PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 6 बन्दा बहादुर तथा सिक्ख मिसलें

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions History Chapter 6 बन्दा बहादुर तथा सिक्ख मिसलें Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 6 बन्दा बहादुर तथा सिक्ख मिसलें

SST Guide for Class 10 PSEB बन्दा बहादुर तथा सिक्ख मिसलें Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द/एक पंक्ति (1-15 शब्दों) में लिखें

प्रश्न 1.
हुक्मनामे में गुरु (गोबिन्द सिंह) जी ने पंजाब के सिक्खों को क्या आदेश दिए?
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर उनका राजनीतिक नेता होगा तथा वे मुग़लों के विरुद्ध धर्मयुद्ध में बंदे का साथ दें।

प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर दक्षिण से पंजाब की तरफ क्यों आया?
उत्तर-
मुगलों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के लिए।

प्रश्न 3.
समाना पर बंदा सिंह बहादुर ने आक्रमण क्यों किया?
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर ने सिक्ख गुरुओं पर अत्याचार करने वाले जल्लादों को दण्ड देने के लिए समाना पर आक्रमण किया।

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प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर की तरफ से भूणा गांव पर आक्रमण करने का क्या कारण था?
उत्तर-
अपनी सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन प्राप्त करने के लिए।

प्रश्न 5.
बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा पर क्यों आक्रमण किया?
उत्तर-
सढौरा के अत्याचारी शासक उसमान खान को दण्ड देने के लिए।

प्रश्न 6.
बंदा सिंह बहादुर ने चप्पड़-चिड़ी तथा सरहिन्द पर क्यों आक्रमण किए?
उत्तर-
सरहिन्द के अत्याचारी सूबेदार वज़ीर खान को दण्ड देने के लिए।

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प्रश्न 7.
सहों के युद्ध के क्या कारण थे?
उत्तर-
जालन्धर दोआबे के सिक्खों ने वहां के फ़ौजदार शम्स खां के विरुद्ध शस्त्र उठा लिए।

प्रश्न 8.
बजीर खां कहां का सूबेदार था? उसका बंदा सिंह बहादुर के साथ किस स्थान पर युद्ध हुआ?
उत्तर-
बज़ीर खां सरहिन्द का सुबेदार था। चप्पड़-चिड़ी में।

प्रश्न 9.
बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बारे में लिखिए।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर को 1716 ई० को उसके साथियों सहित दिल्ली में शहीद कर दिया गया।

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प्रश्न 10.
‘करोड़सिंघिया’ मिसल का नाम कैसे पड़ा?
उत्तर-
करोड़सिंघिया मिसल का नाम इसके संस्थापक करोड़सिंह के नाम पर पड़ा।

प्रश्न 11.
सदा कौर कौन थी?
उत्तर-
सदा कौर महाराजा रणजीत सिंह की सास थी।

(ख) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 30-50 शब्दों में लिखो

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर तथा गुरु गोबिंद सिंह जी की मुलाकात का वर्णन करो।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर का आरम्भिक नाम माधोदास था। वह एक बैरागी था। 1708 ई० में गुरु गोबिन्द सिंह जी मुग़ल सम्राट् बहादुरशाह के साथ दक्षिण में गए। वहां माधोदास उनके सम्पर्क में आया। गुरु जी के आकर्षक व्यक्तित्व ने उसे इतना अधिक प्रभावित किया कि वह शीघ्र ही उनका शिष्य बन गया। गुरु जी ने उसे सिक्ख बनाया और उसे पंजाब में ‘सिक्खों’ का नेतृत्व करने के लिए भेजा। पंजाब में वह ‘बंदा सिंह बहादुर’ के नाम से विख्यात हुआ।

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प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर की समाना की विजय पर एक नोट लिखिए।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर ने 26 नवम्बर, 1709 ई० को समाना पर आक्रमण किया। इसका कारण यह था कि गुरु गोबिन्द सिंह जी के दो साहिबजादों को शहीद करने वाले जल्लाद समाना के थे। समाना की गलियों में कई घण्टों तक लड़ाई होती रही। सिक्खों ने लगभग 10,000 मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया और नगर के कई सुन्दर भवनों को नष्ट कर दिया। हत्यारे जल्लाद परिवारों का सफाया कर दिया गया। इस विजय से बंदा सिंह बहादुर को बहुत-सा धन भी प्राप्त हुआ।

प्रश्न 3.
चप्पड़-चिड़ी तथा सरहिन्द की लड़ाई का वर्णन करो।
उत्तर-
सरहिन्द के सूबेदार वज़ीर खान ने गुरु गोबिन्द सिंह जी को जीवन भर तंग किया था। इसके अतिरिक्त उसने गुरु साहिब के दो साहिबजादों को सरहिन्द में ही दीवार में चिनवा दिया था। इसलिए बंदा सिंह बहादुर इसका बदला लेना चाहता था। जैसे ही वह सरहिन्द की ओर बढ़ा, हजारों लोग उसके झण्डे तले एकत्रित हो गए। सरहिन्द के कर्मचारी, सुच्चा नंद का भतीजा भी 1,000 सैनिकों के साथ बंदा की सेना से जा मिला। परन्तु बाद में उसने धोखा दिया। दूसरी ओर वज़ीर खान के पास लगभग 20,000 सैनिक थे। सरहिन्द से लगभग 16 किलोमीटर पूर्व में चप्पड़चिड़ी के स्थान पर 22 मई, 1710 ई० को दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। वज़ीर खान को मौत के घाट उतार दिया गया। शत्रु के सैनिक बड़ी संख्या में सिक्खों की तलवारों के शिकार हुए। वज़ीर खान की लाश को एक पेड़ पर टांग दिया गया, । सुच्चा नंद जिसने सिक्खों पर अत्याचार करवाये थे, की नाक में नकेल डाल कर नगर में उसका जुलूस निकाला गया।

प्रश्न 4.
गुरदास नंगल के युद्ध का वर्णन करो।
उत्तर-
मुग़ल बंदा सिंह बहादुर की निरन्तर विजयों से आग-बबूला हो उठे थे। अत: 1715 ई० में एक विशाल मुग़ल सेना ने बंदा सिंह बहादुर पर आक्रमण कर दिया। इस सेना का नेतृत्व अब्दुस्समद खां कर रहा था। सिक्खों ने इस सेना का वीरता से सामना किया, परन्तु उन्हें गुरदास नंगल (गुरदासपुर से 6 कि० मी० दूर पश्चिम में) की ओर हटना पड़ा। वहां उन्होंने बंदा सिंह बहादुर सहित दुनीचन्द की हवेली में शरण ली। शत्रु को दूर रखने के लिए उन्होंने हवेली के चारों ओर खाई खोद कर उसमें पानी भर दिया। अप्रैल, 1715 ई० में मुग़ल सेना ने भाई दुनी चन्द की हवेली को घेर लिया। सिक्ख बड़े साहस और वीरता से मुग़लों का सामना करते रहे। आठ मास के लम्बे युद्ध के कारण उनकी खाद्य सामग्री समाप्त हो गई। विवश होकर उन्हें पराजय स्वीकार करनी पड़ी। बंदा सिंह बहादुर तथा उसके 200 साथी बन्दी बना लिए गए।

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प्रश्न 5.
सबसे पहली मिसल कौन-सी थी? उसका वर्णन करो।
उत्तर-
सबसे पहली मिसल फैज़लपुरिया मिसल थी। इसका संस्थापक नवाब कपूर सिंह था। उसने सबसे पहले अमृतसर के निकट फैजलपुर नामक गांव पर अधिकार किया और इसका नाम ‘सिंहपुर’ रखा। इसलिए इस मिसल को ‘सिंहपुरिया मिसल’ भी कहते हैं। 1753 ई० में नवाब कपूर सिंह की मृत्यु हो गई और उसका भतीजा खुशहाल सिंह इस मिसल का नेता बना। उसके काल में सिक्खों का प्रभुत्व काफ़ी बढ़ गया और सिंहपुरिया मिसल का अधिकार क्षेत्र दूर-दूर तक फैल गया। 1795 ई० में उसके पुत्र बुद्ध सिंह ने इस मिसल की बागडोर सम्भाली। वह अपने पिता के समान वीर तथा योग्य न था। 1819 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने इस मिसल को अपने राज्य में मिला लिया।

(ग) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 100-120 शब्दों में लिखो

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर की प्रारम्भिक विजयों का वर्णन करो।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर अपने युग का महान् सेनानायक था। गुरु साहिब का आदेश पाकर वह दिल्ली पहुंचा। उसने मालवा, दोआबा तथा माझा के सिक्खों के नाम गुरु गोबिन्द सिह जी के हुक्मनामे भेजे। शीघ्र ही हज़ारों की संख्या में सिक्ख उसके नेतृत्व में इकट्ठे हो गए। सेना का संगठन करने के पश्चात् बंदा सिंह बहादुर बड़े उत्साह से अत्याचारी मुग़लों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के लिए पंजाब की ओर चल पड़ा।
यहां से उसका विजय अभियान आरम्भ हुआ।

  1. सोनीपत पर आक्रमण-बंदा सिंह बहादुर ने सबसे पहले सोनीपत पर आक्रमण किया। उस समय उसके साथ केवल 500 सिक्ख ही थे। परन्तु वहाँ का फ़ौजदार सिक्खों की वीरता के बारे में सुन कर अपने सैनिकों सहित शहर छोड़ कर भाग गया।
  2. भूणा (कैथल) के शाही खज़ाने की लूट-सोनीपत से बंदा सिंह बहादुर कैथल के पास पहुँचा। उसे पता चला कि कुछ मुग़ल सैनिक भूमिकर इकट्ठा करके भूना गांव में ठहरे हुए हैं। अत: बंदा सिंह बहादुर ने भूना पर धावा बोल दिया। कैथल के फ़ौजदार ने उसका सामना किया, परन्तु पराजित हुआ। बंदा बहादुर ने मुग़लों से सारा धन छीन लिया।
  3. समाना की विजय-भूणा के पश्चात् बंदा सिंह बहादुर समाना की ओर बढ़ा। गुरु तेग़ बहादुर जी को शहीद करने वाला जल्लाद सय्यद जलालुद्दीन वहीं का रहने वाला था। सरहिन्द में गुरु गोबिन्द सिंह जी के छोटे साहिबजादों (जोरावर सिंह तथा फतेह सिंह) को शहीद करने वाले जल्लाद शासल बेग तथा बाशल बेग भी समाना के ही थे। उन्हें दण्ड देने के लिए 26 नवम्बर,1709 ई० को बंदा सिंह बहादुर ने समाना पर आक्रमण कर दिया। लगभग 10,000 मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। सय्यद जलालुद्दीन, शासल बेग तथा बाशल बेग के परिवारों का सफाया कर दिया गया।
  4. घुड़ाम की विजय-लगभग एक सप्ताह पश्चात् बंदा सिंह बहादुर ने घुड़ाम पर धावा बोल दिया। वहां के पठानों ने सिक्खों का विरोध किया, परन्तु अन्त में उन्हें भाग कर अपनी जान बचानी पड़ी। घुड़ाम से भी सिक्खों को बहुतसा धन मिला।
  5. कपूरी पर आक्रमण-घुड़ाम के बाद बंदा सिंह बहादुर कपूरी पहुँचा। वहाँ का शासक कतमऊद्दीन हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार करता था। बंदा सिंह बहादुर ने उसे पराजित करके मौत के घाट उतार दिया। उसकी हवेली को जला कर राख कर दिया गया।
  6. सढौरा की विजय-सढौरे का शासक उसमान खान भी हिन्दुओं पर अत्याचार करता था। भंगानी के युद्ध में गुरु जी की सहायता करने के कारण उसने पीर बुद्ध शाह को कत्ल करवा दिया था। इन अत्याचारों का बदला लेने के लिए बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा पर आक्रमण किया और उसमान खान को पराजित करके शहर को खूब लूटा ।
  7. मुखलिसपुर की जीत-अब बंदा सिंह बहादुर ने मुखलिसपुर पर धावा बोला और बहुत ही आसानी से वहां अधिकार जमा लिया। वहां के किले का नाम बदल कर लोहगढ़’ रख दिया । बाद में यही नगर बंदा सिंह बहादुर की राजधानी बना।
  8. चप्पड़-चिड़ी की लड़ाई तथा सरहिन्द की जीत-बंदा सिंह बहादुर का वास्तविक निशाना सरहिन्द था। यहाँ के सूबेदार वज़ीर खान ने गुरु गोबिन्द सिंह जी को जीवन भर तंग किया था। इसके अतिरिक्त उसने गुरु साहिब के दो छोटे साहिबजादों को सरहिन्द में ही दीवार में चिनवा दिया था। इसका बदला लेने के लिए बंदा ने सरहिंद पर आक्रमण कर दिया। सरहिन्द से लगभग 16 किलोमीटर पूर्व में चप्पड़-चिड़ी के स्थान पर 22 मई, 1710 ई० को दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। सिक्ख बड़े उत्साह से लड़े और उन्होंने वज़ीर खान को मौत के घाट उतार दिया। उसकी लाश को एक पेड़ पर टांग दिया गया। सुच्चानंद जिसने सिक्खों पर अत्याचार करवाये थे, की नाक में नकेल डाल कर नगर में उसका जुलूस निकाला गया। सिक्ख सैनिकों ने शहर में भारी लूट-मार की।
  9. सहारनपुर तथा जलालाबाद पर आक्रमण-इसी समय बंदा सिंह बहादुर को पता चला कि जलालाबाद का गवर्नर जलाल खां अपनी हिन्दू प्रजा पर घोर अत्याचार कर रहा है। अतः वह जलालाबाद की ओर बढ़ा। मार्ग में उसने सहारनपुर पर विजय प्राप्त की। परन्तु उसे जलालाबाद को विजय किए बिना ही वापस लौटना पड़ा।
  10. जालन्धर दोआब पर अधिकार-बंदा सिंह बहादुर की विजयों से उत्साहित होकर जालंधर दोआब के सिक्खों ने वहां के फ़ौजदार शम्स खां के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और बंदा सिंह बहादुर को सहायता के लिए बुलाया। शम्स खां ने एक विशाल सेना सिक्खों के विरुद्ध भेजी। राहों के स्थान पर दोनों सेनाओं में एक भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें सिक्ख विजयी रहे।
  11. अमृतसर, बटाला, कलानौर तथा पठानकोट पर अधिकार-बंदा सिंह बहादुर की सफलता से उत्साहित होकर लगभग आठ हज़ार सिक्खों ने मुसलमान शासकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। शीघ्र ही उन्होंने अमृतसर, बटाला, कलानौर तथा पठानकोट को अपने अधिकार में ले लिया। कुछ समय पश्चात् लाहौर भी उनके अधिकार में आ गया।

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प्रश्न 2.
बहादुर शाह ने बंदा बहादुर के विरुद्ध जो युद्ध लड़े, उनका वर्णन करो।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब के मुग़ल शासकों में हड़कंप मचा रखा था। जब यह समाचार मुग़ल सम्राट बहादुरशाह तक पहुंचा, तो वह क्रोधित हो उठा। उसने अपना सारा ध्यान पंजाब पर केन्द्रित कर दिया । 27 जून, 1710 ई० को वह अजमेर से पंजाब की ओर चल पड़ा। उसने दिल्ली तथा अवध के सूबेदारों तथा मुरादाबाद तथा इलाहाबाद के निज़ामों तथा फ़ौजदारों को आदेश दिया कि वे अपनी-अपनी सेनाओं सहित पंजाब में पहुंचे।

  1. अमीनाबाद की लड़ाई-बंदा सिंह बहादुर की शक्ति को कुचलने के लिए बहादुर शाह ने सर्वप्रथम फिरोज़ खान मेवाती तथा महावत खान के अधीन सिक्खों के विरुद्ध एक विशाल सेना भेजी। इस सेना का सामना बिनोद सिंह तथा राम सिंह ने 26 अक्तूबर, 1710 ई० को अमीनाबाद (बनेसर तथा तरावड़ी के बीच) में किया । उन्होंने महावत खान को एक बार तो पीछे धकेल दिया, परन्तु शत्रु की संख्या बहुत अधिक होने के कारण सिक्खों को अन्त में पराजय का मुंह देखना पड़ा।
  2. सढौरा की लड़ाई-जब बंदा सिंह बहादुर को सिक्खों की पराजय का समाचार मिला तो उसने अपने सैनिकों सहित शत्रु पर चढ़ाई कर दी। उस समय मुग़लों की विशाल सेना सढौरा में पड़ाव डाले हुए थी। 4 दिसम्बर, 1710 ई० को शत्र की सेना किसी उचित ठिकाने की खोज में निकली। अवसर का लाभ उठाकर सिक्खों ने उस पर धावा बोल दिया। उन्होंने शत्रु को बहुत क्षति पहुंचाई, परन्तु शाम को बहुत बड़ी संख्या में शाही सेना शत्रु की सेना से आ मिली। अतः सिक्खों ने लड़ाई छोड़ कर ‘लोहगढ़’ में शरण ली।।
  3. लोहगढ़ का युद्ध-अब बहादुर शाह ने स्वयं बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध कार्यवाही करने का निर्णय किया। उसने सिक्खों की शक्ति का पता लगाने के लिए वज़ीर मुनीम खान को किले की ओर बढ़ने का आदेश दिया। परन्तु उसने 10 दिसम्बर,1710 ई० को लोहगढ़ के किले पर आक्रमण कर दिया। उसे देखकर अन्य मुगल सरदारों ने भी किले पर धावा बोल दिया। सिक्खों ने शत्रु का डट कर सामना किया, परन्तु किले में खाद्य-सामग्री की कमी के कारण सिक्खों को काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अंत में बंदा सिंह बहादुर अपने सिक्खों सहित नाहन की पहाड़ियों की ओर निकल गया। ___ 11 दिसम्बर, 1710 ई० को मुनीम खान ने फिर से किले पर धावा बोल दिया और किले पर अधिकार कर लिया। अत: बहादुर शाह ने बंदा सिंह बहादुर का पीछा करने के लिए हमीद खान को नाहन की ओर भेजा। वह स्वयं सढौरा, बडौली, रोपड़, होशियारपुर, कलानौर आदि स्थानों से होता हुआ लाहौर जा पहुँचा।
  4. पहाड़ी प्रदेश में बंदा सिंह बहादुर की गतिविधियां-पहाड़ों में जाकर बंदा सिंह बहादुर ने सिक्खों के नाम हुक्मनामा भेजे। थोड़े समय में ही एक बड़ी संख्या में सिक्ख कीरतपुर में एकत्रित हो गए।
    1. सबसे पहले बंदा सिंह बहादुर ने गुरु गोबिन्द सिंह जी के पुराने शत्रु बिलासपुर के शासक भीमचन्द को एक ‘परवाना’ भेजा और उसे अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा। उसके न करने पर बंदा ने बिलासपुर पर आक्रमण कर दिया। एक घमासान युद्ध हुआ जिसमें भीमचन्द तथा 1300 सैनिक मारे गए। सिक्खों को शानदार विजय प्राप्त हुई।
    2. बंदा सिंह बहादुर की विजय से शेष पहाड़ी राजा भयभीत हो गए। उनमें से कइयों ने बंदा सिंह बहादुर को नज़राना देना स्वीकार कर लिया। मण्डी के राजा सिद्ध सेन ने यह घोषणा कर दी कि वह सिक्ख गुरु साहिबान का अनुयायी है।
    3. मण्डी से बंदा सिंह बहादुर कुल्लू की ओर बढ़ा। वहाँ के शासक मान सिंह ने चालाकी से उसे कैद कर लिया, परन्तु जल्दी ही बंदा सिंह बहादुर वहां से बच निकलने में सफल हो गया।
    4. कुल्लू से बंदा सिंह बहादुर चम्बा रियासत की ओर बढ़ा। वहाँ के राजा उदय सिंह ने उसका हार्दिक स्वागत किया। उसने अपने परिवार में से एक लड़की का विवाह भी उसके साथ कर दिया। 1711 ई० के अन्त में बंदा के यहाँ एक पुत्र पैदा हुआ। उसका नाम अजय सिंह रखा गया।
    5. बहिरामपुर की लड़ाई-अब बंदा सिंह बहादुर रायपुर तथा बहिरामपुर के पहाड़ों से निकल कर मैदानी प्रदेश में आ गया। वहां जम्मू के फ़ौजदार बायजीद खां खेशगी ने उस पर आक्रमण कर दिया। 4 जून, 1711 ई० को बहिरामपुर के निकट लड़ाई हुई। इस लड़ाई में बाज़ सिंह तथा फतेह सिंह ने अपनी वीरता के जौहर दिखाए और सिक्खों को विजय दिलाई।
      बहिरामपुर की विजय के पश्चात् बंदा सिंह बहादुर ने रायपुर, कलानौर तथा बटाला पर आक्रमण किए और इन स्थानों को अपने अधिकार में ले लिया, परन्तु उसकी ये विजयें चिर-स्थायी सिद्ध न हुईं। उसने फिर से पहाड़ों में शरण ली। परन्तु बहादुर शाह के अधीन मुग़ल सरकार उसकी शक्ति को कुचलने में असफल रही।

प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर की गंगा-यमुना के इलाके में लड़ी गई लड़ाइयों का वर्णन करो।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की विजयों से जन साधारण में उत्साह की लहर दौड़ गई। लोगों को विश्वास हो गया कि बंदा ही उन्हें मुग़लों के अत्याचारों से मुक्ति दिला सकता है। बस फिर क्या था। देखते ही देखते बहुत-से हिन्दू तथा मुसलमान सिक्ख बनने लगे। उनारसा गाँव के निवासी भी सिक्ख बन गए। जलालाबाद का फ़ौजदार जलाल खां इसे सहन न कर सका। उसने वहाँ के बहुत-से सिक्खों को कैद कर लिया। उन सिक्खों को छुड़ाने के लिए बंदा सिंह बहादुर अपने सैनिकों को लेकर उनारसा की ओर चल पड़ा।

  1. सहारनपुर पर आक्रमण-यमुना नदी को पार करके सिक्खों ने पहले सहारनपुर पर आक्रमण किया। वहाँ का फ़ौजदार अली हामिद खान दिल्ली की ओर भाग गया। उसके कर्मचारियों ने सिक्खों का सामना किया, परन्तु वे परास्त हुए। नगर के अधिकतर भाग पर सिक्खों का अधिकार हो गया। उन्होंने सहारनपुर का नाम बदल कर भाग नगर’ रख दिया।
  2. बेहात की लड़ाई-सहारनपुर से बंदा सिंह बहादुर ने बेहात की ओर कूच किया। वहाँ के पीरज़ादे हिन्दुओं पर अत्याचार कर रहे थे। वे खुले तौर पर बाज़ारों तथा गलियों में गौ हत्या करते थे। बंदा सिंह बहादुर ने अनेक पीरज़ादों को मौत के घाट उतार दिया। कहते हैं कि उनमें से केवल एक पीरज़ादा ही जीवित बच सका जोकि बुलंद शहर गया हुआ था।
  3. अम्बेता पर आक्रमण-बेहात के उपरान्त बंदा सिंह बहादुर ने अम्बेता पर आक्रमण किया। वहाँ के पठान बड़े धनी थे। उन्होंने सिक्खों का कोई विरोध न किया। सिक्खों को वहाँ से बहुत-सा धन मिला।
  4. नानौता पर आक्रमण-21 जुलाई, 1710 ई० को सिक्खों ने नानौता पर आक्रमण किया। वहाँ के शेखज़ादे तीर चलाने में बड़े निपुण थे। वे सिक्खों के सामने डट गए। नानौता की गलियों तथा बाजारों में घमासान युद्ध हुआ। लगभग 300 शेखज़ादे युद्ध में मारे गए और सिक्खों को विजय प्राप्त हुई।
  5. उनारसा पर आक्रमण- यहाँ से बंदा सिंह बहादुर ने अपने मुख्य शत्रु अर्थात् उनारसा के जलाल खां की ओर ध्यान दिया। अपने दूत द्वारा उसने जलाल खां के पास एक पत्र भेजा। उसने लिखा कि वह कैदी सिक्खों को छोड़ दे तथा उसकी अधीनता स्वीकार कर ले। परन्तु जलाल खां ने बंदा सिंह बहादुर की इस मांग को ठुकरा दिया। उसने दूत का निरादर भी किया। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने उनारसा पर भयंकर धावा बोल दिया। एक घमासान युद्ध हुआ जिसमें सिक्खों को विजय प्राप्त हुई। इस युद्ध में जलाल खां के दो भतीजे जमाल खां तथा पीर खां भी मारे गए।

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प्रश्न 4.
पंजाब की तीन प्रसिद्ध मिसलों का वर्णन करो।
उत्तर-
मिसल अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है-एक समान। 1767 से 1799 ई० तक पंजाब में जितने भी सिक्ख जत्थे बने उनमें मौलिक समानता पाई जाती थी। इसलिए उन्हें मिसल कहा जाने लगा। प्रत्येक मिसल का सरदार अपने जत्थे के अन्य सदस्यों के साथ समानता का व्यवहार करता था। इसके अतिरिक्त एक मिसल का जत्थेदार तथा उसके सैनिक दूसरी मिसल के जत्थेदार तथा सैनिकों से भी भाई-चारे का नाता रखते थे। सिक्ख मिसलों की कल संख्या 12 थी। इनमें से तीन प्रसिद्ध मिसलों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. फैजलपुरिया मिसल-फैजलपुरिया मिसल सबसे पहली मिसल थी। इस मिसल का संस्थापक नवाब कपूर सिंह था। उसने अमृतसर के पास फैजलपुर नामक गाँव पर कब्जा करके उसका नाम ‘सिंहपुर’ रखा। इसीलिए इस मिसल को ‘सिंहपुरिया’ मिसल भी कहा जाता है।
    1753 ई० में नवाब कपूर सिंह की मौत हो गई और उसका भतीजा खुशहार सिंह फैजलपुरिया मिसल का नेता बना। उसने अपनी मिसल का विस्तार किया। उसके अधीन फैजलपुरिया मिसल में जालन्धर, नूरपुर, बहरामपुर, पट्टी आदि प्रदेश शामिल थे। खुशहाल सिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बुध सिंह फैजलपुरिया मिसल का सरदार बना। वह अपने पिता की तरह वीर तथा साहसी नहीं था। रणजीत सिंह ने उसे हरा कर उसकी मिसल को अपने राज्य में मिला लिया।
  2. भंगी मिसल- भंगी मिसल सतलुज दरिया के उत्तर-पश्चिम में स्थित थी। इस मिसल के क्षेत्र में लाहौर, अमृतसर, गुजरात तथा सियालकोट जैसे महत्त्वपूर्ण शहर शामिल थे।
    रणजीत सिंह के मिसलदार बनने के समय भंगी मिसल पहले जैसी शक्तिशाली नहीं थी। इस मिसल के सरदार गुलाब सिंह तथा साहिब सिंह अयोग्य तथा व्यभिचारी थी। वे भांग व शराब पीने में ही अपना सारा समय बिता देते थे। वे अपनी मिसल के राजप्रबन्ध में बहुत रुचि नहीं लेते थे। अतः मिसल के लोग उनसे तंग आए हुए थे।
  3. आहलूवालिया मिसल-जस्सा सिंह अहलूवालिया के समय वह मिसल बड़ी शक्तिशाली थी। इस मिसल का सुलतानपुर लोधी, कपूरथला, होशियारपुर, नूरमहल आदि प्रदेशों पर अधिकार था। 1783 ई० में इस मिसल के सबसे शक्तिशाली सरदार जस्सासिंह अहलूवालिया की मृत्यु हो गई। 1783 से 1801 ई० तक इस मिसल का नेता भागसिंह रहा। उसके बाद फतह सिंह आहलूवालिया उसका उत्तराधिकारी बना। रणजीत सिंह ने समझदारी से काम लेते हुए उससे मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लिए और उसकी ताकत तथा सेवाओं का प्रयोग अपने राज्य विस्तार के लिए किया।

प्रश्न 5.
पंजाब में दिए गए मानचित्र पर बंदा सिंह बहादुर द्वारा किए गए युद्धों के स्थानों को दर्शाओ।
उत्तर-
विद्यार्थी अध्यापक की सहायता से स्वयं करें।

PSEB 10th Class Social Science Guide बन्दा बहादुर तथा सिक्ख मिसलें Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
गुरदास नंगल के युद्ध में सिक्ख क्यों हारे?
उत्तर-
गुरदास नंगल के युद्ध में सिक्ख खाद्य सामग्री समाप्त हो जाने के कारण हारे।

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प्रश्न 2.
पंजाब में एक सिक्ख राज्य की स्थापना में बंदा सिंह बहादुर की असफलता का एक प्रमुख कारण बताएं।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर अपने साधु स्वभाव को छोड़ कर राजसी ठाठ-बाठ से रहने लगा था।

प्रश्न 3.
नवाब कपूर सिंह ने सिक्खों को 1734 ई० में किन दो दलों में बांटा?
उत्तर-
1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिक्खों को दो दलों में बांट दिया-‘बुड्ढा दल’ तथा ‘तरुण दल’।

प्रश्न 4.
सिक्ख मिसलों की कुल संख्या कितनी थी?
उत्तर-
सिक्ख मिसलों की कुल संख्या 12 थी।

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प्रश्न 5.
फैज़लपुरिया, आहलूवालिया, भंगी तथा रामगढ़िया मिसल के संस्थापक कौन थे?
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह, जस्सा सिंह आहलूवालिया, हरि सिंह तथा जस्सा सिंह रामगढ़िया ने क्रमश: फैजलपुरिया, आहलूवालिया, भंगी तथा रामगढ़िया मिसल की स्थापना की।

प्रश्न 6.
जय सिंह, सरदार चढ़त सिंह, चौधरी फूल सिंह तथा गुलाब सिंह ने क्रमशः किन-किन मिसलों की स्थापना की?
उत्तर-
जय सिंह, सरदार चढ़त सिंह, चौधरी फूल सिंह तथा गुलाब सिंह ने क्रमशः कन्हैया, शुकरचकिया, फुल्कियां तथा डल्लेवालिया मिसल की स्थापना की।

प्रश्न 7.
निशानवालिया, करोड़सिंघिया, शहीद अथवा निहंग तथा नक्कई मिसलों के संस्थापक कौन थे?
उत्तर-
रणजीत सिंह तथा मोहर सिंह, करोड़ सिंह, सुधा सिंह तथा हीरा सिंह ने क्रमशः निशानवालिया, करोड़सिंघिया, शहीद अथवा निहंग तथा नक्कई मिसलों की स्थापना की।

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प्रश्न 8.
बंदा सिंह बहादुर को पंजाब में किसने भेजा था?
उत्तर-
गुरु गोबिन्द सिंह जी ने।

प्रश्न 9.
माधोदास (बंदा सिंह बहादुर) के साथ गुरु गोबिन्द सिंह जी की मुलाकात कहां हुई थी?
उत्तर-
नंदेड़ में।

प्रश्न 10.
गुरु तेग़ बहादुर साहिब जी को शहीद करने वाला जल्लाद कौन था?
उत्तर-
सैय्यद जलालुद्दीन।

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प्रश्न 11.
सैय्यद जलालुद्दीन कहां का रहने वाला था?
उत्तर-
समाना का।

प्रश्न 12.
बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा में किस शासक को हराया था?
उत्तर-
उसमान खां को।

प्रश्न 13.
सढौरा में स्थित पीर बुद्ध शाह की हवेली आजकल किस नाम से जानी जाती है?
उत्तर-
कत्लगढ़ी।

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प्रश्न 14.
बंदा सिंह बहादुर ने किस स्थान के किले को ‘लोहगढ़’ का नाम दिया?
उत्तर-
मुखलिसपुर।

प्रश्न 15.
गुरु गोबिन्द सिंह साहिब के दो छोटे साहिबजादों को दीवार में कहां चिनवाया गया था?
उत्तर-
सरहिन्द में।

प्रश्न 16.
बंदा द्वारा सुच्चानन्द की नाक में नकेल डाले जुलूस कहां निकाला गया था?
उत्तर-
सरहिन्द में।

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प्रश्न 17.
बंदा सिंह बहादुर ने सरहिन्द विजय के बाद वहां का शासक किसे नियुक्त किया?
उत्तर-
बाज़ सिंह को।

प्रश्न 18.
बंदा सिंह बहादुर ने किस स्थान को अपनी राजधानी बनाया?
उत्तर-
मुखलिसपुर को।

प्रश्न 19.
सहारनपुर का नाम ‘भाग नगर’ किसने रखा था?
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर ने।

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प्रश्न 20.
बंदा सिंह बहादुर की सिक्ख सेना को पहली बड़ी हार का सामना कब और कहां करना पड़ा?
उत्तर-
अक्तूबर 1710 में अमीनाबाद में।

प्रश्न 21.
मुग़ल सम्राट् बहादुर शाह की मृत्यु कब हुई?
उत्तर-
18 फरवरी, 1712 को।

प्रश्न 22.
बहादुर शाह के बाद मुग़ल राजगद्दी पर कौन बैठा?
उत्तर-
जहांदार शाह।

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प्रश्न 23.
जहांदार शाह के बाद मुग़ल सम्राट् कौन बना?
उत्तर-
फरुख़सीयर।

प्रश्न 24.
अब्दुससमद खां ने सढौरा तथा लोहगढ़ के किलों पर कब विजय प्राप्त की?
उत्तर-
अक्तूबर 1713 में।

प्रश्न 25.
गुरदास नंगल में सिक्खों ने मुगलों के विरुद्ध कहां शरण ली?
उत्तर-
दुनीचंद की हवेली में।

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प्रश्न 26.
दुनीचन्द की हवेली में बंदा सिंह बहादुर का साथ किसने छोड़ा?
उत्तर-
विनोद सिंह तथा उसके साथियों ने।

प्रश्न 27.
बंदा सिंह बहादुर को उसके 200 साथियों सहित कब गिरफ्तार किया गया?
उत्तर-
7 दिसम्बर, 1715 को।

प्रश्न 28.
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी कब हुई?
उत्तर-
19 जून, 1716 को।

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प्रश्न 29.
दल खालसा की स्थापना कब और कहां हुई?
उत्तर-
दल खालसा की स्थापना 1748 में अमृतसर में हुई।

प्रश्न 30.
महाराजा रणजीत सिंह का सम्बन्ध किस मिसल से था?
उत्तर-
शुकरचकिया मिसल से।

प्रश्न 31.
महाराजा रणजीत सिंह शुकरचकिया मिसल का सरदार कब बना?
उत्तर-
1797 ई० में।

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प्रश्न 32.
करोड़सिंघिया मिसल का दूसरा नाम क्या था?
उत्तर-
पंजगढ़िया मिसल।

II. रिक्त स्थानों की पर्ति

  1. बंदा सिंह बहादुर ने उसमान खान को दण्ड देने के लिए …………. पर आक्रमण किया।
  2. बंदा सिंह बहादुर को उसके 200 साथियों सहित …………… ई० को गिरफ्तार किया गया।
  3. गुरु गोबिन्द सिंह साहिब के दो छोटे. साहिबजादों को दीवार में ……….. में चिनवाया गया था।
  4. बंदा सिंह बहादुर ने ……………. की नाक में नकेल डालकर सरहिंद में जुलूस निकाला।
  5. बंदा सिंह बहादुर ने सहारनपुर का नाम ………….. रखा।।
  6. गुरदास नंगल में सिक्खों ने मुग़लों के विरुद्ध ………….. की हवेली में शरण ली।
  7. दल ख़ालसा की स्थापना ………. ई० में हुई।
  8. बंदा सिंह बहादुर की शहीदी 1716 में …………. में हुई।

उत्तर-

  1. सढौरा,
  2. 7 दिसंबर, 1715,
  3. सरहिंद,
  4. सुच्चानन्द,
  5. भाग नगर,
  6. दुनीचंद,
  7. 1748,
  8. दिल्ली।

III. बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुरु गोबिन्द सिंह जी ने पंजाब में सिखों का नेतृत्व करने के लिए किसे भेजा?
(A) वज़ीर खां को
(B) जस्सा सिंह को
(C) बंदा सिंह बहादुर को
(D) सरदार राजेंद्र सिंह को।
उत्तर-
(C) बंदा सिंह बहादुर को

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प्रश्न 2.
वजीर खां और बंदा सिंह बहादुर का युद्ध किस स्थान पर हुआ?
(A) चप्पड़-चिड़ी
(B) सरहिन्द
(C) सढौरा
(D) समाना।
उत्तर-
(A) चप्पड़-चिड़ी

प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी कब हुई?
(A) 1761 ई० में
(B) 1716 ई० में
(C) 1750 ई० में
(D) 1756 ई० में।
उत्तर-
(B) 1716 ई० में

प्रश्न 4.
भंगी मिसल के सरदारों के अधीन इलाके थे
(A) लाहौर
(B) गुजरात
(C) सियालकोट
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 5.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक था
(A) करोड़ सिंह
(B) रणजीत सिंह
(C) जस्सा सिंह
(D) महा सिंह।
उत्तर-
(C) जस्सा सिंह

IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/गलत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. बंदा सिंह बहादुर की शहीदी 1716 में दिल्ली में हुई।
  2. सदा कौर महाराजा रणजीत सिंह की माता थी।
  3. फैजलपुरिया मिसल को सिंहपुरिया मिसल भी कहा जाता है।
  4. बंदा सिंह बहादुर ने गुरु-पुत्रों पर अत्याचार का बदला लेने के लिए सरहिन्द पर आक्रमण किया।
  5. दल खालसा की स्थापना आनंदपुर साहिब में हुई।

उत्तर-

  1. (✓),
  2. (✗),
  3. (✓),
  4. (✓),
  5. (✗).

V. उचित मिलान

  1. नवाब कपूर सिंह – भंगी मिसल
  2. जस्सा सिंह आहलूवालिया – फैजलपुरिया मिसल
  3. हरि सिंह – रामगढ़िया मिसल
  4. जरसा सिंह रामगढ़िया – आहलूवालिया मिसल

उत्तर-

  1. नवाब कपूर सिंह-फ़ैज़लपुरिया मिसल,
  2. जस्सा सिंह आहलूवालिया-आहलूवालिया मिसल,
  3. हरि सिंह-भंगी मिसल,
  4. जस्सा सिंह रामगढ़िया-रामगढ़िया मिसल।

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छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर के किन्हीं चार सैनिक कारनामों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर के सैनिक कारनामों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है —

  1. समाना और कपूरी की लूटमार-बंदा सिंह बहादुर ने सबसे पहले समाना पर आक्रमण किया और वहां भारी लूटमार की। तत्पश्चात् वह कपूरी पहुंचा। इस नगर को भी उसने बुरी तरह लटा।
  2. सढौरा पर आक्रमण-सढौरा का शासक उस्मान खां हिन्दुओं के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता था। उसे दण्ड देने के लिए बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा पर धावा बोल दिया। इस नगर में इतने मुसलमानों की हत्या की गई कि उस स्थान का नाम ही ‘कत्लगढ़ी’ पड़ गया।
  3. सरहिन्द की विजय-सरहिन्द में गुरु जी के दो छोटे पुत्रों को दीवार में जीवित चिनवा दिया गया था। इस अत्याचार का बदला लेने के लिए बंदा सिंह बहादुर ने यहाँ भी मुसलमानों का बड़ी निर्दयता से वध किया। सरहिन्द का शासक नवाब वजीर खां भी युद्ध में मारा गया।
  4. जालन्धर दोआब पर अधिकार-बंदा सिंह बहादुर की विजयों ने जालन्धर दोआब के सिक्खों में उत्साह भर दिया। उन्होंने वहां के फ़ौजदार शम्स खां के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और बंदा सिंह बहादुर को सहायता के लिए बुलाया। राहों नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में सिक्ख विजयी रहे। इस प्रकार जालन्धर और होशियारपुर के क्षेत्र सिक्खों के अधिकार में आ गए।

प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
गुरदास नंगल के युद्ध में बंदा सिंह बहादुर तथा उसके सभी साथियों को बन्दी बना लिया गया था। उन्हें पहले लाहौर और फिर दिल्ली ले जाया गया। दिल्ली के बाजारों में उनका जुलूस निकाला गया और उनका अपमान किया गया। बाद में बंदा सिंह बहादुर तथा उसके 740 साथियों को इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा गया। उनके इन्कार करने पर बंदा सिंह बहादुर के सभी साथियों की हत्या कर दी गई। अन्त में 19 जून, 1716 ई० में मुग़ल सरकार ने बंदा सिंह बहादुर के वध का भी फरमान जारी कर दिया। उनके वध से पहले उन पर अनेक अत्याचार किए गए। उनकी आंखों के सामने उनके शिशु पुत्र के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। लोहे की गर्म सलाखों से बंदा सिंह बहादुर का मांस नोचा गया। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर शहीदी को प्राप्त हुआ।

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प्रश्न 3.
पंजाब में एक स्थायी सिक्ख राज्य की स्थापना में बंदा सिंह बहादुर की असफलता के कोई चार कारण बताओ।
उत्तर-
संक्षेप में, बंदा सिंह बहादुर द्वारा पंजाब में स्थायी सिक्ख राज्य की स्थापना करने में असफलता के कारण निम्नलिखित थे —

  1. बंदा सिंह बहादुर के शाही रंग-ढंग-बंदा सिंह बहादुर साधुपन को छोड़ राजसी ठाठ-बाठ से रहने लगा था। इसलिए समाज में उनका सम्मान कम हो गया।
  2. अन्धाधुन्ध हत्याएं-लाला दौलत राम के अनुसार बंदा सिंह बहादुर ने अपने अभियानों में पंजाबवासियों की अन्धाधुन्ध हत्याएं की और उन्होंने क्रूर मुसलमानों तथा निर्दोष हिन्दुओं में कोई भेद नहीं समझा। इस रक्तपात के कारण वह हिन्दू और सिक्खों का सहयोग खो बैठा।
  3. शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य-मुग़ल साम्राज्य अभी इतना क्षीण नहीं हुआ था कि बंदा सिंह बहादुर और उसके कुछ हज़ार साथियों के विद्रोह को न दबा पाता।
  4. बंदा सिंह बहादुर के सीमित साधन-अपने सीमित साधनों के कारण भी बंदा सिंह बहादुर पंजाब में स्थायी सिक्ख राज्य की स्थापना न कर सका। मुग़लों की शक्ति का सामना करने के लिए सिक्खों के पास अच्छे साधन नहीं थे।

प्रश्न 4.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक कौन था? उसने इस मिसल की शक्ति को कैसे बढ़ाया?
उत्तर-
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक जस्सा सिंह आहलूवालिया था।

  1. 1748 से 1753 ई० तक जस्सा सिंह ने मीर मन्नू के अत्याचारों का सफलतापूर्वक सामना किया। अन्त में मीर मन्नू ने जस्सा सिंह के साथ सन्धि कर ली।
  2. 1761 ई० में जस्सा सिंह ने लाहौर पर आक्रमण किया और वहां के सूबेदार ख्वाजा आबेद को पराजित किया। लाहौर पर सिक्खों का अधिकार हो गया।
  3. 1762 ई० में अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब पर आक्रमण किया। कुप्पर हीड़ा नामक स्थान पर जस्सा सिंह को पराजय का मुंह देखना पड़ा, परन्तु वह शीघ्र ही सम्भल गया। अगले ही वर्ष सिक्खों ने उसके नेतृत्व में कसूर तथा सरहिन्द को खूब लूटा।
  4. 1764 ई० में जस्सा सिंह ने दिल्ली पर आक्रमण किया और वहां खूब लूट-मार की।

प्रश्न 5.
रणजीत सिंह के उत्थान के समय मराठों की स्थिति कैसी थी?
उत्तर-
अहमदशाह अब्दाली ने मराठों को पानीपत के तीसरे युद्ध (1761) में हरा कर पंजाब से निकाल दिया था। परन्तु 18वीं शताब्दी के अन्त में वे फिर से पंजाब की ओर बढ़ने लगे।
मराठा सरदार दौलत राव सिंधिया ने दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया था। उसने यमुना तथा सतलुज के मध्य के प्रदेशों पर भी आक्रमण करने आरम्भ कर दिए थे। परन्तु शीघ्र ही अंग्रेजों ने पंजाब की ओर उनके बढ़ते कदमों को रोक दिया।

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प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह के उत्थान के समय भारत में अंग्रेजी राज्य का वर्णन करो।
उत्तर-
1773 ई० से 1785 ई० तक वारेन हेस्टिंग्ज़ भारत में अंग्रेज़ी राज्य का गवर्नर-जनरल रहा। उसने मराठों को पंजाब की ओर बढ़ने से रोका। परन्तु उसके उत्तराधिकारियों लॉर्ड कार्नवालिस (1786 ई० से 1793 ई०) तथा जॉन शोर (1793 ई० से 1798 ई० तक) ने ब्रिटिश राज्य की बढ़ौत्तरी के लिए कोई महत्त्वपूर्ण योगदान न दिया। 1798 ई० में लॉर्ड वैलज़ली गवर्नर-जनरल बना। उसने अपने राज्य में हैदराबाद, मैसूर, कर्नाटक, तंजौर, अवध आदि देसी रियासतों को मिलाया। वह मराठों के विरुद्ध भी लड़ता रहा। इसलिए वह पंजाब की ओर ध्यान न दे सका। 1803 ई० में अंग्रेजों ने दौलत राव सिंधिया को हरा कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया।

बड़े उत्तर वाला प्रश्न (Long Answer Type Question)

प्रश्न
निम्नलिखित मिसलों की संक्षिप्त जानकारी दो

  1. फुल्कियां
  2. डल्लेवालिया
  3. निशानवालिया
  4. करोड़सिंघिया तथा
  5. शहीद मिसल।

उत्तर-
दी गई मिसलों के इतिहास का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है —

  1. फुल्कियां मिसल — फुल्कियां मिसल की नींव एक सन्धु जाट चौधरी फूल सिंह ने रखी थी, परन्तु इसका वास्तविक संगठन बाबा आला सिंह ने किया। उसने सबसे पहले बरनाला के आस-पास के प्रदेशों को विजय किया। 1762 ई० में अब्दाली ने उसे मालवा क्षेत्र का नायब बना दिया। 1764 ई० में उसने सरहिन्द के गवर्नर जैन खां को पराजित किया। 1765 ई० में आला सिंह की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के पश्चात् अमर सिंह ने फुल्कियां मिसल की बागडोर सम्भाली। उसने अपनी मिसल में भठिण्डा, रोहतक तथा हांसी को भी मिला लिया। अहमद शाह ने उसे ‘राजाए रजगाने’ की उपाधि प्रदान की। अमर सिंह की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र साहिब सिंह मिसल का सरदार बना। वह बड़ा कमज़ोर शासक था। अन्त में 1809 ई० में एक सन्धि के अनुसार अंग्रेजों ने इस मिसल को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।
  2. डल्लेवालिया मिसल — इस मिसल की स्थापना गुलाब सिंह ने की थी। वह रावी के तट पर स्थित ‘डल्लेवाल’ गांव का निवासी था। इसी कारण इस मिसल को डल्लेवालिया के नाम से पुकारा जाने लगा। इस मिसल का सबसे प्रसिद्ध तथा शक्तिशाली सरदार तारा सिंह घेबा था। उसके अधीन 7,500 सैनिक थे। वह अपार धन-दौलत का स्वामी था। जब तक वह जीवित रहा रणजीत सिंह उसका मित्र बना रहा, परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् रणजीत सिंह ने इस मिसल को अपने राज्य में मिला लिया। तारा सिंह की पत्नी ने उसका विरोध किया, परन्तु उसकी एक न चली।।
  3. निशानवालिया मिसल — इस मिसल की नींव रणजीत सिंह तथा मोहर सिंह ने रखी थी। ये दोनों कभी खालसा दल का झण्डा (निशान) उठाया करते थे। इसलिए उनके द्वारा स्थापित मिसल को ‘निशानवालिया मिसल’ कहा जाने लगा। इस मिसल में अम्बाला तथा शाहबाद के प्रदेश सम्मिलित थे। राजनीतिक दृष्टि से इस मिसल का कोई विशेष महत्त्व नहीं था।
  4. करोड़सिंघिया मिसल — इस मिसल की नींव करोड़ सिंह ने रखी थी। बघेल सिंह इस मिसल का पहला प्रसिद्ध सरदार था। उसने नवांशहर, बंगा आदि प्रदेशों को जीता। उसकी गतिविधियों का केन्द्र करनाल से बीस मील की दूरी पर था। उसकी सेना में 12,000 सैनिक थे। सरहिन्द के गवर्नर जैन खां की मृत्यु के पश्चात् उसने सतलुज नदी के उत्तर की ओर के प्रदेशों पर अधिकार करना आरम्भ कर दिया। बघेल सिंह के पश्चात् जोध सिंह उसका उत्तराधिकारी बना। जोध सिंह ने मालवा के बहुत सारे प्रदेशों पर विजय प्राप्त की तथा उन्हें अपनी मिसल में मिला लिया। अन्त में इस मिसल का कुछ भाग कलसिया रियासत का अंग बन गया और शेष भाग महाराजा रणजीत सिंह ने अपने राज्य में मिला लिया।
  5. शहीद अथवा निहंग मिसल — इस मिसल की नींव सुधा सिंह ने रखी थी। वह मुसलमान शासकों के विरुद्ध लड़ता हुआ शहीद हो गया था। अतः उसके द्वारा स्थापित मिसल का नाम शहीद मिसल रखा गया। उसके पश्चात् इस मिसल के प्रसिद्ध नेता बाबा दीप सिंह, करम सिंह, गुरुबख्श सिंह आदि हुए। इस मिसल के अधिकांश सिक्ख अकाली अथवा निहंग थे। इस कारण इस मिसल को निहंग मिसल भी कहा जाता है। यहां निहंगों की संख्या लगभग दो हज़ार थी। इस मिसल का मुख्य कार्य अन्य मिसलों को संकट के समय सहायता देना था।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 6 बन्दा बहादुर तथा सिक्ख मिसलें

बन्दा बहादुर तथा सिक्ख मिसलें PSEB 10th Class History Notes

  • बंदा सिंह बहादुर गुरु गोबिन्द सिंह जी के सम्पर्क में-1708 ई० में माधोदास नामक एक रागी नंदेड नामक स्थान पर गुरु गोबिन्द सिंह जी के सम्पर्क में आया। गुरु जी के आकर्षक व्यक्तित्व ने उसे इतना प्रभावित किया कि वह शीघ्र ही उनका शिष्य बन गया। गुरु जी ने उसे सिक्खों का नेतृत्व करने के लिए पंजाब की ओर भेज दिया।
  • बंदा सिंह बहादुर पंजाब में-गुरु जी का आदेश पाकर बंदा सिंह बहादुर पंजाब पहुंचा। पंजाब में वह बंदा सिंह बहादुर के नाम से विख्यात हुआ। वहां उसने सिक्खों को संगठित किया और अपना सैनिक अभियान आरम्भ कर दिया।
  • बंदा सिंह बहादुर की सफलताएं-बंदा सिंह बहादुर ने गुरु गोबिन्द सिंह जी के साहिबजादों को शहीद करने वाले जल्लादों को दण्डित किया। उन्होंने सरहिन्द के फ़ौजदार वज़ीर खां का भी वध कर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने गुरु गोबिन्द सिंह जी के विरोधी पहाड़ी राजा भीमचन्द को भी परास्त किया।
  • महत्त्वपूर्ण विजयें-बंदा सिंह बहादुर की महत्त्वपूर्ण विजयें थीं-सढौरा, सरहिन्द, जलालाबाद तथा लोहगढ़ की विजय।
  • गुरदास नंगल का युद्ध-1715 ई० में मुग़ल सेना ने गुरदास नंगल के स्थान पर सिक्खों को भाई दुनी चन्द की हवेली में घेर लिया। आठ मास के लम्बे युद्ध के कारण सिक्खों की खाद्य सामग्री समाप्त हो गई। विवश होकर उन्हें पराजय स्वीकार करनी पड़ी। बंदा सिंह बहादुर तथा उसके सभी साथी बन्दी बना लिए गए।
  • बंदा सिंह बहादुर की शहीदी-बंदा सिंह बहादुर तथा उसके बन्दी साथियों को लाहौर लाया गया। यहां से 1716 ई० को उन्हें दिल्ली ले जाया गया। जून, 1716 ई० में बंदा सिंह बहादुर तथा उसके साथियों का निर्ममता से वध कर दिया गया।
  • मिसलें-बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के पश्चात् सिक्खों को एक लम्बे अन्धकार युग से गुज़रना पड़ा, परन्तु इसी संकट काल में उनके 12 जत्थों का उत्थान हुआ। इन जत्थों में समानता होने के कारण इन्हें मिसलों का नाम दिया गया।
  • रणजीत सिंह का उत्थान-रणजीत सिंह का सम्बन्ध शुकरचकिया मिसल से था। इस मिसल की स्थापना उसके दादा चढ़त सिंह ने की थी। 1792 ई० में अपने पिता महा सिंह की मृत्यु के पश्चात् रणजीत सिंह गद्दी पर बैठा। उसने थोड़े समय में ही पंजाब में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 8 व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Chapter 8 व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Home Science Chapter 8 व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान

PSEB 6th Class Home Science Guide व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य क्या है ?
उत्तर-
मनुष्य के शरीर की रोग-रहित दिशा ही स्वास्थ्य है।

प्रश्न 2.
आँखों के लिए कौन-सा विटामिन महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर-
विटामिन ‘ऐ’।

प्रश्न 3.
दाँतों के लिए भोजन के कौन-से तत्त्व महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर-
कैल्शियम, विटामिन डी, फास्फोरस।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 8 व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान

प्रश्न 4.
खाना खाने के बाद कैसे फल खाने चाहिए ?
उत्तर-
ताजे तथा तेजाबी अंश वाले रसदार फल ।

प्रश्न 5.
आँखों को नीरोग रखने के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
आँखों को धुआँ, धूल, धूप तथा तेज़ रोशनी से बचाना चाहिए।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
आँखों की सम्भाल करनी क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
आँखें हमारे शरीर में अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनसे ही हम विभिन्न वस्तुओं को देख सकते हैं। इसलिए यह कहावत कि ‘आँखें हैं तो जहान है’ कही जाती है। इनकी संभाल के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिएं –

  1. आँखों को बाहर की गन्दगी जैसे धूल-मिट्टी, कूड़ा-करकट, कीट-पतंगे आदि से बचाना चाहिए। कुछ धूल तथा जीवाणु तो आँख के द्वारा बाहर निकल जाते हैं। यदि किसी कारण से आँखों में कुछ गिर जाए तो उसको नार्मल सेलाइन या साफ़ जल से धो डालना चाहिए।
  2. मुंह तथा आँखों को कई बार धोने तथा पोंछने से सफ़ाई होती है।
  3. गन्दे हाथों से अथवा गन्दे रूमाल से आँखों को नहीं पोंछना चाहिए, न ही इन्हें रगड़ना या मलना चाहिए।
  4. तौलिया, साबुन, बाल्टी, मग तथा मुँह पोंछने का कपड़ा जिनका उपयोग दूसरे व्यक्ति करते हों, प्रयोग नहीं करना चाहिए। विशेषकर दुखती आँखों वाले व्यक्ति का।
  5. आँखों को तेज़ धूप, चकाचौंध अथवा तेज़ रोशनी से बचाना चाहिए। इसके लिए धूप के चश्मे आदि का प्रयोग किया जा सकता है।
  6. कम प्रकाश में लिखना-पढ़ना अथवा कोई महीन काम करना आँखों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
  7. आँखों की विभिन्न बीमारियों जैसे-रोहे इत्यादि से आँखों को बचाना चाहिए और यदि इनमें से कोई रोग हो तो तुरन्त ही नेत्र-विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।

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प्रश्न 2.
काम करते समय रोशनी किस तरफ से आनी चाहिए ?
उत्तर-
काम करते समय रोशनी ठीक और बाएँ हाथ की ओर से आनी चाहिए, बाएँ हाथ से काम करने वालों के लिए यह रोशनी दाईं ओर से आनी चाहिए।

प्रश्न 3.
आँखों के व्यायाम के बारे में आप क्या जानते हो ? लिखो।
उत्तर-
प्रत्येक दिन सुबह उठकर ताजे पानी से आँखों को धोना चाहिए और ठण्डे पानी के हल्के-हल्के छींटे मारने चाहिएं। पुतली बाएँ से दाएँ, दाएँ से बाएँ, ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर की तरफ़ बार-बार घुमाना चाहिए। इस व्यायाम में आँखें रुकनी नहीं चाहिएं।

प्रश्न 4.
यदि दाँत ठीक तरह साफ़ न किए जाएं तो क्या होता है ?
उत्तर-
यदि दाँतों को अच्छी तरह साफ़ न किया जाए तो भोजन के कण दाँतों के खोलों में इकट्ठे हो जाते हैं। इससे दाँत कमजोर होने लगते हैं। जीवाणुओं के प्रभाव से ये भोजन कण सड़ते हैं और एक अम्ल बनाते हैं जिनसे दाँतों में सड़न उत्पन्न होने लगती है और पाचन-क्रिया भी खराब हो जाती है। मसूड़ों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 5.
मिठाइयां, निशास्ते वाला भोजन और तेज़ गंध वाली चीजें और पान क्यों अधिक नहीं खाने चाहिएं ?
उत्तर–
दाँतों के लिए अधिक मिठाइयां, निशास्ते वाला भोजन जैसे मैदे की बनी चीजें दाँतों से चिपक जाती हैं। तेज़ गंध वाली चीज़ों को खाने से मुँह में गंध आ जाती है, जैसेलहसुन, प्याज, मछली आदि। अधिक पान खाने से दाँत मैले, कुचैले और काले हो जाते हैं और दाँतों पर निकोटीन की तरह जम जाती है। इससे दाँतों को नुक़सान होता है।

प्रश्न 6.
नाखून गन्दे क्यों नहीं रखने चाहिएं और इन्हें कैसे साफ़ रख सकते हों, लिखो।
उत्तर-
नाखूनों के अन्दर किसी प्रकार की गन्दगी नहीं होनी चाहिए क्योंकि भोजन के साथ इनमें उपस्थित रोगों के कीटाणु, जीवाणु आदि आहार नाल में पहुंचकर विकार उत्पन्न करेंगे। इसी कारण कई बार बच्चों की पाचन-क्रिया खराब हो जाती है और छोटी उम्र में बच्चों को दस्त लग जाते हैं और उल्टियां आने लगती हैं। सप्ताह में एक बार नाखून ज़रूर काटने चाहिएं।

प्रश्न 7.
कम रोशनी में क्यों नहीं पढ़ना चाहिए ?
उत्तर-
कम रोशनी में पढ़ने से आँखों पर दबाव पड़ता है इसलिए नहीं पढ़ना चाहिए।

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प्रश्न 8.
नहाने से पहले मालिश क्यों करनी चाहिए ?
उत्तर-
नहाने से पहले मालिश इसलिए करनी चाहिए कि शरीर स्वस्थ और सुन्दर बने।

प्रश्न 9.
सिगरेट पीने से दाँतों पर किस वस्तु की परत जम जाती है ?
उत्तर-
निकोटीन की।

प्रश्न 10.
दाँत काले हो जाने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
नसवार रगड़ने, पान खाने और सिगरेट पीने से दाँत काले हो जाते हैं।

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प्रश्न 11.
दाँतों का रंग सफ़ेद क्यों होता है ?
उत्तर-
दाँतों का रंग सफ़ेद इनैमल के कारण होता है।

प्रश्न 12.
‘आँखें गईं जहान गया’ से क्या भाव है ?
उत्तर-
इसका भाव यह है कि आँखों के बिना सचमुच ही यह संसार अंधकारमय है। यदि आँखें काम न करें तो दुनिया के ये सभी दृश्य व्यर्थ हैं।

प्रश्न 13.
आँखों के लिए कौन-सा विटामिन महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर-
विटामिन ‘ए’।

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प्रश्न 14.
भोजन के कौन-से तत्त्व दाँतों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर-
कैल्शियम, विटामिन ‘डी’ और फॉस्फोरस।

प्रश्न 15.
प्रत्येक व्यक्ति को अपने कपड़े तथा तौलिया अलग क्यों रखने चाहिए?
उत्तर-
प्रत्येक व्यक्ति को अपने कपड़े तथा तौलिया अलग-अलग रखने चाहिए क्योंकि एक साथ रखने पर छूत की बीमारी फैलने का भय रहता है जैसे-आँखों का रोग, खाज, खुजली, दाद आदि।

निबन्धात्मक प्रश्न अब

प्रश्न 1.
दाँत कैसे साफ़ और स्वस्थ रखे जा सकते हैं ?
उत्तर-
1. प्रत्येक भोजन करने के बाद दाँतों को अच्छी प्रकार साफ़ करना चाहिए। कुल्ली करके दाँतों में फंसे भोजन कण निकाल देने चाहिएं।

2. हर सुबह व रात्रि को सोने से पूर्व दाँतों को उँगली या दन्त ब्रुश से मन्जन या पेस्ट की सहायता से साफ़ करना चाहिए। ऐसा करने से दाँतों को रोगमुक्त रखा जा सकता है। दन्त ब्रुश बहुत बड़े बालों का नहीं होना चाहिए अन्यथा मसूड़ों में घाव होने की सम्भावना रहती है।

3. बचपन से ही दाँतों की सफ़ाई की उचित विधि की शिक्षा देनी चाहिए। दाँतों को सब ओर से, दाँतों के भीतर व बाहर आदि भोजन चबाने वाले ऊपर व नीचे के भागों को नियमपूर्वक साफ़ करना आवश्यक है।

4. दाँतों को तिनकों या सुई से कुरेदना नहीं चाहिए।

5. दन्त चिकित्सक से बच्चों के दाँतों का नियमित निरीक्षण करवाना चाहिए।

6. दाँतों की स्वस्थता के लिए उपयुक्त भोजन की आवश्यकता होती है। इससे निम्नलिखित लाभ होते हैं –
(i) दाँतों की सुदृढ़ता शरीर के सामान्य स्वास्थ्य पर बहुत निर्भर करती है। शरीर के उचित स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त भोजन आवश्यक होता है। प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा विटामिन ‘C’ व ‘D’ दाँतों के निर्माण व स्वास्थ्य में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। भोजन में इन तत्त्वों की कमी दाँतों के स्वास्थ्य को बिगाड़ती है। अतः हमें अपने आहार में इन तत्त्वों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

(ii) कच्चे फल व सब्जियाँ चबा-चबाकर खाने से मसूड़ों को व्यायाम का अवसर मिलता है जिससे वे स्वस्थ बने रहते हैं।

(iii) मिठाइयां, मीठी व चिपकने वाली चॉकलेट, टॉफी, लॉलीपॉप आदि बहुत कम खाना चाहिए। मीठी वस्तुएं खाने के पश्चात् मुँह को कुल्ला करके साफ़ करना अत्यन्त आवश्यक है।

(iv) गरम भोजन के तुरन्त बाद ठण्डा पानी या पेय नहीं लेना चाहिए।

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प्रश्न 2.
स्नान के बारे में आप जो भी जानते हो विस्तार से लिखो।
उत्तर-
निरोग जीवन और व्यक्तिगत सफ़ाई के लिए स्नान बहुत ज़रूरी है। विशेष कर कान के पिछले भाग, बगले या जाँघों की सफाई करनी ज़रूरी है नहीं तो बदबू आने लगती है। काम करने से कई कोशिकाएं मरने के बाद चमड़ी पर इकट्ठी हो जाती हैं। इसको स्नान करके दूर करना ज़रूरी है। यदि पसीना बाहर निकलना रुक जाए तो गुर्दे अपना काम ठीक तरह से नहीं कर सकते।

स्नान से शारीरिक ताप भी ठीक रहता है। गर्मियों में खुश्की, फोड़े, फुसियाँ, पित्त आदि हो जाते हैं और गर्मी शरीर को झुलसाती है। ठीक तरह से स्नान करके त्वचा साफ़ रखने से ऐसे रोग नहीं होते। गर्मी में शारीरिक तापमान बढ़ जाता है। स्नान पर खुली हवा में बैठने से शारीरिक तापमान में गर्मी के कारण वृद्धि नहीं होती। यदि हो सके तो स्नान करते समय शरीर की सखी मालिश भी करनी चाहिए। मालिश करने से रक्त का दौरा तेज़ होता है। इससे रक्त साफ़ और शुद्ध होकर बहने लगता है।

हमें सप्ताह में एक बार सिर को मालिश करके बाल अच्छी तरह धो लेने चाहिएं। सुबह का समय स्नान के लिए सबसे अच्छा होता है। यदि हम स्नान नहीं करेंगे या सिर अच्छी तरह साफ़ नहीं करेंगे तो बालों में जुएँ पड़ जाएंगी इससे सिर की खोपड़ी कमजोर हो जाती है और सारा दिन खुजलाने के लिए एक हाथ सिर में ही रहता है। कुछ लोग गर्मियों में ठीक तरह से स्नान नहीं करते। वे अपना शरीर साफ़ नहीं करते। अतः उनके कपड़ों और शरीर पर भी जुएँ पड़ जाती हैं। ऐसे व्यक्ति के पास कोई भी नहीं बैठ सकता।

सर्दियों में गर्म पानी से स्नान करना चाहिए। इससे गर्मी मिलती है और शक्ति संचार होता है। खेलने के बाद गर्म पानी से स्नान करना चाहिए नहीं तो सर्द-गर्म होने का खतरा रहता है। लेकिन स्वस्थ और बलवान मनुष्य ठण्डे पानी से ही स्नान करते हैं। इससे ताजगी और प्रसन्नता की भावना पैदा होती है।

खाना खाने और थक जाने के पश्चात् स्नान करना ठीक नहीं रहता। ठण्डे देशों में भाप स्नान भी किया जाता है।

प्रश्न 3.
आँखों की सम्भाल कैसे करनी चाहिए ?
उत्तर-
कहते हैं आँख है तो जहान है क्योंकि इनसे ही हम संसार को देख सकते हैं। इनकी सम्भाल के लिए निम्न उपाय किए जाने चाहिएं –

  1. आँखों को बाहरी गंदगी, जैसे धूल-मिट्टी, कूड़ा-करकट, कीट-पतंगों आदि से बचाना चाहिए। गन्दी आँखें दुखने लगती हैं। यदि किसी कारण से आँखों में कुछ गिर जाए, तो साफ़ जल से धोकर निकाल देना चाहिए।
  2. गन्दे हाथों से अथवा गन्दे रूमाल से आँखों को नहीं पोंछना चाहिए।
  3. आँखों को रगड़ना या मलना नहीं चाहिए।
  4. आँखों को तेज़ धूप, चकाचौंध अथवा तेज़ रोशनी से बचाना चाहिए। इसके लिए धूप के चश्मे आदि का प्रयोग किया जा सकता है।
  5. कम प्रकाश में लिखना-पढ़ना अथवा कोई महीन काम नहीं करना चाहिए।
  6. आँखों में तकलीफ होने पर नेत्र-चिकित्सक की राय लेनी चाहिए।

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Home Science Guide for Class 6 PSEB व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान Important Questions and Answers

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
शरीर-क्रिया विज्ञान में स्वास्थ्य की परिभाषा क्या होगी ?
उत्तर-
कोशिकाओं, अंगों व तन्त्रों की स्वाभाविक क्रियाशीलता को स्वास्थ्य कहते हैं।

प्रश्न 2.
WHO के विचार से स्वास्थ्य क्या है ?
उत्तर-
WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के विचार से स्वास्थ्य में मनुष्य का सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक व संवेगात्मक कल्याण निहित है।

प्रश्न 3.
जीवन में सुखी रहने के लिए क्या आवश्यक है ?
उत्तर-
शरीर का स्वस्थ और शक्तिशाली होना।

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प्रश्न 4.
त्वचा को नियमित रूप से साफ़ करना आवश्यक क्यों है ?
उत्तर-
त्वचा से पसीना और अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकलते हैं। यदि त्वचा को साफ़ नहीं किया जाता है तो मैल जम जाता है जिसके कारण त्वचा के छिद्र बंद हो जाते हैं, इसलिए त्वचा को नियमित रूप से साफ़ करना आवश्यक है।

प्रश्न 5.
दाँतों को साफ़ करना आवश्यक क्यों है ?
उत्तर–
दाँतों को खोखले होने से, गिरने से, दर्द होने से बचाने के लिए दाँतों को साफ करना आवश्यक है।

प्रश्न 6.
कानों में सलाई या तिनका क्यों नहीं फेरना चाहिए ?
उत्तर-
कानों में सलाई या तिनका फेरने से कान में घाव हो जाते हैं और पर्दा भी फट सकता है। इसलिए कानों में सलाई नहीं फेरनी चाहिए।

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प्रश्न 7.
कान का संक्रमण होने पर इसका इलाज तुरन्त क्यों करवाना चाहिए ?
उत्तर-
कान का संक्रमण होने पर यदि इसका इलाज न करवाया जाए तो यह दिमाग़ तक नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए इसका इलाज तुरन्त करवा लेना चाहिए।

प्रश्न 8.
धूप सेंकने से क्या लाभ होता है ?
उत्तर-
धूप सेंकने से शरीर में विटामिन ‘D’ उत्पन्न होता है।

प्रश्न 9.
किस समय की धूप स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है ?
उत्तर-
प्रायः शीतकाल में प्रात:काल की धूप।

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प्रश्न 10.
घर में धूप का आना किसलिए आवश्यक है ?
उत्तर-
धूप जीवाणुओं को नष्ट करती है।

प्रश्न 11.
गूढ़ निद्रा शरीर के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
शरीर की थकावट दूर करने के लिए।

प्रश्न 12.
नियमित व्यायाम व उत्तम आसन शरीर के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
शरीर को सुन्दर, सुगठित व स्वस्थ रखने के लिए।

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प्रश्न 13.
दाँतों को केरीज रोग से बचाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिएं ?
उत्तर-

  1. भोजन के बाद कुल्ला करना चाहिए।
  2. दाँतों को अँगुली से साफ़ करना चाहिए।

प्रश्न 14.
दाँतों का केरीज रोग क्या होता है ?
उत्तर–
दाँतों में कार्बोहाइड्रेट युक्त तथा मीठे पदार्थों के सड़ने से जीवाणुओं की क्रिया से एसिड बनता है जो दाँतों के एनेमल को क्षीण कर देता है।

प्रश्न 15.
पायरिया रोग के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर-

  1. मसूड़े सूजने लगते हैं,
  2. मसूड़ों में पीड़ा होती है,
  3. मसूड़ों से दाँत अलग होने लगते हैं,
  4. मुँह से दुर्गन्ध आती है।

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प्रश्न 16.
स्वस्थ बाल कैसे होते हैं ?
उत्तर-
चमकीले और साफ़।

प्रश्न 17.
स्वस्थ आँखें कैसी होती हैं ?
उत्तर-
चौकन्नी, साफ़ और मलविहीन।

प्रश्न 18.
स्वस्थ त्वचा की क्या पहचान है ?
उत्तर-
चिकनी, ठोस और जगह पर होती है।

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प्रश्न 19.
स्वस्थ नाक की क्या पहचान है ?
उत्तर-
साफ़ और सांस लेती हुई होती है।

प्रश्न 20.
स्वस्थ मुख और होंठ कैसे होते हैं ?
उत्तर-
स्वस्थ मुख प्रसन्न और आनन्दित तथा स्वस्थ होंठ लाल और गीले होते हैं।

प्रश्न 21.
स्वस्थ गला किसे कहते हैं ?
उत्तर-
साफ़, गीला तथा बाधा विहीन गले को।

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प्रश्न 22.
स्वस्थ दाँत कैसे होते हैं ?
उत्तर-
साफ, सही और कष्टविहीन।

प्रश्न 23.
स्वस्थ मसूड़े कैसे होने चाहिएं ?
उत्तर-
ठोस तथा लाल।

प्रश्न 24.
स्वस्थ तथा अस्वस्थ हाथ में क्या अन्तर होता है ?
उत्तर-
हाथ की हथेलियाँ लाल होने पर स्वस्थ तथा पीली होने पर अस्वस्थ मानी जाती हैं।

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प्रश्न 25.
सोने से पहले कोई परिश्रम या अधिक दौड़ भाग का काम क्यों नहीं करना चाहिए ?
उत्तर-
इससे निद्रा अच्छी नहीं आती।

प्रश्न 26.
छुट्टी वाले दिन क्या कार्य करने चाहिए ?
उत्तर-
हल्के और मनोरंजक कार्य करने चाहिएं।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यायाम शरीर के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
व्यायाम हमारे स्वास्थ्य के लिए तथा शरीर को निरोग रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसके विभिन्न कारण हैं –

  1. व्यायाम करने से भोजन शीघ्र पच जाता है था भूख खुलकर लगती है।
  2. व्यायाम करने से शरीर की गन्दगी शीघ्र बाहर निकल जाती है।
  3. व्यायाम करने से शरीर की मांसपेशियां मज़बूत हो जाती हैं जिससे शरीर मजबूत होता है।
  4. व्यायाम करने से शरीर के सब अंग खुल जाते हैं। फेफड़े बड़े हो जाते हैं। श्वास की क्रिया तेजी से होती है।
  5. रक्त शुद्ध हो जाता है।
  6. व्यायाम करने से अधिक शुद्ध रक्त मिलता है जिससे वह तरोताज़ा रहता है।
  7. रोग रोधन क्षमता बढ़ जाती है।

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प्रश्न 2.
व्यायाम के सामान्य नियम क्या हैं ?
उत्तर-
व्यायाम (Exercise) करते समय व्यायाम के नियमों का पालन करना चाहिए। व्यायाम के नियम निम्नलिखित हैं –

  1. व्यायाम शुद्ध वायु तथा खुले स्थान पर करना चाहिए।
  2. व्यायाम बीमारी से तुरन्त उठने, भोजन के पश्चात् अथवा चिन्ता की दिशा में नहीं करना चाहिए।
  3. व्यायाम आयु तथा स्वास्थ्य के आधार पर करना चाहिए।
  4. व्यायाम को धीरे-धीरे बढ़ाइए। एकदम अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए।
  5. व्यायाम के तुरन्त बाद जल नहीं पीना चाहिए और न ही नहाना चाहिए।
  6. व्यायाम करते समय सर्दी से बचने के लिए शरीर पर कोई ढीला वस्त्र अवश्य रहना चाहिए।
  7. मस्तिष्क के कार्य करने वालों के लिए सैर करना, हल्की दौड़, ओस पर चलना ही उचित व्यायाम है।
  8. पेट के रोगियों को झुकने वाले व्यायाम करने चाहिएं।
  9. व्यायाम करते समय मुख से सांस नहीं लेना चाहिए।

प्रश्न 3.
नियमित स्नान के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
नियमित स्नान से शरीर को निम्न लाभ होते हैं –

  1. त्वचा की स्वच्छता होती है।
  2. रोमकूपों के मुँह खुल जाते हैं।
  3. ठण्डे पानी से नहाने से त्वचा के तापमान को सामान्य बनाने के लिए रक्त अधिक मात्रा में तथा तीव्र गति से त्वचा की ओर प्रवाहित होता है।
  4. नहाने के बाद तौलिए से शरीर रगड़ने से रक्त संचरण उत्तम होता है।
  5. स्नान से हानिकारक पदार्थों तथा रोगाणुओं से मुक्ति मिलती है।
  6. धुलकर बह जाने से पसीने की दुर्गन्ध जाती रहती है।

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बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विश्राम और निद्रा से स्वास्थ्य को क्या लाभ होता है ?
उत्तर-
विश्राम और निद्रा से स्वास्थ्य को लाभ-विश्राम नितान्त आवश्यक होता है। हम जो भी शारीरिक अथवा मानसिक कार्य करते हैं, उससे हमारे शरीर में थकान आ जाती है। वास्तव में, शारीरिक परिश्रम करते समय हमारे शरीर में अनेक विषैले पदार्थ एकत्र हो जाते हैं। ये पदार्थ ही हमारी माँसपेशियों को थकाते हैं। इसके अतिरिक्त कार्य करते समय हमारे शरीर के ऊतक अधिक टूटते-फूटते रहते हैं। कार्य करते समय इनकी मरम्मत नहीं हो पाती। अतः शरीर के स्वास्थ्य के लिए इन ऊतकों की मरम्मत तथा विषैले पदार्थों का बाहर निकलना अनिवार्य होता है। इन क्रियाओं के लिये विश्राम आवश्यक होता है।

विश्राम का सबसे उत्तम उपाय नींद है। नींद व्यक्ति के लिए वरदान है। निद्रा के समय हमारे शरीर में कार्य करने के परिणामस्वरूप हुई टूट-फूट ठीक हो जाती है तथा शरीर नई शक्ति अर्जित कर लेता है। पर्याप्त नींद ले लेने से व्यक्ति एकदम तरोताज़ा एवं स्वस्थ हो जाता है। नींद के समय हमारे शरीर के सभी अंगों को आराम मिलता है। इस समय हमारी नाड़ी एवं श्वास की गति भी कुछ मन्द हो जाती है तथा रक्तचाप भी घट जाता है, अतः सम्बन्धित अंगों को भी कुछ आराम मिलता है। यदि किसी व्यक्ति को पर्याप्त नींद नहीं आती तो उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। नींद के अभाव में व्यक्ति दुर्बल हो जाता है, स्वभाव में चिड़चिड़ाहट आ जाती है तथा चेहरे पर उदासी छा जाती है।

प्रश्न 2.
स्नान करने का महत्त्व स्पष्ट करें। किन देशों में नहाने का महत्त्व है ?
उत्तर-
स्वयं करें।

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एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
दाँतों के किसी रोग का नाम बताओ।
उत्तर-
केरीज़।

प्रश्न 2.
आँख गई ……………….. गया।
उत्तर-
जहान।

प्रश्न 3.
ठण्डे देश में …………………… स्नान भी किया जाता है।
उत्तर-
भाप।

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प्रश्न 4.
निरोगी जीवन के लिए …………………… बहुत आवश्यक है।
उत्तर-
स्नान।

प्रश्न 5.
खेलने के बाद ………………………. से नहाना चाहिए।
उत्तर-
गर्म पानी।

प्रश्न 6.
शारीरिक या मानसिक कार्य करने से क्या होता है ?
उत्तर-
थकावट।

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प्रश्न 7.
डैनटीन के अन्दर एक खोल होता है उसे क्या कहते हैं ?
उत्तर-
पलम खोल।

प्रश्न 8.
हमारे नाखून सफेद क्यों हो जाते हैं ?
उत्तर-
कैल्शियम, लोहे या खनिज पदार्थों की कमी के कारण।

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व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान PSEB 6th Class Home Science Notes

  • व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान वह विज्ञान है जो हमारे शरीर को स्वस्थ एवं सुचालित रखने में हमारी सहायता करता है।
  • निरोग और बलिष्ठ मनुष्य ही देश की उन्नति में सहायता कर सकते हैं।
  • स्वस्थ और स्वच्छ रहने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने शरीर को स्वच्छ रखें और उसकी उचित देखभाल करें।
  • आँखें हमारे शरीर की बहुत ही महत्त्वपूर्ण और नाजुक अंग हैं। इनकी देखभाल बहुत ज़रूरी है। बड़ों का कहना है कि “आँखें गईं जहान गया।”
  • आँखों की स्वस्थता के लिए विटामिन ‘ए’ बहुत ज़रूरी है।
  • आँखों का दुखना एक छूत की बीमारी है।
  • आँखों के रोगी को अपना तौलिया, रूमाल और अन्य कपड़े दूसरों से अलग रखने चाहिएं।
  • मध्यम रोशनी में बारीक अक्षर पढ़ने से, सूर्यास्त के समय सिलाई-कढाई का काम करने से आँखों पर काफ़ी दबाव पड़ता है।
  • जब कभी रात के समय काम करना हो तो रोशनी ठीक और बाएँ हाथ की ओर होनी चाहिए, लेकिन बाएँ हाथ से काम करने वालों के लिए यह रोशनी दाईं ओर से आनी चाहिए।
  • प्रत्येक दिन सुबह उठकर ताजे पानी से आँखों को धोना चाहिए और ठण्डे पानी के हल्के-हल्के छींटे मारने चाहिएं।
  • यदि आँखों पर दबाव पड़ने वाला काम अधिक देर तक करना पड़े तो थोड़ी देर बाद कुछ पलों के लिए आँखों को धीरे से बन्द कर लेना चाहिए। इससे आँखों को आराम मिलता है।
  • दाँत मनुष्य की सुन्दरता को बढ़ाते हैं।
  • भोजन का सही स्वाद लेने के लिए दाँत बहुत ज़रूरी हैं।
  • यदि दाँतों को अच्छी तरह साफ़ न किया जाए तो भोजन का कुछ भाग दाँतों के खोलों में इकट्ठा हो जाता है। जिससे दाँतों में कई प्रकार की बीमारियाँ हो जाती है।
  • खाना खाने के बाद गर्म या नमक मिले पानी या लाल दवाई से घोल के साथ कुल्ली करना लाभदायक है।
  • दाँतों को दिन में कम-से-कम दो बार ब्रुश या दातुन से साफ़ करना चाहिए।
  • दाँतों से सख्त चीजें जैसे बादाम, अखरोट आदि नहीं तोड़ने चाहिएं।
  • छोटे बच्चे जब दाँत निकाल रहे हों तो उनके भोजन में विटामिन ‘डी’, कैल्शियम और फॉस्फोरस की मात्रा का ध्यान रखना चाहिए।
  • कैल्शियम, विटामिन ‘डी’ और फॉस्फोरस की कमी के कारण दंतासिन नामक रोग हो जाता है।
  • साफ़ नाखून हाथों की सुन्दरता को बढ़ा देते हैं।
  • गन्दे हाथों से तैयार किया और खाया भोजन कई बीमारियाँ पैदा करता है, जैसे बदहज़मी, जी मितलाना, दस्त लगना, उल्टी आना आदि।
  • नींबू काटकर नाखूनों पर रगड़ने से चमक आ जाती है।
  • हमारे शरीर में विटामिन या किसी खनिज पदार्थ की कमी हो जाने से नाखून सफ़ेद हो जाते हैं या उन पर सफ़ेद निशान पड़ जाते हैं।
  • पसीने की ग्रंथियों से पसीना बाहर निकलता है।
  • नहाने से शारीरिक ताप भी ठीक रहता है।
  • सुबह का समय स्नान के लिए सबसे अच्छा होता है।
  • सर्दियों में गर्म पानी से स्नान करने पर गर्मी मिलती है।
  • ठण्डे देशों में भाप स्नान भी किया जाता है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 15 गुप्त साम्राज्य

Punjab State Board PSEB 6th Class Social Science Book Solutions History Chapter 15 गुप्त साम्राज्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 15 गुप्त साम्राज्य

SST Guide for Class 6 PSEB गुप्त साम्राज्य Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
समुद्रगुप्त की विजयों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्रगुप्त एक महान् विजेता था। उसकी प्रमुख विजयों का वर्णन इस प्रकार है –
1. समुद्रगुप्त ने सबसे पहले उत्तरी भारत के तीन राजाओं को हराया और उनके राज्य . को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया।

2. समुद्रगुप्त की सबसे बड़ी विजय दक्षिणी भारत की विजय थी। उसने दक्षिण के 12 राजाओं को हराया। परन्तु उनके द्वारा अधीनता स्वीकार करने पर उसने उनके राज्य लौटा दिए।

3. कुछ जंगली जातियों ने राज्य में अशांति फैला रखी थी। ये जातियां आमतौर पर उड़ीसा के जंगलों में रहती थीं। समुद्रगुप्त ने इन जातियों को युद्ध में हरा कर शान्ति स्थापित की।

वास्तव में समुद्रगुप्त ने फ्रांस के शासक तथा सेनापति नेपोलियन की तरह अनेक प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। इसलिए उसे भारत का नेपोलियन भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य समुद्रगुप्त का पुत्र था। उसे चन्द्रगुप्त द्वितीय भी कहा जाता है। वह गुप्त वंश का एक प्रतापी राजा था। उसने लगभग 380 ई० से 412 ई० तक राज्य किया।

  1. उसने पश्चिमी भारत के शकों को हराया। उसने अपनी सैनिक शक्ति द्वारा अपने साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया तथा सौराष्ट्र और काठियावाड़ को जीता।
  2. उसने दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप लोहे का विशाल स्तम्भ बनवाया, जिस पर लिखे लेख में उसकी सफलताओं का वर्णन है।
  3. उसने कला तथा साहित्य को प्रोत्साहन दिया। उसके दरबार में नौ विद्वान् थे जिन्हें ‘नवरत्न’ कहा जाता था।
  4. वह धार्मिक दृष्टि से बहुत सहनशील था। वह स्वयं भगवान् विष्णु का भक्त था लेकिन वह सभी धर्मों का सम्मान करता था।
  5. उसने बड़ी मात्रा में सोने, चांदी तथा तांबे के सिक्के चलाए।
  6. उसके शासन काल में ही चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था।
  7. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी, जिसका अर्थ है ‘वीरता का सूर्य’।

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प्रश्न 3.
कालिदास के बारे में एक नोट लिखें।
उत्तर-
कालिदास संस्कृत के एक प्रसिद्ध कवि थे। वह गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार के ‘नवरत्नों’ में से एक थे। उन्होंने बहुत-से नाटकों तथा कविताओं की रचना की। शकुन्तला, रघुवंश, कुमारसम्भव तथा मेघदूत आदि उनकी अमर रचनाएं हैं। शकुन्तला नाटक संसार भर में प्रसिद्ध है।

प्रश्न 4.
गुप्तकाल में आर्थिक जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
गुप्तकाल में आर्थिक जीवन बहुत समृद्ध था।

  1. कर बहुत कम थे तथा दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएं बहुत सस्ती थीं। आम लोग इन्हें ख़रीदने के लिए कौड़ियों अथवा तांबे के सिक्कों का प्रयोग करते थे। लेकिन इस काल में सबसे अधिक सोने के सिक्के चलाए गए। ऐसे सिक्कों को दीनार कहते थे।
  2. लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। कई प्रकार के अनाजों के अतिरिक्त फलों, तथा तेल-बीजों की कृषि भी की जाती थी।
  3. देशी तथा विदेशी, दोनों प्रकार का व्यापार उन्नत था। भारत के दक्षिण-पूर्वी एशिया, चीन, मध्य एशिया तथा यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।
  4. साहूकारों, व्यापारियों तथा उत्पादकों के अपने-अपने संगठन थे, जिन्हें श्रेणी अथवा निगम कहा जाता था।
  5. पशु-पालन तथा औद्योगिक-धन्धे अन्य प्रसिद्ध व्यवसाय थे।

प्रश्न 5.
गुप्तकाल को भारत का ‘स्वर्ण युग’ क्यों कहते हैं?
उत्तर-
गुप्तकाल में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई थी, जिस कारण इसे भारत का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है।

  1. गुप्त साम्राज्य का शासन प्रबन्ध बहुत उत्तम था। राजा मन्त्रियों तथा अधिकारियों की सहायता से शासन चलाता था।
  2. लोग समृद्ध, सुखी तथा ईमानदार थे। कर बहुत कम थे। दैनिक प्रयोग की चीजें बहुत सस्ती थीं। इस काल में सोने के सिक्के बड़ी मात्रा में चलाए गए।
  3. कृषि तथा व्यापार का बहुत विकास हुआ था।
  4. गुप्तकाल में उच्चकोटि के साहित्य तथा कला की रचना हुई। साहित्यकारों तथा कलाकारों को राजाओं का संरक्षण प्राप्त था।
  5. सभी धर्मों का सम्मान किया जाता था। चाहे गुप्त राजा स्वयं हिन्दू धर्म को मानते थे लेकिन वे सभी धर्मों के लोगों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते थे।सभी लोगों को पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त थी।
  6. गुप्तकाल में विज्ञान तथा तकनीकी का बहुत विकास हुआ था। आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त तथा बाणभट्ट इस काल के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे।
  7. शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत विकास हुआ था। ब्राह्मण तथा भिक्षु अध्यापक होते थे जो आमतौर पर मन्दिरों तथा मठों में शिक्षा देते थे। तक्षशिला, सारनाथ तथा नालन्दा गुप्तकाल के विश्वविद्यालय थे।
  8. गुप्तकाल में भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता का विदेशों में प्रचार किया गया।

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

  1. समुद्रगुप्त एक ………….. एवं ………….. था।
  2. कालिदास द्वारा लिखित नाटक …………. तथा काव्य ……….. बहुत प्रसिद्ध हैं।
  3. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने बड़ी संख्या में ……….. और ……… के सिक्के जारी . किए।
  4. गुप्त साम्राज्य कई प्रांतों में बंटा हुआ था जिन्हें ………. कहा जाता है।
  5. (गुप्तकाल में) जिलों को …………… कहते थे।

उत्तर-

  1. महान् योद्धा, शासक
  2. सोने, चांदी
  3. भुक्ति
  4. विषय
  5. शकुंतला, मेघदूत।

III. सही जोड़े बनायें

  1. आर्यवर्त – (क) पंजाब
  2. मुद्रक – (ख) उत्तरी भारत
  3. लौह स्तम्भ – (ग) एक अधिकारी
  4. कुमारामात्य – (घ) दिल्ली

उत्तर-सही जोड़े

  1. आर्यवर्त – उत्तरी भारत
  2. मुद्रक – पंजाब
  3. लौह स्तम्भ – दिल्ली
  4. कुमारामात्य – एक अधिकारी

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IV. सही (✓) अथवा ग़लत (✗) बताएं

  1. महाराज गुप्त प्रथम गुप्त राजा था।
  2. विक्रमादित्य ने समुद्रगुप्त की उपाधि धारण की थी।
  3. योद्येय दक्षिण भारत पर राज्य करते थे।
  4. फाह्यान यूनानी लेखक था।
  5. गुप्तों ने सोने के सिक्के जारी किए।
  6. आर्यभट्ट एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✗)
  3. (✗)
  4. (✗)
  5. (✓)
  6. (✓)

PSEB 6th Class Social Science Guide गुप्त साम्राज्य Important Questions and Answers

कम से कम शब्दों में उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
गुप्तवंश के पहले महान् शासक चन्द्रगुप्त प्रथम ने एक लिच्छवी राजकुमारी से विवाह किया था। उसका क्या नाम था?
उत्तर-
कुमार देवी।

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प्रश्न 2.
समुद्रगुप्त की उपलब्धियों से जुड़े इलाहाबाद स्तंभ लेख का लेखक कौन था?
उत्तर-
हरिषेण।

प्रश्न 3.
महरौली में कुतुबमीनार के समीप लौह स्तम्भ इतिहास में किस राजवंश के काल में बना था?
उत्तर-
गुप्त वंश।

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुप्तवंश के पतन में निम्न में से किन आक्रमणकारियों की विशेष भूमिका रही?
(क) ह्यूण
(ख) मंगोल
(ग) आर्य।
उत्तर-
(क) ह्यूण

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प्रश्न 2.
अजन्ता की गुफ़ाएं अपनी किस विशेषता के लिए प्रसिद्ध हैं?
(क) सुंदर भित्ति-चित्र
(ख) हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां
(ग) विशाल तोरण द्वार।
उत्तर-
(क) सुंदर भित्ति-चित्र

प्रश्न 3.
कालिदास ने मेघदूत तथा शकुंतला जैसे प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की। वह निम्न में से किस भाषा का कवि था?
(क) ब्रज
(ख) संस्कृत
(ग) पालि।
उत्तर-
(ख) संस्कृत

अति लघ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुप्त वंश की जानकारी देने वाले चार स्रोतों के नाम लिखें।
उत्तर-
गुप्त वंश की जानकारी देने वाले चार स्रोत हैं –

  1. पुराण,
  2. कालिदास के नाटक,
  3. चीनी यात्री फाह्यान का वृत्तान्त,
  4. अभिलेख।

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प्रश्न 2.
गुप्त वंश का प्रथम स्वतन्त्र राजा कौन था?
उत्तर-
गुप्त वंश का प्रथम स्वतन्त्र राजा चन्द्रगुप्त प्रथम था।

प्रश्न 3.
चन्द्रगुप्त प्रथम ने कौन-से राज्यवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध बनाए?
उत्तर-
चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी वंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध बनाए।

प्रश्न 4.
चन्द्रगुप्त प्रथम का राज्यकाल बताएं।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त प्रथम का राज्यकाल 320 ई० से 335 ई० तक था।

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प्रश्न 5.
समुद्रगुप्त राजगद्दी पर कब बैठा?
उत्तर-
समुद्रगुप्त 335 ई० में राजगद्दी पर बैठा।

प्रश्न 6.
समुद्रगुप्त ने कौन-से नाग राजाओं को पराजित किया?
उत्तर-
समुद्रगुप्त ने जिन नाग राजाओं को पराजित किया उनके नाम थे-अच्युत नाग, नागसेन तथा गणपति नाग।

प्रश्न 7.
भारत का नेपोलियन किस राजा को कहा जाता है?
उत्तर-
समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है।

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प्रश्न 8.
समुद्रगुप्त ने कौन-से विदेशी राजा के साथ मित्रता स्थापित की?
उत्तर-
समुद्रगुप्त ने श्रीलंका के राजा मेघवर्मन के साथ मित्रता स्थापित की।

प्रश्न 9.
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का राज्यकाल बताएं।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का राज्यकाल 380 ई० से 415 ई० तक था।

प्रश्न 10.
पंचतन्त्र के लेखक का क्या नाम था?
उत्तर-
पंचतन्त्र का लेखक विष्णु शर्मा था।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चन्द्रगुप्त प्रथम की विजयों के बारे में लिखें।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी वंश की राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। लिच्छवी वंश राजनीतिक रूप से शक्तिशाली था। इस वंश की सहायता से चन्द्रगुप्त प्रथम ने मगध, बिहार तथा इलाहाबाद के समीपवर्ती प्रदेशों को जीत लिया। उसने अपने नाम पर एक संवत् भी चलाया।

प्रश्न 2.
समुद्रगुप्त की कला के क्षेत्र में क्या देन थी?
उत्तर-
समुद्रगुप्त ने कला तथा साहित्य को पूर्ण सुरक्षा दी। उसको संगीत से बड़ा लगाव था। उसके राज्य के कुछ सिक्कों पर उसको वीणा बजाते हुए दिखाया गया है। हरिषेन उसका दरबारी कवि था।

प्रश्न 3.
गुप्तकाल की वैज्ञानिक उन्नति का ब्योरा दीजिए।
उत्तर-
गुप्तकाल में विज्ञान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई। आर्यभट्ट इस काल का प्रसिद्ध ज्योतिषी तथा गणित का विद्वान् था। उसने संसार को शून्य, सूर्य ग्रहण तथा चन्द्र ग्रहण की जानकारी दी। ब्रह्मगुप्त गणित तथा बीज गणित का विद्वान् था। वराहमिहिर वनस्पति विज्ञान । तथा भूगोल का विद्वान् था।

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प्रश्न 4.
समुद्रगुप्त की दक्षिण विजयों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्रगुप्त की सबसे महान् विजय दक्षिणी भारत की विजय थी। उसने दक्षिण – भारत के 12 राजाओं को पराजित किया । उसने उत्तरी भारत में सभी जीते हुए प्रदेशों को अपने राज्य में मिला लिया, परन्तु दक्षिण भारत के सभी विजित प्रदेश उसने वहां के राजाओं को लौटा दिए। उनसे वह केवल कर वसूल करता रहा।

प्रश्न 5.
चन्द्रगुप्त द्वितीय के दूसरे देशों के साथ सम्बन्धों की जानकारी दें।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त ने एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना करके विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। उसने अपने साम्राज्य को दृढ़ करने के लिए पड़ोसी राजाओं के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए। उसने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक राज्य के राजकुमार रुद्रसेन द्वितीय के साथ किया। परन्तु दुर्भाग्य से रुद्रसेन द्वितीय की शीघ्र ही मृत्यु हो गई। अतः चन्द्रगुप्त ने प्रभावती तथा अपने अवयस्क दोहतों की वाकाटक राज्य को सम्भालने में सहायता की। चन्द्रगुप्त की इस नीति के कारण वाकाटक राज्य की जनता चन्द्रगुप्त की आभारी हो गई। गुप्त राजाओं के कुन्तल के कांदव शासक की पुत्रियों से भी विवाह हुए। इस प्रकार चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी शक्ति को और भी दृढ़ कर लिया।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
फाह्यान के वृत्तांत का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
फाह्यान एक चीनी यात्री था। वह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में भारत आया। वह भारत में बौद्ध तीर्थ स्थानों की यात्रा करने तथा बौद्ध ग्रन्थों की खोज के लिए भारत आया था। उसने अपने वृत्तांत में निम्नलिखित बातों का वर्णन किया है –

1. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन के बारे में-फाह्यान ने चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के उदारवादी राज्य प्रबन्ध का वर्णन किया है। वह लिखता है कि दण्ड नर्म थे, फिर भी अपराध नहीं होते थे। सड़कें सुरक्षित थीं। राज्य प्रबन्ध को सुचारु रूप से चलाने के लिए साम्राज्य को प्रान्तों में बांटा हुआ था। प्रान्तों का प्रबन्ध गर्वनरों के हाथ में था।

2. लोगों के बारे में-फाह्यान के अनुसार गुप्त साम्राज्य में लोग समृद्ध, ईमानदार तथा अच्छे नागरिक थे। वे कानून का पालन करते थे। उनका नैतिक जीवन ऊंचा था। लोग मुख्य रूप में शाकाहारी थे। चण्डालों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। इसलिए वे नगर से बाहर रहते थे।

3. धर्म के बारे में – फाह्यान के वृत्तांत से पता चलता है कि गुप्तकाल में बौद्ध धर्म बहुत विकसित था। लेकिन गुप्त शासक स्वयं हिन्दू धर्म को मानते थे। वे विष्णु के पुजारी थे। लेकिन वे दूसरे धर्मों के प्रति उदारवादी थे।

प्रश्न 2.
गुप्तकाल के साहित्य की जानकारी दीजिए।
उत्तर-
गुप्तकाल में राज दरबार की भाषा संस्कृत थी। इसलिए संस्कृत भाषा तथा साहित्य ने इस काल में विशेष उन्नति की।

  1. इस काल के प्रसिद्ध लेखक कालिदास ने संस्कृत भाषा में अनेक नाटक तथा कविताएं लिखीं। शकुन्तला, रघुवंश, मेघदूत तथा ऋतुसंहार उनके द्वारा रचित मुख्य नाटक हैं। कालिदास, चन्द्रगुप्त द्वितीय के नवरत्नों में से एक थे। उन्हें भारतीय शेक्सपीयर भी कहा जाता है।
  2. समुद्रगुप्त के समय हरिषेन एक प्रसिद्ध साहित्यकार था।
  3. विष्णु शर्मा का पंचतन्त्र, विशाखादत्त का मुद्राराक्षस तथा अमर सिंह का अमरकोष भी संस्कृत भाषा की अनमोल रचनाएं हैं।
  4. गुप्तकाल में नालन्दा, सारनाथ, तक्षशिला, पाटलिपुत्र, बनारस, मथुरा आदि शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे। इन केन्द्रों में साहित्य, धर्म, दर्शन, वेदों आदि की शिक्षा दी जाती थी।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 15 गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य PSEB 6th Class Social Science Notes

  • गुप्त साम्राज्य की स्थिति – गुप्त साम्राज्य पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्थित था।
  • महाराज गुप्त – महाराज गुप्त, गुप्त साम्राज्य का संस्थापक था।
  • चन्द्रगुप्त प्रथम – चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त साम्राज्य का प्रथम महान् शासक था।
  • समुद्रगुप्त – समुद्रगुप्त गुप्त साम्राज्य का सबसे महान् विजेता था।
  • हरिषेन – हरिषेन समुद्रगुप्त का राजकवि था जिसने इलाहाबाद के स्तम्भ लेख में समुद्रगुप्त की सफलताओं का वर्णन किया है।
  • अश्वमेध यज्ञ – समुद्रगुप्त ने चक्रवर्ती सम्राट् बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया था। इस यज्ञ में एक घोड़ा छोड़ दिया जाता था और जहां तक घोड़ा जाता था वहां तक के प्रदेश पर राजा का अधिकार माना जाता था।
  • विक्रमादित्य की उपाधि – विक्रमादित्य का अर्थ वीरता का सूर्य है। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।
  • पाटलिपुत्र (पटना) – पाटलिपुत्र (पटना) गुप्त साम्राज्य की राजधानी थी।
  • गुप्त साम्राज्य का अन्त – गुप्त साम्राज्य का अन्त लगभग 550 ई० में हुआ।
  • फाह्यान – फाह्यान एक चीनी यात्री था जो गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में भारत आया था।
  • दीनार – गुप्त काल में सोने के सिक्कों को दीनार कहते थे।
  • कालिदास – कालिदास गुप्तकाल के संस्कृत के महान् कवि थे।
  • अजंता की गुफाएं – अजंता की गुफ़ाएं महाराष्ट्र में औरंगाबाद के समीप स्थित हैं।
  • आर्यभट्टियम – आर्यभट्ट की पुस्तक का नाम आर्यभट्टियम है।\
  • गुप्तकाल का विशाल स्तम्भ – गुप्तकाल में दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप लोहे का विशाल स्तम्भ बनवाया गया था।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

Punjab State Board PSEB 10th Class Home Science Book Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Home Science Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

PSEB 10th Class Home Science Guide आस-पास की सफ़ाई Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
आस-पास की सफ़ाई से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
आस-पास से अभिप्राय घर का इर्द-गिर्द है जिसमें गली, पार्क और शैड शामिल किए जा सकते हैं। घर की भीतरी सफ़ाई के साथ-साथ आस-पास की सफ़ाई को इर्द-गिर्द की सफ़ाई कहा जाता है।

प्रश्न 2.
घरेलू कूड़े में कौन-कौन सी वस्तुएं होती हैं?
उत्तर-
घर में वस्तुओं का प्रयोग करते समय कूड़े-कर्कट का पैदा होना स्वाभाविक है। इस कूड़े-कर्कट में हम रसोई की जूठन, राख, फल और सब्जियों के छिलके, गत्ते के डिब्बे, पोलीथीन के लिफाफे, कागज़-पत्र आदि शामिल होते हैं।

प्रश्न 3.
आस-पास की सफ़ाई का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
घर को साफ़ रखने के लिए घर के आस-पास की सफ़ाई होना बहुत आवश्यक है। घर के आस-पास की सफ़ाई के कई लाभ हैं।
साफ़ सुथरा आस-पास हमें बदबू और गन्दगी से बचाकर रखता है। कीड़े-मकौड़े पैदा नहीं होते। पानी और भूमि के प्रदूषण का डर नहीं रहता और आए गए को भी साफ़सुथरा स्थान अच्छा लगता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

प्रश्न 4.
घर की नालियां साफ़ करना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
घर की सफ़ाई तभी ठीक रह सकती है यदि घर में फालतू पानी का निकास ठीक हो। आजकल बड़े शहरों में तो भूमिगत (Underground) सीवरेज़ का प्रबन्ध हो चुका है, परन्तु गाँवों और कस्बों में फालतू पानी के निकास को ठीक रखने के लिए नालियों की रोज़ाना सफ़ाई आवश्यक है।

प्रश्न 5.
मल-मूत्र को ठिकाने लगाना सबसे जरूरी है, क्यों?
उत्तर-
मल-मूत्र को ठिकाने लगाने का कार्य सबसे महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मल-मूत्र में हानिकारक बैक्टीरिया, वाइरस और जीवाणु होते हैं यदि इसको जल्दी ठिकाने न लगाया जाए तो बीमारियां फैलने का खतरा रहता है। कई बीमारियां जैसे टाइफाइड, हैज़ा और आंतों के रोग हो सकते हैं।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 6.
घर के कूड़े-कर्कट को कितने भागों में बांटा जा सकता है तथा इसका निपटारा कैसे करना चाहिए?
उत्तर-
घर के कूड़े-कर्कट को सम्भालना घर की सफ़ाई के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। घर के कूड़े-कर्कट को हम चार भागों में विभाजित कर सकते हैं-

  1. फलों सब्जियों के छिलके और रसोई का कूड़ा-कर्कट आदि को सम्भालने के लिए एक मज़बूत कूड़ेदान होना चाहिए जिस पर ढक्कन हो और दोनों ओर कुण्डे लगे हों ताकि इसको आसानी से उठाया जा सके। इस कूड़ेदान को ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जहां से तेज़ हवा से कूड़ा न उड़े और न ही वर्षा का पानी पड़ सके। इस कूड़े को रोज़ाना निपटाना आवश्यक है।
  2. आंगन और बगीची में झाड़ लगाते समय निकला कूड़ा, टूटी हुई वस्तुओं के टुकड़े और गुसलखाने का कूड़ा-कर्कट घर के कूड़े की दूसरी किस्म है । इसको भी किसी ढोल या कूड़ेदान में इकट्ठा करना आवश्यक है।
  3. जिस घर में पशु हों उसमें गोबर, बचा हुआ चारा, घर में काफ़ी कूड़ा-कर्कट पैदा करता है, इसको रोज़ाना सम्भालना चाहिए, पशुओं के गोबर से गोबर गैस भी बनाई जा सकती है और इसके उपले बनाकर भी प्रयोग किए जा सकते हैं।
  4. घर में मानवीय मल-मूत्र को ठिकाने लगाने के कार्य मुश्किल और महत्त्वपूर्ण हैं। यदि घर में फ्लश सिस्टम न हो तो मानवीय मल-मूत्र द्वारा बीमारियां फैलने का डर बना रहता है। इसलिए मानवीय मल-मूत्र जल्दी से जल्दी ठिकाने लगाने का पक्का प्रबन्ध होना चाहिए।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

प्रश्न 7.
कूड़े को जलाया क्यों जाता है?
उत्तर-
वातावरण की सफाई के लिए कूड़े-कर्कट का निपटारा करना बहुत आवश्यक है। वैसे तो कूड़े के निपटारे के लिए कई ढंग हैं, परन्तु कूड़े को जलाना सब से अच्छा समझा जाता है। कूड़े-कर्कट को इकट्ठा करके खुले स्थान पर आग लगा कर नष्ट किया जा सकता है, परन्तु कूड़े को जलाने का सबसे बढ़िया ढंग भट्ठी बनाकर उसमें कूड़े को जलाना है, इस प्रकार कूड़ा भी नष्ट हो जाता है और धुआं भी चिमनी द्वारा ऊपर चला जाता है और वातावरण भी साफ़-सुथरा रहता है।

प्रश्न 8.
कूड़े-कर्कट से खाद कैसे बनाई जाती है? इसका क्या लाभ है?
अथवा
कूड़े से खाद किस प्रकार बनाई जाती है और इससे नीची जगह को कैसे भरा जाता है?
उत्तर-
कड़े-कर्कट को खाद में परिवर्तित कर देना सदियों पुराना लाभदायक ढंग है। इस ढंग से मल-मूत्र और कूड़ा कर्कट को विशेष प्रकार के गड्ढों में भर कर ऊपर सूखी मिट्टी डालकर ढक दिया जाता है। इस तरह कई गड्ढे भर लिए जाते हैं। गर्मियों के दिनों में कभी-कभी पानी फेंका जाता है। 4-6 महीनों के पश्चात् यह कूड़ा-कर्कट खाद में परिवर्तित हो जाता है।

कूड़े-कर्कट को खाद में परिवर्तित कर लेना बहुत लाभदायक ढंग है। बहुत कम मेहनत से कूड़ा केवल सम्भाला ही नहीं जाता बल्कि उसको खाद में परिवर्तित करके फ़सलों, सब्जियों आदि में प्रयोग किया जाता है, जिससे फ़सलें भी अच्छी होती हैं।

प्रश्न 9.
कूड़े-कर्कट से गड्ढे भरने का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव होता है?
उत्तर-
कूड़े-कर्कट से खुले गड्ढे भरने से मानवीय स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि कूड़े-कर्कट को गड्ढे में डाल कर ऊपर से ढका न जाए तो जब कूड़ा गल जाता है उससे चारों ओर बदबू फैलती है। कई तरह के बैक्टीरिया और अन्य कीड़े-मकौड़े भी पैदा हो जाते हैं। इससे पूरा वातावरण दूषित हो जाता है और आस-पास रहते लोग कई बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त वर्षा के पानी के साथ मिलकर यह कूड़ा-कर्कट धरती निचले पानी को प्रदूषित कर देता है। इसलिए खुले गड्ढों में कूड़ाकर्कट फेंकने से मानवीय स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

प्रश्न 10.
कूड़े का निपटारा करने के ढंगों के नाम लिखो।
उत्तर-
कूड़े के निपटारे की निम्नलिखित विधियां हैं

  1. भट्ठी में जलाना
  2. गड्ढों को भरना
  3. खाद बनाना
  4. छांटना।

प्रश्न 11.
गन्दगी का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
देखें अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 12.
कूड़े-कर्कट को ठिकाने लगाने की विधियों का वर्णन करें।
उत्तर-
देखें अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

प्रश्न 13.
आस-पास की सफ़ाई क्यों आवश्यक है? इसके लिए क्या-क्या करना चाहिए?
उत्तर-
घर की सफ़ाई परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य के लिये घर के आस-पास की सफ़ाई से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। इसलिए परिवार के सदस्यों को बीमारियों से बचाने के लिए घर की सफ़ाई के साथ-साथ घर के आस-पास की सफ़ाई का भी ध्यान रखना चाहिए। घर के आस-पास की गन्दगी कई प्रकार के कीड़े-मकौड़े, बैक्टीरिया, मक्खी, मच्छर पैदा करने में सहायक होती है। इनसे मलेरिया, दस्त, टाइफाइड, फ्लू आदि बीमारियां लग सकती हैं और आस-पास की सफ़ाई करके हम काफ़ी हद तक इन बीमारियों से बच सकते हैं। इसके अतिरिक्त घर का साफ़-सुथरा आस-पास आए गए मेहमानों को सुन्दर लगता है और मेहमान भी खुश हो कर मिलने आते हैं। यदि घर के आस-पास गन्दगी होगी तो कोई सफ़ाई पसन्द मित्र और रिश्तेदार आप को मिलने आने से झिझकते हैं। इसलिए घर के आस-पास की गन्दगी परिवार का सामाजिक स्तर कम करती है।

आस-पास की सफ़ाई के लिए क्या करना चाहिए?

1. पानी के सही नियम का प्रबन्ध-गाँव और उन शहरों, कस्बों में जहां भूमिगत सीवरेज का प्रबन्ध नहीं है। घर के पानी से आस-पास प्रदूषित होता है क्योंकि खाना बनाना, बर्तन साफ़ करने, नहाना, पशुओं को साफ़ रखने के लिए, आंगन को साफ़ रखने के लिए पानी की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है और यदि इसका निकास ठीक न हो तो यह पानी घर के किसी कोने या घर के बाहर गली या किसी गड़े में इकट्ठा होता रहता है। इकट्ठा हुआ पानी केवल बदबू ही नहीं फैलाता बल्कि मच्छर, मक्खियों
और अन्य कीटाणुओं का जन्म स्थान बन जाता है जिससे कई बीमारियां फैलती हैं। इसलिए घर के पानी का सही निकास करके और बाहर नालियों की सफाई करके हम काफ़ी हद तक आस-पास को साफ़ रख सकते हैं।

2. गलियों की सफाई करके-प्रायः यह देखने में आता है कि अधिकतर लोग अपना फर्ज केवल घर के अन्दर को साफ़ करना ही समझते हैं या घर का कूड़ा-कर्कट बाहर गली में फेंक देते हैं। इससे केवल गली में ही गन्दगी नहीं फैलती बल्कि पूरा वातावरण ही दूषित हो जाता है। इसलिए घर के बाहर गली को घर का भाग समझ कर ही सफ़ाई करनी चाहिए।

3. घर के आस-पास पड़े खाली स्थान साफ़ करके-कई बार घरों के आसपास खाली स्थान पड़े होते हैं, जिसमें घास-फूस पैदा हो जाता है, गड्ढों में पानी भर जाता है, झाड़ियां पैदा हो जाती हैं, अन्धेरे में कई लोग जंगल पानी जाने लगते हैं। इस तरह गन्दगी बढ़ती जाती है और यह गन्दगी कई तरह की बीमारियों का कारण बनती है। ऐसे इलाके में बने खूबसूरत घर भी गन्दे लगते हैं। इसलिए ऐसे इलाके के निवासियों को खाली पड़े स्थान की सफ़ाई रखने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसे स्थान में घास-फूस काट कर बच्चों के खेलने के लिए जगह बन सकती है या घास, फूल, पौधे लगा कर इसको खूबसूरत पार्क में परिवर्तित किया जाता है।

4. मुहल्ले के बच्चों को सफ़ाई प्रति चेतन करके-बच्चों को सफ़ाई प्रति चेतन करके बच्चों को घर के आस-पास की सफ़ाई करने के लिए लगाया जा सकता है। यह तर्जुबा कई समाज सेवी जत्थेबंदियां सफलतापूर्वक कर चुकी हैं। बच्चे आदर्शवादी और शक्ति भरपूर होते हैं। बस थोड़ी सी सीध देने और उत्साहित करने से वह घरों के आस-पास की सफ़ाई आसानी से कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त मुहल्ला निवासी पैसे इकट्ठे करके भी मज़दूरों से सफ़ाई करवा सकते हैं।
इसलिए उपरोक्त ढंगों को अपना कर घर का आस-पास साफ़-सुथरा रखा जा सकता है जो केवल सुन्दर ही नहीं लगता बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक रहता है।

Home Science Guide for Class 10 PSEB आस-पास की सफ़ाई Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आसपास की सफ़ाई किसे कहते हैं?
उत्तर-
घर के आसपास की सफ़ाई को।

प्रश्न 2.
घरेलू कूड़े में क्या कुछ होता है?
उत्तर-
रसोई की जूठन, फल, सब्जियों के छिलके आदि।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

प्रश्न 3.
पाखानों की उचित सफ़ाई न की जाए तो कौन-से रोग हो सकते हैं?
उत्तर-
टाईफाईड, हैजा।

प्रश्न 4.
नालियों को साफ रखने के लिए यह कैसी होनी चाहिए?
उत्तर-
पक्की होनी चाहिए।

प्रश्न 5.
कूड़े से खाद कितने दिनों में तैयार हो सकती है?
उत्तर-
4-6 महीनों में।

प्रश्न 6.
कूड़े के निपटारे के ढंग बताओ।
उत्तर-
भट्ठी में जलाना, गड्ढों को भरना, खाद बनाना, छांटना।

प्रश्न 7.
री साईकल करने वाले कूड़े में क्या कुछ आता है?
उत्तर-
टूटा कांच, चीनी का सामान, प्लास्टिक का सामान, रद्दी कागज़ आदि।

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प्रश्न 8.
खाद किस प्रकार के कूड़े से बनाई जा सकती है?
उत्तर-
वनस्पति कूड़े-कर्कट से।

प्रश्न 9.
कूड़े के निपटारे के दो ढंग बताओ।
उत्तर-
भट्ठी में जलाना, गड्डों को भरना।

प्रश्न 10.
घरेलू कूड़े में क्या कुछ होता है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 3 आस-पास की सफ़ाई

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कूड़े-कर्कट को ठिकाने लगाने से पहले छांटना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
कूड़े-कर्कट को ठिकाने लगाने से पहले छांटना इसलिये ज़रूरी है कि कूड़े के बीच चीज़ों को प्रयोग में लाया जा सके। जैसे-

  1. कूड़े में से कोयले, अर्द्ध जले कोयले, पत्थर-गीटे अलग करके प्रयोग में लाये जा सकते हैं।
  2. सब्जियों के छिलकों से खाद बनाई जा सकती है। कुछ चीजें कबाड़ियों को बेचकर पैसे कमाए जा सकते हैं।

प्रश्न 2.
कूड़े का अन्तिम निपटारा खाद बनाकर कैसे किया जाता है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 3.
कूड़े का अन्तिम निपटारा कैसे किया जाता है? विस्तार में बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 4.
आस-पास की सफ़ाई क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 5.
घर की नालियों की सफाई कैसे की जाती है?
उत्तर-
नालियों को साफ़-सुथरा रखने के लिए इनका पक्का होना आवश्यक है और इनकी ढलान इस तरह होनी चाहिए कि पानी आसानी से निकल सके। इनमें समय-समय पर कीटनाशक दवाइयां डालते रहना चाहिए ताकि मक्खी मच्छर पैदा न हों।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आस-पास की सफ़ाई का हमारे स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
परिवार के सदस्यों को स्वस्थ रखने के लिए घर की सफ़ाई के साथ-साथ घर के आस-पास की सफ़ाई करना भी बहुत आवश्यक है। यदि घर का इर्द-गिर्द साफ़ नहीं होगा तो गन्दी हवा मक्खी मच्छर घर के अन्दर आएंगे। घर के निकट ईंटें, लकड़ियां, उपले या कूड़े के ढेर नहीं होने चाहिएं। इन पर मक्खी मच्छर तो पैदा होते ही हैं। इसके साथ-साथ और अन्य खतरनाक जीव भी इसमें जाकर अपना स्थान बना लेते हैं। कई बार यह जानलेवा भी साबित हो जाते हैं। इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि घर के इर्द-गिर्द कूड़े कर्कट के ढेर न हों, पानी खड़ा न हो और घास-फूस न उगा हो ताकि घर का आस-पास साफ़-सुथरा रह सके।

प्रश्न 2.
आस-पास की गन्दगी का मानवीय स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
अथवा
गन्दे वातावरण में रहने का क्या नुकसान है?
उत्तर-
आस-पास की गन्दगी का हमारे स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है। गन्दे वातावरण में रहने के निम्नलिखित नुकसान हैं —

  1. कीटाणुओं का पैदा होना-घर के इर्द-गिर्द गन्दगी होने के कारण कई बीमारियों के कीटाणु पैदा हो जाते हैं जिनसे कई बीमारियां जैसे तपेदिक, हैजा, टाइफाइड जैसे हानिकारक कीटाणु हमारे स्वास्थ्य को खराब कर सकते हैं।
  2. बदबू-गन्दगी और कूड़े-कर्कट के ढेरों में कुछ समय के पश्चात् बदबू आनी शुरू हो जाती है जो इर्द-गिर्द की वायु को दूषित करती हुई कई बीमारियों का कारण बनती है।
  3. कीड़े-मकौड़ों की उत्पत्ति-कूड़े-कर्कट में मक्खियां और मच्छर अनेकों प्रकार के कीड़े-मकौड़े पैदा होते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य पर काफ़ी प्रभाव डालते हैं। मच्छर से मलेरिया फैल सकता है और मक्खियां भी हैजा, टाइफाइड आदि रोगों को फैलाती हैं।
  4. पानी का प्रदूषण-लगातार पड़ी रहने वाली गन्दगी के ढेर वर्षा के पानी में घुलकर धरती निचले पानी को भी दूषित करती है जिसका मानवीय स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
  5. धूल और मिट्टी-यदि हम घर का इर्द-गिर्द साफ़ नहीं करते तो धूल और मिट्टी से घर भर जाता है जिससे फेफड़ों का रोग, दमा और कई प्रकार के चमड़ी के रोग भी हो सकते हैं।

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प्रश्न 3.
घर के आस-पास को साफ़ रखने के लिए कूड़े का अन्तिम निपटारा किस तरह करना चाहिए?
अथवा
कूड़े-कर्कट को ठिकाने लगाने की विधियों का वर्णन करें।
उत्तर-
आस-पास को साफ़ रखने के लिए कूड़े-कर्कट को इस तरह ठिकाने लगाना चाहिए जिससे रोज़ाना लोगों को कोई परेशानी पैदा न हो। गाँवों में रहने वाले लोग जानते हैं कि पशुओं के गोबर और कूड़े को गड्ढों में भरकर खाद बनाई जाती है जो बाद में फ़सलों के काम आती है। इस तरह कूड़े-कर्कट को सही ढंग से ठिकाने लगाया जा सकता है। कूड़े-कर्कट को निम्नलिखित ढंगों से ठिकाने लगाया जा सकता है —

  1. भट्ठी में जलाना-यह ढंग सबसे अच्छा समझा जाता है। परन्तु कूड़े-कर्कट को एक विशेष भट्ठी में ही जलाया जाता है शेष केवल राख ही बचती है। कूड़े को जलाने के लिए पक्की भट्ठी बनाई जाती है। इसके निकट एक चबूतरा होना चाहिए जहां कि शहर से लाया गया कूड़ा-कर्कट रखा जा सके। भट्ठी में एक रास्ते द्वारा थोड़ा-थोड़ा करके कूड़ा भट्ठी में फेंका जाता है। इस तरह करने से धुआं चिमनी द्वारा बाहर निकल जाता है।
  2. निम्न स्थान को भरना-प्रत्येक शहर में या गांव में नीचे इलाके होते हैं जिनमें कूड़ा-कर्कट भरकर ठिकाने लगाया जाता है। कूड़ा-कर्कट कुछ देर पड़ा रहता है। धीरे-धीरे यह कूड़ा-कर्कट गल-सड़ कर दब जाता है फिर इस पर और कूड़ा-कर्कट फेंक दिया जाता है। इस तरह धीरे-धीरे सड़क आदि के बराबर आ जाता है फिर उस पर थोड़ी मिट्टी डालकर समतल कर दिया जाता है। इस तरह करने से स्थान साफ़सुथरा हो जाता है।
  3. खाद बनानी-कूड़े-कर्कट को खाद में परिवर्तित करना सदियों पुराना ढंग है। इस ढंग से मानवीय और पशुओं का मल-मूत्र और घर का अन्य कूड़ा-कर्कट एक गहरे गड्ढे में दबाकर खाद बनाई जाती है जो फ़सलों के प्रयोग में लाई जाती है। यह कूड़ाकर्कट सम्भालने का सबसे बढ़िया ढंग है।
  4. छांटना-कूड़े-कर्कट को सम्भालने से पहले उसको तीन भागों में बांट लिया जाता है
    1. कोयले, अर्द्ध जले कोयले, पत्थर गीटे, बट्टे आदि अलग करके ईंटें बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
    2. वनस्पति कूड़ा-कर्कट जैसे फल सब्जियों के छिलके रसोई की जूठन आदि को अलग कर खाद बनाई जा सकती है।
    3. टूटे हुए कांच, चीनी, मिट्टी के बर्तन, प्लास्टिक के सामान को दोबारा प्रयोग कर लिया जा सकता है।
      उपरोक्त ढंगों को प्रयोग करने से कूड़े-कर्कट को सम्भाल लिया जाता है और कूड़े-कर्कट का लाभदायक प्रयोग भी किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
कूड़े को भट्ठी में किस प्रकार जलाया जाता है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर में।

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वस्तनिष्ठ प्रश्न

I. रिक्त स्थान भरें

  1. घर के कूड़े-कर्कट को ……………. में नहीं फेंकना चाहिए।
  2. कूड़े से खाद ………………. महीनों में बन जाती है।
  3. खाद ………………. कूड़े-कर्कट से बनती है।

उत्तर-

  1. गली,
  2. 4 से 6,
  3. वनस्पति।

II. ठीक/ग़लत बताएं

  1. वातावरण की सफ़ाई के लिए कूड़े-कर्कट का निपटारा करना आवश्यक है।
  2. कूड़े-कर्कट से खुले खड्डे भरने से मानवीय स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता
  3. घरेलू कूड़े का भाग है-रसोई की जूठन, फ़ल तथा सब्जियों के छिलके।

उत्तर-

  1. ठीक,
  2. ग़लत,
  3. ठीक।

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में ठीक है
(क) कूड़े-कर्कट को खाद में बदल लेना लाभदायक है।
(ख) कूड़ा-कर्कट को खुले खड्डे में न भरें।
(ग) कूड़े के निपटारे के लिए भट्ठी में जलाना भी एक ढंग है।
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

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प्रश्न 2.
गंदे वातावरण से निम्नलिखित हानियां हैं
(क) कीटाणु पैदा होते हैं
(ख) बदबू पैदा होती है
(ग) पानी प्रदूषित होता है
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

आस-पास की सफ़ाई 10th Class Home Science Notes

  1. घर के इर्द-गिर्द की सफाई को आस-पास की सफ़ाई कहा जाता है।
  2. घर की नालियों की सफाई के बिना घर साफ़ नहीं रह सकता।
  3. घर के आस-पास की सफ़ाई हमें बीसों बीमारियों से बचाती है।
  4. घर के कूड़े-कर्कट को गली में नहीं फेंकना चाहिए।
  5. कूड़े-कर्कट को सही ढंग से ही निपटाना चाहिए।
  6. घर के आस-पास गंदगी जमा नहीं होने देनी चाहिए।
  7. घर के आस-पास की सफ़ाई से परिवार का सामाजिक स्तर बढ़ता है।

परिवार के सदस्यों को खुश और तन्दुरुस्त रखने के लिए सफ़ाई रखनी आवश्यक है। घर जितना चाहे बढ़िया बना हो परन्तु यदि उसमें सफाई न हो तो अच्छा नहीं लगता। घर की गन्दगी बीमारियों को बुलावा देती है। परन्तु घर की सफ़ाई भी तभी रह सकती है यदि आस-पास भी साफ़ हो। इसलिए घर की सफ़ाई के साथ-साथ आस-पास की सफ़ाई का भी ध्यान रखना चाहिए।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

Punjab State Board PSEB 11th Class Agriculture Book Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Agriculture Chapter 8 मुर्गी पालन

PSEB 11th Class Agriculture Guide मुर्गी पालन Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
मुर्गी कितने दिनों बाद अण्डे देना शुरू करती है?
उत्तर-
मुर्गी 160 दिनों पश्चात् अण्डे देना शुरू करती है।

प्रश्न 2.
मीट देने वाली मुर्गियों की दो किस्मों के नाम बताओ।
उत्तर-
आई० बी० एल० 80 ब्रायलर तथा ह्वाइट प्लाईमाऊथ राक।

प्रश्न 3.
मुर्गी के एक अण्डे का भार लगभग कितना होता है?
उत्तर-
एक अण्डे का भार लगभग 55 ग्राम होता है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

प्रश्न 4.
सफ़ेद रंग के अण्डे कौन सी मुर्गी देती है?
उत्तर-
ह्वाइट लैगहान।

प्रश्न 5.
रैड आईलैंड रैड मुर्गी साल में कितने अण्डे देती है?
उत्तर-
यह वर्ष में लगभग 180 अण्डे देती है।

प्रश्न 6.
बीटों से कौन सी गैस बनती है ?
उत्तर-
अमोनिया।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

प्रश्न 7.
चूजों को गर्मी देने वाले यंत्र का क्या नाम है ?
उत्तर-
बरूडर।

प्रश्न 8.
मुर्गियों के शैड की छत कितनी ऊंची होनी चाहिए ?
उत्तर-
10 फुट।

प्रश्न 9.
दो मुर्गियों के लिए पिंजरे का क्या आकार होना चाहिए ?
उत्तर-
15 इंच लम्बा तथा 12 इंच चौड़ा।

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प्रश्न 10.
सर्दियों में मुर्गियां खुराक अधिक खाती हैं या कम।
उत्तर-
सर्दियों में मुर्गियां अधिक खुराक खाती हैं।

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दो।

प्रश्न 1.
पोल्ट्री शब्द से क्या भाव है?
उत्तर-
पोल्ट्री शब्द का अर्थ है प्रत्येक प्रकार के पक्षियों को पालना जिनसे मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो सकें। इसमें मुर्गियां, बतखें, बटेर, टर्की, कबूतर, शुतुरमुर्ग, हंस, गिन्नी, फाऊल आदि शामिल है।

प्रश्न 2.
देसी नस्ल की मुर्गियों का वर्णन करो।
उत्तर-
इसकी किस्में हैं-पंजाब लेयर-1 तथा पंजाब लेयर-2.

  • सतलुज लेयर-यह वर्ष में 255-265 अण्डे देती हैं। एक अण्डे का औसत भार 55 ग्राम होता है।
  • आई०बी०एल० 80 ब्रायलर-इससे मीट प्राप्त किया जाता है। इसका औसत भार 1350-1450 ग्राम लगभग 6 सप्ताह में हो जाता है।

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प्रश्न 3.
वाइट लैग हार्न तथा रैड आइलैंड रेड मुर्गियों की तुलना करो।
उत्तर-
वाइट लैग हार्न मुर्गियां –

  1. इसके अण्डे सफ़ेद रंग के होते हैं।
  2. वर्ष में 220-250 के लगभग अण्डे देती हैं।
  3. थोड़ी खुराक खाती हैं।
  4. इनका मास स्वादिष्ट नहीं होता।
    यह अण्डे वाली नसल है।

रैड आइलैड रेड मुर्गियां –

  1. इसके अण्डे खाकी रंग के होते हैं।
  2. वर्ष में 180 अण्डे देती हैं।
  3. अधिक खुराक खाती हैं।
  4. इनका प्रयोग मांस के लिये होता है।

प्रश्न 4.
मुर्गियों के विकास के लिए किन भोज्य तत्त्वों की आवश्यकता होती है?
उत्तर-
मुर्गियों की वृद्धि के लिये लगभग 40 पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। खुराक में पाए जाने वाले पदार्थों को 6 भागों में बांट सकते हैं। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, चर्बी, धातुएं, विटामिन तथा पानी।

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प्रश्न 5.
मुर्गियों के शैड के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
मुर्गियों की शैड ऊंचे स्थान पर बनानी चाहिए तथा सड़क से जुड़ी होनी चाहिए ताकि खुराक, अण्डों आदि की ढुलाई इत्यादि सुविधा से हो सके। वर्षा अथवा बाढ़ का पानी शैड के निकट नहीं खड़ा होने देना चाहिए।

प्रश्न 6.
गर्मियों में मुर्गियों की सम्भाल कैसे की जाती है ?
उत्तर-
पक्षियों में पसीने के लिये मुसाम (रोमछिद्र) नहीं होते तथा पंख अधिक होते हैं इसलिये इनके लिए गर्मी को सहन करना कठिन होता है। शैड के इर्द-गिर्द घास इत्यादि, शहतूत के वृक्ष आदि लगाने चाहिए। छतों के ऊपर फव्वारे लगाने चाहिएं इससे 5-6°C तापमान कम किया जा सकता है। चारों ओर की दीवारें एक-डेढ़ फुट से अधिक ऊंची नहीं होनी चाहिये तथा शेष स्थान पर जालियां लगवानी चाहिएं। छत पर सरकण्डे की परत बिछा दो तथा अधिक गर्मी में मुर्गियों पर फव्वारे से पानी छिड़का देना चाहिए। पीने वाले पानी का प्रबन्ध ठीक होना चाहिये। पानी के बर्तन दोगुने कर देने चाहिए तथा पानी शीघ्र बदलते रहना चाहिए।

प्रश्न 7.
मुर्गियों के लिटर की सम्भाल क्यों जरूरी है ? –
उत्तर-
लिटर सदैव सूखा होना चाहिये। गीले लिटर से बीमारियां लग सकती हैं। इससे शैड में अमोनिया गैस बनती है जो पक्षियों तथा मज़दूरों दोनों के लिए कठिनाई पैदा करती है।

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प्रश्न 8.
मीट प्राप्त करने के लिये मुर्गी की कौन सी नस्लें पाली जाती हैं ?
उत्तर-
मांस प्राप्त करने के लिये आई० बी० एल० 80 ब्रायलर, रैड आइलैंड रेड तथा ह्वाइट प्लाईमाऊथ रॉक नस्लें पाली जाती हैं।

प्रश्न 9.
आई०बी०एल० 80 नस्ल की क्या विशेषताएं हैं ?
उत्तर-
यह मांस के लिए प्रयोग होने वाली नस्ल है। इसका औसत भार 1350-1450 ग्राम लगभग 6 सप्ताह में हो जाता है।

प्रश्न 10.
मुर्गियों की खुराक बनाने में कौन-कौन सी चीज़ों का उपयोग होता
उत्तर-
मुर्गियों की खुराक में मक्की, चावल का टोटा, मूंगफली की खल, चावल की पालिश, गेहूँ, मछली का चूरा, सोयाबीन की खल, पत्थर तथा साधारण नमक आदि से मुर्गी अपने खुराकी तत्व पूरा करती है। मुर्गी के खुराक में ऐंटीवायोटिक दवाइयां अवश्य शामिल करनी चाहिए।

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(ग) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
मुर्गी की विदेशी नस्लों का वर्णन करो।
उत्तर-

  • वाइट लैगहान-इसके अण्डे सफ़ेद रंग के होते हैं। वर्ष में 220-250 के लगभग अण्डे देती है। इसका मांस स्वादिष्ट नहीं होता है। यह छोटे आकार की होती है तथा कम भोजन खाती है।
  • रेड आइलैण्ड रैड-इसके अण्डे लाल रंग के होते हैं। यह वर्ष में लगभग 180 अण्डे देती है। यह अधिक खुराक खाती है तथा इसे मांस के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • वाइट प्लाइमाऊथ रॉक-यह वर्ष में 140 के लगभग अण्डे देती है। अण्डे का रंग खाकी होता है तथा भार 60 ग्राम से अधिक होता है। इसका प्रयोग मांस के लिए होता है। इसके चूज़े दो मास में एक किलो से अधिक हो जाते हैं। इसके मुर्गों का भार 4 किलो तथा मुर्गियों का भार 3 किलो तक होता है।

प्रश्न 2.
मुर्गियों के लिए ज़रूरी भोज्य तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर-
मुर्गियों के लिए लगभग 40 से अधिक आहारीय तत्त्वों की आवश्यकता होती है। किसी भी आहारीय तत्त्व की कमी का मुर्गियों के स्वास्थ्य तथा पैदावार पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इन आहारीय तत्त्वों को 6 भागों में बांटा जा सकता है। जैसे कार्बोहाइड्रेटस, प्रोटीन, चर्बी, धातुएं, विटामिन तथा पानी।

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प्रश्न 3.
गर्मियों और सर्दियों में मुर्गियों की सम्भाल करने में क्या अंतर है ?
उत्तर-
गर्मियों में सम्भाल-पक्षियों में पसीने के मुसाम नहीं होते तथा पंख अधिक होते हैं। इस कारण वह सर्दी तो सहन कर सकते हैं परन्तु गर्मी सहन करना उनके लिए कठिन होता है। शैड के चारों ओर से गर्मी कम करने के लिए इर्द-गिर्द घास तथा शहतूत इत्यादि के वृक्ष भी लगाने चाहिए। छतों पर फव्वारे लगा कर गर्म तथा शुष्क ऋतु में तापमान को 5-6°C तक कम किया जा सकता है। चारों ओर की दीवारें भूमि से एक-डेढ़ फुट से अधिक ऊंची नहीं होनी चाहिएं तथा शेष स्थान पर जाली लगा देनी चाहिए। छत पर सरकण्डे आदि की मोटी परत बिछा लेनी चाहिए। अधिक गर्मी में मुर्गियों पर स्प्रे पम्प से पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए। पीने वाले पानी का प्रबन्ध ठीक होना चाहिए तथा पानी शीघ्र बदलते रहना चाहिए। खुराक में प्रोटीन, धातुएं तथा विटामिन की मात्रा 20-30% बढ़ा दो।

सर्दियों की सम्भाल-सर्दियों में कई बार तापमान 0°C से भी कम हो जाता है। इसका मुर्गियों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। यदि मुर्गीखाने का तापमान ठीक न हो तो ऐसी अवस्था में सर्दियों की ऋतु में मुर्गी 3 से 5 किलोग्राम दाना अधिक खा जाती है। सर्दी से बचाव के लिए खिड़कियों पर पर्दै लगाने चाहिए। सूख को सप्ताह में दो बार हिलाना चाहिए।

प्रश्न 4.
मुर्गी पालन के लिए प्रशिक्षण विभागों का वर्णन करो।
उत्तर-
मुर्गी पालन का धन्धा शुरू करने के लिए पहले प्रशिक्षण ले लेना चाहिए। इसके लिए जिले में डिप्टी डायरैक्टर पशु-पालन विभाग, गुरु अंगद देव वैटनरी तथा एनीमल साइंसज़ विश्वविद्यालय लुधियाना या कृषि विज्ञान केन्द्र से सम्पर्क करना चाहिए।

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प्रश्न 5.
चूजों की सम्भाल पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
चूजों को किसी विश्वसनीय तथा मान्यता प्राप्त हैचरी से खरीदना चाहिए तथा ब्रडर में रखना चाहिए। ब्रूडर चूजों को गर्मी देने वाला यंत्र है। चूजों को पहले 6-8 सप्ताह की आयु तक 24 घण्टे प्रकाश तथा अच्छी खुराक जो कि संतुलित हो, देनी पड़ती है।

Agriculture Guide for Class 11 PSEB मुर्गी पालन Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सतलुज लेअर से एक वर्ष में कितने अण्डे प्राप्त होते हैं?
उत्तर-
255-265 अण्डे।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

प्रश्न 2.
आई० बी० एल० 80 ब्रायलरों का 6 सप्ताह का औसत भार कितना होता है?
उत्तर-
1230-1450 ग्राम।

प्रश्न 3.
मुर्गी कितने दिनों बाद अण्डा देना शुरू कर देती है ?
उत्तर-
160 दिन।

प्रश्न 4.
सतलुज लेअर के अण्डे का भार होता है।
उत्तर-
55 ग्राम लगभग।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

प्रश्न 5.
सतलुज लेयर मुर्गियों की किस्मों के नाम लिखो।
उत्तर-
पंजाब लेअर-1 तथा पंजाब लेअर-2।।

प्रश्न 6.
विश्व भर में पाई जाने वाली मुर्गियों की तीन जातियों के नाम बताओ।
उत्तर-
वाइट लैगहार्न, रेड आईलैंड रेड तथा वाइट प्लाइमाऊथ राक।

प्रश्न 7.
वाइट लैगहान कितने अण्डे देती है?
उत्तर-
एक वर्ष में 220-250 के लगभग अण्डे देती है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

प्रश्न 8.
रैड आईलैंड रेड के अण्डों का रंग क्या होता है?
उत्तर-
इसके अण्डे खाकी रंग के होते हैं।

प्रश्न 9.
वाइट प्लाईमाउथराक नस्ल कितने अण्डे देती है ?
उत्तर-
यह वर्ष में 140 के लगभग अण्डे देती है।

प्रश्न 10.
मुर्गियों के बढ़ने-फूलने के लिए लगभग कितने भोजन तत्त्वों की आवश्यकता होती है?
उत्तर-
मुर्गियों को लगभग 40 भोजन तत्त्वों की आवश्यकता होती है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

प्रश्न 11.
भोजन में पाए जाने वाले पदार्थों को कौन-कौन से भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-
इनको 6 भागों में बांटा जा सकता है-कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, चर्बी, धातुएं, विटामिन तथा पानी।

प्रश्न 12.
मुर्गियों की गर्मियों की खुराक में प्रोटीन, धातुएं तथा विटामिन की मात्रा कितनी बढ़ानी चाहिए ?
उत्तर-
20-30% तक।

प्रश्न 13.
गीले लिटर से कौन-सी गैस बनती है?
उत्तर-
इससे अमोनिया गैस बनती है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य अपनी आर्थिक आवश्यकताएं पूरी कर सके इसके लिए कौनकौन से पक्षी पालता है?
उत्तर-
मुर्गियां, टर्की, बत्तखें, हंस, बटेर, गिन्नी, फाल, कबूतर आदि ऐसे पक्षी हैं जो मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पाले जाते हैं।

प्रश्न 2.
पक्षियों के लिए गर्मी सहन करना क्यों कठिन है ?
उत्तर-
पक्षियों में पसीने के मुसाम नहीं होते तथा पंख अधिक होते हैं इसलिए इनके लिए गर्मी सहन करना कठिन होता है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 8 मुर्गी पालन

मुर्गी पालन PSEB 11th Class Agriculture Notes

  • ‘पोल्ट्री’ शब्द का अर्थ है ऐसे हर प्रकार के पक्षियों को पालना जो आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हों।
  • सतलुज लेयर, मुर्गियों की एक जाति है जो एक वर्ष में 255-265 अण्डे देती हैं तथा अण्डे का औसत भार 55 ग्राम होता है। मुर्गी 160 दिनों के पश्चात् अण्डे देना शुरू करती है।
  • आई० बी० एल० 80 ब्रायलर मीट पैदा करने वाली मुर्गियों की एक जाति है।। इसका 6 सप्ताह का औसत भार 1250-1350 ग्राम होता है।
  • ह्वाइट लैगहान विदेशी नसल है, जो वर्ष में 220-250 अण्डे देती है।
  • रैड आईलैंड रैड खाकी रंग के लगभग वार्षिक 180 अण्डे देती है।
  • ह्वाइट प्लाईमाऊथ राक वार्षिक 140 के लगभग अण्डे देती है तथा इसके चूजे दो माह में एक किलो भार के हो जाते हैं।
  • मुर्गियों को अपने भोजन में 40 से अधिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। इनको 6 भागों में बांटा जा सकता है। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, चर्बी, धातुएं, विटामिन तथा पानी।
  • चूजों को गर्मी देने वाला यंत्र बरूडर होता है।
  • एक मुर्गी को 2 वर्ग फुट स्थान चाहिए।
  • पक्षियों के शरीर में पसीने के लिए रोमछिद्र नहीं होते।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(iii) पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 3(iii) पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 3(iii) पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य

PSEB 11th Class Geography Guide पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Questions and Answers

1. प्रश्नों के उत्तर दें-

प्रश्न (क)
विश्व का सबसे बड़ा मरुस्थल कौन-सा है ?
उत्तर-
सहारा।

प्रश्न (ख)
मरुस्थल कितने प्रकार के होते हैं ? उनके नाम लिखें।
उत्तर-
पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य Solutions

  1. रेतीला मरुस्थल-सहारा में अरग।
  2. पथरीला मरुस्थल-अल्जीरिया में रैग।
  3. चट्टानी मरुस्थल-सहारा में हमादा।

प्रश्न (ग)
अरग किसे कहते हैं ?
उत्तर-
रेतीले मरुस्थल को।

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प्रश्न (घ)
क्या रेत के टीले सदा स्थिर रहते हैं ?
उत्तर-
नहीं, ये खिसकते रहते हैं।

प्रश्न (ङ)
लोइस मैदानों की मिट्टी का रंग कैसा होता है और उनमें किन फसलों की खेती की जाती है ?
उत्तर-
पीला रंग और गेहूँ की खेती।

प्रश्न (च)
हवा और पवन में क्या अंतर है ?
उत्तर-
वायुमंडल के दबाव कारण हवा चलती है, परंतु गतिशील हवा को पवन कहते हैं।

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प्रश्न (छ)
मुसामदार चट्टानों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जिनमें पानी निचली सतह पर चला जाता है।

प्रश्न (ज)
तटवर्ती रेत के टीले कैसे बनते हैं ?
उत्तर-
जब हवा रेत को जमा करती है।

2. निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट करें-

(i) बरखान — लोइस
(ii) जालीदार पत्थर — डरीकंटर
(iii) ज़िऊजन — यारडांग
(iv) नखलिस्तान — इनसलबर्ग
(v) रेतीले मरुस्थल — चट्टानी मरुस्थल।
उत्तर-
(i) बरखान (Barkhan)- बरखान अर्ध-चंद्र के आकार के टीले हैं। इनका आकार धनुष के समान होता है। इनके सिरों को हॉर्न कहा जाता है।
लोइस (Loess) – बारीक मिट्टी के निक्षेप को लोइस कहते हैं। चीन के उत्तर-पश्चिमी भाग में पीली मिट्टी के निक्षेप को लोइस कहते हैं।

(ii) जालीदार पत्थर (Stone Lattice)-
जब नर्म और कठोर चट्टाने मिलकर बनती हैं, तब नर्म भाग रगड़े जाने से समाप्त हो जाते हैं, परंतु कठोर भाग जालीनुमा आकार में खड़े रहते हैं, जिन्हें जालीदार पत्थर कहा जाता है।

डरीकंटर (Driekanter)-
जब चट्टानों के खुरचने की क्रिया लगातार एक ही दिशा में होती रहती है, तो चट्टानें एक त्रिकोण के समान बन जाती हैं, जिन्हें डरीकंटर कहा जाता है।

(iii) ज़िऊजन (Zeugen)-

  1. ढक्कनदार दवात के आकार के स्थल रूपों को ज़िऊजन कहते हैं।
  2. इनका ऊपरी भाग कठोर होता है परंतु निचला भाग नर्म होने के कारण अधिक चौड़ा होता है।

यारडंग (Yardang)-

  1. नुकीली चट्टानों को यारडंग कहते हैं।
  2. इसमें नर्म और कठोर चट्टानें लंब रूप में होती हैं।

(iv) नखलिस्तान (Oasis)-
अपवाहन (Deflation) की क्रिया के दौरान चट्टानों की ऊपरी परतें हटती जाती हैं और सतह के नीचे वाला पानी चट्टानों के ऊपर आ जाता है, जिसके इर्द-गिर्द के क्षेत्र को नखलिस्तान कहते हैं।

इनसलबर्ग (Insellberg)-
पवनों के अपरदन से कई क्षेत्रों में कठोर चट्टानों की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ बन जाती हैं। ये ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानों से बनती हैं। इन्हें इनसलबर्ग कहते हैं।

(v) रेतीले मरुस्थल (Sandy Deserts)-
ऐसे मरुस्थल, जिनमें अधिकतर रेत ही पाई जाती है। यहाँ से रेत के कण बड़ी आसानी से पवन अपने साथ उड़ाकर ले जाती है। जैसे-सहारा।।

चट्टानी मरुस्थल (Rocky Deserts)-
ऐसे बंजर क्षेत्र, जिनकी ऊपरी नर्म परतें घिसकर बिल्कुल समाप्त हो जाती हैं और केवल चट्टानी टीले या बंजर क्षेत्र ही रह जाते हैं। जैसे-हमादा।

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3. निम्नलिखित के उत्तर सौ शब्दों में दीजिए-

प्रश्न (क)
पवनें मरुस्थल में अनावृत्तिकरण का साधन है। व्याख्या करें।
उत्तर-
पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य (Denudation Works of Winds)-
वायु और पवन-हवा वायुमण्डल के दबाव से चलती है और इस चलती या गतिशील हवा को पवन (Wind) कहते हैं। दबाव में जब अंतर पैदा होता है, तो पवनें चलती हैं। ये अधिक दबाव (High Pressure) से कम दबाव (Low Pressure) वाले क्षेत्रों की ओर चलती हैं। जिस दिशा से पवन उत्पन्न होती है, उसे पवन की दिशा कहा जाता है, भाव उस दिशा को पवन का नाम दिया जाता है।

पवनों की अनावृत्तिकरण क्रिया-यह केवल कम वर्षा, कम वनस्पति, दूसरे शब्दों में शुष्क या मरुस्थलीय क्षेत्रों में ही अधिक कार्य करती है। मरुस्थलीय क्षेत्र ऐसे क्षेत्र होते हैं, जिनमें वर्षा 25 सेंटीमीटर से भी कम और वहाँ अत्यधिक तापमान होता है। इस प्रकार की जलवायु के कारण ऐसे क्षेत्रों में किसी प्रकार की वनस्पति नहीं होती और पवनों के चलने में भी किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती और यह अनावृत्तिकरण का कार्य करती रहती हैं। विश्व के अधिकतर मरुस्थल महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में मिलते हैं। 20° से 30° उत्तरी अक्षांशों के बीच पंजाब का दक्षिण-पश्चिमी (South-West) भाग अर्द्धशुष्क (Semiarid) भाग है, जो वास्तव में थार मरुस्थल में ही मिल जाता है। पवनें निम्नलिखित कारणों के कारण ही मरुस्थल में अनावृत्तिकरण की क्रिया अधिक करती हैं-

1. भौतिक मौसमीकरण-मरुस्थल नमी-युक्त क्षेत्रों से बिल्कुल भिन्न होते हैं। नमीयुक्त क्षेत्रों में रासायनिक मौसमीकरण आम है, परंतु शुष्क क्षेत्रों में भौतिक मौसमीकरण ही हो सकता है। नमक निकालना (Salt wedging) इसका ही उदाहरण है।

2. वर्षा की कमी-मरुस्थलीय इलाकों में मिट्टी और वर्षा की कमी होने के कारण वनस्पति भी कम ही होती है, इसलिए पवनें अपना काम कर सकती हैं।

3. गैर मुसामदार चट्टानें-मरुस्थलों का अधिकतर क्षेत्र गैर मुसामदार (Impermeable) होता है, जिसके कारण धरती की निचली सतह पर कोई कमी नहीं होती है।

4. रेतीले मरुस्थल-जो मरुस्थल अधिक रेतीले होते हैं, वे हवा या वर्षा के कारण और अधिक फैलते जाते हैं। इनका आकार (Size) बढ़ता जाता है।

5. अल्पकालिक नदियाँ–अधिकतर नदियाँ मौसमी या अल्पकालिक (Ephemeral) होती हैं, जोकि केवल वर्षा के समय ही थोड़े समय के लिए चलती हैं और वर्षा के एकदम बाद समाप्त हो जाती हैं।

इसलिए हम कह सकते हैं कि मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा, वनस्पति आदि कम होने के कारण पवनें अधिकतर काम करती हैं। यहाँ केवल झाड़ीदार घास या काँटेदार पौधे ही कहीं-कहीं मिलते हैं।

प्रश्न (ख)
पवनें अपघर्षण की क्रिया के दौरान कौन-कौन-सी भू-आकृतियाँ बनाती हैं ? व्याख्या करें।
उत्तर-
पवनों (हवा) का कार्य (Work of Winds)-
मरुस्थल और शुष्क प्रदेशों में वनस्पति और नमी की कमी के कारण हवा अनावरण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। हवा के कार्य यांत्रिक (Mechanical) होते हैं। हवा भी अन्य साधनों के समान अपरदन, ढुलाई और निक्षेप का काम करती है।

अपरदन (Erosion)-

  1. हवा का वेग (Wind Velocity) तेज़ वेग वाली पवनें अधिक मात्रा में अपरदन करती हैं। तेज़ हवा में रेत के कणों की अधिक मात्रा होती है और अधिक कटाव होता है। तेज़ हवा शक्तिशाली होती है और अपरदन अधिक करती है।
  2. रेत के कणों का आकार (Size of Sand Particles)–धरातल के नज़दीक 2 मीटर से 6 मीटर की ऊँचाई तक रेत के कणों की अधिक मात्रा के कारण अधिक कटाव होता है। अधिक ऊँचाई और रेत के कणों की कमी के कारण कम कटाव होता है।
  3. चट्टानों की रचना (Nature of Rocks)—कठोर चट्टानों पर अपरदन कम होता है।
  4. जलवायु (Climate)-शुष्क जलवायु में मौसमीकरण (Weathering) की क्रिया के कारण अधिक कटाव होता है।

कटाव या अपरदन के रूप (Types of Erosion)-

  1. नीचे का कटाव (Under cutting)
  2. नालीदार कटाव (Gully Erosion)
  3. खुरचना (Scratching)
  4. चमकाना (Polishing)

अपरदन (Erosion)-हवा द्वारा कटाव तीन प्रकार से होता है-

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1. अपवाहन (Deflation)-हवा द्वारा रेत के सूक्ष्म और शुष्क कणों को ऊपर उठाने की क्रिया को अपवाहन कहते हैं। (Deflation is the complete blowing away of fine dust.) हवा रेत और बारीक मिट्टी के कणों को हज़ारों किलोमीटर दूर तक ले जाती है। इसमें मिट्टी का कटाव होता है और खड्डे बनते हैं।

खड्डों (Depressions) का बनना-हवा जिस स्थान से रेत उड़ाकर ले जाती है, उस स्थान पर कई बड़े-बड़े खड्डे बन जाते हैं। इन खड्डों में भूमिगत पानी आकर नखलिस्तान बना देता है, जिस प्रकार मिस्र का कतारा खड्डा समुद्र तल से 140 मीटर गहरा है।

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2. टूट-फूट (Attrition)—हवा के धूल-कण एक-दूसरे से टकराकर चूरा-चूरा हो जाते हैं। इस क्रिया को टूट फूट कहते हैं।

3. अपघर्षण (Abrasion)-हवा में रेत के कण हवा के अपरदन के उपकरण (Tools) होते हैं। तेज़ चाल वाली हवा धूल-कणों को शक्ति के साथ चट्टानों से टकराती है। ये कण एक रेगमार (Sand Paper) की तरह कटाव करते हैं। इस घर्षण की क्रिया से नीचे लिखे भू-आकार बनते हैं, जिनका रूप अलग-अलग होता है-

(i) छत्रक कुकुरमुत्ता चट्टान (Mushroom Rocks)-चट्टानों के निचले भाग में चारों तरफ से नीचे का कटाव (Under Cutting) होता है। इस कटाव से एक पतले से आधार-स्तंभ (Pillar) के ऊपर एक छाते के आकार की कठोर चट्टान खड़ी रहती है। चट्टानों के नीचे एक गुफ़ा बन जाती है। इसे छत्र-आकारी (Mushroom) या गारा (Gara) कहते हैं। इन चट्टानों का आकार खंभ के समान होता है। इसलिए इन्हें खुंभ-आकारी चट्टान भी कहते हैं।

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(ii) ज़िऊजन (Zeugen)-ढक्कनदार दवात के आकार के स्थल रूपों को ज़िऊजन कहते हैं। ऊपरी भाग कठोर और कम चौड़ा होता है, पर निचला भाग नरम और अधिक कटाव के कारण अधिक चौड़ा होता है। ज़िऊजन तब बनते हैं, जब कठोर और नरम चट्टानें एक-दूसरे के समानांतर (Horizontal) बिछी होती हैं। कठोर चट्टानी भाग कोमल चट्टानों पर एक टोपी का काम करता है।

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(iii) यारडांग (Yardang) हवा के लगातार एक ही दिशा में कटाव के कारण नुकीली चट्टानों का निर्माण होता है। इन्हें यारडांग कहते हैं। ये लगभग 15 मीटर ऊँची और पसलियों (Ribs) के समान तेज़ ढलान वाली होती हैं। ये भूआकार कठोर और नरम खड़ी चट्टानों (Vertical Rocks) के कारण बनते हैं।

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(iv) पुल और खिड़की (Bridge and Window)-लंबे समय तक कटाव के कारण चट्टानों के बीच बडे-बडे छेद बन जाते हैं। चट्टानों के आर-पार एक महराब (Arch) के आकार का निर्माण होता है, जिन्हें पवन खिड़की या पुल कहते हैं, जैसे-यू०एस०ए० में Hope Window.

(v) इनसलबर्ग (Insellberg)-कठोर चट्टानों के ऊँचे टीलों को इनसलबर्ग कहते हैं। चारों तरफ से कटाव के कारण ये तिरछी और तेज़ ढलान वाले गुबंद आकार के होते हैं। ये ग्रेनाइट (Granite) और जनीस (Geniss)

जैसी कठोर चट्टानों से बने होते हैं। ये रेत के समूह में पहाड़ी द्वीप के समान दिखाई देते हैं। भारत में रायपुर के निकट कूपघाट में ऐसे टीले मिलते हैं।

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प्रश्न (ग)
पवनों की जमा करने की क्रिया का विस्तार सहित वर्णन करें।
उत्तर-
निक्षेप (Deposition)-जब हवा का वेग कम हो जाता है, तो उसे अपना भार कहीं-न-कहीं छोड़ना पड़ता है। इस निक्षेप से रेत के टीले और लोइस प्रदेश बनते हैं।

I. रेत के टीले (Sand Dunes)-जब रेत के मोटे कण टीलों के रूप में जमा हो जाते हैं, तो उन्हें रेत के टीले कहते हैं। (Sand Dunes are hills on wind blown Sand.) इनके बनने के नीचे लिखे क्षेत्र हैं-

  1. रेतीले मरुस्थलों में
  2. रेतीले समुद्री तटों पर
  3. झीलों के तट पर
  4. नदियों के तट पर।

रेत के टीलों के लिए कुछ ज़रूरी शर्ते (Essential Conditions) होती हैं-

  1. रेत की अधिक मात्रा
  2. तेज़ हवा
  3. हवा के मार्ग में रुकावट
  4. उपयुक्त स्थान।

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रेत की टीलों के प्रकार (Types of Sand Dunes)-

1. लंबाकार रेत के टीले (Longitudinal Dunes)-यह प्रचलित हवा की दिशा के समानांतर बनते हैं। ये रेत की लंबी दीवारें होती हैं। इनका आकार लंबी पहाड़ी के समान होता है। इन्हें सहारा मरुस्थल में सीफ़ (Seif) कहते हैं।

2. रेत के आड़े टीले (Transverse Dunes)-यह प्रचलित हवा की दिशा के समकोण पर आर-पार बनते हैं। यह कम गति वाली हवा के लगातार एक ही दिशा में बहने से बनते हैं। इनका आकार अर्द्ध-चंद्र जैसा होता है।

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3. बरखान (Barkhan)-ये अर्द्ध-चंद्र आकार के टीले होते हैं, जिनमें पवनमुखी ढलान उत्तल (Convex) और पवनाविमुखी ढलान अवतल (Concave) होती है। इनका आकार दरांती (Sickle) अथवा दूज के चाँद (Crescent Moon) अथवा धनुष के समान होता है। ये झुंडों या कतारों में मिलते हैं। इनके सिरों को Horns कहते हैं। इनके सिरों पर कम रुकावट होने के कारण ये आगे को बढ़ते रहते हैं। राजस्थान में शाहगढ़ के । निकट बहुत सारे बरखान मिलते हैं। ये रेत के टीले खिसकते रहते हैं और कई शहर रेत के नीचे दब जाते हैं। राजस्थान का मरुस्थल इसी कारण पंजाब की ओर बढ़ता जा रहा है। सहारा मरुस्थल में ये प्रतिवर्ष 30 मीटर आगे की ओर बढ़ जाते हैं और ऐसे प्रदेशों को अरग (Erg) कहते हैं।

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II. लोइस (Loess)-दूर-दूर के स्थानों से उठाकर लाई हुई बारीक मिट्टी के जमाव को लोइस कहते हैं। यह मिट्टी पानी चूस लेती है। पानी के साथ मिट्टी नीचे परतों में बैठ जाती है। यह बहुत उपजाऊ होती है। मरुस्थलों की सीमा पर रेत के बारीक कणों के निक्षेप से लोइस प्रदेश बनते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश चीन के उत्तरपश्चिमी भाग में पीली मिट्टी का लोइस का प्रदेश है, जो लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस प्रदेश में पीली नदी ‘ह्वांग हो’ गहरी घाटियों का निर्माण करती है।

Geography Guide for Class 11 PSEB पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
पवन किसे कहते हैं ?
उत्तर-
गतिशील हवा को पवन कहते हैं।

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प्रश्न 2.
मरुस्थल किस प्रकार के क्षेत्र हैं ?
उत्तर-
जहाँ वार्षिक वर्षा 25 सैंटीमीटर से कम हो।

प्रश्न 3.
किन अक्षांशों में मरुस्थल स्थित हैं ?
उत्तर-
20°–30°.

प्रश्न 4.
पंजाब के किस भाग में अर्द्ध-मरुस्थल हैं ?
उत्तर-
दक्षिण-पश्चिमी भाग।

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प्रश्न 5.
विश्व के सबसे बड़े मरुस्थल का नाम बताएँ।
उत्तर-
अफ्रीका में सहारा।

प्रश्न 6.
विश्व के सबसे शुष्क मरुस्थल का नाम बताएं।
उत्तर-
दक्षिणी अमेरिका में अटाकामा।

प्रश्न 7.
खंड आकार की चट्टानों का एक उदाहरण दें।
उत्तर-
सहारा में।

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प्रश्न 8.
भारत में यारडांग कहाँ मिलते हैं ?
उत्तर-
जैसलमेर (राजस्थान में)।

प्रश्न 9.
खिड़की और पुल का एक उदाहरण दें।
उत्तर-
यू०एस०ए० में रेनबो ब्रिज।

प्रश्न 10.
लोइस के मैदान कहाँ स्थित हैं ?
उत्तर-
चीन के उत्तर-पश्चिमी भाग में।

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अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
पवनों का कार्य किन क्षेत्रों में अधिक होता है ?
उत्तर-
मरुस्थलों में।

प्रश्न 2.
अपवाहन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
हवा द्वारा रेत के सूक्ष्म कणों को ऊपर उठाने की क्रिया को अपवाहन कहते हैं।

प्रश्न 3.
अपवाहन के दो प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
खड्डे बनना और मिट्टी का कटाव।

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प्रश्न 4.
सहघर्षण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
रेत के कणों के आपस में टकराकर चूरा-चूरा होने की क्रिया को सहघर्षण कहते हैं।

प्रश्न 5.
घर्षण क्रिया से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
रेत के कणों द्वारा चट्टानों को रेगमार की तरह घिसाने की क्रिया को घर्षण क्रिया कहते हैं।

प्रश्न 6.
कतारा डुंघान कहाँ है ?
उत्तर-
मिस्र देश में।

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प्रश्न 7.
पवनों के द्वारा अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-

  1. वायु वेग
  2. रेत कणों का आकार
  3. चट्टानों की रचना
  4. जलवायु।

प्रश्न 8.
छत्रक/खुंभ (कुकुरमुत्ता) चट्टानें क्या होती हैं ?
उत्तर-
चट्टानों के निचले कटाव के कारण, एक पतले स्तंभ के ऊपर छाते के आकार की कठोर चट्टानों को छत्रक/ खुंभ चट्टानें कहते हैं।

प्रश्न 9.
ज़िऊजन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
ढक्कनदार दवात के आकार के स्थल रूपों को ज़िऊजन कहते हैं।

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प्रश्न 10.
यारडांग से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नर्म चट्टानों के ऊपर कठोर चट्टानों की नुकीली चट्टानों को यारडांग कहते हैं।

प्रश्न 11.
इनसलबर्ग से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
गुंबद आकार की कठोर चट्टानों के टीलों को इनसलबर्ग कहते हैं।

प्रश्न 12.
बरखान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
ये अर्द्ध-चंद्र के आकार के रेत के टीले हैं, जिनमें पवनमुखी ढलान उत्तल (Convex) होती है और पवनाविमुखी ढलान अवतल (Concave) होती है।

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प्रश्न 13.
लोइस से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बारीक रेत के कणों के निक्षेप को लोइस प्रदेश कहते हैं, जैसे-चीन के उत्तर-पश्चिमी भाग में।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
हवा का अपरदन किन कारकों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-
1. हवा का वेग (Wind Velocity) तेज़ वेग वाली पवनें अधिक मात्रा में अपरदन करती हैं। तेज़ हवा में रेत के कणों की मात्रा अधिक होती है और कटाव भी अधिक होता है। तेज़ हवा अधिक शक्तिशाली होती है और अपरदन भी अधिक करती है।

2. रेत के कणों का आकार (Size of Sand Particles)–धरातल के निकट 2 मीटर से 6 मीटर की ऊँचाई तक रेत के कणों की अधिक मात्रा के कारण कटाव अधिक होता है। अधिक ऊँचाई पर रेत के कणों की कमी के कारण कटाव कम होता है।

3. चट्टानों की रचना (Nature of Rocks) कठोर चट्टानों पर अपरदन कम होता है।

4. जलवायु (Climate)-शुष्क जलवायु में मौसमीकरण (Weathering) की क्रिया के कारण कटाव अधिक होता है।

प्रश्न 2.
बरखान क्या होते हैं ?
उत्तर-
बरखान अर्द्ध-चंद्र के आकार के टीले होते हैं, जिनमें पवनामुखी ढलान उत्तल (Convex) और पवनाविमुखी ढलान अवतल (Concave) होती है। इनका आकार दरांती (Sickle) या दूज के चाँद (Crescent Moon) या धनुष के समान होता है। ये झुंडों या कतारों में मिलते हैं। इनके सिरों को Horns कहते हैं। इनके सिरों पर रुकावट होने के कारण ये आगे को बढ़ते रहते हैं। राजस्थान में शाहगढ़ के निकट बहुत से बरखान मिलते हैं।

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प्रश्न 3.
लोइस से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
लोइस (Loess)-दूर-दूर के स्थानों से उठाकर लाई हुई बारीक मिट्टी के जमाव को लोइस कहते हैं। यह मिट्टी पानी चूस लेती है। पानी के साथ मिट्टी नीचे परतों में बैठ जाती है। यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है। मरुस्थलों की सीमा पर रेत के बारीक कणों के निक्षेप से लोइस प्रदेश बनते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश चीन के उत्तर-पश्चिमी भाग में पीली मिट्टी का लोइस प्रदेश है, जो लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस प्रदेश में पीली नदी ‘ह्वांग हो’ गहरी घाटियों का निर्माण करती है।

प्रश्न 4.
हवा और नदी के कार्य की तुलना करें।
उत्तर
हवा का कार्य-

  1. हवा का कार्य मरुस्थल प्रदेशों में महत्त्वपूर्ण होता है।
  2. हवा अपने मलबे को दूर-दूर के प्रदेशों तक उड़ाकर ले जाती है।
  3. हवा का काम हवा की गति पर निर्भर करता है।
  4. हवा का मलबा कम होता है और काम कम गति से होता है।

नदी का कार्य-

  1. नदी का कार्य नमी वाले प्रदेशों में महत्त्वपूर्ण होता है।
  2. नदी का काम अपनी घाटी तक ही सीमित होता है।
  3. नदी का काम धरातल की ढलान पर निर्भर करता है।
  4. नदी का मलबा अधिक होता है और काम तेज़ गति से होता है।

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प्रश्न 5.
रेत के लंबाकार टीलों और आड़े टीलों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-
लंबाकार टीले-

  1. ये अर्द्ध-चंद्र के आकार के होते हैं।
  2. ये बहने वाली पवनों की दिशा के समानांतर बनते हैं।
  3. ये 100 मीटर तक ऊँचे होते हैं।
  4. ये तलवार के आकार के होते हैं और इन्हें सीफ भी कहा जाता है।

आड़े टील-

  1. ये रेत की लंबी दीवारों के समान होते हैं।
  2. ये बहने वाली पवनों की दिशा के समकोण पर बनते हैं।
  3. ये 50 मीटर तक ऊँचे होते हैं।
  4. ये लहरों के आकार के समान ऊँचे-नीचे होते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न । (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
मरुस्थलों के भिन्न-भिन्न प्रकार बताएँ।
उत्तर-
पवनों की क्रिया (खुरचना, जमा करना) से मरुस्थल के निर्माण भी तीन प्रकार के हो सकते हैं-
1. रेतीले मरुस्थल (Sandy Deserts)—ऐसे मरुस्थल, जिनमें अधिकतर रेत ही मिलती है, वहाँ रेत के कणों __ को बड़ी आसानी से पवनें, अपने साथ उड़ाकर ले जाती हैं। इन्हें सहारा में अरग (Ergs), तुरकमेनिस्तान में काउन (Koun) कहा जाता है। सऊदी अरब में सबसे बड़ा अरग, खली (Khalli) नामक स्थान पर है, जिसका आकार 5 लाख 60 हज़ार वर्ग किलोमीटर है।

2. पथरीला मरुस्थल (Stony Deserts)—ऐसे मरुस्थल, जोकि बजरी, पत्थर आदि के टुकड़े, कंकड़ आदि से बने होते हैं, पथरीले मरुस्थल कहलाते हैं। एलजीरिया का रैग (Reg) इसका उपयुक्त उदाहरण है।

3. चट्टानी मरुस्थल (Rocky Deserts)-ऐसे बंजर क्षेत्र, जिनकी ऊपरी नर्म परतें घिसकर बिल्कुल समाप्त हो गई हों और केवल चट्टानी टीले या बंजर क्षेत्र ही हों, ऐसे क्षेत्रों को चट्टानी मरुस्थल कहते हैं। जैसे-हमादा बंजर (Hammada-Barren), सहारा मरुस्थल में ऐसे क्षेत्रों को हमादा कहते हैं।

विश्व का सबसे बड़ा मरुस्थल सहारा मरुस्थल है। यह अफ्रीका में है। थार मरुस्थल, जो कि भारत में स्थित (राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, दक्षिणी-पश्चिमी पंजाब और पाकिस्तान, पंजाब के सिंध) एक गर्म मरुस्थल है। जबकि मध्य एशिया (Central Asia) में ठंडे मरुस्थल भी हैं। ऐटाकॉमा जो कि दक्षिणी अमेरिका में संसार का सबसे शुष्क मरुस्थल है, में वार्षिक वर्षा एक मिलीमीटर से भी कम है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(iii) पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न 2.
पवनों के अपरदन कार्यों के प्रकार बताएँ। अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक भी बताएँ।
उत्तर-
पवनों का अपरदन कार्य (Erosional Work of Wind)-
वनस्पति से रहित शुष्क प्रदेशों में ताप-अंतर के कारण चट्टानें टूटकर छोटे-छोटे कणों में बदल जाती हैं। पवन इन कणों को अपने साथ उड़ाकर ले जाती है। ये कण काट-छाँट में पवन की सहायता करते हैं, इसलिए इन्हें पवन की कटाई के उपकरण (Cutting tools of wind) कहा जाता है।
पवन अपरदन के प्रकार (Types of Wind Erosion)-पवन रेत और धूल-कणों की सहायता से अपना अपरदन कार्य करती है। यह मुख्य रूप में भौतिक अपरदन करती है। पवन द्वारा अपरदन नीचे लिखे तीन प्रकार से होता है-

  • घर्षण (Abrasion)-शुष्क प्रदेशों में पवन रेत को उड़ाकर दूर ले जाती है। इस रेत के कण पवन की अपरदन क्रिया के उपकरण के रूप में चट्टानों पर आक्रमण करते हैं जिससे चट्टानें घिसती हैं। इस क्रिया को घर्षण कहते हैं।
  • सह-घर्षण (Attrition)—जब उड़ते हुए धूलकण आपसी कटाव के कारण छोटे और मुलायम हो जाते हैं, तो उस क्रिया को सह-घर्षण कहते हैं।
  • अपवाहन (Deflation)-पवन द्वारा धूल-कणों को उड़ाकर बहुत दूर ले जाने की क्रिया को अपवाहन कहा जाता है।

पवन अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors Controlling Wind Erosion)-

पवन अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक नीचे लिखे हैं-

1. पवन वेग (Wind Velocity)-तीव्र पवनों से अधिक अपरदन होता है क्योंकि इसमें बड़े-बड़े धूल-कण भी उड़ते हैं। फलस्वरूप ये धूल-कण चट्टानों पर ज़ोर से हमला करके उन्हें घिसा देते हैं।

2. धूल कणों का आकार और ऊँचाई (Size of Sand Grains and Height)-धूल-कणों के आकार और ऊँचाई का भी अपरदन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। छोटे WIND आकार के धूल-कण वायु में अधिक ऊँचाई पर उड़ते हैं, परंतु बड़े-बड़े कण धरातल के निकट ही प्रवाहित होते हैं। इसलिए धरातल के निकट (2 मीटर से 6 मीटर तक) वायु अपरदन सबसे अधिक होता है और ऊँचाई के साथ यह क्रिया क्रमबद्ध कम होती जाती है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(iii) पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य 10

3. चट्टानों की कठोरता (Solidity of Rocks) नर्म चट्टानें कठोर चट्टानों की तुलना में जल्दी घिसती हैं।
4. जलवायु (Climate)-शुष्क जलवायु में मौसमीकरण की क्रिया से अधिक अपरदन होता है।

कटाव तथा अपरदन के रूप (Types of Erosion)-

  1. नीचे का कटाव (Under Cutting)
  2. नालीदार कटाव (Gully Erosion)
  3. खुरचना (Scratching)
  4. चमकाना (Polishing)

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(iii) पवनों के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न 3.
पवनों की परिवहन क्रिया की प्रमुख विशेषताएँ और कार्य बताएँ।
उत्तर-
प्रमुख विशेषताएँ-

  1. पवनों के द्वारा परिवहन किसी भी दिशा में हो सकता है।
  2. यह कार्य भूतल के निकट कम ऊँचाई तक सीमित होता है।
  3. पवनों द्वारा परिवहन दूर-दूर तक होता है।
  4. पवनों के द्वारा बारीक धूल-कण दूर-दूर तक प्रवाहित होते हैं, परंतु भारी कण लटकते रहते हैं।

पवनों द्वारा सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोना (Transportation by Wind)
पवनें चट्टानों के छोटे-छोटे टुकड़े, मिट्टी, कंकड़ आदि दरिया और ग्लेशियर की तरह ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेकर जाती हैं, पर पवनों का यह कार्य नदियों की तरह इतना प्रभावशाली नहीं होता। मरुस्थलों में यह क्रिया देखी जा सकती है। पवनें कई प्रकार से यह कार्य करती हैं-
1. पवन की गति जितनी अधिक होगी, उतना ही अधिक सामान उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेकर जा सकेगी।

2. जब पवन धीरे चलती है, तो अपने साथ कई छोटे-छोटे रेत के कण उड़ाकर ले जाती है, पर जब तेज़ चलती है, तो बिजली के खंभे, पेड़ आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। कई बार चट्टानों के बड़े टुकड़े भी पवनों के साथ-साथ सरकते रहते हैं। भारी होने के कारण वे उड़ नहीं सकते।

3. उदाहरण के लिए, एक मिट्टी का तूफान (Dust storm) जिसका व्यास 500 कि०मी० है, 10 करोड़ (100 मिलीयन) टन तक मिट्टी उठा सकता है और 30 मीटर ऊँची और 3 किलोमीटर आधार की चौड़ी पहाड़ी बना सकता है। थार मरुस्थल में जब तेज़ आंधी चलती है, तो हमें तीन फुट की दूरी से भी नज़र नहीं आता। इससे पता चलता है कि पवन के साथ उठाया सामान देखने के मार्ग में रुकावट बनता है। पवन में मिट्टी के कण, कंकड़, पत्थर आपस में रगड़ खाने के कारण आकार में छोटे हो जाते हैं। जब पवन की गति कम हो जाती है, तो यह इस सामान को जमा करने का कार्य शुरू कर देती है।

रेत के टीलों का खिसकना (Shifting of Sand dunes)-पवन की दिशा निश्चित नहीं होती, इसलिए रेत के टीले पवनों की दिशा के परिवर्तन के अनुसार खिसकते रहते हैं। इसलिए, ये स्थिर नहीं होते। पवन जिस दिशा की ओर चलती है, बालू के टीले भी इसके साथ खिसक जाते हैं। आगे बढ़ते रेत के टीले उपजाऊ मैदानों को बहुत क्षति पहुंचाते हैं। जल्दी उगने वाले और लंबी जड़ों वाले पेड़ों को ऐसे मरुस्थलीय क्षेत्रों में लगाया जाता है, ताकि इन टीलों को आगे बढ़ने से रोका जा सके। यह 5 से 30 मीटर वार्षिक दर से आगे खिसक सकते हैं।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 6 खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 6 खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science Geography Chapter 6 खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन

SST Guide for Class 10 PSEB खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए

प्रश्न 1.
प्रमुख खनिजों के नाम बताइए।
उत्तर-
भारत में पाए जाने वाले प्रमुख खनिज हैं-लोहा, मैंगनीज़, कोयला, चूने का पत्थर, बॉक्साइट तथा अभ्रक।

प्रश्न 2.
मैंगनीज़ खनिज का उपयोग किस कार्य के लिए होता है?
उत्तर-
मैंगनीज़ का उपयोग इस्पात बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 3.
मैंगनीज़ अयस्क उत्पादन में भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
उत्तर-
मैंगनीज़ अयस्क उत्पादन में भारत का विश्व में चौथा स्थान है।

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प्रश्न 4.
अभ्रक उत्पादन में भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
उत्तर-
अभ्रक उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है।

प्रश्न 5.
कुल अभ्रक उत्पादन का आधे से अधिक भाग उत्पादन करने वाले राज्य का नाम बताओ।
उत्तर-
बिहार तथा झारखण्ड।

प्रश्न 6.
अभ्रक का उपयोग किस उद्योग में किया जाता है?
उत्तर-
अभ्रक का उपयोग बिजली उद्योग में किया जाता है।

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प्रश्न 7.
बॉक्साइट अयस्क से किस धातु को निकाला जाता है?
उत्तर-
बॉक्साइट अयस्क से एल्यूमीनियम धातु को निकाला जाता है।

प्रश्न 8.
तांबा धातु किन-किन कामों में उपयोग किया जाता है?
उत्तर-
तांबा घरेलू बर्तन बनाने, शो पीस बनाने तथा बिजली उद्योग में प्रयोग होता है।

प्रश्न 9.
सोना उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र कहां और किस राज्य में है?
उत्तर-
सोना उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र कोलार है जो कर्नाटक राज्य में स्थित है।

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प्रश्न 10.
चूने के पत्थर का उपयोग किस उद्योग में सबसे अधिक होता है?
उत्तर-
चूने के पत्थर का सबसे अधिक उपयोग सीमेंट उद्योग में होता है।

प्रश्न 11.
कोयला उत्पादन में भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
उत्तर-
चीन और संयुक्त राज्य के बाद कोयला उत्पादन में भारत का विश्व में तीसरा स्थान है।

प्रश्न 12.
दामोदर घाटी में देश के कल संचित भण्डार का कितना हिस्सा कोयला पाया जाता है?
उत्तर-
दामोदर घाटी में देश के कुल संचित भण्डार का तीन-चौथाई भाग कोयला पाया जाता है।

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प्रश्न 13.
कोयला उत्पादन के प्रबन्ध एवं प्रशासन का कार्य देश की किस संस्था के हाथ में है?
उत्तर-
कोल इण्डिया लिमिटेड (CIL) के हाथ में।

प्रश्न 14.
परमाणु ऊर्जा के चार प्रमुख केन्द्र कहां-कहां स्थित हैं?
उत्तर-
(i) तारापुर-महाराष्ट्र-गुजरात की सीमा पर
(ii) रावतभाटा-राजस्थान में कोटा के पास
(iii) कलपक्कम तमिलनाडु
(iv) नैरोरा-उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के पास।

प्रश्न 15.
पवन ऊर्जा किसे कहते हैं?
उत्तर-
पवन की शक्ति से प्राप्त ऊर्जा को पवन ऊर्जा कहते हैं।

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प्रश्न 16.
बैलाडीला खानों से किस खनिज पदार्थ का खनन किया जाता है?
उत्तर-
बैलाडीला में लोहे का खनन किया जाता है।

प्रश्न 17.
कोलार खानों से कौन-सा खनिज निकाला जाता है?
उत्तर-
कोलार खानों से सोना निकाला जाता है।

प्रश्न 18.
लिग्नाइट को किस अन्य नाम से भी पुकारा जाता है?
उत्तर-
लिग्नाइट को ‘भृरा कोयला’ कह कर भी पुकारा जाता है।

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प्रश्न 19.
सागर सम्राट नाम के जलपोत से क्या काम लिया जाता है?
उत्तर-
जापान द्वारा निर्मित सागर सम्राट नामक जलपोत से सागरीय क्षेत्र में तेल खोजने का काम लिया जाता है।

प्रश्न 20.
यूरेनियम धातु किस प्रकार की ऊर्जा बनाने के काम आती है?
उत्तर-
यूरेनियम धातु परमाणु ऊर्जा बनाने के काम आती है।

II. निम्न प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
खनिजों का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है?
उत्तर-
खनिजों का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बड़ा महत्त्व है। निम्नलिखित तथ्यों से यह बात स्पष्ट हो जाएगी

  1. देश का औद्योगिक विकास मुख्य रूप से खनिजों पर निर्भर करता है। लोहा और कोयला मशीनी युग का आधार हैं। हमारे यहां संसार के लौह-अयस्क के एक-चौथाई भण्डार हैं। भारत में कोयले के भी विशाल भण्डार पाये जाते हैं।
  2. खनन कार्यों से राज्य सरकारों की आय में वृद्धि होती है और लाखों लोगों को रोजगार मिलता है।
  3. कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि खनिज ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।
  4. खनिजों से तैयार उपकरण कृषि की उन्नति में सहायक हैं।

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प्रश्न 2.
भारत में मैंगनीज़ उत्पादन के प्रमुख राज्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
भारत में उड़ीसा सबसे बड़ा मैंगनीज़ उत्पादक राज्य है। इसके पश्चात् मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक का स्थान है। आन्ध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात और बिहार राज्यों में भी मैंगनीज़ का उत्पादन होता है।
उड़ीसा में मैंगनीज़ की प्रमुख खानें क्योंझर, कालाहांडी तथा मयूरभंज में हैं। मध्य प्रदेश में इस खनिज की खाने बालाघाट, छिंदवाड़ा, जबलपुर आदि में हैं।

प्रश्न 3.
बॉक्साइट उत्पादन के प्रमुख क्षेत्रों के नाम बताओ।
उत्तर-
भारत के अनेक क्षेत्रों में बॉक्साइट के निक्षेप पाए जाते हैं। झारखण्ड, गुजरात तथा छत्तीसगढ़ बॉक्साइट के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में भी इसके उत्तम कोटि के भण्डार हैं। विगत कुछ वर्षों में उड़ीसा के बॉक्साइट निक्षेपों का विकास किया गया है। यहां अल्यूमीना तथा एल्यूमीनियम बनाने के लिए एशिया का सबसे बड़ा कारखाना लगाया गया है।

प्रश्न 4.
तांबा उत्पादक क्षेत्रों के नाम बताओ।
उत्तर-
आजकल देश का अधिकांश तांबा झारखण्ड के सिंहभूम, मध्य प्रदेश के बालाघाट और राजस्थान के झुंझनु एवं अलवर जिलों से निकाला जाता है। आन्ध्र प्रदेश के खम्मम, कर्नाटक के चित्रदुर्ग और हसन जिलों तथा सिक्किम में भी थोड़े बहुत तांबे का उत्पादन किया जाता है।

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प्रश्न 5.
पंजाब में खनिज पदार्थों के नहीं मिलने के क्या कारण हैं?
उत्तर-
पंजाब का अधिकांश भाग नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से बना है। हम पंजाब के मैदानों को नवीनतम युग की कांप मिट्टियों के समतल मैदान भी कह सकते हैं। यह मैदान कृषि के लिए बहुत उपजाऊ हैं। खनिज सम्पदा अधिकांशतः भू-इतिहास के प्राचीन काल में निर्मित आग्नेय या कायांतरित शैलों वाले भागों में मिलती है। अतः कांप मिट्टियों से बने पंजाब का खनिज उत्पादन में प्रमुख स्थान नहीं है।

प्रश्न 6.
कोयला उत्पादन के प्रमुख क्षेत्रों के नाम बताओ।
उत्तर-
भारत में कोयले के तीन-चौथाई भण्डार दामोदर नदी घाटी में स्थित हैं। रानीगंज, झरिया, गिरीडीह, बोकारो तथा करनपुरा कोयले के प्रमुख क्षेत्र हैं। ये सभी पश्चिम बंगाल तथा झारखण्ड राज्यों में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ के सिंगरोली, सोहागपुर तथा रायगढ़ में कोयला निकाला जाता है। इसके साथ-साथ उड़ीसा के तालचेर तथा महाराष्ट्र के चांदा जिले में भी कोयले के विशाल क्षेत्र हैं।

प्रश्न 7.
उड़ीसा में कोयला उत्पादन के प्रमुख केन्द्रों के नाम बताओ।
उत्तर-
देवगढ़ तथा तालचेर।

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प्रश्न 8.
कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण करने के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण करने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. श्रमिकों को शोषण से बचाना।
  2. खनन कार्य को योजनाबद्ध तरीके से करना।
  3. खनन किये गये क्षेत्रों में पर्यावरण को बनाये रखना।

प्रश्न 9.
ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्त्रोतों के नाम बताइए।
उत्तर-
ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोतों के नाम निम्नलिखित हैं

  1. सौर ऊर्जा,
  2. पवन ऊर्जा,
  3. ज्वारीय ऊर्जा,
  4. भूतापीय ऊर्जा,
  5. ऊर्जा के लिए वृक्षारोपण,
  6. शहरी कचरे से प्राप्त ऊर्जा,
  7. जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा।
    ऊर्जा के परम्परागत साधन अक्षय भी हैं और कम खर्चीले भी हैं।

प्रश्न 10.
पवन ऊर्जा के महत्त्व एवं भारत में उपयोग को बताइए।
उत्तर-
पवन ऊर्जा अक्षय है और इसके प्रयोग में खर्चा भी कम बैठता है। दूसरे, दूर स्थित मरुस्थलीय स्थानों पर पवन ऊर्जा के बल परं नये उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं।
भारत में उपयोग

  1. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई का काम लिया जा रहा है।
  2. पवन केन्द्र बना कर बिजली प्राप्त की जा रही है और यहां से उत्पन्न बिजली को ग्रिड प्रणाली में शामिल कर लिया जाता है।

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प्रश्न 11.
खनन उद्योग में भारत सरकार की भूमिका क्या है?
उत्तर-
खनन उद्योग में भारत सरकार दिशा निर्देश का काम करती है। इसके लिए केन्द्रीय सरकार खनन एवं खनिज एक्ट 1957 के अनुसार काम करती है। इस कानून के अनुसार भारत सरकार खनिजों के विकास के लिए दिशा निर्देशन कानून बनाती है। इसके लिए भारत सरकार.

  1. गौण खनिज को छोड़ सभी खनिजों के दोहन के लिए लाइसेंस और ठेके देती है।
  2. खनिजों के संरक्षण एवं विकास के लिए पग उठाती है।
  3. पुराने दिए गए ठेकों में समय-समय पर परिवर्तन करती है।

प्रश्न 12.
मध्य प्रदेश के किन-किन जिलों में लौह-अयस्क का खनन होता है?
उत्तर-
मध्य प्रदेश में जबलपुर तथा बालाघाट जिलों में लौह-अयस्क का खनन होता है।

प्रश्न 13.
देश के उन सरकारी उपक्रमों के नाम बताइए, जो आजादी के बाद तेल खोज, शोधन एवं वितरण के कार्य में संलग्न हैं।
उत्तर-
आजादी के बाद तेल की खोज में तेजी लाने तथा वितरण के लिए विशेष उपक्रमों का संगठन किया गया है। ये हैं

  1. तेल एवं प्राकृतिक गैस कमीशन (ONGC),
  2. भारतीय तेल लिमिटेड (IOL),
  3. हिन्दुस्तान पेट्रोलियम निगम (HPC) तथा
  4. भारतीय गैस प्राधिकरण लिमिटेड (GAIL)

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प्रश्न 14.
सौर ऊर्जा को भविष्य की ऊर्जा का स्रोत क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
कोयला और खनिज तेल समाप्त होने वाले साधन हैं। एक दिन ऐसा आएगा जब विश्व के लोगों को इनसे पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिलेगी। इनके भण्डार समाप्त हो चुके होंगे। इनके विपरीत सूर्य ऊर्जा कभी न समाप्त होने वाला साधन है। इससे विपुल मात्रा में ऊर्जा मिलती है। जब कोयले और खनिज तेल के भण्डार समाप्त हो जाएंगे तब सौर बिजली घरों से शक्ति प्राप्त होगी और हम अपने घरेलू कार्य सौर संयन्त्रों से सुगमता से कर लेंगे।

प्रश्न 15.
प्राकृतिक गैस का उर्वरक उद्योग में क्या महत्त्व है?
उत्तर-
प्राकृतिक गैस पैट्रो-रसायन उद्योग के लिए कच्चा माल है। यह भारतीय कृषि का उत्पादन बढ़ाने में भी सहायक है। अब प्राकृतिक गैस से उर्वरक बनाए जाने लगे हैं। प्राकृतिक गैस पाइप लाइनों द्वारा उर्वरक बनाने वाले कारखानों तक भेजी जाती है। हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर गैस पाइप लाइन 1730 किलोमीटर लम्बी है जिसके द्वारा उर्वरक बनाने वाले 6 कारखानों को गैस पहुंचाई जाती है।

प्रश्न 16.
देश में विद्युत् शक्ति के वितरण की प्रमुख समस्याएं क्या हैं ?
उत्तर-
देश में विद्युत् शक्ति के क्षेत्रीय वितरण की प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित हैं

  1. विद्युत् उत्पादन केन्द्र विद्युत् खपत केन्द्रों से बहुत दूर स्थित होते हैं। ग्रिड प्रणाली तक पहुंचने में भी तारों का जाल बिछाना पड़ता है जिसमें धन का भी अधिक व्यय होता है।
  2. दूर स्थित होने के कारण बिजली का आंशिक भाग व्यर्थ चला जाता है।
  3. कभी-कभी ग्रिड प्रणाली में दोष आ जाता है जिसके कारण सारी वितरण प्रणाली ठप्प पड़ जाती है।

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प्रश्न 17.
देश में खनिज सम्पदा की उपलब्धि एवं महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारत खनिज संसाधनों में काफ़ी सम्पन्न है।

  1. यह लौह संसाधनों में विशेष रूप से सम्पन्न है। एक अनुमान के अनुसार भारत में संसार के लौह-अयस्क के एक-चौथाई भण्डार हैं।
  2. भारत में मैंगनीज़ के भी विशाल भण्डार हैं। यह खनिज मिश्र इस्पात बनाने में बहुत उपयोगी है।
  3. भारत में कोयले के भी बड़े भण्डार हैं। परन्तु दुर्भाग्य से हमारे कोयले के ऐसे भण्डार कम हैं, जिनसे ‘कोक’ बनाया जाता है।
  4. चूने का पत्थर भी देश में भारी मात्रा में व्यापक रूप से पाया जाता है।
  5. भारत बॉक्साइट और अभ्रक में भी सम्पन्न है।

महत्त्व-

  1. खनिज सम्पदा उद्योगों का आधार है। अतः देश का औद्योगिक विकास हमारी खनिज सम्पदा पर ही निर्भर करता है।
  2. खनिजों के खनन से देश के धन में वृद्धि होती है, लोगों को रोजगार मिलता है और उनका जीवन-स्तर उन्नत होता है।

प्रश्न 18.
लौह धातु के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
हमारे देश के कई क्षेत्रों में लौह-अयस्क के विशाल भण्डार पाये जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में 17 अरब 57 करोड़ टन लौह-अयस्क के भण्डार हैं। यह मुख्य रूप से झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग तथा बिहार के शाहाबाद जिलों में पाये जाते हैं। मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा में भी लौह-अयस्क के बड़े क्षेत्र हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में पाया जाने वाला लौह-अयस्क जापान आदि देशों को निर्यात किया जाता है। कुछ लौह-अयस्क आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा कर्नाटक में भी पाया जाता है। वैसे तो गोआ में भी लौह-अयस्क के भण्डार हैं, परन्तु यह अच्छी किस्म का नहीं है।

प्रश्न 19.
आजादी के बाद खनिज तेल की खोज एवं उत्पादन के लिए किये गये प्रयासों का वर्णन करो।
उत्तर-
स्वतन्त्रता के पश्चात् देश में खनिज तेल की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए नये तेल क्षेत्रों की खोज का कार्य आरम्भ किया गया। गुजरात के मैदानों तथा खम्बात की खाड़ी के अपतट क्षेत्रों में खनिज तेल और प्राकृतिक गैस की खोज की गई। मुम्बई तट से 115 किलोमीटर दूर समुद्र से भी तेल निकाला गया। इस समय यह भारत का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। इस तेल क्षेत्र को “बॉम्बे हाई” के नाम से जाना जाता है। खनिज तेल के नये भण्डारों की खोज समुद्र के अपतट क्षेत्रों में हुई है। ये क्षेत्र गोदावरी, कृष्णा, कावेरी तथा महानदी के डेल्टाई तटों के पास गहरे सागर में फैले हुए हैं। असम में भी तेल के कुछ नये भण्डारों का पता लगाया गया है।

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प्रश्न 20.
आजादी के बाद ग्रामीण विद्युतीकरण में हुए विकास का वर्णन करो।
उत्तर-
आज़ादी के पश्चात् ग्रामीण क्षेत्रों के विद्युतीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया गया। ग्रामीण विद्युतीकरण की योजनाएं राज्य सरकारों और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम दोनों द्वारा मिलकर चलायी जाती हैं। वर्ष 2000 तक 5 लाख परमाणु ऊर्जा से सम्पन्न कुछ देश चाहते हैं कि भारत अपने परमाणु कार्यक्रम को न चलाए। इस कारण वे भारत के परमाणु कार्यक्रम को अन्तर्राष्ट्रीय निगरानी में लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि भारत से इस सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि पर हस्ताक्षर कराया आए। परन्तु भारत का सदा यह मत रहा है कि यह सन्धि भेदभावपूर्ण है। भारत परमाणु ऊर्जा का उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों के लिए करना चाहता है, न कि विनाशकारी कार्यों के लिए।

III. निम्न प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
कोयला उत्पादन का विस्तार से वर्णन करते हुए प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
कोयला औद्योगिक ऊर्जा का प्रमुख साधन है। लोहा तथा इस्पात एवम् रसायन उद्योगों के लिए कोयले का बड़ा महत्त्व है। हमारे देश में कोयले के काफ़ी बड़े भण्डार हैं। इसके तीन चौथाई भण्डार दामोदर नदी की घाटी में स्थित हैं। आन्ध्र सीमांध्र तथा महाराष्ट्र में भी कोयला क्षेत्र विद्यमान हैं। कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण-स्वतन्त्रता के पश्चात् हमारी सरकार ने सभी कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया है। राष्ट्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य कोयले की खानों में काम करने वाले श्रमिकों को शोषण से बचाना है।
कोयले का महत्त्व-भारत में पाया जाने वाला निम्न कोटि का कोयला हमारे लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। यह कोयला विद्युत् तथा गैस के उत्पादन में बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ है। इससे खनिज तेल भी प्राप्त किया जा सकता है। हमारे छोटेबड़े ताप बिजली-घर इन्हीं कोयला क्षेत्रों में स्थापित किए गए हैं। इन बिजली-घरों से जो बिजली प्राप्त होती है, उसे विशाल प्रादेशिक ग्रिड व्यवस्था में भेज दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप समय और व्यय दोनों की बचत होती है। – कोयले का उत्पादन-सन् 1951 में हमारे देश में कोयले का उत्पादन केवल 3.5 करोड़ टन था। परन्तु 2002-03 में यह बढ़कर 34:12 करोड़ टन हो गया।
समस्याएँ-

  1. भारत में बढ़िया प्रकार का कोयला नहीं मिलता।
  2. कोयला खानों में आग की घटनाओं से अनेक श्रमिक मारे जाते हैं।
  3. कोयले की खानें काफ़ी गहरी हैं। अत: कोयले का उत्पादन काफ़ी महंगा पड़ रहा है।
  4. भारत में कोयला-उत्पादन की तकनीक के आधुनिकीकरण की गति बड़ी धीमी है।

प्रश्न 2.
ताप एवं परमाणु शक्ति के विस्तार पर भारत में हुई प्रगति का वर्णन करो।
उत्तर-
कोयले, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस द्वारा ताप-बिजली घरों में ताप-बिजली (Thermal Power) उत्पन्न की जाती है। ताप-बिजली उत्पादन करने वाले इन खनिज संसाधनों को जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) कहा जाता है। यह इनकी सबसे बड़ी कमी या दोष है कि इन्हें एक बार से अधिक उपयोग नहीं किया जा सकता। कोयले, पेट्रोलियम व गैस के अतिरिक्त परमाणु ईंधन (Atomic Fuel) या भारी जल (Heavy Water) से भी विद्युत् उत्पन्न की जाती है। जल-विद्युत् (Hydel Power) ऊर्जा का स्वच्छ साधन है। इस तरह जल शक्ति से बनने वाली विद्युत् को जल-विद्युत (Hydel Power), कोयले, पेट्रोलियम व गैस की मदद से बनने वाली विद्युत् को तापीयविद्युत् (Thermal Power) तथा परमाणु ईंधन या भारी-जल से बनने वाली विद्युत् को परमाणु-शक्ति (Atomic Power) कहते हैं। विद्युत् शक्ति का हमारी कृषि, उद्योगों, परिवहन तथा घरेलू कार्यों में बहुत अधिक उपयोग होता है। इस प्रकार से बिना विद्युत् शक्ति के आधुनिक जीवन की कल्पना ही लगभग असम्भव है।

वर्ष 2002-03 में इन तीनों प्रमुख स्रोतों से कुल विद्युत् उत्पादन 534.30 अरब यूनिट था। इसमें से लगभग तीनचौथाई भाग ताप-बिजली घरों में उत्पादन किया गया। बाकी 23.5 प्रतिशत जल-विद्युत् घरों में तथा शेष 1.60 प्रतिशत परमाणु-शक्ति से उत्पन्न किया गया। समय के साथ-साथ ताप-बिजली का भाग बड़ी तेजी से बढ़ा है। देश में विद्युत् की संस्थापित क्षमता (Installed Capacity) 1994-95 तक 81.8 हजार मेगावाट थी। परन्तु 2002-03 के अंत तक यह क्षमता बढ़ कर 10.80 लाख मेगावाट हो गई।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 6 खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन

प्रश्न 3.
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों के विकास एवं महत्त्व पर विस्तार से लिखें।
उत्तर-
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू-हाीय ऊर्जा, जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा आदि सम्मिलित हैं।
विकास-ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोतों के प्रयोग को बढ़ाने पर हाल के वर्षों में अत्यधिक बल दिया जा रहा है। इस ऊर्जा का वनारोपण, पर्यावरण सुधार, ऊर्जा संरक्षण, रोजगार वृद्धि, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सुधार, सामाजिक कल्याण, खेतों में सिंचाई, जैविक खाद उत्पादन आदि क्षेत्रों में विशेष योगदान है। मार्च, 1981 में केन्द्र सरकार ने एक उच्च अधिकार प्राप्त आयोग की स्थापना की थी ताकि अतिरिक्त ऊर्जा स्रोतों का पता लगाया जा सके। 1982 में गैर-परम्परागत ऊर्जा साधनों का विभाग, ऊर्जा मन्त्रालय में स्थापित किया गया। अब गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के लिए अलग से एक मन्त्रालय स्थापित कर दिया गया है। राज्य सरकारों ने भी अपने यहां गैर-परम्परागत ऊर्जा साधनों के लिए अलग से एजेन्सी स्थापित की हुई है। स्थानीय लोगों की भागीदारी से स्थानीय स्तर पर खाना पकाने की गैस, लघु सिंचाई योजना, पीने का पानी तथा सड़कों पर रोशनी की व्यवस्था के कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
पवन ऊर्जा से ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था में सहायता मिली है। कई स्थानों पर पवन केन्द्र कार्य कर रहे हैं। यहां से उत्पन्न बिजली को ग्रिड प्रणाली में शामिल कर लिया गया है।
भू-तापीय ऊर्जा-भारत में भू-तापीय ऊर्जा का अभी तक पूरी तरह विकास नहीं किया जा सका। हिमाचल में मणिकरण स्थित गर्म जल स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन के प्रयास किए जा रहे हैं। – महत्त्व-ऊर्जा साधनों के रूप में इनका उपयोग बहुत ही पुराना है

  1. नौ-परिवहन में पवन तथा प्रवाहित जल का भी उपयोग होता था।
  2. आटा पीसने के लिए पनचक्कियों का प्रचलन था। पानी खींचने के लिए पवन चक्कियों का उपयोग होता था। आज के युग में भी इनकी कुछ विशेषताओं तथा परम्परागत साधनों की कुछ कमियों के कारण इनका महत्त्व दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। इन साधनों की यह विशेषता है कि ये सभी साधन या तो नवीकरण योग्य हैं या अक्षय हैं। ये साधन कम खर्चीले भी हैं।

प्रश्न 4.
देश के औद्योगिकीकरण में ऊर्जा के महत्त्व को समझाओ।
उत्तर-
देश के औद्योगिकीकरण में ऊर्जा का बड़ा महत्त्व है। उद्योगों से अभिप्राय उन कारखानों से है जो छोटीबड़ी मशीनों द्वारा चलाये जाते हैं। ये मशीनें केवल ऊर्जा द्वारा ही चलाई जा सकती हैं।
ऊर्जा कोयला, जल तथा परमाणु ईंधन से प्राप्त होती है। आजकल कुछ ऊर्जा गैर-परम्परागत साधनों से भी प्राप्त की जा रही है। यदि हम देश को औद्योगिकीकरण के मार्ग पर ले जाना चाहते हैं तो यह ऊर्जा के विकास के बिना सम्भव नहीं है। औद्योगिक ऊर्जा का प्रमुख साधन होने के साथ कोयला एक कच्चा माल भी है। लोहा तथा इस्पात एवं रसायन उद्योगों के लिए कोयला आवश्यक है। देश में व्यापारिक शक्ति की 60 प्रतिशत से भी अधिक आवश्यकताएँ कोयले और लिग्नाइट से पूरी होती हैं। स्वाधीनता के समय केवल असम में ही खनिज तेल निकाला जाता था। तब कारखाने भी अधिक नहीं थे। परन्तु तेल की खोज के साथ ही भारत में औद्योगिकीकरण का भी विकास हुआ। प्राकृतिक गैस से उर्वरक बनाये जाने लगे हैं। इसी तरह जल-विद्युत का भी प्रसार हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् ऊर्जा का एक नया स्रोत सामने आया। यह परमाणु ऊर्जा थी। ऊर्जा के साधनों के विकास के साथ ही देश में लोहा-इस्पात उद्योग, इंजीनियरिंग उद्योग तथा कई अन्य उद्योग आरम्भ हुए। अत: यह बात सत्य है कि ऊर्जा औद्योगिकीकरण की कुंजी है।

IV. निम्नलिखित को मानचित्र में लगायें:

  1. लौह अयस्क उत्पादक क्षेत्र, कोई चार।
  2. मैंगनीज़ अयस्क उत्पादक क्षेत्र, कोई तीन।
  3. कोयला उत्पादन क्षेत्र, कोई पाँच।
  4. परमाणु ऊर्जा के केंद्र, कोई तीन।
  5. दामोदर घाटी क्षेत्र में लौह उत्पादन केंद्र।
  6. बाक्साइट के चार प्रमुख भंडार क्षेत्र।
  7. कोलार सोना क्षेत्र।
  8. लिग्नाइट कोयला उत्पादन क्षेत्र।

उत्तर-
विद्यार्थी अध्यापक की सहायता से स्वयं करें।

PSEB 10th Class Social Science Guide खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
वर्तमान युग में खनिज पदार्थों का महत्त्व क्यों बढ़ गया है?
उत्तर-
वर्तमान वैज्ञानिक युग में अनुसंधान और तकनीकी विकास के कारण खनिज पदार्थों का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है।

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प्रश्न 2.
भारत के लोगों को खनिज पदार्थों के प्रयोग में कौन-सी सावधानी बरतनी चाहिए?
उत्तर-
हमें खनिज सम्पदा का बुद्धिमानी और सतर्कता से प्रयोग करना चाहिए ताकि उसका अपव्यय कम-से-कम हो।

प्रश्न 3.
भारत में मिलने वाले किन्हीं चार खनिज पदार्थों के नाम लिखो।
उत्तर-
भारत में मिलने वाले खनिज पदार्थ हैं-मैंगनीज़, अभ्रक, तांबा तथा बॉक्साइट।

प्रश्न 4.
लौह-अयस्क भारत के किन राज्यों में पाया जाता है?
उत्तर-
लौह-अयस्क भारत के झारखण्ड और उड़ीसा राज्यों में पाया जाता है।

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प्रश्न 5.
हमारा लौह-अयस्क का सबसे बड़ा आयातक देश कौन-सा है?
उत्तर-
जापान भारत के लौह-अयस्क का सबसे बड़ा आयातक देश है।

प्रश्न 6.
मध्य प्रदेश के ऐसे दो जिलों के नाम बताओ जहां लौह-अयस्क पाया जाता है?
उत्तर-
जबलपुर तथा बालाघाट जिलों में लौह-अयस्क पाया जाता है।

प्रश्न 7.
उड़ीसा की मैंगनीज़-अयस्क की चार खानों के नाम बताओ।
उत्तर-
उड़ीसा में स्थित मैंगनीज़-अयस्क की चार खानें-क्योंझर, कालाहाण्डी, मयूरभंज तथा तालचेर हैं।

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प्रश्न 8.
भारत में सबसे अधिक अभ्रक किस राज्य में पाया जाता है?
उत्तर-
भारत में सबसे अधिक अभ्रक झारखण्ड में पाया जाता है।

प्रश्न 9.
दो बॉक्साइट उत्पादक राज्यों के नाम बताओ।
उत्तर-
दो बॉक्साइट उत्पादक राज्य हैं-गुजरात तथा महाराष्ट्र।

प्रश्न 10.
तांबा मुख्य रूप से किस राज्य में पाया जाता है?
उत्तर-
तांबा मुख्य रूप से झारखण्ड में पाया जाता है।

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प्रश्न 11.
चार शक्ति साधनों के नाम बताओ।
उत्तर-
चार शक्ति साधनों के नाम हैं-कोयला, खनिज तेल, जल विद्युत् तथा परमाणु ऊर्जा।

प्रश्न 12.
हमारे देश में औद्योगिक ईंधन का सबसे बड़ा साधन कौन-सा है?
उत्तर-
हमारे देश में औद्योगिक ईंधन का सबसे बड़ा साधन कोयला है।

प्रश्न 13.
भारत की चार प्रमुख कोयला खानों के नाम बताओ।
उत्तर-
भारत की चार प्रमुख कोयला. खानों के नाम हैं-रानीगंज, झरिया, गिरिडीह तथा बोकारो।

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प्रश्न 14.
भारत में कोयले का उत्पादन सबसे अधिक किस राज्य में होता है?
उत्तर-
भारत में कोयले का उत्पादन सबसे अधिक झारखण्ड में होता है।

प्रश्न 15.
स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में तेल का एकमात्र उत्पादक राज्य कौन-सा था?
उत्तर-
स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में तेल का एकमात्र उत्पादक राज्य असम था।

प्रश्न 16.
ग्रामीण इलाकों में ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत सरकार ने कौन-सी योजना बनाई है?
उत्तर-
ऊर्जा ग्राम योजना।

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प्रश्न 17.
भारत के उत्तम किस्म के दो लौह अयस्कों के नाम बताओ।
उत्तर-
हेमाटाइट तथा मैगनेटाइट।

प्रश्न 18.
हेमाटाइट तथा मैगनेटाइट में कितने प्रतिशत लौह-अंश होता है?
उत्तर-
60 से 70 प्रतिशत।

प्रश्न 19.
इस्पात बनाने में मैंगनीज़ का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
मैंगनीज़ का मिश्रण इस्पात को मजबूती प्रदान करता है।

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प्रश्न 20.
तांबे का प्रयोग बिजली उद्योग में क्यों होता है?
उत्तर-
क्योंकि ताँबा ताप का बहुत अच्छा सुचालक है।

प्रश्न 21.
चूने के पत्थर का उपयोग किस उद्योग में होता है?
उत्तर-
सीमेंट उद्योग में।

प्रश्न 22.
दो अलौह खनिजों के नाम लिखो।
उत्तर-
कोयला तथा चूने का पत्थर।

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प्रश्न 23.
लिग्नाइट अथवा भूरा कोयला किस प्रकार का कोयला है?
उत्तर-
निम्न कोटि का।

प्रश्न 24.
लिग्नाइट पर आधारित ताप बिजली घर कहां स्थापित किया गया है?
उत्तर-
तमिलनाडु में नेवेली नामक स्थान पर।

प्रश्न 25.
पंजाब में कोयला आधारित ताप विद्युत् केंद्र किन दो स्थानों पर स्थित हैं?
उत्तर-
रोपड़ तथा भटिंडा में।

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प्रश्न 26.
‘बाम्बे हाई’ से क्या प्राप्त किया जाता है?
उत्तर-
खनिज तेल।

प्रश्न 27.
गुजरात के एक तेल क्षेत्र का नाम बताओ।
उत्तर-
‘अंकलेश्वर’।

प्रश्न 28.
असम में स्थित एक तेल शोधन केंद्र का नाम लिखो।
उत्तर-
डिगबोई।

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प्रश्न 29.
तेल तथा प्राकृतिक गैस के खोज कार्य में लगी भारत की एक कम्पनी का नाम बताइए।
उत्तर-
तेल एवं प्राकृतिक गैस कमीशन (ONGC)।

प्रश्न 30.
खाना पकाने के लिए व्यापक रूप से प्रयोग की जाने वाली गैस का नाम बताइए।
उत्तर-
एल० पी० जी०।

प्रश्न 31.
दो जीवाश्म इंधनों के नाम लिखिए।
उत्तर-
कोयला तथा पेट्रोलियम।

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प्रश्न 32.
केरल के समुद्री तट पर पाये जाने वाले उस बालू का नाम बताओ जिसमें से थोरियम निकाला जाता
उत्तर-
मोनाजाइट।

प्रश्न 33.
किसी एक कभी समाप्त न होने वाले ऊर्जा स्त्रोत का नाम बताइए।
उत्तर-
सौर ऊर्जा।

प्रश्न 34.
(i) भारत में इस समय कौन-कौन से चार परमाणु केन्द्र काम कर रहे हैं ।
(ii) सबसे पुराना केन्द्र कौन-सा है?
उत्तर-
(i) भारत में इस समय महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर तारापुर, राजस्थान में कोटा के पास रावत भाटा, तमिलनाडु में कल्पाक्कम तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नरौरा परमाणु केन्द्र काम कर रहे हैं।
(ii) सबसे पुराना केन्द्र तारापुर में है।

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प्रश्न 35.
भारत के किन्हीं चार तापीय विपत् केन्द्रों के नाम लिखें। (राज्यों के नाम सहित)
उत्तर-
भारत के चार तापीय विद्युत् केन्द्रों के नाम हैं
बिहार में बरौनी, दिल्ली में बदरपुर, महाराष्ट्र में ट्रांबे तथा पंजाब में भटिण्डा।

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. लौह अयस्क मुख्यतः भारत के उड़ीसा और ……….. राज्यों में पाया जाता है।
  2. मध्य प्रदेश के जबलपुर तथा ………… जिलों में लौह-अयस्क पाया जाता है।
  3. हेमाटाइट तथा मैगनेटाइट में …………. प्रतिशत लौह-अंश होता है।
  4. ……………. का मिश्रण इस्पात को मजबूती प्रदान करता है।
  5. ताँबा ताप का बहुत अच्छा ………. है।
  6. ……….. निम्न कोटि का कोयला है।
  7. तमिलनाडु में ………. नामक स्थान पर स्थापित ताप बिजली घर लिग्नाइट पर आधारित है।
  8. बाम्बे हाई से ………… प्राप्त किया जाता है।
  9. डिगबोई तेल शोधक केंद्र ……….. राज्य में स्थित है।
  10. ……… खाना पकाने के लिए व्यापक रूप से प्रयोग की जाने वाली गैस है।

उत्तर-

  1. झारखंड,
  2. बालाघाट.
  3. 60 से 70,
  4. मैंगनीज़,
  5. सुचालक,
  6. लिग्नाइट अथवा भूरा कोयला,
  7. नेवेली,
  8. खनिज तेल,
  9. असम,
  10. एल० पी० जी०।

III. बहुविकल्पीय प्रश

प्रश्न 1.
भारत के लौह-अयस्क का सबसे बड़ा आयातक देश है
(A) चीन
(B) जापान
(C) अमेरिका
(D) दक्षिण कोरिया।
उत्तर-
(B) जापान

प्रश्न 2.
भारत में सबसे अधिक अक किस राज्य में पाया जाता है?
(A) बिहार
(B) छत्तीसगढ़
(C) झारखंड
(D) मध्य प्रदेश।
उत्तर-
(C) झारखंड

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प्रश्न 3.
तांबा मुख्य रूप से किस राज्य में पाया जाता है?
(A) बिहार
(B) झारखण्ड
(C) गुजरात
(D) मध्य प्रदेश।
उत्तर-
(B) झारखण्ड

प्रश्न 4.
हमारे देश में औद्योगिक ईंधन का सबसे बड़ा साधन है
(A) कोयला
(B) लकड़ी
(C) डीज़ल
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(A) कोयला

प्रश्न 5.
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में तेल का एकमात्र उत्पादक राज्य था
(A) गुजरात
(B) महाराष्ट्र
(C) बिहार
(D) असम।
उत्तर-
(D) असम।

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प्रश्न 6.
चूने के पत्थर का उपयोग मुख्य रूप से किस उद्योग में होता है?
(A) कागज़
(B) पेट्रो-रसायन
(C) सीमेंट
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(C) सीमेंट

प्रश्न 7.
खनिज भण्डारों के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा खनिज संसाधन हैं
(A) कोयला
(B) तांबा
(C) मैंगनीज़
(D) पेट्रोलियम।
उत्तर-
(A) कोयला

प्रश्न 8.
भारत में सबसे पुराना परमाणु केंद्र है
(A) कल्पाक्कम
(B) नरौरा
(C) रावत भाटा
(D) तारापुर।
उत्तर-
(D) तारापुर।

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IV. सत्य-असत्य कथन प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/गलत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. हेमाटाइट सबसे घटिया किस्म का लोहा है।
  2. एल्यूमिनियम धातु हल्की तथा ताप की सुचालक होती है।
  3. सौर ऊर्जा एक गैर-परम्परागत ऊर्जा साधन है।
  4. प्राकृतिक गैस के भण्डार आमतौर पर कोयला क्षेत्रों के साथ पाये जाते हैं।
  5. कोयला देश (भारत) का सबसे बड़ा खनिज संसाधन है।

उत्तर-

  1. (✗),
  2. (✓),
  3. (✓),
  4. (✗),
  5. (✓).

V. उचित मिलान

  1. मैंगनीज़ का उपयोग — सीमेंट उद्योग
  2. अभ्रक का उपयोग — एल्यूमीनियम
  3. चूने पत्थर का उपयोग — बिजली उद्योग
  4. बॉक्साइट — इस्पात बनाने में।

उत्तर-

  1. मैंगनीज का उपयोग — इस्पात बनाने में,
  2. अभ्रक का उपयोग — बिजली उद्योग,
  3. चूने पत्थर का उपयोग — सीमेंट उद्योग,
  4. बॉक्साइट — एल्यूमीनियम।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
आधुनिक युग में अभ्रक का महत्त्व बताओ। भारत में अभ्रक का उत्पादन करने वाले दो मुख्य राज्यों का वर्णन करो।
उत्तर-
महत्त्व-आधुनिक युग में उद्योगों के विकास के कारण अभ्रक का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। इस खनिज का अधिकतर उपयोग बिजली का सामान बनाने में किया जाता है। मोटरों तथा हवाई जहाज़ के शीशों में भी अभ्रक का प्रयोग किया जाता है।
अभ्रक उत्पादन राज्य-भारत में अभ्रक का उत्पादन करने वाले मुख्य दो राज्य निम्नलिखित हैं —

  1. झारखण्ड-भारत में सबसे अधिक अभ्रक झारखण्ड राज्य में निकाला जाता है। हमारे देश का लगभग आधा अभ्रक इसी राज्य से प्राप्त होता है।
  2. आन्ध्र प्रदेश-देश के कुल अभ्रक का 27 प्रतिशत भाग आन्ध्र प्रदेश से प्राप्त होता है।

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प्रश्न 2.
कोयले का क्या महत्त्व है? इसकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई?
उत्तर-
महत्त्व-कोयला शक्ति प्राप्त करने अथवा औद्योगिक ईंधन का सबसे बड़ा साधन है। साथ ही यह औद्योगिक कच्चा माल भी है। घरों में भी इसका प्रयोग ईंधन के रूप में होता है।
उत्पत्ति-कोयले की उत्पत्ति वनस्पति के गल-सड़ कर कठोर हो जाने से हुई है। लाखों वर्ष पहले धरातल पर घने जंगल थे। पृथ्वी की भीतरी हलचलों के कारण धरातलं में दरारें पड़ गई और ये वन पृथ्वी के नीचे धंस गए। पृथ्वी की भीतरी गर्मी तथा ऊपरी दबाव के कारण ये वन गल-सड़ कर कोयला बन गये और धीरे-धीरे काफ़ी कठोर हो गए। इसी को पत्थरी कोयला कहते हैं।

प्रश्न 3.
पेट्रोलियम किस काम आता है? इसकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई?
उत्तर-
पेट्रोलियम हवाई जहाज़ तथा मोटरें आदि चलाने के काम आता है। इसे साफ़ करके पेट्रोल, मोम, कैरोसीन तथा मोबिल ऑयल बनाया जाता है।
पेट्रोलियम की उत्पत्ति-पेट्रोलियम की उत्पत्ति समुद्री जीव-जन्तुओं तथा वनस्पतियों के अवशेषों से हुई है। समुद्र में अनेक छोटे-छोटे जीव तथा पौधे पानी में तैरते रहते हैं। मरने के पश्चात् इनके जीवांश समुद्र में निर्मित अवसादी शैलों में दब जाते हैं। इन जीवांशों पर करोड़ों वर्षों तक गर्मी, दबाव तथा रासायनिक क्रियाओं का प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप ये जीवांश पेट्रोलियम में बदल जाते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में पेट्रोलियम उत्पादक राज्यों, इसकी शोधशालाओं तथा इसके उत्पादन का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
स्वतन्त्रता के समय केवल असम में ही खनिज तेल निकाला जाता था। यह तेल क्षेत्र काफ़ी छोटा था। स्वतन्त्रता के पश्चात् गुजरात में अंकलेश्वर से भी खनिज तेल प्राप्त होने लगा। तत्पश्चात् मुम्बई हाई में खनिज तेल के भण्डार मिले। मुम्बई तट से 115 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह तेल क्षेत्र आज भारत का सबसे बड़ा तेल क्षेत्र है। शोधशालाएं-पेट्रोलियम को साफ़ करने के लिए देश में अनेक शोधशालाएं स्थापित की गई हैं। इनमें से मुख्य शोधशालाएं नूनमती (असम), बरौनी (बिहार), अंकलेश्वर (गुजरात) में हैं। विशाखापट्टनम, चेन्नई तथा मुम्बई में भी तेल शोधशालाएं हैं। उत्पादन-भारत में पेट्रोलियम का उत्पादन प्रति वर्ष बढ़ रहा है। 1980-81 में भारत में पेट्रोलियम का कुल उत्पादन 10.5 मिलियन टन था। 1999-2000 में यह बढ़ कर 31.9 मिलियन टन हो गया।

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प्रश्न 5.
भारत में लोहे के उत्पादन और वितरण पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
भारत में विश्व के कुल लोहे का एक-चौथाई भाग सुरक्षित भण्डार के रूप में विद्यमान है। एक अनुमान के अनुसार भारत में 2,100 करोड़ टन लोहे का सुरक्षित भण्डार है।
उत्पादन-पिछले वर्षों में भारत में लोहे का उत्पादन काफ़ी बढ़ा है। सन् 1951 में भारत में केवल 4 मिलियन टन लोहे का उत्पादन हुआ। 1998-99 में यह उत्पादन बढ़ कर 70.7 मिलियन टन हो गया।
वितरण-भारत में सबसे अधिक लोहा झारखण्ड राज्य में निकाला जाता है। देश के कुल लोहा उत्पादन का 50 प्रतिशत से भी अधिक लोहा इसी राज्य से प्राप्त होता है। इसका दूसरा बड़ा उत्पादक राज्य उड़ीसा है। इनके अतिरिक्त लोहे के अन्य मुख्य उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान आदि हैं।

प्रश्न 6.
परमाणु खनिज क्या होते हैं और इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
वे खनिज जिनसे परमाणु ऊर्जा मिलती है, परमाणु खनिज कहलाते हैं। यूरेनियम और बेरीलियम इसी प्रकार के खनिज हैं। यूरेनियम बिहार राज्य में मिलता है तथा बेरीलियम राजस्थान में।
महत्त्व-अणु-खनिजों का महत्त्व निम्नलिखित बातों से जाना जा सकता है

  1. इनसे चालक शक्ति प्राप्त की जाती है।
  2. इनसे विनाशकारी बम बनाए जाते हैं। परन्तु आजकल अणु शक्ति का प्रयोग शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए अधिक होने लगा है।
  3. अणु-खनिजों से कारखाने चलाने के लिए विद्युत् उत्पन्न की जाती है। (4) इस शक्ति से कैंसर आदि भयानक रोगों की चिकित्सा की जाती है।

प्रश्न 7.
भारत के चार प्रमुख खनिज क्षेत्रों के नाम बताइए और प्रत्येक क्षेत्र में पाए जाने वाले मुख्य खनिजों के नाम लिखिए।
उत्तर-
भारत के चार प्रमुख खनिज क्षेत्र अनलिखित हैं

  1. छोटा नागपुर तथा उत्तरी उड़ीसा-ये खनिज क्षेत्र बहुत ही विकसित हैं। इस क्षेत्र में कोयला, लोहा आदि प्रमुख खनिज पाये जाते हैं।
  2. मध्य राजस्थान में खनिजों के विशाल भण्डार हैं। इस क्षेत्र को विकसित किया जा रहा है। इस क्षेत्र में तांबा, जस्ता, सीसा, अभ्रक आदि खनिज पाये जाते हैं।
  3. दक्षिण भारत भी खनिजों की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में गोआ, मैसूर पठार तथा तमिलनाडु के कुछ भाग शामिल हैं। यहां पर लोहा, लिग्नाइट आदि खनिज पाये जाते हैं।
  4. मध्य भारत में दक्षिणी मध्य प्रदेश तथा पूर्वी महाराष्ट्र में भी खनिजों के भण्डार हैं। इनमें लोहा तथा मैंगनीज़ विशेष रूप से पाये जाते हैं।

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प्रश्न 8.
अन्य शक्ति साधनों की अपेक्षा जल विद्युत् के कौन-कौन से चार लाभ हैं?
उत्तर-
शक्ति के चार साधनों (कोयला, पेट्रोलियम, जल-विद्युत् तथा अणु शक्ति) में जल-विद्युत का अपना विशेष महत्त्व है। इसके अतिरिक्त लाभ हैं

  1. कोयला तथा पेट्रोलियम के भण्डार समाप्त हो सकते हैं। परन्तु जल एक स्थायी भण्डार है जिससे निरन्तर जलविद्युत् प्राप्त की जा सकती है।
  2. जल-विद्युत् को तारों द्वारा सैंकड़ों कि० मी० की दूरी तक सरलता से ले जाया जा सकता है।
  3. जल-विद्युत् कोयले तथा पेट्रोलियम की अपेक्षा सस्ती पड़ती है।
  4. कोयले और पेट्रोलियम के प्रयोग से वायु प्रदूषण बढ़ता है। इसके विपरीत जल-विद्युत् के प्रयोग से धुआँ नहीं निकलता।

बड़े उत्तर वाले प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
आधुनिक युग में लोहे का क्या महत्त्व है? भारत के विभिन्न भागों में लोहे के उत्पादन का हाल विस्तारपूर्वक लिखो। देश में लोहे का कुल उत्पादन तथा इसके सुरक्षित भण्डार का भी वर्णन करो।
उत्तर-
लोहा एक महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। इसके महत्त्व, प्रादेशिक वितरण तथा उत्पादन का वर्णन इस प्रकार है
महत्त्व-आधुनिक युग में लोहे का बहुत महत्त्व है। यह उद्योगों की आधारशिला है। इसके बिना किसी देश के आर्थिक विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उद्योगों में प्रयोग होने वाली लगभग सभी मशीनें लोहे से बनाई जाती हैं। इसका प्रयोग रेलें, वायुयान तथा जलयान बनाने में भी होता है। यह अन्य खनिजों की अपेक्षा अधिक कठोर है। इसके अतिरिक्त उत्पादन में लागत भी कम आती है। लोहे के महत्त्व को देखते हुए इसे काला सोना (Black Gold) भी कहा जाता है। प्रादेशिक वितरण-भारत में लोहे का वितरण इस प्रकार है

  1. झारखण्ड-भारत में लोहे के उत्पादन में झारखण्ड को मुख्य स्थान प्राप्त है। इस राज्य में सबसे अधिक लोहा सिंहभूम जिले में निकाला जाता है।
  2. उड़ीसा-भारत में दूसरा बड़ा लोहा उत्पादक राज्य उड़ीसा है। इस राज्य में लोहा उत्पन्न करने वाले मुख्य जिले हैं-क्योंझर, बोनाई तथा मयूरभंज। गुरुहास्नी, सुलाइयत और बादाम पहाड़ इस राज्य के लोहे की मुख्य खानें हैं।
  3. मध्य प्रदेश-भारत में लोहा उत्पन्न करने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश को तीसरा स्थान प्राप्त है। इस राज्य में लोहे का उत्पादन करने वाले मुख्य जिले हैं-जबलपुर और बालाघाट।
  4. कर्नाटक-लोहा उत्पन्न करने में कर्नाटक राज्य चौथे नम्बर पर है। कर्नाटक के बिलारी, चित्रदुर्ग तथा चिकमंगलूर जिले भी प्रमुख लौह-अयस्क केन्द्र हैं। कर्नाटक की कुद्रेमुख क्षेत्र की खानों से भी लौह-अयस्क मिलता है।

इन राज्यों के अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान अन्य महत्त्वपूर्ण लोहा उत्पादक राज्य हैं। हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले में भी थोड़ी-बहुत मात्रा में लोहा निकाला जाता है।
उत्पादन-पिछले वर्षों में भारत में लोहे का उत्पादन काफ़ी बढ़ा है। सन् 1951 में भारत में केवल 4 मिलियन टन लोहे का उत्पादन किया गया था। परन्तु 1998-99 में भारत में 70.7 मिलियन टन लोहे का उत्पादन हुआ।
सुरक्षित भण्डार-भारत में लोहे का सुरक्षित भण्डार लगभग 13 अरब टन है। यह संसार के लोहे के कुल ज्ञात भण्डार का लगभग एक चौथाई भाग है।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 6 खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन

प्रश्न 2.
भारत में खनिज सम्पत्ति तथा शक्ति के साधनों का वर्णन करो।
अथवा
निम्नलिखित पदार्थ भारत में कहां पाए जाते हैं और इनका क्या महत्त्व है? कोयला, लोहा, मैंगनीज, बॉक्साइट, खनिज तेल, तांबा, अभ्रक।
उत्तर-
खनिज पदार्थों का प्रत्येक देश के लिए बड़ा महत्त्व होता है। इसके बिना किसी भी देश के उद्योग नहीं चल सकते। भारत खनिज पदार्थों में काफ़ी धनी है। यहां मुख्य रूप से निम्नलिखित खनिज पदार्थ मिलते हैं

  1. कोयला-कोयला एक महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। यह शक्ति का बहुत बड़ा साधन है। इससे रेलें, जहाज़ तथा कारखाने चलते हैं। हमारा अधिकतर कोयला रेलों में प्रयोग किया जाता है। कोयले के उत्पादन में भारत का विश्व में आठवां स्थान है। कोयले की अधिकतर खानें झारखण्ड में हैं। इसके अतिरिक्त रानीगंज (बंगाल) में भी इसकी खाने हैं। 2000-01 में देश में कोयले का कुल उत्पादन 33 करोड़ 35 लाख टन था। भारत कुछ कोयला निर्यात भी करता है।
  2. लोहा-लोहा उद्योगों का आधार माना जाता है। भारत में लोहे के विस्तृत भण्डार हैं। लोहे की बड़ी खाने सिंहभूम (झारखण्ड), मयूरभंज, क्योंझर तथा बोनाई (उड़ीसा) और स्लेम (तमिलनाडु) में हैं। कुछ लोहा कर्नाटक, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ से भी निकाला जाता है। 1998 में देश में 71.5 मिलियन टन खनिज लोहे का उत्पादन हुआ था। हम कुछ लोहे का निर्यात भी करते हैं। हमारे लोहे का मुख्य ग्राहक जापान है।
  3. मैंगनीज़-मैंगनीज़ के उत्पादन में भारत को विश्व में चौथा स्थान प्राप्त है। विश्व का 20% मैंगनीज़ भारतीय खानों से निकाला जाता है। भारत में मैंगनीज़ पैदा करने वाले मुख्य राज्य मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा झारखण्ड हैं। मैंगनीज़ का प्रयोग लोहे से इस्पात बनाने में किया जाता है। किन्तु अभी लोहा-इस्पात उद्योग इतना विकसित नहीं है कि सारा मैंगनीज़ उसमें खप जाए। अतः हम काफ़ी मैंगनीज़ विदेशों को बेच देते हैं। हम अधिकतर मैंगनीज़ अमेरिका तथा इंगलैंड को भेजते हैं। भारत का मैंगनीज़ उत्तम प्रकार का होता है।
  4. अभ्रक-अभ्रक एक बहुमूल्य धातु है। इसका उपयोग शीशे तथा बिजली का सामान बनाने में होता है। संसार का 75% अभ्रक भारत में ही निकाला जाता है। यह मुख्य रूप से झारखण्ड तथा आन्ध्र प्रदेश में मिलता है किन्तु कुछ । अभ्रक राजस्थान से भी प्राप्त होता है। भारत अधिकतर अभ्रक निर्यात कर देता है। इंगलैंड, फ्रांस, अमेरिका, जापान, इटली, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि भारतीय अभ्रक के मुख्य ग्राहक हैं।
  5. बॉक्साइट-बॉक्साइट से एल्यूमीनियम नामक धातु प्राप्त की जाती है। एल्यूमीनियम रेल के डिब्बे, मोटर गाड़ी, जहाज, बिजली का सामान, बर्तन और वार्निश आदि बनाने के काम आती है। बॉक्साइट का प्रयोग मिट्टी का तेल साफ़ करने, सीमेंट बनाने और अनेक रासायनिक पदार्थों का निर्माण करने में भी होता है। भारत बॉक्साइट के उत्पादन में आत्मनिर्भर है। यह झारखण्ड, गुजरात, तमिलनाडु, उड़ीसा, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में पाया जाता है।
  6. खनिज तेल-आज के युग में खनिज तेल का बड़ा महत्त्व है। यह केवल शक्ति का ही साधन नहीं है बल्कि इससे और भी कई प्रकार की वस्तुएं बनाई जाती हैं। पेट्रोलियम हवाई जहाज़, समुद्री जहाज़ तथा मोटर आदि चलाने के काम आता है। इसे साफ़ करके पेट्रोल, मोम, कैरोसीन तथा मोबिल आयल बनाया जाता है। भारत में सबसे अधिक पेट्रोलियम सुम्बई हाई से प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त असम राज्य में भी काफ़ी पेट्रोलियम निकाला जाता है। इस राज्य में पेट्रोलियम के मुख्य केन्द्र डिगबोई, बम्पापुंज, हंसपुंग, नाहरकटिया और मोरन आदि हैं। गुजरात राज्य में कैम्बे के निकट अंकलेश्वर से भी पेट्रोलियम निकाला जाता है। भारत में खनिज तेल का उत्पादन आवश्यकता से बहुत कम होता है। यहां निकाला जाने वाला पेट्रोलियम हमारी केवल 20 प्रतिशत आवश्यकता ही पूरी कर पाता है। इसलिए हमें विदेशों से इसका आयात करना पड़ता है।

खनिज पदार्थ एवं ऊर्जा-साधन PSEB 10th Class Geography Notes

  • भारत के प्रमुख खनिज – लोहा, मैंगनीज़, अभ्रक, बॉक्साइट, तांबा, सोना, नमक आदि भारत के प्रमुख खनिज हैं।
  • लोहे के उत्पादक क्षेत्र – लोहे के उत्पादन के मुख्य क्षेत्र झारखण्ड तथा उड़ीसा हैं। कुछ लोहा छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक राज्य में भी मिलता है।
  • मैंगनीज़ – मैंगनीज़ का मुख्य उत्पादक उड़ीसा राज्य है। इसके पश्चात् मैंगनीज़ के उत्पादन में कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र का स्थान है।
  • अभ्रक का उत्पादन – अभ्रक के उत्पादन में विश्व में भारत का प्रथम स्थान है। अभ्रक उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र झारखण्ड में हज़ारीबाग, बिहार में गया तथा मुंगेर जिले, आन्ध्र प्रदेश में नेल्लोर और राजस्थान में अजमेर तथा जयपुर जिले हैं।
  • बॉक्साइट – झारखण्ड, गुजरात और छत्तीसगढ़ बॉक्साइट के मुख्य उत्पादक राज्य हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी थोड़ी मात्रा में बॉक्साइट पाया जाता है।
  • शक्ति के साधन – कोयला, खनिज तेल तथा जल विद्युत् शक्ति प्राप्त करने के तीन साधन हैं। शक्ति का चौथा साधन परमाणु ऊर्जा है।
  • कोयले के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र – कोयला उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र रानीगंज, झरिया, बोकारो और कर्णपुरा हैं।
  • खनिज तेल – तेल के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र असम और गुजरात हैं। बॉम्बे हाई से भी अब तेल निकाला जा रहा है।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 4 भारतीय ढंग से मेज़ लगाना

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Chapter 4 भारतीय ढंग से मेज़ लगाना Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Home Science Chapter 4 भारतीय ढंग से मेज़ लगाना

PSEB 8th Class Home Science Guide भारतीय ढंग से मेज़ लगाना Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
खाना खाने के कितने तरीके हैं ?
उत्तर-
खाना खाने के दो तरीके हैं-आधुनिक तथा पुरातन।

प्रश्न 2.
खाना खाने के आधुनिक तरीके से आप क्या समझते हो ?
उत्तर-
आधुनिक तरीके आजकल भारत में पढ़े-लिखे व्यक्ति ही व्यवहार में लाते हैं और मेज़ पर बैठकर ही खाना पसंद करते हैं।

प्रश्न 3.
खाना खाने के कौन-से ढंग में आमतौर पर स्त्रियाँ मेहमान के साथ बैठकर खाना नहीं खातीं और क्यों ?
उत्तर-
खाना खाने की पुरातन ढंग में स्त्रियाँ प्रायः अतिथि के साथ बैठकर खाना नहीं खाती क्योंकि वे मेजबान बनकर खाना बनाने और परोसने में मान महसूस करती हैं।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 4 भारतीय ढंग से मेज़ लगाना

प्रश्न 4.
प्लेटों के स्थान पर खाना खाने के लिए केले के पत्ते कहाँ प्रयोग किये जाते हैं ?
उत्तर-
प्लेटों के स्थान पर खाना खाने के लिए केले के पत्ते दक्षिणी भारत में प्रयोग किये जाते हैं।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
तुम्हारे विचार में भोजन इकट्ठे बैठकर खाना चाहिए या अलग-अलग बैठकर और क्यों ?
उत्तर-
हमारे विचार से भोजन इकट्ठे बैठकर करना चाहिए क्योंकि इकट्ठे बैठकर भोजन करने से जो भी भोजन बना होगा सभी मिल-जुलकर खाना खाएँगे और किसी तरह की शिकायत नहीं होगी। साथ ही गृहिणी को खाना परोसने में आसान भी रहेगा।

प्रश्न 2.
खाना खाते समय आप किन नियमों का पालन करोगे ? विस्तार से लिखो।
उत्तर-
खाना खाते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए-

  1. मुँह में चपचप की आवाज़ नहीं आनी चाहिए। उतनी देर तक कोई चीज़ दोबारा नहीं लेना चाहिए जब तक सभी एक-एक बार न ले लें।
  2. अगर खाना हाथ से खाओ तो पूरा हाथ नहीं भरना चाहिए।
  3. भोजन करते समय प्रसन्नचित्त रहना चाहिए। तली हुई चीज़ों का इस्तेमाल कम करना चाहिए। उतना ही खाना खाना चाहिए जितना आसानी से पच सके।
  4. हाथ साफ़ होने चाहिएँ। कपड़े साफ़, हल्के और ढीले हों तो अति उत्तम है।
  5. गर्म भोजन के साथ ठंडा और ठंडे भोजन के साथ गर्म पानी नहीं पीना चाहिए।
  6. भोजन करते समय न तो खाँसी होना चाहिए न ही छींक आनी चाहिए। चम्मच, काँटे या बर्तन अगर कोई दूसरे व्यक्ति ने इस्तेमाल किए हों तो गर्म पानी में धो कर इस्तेमाल करना चाहिए।
  7. रात को सोने से एक घंटा पहले खाना खाना चाहिए। भोजन करके तुरन्त नहीं सोना चाहिए।

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प्रश्न 3.
आपखाना खाने और परोसने के लिए कौन-सा ढंग पसन्द करोगे और क्यों ?
उत्तर-
हम खाना खाने और परोसने के लिए आधुनिक ढंग पसन्द करेंगे, क्योंकि आधुनिक ढंग में सब लोग इकट्ठा खाना शुरू करते हैं और अन्त में कुर्सियों से इकट्ठे ही उठते हैं। इसमें मेज़ के ऊपर सभी चीजें रख ली जाती हैं जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता के अनुसार चीज़ ले लेता है। इस प्रकार कोई भी पदार्थ व्यर्थ नहीं जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तरी और दक्षिणी भारत में खाना परोसने के ढंग बताओ।
उत्तर-
उत्तरी भारत में थाली में विभिन्न आकार की कटोरियों में सजे व्यंजन रखे जाते हैं। दाल, सब्जी व रायता एक ही आकार की कटोरियों में रखते हैं। छोटी कटोरियों में चटनी व अचार रखते हैं। पापड़ और रोटी, पराँठा या पूरी भी थाली में रखते हैं। थाली में चम्मच भी अवश्य रखा जाता है। पानी से भरा गिलास दायीं ओर चौकी पर थाली के पास रखा जाता है। चावल यदि बनाये जाते हैं तो कुछ रोटी के बाद पूछकर दिए जाते हैं। पंजाब में तथा अन्य बहुत-से घरों में दही की नमकीन लस्सी भी दी जाती है।

खाना प्रायः गृहिणी ही खिलाती है। पहले थाली व कटोरी में थोड़ा-थोड़ा खाना लगाकर चौकी पर रख दिया जाता है। भोजनकर्ता खाना खाता रहता है और गृहिणी बीच-बीच में आवश्यकतानुसार थोड़ा-थोड़ा परोसती रहती है।

भोजन के पश्चात् जूठे बर्तन उठाकर चौकी, पटरा तथा कमरे व स्थान को साफ़ कर दिया जाता है।
दक्षिण भारत में प्लेटों या थाली की जगह केले के पत्ते इस्तेमाल किए जाते हैं। पत्ते की नोक खाने वाले के दायीं तरफ़ होती है। पत्ते के ऊपर बायीं तरफ़ पानी के लिए गिलास रखा जाता है। यदि मिठाई परोसनी हो तो पत्ते के दाएँ हाथ के कोने पर परोसी जाती है। कई लोग खाने के शुरू में और कई खाने के अन्त में मिठाई परोसते हैं। अचार पत्ते के नोक की बाईं तरफ रखते हैं। चावल जो दक्षिण भारत के लोगों का मुख्य खाना है, पत्ते के बीच में रखा जाता है। चावलों के साथ घी और सांबर देते हैं। दूसरे दौर में चावल के साथ रसम और तीसरी बार देना हो तो अचार, चावल, दही या लस्सी परोसी जाती है। भोजन खाने के बाद हाथ धोकर पान बाँटते हैं।

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प्रश्न 2.
खाना खाने के आधुनिक और पुरातन ढंग में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
खाना खाने के आधुनिक तथा पुरातन ढंग में निम्नलिखित अन्तर हैं-

आधुनिक ढंग पुरातन ढंग
(1) इस विधि में एक बड़ी मेज़ के चारों तरफ़ कुर्सियाँ लगी होती हैं। (1) पुराने ढंग में भोजन भूमि पर आसन या चौकी बिछाकर किया जाता है।
(2) मेज़ पर सभी खाद्य पदार्थ डोंगों, प्लेटों आदि में मेज़ के मध्य में सजा दिए जाते हैं। (2) इस विधि में प्रत्येक सदस्य के लिए अलग थाली में भोजन परोसा जाता है।
(3) भोजन करने वाले व्यक्ति कुर्सियों  पर बैठते हैं तथा अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार अपनी प्लेट में भोज्य पदार्थ लेते हैं। (3) इस विधि में गृहिणी को सामान्यतः भोजन परोसने के लिए तत्पर रहना आवश्यक है।
(4) आवश्यकता पड़ने पर दुबारा या अधिक बार वह अपने आप भोजन डोंगों से लेते हैं। (4) प्रारम्भिक रूप से गृहिणी थोडा-थोड़ा भोजन थालियों में परोसती है तथा आवश्यकता पड़ने पर खाने वाले सदस्य से पूछकर दोबारा डालती है।

 

प्रश्न 3.
खाना परोसते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है ?
उत्तर-
खाना परोसते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

  1. गृहिणी अथवा खाना परोसने वाले व्यक्ति का शरीर स्वच्छ तथा वस्त्र साफ़-सुथरे होने चाहिए। सफेद या हल्के रंग के वस्त्र हों तो अधिक उत्तम रहता है।
  2. यदि गृहिणी खाना परोसे तो उसे अपने बाल भली-भान्ति बाँध लेने चाहिएँ जिससे बार-बार बालों को स्पर्श न करना पड़े। पल्ला व दुपट्टा उचित स्थिति में रखना चाहिए ताकि वह लटके नहीं।
  3. भोजन प्रसन्नचित्त होकर कराना चाहिए।
  4. बर्तन साफ़, बेदाग और चमकते होने चाहिएं।
  5. कटोरियाँ और प्लेटें खाने के समय पूरी-पूरी नहीं भरनी चाहिए। थोड़ी खाली ही रहने देनी चाहिए।
  6. भोजन परोसते समय मेज़ या फर्श पर न गिरे और न ही बर्तन के किनारे पर गिरे, इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
  7. खाना खिलाते समय प्रत्येक सदस्य की ओर ध्यान रखना चाहिए।
  8. भोजन करने वालों की रुचि का ध्यान रखना चाहिए।
  9. प्रत्येक आदमी के लिए 20” से 24″ तक लम्बी और 15 से 16” चौड़ी जगह होनी चाहिए ताकि खाना आसानी से खाया जा सके।
  10. खाने की मेज़ पर कोई ऐसा कपड़ा बिछाना चाहिए जिससे खाना खाते समय प्लेटों, छुरियों, काँटों आदि की आवाज़ कम हो।
  11. फूलदान, फूल ट्रे आदि को मेज़ के केन्द्र में रखना चाहिए तथा ये कम ऊँचे होने चाहिए जिससे सभी व्यक्ति बिना रुकावट एक-दूसरे को देख सकें।
  12. खाना परोसते समय थाली, कटोरी या किसी बर्तन को ज़मीन पर बिल्कुल नहीं रखना चाहिए।
  13. खाना खाने के बाद हाथ धोने, हाथ पोंछने आदि का प्रबन्ध होना चाहिए।
  14. भोजन को इस तरह परोसना चाहिए कि भोजन खाने वाले भोजन की ओर आकर्षित हो जायें और खुश होकर खायें।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 4 भारतीय ढंग से मेज़ लगाना

Home Science Guide for Class 8 PSEB भारतीय ढंग से मेज़ लगाना Important Questions and Answers

I. बहुविकल्पी प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय तरीके में घर की स्त्री पति के किस तरफ बैठती है ?
(क) बायें
(ख) दायें
(ग) बैठती ही नहीं
(घ) खड़ी रहती है।
उत्तर-
(क) बायें

प्रश्न 2.
प्लेटों के स्थान पर केले के पत्ते कहां प्रयोग होते हैं
(क) दक्षिणी भारत
(ख) पूर्वी भारत
(ग) अमरीका
(घ) रूस।
उत्तर-
(क) दक्षिणी भारत

प्रश्न 3.
विदेशी शैली में भोजन परोसने में सब से पहले क्या परोसा जाता है ?
(क) सूप
(ख) खीर
(ग) पानी
(घ) कुछ नहीं
उत्तर-
(क) सूप

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प्रश्न 4.
मक्खन को गर्म करने से
(क) खाने योग्य नहीं रहता
(ख) विटामिन A नष्ट हो जाता है
(ग) जल जाता है
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(ख) विटामिन A नष्ट हो जाता है

II. ठीक/गलत बताएं

  1. भारतीय शैली में भोजन के अंत में स्वीट डिश परोसी जाती है।
  2. मिठाई केले के पत्ते के कोने पर परोसी जाती है।
  3. भोजन प्रसन्नचित्त हो कर करना चाहिए।
  4. भोजन करते समय खूब बातें करना चाहिए।

उत्तर-

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III. रिक्त स्थान भरें

  1. दक्षिणी भारत में ……………. के पत्ते बर्तनों की जगह प्रयोग में लाए जाते हैं।
  2. पुराने ढंग में भोजन खाने के बाद हाथ धोकर ……………… बाँटा जाता है।
  3. रात को सोने से ……………… पहले खाना खायो।
  4. ……………… के गिलास प्रयोग नहीं करने चाहिए।

उत्तर-

  1. केले,
  2. पान,
  3. एक घण्टे,
  4. काँसे।

IV. एक शब्द में उत्तर दें-

प्रश्न 1.
भोजन परोसते समय किस बात का सबसे अधिक ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
स्वच्छता का।

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प्रश्न 2.
विदेशी शैली में भोजन परोसने में सबसे पहले क्या परोसा जाता है ?
उत्तर-
सूप या फ्रूट जूस।

प्रश्न 3.
भारतीय शैली में भोजन के अन्त में क्या परोसा जाता है ?
उत्तर-
मीठी चीजें (स्वीट डिश)

प्रश्न 4.
खाना खाने की किस विधि में स्त्रियाँ प्रायः अतिथि के साथ बैठकर खाना नहीं खातीं ?
उत्तर-
पुरातन ढंग में।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खाना खाने के कौन-कौन से दो तरीके हैं ?
अथवा
खाना परोसने के दो ढंगों के नाम लिखो।
उत्तर-
खाना खाने के पुरातन और आधुनिक दो तरीके हैं।

प्रश्न 2.
मक्खन को गर्म क्यों नहीं करना चाहिए ?
उत्तर-
मक्खन को गर्म करने से उसका विटामिन ‘ए’ नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 3.
भोजन परोसने की तीन (दो) विधियाँ कौन-कौन सी हैं ?
अथवा
भोजन परोसने के ढंगों के नाम लिखिए।
उत्तर-

  1. भारतीय शैली,
  2. विदेशी शैली,
  3. बुफे भोज।

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प्रश्न 4.
यथासम्भव एक ही धातु के पात्रों में भोजन क्यों परोसना चाहिए ?
उत्तर-
एकरूपता होने के कारण आकर्षण बढ़ता है।

प्रश्न 5.
बुफे विधि प्रायः कहाँ प्रयोग में लाई जाती है ?
उत्तर-
शादी, पार्टियों, सामूहिक भोज आदि अवसरों पर।

प्रश्न 6.
सेकने की विधि द्वारा भोजन पकाने के लाभ तथा हानि क्या हैं ?
उत्तर-
लाभ-भोज्य पदार्थ स्वादिष्ट तथा पोषक तत्त्वयुक्त रहता है। हानि-यह महँगी विधि है और इसमें अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 7.
चावल पकाते समय चावलों में कितना पानी डालना चाहिए ?
उत्तर-
जितना पानी चावल सोख लें।

प्रश्न 8.
मेज़ लगाने के आधुनिक तरीके से आप क्या समझते हैं ।
उत्तर-
इस विधि में एक बड़ी मेज़ के चारों तरफ कुर्सियां लगी होती हैं। मेज़ पर सभी खाद्य पदार्थ डोगों प्लेटों आदि में मेज़ के मध्य में सजा दिए जाते हैं। भोजन करने वाले व्यक्ति कुर्सियों पर बाठते हैं तथा अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार अपनी प्लेट में भोज्य पदार्थ लेते हैं।

प्रश्न 9.
मेज़ पर खाना परोसने के लिए क्या-क्या सामग्री चाहिए ? ।
उत्तर-
मेज़ पर खाना परोसने के लिए, डोंगे, कड़छियाँ, चम्मच, छरी, काँटे, नेपकिन पानी का जग, गिलास, प्लेटें, कटोरियाँ, नमकदानी आदि सामग्री की आवश्यकता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन परोसने की देशी और विदेशी विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
हमारे देश में भोजन परोसने के लिए सामान्यतः दो विधियां हैं-
(1) देशी विधि,
(2) विदेशी विधि। कहीं-कहीं इन दोनों विधियों का मिला-जुला रूप भी प्रचलित है।

1. देशी विधि-देशी विधि अर्थात् भारतीय विधि में भोजन भूमि पर आसन या चौकी बिछाकर किया जाता है। प्रत्येक सदस्य के लिए अलग थाली में भोजन परोसा जाता है। थाली में पकाया हुआ भोजन भली-भाँति सजाया जाता है। रसेदार सब्जी व तरल भोज्य पदार्थों को कटोरी में व अन्य चीजें थाली में ही रखी जाती हैं। इस विधि में गृहिणी को सामान्यत: भोजन पोसने के लिए तत्पर रहना आवश्यक है। प्रारम्भिक रूप में गृहिणी थोड़ा-थोड़ा भोजन थालियों में परोसती है तथा आवश्यकता पड़ने पर खाने वाले सदस्य से पूछकर दोबारा डालती है। यह बात गृहिणी के ध्यान रखने योग्य है कि शुरू में ही वह थाली में इतना भोजन न परोसे कि खाया ही न जाए तथा व्यर्थ जाए, बल्कि खाने वाले की इच्छानुसार पूछकर देना चाहिए।

देशी विधि में बदलते समय के साथ-साथ कुछ परिवर्तन भी होते रहे हैं, जैसे अब विदेशी विधि की भान्ति डोंगों में भोज्य पदार्थों को रखकर परिवार के सारे सदस्य भूमि में आसन बिछाकर एक साथ भोजन करते हैं।

2. विदेशी विधि- यह विधि परा-भारतीय है किन्तु भारत में अब इसका काफ़ी प्रचलन है। इस विधि में एक बड़ी मेज़ के चारों ओर कुर्सियाँ लगी होती हैं। मेज़ पर सभी खाद्य पदार्थ डोंगों, प्लेटों आदि में मेज़ के मध्य में सजा दिए जाते हैं। भोजन करने वाले व्यक्ति कुर्सियों पर बैठते हैं तथा अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार अपनी प्लेट में भोज्य पदार्थ लेते हैं। आवश्यकता पड़ने पर दोबारा या अधिक बार वह अपने आप भोजन डोंगों से ले लेते हैं। इस विधि में बार-बार परोसने के लिए किसी अतिरिक्त व्यक्ति की आवश्यकता नहीं होती । अतः सभी व्यक्ति एक साथ भोजन कर सकते हैं। इस विधि में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए-

  • प्रत्येक डोंगे के साथ एक सर्विस चम्मच होना चाहिए।
  • प्रत्येक व्यक्ति के प्रयोग के लिए नेपकिन होते हैं जिससे कपड़े खराब नहीं होते।
  • प्रत्येक व्यक्ति के सामने एक बड़ी प्लेट होती है।
  • छुरी, काँटे की उचित व्यवस्था हो। छुरी प्लेट के दायीं ओर हो तथा उसकी धार प्लेट की तरफ़ होनी चाहिए। काँटे प्लेट के बायीं ओर सीधे रखने चाहिएँ।
  • मेज़ पर एक सुन्दर फूलदान रखना चाहिए लेकिन यह इस स्थिति में रखा जाए कि भोजन लेने में उससे रुकावट उत्पन्न न हो।

आजकल देशी-विदेशी दोनों विधियों का मिला-जुला रूप कई स्थानों पर देखने को मिलता है। जो भी हो, भोजन परोसने की विधि ऐसी मनोहारी, स्वच्छ व रुचिकर होनी चाहिए जिसमें आकर्षण झलकता हो।

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प्रश्न 2.
खाने की मेज़ की व्यवस्था करना क्यों आवश्यक है ? यह व्यवस्था कैसे की जाती है ?
उत्तर-
मेज़ पर खाना परोसने से पहले मेज़ की व्यवस्था करना ज़रूरी है। मेज़ की व्यवस्था खाना खाने के काम को सुविधाजनक बनाने के लिए की जाती है। मेज़ की व्यवस्था से गहिणी का व्यक्तित्व प्रकट होता है।

मेज़ की व्यवस्था में कोई जटिल नियम नहीं होते हैं। भोजन के परोसे जाने की विधि; मीन का चुनाव, मेज़ का आकार, इन सब पर मेज़-व्यवस्था निर्भर करती है। भोजन परोसने की विधि के अनुसार हम वस्तुओं की स्थिति निर्धारित करते हैं।

मेज़पोश-मेज़ पर मेज़पोश, मैट्स, नेपकिन इत्यादि की आवश्यकता होती है। आजकल सनमाइका के मेज़ होने के कारण मेज़पोश तथा मैट्स की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि कागज़ के नैपकिन के इस्तेमाल से ही काम चल जाता है। यदि इन वस्तुओं का इस्तेमाल करना हो तो निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए
1. मेज़पोश मेज़ के चारों तरफ 30-40 सेमी० से ज्यादा नहीं लटकना चाहिए।

2. मेज़ चौड़ी हो तो मैट्स को मेज़ के किनारों से 3-4 सेमी. दूरी पर रखनी चाहिए। यदि मेज़ कम चौड़ी हो तो मैट्स को किनारों के साथ-साथ लगाया जाना चाहिए।

3. मेज़ की सज्जा रुचि अनुसार की जाती है। यदि बैठकर भोजन करना हो तो फूल सज्जा नीची रखनी चाहिए और यदि खड़े होकर खाने का प्रबन्ध हो तो ऊँचे आकार की फूल सज्जा रखी जाती है।

4. नेपकिन के रंग ध्यानपूर्वक चुनने चाहिएँ। नेपकिन रखने से पहले कई तरह से तह लगाया जा सकता है, जैसे-चौरस, आयताकार आदि। नेपकिन को मैट्स पर प्लेट के बाईं तरफ या प्लेट के ऊपर ही रखा जाता है।

5. चीनी और काँच के बर्तन आदि रखने के लिए ठीक स्थान होना चाहिए। पानी के गिलास को छुरी के एक दम सामने रखना चाहिए। सब्जी की प्लेटें चम्मच के दाईं ओर रखनी चाहिएँ। डोंगे मेज़ के मध्य भाग में ही रखने चाहिए।

5. चम्मच, छुरी, काँटे खाना खाने की सुविधा के लिए होते हैं । खाना खाने की छुरी को प्लेट के दाईं तरफ़ तथा चम्मचों को छुरी के बाईं तरफ रखना चाहिए। काँटे को प्लेट की बाईं ओर रखना चाहिए।

6. यदि मेहमानों की संख्या उपलब्ध स्थान से ज्यादा हो तो इसका सरल समाधान बुफे सर्विस है। बड़ी मेज़ के साथ छोटी मेजें लगाकर डेजर्ट तथा पानी की व्यवस्था की जा सकती है।

प्रश्न 3.
मेज़ लगाने के आधुनिक तरीके से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 4 भारतीय ढंग से मेज़ लगाना

भारतीय ढंग से मेज़ लगाना PSEB 8th Class Home Science Notes

  • खाना खाने के दो तरीके हैं-एक पुरातन और दूसरा आधुनिक।
  • भारतीय ढंग के अनुसार खाना खाने के लिए दाएँ हाथ का इस्तेमाल करते हैं और खाना उँगलियों से खाते हैं।
  • दक्षिणी भारत में प्लेटों या थाली की जगह केले के पत्ते इस्तेमाल करते हैं।
  • भारतीय ढंग में घर की स्त्री पति के बाएँ ओर बैठती है।
  • मेज़ को सजाने के लिए फूलदान, फ्रूट ट्रे आदि इस्तेमाल करते हैं।
  • खाना परोसते समय बर्तन साफ़, बेदाग और चमकते हुए होने चाहिएँ।
  • खाना खाते समय मुँह से चपचप की आवाज़ नहीं आनी चाहिए।
  • भोजन करते समय प्रसन्नचित्त रहना चाहिए।
  • गर्म भोजन के साथ ठंडा और ठंडे भोजन के साथ गर्म पानी नहीं पीना चाहिए।
  • रात को सोने से एक घंटा पहले खाना खा लेना चाहिए। भोजन करके तुरन्त नहीं सोना चाहिए।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 8 राजनीति, धर्म, अर्थ प्रणाली तथा शिक्षा

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions Chapter 8 राजनीति, धर्म, अर्थ प्रणाली तथा शिक्षा Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology Chapter 8 राजनीति, धर्म, अर्थ प्रणाली तथा शिक्षा

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
शक्ति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
शक्ति समूह या व्यक्तियों का वह सामर्थ्य है जिससे वह उस समय अपनी बात मनवाते हैं जब उनका विरोध हो रहा होता है।

प्रश्न 2.
मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सत्ता के तीन प्रकार बताइये।
उत्तर-
परंपरागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मायी सत्ता।

प्रश्न 3.
अर्थव्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
समाजशास्त्रियों के अनुसार मानवीय क्रियाएं जो भोजन अथवा सम्पत्ति से संबंधित होती हैं, अर्थ व्यवस्था को बनाती हैं।

प्रश्न 4.
राज्य के कोई दो तत्व बताइये।
उत्तर-
जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र, प्रभुसत्ता तथा सरकार राज्य के प्रमुख तत्त्व हैं।

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प्रश्न 5.
जीववाद का सिद्धांत किसने प्रस्तुत किया ?
उत्तर-
ई० बी० टाईलर (E.B. Tylor) ने जीववाद का सिद्धांत दिया था।

प्रश्न 6.
किसने पवित्र तथा सामान्य वस्तुओं में अंतर किया ?
उत्तर-
दुर्थीम (Durkheim) ने पवित्र तथा अपवित्र वस्तुओं में अंतर दिया था।

प्रश्न 7.
प्रकृतिवाद के विचार की चर्चा किसने की ?
उत्तर-
प्रकृतिवाद का सिद्धांत मैक्स मूलर (Max Muller) ने दिया था।

प्रश्न 8.
किसने धर्म को ‘आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास’ माना है ?
उत्तर-
ई० बी० टाईलर ने धर्म को परा प्राकृतिक शक्ति में विश्वास कहा था।

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प्रश्न 9.
दो ऐसे धर्मों के नाम बताइये जो भारत में बाहर से आये हैं।
उत्तर-
ईसाई और इस्लाम दो धर्म हैं जो भारत में बाहर से आए हैं।

प्रश्न 10.
सम्प्रदाय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
सम्प्रदाय एक धार्मिक विचार व्यवस्था का एक उपसमूह है तथा साधारणतया यह बड़े धार्मिक समूह से निकला एक हिस्सा होता है।

प्रश्न 11.
पंथ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
पंथ एक धार्मिक संगठन है जो किसी एक व्यक्तिगत नेता के विचारों तथा विचारधारा में से निकला है।

प्रश्न 12.
कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत पूंजीवादी समाज में दो प्रमुख वर्गों के नाम बताइये।
उत्तर-
पूंजीवादी वर्ग तथा मज़दूर वर्ग।

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प्रश्न 13.
औपचारिक शिक्षा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वह शिक्षा जो हम स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय इत्यादि में लेते हैं, वह औपचारिक शिक्षा होती है।

प्रश्न 14.
अनौपचारिक शिक्षा को परिभाषित दीजिए।
उत्तर-
वह शिक्षा जो हम अपने परिवार से, रोज़ाना के अनुभवों से प्राप्त करते हैं, अनौपचारिक शिक्षा होती है।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
राज्यहीन समाज किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जिन समाजों में राज्य नामक संस्था नहीं होती वह राज्य रहित समाज होते हैं। वे सादा या प्राचीन समाज होते हैं। यहां कम जनसंख्या होती है जिस कारण लोगों के बीच आमने-सामने के रिश्ते होते हैं तथा सामाजिक नियंत्रण के लिए समाज या सरकार जैसे किसी औपचारिक साधन की आवश्यकता नहीं होती। यहां बुजुर्गों की सभा से नियंत्रण किया जाता है।

प्रश्न 2.
करिश्मई सत्ता पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-
जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से इतना प्रभावित होता है कि उसके कहने के अनुसार वह कुछ भी कर जाता है तो इस प्रकार की सत्ता करिश्मई सत्ता होती है। किसी व्यक्ति का करिश्मई व्यक्तित्व होता है तथा लोग उससे प्रभावित हो जाते हैं। धार्मिक नेता, राजनीतिक नेता इस प्रकार की सत्ता का प्रयोग करते हैं।

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प्रश्न 3.
वैधानिक-तार्किक सत्ता किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जो सत्ता कुछ नियमों-कानूनों के अनुसार प्राप्त होती है उसे वैधानिक सत्ता का नाम दिया जाता है। सरकार के पास वैधानिक सत्ता होती है तथा प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री, अधिकारी इस प्रकार की सत्ता का प्रयोग करते हैं जो संविधान की सहायता से प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 4.
पंचायती राज प्रणाली के दो गुण लिखिए।
उत्तर-

  1. पंचायती राज व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर लागू किया जाता है तथा साधारण जनता को भी सत्ता में भागीदारी करने का मौका प्राप्त होता है।
  2. इस व्यवस्था में स्थानीय स्तर की समस्याओं का स्थानीय स्तर पर ही समाधान कर लिया जाता है तथा कार्य भी जल्दी हो जाता है।

प्रश्न 5.
जीववाद (Animism) और प्रकृतिवाद (Naturism) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-

  1. जीववाद-यह सिद्धान्त Tylor ने दिया था तथा इसके अनुसार धर्म का उद्भव आत्मा के विचार से सामने आया अर्थात् लोग आत्माओं में विश्वास रखते हैं तथा इससे ही धर्म का जन्म हुआ।
  2. प्रकृतिवाद-इसके अनुसार प्राचीन समय में मनुष्य प्राकृतिक घटनाओं जैसे कि वर्षा, बर्फानी तूफान, आग इत्यादि से डरता था। इसलिए उसने प्रकृति की पूजा करनी शुरू की तथा धर्म सामने आया।

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प्रश्न 6.
हित समूह किसे कहते हैं ?
उत्तर-
हित समूह एक विशेष समूह के लोगों की तरफ से बनाए गए समूह हैं जो केवल अपने सदस्यों के हितों के लिए कार्य करते हैं। उन हितों की प्राप्ति के लिए वह अन्य समूहों के हितों की भी परवाह नहीं करते। उदाहरण के लिए मज़दूर संघ, ट्रेड यूनियन, फिक्की (FICCI) इत्यादि।

प्रश्न 7.
पवित्र एवं सामान्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
दुर्थीम ने धर्म से संबंधित पवित्र तथा साधारण वस्तुओं के बारे में बताया था। उनके अनुसार पवित्र वस्तुएं वे हैं जिन्हें हमसे ऊंचा तथा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। ये असाधारण होती हैं तथा रोज़ाना के कार्यों से दूर होती हैं परन्तु बहुत-सी वस्तुएं ऐसी होती हैं जो रोज़ाना हमारे सामने आती हैं तथा प्रयोग की जाती हैं। इन्हें साधारण वस्तुएं कहा जाता है।

प्रश्न 8.
टोटमवाद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
टोटमवाद में कोई जनजाति स्वयं को किसी वस्तु, मुख्य रूप से कोई जानवर, पेड़, पौधा, पत्थर या किसी अन्य वस्तु से संबंधित मान लेती है। जिस वस्तु के प्रति उसका श्रद्धा भाव होता है वह जनजाति उस वस्तु के नाम को अपना लेती है तथा उसकी पूजा करती है। वह स्वयं को उस टोटम से पैदा हुई मान लेती है।

प्रश्न 9.
पशुपालक अर्थव्यवस्था (Pastoral Economy) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में समाज अपनी जीविका कमाने के लिए घरेलू जानवरों पर निर्भर करते हैं। इन्हें चरवाहे कहा जाता है। वह भेड़ों-बकरियों, गाय, ऊंट, घोड़े इत्यादि रखते हैं। इस प्रकार के समाज घास वाले हरे-भरे मैदानों या पहाड़ों में मिलते हैं। मौसम बदलने से यह लोग स्थान भी बदल लेते हैं।

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प्रश्न 10.
कृषि अर्थव्यवस्था किस प्रकार औद्योगिक अर्थव्यवस्था से भिन्न है ?
उत्तर-
कृषि अर्थव्यवस्था में लोगों का मुख्य पेशा कृषि होता है तथा वे कृषि करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वहां कम जनसंख्या तथा अनौपचारिक संबंध होते हैं। परन्तु औद्योगिक अर्थव्यवस्था में लोग उद्योगों में कार्य करके पैसे कमाते हैं। वहां अधिकतर जनसंख्या तथा लोगों के बीच औपचारिक संबंध होते हैं।

प्रश्न 11.
जजमानी प्रणाली किसे कहते हैं ?
उत्तर-
यह व्यवस्था सेवा लेने तथा देने की व्यवस्था है जिसमें निम्न जातियां उच्च जातियों को अपनी सेवाएं देती हैं तथा सेवा देने वाली जाति को अपनी सेवाओं का मेहनताना मिल जाता है। सेवा लेने वाले को जजमान कहा जाता है तथा सेवा देने वाले को कमीन कहा जाता है।

प्रश्न 12.
पूंजीवादी समाज पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-
पश्चिमी समाजों को पूंजीवादी समाज कहा जाता है जहां उद्योगों में पूंजी लगाकर पैसा कमाया जाता है। उद्योगों के मालिकों के हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा वे मजदूरों को काम पर रख कर वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। पूंजीवाद का मुख्य तत्त्व है मज़दूरों, उत्पादन के साधनों, उद्योगों, मशीनों तथा मालिकों के बीच संबंध। .

प्रश्न 13.
समाजवादी समाज किसे कहते हैं ?
उत्तर-
यह संकल्प 19वीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने दिया था, जिसके अनुसार सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था मज़दूरों के हाथों में होती है। मजदूर उद्योगपतियों के विरुद्ध क्रांति करके उनकी सत्ता खत्म कर देंगे तथा वर्ग रहित समाज की स्थापना करेंगे। सभी लोग कानून के सामने समान होंगे तथा उन्हें उनकी आवश्यकता के अनुसार सरकार की तरफ से मिल जाएगा।

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प्रश्न 14.
शिक्षा के निजीकरण का उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
आजकल प्रत्येक गांव, कस्बे तथा नगर में निजी स्कूल आरंभ हो गए हैं। नगरों में निजी कॉलेज खल गए हैं तथा देश के कई भागों में निजी विश्वविद्यालय खुल गए हैं। यह शिक्षा के निजीकरण के उदाहरण हैं।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
धर्म पर एमिल दुर्खाइम के विचारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
दुर्थीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की ठोस व्यवस्था है जो इन पर विश्वास करने वालों को नैतिक रूप प्रदान करती है। दुर्शीम ने सभी धार्मिक विश्वासों तथा आदर्शात्मक वस्तुओं को ‘पवित्र’ तथा ‘साधारण’ दो वर्गों में विभाजित किया है। पवित्र वस्तुओं में देवताओं तथा आध्यात्मिक शक्तियों या आत्माओं के अतिरिक्त गुफाएं, पेड़, पत्थर, नदी इत्यादि शामिल हो सकते हैं। साधारण वस्तुओं की तुलना में पवित्र वस्तुएं अधिक शक्ति तथा शान रखती हैं। दुर्थीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं अर्थात् अलग व प्रतिबन्धित वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा क्रियाओं की संगठित व्यवस्था है।” .

प्रश्न 2.
धर्म किस प्रकार समाज में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ?
उत्तर-
सामाजिक संगठन को बनाए रखने के लिए धर्म महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। एक धर्म में लाखों लोग होते हैं जिनके एक समान विश्वास होते हैं। यह विश्वास, प्रतिमान, व्यवहार के तरीके एक धार्मिक समूह को मिला देते हैं जिससे समूह में एकता बनी रहती है। इस प्रकार ही अलग-अलग समूहों में एकता के साथ सामाजिक संगठन बना रहता है। प्रत्येक धर्म अपने लोगों को दान देने व सहयोग करने के लिए कहता है जिससे समाज में मज़बूती तथा स्थिरता बनी रहती है। इस प्रकार धर्म का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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प्रश्न 3.
शिक्षा संस्था से क्या अभिप्राय है ? सरकार द्वारा अपनायी गयी शिक्षा नीतियों के विषय में लिखिए।
उत्तर-
शैक्षिक संस्था वह होती है जो व्यक्ति को शिक्षा देकर उसे आवश्यक ज्ञान देती है तथा उसे उत्तरदायी नागरिक बनाती है। सरकार की तरफ से लागू की गई शैक्षिक नीतियों का वर्णन इस प्रकार है

  • हमारे संविधान के अनुच्छेद 45 के अनुसार 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त तथा आवश्यक शिक्षा प्रदान की जाएगी।
  • 1960 के कोठारी कमीशन ने सभी बच्चों के स्कूल आने तथा उन्हें लगाकर पढ़ाने पर बल दिया था।
  • 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अपनाया गया था जिसमें वोकेशनल ट्रेनिंग तथा पिछड़े समूहों के लिए शैक्षिक सुविधाओं पर बल दिया।
  • सर्व शिक्षा अभियान 1986 तथा 1992 ने इस बात पर बल दिया कि 6-14 वर्ष के सभी बच्चों को आवश्यक शिक्षा प्रदान की जाए।
  • 2010 में शिक्षा का अधिकार (Right to Education) लागू किया गया जिसके अनुसार 6-14 वर्ष के बच्चों को क्लासों में 8 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा दी जाएगी।

प्रश्न 4.
शिक्षा के प्रकार्यों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-

  • शिक्षा व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहायता करती है।
  • शिक्षा व्यक्तियों को समाज से जोड़ती है।
  • यह समाज में तालमेल बिठाने में सहायता करती है।
  • यह व्यक्ति की योग्यता बढ़ाने में सहायता करती है।
  • शिक्षा संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने में सहायता करती है।
  • शिक्षा से बच्चों में नैतिक गुणों का विकास होता है।
  • शिक्षा व्यक्ति के समाजीकरण में सहायक होती है।

प्रश्न 5.
मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सत्ता के प्रकारों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
मैक्स वैबर ने सत्ता के तीन प्रकारों का वर्णन किया है-परंपरागत, वैधानिक तथा करिश्मई सत्ता। परंपरागत सत्ता वह होती है जो परंपरागत रूप से प्राचीन समय ही चलती आ रही है तथा जिसके विरुद्ध कोई किन्तु परन्तु नहीं होता। पिता के घर में इस प्रकार की सत्ता होती है। वैधानिक सत्ता वह होती है जो कुछ नियमों, कानूनों के अनुसार प्राप्त की जाती है। सरकार को प्राप्त सत्ता इस प्रकार की सत्ता है। करिश्मई सत्ता वह होती है जो किसी के करिश्मई व्यक्तित्व के कारण उसे प्राप्त हो जाती है तथा उसके चेले उसकी सत्ता बिना किसी प्रश्न के मानते हैं। धार्मिक नेता, राजनीतिक नेता इस प्रकार की सत्ता भोगते हैं।

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प्रश्न 6.
राज्य समाज एवं राज्यहीन समाज में अंतर कीजिए।
उत्तर-
1. राज्य समाज (State Less Society)-आधुनिक समाजों को राज्य वाले समाज कहा जाता है जहां सत्ता राज्य नामक संस्था के हाथों में केन्द्रित होती है परन्तु इसे जनता से प्राप्त किया जाता है। मैक्स वैबर के अनुसार राज्य वह मानवीय समुदाय है जो एक निश्चित क्षेत्र में शारीरिक बल के साथ सत्ता का उपभोग करता

2. राज्य हीन समाज (State Less Society)-जिन समाजों में राज्य नामक संस्था नहीं होती वह राज्य हीन समाज होते हैं। ये सादा या प्राचीन समाज होते हैं। यहां कम जनसंख्या होती है जिस कारण लोगों के बीच आमनेसामने के रिश्ते होते हैं तथा सामाजिक नियंत्रण के लिए राज्य या सरकार जैसे किसी औपचारिक साधन की कोई आवश्यकता नहीं होती। यहां बुजुर्गों की सभा से नियंत्रण रखा जाता है।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1.
राजनीतिक संस्थाओं से आप क्या समझते हैं, विस्तार से चर्चा कीजिए ।
उत्तर-
हमारा समाज काफ़ी बड़ा है तथा राजनीतिक व्यवस्था इसका एक भाग है। राजनीतिक व्यवस्था मनुष्यों की भूमिकाओं को परिभाषित करती है। राजनीति तथा समाज में काफ़ी गहरा संबंध है। सामाजिक मनुष्यों को नियंत्रण में करने के लिए राजनीतिक संस्थाओं की आवश्यकता होती है तथा वह राजनीतिक संस्थाएं हैं शक्ति, सत्ता, राज्य, सरकार, विधानपालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका इत्यादि। ये राजनीतिक संस्थाएं हमारे समाज के ऊपर औपचारिक नियंत्रण रखती हैं तथा यह नियंत्रण रखने के उनके अपने साधन होते हैं जैसे कि सरकार, पुलिस, सेना, न्यायालय इत्यादि। इस प्रकार राजनीतिक संस्थाएं वह साधन हैं जिनकी सहायता से समाज में शांति तथा व्यवस्था बना कर रखी जाती है। राजनीतिक संस्थाएं मुख्य रूप से समाज में शक्ति के वितरण से संबंध रखती हैं। राजनीतिक संस्थाओं में शक्ति तथा सत्ता को समझना आवश्यक है।

(i) शक्ति (Power)-शक्ति किसी व्यक्ति या समूह का सामर्थ्य होता है जिसके द्वारा वह अन्य लोगों पर अपनी इच्छा थोपता है चाहे उसका विरोध ही क्यों न हो रहा हो। इसका अर्थ है कि जिनके पास शक्ति होती है वह अन्य लोगों की कीमत पर शक्ति का भोग कर रहे होते हैं। समाज में शक्ति सीमित मात्रा में होती है। जिन लोगों या समूहों के पास अधिक शक्ति होती है वह कम शक्ति वाले समूहों या व्यक्तियों के ऊपर शक्ति का प्रयोग करते हैं तथा उन्हें प्रभावित करते हैं। इस प्रकार शक्ति अपने तथा अन्य लोगों के निर्णय लेने की वह सामर्थ्य है जिसमें वे देखा जाता है कि जिनके लिए निर्णय लिया गया है क्या वह उस निर्णय की पालना कर रहे हैं या नहीं। परिवार के बड़े बुजुर्ग, किसी कंपनी का जनरल मैनेजर, सरकार, मंत्री इत्यादि ऐसी शक्ति का प्रयोग करते हैं।

(ii) सत्ता (Authority)–शक्ति का सत्ता के द्वारा उपभोग किया जाता है। सत्ता शक्ति का ही एक रूप है जो वैधानिक तथा सही है। यह संस्थात्मक है तथा वैधता पर आधारित होती है जिनके पास सत्ता होती है। उनकी बात सभी को माननी पड़ती है तथा इसे वैध भी माना जाता है। सत्ता न केवल व्यक्तियों के ऊपर बल्कि समूहों तथा संस्थाओं पर भी लागू होती है। उदाहरण के लिए तानाशाही में सत्ता एक व्यक्ति, समूह या दल के हाथों में होती है जबकि लोकतंत्र में यह सत्ता जनता या उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में होती है।

मैक्स वैबर ने तीन प्रकार की सत्ता का जिक्र किया है तथा वह हैं परंपरागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मयी सत्ता। पिता की घर में सत्ता परंपरागत सत्ता होती है, प्रधानमंत्री की सत्ता वैधानिक तथा किसी धार्मिक नेता की अपने चेलों पर स्थापित सत्ता करिश्मयी सत्ता होती है।

(iii) राज्य (State)—राज्य सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संस्था है। राज्य एक ऐसा लोगों का समूह है जो एक निश्चित भू-भाग में होता है, जिसकी जनसंख्या होती है, जिसकी अपनी एक सरकार होती है तथा अपनी प्रभुसत्ता होती है। राज्य एक सम्पूर्ण समाज का हिस्सा है। बेशक यह सामाजिक जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित करता है परन्तु फिर भी यह समाज का स्थान कोई नहीं ले सकता। राज्य एक ऐसा साधन है जो सामाजिक समितियों को नियंत्रण में रखता है। राज्य समाज के सभी पक्षों को प्रभावित करता है तथा उनमें तालमेल बिठाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(iv) सरकार (Government)-सरकार एक ऐसा संगठन होता है जिसके पास आदेशात्मक कन्ट्रोल होता है जो वे राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखने में सहायता करता है। सरकार को वैधता भी प्राप्त होती है क्योंकि सरकार किसी न किसी नियम के अन्तर्गत चुनी जाती है। इसे बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है। सरकार राज्य के उद्देश्यों को पूर्ण करने का एक साधन है। यह राज्य का यन्त्र तथा उसका प्रतीक है। सरकार के तीन अंग होते हैंविधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका।

  • विधानपालिका (Legislature)-यह सरकार का वह अंग है जिसका कार्य देश के लिए कानून बनाना है। देश की संसद् विधानपालिका का कार्य करती है।
  • कार्यपालिका (Executive) यह सरकार का वह अंग है जो विधानपालिका द्वारा बनाए गए कानूनों को देश में लागू करती है। राष्ट्रीय, प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल इसका हिस्सा होते हैं।
  • न्यायपालिका (Judiciary)-सरकार का वह अंग है जो विधानपालिका द्वारा बनाए तथा कार्यपालिका द्वारा लागू किए कानूनों का प्रयोग करता है। हमारे न्यायालय, जज़ इत्यादि इसका हिस्सा होते हैं।

इस प्रकार अलग-अलग राजनीतिक संस्थाएं भी देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए अपना योगदान देती हैं। यह संस्थाएं बिना एक-दूसरे के क्षेत्र में आए अपना कार्य ठीक ढंग से करती रहती हैं।

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प्रश्न 2.
पंचायती राज्य पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
हमारे देश में स्थानीय क्षेत्रों के विकास के लिए दो प्रकार की पद्धतियां हैं। शहरी क्षेत्रों का विकास करने के लिए स्थानीय सरकारें होती हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करने के लिए पंचायती राज्य की संस्थाएं होती हैं। स्थानीय सरकार की संस्थाएं श्रम विभाजन के सिद्धान्त पर आधारित होती हैं क्योंकि इनमें सरकार तथा स्थानीय समूहों में कार्यों को बांटा जाता है। हमारे देश की 70% जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों को जिस स्थानीय सरकार की संस्था द्वारा शासित किया जाता है उसे पंचायत कहते हैं। पंचायती राज्य सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों के संस्थागत ढांचे को ही दर्शाता है।

जब भारत में अंग्रेजी राज्य स्थापित हुआ था तो सारे देश में सामन्तशाही का बोलबाला था। 1935 में भारत सरकार ने एक कानून पास किया जिसने प्रान्तों को पूर्ण स्वायत्तता दी तथा पंचायती कानूनों को एक नया रूप दिया गया। पंजाब में 1939 में पंचायती एक्ट पास हुआ जिसका उद्देश्य पंचायतों को लोकतान्त्रिक आधार पर चुनी हुई संस्थाएं बना कर ऐसी शक्तियां प्रदान करना था जो उनके स्वैशासन की इकाई के रूप में निभायी जाने वाली भूमिका के लिए ज़रूरी थीं। 2 अक्तूबर, 1961 ई० को पंचायती राज्य का तीन स्तरीय ढांचा औपचारिक रूप से लागू किया गया। 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन हुआ जिनमें शक्तियों का स्थानीय स्तर तक विकेन्द्रीकरण कर दिया गया। इससे पंचायती राज्य को बहुत-सी वित्तीय तथा अन्य शक्तियां दी गईं।

भारत के ग्रामीण समुदाय में पिछले 50 सालों में बहुत-से परिवर्तन आए हैं। अंग्रेज़ों ने भारतीय पंचायतों से सभी प्रकार के अधिकार छीन लिए थे। वह अपनी मर्जी के अनुसार गांवों को चलाना चाहते थे जिस कारण उन्होंने गांवों में एक नई तथा समान कानून व्यवस्था लागू की। आजकल की पंचायतें तो आज़ादी के बाद ही कानून के तहत सामने आयी हैं।
ए० एस० अलटेकर (A.S. Altekar) के अनुसार, “प्राचीन भारत में सुरक्षा, लगान इकट्ठा करना, कर लगाने तथा लोक कल्याण के कार्यक्रमों को लागू करना इत्यादि जैसे अलग-अलग कार्यों की जिम्मेदारी गांव की पंचायत की होती थी। इसलिए ग्रामीण पंचायतें विकेन्द्रीकरण, प्रशासन तथा शक्ति की बहुत ही महत्त्वपूर्ण संस्थाएं हैं।”

के० एम० पानीकर (K.M. Pannikar) के अनुसार, “यह पंचायतें प्राचीन भारत के इतिहास का पक्का आधार हैं। इन संस्थाओं ने देश की खुशहाली को मज़बूत आधार प्रदान किया है।”

संविधान के Article 30 के चौथे हिस्से में कहा गया है कि, “गांव की पंचायतों का संगठन-राज्य को गांव की पंचायतों के संगठन को सत्ता तथा शक्ति प्रदान की जानी चाहिए ताकि यह स्वैः सरकार की इकाई के रूप में कार्य कर सकें।”

गांवों की पंचायतें गांव के विकास के लिए बहुत-से कार्य करती हैं जिस लिए पंचायतों के कुछ मुख्य उद्देश्य रखे गए हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है।

पंचायतों के उद्देश्य (Aims of Panchayats) –

  1. पंचायतों को स्थापित करने का सबसे पहला उद्देश्य है लोगों की समस्याओं को स्थानीय स्तर पर ही हल करना। ये पंचायतें लोगों के बीच के झगड़ों तथा समस्याओं को हल करती हैं।
  2. गांव की पंचायतें लोगों के बीच सहयोग, हमदर्दी, प्यार की भावनाएं पैदा करती हैं ताकि सभी लोग गांव की प्रगति में योगदान दे सकें।
  3. पंचायतों को गठित करने का एक और उद्देश्य है लोगों को तथा पंचायत के सदस्यों को पंचायत का प्रशासन ठीक प्रकार से चलाने के लिए शिक्षित करना ताकि सभी लोग मिल कर गांव की समस्याओं के हल निकाल सकें। इस तरह लोक कल्याण का कार्य भी पूर्ण हो जाता है।

गांवों की पंचायतों का संगठन (Organisation of Village Panchayats)-गांवों में दो प्रकार की पंचायतें होती हैं। पहली प्रकार की पंचायतें वे होती हैं जो सरकार द्वारा बनाए कानूनों अनुसार चुनी जाती हैं तथा ये औपचारिक होती हैं। दूसरी पंचायतें वे होती हैं जो अनौपचारिक होती हैं तथा इन्हें जाति पंचायतें भी कहा जाता है। इनकी कोई कानूनी स्थिति नहीं होती है परन्तु यह सामाजिक नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

पंचायतों में तीन तरह का संगठन पाया जाता है-

  1. ग्राम सभा (Gram Sabha)
  2. ग्राम पंचायत (Gram Panchayat)
  3. न्याय पंचायत (Nyaya Panchayat)

ग्राम सभा (Gram Sabha) गांव की सम्पूर्ण जनसंख्या में से बालिग व्यक्ति इस ग्राम सभा का सदस्य होता है तथा यह गांव की सम्पूर्ण जनसंख्या की एक सम्पूर्ण इकाई है। यह वह मूल इकाई है जिसके ऊपर हमारे लोकतन्त्र का ढांचा टिका हुआ है। जिस ग्राम की जनसंख्या 250 से अधिक होती है वहां ग्राम सभा बन सकती है। अगर एक गांव की जनसंख्या कम है तो दो गांव मिलकर ग्राम सभा का निर्माण करते हैं। ग्राम सभा में गांव का प्रत्येक वह बालिग सदस्य होता है जिस को वोट देने का अधिकार होता है। प्रत्येक ग्राम सभा का एक प्रधान तथा कुछ सदस्य होते हैं। यह पांच सालों के लिए चुने जाते हैं।

ग्राम सभा के कार्य (Functions of Gram Sabha)-पंचायत के सालाना बजट तथा विकास के लिए किए जाने वाले कार्यक्षेत्रों को ग्राम सभा पेश करती है तथा उन्हें लागू करने में मदद करती है। यह समाज कल्याण के कार्य, प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम तथा परिवार कल्याण के कार्यों को करने में मदद करती है। यह गांवों में एकता रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ग्राम पंचायत (Gram Panchayat)-हर एक ग्राम सभा अपने क्षेत्र में से एक ग्राम पंचायत को चुनती है। इस तरह ग्राम सभा एक कार्यकारिणी संस्था है जो ग्राम पंचायत के लिए सदस्य चुनती है। इनमें 1 सरपंच तथा 5 से लेकर 13 पंच होते हैं। पंचों की संख्या गांव की जनसंख्या के ऊपर निर्भर करती है। पंचायत में पिछडी श्रेणियों तथा औरतों के लिए स्थान आरक्षित होते हैं। यह 5 वर्ष के लिए चुनी जाती है। परन्तु अगर पंचायत अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करे तो राज्य सरकार उसे 5 साल से पहले भी भंग कर सकती है। अगर किसी ग्राम पंचायत को भंग कर दिया जाता है तो उसके सभी पद भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं। ग्राम पंचायत के चुनाव तथा पंचों को चुनने के लिए गांव को अलग-अलग हिस्सों में बांट लिया जाता है। फिर ग्राम सभा के सदस्य पंचों तथा सरपंच का चुनाव करते हैं। ग्राम पंचायत में स्त्रियों के लिए आरक्षित सीटें कुल सीटों का एक तिहायी (1/3) होती हैं तथा पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित सीटें गांव या उस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार होती हैं। ग्राम पंचायत में सरकारी नौकर तथा मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते। ग्राम पंचायतें गांव में सफ़ाई, मनोरंजन, उद्योग, संचार तथा यातायात के साधनों का विकास करती हैं तथा गांव की समस्याओं का समाधान करती पंचायतों के कार्य (Functions of Panchayat) ग्राम पंचायत गांव के लिए बहुत-से कार्य करती है जिनका वर्णन इस प्रकार है-

1. ग्राम पंचायत का सबसे पहला कार्य गांव के लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाना होता है। गांव में बहुत-सी सामाजिक बुराइयां भी पायी जाती हैं। पंचायत लोगों को इन बुराइयों को दूर करने के लिए प्रेरित करती है तथा उनके परम्परागत दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास करती है।

2. किसी भी क्षेत्र के सर्वपक्षीय विकास के लिए यह ज़रूरी है कि उस क्षेत्र से अनपढ़ता ख़त्म हो जाए तथा भारतीय समाज के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण भी यही है। भारतीय गांव भी इसी कारण पिछड़े हुए हैं। गांव की पंचायत गांव में स्कूल खुलवाने तथा लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती है। बालिगों को पढ़ाने के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खुलवाने का भी प्रबन्ध करती है।

3. गांव की पंचायत गांव की स्त्रियों तथा बच्चों की भलाई के लिए भी कार्य करती है। वह औरतों को शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध करती है। बच्चों को अच्छी खुराक तथा उनके मनोरंजन के कार्य का प्रबन्ध भी पंचायत ही करती है।

4. ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन के साधन नहीं होते हैं। इसलिए पंचायतें ग्रामीण समाजों में मनोरंजन के साधन उपलब्ध करवाने का प्रबन्ध भी करती है। पंचायतें गांव में फिल्मों का प्रबन्ध, मेले लगवाने तथा लाइब्रेरी इत्यादि खुलवाने का प्रबन्ध करती है।

5. कृषि प्रधान देश में उन्नति के लिए कृषि के उत्पादन में बढ़ोत्तरी होनी ज़रूरी होती है। पंचायतें लोगों को नई तकनीकों के बारे में बताती है, उनके लिए नए बीजों, उन्नत उर्वरकों का भी प्रबन्ध करती है ताकि उनके कृषि उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी हो सके।

6. गांवों के सर्वपक्षीय विकास के लिए गांवों में छोटे-छोटे उद्योग लगवाना भी जरूरी होता है। इसलिए पंचायतें गांव में सरकारी मदद से छोटे-छोटे उद्योग लगवाने का प्रबन्ध करती हैं। इससे गांव की आर्थिक उन्नति भी होती है तथा लोगों को रोजगार भी प्राप्त होता है।

7. कृषि के अच्छे उत्पादन में सिंचाई के साधनों का अहम रोल होता है। ग्राम पंचायत गांव में कुएँ, ट्यूबवैल इत्यादि लगवाने का प्रबन्ध करती है तथा नहरों के पानी की भी व्यवस्था करती है ताकि लोग आसानी से अपने खेतों की सिंचाई कर सकें।

8. गांव में लोगों में आमतौर पर झगड़े होते रहते हैं। पंचायतें उन झगड़ों को ख़त्म करके उनकी समस्याओं को हल करने का प्रयास करती हैं।

न्याय पंचायत (Nayaya Panchayat)-गांव के लोगों में झगड़े होते रहते हैं। न्याय पंचायत लोगों के बीच होने वाले झगड़ों का निपटारा करती है। 5-10 ग्राम-सभाओं के लिए एक न्याय पंचायत बनायी जाती है। इसके सदस्य चुने जाते हैं तथा सरपंच 5 सदस्यों की एक कमेटी बनाता है। इन को पंचायतों से प्रश्न पूछने का भी अधिकार होता है।.

पंचायत समिति (Panchayat Samiti)-एक ब्लॉक में आने वाली पंचायतें पंचायत समिति की सदस्य होती हैं तथा इन पंचायतों के सरपंच इसके सदस्य होते हैं। पंचायत समिति के सदस्यों का सीधा-चुनाव होता है। पंचायत समिति अपने क्षेत्र में आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है, गांवों के विकास कार्यों को चैक करती है तथा पंचायतों को गांव के कल्याण के लिए निर्देश भी देती है। यह पंचायती राज्य के दूसरे स्तर पर है।

जिला परिषद् (Zila Parishad)—पंचायती राज्य का सबसे ऊँचा स्तर हैं ज़िला परिषद् जोकि जिले में आने वाले पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह भी एक कार्यकारी संस्था होती है। पंचायत समितियों के चेयरमैन, चुने हुए सदस्य, लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा के सदस्य सभी जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। यह सभी जिले में पड़ते गांवों के विकास कार्यों का ध्यान रखते हैं। जिला परिषद् कृषि में सुधार, ग्रामीण बिजलीकरण, भूमि सुधार, सिंचाई बीजों तथा उर्वरकों को उपलब्ध करवाना, शिक्षा, उद्योग लगवाने इत्यादि जैसे कार्य करती है।

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प्रश्न 3.
हित समूह किस प्रकार दबाव समूहों के रूप में काम करते हैं ?
उत्तर-
पिछले कुछ समय के दौरान समाज में श्रम विभाजन नाम का संकल्प सामने आया है। श्रम विभाजन में अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग कार्य करते हैं जिस कारण बहुत से पेशेवर समूह सामने आए हैं। इन सभी पेशेवर समूहों के अपने-अपने हित होते हैं जिनकी प्राप्ति के लिए वे लगातार कार्य करते रहते हैं। इस प्रकार जो समूह किसी विशेष समूह के हितों का ध्यान रखते हैं तथा उन्हें प्राप्त करने के प्रयास करते हैं उन्हें हित समूह कहा जाता है। आजकल के लोकतांत्रिक समाजों में यह राजनीतिक निर्णय तथा अन्य प्रक्रियाओं को अपने हितों के अनुसार बदलने के प्रयास करते रहते हैं। यह समूह आवश्यकता पड़ने पर राजनीतिक दलों की भी सहायता करते हैं तथा उनके द्वारा सरकारी फैसलों को प्रभावित करने के प्रयास करते हैं। लगभग सभी हित समूहों का एक ही उद्देश्य होता है कि उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान हासिल हो। इसलिए वे सरकार पर उनके लिए नीतियां बनाने का दबाव डालते हैं। जब यह दबाव डालना शुरू कर देते हैं तो इन्हें दबाव समूह भी कहा जाता है

दबाव समूह संगठित या असंगठित होते हैं जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा अपने हितों को आगे बढ़ाते हैं। यह राजनीति को जिस ढंग से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं उसका वर्णन इस प्रकार है-

  • यह दबाव समूह किसी विशेष मुद्दे पर आंदोलन चलाते हैं ताकि जनता का समर्थन हासिल किया जा सके। यह संचार साधनों की सहायता लेते हैं ताकि जनता का अधिक-से-अधिक ध्यान खींचा जा सके।
  • यह साधारणतया हड़तालें करवाते हैं, रोष मार्च निकालते हैं तथा सरकारी कार्यों को रोकने का प्रयास करते हैं। यह हड़ताल की घोषणा करते हैं तथा धरने पर बैठते हैं ताकि अपनी आवाज़ उठा सकें। अधिकतर मजदूर संगठन इस प्रकार से अपनी बातें मनवाते हैं।
  • साधारणतया व्यापारी समूह लॉबी का निर्माण करते हैं जिसके कुछ समान हित होते हैं ताकि सरकार पर उसकी नीतियां बदलने के लिए दबा बनाया जा सके।
  • प्रत्येक दबाव समूह या हित समूह किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होता है। यह समूह चुनाव के समय अपने-अपने राजनीतिक दल का तन-मन-धन से समर्थन करते हैं ताकि वह चुनाव जीत कर उनकी मांगें पूर्ण करें।

प्रश्न 4.
धर्म को परिभाषित कीजिए। इसकी विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
सामाजिक शास्त्रियों के लिए सब से मुश्किल काम धर्म की परिभाषा देना है व ऐसी परिभाषा देना जिस पर सभी एक मत हों। इसका कारण है कि धर्म की प्रकृति काफ़ी जटिल है तथा इसके बारे में समाजशास्त्री अलगअलग विचार रखते हैं। यह इस कारण है कि अलग-अलग समाजशास्त्री अलग-अलग देशों व भिन्न-भिन्न संस्कृतियों से सम्बन्ध रखते हैं और इस कारण उनकी धर्म के बारे में व्याख्या भिन्न-भिन्न होती है। दुनिया में बहुत सारे धर्म हैं तथा इसी विविधता के कारण वह सभी धर्म की एक परिभाषा पर सहमत नहीं हैं। परन्तु फिर भी अलगअलग समाजशास्त्रियों ने धर्म की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-

  • दुर्जीम (Durkheim) के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों व आचरणों की एक ठोस व्यवस्था है जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संगठित करती है।”
  • फ्रेज़र (Frazer) के अनुसार, “धर्म मानव रूप अपने से श्रेष्ठ शक्तियों में विश्वास है। जिस सम्बन्ध में यह विश्वास किया जाता है वह प्रकृति व मानवीय जीवन का मार्ग दर्शन हैं व इसको नियन्त्रण करती है।”
  • मैकाइवर (MacIver) के अनुसार, “धर्म के साथ जैसे कि हम समझते हैं कि केवल मनुष्यों के बीच का सम्बन्ध ही नहीं है बल्कि एक सर्वोच्च शक्ति के प्रति मनुष्य का सम्बन्ध भी सूचित होता है।”
  • मैलिनोवस्की (Malinowski) के अनुसार, “धर्म क्रिया का एक ढंग है व साथ ही विश्वास की एक व्यवस्था है। धर्म एक समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्म का आधार आलौकिक शक्ति पर विश्वास है और पद शक्ति मानवीय शक्ति से श्रेष्ठ व शक्तिशाली समझी जाती है। यह जीवन के सभी तत्त्वों यह नियन्त्रण रखती है जिनको आदमी अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है। इसका एक आधार भावनात्मक होता है। इस शक्ति को खुश रखने के लिए कई विधियां या संस्कार होते हैं। स्पष्ट है कि धर्म की स्वीकृति परा-सामाजिक है क्योंकि धर्म की पुष्टि परा सामाजिक शक्तियों द्वारा होती है। समाज में धर्म का प्रयोग काफ़ी व्यापक रूप में किया जाता है समाजशास्त्रियों अनुसार धर्म मानव की आदतों व भावनात्मक अनुभूतियों की प्रतिनिधिता करता है। डर की भावनाओं के कारण व कई वस्तुओं प्रति मानव की श्रद्धा के कारण धर्म का विकास हुआ है।

धर्म के तत्त्व या विशेषताएं (Elements or Characteristics of Religion). –

1. आलौकिक शक्ति में विश्वास (Belief in Super natural Power)-धर्म विचारों, भावनाओं व विधियों की जटिलता है जो आलौकिक शक्तियों में विश्वास प्रकट करती है यानि यह शक्ति सर्वव्यापक व सर्व शक्तिमान है। यह विश्वास किया जाता है कि प्रत्येक मानवीय क्रिया का संचालन इसी शक्ति द्वारा होता है। इस प्रकार धर्म की सब से पहली विशेषता आलौकिक शक्ति पर विश्वास है। इस आलौकिक शक्ति के आधार तो भिन्न-भिन्न होते हैं पर यह शक्ति सारे धर्मों में आवश्यक तौर पर पाई जाती है।

2. संस्कार (Rituals)-धार्मिक रीतियां धर्म द्वारा निर्धारित क्रियाएं हैं। यह अपने आप में पवित्र हैं व पवित्रता की प्रतीक भी हैं। उदाहरण के लिए हिन्दू धर्म के अनुसार कई तरह के व्रत व तीर्थ यात्रा धार्मिक संस्कार है। एक धर्म के पैरोकारों को धार्मिक संस्कार एक सूत्र में बांधते हैं जबकि दूसरे धर्म के पैरोकारों को वह खुद से भिन्न समझते हैं।

3. धार्मिक कार्य विधियां (Religion Acts)—प्रत्येक धर्म की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी विभिन्न धार्मिक गतिविधियां हैं। इन कार्य विधियों द्वारा मानव विशेष आलौकिक शक्तियों को खुश करने की कोशिश करता है और इन्हें सिर चढ़ा कर इन शक्तियों में अपना विश्वास प्रकट करता है। यह कार्य विधियां दो प्रकार की हैं। पहली वह क्रियाएं जिसको पूरा करने के लिए विशेष धार्मिक ज्ञान की आवश्यकता है। आम आदमी यह काम नहीं कर सकता। इनको प्रत्येक धर्म में धार्मिक पण्डितों द्वारा पूरा कराया जाता है। दूसरा साधारण धार्मिक क्रियाएं हैं जैसे प्रार्थना करना, तीर्थ यात्रा आदि जिसके साधारण व्यक्ति आसान तरीके से पूरी कर लेता है। पर प्रत्येक धर्म में यह विश्वास प्रचलित है कि धार्मिक कार्यों को पूरा करके ही व्यक्ति दैवीय शक्तियों को खुश रख सकता है।

4. धार्मिक प्रतीक व चिह्न (Religious Symbols)—प्रत्येक धर्म में आलौकिक शक्ति के दर्शनों के लिए कुछ चिह्नों व प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। जैसे हिन्दू धर्म में मूर्ति को दिव्य शक्ति के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक धर्म के साथ आलौकिक शक्तियों सम्बन्धी कई तरह की कहानियां जुड़ी होती हैं। लोगों को यह विश्वास होता है कि वह इन आलौकिक कथाओं में विश्वास करके भगवान् को खुश कर सकते हैं।

5. धार्मिक प्रस्थिति (Religious Hierarchy)-किसी भी धर्म के सभी पैरोकारों की धार्मिक समूह में प्रस्थिति समान नहीं होती। प्रत्येक धर्म में प्रस्थितियों की व्यवस्था मिलती है। उच्च पदति पर वह लोग होते हैं जो कि धार्मिक क्रियाओं को पूरा करने में माहिर होते हैं इन्हें दूसरे व्यक्तियों की तुलना में पवित्र समझा जाता है जैसे कि पुरोहित या पण्डित। दूसरी जगह वह लोग आते हैं जिन्हें अपने धार्मिक प्रतिनिधियों व सिद्धान्तों में पूरा विश्वास होता है। सबसे नीचे वह व्यक्ति आते हैं जिन्हें पवित्र नहीं माना जाता और वह धर्म द्वारा अपवित्र करार दिए काम करते हैं। अनेकों धर्मों में इस श्रेणी पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिए जाते हैं।

6. धार्मिक ग्रन्थ (Religious Books)—प्रत्येक धर्म का एक प्रमुख लक्षण रहा है, उससे सम्बन्धित ग्रन्थ या पुस्तकें। हर एक धर्म से सम्बन्धित कुछ धार्मिक लोग धार्मिक ग्रन्थ लिखते हैं तथा प्रत्येक धर्म की कुछ कथाएं, कहानियां होती हैं जिनका वर्णन इन ग्रन्थों में होता है; जैसे हिन्दू धर्म में रामायण, महाभारत, गीता, चार वेद, मनुस्मृति उपनिषद आदि होते हैं। इस प्रकार मुसलमानों में कुरान, सिक्खों में गुरु ग्रन्थ साहिब व ईसाइयों में बाईबल होते हैं।

7. पवित्रता की धारणा (Concept of Sacredness)-धर्म से सम्बन्धित सभी चीज़ों को पवित्र समझा जाता है। व्यक्ति जिस धर्म से सम्बन्धित होता है, उस धर्म की प्रत्येक वस्तु उसके लिए पवित्र होती है। हम कह सकते हैं कि धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित ऐसी व्यवस्था है जो नैतिक तौर पर समुदाय को इकट्ठा करती है।

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प्रश्न 5.
धर्म किस प्रकार समाज के लिए उपयोगी व हानिकारक है ?
उत्तर-
धर्म के निम्नलिखित लाभ हैं :
1. सामाजिक संगठन को स्थिरता प्रदान करना (To give stability to social organization)समाज को स्थिरता प्रदान करने में और सामाजिक संगठन को बनाए रखने में धर्म का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। एक धर्म में लाखों व्यक्ति होते हैं, जिनके विचार व विश्वास साझे होते हैं। साझे विश्वास, प्रतिमान, व्यवहार के तरीके कम-से-कम उस धार्मिक समूह को एक कर देते हैं व उस समूह में एकता बन जाती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न समूहों में एकता से सामाजिक संगठन दृढ़ व मज़बूत हो जाता है। प्रत्येक धर्म अपने धर्म के लोगों को दान देने, दया करने, सहयोग देने के लिए कहते हैं जिस कारण समाज में मज़बूती व स्थिरता बनी रहती है। इस तरह धर्म लोगों को अस्थिरता से बचाता है व समाज को स्थिरता प्रदान करता है।

2. सामाजिक जीवन को निश्चित रूप देना (To give definite form to social life) कोई भी धर्म रीति-रिवाज़ों रूढ़ियों का समूह होता है यह रीति-रिवाज व रूढ़ियां संस्कृति का ही भाग होते हैं। इस तरह धर्म के कारण सामाजिक वातावरण व संस्कृति में सन्तुलित बन जाता है। इस सन्तुलन के कारण सामाजिक जीवन को निश्चित रूप मिल जाता है। धर्म करण लोग रीति-रिवाजों तथा रूढ़ियों का आदर करते हैं और अन्य लोगों से सन्तुलन बना कर चलते हैं। इस तरह के सन्तुलन से ही सामाजिक जीवन सही ढंग से चलता रहता है व यह सब धर्म के कारण ही होता है।

3. पारिवारिक जीवन को संगठित करना (To organise family life)-भिन्न-भिन्न धर्मों में विवाह धार्मिक परम्पराओं के अनुसार होता है। धार्मिक परम्पराओं द्वारा परिवार स्थायी बन जाता है व उसका संगठन, जीवन आदि मज़बूत होता है। प्रत्येक धर्म परिवार के भिन्न-भिन्न सदस्यों के कर्त्तव्य व अधिकारों को निश्चित करता है। यह पिता, माता, बच्चों को बताता है कि उनके एक-दूसरे के प्रति क्या कर्त्तव्य हैं ? सारे परिवार में रहते हुए एकदूसरे के प्रति अपने कर्त्तव्यों की पालना करते हैं तथा एक-दूसरे के परिवार चलाने के लिए सहयोग करते हैं। इस तरह परिवार के सभी सदस्यों में सन्तुलन बना रहता है। परिवार में किए जाने वाले आमतौर पर सभी काम धर्म द्वारा निश्चित किए जाते हैं।

4. भेद-भाव दूर करना (To remove mutual differences)-दुनिया में बहुत सारे धर्म हैं व सभी धर्म ही एक-दूसरे के साथ लड़ने का नहीं बल्कि एक-दूसरे से प्यार से रहने का उपदेश देते हैं तथा यह भी कहते हैं कि वह आपसी भेद-भाव दूर करें। आपसी भेद-भाव को दूर करने से समाज में एकता बढ़ती है। इन धर्मों ने व उन्हें चलाने वालों ने समाज की नई जातियों के लोगों को आगे बढ़ाया।

5. सामाजिक नियन्त्रण रखना (To keep social control)-धर्म सामाजिक नियन्त्रण के प्रमुख साधनों में एक है। धर्म के पीछे सभी समुदाय की अनुमति होती है। व्यक्ति पर न चाहते हुए भी धर्म ज़बरदस्ती प्रभाव डालता है तथा वह इसका प्रभाव भी महसूस करता है कि धर्म का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। धर्म अपने सदस्यों के जीवन को इस तरह नियन्त्रित और निर्देशित करता है कि व्यक्ति को धर्म के आगे झुकना व उसका कहना मानना ही पड़ता है। धर्म आलौकिक शक्ति पर विश्वास है और लोग उस आलौकिक शक्ति के क्रोध से बचने के लिए कोई ऐसा काम नहीं करते जो कि उसकी इच्छाओं के विरुद्ध हो। इस प्रकार लोगों के व्यवहार व क्रिया करने के तरीके धर्म द्वारा नियन्त्रित होते हैं।।

6. समाज कल्याण (Social Welfare)—प्रत्येक धर्म अपने सदस्यों को समाज कल्याण के काम करने के लिए उत्साहित करता है दुनिया के सभी धर्मों में दान देना पवित्र माना जाता है। लोग धर्मशालाएं, अनाथालय, अस्पताल, आश्रम व स्कूलों को खुलवा कर वहां दान देकर उनकी मदद करते हैं।

7. व्यक्ति का विकास (Development of Man)-धर्म समाज का विकास करता है उसकी एकता, व सामाजिक संगठन का भी विकास करता है बल्कि वह व्यक्ति का विकास भी करता है। धर्म व्यक्ति का समाजीकरण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धर्म उसको समाज में व्यवहार करने के तरीके बताता है, समाज के प्रतिमानों के बारे में बताता है। धर्म व्यक्तियों में भाई-चारे व एकता का निर्माण करता है। धर्म व्यक्ति में आध्यात्मिकता का विकास करता है धर्म से व्यक्तियों का आत्मबल बना रहता है। धर्म मानव को बड़ी-बड़ी मुश्किलों में स्थिर रहने की प्रेरणा देता है। धर्म लोगों को दान देना, सहयोग करना, सहनशीलता रखने की प्रेरणा देता है ताकि समाज के बेसहारा लोगों को सहारा मिल सके, क्योंकि इन बेसहारा लोगों का धर्म के सिवा और कोई नहीं होता।

धर्म के दोष अथवा अकार्य (Demerits or Dysfunctions of Religion) –

1. धर्म सामाजिक उन्नति के रास्ते में रुकावट बनता है (Religion is an obstacle)-धर्म प्रकृति से ही रूढ़िवादी होता है व परिवर्तन प्रकृति का ही नियम है। समाज में परिवर्तन आते रहते हैं जिनके कारण मौलिक तौर पर समाज की प्रगति तो हो जाती है पर आध्यात्मिक तौर पर नहीं होती। धर्म आमतौर पर परिवर्तन का विरोधी होता है। धर्म स्थिति को बदलने के पक्ष में नहीं बल्कि जैसे का तैसा बन कर रखने के पक्ष में होता है। बदले हुए हालात धर्म के अनुसार नहीं होते जिस कारण धर्म परिवर्तन का विरोध करता है। परिवर्तन का विरोध करके यह सामाजिक उन्नति के रास्ते में रुकावट बनता है।

2. व्यक्ति किस्मत के सहारे रह जाता है (Man become fatalist)-धर्म यह कहता है कि जो कुछ व्यक्ति की किस्मत में लिखा है वह उसको प्राप्त होगा। उसको न तो उससे अधिक और न ही उससे कम प्राप्त होगा। ऐसा सोचकर कुछ व्यक्ति अपना कर्म करना बन्द कर देते हैं कि यदि मिलना ही किस्मत के अनुसार है तो काम करने का क्या लाभ है? जो कुछ भी किस्मत में लिखा है वह तो मिल ही जाएगा। इसी तरह व्यक्ति किस्मत के सहारे रह जाता है।

3. राष्ट्रीय एकता का विरोधी (Opposite to National Unity) धर्म को हम राष्ट्रीय एकता का विरोधी ही कह सकते हैं। आमतौर पर प्रत्येक धर्म अपने-अपने सदस्य को अपने धर्म के नियमों पर चलने की शिक्षा देते हैं व यह नियम आमतौर पर दूसरे धर्म के विरोधी होते हैं। अपने धर्म को प्यार करते-करते कई बार लोग दूसरे धर्मों का विरोध करने लग जाते हैं। इस विरोध के कारण धार्मिक संकीर्णता व असहनशीलता पैदा होती है।

4. धर्म सामाजिक समस्याएं बढ़ाता है (Religion increases the Social Problems)—प्रत्येक धर्म में बहुत सारे कर्मकाण्ड, रीतियां आदि होते हैं। धर्म के ठेकेदार, पुजारी, महन्त इत्यादि इन कर्मकाण्डों को ज़रूरी समझते हैं। इन कर्मकाण्डों के कारण व्यक्ति अन्धविश्वासों में फँस जाता है। धर्म के ठेकेदार लोगों को दूसरे धर्मों के विरुद्ध भड़काते हैं। धर्म के कारण ही हमारे देश में कई समस्याएं हैं जैसे बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, विधवा विवाह न होना, अस्पृश्यता, गरीबी आदि।

5. धर्म परिवर्तन के रास्ते में रुकावट है (Religion is an obstacle in the way of change)-धर्म हमेशा परिवर्तन के रास्ते में रुकावट बनता है। दुनिया में भिन्न-भिन्न प्रकार की नई खोजें होती रहती हैं। धर्म क्योंकि रूढ़िवादी होता है इस कारण वह परिवर्तन का हमेशा विरोधी होता है। समाज में होने वाले किसी भी परिवर्तन का विरोध धर्म सब से पहले करता है।

6. धर्म समाज को बांटता है (Religion divides, society)-धर्म समाज को बांट देता है। एक ओर तो वह लोग होते हैं जो अनपढ़ होते हैं व धर्म द्वारा फैलाए अन्ध-विश्वासों, कुरीतियों में फंसे होते हैं व दूसरी ओर वह पढ़े-लिखे होते हैं जो इन धर्म के अन्ध-विश्वासों व कुरीतियों से दूर होते हैं। अनपढ़ अन्ध-विश्वासों को मानते हैं व पढ़े-लिखे इन अन्ध-विश्वासों का विरोध करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि दोनों धर्म एक-दूसरे के विरोधी हो जाते हैं व उनमें अनुकूलन मुश्किल हो जाता है।

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प्रश्न 6.
आदिम, पशुपालक, कृषि तथा औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं की विशेषताओं की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
(i) आदिम अर्थव्यवस्था (Primitive Economy) बहुत-से कबीले दूर-दूर के जंगलों तथा पहाड़ों पर रहते हैं। चाहे यातायात के साधनों के कारण बहुत-से कबीले मुख्य धारा में आकर मिल गए हैं तथा उन्होंने कृषि के कार्य को अपना लिया है परन्तु फिर भी कुछ कबीले ऐसे हैं जो अभी भी भोजन इकट्ठा करके तथा शिकार करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वे जड़ें, फल, शहद इत्यादि इकट्ठा करते हैं तथा छोटे-छोटे जानवरों का शिकार भी करते हैं। कुछ कबीले कई चीज़ों का लेन-देन भी करते हैं। इस तरह कृषि के न होने की सूरत में वे अपनी आवश्यकताएं पूर्ण कर लेते हैं।

जो कबीले इस प्रकार से अपनी ज़रूरतें पूर्ण करते हैं उनको प्राचीन कबीले कहा जाता है। यह लोग शिकार करने के साथ-साथ जंगलों से फल, शहद, जड़ें इत्यादि भी इकट्ठा करते हैं। इस तरह वे कृषि के बिना भी अपनी आवश्यकताएं पूर्ण कर लेते हैं। जिस प्रकार से वे जानवरों का शिकार करते हैं उससे उनकी संस्कृति के बारे में भी पता चल जाता है। उनके समाजों में औज़ारों तथा साधनों की कमी होती है जिस कारण ही वे प्राचीन कबीलों के प्रतिरूप होते हैं। उनके समाजों में अतिरिक्त उत्पादन की धारणा नहीं होती है। इसका कारण यह है कि वे न तो अतिरिक्त उत्पादन को सम्भाल सकते हैं तथा न ही अतिरिक्त चीजें पैदा कर सकते हैं। वह तो टपरीवास अथवा घुमन्तु जीवन व्यतीत करते हैं।

(ii) पशुपालक आर्थिकता (Pastoral Economy)-पशुपालक अर्थव्यवस्था जनजातीय अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। लोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए पशुओं को पालते हैं जैसे कि दूध लेने के लिए, मीट के लिए, ऊन के लिए, भार ढोने के लिए इत्यादि। भारत में रहने वाले चरवाहे कबीले स्थायी जीवन व्यतीत करते हैं तथा मौसम के अनुसार ही चलते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले कबीले अधिक सर्दी के समय मैदानी क्षेत्रों में अपने पशुओं के साथ चले जाते हैं तथा गर्मियों में वापस अपने क्षेत्रों में चले आते हैं। भारतीय कबीलों में प्रमुख चरवाहा कबीला हिमाचल प्रदेश में रहने वाला गुज्जर कबीला है जो व्यापार के उद्देश्य से गाय तथा भेड़ों को पालता है। इसके साथ-साथ तमिलनाडु के टोडस कबीले में भी यह प्रथा प्रचलित है। यह कबीला जानवरों को पालता है तथा उनसे दूध प्राप्त करता है। दूध कों या तो विनिमय के लिए प्रयोग किया जाता है या फिर अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए प्रयोग किया जाता है। भारतीय कबीलों में चरवाहे साधारणतया स्थापित जीवन व्यतीत करते हैं तथा उनसे कई प्रकार की चीजें जैसे कि दूध, ऊन, मांस इत्यादि प्राप्त करते हैं। वे पशुओं जैसे कि भेड़ों, बकरियों इत्यादि का व्यापार भी करते हैं।

(iii) कृषि अर्थव्यवस्था (Agrarian Economy)-ग्रामीण समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि पेशा या उस पर आधारित कार्य होते हैं क्योंकि ग्रामीण समाज प्रकृति के बहुत ही नज़दीक होता है। क्योंकि इनमें प्रकृति के साथ बहुत ही नज़दीकी के सम्बन्ध होते हैं इस कारण यह जीवन को एक अलग ही दृष्टिकोण से देखते हैं। चाहे गांवों में और पेशों को अपनाने वाले लोग भी होते हैं जैसे कि बढ़ई, लोहार इत्यादि परन्तु यह बहुत कम संख्या में होते हैं तथा यह भी कृषि से सम्बन्धित चीजें ही बनाते हैं। ग्रामीण समाज में भूमि को बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझा जाता है तथा लोग यहीं पर रहना पसन्द करते हैं क्योंकि उनका जीवन भूमि पर ही निर्भर होता है। यहां तक कि लोगों तथा गांव की आर्थिक व्यवस्था तथा विकास कृषि पर निर्भर करता है।

(iv) औद्योगिक अर्थव्यवस्था (Industrial Economy)-शहरी अर्थव्यवस्था को औद्योगिक अर्थव्यवस्था का नाम भी दिया जा सकता है क्योंकि शहरी अर्थव्यवस्था उद्योगों पर ही आधारित होती है। शहरों में बड़े-बड़े उद्योग लगे होते हैं जिन में हज़ारों लोग कार्य करते हैं। बड़े उद्योग होने के कारण उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता है। इन बड़े उद्योगों के मालिक निजी व्यक्ति होते हैं। उत्पादन मण्डियों के लिए होता है। ये मण्डियां न केवल देसी बल्कि विदेशी भी होती हैं। कई बार तो उत्पादन केवल विदेशी मण्डियों को ध्यान में रख कर किया जाता है। बड़ेबड़े उद्योगों के मालिक अपने लाभ के लिए ही उत्पादन करते हैं तथा मजदूरों का शोषण भी करते हैं।

शहरी समाजों में पेशों की भरमार तथा विभिन्नता पायी जाती है। प्राचीन समय में तो परिवार ही उत्पादन की इकाई होता था। सारे कार्य परिवार में ही हुआ करते थे परन्तु शहरों के बढ़ने के कारण हज़ारों प्रकार के पेशे तथा उद्योग विकसित हो गए हैं। उदाहरण के लिए एक बड़ी फैक्टरी में सैंकड़ों प्रकार के कार्य होते हैं तथा प्रत्येक कार्य को करने के लिए एक विशेषज्ञ की ज़रूरत होती है। उस कार्य को केवल वह व्यक्ति ही कर सकता है जिस को उस कार्य में महारथ हासिल हो। इस प्रकार शहरों में कार्य अलग-अलग लोगों के पास बंटे हुए होते हैं जिस कारण श्रम विभाजन बहुत अधिक प्रचलित है। लोग अपने-अपने कार्य में माहिर होते हैं जिस कारण विशेषीकरण का बहुत महत्त्व होता है। इस प्रकार शहरी अर्थव्यवस्था के दो महत्त्वपूर्ण अंग श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण हैं।

प्रश्न 7.
श्रम विभाजन पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
दुर्शीम ने 1893 में फ्रेन्च भाषा में अपनी प्रथम पुस्तक (De La Division Trovail Social) नाम से प्रकाशित की चाहे यह उसका पहला ग्रन्थ था पर यह उसकी प्रसिद्धि की आधारशिला थी। इसी पर उसको 1893 में डॉक्टरेट भी मिली थी दीम ने उसको तीन भागों में बांटा वह तीन भाग हैं

1. श्रम विभाजन के कार्य (Functions of Division of Labour)-दुर्थीम हर सामाजिक तथ्य को एक नैतिक तथ्य के रूप में स्वीकार करता है। कोई भी सामाजिक प्रतिमान नैतिक आधार पर ही जीवित सुरक्षित रह सकता है। एक कार्यवादी के रूप में दुर्थीम ने सब से पहले श्रम विभाजन के कार्यों की खोज की। दुर्थीम ने सब से पहले काम शब्द के बारे में बताया कि यह क्या होता है।

  1. कार्य से अर्थ गति व्यवस्था अर्थात् क्रिया से है।
  2. कार्य का अर्थ इस क्रिया या गति व उसके अनुरूप ज़रूरत के आपसी सम्बन्ध से है अर्थात् क्रिया से पूरी होने वाली ज़रूरत से है।

दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन के कार्य से उनका अर्थ यह है कि श्रम विभाजन की प्रक्रिया समाज की पहचान के लिए किन मौलिक ज़रूरतों को पूरा करती है। काम तो वह काम है जिसके न होने पर उसके तत्त्वों की मौलिक जरूरतों की पूर्ति नहीं हो सकती।

आम तौर पर यह कहा जाता है कि श्रम विभाजन का कार्य सभ्यता का विकास करना है क्योंकि श्रम विभाजन के विकास के साथ-साथ विशेषीकरण के फलस्वरूप समाज की सभ्यता बढ़ती है। दुर्थीम ने इसका विरोध किया है उन्होंने सभ्यता के विकास को श्रम विभाजन का काम नहीं माना। उनका मतलब स्रोत का मतलब काम नहीं है। सुखों के बढ़ने या बौधिक या भौतिक विकास श्रम विभाजन के फलस्वरूप पैदा होते हैं इसलिए यह उनके परिणाम हैं काम नहीं। काम का मतलब परिणाम नहीं होता।

इस प्रकार सभ्यता का विकास श्रम विभाजन का काम नहीं है। दुर्थीम के अनुसार नए समूहों का निर्माण व उनकी एकता ही श्रम विभाजन के काम है। दुर्थीम ने समाज की पहचान से सम्बन्धित किसी नैतिक ज़रूरत को ही श्रम विभाजन के काम के रूप में ढूंढ़ने की कोशिश की है। उनके अनुसार समाज के सदस्यों की संख्या व उनके आपसी सर्पकों के बढ़ने से ही धीरे-धीरे श्रम विभाजन की प्रक्रिया का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया से अनेक नएनए व्यापारिक व सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ। इन भिन्न-भिन्न समूहों में एकता ही समाज की पहचान के लिए ज़रूरी है। दुर्थीम के अनुसार समाज की इसी ज़रूरत को श्रम विभाजन द्वारा पूरा किया जाता है। जहां एक और श्रम विभाजन से सामाजिक समूहों का निर्माण होता है वहां दूसरी ओर इन्हीं समूहों की आपसी एकता व उनकी सामूहिकता बनी रहती है।

इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का कार्य समाज में, एकता स्थापित करना है। श्रम विभाजन मनुष्यों की क्रियाओं की भिन्नता से सम्बन्धित है यह भिन्नता ही समाज की एकता का आधार है। यह भिन्नता दो व्यक्तियों को करीब लाती है जिससे मित्रता के सम्बन्ध निर्धारित होते हैं। यह दो व्यक्तियों के मन में आपसी एकता का भाव पैदा करता है। – इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन समूहों का निर्माण करता है व उनमें एकता पैदा करता है। इस एकता को बनाए रखने के लिए कानूनों का निर्माण किया जाता है। यह कानून दमनकारी भी होते हैं व प्रतिकारी भी। इन कानूनों के आधार पर ही दो भिन्न-भिन्न प्रकार की सामाजिक एकताओं का निर्माण होता है। यह दो प्रकार समाज की भिन्न-भिन्न जीवन शैलियों के परिणाम हैं। दमनकारी कानून का सम्बन्ध आदमी की आम प्रवृति से है, समानताओं से है जब कि प्रतिकारी कानून का सम्बन्ध विभिन्नताओं से या श्रम विभाजन से है। दमनकारी कानून से जिस प्रकार की एकता मिलती है, उसके दुर्थीम ने यान्त्रिक एकता का नाम दिया है व प्रतिकारी कानून से आंगिक एकता पैदा होती है।

इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार समाज में दो प्रकार की सामाजिक एकताएं पाई जाती हैं-

1. यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-दुर्थीम के अनुसार यान्त्रिक एकता को हम समाज की दण्ड संहिता में अर्थात् दमनकारी कानूनों में देख सकते हैं। समाज के सदस्यों में मिलने वाली समानताएं इस एकता का आधार है। जिस समाज के सदस्यों में समानताओं से भरपूर जीवन होता है, जहां विचारों, विश्वासों, कार्यों व जीवन शैली के आम प्रतिमान व आदर्श प्रचलित होते हैं व जो समाज इन समानताओं के परिणामस्वरूप एक सामूहिक इकाई के रूप में सोचता है क्रिया करता है। वह यान्त्रिक एकता का प्रदर्शन करता है अर्थात् उसके सदस्य एक यन्त्र या मशीन की भान्ति आपस में संगठित रहते हैं। इस एकता में दुर्थीम ने अपराध, दण्ड व सामूहिक चेतना को भी लिया है, दुर्थीम के अनुसार यह एक ऐसी सामाजिक एकता है जो चेतना की उन निश्चित अवस्थाओं में से पैदा होती है जोकि किसी समाज के सदस्यों के लिए आम है। इस को असल में दमनकारी कानून पेश करता है।

2. आंगिक एकता (Organic Solidarity)-दुर्थीम के अनुसार दूसरी एकता आंगिक एकता है। दमनकारी कानून की शक्ति सामूहिक चेतना में होती है। सामूहिक चेतना समानताओं से शक्ति प्राप्त करती है। आदिम समाज में दमनकारी कानून की प्रधानता होती थी क्योंकि उनमें समानताएं सामाजिक जीवन का आधार है। दुर्थीम के अनुसार आधुनिक समाज श्रम विभाजन व विशेषीकरण से प्रभावित है, जिसमें समानताओं की जगह पर विभिन्नताएं प्रमुख हैं। सामूहिक जीवन की यह विभिन्नता व्यक्तिगत चेतना को प्रमुखता देती है।

आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप में समूह के साथ बंधा नहीं रहता। इस समाज में मनुष्यों के आपसी सम्बन्धों का महत्त्व काफ़ी अधिक होता है। यही कारण है कि दुर्थीम ने आधुनिक समाज में दमनकारी कानून की जगह प्रतिकारी कानूनों की प्रधानता बताई है। विभिन्नता पूर्ण जीवन में मनुष्यों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक काम पर योग्यता प्राप्त कर सकता है और सभी कार्यों के लिए उसको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। समूह के सदस्यों की यह आपसी निर्भरता, उनकी व्यक्तिगत असमानता उन्हें करीब आने के लिए मजबूर करती है जिसके आधार पर समाज मे एकता की स्थापना होती है। इस एकता के दुर्थीम ने आंगिक एकता कहा है। यह प्रतिकारी कानून के कारण होती है।

दुर्थीम के कारण यह एकता शारीरिक एकता के समान है हाथ, पांव, नाक, कान, आंखें इत्यादि अपने भिन्नभिन्न कार्यों के कारण स्वतन्त्र अंगों के रूप में काम करते हैं पर काम तो ही सम्भव है जब तक कि वह एकदूसरे से मिले हुए हों इस प्रकार शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों की एकता आपसी निर्भरता पर टिकी हुई है। दुर्थीम के अनुसार जनसंख्या बढ़ने के साथ ज़रूरतें भी बढ़ती है। इन्हें पूरा करने के लिए श्रम विभाजन व विशेषीकरण हो जाता है जिस कारण समाज में आंगिक एकता दिखाई देती है।

3. समझौते पर आधारित एकता (Contractual Solidarity)-आम एकता व आंगिक एकता का अध्ययन करने के पश्चात् दुर्थीम ने एक एकता बारे बताया है जिसको वह समझौते पर आधारित एकता कहता है। दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन की प्रक्रिया समझौते पर आधारित सम्बन्धों को जन्म देती है। समूह के लोग आपसी समझौते के आधार पर एक-दूसरे की सेवाओं को प्राप्त करते हैं व आपस में सहयोग करते हैं। यह सत्य है कि आधुनिक समाज में समझौतों के आधार पर लोगों में सहयोग व एकता स्थापित होती है। पर श्रम विभाजन का कार्य समझौतों पर आधारित एकता को उत्पन्न करना ही नहीं है। दुर्थीम के अनुसार यह एकता व्यक्तिगत तथ्य है चाहे यह समाज द्वारा ही संचालित होती है।

श्रम विभाजन के कारण (Causes of Division of Labour) – दुर्थीम ने श्रम विभाजन की व्याख्या समाजशास्त्रीय आधार पर की है। उसने श्रम विभाजन के कारणों की खोज सामाजिक जीवन की दिशाओं व उनसे सामाजिक ज़रूरतों से की है। इस प्रकार उसने श्रम विभाजन के कारणों को दो वर्गों में बांटा है

  1. प्राथमिक कारक
  2. द्वितीय कारक।

1. जनसंख्या व उसकी घनत्व का बढ़ना-दुर्थीम के अनुसार जनसंख्या के आकार पर घनत्ता का बढ़ना ही श्रम विभाजन का प्रमुख व प्राथमिक कारण है।
दुर्शीम ने लिखा है कि, “श्रम विभाजन समाज की जटिलता व घनता का सीधा अनुपात है तथा सामाजिक विकास के इस दौरान में लगातार बढ़ोत्तरी होती है अर्थात् इसका कारण यह है कि समाज नियमित रूप से ओर अधिक जटिल होते जा रहे हैं।” दुर्थीम के अनुसार जनसंख्या बढ़ने के दो पक्ष हैं। जनसंख्या के आकार में बढ़ोत्तरी व जनसंख्या की घनत्व में बढ़ोत्तरी। यह दोनों पक्ष श्रम विभाजन को जन्म देते हैं। जनसंख्या के बढ़ने से मिश्रित समाज का निर्माण होने लगता है व जनसंख्या विशेष स्थानों पर केन्द्रित होने लगती है जनसंख्या की घनत्व को दो भागों में बांट सकते हैं।
(a) भौतिक घनत्व-शारीरिक तौर पर लोगों का एक ही स्थान पर एकत्र होना भौतिक घनत्व है।
(b) नैतिक घनत्व-भौतिक घनत्व के कारण लोगों के आपसी सम्बन्ध, क्रिया, प्रतिक्रिया बढ़ती है जिससे जटिलता भी बढ़ती है जिसको नैतिक घनत्व कहते हैं।

2. आम या सामूहिक चेतना की बढ़ती अस्पष्टता-दुर्थीम ने द्वितीय कारकों में सामूहिक चेतना की बढ़ती अस्पष्टता को प्रथम स्थान दिया है। समानताओं के आधार वाले समाज में सामूहिक चेतना का बोलबाला होता है जिस कारण समूह के व्यक्तिगत विचार आगे नहीं आते। दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन व विशेषीकरण तो ही सम्भव है जब सामूहिक विचार की जगह पर व्यक्तिगत विचार का विकास हो जाए व व्यक्तिगत चेतना सामूहिक चेतना को दबा दे। इस प्रकार श्रम विभाजन भी बढ़ जाएगा।

3. पैतृकता व श्रम विभाजन-श्रम विभाजन के द्वितीय कारक को दूसरे प्रकार को दुीम ने पैतकता के घटते प्रभाव को माना है। उनके अनुसार जितना अधिक पैतृकता का प्रभाव होगा। परिवर्तन के मौके उतने ही कम होंगे। अन्य शब्दों में श्रम विभाजन के विकास लिए यह ज़रूरी है कि पैतृक गुणों को महत्त्व न दिया जाए। श्रम विभाजन की प्रगति तो ही सम्भव है जब लोगों की प्राकृति व स्वभाव में भिन्नता हो। पैतृकता से प्राप्त गुणों के आधार पर मनुष्यों को उनके पूर्वजों से बांधने का यह परिणाम होता है कि हम अपनी खास आदतों का विकास नहीं कर सकते अर्थात् परिवर्तन नहीं कर सकते। इस प्रकार दुर्थीम के अनुसार पैतृकता श्रम विभाजन को रोकती है। समय के साथसाथ समाज का विकास होता है व पैतृकता का प्रभाव कम हो जाता है जिस कारण व्यक्तियों की विभिन्नताएं विकसित होती हैं श्रम विभाजन में बढ़ोत्तरी होती है।

श्रम विभाजन के परिणाम (Consequences of Division of Labour) –
श्रम विभाजन के प्राथिमक व द्वितीय कारकों के पश्चात् दीम इसके विकास के फलस्वरूप पैदा होने वाले परिणामों का जिक्र करता है। दुर्शीम ने श्रम विभाजन के बहुत सारे परिणामों का जिक्र किया है। जिनमें से कुछ प्रमुख हैं।

1. कार्यात्मक स्वतन्त्रता व विशेषीकरण-दुीम ने शारीरिक श्रम विभाजन व सामाजिक श्रम विभाजन में अन्तर किया है और सामाजिक श्रम विभाजन के परिणामों के बारे में बताया है। दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का एक परिणाम यह होता है कि जैसे ही काम अधिक बांटा जाता है। श्रम विभाजन के कारण मनुष्य अपने कुछ विशेष गुणों को विशेष कामों में लगा देता है। जिस कारण श्रम विभाजन के विकास का एक परिणाम यह भी होता है कि व्यक्तियों के काम उनके शारीरिक लक्षणों से स्वतन्त्र हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में संरचनात्मक विशेषताएं उनकी कार्यात्मक प्रवृत्तियों को अधिक प्रभावित नहीं करतीं।

2. सभ्यता का विकास-दुर्थीम ने आरम्भ में ही स्पष्ट कर दिया था कि सभ्यता का विकास करना श्रम विभाजन का काम नहीं है क्योंकि श्रम विभाजन एक नैतिक तथ्य है तथा सभ्यता के तीनों अंगों औद्योगिक, कलात्मक व वैज्ञानिक विकास नैतिक विकास से सम्बन्ध नहीं रखते।
उनके अनुसार श्रम विभाजन के परिणाम स्वरूप सभ्यता का विकास होता है। जनसंख्या के आकार तथा घनत्ता में अधिक होना ही सभ्यता के विकास को ज़रूरी बना देता है। श्रम विभाजन व सभ्यता दोनों साथ-साथ प्रगति करते हैं पर श्रम विभाजन का विकास पहले होता है तथा उसके परिणामस्वरूप सभ्यता विकसित होती है। इसलिए दुर्थीम का मानना है कि सभ्यता का न तो श्रम विभाजन का उद्देश्य है और न ही काम बल्कि इसका परिणाम है।

3. सामाजिक प्रगति-प्रगति परिवर्तन का परिणाम है। श्रम विभाजन परिवर्तनों को भी जन्म देता है। परिवर्तन समाज में एक निरन्तर प्रक्रिया है इसलिए समाज में प्रगति भी निरन्तर होती रहती है। इस परिवर्तन का मुख्य कारण श्रम विभाजन है। श्रम विभाजन के कारण परिवर्तन होता है व परिवर्तन के कारण प्रगति होती है। इस प्रकार सामाजिक प्रगति श्रम विभाजन का एक परिणाम है।

दुर्थीम के विचार से प्रगति का प्रमुख कारक समाज है। हम इसके लिए बदल जाते हैं क्योंकि समाज बदल जाता है प्रगति तो ही कर सकती है जब समाज की गति रुक जाए पर ऐसा होना वैज्ञानिक रूप से सम्भव नहीं है। इसलिए दुर्थीम के विचार से प्रगति भी सामाजिक जीवन का परिणाम है।

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प्रश्न 8.
आर्थिक संस्था को परिभाषित कीजिए। अर्थप्रणाली में होने वाले परिवर्तनों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
हमारे समाज में बहुत से व्यक्ति रहते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति की कुछ मूल आवश्यकताएं होती हैं। यह मूल आवश्यकताएं हैं-रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य सुविधाएं इत्यादि परन्तु इन सबकी पूर्ति के लिए व्यक्ति को पैसे की आवश्यकता पड़ती है। यह पैसा व्यक्ति को कार्य करके कमाना पड़ता है। पैसा कमाने के लिए व्यक्ति को समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ सहयोग करना पड़ता है तथा उन्हें उनके कार्यों में सहायता करनी पड़ती है ताकि वह भी पैसे कमा सकें।

आर्थिक संस्थाएं वह संस्थाएं हैं जो लोगों के लिए वस्तुओं के उत्पादन, विभाजन व उपभोग का प्रबन्ध करती हैं। समाज में आर्थिक संस्थाओं का बहुत महत्त्व होता है। इसी कारण ही समाज के विभिन्न स्वरूपों को आर्थिक संस्थाओं या अर्थव्यवस्था के आधार पर विभाजित किया गया है जैसे शिकारी, कृषि, औद्योगिक समाज आदि। इन आर्थिक संस्थाओं से ही समाज की अन्य संस्थाओं जैसे परिवार, धर्म आदि प्रभावित होते हैं।

प्रत्येक मानव की कुछ ज़रूरतें व कुछ इच्छाएं होती हैं। कुछ आवश्यकताएं तो जैविक कारणों से पैदा होती हैं। जैसे खाना, पीना, सोना आदि पर व्यक्ति की कुछ इच्छाएं सांसारिक वस्तुओं के कारण होती हैं। जैसे उच्च स्तर, अधिक पैसे होने, ऐशो आराम की सभी चीजें आदि। व्यक्ति अपनी इच्छाएं आप ही बनाता है व उनको पूरा करने की सामर्थ्य भी समाज में व्यवस्थित की गई है। व्यक्ति सभी वस्तुओं को प्राप्त करना चाहता है पर उसके पास इन चीजों की पूर्ति के लिए हमेशा से ही स्रोत की कमी रही है। इसलिए लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरे नित नए साधन ढूंढ़ते रहते हैं। इन साधनों के पता करने में उनसे उम्मीद की जाती है कि इन साधनों में तालमेल स्थापित किया जाए। इस तरह व्यक्ति अपनी ज़रूरतों व इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपने साधनों का उपयोग करता है व उन साधनों को व्यवस्थित करने के लिए जो मापदण्ड व सामाजिक संगठनों का उपयोग करता है उसको धर्म व्यवस्था या आर्थिक संस्थाओं का नाम दिया जाता है।

जॉनस (Jones) के अनुसार, “जीवन निर्वाह की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए वातावरण की उपयोग से सम्बन्धित तकनीकें, विचारों व प्रथाओं की जटिलता को आर्थिक संस्थाएं कहते हैं।”
प्रो० डेविस (Prof. Davis) के अनुसार, “किसी भी समाज में चाहे वह विकसित हो या आदिम, सीमित चीज़ों के विभाजन को निर्धारित करने वाले प्राथमिक विचारों, मानदण्डों व रूतबों को ही आर्थिक संस्था कहते हैं।”
ऑगबर्न व निमकौफ (Ogburn & Nimkoff) के अनुसार, “भोजन व सम्पत्ति के सम्बन्ध में मानव की क्रियाएं आर्थिक सम्पत्ति का निर्माण करती हैं।”

इस प्रकार इन परिभाषाओं को देख कर हम कह सकते हैं कि भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मानव द्वारा क्रियाओं के निश्चित व संगठित रूप को आर्थिक संस्था कहते हैं।

आर्थिक संस्थाओं में आ रहे परिवर्तन (Changes coming in the economic system)-20वीं शताब्दी के आरंभ से ही आर्थिक संस्थाओं में बहुत से परिवर्तन आने शुरू हो गए जिनका वर्णन इस प्रकार हैं-

  • अब उत्पादन बड़े स्तर पर होता है तथा उत्पादन के लिए Assembly Line नामक तकनीक सामने आ गई है जिसमें मनुष्य तथा मशीन दोनों इकट्ठा मिलकर नई वस्तु का उत्पादन करते हैं।
  • उत्पादन में बड़ी-बड़ी मशीनों का प्रयोग किया जाता है ताकि बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सके।
  • विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया ने सभी देशों की आर्थिक सीमाओं को खोल दिया है। लगभग सभी देशों ने सीमा शुल्क (Custom duty) इतना कम कर दिया है कि सभी वस्तुएं हमारे देश में आसानी से तथा कम दाम पर उपलब्ध हैं।
  • उदारीकरण (Liberalisation) की प्रक्रिया ने भी आर्थिक संस्थाओं में परिवर्तन ला दिए हैं। भारत सरकार ने सन् 1991 के पश्चात् उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाया जिससे देश की आर्थिकता तेज़ी से बढी। देश में बडीबड़ी विदेशी कंपनियों ने अपने उद्योग लगाए जिससे लोगों को रोजगार मिला तथा बेरोज़गारी में भी कमी आई।
  • देश में कम्प्यूटर (Computer) से संबंधित बहुत से उद्योग शुरू हुए।

BPO (Business Process Outsourcing) उद्योग, काल सेंटर, सॉफ्टवेयर सेवाएं इत्यादि ने देश के लिए विदेशी मुद्रा कमाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशों की अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया। अब प्रत्येक प्रकार के उद्योगों में मशीनों का प्रयोग बढ़ गया है।

प्रश्न 9.
शिक्षा को परिभाषित कीजिए। औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा के मध्य उदाहरणों सहित अन्तर कीजिए।
उत्तर-
शिक्षा व्यक्ति के समाजीकरण का एक साधन है। यह सांस्कृतिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सबसे अच्छा तरीका है। शिक्षा ने ही व्यक्ति का औद्योगीकरण, नगरीकरण इत्यादि के साथ सामंजस्य स्थापित करवाया है। शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान तक ही सीमित नहीं है। शिक्षा व्यक्ति को जीवन जीने का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करती है। शिक्षा समाज में प्रेम, मैत्री, सहानुभूति, आज्ञाकारिता, अनुशासन इत्यादि जैसे गुणों का विकास करती है।

शिक्षा का अर्थ (Meaning of Education)- शिक्षा को हम ज्ञान के संग्रह के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। निम्न परिभाषाओं से शिक्षा का अर्थ और भी स्पष्ट हो जाएगा।

  • फिलिप्स (Philips) के अनुसार, “शिक्षा वह संस्था है जिसका केंद्रीय तत्त्व ज्ञान का संग्रह है।”
  • महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बच्चे के शरीर, मन और आत्मा में विद्यमान सर्वोत्तम गुणों का सर्वांगीण विकास करना है।”
  • ब्राउन तथा रासेक (Brown and Rouck) के अनुसार, “शिक्षा अनुभव की वह संपूर्णता है जो किशोर और वयस्क दोनों की अभिवृत्तियों को प्रभावित करती है तथा उनके व्यवहारों का निर्धारण करती है।”

इन परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें तार्किक अनुभव सिद्ध, सैद्धांतिक और व्यावहारिक विचारों का समावेश होता है जिसका उद्देश्य व्यक्ति का सामाजिक व भौतिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना होता है। शिक्षा सामाजिक नियंत्रण में एक अहम भूमिका निभाती है।

मुख्य रूप से शैक्षिक व्यवस्था के दो प्रकार होते हैं-औपचारिक शिक्षा तथा अनौपचारिक शिक्षा।

1. औपचारिक शिक्षा (Formal Education)-औपचारिक शिक्षा वह शिक्षा होती है जो हम औपचारिक तौर पर स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय इत्यादि में जाकर प्राप्त करते हैं। इस तरह की शिक्षा में स्पष्ट पाठ्यक्रम निश्चित किया जाता है तथा अध्यापकगण इस पाठ्यक्रम के अनुसार व्यक्ति को शिक्षा देते हैं। इस तरह की शिक्षा का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है तथा वह उद्देश्य होता है व्यक्ति का सर्वपक्षीय विकास ताकि वह समाज का ज़िम्मेदार नागरिक बन सके।

2. अनौपचारिक शिक्षा (Informal Education)-अनौपचारिक शिक्षा वह होती है जो व्यक्ति किसी स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में नहीं लेता है बल्कि वह यह शिक्षा तो रोज़मर्रा के अनुभवों और व्यक्तियों के विचारों, परिवार, पड़ोस, दोस्तों इत्यादि से लेता है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने रोज़ाना जीवन से कुछ न कुछ सीखता रहता है। इस को ही अनौपचारिक शिक्षा कहते हैं। इसका कोई निश्चित समय नहीं होता, निश्चित पाठ्यक्रम नहीं होता, निश्चित स्थान नहीं होता। व्यक्ति इसको कहीं भी, किसी से भी तथा किसी भी समय प्राप्त कर सकता। इसके लिए कोई डिग्री नहीं मिलती बल्कि व्यक्ति इसको पाने से परिपक्व हो जाता है।

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प्रश्न 10.
समाज में शिक्षा की भूमिका पर प्रकार्यवादी समाजशास्त्रियों के विचारों को प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-
अगर हम आधुनिक समाज की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि जितनी तेजी से समाज में परिवर्तन शिक्षा के साथ आए हैं, उतने परिवर्तन किसी अन्य कारण के साथ नहीं आए हैं। शिक्षा के बढ़ने से सबसे पहले यूरोपियन समाजों में परिवर्तन आए तथा उसके बाद 20वीं शताब्दी के दूसरे उत्तरार्द्ध में एशिया के देशों में परिवर्तन आया। इन परिवर्तनों ने समाज को पूर्णतया बदल कर रख दिया। भारतीय समाज में आधुनिक शिक्षा के कारण ही काफ़ी परिवर्तन आए। लोगों ने पढ़ना लिखना शुरू किया जिससे उनके जीवन का सर्वपक्षीय विकास हुआ। स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन, निम्न तथा पिछड़ी जातियों की स्थिति में परिवर्तन शिक्षा के कारण ही संभव हो सका है। इस कारण समाजशास्त्रियों के लिए भी शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण विषय रहा है कि वह समाज पर शिक्षा के प्रभावों को ढूंढ सकें।

समाजशास्त्री सामाजिक परिवर्तन के कारण के रूप में शिक्षा का अध्ययन करने में अधिक रुचि दिखाते हैं। उनके अनुसार शिक्षा मनुष्य को एक जीव से सामाजिक तथा सभ्य जीव के रूप में परिवर्तित कर देता है। फ्रांस के प्रमुख समाजशास्त्री दुर्थीम के अनुसार, “शिक्षा एक वयस्क पीढ़ी की तरफ से अवयस्क पीढ़ी के ऊपर डाला गया प्रभाव है।”

इसका अर्थ है कि शिक्षा वह प्रभाव है जो जाने वाली पीढी आने वाली पीढ़ी पर डालती है ताकि उस पीढी को समाज में रहने के लिए तैयार किया जा सके। दुखीम के अनुसार समाज का अस्तित्व तब ही बना रह सकता है अगर समाज के सदस्यों में एकरूपता (Homogeneity) बनी रहे तथा यह एकरूपता शिक्षा के कारण ही आती है। शिक्षा से ही लोग एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहना सीखते हैं तथा उनमें एकरूपता आ जाती है। शिक्षा से ही एक बच्चा समाज में रहने के नियम, परिमाप, कीमतों इत्यादि को सीखता व ग्रहण करता है। किंगस्ले डेविस (Kingslay Davis) तथा विलबर्ट मूरे (Wilbert Moore) ने भी शिक्षा के कार्यात्मक पक्ष के बारे में बताया है। उनके अनुसार सामाजिक स्तरीकरण एक तरीका है जिससे समर्थ व्यक्तियों को उचित स्थितियां प्रदान की जाती हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति शिक्षा द्वारा होती है तथा यह इस बात को सुनिश्चित करती है कि सही व्यक्ति को, समाज को सही स्थान प्राप्त हो।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions):

प्रश्न 1.
राज्य की कितनी प्रमुख विशेषताएं हैं ?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार।
उत्तर-
(D) चार।

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प्रश्न 2.
राज्य के उद्देश्यों को पूरा करने के साधन कौन-से हैं ?
(A) सरकार
(B) समाज
(C) लोग
(D) जाति।
उत्तर-
(A) सरकार।

प्रश्न 3.
सरकार को कौन चुनता है ?
(A) राज्य
(B) समाज
(C) लोग
(D) जाति।
उत्तर-
(C) लोग।

प्रश्न 4.
सरकार के कितने अंग होते हैं ?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार।
उत्तर-
(C) तीन।

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प्रश्न 5.
देश की अर्थव्यवस्था को कौन मज़बूत करता है ?
(A) राज्य
(B) समाज
(C) जाति
(D) सरकार।
उत्तर-
(D) सरकार।

प्रश्न 6.
इनमें से कौन सी आर्थिक संस्था है ?
(A) निजी सम्पत्ति
(B) श्रम विभाजन
(C) विनिमय
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 7.
पूंजीवाद में मुख्य तौर पर कितने वर्ग होते हैं ?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच।
उत्तर-
(A) दो।

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प्रश्न 8.
उस वर्ग को क्या कहते हैं जिसके पास उत्पादन के सभी साधन होते हैं तथा जो श्रमिकों को कार्य देकर उनका शोषण करता है ?
(A) श्रमिक वर्ग
(B) पूंजीपति वर्ग
(C) मध्य वर्ग
(D) निम्न वर्ग।
उत्तर-
(B) पूंजीपति वर्ग।

प्रश्न 9.
धर्म की उत्पत्ति कहां से हुई ?
(A) मनुष्य के विश्वास से
(B) भगवान से
(C) आत्मा से
(D) दैवी शक्तियों से।
उत्तर-
(A) मनुष्य के विश्वास से।

प्रश्न 10.
यह शब्द किसने कहे “धर्म आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास है ?”
(A) टेलर
(B) दुर्थीम
(C) लॉस्की
(D) फ्रेजर।
उत्तर-
(A) टेलर।

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प्रश्न 11.
धर्म किसके साथ सम्बन्धित है ?
(A) मूर्ति पूजा के साथ
(B) अलौकिक शक्ति में विश्वास
(C) पुस्तकों के साथ .
(D) A+ B + C.
उत्तर-
(D) A + B + C.

प्रश्न 12.
Elementary Forms of Religious life पुस्तक किसने लिखी ?
(A) दुखीम
(B) टेलर।
(C) वैबर
(D) मैलिनावैसकी।
उत्तर-
(A) दुर्थीम।

प्रश्न 13.
धर्म का क्या कार्य है ?
(A) समाज को तोड़ना
(B) सामाजिक एकता बनाये रखना
(C) समाज को नियन्त्रण में रखना
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(B) सामाजिक एकता को बनाए रखना।

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प्रश्न 14.
जो धर्म में विश्वास रखता हो उसे क्या कहते हैं ?
(A) आस्तिक
(B) नास्तिक
(C) धार्मिक
(D) अधार्मिक।
उत्तर-
(A) आस्तिक।

प्रश्न 15.
जो धर्म में विश्वास नहीं रखता हो उसे ………… क्या कहते हैं।
(A) धार्मिक
(B) नास्तिक
(C) आस्तिक
(D) अधार्मिक।
उत्तर-
(B) नास्तिक।

प्रश्न 16.
भारत में शिक्षित व्यक्ति किसे कहते हैं ?
(A) जो किसी भी भारतीय भाषा में पढ़ लिख सकता हो
(B) जो आठवीं पास हो
(C) जो मैट्रिक पास हो
(D) जिसने बी० ए० पास की हो।
उत्तर-
(A) जो किसी भी भारतीय भाषा में पढ़ लिख सकता हो।

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प्रश्न 17.
भारत में स्कूलों के लिए पाठ्यक्रम ………….. तैयार करता है।
(A) U.G.C.
(B) विश्वविद्यालय
(C) NCERT
(D) राज्य का शिक्षा बोर्ड।
उत्तर-
(C) NCERT.

प्रश्न 18.
प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली किस चीज़ पर आधारित थी ?
(A) धर्म
(B) विज्ञान
(C) तर्क
(D) पश्चिमी शिक्षा।
उत्तर-
(A) धर्म।

प्रश्न 19.
भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली किस चीज़ पर आधारित है ?
(A) धर्म
(B) पश्चिमी शिक्षा
(C) संस्कृति
(D) सामाजिक शिक्षा।
उत्तर-
(B) पश्चिमी शिक्षा।

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प्रश्न 20.
भारत में 2011 में शिक्षा दर कितनी थी ?
(A) 52%
(B) 74%
(C) 74%
(D) 70%.
उत्तर-
(C) 74%.

II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. ……………. के चार तत्त्व होते हैं।
2. वैबर ने ………… के तीन प्रकार बताए हैं।
3. ………. ने. जीववाद का सिद्धांत दिया था।
4. ………… ने पवित्र व साधारण वस्तुओं में अंतर दिया था।
5. प्रकृतिवाद का सिद्धांत ………….. ने दिया था।
6. मार्क्स ने दो वर्गों ……………. तथा ……………… के बारे में बताया था।
7. …………….. शिक्षा वह होती है जो हम स्कूल, कॉलेज में प्राप्त करते हैं।
उत्तर-

  1. राज्य,
  2. तीन,
  3. ई० बी० टाइलर,
  4. दुर्शीम,
  5. मैक्स मूलर,
  6. पूँजीपति, मज़दूर,
  7. औपचारिक।

III. सही/गलत (True/False) :

1. भारत की जनता को आठ मौलिक अधिकार दिए गए हैं।
2. पंचायतों की आधी सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित हैं।
3. भारतीय संविधान 26 नवंबर, 1949 को लागू हुआ था।
4. भारत एक धार्मिक देश है।
5. जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र, सरकार व प्रभुसत्ता राज्य के आवश्यक तत्व हैं।
6. साम्यवाद व समाजवाद के विचार दुर्शीम ने दिए थे।
7. 2011 में भारत की शिक्षा दर 74% थी।
उत्तर-

  1. गलत,
  2. गलत,
  3. गलत,
  4. गलत,
  5. सही,
  6. गलत,
  7. सही।

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IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1.
भारत का संविधान कब पास हुआ था ?
उत्तर-
भारत का संविधान 26 नवंबर, 1949 को पास हुआ था परन्तु यह लागू 26 जनवरी, 1950 को हुआ था।

प्रश्न 2.
संविधान में कितने मौलिक अधिकारों का जिक्र है ?
उत्तर-
संविधान में छ: (6) मौलिक अधिकारों का जिक्र है।

प्रश्न 3.
पंचायती राज योजना कब पास हुई थी ?
उत्तर-
पंचायती राज योजना 1959 में पास हुई थी।

प्रश्न 4.
पंचायती राज में महिलाओं के लिए कितना आरक्षण है ?
उत्तर-
पंचायती राज में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण है।

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प्रश्न 5.
गांधी जी के अनुसार कौन-सा राज्य ठीक नहीं है ?
उत्तर-
गांधी जी के अनुसार जो राज्य शक्ति या बल का प्रयोग करे अथवा जो राज्य बल या शक्ति की मदद से बना हो वह राज्य ठीक नहीं है।

प्रश्न 6.
गांधी जी देश में किस प्रकार की व्यवस्था चाहते थे ?
उत्तर-
गांधी जी देश में पंचायती राज प्रणाली चाहते थे ताकि निचले स्तर तक शक्तियां बांट दी जाएं।

प्रश्न 7.
राज्य किस तरह बनता है ?
उत्तर-
राज्य सोच समझ कर चेतन कोशिशों से बनाया जाता है ताकि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इसका प्रयोग किया जा सके।

प्रश्न 8.
राज्य के उद्देश्यों की पूर्ति कौन करता है ?
उत्तर-
राज्य बनाने के कुछ उद्देश्य होते हैं तथा इन उद्देश्यों की पूर्ति सरकार द्वारा होती है। इस तरह सरकार ही राज्य में उद्देश्यों की पूर्ति करती है।

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प्रश्न 9.
राज्य के आवश्यक कार्य कौन-से हैं ?
उत्तर-
देश की आंतरिक तथा बाहरी खतरों से सुरक्षा राज्य का सबसे आवश्यक कार्य है।

प्रश्न 10.
समाज के लिए न्याय की व्यवस्था कौन करता है ?
उत्तर-
समाज के लिए न्याय की व्यवस्था राज्य करता है। राज्य ही न्यायपालिका का निर्माण करता है।

प्रश्न 11.
राज्य किस प्रकार की व्यवस्था को उत्पन्न करता है?
उत्तर-
राज्य राजनीतिक व्यवस्था को जन्म देता है।

प्रश्न 12.
राज्य के कौन-से ज़रूरी तत्त्व होते हैं?
उत्तर-
राज्य के चार ज़रूरी तत्त्व जनसंख्या, निश्चित भौगोलिक क्षेत्र, सरकार तथा प्रभुसत्ता होनी चाहिए।

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प्रश्न 13.
आर्थिक संस्थाएं क्या होती हैं ?
उत्तर-
जो संस्थाएं आर्थिक क्रियाओं के उत्पादन, बांट, उपभोग इत्यादि का ध्यान रखती हों, वह आर्थिक संस्थाएं होती हैं।

प्रश्न 14.
आर्थिक व्यवस्थाओं की कोई उदाहरण दें।
उत्तर-
आर्थिक व्यवस्थाओं के उदाहरण हैं-पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद।

प्रश्न 15.
आर्थिक संस्थाओं के उदाहरण दें।
उत्तर-
निजी सम्पत्ति, श्रम विभाजन, विनिमय इत्यादि आर्थिक संस्थाओं के उदाहरण हैं।

प्रश्न 16.
पूंजीवाद में मुख्य तौर पर कितने वर्ग होते हैं ?
उत्तर-
पूंजीवाद में मुख्य तौर पर दो वर्ग-पूंजीपति वर्ग तथा मज़दूर वर्ग होते हैं।

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प्रश्न 17.
साम्यवादी व्यवस्था में उत्पादन के साधन पर किसका अधिकार होता है ?
उत्तर–
साम्यवादी व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर राज्य का या समाज का अधिकार होता है।

प्रश्न 18.
साम्यवादी व्यवस्था तथा समाजवादी व्यवस्था के विचार किसके थे?
उत्तर-
साम्यवादी व्यवस्था तथा समाजवादी व्यवस्था के विचार कार्ल मार्क्स के थे।

प्रश्न 19.
साम्यवादी किस चीज़ के खिलाफ होते हैं?
उत्तर–
साम्यवादी पैतृक सम्पत्ति तथा निजी सम्पत्ति के खिलाफ होते हैं।

प्रश्न 20.
क्या भारत एक धार्मिक देश है ?
उत्तर-
जी नहीं भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है जहां कई धर्मों के लोग मिलजुल कर एक साथ रहते हैं।

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प्रश्न 21.
धर्म क्या है?
उत्तर-
धर्म विश्वासों तथा संस्कारों का एक संगठन है जो सामाजिक जीवन को नियमित करके नियंत्रित करता है।

प्रश्न 22.
धर्म की उत्पत्ति किसने की?
उत्तर-
धर्म की उत्पत्ति मानव ने की।

प्रश्न 23.
किन समाजशास्त्रियों ने धर्म का अध्ययन किया है?
उत्तर-
दुर्शीम, वैबर, टेलर इत्यादि ने धर्म का अध्ययन किया है।

प्रश्न 24.
आस्तिक कौन होता है?
उत्तर-
जो व्यक्ति अलौकिक शक्ति, प्राचीन परंपराओं तथा धर्म में विश्वास रखता हो उसे आस्तिक कहते हैं।

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प्रश्न 25.
नास्तिक कौन होता है?
उत्तर-
जो व्यक्ति अलौकिक शक्ति तथा धर्म में विश्वास न करता हो उसे नास्तिक कहते हैं।

प्रश्न 26.
धर्म के समाज में चलते रहने का क्या कारण है?
उत्तर-
धर्म में जो भी गुण पाए जाते हैं उन्हीं की वजह से आज भी समाज में धर्म चल रहा है।

प्रश्न 27.
भारत में शिक्षित व्यक्ति का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
भारत में जो भी व्यक्ति किसी भी भाषा में पढ़ या लिख सकता है वह शिक्षित व्यक्ति है।

प्रश्न 28.
भारत में स्कूलों के लिए पाठ्यक्रम कौन बनाता है ?
उत्तर-
भारत में स्कूलों के लिए पाठ्यक्रम N.C.E.R.T. तैयार करता है।

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प्रश्न 29.
भारतीय आधुनिक शिक्षा प्रणाली किस पर आधारित है ?
उत्तर-
भारतीय आधुनिक शिक्षा प्रणाली पश्चिमी शिक्षा पर आधारित है।

प्रश्न 30.
प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली किस पर आधारित थी ?
उत्तर-
प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली धर्म या धार्मिक ग्रन्थों पर आधारित थी।

प्रश्न 31.
सबसे पहले बच्चे को शिक्षा कहां प्राप्त होती है ?
उत्तर-
सबसे पहले बच्चे को शिक्षा परिवार में प्राप्त होती है क्योंकि परिवार में ही बच्चा सबसे पहले आंखें खोलता है।

प्रश्न 32.
भारत में आधुनिक शिक्षा की नींव किसने रखी थी ?
उत्तर-
भारत में आधुनिक शिक्षा की नींव अंग्रेज़ों ने रखी थी।

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प्रश्न 33.
2011 में भारत में साक्षरता दर कितनी थी ?
उत्तर-
2011 में भारत की साक्षरता दर 74% थी।

प्रश्न 34.
भारत में उच्च शिक्षा का ध्यान कौन रखता है ?
उत्तर-
भारत में उच्च शिक्षा का ध्यान U.G.C. रखती है।

प्रश्न 35.
औपचारिक शिक्षा क्या होती है ?
उत्तर-
जो शिक्षा व्यक्ति स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में प्राप्त करता है उसे औपचारिक शिक्षा कहते हैं।

प्रश्न 36.
अनौपचारिक शिक्षा क्या होती है ?
उत्तर-
जो शिक्षा व्यक्ति अपने रोज़ के कार्यों, अनुभवों, मेल-मिलाप, परिवार इत्यादि में लेता है वह अनौपचारिक शिक्षा होती है।

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प्रश्न 37.
प्राचीन समय में शिक्षा कौन देता था ?
उत्तर-
प्राचीन समय में शिक्षा ब्राह्मण देता था।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
गांधी जी के राज्य की शक्तियों के बारे क्या विचार थे ?
उत्तर-
गांधी जी के अनुसार राज्य की शक्चियों का विकेंद्रीकरण अर्थात् शक्तियां विभाजित कर दी जाएं ताकि शक्तियां एक स्थान पर केंद्रित न हों तथा अगर इन्हें अलग-अलग स्तरों पर विभाजित कर दिया जाए तो ही शक्ति का ग़लत प्रयोग नहीं होगा।

प्रश्न 2.
राज्य की कोई दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. राज्य अपनी जनता के कल्याण के कार्य करता रहता है।
  2. अगर आवश्यकता हो तो राज्य शक्ति का प्रयोग भी करता है। (iii) राज्य का अपना भौगोलिक क्षेत्र होता है, जनसंख्या तथा प्रभुत्त्व भी होता है।

प्रश्न 3.
रूसो तथा प्लैटो के अनुसार राज्य की जनसंख्या कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर-
बहुत से विद्वानों ने राज्य की जनसंख्या के बारे में अलग-अलग विचार दिए हैं। रूसो के अनुसार राज्य की जनसंख्या कम-से-कम 10,000 होनी चाहिए तथा इसी प्रकार प्लैटो के अनुसार आदर्श राज्य की जनसंख्या 5040 होनी चाहिए।

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प्रश्न 4.
पूंजीपति वर्ग कौन-सा होता है ?
उत्तर-
पूंजीपति वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के सभी साधन तथा पैसा होता है तथा जो मज़दूरों को कार्य देकर उनका शोषण करता है। क्योंकि पूंजीपति वर्ग के पास काफ़ी अधिक पैसा होता है इसलिए वह अपने पैसे का निवेश करके काफ़ी मुनाफा कमाता है।

प्रश्न 5.
मज़दूर वर्ग कौन-सा होता है ?
उत्तर-
वह वर्ग जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते तथा पूंजीपति वर्ग जिसका हमेशा शोषण करता है तथा जो वर्ग केवल अपना श्रम बेचकर अपना पेट पालता है उसे मजदूर वर्ग कहते हैं। इस वर्ग के पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते तथा इसका सदियों से शोषण होता आया है।

प्रश्न 6.
साम्यवादी व्यवस्था क्या होती है ?
उत्तर-
जिस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य वर्ग रहित बनाना अर्थात् उस प्रकार के समाज का निर्माण करना है, जिसमें कोई वर्ग न हो, उसे साम्यवादी व्यवस्था का नाम दिया जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था में उत्पादन के सभी साधनों पर राज्य का अधिकार होता है।

प्रश्न 7.
समाजवाद क्या होता है ?
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार जिस व्यवस्था में सभी को उनकी आवश्यकता के अनुसार तथा उसकी योग्यता के अनुसार मिलेगा, समाजवाद की व्यवस्था होगी। इस प्रकार की व्यवस्था में समानता व्याप्त हो जाएगी तथा सभी को समान रूप में राज्य की तरफ से मिलेगा।

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प्रश्न 8.
धर्म कैसे व्यक्ति को आलसी बना देता है ?
उत्तर-
धार्मिक व्यक्ति में किस्मत तथा कर्म की विचारधारा आ जाती है। इस कारण वह स्वयं कोई कार्य नहीं करता अपितु कार्य करना ही छोड़ देता है। वह सोचता है कि जो कुछ उसके भाग्य में होगा उसे मिल जाएगा। इस तरह वह आलसी बन जाता है तथा कार्य से दूर भागता है।

प्रश्न 9.
धर्म सामाजिक नियन्त्रण कैसे करता है ?
उत्तर-
धर्म किसी अलौकिक शक्ति के विश्वास पर आधारित है जिसे किसी ने देखा नहीं है। व्यक्ति इस शक्ति से डरता है तथा कोई कार्य नहीं करता जो इसकी इच्छा के विरुद्ध हो। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं को नियंत्रित कर लेता है। इस प्रकार धर्म सामाजिक नियंत्रण करता है।

प्रश्न 10.
शिक्षा क्या होती है ?
उत्तर-
शिक्षा व्यक्ति के अंदर समाज तथा स्थितियों के साथ तालमेल बिठाने का सामर्थ्य विकसित करके उसका समाजीकरण करती है। शिक्षा वह प्रभाव है जिसे जा रही पीढ़ी उनके ऊपर प्रयोग करती है जो अभी बालिग नहीं हैं।

प्रश्न 11.
शिक्षा बच्चों के विकास को कैसे प्रभावित करती है ?
उत्तर-
शिक्षा बच्चों के विकास को प्रभावित करती है क्योंकि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बच्चों का सर्वपक्षीय विकास करना है। शिक्षा प्राप्त करने के कारण ही बच्चे को अच्छा जीवन मिल जाता है तथा उसका भविष्य अच्छा बनाने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 12.
शिक्षा के कोई दो कार्य बताएं।
उत्तर-

  • शिक्षा हमारे जीवन को व्यवस्थित तथा नियंत्रित करती है।
  • शिक्षा हमें समाज के साथ अनुकूलन करना सिखाती है।
  • शिक्षा व्यक्ति के अंदर नैतिक गुणों का विकास करती है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य की चार विशेषताएं।
उत्तर-

  1. राज्य सार्वजनिक हितों की रक्षा करता है।
  2. राज्य अमूर्त होता है।
  3. राज्य के पास वास्तविक शक्तियां या सत्ता होती है।
  4. राज्य की एक सरकार होती है।

प्रश्न 2.
राज्य के कोई चार आवश्यक कार्य बताएं।
उत्तर-

  • राज्य अन्दरूनी शान्ति व सुरक्षा बनाये रखता है।
  • राज्य नागरिक अधिकारों की रक्षा करता है।
  • राज्य न्याय प्रदान करता है।
  • राज्य परिवार के सम्बन्धों को स्थिर रखता है।
  • राज्य बाह्य हमले से रक्षा करता है।

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प्रश्न 3.
राज्य के कोई चार ऐच्छिक कार्य बताइए।
उत्तर-

  1. राज्य यातायात व संचार के साधनों का विकास करता है।
  2. राज्य प्राकृतिक साधनों का उपयोग देश की भलाई के लिये करता है।
  3. राज्य शिक्षा देने का प्रबन्ध करता है।
  4. राज्य लोगों की सेहत का ध्यान रखता है।
  5. राज्य व्यापार एवं उद्योगों का संचालन करता है।

प्रश्न 4.
सरकार।
उत्तर-
सरकार एक ऐसा संगठन है, जिसके पास आदेशात्मक (Control) होता है। जोकि राज्य में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने में सहायता करता है। सरकार को मान्यता प्राप्त होती है क्योंकि सरकार के पास बहुमत का समर्थन होता है। सरकार तो राज्य के उद्देश्यों को पूरा करने का साधन है।

प्रश्न 5.
सरकार की कोई चार विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. सरकार लोगों के द्वारा चुनी जाती है।
  2. सरकार मूर्त होती है।
  3. सरकार कई अंगों से मिलकर बनती है।
  4. सरकार अस्थायी होती है।
  5. सरकार राज्य का साधन है।

प्रश्न 6.
सरकार के कितने अंग हैं ?
उत्तर-
सरकार के तीन अंग होते हैं। कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका। कार्यपालिका में सरकार के प्रधानमन्त्री एवं मन्त्री इत्यादि कार्य करते हैं। विधानपालिका का अर्थ संसद् या विधानसभा जोकि विंधान या कानून बनाती है और न्यायपालिका अर्थात् अदालतें, जज इत्यादि होते हैं जो कानूनों को लागू करते हैं।

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प्रश्न 7.
सरकार के कोई चार कार्य बताएं।
उत्तर-

  1. सरकार शिक्षा का प्रसार करती है।
  2. सरकार ग़रीबी दूर करने की कोशिश करती है।
  3. सरकार सार्वजनिक क्षेत्र का ध्यान रखती है।
  4. सरकार व्यापार एवं उद्योगों को उत्साहित करती है और उनके लिए नियम बनाती है।
  5. सरकार देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती है।
  6. सरकार नियुक्तियां करती है।
  7. सरकार कानून बनाती है।

प्रश्न 8.
राजनीतिक दल क्या होता है ? ।
उत्तर-
राजनीतिक दल एक समूह होता है, जोकि कुछ नियमों के साथ बंधा हुआ होता है। यह एक लोगों की सभा है, जिसका एकमात्र महत्त्व राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना होता है जिसके लिए वह सभी मिलकर कोशिश और उपाय करते रहते हैं। इसके सदस्यों के विचार साझे होते हैं, क्योंकि वह सभी एक ही दल से सम्बन्ध रखते है।

प्रश्न 9.
राजनीतिक दल की कोई चार विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. प्रत्येक राजनीतिक दल की भिन्न-भिन्न नीतियां होती हैं।
  2. प्रत्येक दल के सदस्य अच्छी तरह संगठित होते हैं और वह दल भी अच्छी तरह से संगठित व सुदृढ़ होता है।
  3. इसके सभी सदस्य एक ही नीति पर विश्वास करते हैं।
  4. इनके सदस्यों का एक साझा कार्यक्रम होता है।
  5. प्रत्येक अच्छा राजनीतिक दल देश के हितों का ध्यान रखता है।

प्रश्न 10.
राजनीतिक दलों के कोई चार कार्य बताओ।
उत्तर-

  1. यह लोकमत बनाते हैं।
  2. यह राजनीतिक शिक्षा देते हैं।
  3. यह उम्मीदवार चुनने में सहायता करते हैं।
  4. यह लोगों की कठिनाइयों को सरकार तक पहुँचाते हैं।
  5. यह राष्ट्रीय हितों को महत्त्व देते हैं।

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प्रश्न 11.
प्रभुसत्ता (Soveriegnty) ।
उत्तर-
प्रभुसत्ता का अर्थ है राज्य के ऊपर किसी भी प्रकार का बाहरी या आन्तरिक दबाव न हो। वह अपने फैसले लेने के लिये पूर्णतः स्वतन्त्र हो। यह दो प्रकार की होती है। (1) आन्तरिक प्रभुसत्ता (2) बाहरी प्रभुसत्ता। आन्तरिक प्रभुसत्ता से भाव है कि राज अन्य सभी सत्ताओं से सर्वोच्च है। उसकी सीमा के अन्दर (भीतर) रहने वाली संस्थाओं के लिए उसके आदेश मानने आवश्यक होते हैं। अन्य संस्थाओं का अस्तित्व राज्य के ऊपर निर्भर करता है। बाहरीय प्रभुसत्ता से भाव है कि राज्य देश से बाहर की किसी भी शक्ति के अधीन नहीं है। वह अपनी विदेशी एवं घरेलू नोति को बनाने के लिए पूर्णतः स्वतन्त्र होता है।

प्रश्न 12.
राज्य के कार्यों के बढ़ने के कारण।
उत्तर-

  1. सामाजिक परिवर्तन तेजी से हो रहे हैं जिसके कारण राज्य के कार्य बढ़ रहे हैं।
  2. सामाजिक जटिलता के बढ़ने के कारण ही राज्य के कार्य बढ़ रहे हैं।
  3. देश की जनसंख्या के तीव्रता के साथ बढ़ने के कारण उनको सुविधाएं देने के कारण राज्य का कार्य बढ़ रहा है।
  4. कल्याणकारी राज्य की धारणाओं के कारण ही राज्य के कार्य बढ़ रहें है।

प्रश्न 13.
सरकार के तीन अंग।
उत्तर-

  1. विधानपालिका-यह सरकार का वैधानिक अंग है जिसका मुख्य कार्य कानून बनाना एवं कार्यपालिका के ऊपर नियंत्रण रखना है। यह संसद् है।
  2. कार्यपालिका-इसका मुख्य कार्य संसद् या विधानपालिका द्वारा बनाये गये कानूनों को लागू करना है और प्रशासन को चलाना है। यह सरकार है।
  3. न्यायपालिका- इसका मुख्य कार्य संसद् के द्वारा पास और सरकार द्वारा लागू किये गये कानूनों के अनुसार . न्याय करना है। ये अदालतें होती हैं।

प्रश्न 14.
लोकतन्त्र।
उत्तर-
लोकतन्त्र सरकार का ही एक प्रकार है जिसमें जनता का शासन चलता है। इसमें जनता के प्रतिनिधि साधारण जनता के बालिगों द्वारा वोट देने के अधिकार से चुने जाते हैं तथा यह प्रतिनिधि ही जनता का प्रतिनिधित्व करके उनकी तरफ से बोलते हैं। यह कई संकल्पों जैसे कि समानता, स्वतन्त्रता तथा भाईचारे में विश्वास रखता है तथा यह ही इसका कार्यवाहक आधार है। इसके पीछे मूल विचार यह है कि समाज में, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक समानता होनी चाहिए। इसमें प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुसार बोलने तथा संगठन बनाने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए।

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प्रश्न 15.
शक्ति।
उत्तर-
समाज साधारणतया वर्गों में विभाजित होता है तथा इन वर्गों के हिसाब से व्यक्ति को प्रस्थिति तथा भूमिका प्राप्त होती है। प्रत्येक व्यक्ति की प्रस्थिति तथा भूमिका अलग-अलग होती है। समाज में अलग-अलग वर्गों में विभाजन को स्तरीकरण का नाम दिया जाता है। जब व्यक्ति समाज में रहते हुए अपनी स्थिति तथा भूमिका को निभाते हुए किसी-न-किसी स्थिति को प्राप्त करता है तो यह कहा जा सकता है कि उसके शक्ति अथवा ताकत प्राप्त कर ली है। इस प्रकार शक्ति समझौते तथा सौदे करने की प्रक्रिया है जिसमें प्राथमिकता रख कर सम्बन्धों के लिए निर्णय लिए जाते हैं।

प्रश्न 16.
यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity) क्या होती है?
उत्तर-
दुर्थीम के अनुसार समाज में सदस्यों के बीच मिलने वाली समानताओं के कारण यान्त्रिक एकता होती · है। जिस समाज के सदस्यों का जीवन समानताओं से भरपूर होता है और विचारों, प्रतिमानों, आदर्शों के प्रतिमान प्रचलित होते हैं, वहां उन समानताओं के फलस्वरूप एकता हो जाती है, जिसको दुर्थीम ने यान्त्रिक एकता कहा है। यहां पर सदस्य एक मशीन या यंत्र की तरह कार्य करते हैं। इसको दमनकारी कानून व्यक्त करता है। यह आदिम समाजों में होती है।

प्रश्न 17.
आंगिक एकता (Organic Solidarity) क्या होती है ?
उत्तर-
आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप के साथ एक-दूसरे के बंधे नहीं होते है। व्यक्ति में श्रमविभाजन एवं विशेषीकरण के कारण काफ़ी विभिन्नताएं आ जाती हैं। जिस कारण व्यक्तियों को एक-दूसरे के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है। व्यक्ति किसी विशेष कार्य में ही योग्यता प्राप्त कर सकता है और सभी इसी कारण एकदूसरे के ऊपर निर्भर करते हैं। सभी मजबूरी में एक दूसरे के पास आते हैं और एक एकता में बंधे रहते हैं। इसे दुर्शीम ने आंगिक एकता का नाम दिया है।

प्रश्न 18.
उत्पादन।
उत्तर-
उत्पादन का अर्थ ऐसी क्रिया से है, जो व्यक्ति की आवश्यकता को पूर्ण करते हेतु किसी वस्तु का निर्माण करती है। इसको किसी वस्तु को उपयोग करने हेतु भी परिभाषित कर सकते हैं। किसी भी वस्तु के निर्माण में बहुत सी वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। जैसे-प्राकृतिक साधन, मानवीय शक्ति, मज़दूरी, तकनीक, श्रम इत्यादि। इस प्रकार उत्पादन ऐसी क्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये किसी भी वस्तु का निर्माण करता है और उसका उपयोग करता है।

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प्रश्न 19.
उपभोग।
उत्तर-
किसी भी वस्तु के उत्पादन के साथ-साथ उपभोग का होना भी अति आवश्यक होता है क्योंकि बिना उत्पादन के खपत नहीं हो सकती। उपभोग का अर्थ है किसी भी वस्तु का उपभोग करना एवं उपभोग का अर्थ है, वह गुण जो किसी वस्तु को मानव की आवश्यकता पूरा करने के योग्य बनाता है। यह प्रत्येक समाज का मुख्य कार्य होता है कि वह उपभोग को समाज के लिये नियमित व नियंत्रित करे।

प्रश्न 20.
विनिमय।
उत्तर-
किसी भी वस्तु के लेने-देने को वर्तमान में (Exchange) कहते हैं। इसका अर्थ है किसी वस्तु के स्थान पर किसी दूसरी वस्तु को लेना या देना। विनिमय वर्तमान में ही नहीं, बल्कि पुरातन समाज से ही चला आ रहा है। यह कई प्रकार का होता है, वस्तु के बदले वस्तु, सेवा के बदले सेवा, वस्तु के बदले धन, सेवा के बदले धन, यह दो प्रकार का होता है, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, विनिमय सर्वप्रथम वस्तुओं का वस्तुओं के साथ, सेवा के बदले वस्तुओं के साथ और सेवा के बदले सेवा के लेने-देने के साथ होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय में तोहफे का विनिमय सर्वोत्तम होता है।

प्रश्न 21.
विभाजन।
उत्तर-
आम व्यक्ति के लिये विभाजन का अर्थ वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान के ऊपर ले जाने से और बेचने से है। परन्तु अर्थशास्त्र में विभाजन वह प्रक्रिया है, जिसके साथ किसी आर्थिक वस्तु का कुल मूल्य उन व्यक्तियों में बांटा जाता है, जिन्होंने उस वस्तु के उत्पादन में भाग लिया। भिन्न-भिन्न लोगों एवं समूहों का विशेष योगदान होता है जिस कारण उन्हें मुआवजा मिलना चाहिये। इस तरह उन्हें दिया गया धन या पैसा मुआवजा विभाजन होता है। जैसे ज़मीन के मालिक को किराया, मजदूर को मजदूरी, पैसे लगाने वाले को ब्याज, सरकार को टैक्स आदि के रूप में इस विभाजन का हिस्सा प्राप्त होता है।

प्रश्न 22.
धर्म।
उत्तर-
धर्म मानवीय जीवन की सर्वशक्तिमान, परमात्मा के प्रति श्रद्धा का नाम है या धर्म का अर्थ है परमात्मा के होने का अनुभव। धर्म में व्यक्ति अपने आपको अलौकिक शाक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित करना मानता है।

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प्रश्न 23.
धर्म की कोई चार विशेषताएं बताइये।
उत्तर-

  1. धर्म में अलौकिक शक्तियों में विश्वास होता है।
  2. धर्म में बहुत सारे संस्कार होते हैं।
  3. धर्म में धार्मिक कार्य-विधियां भी होती हैं।
  4. धर्म में धार्मिक प्रतीक एवं चिन्ह भी होते हैं।

प्रश्न 24.
धर्म के कार्य।
उत्तर-

  1. धर्म सामाजिक संगठन को स्थिरता प्रदान करता है।
  2. धर्म सामाजिक जीवन को एक निश्चित रूप प्रदान करता है।
  3. धर्म पारिवारिक जीवन को संगठित करता है।
  4. धर्म सामाजिक नियंत्रण रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
  5. धर्म भेद-भाव को दूर करता है।
  6. धर्म समाज कल्याण के कार्यों के लिये उत्साहित करता है।
  7. धर्म व्यक्ति के विकास करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  8. धर्म व्यक्ति के समाजीकरण करने में सहायता करता है।

प्रश्न 25.
धर्म के दोष।
उत्तर-

  • धर्म सामाजिक उन्नति के रास्ते में रुकावट बनता है।
  • धर्म के कारण व्यक्ति भाग्य के सहारे रह जाता है।
  • धर्म राष्ट्रीय एकता का विरोध करता है।
  • धर्म सामाजिक समस्याओं को बढ़ाता है।
  • धर्म परिवर्तन के रास्ते में रुकावट बनता है।
  • धर्म समाज को बांट देता है।

प्रश्न 26.
धर्म सामाजिक जीवन को निश्चित रूप देता है।
उत्तर-
कोई भी धर्म रीति-रिवाजों व रूढ़ियों का एकत्रित रूप होता है। यह रीति-रिवाज एवं रूढ़ियों संस्कृति का हिस्सा होती हैं। इसलिये धर्म के कारण सामाजिक वातावरण व संस्कृति में सन्तुलन बन जाता है। इसी सन्तुलन कारण जीवन को एक निश्चित रूप मिल जाता है। धर्म के कारण ही लोग रीति-रिवाज़ों, रूढ़ियों आदि पर विश्वास या सत्कार करते हैं और अन्य लोगों के साथ भी सन्तुलन बनाकर चलते हैं। इसी सन्तुलन के कारण ही सामाजिक जीवन सही तरीके के साथ चलता रहता है। यह सब धर्म के फलस्वरूप ही होता है।

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प्रश्न 27.
धर्म एवं सामाजिक नियंत्रण।
उत्तर-
धर्म नियंत्रण के प्रमुख साधनों में से एक है। धर्म के पीछे पूर्ण समुदाय की अनुमति होती है। व्यक्ति के ऊपर न चाहते हुए भी धर्म का जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। धर्म अपने सदस्यों को इस प्रकार नियंत्रित एवं निर्देशित करता है कि व्यक्ति को धर्म के आगे नतमस्तक एवं उसका कहना मानना ही पड़ता है। धर्म एक अलौकिक शक्ति एवं विश्वास है, इसलिये सभी लोग उस अलौकिक शक्ति के प्रकोप से बचना चाहते हैं और कोई भी कार्य ऐसा नहीं करते हैं जो धर्म के विरुद्ध हो। इस प्रकार लोगों के व्यवहार करने के तरीके धर्म के द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। धर्म में ही पाप-पुण्य, पवित्र एवं अपवित्र की धारणा होती है। यह व्यक्ति को धर्म के विरुद्ध कार्य करने को रोकती है। यह मान्यता है कि धर्म के विरुद्ध कार्य करना पाप है। जो व्यक्ति को एक नरक में लेकर जाता है और धर्म के अनुसार कार्य करने वाले को स्वर्ग में जगह मिलती है। इसी प्रकार दान देना, सहयोग करना, सहनशीलता सिखाना भी धर्म से ही प्राप्त होते हैं। धर्म लोगों को बुरे कार्यों के विरुद्ध जाने को कहता है, इस प्रकार धर्म समाज के ऊपर एक नियंत्रण शक्ति का कार्य करता है।

प्रश्न 28.
पवित्र।
उत्तर-
दुर्थीम के अनुसार सभी धार्मिक विश्वास आदर्शात्मक वस्तु जगतं को पवित्र (Sacred) तथा साधारण (Profane) दो वर्गों में बाँटते हैं। पवित्र वस्तुओं में देवताओं तथा आध्यात्मिक शक्तियों या आत्माओं के अतिरिक्त गुफाओं, पेड़ों, पत्थर, नदी इत्यादि शामिल हो सकते हैं। साधारण वस्तुओं की तुलना में पवित्र वस्तुएं अधिक शक्ति तथा शान रखती हैं। दुर्थीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं अर्थात् अलग तथा प्रतिबन्धित वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा क्रियाओं की संगठित व्यवस्था है।”

प्रश्न 29.
पंचायती राज्य संस्थाएं।
उत्तर-
हमारे देश में स्थानीय क्षेत्रों का विकास करने के लिए दो प्रकार के ढंग हैं। शहरी क्षेत्रों का विकास करने के लिए स्थानीय सरकारें होती हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करने के लिए पंचायती राज्य संस्थाएं होती हैं। हमारे देश की लगभग 68% जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करने के लिए जो संस्थाएं बनाई गई हैं उन्हें पंचायती राज्य संस्थाएं कहते हैं। इसमें तीन स्तर होते हैं। ग्राम स्तर पर विकास करने के लिए पंचायत होती है, ब्लॉक स्तर पर विकास करने के लिए ब्लॉक समिति होती है तथा जिला स्तर पर विकास करने के लिए जिला परिषद् होती है। इन सभी के सदस्य चुने भी जाते हैं तथा मनोनीत भी होते हैं।

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प्रश्न 30.
ग्राम सभा।
उत्तर-
गांव की पूरी जनसंख्या में से बालिग व्यक्ति जिस संस्था का निर्माण करते हैं उसे ग्राम सभा कहते हैं। गांव के सभी वयस्क व्यक्ति इसके सदस्य होते हैं तथा यह गांव की पूर्ण जनसंख्या की एक सम्पूर्ण इकाई है। यह वह मूल इकाई है जिस पर हमारे लोकतन्त्र का ढांचा टिका हुआ है। जिस गांव की जनसंख्या 250 से अधिक होती है वहां ग्राम सभा बन सकती है। यदि एक गांव की जनसंख्या कम है तो दो गांव मिलकर ग्राम सभा बनाते हैं। ग्राम सभा में गांव का प्रत्येक वह बालिग अथवा वयस्क व्यक्ति सदस्य होता है जिसे वोट देने का अधिकार प्राप्त होता है। प्रत्येक ग्राम सभा का एक प्रधान तथा कुछ सदस्य होते हैं जो 5 वर्ष के लिए चुने जाते हैं।

प्रश्न 31.
ग्राम पंचायत।
उत्तर-
प्रत्येक ग्राम सभा अपने क्षेत्र में से एक ग्राम पंचायत का चुनाव करती है। इस प्रकार ग्राम सभा एक कार्यकारी संस्था है जो ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करती है। इसमें एक सरपंच तथा 5 से 13 तक पंच होते हैं। यह 5 वर्ष के लिए चुनी जाती है परन्तु यदि यह अपने अधिकारों का गलत प्रयोग करे तो उसे 5 वर्ष से पहले भी भंग किया जा सकता है। पंचायत में पिछड़ी श्रेणियों तथा स्त्रियों के लिए स्थान आरक्षित हैं। ग्राम पंचायत में सरकारी कर्मचारी तथा मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते। ग्राम पंचायत गांव में सफाई, मनोरंजन, उद्योग तथा यातायात के साधनों का विकास करती है तथा गांव की समस्याएं दूर करती है।

प्रश्न 32.
ग्राम पंचायत के कार्य।
उत्तर-

  • ग्राम पंचायत का सबसे पहला कार्य गांव के लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाना होता है।
  • गांव की पंचायत गांव में स्कूल खुलवाने तथा लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती है।
  • ग्राम पंचायत ग्रामीण समाज में मनोरंजन के साधन जैसे कि फिल्में, मेले लगवाने तथा लाइब्रेरी खुलवाने का भी प्रबन्ध करती है। (iv) पंचायत लोगों को कृषि की नई तकनीकों के बारे में बताती है, नए बीजों, उन्नत उर्वरकों का भी प्रबन्ध करती है।
  • यह गांव में कुएं, ट्यूबवैल इत्यादि लगवाने का प्रबन्ध करती है तथा नदियों के पानी की भी व्यवस्था करती है।
  • यह गांवों का औद्योगिक विकास करने के लिए गांव में उद्योग लगवाने का भी प्रबन्ध करती है।

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प्रश्न 33.
न्याय पंचायत।
उत्तर-
गांवों के लोगों में झगड़े होते रहते हैं जिस कारण उनके झगड़ों का निपटारा करना आवश्यक होता है। इसलिए 5-10 ग्राम सभाओं के लिए एक न्याय पंचायत का निर्माण किया जाता है। न्याय पंचायत लोगों के बीच होने वाले झगड़ों को खत्म करने में सहायता करती है। इसके सदस्य चुने जाते हैं तथा सरपंच पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाता है। इन सदस्यों को पंचायत से प्रश्न पूछने का भी अधिकार होता है।

प्रश्न 34.
पंचायत समिति अथवा ब्लॉक समिति।
उत्तर-
पंचायती राज्य संस्थाओं के तीन स्तर होते हैं। सबसे निचले गांव के स्तर पर पंचायत होती है। दूसरा स्तर ब्लॉक का होता है जहां पर ब्लॉक समिति अथवा पंचायत समिति का निर्माण किया जाता है। एक ब्लॉक में आने वाली पंचायतें, पंचायत समिति के सदस्य होते हैं तथा इन पंचायतों के प्रधान अथवा सरपंच इसके सदस्य होते हैं।

पंचायत समिति के इन सदस्यों के अतिरिक्त और सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष तौर पर किया जाता है। पंचायत समिति अपने क्षेत्र में आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह गांवों के विकास के कार्यक्रमों को चैक करती है तथा पंचायतों को गांव के कल्याण करने के लिए निर्देश देती है। यह पंचायती राज्य के दूसरे स्तर पर है।

प्रश्न 35.
जिला परिषद्।
उत्तर-
पंचायती राज्य के सबसे ऊंचे स्तर पर है ज़िला परिषद् जो कि जिले के बीच आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह भी एक प्रकार की कार्यकारी संस्था होती है। पंचायत समितियों के चेयरमैन चुने हुए सदस्य, उस क्षेत्र के लोक सभा, राज्य सभा तथा विधान सभा के सदस्य सभी जिला परिषद के सदस्य होते हैं। यह सभी जिले में आने वाले गांवों के विकास का ध्यान रखते हैं। जिला परिषद् कृषि में सुधार, ग्रामीण बिजलीकरण, भूमि सुधार, सिंचाई, बीजों तथा उर्वरकों को उपलब्ध करवाना, शिक्षा, उद्योग लगवाने जैसे कार्य करती है।

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प्रश्न 36.
पंचायती राज्य की समस्याएं।
उत्तर-

  • लोगों के अनपढ़ तथा अन्धविश्वासों में फंसे हुए होने के कारण वह परिवर्तन को जल्दी स्वीकार नहीं करते जो कि पंचायती राज्य संस्थाओं के रास्ते में सबसे बड़ी समस्या है।
  • गांवों में अच्छे तथा ईमानदार नेताओं की कमी होती है तथा वह केवल अपने विकास पर ही ध्यान देते हैं गांवों के विकास पर नहीं।
  • अच्छे पढ़े-लिखे लोग धीरे-धीरे शहरों में बस रहे हैं जिससे गांव में पढ़े-लिखे नेताओं की कमी है।
  • सरकारी अफ़सर, पंचों तथा सरपंचों से मिलकर गांव को मिलने वाले ज़्यादातर पैसे को स्वयं ही खा जाते हैं तथा गांव का विकास रुक जाता है।

प्रश्न 37.
ग्राम पंचायत की आय के साधन।
उत्तर-

  • पंचायत को राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त टैक्स लगाने का अधिकार प्राप्त है जैसे कि सम्पत्ति कर, पशु कर, पेशा कर, मार्ग कर, चुंगी कर इत्यादि इनसे उसे आय होती है।
  • ग्राम पंचायत कई प्रकार के जुर्माने भी लगा सकती है तथा फीस भी इकट्ठी कर सकती है जिससे उसे आय प्राप्त होती है।
  • पंचायतों को प्रत्येक वर्ष सरकार से ग्रांटें प्राप्त होती हैं जिससे उसकी आय बढ़ती है।
  • पंचायत को कूड़ा-कर्कट, गोबर बेचने से आय, मेलों से आय, पंचायत की सम्पत्ति से भी आय प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न 38.
पंचायत समिति का चेयरमैन।
उत्तर-
पंचायत समिति के चुने हुए सदस्य अपने में से एक चेयरमैन का चुनाव करते हैं जो कि डिप्टी कमिश्नर की निगरानी में चुना जाता है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। इसे समिति के क्षेत्र तथा प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है। यह समिति की मीटिंग बुलाता है तथा उनकी अध्यक्षता करता है। यह समिति के अधिकारियों की सहायता से समिति का बजट तैयार करके उन्हें पास करवाता है। यह पंचायत समिति के क्षेत्र में आने वाली सभी पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखता है तथा उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों का निरीक्षण भी करता है।

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बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक संस्थाओं के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
आर्थिक संस्थाओं के मुख्य कार्यों का वर्णन इस प्रकार है-

1. उत्पादन (Production)-उत्पादन का अर्थ ऐसी क्रिया है जो व्यक्ति की ज़रूरत को पूरा करने के लिए किसी चीज़ की निर्माण करती है। इसको किसी चीज़ को उपयोग करने के रूप में भी परिभाषित कर सकती है। किसी वस्तु के निर्माण में बहुत सारी वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है जिसका वर्णन नीचे दिया गया है

(1) सबसे पहले किसी वस्तु के उत्पादन के लिए प्राकृतिक साधनों की ज़रूरत पड़ती है जिससे वस्तु का निर्माण होता है। वे सभी वस्तुएं जो किसी भी चीज़ के निर्माण के लिए ज़रूरी होती हैं साधन कहलाती हैं। साधन में भौतिक वस्तुओं व उनके लिए प्रयोग होने वाली मानवीय ताकत भी शामिल है। भौतिक चीज़ों के उत्पादन के लिए बढ़िया भूमि व जलवायु की आवश्यकता होती है। इस्पात बनाने के लिए कच्चा लोहा व बिजली बनाने के लिए कोयले या पानी की आवश्यकता पड़ती है ताकि मशीनें चल सकें। इस प्रकार वस्तु के उत्पादन के लिए प्राकृतिक साधनों की ज़रूरत होती है। …

(2) प्राकृतिक साधनों के पश्चात् बारी आती है मानवीय शक्ति की। मनुष्य की मज़दूरी धन के उत्पादन के लिए प्रयोग की जाती है। व्यक्ति जब किसी भी चीज़ का निर्माण करता है तो वह अपना परिश्रम लगाता है और यही मेहनत किसी भी चीज़ की उपयोगिता बढ़ा देती है। मजदूर को उसकी मेहनत का किस तरह का फल मिले वह अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है। जैसे पुराने समय में गांवों में कार्य करवा कर उसको दाने, अनाज इत्यादि दिया जाता था पर आजकल उसको तनख्वाह पैसे के रूप में दी जाती है इस प्रकार मज़दूरी तथा मनुष्य की मेहनत का भी उत्पादन में बहुत बड़ा हाथ होता है।

(3) किसी भी चीज़ के उत्पादन के लिए साधनों व मजदूरी की ज़रूरत होती है। इनमें से किसी एक की गैर मौजूदगी से चीज़ नहीं बन सकती। इन दोनों की मदद से व मशीनों, उद्योग की अन्य वस्तुओं जिनकी मदद से चीजों का उत्पादन होता है को पूंजी कहा जाता है। इस प्रकार पूंजी वह चीज़ है जिस का निर्माण प्राकृतिक साधनों पर परिश्रम करके होता है अर्थात् जिसको आगे और पूंजी के उत्पादन में प्रयोग किया जा सकता है।

(4) प्राकृतिक साधनों, मज़दूरी व पूंजी के अतिरिक्त कई अन्य वस्तुएं हैं जो उत्पादन में मदद करती हैं। सबसे पहले टैक्नॉलाजी होती है। टैक्नॉलजी समाज की पूरी कला के ज्ञान का स्रोत है। जिस समाज का ज्ञान व कला जितनी बढ़िया होगा। वह समाज उतनी ही बढ़िया चीज़ का निर्माण करेगा। इसके समय साथ होता है जो किसी भी चीज़ के निर्माण में महत्त्वपूर्ण होता है। यदि हमने किसी चीज़ का निर्माण करना है तो वह निश्चित समय के अन्दर होना ज़रूरी है नहीं तो उस वस्तु के निर्माण की खपत बढ़ जाएगी। फिर बारी आती है निर्माण करने के तरीके की क्योंकि कम समय में साधनों के द्वारा चीज़ों का अधिक-से-अधिक मात्रा में प्राप्त करने का तरीका है। निर्माण करने का तरीका वह है जिससे कम-से-कम समय में अधिक वस्तुएं बनाई जाएं।

(5) अन्त में जो वस्तु उत्पादन में ज़रूरी होती हैं वह है उद्यमी। प्रत्येक उत्पादन की प्रक्रिया में कोई दिशा व किसी न किसी योजना की ज़रूरत होती है। आजकल बड़े-बड़े उद्योगों व समूहों की देख-रेख कुछ विशेष व्यक्ति या मालिक करते हैं। उत्पादन की प्रक्रिया में भिन्न-भिन्न व्यक्ति अपना योगदान डालते हैं। कुछ लोगों के पास प्राकृतिक साधन होते हैं, किसी के पास मज़दूरी होती है व किसी के पास पैसा। उद्यमी व्यक्ति इन सब को इकट्ठा करके चीज़ों का उत्पादन करता है व अपना मुनाफा कमाता है इस उत्पादन की प्रक्रिया में फायदा सब में बांटा जाता है। उद्यमी के साथ-साथ सरकारी नीतियों कानून, मज़दूरों की तनख्वाह उनके झगड़ों का निपटारा, व्यापार, काम के साथ सम्बन्धित कानूनों का निर्माण आदि ही इसमें ज़रूरी है। इस प्रकार इन सभी कारणों के कारण उत्पादन होता है। इस प्रकार आर्थिक संस्थाओं का सब से पहला काम उत्पादन करना होता है।

2. उपभोग (Consumption)-उत्पादन के साथ-साथ उपभोग का होना भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि बगैर उपभोग के उत्पादन नहीं हो सकता। इसका अर्थ होता है किसी चीज़ का उपयोग करना व उपयोग का अर्थ है, वह गुण जो किसी चीज़ को मनुष्य की ज़रूरत पूरा करने के योग्य बनाता है। साधारण समाजों में तो उपभोग की कोई मुश्किल नहीं होती क्योंकि जो भी चीज़ उत्पादित होती है, उसकी खपत आराम से हो जाती है जैसे आदिम समाज में होता था। व्यक्ति भोजन का उत्पादन करते थे व उसका उपभोग कर लेते थे। परन्तु मुश्किल तो जटिल समाज में होती है। जहां व्यक्ति अपनी प्राथिमक ज़रूरतों के अलावा और चीजें व जरूरतों को विकसित कर लेते हैं। जोकि जीवन जीने के लिए कोई खास ज़रूरी नहीं हैं जैसे टी० वी०, बढ़िया मकान, कारें, ऐशो-आराम के समान इत्यादि। जटिल समाज में इन चीजों की उपभोग बहुत अधिक होता है क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था बढ़ती है।

प्रत्येक समाज का मुख्य काम होता है कि वह उपभोग को समाज के लिए निर्धारित करे। उपभोग की नियमित कई तरीकों से हो सकती है। जैसे उत्पादन पर नियन्त्रण करके उत्पादन पर नियन्त्रण भी कई ढंगों से हो सकता है, जैसे प्राकृतिक साधनों के भण्डार को बचाकर रखना व ताज़ा उत्पादन में भी उनका कम प्रयोग करना।

इसी प्रकार (Export) या निर्यात भी इसका नियन्त्रण कर सकता है। उपभोग को हम प्रचार करके भी प्रभावित कर सकते हैं जैसे कि यदि किसी नई वस्तु का निर्माण हुआ है तो उसके बारे टी० वी० अखबार इत्यादि में प्रचार करके लोगों को उसके बारे में बता सकते हैं। इस प्रकार किसी वस्तु की खपत इस कारण कम या अधिक हो सकती है। इस के अतिरिक्त सरकार भी कानूनी पाबन्दी लगाकर खपत को प्रभावित कर सकती है। जैसे किसी वस्तु के खतरनाक परिणामों के कारण उस पर प्रतिबन्ध लगाना किसी चीज़ की रिआयत देना जिस कारण खपत कम बढ़ सकती है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रत्येक व्यवस्था एक संस्थागत नियमों की प्रणाली में काम करती है। जैसे जायदाद की परिभाषा व अधिकारियों का विभाजन, श्रम विभाजन व्यवस्था, उत्पादन व उपभोग की व्यवस्थाओं पर नियन्त्रण। इस प्रकार खपत को नियमित करना आर्थिक संस्थाओं का प्रमुख काम है। ..

3. विनिमय (Exchange)-किसी चीज़ के लेन-देन को विनिमय कहते हैं। इसका अर्थ है किसी आर्थिक वस्तु की जगह दूसरी वस्तु को देना। विनिमय आजकल का नहीं बल्कि पुरातन समाज से ही चला आ रहा है। विनिमय कई प्रकार का होता है। जैसे चीज़ के बदले चीज़, सेवा के बदले चीज़, सेवा के बदले सेवा, चीज़ के बदले पैसा, सेवा के बदले पैसा, पैसे के बदले पैसा। विनिमय को जॉनसन दो श्रेणियों में रखते हैं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष।

प्रत्यक्ष विनिमय सबसे पहले वस्तुओं की वस्तुओं से सेवा बदले सेवा का लेन-देन होता है इसमें व्यवस्थित व्यापार भी होता है व उस समय होता है जब चीज़ों की कीमतों को राजनीतिक सत्ता द्वारा निश्चित किया जाता है। पर समय-समय पर बदल दिया जाता है। इसमें पैसे का विनिमय भी होता है या हम कह सकते हैं कि पैसे देकर चीज़ ली जा सकती है। इस विनिमय के कारण लोगों में बदलने की सुविधा पैदा होती है।

अप्रत्यक्ष विनिमय में तोहफे का बदलना सब से आम रूप है जिसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष से किसी खास प्रकार का लाभ लेने के लिए समझौता करता है व बिना किसी चीज़ या सेवा के तोहफे (gift) का लेन-देन होता है इसके अलावा समूह द्वारा उत्पादित चीज़ों के एकत्र करके सदस्यों में दुबारा बांट दिया जाता है।

विनिमय के कारण उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। जब लोगों को अन्य लोगों से किसी चीज़ को प्राप्त करने में कोई कठिनाई होती है तो वह उस चीज़ द्वारा आत्म निर्भर बनने के लिए भिन्न-भिन्न चीजों का निर्माण करते हैं। दूसरी ओर जब बदलाव बहुत अधिक विकसित हो जाता है व प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने स्रोत से अधिक चीजें लेनी आसान हों तो वह व्यक्ति उत्पादन में उस्ताद हो जाता है तथा अपनी फालतू चीज़ों का उन चीज़ों से बदलाव कर लेता है जिनका उत्पादन और लोग कर रहे होते हैं।

4. विभाजन (Distribution)—साधारण व्यक्ति के लिए विभाजन का मतलब चीजों के एक स्थान से दूसरी जगह ले कर जाना तथा उसके बेचने से है। उसके अनुसार हम चीज़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जा कर बेच देते हैं पर अर्थशास्त्र में लाने व लेकर जाने के लिए इसको एक किस्म के उत्पादन के रूप में लिया जाता है क्योंकि यह वस्तुओं की सुविधा देता है क्योंकि इसमें वस्तुओं की मलकीयत है।

विभाजन वह प्रक्रिया है जिससे किसी आर्थिक वस्तु का कुल मूल्य उन व्यक्तियों में बांटा जाता है जिन्होंने उस चीज़ के उत्पादन में हिस्सा डाला होता है। भिन्न-भिन्न लोगों व समूहों का अपना विशेष योगदान होता है जिस कारण उन्हें इनाम या मुनाफा मिलना चाहिए। जिन लोगों के पास भूमि होती है उनको आर्थिक क्रिया प्राप्त होती है। मज़दूर को मज़दूरी या तनख्वाह प्राप्त होती है जो व्यक्ति कारखाने बनाता है, उसमें निवेश करने व उसको चलाने के लिए पैसा देता है उसको उद्यमी कहते हैं। उसको पैसा लगाने का मुआवज़ा ब्याज के रूप में प्राप्त होता है। सरकार का भी उत्पादन में प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा होता है व वह अपना मुआवज़ा कर के रूप में लेती है। इतना ।

सब कुछ देने के बाद जो कुछ बचता है उसको उद्यमी या प्रबन्धक बोर्ड लाभ के रूप में रख लेता है।
छोटा व्यापार चलाना काफ़ी साधारण मामला है। यदि छोटा व्यापारी ही प्राकृतिक साधनों, पूंजी व मज़दूरी का, आय का प्रबन्ध करता है तो कर को छोड़ कर बाकी सारी आय उस की होती है। इस प्रकार के मामले में किराया, तनख्वाह, लाभ व ब्याज वही छोटा व्यापारी ही प्राप्त करता है। इस बात का यहां कोई भी महत्त्व नहीं होता कि वह व्यक्ति अपनी आमदन के किस भाग को लाभ, तनख्वाह या ब्याज के रूप में मानता है।

पर आजकल की आधुनिक जटिल अर्थव्यवस्था में बड़े व्यापारिक आकार में विभाजन बहुत बड़ी समस्या होती है। उत्पादन की प्रक्रिया में कई कारक होते हैं व प्रत्येक कारक के मालिक भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रत्येक मालिक अपने लिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा प्राप्त करने की कोशिश करता है। मजदूर को अधिक तनख्वाह चाहिए होती है। पूंजीपति को अधिक ब्याज चाहिए होता है। उद्यमी उसको कम देना चाहता है क्योंकि इन्हें कम देने से उसका

लाभ बढ़ जाएगा। प्रबन्धकों से मजदूरों में संघर्ष भी लाभ का विभाजन कारण ही होता है। एक का लाभ दूसरे का नुकसान होता है। जब मज़दूरों, प्रबन्धकों व पूंजीपतियों में अधिक लाभ प्राप्त करने की होड़ लग जाती है तो लोग इनके बीच के झगड़े का उपाय ढूंढने में लग जाते हैं ताकि इनका समझौता हो जाए व समाज को अधिक उत्पादन प्राप्त होता रहे। इस प्रकार आर्थिक संस्थाओं के मुख्य कार्य चीज़ों का उत्पादन, उपभोग, विनिमय व विभाजन है।

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प्रश्न 2.
पूंजीवाद के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तार सहित लिखो।
उत्तर-
पूंजीवाद एक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें निजी सम्पत्ति की बहुत महत्ता होती है। पूंजीवाद एक दम से ही किसी स्तर पर नहीं पहुंचा बल्कि उसका धीरे-धीरे विकास हुआ है। इसके विकास को देखने के लिए हमें इसका अध्ययन आदिम समाज में करना होगा।

आदिम समाज में वस्तुओं के लेन-देने की व्यवस्था आदान-प्रदान बदलने की व्यवस्था थी। उस समय लाभ (Profit) का विचार प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आया था। लोग चीज़ों के लाभ के लिए एकत्र नहीं करते थे बल्कि उन दिनों के लिए एकत्र करते थे जब चीज़ों की कमी होती थी या फिर सामाजिक प्रसिद्धि के लिए एकत्र करते थे। व्यापारिक व्यवस्था आमतौर पर सेवा व चीज़ों के देने पर निर्भर करती थी। आर्थिक कारक जैसे कि मजदूरी, निवेश, व्यापारिक लाभ के बारे में आदिम समाज को पता नहीं था।

मध्यमवर्गी समाज में व्यापार व वाणिज्य थोड़े से उन्नत हो गए। चाहे शुरू में व्यापार आदान-प्रदान की व्यवस्था पर आधारित था पर धीरे-धीरे पैसा व्यापार करने का एक माध्यम बन गया। इसी ने व्यापार व वाणिज्य को एक प्रकार का उत्साह दिया जिस कारण पैसे, सोना, चांदी व टैक्स की महत्ता बढ गई। पैसा चाहे सम्पत्ति नहीं था, पर यह सम्पत्ति का सूचक था। इसका उत्पादक शक्तियों के लक्षणों पर पूरा प्रभाव था। सिमल के अनुसार पैसे की ‘संस्था के आधुनिक पश्चिमी समाज में व्यवस्थित होने के कारण ज़िन्दगी के हर भाग पर बहुत गहरे प्रभाव पड़े। इसने मालिक व नौकर को आजादी दी वस्तुओं तथा सेवाओं के बेचने तथा खरीदने वाले पर भी असर पड़ा क्योंकि इससे व्यापार के दोनों ओर से रस्मी रिश्ते पैदा हो गए। सिमल के अनुसार पैसे ने हमारी ज़िन्दगी की फिलासफ़ी में बहुत परिवर्तन ला दिए। इसने हमें Practical बना दिया। क्योंकि अब हम प्रत्येक चीज़ को पैसे में तोलने लग पड़े। समाज सम्पर्क, सम्बन्ध औपचारिक तथा अव्यक्तक हो गए। मानवीय सम्बन्ध भी ठण्डे हो गए।

आधुनिक समय के आरम्भिक दौर में आर्थिक गतिविधियां आमतौर पर सरकारी ताकतों द्वारा संचालित होती थीं। इससे हमें यूरोपीय लोगों के राज्य की सरकार अधीन इकट्ठे होकर आगे बढ़ने का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। इस समय में आर्थिक गतिविधियां राजनैतिक सत्ता द्वारा संचालित हैं। ताकि राज्य का लाभ तथा खज़ाना बढ़ सके। देश व्यापारियों की देख-रेख में चलता था तथा व्यापारी एक आर्थिक संगठन की भान्ति लाभ कमाने में लगे हुए हैं। उत्पादक शक्तियां भी व्यापारिक कानून द्वारा संचालित होती हैं। – इसके पश्चात् औद्योगिक क्रान्ति आई जिसने उत्पादन के तरीकों को बदल दिया। व्यापारिक नीतियां लोगों का भला करने में असफल रहीं जिसका चीज़ों के उत्पादन करने के लिए (Laissez faire) की नीति अपनाई गई। इस नीति के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हित देख सकता था। उस पर कोई बन्धन नहीं था। राज्य ने आर्थिक कार्य में दखल देना बन्द कर दिया। समनर के अनुसार राज्य के व्यापार व वाणिज्य पर लगे सारे प्रतिबन्ध हटा लेने चाहिएं व उत्पादन, आदान-प्रदान व पैसे को इकट्ठा करने पर लगी सभी पाबन्दियां हटा लेनी चाहिएं। एडम स्मिथ ने इस समय चार सिद्धान्तों का वर्णन किया।

  1. व्यक्तिगत हित की नीति।
  2. दखल न देने की नीति।
  3. प्रतियोगिता का सिद्धान्त।
  4. लाभ को देखना।

इन सिद्धान्तों का उस समय पर काफ़ी प्रभाव पड़ा। इन नियमों के प्रभाव अधीन व औद्योगिक क्रान्ति के कारण सम्पत्ति व उत्पादन की मलकीयत की नई व्यवस्था सामने आई जिसको पूंजीवाद का नाम दिया गया। औद्योगिक क्रान्ति के कारण घरेलू उत्पादन कारखानों के उत्पादन में बदल गया। कारखानों में काम छोटे-छोटे भागों में बंटा होता था तथा प्रत्येक मज़दूर थोड़ा या छोटा सा काम करता था। इससे उत्पादन बढ़ गया। समय के साथ-साथ बड़ेबड़े कारखाने लग गए। इन बड़े कारखानों के मालिक निगम वजूद में आ गए। पूंजीवाद के साथ-साथ श्रमविभाजन, विशेषीकरण व लेन-देन भी पहचान में आया। इस उत्पादन व लेन-देन की व्यवस्था में उत्पादन के साधन के मालिक व्यक्तिगत लोग थे और उन पर कोई सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं थी। सम्पत्ति बिल्कुल निजी थी तथा वह राज्य, धर्म, परिवार व अन्य संस्थाओं की पाबन्दियों से स्वतन्त्र थे। फैक्टरियों के मालिक कुछ भी करने को स्वतन्त्र थे। उनका उद्देश्य केवल लाभ था।

उन पर बिना लाभ की चीजों का उत्पादन करने का कोई बन्धन नहीं था। उत्पादन का तरीका लाभ वाला था और सरकार ने दखल न देने की नीति अपनाई तथा इस दिशा में मालिक का साथ दिया।

पूंजीवाद के लक्षण (Features of Capitalism) –

1. बड़े स्तर पर उत्पादन (Large Scale Production)-पूंजीवाद का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है उत्पादन का बढ़ना। उद्योगों के लगने से उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा। पूंजीवाद औद्योगिक क्रान्ति के कारण आया जिस कारण बड़े स्तर पर उत्पादन मुश्किल हुआ। बड़े-बड़े कारखानों व श्रम-विभाजन पर विशेषीकरण के बढ़ने से उत्पादन भी बढ़ गया। अधिक उत्पादन का अर्थ था पूंजी का बड़े स्तर पर उपयोग और बहुत अधिक फ़ायदा।

2. निजी सम्पत्ति (Private Property)—निजी सम्पत्ति आधुनिक समाज व आधुनिक आर्थिक जीवन का आधार है। यह पूंजीवाद का ही आधार है। पूंजीवाद में प्रत्येक व्यक्ति को कमाने का हक तथा सम्पत्ति को रखने का अधिकार है। सम्पत्ति रखने के हक को व्यक्तिगत अधिकार के रूप में देखा जाता है। निजी सम्पत्ति के कारण ही बड़े-बड़े कारखाने, उद्योग, निगम कार्य प्रणाली में आए व पूंजीवाद बढ़ा।

3. प्रतियोगिता (Competition)-पूंजीवादी व्यवस्था में प्रतियोगिता एक ज़रूरी तत्त्व के परिणाम है। पूंजीवाद में भिन्न-भिन्न पूंजीपतियों में बहुत अधिक मुकाबला देखने को मिलता है। मांग को नकली तौर पर बढ़ाकर व पूर्ति को घटा दिया जाता है व पूंजीवाद में कठिन मुकाबला होता है। इस मुकाबले में बड़े पूंजीपति जीत जाते हैं व छोटे पूंजीपति हार जाते हैं।

4. लाभ (Profit)-मार्क्स के अनुसार लाभ के बिना पूंजीवाद नहीं टिक सकता। पूंजीपति बड़े पैमाने पर पूंजी का निवेश करता है ताकि लाभ कमाया जा सके। पूंजीवाद में उत्पादन लाभ के लिए किया जाता है ना कि समाज कल्याण या समाज की ज़रूरतें पूरी करने के लिए।

5. कीमत प्रणाली (Price System)-पूंजीवाद में मुख्य उद्देश्य अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त करना होता है। किसी चीज़ की कीमत उस पर लगी लागत के आधार पर नहीं बल्कि उस चीज़ की मांग के आधार पर निर्धारित होती है। इसी प्रकार मजदूरों की मज़दूरी भी उनकी मांग के अनुसार निश्चित होती है। उस काम की कीमत अधिक होती है जिसकी बाज़ार में मांग अधिक होती है। चीज़ की कीमत उसकी बाज़ार में मांग के आधार पर निर्धारित होती है। इसी प्रकार श्रम की कीमत भी उनकी मांग के अनुसार कारखाने में ही निर्धारित होती है।

6. मुद्रा और उधार (Money and Credit)-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में पैसे व उधार की बहुत महत्ता होती है। पूंजीपति कर्जे लेते हैं व अपने उत्पादन व व्यापार को बढ़ाते हैं। यह उधार साहूकारों, बैंकों आदि से लिए जाते हैं। इस कर्जे से वह उत्पादन बढ़ाते हैं। इस कर्जे का उन्हें ब्याज़ भी देना पड़ता है।

7. मज़दूरी (Wages)-पूंजीवाद में मजदूर की दशा बहुत ही असुविधाजनक होती है। पूंजीपति का मज़दूरों के प्रति एक ही उद्देश्य होता है व वह है कम-से-कम पैसे देकर अधिक-से-अधिक काम लिया जा सके। मज़दूरों का पूंजीवाद में शोषण होता है।

प्रश्न 3.
राज्य का क्या अर्थ होता है ? इसके परिभाषाओं सहित वर्णन करें।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य है पर राज्य का प्रयोग कई रूपों में किया जाता है जिसके कारण एक आम आदमी को राज्य के अर्थ का पूरा ज्ञान नहीं हो सकता। आमतौर पर राज्य, समाज, सरकार और राष्ट्र में अन्तर नहीं किया जाता और इन शब्दों का अर्थ एक ही लिया जाता है। आम नागरिक के लिए राज्य और सरकार में कोई अन्तर नहीं है। इसी तरह राज्य का प्रयोग राष्ट्र के स्थान पर किया जाता है पर राजनीति शास्त्र की दृष्टि से यह ग़लत है। इन शब्दों का अर्थ राजनीति शास्त्र में अलग-अलग है। कई बार एक संघ (Federation) और उसकी इकाइयों के लिए भी राज्य शब्द प्रयोग किया जाता है। जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका को भी राज्य कहा जाता है और उसकी इकाइयों के लिए भी राज्य शब्द प्रयोग किया जाता है। इसी तरह भारत को भी राज्य कहा जाता है और इसकी इकाइयां-पंजाब, बंगाल, तमिलनाडु, केरल, मध्य प्रदेश को भी राज्य ही कहा जाता है पर असलियत यह है कि संघ की इकाइयां राज्य नहीं हैं और उनके लिए राज्य शब्द प्रयोग करना ग़लत है। इसलिए राज्य शब्द का ठीक-ठाक अर्थ जानना ज़रूरी है।

राज्य शब्द की उत्पत्ति (Etymology of the world ‘state’) राज्य शब्द को अंग्रेजी में स्टेट (State) कहा जाता है। स्टेट (State) शब्द लातीनी भाषा के स्टेटस (Status) शब्द से लिया गया है। स्टेटस (Status) शब्द का अर्थ है किसी व्यक्ति का सामाजिक स्तर। प्राचीन काल में राज्य और समाज में कोई अन्तर नहीं समझा जाता था। इसलिए राज्य शब्द का प्रयोग सामाजिक दर्जे को बताने के लिए किया जाता था पर धीरे-धीरे इसका अर्थ बदल गया। और इसका अर्थ सिस्रो (Cicero) के समय तक सारे समाज के दर्जे के साथ हो गया। आधुनिक अर्थ में इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले इटली के प्रसिद्ध राजनीतिक मैकाइवली (Machiaveli) ने किया। उसने ‘राज्य’ शब्द का प्रयोग ‘राष्ट्र राज्य’ के लिए किया। मैकाइवली (Machiaveli) ने अपनी पुस्तक ‘The Prince’ में लिखा है “वह सब शक्तियां’ जिन पर लोगों का अधिकार होता है राज्य (State) होते हैं और वह राज्यतन्त्री या गणतन्त्री होते हैं।” (“All the powers which have had and have authority over man are states (state) and are either monarchies or republic.”) प्रो० बार्कर (Barker) ने लिखा है, “राज्य शब्द जब 16वीं सदी में शुरू हुआ इटली से अपने साथ महान् राज्य या महानता का अर्थ भी लिखवाया जो किसी व्यक्ति या समुदाय में छुपा होता है।”

राज्य एक सम्पूर्ण समाज का हिस्सा है। यद्यपि यह सामाजिक जीवन के सारे पक्षों को प्रभावित करता है पर फिर भी यह समाज का स्थान नहीं ले सकता। राज्य एक ऐसी एजेंसी है जो समाजिक समितियों को नियन्त्रित करती है। राज्य समाज के सारे पक्षों को प्रभावित करता है और उनमें तालमेल बिठाकर रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  • हॉलैंड (Holland) के अनुसार, “राज्य मनुष्यों के उस समूह को कहते हैं जो आमतौर पर किसी निश्चित प्रदेश पर बसा हो, जिसमें बहु-संख्यक दल या किसी निश्चित वर्ग का फैसला उस वर्ग या दल की शक्ति के द्वारा समूह के उन व्यक्तियों से ही स्वीकार करवाया जा सके जो इसका विरोध करते हैं।”
  • बोदिन (Bodin) के अनुसार, “राज्य सम्पत्ति सहित परिवारों का एक संघ है जो किसी उच्च शक्ति और नियमों द्वारा शासित हो।”
  • मैकाइवर (Maciver) के अनुसार, “राज्य एक ऐसी समिति है जो कानून द्वारा शासन व्यवस्था को चलाती है और जिसको एक निश्चित भू-भाग में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का सर्वोच्च अधिकार प्राप्त होता है।”
  • वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson) के अनुसार, “लोगों के किसी भूमि भागों में कानून के लिए संगठित होने को ही राज्य कहा जाता है।”
  • ऐंडरसन और पार्कर (Anderson and Parkar) के अनुसार, “राज्य समाज में वह समिति है जो निश्चित भू-भाग में सत्ता का प्रयोग कर सकती है।”

इस तरह इन परिभाषाओं के अध्ययन से हम यह कह सकते हैं कि राज्य एक ऐसे लोगों का समूह है जो कि निश्चित भू-भाग में होता है, अर्थात् उसका अपना भौगोलिक क्षेत्र होता है, जिसकी एक सरकार होती है, जिसकी मदद के साथ राज्य अपने काम करता है, अपने हुक्म मनवाता है और जनसंख्या पर नियन्त्रण रखता है और जिसकी अपनी प्रभुसत्ता होती है। प्रभुसत्ता से मतलब है कि वह किसी बाहरी दबाव से मुक्त होता है। उस पर किसी किस्म का दबाव नहीं होता। राज्य अपनी सीमाओं की बाहरी हमले से रक्षा करता है और यदि उसके अन्दर ही बगावत होती है तो वह उसको दबाने के लिए भौतिक शक्ति, जो उसके पास होती है सरकार तथा पुलिस के रूप में, का भी प्रयोग करता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 8 राजनीति, धर्म, अर्थ प्रणाली तथा शिक्षा

प्रश्न 4.
राज्य के अलग-अलग तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर-
डॉ० गार्नर के अनुसार राज्य के चार तत्त्व हैं-
(1) मनुष्यों का एक समुदाय।
(2) एक प्रदेश जिसमें वह स्थाई रूप से रहते हों।
(3) अन्दरुनी और बाहर की प्रभुसत्ता।
(4) राजनीतिक संगठन। गैटेल ने भी राज्य के चार तत्त्व बताएं हैं। वह चार तत्त्व निम्नलिखित हैं-

  1. जनसंख्या (Population)
  2. निश्चित भूमि (Fixed territory)
  3. सरकार (Government)
  4. प्रभु-शक्ति (Sovereignty)

1. जनसंख्या (Population)-राज्य का मुख्य तत्त्व जनसंख्या है। राज्य पशु-पक्षियों का समूह नहीं है। वह मनुष्यों की एक राजनीतिक संस्था है। बिना जनसंख्या के राज्य की स्थापना की तो दूर की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिस तरह बिना पति-पत्नी के परिवार, मिट्टी के बिना घड़ा और सूत के बिना कपड़ा नहीं बन सकता, उसी तरह बिना आदमियों के समूह के राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राज्य में कितनी जनसंख्या होनी चाहिए, इसके लिए कोई निश्चित नियम नहीं है पर राज्य के लिए काफ़ी जनसंख्या होनी चाहिए। दस-बीस आदमी राज्य नहीं बना सकते। गार्नर (Garner) के शब्दों में, “राज्य की हस्ती के लिए जनता रूपी भौतिक तत्त्व की बहुत ज़रूरत है। जनता की कमी में राज्य की कल्पना सम्भव नहीं।”

वर्तमान राज्यों की जनसंख्या को देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि राज्य की जनसंख्या निश्चित करनी मुश्किल नहीं बल्कि असम्भव भी है पर फिर भी हम अरस्तु (Aristotle) के इस विचार से सहमत हैं कि राज्य की जनसंख्या इतनी होनी चाहिए कि राज्य आत्म-निर्भर हो सके और देश का शासन भी अच्छी तरह से चलाया जा सके। असल में राज्य की जनसंख्या इतनी होनी चाहिए कि वहां की जनता सुखी और खुशहाल जीवन बिता सके। उस पर अच्छे ढंग के शासन की स्थापना की जा सके और इसमें एक स्थाई सरकार कायम हो सके।

2. निश्चित भूमि (Fixed territory)-जिस तरह राज्य के लिए जनसंख्या का होना ज़रूरी है उसी तरह निश्चित भूमि का होना भी ज़रूरी है पर कई प्रकार के लेखकों ने इसको राज्य का आवश्यक तत्त्व नहीं माना। जैलीनेक (Jellinek) ने लिखा है, “19वीं सदी से पहले किसी भी लेखक ने राज्य की परिभाषा में भूमि या प्रदेश का ज़िक्र नहीं किया है और क्लूबर पहला लेखक था जिसने 1817 में राज्य के लिए निश्चित भूमि का होना ज़रूरी माना।”

लेखकों के विचार के अनुसार निश्चित भूमि के बिना राज्य नहीं बन सकता। यदि जनता राज्य की आत्मा है तो भूमि उसका शरीर है।
आदमियों का समूह जब तक किसी निश्चित भू-भाग पर नहीं बस जाता उस वक्त तक राज्य की स्थापना नहीं हो सकती।

खाना-बदोश कबीले (Nomadic tribes), जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं, राज्य की स्थापना नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास निश्चित भू-भाग नहीं होता। सन् 1948 से पहले यहूदी सारे संसार में फैले होते हैं पर उनका अपना कोई राज्य नहीं था क्योंकि वह निश्चित भू-भाग पर नहीं रह रहे थे। जब उन्होंने इज़राइल के निश्चित भू-भाग पर रहना शुरू कर दिया तो इज़राइल राज्य बन गया। असल में राज्य का यह तत्त्व राज्य को दूसरे समुदायों से अलग करता है।

3. सरकार (Government)-जनसंख्या तथा भूमि के बाद राज्य की स्थापना के लिए सरकार की ज़रूरत होती है। किसी निश्चित इलाके पर बना आदमियों का समुदाय उस वक्त तक राज्य नहीं कहा जा सकता, जब तक वह राजसी दृष्टि से संगठित न हो। सरकार ही एक ऐसा संगठन है। संस्था (Agency) है जिसकी मदद से राज्य की इच्छा प्रकट होती है और अमल में लाई जाती है। सरकार के बिना जन-समूह संगठित नहीं हो सकता। सरकार द्वारा ही लोगों के आपसी सम्बन्धों को नियमित बनाया जाता है। शान्ति और व्यवस्था को लागू किया जाता है। और बाहर के हमलों से लोगों की रक्षा की जाती है और दूसरे देशों के साथ मित्रता पूर्ण सम्बन्ध स्थापित करती है। सरकार के बिना जनता में आशान्ति रहेगी। इसलिए राज्य एक अमूर्त संस्था है और सरकार उस अमूर्त संस्था का मूर्त रूप सरकार के माध्यम से हम राज्य के साथ सम्बन्ध कायम कर सकते हैं या राज्य तक पहुँच सकते हैं।

राज्य में सरकार किसी भी किस्म की हो सकती है। भारत, इंग्लैण्ड, स्विट्ज़रलैंड, कैनेडा, फ्रांस, जर्मनी, न्यूजीलैंड आदि देशों में लोकराज्य (Democracy) है जबकि चीन, उत्तरी कोरिया, वियतनाम, क्यूबा आदि देशों में कम्यूनिस्ट पार्टी की तानाशाही (Dictatorship) है। कुवैत, सऊदी अरब आदि में राज्य तन्त्र (Monarchy) है। कई देशों में संसदीय सरकार (Parliamentary Government) है और कई देशों में अध्यक्षात्मक सरकार (Presidential Government) है । जापान, इंग्लैण्ड, भारत आदि देशों में संसदीय सरकार है जबकि अमेरिका में अध्यात्मक सरकार हैं। कुछ देशों में संघात्मक सरकार है जबकि कुछ देशों में एकात्मक सरकार (Unitary Government) हैं। अमरीका, स्विट्ज़रलैण्ड और भारत में संघात्मक सरकार हैं जबकि जापान इंग्लैण्ड में सरकार एकात्मक है। किसी राज्य में किस किस्म की सरकार हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि सरकारें तो बदल सकती हैं और बदलती रहती हैं। जिस तरह भू-भाग और जनसंख्या के कम या ज्यादा होने के कारण राज्य पर अन्तर नहीं उसी तरह सरकार के स्वरूप में परिवर्तन आने के साथ ही राज्य के स्तर पर असर नहीं पड़ता क्योंकि सरकार का काम तो कानून बनाना, उनका पालन करवाने, लोगों की रखवाली का प्रबन्ध आदि करना है।

4. प्रभुसत्ता (Sovereignty)-प्रभुसत्ता राज्य के लिए चौथा ज़रूरी तत्त्व हैं। जनता के समूह के लिए एक निश्चित भू-भाग रहने और सरकार का होना ही राज्य के लिए जरूरी नहीं। प्रभुसत्ता के बिना राज्य की स्थापना नहीं हो सकती। प्रभु शक्ति को अंगेज़ी में (Sovereignt) कहते हैं जो कि लातीनी भाषा के शब्द ‘सुपरेन्स’ (Superanus) से निकला है जिसका अर्थ है ‘सर्वोच्च’ Supreme । इस तरह प्रभुसत्ता (Sovereignt) का अर्थ हुआ राज्य की सर्वोच्च शक्ति राज्य के पास अधिकार होते हैं, कोई भी उसके विरुद्ध आवाज़ नहीं उठा सकता। प्रभुसत्ता के कारण ही राज्य का अपने सारे नागरिकों और उनकी संस्थाओं पर उसका पूरा नियन्त्रण होता हैं और भू-भाग से बाहर की किसी भी शक्ति के अधीन नहीं रहता।

इस तरह राज्य की स्थापना के लिए चार तत्त्वों की जरूरत है और चारों तत्त्वों में से कोई एक तत्त्व न हो तो राज्य की स्थापना नहीं हो सकती। इन चारों तत्त्वों के बिना प्रो० विलोबी (Willoughby) के अनुसार, “राज्य के लिए यह और ज़रूरी तत्त्व प्रजा द्वारा आज्ञा पालना की भावना है, पर हमारे विचार के अनुसार जब राज्य में चार तत्त्व हों तो प्रजा में आज्ञा पालन की भावना ज़रूर होती है और किसी राज्य के लोगों में आज्ञा पालन की भावना नहीं हैं तो वह राज्य जल्दी नष्ट हो जाता है।”

प्रश्न 5.
राज्य की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-
1. स्थिरता (Permanence)—इसका अर्थ यह है कि राज्य एक स्थाई संगठन है। इसका अर्थ गार्नर (Garner) के शब्दों में यह है, “जो लोग एक बार राज्य के तौर पर संगठित हो जाते हैं, हमेशा किसी न किसी राज्य संगठित के अधीन होते हैं।” यदि किसी कारण एक राज्य में दूसरे राज्य का हिस्सा शामिल हो जाए तो या कट जाए तो इसके कारण राज्य की कानूनी हस्ती पर कोई असर नहीं पड़ता। युद्ध पर किसी सन्धि के कारण कई बार कई राज्य खत्म हो जाते हैं या किसी और राज्य में शामिल कर लिए जाते हैं पर ऐसा होने पर प्रभुसत्ता का परिवर्तन होता है अर्थात् प्रभुसत्ता एक राज्य से दूसरे राज्य के पास चली जाती है पर जनता राज्य में ही रहती है, चाहे वह दूसरा राज्य ही हो।

2. निरन्तरता (Continuity) राज्य का सिलसिला निरन्तर बना रहता है। राज्य की सरकार के रूप में परिवर्तन आने पर राज्य पर कोई असर नहीं पड़ता। एक राज्य की सरकार राजतन्त्र से बदलकर गणतंत्र बन जाए और निरंकुश शासन से लोक-राज्य बन जाए तो इन परिवर्तनों के कारण राज्य की एकरूपता या उसकी अन्तर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी पर कोई असर नहीं पड़ता। यह सिद्धान्त राज्य की निरंतरता का सिद्धान्त है और इसी सिद्धान्त के कारण राज्य की विरासत के सिद्धान्त का जन्म हुआ है।

3. सर्वव्यापकता (All Comprehensiveness)-सर्व-व्यापकता का अर्थ यह हैं कि राज्य की प्रभुसत्ता अपने भू-भाग पर रहने वाले व्यक्ति, संस्था और चीज़ पर लागू होती है। कोई भी व्यक्ति, समुदाय या संस्था राज्य के नियन्त्रण से नहीं बच सकती। यह बात अलग है कि अन्तर्राष्ट्रीय शिष्टाचार के नाते या अन्तर्राष्ट्रीय कानून के सर्वमान्य सिद्धान्तों का आदर करते हुए राज्य अपने आदेशों को कुछ व्यक्तियों पर लागू न कर सके। यह लक्षण असल में अंदरूनी प्रभु-शक्ति में छुपा हुआ है।

4. राज्य समाज की सबसे शक्तिशाली संस्था है (It is an powerful institution of society)-राज्य समाज की सबसे शक्तिशाली संस्था है क्योंकि इसके पास अपनी आज्ञा मनवाने के साधन होते हैं चाहे यह साधन रस्मी होते हैं जैसे-पुलिस, कानून, सरकार आदि, पर इनकी मदद से राज्य समाज की सारी और संस्थाओं पर नियन्त्रण रखता है और सभी को आज्ञा देकर सूत्र में बांधकर रखता है।

5. राज्य के पास वास्तविक शक्तियां और प्रभुसत्ता (State has original powers and Sovereignty)यह राज्य ही है जिस के पास वास्तविक शक्तियां होती हैं चाहे यह शक्तियां आगे बंटी होती हैं, पर यह होती राज्य की हैं। असल में राज्य की सारी शक्तियां सरकार इस्तेमाल करती है पर करती राज्य के नाम पर है। सरकार ऐसा कुछ नहीं कर सकती जो राज्य के विरुद्ध जाए। राज्य के पास अपनी प्रभुसत्ता होती है। सरकार भी आज़ाद होती है पर असल में राज्य अपने आप में स्वतन्त्र होता है और यह किसी के अधीन रह कर काम नहीं करता।

6. राज्य सार्वजनिक हितों की रक्षा करता है (State takes care of Public Interest)-राज्य का एक प्रमुख लक्षण है उसकी जनसंख्या। यह राज्य के लिए ज़रूरी है कि उसकी जनसंख्या हो और वह जनसंख्या सुखी हो। यदि जनसंख्या सुखी नहीं है तो उस राज्य का होना न होना एक बराबर है इसके लिए यह ज़रूरी है कि राज्य लोगों के भले के लिए काम करे और राज्य करता भी है। राज्य किसी खास व्यक्ति या समूह के हितों की रक्षा भी करता है और उनका भला करने की कोशिश करता है ।

7. राज्य अपने आप में एक उद्देश्य है (State is an end itself)-राज्य अपने आप में एक उद्देश्य है और सरकार उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। राज्य की सत्ता और शक्ति सब से ऊंची है और कोई भी राज्य से ऊंचा नहीं है। सरकारें आती रहती हैं, और बदलती रहती हैं पर राज्य अपने स्थान पर खड़ा रहता है।

8. राज्य अमूर्त होता है (State is abstract)-राज्य एक अमूर्त शब्द है। हम राज्य को देख या स्पर्श नहीं सकते पर हम राज्य को और राज्य की शक्ति को महसूस कर सकते हैं। हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते कि यह किस तरह का होगा । उदाहरण के तौर पर भारत माता की हम कल्पना कर सकते हैं पर हमने इसको देखा. नहीं है। हम इसको स्पर्श नहीं सकते। इसी तरह ही राज्य भी अमूर्त होता है।

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प्रश्न 6.
राज्य के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
आधुनिक राज्य का उद्देश्य व्यक्ति का कल्याण करना है। राज्य व्यक्ति के विकास के लिए काम करता है। प्रो० गैटेल और विलोबी ने राज्य के कार्यों को दो हिस्सों में बांटा है-आवश्यक कार्य और इच्छुक कार्य।

आवश्यक कार्य (Compulsory Functions)-

1. बाहरी हमलों से सुरक्षा (Protection from External Aggression)-राज्य अपने नागरिकों की बाहरी हमलों से रक्षा करता है, जो बाहरी हमलों से रक्षा नहीं कर सकता, वह राज्य खत्म हो जाता है। यदि नागरिकों का जीवन बाहरी हमलों से सुरक्षित नहीं है तो नागरिक अपने जीवन का विकास करने के लिए प्रयत्न नहीं करेंगे। राज्य अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सेना का प्रबन्ध करता है। अन्दरूनी शान्ति की स्थापना के लिए भी सेना की सहायता ली जा सकती है।

2. कर लगाना (Taxation)-मुद्रा निश्चित करना, कर लगाना और इकट्ठा करना राज्य का ज़रूरी काम है। बिना कर लगाए राज्य का काम नहीं चल सकता। जिस राज्य की आमदन कम होगी वह नागरिकों की सहूलियत के लिए उतने ही कम काम करेगा। एक अच्छे राज्य की आय काफ़ी होनी चाहिए पर कर वही लगाने चाहिएं जो उचित हों।

3. जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा करना (Protection of Life and Property) लोगों के जीवन और सम्पत्ति की रक्षा करना राज्य का ज़रूरी काम है। राज्य को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसके साथ किसी भी व्यक्ति को अपनी जान का ख़तरा न हो। राज्य को सम्पत्ति के बारे में भी निश्चित कानून बनाने चाहिए। जीवन और सम्पत्ति की रक्षा के लिए राज्य पुलिस का प्रबन्ध करता है जो चोरों, और अपराधियों से व्यक्तियों की रक्षा करती है।

4. नागरिक अधिकारों की रक्षा (Protection of Civil Rights – प्रत्येक राज्य के नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार मिले होते हैं जैसे-जीने का अधिकार, रोटरी कमाने का अधिकार, सम्पत्ति रखने का अधिकार, शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार । इस तरह के अधिकारों की वकालत ता कांयुक्त राष्ट्र (United Nation) भी करता है। यदि व्यक्ति के पास यह अधिकार न हों तो उसका जीवन नर्क बन जाए। इस तरह यह राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के इन अधिकारों की रक्षा करे और इसके लिए उचित कानुन बनाए। जो इन अधिकारों को किसी से छीनने की कोशिश करे तो उसको सज़ा दिलवाना भी सरकार का ही काम होता है।

5. कानन और व्यवस्था की स्थापना करना (Maintenance of law and order)-देश में कानून और व्यवस्था की स्थापना करना राज्य का महत्त्वपूर्ण काम है। अपराधों को रोकना, अपराधियों को दण्ड देना, जीवन और सम्पत्ति की रक्षा करने के लिए राज्य कानूनों का निर्माण करता है और कानूनों को लागू करता है। पुलिस की व्यवस्था की जाती है ताकि काना तोड़ने वालों को पकड़ा जा सके और उनको सज़ा दी जा सके।

6. न्याय का प्रबन्ध (Administration Judiciary)-जिस राज्य में न्याय की व्यवस्था सर्वोत्तम होती है उसी राज्य को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उत्तम न्याय व्यवस्था का अर्थ है कि गरीब-अमीर, निर्बल-शक्तिशाली, अनपढ़ और पढ़े-लिखे में किसी तरह के अन्तर का होना अर्थात् कानून के सामने सभी व्यक्ति समान होने चाहिएं। हर एक राज्य न्यायपालिका की स्थापना करता है। न्यायपालिका का स्वतन्त्र होना अति ज़रूरी है। स्वतन्त्र न्यायपालिका ही निष्पक्ष फ़ैसला दे सकती है। इस स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना करना राज्य का आवश्यक तत्त्व है।

7. परिवारों के सम्बन्धों को स्थिर रखना (Maintenance of family relations)-परिवार पूरे समाज का केन्द्र बिन्दु है। इसके कारण यह सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था है। इसलिए राज्य का कर्तव्य है कि यह पिता और पुत्र, पति-पत्नि, भाई-बहन और बाकी परिवार के आपसी सम्बन्धों की और उनके पारिवारिक अधिकारों और कर्त्तव्यों की व्याख्या करके उनके सम्बन्ध में कानून बनाए।

ऐच्छिक कार्य (Optional Functions)-

1. कृषि की उन्नति (Development of Agriculture)—वर्तमान राज्य कृषि की उन्नति के लिए काम करता है। जिस देश में अन्न की समस्या रहती है उस राज्य को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे कई बार उनको विदेशी राज्यों की अनुचित मांगों को भी मानना पड़ता है। सरकार किसानों को अच्छे बीज, ट्रैक्टर, खाद और कर्जा देने की सहूलियत प्रदान करती है। सिंचाई के साधनों का उचित प्रबन्ध करना राज्य का काम है।

2. मनोरंजन के साधनों का प्रबन्ध करना (To provide Recreational Facilities)-वर्तमान राज्य नागरिकों के मनोरंजन का प्रबन्ध करता है। इसके लिए राज्य सिनेमा, नाटक घरों, कला केन्द्रों, तालाबों, पार्कों, होटलों आदि की स्थापना करता है। राज्य अच्छे कलाकारों और साहित्यकारों को पुरस्कार भी देता है।

3. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education)-वर्तमान राज्य का महत्त्वपूर्ण काम शिक्षा का प्रसार करना है। प्राचीन काल में शिक्षा का प्रसार धार्मिक संस्थाएं करती थीं। परन्तु कोई भी राज्य शिक्षा को धर्म प्रचारकों की इच्छा पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो सकता। शिक्षा से मनुष्य को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान होता है। शिक्षा के बिना नागरिक आदर्श नागरिक नहीं बना सकता और न ही अपनी शख्सीयत का विकास कर सकता है। लोकतान्त्रिक राज्यों में शिक्षा का महत्त्व और भी ज्यादा है क्योंकि प्रजातन्त्र सरकार की सफलता नागरिकों पर निर्भर करती है। हर एक राज्य शिक्षा के प्रसार के लिए स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की स्थापना करता है। ग़रीब विद्यार्थियों को वज़ीफे दिए जाते हैं और शिक्षा के लिए सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।

4. समाजिक और नैतिक सुधार (Social and Moral Reforms)-वर्तमान राज्य अपने नागरिकों के समाजिक और नैतिक स्तर को ऊँचा करने के लिए काम करता है। भारत में सती प्रथा, बाल-विवाह प्रथा, छुआछूत आदि अनेक बीमारियां थीं, जिनको कानूनों द्वारा स्थापित किया गया है। अफ़ीम खाना और शराब पीने को अच्छा नहीं समझा जाता था। क्योंकि इससे सेहत खराब हो जाती है। इसलिए कई राज्यों में शराब पीने और अफ़ीम खाने की मनाही है। परन्तु अब इसका प्रयोग कम हो गया है क्योंकि राज्य ने अनेक पाबन्दियां लगाई हैं।

5. संचार के साधनों की उन्नति (Development of the means of communication)–नागरिक खुद संचार साधनों का विकास नहीं कर सकता। संचार के साधनों का विकास राज्य द्वारा ही किया जाता है। राज्य रेलवे, सड़कों, तार-घर, डाक-घर रेडियो आदि की स्थापना करता है। __6. सार्वजनिक उपयोगी काम (Public Utility Works)-वर्तमान राज्य सार्वजनिक उपयोगी काम भी करता है। राज्य नई सड़कों का निर्माण करता है और पुरानी सड़कों की मुरम्मत करता है। बिजली का प्रबन्ध भी इसके द्वारा ही किया जाता है। हवाई जहाज़ और समुद्री जहाज़ का प्रबन्ध आमतौर पर राज्य ही किया करता है। टैलीफोन की व्यवस्था राज्य द्वारा ही की जाती है।

प्रश्न 7.
पंचायत के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
पंचायत भारत में स्थानीय स्वैःशासन की पुरातन संस्था है, जो देश में बहुत सारी सामाजिक और राजनीतिक क्रांतियों और परिवर्तनों के होते हुए भी स्थिर रही है। चालर्स मेटकॉफ (Charles Metcalf) के शब्दों में, ‘ग्रामीण भाईचारे छोटे गणतंत्र होते हैं जो अपनी सीमाओं में रहते हुए अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहे कर सकते हैं बाह्य हस्तक्षेप से स्वतन्त्र होते हैं। वह निरन्तर स्थिर चलते आ रहे हैं। खानदान के बाद खानदान की समाप्ति हुई ; क्रान्तियों के बाद क्रान्तियां आईं, पर ग्रामीण समुदायों (Village Communities) ने अलग राज्य के रूप में देश की बहुत सहायता की है।”

पंचायत की रचना (Composition of Panchayat)- पंचायत के सदस्यों की संख्या और चुनाव (Number and Election of Members of Panchayat)—पंचायत के सदस्यों को पंच और इसके प्रधान को सरपंच कहा जाता है। प्रत्येक राज्य में पंचायत के सदस्यों का चुनाव ग्राम सभा के बालिग सदस्यों अर्थात् 18 साल के प्रत्येक पुरुष और स्त्री जिनका नाम राज्य विधान सभा के चुनाव के लिए बनाई गई वोटर सूची में दर्ज है, वह ग्राम पंचायत के सदस्यों के चुनाव के समय वोट देने के हकदार होते हैं। इस तरह पंचायत के सदस्यों का चुनाव सीधे तौर पर किया जाता है। पंचायत के सदस्यों की संख्या ग्राम सभा की आबादी पर निर्भर करती है। भिन्नभिन्न राज्यों में ग्राम पंचायत के सदस्यों की संख्या भिन्न-भिन्न है।

सीटों का आरक्षण (Reservation of Seats)-73वें संवैधानिक संशोधन कानून, 1992 के अन्तर्गत सभी राज्यों ने अपने राज्य एक्टों द्वारा, पंचायत राज्य की सभी संस्थाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित कबीलों, पिछड़ी श्रेणियों और स्त्रियों के लिए कुछ सीटें आरक्षित रखने के लिए व्यवस्था की है।

पंचायत के सदस्यों के लिए योग्यताएं (Qualifications for the members of a Panchayat)(1) वह भारत का नागरिक हो, उसको विधान सभा का सदस्य चुने जाने के लिए आवश्यक सभी योग्यताएं प्राप्त हों। (2) वह उस पंचायत क्षेत्र का प्रवासी हो। (3) उसकी आयु 25 साल से कम न हो। (4) वह स्थानिक सरकार या राज्य सरकार या केन्द्र सरकार का कर्मचारी न हो। (5) उसके दिवालिया होने का ऐलान किसी अदालत द्वारा न किया गया हो। (6) वह किसी अपराध में सज़ा न झेल चुका हो, या जिसकी सज़ा को खत्म हुए साल का समय बीत चुका हो।

सरपंच या चेयरपर्सन (Sarpanch or Chairperson)-ग्राम पंचायत के मुखी को सरपंच या चेयरपर्सन कहा जाता है। भिन्न-भिन्न राज्यों मे इसको भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। सरपंच की चुनाव प्रणाली भी एक जैसी नहीं है। ज्यादातर राज्यों में इसका चुनाव सीधे तौर पर किया जाता है। अर्थात् ग्राम सभा के सदस्य जिनको वोट देने का अधिकार प्राप्त है और जो ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करते हैं, वह वोटर ही ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव भी करते हैं। यह प्रणाली बिहार, गुजरात, गोवा, मध्य प्रदेश, आसाम, मणिपुर, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में प्रचलित है। कुछ राज्यों में सरपंच का चुनाव अप्रत्यक्ष तौर पर किया जाता है अर्थात् ग्राम पंचायत के सदस्य अपने में से ही एक व्यक्ति को सरपंच चुन लेते हैं। ऐसी प्रणाली कर्नाटक, केरल, उड़ीसा और अरुणाचल प्रदेश में प्रचलित है। हर एक जिले की पंचायतों में सरपंचों के लिए कुछ सीटें अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित कबीलों के व्यक्तियों के लिए, जिले में इन जातियों तथा कबीलों की आबादी के अनुपात के अनुसार आरक्षित रखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त हर एक ज़िले की पंचायतों के सरपंचों की सीटों में से एक-तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित रखी जाती हैं। कुछ राज्यों में सरपंचों की कुछ सीटें पिछड़ी श्रेणियों के लिए भी आरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है।

ग्राम पंचायत के कार्य (Functions of Gram Panchayat) ग्राम पंचायत के कई कार्य होते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया है

(i) सार्वजनिक कार्य (Public Functions)—पंचायत के सार्वजनिक कार्य इस प्रकार हैं-

  • अपने क्षेत्र की सड़कों की देखभाल करना, उनकी मुरम्मत करना।
  • गांव की सफ़ाई करना।
  • कुएँ, नल, तालाबों आदि की व्यवस्था करना।
  • गलियों एवं बाजारों में रोशनी का प्रबन्ध करना।
  • शमशानों और कब्रिस्तानों की निगरानी करना।
  • जन्म और मृत्यु का हिसाब रखना।
  • प्राइमरी शिक्षा के लिए यत्न करना।
  • ग्राम सभा से सम्बन्धित किसी भी इमारत की सुरक्षा करना।
  • पशुओं की मण्डी लगवाना और पशुओं की नस्ल में सुधार करना।
  • मेले और त्यौहारों के अतिरिक्त सामाजिक त्यौहारों को मनाना।
  • नए मकान का निर्माण और बनी हुई इमारतों में परिवर्तन या विस्तार करने और कंट्रोल करना।
  • खेती, व्यापार और ग्राम उद्योग के विकास में सहायता देना।
  • सार्वजनिक इमारतों की स्थापना और उनकी देखभाल और मुरम्मत करवाना।
  • स्त्रियों और बच्चों के कल्याण केन्द्रों की स्थापना करना।
  • जानवरों के अस्पतालों की स्थापना करना।
  • खाद इकट्ठा करने के लिए स्थान निश्चित करना।
  • आग बुझाने में सहायता करना और आग लग जाने एवं जीवन और सम्पत्ति की रक्षा करने का प्रयत्न करना।
  • लाइब्रेरियों, रीडिंग रूमों (Reading Rooms) और खेल के मैदानों की व्यवस्था करना।
  • सड़कों के किनारे वृक्ष लगवाना।
  • ज़रूरत के अनुसार पुल की स्थापना करना।
  • गरीबों को सहायता (Relief) देना।

(ii) प्रशासनिक कार्य (Administrative Functions)-प्रशासनिक क्षेत्र में ग्राम पंचायत का कर्तव्य है कि वह-

  • अपने क्षेत्र में अपराधों की रोकथाम और अपराधियों की खोज में पुलिस की सहायता करे।
  • यदि देहाती क्षेत्र में कार्य करने वाले किसी सरकारी कर्मचारी, सिपाही. पटवारी, वन-विभाग के व्यक्ति. चौकीदार, चपड़ासी इत्यादि के विरुद्ध कोई शिकायत हो तो डिप्टी कमिश्नर या किसी और अधिकारी को सूचित करें। पंचायत की रिपोर्ट के अनुसार डिप्टी कमिश्नर या किसी और अधिकारी द्वारा कार्यवाही की गई हो, उसकी सूचना लिखित रूप में ग्राम पंचायत को भेजे।
  • गांवों में शराब के ठेकों और शराब बेचने का विरोध करें।
  • असम, बिहार, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा में ग्राम पंचायतों को चौकीदारों (Watch and Wards) का प्रबन्ध करने की शक्ति भी प्रदान की गई है।

(iii) विकासवादी कार्य (Developmental Functions)-क्योंकि देहाती क्षेत्र के विकास की ज़िम्मेदारी पंचायतों पर है, इसलिए इसको कुछ विकासवादी कार्य भी दिए गए हैं। यह विकासवादी योजनाओं को लागू करती है और पंचवर्षीय योजनाओं को लागू करने में सहयोग देती है। यह खेतीबाड़ी और उद्योग के विकास के लिए यत्न करती है।

(iv) न्यायिक कार्य (Judicial Functions)-पंचायतों को दीवानी और फ़ौजदारी मुकद्दमे सुनने का अधिकार दिया गया है। फ़ौजदारी मुकद्दमे में गाली-गलौच, 50 रुपये तक की चोरी, मार-पिटाई और स्त्री और सरकारी कर्मचारी का अपमान, पशुओं को बेरहमी के साथ पीटना, इमारतों, तालाबों और सड़कों को नुकसान पहुँचाना आदि शामिल है। इसके अलावा कुछ राज्यों में कुछ पंचायतों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। वह हमले, राज्य कर्मचारी का अपमान, दूसरों के माल पर कब्जा करने आदि के विषयों के सम्बन्ध में मुकद्दमा सुन सकती है। इन मुकदमों में साधारण अधिकारों वाली पंचायतों को 100 रुपये और विशेष अधिकारों वाली पंचायतों को 200 रुपये तक जुर्माना करने का अधिकार प्राप्त है। कुछ राज्यों में विशेष अधिकारों वाली पंचायतों को साधारण कैद की सज़ा देने की शक्ति भी प्रदान की गई है। पंचायतें किसी अपराधी को सज़ा भी दे सकती हैं और चेतावनी देकर ज़मानत लेकर छोड़ भी सकती है। दीवानी साधारण पंचायतें 200 रुपये की रकम तक और विशेष अधिकारों वाली पंचायतें 500 रुपये की रकम तक मुकद्दमा सुन सकती हैं, पर वह निम्नलिखित मुकद्दमें नहीं सुन सकती-

  1. साझेदारी के मुकद्दमे।
  2. वसीयत सम्बन्धी मुकद्दमे।
  3. नाबालिग और बालिग व्यक्ति के विरुद्ध मुकद्दमा।
  4. राज्य और केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के विरुद्ध मुकद्दमा।
  5. दीवालिये के विरुद्ध मुकद्दमा।।
  6. अदालत के विचार अधीन मुकद्दमे इत्यादि।

आय के साधन (Sources of Income)—पंचायतों की आय के साधन निम्नलिखित हैं-
1. टैक्स-पंचायत की आय का पहला साधन टैक्स हैं। पंचायत राज्य सरकार द्वारा प्रदान किए गए टैक्स लगा सकती है, जैसे सम्पत्ति टैक्स, पशु टैक्स, कार्य टैक्स, टोकन टैक्स, मार्ग टैक्स, चुंगी टैक्स इत्यादि।

2. फीस और जुर्माना टैक्स-पंचायत की आय का दूसरा साधन इसके द्वारा किए गये जुर्माने और अन्य प्रकार की फीसें (Fees) हैं, जैसे पंचायत आराम गृह के प्रयोग के लिए फीस, गलियों और बाजारों में रोशनी करने का टैक्स, पानी टैक्स आदि। इनका प्रयोग सिर्फ उन पंचायतों द्वारा ही किया जाता है जो यह सुविधाएं प्रदान करती हैं।

3. सरकारी ग्रांट (Government Grants)—पंचायत की आय का मुख्य साधन सरकारी ग्रांटें (Grants) हैं। सरकार पंचायतों की विकास सम्बन्धी योजनाओं को लागू करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की ग्रांटें प्रदान करती है। आमतौर पर हर राज्य के क्षेत्र में इकट्ठा होने वाले ज़मीन के मालिए का कुछ भाग पंचायतों को दिया जाता है जैसे पंजाब में 15%, उत्तर प्रदेश में 1212% आदि। बिहार, महाराष्ट्र और गुजरात में पंचायतें ही सरकार के आधार पर भूमि का टैक्स (Land Revenues) को इकट्ठा करती हैं।

4. मिले-जुले साधन-पंचायतों की आय के अन्य साधन हैं जैसे पंचायत की सीमा में कूड़ा-कर्कट, गोबर, गन्दगी आदि को बेचने से प्राप्त आमदनी, शामलाट से आमदनी, मेलों से आमदनी, पंचायत की सम्पत्ति से आमदनी आदि। आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा और पंजाब में पंचायत को मछली पालन एवं उनको बेचने से विशेष आमदनी होती है।

5. कर्जे (Borrowing)-उपरोक्त साधनों के अलावा राज्य सरकार की मंजूरी के साथ पंचायत कर्जे भी ले सकती है।

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प्रश्न 8.
पंचायत समिति के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
पंचायत समिति तीन-स्तरीय पंचायती राज की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था है। यह पंचायती राज तीन स्तरीय प्रणाली का मध्यस्तर (Intermediate tier) है। इसकी स्थापना ब्लॉक (Block) स्तर पर की गई है और यह पंचायत एवं जिला परिषद् मध्य की कड़ी के रूप में कार्य करती है। गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसकी व्यवस्था तालुक (Taluk) के स्तर पर की गई है। भिन्न-भिन्न राज्यों में इसको भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। आन्ध्र प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में पंचायत समिति कहते हैं। असम में आंचलिक पंचायत (Anchalik Panchayat), तमिलनाडु में पंचायती संघ समिति (Panchayat Union Council), उत्तर प्रदेश में क्षेत्र समिति (Kshetra Samiti), गुजरात में तालुक पंचायत (Taluk Panchayat) और कर्नाटक में तालुक विकास बोर्ड (Taluk Development Board) कहते हैं।

इसी तरह पंचायत समिति के प्रधान को भी भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। आन्ध्र प्रदेश, असम, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में प्रेजीडेंट (President), महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उड़ीसा, हरियाणा और पंजाब में चेयरमैन (Chairman), राजस्थान में प्रधान (Pardhan) और उत्तर प्रदेश तथा बिहार में प्रमुख (Parmukha) कहते हैं।

पंचायत समिति की रचना (Composition of Panchayat Samiti)-चुने हुए सदस्य (Elected Members)-पंचायत समिति के सदस्य इसके क्षेत्र के वोटरों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं। पंचायत समिति के सदस्यों की गिनती इसके क्षेत्र की आबादी पर निर्भर करती है और यह भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न होती है। कुछ राज्यों में इसके सदस्यों की गिनती निश्चित है और कुछ राज्यों में ऐसा नहीं है। कर्नाटक में प्रत्येक 10,000 की आबादी के पीछे एक सदस्य चुना जाता है। जबकि बिहार, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में प्रत्येक 5000 की आबादी के पीछे सदस्य चुना जाता है। त्रिपुरा में एक सदस्य 8000 की आबादी के लिए, आन्ध्र प्रदेश में 3000 से 4000 तक की आबादी के लिए, हिमाचल प्रदेश में 3000 की आबादी के लिए, उत्तर प्रदेश में 2000 की आबादी के लिए और पंजाब में 15,000 की आबादी के लिए चुना जाता है। हरियाणा में यदि पंचायत समिति क्षेत्र की आबादी 40,000 हो तो प्रत्येक 4000 के पीछे एक सदस्य चुना जाता है। पर यदि आबादी 40,000 से ज्यादा हो तो प्रत्येक 5000 की आबादी के लिए एक सदस्य चुना जाता है।

गुजरात में पंचायत समिति के सदस्यों की गिनती 15 निर्धारित की गई है। मध्य प्रदेश में 10 से 15 तक और केरल में 8 से 15 तक सदस्य एक पंचायत समिति में होते हैं। पंजाब में पंचायत समिति के सदस्यों की गिनती 6 से 10 तक होती है। राजस्थान में एक लाख आबादी वाली पंचायत समिति को 15 चुनाव क्षेत्रों में बाँटा जाता है और यदि आबादी एक लाख से ज्यादा हो तो प्रत्येक ज्यादा 15000 की आबादी के पीछे 2 सदस्यों को चुना जाता है। असम में प्रत्येक ग्राम पंचायत में से एक सदस्य आंचलिक पंचायत के लिए चुना जाता है। उड़ीसा और महाराष्ट्र में पंचायत समिति के सदस्यों की गिनती निश्चित नहीं है।

आरक्षित सीटें (Reserved Seats)—प्रत्येक राज्य में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित कबीलों तथा स्त्रियों के लिए पंचायत समिति में कुछ सीटें आरक्षित रखी जाती हैं। अनुसूचित जातियों तथा कबीलों के लिए आरक्षित सीटों की गिनती पंचायत समिति में सीटों की कुल गिनती के लगभग उसी अनुपात में होगी, जिस अनुपात में उस क्षेत्र में उनकी आबादी है। इनमें 1/3 सीटें औरतों के लिए आरक्षित रखी जाएंगी।

चेयरमैन (Chairman) पंचायत समिति के चुने हुए सदस्य अपने में से एक चेयरमैन और एक उप-चेयरमैन का चुनाव करते हैं। यह चुनाव जिले के डिप्टी कमिश्नर या उसके द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारी की निगरानी में होता है। क्योंकि पंचायत समिति का कार्यकाल पांच वर्ष है इसलिए इसके चेयरमैन और उप-चेयरमैन का कार्यकाल भी पांच वर्ष का होता है।

पंचायत समिति के चेयरमैनों में भी आबादी के आधार पर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित कबीलों के लिए सीटें आरक्षित रखी जाती हैं और कुल सीटों में से एक-तिहाई सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित रखी होती हैं।

पंचायत समिति के कार्य (Functions of Panchayat Samiti)-पंचायत समिति के कार्य बहुपक्षीय हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. सामूहिक विकास (Community Development)-सभी राज्यों में पंचायत समितियों को विकासवादी कार्यों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। वह सामूहिक विकास योजना को लागू करती है। वह ब्लॉक स्तर की योजनाओं को तैयार करती है और उनको लाग भी करती हैं।

2. खेतीबाड़ी और सिंचाई सम्बन्धी कार्य (Functions Regarding Irrigation and Agriculture)आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब और राजस्थान आदि सभी राज्यों की खेतीबाड़ी के विकास के सम्बन्ध में पंचायत समिति को विशेष शक्ति दी गई है। वह अच्छे बीज और उर्वरक बांटती है। खेतीबाड़ी के वैज्ञानिक तरीकों को प्रचलित करने के लिए प्रयत्न करती है। भूमि बचाओ (Soil Conservation) भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए प्रबन्ध करती है। हरी खाद और खादों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का यत्न करती है।

सब्जियों और फलों को ज्यादा उगाने के लिए उत्साह देती है। सिंचाई के लिए कुओं, तालाबों और सिंचाई के और साधनों की व्यवस्था करती है।

3. पशु पालन और मछली पालन (Animal Husbandry and Fisheries) पंचायत समिति पशु पालन के अच्छे तरीकों का प्रचार और उनकी बीमारियों से रक्षा करने के लिए और उनके इलाज के लिए व्यवस्था करती है। पशुओं की नस्ल सुधारने का प्रयत्न करती है, ब्लॉक में मछली पालन का प्रसार करती है और मछली पालने के लिए स्थान निश्चित करती है।

4. प्राथमिक शिक्षा (Primary Education) आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और राजस्थान आदि राज्यों में प्राथमिक शिक्षा की ज़िम्मेदारी पंचायत समिति को सौंपी गई है। इसके अतिरिक्त पंचायत समिति सूचना केन्द्र (Information Centre), मनोरंजन, युवक संगठन, स्त्री मंडल, किसान संघ, नुमायशें, मेले और औद्योगिक समारोहों इत्यादि का प्रबन्ध करती है।

5. Fartea Ta Hung Hopeit abref (Functions Regarding Health and Sanitation)—3714 pite पर सभी राज्यों में स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्य पंचायत समितियों को सौंपे गए हैं। यह छुआ-छूत की बीमारियों की रोकथाम के उपाय करती है। चेचक, हैज़ा, मलेरिया आदि के टीके लगाने का प्रबन्ध करती है। ब्लॉक में हस्पताल, स्त्रियों एवं बच्चों के कल्याण केन्द्रों की स्थापना की देखभाल करती है। पीने के लिए पानी, गंदे नाले और गलियों की सफ़ाई आदि का प्रबन्ध करती है। टिड्डियों, चूहों और अन्य कीड़ों आदि के खात्मे के लिए उपाय करती है।

6. स्थानीय कार्य (Municipal functions)-पंचायत समिति ब्लॉक पंचायती समिति ब्लॉक में सड़कों का निर्माण, मुरम्मत और देखभाल करती है। पीने के पानी, गन्दगी के निकास, सफ़ाई आदि का प्रबन्ध करती है।

7. सहकारिता (Co-operation)—पंचायत समिति औद्योगिक और खेती-बाड़ी में सहकारी समितियाँ (Cooperative societies) की स्थापना करने के लिए हौसला-अफजाई (प्रोत्साहन) और सहायता प्रदान करती है।

8. नियोजन तथा उद्योग (Planning and Industries)-कुछ राज्यों में पंचायत समिति को ब्लॉक स्तर पर नियोजन का अधिकार दिया गया है। वह छोटे पैमाने के तथा घरेलू उद्योगों की स्थापना में सहायता करती है।

पंचायत समिति की आय के स्रोत (Sources of Income of Panchayat Samiti) –

  1. पंचायत समिति द्वारा लगाए गए टैक्स-पंचायत समिति और जिला परिषद् एक्ट की धाराओं के अंतर्गत भिन्न-भिन्न प्रकार के टैक्स लगा सकती है। रोज़गार टैक्स, संपत्ति टैक्स, मार्ग टैक्स (Toll Tax), टोकन टैक्स आदि से होने वाली आय।
  2. संपत्ति से आय-पंचायत समिति के अधिकार में रखी गई संपत्ति से आय।
  3. फ़ीस (Fees)-पंचायत समिति द्वारा प्रदान की गई सेवाओं से आय। पंचायत समिति जिला परिषद् की स्वीकृति से कई प्रकार की फ़ीसें लगा सकती है जैसे मेलों, खेती-बाड़ी की नुमाएशों पर फ़ीस आदि।
  4. सरकारी कर (Government Grants)-राज्य सरकार पंचायत समिति को सामूहिक विकास योजना तथा अन्य कार्यों हेतु कई प्रकार की ग्रांटें देती है।
  5. भूमि कर (Land Revenue)-भूमि कर से आमदनी लगभग सभी राज्यों में ब्लॉक क्षेत्र से प्राप्त होने वाली भूमि मालिए (Land Revenue) का कुछ भाग पंचायत समिति को दिया जाता है, जैसे पंजाब में सरकार द्वारा भूमि कर का 10% भाग पंचायत समिति को दिया जाता है।
  6. कर्जे (Loans)—पंचायत समिति जिला परिषद् और सरकार की स्वीकृति के साथ सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं से कर्जे ले सकती है। गैर-सरकारी से 5 लाख रुपए से ज़्यादा कर्जा नहीं लिया जा सकता।

पंचायत समितियों को स्थानिक सत्ता कर्जा एक्ट, 1914 (Local Authorities Loans Act, 1914) और स्थानिक सत्ता कर्जा नियम, 1912 (Local Authorities Loans Rules, 1912) के अधीन सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं से अपने कार्यों को पूरा करने के लिए धन, कर्जे के रूप में प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

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प्रश्न 9.
जिला परिषद् के बारे में आप क्या समझते हैं ? विस्तार से लिखें।
उत्तर-
जिला परिषद् पंचायती राज्य की तीसरी तथा सबसे उच्च इकाई है। इसकी स्थापना सभी राज्यों में जिला स्तर पर की गई है। आन्ध्र प्रदेश, बिहार, पंजाब, सिक्किम, उड़ीसा, असम, राजस्थान, हरियाणा, मणिपुर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, त्रिपुरा, पश्चिमी बंगाल, हिमाचल प्रदेश तथा अरुणाचल प्रदेश में इसको जिला परिषद् कहते हैं। कर्नाटक, गोआ तथा उत्तर प्रदेश में इसको जिला पंचायत जबकि गुजरात, तमिलनाडु तथा केरल में इसे डिस्ट्रिकट पंचायत कहते हैं।

रचना (Composition)-जिला परिषद् में चुने हुए तथा कुछ और सदस्य होते हैं। चुने हुए सदस्यों को जिले के मतदाताओं द्वारा चुनावी क्षेत्र बना कर चुना जाता है। परन्तु चुने हुए सदस्यों की संख्या अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। त्रिपुरा, सिक्किम, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा पश्चिमी बंगाल में पंचायती राज्य एक्ट में चुने हुए सदस्यों की संख्या निर्धारित नहीं की गई है। बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में 50,000 की जनसंख्या के लिए एक सदस्य चुना जाता है। आसाम, हरियाणा, कर्नाटक में 40,000 की जनसंख्या के लिए एक सदस्य चुना जाता है। हिमाचल प्रदेश में 20,000 तथा मणिपुर में 15,000 की जनसंख्या के लिए एक सदस्य चुना जाता है।

गुजरात में कम-से-कम 17 तथा गोआ में 20 सदस्य जिला परिषद के लिए चुने जाते हैं। जिला परिषद में चने हुए सदस्यों की संख्या मध्य प्रदेश में 10 से 35 तक, महाराष्ट्र में 40 से 60 तक, केरल में 10 से 20 तक निर्धारित की गई है। राजस्थान में अगर जिला परिषद् की जनसंख्या 4 लाख हो तो 17 सदस्य चुने जाते हैं। अगर आबादी 4 लाख से अधिक हो तो प्रत्येक अधिक एक लाख के लिए 2 सदस्य बढ़ जाते हैं।

महाराष्ट्र के अतिरिक्त ज़िले में चुने हुए संसद् सदस्य (M.P’s) राज्य विधान सभा के सदस्य (M.L.A’s) ज़िला परिषद के अपने पद के कारण सदस्य होते हैं। गुजरात में विधान सभा के सदस्य स्थायी तौर पर जिला परिषद् में बुलाए जाते हैं परन्तु उन्हें वोट देने के अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

आन्ध्र प्रदेश में मण्डल पंचायतों के प्रधान, विधान सभा तथा संसद् के सदस्यों के अतिरिक्त अल्पसंख्यकों के दो प्रतिनिधि नियुक्त किए जाते हैं। इनके अतिरिक्त (District Co-operative Marketing Society) का प्रधान, जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक का प्रधान, जिले का डिप्टी कमिश्नर तथा Zila Grandholaya संस्था का प्रधान अपने पद के कारण जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। इस तरह मध्य प्रदेश में संसद् तथा विधान सभा के सदस्यों को अतिरिक्त जिला सहकारी बैंक तथा जिला सहकारी और विकास बैंक के प्रधान भी जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। यदि अनुसूचित जातियों तथा कबीलों का उपरोक्त में से कोई सदस्य न हो तो जिला परिषद् इन में से एक सदस्य नियुक्त कर सकती है।अनसचित जातियों, कबीलों तथा स्त्रियों के लिए आरक्षण (Reservation of seats for scheduled

castes, scheduled tribes and women)-जिला परिषद् के अनुसूचित जातियों, कबीलों तथा स्त्रियों के लिए सीटें सुरक्षित रखने के प्रावधान रखे गए हैं। अनुसूचित जातियों तथा कबीलों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात सीधे चुने गए सदस्यों के साथ वही होगा जो जिले में इन जातियों की संख्या का ज़िले की कुल जनसंख्या के साथ है।

प्रत्येक जिला परिषद् में 1/3 कुल स्थान स्त्रियों के लिए आरक्षित हैं (S.C. & S.T. मिलाकर) इसमें अनुसूचित जातियों तथा कबीलों की स्त्रियों के स्थान (आरक्षित) भी शामिल हैं।

पिछड़ी श्रेणियों के लिए आरक्षण (Reservation for Backward Classes)-लगभग सभी राज्यों में पिछड़ी श्रेणियों के लोगों के लिए भी कुछ स्थान जिला परिषद् में आरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है परन्तु ऐसा करना सरकार की मर्जी पर निर्भर करता है। जैसे बहुत-से राज्यों में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए उनकी संख्या के अनुसार जिला परिषद् में सीटें आरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है।

कार्यकाल (Tenure)-ज़िला परिषद् का कार्यकाल 5 साल का होता है। अगर इससे पहले इसे भंग कर दिया जाता है तो 6 महीने के अंदर इसके सदस्यों का चुनाव करवाना जरूरी होता है।

चेयरमैन (Chairman)—प्रत्येक जिला परिषद् में एक चेयरमैन तथा एक वाइस चेयरमैन होता है। उनका चुनाव जिला परिषद् के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से अपने में से करते हैं। जिला परिषद् के चेयरमैन तथा वाइस चेयरमैन को भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है।

अनुसूचित जातियों, कबीलों तथा स्त्रियों के लिए जिला परिषद् के चेयरमैन के पद को आरक्षित रखने की व्यवस्था भी की गई है। सदस्यों को इस तरह इन की जनसंख्या के अनुपात में रखा गया है तथा राज्य की कुल सीटों में से 1/3 स्त्रियों के लिए आरक्षित रखी गई है। चेयरमैन का कार्यकाल 5 साल का होता है।

जिला परिषद् के चेयरमैन तथा उप-चेयरमैन को अविश्वास प्रस्ताव पास करके उनके पद से हटाया जा सकता है। अविश्वास प्रस्ताव पास करने के लिए राज्यों में स्थिति भिन्न-भिन्न है।

कर्नाटक, बिहार, त्रिपुरा, सिक्किम, महाराष्ट्र, गोआ, मणिपुर, पश्चिमी बंगाल तथा हिमाचल प्रदेश में चुने हुए सदस्यों का बहुमत यदि अविश्वास प्रस्ताव को पास कर दे तो चेयरमैन को उसके पद से हटाया जा सकता है। इस तरह गुजरात, उड़ीसा, केरल, असम, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान तथा अरुणाचल प्रदेश में अविश्वास प्रस्ताव पास करने के लिए चुने सदस्यों का 2/3 इसके पक्ष में होना ज़रूरी होता है। मध्य प्रदेश में 3/4 तथा उत्तर प्रदेश में यदि 50% सदस्यों द्वारा इसे पास कर दिया जाए तो चेयरमैन को उसके पद के हटाया जा सकता है।

जिला परिषद् के कार्य (Functions of Zila Parishad) –

चाहे जिला परिषद् में कार्यों में अलग-अलग राज्यों में भिन्नता मिलती है तो भी इसका मुख्य उद्देश्य पंचायत समितियों के कार्यों का सुमेल तथा निरीक्षण करना है। इस स्थिति में वह निम्नलिखित कार्य करती है-

  1. यह जिले की पंचायत समितियों के बजट को पास करती है।
  2. यह पंचायत समितियों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार कार्य करने के लिए निर्देश जारी करती है।
  3. यह पंचायत समितियों को अपनी इच्छा या सरकार के आदेश के अनुसार या पंचायत समिति की विनती पर किसी विशेष विषय पर मशवरा भी दे सकती है।
  4. यह पंचायत समितियों द्वारा तैयार की गई विकास योजनाओं में तालमेल पैदा करती है।
  5. यह दो या दो से अधिक समितियों से सम्बन्धित योजनाओं को पूरा करती है।
  6. सरकार विशेष सूचना द्वारा किसी भी विकास योजना को पूरा करने का कार्य जिला परिषद् को सौंप सकती
  7. ज़िला परिषद् सरकार को जिले के स्तर पर या स्थानीय विकास के सभी कार्यों के सम्बन्ध में सलाह देती है।
  8. सरकार को पंचायत समितियों के कार्यों के विभाजन तथा तालमेल के सम्बन्ध में सलाह देती है।
  9. ज़िला परिषद् सरकार द्वारा दी गई शक्तियों को प्रयोग करने के सम्बन्ध में सरकार को सलाह देती है।
  10. वह सरकार से पूछकर पंचायत समितियों से कुछ धन भी वसूल कर सकती है।
  11. राज्य सरकार जिला परिषदों को पंचायतों का निरीक्षण तथा नियन्त्रण करने की शक्ति भी दे सकती है।

आय के साधन (Financial Resources)-जिला परिषद् की आय के साधन निम्नलिखित हैं-

  1. केन्द्रीय तथा राज्य सरकार द्वारा जिला परिषद् के लिए निश्चित किए गए फण्ड (Funds)।
  2. बड़े तथा छोटे उद्योगों की उन्नति के लिए सर्व भारतीय संस्थाओं द्वारा दी गयी ग्रांट (Grants) ।
  3. भूमि कर तथा दूसरे राज्य करों में से राज्य सरकार द्वारा दिया गया हिस्सा।
  4. जिला परिषद् की अपनी सम्पत्ति से आय।
  5. राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किए गए आय के दूसरे साधन ।
  6. जनता तथा पंचायत समितियों द्वारा दी गई ग्रांट ।
  7. पंचायत समितियों से राज्य सरकार की मंजूरी से जिला परिषद् द्वारा ली गई धनराशि।
  8. विकास योजनाओं के सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा दी गई ग्रांट।
  9. कुछ राज्यों में जिला परिषद् को विशेष प्रकार के टैक्स लगाने तथा पंचायत समिति द्वारा लगाए गए टैक्सों में बढ़ोत्तरी करने की शक्ति दी गई है।
    उपरोक्त स्रोतों के अतिरिक्त जिला परिषद् सरकार तथा गैर-सरकारी संस्थाओं से कर्जे भी ले सकती है। परन्तु ऐसा करने से पहले उसे राज्य सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 8 राजनीति, धर्म, अर्थ प्रणाली तथा शिक्षा

राजनीति, धर्म, अर्थ प्रणाली तथा शिक्षा PSEB 11th Class Sociology Notes

  • हमारे समाज में बहुत सी संस्थाएं होती हैं। सामाजिक संस्थाओं में हम विवाह, परिवार और नातेदारी को शामिल करते हैं।
  • राजनीतिक व्यवस्था समाज की ही एक उपव्यवस्था है। यह मनुष्यों की उन भूमिकाओं को निर्धारित करती है जो कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक होती है। राजनीति और समाज में काफ़ी गहरा रिश्ता है।
  • समाजशास्त्र में राजनीतिक संस्थाओं की सहायता ली जाती है तथा कई संकल्पों को समझा जाता है, जैसे कि शक्ति, नेतागिरी, सत्ता, वोट करने का व्यवहार इत्यादि। राजनीतिक संस्थाएं समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में सहायता करती हैं।
  • शक्ति समूह अथवा व्यक्तियों की वह समर्था होती है जिसके द्वारा वह उस समय अपनी बात मनवाते हैं जब उनका विरोध हो रहा होता है। समाज में शक्ति एक निश्चित मात्रा में मौजूद है। कुछ समूहों के पास अधिक शक्ति होती है तथा वे कम शक्ति वाले व्यक्तियों या समूहों पर अपनी बात थोपते हैं।
  • शक्ति को सत्ता की सहायता से लागू किया जाता है। सत्ता शक्ति का वह रूप है जिसे सही तथा वैध समझा जाता है जिनके पास सत्ता होती है वे शक्ति का प्रयोग करते हैं क्योंकि इसे न्यायकारी समझा जाता है।
  • मैक्स वैबर ने सत्ता के तीन प्रकार दिए हैं-परम्परागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मई सत्ता। पिता की सत्ता परंपरागत सत्ता होती है, सरकार की सत्ता वैधानिक सत्ता तथा किसी गुरु की बात मानना करिश्मई सत्ता होती है।
  • अलग-अलग प्रकार के समाजों में अलग-अलग राज्य होते हैं। कई समाजों में राज्य नाम का कोई संकल्प : नहीं होता जिस कारण इन्हें राज्य रहित समाज कहा जाता है तथा यह पुरातन समाजों में मिलते हैं। आधुनिक समाजों में सत्ता को राज्य नामक संस्था में शामिल किया है तथा यह सत्ता जनता से ही प्राप्त की जाती है।
  • राज्य राजनीतिक व्यवस्था की एक मूल संस्था है। इसके चार आवश्यक तत्त्व होते हैं तथा वह हैं जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र, प्रभुसत्ता तथा सरकार।
  • सरकार के तीन अंग होते हैं तथा वह हैं-विधानपलिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका। राज्य तथा सरकार को बनाए रखने में इन तीनों के बीच तालमेल का होना आवश्यक है।
  • आजकल की राजनीतिक व्यवस्था लोकतन्त्र के साथ चलती है। लोकतन्त्र दो प्रकार का होता है। प्रत्यक्ष लोकतन्त्र में जनता अपने निर्णय स्वयं लेती है तथा अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि सभी निर्णय लेते हैं।
  • हमारे देश में सरकार ने विकेन्द्रीयकरण की व्यवस्था को अपनाया है तथा स्थानीय स्तर तक सरकार बनाई
    जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव के स्तर पर पंचायत ब्लॉक के स्तर पर ब्लॉक समिति तथा जिले के स्तर पर जिला परिषद् होते है जो अपने क्षेत्रों का विकास करते हैं।
  • लोकतन्त्र में राजनीतिक दल महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। एक राजनीतिक दल उन लोगों का समूह होता है जिसका मुख्य उद्देश्य चुनाव लड़ कर सत्ता प्राप्त करना होता है। कुछ दल राष्ट्रीय दल होते हैं तथा कुछेक प्रादेशिक दल होते हैं।
  • लोकतन्त्र में हित समूहों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। ये हित समूह किसी विशेष समूह से जुड़े होते हैं तथा वे अपने समूह के हितों की प्राप्ति के लिए कार्य करते रहते हैं।
  • जब से मानवीय समाज शुरू हुए हैं धर्म उस समय से ही समाज में मौजूद है। धर्म और कुछ नहीं बल्कि अलौकिक शक्ति में विश्वास है जो हमारे अस्तित्व और पहुँच से बहुत दूर है।
  • हमारे देश भारत में बहुत से धर्म मौजूद हैं जैसे कि हिन्दू, इस्लाम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, पारसी धर्म इत्यादि। भारत एक बहु-धार्मिक देश है जहाँ बहुत से धर्मों के लोग इकट्ठे मिल कर रहते हैं।
  • प्रत्येक व्यक्ति को भोजन, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए पैसे की आवश्यकता पड़ती है तथा यह सब हमारी अर्थ व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। अर्थ व्यवस्था हमारे पैसे तथा खर्च का ध्यान रखती है।
  • अलग-अलग समाजों में अलग-अलग अर्थ व्यवस्था मौजूद होती है। कई समाज चीजें एकत्र करने वाले होते हैं, कई समाज चारगाह अर्थ व्यवस्था वाले होते हैं, कई समाज ग्रामीण अर्थ व्यवस्था वाले होते हैं, कई समाज औद्योगिक अर्थ व्यवस्था तथा कई समाज पूँजीवाद वाले भी होते हैं। कार्ल मार्क्स ने समाजवादी अर्थ व्यवस्था के बारे में बताया है।
  • श्रम विभाजन का संकल्प हमारे समाज के लिए नया नहीं है। जब लोग किसी विशेष कार्य को करने लग जाएं तथा वे सभी कार्यों को न कर सकें तो इसे विशेषीकरण तथा श्रम विभाजन का नाम दिया जाता है। भारतीय समाज में जाति व्यवस्था तथा जजमानी व्यवस्था श्रम विभाजन का ही एक प्रकार है।
  • अगर हम अपने समाज की तरफ देखें तो हम कह सकते हैं कि शिक्षा के बिना समाज में कुछ नहीं होता। शिक्षा व्यक्ति को जानवर से सभ्य मनुष्य के रूप में परिवर्तित कर देती है।
  • शिक्षा दो प्रकार की होती है-औपचारिक तथा अनौपचारिक। औपचारिक शिक्षा वह होती है जो हम स्कूल, कॉलेज इत्यादि से प्राप्त करते हैं तथा अनौपचारिक शिक्षा वह होती है जो हम अपने रोजाना के अनुभवों, बुजुर्गों इत्यादि से प्राप्त करते हैं।
  • सत्ता (Authority)-राजनीतिक व्यवस्था द्वारा अपने भौगोलिक क्षेत्र में स्थापित की गई शक्ति।
  • श्रम विभाजन (Division of Labour)-वह व्यवस्था जिसमें कार्य को अलग-अलग भागों में विभाजित कर दिया जाता है तथा प्रत्येक कार्य किसी व्यक्ति या समूह द्वारा ही किया जाता है।
  • अर्थव्यवस्था (Economy)-उत्पादन, विभाजन तथा उपभोग की व्यवस्था को अर्थव्यवस्था कहते हैं।
  • विश्वव्यापीकरण (Globalisation)-सांसारिक इकट्ठा होने की व्यवस्था जो संस्कृति के अलग-अलग पक्षों, अन्तर्राष्ट्रीय विचारों, वस्तुओं इत्यादि के लेन-देन से सामने आती है।
  • टोटम (Totem)-किसी पेड़, पौधे, पत्थर या किसी अन्य वस्तु को पवित्र मानना।
  • राज्य वाले समाज (State Society)-वह समाज जिनमें सरकार का औपचारिक ढांचा मौजूद होता है।
  • राज्य रहित समाज (Stateless Society)-वह समाज जहां सरकार के औपचारिक संगठन नहीं होते।
  • हित समूह (Pressure Groups)—वह समूह जहां लोकतान्त्रिक व्यवस्था में किसी विशेष समूह के हितों के लिए कार्य करते हैं।
  • राज्य (State)-राज्य वह समूह होता है जिसके चार प्रमुख तत्त्व हैं-जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र, प्रभुसत्ता तथा सरकार।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 5 कार्यात्मक फर्नीचर

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Chapter 5 कार्यात्मक फर्नीचर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Home Science Chapter 5 कार्यात्मक फर्नीचर

PSEB 8th Class Home Science Guide कार्यात्मक फर्नीचर Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कार्यात्मक फर्नीचर से क्या भाव है ?
उत्तर-
जो फर्नीचर किसी खास काम के लिए इस्तेमाल किया जाता हो।

प्रश्न 2.
सोने वाले कमरे में आरामदायक फर्नीचर होना चाहिए। बताओ क्यों ?
उत्तर-
सोने वाले कमरे में आरामदायक फर्नीचर होना चाहिए क्योंकि उठने-बैठने तथा सोने में कष्टदायक न हो।

प्रश्न 3.
कार्यात्मक फर्नीचर कितनी प्रकार का होता है ?
उत्तर-
दो प्रकार का-

  1. कार्यात्मक,
  2. केवल सजावटी।

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प्रश्न 4.
मेज़ के ऊपर सनमाइका लगाने का क्या लाभ है ?
उत्तर-
मेज़ के ऊपरी भाग पर सनमाइका लगाने से मेज़ साफ़ करना आसान रहता है।

प्रश्न 5.
किस प्रकार की लकड़ी फर्नीचर के लिए सबसे अच्छी रहती है ?
उत्तर-
टीक, महोगनी, गुलाब और अखरोट की लकड़ी फर्नीचर के लिए सबसे अच्छी रहती है।

प्रश्न 6.
पलंग का आम माप क्या होता है और बच्चों के लिए कैसा पलंग हो सकता
उत्तर-
पलंग का साधारण माप \(2 \frac{1}{2}\) से \(3 \frac{1}{2}\) तक चौड़ा और \(6 \frac{1}{2}\) फुट तक लम्बा होता है।
बच्चों के लिए छोटी चारपाई हो सकती है। इसका माप 4′ × 2′ होता है।

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प्रश्न 7.
पढ़ाई वाले मेज़ का आम माप क्या होता है ?
उत्तर-
पढ़ाई वाले मेज़ का साधारण माप \(2 \frac{1}{2}\) फुट × 4 फुट और ऊँचाई \(2 \frac{1}{2}\) फुट हो सकती है।

प्रश्न 8.
पढ़ाई वाले मेज़ पर कार्य करते समय किस प्रकार की कुर्सी का प्रयोग करना चाहिए ?
उत्तर-
पढ़ाई वाले मेज़ पर काम करते समय कुर्सी सीधी पीठ वाली और बाजू वाली प्रयोग करनी चाहिए।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय मौसम के अनुसार किस तरह का फर्नीचर होना चाहिए ?
उत्तर-
भारतीय मौसम के अनुसार निम्नलिखित तरह का फर्नीचर होना चाहिए

  1. फर्नीचर नए डिज़ाइन का हो।
  2. फर्नीचर कमरे के आकार का हो।
  3. फर्नीचर आर्थिक दृष्टि से मितव्ययी हो।
  4. फर्नीचर स्थान की दृष्टि से मितव्ययी हो।
  5. फर्नीचर कमरे के लिए उपयोगी हो।
  6. फर्नीचर मज़बूत व टिकाऊ हो।
  7. फर्नीचर उपयोगी और सुन्दर होने के साथ-साथ आरामदायक हो।
  8. फर्नीचर उठाने-धरने में सुविधाजनक हो।
  9. फर्नीचर सदैव अच्छे कारीगर द्वारा बना हो।

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प्रश्न 2.
बैठने वाले और खाने वाले कमरों में कौन-कौन सा फर्नीचर होना ज़रूरी है ?
उत्तर-
बैठने वाले कमरों में फर्नीचर-सोफासेट, गद्देदार, कुर्सियाँ, मेज़, कॉफी टेबल,सेन्टर टेबल और आराम कुर्सियाँ। खाने वाले कमरों में फर्नीचर- भोजन की मेज़, कुर्सियाँ, परोसने की मेज़, साइड बोर्ड ट्राली (पहिए वाली मेज़)।

प्रश्न 3.
पढ़ाई वाले कमरे की आवश्यकता क्यों समझी जाती है ? इसमें किस तरह का फर्नीचर होना चाहिए ?
उत्तर-
शिक्षा के प्रसार से हमारे देश में भी पश्चिमी देशों की तरह पढ़ाई वाले कमरे की आवश्यकता है जिसमें बच्चों की पढ़ाई सही ढंग से हो सके। पढ़ाई वाले कमरे का फर्नीचर-पढ़ने वाला मेज़, कुर्सी, पुस्तकों की अलमारी आदि होनी चाहिएँ। मेज़ का आम माप 21/2 फुट × 4 फुट और ऊँचाई 272 फुट होती है। लेकिन मेज़ इससे लम्बा और चौड़ा भी हो सकता है। मेज़ इतना बड़ा होना चाहिए कि उस पर लैम्प, पुस्तकें, शब्दकोष, पेन, पेंसिलें आदि आसानी से आ सकें। अगर टाइपराइटर रखने की जगह हो सके तो और भी अच्छा है। कुर्सी सीधी पीठ वाली और बाजू वाली होनी चाहिए। इसकी सीट बेंत की या गद्देदार होनी चाहिए। यदि टाइपराइटर का प्रबन्ध हो तो कुर्सी पहियों वाली होनी चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर इसको टाइपराइटर की तरफ़ या मेज़ की तरफ़ घुमाया जा सके। पुस्तकों के लिए शैल्फ़ वाली अलमारी इस कमरे में होनी चाहिए। हमारे देश के मौसम के अनुसार शीशे वाली अलमारी होनी चाहिए क्योंकि मिट्टी, धूल से पुस्तकों को सुरक्षित रखा जा सके।

प्रश्न 4.
लकड़ी के फर्नीचर की किस तरह देखभाल करोगे ? ।
उत्तर-
लकड़ी के फर्नीचर की देखभाल के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. फर्नीचर की सफ़ाई प्रतिदिन की जानी चाहिए।
  2. फर्नीचर को बहुत सावधानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना चाहिए।
  3. फर्नीचर को खींचना या घसीटना नहीं चाहिए। फर्नीचर को रगड़ लगने से भी बचाना चाहिए।
  4. फर्नीचर पर किसी प्रकार की खाने की वस्तु न गिरे, यदि गिर भी जाए तो उसे तत्काल साफ़ कर देना चाहिए नहीं तो दाग-धब्बे पड़ने का डर रहता है।

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प्रश्न 5.
गद्देदार और चमड़े के फर्नीचर को किस तरह साफ़ करोगे ?
उत्तर-
गद्देदार और चमड़े के फर्नीचर को साफ़ करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. प्रतिदिन साफ़ कपड़े से झाड़ना चाहिए।
  2. कभी-कभी पानी में नर्म साबुन का घोल बनाकर कपड़े के साथ घोल लगाकर चमड़े और रेक्सीन को साफ़ करना चाहिए।
  3. साफ़ करने के बाद पॉलिश करना चाहिए ताकि चमड़ा नरम हो जाए और कटे नहीं।

प्रश्न 6.
बैंत के फर्नीचर का क्या लाभ और हानियाँ हैं ?
उत्तर-
बैंत के फर्नीचर से निम्नलिखित लाभ हैं-

  1. बैंत का फर्नीचर लकड़ी से हल्का होता है।
  2. यह लकड़ी के फर्नीचर की अपेक्षा आसानी से बाहर निकाला जा सकता है।
  3. यह लकड़ी के फर्नीचर से सस्ता होता है।

बैंत के फर्नीचर की सफ़ाई-

  1. बैंत वाले फर्नीचर को रोज़ कपड़े या ब्रुश से साफ़ करना चाहिए।
  2. बैंत वाले फर्नीचर को नमक के पानी से साफ़ करना चाहिए।

हानियाँ-

  1. इस फर्नीचर को कुत्तों, बिल्लियों से बचाना पड़ता है।
  2. यह लम्बे समय तक चलने योग्य नहीं होता।

प्रश्न 7.
मीनाकारी वाले फर्नीचर के क्या लाभ और हानियाँ हैं ?
उत्तर-
लाभ-

  1. मीनाकारी फर्नीचर देखने में सुन्दर होता है।
  2. इससे कमरा आकर्षक लगता है।

हानियाँ-

  1. हमारे यहाँ तेज़ हवा चलती है जिस कारण मीनाकारी फर्नीचर पर धूलमिट्टी की परतें जम जाती हैं।
  2. इस फर्नीचर की आसानी से सही सफ़ाई नहीं होती।
  3. सफ़ाई न होने से यह अनाकर्षक दिखायी देने लगता है।

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प्रश्न 8.
फर्नीचर पर घी, तेल, पेंट और लुक आदि के दाग कैसे दूर किये जा सकते
उत्तर-
फर्नीचर पर लगे घी, तेल, पेंट तथा तारकोल आदि के धब्बे निम्नलिखित ढंग से दूर किये जा सकते हैं

  1. तरल पदार्थों को किसी साफ़ कपड़े से पोंछ देना चाहिए।
  2. चिकने और चिपकने वाले दागों के लिए गुनगुने पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। आवश्यकता हो तो किसी नरम साबुन का इस्तेमाल करना चाहिए। लकड़ी को अधिक गीला नहीं करना चाहिए।
  3. यदि लकड़ी पर कोई गर्म बर्तन रखा जाए तो भी उस पर दाग पड़ जाते हैं। इस तरह के दाग पर कुछ दिन थोड़ा सा युक्लिप्टस का तेल या पीतल का पॉलिश लगाकर अच्छी तरह रगड़ना चाहिए। 8-10 दस दिनों के बाद दाग उतर जाएगा।
  4. पेन्ट या रोगन के दाग के लिए मैथिलेटिड स्पिरिट इस्तेमाल में लानी चाहिए और फर्नीचर पर पॉलिश करनी चाहिए।
  5. स्याही के दाग के लिए ऑग्जैलिक तेज़ाब का हल्का घोल इस्तेमाल करना चाहिए।
  6. रगड़ के निशानों को दूर करने के लिए उबालकर ठंडा किया अलसी का तेल इस्तेमाल करना चाहिए।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
फर्नीचर का चुनाव करते समय कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ?
उत्तर-
फर्नीचर के चुनाव में निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है
(1) उपयोगिता,
(2) सुन्दरता,
(3) डिज़ाइन,
(4) आरामदेही,
(5) मूल्य,
(6) मज़बूती,
(7) आकार।
1. उपयोगिता-केवल उपयोगी फर्नीचर का ही चुनाव करना चाहिए। अनुपयोगी फर्नीचर कितना ही सुन्दर क्यों न हो, वह हमारे लिए कोई महत्त्व नहीं रखता।

2. सुन्दरता-फर्नीचर आकर्षक व सन्तोषजनक होना चाहिए। सामान्य नियमों का पालन करते हुए सुन्दरता पर ध्यान देना चाहिए।

3. बनावट (डिज़ाइन)-मकान की बनावट के अनुसार फर्नीचर आधुनिक, सादा या पुराने डिज़ाइन का हो सकता है। आधुनिक मकान में पुराने डिज़ाइन का फर्नीचर शोभा नहीं देता। आधुनिक मकान का सभी फर्नीचर आधुनिक ही होना चाहिए।

4. आरामदेही-फर्नीचर की विशेषता उसका आरामदेह होना है। उठने-बैठने तथा सोने में कष्ट देने वाले फर्नीचर कितने ही सुन्दर क्यों न हों, बेकार होते हैं।

5. मूल्य-घर की आर्थिक स्थिति तथा फर्नीचर के मूल्य में तालमेल होना चाहिए। अपनी आर्थिक स्थिति से बाहर निकलकर खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है। बहुत सस्ता फर्नीचर भी नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि वह टिकाऊ नहीं हो सकता।

6. मज़बूती-फर्नीचर सुन्दर होने के साथ-साथ मज़बूत भी होना चाहिए। चीड की लकड़ी का फर्नीचर शीघ्र टूट जाता है। सागवान व शीशम की लकड़ी का फर्नीचर मज़बूत होता है। स्टील या लोहे के फर्नीचर में चादर की मज़बूती का ध्यान रखना चाहिए।

7. आकार- फर्नीचर का चुनाव कमरे के आकार के आधार पर ही करना चाहिए। छोटे कमरों में छोटे आकार का फर्नीचर और बड़े कमरों में बड़े आकार का फर्नीचर ही उपयुक्त रहता है।

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प्रश्न 2.
लकड़ी के फर्नीचर पर रगड़ के निशानों को कैसे दूर कर सकते हैं ?
उत्तर-
लकड़ी के फर्नीचर पर रगड़ के निशानों को दूर करने के लिए अलसी का तेल उबालकर ठंडा करके प्रयोग किया जाता है।

Home Science Guide for Class 8 PSEB कार्यात्मक फर्नीचर Important Questions and Answers

I. बहुविकल्पी प्रश्न

प्रश्न 1.
ग़लत तथ्य हैं
(क) बैंत का फर्नीचर लकड़ी से हल्का होता है।
(ख) पढ़ाई वाली मेज़ 4 फुट ऊंची होती है।
(ग) सजावटी फर्नीचर केवल सजावट के लिए होता है।
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(ख) पढ़ाई वाली मेज़ 4 फुट ऊंची होती है।

प्रश्न 2.
ठीक तथ्य है
(क) फर्नीचर दो प्रकार का होता है।
(ख) सब से अच्छा फर्नीचर लकड़ी का होता है।
(ग) फर्नीचर आराम दायक होना चाहिए।
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

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प्रश्न 3.
ठीक तथ्य है
(क) बैंत वाले फर्नीचर को नमक वाले पानी से साफ करना चाहिए।
(ख) मीनाकारी वाले फर्नीचर से कमरा आकर्षक लगता है।
(ग) बैंत का फर्नीचर लकड़ी के फर्नीचर से सस्ता होता है।
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

II. ठीक/गलत बताएं

  1. पुराने फर्नीचर भारी तथा नक्काशीदार होते हैं।
  2. फर्नीचर का चयन कमरे के रंग, आकार अनुसार करें।
  3. देवदार, अखरोट की लकड़ी हल्की होती है।
  4. बहु-उद्देशीय फर्नीचर कम स्थान लेता है।

उत्तर-

  1.  ✓

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III. रिक्त स्थान भरें

  1. फर्नीचर का चयन कमरे के ……………….. के अनुसार करें।
  2. पढ़ाई वाले कमरे में कुर्सी ………………. तथा बाजू वाली होनी चाहिए।
  3. मेज़ के ऊपर ……………….. लगा होना चाहिए।
  4. लकड़ी के फर्नीचर पर रगड़ दूर करने के लिए …… का तेल प्रयोग करें।
  5. स्याही के दाग़ दूर करने के लिए ……………….. प्रयोग करें।

उत्तर-

  1. रंग, आकार,
  2. सीधी पीठ वाली,
  3. सनमाईका,
  4. अलसी,
  5. आग्जैलिक तेज़ाब।

IV. एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
सबसे अच्छा फर्नीचर किसका होता है ?
उत्तर-
लकड़ी का।

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प्रश्न 2.
जो फर्नीचर बार-बार हटाये या खिसकाये जाएं, वे किस प्रकार की लकड़ी के बने होते हैं ?
उत्तर-
हल्की लकड़ी (देवदार, अखरोट) आदि के।

प्रश्न 3.
बच्चों के फर्नीचर किसके बने होने चाहिएँ ?
उत्तर-
बेंत के।

प्रश्न 4.
पुराने फर्नीचर किस प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
भारी और नक्काशीदार।

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प्रश्न 5.
आधुनिक फर्नीचर कैसे होते हैं तथा इनके डिज़ाइन क्या हैं ? .
उत्तर-
हल्के तथा तरल डिज़ाइन वाले।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फर्नीचर के अन्तर्गत कौन-कौन सी वस्तुएँ आती हैं ?
उत्तर-
मेज़, कुर्सी, पलंग, चौकी, तिपाई, सोफा, मूढा, बुक-रैक, अलमारी आदि।

प्रश्न 2.
फर्नीचर कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर-

  1. लकड़ी का,
  2. बेंत का,
  3. गद्देदार का,
  4. लोहे का,
  5. कामचलाऊ,
  6. अलंकृत, तथा
  7. स्थान बचाऊ या फोल्डिंग।

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प्रश्न 3.
फर्नीचर किस किस्म की लकड़ी का हो सकता है ?
उत्तर-
फर्नीचर लकड़ी मज़बूत और अच्छी तरह पकी हुई लकड़ी का हो सकता है।

प्रश्न 4.
कार्यात्मक फर्नीचर से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर-
जो फर्नीचर किसी खास काम के लिए प्रयोग किया जाता हो।

प्रश्न 5.
फर्नीचर के दो आवश्यक गुण बताओ।
उत्तर-

  1. आरामदायकता,
  2. मज़बूती।

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प्रश्न 6.
बैठक में क्या-क्या फर्नीचर होता है ?
उत्तर-
सोफासेट, गद्देदार, कुर्सियाँ, मेज़, कॉफी टेबत, केन्टर टेबल और आराम कुर्सियाँ ।

प्रश्न 7.
भोजन कक्ष में इस्तेमाल होने वाला फीस कौन-सा होता है ?
उत्तर-
भोजन की मेज़, कुर्सियाँ, परोसने की मेज़, साइड छोर्ड ट्राली (पहिये वाली मेज़)।

प्रश्न 8.
सोने के कमरे का फर्नीचर बताओ।
उत्तर-
सिंगल या डबल बैड, साइड मेज़, ड्रेसर खानों सहित, ड्रेसिंग टेबल, लोहे या लकड़ी की अलमारी, आराम कुर्सी।।

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प्रश्न 9.
फर्नीचर खरीदते समय कौन-सी आवश्यक बातें ध्यान में रखनी चाहिएँ ?
उत्तर-

  1. उपयोगिता,
  2. सुन्दरता,
  3. डिज़ाइन,
  4. मूल्य,
  5. आरामदायकता,
  6. मज़बूती,
  7. आकार, तथा
  8. परिवार के सदस्यों की रुचि।

प्रश्न 10.
फर्नीचर के मुख्य लाभ क्या हैं ?
उत्तर-

  1. घर में उठने-बैठने के लिए,
  2. शरीर को आराम पहुँचाने के लिए,
  3. काम करने में सुविधा प्रदान करना,
  4. घर की सजावट,
  5. सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का परिचय तथा
  6. वस्तुओं की सुरक्षा।

प्रश्न 11.
फर्नीचर बनाने में प्रायः कौन-कौन सी लकड़ी का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
देवदार, आबनूस, शीशम, आम, सागवान, अखरोट, चीड़ आदि।

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प्रश्न 12.
बेंत से कौन-से फर्नीचर बनाए जाते हैं ?
उत्तर-
मोटी बेंत से कुर्सी,सोफा, मेज़ और मूढ़े बनाये जाते हैं।

प्रश्न 13.
बेंत के फर्नीचर किस स्थान के लिए अधिक उपयोगी होते हैं ?
उत्तर-
बगीचे, बरामदे और आँगन के लिए। बच्चों के कमरों में भी ऐसे फर्नीचर उचित रहते हैं।

प्रश्न 14.
अच्छे फर्नीचर की क्या विशेषता होती है ?
उत्तर-
अच्छा फर्नीचर उपयोगी, मज़बूत, नये डिज़ाइन का, कम कीमत का तथा आरामदेह होता है।

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प्रश्न 15.
फर्नीचर का चुनाव करते समय कमरे के आकार का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
फर्नीचर कमरे के आकार के अनुसार ही होना चाहिए। जैसे छोटे कमरे में अधिक या बड़े आकार के फर्नीचर से कमरा भरा लगेगा तथा चलने फिरने की जगह भी नहीं रहेगी।

प्रश्न 16.
सजावटी फर्नीचर से क्या भाव है ?
उत्तर-
ऐसा फर्नीचर घर की सजावट के लिए प्रयोग होता है। इस फर्नीचर पर नक्काशीदार खुदाई की होती है।

लघ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फर्नीचर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
फर्नीचर’ शब्द से अभिप्राय ऐसे सामान से है जो प्रतिदिन उठने-बैठने, आराम करने, विभिन्न वस्तुओं को सुरक्षित रखने आदि के काम आता है। इसके अन्तर्गत कुर्सी, मेज़, सोफा, मूढा, तिपाई, पलंग, तख्त, चारपाई, डोली, बेंच, बुक-रैक तथा अलमारी आदि भी फर्नीचर में आते हैं।

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प्रश्न 2.
घर में फर्नीचर का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
घर में फर्नीचर का महत्त्व निम्नलिखित प्रकार है-

  1. फर्नीचर घर की आन्तरिक सजावट के लिए आवश्यक है।
  2. फर्नीचर से व्यक्ति की मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा को बढ़ावा मिलता है।
  3. घर में सुसज्जित फर्नीचर से परिवार के व्यक्तित्व की झलक दिखाई देती है।
  4. वस्तुओं को सुरक्षित रखने एवं कार्यों को सुविधापूर्वक करने के लिए भी फर्नीचर अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 3.
फर्नीचर कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर-
फर्नीचर का विभाजन तीन प्रकार से किया जा सकता है-
(1) फर्नीचर किस वस्तु का बना है ?
(2) कीमत के आधार पर।
(3) उपयोगिता के आधार पर।

  1. फर्नीचर किस वस्तु का बना है ?
    • लकड़ी का फर्नीचर।
    • बेंत का फर्नीचर।
    • बाँस का फर्नीचर।
    • गद्देदार फर्नीचर।
    • लोहे का फर्नीचर।
    • एल्यूमिनियम का फर्नीचर।
  2.  कीमत के आधार पर-
    • कम लागत का फर्नीचर।
    • मध्यम लागत का फीचर।
    • उच्च लागत का फर्नीचर।
  3. उपयोगिता के आधार पर-
    • बैठने के लिए फर्नीचर।
    • मध्यम लागत का फर्नीचर।
    • कार्य सम्पादन के लिए फर्नीचर।
    • सामान को सुरक्षित रखने के लिए फर्नीचर।

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प्रश्न 4.
लकड़ी के फर्नीचर पर पॉलिश के सामान्य नियम क्या हैं ?
उत्तर-

  1. पॉलिश या वार्निश लगाने से पूर्व फर्नीचर पर पड़े धूल कण तथा गन्दगी को मुलायम झाड़न से पोंछकर साफ़ कर देना चाहिए।
  2. फर्नीचर को गुनगुने पानी से या सोडे से धोने पर ऊपरी मैल तथा धब्बे छूट जाते हैं।
  3. पूरा फर्नीचर एक साथ गीला नहीं करना चाहिए। थोड़ा-थोड़ा भाग गीला करके साफ़ करते जाना चाहिए।
  4. पॉलिश लगाने अथवा चमकाने के पूर्व लकड़ी को पूर्णतः सूख जाना चाहिए।
  5. फर्नीचर पर चमक लाने के लिए साफ़ और मुलायम कपड़े से अधिक ज़ोर देकर जल्दी-जल्दी रगड़ना चाहिए।

प्रश्न 5.
फर्नीचर खरीदते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखोगी ?
उत्तर-

  1. फर्नीचर नए डिज़ाइन का हो।
  2. फर्नीचर कमरे के आकार के अनुरूप हो।
  3. फर्नीचर आर्थिक दृष्टि से मितव्ययी हो।
  4. फर्नीचर स्थान की दृष्टि से मितव्ययी हो।
  5. फर्नीचर कमरे के लिए उपयोगी हो।
  6. फर्नीचर मज़बूत व टिकाऊ हो।
  7. फर्नीचर उपयोगी और सुन्दर होने के साथ-साथ आरामदायक हो।
  8. फर्नीचर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में सुविधाजनक हो।
  9. फर्नीचर सदैव अच्छे कारीगर द्वारा बना हो।

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प्रश्न 6.
फर्नीचर की देखभाल के नियम बताइए।
उत्तर-
फर्नीचर की देखभाल के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए-

  1. फर्नीचर पर गद्दियों तथा कवर आदि का प्रयोग करना चाहिए।
  2. फर्नीचर की टूट-फूट होने पर उसकी मरम्मत तुरन्त करवानी चाहिए।
  3. फर्नीचर को रोज़ सूखे कपड़े से पोंछकर साफ़ रखना चाहिए।
  4. नक्काशीदार फर्नीचर को ब्रुश के प्रयोग से साफ़ रखना चाहिए।
  5. फर्नीचर को नमी या धूप के स्थान पर नहीं रखना चाहिए।
  6. आवश्यकता अनुभव होने पर फर्नीचर की पॉलिश करवानी चाहिए।
  7. फर्नीचर उठाते या सरकाते समय सावधानी बरतनी चाहिए।

प्रश्न 7.
बहुउद्देशीय स्थान-बचाऊ की क्या उपयोगिता है ?
उत्तर-
बहुउद्देशीय स्थान-बचाऊ फर्नीचर फोल्डिंग (मुड़ने वाला) फर्नीचर होता है, जैसे सोफा-कम-बैड, फोल्डिंग कुर्सियाँ, मशीन कवर-कम-टेबल आदि। छोटे घरों में इसकी बहुत उपयोगिता होती है-

  1. यह स्थान कम घेरता है।
  2. फोल्डिंग सोफे को रात्रि में खोलकर पलंग का काम लिया जा सकता है।
  3. रात्रि में फोल्डिंग कुर्सियों व मेज़ आदि को फोल्ड करके रख देने से छोटे घर में स्थान की समस्या हल हो जाती है।
  4. तबादले के समय सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में सुविधा रहती है।

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प्रश्न 8.
मुख्य प्रकार के फर्नीचर तथा उनके उदाहरण बताओ।
उत्तर-

  1. लकड़ी का फर्नीचर-कुर्सी, मेज़, पलंग, चौकी,तख्त, अलमारी आदि।
  2. बेंत का फर्नीचर-कुर्सी, मेज़, सोफा, मूढ़े आदि।
  3. गद्देदार फर्नीचर-सोफा, गद्देदार, कुर्सियाँ आदि।
  4. लोहे का फर्नीचर-फोल्डिंग टेबल, कुर्सियाँ, अलमारियाँ, रैकं आदि।
  5. अलंकृत फर्नीचर- नक्काशीदार फर्नीचर।
  6. काम चलाऊ फर्नीचर-बॉक्स पर गद्दी, बिछाकर बेंच के रूप में, लकड़ी की पेटियों की बुक-रैक, क्रॉकरी तथा बर्तन रखने की अलमारी आदि।

प्रश्न 9.
घर में कौन-कौन से फर्नीचर प्रयोग में लाये जाते हैं ?
उत्तर-
घर में निम्नलिखित फर्नीचर प्रयोग में लाए जाते हैं-

  1. सोफासेट-लकड़ी का, स्प्रिंग वाला गद्देदार, फोम रबड़ का, बेंत का या फोल्डिंग।
  2. कुर्सियाँ-साधारण, ड्राइंग रूम के लिए, भोजन कक्ष के लिए, अध्ययन कक्ष के लिए फोल्डिंग कुर्सी तथा आराम कुर्सियाँ।
  3. मेज़-बैठक के लिए केन्द्रीय मेज़, बगल वाली मेज़, कोने वाली मेज़ व कॉफी मेज़, खाने की मेज़ (डाइनिंग टेबल), श्रृंगार मेज़, पढ़ने की मेज़।
  4.  चारपाई तथा पलंग।
  5. तख्त और दीवान।
  6. अलमारियाँ-दीवार में बनी, लकड़ी की, स्टील की तथा रैक।
  7. शो केस।
  8. वॉल केबिनेट।

प्रश्न 10.
‘महँगा रोए एक बार सस्ता रोए बार-बार’ पर टिप्पणी दो।
उत्तर-
घर के उपयोग की कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिन्हें जीवन में प्रायः एक-दो बार ही खरीदा जाता है, जैसे-मकान, टी० वी०, फ्रिज़, फर्नीचर आदि। ऐसी वस्तुएँ जब खरीदी जाती हैं तब उनके मूल्य की ओर इतना ध्यान न देकर उनकी मज़बूती, आरामदेहता तथा बनावट की ओर अधिक ध्यान दिया जाता है। कुछ लोग नासमझी में सस्ती वस्तुएँ खरीद तो लेते हैं, परन्तु उनके खराब होने या टूट जाने पर उन्हें दूसरी बार या कई बार खरीदना पड़ता है। तात्पर्य यह है कि एक ही बार सोच-समझकर अधिक पैसे खर्च कर अच्छी चीज़ खरीदना या कम पैसे खर्च कर सस्ती चीज़ कई बार खरीदना, इन दोनों बातों के आधार पर ही यह कथन है कि ‘महँगा रोए एक बार’ ‘सस्ता रोए बार-बार’।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 5 कार्यात्मक फर्नीचर

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभिन्न प्रकार के फर्नीचर का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
फर्नीचर विभिन्न प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं-
1. लकड़ी का फर्नीचर-लकड़ी का फर्नीचर हल्का होता है। यह धूप तथा पानी से खराब हो जाता है। घरों में काम आने वाला अधिकतर फर्नीचर, जैसे-मेज़, कुर्सी, पलंग, अलमारी, चौकी आदि प्रायः लकड़ी का ही बना होता है। इस प्रकार के फर्नीचर देवदार, शीशम, आम, सागवान, अखरोट, चीड़, आबनूस आदि लकड़ी के बनते हैं। फर्नीचर की कीमत लकड़ी पर निर्भर करती है। सागवान तथा शीशम का फर्नीचर सुदृढ़, आकर्षक, भारी एवं मज़बूत होता है। आजकल पर्ती लकड़ी (प्लाइवुड) का फर्नीचर भी बनाया जाता है।

2. बेंत का फर्नीचर-बेंत का फर्नीचर विभिन्न रंगों का तथा हल्का होता है। बेंत का फर्नीचर मज़बूत नहीं होता। यह देखी में सुन्दर लगता है। बच्चों के कमरों में इस प्रकार का फर्नीचर उपयोगी होता है। बेंत का फर्नीचर बगीचे, बरामदे तथा आँगन के लिए भी उपयोगी होता है। लकड़ी की कुर्सी में भी बेंत का जाल बुना जा सकता है। मोटी बेंत द्वारा कुर्सी, मेज़, सोफा, मूढ़े आदि बनाये जाते हैं।

3. गद्देदार फर्नीचर-गद्देदार फर्नीचर, जैसे-सोफासेट, गद्देदार कुर्सियाँ, तिपाई आदि लकड़ी या धातु के ढाँचे में जूट, नारियल के रेशे, रूई तथा भूसा आदि भरकर तथा स्प्रिंग डालकर बनाए जाते हैं। इन्हें ऊपर से चमड़े, रेक्सीन या प्लास्टिक से ढका जाता है। गद्दों में फोम, रबर, डनलप का प्रयोग भी किया जाता है। ये टिकाऊ तथा आरामदायक होता है।

4. स्टील या लोहे का फर्नीचर-स्टील या लोहे का फर्नीचर प्रायः लोहे की चादरों तथा खोखले पाइप से बनाया जाता है। लोहे का फर्नीचर हल्का तथा मज़बूत होता है। इस पर आसानी से रंग चढ़ाया जा सकता है। इसमें सीलन तथा कीड़े-मकोड़े नहीं घुस सकते। इससे बनी कुर्सियों में गद्दों का तथा गद्दों पर रेक्सीन व चमड़े का कवर लगाया जाता है। इसके अन्तर्गत मुड़ने वाला (फोल्डिंग) फर्नीचर भी आता है। सुरक्षा की दृष्टि से मूल्यवान वस्तुओं को रखने के लिए स्टील की पेटियाँ तथा अलमारियाँ काम में लाई जाती हैं।

5. बाँस का फर्नीचर-बाँस से सोफासेट, गोल एवं चौकोर कुर्सियाँ, मेज़, मूढ़े आदि बनाए जाते हैं। ये अधिक सस्ते होते हैं तथा इन पर पॉलिश की जा सकती है। ये अधिक हल्के होते हैं।

6. एल्यूमीनियम का फर्नीचर-आजकल एल्यूमीनियम की बनी नलियों के फ्रेम वाले फर्नीचर प्रचलित हो गए हैं। कुर्सियों, स्टूलों, मेज़ों और पलंगों के फ्रेम एल्यूमीनियम के बनने लगे हैं। ये सस्ते और हल्के होते हैं। इन पर नायलॉन की तारों और निवाड़ की बुनाई होती है।

7. कामचलाऊ फर्नीचर-धन की कमी के कारण उपलब्ध सामग्री को फर्नीचर के रूप में प्रयोग किया जा सकता है, जैसे सामान की पेटी पर गद्दी तथा चादर बिछाकर बेंच का काम लिया जा सकता है। कम दामों में लकड़ी की पेटियाँ खरीदकर उनसे बुक-रैक, क्रॉकरी तथा बर्तन रखने की अलमारी बनायी जा सकती है।

8. अलंकृत फर्नीचर-कुछ फर्नीचर नक्काशीदार खुदाई किए हुए भी बनाया जाता है। इस प्रकार के फर्नीचर पर धूल-मिट्टी की पर्ते जम जाती है। इस फर्नीचर की आसानी से सही सफ़ाई नहीं हो पाती। सफ़ाई न होने से यह अनाकर्षक दिखायी देने लगता है।

9. आधुनिक स्थानबचाऊ बहुउद्देशीय फर्नीचर-आज बड़े-बड़े शहरों जैसे मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली आदि में स्थान की कमी के कारण आधुनिक स्थानबचाऊ फर्नीचर का उपयोग किया जाता है। स्थानबचाऊ बहुउद्देशीय फर्नीचर फोल्डिंग होता है, जैसे सोफाकम-बैड जिसे दिन में सोफे के रूप में तथा रात्रि में उसे खोलकर बिस्तर के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। सिलाई मशीनें भी इस तरह की होती हैं जिसमें आवश्यकतानुसार पहिया लगाकर चौकोर मेज़ के रूप में प्रयोग किया जाता है। आजकल विभिन्न प्रकार के फोल्डिंग, मेज़, कुर्सी, पलंग बनाये जाते हैं जो बन्द करके रखे जा सकते हैं।

प्रश्न 2.
आप घर में अलग-अलग प्रकार के फर्नीचर की देखभाल कैसे करेंगे ?
उत्तर-
स्वयं करें।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 5 कार्यात्मक फर्नीचर

कार्यात्मक फर्नीचर PSEB 8th Class Home Science Notes

  • फर्नीचर दो प्रकार के होते हैं-कार्यात्मक और सजावट वाले।
  • कार्यात्मक फर्नीचर वह होता है जिसका अलग-अलग काम हो।
  • सजावटी फर्नीचर केवल सजावट के लिए होता है।
  • फर्नीचर खरीदते समय डिज़ाइन का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है।
  • सबसे अच्छा फर्नीचर लकड़ी का होता है।
  • फर्नीचर के जोड़ मज़बूत होने चाहिएँ।
  • फर्नीचर आरामदेह होना चाहिए।
  • लकड़ी के फर्नीचर को प्रतिदिन बड़े ध्यान से साफ़ करना चाहिए।
  • लकड़ी के फर्नीचर पर कोई चीज़ गिर जाए तो उसको वहीं सूखने नहीं देना चाहिए। उसको उसी समय साफ़ कर देना चाहिए।
  • चिकने और चिपकने वाले दागों के लिए गुनगुने पानी का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • पेंट या रोगन के दाग के लिए मैथिलेटिड स्पिरिट इस्तेमाल में लानी चाहिए और फर्नीचर पर पॉलिश करनी चाहिए।
  • साल में एक दो बार फर्नीचर को अच्छी तरह साफ़ करके पॉलिश करना चाहिए।
  • चाय, कॉफी, कलों के रस के दागों के लिए पानी में थोड़ा-सा नरम साबुन घोलकर कपड़े के साथ साफ़ करना चाहिए।
  • गद्देदार फर्नीचर को आवश्यकतानुसार ड्राइक्लीन करवाना चाहिए।
  •  बेंत वाले फर्नीचर को नमक वाले पानी से साफ़ करना चाहिए।