भी दाईं ओर मुड़ा होगा यहां से चक्र का प्रारम्भ होगा। चक्र का प्रारम्भ शरीर के नीचे के भाग से होगा, बायें पैर को बायीं ओर झुकाएंगे। शरीर का भार इसी के ऊपर आयेगा। दायां घुटना भी साथ ही घूमेगा, दायां पैर भी घूमेगा, साथ ही कमर, पेट भी घूमेगा जाकि दायीं बाजू एवं चक्के को भी साथ में लायेगा।

इस स्थिति में गोले को पार करने की क्रिया प्रारम्भ होगी। सबसे पहले बायां पैर ज़मीन को छोड़ेगा। इसके उपरान्त बायां पैर चक्का फेंकने की दशा में आगे बढ़ेगा। दायां पैर घुटने से मुड़ा हुआ अर्ध चक्र की दशा में बायीं से दायीं ओर आगे को चलेगा। घूमते समय दोनों पुढे कन्धों से आगे होंगे जिससे शरीर के ऊपरी भाग तथा नीचे के भाग में मोड़ उत्पन्न होगा। दायीं भुजा जिसमें चक्का होगा, सिर कोहनी से सीधा होगा, बायीं भुजा कोहनी से मुड़ी हुई सीने के सम्मुख होगी। सिर सीधा रहेगा। दायें पैर के पंजे पर ज़मीन से थोड़ा ऊपर रख कर गोले को पार करेंगे तथा दायें पैर के पंजे ज़मीन पर आयेंगे। यह पैर लगभग केन्द्र में आयेगा। पंजा बाईं ओर को मुड़ा होगा।
विधियां
(Methods)
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इसमें मुख्यतः निम्नलिखित तीन प्रकार की विधियां हैं—

  1. प्रारम्भ करते समय भी जो नये फेंकने वाले होते हैं वे अपना दायां पैर केन्द्र की रेखा पर एवं बायां पैर 10 से०मी० छल्ले (Ring) के पीछे रखते हैं।
  2. दूसरी विधि जिसमें सामान्य फेंकने वाले केन्द्रीय रेखा को दोनों पैरों के मध्य रखते हैं।
  3. तीसरे वे फेंकने वाले हैं जो बायें पैर को केन्द्रीय रेखा पर रखते हैं।

इसी प्रकार गोले के मध्य में आते समय तीन प्रकार से पैर को रखते हैं। पहले 3 बजे की स्थिति में, दूसरे 10 बजे की स्थिति में, तीसरे 12 बजे की स्थिति में, जिसमें 12 बजे की स्थिति सर्वोत्तम मानी गयी है क्योंकि इसमें दायें पैर पर कम घूमना पड़ता है तथा बायें कन्धे को खुलने से रोका जा सकता है।
दायां पैर ज़मीन पर आने के उपरान्त भी निरन्तर घूमता रहेगा और बायां पैर गोले के केन्द्र की रेखा से थोड़ा बायीं ओर पंजे एवं अन्दर के भाग को ज़मीन पर लगा देगा।
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अन्तिम चरण (Last Step)
इस समय पैर ज़मीन पर होंगे, कमर घूमती हुई दिशा में पीछे को झुकी होगी, बायां पैर सीधा होगा, दायां पैर घुटने से मुड़ा हुआ, दायां घुटना एवं पुढे बायीं ओर घूमते हुए होंगे.। बायीं भुजा ऊपर की ओर खुलेगी, दायीं भुजा को शरीर से दूर रखते हुए आगे एवं ऊपर की दशा में लायेंगे।

फेंकना (Throwing)
दोनों पैर जो कि घूम कर आगे आ रहे थे, इस समय घुटने से सीधे होंगे। पुढे आगे को बढ़ेंगे, कन्धे तथा धड़ अपना घूमना आगे की दशा में समाप्त कर चुके होंगे। बायीं भुजा तथा कन्धा आगे घूमना बन्द करके एक स्थान पर रुक जायेंगे। दायीं भुजा एवं कन्धा आगे तथा ऊपर बढ़ेगा। दोनों पैरों के पंजों पर शरीर का भार होगा तथा दोनों पैर सीधे होंगे। अन्त में बायां पैर पीछे आयेगा तथा दायां पैर आगे जा कर घुटने से मुड़ेगा। शरीर का ऊपरी भाग भी आगे को झुका होगा। ऐसा शरीर का सन्तुलन बनाये रखने के लिए किया जाता है।
साधारण नियम (General Rules)
चक्के (Discus) का भार पुरुष वर्ग हेतु 2 किग्रा०, महिला वर्ग हेतु 1 कि०ग्रा० होता है। वृत्त का व्यास 2.50 होता
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LAY OUT OF DISCUS CIRCLE
है। वर्तमान समय के चक्के के गोले के बाहर लोहे की केज (Cage) बनाई जाती है ताकि चक्के से किसी को चोट न पहुंचे। सम्मुख 6 मीटर, अन्य 7 मीटर अंग्रेज़ी के ‘E’ के आकार की होती है। इसकी ऊंचाई 3.35 मीटर होती है।
सैक्टर-40° का इसी प्रकार बनायेंगे जैसे गोले के लिए, अन्य समस्त नियम गोले की भान्ति ही इसमें काम आयेंगे।

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प्रश्न 8.
जैवलिन थ्रो और उसके नियम लिखें।
उत्तर-

  1. जैवलिन का भार = 800 ग्राम पुरुषों के लिए 600 ग्राम स्त्रियों के लिए
  2. रनवे की लम्बाई = 30 मी० 36.5 मी०
  3. रनवे की चौड़ाई = 4 मीटर
    जैवलिन की लम्बाई = 260 सें.मी० से 270 सें०मी० पुरुषों के लिए 220 सें०मी० के 230 सें०मी० स्त्रियों के लिए
  4. जैवलिन के थ्रोईंग सैक्टर का कोण = 28.950

भाला फेंकना (Javelin Throw) भाले की सिर के बराबर ऊंचाई पर कान के पास, भुजा को कोहनी से झकी हुई, कोहनी एवं जैवलिन दोनों का
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मुख सामने की ओर होगा। हाथ की हथेली का रुख ऊपर की ओर होगा-ज़मीन के समानान्तर। सम्पूर्ण लम्बाई 30 से 35 मी० होगी। 3/4 दौड़ पथ में सीधे दौड़ेंगे। 1/3 अन्तिम के पांच कदम के लगभग क्रॉस स्टैप (Cross Step) लेंगे। अन्तिम चरण में जब बायां पैर जांच चिह्न (Check Mark) पर आएगा दायां कन्धा धीमी गति से दायीं ओर मुड़ना प्रारम्भ करेगा तथा दायीं भुजा भी पीछे आना प्रारम्भ करेगी। कदमों के बीच की दूरी बढ़ने लगेगी। दायां हाथ एवं कन्धा बराबर पीछे को आयेंगे एवं दाईं तरफ खुलते जायेंगे। कमर एवं शरीर का ऊपरी भाग पीछे को झुकता जायेगा। ऊपरी एवं नीचे
JAVELIN THROW
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के भाग में मोड़ उत्पन्न होगा, क्योंकि ऊपरी भाग दायीं ओर खुलेगा तथा नीचे का भाग सीधा आगे को चलेगा। आंखें आगे की ओर देखती हुई होंगी।

अन्त में दायां पैर घुटने से झुकी दशा में जमीन पर क्रॉस स्टैप (Cross Step) के अन्त में आयेगा। जैसे ही घुटना आगे बढ़ेगा, दायें पैर की एड़ी जमीन से ऊपर उठना प्रारम्भ हो जायेगी। इस प्रकार यह बायें पैर को अधिक दूरी पर जाने में सहायता करती है, जिससे कि दोनों पैरों के बीच अधिक-से-अधिक दूरी हो सके। बायां पैर थोड़ा बायीं ओर ज़मीन पर आएगा। कन्धे दायीं ओर को होंगे। भाला कन्धे की सीध में होगा। मुट्ठी बन्द तथा हथेली ऊपर की ओर, कलाई सीधी, कलाई नीचे की ओर होने से भाले का अन्तिम सिरा ज़मीन पर लगेगा। इस स्थिति के समय बाईं भुजा मुड़ी हुई सीने के ऊपर होगी।

अन्तिम फेस (Last Phase)-थ्रो करने की स्थिति में जब बायां पैर ज़मीन पर आयेगा, कूल्हा (Hip) आगे बढ़ना प्रारम्भ कर देगा। दायां पैर एवं घुटना अन्दर को घूमेगा तथा सीधा होकर टांग को सीधा करेगा। बायां कन्धा भी साथ में खुलेगा, दायीं कुहनी बाहर की ओर घूमेगी एवं ऊपर को भाला कन्धा एवं भुजा के ऊपर सीध में होगा। बायें पैर का रुकना, दायें पैर को अन्दर घुमाना तथा सीधा करना इन सबसे शरीर का ऊपरी भाग धनुष की भान्ति पीछे को झुकेगा तथा सीना एवं पेट की मांसपेशियों में तनाव उत्पन्न होगा।

फेंकने के बाद फाऊल (Foul) बचाने के लिए तथा शरीर के भार को नियन्त्रण में रखने के लिए कदमों में परिवर्तन लायेंगे। दायां पैर आगे आकर घुटने से मुड़ेगा तथा पंजा बायीं ओर को झुकेगा। शरीर का ऊपरी भाग दायें पैर पर आगे को झुक कर सन्तुलन बनाएगा। दायां पैर अपने स्थान से उठ कर कुछ आगे भी जा सकता है।

साधारण नियम
(General Rules)
1. पुरुष भाले की लम्बाई 2.60 मी० से 2.70 मी०, महिला 2.20 मी० से2.30 मी०

2. भाला फेंकने के लिए कम-से-कम 30 मी०, अधिकतम 36.50 मी० लम्बा एवं 4 मी० चौड़ा मार्ग चाहिए। सामने 70 मि०मी० की चाप वक्राकार सफेद लोहे की पट्टी होगी जो कि दोनों ओर 75 सें०मी० निकली होगी। इसको सफेद लेन से भी बनाया जा सकता है। यह रेखा 8 मी० सेण्टर से खींची जा सकती है।

3. भाले का सैक्टर 29° का होता है जहां वक्राकार रेखा मिलती है वहीं निशान लगा देते हैं। पूर्ण रूप से सही कोण के लिए 40 मी० की दूरी पर दोनों भुजाओं के बीच की दूरी 20 मीटर होगी, 60 मी० की दूरी पर 30 मी० होगी।
JAVELIN RUNWAY THROWING
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4. भाला केवल बीच में पकड़ने के स्थान (Grip) से ही पकड़ कर फेंकेंगे। भाले का अगला भाग ज़मीन पर पहले लगना चाहिए। शरीर के किसी भी भाग से 50 सें०मी० चौड़ी दोनों ओर की रेखाओं को या आगे 70 सें.मी. चौड़ी रेखा को स्पर्श करने को फाऊल थ्रो (Foul Throw) मानेंगे।

5. प्रारम्भ करने से अन्त तक भाला फेंकने की दशा में रहेगा। भाले को चक्र काट कर नहीं फेंकेंगे, केवल कन्धे के ऊपर से फेंक सकते हैं।

6. 3 + 3 गोला एवं चक्के की भान्ति अवसर मिलेंगे।

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प्रश्न 9.
रिले दौड़ों के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
रिले दौड़ें (Relay Races)

पुरुष (Men) महिला (Women)
4 x 100 मीटर 4 x 100 मीटर
4 x 200 मीटर 4 x 400 मीटर
4 x 400 मीटर
4 x 800 मीटर

मेडले रिले दौड़ (Medley Relay Race)—
800 × 200 × 200 × 400 मीटर
बैटन (Baton)-सभी वृत्ताकार रिले दौड़ों में बैटन को ले जाना होता है। बैटन एक खोखली नली का होना चाहिए और इसकी लम्बाई 30 सें०मी० से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसकी परिधि 12 सेंटीमीटर होनी चाहिए और भार 40 ग्राम होना चाहिए।
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रिले धावन पथ (Relay Race Track) रिले धावन पथ परे चक्र के लिए, गलियारों में विभाजित या अंकित होना चाहिए। यदि ऐसा सम्भव नहीं है, तो कम-से-कम बैटन विनिमय क्षेत्र गलियारों में होना चाहिए।

रिले दौड़ का प्रारम्भ (Start of Relay Race)-दौड़ के प्रारम्भ में बैटन का कोई भी भाग रेखा से आगे निकल सकता है, किन्तु बैटन रेखा या आगे की ज़मीन को स्पर्श नहीं करना चाहिए।

बैटन लेना (Taking the Baton) बैटन लेने के लिए भी क्षेत्र निर्धारित होता है। यह क्षेत्र दौड की निर्धारित दूरी रेखा के दोनों ओर 10 मीटर लम्बी प्रतिबन्ध रेखा खींच कर चिह्नित किया जाता है। 4 x 200 मीटर तक की रिले दौड़ों में पहले धावक के अतिरिक्त टीम के अन्य सदस्य बैटन लेने के लिए निर्धारित क्षेत्र के बाहर, किन्तु 10 मीटर से कम दूरी से दौड़ना आरम्भ करते हैं।
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बैटन विनिमय (Exchange of Baton)-बैटन विनिमय निर्धारित क्षेत्र के अन्दर ही होना चाहिए। धकेलने या किसी प्रकार से सहायता करने की अनुमति नहीं है। धावक एक-दूसरे को बैटन नहीं फेंक सकते यदि बैटन गिर जाता है, तो गिराने वाला धावक ही उठाएगा।
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