PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 29 संघीय व्यवस्थापिका–संसद्

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 29 संघीय व्यवस्थापिका–संसद् Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 29 संघीय व्यवस्थापिका–संसद्

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
भारत में राज्यसभा की रचना, कार्यों तथा शक्तियों का वर्णन करो।
(Discuss the composition, functions and powers of Rajya Sabha in India.)
उत्तर-
भारत में संघात्मक शासन प्रणाली को अपनाया गया है। संघात्मक शासन प्रणाली में विधानमण्डल के दो सदन होते हैं। भारतीय संसद् के भी दो सदन हैं-लोकसभा तथा राज्यसभा। लोकसभा संसद् का निम्न सदन है और यह समस्त भारत का प्रतिनिधित्व करता है। राज्यसभा संसद् का द्वितीय सदन है और यह राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है।

रचना (Composition)—संविधान द्वारा राज्यसभा के सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या 250 हो सकती है, जिनमें से 238 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले होंगे, 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जा सकते हैं जिन्हें समाज सेवा, कला तथा विज्ञान, शिक्षा आदि के क्षेत्र में विशेष ख्याति प्राप्त हो चुकी है। राज्यसभा की रचना में संघ की इकाइयों को समान प्रतिनिधित्व देने का वह सिद्धान्त जो अमेरिका की सीनेट की रचना में अपनाया गया है, भारत में नहीं अपनाया गया। हमारे देश में विभिन्न राज्यों की जनसंख्या के आधार पर उनके द्वारा भेजे जाने वाले सदस्यों की संख्या संविधान द्वारा निश्चित की गई है। उदाहरणस्वरूप जहां पंजाब से 7 तथा हरियाणा से 5 सदस्य निर्वाचित होते हैं वहां उत्तर प्रदेश 31 प्रतिनिधि भेजता है।

इस समय राज्यसभा में कुल सदस्य 245 हैं जिनमें से 233 राज्यों तथा केन्द्र प्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं और शेष 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए गए हैं।
राज्यसभा के सदस्यों की योग्यताएं (Qualifications of the Members of Rajya Sabha)-राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित हैं-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह तीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह संसद् द्वारा निश्चित अन्य योग्यताएं रखता हो।
  4. वह पागल न हो, दिवालिया न हो।
  5. भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो।
  6. वह उस राज्य का रहने वाला हो जहां से वह निर्वाचित होना चाहता है।
  7. संसद् के किसी कानून या न्यायपालिका द्वारा राज्यसभा का सदस्य बनने के अयोग्य घोषित न किया गया हो। यदि चुने जाने के बाद भी उसमें कोई ऐसी अयोग्यता उत्पन्न हो जाए तो भी उसे अपना पद त्यागना पड़ेगा।

चुनाव (Election)—प्रत्येक राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य अपने राज्य के लिए नियत सदस्य चुनते हैं। यह चुनाव आनुपातिक प्रणाली के अनुसार एकल हस्तान्तरण मतदान द्वारा किया जाता है। संघीय क्षेत्र के प्रतिनिधियों का चुनाव संसद् द्वारा निश्चित तरीके से होता है।

अवधि (Term)-अमेरिकन सीनेट की तरह राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं और इसके 1/3 सदस्य प्रति दो वर्ष के पश्चात् अवकाश ग्रहण करते हैं। इस प्रकार दो वर्ष के पश्चात् राज्यसभा से 1/3 सदस्यों का चुनाव होता है। रिटायर होने वाले सदस्य दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। राष्ट्रपति इस सदन को भंग नहीं कर सकता।

अधिवेशन (Sessions)—राज्यसभा की बैठकें राष्ट्रपति द्वारा बुलाई जाती हैं। एक वर्ष में राज्यसभा के कम-सेकम दो अधिवेशन अवश्य होते हैं। संविधान में स्पष्ट लिखा हुआ है कि पहले अधिवेशन की अन्तिम तिथि तथा दूसरे अधिवेशन की पहली तिथि में 6 मास से अधिक समय का अन्तर नहीं होना चाहिए। इसके विशेष अधिवेशन राष्ट्रपति जब चाहे बुला सकता है।
राज्यसभा की गणपूर्ति (Quorum of Rajya Sabha) संविधान में राज्य सभा की गणपूर्ति कुल सदस्यों का 1/10 भाग था अर्थात् जब तक 1/10 सदस्य उपस्थित नहीं होते राज्यसभा अपना कार्य आरम्भ नहीं कर सकती थी। परन्तु 42वें संशोधन द्वारा राज्यसभा को अपनी गणपूर्ति संख्या स्वयं निश्चित करने का अधिकार दे दिया गया है।

राज्यसभा का अध्यक्ष (Chairman of the Rajya Sabha)-अमेरिका की तरह भारत का उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष (Ex-officio chairman) होता है। वर्तमान समय में उप-राष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू राज्यसभा के सभापति हैं। राज्य सभा अपने सदस्यों में से किसी एक को 6 वर्ष के लिए उपसभापति भी निर्वाचत करती है। 9 अगस्त, 2018 को राष्ट्रपति जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीद्वार श्री हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा के उपसभापति चुने गए।

सभापति राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है। वह सदन में अनुशासन रखता है तथा राज्यसभा के कार्यों को नियमानुसार चलाता है। सभापति साधारणतः वोट नहीं डालता परन्तु जब किसी विषय पर दोनों पक्षों के समान वोट हों तो वह निर्णायक मत का प्रयोग करता है। सभापति की अनुपस्थिति में उप-सभापति राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है और अध्यक्ष के कर्तव्यों का पालना करता है। सभापति के वेतन तथा भत्ते संसद् द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।

राज्यसभा के कार्य तथा शक्तियां (Powers and Functions of the Rajya Sabha)-राज्यसभा को कई प्रकार की शक्तियां प्राप्त हैं जो निम्नलिखित हैं-

1. विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)-धन विधेयकों को छोड़ कर कोई भी साधारण बिल राज्यसभा में पहले पेश हो सकता है। कोई भी बिल उस समय तक संसद् द्वारा पास नहीं समझा जा सकता और उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए नहीं भेजा जा सकता जब तक कि वह दोनों सदनों द्वारा पास न हो जाए। यदि किसी बिल पर दोनों में मतभेद पैदा हो जाए तो राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाने का अधिकार रखता है और उस बिल को उसके सामने रखा जाता है। संयुक्त बैठक में बिल पर हुआ निर्णय दोनों सदनों का सामूहिक निर्णय समझा जाता है। दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में लोकसभा का अध्यक्ष ही सभापति का आसन ग्रहण करता है।

2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-राज्यसभा की वित्तीय शक्तियां लोकसभा की अपेक्षा बहुत कम हैं। धन बिल इसमें पेश नहीं हो सकता। धन बिल या बजट लोकसभा में पास होने के बाद ही राज्यसभा के पास आते हैं। राज्यसभा धन बिल को 14 दिन तक पास होने से रोक सकती है।

भारतीय राज्यसभा चाहे धन बिल को रद्द कर दे या उसमें परिवर्तन कर दे या 14 दिन तक उस पर कोई कार्यवाही न करे, इन सभी दशाओं में वह बिल राज्य सभा के पास समझा जाएगा, जिस रूप में लोकसभा ने उसे पास किया था
और राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाएगा। लोकसभा की इच्छा है कि वह धन बिल पर राज्यसभा की सिफ़ारिश को माने या न माने।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive)-राज्यसभा की कार्यकारी शक्तियां बहुत सीमित हैं। राज्यसभा के सदस्य मन्त्रिमण्डल में लिए जा सकते हैं। राज्यसभा के सदस्यों को मन्त्रियों से प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार है और प्रश्नों द्वारा वे प्रशासन के कार्यों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। बजट पर विचार करते समय तथा काम रोको प्रस्ताव पेश करके भी राज्यसभा के सदस्य शासन की कड़ी आलोचना कर सकते हैं तथा मन्त्रिमण्डल पर प्रभाव डाल सकते हैं। परन्तु राज्यसभा अविश्वास प्रस्ताव द्वारा मन्त्रियों को नहीं हटा सकती।

4. न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers)-राज्यसभा को कुछ न्यायिक शक्तियां भी प्राप्त हैं-

  • वह लोकसभा के साथ मिलकर राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा अपदस्थ कर सकती है।
  • उप-राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग आरम्भ करने का अधिकार राज्यसभा को ही है।
  • राज्यसभा लोकसभा के साथ मिलकर सर्वोच्च न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाए जाने का प्रस्ताव पास कर सकती है।
  • राज्यसभा लोकसभा के साथ मिलकर चुनाव आयोग, महान्यायवादी (Attorney General) तथा नियन्त्रण एवं महालेखा निरीक्षक के विरुद्ध दोषारोपण के प्रस्ताव पास कर सकती है। ऐसा प्रस्ताव पास होने पर राष्ट्रपति सम्बन्धित अधिकारी को हटा सकता है।
  • राज्यसभा अपने सदस्यों के व्यवहार तथा गतिविधियों की जांच-पड़ताल करने के लिए समिति नियुक्त कर सकती है और उसके विरुद्ध उचित कार्यवाही कर सकती है।
  • यदि कोई सदस्य, अन्य व्यक्ति अथवा संस्था राज्यसभा के विशेषाधिकार का उल्लंघन करती है तो राज्यसभा उसको दण्ड दे सकती है।
  • राज्यसभा लोकसभा के साथ मिलकर विशेष न्यायालयों (Special Courts) की स्थापना कर सकती है।

5. संवैधानिक शक्तियां (Constitutional Powers)—संवैधानिक मामलों में राज्य सभा को लोक सभा के समान अधिकार प्राप्त हैं। संविधान में संशोधन करने वाला बिल संसद् के किसी सदन में भी पेश हो सकता है अर्थात् संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव राज्यसभा में भी पेश किया जा सकता है। 59वां संशोधन बिल राज्यसभा में पेश किया गया था। संशोधन प्रस्ताव उस समय तक पास नहीं समझा जाता जब तक कि वह दोनों सदनों द्वारा बहुमत से पास न हो जाए।

6. संकटकालीन शक्तियां (Emergency Powers)-राज्यसभा लोकसभा के साथ मिल कर राष्ट्रपति द्वारा घोषित संकटकालीन उद्घोषणा को एक महीने से अधिक लागू रहने अथवा रद्द करने का प्रस्ताव करती है। यदि लोकसभा भंग हो तो केवल राज्यसभा का अनुमोदन ही आवश्यक है।

7. निर्वाचन सम्बन्धी शक्तियां (Electoral Powers)-राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। उप-राष्ट्रपति के चुनाव में राज्यसभा के सभी सदस्य भाग लेते हैं। राज्यसभा अपना एक उप-सभापति चुनती है जिसे डिप्टी चेयरमैन कहते हैं।

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8. राज्यसभा की विशिष्ट शक्तियां (Special Powers of the Rajya Sabha)-राज्यसभा को कुछ विशिष्ट शक्तियां भी प्राप्त हैं। ये शक्तियां निम्नलिखित हैं

  • राज्यसभा राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित करके संसद् को इस पर कानून बनाने का अधिकार दे सकती है।
  • 42वें संशोधन में यह व्यवस्था की गई है कि राज्यसभा अनुच्छेद 249 के अन्तर्गत प्रस्ताव पास करके अखिल भारतीय न्यायिक सेवाएं (All India Judicial Services) स्थापित करने के सम्बन्ध में संसद् को अधिकार दे सकती है।
  • राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके नई अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services) को स्थापित करने का अधिकार केन्द्रीय सरकार को दे सकती है।

9. अन्य कार्य (Other Functions)

  • जब राष्ट्रपति अपना आज्ञानुसार कोई भी मौलिक अधिकार छीनता है तो वह आज्ञा संसद् के दोनों सदनों में रखना ज़रूरी है।
  • जिन आयोगों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, उन सभी की रिपोर्ट दोनों सदनों के आगे रखनी आवश्यक है। राज्यसभा को भी लोकसभा की तरह उन पर विचार करने का अधिकार है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राज्यसभा की शक्तियों एवं कार्यों से स्पष्ट है कि राज्यसभा लोकसभा के मुकाबले में शक्तिहीन सदन है, परन्तु इस सदन के पास इतनी शक्तियां हैं कि यह आदर्श द्वितीय सदन बन सकता है।

प्रश्न 2.
राज्यसभा की स्थिति और उपयोगिता की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए। (Critically discuss the position and utility of the Rajya Sabha.)
उत्तर-
राज्यसभा की स्थिति लोकसभा के मुकाबले में बहुत महत्त्वहीन है। कानून निर्माण तथा वित्तीय मामलों में इसे कोई विशेष शक्ति प्राप्त नहीं और सभी साधारण तथा धन बिल लोकसभा की इच्छानुसार पास होते हैं। यह साधारण बिल को अधिक-से-अधिक 6 महीने तक पास होने से रोक सकती है तथा धन बिल को केवल 14 दिन के लिए रोक सकती है। मन्त्रिमण्डल पर इसका कोई नियन्त्रण नहीं है। राज्यसभा की उपयोगिता के बारे में डॉ० अम्बेदकर ने भी सन्देह प्रकट किया था। राज्यसभा की आलोचना मुख्यतः निम्नलिखित आधारों पर की जाती है-

  • असंघीय सिद्धान्त पर आधारित (Based on Non-federal Principle)-राज्यसभा का संगठन संघीय सिद्धान्त पर आधारित नहीं है। प्रान्तों को इसमें समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। प्रतिनिधि जनसंख्या के आधार पर भेजे जाते हैं।
  • दलगत प्रतिनिधित्व (Party-Representations)-राज्यसभा के सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व न करके दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • मनोनीत सदस्य (Nominated Members)-राज्यसभा राज्यों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती क्योंकि 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।
  • चुनाव प्रणाली दोषपूर्ण (Defective Election System)-राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष ढंग से चुने जाते हैं। अप्रत्यक्ष प्रणाली में भ्रष्टाचार का भय अधिक रहता है।
  • शक्तिहीन सदन (Powerless House)-राज्यसभा की शक्तियां लोकसभा से बहुत कम हैं। धन बिल को राज्यसभा केवल 14 दिन तक रोक सकती है और इसका कार्यपालिका पर कोई नियन्त्रण नहीं है।
  • बिलों को दोहराना लाभदायक नहीं है (Revision of Bills not Useful)-राज्यसभा का एक मुख्य कार्य बिलों को दोहराना है, ताकि बिल को जल्दी से पास किए जाने के कारण जो त्रुटियां रह गई हैं, उन्हें दूर किया जा सके। राज्यसभा को अपने इस कार्य में कोई विशेष सफलता नहीं मिलती है क्योंकि साधारणतः एक ही दल का दोनों सदनों में बहुमत होने के कारण राज्यसभा आंखें बन्द करके बिलों को पास कर देती है।
  • राज्यसभा में प्रादेशिकता की भावना का ज़ोर अधिक रहता है। 8. राज्यसभा के सदस्य इनकी बैठकों में अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाते तथा अधिकांश सदस्य अनुपस्थित रहते हैं।
  • राज्यसभा के अधिकांश सदस्य इतने अधिक पूरक प्रश्न (Supplementary Questions) पूछते हैं, जिनसे न केवल समय बर्बाद होता है बल्कि कभी-कभी सदस्यों और मन्त्रियों के बीच छोटे-मोटे झगड़े भी उत्पन्न हो जाते हैं।
  • राज्यसभा के बहुत-से सदस्य वे होते हैं जो लोकसभा का चुनाव हार चुके होते हैं। इस प्रकार राज्यसभा संसद् में घुसने के लिए पिछले दरवाज़े का काम करती है।

राज्यसभा की भूमिका (Role of Rajya Sabha)
अथवा
राज्यसभा की उपयोगिता (Utility of Rajya Sabha)

इसमें कोई सन्देह नहीं कि राज्यसभा निचले सदन की भान्ति एक शक्तिशाली संस्था नहीं है, परन्तु राज्यसभा को हम एक व्यर्थ संस्था नहीं कह सकते बल्कि राज्यसभा एक बहुत उपयोगी संस्था है।

मौरिस जोन्स (Morris Jones) के अनुसार, “राज्यसभा के तीन भारी गुण हैं। यह अतिरिक्त राजनीतिक पद प्रदान करती है जिसके लिए मांग है। यह अतिरिक्त वाद-विवाद के लिए अवसर प्रदान करती है जिसके लिए कभी-कभी आवश्यकता होती है और यह वैधानिक समय सूची की समस्याओं को हल करने में सहायता देती है।”

राज्यसभा संघात्मक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो इस प्रकार है-

  • योग्य व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व (Representative of Able Persons)-इसमें देश के अनुभवी सज्जन राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। राज्यसभा के 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। राष्ट्रपति उन्हीं व्यक्तियों की नियुक्ति करता है जिनकी विज्ञान, कला, साहित्य आदि में प्रसिद्धि होती है।
  • सरकारी कमजोरियों पर प्रकाश (Points out Shortcomings of the Govt.)-राज्यसभा के सदस्यों ने सार्वजनिक महत्त्व के प्रश्नों पर आधे घण्टे की बहस के दौरान सरकार की कमजोरियों पर प्रकाश डाला और सरकार को महत्त्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए हैं।
  • सभी पहलुओं पर वाद-विवाद (Debates on AII Aspects)-राज्यसभा में प्रस्तुत प्रस्तावों के माध्यम से देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के सम्बन्ध में वाद-विवाद होता रहता है। यद्यपि सरकार इन प्रस्तावों को प्रायः स्वीकार नहीं करती तथापि इसका सरकार पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है।
  • राज्यसभा अपने प्रस्ताव द्वारा राज्य सूची के किसी भी विषय को संसद् के अधिकार-क्षेत्र में ले जा सकती है।
  • केन्द्रीय सरकार राज्यसभा के परामर्श से किसी अखिल भारतीय सेवा की व्यवस्था कर सकती है।
  • संविधान में संशोधन करने वाला बिल राज्यसभा में प्रस्तुत हो सकता है और तब तक संशोधन नहीं हो सकता जब तक राज्यसभा भी पास न करे। 44वें संशोधन की पांच धाराओं को राज्यसभा ने रद्द कर दिया था।
  • राज्यसभा के सदस्य राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते है।
  • राज्यसभा लोकसभा के साथ मिल कर राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटा सकती है।
  • उप-राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग आरम्भ करने का अधिकार राज्यसभा को ही है।
  • राज्यसभा के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं और सरकार की आलोचना कर सकते हैं।
  • संकटकालीन घोषणा की स्वीकृति-जब राष्ट्रपति लोकसभा को भंग कर देता है तो राज्यसभा उस समय भी बनी रहती है तथा राष्ट्रपति को अपनी संकटकालीन घोषणा की स्वीकृति उससे लेनी पड़ती है।
  • बिलों का पुनर्निरीक्षण-राज्यसभा लोकसभा में शीघ्रतापूर्वक पास किए गए बिलों पर उचित ढंग से विचार करने के पश्चात् उसमें संशोधन के लिए सुझाव भी देती है। 1979 में राज्यसभा ने लोकसभा द्वारा विशेष न्यायालय विधेयक में महत्त्वपूर्ण संशोधन किए जिसे लोकसभा ने तुरन्त स्वीकार कर लिया।
  • विवादहीन बिलों का पेश होना-महत्त्वपूर्ण बिल प्रायः लोकसभा में प्रस्तुत किए जाते हैं, परन्तु अवित्तीय विवादहीन बिल राज्यसभा में प्रस्तुत करके लोकसभा के समय की बचत की जाती है क्योंकि राज्यसभा विवादहीन और विरोधहीन बिलों पर खूब सोच-विचार करके लोकसभा के पास भेजती है। लोकसभा ऐसे बिलों पर कम विवाद करती है और शीघ्रता से पास कर देती है। इस प्रकार लोकसभा का समय बच जाता है और इस समय का प्रयोग इसके महत्त्वपूर्ण बिलों पर किया जाता है।
  • राज्यसभा लोकसभा के साथ मिल कर मुख्य चुनाव आयुक्त, महान्यायवादी तथा नियन्त्रक एवं महालेखा निरीक्षक के विरुद्ध दोषारोपण के प्रस्ताव पास कर सकती है।
  • वाद-विवाद का उच्च स्तर-राज्यसभा में विचार का स्तर लोकसभा की अपेक्षा उच्च रहता है, वहां प्रत्येक बिल पर शान्तिपूर्वक विचार होता है। एक तो सदस्यों की संख्या लोकसभा की तुलना में कम है, दूसरे इसके मैम्बर अधिक अनुभवी और विद्वान् होते हैं।
  • लोकतन्त्रीय परम्परा का प्रतीक-राज्यसभा लोकतन्त्रीय परम्पराओं के अनुकूल है। संसार के कुछ देशों को छोड़ कर बाकी सब देशों में संसद् के दो सदन हैं।
  • भारतीय संवैधानिक परम्परा के अनुकूल-भारत में ब्रिटिश शासन काल से ही केन्द्रीय विधान मण्डल के दो सदन चले आ रहे हैं। अत: संविधान निर्माताओं ने इसी परम्परा का पालन किया।

यह संविधान का केवल एक शृंगारात्मक अंग ही नहीं, यह सदन कनाडा की सीनेट की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली तथा उपयोगी है। यह अपने विवादों तथा सरकार की आलोचना द्वारा जनता पर अधिक प्रभाव डालता है। इसमें बहुतसे सुधारवादी बिल पेश हुए हैं और जिनसे राष्ट्र को बहुत-सा लाभ हुआ है। 1952 से 1956 के बीच राज्यसभा में 101 विधेयक प्रस्तुत किए गए थे। राज्यसभा के उप-सभापति श्री रामनिवास मिर्धा ने राज्यसभा की रजत जयन्ती के अपने स्वागत भाषण में राज्यसभा की उपलब्धियों की चर्चा करते हुए कहा था कि इन 25 वर्षों में राज्यसभा में विधान आरम्भ करने वाले सदन के रूप में 350 सरकारी विधेयक पुनः स्थापित किए गए जिनमें कुछ सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और वैधानिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थे। इसमें हिन्दू कानून में दूरव्यापी परिवर्तन करने वाले विधेयक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे।

प्रश्न 3.
लोकसभा की रचना और शक्तियों का वर्णन करो।
[Describe the composition and powers of the Lok Sabha (House of People) in India.]
उत्तर-
लोकसभा भारतीय संसद् का निचला सदन है, परन्तु इसकी स्थिति ऊपरी सदन (राज्यसभा) से अधिक शक्तिशाली है। यह जनता का प्रतिनिधित्व करती है क्योंकि इसमें जनता के प्रत्यक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं और यही इसके अधिक शक्तिशाली होने का कारण है।

रचना (Composition)—प्रारम्भ में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 निश्चित की गई थी। 31वें संशोधन के अन्तर्गत इसके निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 545 निश्चित की गई। परन्तु अब ‘गोवा, दमन और दियू पुनर्गठन अधिनियम 1987’ द्वारा लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 निश्चित की गई है। इस प्रकार लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या 552 हो सकती है। 552 सदस्यों का ब्यौरा इस प्रकार है-

(क) 530 सदस्य राज्यों में से चुने हुए, (ख) 20 सदस्य संघीय क्षेत्रों में से चुने हुए और (ग) 2 ऐंग्लो-इण्डियन जाति (Anglo-Indian Community) के सदस्य जिनको राष्ट्रपति मनोनीत करता है, यदि उसे विश्वास हो जाए कि इस जाति को लोकसभा में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं। आजकल लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 545 है। इसमें 543 निर्वाचित सदस्य हैं और 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा एंग्लो-इंडियन नियुक्त किए हुए हैं।

चुनाव की विधि (Method of Election)-लोकसभा के चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रणाली के आधार पर होते हैं। सभी नागरिकों को जिनकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक हो, चुनाव में वोट डालने का अधिकार है। चुनाव गुप्त मतदान प्रणाली के आधार पर होता है। 5 लाख से 772 लाख की जनसंख्या के आधार पर एक सदस्य चुना जाता है और समस्त देश को लगभग समान जनसंख्या वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बांट दिया जाता है। कुछ स्थान अनुसूचित जातियों तथा कबीलों को प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षित किए गए हैं। 2014 के लोकसभा के चुनाव में मतदाताओं की कुल संख्या 81 करोड़ 40 लाख थी।

अवधि (Term) लोकसभा के सदस्य पांच वर्ष के लिए चुने जाते हैं। संकट के समय इसकी अवधि को बढ़ाया जा सकता है, परन्तु एक समय में एक वर्ष से अधिक और संकटकालीन उद्घोषणा के समाप्त होने से छ: महीने से अधिक इसे नहीं बढ़ाया जा सकता। राष्ट्रपति पांच वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले जब चाहे लोकसभा को भंग करके दोबारा चुनाव करवा सकता है। ऐसा कदम उसी समय उठाया जाएगा जब प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति को इस प्रकार की सलाह दे। 6 फरवरी, 2004 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर राष्ट्रपति ए० पी० जे० अब्दुल कलाम ने 13वीं लोकसभा को भंग किया।

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योग्यताएं (Qualifications)-लोकसभा का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं होनी आवश्यक हैं-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
  3. वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अन्तर्गत किसी लाभदायक पद पर आसीन व हो।
  4. वह संसद् द्वारा निश्चित की गई अन्य योग्यताएं रखता हो।
  5. वह पागल न हो, दिवालिया न हो।
  6. किसी न्यायालय द्वारा इस पद के लिए अयोग्य न घोषित किया गया हो। यदि चुने जाने के बाद भी किसी सदस्य में कोई अयोग्यता उत्पन्न हो जाए तो उसे अपना पद त्यागना पड़ेगा।
  7. उसे किसी गम्भीर अपराध में दण्ड न मिल चुका हो।
  8. उसका नाम वोटरों की सूची में अंकित हो।
  9. नवम्बर, 1976 को संसद् में छुआछूत के विरुद्ध एक कानून पास किया गया। इस कानून के अनुसार यह व्यवस्था की गई है कि यदि किसी व्यक्ति को इस कानून के अन्तर्गत दण्ड मिला है तो वह लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ सकता।
  10. लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय उम्मीदवार के लिए यह आवश्यक है कि उसका नाम दस मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित किया जाए।

गणपूर्ति (Ouorum)-लोकसभा की कार्यवाही आरम्भ होने के लिए उसके कुल सदस्यों की संख्या का 1/10 भाग गणपूर्ति के लिए निश्चित किया गया है, परन्तु 42वें संशोधन द्वारा गणपूर्ति निश्चित करने का अधिकार लोकसभा को दिया गया है।

अधिवेशन (Session)-राष्ट्रपति जब चाहे लोकसभा का अधिवेशन बुला सकता है, परन्तु एक वर्ष में दो अधिवेशन अवश्य बुलाए जाने चाहिए और राष्ट्रपति का यह विशेष उत्तरदायित्व है कि पहले अधिवेशन के आखिरी दिन और दूसरे अधिवेशन के पहले दिन के बीच छः मास से अधिक समय नहीं गुज़रना चाहिए। इसलिए अधिवेशन बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है।

अध्यक्ष (Speaker)—लोकसभा का एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होता है जिस का काम लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करना, अनुशासन बनाए रखना तथा सदन की कार्यवाही को ठीक प्रकार से चलाना है। अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष लोकसभा के सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुने जाते हैं। नई लोकसभा अपना नया अध्यक्ष चुनती है। 6 जून, 2014 को भारतीय जनता पार्टी की नेता श्रीमती सुमित्रा महाजन को सर्वसम्मति से लोक सभा का अध्यक्ष चुना गया। लोकसभा अपने अध्यक्ष को जब चाहे प्रस्ताव पास करके अपने पद से हटा सकती है, यदि वे अपना काम ठीक प्रकार से न करे। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, अध्यक्ष के पद पर काम करता है।

विरोधी दल के नेता को सरकारी मान्यता (Official Recognition to the Leader of Opposition)मार्च 1977 में लोकसभा के चुनाव में जनता पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ। जनता सरकार ने लोकतन्त्र को दृढ़ बनाने के लिए लोकसभा के विरोधी दल के नेता को कैबिनेट स्तर के मन्त्री के समान मान्यता दी थी। विरोधी दल के नेता को वही वेतन, भत्ते और सुविधाएं प्राप्त होती हैं जो कैबिनेट स्तर के मन्त्री को मिलती हैं। नौवीं लोकसभा में राजीव गांधी विपक्ष के नेता थे। मई, 2009 में 15वीं लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गई थी, परन्तु दिसम्बर, 2009 में भारतीय जनता पार्टी ने श्री लालकृष्ण आडवाणी के स्थान पर श्रीमती सुषमा स्वराज को लोकसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया था। मई, 2014 में 16वीं लोकसभा में किसी भी दल को मान्यता प्राप्त विरोधी दल का दर्जा नहीं दिया गया।

लोकसभा की शक्तियां तथा कार्य (Powers and Functions of the Lok Sabha) लोकसभा को बहुतसी शक्तियां प्राप्त हैं जो कई प्रकार की हैं-

1. विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)-लोकसभा भारतीय संसद् का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। वास्तव में संसद् की विधायिनी शक्तियां लोकसभा ही प्रयोग करती है। इसकी इच्छा के विरुद्ध कोई कानून नहीं बन सकता । कोई भी बिल लोकसभा में पेश हो सकता है। यदि राज्यसभा लोकसभा द्वारा पास किए गए बिल पर छ: महीने तक कोई कार्यवाही न करे या उसे रद्द कर दे या उसमें ऐसे संशोधन प्रस्ताव पास करके भेज दे जो लोकसभा को स्वीकृत न हो तो राष्ट्रपति दोनों सदनों की एक संयुक्त बैठक बुला सकता है। संयुक्त अधिवेशन में प्रायः वही निर्णय होता है जो लोकसभा के सदस्य चाहते हैं क्योंकि लोकसभा के सदस्यों की संख्या राज्यसभा की सदस्य संख्या से दुगुनी से भी अधिक है।

2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers) राष्ट्र के धन पर संसद् का नियन्त्रण है, परन्तु यह नियन्त्रण लोकसभा ही प्रयोग करती है। बजट तथा धन विधेयक सर्वप्रथम लोकसभा में ही पेश हो सकते हैं। लोकसभा के पास होने के बाद बजट या धन बिल राज्यसभा के पास सुझाव के लिए जाते हैं। राज्यसभा उस पर विचार करती है। राज्यसभा यदि धन विधेयक पर 14 दिन तक कोई कार्यवाही न करे या उसे रद्द कर दे या उसमें ऐसे संशोधन प्रस्ताव पास करके भेज दे जो लोकसभा को स्वीकृत न हों तो इन सभी दशाओं में वह बिल दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पास समझा जाएगा जिस रूप में लोकसभा ने पहले पास किया था और राष्ट्रपति को स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि राष्ट्र के धन पर लोकसभा को अन्तिम निर्णय करने का अधिकार है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive)-मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। लोकसभा के सदस्य मन्त्रियों से उनके कार्यों के सम्बन्ध में प्रश्न पूछ सकते हैं तथा सम्बन्धित मन्त्री को उसका उत्तर देना पड़ता है। लोकसभा के सदस्य सरकार की नीतियों की आलोचना भी कर सकते हैं तथा मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव भी पास कर सकते हैं जिससे मन्त्रिपरिषद् को त्याग-पत्र देना पड़ता है। 10 जुलाई, 1979 को लोकसभा के विरोधी दल के नेता यशवंतराव चह्वाण ने प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होने से पूर्व ही प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई ने 15 जुलाई, 1979 को त्याग-पत्र दे दिया क्योंकि जनता पार्टी के कई सदस्यों ने जनता पार्टी को छोड़ दिया था। नवम्बर 1990 में प्रधानमन्त्री वी० पी० सिंह लोकसभा का विश्वास प्राप्त न कर सके जिस पर उन्हें त्याग-पत्र देना पड़ा। 17 अप्रैल, 1999 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में विश्वास मत का प्रस्ताव पास न होने पर त्याग-पत्र दिया था। विश्वास मत के प्रस्ताव के पक्ष में 269 और विपक्ष में 270 मत पड़े।

4. संवैधानिक शक्तियां (Constitutional Powers) लोकसभा को संविधान में संशोधन करने के लिए प्रस्ताव पास करने का अधिकार है, लोकसभा में संशोधन का प्रस्ताव आवश्यक बहुमत से पास होने के बाद राज्यसभा के पास जाता है। यदि राज्यसभा भी उसे आवश्यक बहुमत से पास कर दे, तभी संशोधन लागू हो सकता है।

5. न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers)-लोकसभा को कुछ न्यायिक शक्तियां भी प्राप्त हैं, जिनका प्रयोग वह राज्यसभा के साथ मिलकर ही कर सकती है

  • लोकसभा राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग में भाग लेती है।
  • उपराष्ट्रपति के विरुद्ध आरोप लगाने का अधिकार केवल राज्यसभा को ही है, परन्तु उसमें निर्णय देने का अधिकार लोकसभा को है।
  • लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के जजों को अपदस्थ किए जाने वाले प्रस्ताव पास कर सकती है।
  • लोकसभा के साथ मिल कर मुख्य चुनाव आयुक्त, महान्यायवादी (Attorney General) तथा नियन्त्रण एवं महालेखा निरीक्षक के विरुद्ध दोषारोपण के प्रस्ताव पास कर सकती है। ऐसा प्रस्ताव पास होने पर राष्ट्रपति सम्बन्धित अधिकारी को हटा सकता है।
  • यदि कोई सदस्य या व्यक्ति अथवा संस्था लोकसभा के विशेषाधिकार का उल्लंघन करती है तो लोकसभा इसको दण्ड दे सकती है।

6. चुनाव सम्बन्धी कार्य (Electoral Functions) लोकसभा स्पीकर तथा डिप्टी स्पीकर का चुनाव स्वयं करती है। लोकसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर उपराष्ट्रपति का चुनाव करती है।

7. जनता की शिकायतों को दूर करना (Redressal of Public Grievances)—लोकसभा के सदस्य जनता के प्रतिनिधि हैं, अतः इनका कर्तव्य है जनता की शिकायतों को सरकार तक पहुंचाना। लोकसभा के सदस्य इस कार्य को प्रश्नों द्वारा, स्थगन प्रस्ताव द्वारा तथा वाद-विवाद के अन्तर्गत शासक वर्ग की आलोचना के जरिए पूरा करते हैं।

8. लोकसभा की संकटकालीन शक्तियां (Emergency Powers of the Lok Sabha)-लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर राष्ट्रपति द्वारा जारी की गई संकटकालीन उद्घोषणा का समर्थन कर सकती है। 44वें संशोधन के अनुसार यदि लोकसभा संकटकाल की घोषणा के लागू रहने के विरुद्ध प्रस्ताव पास कर दे तो संकटकाल की घोषणा लागू नहीं रह सकती। लोकसभा के 10 प्रतिशत सदस्य अथवा अधिक सदस्य घोषणा के अस्वीकृत प्रस्ताव पर विचार करने के लिए लोकसभा की बैठक बुला सकते हैं।

9. विविध शक्तियां (Miscellaneous Powers) लोकसभा की अन्य शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  • लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्रों में परिवर्तन कर सकती है।
  • लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए कानून बनाती है।
  • राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए अध्यादेशों को लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर स्वीकृत या अस्वीकृत करती है।
  • लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर संघ में नए राज्यों को सम्मिलित करती है, राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं तथा नामों में परिवर्तन कर सकती है।
  • लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर दो या दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग या उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है।

लोकसभा की स्थिति (Position of the Lok Sabha)-लोकसभा भारतीय संसद् का निम्न सदन है जिसके लगभग सभी सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं। जनता का प्रतिनिधि सदन होने के कारण इसमें जनता का अधिक विश्वास है। यही कारण है कि लोकसभा संसद् का महत्त्वपूर्ण, प्रभावशाली, शक्तिशाली अंग है और संसद् की शक्तियों का वास्तविक प्रयोग करती है। इसे भारत की संसद् कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। लोकसभा की इच्छा के विरुद्ध कोई कानून नहीं बन सकता। इसकी तुलना में राज्यसभा एक अत्यन्त महत्त्वहीन सदन है। प्रधानमन्त्री भी लोकसभा के ही बहुमत दल का नेता होता है और लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। प्रो० एम० पी० शर्मा (M.P. Sharma) के अनुसार, “यदि संसद् देश का सर्वोच्च अंग है, तो लोकसभा संसद् का सर्वोच्च अंग है, वस्तुतः सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए लोकसभा ही संसद् है।”

प्रश्न 4.
भारतीय संसद् की रचना, उसकी शक्तियों तथा कार्यों का वर्णन करो।
(Describe the composition, powers and functions of the indian Parliament.)
अथवा
संसद् के कार्यों की विवेचना कीजिए।
(Discuss the functions of Parliament.)
उत्तर-
संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, “संघ के लिए एक संसद् होगी जो राष्ट्रपति और दोनों सदनोंराज्यसभा एवं लोकसभा से मिलकर बनेगी।”

लोकसभा (Lok Sabha) लोकसभा संसद् का निम्न सदन है और समस्त देश का प्रतिनिधित्व करता है। 1973 में 31वें संशोधन के अनुसार लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 547 निश्चित की गई। ‘गोवा, दमन और दियू पुनर्गठन अधिनियम 1987′ द्वारा लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 निश्चित की गई है। इस प्रकार लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या 552 हो सकती है। आजकल लोकसभा में 545 सदस्य हैं। इनमें 543 निर्वाचित हैं और 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा एंग्लो-इण्डियन नियुक्त किए गए हैं।

मनोनीत सदस्यों को छोड़कर शेष सभी सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। लोकसभा की अवधि 5 वर्ष है। इसकी अवधि को बढ़ाया भी जा सकता है और 5 वर्ष से पूर्व राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह पर इसको भंग भी कर सकता है। लोकसभा के सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष चुनते हैं।

राज्यसभा (Rajya Sabha)-राज्यसभा भारतीय संसद् का ऊपरि सदन है जो जनता का प्रतिनिधित्व न करके राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या 250 निश्चित की गई है जिसमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से जिन्हें विज्ञान, कला, साहित्य, समाज-सेवा आदि क्षेत्र में विशेष ख्याति प्राप्त हो चुकी हो, मनोनीत किया जाता है। शेष सदस्य राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। इस समय राज्यसभा के सदस्यों की कुल संख्या 245 है, जिसमें से 233 राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं और शेष 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए हैं।

राज्यसभा के सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष बाद रिटायर होते हैं। भारत का उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होता है। राज्यसभा के सदस्य अपने में से एक उपाध्यक्ष भी चुनते हैं जो अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसके कार्यों को सम्पन्न करता है।

संसद सदस्यों के वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances of the Members of the Parliament)संसद् सदस्यों को समय-समय पर संसद् द्वारा निर्धारित वेतन, भत्ते तथा दूसरी सुविधायें प्राप्त होती हैं।

संसद की शक्तियां तथा कार्य (Powers and Functions of the Parliament)-

भारतीय संसद् संघ की विधानपालिका है और संघ की सभी विधायिनी शक्तियां उसे प्राप्त हैं। विधायिनी शक्तियों के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की शक्तियां संसद् को दी गई हैं-

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 29 संघीय व्यवस्थापिका–संसद्

1. विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)-संसद् का मुख्य कार्य कानून-निर्माण करना है। संसद् की कानून बनाने की शक्तियां बड़ी व्यापक हैं। संघीय सूची में दिए गए सभी विषयों पर इसे कानून बनाने का अधिकार है। समवर्ती सूची पर संसद् और राज्यों की विधानपालिका दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार है परन्तु यदि किसी विषय पर संसद् और राज्य की विधानपालिका के कानून में पारस्परिक विरोध हो तो संसद् का कानून लागू होता है। कुछ परिस्थितियों में राज्य सूची के 66 विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार संसद् को प्राप्त है।

2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)—संसद् राष्ट्र के धन पर नियन्त्रण रखती है। वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले बजट संसद् में पेश किया जाता है। संसद् इस पर विचार करके अपनी स्वीकृति देती है। संसद् की स्वीकृति के बिना सरकार जनता पर कोई टैक्स नहीं लगा सकती और न ही धन खर्च कर सकती है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive) हमारे देश में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। राष्ट्रपति संवैधानिक अध्यक्ष होने के नाते संसद् के प्रति उत्तरदायी नहीं है। जबकि मन्त्रिमण्डल अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् के प्रति उत्तरदायी है। मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर रह सकता है जब तक उसे लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त रहे।

4. राष्ट्रीय नीतियों को निर्धारित करना (Determination of National Policies)-भारतीय संसद् केवल कानून ही नहीं बनाती वह राष्ट्रीय नीतियां भी निर्धारित करती है। यदि मन्त्रिपरिषद् संसद् द्वारा निर्धारित की गई नीतियों का पालन न करे तो संसद् के सदस्य सरकार की तीव्र आलोचना करते हैं तथा बहुधा ऐसे भी हो सकता है कि संसद् के सदस्य मन्त्रिपरिषद् से असन्तुष्ट हो जाने के कारण उससे भी त्याग-पत्र देने की मांग कर सकते हैं।

5. न्यायिक जांच (Judicial Powers)–संसद् राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति को यदि वे अपने कार्यों का ठीक प्रकार से पालन न करें तो महाभियोग लगाकर अपने पद से हटा सकती है। संसद् के दोनों सदन सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के जजों को हटाने का प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति को भेज सकते हैं। कुछ अन्य पदाधिकारियों को पदों से हटाए जाने के प्रस्ताव भी संसद् द्वारा पास किए जा सकते हैं।

6. संवैधानिक शक्तियां (Constituent Powers)-भारतीय संसद् को संविधान में संशोधन करने का भी अधिकार प्राप्त है। संविधान की कुछ धाराएं तो ऐसी हैं जिन्हें संसद् साधारण बहुमत से संशोधित कर सकती है। कुछ धाराओं का संशोधन करने के लिए संशोधन प्रस्ताव दोनों सदनों में सदन के बहुमत तथा उपस्थित वोट दे रहे सदस्यों के 2/3 बहुमत से पास होना आवश्यक है। कुछ संशोधन ऐसे भी हैं जिन पर कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों का समर्थन प्राप्त करने के बाद ही वे लागू हो सकते हैं।

7. सार्वजनिक मामलों पर वाद-विवाद (Deliberation over Public Matters)-संसद में जनता के प्रतिनिधि होते हैं और इसलिए वह सार्वजनिक मामलों पर वाद-विवाद का सर्वोत्तम साधन है। संसद् में ही सरकार की नीतियों तथा निर्णयों पर वाद-विवाद होता है और उनकी विभिन्न दृष्टिकोणों से आलोचना की जाती है। संसद् को जनता की शिकायतों पर प्रकाश डालने तथा उन्हें दूर करने का साधन भी कहा जा सकता है। संसद् सदस्य विभिन्न मामलों पर विचार प्रकट करते हुए अपने मतदाताओं की शिकायतों व आवश्यकताओं को सरकार के सामने रखते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयत्न करते हैं।

8. निर्वाचन सम्बन्धी अधिकार (Electoral Powers)–संसद् उप-राष्ट्रपति का चुनाव करती है। संसद् राष्ट्रपति के चुनाव में भी महत्त्वपूर्ण भाग लेती है। लोकसभा अपने स्पीकर तथा डिप्टी-स्पीकर का चुनाव करती है और राज्यसभा अपने उपाध्यक्ष का चुनाव करती है।

9. विविध शक्तियां (Miscellaneous Powers)-

  • संसद् सम्बन्धित राज्य सरकार की सलाह से नवीन राज्य बना सकती है। उदाहरणतया, अगस्त, 2000 में संसद् ने तीन नए राज्यों-छत्तीसगढ़, उत्तराँचल और झारखण्ड की स्थापना की। संसद् वर्तमान राज्यों के नाम परिवर्तन कर सकती है।
  • संसद् किसी राज्य की विधानपरिषद् का अन्त कर सकती है अथवा बना भी सकती है। यह किसी राज्य की सीमाएं भी परिवर्तित कर सकती है।
  • राष्ट्रपति द्वारा जारी की गई संकटकालीन उद्घोषणा पर एक महीने के अन्दर-अन्दर संसद् की स्वीकृति आवश्यक है। वह चाहे तो उसे अस्वीकृत भी कर सकती है।

भारतीय संसद् की स्थिति (Position of Indian Parliament) भारतीय संसद् को कानून निर्माण आदि के क्षेत्र में बहुत अधिक शक्तियां प्राप्त हैं, परन्तु भारतीय संसद् इंग्लैण्ड की संसद् की तरह प्रभुसत्ता सम्पन्न नहीं है।

ब्रिटिश संसद् द्वारा बनाए हुए कानूनों को संसद् के अतिरिक्त किसी अन्य शक्ति द्वारा सुधार अथवा रद्द नहीं किया जा सकता। न ही इंग्लैण्ड में किसी न्यायालय को संसद् के बनाए कानूनों पर पुनर्विचार (Judicial Review) करने का अधिकार है। भारतीय संसद् को ब्रिटिश संसद् की तुलना में सीमित अधिकार (Limited Powers) प्राप्त हैं। इसके मुख्य कारण ये हैं

  • लिखित संविधान की सर्वोच्चता-हमारे देश का संविधान लिखित है जो संसद् की शक्तियों को सीमित करता है। भारतीय संसद् संविधान के विरुद्ध कोई कानून नहीं बना सकती।
  • संघीय व्यवस्था- भारत में इंग्लैण्ड के विपरीत संघीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है, जिस कारण केन्द्रीय सरकार तथा राज्यों की सरकारों में शक्तियों का बंटवारा किया गया है।
  • मौलिक अधिकार- भारतीय संसद् नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कोई कानून नहीं बना सकती।
  • संसद् द्वारा पास किए गए कानून राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत किए जा सकते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति-संसद् द्वारा पास किए गए कानूनों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है और न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर सकती है।
  • संशोधन करने की शक्ति सीमित है–संसद् को समस्त संविधान में संशोधन करने का अधिकार नहीं बल्कि उसकी महत्त्वपूर्ण धाराओं में संशोधन करने के लिए वह आधे राज्यों के समर्थन पर निर्भर रहती है।
  • राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्तियां-संसद् का जब अधिवेशन न हो रहा हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश भी जारी कर सकता है। ये अध्यादेश भी कानून के समान शक्ति रखते हैं।
    इन सभी बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय संसद् ब्रिटिश संसद् का मुकाबला नहीं करती। प्रभुसत्ता सम्पन्न संसद् न होते हुए भी भारतीय संसद् को अपनी शक्तियों और कार्यों के कारण समस्त एशिया के विधानमण्डलों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 5.
संसद् में साधारण विधेयक कैसे पारित होते हैं ? समझा कर लिखिए।
(Describe the Procedure through which an ordinary bill is passed by parliament.)
अथवा
भारतीय संसद् में एक बिल एक्ट कैसे बनता है ?
(How does a bill become an Act in the Indian Parliament ?)
उत्तर-
संसद् का मुख्य काम कानून बनाना है। संविधान की धारा 107 से 112 तक कानून निर्माण सम्बन्धी बातों से सम्बन्धित है। दोनों सदनों में समान विधायिनी पक्रिया (Legislative Procedure) की व्यवस्था की गई है। किसी भी विधेयक को प्रत्येक सदन में पास होने के लिए पांच सीढ़ियों में से गुजरना पड़ता है-(1) बिल की पुनः स्थापना तथा प्रथम वाचन, (2) दूसरा वाचन, (3) समिति अवस्था, (4) प्रतिवेदन अवस्था और (5) तीसरा वाचन । भारत में सरकारी बिल तथा निजी सदस्य बिल (Private Member’s Bill) के पास करने का ढंग एक-सा है। किसी भी साधारण बिल के कानून का रूप धारण करने से पहले निम्नलिखित अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है-

1. पुनः स्थापना तथा प्रथम वाचन (Introduction and First Reading)—साधारण बिल संसद् के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। जो भी सदस्य कोई बिल पेश करना चाहता है उसे महीना पहले इस आशय की सूचना सदन के अध्यक्ष को देनी पड़ती है। परन्तु मन्त्रियों के लिए एक महीने का नोटिस देना अनिवार्य है। निश्चित तिथि को सम्बन्धित सदस्य खड़ा होकर सदन से बिल पेश करने की आज्ञा मांगता है जोकि प्रायः दे दी जाती है। यदि इस अवस्था में बिल का विरोध हो जैसे कि नवम्बर, 1954 मे निवारक नजरबन्दी संशोधन बिल (Preventive Detention Bill) का विरोध हुआ था, तो अध्यक्ष बिल पेश करने वाले बिल का विरोध करने वाले सदस्यों का संक्षिप्त रूप में बिल सम्बन्धी बात करने का मौका देता है। सदन का अध्यक्ष सदस्यों का मत ले लेता है। उपस्थिति सदस्यों के साधारण बहुमत से उसका निर्णय हो जाता है। बिल को पेश करने की आज्ञा मिल जाने पर सदस्य बिल का शीर्षक पढ़ता है, इस समय बिल पर कोई वाद-विवाद नहीं होता। महत्त्वपूर्ण बिलों पर इस समय उनकी मुख्य बातों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा सकता है। इस प्रकार बिल की पुनः स्थापना (Introduction) भी हो जाती है और उसका प्रथम वाचन भी। इसके बाद बिल को सरकारी गज़ट में छाप दिया जाता है।

2. द्वितीय वाचन (Second Reading)—बिल की पुन:स्थापना के बाद द्वितीय वाचन किसी भी समय पर प्रारम्भ हो सकता है। साधारणतः पुनः स्थापना तथा द्वितीय वाचन में दो दिनों का अन्तर होता है, परन्तु यदि सदन का अध्यक्ष आवश्यक समझे तो द्वितीय वाचन को प्राय: दो चरणों में बांटा जाता है।
प्रथम चरण में बिल को पेश करने वाला सदस्य निश्चित तिथि और समय पर यह प्रस्ताव पेश करता है कि बिल पर विचार किया जाए अथवा सदन की सलाह से किसी अन्य समिति के पास भेजा जाए अथवा बिल पर जनमत जानने के लिए इसे प्रसारित किया जाए। यदि प्रस्तावक सदस्य तीन विकल्पों में कोई एक प्रस्ताव लाता है तो कोई अन्य दूसरा प्रस्ताव भी ला सकता है। यदि बिल को प्रसारित करने का प्रस्ताव हो जाता है तो सदन का सचिवालय राज्य सरकारों को आदेश देता है कि वे अपने गज़ट में बिल को प्रकाशित करें तथा स्वीकृत संस्थाओं, सम्बन्धित व्यक्तियों तथा स्थानीय संस्थाओं का विचार लें, परन्तु इस सम्बन्धी प्रस्ताव निर्धारित तिथि के अन्दर किसी सुझाव तथा विचार के साथ सदन के सचिवालय में अवश्य ही पहुंचना चाहिए।

द्वितीय चरण में, बिल के सम्बन्ध में प्राप्त विचारों व सुझावों का संक्षिप्त रूप सदन के सदस्यों के बीच बांट दिया जाता है। प्रस्तावक सदस्य यह प्रस्ताव पेश करता है कि प्रवर या संयुक्त समिति के पास भेजा जाए। कभी-कभी अध्यक्ष की आज्ञा से बिल को बिना प्रवर या संयुक्त समिति में भेजे ही उस पर विचार करना शुरू हो जाता है, परन्तु इस स्तर पर वाद-विवाद सामान्य प्रकृति का होता है। बिल की धाराओं पर बहस नहीं की जाती बल्कि बिल के मौलिक सिद्धान्तों तथा उद्देश्यों पर वाद-विवाद होता है अर्थात् इस समय बिल के आधारमूल सिद्धान्तों पर ही बहस की जाती है, इसके पश्चात् स्पीकर बिल पर मतदान करवाता है। यदि बहुमत बिल के पक्ष में हो तो बिल किसी समिति के पास भेजा जाता है परन्तु यदि बहुमत विपक्ष में हो तो बिल रद्द हो जाता है।

3. समिति अवस्था (Committee Stage)—यदि सदन का निर्णय उस बिल को किसी विशेष कमेटी को भेजने का हो तो फिर ऐसा किया जाता है। जिस प्रवर समिति को वह बिल भेजा जाता है, उसमें बिल पेश करने वाला सदस्य तथा कुछ अन्य सदस्य होते हैं। यदि सदन का उप-सभापति इस समिति में हो तो फिर उसे ही इस समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है। प्रवर समिति बिल की धाराओं पर विस्तारपूर्वक विचार करती है। समिति के प्रत्येक सदस्य को बिल की धाराओं, उपधाराओं, खण्डों तथा उपखण्डों आदि पर पूर्ण विस्तार से अपने विचार प्रकट करने और उनमें संशोधन प्रस्ताव पेश करने का अधिकार है। पूरी छानबीन करने के पश्चात् समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है। यह सिफ़ारिश कर सकती है कि बिल रद्द कर दिया जाए या उसे मौलिक रूप में स्वीकर कर लिया जाए या उसे कुछ संशोधन सहित पास किया जाए। समिति अपनी रिपोर्ट निश्चित समय में सदन को भेज देती है।

4. प्रतिवेदन अवस्था (Report Stage)-समिति के लिए यह आवश्यक होता है कि वह बिल के सम्बन्ध में तीन महीने के अन्दर या सदन द्वारा निश्चित समय में अपनी रिपोर्ट सदन में पेश करे। रिपोर्ट तथा संशोधन बिल को छपवाकर सदन के सदस्यों में बांट दिया जाता है। समिति अपनी रिपोर्ट अवस्था पर बिल पर व्यापक रूप से विचार करती है। बिल की प्रत्येक धारा तथा समिति की रिपोर्ट तथा उसके द्वारा पेश किए संशोधन पर विस्तारपूर्वक वाद-विवाद होता है। वाद-विवाद के पश्चात् बिल की धाराओं पर अलग-अलग या सामूहिक रूप में मतदान करवाया जाता है। यदि बहुमत बिल के पक्ष में हो तो बिल पास कर दिया जाता है अथवा बिल रद्द हो जाता है।

5. तृतीय वाचन (Third Reading)-प्रवर समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् बिल के तृतीय वाचन के लिए तिथि निश्चित कर दी जाती है। तृतीय वाचन किसी बिल की सदन में अन्तिम अवस्था होती है। इस अवस्था में प्रस्तावक यह प्रस्ताव पेश करता है कि बिल को पास किया जाए। इस अवस्था में बिल की प्रत्येक धारा पर विचार नहीं किया जाता। बिल के सामान्य सिद्धान्तों पर केवल बहस होती है और बिल की भाषा को अधिक-से-अधिक स्पष्ट बनाने के लिए यत्न किये जाते हैं। बिल में केवल मौखिक संशोधन किए जाते हैं। बिल की यह अवस्था औपचारिक है और बिल के रद्द होने की सम्भावना बहुत कम होती है।

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बिल दूसरे सदन में (Bill in the Second House)-एक सदन में पास होने के बाद बिल दूसरे सदन में जाता है। दूसरे सदन में भी बिल को इसी प्रकार की पांचों अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है। यदि दूसरा सदन भी बिल को पास कर दे तो वह राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। यदि दूसरा सदन उसे रद्द कर दे या छ: महीने तक उस पर कोई कार्यवाही न करे या उसमें ऐसे सुझाव देकर वापस कर दे जो पहले सदन को स्वीकृत न हों तो राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई जाती है। बिल दोनों सदनों के उपस्थित तथा वोट देने वाले सभी सदस्यों के बहुमत से पास होता है, क्योंकि लोकसभा के सदस्यों की संख्या राज्य सभा की सदस्य संख्या के दुगने से भी अधिक है, इसलिए संयुक्त बैठक में लोकसभा की इच्छानुसार ही निर्णय होने की सम्भावना होती है।

राष्ट्रपति की स्वीकृति (Assent of the President)-दोनों सदनों से पास होने के बाद बिल राष्ट्र की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति उस पर एक बार अपनी स्वीकृति देने से इन्कार कर सकता है, परन्तु यदि संसद् उस बिल को दोबारा साधारण बहुमत से पास करके राष्ट्रपति के पास भेज दे तो इस बार राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है। स्वीकृति कितने समय में देनी आवश्यक है, इस विषय में संविधान चुप है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद बिल को सरकारी गजट में छाप दिया जाता है और वह कानून बन जाता है।

धन-बिल के पास होने की प्रक्रिया-धन-बिल केवल मन्त्रियों द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति से लोकसभा में पेश किया जा सकता है। लोकसभा द्वारा पास होने के पश्चात् धन-बिल को राज्यसभा के पास भेज दिया जाता है। राज्यसभा धन-बिल को अस्वीकार नहीं कर सकती। राज्यसभा अधिक-से-अधिक बिल को 14 दिन तक रोक सकती है। राज्यसभा की सिफारिशों को मानना लोकसभा की इच्छा पर निर्भर करता है। इसके बाद बिल को राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है और राष्ट्रपति हस्ताक्षर करने से इन्कार नहीं कर सकता।

प्रश्न 6.
लोकसभा के अध्यक्ष के चुनाव, शक्तियों तथा स्थिति की विवेचना कीजिए।
(Discuss the election, powers and position of the Speaker of Lok Sabha.)
उत्तर-
लोकसभा भारतीय संसद् का निम्न तथा जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदन है। संसद् की शक्तियां वास्तव में लोकसभा ही प्रयोग करती है। लोकसभा की अध्यक्षता उसके अध्यक्ष (Speaker) द्वारा की जाती है। लोकसभा अध्यक्ष के नेतृत्व में ही अपने समस्त कार्य करती है। लोकसभा के भंग होने पर भी अध्यक्ष का पद नई लोकसभा के कार्य तक बना रहता है। मुनरो (Munro) के अनुसार, “स्वीकर लोकसभा में प्रमुखतम व्यक्ति होता है।” (“The speaker is the most conspicuous figure in the house.”)

चुनाव (Election)-लोकसभा का अध्यक्ष सभा के सदस्यों द्वारा उनसे ही चुना जाता है। आम चुनाव के बाद लोकसभा अपनी प्रथम बैठक में अध्यक्ष का चुनाव करती है। उपाध्यक्ष का चुनाव भी उसी समय होता है। 6 जून, 2014 को भारतीय जनता पार्टी की नेता श्रीमती सुमित्रा महाजन को 16वीं लोकसभा का सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया। वास्तव में बहुमत दल की इच्छानुसार ही कोई व्यक्ति अध्यक्ष के पद पर चुना जाता है क्योंकि यदि स्पीकर के पद के लिए मुकाबला होता है तो बहुमत दल का उम्मीदवार ही विजयी होता है।

कार्यकाल (Term of Office)-लोकसभा के स्पीकर की अवधि 5 वर्ष है। यदि लोकसभा को भंग कर दिया जाए तो स्पीकर अपने पद का त्याग नहीं करता। वह उतनी देर तक अपने पद पर बना रहता है जब तक नई लोकसभा का चुनाव नहीं हो जाता तथा नई लोकसभा अपना स्पीकर नहीं चुन लेती । यदि स्पीकर तथा डिप्टी स्पीकर लोकसभा के सदस्य नहीं रहते तो उनको अपना पद त्यागना पड़ता है। स्पीकर तथा डिप्टी स्पीकर को 5 वर्ष की अवधि से पहले भी हटाया जा सकता है। यह तभी हो सकता है यदि लोकसभा के उपस्थित सदस्यों की बहसंख्या इसके लिए प्रस्ताव पास कर दे, परन्तु इस प्रकार का प्रस्ताव लोकसभा में तभी पेश हो सकता है यदि कम-से-कम 14 दिन पूर्व अध्यक्ष को ऐसे प्रस्ताव की सूचना दी गई हो। अभी तक स्पीकर के विरुद्ध चार-बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया है, परन्तु कभी भी प्रस्ताव पास नहीं हुआ। नौवीं लोकसभा के स्पीकर श्री रवि राय ने 18 महीने ही काम किया।

वेतन तथा भत्ता (Salary and Allowances)-लोकसभा अध्यक्ष को मासिक वेतन, अन्य भत्ते और रहने के लिए निःशुल्क स्थान आदि मिलता है। अध्यक्ष के वेतन, भत्ते तथा अन्य सुविधाएं भारत की संचित निधि से दी जाती हैं जिनको न तो अध्यक्ष के कार्य काल के दौरान घटाया जा सकता है और न ही संसद् इन पर मतदान कर सकती है।

अध्यक्ष की शक्तियां व कार्य (Powers and Functions of the Speaker)-अध्यक्ष को अपने पद से सम्बन्धित बहुत-सी शक्तियां तथा बहुत से कार्यों को करना पड़ता है जोकि मुख्य रूप से निम्नलिखित हैं-

(क) व्यवस्था सम्बन्धी शक्तियां (Regulatory Powers)-स्पीकर लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है। सदन के सभी सदस्य उसी को सम्बोधित करते हैं। सदन के अध्यक्ष के नाते उसे अनेक व्यवस्था सम्बन्धी शक्तियां प्राप्त हैं जो कि इस प्रकार हैं-

  • सदन की कार्यवाही चलाने के लिए सदन में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखना स्पीकर का कार्य है। (2) स्पीकर सदन के नेता से सलाह करके सदन का कार्यक्रम निर्धारित करता है।
  • स्पीकर सदन की कार्यवाही-नियमों की व्याख्या करता है। स्पीकर की कार्यवाही के नियमों पर की गई आपत्ति पर निर्णय देता है जोकि अन्तिम होता है।
  • जब किसी बिल पर या विषय पर वाद-विवाद समाप्त हो जाता है तो स्पीकर उस पर मतदान करवाता है। वोटों की गिनती करता है तथा परिणाम घोषित करता है।
  • साधारणतः स्पीकर अपना वोट नहीं डालता, परन्तु जब किसी विषय पर वोट समान हों तो अपना निर्णायक वोट दे सकता है।
  • प्रस्तावों व व्यवस्था सम्बन्धी मुद्दों को स्वीकार करना।
  • स्पीकर ही इस बात का निश्चय करता है कि सदन की गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य उपस्थित हैं अथवा नहीं।
  • स्पीकर सदन के सदस्यों की जानकारी के लिए या किसी विशेष महत्त्व के मामले पर सदन को सम्बोधित करता है।
  • स्पीकर सदन के नेता की सलाह पर सदन की गुप्त बैठक की आज्ञा देता है।
  • लोकसभा में सदस्यों को उनकी मातृभाषा में बोलने की आज्ञा देता है।
  • मन्त्री पद छोड़ने के पश्चात् किसी सदस्य को अपनी सफाई देने की आज्ञा देता है।

(ख) निरीक्षण व भर्त्सना सम्बन्धी शक्तियां (Supervisory and Censuring Powers)—स्पीकर की निरीक्षण व भर्त्सना सम्बन्धी शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  • सदन की विभिन्न समितियों को नियुक्त करने में स्पीकर का हाथ होता है और ये समितियां स्पीकर के निरीक्षण में कार्य करती हैं।
  • स्पीकर स्वयं कुछ समितियों की अध्यक्षता करता है।
  • स्पीकर लोकसभा के सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करता है।
  • स्पीकर सरकार को आदेश देता है कि वह लोकहित के लिए सदन को या उसकी समिति को अमुक सूचना भेजे।
  • स्पीकर की आज्ञा के बिना कोई सदस्य लोकसभा में नहीं बोल सकता।
  • यदि कोई सदस्य सदन में अनुचित शब्दों का प्रयोग करे तो स्पीकर अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने वाले सदस्य को अपने शब्द वापस लेने के लिए कह सकता है और वह संसद् की कार्यवाही से ऐसे शब्दों को काट सकता है जो उसकी सम्मति में अनुचित तथा असभ्य हों।
  • यदि कोई सदस्य सदन में गड़बड़ करे तो स्पीकर उसको सदन से बाहर जाने के लिए कह सकता है।
  • यदि कोई सदस्य अध्यक्ष के आदेशों का उल्लंघन करे तथा सदन के कार्य में बाधा उत्पन्न करे तो स्पीकर उसे निलम्बित (Suspend) कर सकता है। यदि कोई सदस्य उसके आदेशानुसार सदन से बाहर न जाए तो वह मार्शल की सहायता से उसे बाहर निकलवा सकता है।
  • सदन की मीटिंग में गड़बड़ होने की दशा में स्पीकर को सदन का अधिवेशन स्थगित करने का अधिकार है।
  • यदि सदन किसी व्यक्ति को अपने विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने के लिए दण्ड दे तो उसे लागू करना स्पीकर का काम है।
  • किसी कथित अपराधी को पकड़ने का आदेश जारी करना स्पीकर का कार्य है।

(ग) प्रशासन सम्बन्धी शक्तियां (Administrative Powers)-स्पीकर को प्रशासकीय शक्तियां भी प्राप्त हैं जो निम्नलिखित हैं

  • स्पीकर का अपना सचिवालय होता है जिसमें काम करने वाले कर्मचारी उसके नियन्त्रण में काम करते हैं।
  • प्रेस तथा जनता के लिए दर्शक गैलरी में व्यवस्था करना स्पीकर का काम है।
  • सदन की बैठकों के लिए विभिन्न समितियों के कार्य-संचालन के लिए सदन के सदस्यों के लिए उपयुक्त स्थानों की व्यवस्था करना।
  • स्पीकर सदन के सदस्यों के लिए निवास व अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करता है।
  • स्पीकर संसदीय कार्यवाहियों और अभिलेखों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था करता है।
  • स्पीकर सदन के सदस्यों तथा कर्मचारियों के जीवन व उनकी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए उचित प्रबन्ध करता है।
  • स्पीकर किसी गैर-सदस्य को सदन में प्रविष्ट नहीं होने देता।

(घ) विविध कार्य (Miscellaneous Powers)

  • कोई बिल वित्त बिल है या नहीं, इसका निर्णय स्पीकर करता है।
  • लोकसभा जब किसी बिल पर प्रस्ताव पास कर देती है तब उसे सदन अथवा राष्ट्रपति के पास स्पीकर ही हस्ताक्षर करके भेजता है।
  • दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता स्पीकर करता है।
  • स्पीकर राष्ट्रपति तथा संसद् के बीच एक कड़ी का कार्य करता है। राष्ट्रपति और संसद् के बीच पत्र-व्यवहार स्पीकर के माध्यम से ही होता है।
  • स्पीकर लोकसभा तथा राज्यसभा के बीच एक कड़ी का काम करता है। दोनों सदनों में पत्र-व्यवहार स्पीकर के माध्यम से ही होता है।
  • संसदीय शिष्टमण्डलों के सदस्यों को मनोनीत करना स्पीकर का कार्य है।
  • अन्तर संसदीय संघ में भारतीय संसदीय शिष्टमण्डल में पदेन अध्यक्ष के रूप में कार्य करना।
  • स्पीकर यदि किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए तो सदन को सूचना देता है।
  • सदन की अवधि पूर्ण होने पर स्पीकर विदाई भाषण देता है।

अध्यक्ष की स्थिति (Position of the Speaker) लोकसभा के अध्यक्ष का पद बड़ा महत्त्वपूर्ण तथा महान् आदर गौरव का है। मावलंकर (Mavlanker) ने एक स्थान पर कहा था, “सदन में अध्यक्ष की शक्तियां सबसे अधिक हैं।” (“His authority is supreme in the house.”) इसी प्रकार लोकसभा के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री हुक्म सिंह (Hukam Singh) ने एक बार कहा था, “अध्यक्ष का पद राज्य के उच्च पदों में से एक है।” (“Speaker’s is one of highest office in the land.”) श्री एल० के० अडवाणी (L.K. Advani) ने मार्च 1977 में कहा था कि, “स्पीकर अथवा अध्यक्ष स्वयं में एक संस्था है।” इस पद पर बहुत-से योग्य, निष्पक्ष तथा विद्वान् व्यक्तियों ने कार्य किया है और उन्होंने इसके सम्मान को बढ़ाने में सहायता दी है। इसमें श्री वी० जे० पटेल जो केन्द्रीय विधानसभा के प्रथम स्पीकर थे और श्री जी० वी० मावलंकर (G.V. Mavlankar) का नाम जो लोकसभा के प्रथम स्पीकर थे, उल्लेखनीय हैं।

लोकसभा के अध्यक्ष का पद इंग्लैंड के कॉमन सदन के अध्यक्ष के समान सम्मानित तथा आदरपूर्ण न होते हुए भी काफ़ी प्रभावशाली, सम्मानित आदरपूर्ण है। स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा के स्पीकर के महत्त्व को बताते हुए कहा था, “अध्यक्ष सदन का प्रतिनिधि है, वह सदन के गौरव, सदन की स्वतन्त्रता का प्रतिनिधित्व करता है और राष्ट्र की स्वतन्त्रता का प्रतीक है क्योंकि सदन राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए उचित ही है कि उसका पद सम्मानित तथा स्वतन्त्र होना चाहिए और उच्च योग्यता तथा निष्पक्षता वाले व्यक्तियों के द्वारा ही इसे सुशोभित किया जाना चाहिए।”

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 29 संघीय व्यवस्थापिका–संसद्

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संघीय संसद् की रचना का वर्णन करें।
उत्तर-
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, “संघ के लिए एक संसद् होगी जो राष्ट्रपति और दोनों सदनों-राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनेगी।” राज्यसभा संसद् का ऊपरि सदन है जो जनता का प्रतिनिधित्व न करके राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके 250 सदस्य हो सकते हैं जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। लोकसभा संसद् का निम्न सदन है। लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या 552 हो सकती है। इनमें से 550 निर्वाचित और 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा ऐंग्लो-इण्डियन नियुक्त किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति संघीय संसद् का भाग अवश्य है परन्तु इसका सदस्य नहीं है।

प्रश्न 2.
राज्यसभा की रचना लिखें।
उत्तर-
संविधान द्वारा राज्यसभा के सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या 250 हो सकती है जिनमें से 238 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले होंगे। 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जा सकते हैं, जिन्हें समाज सेवा, कला तथा विज्ञान, शिक्षा आदि के क्षेत्र में विशेष ख्याति प्राप्त हो चुकी है। आजकल राज्यसभा के कुल सदस्यों की संख्या 245 है। राज्यसभा की रचना में संघ की इकाइयों को समान प्रतिनिधित्व देने का वह सिद्धान्त जो अमेरिका की सीनेट की रचना में अपनाया गया है, भारत में नहीं अपनाया गया। हमारे देश में विभिन्न राज्यों की जनसंख्या के आधार पर उनके द्वारा भेजे जाने वाले सदस्यों की संख्या संविधान द्वारा निश्चित की गई है। उदाहरणस्वरूप जहां पंजाब से 7 तथा हरियाणा से 5 सदस्य निर्वाचित होते हैं वहां उत्तर प्रदेश से 31 प्रतिनिधि।

प्रश्न 3.
लोकसभा की रचना लिखें।
उत्तर-
प्रारम्भ में लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 निश्चित की गई थी। 31वें संशोधन के अन्तर्गत इसके निर्वाचित सदस्यों की अधिक संख्या 545 निश्चित की गई। ‘गोवा, दमन और दीयू पुनर्गठन अधिनियम 1987’ द्वारा लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 निश्चित की गई। इस प्रकार लोकसभा की कुल अधिकतम संख्या 552 हो सकती है। 552 सदस्यों का ब्यौरा इस प्रकार है-

(क) 530 सदस्य राज्यों में से चुने हुए,
(ख) 20 सदस्य संघीय क्षेत्रों में से चुने हुए और
(ग) 2 ऐंग्लो-इण्डियन जाति (Anglo-Indian Community) के सदस्य जिनको राष्ट्रपति मनोनीत करता है, यदि उसे विश्वास हो जाए कि इस जाति को लोकसभा में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। आजकल लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 545 है। इसमें 543 निर्वाचित सदस्य हैं और 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा ऐंग्लो-इण्डियन नियुक्त किए हुए हैं।

प्रश्न 4.
लोकसभा का सदस्य बनने के लिए संविधान में लिखित योग्यताएं बताएं।
उत्तर-
लोकसभा का सदस्य वही व्यक्ति बन सकता है जिसमें निम्नलिखित योग्यताएं हों-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,
  • वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अन्तर्गत किसी लाभदायक पद पर आसीन न हो,
  • वह संसद् द्वारा निश्चित की गई अन्य योग्यताएं रखता हो,
  • वह पागल न हो, दिवालिया न हो,
  • किसी न्यायालय द्वारा इस पद के लिए अयोग्य न घोषित किया गया हो।
  • लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले आज़ाद उम्मीदवार के लिए आवश्यक है कि उसका नाम दस प्रस्तावकों द्वारा प्रस्तावित किया गया हो।

प्रश्न 5.
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएं होनी चाहिएं ?
उत्तर-
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह तीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,
  • वह संसद् द्वारा निश्चित अन्य योग्यताएं रखता हो,
  • वह पागल न हो, दिवालिया न हो,
  • भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर आसीन न हो,
  • वह उस राज्य का रहने वाला हो जहां से वह निर्वाचित होना चाहता है,
  • संसद् के किसी कानून या न्यायपालिका द्वारा राज्यसभा का सदस्य बनने के अयोग्य घोषित न किया गया हो।

प्रश्न 6.
लोकसभा में प्रश्नोत्तर काल का वर्णन करें।
उत्तर-
लोकसभा के सदस्य मन्त्रियों से उनके विभागों के कार्यों के सम्बन्ध में प्रश्न पूछ सकते हैं जिनका मन्त्रियों को उत्तर देना पड़ता है। लोकसभा की दैनिक बैठकों का प्रथम घण्टा प्रश्नों का उत्तर देने के लिए निश्चित है। साधारणतया प्रशासकीय जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्न पूछे जाते हैं, परन्तु विरोधी दल कई बार सरकार की कमियों और उसके द्वारा किये गये स्वेच्छाचारी कार्यों पर प्रकाश डालने के लिए भी प्रश्न पूछ लेते हैं और मन्त्रियों को बड़ी सतर्कता के साथ इनका उत्तर देना पड़ता है। इस प्रकार लोकसभा के सदस्य प्रश्न पूछने के द्वारा कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखते हैं।

प्रश्न 7.
राज्यसभा के सदस्यों को कौन-से विशेषाधिकार प्राप्त हैं ?
उत्तर-
(क) राज्यसभा के सदस्यों को अपने विचार प्रकट करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। सदन में दिए गए भाषणों के कारण उसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है।
(ख) अधिवेशन के दौरान और 40 दिन पहले और अधिवेशन समाप्त होने के 40 दिन बाद तक सदन के किसी भी सदस्य को दीवानी अभियोग के कारण गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
(ग) सदस्यों को वे सब विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं जो संसद् द्वारा समय-समय पर निश्चित किए जाते हैं।

प्रश्न 8.
‘काम रोको प्रस्ताव’ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
सांसद अपना दैनिक कार्य पूर्व निश्चित कार्यक्रम के अनुसार करते हैं। परन्तु कई बार देश में अचानक कोई विशेष और महत्त्वपूर्ण घटना घट जाती है, जैसे कि कोई रेल दुर्घटना हो जाए, कहीं पुलिस और जनता में झगड़ा होने से कुछ व्यक्तियों की जानें चली जाएं, ऐसे समय में संसद् का कोई भी सदस्य स्थगन (काम रोको) प्रस्ताव पेश कर सकता है। इस प्रस्ताव का यह अर्थ है कि सदन का निश्चित कार्यक्रम थोड़े समय के लिए रोक दिया जाए और उस घटना या समस्या पर विचार किया जाए। अध्यक्ष इस पर विचार करता है और यदि उचित समझे तो काम रोको प्रस्ताव स्वीकार करके सामने रख देता है। वह यदि ठीक न समझे तो उसे अस्वीकृत भी कर सकता है। प्रस्ताव की स्वीकृति दो चरणों में मिलती है, पहले अध्यक्ष के द्वारा और फिर सदन के द्वारा। अध्यक्ष अपनी स्वीकृति के बाद सदन से पूछता है और यदि सदस्यों की निश्चित संख्या उस प्रस्ताव के शुरू किए जाने के पक्ष में हो तो प्रस्ताव आगे चलता है वरन् नहीं। लोकसभा में यह संख्या पचास है। प्रस्ताव स्वीकार हो जाने पर सदन का निश्चित कार्यक्रम रोक दिया जाता है और उस विशेष घटना पर विचार होता है। संसद् सदस्यों को ऐसी दशा में सरकार की आलोचना का अवसर मिलता है। मन्त्रिमण्डल भी उस स्थिति पर विचार प्रकट करता है और सदस्यों को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करता है।

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प्रश्न 9.
वित्त बिल किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वित्त बिल उसको कहते हैं जिसका सम्बन्ध टैक्स लगाने, बढ़ाने से तथा कम करने, खर्च करने, ऋण लेने, ब्याज देने आदि की बातों से हो। यदि इस बात पर शंका हो कि अमुक बिल धन बिल है या नहीं, तो इस सम्बन्ध में लोकसभा के स्पीकर का निर्णय अंतिम समझा जाता है। उस बिल को केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। धन बिल केवल मन्त्री ही पेश कर सकते हैं।

प्रश्न 10.
राज्यसभा के अध्यक्ष के कोई चार कार्य बताइए।
उत्तर-

  1. वह राज्यसभा के अधिवेशन में सभापतित्व करता है।
  2. वह राज्यसभा में शान्ति बनाए रखने तथा उसकी बैठकों को ठीक प्रकार से चलाने का जिम्मेदार है।
  3. वह सदस्यों को बोलने की आज्ञा देता है।
  4. उसे एक निर्णायक मत देने का अधिकार है।

प्रश्न 11.
किन परिस्थितियों में संसद् का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है ?
उत्तर-
राष्टपति निम्नलिखित परिस्थितियों में संसद् का संयुक्त अधिवेशन बुलाता है-

  1. संसद् के दोनों सदनों के विवादों को हल करने के लिए संसद् का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है।
  2. संयुक्त अधिवेशन तब बुलाया जाता है जब एक बिल को संसद् का एक सदन पास कर दे और दूसरा अस्वीकार कर दे।

प्रश्न 12.
राज्यसभा की विशेष शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यसभा को संविधान के अन्तर्गत कुछ विशेष शक्तियां दी गई हैं, जो कि इस प्रकार हैं-

  1. राज्यसभा राज्यसूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित करके संसद् को इस पर कानून बनाने का अधिकार दे सकती है।
  2. 42वें संशोधन में यह व्यवस्था की गई है कि राज्यसभा अनुच्छेद 249 के अन्तर्गत प्रस्ताव पास करके अखिल भारतीय न्यायिक सेवाएं (All India Judicial Services) स्थापित करने के सम्बन्ध में संसद् को अधिकार दे सकती है।
  3. संविधान के अनुसार राज्यसभा ही 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके नई अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं (All India Judicial Services) को स्थापित करने का अधिकार केन्द्रीय सरकार को दे सकती है।

प्रश्न 13.
लोकसभा तथा राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
लोकसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं और प्रत्येक नागरिक को जिसकी आयु 18 वर्ष हो, वोट डालने का अधिकार प्राप्त होता है। एक निर्वाचन क्षेत्र से एक ही उम्मीदवार का चुनाव होता है और जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे ही विजयी घोषित किया जाता है। राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है। इस तरह राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष तौर पर जनता द्वारा ही होता है।

प्रश्न 14.
लोकसभा तथा राज्यसभा का क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर-
लोकसभा संसद् का निम्न सदन और राज्यसभा संसद् का ऊपरी सदन है। दोनों सदनों को समान शक्तियां प्राप्त नहीं हैं। लोकसभा राज्यसभा की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है। राज्यसभा साधारण बिल को 6 महीने के लिए और धन बिल को केवल 14 दिन तक रोक सकती है। लोकसभा की इच्छा के विरुद्ध कोई कानून पास नहीं हो सकता और देश के वित्त पर लोकसभा का ही नियन्त्रण है। राज्यसभा मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकती है, आलोचना कर सकती है परन्तु अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिपरिषद् को नहीं हटा सकती। यह अधिकार लोकसभा के पास है। राष्ट्रपति के चुनाव में दोनों सदन भाग लेते हैं और महाभियोग में भी दोनों को समान अधिकार प्राप्त हैं।

प्रश्न 15.
संसद् के प्रमुख कार्य तथा शक्तियां क्या हैं ?
उत्तर-

  • संसद् का मुख्य कार्य कानून का निर्माण करना है।
  • संसद् का राष्ट्र के वित्त पर नियन्त्रण है और बजट पास करती है।
  • संसद् का मन्त्रिमण्डल पर नियन्त्रण है और मन्त्रिमण्डल संसद् के प्रति उत्तरदायी है।
  • संसद् राष्ट्रीय नीतियों को निर्धारित करती है।
  • संसद् को न्याय सम्बन्धी शक्तियां प्राप्त हैं।
  • संसद् निर्वाचन सम्बन्ध कार्य करती है और संविधान में संशोधन करती है।

प्रश्न 16.
भारतीय संसद् की शक्तियों पर कोई चार सीमाएं बताइए।
उत्तर-
भारतीय संसद् ब्रिटिश संसद् की तरह सर्वोच्च नहीं है। इस पर निम्नलिखित मुख्य सीमाएं हैं-

  1. भारतीय संसद् संविधान के विरुद्ध कोई कानून नहीं बना सकती।
  2. संसद् मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कोई कानून नहीं बना सकती।
  3. संसद् द्वारा पास किए गए कानून राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत किए जा सकते हैं।
  4. सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति संसद् की शक्तियों पर महत्त्वपूर्ण प्रतिबन्ध है।

प्रश्न 17.
साधारण विधेयक किस तरह कानून बनता है, समझाइए।
उत्तर–
संसद् का मुख्य कार्य कानून बनाना होता है। संविधान की धारा 107 से 112 तक कानून निर्माण प्रक्रिया से सम्बन्धित है। साधारण विधेयक को संसद् के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। विधेयक को प्रत्येक सदन में पास होने के लिए पाँच अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है-(1) बिल की पुनर्स्थापना तथा प्रथम वाचन, (2) दूसरा वाचन, (3) समिति अवस्था, (4) प्रतिवादन अवस्था और (5) तीसरा वाचन। भारत में सरकारी बिल तथा निजी सदस्य बिल (Private Member’s Bill) के पास करने का ढंग एक-सा है।

एक सदन में पास होने के बाद बिल दूसरे सदन में जाता है। दूसरे सदन में भी बिल को इसी प्रकार की पाँचों अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है। यदि दूसरा सदन भी बिल को पास कर दे तो वह राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद बिल को सरकारी गजट में छाप दिया जाता है और वह कानून बन जाता है।

प्रश्न 18.
लोकसभा के अध्यक्ष के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
लोकसभा का एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होता है जिसका काम लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करना, अनुशासन बनाए रखना तथा सदन की कार्यवाही को ठीक प्रकार से चलाना है। अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष लोकसभा के सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुने जाते हैं। नई लोकसभा अपना नया अध्यक्ष चुनती है। लोकसभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को जब चाहे प्रस्ताव पास करके अपने पद से हटा सकती है, यदि वे अपना कार्य ठीक प्रकार से न करें। परन्तु ऐसा प्रस्ताव उस समय तक लोकसभा में पेश नहीं किया जा सकता जब तक कि इस आशय की पूर्व सूचना कम-से-कम 14 दिन पहले अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को न दी गई हो। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष अध्यक्ष के पद पर काम करता है।

प्रश्न 19.
लोकसभा का अध्यक्ष कौन होता है ? इसके चार मुख्य काम लिखें। (P.B. 1988)
उत्तर-
लोकसभा का एक अध्यक्ष होता है, जिसे स्पीकर कहा जाता है और स्पीकर का चुनाव लोकसभा के सदस्य अपने में से करते हैं।

  • स्पीकर लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  • स्पीकर लोकसभा में अनुशासन बनाए रखता है। यदि कोई सदस्य सदन में गड़बड़ी पैदा करता है तो स्पीकर उस सदस्य को सदन से बाहर निकाल सकता है।
  • स्पीकर सदन की कार्यवाही चलाता है। वह सदस्यों को बिल पेश करने, काम रोकने का प्रस्ताव करने, स्थगन प्रस्ताव पेश करने आदि की स्वीकृति देता है।
  • स्पीकर सदस्यों को बोलने की स्वीकृति देता है। कोई भी सदस्य स्पीकर की स्वीकृति के बिना सदन में नहीं बोल सकता।

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प्रश्न 20.
लोकसभा के अध्यक्ष को किस प्रकार चुना जाता है ?
उत्तर-
लोकसभा का अध्यक्ष सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुना जाता है। आम चुनाव के बाद लोकसभा अपनी प्रथम बैठक में अध्यक्ष का चुनाव करती है। उपाध्यक्ष का चुनाव भी उसी प्रकार होता है। 6 जून, 2014 को भारतीय जनता पार्टी की नेता श्रीमती सुमित्रा महाजन को सर्वसम्मति से 16वीं लोकसभा का अध्यक्ष चुना गया। वास्तव में बहुमत दल की इच्छानुसार ही कोई व्यक्ति अध्यक्ष के पद पर चुना जाता है क्योंकि यदि स्पीकर के पद के लिए मुकाबला होता है तो बहुमत दल का उम्मीदवार ही विजयी होता है।

प्रश्न 21.
लोकसभा के अध्यक्ष की चार शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
अध्यक्ष को बहुत-सी शक्तियां प्राप्त हैं तथा उसे पद से सम्बन्धित अनेकों कार्य करने पड़ते हैं जोकि मुख्य रूप से निम्नलिखित हैं-

  1. सदन की कार्यवाही को चलाने के लिए शान्ति और व्यवस्था बनाए रखना स्पीकर का कार्य है।
  2. स्पीकर सदन के नेता से सलाह करके सदन का कार्यक्रम निश्चित करता है।
  3. स्पीकर सदन के कार्यकारी नियमों की व्याख्या करता है।
  4. बिल पर वाद-विवाद के पश्चात् मतदान करवा कर परिणाम घोषित करता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संघीय संसद् की रचना का वर्णन करें।
उत्तर-
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, “संघ के लिए एक संसद् होगी जो राष्ट्रपति और दोनों सदनों-राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनेगी।””राज्यसभा संसद् का उपरि सदन है जो जनता का प्रतिनिधित्व न करके राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके 250 सदस्य हो सकते हैं जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। लोकसभा संसद् का निम्न सदन है। लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या 552 हो सकती है।

प्रश्न 2.
राज्यसभा की रचना लिखें।
उत्तर-
संविधान द्वारा राज्यसभा के सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या 250 हो सकती है जिनमें से 238 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले होंगे। 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जा सकते हैं, जिन्हें समाज सेवा, कला तथा विज्ञान, शिक्षा आदि के क्षेत्र में विशेष ख्याति प्राप्त हो चुकी है। आजकल राज्यसभा के कुल सदस्यों की संख्या 245 है।

प्रश्न 3.
लोकसभा की रचना लिखें।
उत्तर-
लोकसभा की कुल अधिकतम संख्या 552 हो सकती है। 552 सदस्यों का ब्यौरा इस प्रकार है-
(क) 530 सदस्य राज्यों में से चुने हुए,
(ख) 20 सदस्य संघीय क्षेत्रों में से चुने हुए और
(ग) 2 एंग्लो-इण्डियन जाति (Anglo-Indian Community) के सदस्य जिनको राष्ट्रपति मनोनीत करता है, यदि उसे विश्वास हो जाए कि इस जाति को लोकसभा में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है। आजकल लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 545 है। इसमें 543 निर्वाचित सदस्य हैं और 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा ऐंग्लो-इण्डियन नियुक्त किए हुए हैं।

प्रश्न 4.
लोकसभा का सदस्य बनने के लिए संविधान में लिखित कोई दो योग्यताएं बताएं।
उत्तर-
लोकसभा का सदस्य वही व्यक्ति बन सकता है जिसमें निम्नलिखित योग्यताएं हों-

  1. वह भारत का नागरिक हो,
  2. वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

प्रश्न 5.
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए कौन-सी दो योग्यताएं होनी चाहिएं ?
उत्तर-
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित हैं-

  1. वह भारत का नागरिक हो
  2. वह तीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

प्रश्न 6.
वित्त बिल किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वित्त बिल उसको कहते हैं जिसका सम्बन्ध टैक्स लगाने, बढ़ाने से तथा कम करने, खर्च करने, ऋण लेने, ब्याज देने आदि की बातों से हो। यदि इस बात पर शंका हो कि अमुक बिल धन बिल है या नहीं, तो इस सम्बन्ध में लोकसभा के स्पीकर का निर्णय अंतिम समझा जाता है। उस बिल को केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। धन बिल केवल मन्त्री ही पेश कर सकते हैं।

प्रश्न 7.
राज्यसभा के अध्यक्ष के कोई दो कार्य बताइए।
उत्तर-

  1. वह राज्यसभा के अधिवेशन में सभापतित्व करता है।
  2. वह राज्यसभा में शान्ति बनाए रखने तथा उसकी बैठकों को ठीक प्रकार से चलाने का ज़िम्मेदार है।

प्रश्न 8.
लोकसभा के अध्यक्ष को किस प्रकार चुना जाता है ?
उत्तर-
लोकसभा का अध्यक्ष सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुना जाता है। आम चुनाव के बाद लोकसभा अपनी प्रथम बैठक में अध्यक्ष का चुनाव करती है। उपाध्यक्ष का चुनाव भी उसी प्रकार होता है। 6 जून, 2014 को भारतीय जनता पार्टी की नेता सुमित्रा महाजन को सर्वसम्मति से 16वीं लोकसभा का अध्यक्ष चुना गया।

प्रश्न 9.
लोकसभा स्पीकर, डिप्टी स्पीकर तथा राज्यसभा के सभापति एवं उप-सभापति का नाम बताएं।
उत्तर-
पद का नाम — व्यक्ति का नाम
1. लोकसभा स्पीकर — श्रीमती सुमित्रा महाजन
2. लोकसभा का डिप्टी स्पीकर — श्री थंबी दुरई
3. राज्य सभा का सभापति — वेंकैया नायडू
4. राज्य सभा का उप-सभापति — श्री हरिवंश नारायण सिंह

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 29 संघीय व्यवस्थापिका–संसद्

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. भारत की विधानपालिका को क्या कहते हैं ?
उत्तर-भारत की विधानपालिका को संसद् कहते हैं।

प्रश्न 2. भारतीय संसद् के कितने सदन हैं ?
उत्तर- भारतीय संसद् के दो सदन हैं-

  1. लोकसभा
  2. राज्यसभा।

प्रश्न 3. राज्यसभा की अवधि कितनी है ?
उत्तर-राज्यसभा एक स्थायी सदन है।

प्रश्न 4. राज्यसभा के सदस्यों की अवधि कितनी है ?
उत्तर-राज्यसभा के सदस्यों की अवधि 6 वर्ष है।

प्रश्न 5. राज्यसभा के कितने सदस्य प्रति दो वर्ष बाद सेवानिवृत्त होते हैं ?
उत्तर-एक तिहाई सदस्य।

प्रश्न 6. राज्यसभा की अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर-राज्यसभा की अध्यक्षता उप-राष्ट्रपति करता है।

प्रश्न 7. लोकसभा के सदस्यों का कार्यकाल कितना है?
उत्तर-लोकसभा के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष है।

प्रश्न 8. लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या कितनी हो सकती है?
उत्तर-लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 हो सकती है।

प्रश्न 9. राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या कितनी हो सकती है?
उत्तर-राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है।

प्रश्न 10. राज्यसभा धन बिल को कितने समय तक रोक सकती है?
उत्तर-राज्यसभा धन बिल को अधिकतम 14 दिनों तक रोक सकती है।

प्रश्न 11. संसद् के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर-लोकसभा का स्पीकर।

प्रश्न 12. संसद् का कोई एक कार्य लिखें।
उत्तर-संसद् कानूनों का निर्माण करती है।

प्रश्न 13. संविधान अनुसार संसद् में कौन-कौन शामिल है?
उत्तर-

  1. लोकसभा,
  2. राज्यसभा तथा
  3. राष्ट्रपति।

प्रश्न 14. लोकसभा में 2 एंग्लो इंडियन सदस्यों को कौन मनोनीत करता है?
उत्तर-राष्ट्रपति।

प्रश्न 15. राज्यसभा में 12 सदस्यों को कौन मनोनीत करता है?
उत्तर-राष्ट्रपति।

प्रश्न 16. लोकसभा का सदस्य बनने के लिए कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर-25 वर्ष।

प्रश्न 17. राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 18. लोकसभा में सबसे अधिक सदस्य किस राज्य से आते हैं ?
उत्तर-उत्तर प्रदेश से।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. संविधान के अनुच्छेद ………….. में संसद् का वर्णन किया गया है।
2. ……….. संसद् का निम्न सदन है।
3. लोकसभा में अनुसूचित जातियों के लिए …………… स्थान आरक्षित रखे गए हैं।
4. लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए …………… स्थान आरक्षित रखे गए हैं।
उत्तर-

  1. 79
  2. लोकसभा
  3. 84
  4. 47.

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प्रश्न III. निम्नलिखित कथनों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. लोकसभा का सदस्य बनने के लिए 25 वर्ष की आयु होनी चाहिए।
2. राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए 35 वर्ष की आयु होनी चाहिए।
3. राष्ट्रपति राज्यसभा में 12 सदस्यों को नियुक्त कर सकता है।
4. प्रधानमन्त्री लोकसभा में 12 ऐंग्लो इंडियन सदस्यों को मनोनीत कर सकता है।
5. लोकसभा का चुनाव पांच वर्ष के लिए किया जाता है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या हो सकती है
(क) 250
(ख) 400
(ग) 500
(घ) 545.
उत्तर-
(क) 250।

प्रश्न 2.
संसद् के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता कौन करता है ?
(क) राज्यसभा का चेयरमैन
(ख) लोकसभा का स्पीकर
(ग) भारत का राष्ट्रपति
(घ) भारत का प्रधानमन्त्री।
उत्तर-
(ख) लोकसभा का स्पीकर।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित संसद का कार्य है-
(क) कानूनों का निर्माण करना
(ख) शासन करना
(ग) युद्ध की घोषणा करना
(घ) नियुक्तियां करना।
उत्तर-
(क) कानूनों का निर्माण करना।

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प्रश्न 4.
संविधान के अनुसार संसद् में सम्मिलित है
(क) लोकसभा, राज्यसभा और मन्त्रिमंडल
(ख) लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति
(ग) लोकसभा, राज्यसभा और प्रधानमन्त्री
(घ) लोकसभा, राज्यसभा और उप-राष्ट्रपति।
उत्तर-
(ख) लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राज्यपाल की नियक्ति, शक्तियों तथा स्थिति का वर्णन करें।
(Explain the appointment, powers and position of the Governor of a state.)
अथवा
राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है ? (How is the Governor of a State appointed ?)
अथवा
राज्यपाल की वास्तविक स्थिति की संक्षिप्त व्याख्या करें। (Explain briefly the actual position of a State Governor.)
अथवा
आपके राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है ? उसकी शक्तियों और स्थिति का वर्णन करें।
(How is the Governor of a State appointed ? Discuss his powers and position.)
उत्तर-
भारत में संघीय प्रणाली की व्यवस्था होने के कारण राज्यों की अलग-अलग सरकारें हैं। राज्य की सरकारों का संगठन बहुत कुछ संघीय सरकार से मिलता-जुलता है। संविधान के अनुच्छेद 153 में अंकित है कि “प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा और एक ही व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।” राज्य का शासन राज्यपाल के नाम पर चलता है जो राज्य का अध्यक्ष है, परन्तु राज्यों में भी केन्द्र की तरह संसदीय शासन-व्यवस्था होने के कारण राज्यपाल नाममात्र का तथा संवैधानिक अध्यक्ष है। राज्य का मन्त्रिमण्डल ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है और राज्यपाल की शक्तियों का प्रयोग करता है। राज्यपाल की स्थिति बहुत कुछ वैसी ही है जैसी कि केन्द्र में राष्ट्रपति की। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 से 160 राज्यपाल की नियुक्ति तथा कार्यो का वर्णन किया गया है।

राज्यपाल की नियुक्ति (Appointment)-प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है तथा वह राष्ट्रपति की कृपा दृष्टि (During the pleasure of the President) तक ही अपने पद पर रह सकता है। व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से ही राज्यपाल को नियुक्त करता है। 18 अगस्त, 2016 को श्री वी० पी० सिंह बदनौर (Sh. V.P. Singh Badnore) को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया।

राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में कुछ प्रथाएं स्थापित की गई हैं, जिनमें मुख्य निम्न प्रकार की हैं-

  • प्रथम परम्परा तो यह है कि ऐसे व्यक्ति को किसी राज्य में राज्यपाल नियुक्त किया जाता है जो उस राज्य का निवासी न हो।
  • दूसरे राष्ट्रपति किसी राज्यपाल को नियुक्त करने से पहले उस राज्य के मुख्यमन्त्री से भी इस बात का परामर्श लेता है।

योग्यताएं (Qualifications)-अनुच्छेद 157 के अन्तर्गत राज्यपाल के पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।
  • वह किसी राज्य में विधानमण्डल अथवा संसद् का सदस्य न हो तथा यदि हो, तो राज्यपाल का पद ग्रहण करने के समय उसका सदन वाला स्थान रिक्त समझा जाएगा।
  • राज्यपाल अपने पद पर नियुक्त होने के बाद किसी अन्य लाभदायक पद पर नहीं रह सकता।
  • वह किसी न्यायालय द्वारा दिवालिया घोषित न किया गया हो।

वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances)-राज्यपाल के वेतन, भत्ते तथा अन्य सुविधाओं को निश्चित करने का अधिकार संसद् को दिया गया है, परन्तु राज्यपाल की नियुक्ति के बाद उसके वेतन तथा अन्य सुविधाओं में उसके कार्यकाल में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता जिससे उसकी हानि हो। प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को 3,50,000 रु० मासिक, नि:शुल्क सरकारी कोठी तथा कुछ भत्ते भी मिलते हैं। भत्तों की राशि समस्त राज्यों में एक जैसी नहीं है। राज्य के वातावरण तथा आवश्यकताओं के अनुसार भत्ते अधिक तथा कम दिये जाते हैं।

कार्यकाल (Term) साधारणतया राज्यपाल को 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है और वह अपने पद पर तब तक रह सकता है जब तक उसे राष्ट्रपति चाहे। राष्ट्रपति 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है। 27 अक्तूबर, 1980 को राष्ट्रपति ने तामिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी को बर्खास्त किया। जनवरी, 1990 में राष्ट्रपति वेंकटरमण ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार की सलाह पर सभी राज्यपालों को त्याग-पत्र देने को कहा। अधिकतर राज्यपालों ने तुरन्त अपने त्याग-पत्र भेज दिए। राज्यपाल चाहे तो स्वयं भी 5 वर्ष से पूर्व त्याग-पत्र दे सकता है। 22 जून, 1991 को पंजाब के राज्यपाल जनरल ओ० पी० मल्होत्रा (O.P. Malhotra) ने पंजाब में चुनाव स्थगित किए जाने के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया।

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न्यायिक सुविधाएं (Immunities)-राज्यपाल को संविधान द्वारा कुछ न्यायिक सुविधाएं भी मिली हुई हैं-

  • उसको अपने पद की शक्तियों के प्रयोग तथा कर्तव्यों का पालन करने के लिए किसी भी न्यायालय के सम्मुख उत्तरदायी नहीं होना पड़ता।
  • उसके कार्यकाल में उसके विरुद्ध कोई फौजदारी अभियोग नहीं चलाया जा सकता।
  • अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी न्यायालय को उसे नजरबन्द करने की आज्ञा जारी करने का अधिकार नहीं है।
  • यदि किसी ने राज्यपाल के विरुद्ध दीवानी मुकद्दमा करना हो तो दो मास का नोटिस देना ज़रूरी है।

राज्यपाल का स्थानान्तरण (Transfer of Governor)-राष्ट्रपति जब चाहे किसी राज्य के राज्यपाल को दूसरे राज्य में स्थानान्तरण कर सकता है। उदाहरणस्वरूप 13 सितम्बर, 1977 को हरियाणा के राज्यपाल जय सुखलाल हाथी को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया और उड़ीसा के राज्यपाल हरचरण सिंह बराड़ को हरियाणा का राज्यपाल नियुक्त किया गया। 8 अक्तूबर, 1983 को पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल भैरव दत्त पांडे को पंजाब का राज्यपाल व पंजाब के राज्यपाल ए० पी० शर्मा को पश्चिमी बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया।

राज्यपाल की शक्तियां तथा कार्य (Powers and Functions of the Governor) –
राज्यपाल को लगभग वही शक्तियां तथा कार्य प्राप्त हैं जो केन्द्र में राष्ट्रपति को प्राप्त हैं। डी० डी० वसु (D.D. Basu) के शब्दों में, “राष्ट्रपति की आपात्कालीन शक्तियों और कूटनीतिक व सैनिक शक्तियों को छोड़ कर राज्यप्रशासन में शेष शक्तियां राष्ट्रपति की भांति राज्यपाल को भी प्राप्त हैं।”

राज्यपाल की शक्तियां तथा कार्य निम्नलिखित हैं-

(क) कार्यपालिका शक्तियां (Executive Powers)-संविधान के अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्तियां राज्यपाल में निहित की गई हैं जिनका प्रयोग या तो स्वयं प्रत्यक्ष रूप से करता है या अपने अधीन कार्यपालिका द्वारा करता है। राज्यपाल को निम्नलिखित कार्यपालिका शक्तियां प्राप्त हैं

  • राज्य का समस्त शासन गवर्नर के नाम से चलाया जाता है।
  • राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।
  • मन्त्री अपने पद पर राज्यपाल की कृपा-पर्यन्त रहते हैं। राज्यपाल भी मन्त्री को मुख्यमन्त्री की सलाह से हटा सकता है।
  • वह शासन के कार्य को सुविधापूर्वक चलाने के लिए तथा उस कार्य को मन्त्रियों में बांटने के लिए नियम बनाता है।
  • वह राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) और राज्य लोकसेवा आयोग के सभापति तथा अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। राज्यों में बड़े-बड़े पदाधिकारियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा ही की जाती है।
  • राष्ट्रपति उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय राज्यपाल की सलाह लेता है।
  • राज्यपाल मन्त्री के किसी निर्णय को मन्त्रिपरिषद् के पास विचार करने के लिए वापिस भेज सकता है।
  • वह प्रशासन के बारे में मुख्यमन्त्री से कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकता है।
  • असम के राज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि वह अनुसूचित कबीलों का ध्यान रखे।
  • राज्यपाल जब यह अनुभव करे कि राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो चुकी है कि राज्य प्रशासन लोकतन्त्रात्मक परम्पराओं के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तब वह राष्ट्रपति को इस सम्बन्ध में रिपोर्ट भेजता है और राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक संकट की घोषणा पर वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का शासन चलाता है।

(ख) विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)–राज्यपाल विधानमण्डल का सदस्य नहीं, फिर भी कानूननिर्माण में उसका महत्त्वपूर्ण हाथ है और इसलिए उसे विधानमण्डल का एक अंग माना जाता है। उसे निम्नलिखित विधायिनी शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता है।
  2. वह विधानमण्डल के दोनों सदनों में भाषण दे सकता है तथा उनको सन्देश भेज सकता है।
  3. वह विधानमण्डल के निम्न सदन विधानसभा को जब चाहे, भंग कर सकता है। अपने इस अधिकार का प्रयोग वह साधारणतया मुख्यमन्त्री के परामर्श पर ही करता है।
  4. प्रत्येक वर्ष विधानमण्डल का अधिवेशन राज्यपाल के भाषण से प्रारम्भ होता है जिसमें राज्य की नीति का वर्णन होता है।
  5. यदि राज्य विधानमण्डल में ऐंग्लो-इण्डियन जाति को उचित प्रतिनिधित्व न मिले, तो राज्यपाल उस जाति के एक सदस्य को विधानसभा में मनोनीत करता है।
  6. राज्य विधानमण्डल द्वारा पास हुआ बिल उतनी देर तक कानून नहीं बन सकता जब तक राज्यपाल अपनी स्वीकृति न दे दे। धन बिलों को राज्यपाल स्वीकृति देने से इन्कार नहीं कर सकता परन्तु साधारण बिलों को पुनर्विचार करने के लिए वापस भेज सकता है। यदि विधानमण्डल साधारण बिल दोबारा पास कर दे तो राज्यपाल को अपनी स्वीकृति देनी पड़ती है। राज्यपाल कुछ बिलों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है।
  7. वह राज्य विधानमण्डल के उपरि सदन (विधानपरिषद्) के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है। राज्यपाल ऐसे व्यक्तियों को मनोनीत करता है जिन्होंने विज्ञान, कला, साहित्य, समाज-सेवा आदि के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की हो।
  8. राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का भी अधिकार प्राप्त है। अध्यादेश को उसी प्रकार लागू किया जाता है जिस प्रकार विधानमण्डल के बनाए हुए कानून को, परन्तु यह अध्यादेश विधानमण्डल की बैठक आरम्भ होने के 6 सप्ताह के पश्चात् लागू नहीं रह सकता। यदि विधानमण्डल इस समय से पूर्व ही इसको समाप्त करने का प्रस्ताव पास कर दे, तो ऐसे अध्यादेशों का प्रभाव तुरन्त समाप्त हो जाता है। राज्यपाल स्वयं भी अध्यादेश वापस ले सकता है।
  9. राज्यपाल विधानपरिषद् के सभापति तथा उप-राष्ट्रपति के पद रिक्त होने पर किसी भी सदस्य को विधानपरिषद् की अध्यक्षता करने को कह सकता है।

(ग) वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-राज्यपाल को निम्नलिखित वित्तीय शक्तियां प्राप्त हैं-

  • राज्यपाल की सिफ़ारिश के बिना कोई धन-बिल विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता।
  • राज्यपाल वित्त मन्त्री द्वारा वार्षिक बजट विधानसभा में पेश करवाता है। कोई भी अनुदान की मांग (Demand for Grant) बजट में बिना राज्यपाल की आज्ञा के प्रस्तुत नहीं हो सकती।
  • राज्य की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of the State) पर राज्यपाल का ही नियन्त्रण है। यदि संकट के समय आवश्यकता पड़े, तो राज्यपाल इसमें से आवश्यकतानुसार व्यय कर लेता है तथा उसके पश्चात् विधानमण्डल से उस व्यय की स्वीकृति ले लेता है।

(घ) न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers)-राज्यपाल को निम्नलिखित न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं

  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति राज्यपाल की सलाह लेता है।
  • जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदोन्नति राज्यपाल ही करता है।
  • राज्यपाल उस अपराधी के दण्ड को क्षमा कर सकता है, घटा सकता है तथा कुछ समय के लिए स्थगित कर सकता है, जिसे राज्य से कानून के विरुद्ध अपराध करने पर दण्ड मिला हो।
  • राज्यपाल यह भी देखता है कि किसी न्यायालय के पास अधिक कार्य तो नहीं है। यदि हो, तो वह आवश्यकतानुसार अधिक न्यायाधीशों को नियुक्त कर सकता है।

(ङ) स्वैच्छिक अधिकार (Discretionary Powers)-राज्यपाल को कुछ स्वविवेकी शक्तियां भी प्राप्त हैं। स्वविवेकी शक्तियों का प्रयोग राज्यपाल अपनी इच्छा से करता है न कि मन्त्रिमण्डल के परामर्श से। राज्यपाल की मुख्य स्वविवेकी शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  • संघीय क्षेत्र के प्रशासक के रूप में यदि राष्ट्रपति ने राज्यपाल के समीप संघीय क्षेत्र (Union Territory) का प्रशासक भी नियुक्त कर दिया है तो उस क्षेत्र का प्रशासन स्वविवेक से चलाता है।
  • असम में आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में- असम राज्य के राज्यपाल को आदिम जातियों के सम्बन्ध में स्वविवेक से कार्य करने का अधिकार दिया गया है।
  • सिक्किम के राज्यपाल के विशेष उत्तरदायित्व-सिक्किम राज्य में शान्ति बनाए रखने के लिए तथा सिक्किम को जनसंख्या के सब वर्गों के सामाजिक तथा आर्थिक विकास के लिए सिक्किम के राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
  • राज्य में संवैधानिक संकट होने पर-प्रत्येक राज्यपाल अपने राज्य में संवैधानिक मशीनरी के फेल हो जाने का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को करता है जिस पर वह संकटकाल की घोषणा करता है। इस दशा में मन्त्रिपरिषद् को भंग कर दिया जाता है तथा वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
  • राज्यपाल अपने राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होता है।

राज्यपाल की स्थिति (Position of the Governor) – राज्यपाल एक संवैधानिक मुखिया के रूप में राज्य में राज्यपाल की स्थिति लगभग वही है जो कि संघीय सरकार में राष्ट्रपति की है। संविधान के दृष्टिकोण से सरकार की समस्त शक्तियां राज्यपाल में निहित हैं तथा मन्त्रिपरिषद् का कार्य उसको शासन में सहायता तथा परामर्श देना है। वह एक संवैधानिक शासक है तथा राज्य का सम्पूर्ण कार्य उसके नाम पर चलाया जाता है। राज्यपाल को जितनी भी शक्तियां प्राप्त हैं, उनका प्रयोग वह राज्य की मन्त्रिपरिषद् द्वारा करता है। हमारे संविधान में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि राज्यपाल के मन्त्रिपरिषद् के परामर्श को स्वीकार करना आवश्यक है अथवा नहीं, परन्तु देश तथा राज्यों में संसदीय प्रकार की सरकार स्थापित होने के कारण राज्यपाल को मन्त्रिपरिषद् की सम्मति से राज्य का प्रबन्ध चलाना पड़ता है। वास्तव में राज्यपाल की स्थिति एक संवैधानिक प्रमुख अथवा नाम मात्र प्रशासक की भान्ति है तथा राज्य की वास्तविक शक्ति मन्त्रिपरिषद् के पास है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

राज्यपाल केवल एक संवैधानिक मुखिया नहीं बल्कि वह एक प्रभावशाली अधिकारी है।
राज्यपाल के संवैधानिक प्रमुख होने का यह अर्थ नहीं कि उसका पद बिल्कुल ही प्रभावहीन है। चाहे उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिपरिषद् ही करती है फिर भी राज्यपाल शासन का महत्त्वपूर्ण अधिकारी होता है। वह राष्ट्रपति का प्रतिनिधि तथा राज्य में केन्द्रीय सरकार का प्रतिनिधि है। वह केन्द्रीय सरकार को अपने राज्यों के विषयों के सम्बन्ध में सूचित करता है। वह मन्त्रिपरिषद् को परामर्श देने, चेतावनी देने तथा उत्साह देने का अधिकार रखता है। वर्तमान संविधान के अधीन कुछ ऐसी परिस्थितियां भी हैं जिनके अनुसार राज्यपाल अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार कर सकता है, जो कि इस प्रकार हैं-

  • जब राष्ट्रपति संकटकालीन घोषणा करता है तो राज्यपाल राष्ट्रपति का प्रतिनिधि बन जाता है। उसको राष्ट्रपति की आज्ञाओं का पालन करना पड़ता है।
  • जब राज्यपाल राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट भेजता है कि राज्य-कार्य संविधान की धाराओं के अनुसार नहीं चलाया जा रहा, तो राज्य में संवैधानिक मशीनरी फेल हो जाने के कारण राज्यपाल केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि (Agent) की स्थिति में राज्य सरकार के वास्तविक शासक (Real Ruler) के रूप में कार्य करता है। जब राज्यपाल राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट भेजता है तब वह किसी दल का पक्ष भी ले सकता है।
  • जब विधानसभा के चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता तब राज्यपाल अपनी इच्छा से मुख्यमन्त्री को नियुक्त करता है।
  • मन्त्रिपरिषद् को भंग करते समय राज्यपाल अपनी इच्छा का प्रयोग कर सकता है। 1967 के चुनाव के बाद पश्चिमी बंगाल के राज्यपाल धर्मवीर ने अजय मुखर्जी के मन्त्रिमण्डल को भंग कर दिया और विधानसभा का अधिवेशन बुला कर यह तक नहीं देखा कि उनको विधानसभा में बहुमत प्राप्त है या नहीं।
  • विधानसभा का विघटन (Dissolution) करते समय जब तक बहुतम दल का नेता विधानसभा को भंग करने की सलाह राज्यपाल को देता है तब तो राज्यपाल को वह सलाह माननी पड़ती है, परन्तु इस सम्बन्ध में राज्यपाल को स्वविवेक का प्रयोग करने का अवसर तब प्राप्त होता है जबकि दल-बदल के कारण या अन्य किसी कारण से सरकार अल्पमत में रह गई हो।
  • राज्यपाल मुख्यमन्त्री से प्रशासन सम्बन्धी तथा वैधानिक कार्यों के सम्बन्ध में सूचना प्राप्त करने का अधिकार रखता है।
  • विधानमण्डल द्वारा पास किए बिल को अस्वीकार करते समय अथवा उसको विधानमण्डल के पुनर्विचार के लिए भेजते समय।
  • राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजते समय।
  • इसके अतिरिक्त असम के राज्यपाल को कुछ अधिक स्वैच्छिक (Discretionary) अधिकार प्राप्त हैं। उसको कुछ विशेष कबीलों तथा क्षेत्रों के राज्य-प्रबन्ध के लिए अपनी स्वेच्छानुसार कार्य करने की स्वतन्त्रता है।

पायली ने ठीक ही कहा है कि, “राज्यपाल न तो नाममात्र का अध्यक्ष है, न ही रबड़ की मोहर है बल्कि एक ऐसा अधिकारी है जो राज्य के प्रशासन और जीवन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला है।” राज्यपाल के कर्त्तव्यों के विषय में स्वर्गीय राष्ट्रपति श्री वी० वी० गिरि के शब्दों में, “राज्यपालों को संविधान के उपबन्धों, अपनी श्रेष्ठ बुद्धि और योग्यता के अनुसार जनता के हितों के लिए काम करना चाहिए।”

प्रश्न 2.
मन्त्रिपरिषद् का निर्माण किस तरह होता है ? मन्त्रिपरिषद् की शक्तियों का वर्णन करें।
(How is the Council of Ministers formed ? Explain its powers.)
उत्तर-
हमारे संविधान में केन्द्र तथा प्रान्तों में संसदीय शासन-व्यवस्था का प्रबन्ध किया गया है। अनुच्छेद 163 में लिखा हुआ है कि राज्यपाल की सहायता तथा उसको परामर्श देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होगी, जिसका मुखिया मुख्यमन्त्री होगा। राज्यपाल के कुछ अधिकारों को छोड़ कर शेष सभी अधिकारों का प्रयोग करने का अधिकार मन्त्रिपरिषद् को ही है। अतः केन्द्र की तरह प्रान्तों को शासन वास्तव में मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही चलाया जा सकता है।

मन्त्रिपरिषद् का निर्माण (Formation of the Council of Ministers)–मन्त्रिपरिषद् के निर्माण के लिए सबसे पहला महत्त्वपूर्ण पग मुख्यमन्त्री की नियुक्ति है। राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् के अध्यक्ष मुख्यमन्त्री को सर्वप्रथम नियुक्त करता है, परन्तु राज्यपाल उसे अपनी इच्छा से नियुक्त नहीं कर सकता। जिस दल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त होता है, उसी दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया जाता है। मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। मन्त्रियों के लिए विधानमण्डल के दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त किया जाए जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, तो उसको 6 महीने के के अन्दर-अन्दर विधानमण्डल के किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है। दिसम्बर, 2003 में पारित 91वें संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है, कि राज्य मन्त्रिपरिषद का आकार विधानपालिका के निचले सदन (विधानसभा) की कुल सदस्य संख्या का 15% होगा। मार्च, 2017 में पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने अपने 9 सदस्यीय मन्त्रिपरिषद् का निर्माण किया।
विभागों का वितरण (Distribution of Portfolios)—संविधान के अनुसार मन्त्रियों में विभागों का विभाजन करने का उत्तरदायित्व राज्यपाल का है, परन्तु वास्तव में यह कार्य मुख्यमन्त्री द्वारा किया जाता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे अपने मन्त्रियों के विभागों को बदल सकता है।

कार्यकाल (Term of Office) मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल निश्चित नहीं है। वह अपने कार्यों के लिए सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है अर्थात् मन्त्रिपरिषद् उसी समय तक अपने पद पर रह सकती है जब तक कि उसे विधानसभा का विश्वास प्राप्त हो।

मन्त्रिपरिषद् की शक्तियां और कार्य (Powers and Functions of the Council of Ministers) राज्य की मन्त्रिपरिषद् की शक्तियां और कार्य भी संघीय मन्त्रिपरिषद् के कार्यों से मिलते-जुलते हैं। इसकी शक्तियों और कार्यों का उल्लेख निम्नलिखित कई श्रेणियों में किया जा सकता है-

  • नीति का निर्धारण (Determination of Policy)-मन्त्रिपरिषद् का मुख्य कार्य प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करना है। मन्त्रिपरिषद् राज्य की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं का हल निकालती है। नीतियां बनाते समय मन्त्रिपरिषद् अपने दल के कार्यक्रम व नीतियों को ध्यान में रखती है। मन्त्रिपरिषद् केवल नीति का निर्णय नहीं करती बल्कि उसे विधानमण्डल की स्वीकृति के लिए भी प्रस्तुत करती है।
  • प्रशासन पर नियन्त्रण (Control over Administration)—शासन को अच्छी प्रकार चलाने के लिए कई विभागों में बांटा जाता है और प्रत्येक विभाग किसी-न-किसी मन्त्री के अधीन होता है। विभाग में मन्त्री के अधीन कई सरकारी कर्मचारी होते हैं जो उसकी आज्ञानुसार कार्य करते हैं। मन्त्री को अपने विभाग का शासन मन्त्रिपरिषद् की निश्चित नीति के अनुसार चलाना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् प्रशासन चलाने के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है।
  • कानून को लागू करना तथा व्यवस्था को बनाए रखना (Enforcement of Law and Maintenance of Order)-राज्य के विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानून को लागू करना मन्त्रिपरिषद् की ज़िम्मेवारी है। कानून का तब तक कोई महत्त्व नहीं है जब तक उसे लागू न किया जाए और कानूनों को सख्ती से अथवा नर्मी से लागू करना मन्त्रिपरिषद् पर निर्भर करता है। राज्य के अन्दर शान्ति को बनाए रखना मन्त्रिपरिषद् का कार्य है।
  • नियुक्तियां (Appointments)-राज्य की सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां राज्यपाल मन्त्रिमण्डल के परामर्श से करता है। वास्तव में नियुक्तियों के सम्बन्ध में सभी निर्णय मन्त्रिमण्डल के द्वारा लिए जाते हैं और राज्यपाल उन सभी निर्णयों के अनुसार नियुक्तियां करता है। इन नियुक्तियों में एडवोकेट जनरल, राज्य के लोक-सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य, राज्य में विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों के पद इत्यादि सम्मिलित हैं।
  • विधायिनी शक्तियां (Legislative Powers)-राज्य के कानून निर्माण में मन्त्रिपरिषद् का मुख्य हाथ होता है। मन्त्रिपरिषद के सभी सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं। ये विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं तथा वोट डालते हैं। सभी महत्त्वपूर्ण बिल मन्त्रिपरिषद् द्वारा तैयार किये जाते हैं और किसी-न-किसी मन्त्री द्वारा विधानमण्डल में पेश किए जाते हैं। मन्त्रिपरिषद् को विधानमण्डल में बहुमत प्राप्त होता है, जिस कारण इसके द्वारा पेश किए गए सभी बिल पास हो जाते हैं। मन्त्रिपरिषद् की इच्छा के विरुद्ध कोई कानून पास नहीं हो सकता।
  • वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-राज्य का बजट मन्त्रिमण्डल द्वारा ही तैयार किया जाता है। मन्त्रिपरिषद् ही इस बात का निर्णय करती है कि कौन से नए कर लगाए जाएं और किस कर में कमी या बढ़ौतरी की जाए। बहुमत का समर्थन प्राप्त होने के कारण यह अपनी इच्छानुसार उन्हें पास करवा लेती है।
  • विभागों में तालमेल (Coordination among the Departments)-मन्त्रिपरिषद् का कार्य राज्य का प्रशासन ठीक प्रकार से चलाना है तथा मन्त्रिमण्डल का मुख्य कार्य भिन्न-भिन्न विभागों में तालमेल उत्पन्न करना है ताकि राज्य का प्रशासन-प्रबन्ध अच्छी तरह से चलाया जा सके। विभिन्न विभागों के मतभेदों को दूर करना मन्त्रिमण्डल का कार्य है।

मन्त्रिपरिषद् की स्थिति (Position of the Council of Ministers)—निःसन्देह मन्त्रिपरिषद् ही राज्य की वास्तविक शासक है। राज्य के कानून बनवाने, उन्हें लागू करने तथा शासन करने में उसकी इच्छा ही प्रधान रहती है। मन्त्रिपरिषद् को वास्तविक स्थिति कुछ कारकों पर निर्भर है-(क) यदि मन्त्रिपरिषद् केवल एक दल से ही सम्बन्धित है और उस दल को विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त है तथा इसके साथ-साथ दलीय अनुशासन दृढ़ होने के नाते दलबदली की सम्भावना कम है तो मन्त्रिपरिषद् वास्तविक शासक होती है। (ख) यदि मन्त्रिपरिषद् मिली-जुली (Coalition) हो तो यह इतनी सुदृढ़ और शक्तिशाली नहीं होती (ग) धारा 356 के अन्तर्गत संकटकालीन घोषणा के दौरान तो मन्त्रिपरिषद् होती ही नहीं।

प्रश्न 3.
भारतीय संघ के राज्यों में नाममात्र कार्यपालिका तथा वास्तविक कार्यपालिका कौन होता है ? वास्तविक कार्यपालिका की शक्तियों की व्याख्या करे।
(Who is the Nominal Executive and Real Executive in the States of the Indian Union ? Explain the powers and position of the Real Executive.)
उत्तर-
भारतीय संघ के राज्यों में केन्द्र की तरह संसदीय प्रणाली की व्यवस्था की गई है। जिस तरह केन्द्र में राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है, उसी तरह राज्यों में राज्यपाल नाममात्र की कार्यपालिका है। राज्य का शासन राज्यपाल के नाम पर चलता है जो राज्य का अध्यक्ष परन्तु राज्यपाल नाममात्र का तथा संवैधानिक अध्यक्ष है। राज्य का मन्त्रिमण्डल ही राज्य की वास्तविक कार्यपालिका है और राज्यपाल की शक्तियों का प्रयोग करता है। केन्द्र की तरह राज्यों का शासन वास्तव में मन्त्रिपरिषद् द्वारा चलाया जाता है।
वास्तविक कार्यपालिका की शक्तियां एवं स्थिति-इसके लिए पिछला प्रश्न देखिए।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

प्रश्न 4.
मुख्यमन्त्री को कौन नियुक्त करता है ? उसकी शक्तियों तथा स्थिति की व्याख्या करें।
(Who appoints the Chief Minister ? Discuss his powers and position.)
उत्तर-
राज्य का समस्त प्रशासन राज्यपाल के नाम पर ही चलाया जाता है परन्तु वास्तव में प्रशासन को राज्यपाल अपनी इच्छा के अनुसार न चला कर मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार चलाता है और मन्त्रिमण्डल मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है। राज्य में मुख्यमन्त्री की लगभग वही स्थिति है जो केन्द्र में प्रधानमन्त्री की अर्थात् देश का वास्तविक शासक प्रधानमन्त्री तथा राज्य का वास्तविक शासक मुख्यमन्त्री है।

नियुक्ति (Appointment)-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे, मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में राज्यपाल को या तो विधानसभा में सबसे अधिक स्थान प्राप्त दल के नेता को अथवा यदि कुछ दलों ने मिलकर सभा में सबसे अधिक स्थान प्राप्त दल के नेता को अथवा यदि कुछ दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा और उन्हें स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया तो ऐसे मिले-जुले दलों के नेता को मुख्यमन्त्री पद पर नियुक्त करना चाहिए। फरवरी, 1992 में पंजाब विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस (ई) को भारी बहुमत प्राप्त हुआ और राज्यपाल ने कांग्रेस (इ) के नेता बेअन्त सिंह को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया। फरवरी, 1997 की पंजाब राज्य विधानसभा के चुनावों के पश्चात् अकाली दल व भारतीय जनता पार्टी गठजोड़ को भारी सफलता प्राप्त हुई और सरदार प्रकाश सिंह बादल राज्य के मुख्यमन्त्री बने। फरवरी, 2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और राज्यपाल ने कांग्रेस के कैप्टन अमरिन्दर सिंह को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया। फरवरी, 2017 में हुए पंजाब विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी सफलता प्राप्त हुई तथा कैप्टन अमरिन्दर सिंह राज्य के मुख्यमन्त्री नियुक्त किये गए।

वेतन और भत्ते (Salary and Allowances)—मुख्यमन्त्री के वेतन तथा भत्ते राज्य विधानमण्डल द्वारा निश्चित किए जाते हैं।
अवधि (Term of Office)-मुख्यमन्त्री का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं है। वह उसी समय तक अपने पद पर रह सकता है जब तक कि विधानसभा का बहुमत उसके साथ है। राज्यपाल अपनी इच्छानुसार जब चाहे उसे अपदस्थ नहीं कर सकता और बहुमत का समर्थन खोने पर वह पद पर नहीं रह सकता। मुख्यमन्त्री स्वयं भी जब चाहे, त्यागपत्र दे सकता है। 21 नवम्बर, 1996 को पंजाब के मुख्यमन्त्री हरचरण सिंह बराड़ ने अपना त्याग-पत्र राज्यपाल छिब्बर को दे दिया।

मुख्यमन्त्री की शक्तियां तथा कार्य (Powers and Functions of the Chief Minister)-मुख्यमन्त्री की शक्तियों और कार्यों को निम्नलिखित कई भागों में बांटा जा सकता है-

1. मुख्यमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् (Chief Minister and the Council of Minister)-मुख्यमन्त्री के बिना मन्त्रिपरिषद् का कोई अस्तित्व नहीं है। प्रधानमन्त्री की तरह उसे भी ‘मन्त्रिमण्डल रूपी मेहराब की आधारशिला’ (Keystone of the Cabinet arch) कहा जा सकता है। मुख्यमन्त्री की मन्त्रिपरिषद् से सम्बन्धित शक्तियां निम्नलिखित हैं-

(क) मन्त्रिपरिषद् का निर्माण (Formation of the Council of Ministers)-राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्यपाल मुख्यमन्त्री के परामर्श से करता है। मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् उन व्यक्तियों की सूची तैयार करता है जिन्हें वह मन्त्रिपरिषद् में लेना चाहता है। मुख्यमन्त्री मन्त्रियों की सूची तैयार करके राज्यपाल को भेजता है और राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात् सूची में दिए गए व्यक्ति मन्त्री नियुक्त कर दिए जाते हैं। राज्यपाल सूची में दिए गए व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त करने से इन्कार नहीं कर सकता। मन्त्रिपरिषद् के निर्माण का वास्तविक कार्य मुख्यमन्त्री का है। दिसम्बर, 2003 में पारित 91वें संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है, कि राज्य मन्त्रिपरिषद् का आकार विधानपालिका के निचले सदन (विधानसभा) की कुल सदस्य संख्या का 15% होगा। मार्च, 2017 में पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने अपने 9 सदस्यीय मन्त्रिपरिषद् का निर्माण किया।

(ख) मन्त्रियों की पदच्युति (Removal of Ministers)—मुख्यमन्त्री मन्त्रियों को अपने पद से हटा भी सकता है। यदि वह किसी मन्त्री के काम से प्रसन्न न हो या उसके विचार मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों, तो वह उस मन्त्री को त्याग-पत्र देने के लिए कह सकता है। यदि मन्त्री त्याग-पत्र न दे, तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को बर्खास्त करवा सकता है। यदि मन्त्री उसकी इच्छानुसार त्याग-पत्र न दे तो वह स्वयं भी अपना त्यागपत्र दे सकता है जिसका अर्थ यह होगा समस्त मन्त्रिपरिषद् का त्याग-पत्र। बहुमत दल का नेता होने के कारण जब दोबारा मन्त्रिमण्डल बनाने लगे, तो उस मन्त्री को छोड़कर अन्य सभी मन्त्रियों को मन्त्रिपरिषद् में ले सकता है। 16 फरवरी, 1993 को हरियाणा के मुख्यमन्त्री भजनलाल की सलाह पर राज्यपाल ने विज्ञान एवं टेकनालोजी राज्यमन्त्री डॉ० राम प्रकाश को बर्खास्त कर दिया।

(ग) विभागों का वितरण (Distribution of Portfolios)-मुख्यमन्त्री मन्त्रियों को केवल नियुक्त ही नहीं करता बल्कि उनमें विभागों का वितरण भी करता है। वह किसी भी मन्त्री को कोई भी विभाग दे सकता है। कोई भी मन्त्री यह मांग नहीं कर सकता कि उसे कोई विशेष विभाग मिलना चाहिए। मुख्यमन्त्री जब चाहे मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है। उदाहरणस्वरूप पंजाब के मुख्यमन्त्री हरचरण सिंह बराड़ ने 7 फरवरी, 1996 को अपने मन्त्रिमण्डल का विस्तार किया और मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन किया था।

(घ) मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष (Chairman of the Council of Ministers)-मन्त्रिपरिषद् अपना समस्त कार्य मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में ही करती है। मुख्यमन्त्री ही परिषद् की बैठक बुलाता है और इस बात का निश्चय करता है कि बैठक कब और कहां बुलाई जाए तथा उसमें किस विषय पर विचार किया जाएगा। मुख्यमन्त्री मन्त्रिपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करता है और मन्त्रिपरिषद् के निर्णय भी अधिकतर मुख्यमन्त्री की इच्छानुसार ही होते हैं।

(ङ) मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व एवं प्रतिनिधित्व (Leadership and Representative of Cabinet)-मुख्यमन्त्री मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व और प्रतिनिधित्व करता है। इसके महत्त्वपूर्ण निर्णयों की घोषणा जनता तथा विधानमण्डल के सामने मुख्यमन्त्री के द्वारा ही की जाती है। शासन की नीति पर मुख्यमन्त्री ही प्रकाश डालता है और उस पर उत्पन्न हुए मतभेदों का स्पष्टीकरण करता है।

2. राज्यपाल और मन्त्रिपरिषद के बीच कड़ी (Link between the Governor and Council of Ministers)-मुख्यमन्त्री ही मन्त्रिपरिषद् तथा राज्यपाल के बीच कड़ी है। कोई भी मन्त्री मुख्यमन्त्री की आज्ञा के बिना राज्यपाल से मिलकर प्रशासनिक मामलों के बारे में बातचीत नहीं कर सकता। मन्त्रिपरिषद् के बारे में मुख्यमन्त्री ही राज्यपाल को सूचित करता है। राज्यपाल भी, यदि उसे प्रशासन के बारे में कोई सूचना चाहिए, मुख्यमन्त्री के द्वारा ही प्राप्त कर सकता है।

3. शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय (Co-ordination among the different Departments)शासन के विभिन्न विभागों में तालमेल होना आवश्यक है क्योंकि एक विभाग की नीतियों का दूसरे विभाग पर आवश्यक प्रभाव पड़ता है। यह तालमेल मुख्यमन्त्री द्वारा पैदा किया जाता है। मुख्यमन्त्री विभिन्न विभागों की देख-रेख करता है
और इस बात का ध्यान रखता है कि किसी विभाग की नीति का दूसरे विभाग पर बुरा प्रभाव न पड़े।

4. राज्यपाल का मुख्य सलाहकार (Principal Adviser of the Governor)—मुख्यमन्त्री राज्यपाल का मुख्य सलाहकार है और सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देता है। राज्यपाल प्रायः सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री की सलाह मान लेता है सिवाय उन विषयों को छोड़कर, जब वह केन्द्रीय सरकार के निर्देशन में काम कर रहा हो।

5. विधानमण्डल का नेता (Leader of the State Legislature)-मुख्यमन्त्री विधानमण्डल का नेता समझा जाता है जिसके नेतृत्व तथा मार्गदर्शन में विधान मण्डल अपना काम करता है। वह विधानसभा में बहुमत दल का नेता होता है और इसलिए विधानसभा उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकती। किसी गम्भीर समस्या के होने पर विधानमण्डल तथा पथ-प्रदर्शन के लिए मुख्यमन्त्री की ओर ही देखता है। दूसरे मन्त्रियों की ओर से दिए गए वक्तव्यों को स्पष्ट करना तथा यदि कोई ग़लत बात हो गई हो तो उसे ठीक करने का अधिकार भी मुख्यमन्त्री को ही है।

6. विधानसभा का विघटन (Dissolution of the Legislative Assembly)-मुख्यमन्त्री विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है और जब इस सदन में उसे बहुमत प्राप्त न रहे तब उसके सामने दो रास्ते होते हैं। प्रथम, या तो वह त्यागपत्र दे दे। द्वितीय, या फिर वह राज्यपाल को सलाह देकर सदन को विघटित कर सकता है। प्रायः राज्यपाल विघटन की मांग को अस्वीकार नहीं करता।

7. नियुक्तियां (Appointments)-राज्य में होने वाली सभी बड़ी-बड़ी नियुक्तियां मुख्यमन्त्री के हाथों में हैं। मन्त्री, एडवोकेट जनरल, लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष तथा अन्य सदस्य, राज्य में स्थित यूनिवर्सिटियों के उप-कुलपति आदि की नियुक्तियां राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह के अनुसार करता है।

8. जनता का नेता (Leader of People)-मुख्यमन्त्री उसी प्रकार से राज्य की जनता का नेता है जिस प्रकार प्रधानमन्त्री समस्त राष्ट्र का नेता माना जाता है। राज्य की जनता का उसमें दृढ़ विश्वास रहता है और इस कारण उसकी स्थिति और भी महत्त्वपूर्ण बन जाती है। राज्य में होने वाले सामाजिक समारोहों का नेतृत्व भी मुख्यमन्त्री करता है। जैसे ज्ञानी जैलसिंह ने हरमन्दिर साहिब में हुई कार सेवा, गुरु गोबिन्द मार्ग की महायात्रा और रामचरित मानस की चार सौ साला शताब्दी के समारोहों का नेतृत्व किया।

9. दल का नेता (Leader of the Party)-मुख्यमन्त्री अपने दल का राज्य में नेतृत्व करता है, राज्य में दलों को संचालित करता है और नीतियां बनाता तथा उसका प्रचार करना उसी का कार्य है। चुनाव में मुख्यमन्त्री अपने दल का मुख्य वक्ता बन जाता है और अपने दल के उम्मीदवारों को चुनावों में विजयी करवाने में भरसक प्रयत्न करता है।

मुख्यमन्त्री की स्थिति (Position of the Chief Minister) राज्य में मुख्यमन्त्री की वही स्थिति है जोकि केन्द्र में प्रधानमन्त्री की है। राज्य में समस्त प्रशासन पर उसका प्रभाव रहता है। उसकी इच्छा के विरुद्ध न कोई कानून बन सकता है और न ही कोई टैक्स आदि लगाया जा सकता है। उसके मुकाबले में अन्य मन्त्रियों की स्थिति कुछ महत्त्व नहीं रखती। परन्तु मुख्यमन्त्री की वास्तविक स्थिति इस पर निर्भर करती है कि उसके राजनीतिक दल को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो।

मुख्यमन्त्री की वास्तविक स्थिति न केवल अपने दल के विधानसभा में बहुमत पर निर्भर करती है बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसके दल के सदस्य उसे कितना सहयोग देते हैं। मुख्यमन्त्री की स्थिति पार्टी की हाईकमान और प्रधानमन्त्री के समर्थन पर भी निर्भर करती है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

मुख्यमन्त्री की स्थिति उसके अपने व्यक्तित्व तथा राज्यपाल के व्यक्तित्व पर भी निर्भर करती है। चाहे मुख्यमन्त्री एक ही दल का नेता हो और उसे अपने दल का भी सहयोग प्राप्त हो, तब भी वह तानाशाह नहीं बन सकता, क्योंकि उसकी शक्तियों पर निम्नलिखित सीमाएं हैं जो उसे तानाशाह बनने नहीं देती-

  • विरोधी दल (Opposition Parties)-मुख्यमन्त्री को विरोधी दलों के होते हुए शासन चलाना होता है और विरोधी दल मुख्यमन्त्री की विधानमण्डल के अन्दर तथा बाहर आलोचना करके उसको तानाशाह बनने से रोकते हैं।
  • राज्य विधानमण्डल (State Legislature)-मुख्यमन्त्री राज्य विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होता है और विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव पास करके मुख्यमन्त्री को हटा सकती है।
  • गवर्नर (Governor)–यदि मुख्यमन्त्री जनता के हित के विरुद्ध कार्य करे तथा प्रजातन्त्र के सिद्धान्तों के विरुद्ध चले, तो गवर्नर अपनी स्वेच्छाचारी शक्तियों का प्रयोग मुख्यमन्त्री के विरुद्ध कर सकता है।
    संक्षेप में, मुख्यमन्त्री की स्थिति उसके अपने व्यक्तित्व और उसके दल के समर्थन पर निर्भर करती है।

प्रश्न 5.
मुख्यमन्त्री तथा राज्यपाल के पारस्परिक सम्बन्धों की व्याख्या करें।
(Discuss the relations between Chief Minister and Governor.)
उत्तर-
मुख्यमन्त्री तथा राज्यपाल में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राज्यपाल राज्य का मुखिया है जबकि मुख्यमन्त्री सरकार का मुखिया है।

  • मुख्यमन्त्री की नियुक्ति-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता हैं। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त होता है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है।
  • मुख्यमन्त्री को हटाना-राज्यपाल मुख्यमन्त्री को जब चाहे अपनी इच्छानुसार अपदस्थ नहीं कर सकता है। मुख्यमन्त्री बहुमत का समर्थन प्राप्त न होने पर पद पर नहीं रह सकता। यदि मुख्यमन्त्री विधानसभा को यह अवसर नहीं देता कि विधानसभा उसके विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर सके तो राज्यपाल उसे हटा सकता है।
  • मन्त्रियों की नियुक्ति-मन्त्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से करता है। मुख्यमन्त्री मन्त्रियों की सूची तैयार करके राज्यपाल को भेजता है और राज्यपाल सूची में दिए गए व्यक्तियों को मन्त्री नियुक्त करता है।
  • मन्त्रियों की पच्युति-राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से मन्त्रियों को हटा सकता है। परन्तु यदि मुख्यमन्त्री ने अपने मन्त्रिमण्डल में किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री रखा हुआ है जिसके विरुद्ध रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि के दोष हों तो राज्यपाल उसे पद से हटा सकता है, बेशक मुख्यमन्त्री का विश्वास अभी भी उस मन्त्री में हो।
  • मुख्यमन्त्री राज्यपाल का सलाहकार-मुख्यमन्त्री राज्यपाल का मुख्य सलाहकार है और सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देता है। राज्यपाल प्रायः सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री की सलाह मान लेता है। सिवाय उन विषयों को छोड़कर जब वह केन्द्रीय सरकार के निर्देशन में काम कर रहा हो।
  • राज्यपाल का प्रशासनिक सूचना प्राप्त करने का अधिकार-राज्यपाल को यह अधिकार प्राप्त है कि वह समय-समय पर प्रशासनिक मामलों में जानकारी प्राप्त करने के लिए मुख्यमन्त्री से आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकता है। मुख्यमन्त्री का भी यह कर्त्तव्य है कि मन्त्रिपरिषद् के सभी निर्णयों की सूचना राज्यपाल को दे। वह मुख्यमन्त्री को किसी ऐसे मामले के लिए जिस पर एक मन्त्री ने निर्णय लिया हो, समस्त मन्त्रिपरिषद् के सम्मुख विचार के लिए रखने को कह सकता है। इस प्रकार राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् को सलाह भी दे सकता है, प्रोत्साहन और चेतावनी भी।
  • नियुक्तियां- राज्य में होने वाली सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से करता है।
  • विधानसभा का विघटन–मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर विधानसभा को भंग करवा सकता है। प्रायः राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह मान लेता है परन्तु कई स्थितियों में सलाह मानने से इन्कार कर सकता है। 1967 में पंजाब में राज्यपाल ने विधानसभा को भंग करने की मुख्यमन्त्री गुरनाम सिंह की सिफ़ारिश को नहीं माना।
  • स्वैच्छिक अधिकार-राज्यपाल को कुछ स्वैच्छिक अधिकार प्राप्त होते हैं जिनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है न कि मुख्यमन्त्री की सलाह से।

प्रश्न 6.
भारतीय संघ के राज्यों में मन्त्रिमण्डल प्रणाली की कार्य-विधि की व्याख्या कीजिए।
(Explain the working principles of the cabinet system in the states of the Indian Union.)
उत्तर-
राज्यों में संसदीय शासन व्यवस्था है। मन्त्रिमण्डल ही राज्यों का वास्तविक शासक है और उसकी सलाह के बिना तथा सलाह के विरुद्ध राज्यपाल कोई कार्य नहीं कर सकता। मन्त्रिमण्डल के महत्त्व के कारण संसदीय शासन प्रणाली को मन्त्रिमण्डल शासन प्रणाली भी कहा जाता है। राज्यों की मन्त्रिमण्डल प्रणाली की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

  • नाममात्र का अध्यक्ष (Nominal Head)-राज्यपाल नाममात्र का अध्यक्ष है। समस्त शासन उसी के नाम से चलाया जाता है परन्तु वास्तव में शासन मन्त्रिमण्डल द्वारा चलाया जाता है। वह राज्य का मुखिया है, सरकार का नहीं। सरकार का मुख्यिा मुख्यमन्त्री है।
  • कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठता (Close Relation between the Executive and Legislature)-राज्यों की विधानपालिका और मन्त्रिमण्डल में घनिष्ठ सम्बन्ध है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं, वाद-विवाद में हिस्सा लेते हैं, बिल पेश करते हैं, बिलों को पास कराते और मतदान कराते हैं।
  • मुख्यमन्त्री का नेतृत्व (Leadership of the Chief Minister)-राज्यों के मन्त्रिमण्डल अपना समस्त कार्य मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में करते हैं। मुख्यमन्त्री ही अन्य मन्त्रियों की नियुक्तियां करता है। मुख्यमन्त्री ही मन्त्रियों में विभागों का बंटवारा करता है और जब चाहे विभाग बदल सकता है। उनके कार्यों की देख-भाल मुख्यमन्त्री ही करता है। मन्त्रिमण्डल की बैठकें मुख्यमन्त्री के द्वारा ही बुलाई जाती हैं और वही अध्यक्षता करता है। मुख्यमन्त्री का त्याग-पत्र समस्त मन्त्रिमण्डल का त्याग-पत्र समझा जाता है।
  • राजनीतिक एकता (Political Homogeneity)—कैबिनेट प्रणाली में मन्त्रिपरिषद् के सभी सदस्य एक ही दल से लिए जाते हैं। इसके फलस्वरूप उनके विचार तथा सिद्धान्तों में एकता होती है। राज्यों में प्रायः मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही राजनीतिक दल से लिए जाते हैं।
  • मन्त्रिमण्डल की एकता (Unity of the Cabinet) राज्य मन्त्रिमण्डल प्रणाली की एक यह भी विशेषता है कि मन्त्रिमण्डल एक इकाई के रूप में काम करता है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य “इकडे आते और इकटे जाते हैं।” किसी एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास होने पर सभी मन्त्रियों को अपना त्याग-पत्र देना पड़ता है। मन्त्री इकट्ठे तैरते हैं और इकट्ठे डूबते हैं।
  • गोपनीयता (Secrecy)-मन्त्रिमण्डल की कार्यवाहियों की गोपनीयता शासन प्रणाली की एक विशेषता है। कोई भी मन्त्री मन्त्रिमण्डल की बैठक में हुए गुप्त वाद-विवाद तथा निर्णय आदि को सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित नहीं कर सकता और न ही किसी को बता सकता है।
  • मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व (Responsibility of the Cabinet)-मन्त्रिमण्डल की एक यह भी विशेषता है कि वह अपने कार्यों के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। मन्त्रिमण्डल को मनमानी करने का अधिकार नहीं है। विधानमण्डल के सदस्य मन्त्रियों से उनके प्रशासकीय विभागों के सम्बन्ध और पूरक प्रश्न (Supplementary questions) पूछ सकते हैं जिनका उन्हें उत्तर देना पड़ता है। यदि विधानसभा में मन्त्रिमण्डल बहुमत का समर्थन खो बैठे तो उसे त्याग-पत्र देना पड़ता है।
  • मन्त्रिमण्डल की समितियां (Committees in the Cabinet) राज्यों के मन्त्रिमण्डल में भिन्न-भिन्न विषयों में कई समितियां स्थापित की गई हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्यपाल की नियुक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यपाल की नियुक्ति–प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है तथा वह राष्ट्रपति की कृपा दृष्टि तक ही अपने पद पर रह सकता है। व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से ही राज्यपाल को नियुक्त करता है।
राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में कुछ प्रथाएं स्थापित हो गई हैं, जिनमें मुख्य निम्न प्रकार हैं-

  • प्रथम परम्परा तो यह है कि ऐसे व्यक्ति को किसी राज्य में राज्यपाल नियुक्त किया जाता है जो उस राज्य का निवासी न हो।
  • दूसरे, राष्ट्रपति किसी राज्यपाल की नियुक्ति करने से पहले उस राज्य के मुख्यमन्त्री से भी इस बात का परामर्श लेता है।

प्रश्न 2.
राज्यपाल पद के लिए चार आवश्यक योग्यताएं लिखें।
उत्तर-
योग्यताएं- अनुच्छेद 157 के अन्तर्गत राज्यपाल के पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।
  3. वह किसी राज्य में विधानमण्डल अथवा संसद् का सदस्य न हो तथा यदि हो, तो राज्यपाल का पद ग्रहण करने के समय उसका सदन वाला स्थान रिक्त समझा जाएगा।
  4. राज्यपाल अपने पद पर नियुक्त होने के पश्चात् किसी अन्य लाभदायक पद पर नहीं रह सकता।

प्रश्न 3.
राज्यपाल के चार कार्यकाल का वर्णन करो।
उत्तर-
कार्यकाल-साधारणतया राज्यपाल को 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है और वह अपने पद पर तब तक रह सकता है जब तक राष्ट्रपति चाहे । राष्ट्रपति 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है। 27 अक्तूबर, 1980 को राष्ट्रपति ने तमिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी को बर्खास्त कर दिया। जनवरी, 1990 में राष्ट्रपति वेंकटरमन ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार की सलाह पर सभी राज्यपालों को त्याग-पत्र देने को कहा। अधिकतर राज्यपालों ने तुरन्त अपने त्याग-पत्र भेज दिये। राज्यपाल चाहे तो स्वयं भी 5 वर्ष से पूर्व त्याग-पत्र दे सकता है। 23 जून, 1991 को पंजाब के राज्यपाल जनरल ओ०पी० मल्होत्रा ने त्याग-पत्र दे दिया।

प्रश्न 4.
राज्यपाल की चार कार्यपालिका शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यपाल को निम्नलिखित कार्यपालिका शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलाया जाता है।
  2. राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है तथा उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।
  3. राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह पर किसी भी मन्त्री को अपदस्थ कर सकता है।
  4. वह शासन के कार्य को सुविधापूर्वक चलाने के लिए तथा मन्त्रियों में बांटने के लिये नियम बनाता है।

प्रश्न 5.
राज्यपाल की चार वैधानिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यपाल के पास निम्नलिखित वैधानिक शक्तियां हैं-

  1. राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता
  2. वह विधानमण्डल के दोनों सदनों में भाषण दे सकता है।
  3. वह विधानमण्डल के निम्न सदन को मुख्यमन्त्री की सलाह पर भंग कर सकता है।
  4. प्रत्येक वर्ष विधानमण्डल का अधिवेशन राज्यपाल के भाषण से प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 6.
राज्यपाल की चार स्वेच्छिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यपाल को कुछ स्वविवेकी शक्तियां भी प्राप्त हैं। स्वविवेकी शक्तियों का प्रयोग राज्यपाल अपनी इच्छा से करता है न कि मन्त्रिमण्डल के परामर्श से। राज्यपाल की मुख्य स्वविवेकी शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  1. संघीय क्षेत्र के प्रशासक के रूप में- यदि राष्ट्रपति ने राज्यपाल को राज्य के समीप के संघीय क्षेत्र का प्रशासक भी नियुक्त कर दिया है तो उस क्षेत्र का प्रशासन स्वविवेक से चलाता है।
  2. असम में आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में-असम राज्य के राज्यपाल को आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में स्वविवेक से कार्य करने का अधिकार दिया गया है।
  3. सिक्किम के राज्यपाल के विशेष उत्तरदायित्व-सिक्किम राज्य में शान्ति बनाए रखने के लिए तथा सिक्किम की जनसंख्या के सब वर्गों के सामाजिक तथा आर्थिक विकास के लिए सिक्किम के राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
  4. राज्य में संवैधानिक संकट होने पर-प्रत्येक राज्यपाल अपने राज्य में संवैधानिक मशीनरी के फेल हो जाने का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को करता है जिस पर वह संकटकाल की घोषणा करता है। इस दशा में मन्त्रिपरिषद् को भंग कर दिया जाता है तथा वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

प्रश्न 7.
राज्यपाल की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलता है, परन्तु शासन चलाने वाला वह स्वयं नहीं है। संविधान में राज्यपाल को जो शक्तियां प्राप्त हैं, व्यवहार में उनका प्रयोग मन्त्रिमण्डल करता है। राज्यपाल कार्यपालिका का संवैधानिक अध्यक्ष है। परन्तु जब वह केन्द्रीय सरकार के एजेन्ट के रूप में काम करता है तो वह अधिक शक्तियों को प्रयोग कर सकता है। उस समय वह केन्द्रीय सरकार के आदेश के अनुसार काम करता है। वर्तमान समय में राज्यपाल के दायित्व पहले से अधिक बढ़ चुके हैं।

प्रश्न 8.
राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर-
मन्त्रिपरिषद् के निर्माण के लिए सबसे पहला महत्त्वपूर्ण पग मुख्यमन्त्री की नियुक्ति है। राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् के अध्यक्ष को सर्वप्रथम मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है, परन्तु राज्यपाल उसे अपनी इच्छा से नियुक्त नहीं कर सकता। जिस दल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त होता है, उसी दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त किया जाता है। मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। मन्त्रियों के लिए विधानमण्डल के दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त किया जाए जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, तो उसको 6 महीने के अन्दर-अन्दर विधानमण्डल के किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् की सदस्य संख्या भी मुख्यमन्त्री द्वारा निश्चित की जाती है।

प्रश्न 9.
मन्त्रिपरिषद् की चार शक्तियों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. नीति का निर्धारण-मन्त्रिपरिषद् का मुख्य कार्य प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करना है।
  2. प्रशासन पर नियन्त्रण-शासन को अच्छी प्रकार चलाने के लिए कई विभागों में बांटा जाता है और प्रत्येक विभाग किसी-न-किसी मन्त्री के अधीन होता है। विभाग में मन्त्री के अधीन कई सरकारी कर्मचारी होते हैं जो उसकी आज्ञानुसार कार्य करते हैं। मन्त्री को अपने विभाग का शासन मन्त्रिपरिषद् की निश्चित नीति के अनुसार चलाना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् प्रशासन चलाने के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है।
  3. कानून को लागू करना तथा व्यवस्था को बनाए रखना- राज्य के विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानून को लागू करना मन्त्रिपरिषद् की ज़िम्मेवारी है। कानून का तब तक कोई महत्त्व नहीं है जब तक उसे लागू न किया जाए
    और कानूनों को सख्ती से अथवा नर्मी से लागू करना मन्त्रिपरिषद् पर निर्भर करता है। राज्य के अन्दर शान्ति को बनाए रखना मन्त्रिपरिषद् का कार्य है।
  4. नियुक्तियां-राज्य की सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्यिां राज्यपाल मन्त्रिमण्डल के परामर्श से करता है।

प्रश्न 10.
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है ?
उत्तर-
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे, मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में राज्यपाल को या तो विधानसभा में सबसे अधिक स्थान प्राप्त दल के नेता को अथवा यदि कुछ दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा है और उन्हें स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया है तो ऐसे मिले-जुले दलों के नेता को मुख्यमन्त्री पद पर नियुक्त करना चाहिए। फरवरी, 2017 के पंजाब विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ और कैप्टन अमरिन्दर सिंह पंजाब के मुख्यमन्त्री बने।

प्रश्न 11.
मुख्यमन्त्री की चार शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
मुख्यमन्त्री को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण-राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्यपाल मुख्यमन्त्री के परामर्श से करता है। मुख्यमन्त्री अपने साथियों की एक सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेज देता है तथा राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात् वे व्यक्ति मन्त्री बन जाते हैं।
  2. मन्त्रियों की पदच्युति-मुख्यमन्त्री किसी भी मन्त्री को उसके पद से अपदस्थ कर सकता है। यदि मुख्यमन्त्री किसी मन्त्री के कार्यों से प्रसन्न न हो और उसके विचार उस मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को हटा सकता है।
  3. मन्त्रियों में विभागों का वितरण-मुख्यमन्त्री केवल मन्त्रियों की नियुक्ति ही नहीं करता बल्कि उनमें विभागों का वितरण भी करता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे उनके विभागों को बदल भी सकता है।
  4. राज्यपाल का मुख्य सलाहकार-मुख्यमन्त्री राज्यपाल का मुख्य सलाहकार है।

प्रश्न 12.
मुख्यमन्त्री का कार्यकाल क्या है ?
उत्तर-
मुख्यमन्त्री का कार्यकाल निश्चित नहीं है। मुख्यमन्त्री उस समय तक अपने पद पर रहता है जब तक विधानसभा का बहुमत उसके साथ हो। परन्तु चौथे आम चुनाव के बाद नई परिस्थितियां उत्पन्न हुईं जिनके अधीन राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा अविश्वास के प्रस्ताव की प्रतीक्षा किए बिना ही मुख्यमन्त्री को पदच्युत कर दिया। हरियाणा के राजनीतिक भ्रष्टाचार और प्रशासन में कुशलता के ह्रास के कारण राज्य के राज्यपाल श्री चक्रवर्ती ने मुख्यमन्त्री राव वीरेन्द्र सिंह को पदच्युत कर दिया था।

प्रश्न 13.
राज्य में मुख्यमन्त्री ही शक्तिशाली व्यक्ति है। कैसे ?
उत्तर-
केन्द्र की तरह राज्यों में संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है। राज्य में राज्यपाल संवैधानिक मुखिया है जबकि मुख्यमन्त्री वास्तविक शासक है। राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलाया जाता है परन्तु वास्तविकता में राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से शासन चलाता है। मुख्यमन्त्री मन्त्रिपरिषद् का निर्माण करता है और जब चाहे किसी मन्त्री को पद से हटा सकता है। मन्त्रिपरिषद् मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है। राज्य में सभी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियां मुख्यमन्त्री द्वारा की जाती हैं। 5 वर्ष की अवधि से पूर्व यह विधानसभा को राज्यपाल को सलाह देकर भंग करवा सकता है। राज्य का सारा शासन मुख्यमन्त्री के इर्द-गिर्द घूमता है।

प्रश्न 14.
मुख्यमन्त्री के मन्त्रिपरिषद् के साथ चार सम्बन्ध बताएं।
उत्तर-
मुख्यमन्त्री के बिना मन्त्रिपरिषद् का कोई अस्तित्व नहीं है। मुख्यमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् में महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध निम्नलिखित हैं-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण-मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् उन व्यक्तियों की सूची तैयार करता है जिन्हें वह मन्त्रिपरिषद् में लेना चाहता है। मुख्यमन्त्री सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेजता है और राज्यपाल उस सूची के अनुसार ही मन्त्री नियुक्त करता है।
  2. विभागों का बंटवारा-मुख्यमन्त्री मन्त्रियों में विभागों का बंटवारा करता है। वह किसी भी मन्त्री को कोई भी विभाग दे सकता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है।
  3. मन्त्रियों की पदच्युति-मुख्यमन्त्री यदि किसी मन्त्री के कार्यों से अप्रसन्न हो और उसके विचार उस मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को उसके पद से अपदस्थ कर सकता है।
  4. मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष–मन्त्रिपरिषद् अपना समस्त कार्य मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में ही करती है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्यपाल की नियुक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-
प्रत्येक राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति नियुक्त करता है तथा वह राष्ट्रपति की कृपा दृष्टि तक ही अपने पद पर रह सकता है। व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से ही राज्यपाल को नियुक्त करता है।

प्रश्न 2.
राज्यपाल पद के लिए कोई दो आवश्यक योग्यताएं लिखें।
उत्तर-
योग्यताएं-अनुच्छेद 157 के अन्तर्गत राज्यपाल के पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।

प्रश्न 3.
राज्यपाल के कार्यकाल का वर्णन करो।
उत्तर-
साधारणतया राज्यपाल को 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है और वह अपने पद पर तब तक रह सकता है जब तक राष्ट्रपति चाहे। राष्ट्रपति 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है।

प्रश्न 4.
राज्यपाल की कोई दो कार्यपालिका शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यपाल को निम्नलिखित कार्यपालिका शक्तियां प्राप्त हैं-

  1. राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम पर चलाया जाता है।
  2. राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है तथा उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

प्रश्न 5.
राज्यपाल की कोई दो वैधानिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता है।
  2. वह विधानमण्डल के दोनों सदनों में भाषण दे सकता है।

प्रश्न 6.
राज्यपाल की स्वेच्छिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. संघीय क्षेत्र के प्रशासक के रूप में-यदि राष्ट्रपति ने राज्यपाल को राज्य के समीप के संघीय क्षेत्र का प्रशासक भी नियुक्त कर दिया है तो उस क्षेत्र का प्रशासन स्वविवेक से चलाता है।
  2. असम में आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में- असम राज्य के राज्यपाल को आदिम जातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में स्वविवेक से कार्य करने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 7.
राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर-
मन्त्रिपरिषद् के निर्माण के लिए सबसे पहला महत्त्वपूर्ण पग मुख्यमन्त्री की नियुक्ति है। मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्यपाल अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। मन्त्रियों के लिए विधानमण्डल के दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना अनिवार्य है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मन्त्री नियुक्त किया जाए जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, तो उसको 6 महीने के अन्दर-अन्दर विधानमण्डल के किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है। मन्त्रिपरिषद् की सदस्य संख्या भी मुख्यमन्त्री द्वारा निश्चित की जाती है।

प्रश्न 8.
मन्त्रिपरिषद् की दो शक्तियों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. नीति का निर्धारण (Determination of Policy)-मन्त्रिपरिषद् का मुख्य कार्य प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करना है।
  2. प्रशासन पर नियन्त्रण (Control over Administration)-शासन को अच्छी प्रकार चलाने के लिए कई विभागों में बांटा जाता है और प्रत्येक विभाग किसी-न-किसी मन्त्री के अधीन होता है।

प्रश्न 9.
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है ?
उत्तर-
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल जिस व्यक्ति को चाहे, मुख्यमन्त्री नियुक्त नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है। राज्यपाल को अपने स्वविवेक से नियुक्त करने का अवसर तभी प्राप्त है जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 10.
मुख्यमन्त्री की कोई दो शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्य में मन्त्रिपरिषद् का निर्माण राज्यपाल मुख्यमन्त्री के परामर्श से करता है। मुख्यमन्त्री अपने साथियों की एक सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेज देता है तथा राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात् वे व्यक्ति मन्त्री बन जाते हैं।
  2. मन्त्रियों की पदच्युति-मुख्यमन्त्री किसी भी मन्त्री को उसके पद से अपदस्थ कर सकता है। यदि मुख्यमन्त्री किसी मन्त्री के कार्यों से प्रसन्न न हो और उसके विचार उस मन्त्री के विचारों से मेल न खाते हों तो मुख्यमन्त्री राज्यपाल को सलाह देकर उस मन्त्री को हटा सकता है।

प्रश्न 11.
मुख्यमन्त्री के मन्त्रिपरिषद् के साथ सम्बन्ध बताएं।
उत्तर-

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण-मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् उन व्यक्तियों की सूची तैयार करता है जिन्हें वह मन्त्रिपरिषद् में लेना चाहता है। मुख्यमन्त्री सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेजता है और राज्यपाल उस सूची के अनुसार ही मन्त्री नियुक्त करता है।
  2. विभागों का बंटवारा-मुख्यमन्त्री मन्त्रियों में विभागों का बंटवारा करता है। वह किसी भी मन्त्री को कोई भी विभाग दे सकता है। मुख्यमन्त्री जब चाहे मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है।

प्रश्न 12.
पंजाब के राज्यपाल एवं उसका वेतन तथा मुख्यमन्त्री का नाम बताएं।
उत्तर-
पंजाब के वर्तमान राज्यपाल श्री वी०पी० सिंह बदनौर हैं, एवं उनका वेतन 3,50,000 रु० मासिक है। पंजाब के वर्तमान मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर-राष्ट्रपति।

प्रश्न 2. राज्यपाल का मासिक वेतन कितना है ?
उत्तर-3,50,000 रु० ।

प्रश्न 3. राज्यपाल बनने के लिए कितनी आयु होनी चाहिए ?
उत्तर-35 वर्ष।

प्रश्न 4. मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर-राज्यपाल।

प्रश्न 5. राज्यपाल की कोई एक वैधानिक शक्ति लिखिए।
उत्तर- राज्यपाल विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है, स्थगित कर सकता है तथा इसकी अवधि बढ़ा सकता है।

प्रश्न 6. राज्यपाल की एक कार्यपालिका शक्ति का वर्णन करो।
उत्तर-राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।

प्रश्न 7. राज्य में संवैधानिक संकट के समय राज्यपाल की स्थिति क्या होती है ?
उत्तर-उस समय राज्यपाल केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का वास्तविक शासक बन जाता है। राज्यपाल कार्यपालिका की सभी शक्तियों का प्रयोग करता है और प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी उसी की होती है।

प्रश्न 8. राज्यपाल कब तक अपने पद पर रहता है ?
उत्तर-राज्यपाल की नियुक्ति केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्यपाल राष्ट्रपति की इच्छा पर्यंत अपने पद पर रहता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति जब चाहे राज्यपाल को उसके पद से हटा सकता है।

प्रश्न 9. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण कौन करता है?
उत्तर- मुख्यमन्त्री अपनी नियुक्ति के पश्चात् मन्त्रियों की सूची तैयार करके राज्यपाल के पास भेजता है। राज्यपाल उस सूची में दिए गए व्यक्तियों को मन्त्री नियुक्त करता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 30 राज्य कार्यपालिका

प्रश्न 10. मन्त्रिमण्डल तथा मन्त्रिपरिषद् में अन्तर बताइए।
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् का वर्णन संविधान में किया गया है जबकि मन्त्रिमण्डल शब्द संविधान में नहीं मिलता।

प्रश्न 11. मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कैसे की जाती है?
उत्तर-मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है परन्तु राज्यपाल मुख्यमन्त्री की नियुक्ति में अपनी इच्छा का प्रयोग नहीं कर सकता। राज्यपाल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबन्धन के नेता को ही मुख्यमन्त्री बनाना पड़ता है।

प्रश्न 12. राज्यपाल की एक स्वैच्छिक शक्ति बताइए।
उत्तर-जब राज्य विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता तब राज्यपाल अपनी इच्छा से मुख्यमन्त्री को नियुक्त करता है।

प्रश्न 13. मन्त्रिपरिषद् की एक शक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् प्रशासन चलाने के लिए नीति निर्धारित करती है।

प्रश्न 14. मुख्यमन्त्री की एक शक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् का निर्माण मुख्यमन्त्री द्वारा किया जाता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. राज्य मन्त्रिपरिषद् का निर्माण ………….. करता है।
2. मुख्यमन्त्री …………… की अध्यक्षता करता है।
3. राज्य विधानमण्डल का नेता ……………. होता है।
4. राज्यपाल का मुख्य सलाहकार ………….. होता है।
उत्तर-

  1. मुख्यमन्त्री
  2. मन्त्रिपरिषद
  3. मुख्यमन्त्री
  4. मुख्यमन्त्री।

प्रश्न III. निम्नलिखित कथनों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. राज्य का समस्त शासन राज्यपाल के नाम से चलाया जाता है।
2. राज्यपाल प्रशासन के बारे में मुख्यमन्त्री से कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकता है।
3. राज्यपाल तानाशाह बन सकता है।
4. मुख्यमन्त्री राज्यपाल की नियुक्ति करता है।
5. मन्त्रिपरिषद नीति का निर्धारण करती है।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. ग़लत
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
मुख्यमन्त्री को नियुक्त करता है
(क) राष्ट्रपति
(ख) राज्यपाल
(ग) प्रधानमन्त्री
(घ) विधानमण्डल।
उत्तर-
(ख) राज्यपाल ।

प्रश्न 2.
मुख्यमन्त्री की अवधि कितनी है ?
(क)5 वर्ष
(ख) निश्चित नहीं
(ग) 4 वर्ष
(घ) 3 वर्ष।
उत्तर-
(ख) निश्चित नहीं ।

प्रश्न 3.
राज्यपाल निम्नलिखित में से किसके प्रति उत्तरदायी है ?
(क) राज्य के लोगों के प्रति
(ख) राष्ट्रपति के प्रति
(ग) प्रधानमन्त्री के प्रति
(घ) लोकसभा के प्रति।
उत्तर-
(ख) राष्ट्रपति के प्रति ।

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प्रश्न 4.
विधानसभा का नेता है-
(क) मुख्यमन्त्री
(ख) राज्यपाल
(ग) स्पीकर
(घ) प्रधानमन्त्री।
उत्तर-
(क) मुख्यमन्त्री।

PSEB 9th Class SST Solutions History Chapter 3 सिक्ख धर्म का विकास (1539 ई०-1581 ई०)

Punjab State Board PSEB 9th Class Social Science Book Solutions History Chapter 3 सिक्ख धर्म का विकास Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 3 सिक्ख धर्म का विकास

SST Guide for Class 9 PSEB सिक्ख धर्म का विकास Textbook Questions and Answers

(क) बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
किस गुरु जी ने गोइंदवाल में बाउली का निर्माण शुरू करवाया ?
(क) श्री गुरु अंगद देव जी
(ख) श्री गुरु अमरदास जी
(ग) श्री गुरु रामदास जी
(घ) श्री गुरु नानक देव जी।
उत्तर-
(क) श्री गुरु अंगद देव जी

प्रश्न 2.
मंजीदारों की कुल संख्या कितनी थी ?
(क) 20
(ख) 21
(ग) 22
(घ) 23
उत्तर-
(ग) 22

प्रश्न 3.
मुग़ल सम्राट अकबर कौन-से गुरु साहिब के दर्शन के लिए गोइंदवाल आए ?
(क) गुरु नानक देव जी
(ख) गुरु अंगद देव जी
(ग) गुरु अमरदास जी
(घ) गुरु रामदास जी।
उत्तर-
(ग) गुरु अमरदास जी

PSEB 9th Class SST Solutions History Chapter 3 सिक्ख धर्म का विकास (1539 ई०-1581 ई०)

प्रश्न 4.
भाई लहणा जी गुरु नानक देव जी के दर्शन करने के लिए कहां गए ?
(क) श्री अमृतसर साहिब
(ख) करतारपुर
(ग) गोइंदवाल
(घ) लाहौर।
उत्तर-
(ख) करतारपुर

प्रश्न 5.
गुरु रामदास जी ने अपने पुत्रों में से गुरुगद्दी किसको दी ?
(क) पृथीचंद
(ख) महादेव
(ग) अर्जन देव
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(ग) अर्जन देव

(ख) रिक्त स्थान भरें :

  1. गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी लिपि में ……………… लिखा।
  2. ……… जी हर साल हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए जाते थे।
  3. …………. ने गोईंदवाल में बाउली का निर्माण पूरा करवाया।
  4. गुरु रामदास जी ने ………….. नगर की स्थापना की।
  5. ‘लावां’ बाणी ……….. जी की प्रसिद्ध रचना है।

उत्तर-

  1. ‘बाल बोध’
  2. गुरु अमरदास
  3. गुरु अमरदास जी
  4. रामदासपुर (अमृतसर)
  5. गुरु रामदास जी।

(ग) सही मिलान करें:

(क) – (ख)
1. बाबा बुड्ढा जी – (अ) अमृत सरोवर
2. मसंद प्रथा – (आ) श्री गुरु रामदास जी
3. भाई लहणा – (इ) श्री गुरु अंगद देव जी
4. मंजी प्रथा – (ई) श्री गुरु अमरदास जी।

उत्तर-

  1. अमृत सरोवर
  2. श्री गुरु रामदास जी
  3. श्री गुरु अंगद देव जी
  4. श्री गुरु अमरदास जी।

(घ) अंतर बताओ :

प्रश्न -संगत और पंगत।
उत्तर-संगत-संगत से अभिप्राय गुरु शिष्यों के उस समूह से है जो एक साथ बैठकर गुरु जी के उपदेशों पर अमल करते थे।
पंगत-पंगत के अनुसार गुरु के शिष्य इकट्ठे मिल-बैठकर एक ही रसोई में पका खाना खाते थे।

अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
गुरु अंगद देव जी का पहला नाम क्या था ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी का पहला नाम भाई लहणा था।

प्रश्न 2.
‘गुरुमुखी’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
गुरुमुखी का अर्थ है गुरुओं के मुख से निकलने वाली।

प्रश्न 3.
मंजीदार किसे कहा जाता था ?
उत्तर-
मंजियों के प्रमुख को मंजीदार कहा जाता था जो गुरु साहिब व संगत के मध्य एक कड़ी का कार्य करते थे।

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प्रश्न 4.
अमृतसर का पुराना नाम क्या था ?
उत्तर-
अमृतसर का पुराना नाम रामदासपुर था।

प्रश्न 5.
गुरु रामदास जी का मूल नाम क्या था ?
उत्तर-
भाई जेठा जी।

प्रश्न 6.
मसंद प्रथा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
मसंद प्रथा के अनुसार गुरु के मसंद स्थानीय सिख संगत के लिए गुरु के प्रतिनिधि होते थे।

लघु उत्तरों वाले प्रश्न।

प्रश्न 1.
मंजी प्रथा पर नोट लिखो।
उत्तर-
मंजी प्रथा की स्थापना गुरु अमरदास जी ने की थी। उनके समय में सिक्खों की संख्या काफ़ी बढ चकी थी। परंतु गुरु जी की आयु अधिक होने के कारण उनके लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करना कठिन हो गया। अतः उन्होंने अपने सारे आध्यात्मिक प्रदेश को 22 भागों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक भाग को ‘मंजी’ कहा जाता था। इसके प्रमुख को मंजीदार। प्रत्येक मंजी छोटे-छोटे स्थानीय केंद्रों में बंटी हुई थी जिन्हें पीड़ियां (Piris) कहते थे। सिख संगत इनके द्वारा अपनी भेंट गुरु साहिब तक पहुंचाती थी। मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चंद नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में प्रचार कार्य को बढ़ाने में विशेष योगदान दिया।”

प्रश्न 2.
गुरु अंगद देव जी का गुरुमुखी लिपि के विकास में क्या योगदान है ?
उत्तर-
गुरुमुखी लिपि गुरु अंगद देव जी से पहले प्रचलित थी। गुरु जी ने इसें गुरुमुखी का नाम देकर इसका मानकीकरण किया। कहते हैं कि गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी के प्रचार के लिए गुरुमुखी वर्णमाला में बच्चों के लिए ‘बाल बोध’ की रचना की। जनसाधारण की भाषा होने के कारण इससे सिक्ख धर्म के प्रचार के कार्य को बढ़ावा मिला। आज सिक्खों के सभी धार्मिक ग्रंथ इसी भाषा में हैं।

प्रश्न 3.
गुरु अमरदास जी के द्वारा किये गए समाज सुधार के कार्यों पर नोट लिखो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने अनेक महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुधार किए-

  1. गुरु अमरदास जी ने जाति मतभेद का खंडन किया। गुरु जी का विश्वास था कि जाति मतभेद परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध है। इसलिए गुरु जी के लंगर में जाति-पाति तथा छुआछूत को कोई स्थान नहीं दिया था।
  2. उस समय सती प्रथा जोरों से प्रचलित थी। गुरु जी ने इस प्रथा के विरुद्ध ज़ोरदार आवाज़ उठाई।
  3. गुरु जी ने स्त्रियों में प्रचलित पर्दे की प्रथा की भी घोर निंदा की। वे पर्दे की प्रथा को समाज की उन्नति के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा मानते थे।
  4. गुरु अमरदास जी नशीली वस्तुओं के सेवन के भी घोर विरोधी थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को सभी नशीली
    वस्तुओं से दूर रहने का निर्देश दिया।

इन सब कार्यों से स्पष्ट है कि गुरु अमरदास जी निःसंदेह एक महान् सुधारक थे।

प्रश्न 4.
अमृतसर की स्थापना पर नोट लिखो।
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने रामदासपुर की नींव रखी। आजकल इस नगर को अमृतसर कहते हैं। गुरु साहिब ने 1577 ई० में यहां अमृतसर तथा संतोखसर नामक दो सरोवरों की खुदाई आरंभ की, परंतु उन्होंने देखा कि गोइंदवाल में रहकर खुदाई के कार्य का निरीक्षण करना कठिन है। अतः उन्होंने यहीं डेरा डाल दिया। कई श्रद्धालु लोग भी यहीं आ कर बस गए और कुछ ही समय में सरोवर के चारों ओर एक छोटा-सा नगर बस गया। इसे रामदासपुर का नाम दिया गया। गुरु जी ने इस नगर को हर प्रकार से आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बाज़ार की स्थापना की जिसे आजकल ‘गुरु का बाज़ार’ कहते हैं। इस नगर के निर्माण से सिक्खों को एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान मिल गया जिससे सिक्ख धर्म के विकास में सहायता मिली।

दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
श्री गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख पंथ के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किए। वर्णन करो।
उत्तर-
श्री गुरु नानक देव जी (1539 ई०) के पश्चात् गुरु अंगद देव जी गुरुगद्दी पर आसीन हुए। उनका नेतृत्व सिक्ख धर्म के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उन्होंने निम्नलिखित ढंग से सिक्ख धर्म के विकास में योगदान दिया

  1. गुरुमुखी लिपि में सुधार-गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी लिपि को मानक रूप दिया। कहते हैं कि गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी के प्रचार के लिए गुरुमुखी वर्णमाला में बच्चों के लिए ‘बाल बोध’ की रचना की। उन्होंने अपनी वाणी की रचना भी इसी लिपि में की। जनसाधारण की भाषा (लिपि) होने के कारण इससे सिक्ख धर्म के प्रचार के कार्य को बढ़ावा मिला। आज सिक्खों के सभी धार्मिक ग्रंथ इसी लिपि में हैं।
  2. गुरु नानक देव जी की जन्म-साखी-श्री गुरु अंगद देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी की सारी बाणी को एकत्रित करके भाई बाला से गुरु जी की जन्म-साखी (जीवन-चरित्र) लिखवाई। इससे सिक्ख गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पालन करने लगे।
  3. लंगर प्रथा-श्री गुरु अंगद देव जी ने लंगर प्रथा जारी की। उन्होंने यह आज्ञा दी कि जो कोई उनके दर्शन को आए, उसे पहले लंगर में भोजन कराया जाए। यहां प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेद-भाव के भोजन करता था। इससे जाति-पाति की भावनाओं को धक्का लगा और सिक्ख धर्म के प्रसार में सहायता मिली।.
  4. उदासियों से सिक्ख धर्म को अलग करना-गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र श्रीचंद जी ने उदासी संप्रदाय की स्थापना की थी। उन्होंने संन्यास का प्रचार किया। यह बात गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के विरुद्ध थी। गुरु अंगद देव जी ने सिक्खों को स्पष्ट किया कि सिक्ख धर्म महारथियों का धर्म है। इसमें संन्यास का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वह सिक्ख जो संन्यास में विश्वास रखता है, सच्चा सिक्ख नहीं है। इस प्रकार उदासियों को सिक्ख संप्रदाय से अलग करके गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख धर्म को ठोस आधार प्रदान किया।
  5. गोइंदवाल साहिब का निर्माण-गुरु अंगद देव जी ने 1596 ई० में गोइंदवाल साहिब नामक नगर की स्थापना की। गुरु अमरदास के समय में यह नगर एक प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र बन गया। आज भी यह सिक्खों का एक पवित्र धार्मिक स्थान है।
  6. अनुशासन को बढ़ावा-गुरु जी बड़े ही अनुशासन प्रिय थे। उन्होंने सत्ता और बलवंड नामक दो प्रसिद्ध रबाबियों को अनुशासन भंग करने के कारण दरबार से निकाल दिया, परंतु बाद में भाई लद्धा के प्रार्थना करने पर गुरु जी ने उन्हें क्षमा कर दिया। इस घटना से सिक्खों में अनुशासन की भावना को बल मिला।
  7. उत्तराधिकारी की नियुक्ति-गुरु अंगद देव जी ने.13 वर्ष तक निष्काम भाव से सिक्ख धर्म की सेवा की। 1552 ई० में ज्योति-जोत समाये से पूर्व उन्होंने अपने पुत्रों की बजाय भाई अमरदास जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उनका यह कार्य सिख इतिहास में बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे सिक्ख धर्म का प्रचार कार्य जारी रहा।
  8. सच तो यह है कि गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख धर्म को पृथक् पहचान प्रदान की। गुरुमुखी लिपि के प्रसार के कारण नानक पंथियों को नवीन बाणी मिली। लंगर प्रथा के कारण वे जाति-बंधनों से मुक्त हुए। इस प्रकार सिक्ख धर्म हिंदू धर्म से अलग रूप धारण करने लगा। इन सबका श्रेय गुरु अंगद देव जी को ही जाता है।

प्रश्न 2.
श्री गुरु अमरदास जी का सिक्ख धर्म के विकास में क्या योगदान है ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी को सिक्ख धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गुरु नानक देव जी ने धर्म का जो बीज बोया था, वह गुरु अंगद देव जी के काल में अंकुरित हो गया। गुरु अमरदास जी ने इस नवीन खिले अंकुर के गिर्द बाड़ लगा दी, ताकि हिंदू धर्म इसे अपने में ही न समा ले। कहने का अभिप्राय यह है कि उन्होंने सिक्खों को सामाजिक जीवन व्यतीत करने के लिए नवीन रीति-रिवाज़ प्रदान किए जिससे सिक्ख धर्म हिंदू धर्म से अलग राह पर चल पड़ा। निःसंदेह वह एक महान् व्यक्ति थे। पेन (Payne) ने उन्हें उत्साही प्रचारक बताया है। एक अन्य इतिहासकार ने उन्हें बुद्धिमान तथा न्यायप्रिय गुरु कहा है। कुछ भी हो उनके गुरु काल में सिक्ख धर्म नवीन दिशाओं में प्रवाहित हुआ। संक्षेप में गुरु अमरदास जी के कार्यों का वर्णन इस प्रकार है–

1. गोइंदवाल साहिब की बावली का निर्माण-गुरु अमरदास जी ने सर्वप्रथम गोइंदवाल साहिब के स्थान पर एक बावली (जल-स्रोत) का निर्माण कार्य पूरा किया जिसका शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय रखा गया था। गुरु अमरदास जी ने इस बावली की तह तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियां बनवाईं। गुरु जी के अनुसार प्रत्येक सीढ़ी पर जपुजी साहिब का पाठ करने से ही जन्म-मरण की चौरासी लाख योनियों के चक्कर से मुक्ति मिलेगी। गोइंदवाल साहिब की बावली सिक्ख धर्म का एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थान बन गई।

PSEB 9th Class SST Solutions History Chapter 3 सिक्ख धर्म का विकास (1539 ई०-1581 ई०)

2. लंगर प्रथा-गुरु अमरदास जी ने लंगर प्रथा का विस्तार करके सिक्ख धर्म के विकास की ओर एक और महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। उन्होंने लंगर के लिए कुछ विशेष नियम बनाए। अब कोई भी व्यक्ति लंगर में भोजन किए बिना गुरु जी से नहीं मिल सकता था। लंगर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी जातियों के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर एक ही रसोई में बना भोजन करते थे।
लंगर प्रथा सिक्ख धर्म के प्रचार में बड़ी सहायक सिद्ध हुई। इससे जाति-पाति तथा रंग-रूप के भेद भावों को बड़ा धक्का लगा और लोगों में समानता की भावना का विकास हुआ। परिणामस्वरूप सिक्ख एकता के सूत्र में बंधने लगे।

3. सिक्ख गुरु साहिबान के शब्दों को एकत्रित करना-गुरु नानक देव जी के शब्दों तथा श्लोकों को गुरु अंगद देव जी ने एकत्रित करके उनके साथ अपने रचे हुए शब्द भी जोड़ दिए थे। यह सारी सामग्री गुरु अंगद देव जी ने गुरु अमरदास जी को सौंप दी थी। गुरु अमरदास जी ने भी कुछ-एक नए श्लोकों की रचना की और उन्हें पहले वाले संकलन (collection) के साथ मिला दिया। इस प्रकार विभिन्न गुरु साहिबान के श्लोकों तथा उपदेशों के एकत्रित हो जाने से एक ऐसी सामग्री तैयार की गई जो आदि ग्रंथ साहिब के संकलन का आधार बनी। इस कार्य में उनके पोते ने इनकी बड़ी सहायता की।

4. मंजी प्रथा-गुरु अमरदास जी के समय में सिक्खों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी। परंतु वृद्धावस्था के कारण गुरु साहिब जी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करना कठिन हो गया था। अतः उन्होंने अपने पूरे आध्यात्मिक साम्राज्य को 22 प्रांतों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक प्रांत को मंजी’ कहा जाता था। प्रत्येक मंजी सिक्ख धर्म के प्रचार का एक केंद्र थी जिसके संचालन का कार्यभार गुरु जी ने अपने किसी विद्वान् श्रद्धालु शिष्य को सौंप रखा था।  गुरु अमरदास जी द्वारा स्थापित मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चंद नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में प्रचार कार्य बढ़ाने में विशेष योगदान दिया।”

5. उदासियों से सिक्खों को पृथक् करना-गुरु अमरदास जी के गुरुकाल के आरंभिक वर्षों में उदासी संप्रदाय काफी लोकप्रिय हो चुका था। इस बात का भय होने लगा कि कहीं सिक्ख धर्म उदासी संप्रदाय में ही विलीन न हो जाए। इसलिए गुरु साहिब ने जोरदार शब्दों में उदासी संप्रदाय के सिद्धांतों का खंडन किया। उन्होंने अपने अनुयायियों को समझाया कि कोई भी व्यक्ति, जो उदासी नियमों का पालन करता है, सच्चा सिक्ख नहीं हो सकता। गुरु जी के इन प्रयत्नों से सिक्ख उदासियों से पृथक् हो गए और सिक्ख धर्म का अस्तित्व मिटने से बच गया।

6. मुगल सम्राट अकबर का गोइंदवाल आना-गुरु अमरदास जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर मुग़ल सम्राट अकबर गोइंदवाल आया। गुरु जी के दर्शन से पहले उसने पंक्ति में बैठ कर लंगर खाया। लंगर की व्यवस्था से अकबर बहुत प्रभावित हुआ। कहते हैं उसी वर्ष पंजाब में अकाल पड़ा था। गुरु जी के आग्रह पर अकबर ने पंजाब के किसानों का लगान माफ़ कर दिया था।

7. नई परंपराएं-गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को व्यर्थ के रीति-रिवाजों का त्याग करने का उपदेश दिया। हिंदुओं में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर खूब रोया-पीटा जाता था। परंतु गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को रोने-पीटने के स्थान पर ईश्वर का नाम लेने का उपदेश दिया। उन्होंने विवाह की भी नई विधि आरंभ की जिसे आनंद कारज कहते हैं।

8. अनंदु साहिब की रचना-गुरु अमरदास जी ने एक नई बाणी की रचना की जिसे अनंदु साहिब कहा जाता है। इस राग के प्रवचन से सिक्खों में वेद-मंत्रों के उच्चारण का महत्त्व बिल्कुल समाप्त हो गया।
सच तो यह है कि गुरु अमरदास जी का गुरुकाल (1552 ई०-1574 ई०) सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। गुरु जी के द्वारा बावली का निर्माण, मंजी प्रथा के आरंभ, लंगर प्रथा के विस्तार तथा नए रीति-रिवाजों ने सिक्ख धर्म के संगठन में बड़ी सहायता की।

प्रश्न 3.
श्री गुरु रामदास जी ने सिख पंथ के विकास के लिए कौन-से महत्त्वपूर्ण कार्य किए ? वर्णन करो।
उत्तर-
श्री गुरु रामदास जी सिक्खों के चौथे गुरु थे। इनके बचपन का नाम भाई जेठा था। उनके सेवाभाव से प्रसन्न होकर गुरु अमरदास जी ने उन्हें गुरुगद्दी सौंपी थी। उन्होंने 1574 ई० से 1581 ई० तक गुरुगद्दी का संचालन किया और उन्होंने निम्नलिखित कार्यों द्वारा सिख धर्म की मर्यादा को बढ़ाया।

1. अमृतसर का शिलान्यास-गुरु रामदास जी ने रामदासपुर की नींव रखी। आजकल इस नगर को अमृतसर कहते हैं। 1577 ई० में गुरु जी ने यहां अमृतसर तथा संतोखसर नामक दो सरोवरों की खुदाई आरंभ की। परंतु उन्होंने देखा कि गोइंदवाल में रहकर खुदाई के कार्य का निरीक्षण करना कठिन है, अतः उन्होंने यहीं डेरा डाल दिया। कई श्रद्धालु लोग भी यहीं आ बसे। कुछ ही समय में सरोवर के चारों ओर एक छोटा-सा नगर बस गया। इसे रामदासपुर का नाम दिया गया। गुरु जी इस नगर को हर प्रकार से आत्म-निर्भर बनाना चाहते थे। अत: उन्होंने 52 अलग-अलग प्रकार के व्यापारियों को आमंत्रित किया। उन्होंने एक बाज़ार की स्थापना की जिसे आजकल ‘गुरु का बाज़ार’ कहते हैं। इस नगर के निर्माण से सिक्खों को एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान मिल गया और उन्होंने हिंदुओं के तीर्थस्थानों की यात्रा करनी बंद कर दी।

2. मसंद प्रथा का आरंभ-गुरु रामदास जी को अमृतसर तथा संतोखसर नामक सरोवरों की खुदाई के लिए काफ़ी धन की आवश्यकता थी। अतः उन्होंने मसंद प्रथा का आरंभ किया। उन्होंने अपने शिष्यों को दूर देशों में धर्म प्रचार करने तथा वहां से धन एकत्रित करने के लिए भेजा। इन मसंदों ने विभिन्न प्रदेशों में सिक्ख धर्म का खूब प्रचार किया तथा काफ़ी धन राशि एकत्रित की। वास्तव में इस प्रथा ने सिक्ख धर्म के प्रसार में काफी योगदान दिया। इससे सिक्ख एक लड़ी में पिरोए गए तथा उनमें भावनात्मक एकता आ गई।

3. उदासियों के मतभेद की समाप्ति-गुरु अंगद देव जी तथा गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी संप्रदाय से अलग कर दिया था। परंतु गुरु रामदास जी ने उदासियों से बड़ा विनम्रतापूर्ण व्यवहार किया। कहा जाता है कि उदासी संप्रदाय का नेता बाबा श्रीचंद एक बार गुरु रामदास जी से मिलने आए। उसने गुरु जी का मज़ाक उड़ाते हुए गुरु जी से यह प्रश्न किया- “सुनाओ दाढ़ा इतना लंबी क्यों है ?” गुरु जी ने बड़े विनम्र भाव से उत्तर दिया, “आप जैसे सत्य पुरुषों के चरण झाड़ने के लिए।” यह बात सुन कर श्रीचंद जी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने गुरु जी की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार उदासी संप्रदाय तथा सिक्ख गुरु साहिबान का काफी समय से चला आ रहा द्वेष-भाव समाप्त हो गया। यह बात सिक्ख मत के प्रसार में बहुत सहायक सिद्ध हुई।
सच तो यह कि गुरु रामदास जी ने भी गुरु अमरदास जी की भांति सिक्ख मत को इसका अलग अस्तित्व प्रदान करने का हर सभव प्रयास किया।

प्रश्न 4.
गुरुओं द्वारा नये नगरों की स्थापना और नई परंपराओं की शुरुआत ने सिख धर्म के विकास में क्या योगदान दिया ?
उत्तर-
गुरु साहिबान ने सिख धर्म के प्रचार तथा सिखों की समृद्धि के लिए अनेक नगर बसाये। नए नगर बसाने का एक उद्देश्य यह भी था कि सिक्खों को अपने अलग तीर्थ-स्थान दिए जाएं ताकि उनमें एकता एवं संगठन की भावना मज़बूत हो। गुरु साहिबान ने समाज में प्रचलित परम्पराओं से हट कर कुछ नई परम्पराएं भी आरंभ की। इनसे सिख समाज में सरलता आई और सिख धर्म का विकास तेज़ी से हुआ।
I. नये नगरों का योगदान

  1. गोइंदवाल साहिब-गोइंदवाल साहिब नामक नगर की स्थापना गुरु अंगद देव जी ने की। इस नगर का निर्माण 1546 ई० में आरंभ हुआ था। इसका निर्माण कार्य उन्होंने अपने शिष्य अमरदास जी को सौंप दिया। गुरु अमरदास जी ने अपने गुरुकाल में यहां बाऊली साहब का निर्माण करवाया। इस प्रकार गोइंदवाल साहिब सिक्खों का एक प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र बन गया।
  2. रामदासपुर-गुरु रामदास जी ने रामदासपुर की नींव रखी। आजकल इस नगर को अमृतसर कहते हैं। 1577 ई० में गुरु जी ने यहां अमृतसर तथा संतोखसर नामक दो तालाबों की खुदाई आरंभ की। कुछ ही समय में तालाब के चारों ओर एक छोटा-सा नगर बस गया। इसे रामदासपुर का नाम दिया गया। गुरु जी इस नगर को हर प्रकार से आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। अतः उन्होंने 52 अलग-अलग प्रकार के व्यापारियों को आमंत्रित किया। उन्होंने एक बाजार की स्थापना की जिसे आजकल ‘गुरु का बाज़ार’ कहते हैं। इस नगर के निर्माण से सिक्खों को एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ-स्थान मिल गया।
  3. तरनतारन-तरनतारन का निर्माण गुरु अर्जन देव जी ने ब्यास तथा रावी नदियों के मध्य करवाया। इसका निर्माण 1590 ई० में हुआ। अमृतसर की भांति तरनतारन भी सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गया। हजारों की संख्या में यहां सिक्ख यात्री स्नान करने के लिए आने लगे।
  4. करतारपुर-गुरु अर्जन देव जी ने 1593 ई० में जालंधर दोआब में एक नगर की स्थापना की जिसका नाम करतारपुर अर्थात् ‘ईश्वर का शहर’ रखा गया। यहां उन्होंने एक कुआं भी खुदवाया जो गंगसर के नाम से प्रसिद्ध है। यह नगर जालंधर दोआब में सिक्ख धर्म के प्रचार का केंद्र बन गया।
  5. हरगोबिंदपुर तथा छहरटा-गुरु अर्जन देव जी ने अपने पुत्र हरगोबिंद के जन्म की खुशी में ब्यास नदी के तट पर हरगोबिंदपुर नगर की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अमृतसर के निकट पानी की कमी को दूर करने के लिए एक कुएं का निर्माण करवाया। इस कुएं पर छः रहट चलते थे। इसलिए इसको छहरटा के नाम से पुकारा जाने लगा। धीरे-धीरे यहां एक नगर बस गया जो आज भी विद्यमान है।
  6. चक नानकी-चक नानकी की नींव कीरतपुर के निकट गुरु तेग बहादुर साहिब ने रखी। इस नगर की भूमि गुरु साहिब ने 19 जून, 1665 ई० को 500 रुपये में खरीदी थी।

II. नयी परम्पराओं का योगदान

  1. गुरु नानक देव जी ने ‘संगत’ तथा ‘पंगत’ प्रथा की परंपरा चलाई। इससे सिखों में एक साथ बैठ कर नाम सिमरण करने की भावना का विकास हुआ। परिणामस्वरूप सिख भाईचारा मज़बूत हुआ।
  2. आनंद कारज से विवाह की व्यर्थ रस्मों से सिखों को छुटकारा मिला और विवाह सरल रीति से होने लगे। इस परंपरा के कारण और भी बहुत से लोग सिख धर्म से जुड़ गए। .
  3. मृत्यु के अवसर पर रोने-पीटने की परंपरा को छोड़ प्रभु सिमरण पर बल देने से सिखों में गुरु भक्ति की भावना मजबूत हुई।

PSEB 9th Class Social Science Guide पंजाब : सिक्ख धर्म का विकास Important Questions and Answers

I. बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
गोइंदवाल साहिब में बाऊली (जल-स्रोत) की नींव रखी
(क) गुरु अर्जन देव जी ने
(ख) गुरु नानक देव जी ने
(ग) गुरु अंगद देव जी ने
(घ) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-
(ग) गुरु अंगद देव जी ने

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प्रश्न 2.
गुरु रामदास जी ने नगर बसाया
(क) अमृतसर
(ख) जालंधर
(ग) कीरतपुर साहिब
(घ) गोइंदवाल साहिब।
उत्तर-
(क) अमृतसर

प्रश्न 3.
गुरु अर्जन देव जी ने रावी तथा व्यास के बीच किस नगर की नींव रखी ?
(क) जालंधर
(ख) गोइंदवाल साहिब
(ग) अमृतसर
(घ) तरनतारन।
उत्तर-
(घ) तरनतारन।

प्रश्न 4.
गुरु अंगद देव जी को गुरुगद्दी मिली-
(क) 1479 ई० में
(ख) 1539 ई० में
(ग) 1546 ई० में
(घ) 1670 ई० में।
उत्तर-
(ख) 1539 ई० में

प्रश्न 5.
गुरु अंगद देव जी ज्योति-जोत समाये
(क) 1552 ई० में
(ख) 1538 ई० में
(ग) 1546 ई० में
(घ) 1479 ई० में।
उत्तर-
(क) 1552 ई० में

प्रश्न 6.
‘बाबा बकाला’ वास्तव में थे-
(क) गुरु तेग़ बहादुर जी
(ख) गुरु हरकृष्ण जी
(ग) गुरु गोबिंद सिंह जी
(घ) गुरु अमरदास जी।
उत्तर-
(क) गुरु तेग़ बहादुर जी

प्रश्न 7.
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ
(क) कीरतपुर साहिब में
(ख) पटना में
(ग) दिल्ली में
(घ) तरनतारन में।
उत्तर-
(ख) पटना में

प्रश्न 8.
गुरु अमरदास जी ज्योति-जोत समाए
(क) 1564 ई० में
(ख) 1538 ई० में
(ग) 1546 ई० में
(घ) 1574 ई० में।
उत्तर-
(घ) 1574 ई० में।

प्रश्न 9.
गुरुगद्दी को पैतृक रूप दिया
(क) गुरु अमरदास जी ने
(ख) गुरु रामदास जी ने
(ग) गुरु गोबिंद सिंह जी ने
(घ) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-
(क) गुरु अमरदास जी ने

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रिक्त स्थान भरें :

  1. गुरु ………… का पहला नाम भाई लहना था।
  2. …………….. सिक्खों के चौथे गुरु थे।
  3. …………. नामक नगर की स्थापना गुरु अंगद देव जी ने की।
  4. गुरु हरगोबिंद साहिब ने अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष ……….. में धर्म प्रचार में व्यतीत किए।
  5. गुरु अंगद देव जी के पिता का नाम श्री ………….. और माता का नाम ………….. था।
  6. ‘उदासी’ मत गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र …………….. जी ने स्थापित किया।
  7. मंजियों की स्थापना गुरु ………… ने की।

उत्तर-

  1. अंगद साहिब
  2. गुरु रामदास जी
  3. गोइंदवाल साहिब
  4. फेरूमल, सभराई देवी
  5. कीरतपुर साहि
  6. बाबा श्रीचंद
  7. अमर दास जी।

सही मिलान करो :

(क) – (ख)
1. भाई लहना – (i) श्री गुरु नानक देव जी
2. अकबर – (ii) बाबा श्री चंद
3. लंगर प्रथा – (iii) अमृतसर
4. उदासी मत – (iv) श्री गुरु अंगद देव जी
5. रामदासपुर – (v) श्री गुरु अमरदास जी

उत्तर-

  1. श्री गुरु अंगद देव जी
  2. श्री गुरु अमरदास जी
  3. श्री गुरु नानक देव जी
  4. बाबा श्री चंद
  5. अमृतसर

अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

उत्तर एक लाइन अथवा एक शब्द में :

(I)

प्रश्न 1.
भाई लहना किस गुरु साहिब का पहला नाम था ?
उत्तर-
गुरु अंगद साहिब का।

प्रश्न 2.
लंगर प्रथा से क्या भाव है ?
उत्तर-
लंगर प्रथा अथवा पंगत से भाव उस प्रथा से है जिसके अनुसार सभी जातियों के लोग बिना किसी भेदभाव के एक ही पंक्ति में बैठकर खाना खाते थे।

प्रश्न 3.
गोइंदवाल साहिब में बाऊली (जल स्रोत) की नींव किस गुरु साहिब ने रखी थी ?
उत्तर-
गोइंदवाल साहिब में बाऊली की नींव गुरु अंगद देव जी ने रखी थी।

प्रश्न 4.
अकबर कौन-से गुरु साहिब को मिलने गोइंदवाल साहिब आया ?
उत्तर-
अकबर गुरु अमरदास जी से मिलने गोइंदवाल साहिब आया था।

प्रश्न 5.
मसंद प्रथा के दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर-
मसंद प्रथा के दो मुख्य उद्देश्य थे- सिक्ख धर्म के विकास कार्यों के लिए धन एकत्रित करना तथा सिक्खों को संगठित करना।

प्रश्न 6.
सिक्खों के चौथे गुरु कौन थे तथा उन्होंने कौन-सा शहर बसाया ?
उत्तर-
गुरु रामदास जी सिक्खों के चौथे गुरु थे जिन्होंने रामदासपुर (अमृतसर) नामक नगर बसाया।

प्रश्न 7.
लंगर प्रथा के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
लंगर प्रथा का आरंभ गुरु नानक साहिब ने सामाजिक भाईचारे के लिए किया।

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प्रश्न 8.
गुरु अंगद देव जी संगत प्रथा के द्वारा सिक्खों को क्या उपदेश देते थे ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी संगत प्रथा के द्वारा सिक्खों को ऊंच-नीच के भेदभाव को भूल कर प्रेमपूर्वक रहने की शिक्षा देते थे।

प्रश्न 9.
गुरु अंगद देव जी की पंगत-प्रथा के बारे में जानकारी दो ।
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने गुरु नानक देव जी के द्वारा चलाई गई पंगत-प्रथा को आगे बढ़ाया जिसका खर्च सिक्खों की कार सेवा से चलता था।

प्रश्न 10.
गुरु अंगद देव जी द्वारा स्थापित अखाड़े के बारे में लिखिए।
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने सिक्खों को शारीरिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए खडूर साहिब के स्थान पर एक अखाड़ा बनवाया।

प्रश्न 11.
गोइंदवाल साहिब के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
गोइंदवाल साहिब नामक नगर की स्थापना गुरु अंगद देव जी ने की जो सिक्खों का एक प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र बन गया।

प्रश्न 12.
गुरु अमरदास जी के जाति-पाति के बारे में विचार बताओ।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी जातीय भेदभाव तथा छुआछूत के विरोधी थे।

प्रश्न 13.
सती प्रथा के बारे में गुरु अमरदास जी के क्या विचार थे ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने सती प्रथा का खंडन किया।

प्रश्न 14.
गुरु अमरदास जी द्वारा निर्मित शहर गोइंदवाल साहिब दूसरे धार्मिक स्थानों से कैसे अलग था ?
उत्तर-
गोइंदवाल साहिब सिक्खों के सामूहिक परिश्रम से बना था जिसमें न तो किसी देवी-देवता की पूजा की जाती थी और न ही इसमें किसी पुजारी की आवश्यकता थी।

प्रश्न 15.
गुरु अमरदास जी ने जन्म, विवाह तथा मृत्यु संबंधी क्या सुधार किए ? ।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने जन्म तथा विवाह के अवसर पर ‘आनंद’ बाणी का पाठ करने की प्रथा चलाई और सिक्खों को आदेश दिया कि वे मृत्यु के अवसर पर ईश्वर की स्तुति तथा भक्ति के शब्दों का गायन करें।

प्रश्न 16.
रामदासपुर या अमृतसर की स्थापना की महत्ता बताइए।
उत्तर-
रामदासपुर की स्थापना से सिक्खों को एक अलग तीर्थ-स्थान तथा महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र मिल गया।

प्रश्न 17.
गुरु रामदास जी तथा अकबर बादशाह की मुलाकात का महत्त्व बताइए।
उत्तर-
गुरु रामदास जी की अकबर से मुलाकात से दोनों में मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुए।

प्रश्न 18.
गुरु अंगद देव जी का नाम अंगद देव कैसे पड़ा ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी गुरु नानक देव जी के लिए सर्दी की रात में दीवार बना सकते थे तथा कीचड़ से भरी घास की गठरी उठा सकते थे, इसलिए गुरु जी ने उनका नाम अंगद अर्थात् शरीर का एक अंग रख दिया।

प्रश्न 19.
भाई लहना (गुरु अंगद साहिब) के माता-पिता का नाम क्या था ?
उत्तर-
भाई लहना (गुरु अंगद साहिब) के पिता का नाम फेरूमल और माता का नाम सभराई देवी था।

प्रश्न 20.
गुरु अंगद साहिब का बचपन किन दो स्थानों पर बीता ?
उत्तर-
गुरु अंगद साहिब का बचपन हरिके तथा खडूर साहिब में बीता।

PSEB 9th Class SST Solutions History Chapter 3 सिक्ख धर्म का विकास (1539 ई०-1581 ई०)

(II)

प्रश्न 1.
सिक्खों के दसरे गुरु कौन थे ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी।

प्रश्न 2.
गुरु अंगद देव जी का पहला नाम क्या था ?
उत्तर-
भाई लहना जी।

प्रश्न 3.
गुरु अंगद देव जी को गुरुगद्दी कब सौंपी गई ?
उत्तर-
1539 ई० में।

प्रश्न 4.
लहना जी का विवाह किसके साथ हुआ और उस समय उनकी आयु कितनी थी ?
उत्तर-
लहना जी का विवाह 15 वर्ष की आयु में श्री देवीचंद जी की सुपुत्री बीबी खीवी से हुआ।

प्रश्न 5.
लहना जी के कितने पुत्र और पुत्रियां थीं ? उनके नाम भी लिखो।
उत्तर-
लहना जी के दो पुत्र दातू तथा दासू तथा दो पुत्रियां बीबी अमरो तथा बीबी अनोखी थीं।

प्रश्न 6.
‘उदासी’ मत किसने स्थापित किया ?
उत्तर-
‘उदासी’ मत गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्रं बाबा श्रीचंद जी ने स्थापित किया।

प्रश्न 7.
गुरु अंगद साहिब ने ‘उदासी’ मत के प्रति क्या रुख अपनाया ?
उत्तर-
गुरु अंगद साहिब ने उदासी मत को गुरु नानक साहिब के उद्देश्यों के प्रतिकूल बताया और इस मत का विरोध किया।

प्रश्न 8.
गुरु अंगद देव जी की धार्मिक गतिविधियों का केंद्र कौन-सा स्थान था ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी की धार्मिक गतिविधियों का केंद्र अमृतसर जिले में खडूर साहिब था।

प्रश्न 9.
लंगर प्रथा किसने चलाई ?
उत्तर-
लंगर प्रथा गुरु नानक देव जी ने चलाई।

प्रश्न 10.
उदासी संप्रदाय किसने चलाया ?
उत्तर-
बाबा श्रीचंद जी ने।

प्रश्न 11.
गोइंदवाल साहिब की स्थापना (1546 ई०) किसने की ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने।

प्रश्न 12.
गुरु अंगद देव जी ने अखाड़े का निर्माण कहां करवाया ?
उत्तर-
खडूर साहिब में।

प्रश्न 13.
गुरु अंगद देव जी ज्योति-जोत कब समाये ?
उत्तर-
1552 ई० में।

प्रश्न 14.
गुरु अमरदास जी का जन्म कब और कहां हुआ था ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी का जन्म 1479 ई० में जिला अमृतसर में स्थित बासरके नामक गांव में हुआ था।

प्रश्न 15.
गुरु अमरदास जी को गद्दी संभालते समय किस कठिनाई का सामना करना पड़ा ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी को गुरु अंगद देव जी के पुत्रों दासू और दातू के विरोध का सामना करना पड़ा ।
अथवा
गुरु जी को गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र बाबा श्रीचंद के विरोध का भी सामना करना पड़ा।

प्रश्न 16.
गोइंदवाल साहिब में बाऊली का निर्माण कार्य किसने पूरा करवाया ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने।

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प्रश्न 17.
मंजी प्रथा किस गुरु जी ने आरंभ करवाई ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने।

प्रश्न 18.
‘आनंद’ नामक बाणी की रचना किसने की ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने।

प्रश्न 19.
गुरु अमरदास जी ने किन दो अवसरों के लिए सिक्खों के लिए विशिष्ट रीतियां निश्चित की ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने आनंद विवाह की पद्धति आरंभ की जिसमें जन्म तथा मरण के अवसरों पर सिक्खों के लिए विशिष्ट रीतियां निश्चित की गईं।

प्रश्न 20.
गुरु अमरदास जी द्वारा सिक्ख मत के प्रसार के लिए किया गया कोई एक कार्य लिखो।।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब में बाउली का निर्माण किया।
अथवा
उन्होंने मंजी प्रथा की स्थापना की तथा लंगर प्रथा का विस्तार किया।

(III)

प्रश्न 1.
गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को कौन-कौन से तीन त्योहार मनाने का आदेश दिया ?
उत्तर-
उन्होंने सिक्खों को वैशाखी, माघी तथा दीवाली के त्योहार मनाने का आदेश किया।

प्रश्न 2.
गुरु अमरदास जी के काल में सिक्ख अपने त्योहार मनाने के लिए कहां एकत्रित होते थे ?
उत्तर-
सिक्ख अपने त्योहार मनाने के लिए गुरु अमरदास जी के पास गोइंदवाल साहिब में एकत्रित होते थे।

प्रश्न 3.
गुरु अमरदास जी ज्योति-जोत कब समाए ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी 1574 ई० में ज्योति-जोत समाए।

प्रश्न 4.
गुरुगद्दी को पैतृक रूप किसने दिया ?
उत्तर-
गुरुगदी को पैतृक रूप गुरु अमरदास जी ने दिया।

प्रश्न 5.
सिक्खों के चौथे गुरु कौन थे ?
उत्तर-
श्री गुरु रामदास जी।

प्रश्न 6.
अमृतसर शहर की नींव किसने रखी ?
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने।

प्रश्न 7.
मसंद प्रथा का आरंभ सिक्खों के किस गुरु ने आरंभ किया ?
उत्तर-
श्री गुरु रामदास जी ने।

प्रश्न 8.
गुरु रामदास जी की पत्नी का क्या नाम था ?
उत्तर-
गुरु रामदास जी की पत्नी का नाम बीबी भानी जी था।

प्रश्न 9.
गुरु रामदास जी के कितने पुत्र थे ? पुत्रों के नाम भी बताओ।
उत्तर-
गुरु रामदास जी के तीन पुत्र थे-पृथी चंद, महादेव तथा अर्जन देव।

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प्रश्न 10.
गुरु रामदास जी द्वारा सिक्ख धर्म के विस्तार के लिए किया गया कोई एक कार्य बताओ।
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने अमृतसर नगर बसाया। इस नगर के निर्माण से सिक्खों को एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान मिल गया।
अथवा
उन्होंने मसंद प्रथा को आरंभ किया। मसंदों ने सिक्ख धर्म का खूब प्रचार किया।

प्रश्न 11.
अमृतसर नगर का प्रारंभिक नाम क्या था ?
उत्तर-
अमृतसर नगर की प्रारंभिक नाम रामदासपुर था।

प्रश्न 12.
गुरु रामदास जी द्वारा खुदवाए गए दो सरोवरों के नाम लिखो।
उत्तर-
गुरु रामदास जी द्वारा खुदवाए गए दो सरोवर संतोखसर तथा अमृतसर हैं।

प्रश्न 13.
गुरु रामदास जी ने अमृतसर सरोवर के चारों ओर जो ब्राज़ार बसाया वह किस नाम से प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर-
‘गुरु का बाज़ार’।

प्रश्न 14.
गुरु रामदास जी ने ‘गुरु का बाज़ार’ की स्थापना किस उद्देश्य से की ?
उत्तर-
गुरु रामदास जी अमृतसर नगर को हर प्रकार से आत्म-निर्भर बनाना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने 52 अलग-अलग प्रकार के व्यापारियों को आमंत्रित किया और इस बाज़ार की स्थापना की।

प्रश्न 15.
गुरु रामदास जी ने महादेव को गुरुगद्दी के अयोग्य क्यों समझा ?
उत्तर-
महादेव फ़कीर स्वभाव का था तथा उसे सांसारिक विषयों से कोई लगाव नहीं था।

प्रश्न 16.
गुरु रामदास जी ने पृथी चंद को गुरुगद्दी के अयोग्य क्यों समझा ?
उत्तर-
गुरु रामदास जी ने पृथी चंद को गुरुपद के अयोग्य इसलिए समझा क्योंकि वह धोखेबाज़ और षड्यंत्रकारी था।

लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी मत से कैसे अलग किया ?
उत्तर-
उदासी संप्रदाय की स्थापना गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र श्रीचंद जी ने की थी। उसने संन्यास का प्रचार किया। यह बात गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के विरुद्ध थी। गुरु अंगद देव जी ने सिक्खों को स्पष्ट किया कि सिक्ख धर्म गृहस्थियों का धर्म है। इसमें संन्यास का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वह सिक्ख जो संन्यास में विश्वास रखता है, सच्चा सिक्ख नहीं है। इस प्रकार उदासियों को सिक्ख संप्रदाय से अलग करके गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख धर्म को ठोस आधार प्रदान किया।

प्रश्न 2.
गुरु अमरदास जी ने ब्याह की रस्मों में क्या सुधार किए ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी के समय समाज में जाति मतभेद का रोग इतना बढ़ चुका था कि लोग अपनी जाति से बाहर विवाह करना धर्म के विरुद्ध मानने लगे थे। गुरु जी का विश्वास था कि ऐसे रीति-रिवाज लोगों में फूट डालते हैं। इसीलिए उन्होंने सिक्खों को जाति-मतभेद भूल कर अंतर्जातीय विवाह करने का आदेश दिया। उन्होंने विवाह की रीतियों में भी सुधार किया। उन्होंने विवाह के समय रस्मों, फेरों के स्थान पर ‘लावां’ की प्रथा आरंभ की।

प्रश्न 3.
गोइंदवाल साहिब की बाऊली (जल स्रोत) का वर्णन करो।
उत्तर-
गुर अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब नामक स्थान पर बाऊली (जल स्रोत) का निर्माण कार्य पूरा किया जिसका शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय में किया गया था। गुरु अमरदास जी ने इस बावली में 84 सीढ़ियां बनवाई। उन्होंने अपने शिष्यों को बताया कि जो सिक्ख प्रत्येक सीढ़ी पर श्रद्धा और सच्चे मन से ‘जपुजी साहिब’ का पाठ करके स्नान करेगा वह जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो जाएगा और मोक्ष को प्राप्त करेगा। डॉ. इंदू भूषण बनर्जी लिखते हैं, “इस बाऊली की स्थापना सिक्ख धर्म के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण कार्य था।” गोइंदवाल साहिब की बाऊली सिक्ख धर्म का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गई। इस बाऊली पर एकत्रित होने से सिक्खों में आपसी मेलजोल की भावना भी बढ़ी और वे परस्पर संगठित होने लगे।

प्रश्न 4.
आनंद साहिब बारे लिखो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने एक नई बाणी की रचना की जिसे आनंद साहिब कहा जाता है। गुरु साहिब ने अपने सिक्खों को आदेश दिया कि जन्म, विवाह तथा खुशी के अन्य अवसरों पर ‘आनंद’ साहिब का पाठ करें। इस बाणी से सिक्खों में वेद-मंत्रों के उच्चारण का महत्त्व बिल्कुल समाप्त हो गया। आज भी सभी सिक्ख जन्म, विवाह तथा खुशी के अन्य अवसरों पर इसी बाणी को गाते हैं।

प्रश्न 5.
सिक्खों तथा उदासियों में हुए समझौते के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी तथा गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी संप्रदाय से अलग कर दिया था, परंतु गुर रामदास जी ने उदासियों से बड़ा विनम्रतापूर्ण व्यवहार किया। उदासी संप्रदाय के संचालक बाबा श्रीचंद जी एक बार गुरु रामदास जी से मिलने गए। उनके बीच एक महत्त्वपूर्ण वार्तालाप भी हुआ। श्रीचंद जी गुरु साहिब की विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गुरु जी की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार उदासियों ने सिक्ख गुरु साहिबान का विरोध करना छोड़ दिया।

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प्रश्न 6.
गुरु साहिबान के समय के दौरान बनी बाऊलियों (जल स्रोतों) का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
गुरु साहिबान के समय में निम्नलिखित बाऊलियों का निर्माण हुआ

  1. गोइंदवाल साहिब की बाऊली-गोइंदवाल साहिब की बाऊली का शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय में हुआ था। गुरु अमदास जी ने इस बाऊली को पूर्ण करवाया। उन्होंने इसके जल तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियाँ बनवाईं। उन्होंने अपने शिष्यों को बताया कि जो सिक्ख प्रत्येक सीढ़ी पर श्रद्धा और सच्चे मन से जपुजी साहिब का पाठ करेगा वह जन्म-मरण की चौरासी लाख योनियों के चक्कर से मुक्त हो जाएगा।
  2. लाहौर की बाऊली-लाहौर के डब्बी बाज़ार में स्थित इस बाऊली का निर्माण गुरु अर्जन साहिब ने करवाया। यह बाऊली सिक्खों का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गई।

प्रश्न 7.
गुरु अंगद
देव जी द्वारा सिक्ख संस्था (पंथ) के विकास के लिए किए गए किन्हीं चार कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
श्री गुरु नानक देव जी (1539 ई०) के पश्चात् गुरु अंगद देव जी गुरुगद्दी पर आसीन हुए। उनका नेतृत्व सिक्ख धर्म के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उन्होंने निम्नलिखित कार्यों द्वारा सिक्ख धर्म के विकास में योगदान दिया-

  1. गुरुमुखी लिपि का मानकीकरण-गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी लिपि को मानक रूप दिया। कहते हैं कि गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी के प्रचार के लिए गुरुमुखी वर्णमाला में ‘बाल बोध’ की रचना की।
  2. गुरु नानक देव जी की जन्म-साखी-श्री गुरु अंगद देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी की सारी बाणी को एकत्रित करके भाई बाला से गुरु जी की जन्म साखी (जीवन-चरित्र) लिखवाई। इससे सिक्ख गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पालन करने लगे।
  3. लंगर प्रथा-श्री गुरु अंगद देव जी ने लंगर प्रथा जारी रखी। इस प्रथा से जाति-पाति की भावनाओं को धक्का लगा और सिक्ख धर्म के प्रसार में सहायता मिली।
  4. गोइंदवाल साहिब का निर्माण-गुरु अंगद देव जी ने गोइंदवाल साहिब नामक नगर की स्थापना की। गुरु अमरदास के समय में यह नगर एक प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र बन गया। आज भी यह सिक्खों का एक पवित्र धार्मिक स्थान है।

प्रश्न 8.
सिक्ख पंथ में गुरु और सिक्ख (शिष्य) की परंपरा कैसे स्थापित हुई ?
उत्तर-
गुरु नानक साहिब के 1539 में ज्योति-जोत समाने से पूर्व एक विशेष धार्मिक भाई-चारा अस्तित्व में आ चुका था। गुरु नानक देव जी इसे जारी रखना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने अपने जीवन काल में ही अपने शिष्य भाई लहना जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। भाई लहना जी ने गुरु नानक साहिब के ज्योति-जोत समाने के पश्चात् गुरु अंगद देव जी के नाम से गुरुगद्दी संभाली। इस प्रकार गुरु और सिक्ख (शिष्यों) की परंपरा स्थापित हुई और सिक्ख इतिहास में यह विचार गुरु पंथ के सिद्धांत के रूप में विकसित हुआ ।

प्रश्न 9.
गुरु नानक साहिब ने अपने पुत्रों के होते हुए भाई लहना जी को अपना उत्तराधिकारी क्यों बनाया ?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने अपने दो पुत्रों श्री चंद तथा लखमी दास (चंद) के होते हुए भी भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। उसके पीछे कुछ विशेष कारण थे-

  1. आदर्श गृहस्थ जीवन का पालन गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का मुख्य सिद्धांत था, परंतु उनके दोनों पुत्र गुरु जी के इस सिद्धांत का पालन नहीं कर रहे थे। इसके विपरीत भाई लहना गुरु नानक देव जी के सिद्धांत का पालन सच्चे मन से कर रहे थे।
  2. नम्रता तथा सेवा-भाव भी गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का मूल मंत्र था, परंतु बाबा श्रीचंद नम्रता तथा सेवा-भाव दोनों ही गुणों से खाली थे। दूसरी ओर, भाई लहना इन गुणों की साक्षात मूर्ति थे।
  3. गुरु नानक देव जी को वेद-शास्त्रों तथा ब्राह्मण वर्ग की सर्वोच्चता में विश्वास नहीं था। वे संस्कृत को भी पवित्र भाषा स्वीकार नहीं करते थे, परंतु उनके पुत्र श्रीचंद जी को संस्कृत भाषा तथा वेद-शास्त्रों में गूढ विश्वास था।

प्रश्न 10.
गुरु अंगद देव जी के समय में लंगर प्रथा तथा उसके महत्त्व का वर्णन करो।
उत्तर-
लंगर में सभी सिक्ख एक साथ बैठ कर भोजन करते थे। गुरु अंगद देव जी ने इस प्रथा को काफ़ी प्रोत्साहन दिया। लंगर प्रथा के विस्तार तथा प्रोत्साहन के कई महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। यह प्रथा धर्म प्रचार कार्य का एक शक्तिशाली साधन बन गई। निर्धनों के लिए एक सहारा बनने के अतिरिक्त यह प्रचार तथा विस्तार का एक महान् यंत्र बनी। गुरु जी के अनुयायियों द्वारा दिए गए अनुदानों, चढ़ावे इत्यादि को इसने निश्चित रूप दिया। हिंदुओं द्वारा स्थापित की गई दान संस्थाएं अनेक थीं, परंतु गुरु जी का लंगर संभवत: पहली संस्था थी जिसका खर्च समस्त सिक्खों के संयुक्त दान तथा भेंटों से चलाया जाता था। इस बात ने सिक्खों में ऊंच-नीच की भावना को समाप्त करके एकता की भावना जागृत की।

प्रश्न 11.
गुरु अंगद देव जी के जीवन की किस घटना से उनके अनुशासनप्रिय होने का प्रमाण मिलता है ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी ने सिक्खों के समक्ष अनुशासन का एक बहुत बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया। कहा जाता है कि सत्ता और बलवंड नामक दो प्रसिद्ध रबाबी उनके दरबार में रहते थे। उन्हें अपनी कला पर इतना अभिमान हो गया कि वे गुरु जी के आदेशों का उल्लंघन करने लगे। वे इस बात का प्रचार करने लगे कि गुरु जी की प्रसिद्धि केवल हमारे ही मधुर रागों और शब्दों के कारण है। इतना ही नहीं उन्होंने तो गुरु नानक देव जी की महत्ता का कारण भी मरदाना का मधुर संगीत बताया। गुरु जी ने इस अनुशासनहीनता के कारण सत्ता और बलवंड को दरबार से निकाल दिया। अंत में श्रद्धालु भाई लद्धा जी की प्रार्थना पर ही उन्हें क्षमा किया गया। इस घटना का सिक्खों पर गहरा प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप सिक्ख धर्म में अनुशासन का महत्त्व बढ़ गया।

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प्रश्न 12.
गुरु अमरदास जी गुरु अंगद देव जी के शिष्य कैसे बने ? उन्हें गुरुगद्दी कैसे मिली ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने एक दिन गुरु अंगद देव जी की पुत्री बीबी अमरो के मुंह से गुरु नानक देव जी की बाणी सुनी। वे बाणी से इतने प्रभावित हुए कि तुरंत गुरु अंगद देव जी के पास पहुंचे और उनके शिष्य बन गये। इसके पश्चात् गुरु अमरदास जी ने 1541 से 1552 ई० तक (गुरुगद्दी मिलने तक) खडूर साहिब में रह कर गुरु अंगद देव जी की खूब सेवा की। एक दिन कड़ाके की ठंड में अमरदास जी गुरु अंगद देव जी के स्नान के लिए पानी का घड़ा लेकर आ रहे थे। मार्ग में ठोकर लगने से वह गिर पडे। यह देख कर एक बनकर की पत्नी ने कहा कि यह अवश्य निथावां (जिसके पास कोई स्थान न हो) अमरू ही होगा। इस घटना की सूचना जब गुरु अंगद देव जी को मिली तो उन्होंने अमरदास को अपने पास बुलाकर घोषणा की कि, “अब से अमरदास निथावां नहीं होगा, बल्कि अनेक निथावों का सहारा होगा।” मार्च, 1552 ई० में गुरु अंगद देव जी ने अमरदास जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। इस प्रकार गुरु अमरदास जी सिक्खों के तीसरे गुरु बने।

प्रश्न 13.
गुरु अमरदास जी के समय में लंगर प्रथा के विकास का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने लंगर के लिए कुछ विशेष नियम बनाये। अब कोई भी व्यक्ति लंगर में भोजन किए बिना गुरु जी से नहीं मिल सकता था। कहा जाता है कि सम्राट अकबर को गुरु जी के दर्शन करने से पहले लंगर में भोजन करना पड़ा था। गुरु जी का लंगर प्रत्येक जाति, धर्म और वर्ग के लोगों के लिए खुला था। लंगर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी जातियों के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे। इससे जाति-पाति तथा रंग-रूप के भेदभावों को बड़ा धक्का लगा और लोगों में समानता की भावना का विकास हुआ। परिणामस्वरूप सिक्ख एकता के सूत्र में बंधने लगे।

प्रश्न 14.
गुरु अमरदास जी के समय में मंजी प्रथा के विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मंजी प्रथा की स्थापना गुरु अमरदास जी ने की थी। उनके समय में सिक्खों की संख्या काफ़ी बढ़ चुकी थी। परंतु गुरु जी की आयु अधिक होने के कारण यह बहुत कठिन हो गया कि वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करें। अतः उन्होंने अपने सारे आध्यात्मिक प्रदेश को 22 भागों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक भाग को ‘मंजी’ तथा उसके मुखिया को मंजीदार कहा जाता था। प्रत्येक मंजी छोटे-छोटे स्थानीय केंद्रों में बंटी हुई थी जिन्हें पीढ़ियाँ (Piris) कहते थे। मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चंद नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में प्रचार कार्य को बढ़ाने में विशेष योगदान दिया होगा।”

प्रश्न 15.
“गुरु अमरदास जी एक महान् समाज सुधारक थे।” इस कथन के पक्ष में कोई चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
गुरु अमरदास जी ने निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुधार किए-

  1. गुरु अमरदास जी ने जाति मतभेद का खंडन किया। गुरु जी का विश्वास था कि जाति मतभेद परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध है। इसलिए गुरु जी के लंगर में जाति-पाति का कोई भेद-भाव नहीं रखा जाता था।
  2. उस समय सती प्रथा जोरों से प्रचलित थी। गुरु जी ने इस प्रथा के विरुद्ध जोरदार आवाज़ उठाई। .
  3. गुरु जी ने स्त्रियों में प्रचलित पर्दे की प्रथा की भी घोर निंदा की। वे पर्दे की प्रथा को समाज की उन्नति के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा मानते थे।
  4. गुरु अमरदास जी नशीली वस्तुओं के सेवन के भी घोर विरोधी थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को सभी नशीली वस्तुओं से दूर रहने का निर्देश दिया।

दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
गुरु अंगद साहिब ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या योगदान दिया?
उत्तर-
श्री गुरु नानक देव जी (1539 ई०) के पश्चात् गुरु अंगद देव जी गुरुगद्दी पर आसीन हुए। उनका नेतृत्व सिक्ख धर्म के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उन्होंने अग्रलिखित ढंग से सिक्ख धर्म के विकास में योगदान दिया

  1. गुरुमुखी लिपि में सुधार-गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी लिपि में सुधार किया। कहते हैं कि गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी के प्रचार के लिए गुरुमुखी वर्णमाला में बाल बोध’ की रचना की। जनसाधारण की भाषा होने के कारण इससे सिक्ख धर्म के प्रचार के कार्य को बढ़ावा मिला। आज सिक्खों के सभी धार्मिक ग्रंथ इसी भाषा में हैं।
  2. गुरु नानक देव जी की जन्म-साखी-श्री गुरु अंगद देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी की सारी बाणी को एकत्रित करके भाई बाला से गुरु जी की जन्म-साखी (जीवन-चरित्र) लिखवाई। इससे सिक्ख गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पालन करने लगे।
  3. लंगर प्रथा-श्री गुर अंगद देव जी ने लंगर प्रथा जारी रखी। उन्होंने यह आज्ञा दी कि जो कोई उनके दर्शन को आए, उसे पहले लंगर में भोजन कराया जाए। यहां प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेद-भाव के भोजन करता था। इससे जाति-पाति की भावनाओं को धक्का लगा और सिक्ख धर्म के प्रसार में सहायता मिली।
  4. उदासियों से सिक्ख धर्म को अलग करना-गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र श्रीचंद जी ने उदासी संप्रदाय की स्थापना की थी। उन्होंने संन्यास का प्रचार किया। यह बात गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के विरुद्ध थी। अतः गुरु अंगद देव जी ने उदासियों से नाता तोड़ लिया।
  5. गोइंदवाल का निर्माण-गुरु अंगद देव जी ने गोइंदवाल नामक नगर की स्थापना की। गुरु अमरदास जी के समय में यह नगर सिक्खों का एक प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र बन गया। आज भी यह सिक्खों का एक पवित्र धार्मिक स्थान
  6. अनुशासन को बढ़ावा-गुरु जी बड़े ही अनुशासन प्रिय थे। उन्होंने सत्ता और बलवंड नामक दो प्रसिद्ध रबाबियों को अनुशासन भंग कराने के कारण दरबार से निकाल दिया, परंतु बाद में भाई लद्धा के प्रार्थना करने पर गुरु जी ने उन्हें क्षमा कर दिया।
    सच तो यह है कि गुरु अंगद देव जी ने सिक्ख धर्म को पृथक् पहचान प्रदान की।

प्रश्न 2.
गुरु अमरदास जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या-क्या कार्य किए ?
उत्तर-
गुरु अमरदास जी को सिक्ख धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गुरु नानक देव जी ने धर्म का जो बीज बोया था वह गुरु अंगद देव जी के काल में अंकुरित हो गया। गुरु अमरदास जी ने अपने कार्यों से इस नये पौधे की रक्षा की। संक्षेप में, गुरु अमरदास जी के कार्यों का वर्णन इस प्रकार है

  1. गोइंदवाल साहिब की बावली का निर्माण-गुरु अमरदास जी ने सर्वप्रथम गोइंदवाल साहिब के स्थान पर एक बावली (जल-स्रोत) का निर्माण कार्य पूरा किया जिसका शिलान्यास गुरु अंगद देव जी के समय रखा गया था। गुरु अमरदास जी ने इस बावली की तह तक पहुंचने के लिए 84 सीढ़ियां बनवाईं। गुरु जी के अनुसार प्रत्येक सीढ़ी पर जपुजी साहिब का पाठ करने से जन्म-मरण की चौरासी लाख योनियों के चक्कर से मुक्ति मिलेगी। गोइंदवाल साहिब की बावली सिक्ख धर्म का एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थान बन गई।
  2. लंगर प्रथा-गुरु अमरदास जी ने लंगर प्रथा का विस्तार करके सिक्ख धर्म के विकास की ओर एक और महत्त्वपूर्ण कदम उठाया। उन्होंने लंगर के लिए कुछ विशेष नियम बनाए। अब कोई भी व्यक्ति लंगर में भोजन किए बिना गुरु जी से नहीं मिल सकता था। लंगर प्रथा से जाति-पाति तथा रंग-रूप के भेदभावों को बड़ा धक्का लगा और लोगों में समानता की भावना का विकास हुआ। परिणामस्वरूप सिक्ख एकता के सूत्र में बंधने लगे।
  3. सिक्ख गुरु साहिबान के शब्दों को एकत्रित करना-गुरु नानक देव जी के शब्दों तथा श्लोकों को गुरु अंगद देव जी ने एकत्रित करके उनके साथ अपने रचे हुए शब्द भी जोड़ दिए थे। यह सारी सामग्री गुरु अंगद देव जी ने गुरु अमरदास जी को सौंप दी थी। गुरु अमरदास जी ने कुछ-एक नए श्लोकों की रचना की और उन्हें पहले वाले संकलन (collection) के साथ मिला दिया। इस प्रकार विभिन्न गुरु साहिबान के शब्दों तथा उपदेशों के एकत्र हो जाने से ऐसी सामग्री तैयार हो गई जो आदि ग्रंथ साहिब के संकलन का आधार बनी।
  4. मंजी प्रथा-वृद्धावस्था के कारण गुरु साहिब जी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करना कठिन हो गया था। अतः उन्होंने अपने पूरे आध्यात्मिक साम्राज्य को 22 प्रांतों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक प्रांत को ‘मंजी’ कहा जाता था। प्रत्येक मंजी सिक्ख धर्म के प्रचार का एक केंद्र थी। गुरु अमरदास जी द्वारा स्थापित मंजी प्रणाली का सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व है। डॉ० गोकुल चंद नारंग के शब्दों में, “गुरु जी के इस कार्य ने सिक्ख धर्म की नींव सुदृढ़ करने तथा देश के सभी भागों में प्रचार कार्य बढ़ाने में विशेष योगदान दिया।”
  5. उदासियों से सिक्खों को पृथक् करना-गुरु साहिब ने उदासी संप्रदाय के सिद्धांतों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने अपने अनुयायियों को समझाया कि कोई भी व्यक्ति, जो उदासी नियमों का पालन करता है, सच्चा सिक्ख नहीं हो सकता। गुरु जी के इन प्रयत्नों से सिक्ख उदासियों से पृथक् हो गए और सिक्ख धर्म का अस्तित्व मिटने से बच गया।
  6. नई परंपराएं-गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को व्यर्थ के रीति-रिवाजों का त्याग करने का उपदेश दिया। हिंदुओं में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर खूब रोया-पीटा जाता था। परंतु गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को रोने-पीटने के स्थान पर ईश्वर का नाम लेने का उपदेश दिया। उन्होंने विवाह की भी नई विधि आरंभ की जिसे आनंद कारज कहते हैं।
  7. आनंद साहिब की रचना-गुरु अमरदास जी ने एक नई बाणी की रचना की जिसे आनंद साहिब कहा जाता सच तो यह है कि गुरु अमरदास जी का गुरु काल सिक्ख धर्म के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। गुरु जी के द्वारा बाऊली का निर्माण, मंजी प्रथा के आरंभ, लंगर प्रथा के विस्तार तथा नए रीति-रिवाजों ने सिख धर्म के संगठन में बड़ी सहायता की।

PSEB 9th Class SST Solutions History Chapter 3 सिक्ख धर्म का विकास (1539 ई०-1581 ई०)

प्रश्न 3.
गुरु अमरदास जी के द्वारा किए गए सुधारों का वर्णन करो। .
उत्तर-
गुरु अमरदास जी के समय में समाज अनेकों बुराइयों का शिकार हो चुका था। गुरु जी इस बात को भली-भांति समझते थे, इसलिए उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुधार किए। सामाजिक क्षेत्र में गुरु जी के कार्यों का वर्णन निम्नलिखित है-

  1. जाति-पाति का विरोध-गुरु अमरदास जी ने जाति-मतभेद का खंडन किया। उनका विश्वास था कि जातीय मतभेद परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध है। .
  2. छुआछूत की निंदा-गुरु अमरदास जी ने छुआछूत को समाप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके लंगर में जाति-पाति का कोई भेदभाव नहीं था। वहां सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते थे।
  3. विधवा विवाह-गुरु अमरदास के समय में विधवा विवाह निषेध था। किसी स्त्री को पति की मृत्यु के पश्चात् सारा जीवन विधवा के रूप में व्यतीत करना पड़ता था। गुरु जी ने विधवा विवाह को उचित बताया और इस प्रकार स्त्री जाति को समाज में योग्य स्थान दिलाने का प्रयत्न किया।
  4. सती-प्रथा की भर्त्सना-उस काल के समाज में एक और बड़ी बुराई सती-प्रथा की थी। जी० वी० स्टॉक के अनुसार, गुरु अमरदास जी ने सती-प्रथा की सबसे पहले निंदा की। उनका कहना था कि वह स्त्री सती नहीं कही जा सकती जो अपने पति के मृत शरीर के साथ जल जाती है। वास्तव में वही स्त्री सती है जो अपने पति के वियोग की पीड़ा को सहन करे।
  5. पर्दे की प्रथा का विरोध-गुरु जी ने स्त्रियों में प्रचलित पर्दे की प्रथा की भी घोर निंदा की। वह पर्दे की प्रथा को समाज की उन्नति के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा मानते थे। इसलिए उन्होंने स्त्रियों को बिना पर्दा किए लंगर की सेवा करने तथा संगत में बैठने का आदेश दिया।
  6. नशीली वस्तुओं की निंदा-गुरु अमरदास जी ने अपने अनुयायियों को नशीली वस्तुओं से दूर रहने का उपदेश दिया। उन्होंने अपने एक ‘शब्द’ में शराब सेवन की खूब निंदा की है।
  7. सिक्खों में भ्रातृत्व की भावना-गुरु जी ने सिक्खों को यह आदेश दिया कि वे माघी, दीपावली और वैशाखी आदि त्योहारों को एक साथ मिलकर नई परंपरा के अनुसार मनायें। इस प्रकार उन्होंने सिक्खों में भ्रातृत्व की भावना जागृत करने का प्रयास किया।
  8. जन्म तथा मृत्यु के संबंध में नये नियम-गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को जन्म-मृत्यु तथा विवाह के अवसरों पर नये रिवाजों का पालन करने को कहा। ये रिवाज हिंदुओं के रीति-रिवाजों से बिल्कुल भिन्न थे। इनके लिए ब्राह्मण वर्ग को बुलाने की कोई आवश्यकता न थी। इस प्रकार गुरु साहिब ने सिक्ख धर्म को पृथक् पहचान प्रदान की।
    सच तो यह है कि गुरु अमरदास जी ने अपने कार्यों से सिक्ख धर्म को नया बल दिया।

प्रश्न 4.
गुरु रामदास जी ने सिक्ख धर्म के विकास के लिए क्या यत्न किए ?
उत्तर-
गुरु रामदास जी सिक्खों के चौथे गुरु थे। उन्होंने सिक्ख पंथ के विकास में निम्नलिखित योगदान दिया

  1. अमृतसर का शिलान्यास-गुरु रामदास जी ने रामदासपुर की नींव रखी। आजकल इस नगर को अमृतसर कहते हैं। 1577 ई० में गुरु जी ने यहां अमृतसर तथा संतोखसर नामक दो सरोवरों की खुदाई आरंभ की। कुछ ही समय में सरोवर के चारों ओर एक छोटा-सा नगर बस गया। इसे रामदासपुर का नाम दिया गया। गुरु जी इस नगर को हर प्रकार से आत्म-निर्भर बनाना चाहते थे। अत: उन्होंने 52 अलग-अलग प्रकार के व्यापारियों को आमंत्रित किया। उन्होंने एक बाज़ार की स्थापना की जिसे आजकल ‘गुरु का बाज़ार’ कहते हैं।
  2. मसंद प्रथा का आरंभ-गुरु रामदास जी को अमृतसर तथा संतोखसर नामक सरोवरों की खुदाई के लिए काफ़ी धन की आवश्यकता थी। अत: उन्होंने मसंद प्रथा का आरंभ किया। इसके अनुसार गुरु के मसंद स्थानीय सिख संगत के लिए गुरु के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते थे। वे संगत को गुरु घर से जोड़ते थे और उनकी साझा समस्याओं का समाधान भी करते थे। इन मसंदों ने विभिन्न प्रदेशों में सिक्ख धर्म का खूब प्रचार किया तथा काफ़ी धन राशि एकत्रित की।
  3. उदासियों से मत-भेद की समाप्ति-गुरु अंगद देव जी तथा गुरु अमरदास जी ने सिक्खों को उदासी संप्रदाय से अलग कर दिया था। परंतु गुरु रामदास जी ने उदासियों से बड़ा विनम्रतापूर्ण व्यवहार किया। उदासी संप्रदाय के संचालक बाबा श्रीचंद जी एक बार गुरु रामदास जी से मिलने आए। दोनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण वार्तालाप हुआ। श्रीचंद जी गुरु साहिब की विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने गुरु जी की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया।
  4. सामाजिक सुधार-गुरु रामदास जी ने गुरु अमरदास जी द्वारा आरंभ किए गए नए सामाजिक रीति-रिवाजों को जारी रखा। उन्होंने सती प्रथा की घोर निंदा की, विधवा पुनर्विवाह की अनुमति दी तथा विवाह और मृत्यु संबंधी कुछ नए नियम जारी किए।
  5. अकबर के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध -मुग़ल सम्राट अकबर सभी धर्मों के प्रति सहनशील था। वह गुरु रामदास जी का बड़ा सम्मान करता था। कहा जाता है कि गुरु रामदास जी के समय में एक बार पंजाब बुरी तरह अकाल की चपेट में आ गया जिससे किसानों की दशा बहुत खराब हो गई, परंतु गुरु जी के कहने पर अकबर ने पंजाब के कृषकों का पूरे वर्ष का लगान माफ कर दिया।
  6. गुरुगद्दी का पैतृक सिद्धांत-गुरु रामदास जी ने गुरुगद्दी को पैतृक रूप प्रदान किया। उन्होंने ज्योति जोत समाने से कुछ समय पूर्व गुरुगद्दी अपने छोटे, परंतु सबसे योग्य पुत्र अर्जन देव जी को सौंप दी। गुरु रामदास जी ने गुरुगद्दी को पैतृक बनाकर सिक्ख इतिहास में एक नवीन अध्याय का श्रीगणेश किया। परंतु एक बात ध्यान देने योग्य है कि गुरु पद का आधार गुण तथा योग्यता ही रहा।
    सच तो यह है कि गुरु रामदास जी ने बहुत ही कम समय तक सिक्ख मत का मार्ग-दर्शन किया। परंतु इस थोड़े समय में ही उनके प्रयत्नों से सिक्ख धर्म के रूप में विशेष निखार आया।

सिक्ख धर्म का विकास PSEB 9th Class History Notes

  1.  गुरु अंगद देव जी – दूसरे सिक्ख गुरु अंगद देव जी ने गुरु नानक साहिब की बाणी एकत्रित की और इसे गुरुमुखी लिपि में लिखा। उनका यह कार्य गुरु अर्जन साहिब द्वारा संकलित ‘ग्रंथ साहिब’ की तैयारी का पहला चरण सिद्ध हुआ। गुरु अंगद देव जी ने स्वयं भी गुरु नानक देव जी के नाम से बाणी की रचना की। इस प्रकार उन्होंने गुरु पद की एकता को दृढ़ किया। संगत और पंगत की संस्थाएं गुरु अंगद साहिब के अधीन भी जारी रहीं।
  2. गुरु अमरदास जी – गुरु अमरदास जी सिक्खों के तीसरे गुरु थे। वह 22 वर्ष तक गुरुगद्दी पर रहे। वह खडूर साहिब से गोइंदवाल साहिब चले गए। वहां उन्होंने एक बाउली बनवाई जिसमें उनके सिक्ख (शिष्य) धार्मिक अवसरों पर स्नान करते थे। गुरु अमरदास जी. ने विवाह की एक सरल विधि प्रचलित की और उसे आनंद-कारज का नाम दिया। उनके समय में सिक्खों की संख्या काफ़ी बढ़ गई।
  3. गुरु रामदास जी – चौथे गुरु रामदास जी ने रामदासपुर (आधुनिक अमृतसर) में रह कर प्रचार कार्य आरंभ किया। इसकी नींव गुरु अमरदास जी के जीवन-काल के अंतिम वर्षों में रखी गई थी। श्री रामदास जी ने रामदासपुर में एक बहुत बड़ा सरोवर बनवाया जो अमृतसर अर्थात् अमृत के सरोवर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्हें अमृतसर तथा संतोखसर नामक तालाबों की खुदाई के लिए काफ़ी धन की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने मसंद प्रथा का श्रीगणेश किया। उन्होंने गुरुगद्दी को पैतृक रूप भी प्रदान किया।
  4. गुरुमुखी लिपि को मानकीकरण – गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी लिपि का मानकीकरण किया। कहते हैं कि गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी के प्रचार के लिए गुरुमुखी वर्णमाला में बच्चों के लिए ‘बाल बोध’ की रचना की। आम लोगों की बोली होने के कारण इससे सिक्ख धर्म के प्रचार के कार्य को बढ़ावा मिला। आज सिक्खों के सभी धार्मिक ग्रंथ इसी भाषा में हैं।
  5. मंजी प्रथा –   गुरु अमरदास जी के समय में सिक्खों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी। परंतु वृद्धावस्था के कारण गुरु साहिब जी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार करना कठिन हो गया था। अत: उन्होंने अपने सारे आध्यात्मिक साम्राज्य को 22 प्रांतों में बांट दिया। इनमें से प्रत्येक प्रांत को ‘मंजी’ कहा जाता था। प्रत्येक मंजी सिक्ख धर्म के प्रचार का एक केंद्र थी जिसके संचालन का कार्यभार गुरु जी ने अपने किसी विद्वान् श्रद्धालु शिष्य को सौंप रखा था।
  6. अनंदु साहिब की रचना – गुरु अमरदास जी ने एक नई बाणी की रचना की जिसे ‘अनंदु साहिब’ कहा जाता है। इस बाणी से सिक्खों में वेद-मंत्रों के उच्चारण का महत्त्व बिल्कुल समाप्त हो गया।
  7. गोइंदवाल साहिब का निर्माण – गुरु अंगद देव जी ने गोइंदवाल साहिब नामक नगर की स्थापना की। गुरु अमरदास जी के समय में यह नगर एक प्रसिद्ध धार्मिक केंद्र बन गया। आज भी यह सिक्खों का एक पवित्र धार्मिक स्थान है।
  8. लंगर प्रथा का विस्तार – श्री गुरु अंगद देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी द्वारा आरम्भ की गई लंगर प्रथा का विस्तार किया। उन्होंने यह आज्ञा दी कि जो कोई उनके दर्शन को आए, वह पहले लंगर में भोजन करे। यहां प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेद-भाव के भोजन करता था। इससे जाति-पाति की भावनाओं को धक्का लगा और सिक्ख धर्म के प्रसार में सहायता मिली।
  9. 31 मार्च, 1504-श्री गुरु अंगद देव जी का जन्म।
  10. 2 सितंबर, 1539 ई० से 29 मार्च 1552 ई०-गुरु अंगद देव जी गुरुगद्दी पर विराजमान रहे।
  11. 1546 ई०-श्री गुरु अंगद देव जी द्वारा गोइंदवाल साहिब नगर की स्थापना।
  12. 29 मार्च, 1552-श्री गुरु अंगद देव जी ज्योति-जोत समाए।
  13. 5 मई, 1479 ई०-श्री गुरु अमरदास जी का जन्म।
  14. मार्च 1552 ई०-श्री गुरु अमरदास जी गुरुगद्दी पर विराजमान।
  15. मार्च 1559 ई०- श्री गुरु अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब में बाउली का निर्माण कार्य पूरा किया।
  16. 1574 ई०- श्री गुरु अमरदास जी ज्योति-जोत समाए।
  17. 24 सितंबर, 1534 ई०-श्री गुरु रामदास जी का जन्म।
  18. 1574 ई० से 1581 ई०-श्री गुरु रामदास जी गुरुगद्दी पर विराजमान रहे।
  19. 1 सितंबर, 1581 ई०-श्री गुरु रामदास जी ज्योति-जोत समाए।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 5 वर्ग असमानताएं

Punjab State Board PSEB 12th Class Sociology Book Solutions Chapter 5 वर्ग असमानताएं Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 वर्ग असमानताएं

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सभी समाजों के अस्तित्व का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।’ किसका कथन है :
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) वी० आई० लेनिन
(ग) एनटोनियो ग्रामसी
(घ) रोसा लक्समबर्ग।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 2.
‘अपने आप में वर्ग’ और ‘अपने आप के लिए वर्ग’ की अवधारणा किसने दी है ?
(क) मार्क्स
(ख) वैबर
(ग) सोरोकिन
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) मार्क्स।

प्रश्न 3.
ऐरिक आलिन राइट द्वारा दिया गया वर्ग सिद्धान्त किनके विचारों का संश्लेषण करते हैं ?
(क) मार्क्स और दुखीम
(ख) मार्क्स और वैबर
(ग) मार्क्स और स्पैंसर
(घ) मार्क्स और एंजेल्स।
उत्तर-
(क) मार्क्स और दुर्थीम।

प्रश्न 4.
सम्पत्तिविहीन सफेदपोश व्यावसायिक वर्ग की एक वर्ग के रूप में चर्चा किसने की है ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) लॉयड वार्नर
(घ) विलफ्रिडो-पेरिटो।
उत्तर-
(ख) मैक्स वैबर।

प्रश्न 5.
जाति व वर्ग में भिन्नता को कौन नहीं दर्शाता :
(क) आरोपित व उपलब्धियां
(ख) बंद व मुक्त गतिशीलता
(ग) पवित्र व धर्म निरपेक्ष
(घ) शासक एवं शासित।
उत्तर-
(घ) शासक एवं शासित।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा उत्पादन का साधन नहीं है ?
(क) भूमि
(ख) संस्कृति
(ग) श्रम
(घ) पूंजी।
उत्तर-
(ख) संस्कृति।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन जीवन अवसरों व बाजार स्थितियों को वर्ग विश्लेषण के लिए महत्त्व देते हैं ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) एलफ्रेड वेबर
(घ) सी० डब्ल्यू० मिल्स।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 8.
भारत में उत्पादन के संसाधनों के स्वामित्व का निर्णायक कारण कौन-सा है ?
(क) स्थिति समूह
(ख) वर्ग
(ग) जाति
(घ) सामाजिक श्रेणी।
उत्तर-
(ग) जाति।

प्रश्न 9.
कृषिदास (खेतीहर मज़दूर) वर्ग का विरोधी है :
(क) सामंत
(ख) छोटे स्तर के पूंजीपति
(ग) बुर्जुआ
(घ) स्वामी।
उत्तर-
(क) सामंत।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. वर्ग प्रणाली स्वभाव में ……………… है।
2. वर्ग प्रणाली स्तर में ………………..
3. वैबर ने वर्ग के …………………… पद पर विचार किया है।
4. व्यक्ति का वर्ग स्तर …………………… एवं …………………… द्वारा निर्धारित होता है।
उत्तर-

  1. सार्वभौमिक,
  2. मुक्त,
  3. आर्थिक,
  4. शिक्षा, व्यवसाय।

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C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं

1. सामाजिक वर्ग दासता, दर्जा, जागीरदारी तथा जाति की तरह स्तरीकरण का ही एक रूप है।
2. एक सामाजिक वर्ग अनिवार्य रूप से एक स्थिति समूह होता है।
3. वैबर के अनुसार धन, शक्ति तथा स्थिति असमानता के रूप हैं।
4. सामाजिक वर्ग मुक्त समूह हैं।
उत्तर-

  1.  सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही।

D. निम्नलिखित शब्दों का मिलान करें-

कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
सामाजिक वर्ग — बुर्जुआ
पूंजीपति — विशेष वर्ग की जीवन शैली
वर्ग के निर्धारक — मुक्त समूह
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
वर्ग चेतना — व्यवसाय
जीने का ढंग — आत्म जागरुकता
उत्तर-
कॉलम ‘ए’ — कॉलम ‘बी’
सामाजिक वर्ग — मुक्त समूह
पूंजीपति — बुर्जुआ
वर्ग के निर्धारक — व्यवसाय
वर्ग चेतना — आत्म जागरुकता
जीने का ढंग — विशेष वर्ग की जीवन शैली

II. अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1. किस सामाजिक समूह में सदस्यों का उत्पादन की शक्तियों के साथ समान सम्बन्ध होता है ?
उत्तर-पूंजीपति वर्ग में।

प्रश्न 2. क्या वर्ग में किसी की उर्ध्वगामी व निम्नगामी गतिशीलता हो सकता है ?
उत्तर-जी हाँ, यह मुमकिन है।

प्रश्न 3. विभिन्न सामाजिक आर्थिक स्थितियों में समूहों के विभाजन को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-वर्ग व्यवस्था।

प्रश्न 4. व्यक्तियों का कौन-सा सामाजिक वर्ग नीले कॉलर अथवा श्रम व्यवसाय की रचना करता है ?
उत्तर-श्रमिक वर्ग या मज़दूर वर्ग।

प्रश्न 5. वर्ग की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को दर्शाइए।
उत्तर-(i) वर्ग व्यवस्था के कई आधार होते हैं। (ii) वर्ग के लोगों में अपने वर्ग के प्रति चेतना होती है।

प्रश्न 6. आप संसाधनों के स्वामित्व से क्या समझते हैं ?
उत्तर- इसका अर्थ है कि साधनों पर किसी-न-किसी का व्यक्तिगत अधिकार होता है तथा वह ही उसका मालिक होता है।

प्रश्न 7. उत्पादन के साधनों को पहचानें।
उत्तर-वह साधन जो किसी न किसी वस्तु के उत्पादन में सहायता करते हैं, उत्पादन के साधन होते हैं जैसे कि मशीनें, उद्योग, औज़ार इत्यादि।

प्रश्न 8. उन दो वर्गों के नाम दें जो दासता के समय पाए गए।
उत्तर-दासता के समय दो वर्ग होते थे तथा वे थे गुलाम तथा स्वामी।

प्रश्न 9. बुर्जुआ कौन है ?
उत्तर-जिसके हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा जो उन साधनों की सहायता से अन्य वर्गों का शोषण करता है उसे बुर्जुआ कहते हैं। जैसे कि उद्योगपति।

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III. लघु उत्तरों वाले प्रश्न-

प्रश्न 1.
वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वर्ग ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी की स्थिति समाज में अपनी ही होती है। इसके अनुसार वर्ग के प्रत्येक सदस्य को कुछ विशेष उत्तरादियत्व, अधिकार तथा शक्तियां भी प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 2.
जाति व वर्ग में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-

  • जाति में व्यक्ति की स्थिति प्रदत्त होती है, जबकि वर्ग में यह अर्जित होती है।
  • व्यक्ति अपनी जाति को परिवर्तित नहीं कर सकता जबकि वर्ग को कर सकता है।
  • मुख्यतः चार प्रकार की जातियां होती हैं जबकि वर्ग हज़ारों की संख्या में हो सकते हैं।

प्रश्न 3.
ग्रामीण भारत में पाए जाने वाले वर्गों की पहचान करें।
उत्तर-
बड़े ज़मींदार, गैर-हाज़िर ज़मींदार, पूँजीपति किसान, किसान, ठेका आधारित ठेकेदार, सीमांत किसान, भूमिविहीन कृषक, साहूकार, छोटे व्यापारी, स्वैः नियुक्त व्यक्ति इत्यादि।

प्रश्न 4.
मार्क्स के इस कथन का क्या अभिप्राय है कि ‘सभी मौजूद समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।’
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार आज तक जितने भी समाज हुए हैं उनमें मुख्य रूप से दो समूह हुए हैं-प्रथम वह जिसके पास उत्पादन के साधन हैं तथा द्वितीय वह जिसके पास नहीं है। इस कारण दोनों में संघर्ष चलता रहा है। इस कारण मार्क्स ने कहा था कि सभी मौजूद समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।

प्रश्न 5.
मैक्स वैबर द्वारा वर्णित किए गए वर्गों के नाम लिखें।
उत्तर-

  • पूंजीपति बुर्जुआ वर्ग
  • सम्पत्ति विहीन सफेद पोश कार्यकारी वर्ग
  • मध्यवर्गीय वर्ग
  • औद्योगिक कार्यकारी वर्ग।

IV. दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐरिक ओलिन राइट के वर्ग विषयक विचारों की चर्चा करें।
उत्तर-
ऐरिक ओलिन राइट ने वर्ग का सिद्धांत दिया है तथा यह सिद्धांत मार्क्स वैबर के विचारों का मिश्रण है। राइट के अनुसार पूँजीपति समाज में आर्थिक साधनों पर नियंत्रण के लिए तीन मापदण्ड हैं तथा वह हैं-

  • पैसा या पूँजी पर नियन्त्रण ।
  • ज़मीन, फैक्टरी तथा दफ्तरों पर नियन्त्रण
  • मज़दूरों पर नियन्त्रण।।

यह मापदण्ड ही कई वर्गों का निर्माण करते हैं जैसे कि नीली वर्दी वाले कर्मी, श्वेत कालर कर्मी, व्यावसायिक कर्मचारी व शारीरिक कार्य करने वाले कर्मी इत्यादि। उसके अनुसार मध्य वर्ग के वर्करों (प्रबन्धक व निरीक्षक) का मालिकों से सीधा रिश्ता होता है जबकि मजदूर वर्ग का शोषण होता है।

प्रश्न 2.
जाति व वर्ग में संबंध स्पष्ट करें।
अथवा
जाति तथा वर्ग किस प्रकार परस्पर सम्बन्धित है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • जाति जन्म पर आधारित होती है जबकि वर्ग व्यवसाय तथा व्यक्तिगत योग्यता पर आधारित होता है।
  • जाति में प्रदत्त स्थिति प्राप्त होती है जबकि वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है।
  • जाति अन्तर्वैवाहिक समूह होती है, जबकि वर्ग बर्हिविवाही समूह होता है।
  • जाति को वैधता हिंदू धार्मिक क्रियाओं से मिलती है परन्तु वर्ग को वैधता उसकी व्यक्तिगत योग्यता तथा पूँजीवादी व्यवस्था से मिलती है।
  • जाति में गतिशीलता नहीं होती है क्योंकि यह एक बंद व्यवस्था है परन्तु वर्ग में गतिशीलता होती है क्योंकि यह एक मुक्त व्यवस्था है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण भारत में पाए जाने वाले वर्गों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
बड़े ज़मींदार, गैर-हाज़िर ज़मींदार, पूँजीपति किसान, किसान, ठेका आधारित ठेकेदार, सीमांत किसान, भूमिविहीन कृषक, साहूकार, छोटे व्यापारी, स्वैः नियुक्त व्यक्ति इत्यादि।

प्रश्न 4.
शहरी भारत में पाए जाने वाले वर्गों का संक्षेप में वर्णन करें।
अथवा
नगरीय भारत में पाए जाने वाले वर्गों को लिखिए।
उत्तर-

  • कार्पोरेट पूंजीपति।
  • औद्योगिक पूंजीपति।
  • आर्थिक पूंजीपति।
  • नौकरशाह।
  • सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक अभिजात वर्ग।
  • मध्य वर्ग-मैनेजर, व्यापारी, छोटे दुकानदार, स्वै-कार्यरत व्यक्ति, बैंकर।
  • निम्न वर्ग-सहायक, मिस्त्री, निम्न स्तरीय निरीक्षक।
  • संगठित क्षेत्र में औद्योगिक कार्यरत वर्ग।
  • असंगठित/अर्द्ध संगठित क्षेत्र में कार्यरत वर्ग।
  • दिहाड़ीदार मज़दूर।
  • बेरोज़गार व्यक्ति।

प्रश्न 5.
मध्य वर्ग पर कुछ टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
अमीर तथा निर्धन व्यक्तियों के बीच एक अन्य वर्ग आता है जिसे मध्य वर्ग का नाम दिया जाता है। यह वर्ग साधारणतया तथा नौकरी करने वालों, छोटे दुकानदारों या व्यापारी लोगों का होता है। यह वर्ग या तो उच्च वर्ग के लोगों के पास नौकरी करता है या सरकारी नौकरी करता है। छोटे-बड़े व्यापारी, छोटे-बड़े दुकानदार, क्लर्क, छोटे-बड़े अफसर, छोटे-बड़े किसान, ठेकेदार, जायदाद का कार्य करने वाले लोग, छोटे-मोटे कलाकार इत्यादि सभी इस वर्ग में आते हैं। उच्च वर्ग इस वर्ग की सहायता से निम्न वर्ग पर अपना अधिकार कायम रखता है।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

V. अति दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मार्क्सवादी के वर्ग सिद्धान्त का वर्णन करें।
अथवा
वर्ग के मार्क्सवादी सिद्धान्त को बताइए।
उत्तर-
कार्ल मार्क्स ने सामाजिक स्तरीकरण का संघर्षवाद का सिद्धान्त दिया है और यह सिद्धान्त 19वीं शताब्दी के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों के कारण ही आगे आया है। मार्क्स ने केवल सामाजिक कारकों को ही सामाजिक स्तरीकरण एवं अलग-अलग वर्गों में संघर्ष का सिद्धान्त माना है। ___ मार्क्स ने यह सिद्धान्त श्रम विभाजन के आधार पर दिया। उसके अनुसार श्रम दो प्रकार का होता है-शारीरिक एवं बौद्धिक श्रम और यही अन्तर ही सामाजिक वर्गों में संघर्ष का कारण बना।

मार्क्स का कहना है कि समाज में साधारणतः दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है। दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता है। इस मलकीयत के आधार पर ही पहला वर्ग उच्च स्थिति में एवं दूसरा वर्ग निम्न स्थिति में होता है। मार्क्स पहले (मालिक) वर्ग को पूंजीपति वर्ग और दूसरे (गैर-मालिक) वर्ग को मज़दूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग, मजदूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है और मज़दूर वर्ग अपने आर्थिक अधिकारों की प्राप्ति हेतु पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यही स्तरीकरण का परिणाम है।

मार्क्स का कहना है कि स्तरीकरण के आने का कारण ही सम्पत्ति का असमान विभाजन है। स्तरीकरण की प्रकृति उस समाज के वर्गों पर निर्भर करती है और वर्गों की प्रकृति उत्पादन के तरीकों पर उत्पादन का तरीका तकनीक पर निर्भर करता है। वर्ग एक समूह होता है जिसके सदस्यों के सम्बन्ध उत्पादन की शक्तियों के समान होते हैं, इस तरह वह सभी व्यक्ति जो उत्पादन की शक्तियों पर नियन्त्रण रखते हैं। वह पहला वर्ग यानि कि पूंजीपति वर्ग होता है जो उत्पादन की शक्तियों का मालिक होता है। दूसरा वर्ग वह है तो उत्पादन की शक्तियों का मालिक नहीं है बल्कि वह मजदूरी या मेहनत करके अपना समय व्यतीत करता है यानि कि यह मजदूर वर्ग कहलाता है। अलग-अलग समाजों में इनके अलगअलग नाम हैं जिनमें ज़मींदारी समाज में ज़मींदार और खेतीहर मज़दूर और पूंजीपति समाज में पूंजीपति एवं मजदूर। पूंजीपति वर्ग के पास उत्पादन की शक्ति होती है और मजदूर वर्ग के पास केवल मज़दूरी होती है जिसकी सहायता के साथ वह अपना गुजारा करता है। इस प्रकार उत्पादन के तरीकों एवं सम्पत्ति के समान विभाजन के आधार पर बने वर्गों को मार्क्स ने सामाजिक वर्ग का नाम दिया है।

मार्क्स के अनुसार “आज का समाज चार युगों में से गुजर कर हमारे सामने आया है।”

(a) प्राचीन समाजवादी युग (Primitive Ancient Society or Communism)
(b) प्राचीन समाज (Ancient Society)
(c) सामन्तवादी युग (Feudal Society)
(d) पूंजीवाद युग (Capitalist Society)।

मार्क्स के अनुसार पहले प्रकार के समाज में वर्ग अस्तित्व में नहीं आये थे। परन्तु उसके पश्चात् के समाजों में दो प्रमुख वर्ग हमारे सामने आये। प्राचीन समाज में मालिक एवं दास। सामन्तवादी में सामन्त एवं खेतीहारी मज़दूर वर्ग। पूंजीवादी समाज में पूंजीवादी एवं मज़दूर वर्ग। प्रायः समाज में मजदूरी का कार्य दूसरे वर्ग के द्वारा ही किया गया। मजदूर वर्ग बहुसंख्यक होता है और पूंजीवादी वर्ग कम संख्या वाला।

मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो प्रकार के वर्गों का अनुभव किया है। परन्तु मार्क्स के फिर भी इस मामले में विचार एक समान नहीं है। मार्क्स कहता है कि पूंजीवादी समाज में तीन वर्ग होते हैं। मज़दूर, सामन्त एवं ज़मीन के मालिक (land owners) मार्क्स ने इन तीनों में से अन्तर आय के साधनों, लाभ एवं ज़मीन के किराये के आधार पर किया है। परन्तु मार्क्स की तीन पक्षीय व्यवस्था इंग्लैण्ड में कभी सामने नहीं आई।

मार्क्स ने कहा था कि पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ तीन वर्गीय व्यवस्था दो वर्गीय व्यवस्था में परिवर्तित हो जायेगी एवं मध्यम वर्ग समाप्त हो जायेगा। इस बारे में उसने कम्युनिष्ट घोषणा पत्र में कहा है। मार्क्स ने विशेष समाज के अन्य वर्गों का उल्लेख भी किया है। जैसे बुर्जुआ या पूंजीपति वर्ग को उसने दो उपवर्ग जैसे प्रभावी बुर्जुआ और छोटे बुर्जुआ वर्गों में बांटा है। प्रभावी बुर्जुआ वे होते हैं जो बड़े-बड़े पूंजीपति व उद्योगपति होते हैं और जो हज़ारों की संख्या में मजदूरों को कार्य करने को देते हैं। छोटे बुर्जुआ वे छोटे उद्योगपति या दुकानदार होते हैं जिनके व्यापार छोटे स्तर पर होते हैं और वे बहुत अधिक मज़दूरों को कार्य नहीं दे सकते। वे काफ़ी सीमा तक स्वयं ही कार्य करते हैं। मार्क्स यहां पर फिर कहता है कि पूंजीवाद के विकसित होने के साथ-साथ मध्यम वर्ग व छोटी-छोटी बुर्जुआ उप-जातियां समाप्त हो जाएंगी या फिर मज़दूर वर्ग में मिल जाएंगी। इस तरह समाज में पूंजीपति व मजदूर वर्ग रह जाएगा।

वर्गों के बीच सम्बन्ध (Relationship between Classes) –

मार्क्स के अनुसार “पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग का आर्थिक शोषण करता रहता है और मज़दूर वर्ग अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करता रहता है। इस कारण दोनों वर्गों के बीच के सम्बन्ध विरोध वाले होते हैं। यद्यपि कुछ समय के लिये दोनों वर्गों के बीच का विरोध शान्त हो जाता है परन्तु वह विरोध चलता रहता है। यह आवश्यक नहीं कि यह विरोध ऊपरी तौर पर ही दिखाई दे। परन्तु उनको इस विरोध का अहसास तो होता ही रहता है।”

मार्क्स के अनुसार वर्गों के बीच आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता एवं संघर्ष पर आधारित होते हैं। हम उदाहरण ले सकते हैं पूंजीवादी समाज के दो वर्गों का। एक वर्ग पूंजीपति का होता है दूसरा वर्ग मज़दूर का होता है। यह दोनों वर्ग अपने अस्तित्व के लिये एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन की शक्तियां एक मलकीयत नहीं होती हैं। उसके पास रोटी कमाने हेतु अपनी मेहनत के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। वह रोटी कमाने के लिये पूंजीपति वर्ग के पास अपनी मेहनत बेचते हैं और उन पर ही निर्भर करते हैं। वह अपनी मजदूरी पूंजीपतियों के पास बेचते हैं जिसके बदले पूंजीपति उनको मेहनत का किराया देता है। इसी किराये के साथ मज़दूर अपना पेट पालता है। पूंजीपति भी मज़दूरों की मेहनत पर ही निर्भर करता है। क्योंकि मजदूरों के बिना कार्य किये न तो उसका उत्पादन हो सकता है और न ही उसके पास पूंजी एकत्रित हो सकती है। – इस प्रकार दोनों वर्ग एक-दूसरे के ऊपर निर्भर हैं। परन्तु इस निर्भरता का अर्थ यह नहीं है कि उनमें सम्बन्ध एक समान होते हैं।

पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग का शोषण करता है। वह कम धन खर्च करके अधिक उत्पादन करना चाहता है ताकि उसका स्वयं का लाभ बढ़ सके। मज़दूर अधिक मज़दूरी मांगता है ताकि वह अपना व परिवार का पेट पाल सके। उधर पूंजीपति मज़दूरों को कम मजदूरी देकर वस्तुओं को ऊँची कीमत पर बेचने की कोशिश करता है ताकि उसका लाभ बढ़ सके। इस प्रकार दोनों वर्गों के भीतर अपने-अपने हितों के लिये संघर्ष (Conflict of Interest) चलता रहता है। यह संघर्ष अन्ततः समतावादी व्यवस्था (Communism) को जन्म देगा जिसमें न तो विरोध होगा न ही किसी का शोषण होगा, न ही किसी के ऊपर अत्याचार होगा, न ही हितों का संघर्ष होगा और यह समाज वर्ग रहित समाज होगा।

कार्ल मार्क्स ने ऐतिहासिक आधार पर स्तरीकरण के संघर्ष सिद्धान्त की व्याख्या की है। मार्क्स के स्तरीकरण के संघर्ष के सिद्धान्त में निम्नलिखित बातें मुख्य हैं-

1. समाज में दो वर्ग (Two classes in society) मार्क्स का कहना था कि प्रत्येक प्रकार के समाज में साधारणत: दो वर्ग पाए जाते हैं। पहला तो वह जिसके हाथों में उत्पादन के साधन होते हैं तथा जिसे हम आज पूंजीपति के नाम से जानते हैं। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते तथा जो अपना श्रम बेचकर गुज़ारा करता है। इसको मज़दूर वर्ग का नाम दिया जाता है। पहला वर्ग शोषण करता है तथा दूसरा वर्ग शोषित होता है।

2. उत्पादन के साधनों पर अधिकार (Right over means of production)-मार्क्स ने स्तरीकरण की ऐतिहासिक आधार पर व्याख्या करते हुए कहा है कि समाज में स्तरीकरण उत्पादन के साधनों पर अधिकार के आधार पर होता है। प्रत्येक समाज में इस आधार पर दो वर्ग पाए जाते हैं। पहला वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर अधिकार होता है। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते तथा जो अपना श्रम बेचकर रोज़ी कमाता है।

3. उत्पादन की व्यवस्था (Modes of Production)-उत्पादन की व्यवस्था पर ही सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप निर्भर करता है। जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसकी स्थिति अन्य वर्गों से उच्च होती है। इस वर्ग को मार्क्स ने पूंजीपति या बुर्जुआ (Bourgeoisie) का नाम दिया है। दूसरा वर्ग वह होता है जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते, जो अपनी स्थिति से सन्तुष्ट नहीं होता तथा अपनी स्थिति को बदलना चाहता है। इसको मार्क्स ने मज़दूर या प्रोलतारी (Proletariat) का नाम दिया है।

4. मनुष्यों का इतिहास-वर्ग संघर्ष का इतिहास (Human history-History of Class Struggle)-मार्क्स का कहना है कि मनुष्यों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। हम किसी भी समाज की उदाहरण ले सकते हैं। प्रत्येक समाज में अलग-अलग वर्गों में किसी-न-किसी रूप में संघर्ष तो चलता ही रहा है। __ इस तरह मार्क्स का कहना था कि सभी समाजों में साधारणतः पर दो वर्ग रहे हैं-मज़दूर तथा पूंजीपति वर्ग। दोनों में वर्ग संघर्ष चलता ही रहता है। इन में वर्ग संघर्ष के कई कारण होते हैं जैसे कि दोनों वर्गों में बहुत ज्यादा आर्थिक अन्तर होता है जिस कारण वह एक-दूसरे का विरोध करते हैं। पूंजीपति वर्ग बिना परिश्रम किए ही अमीर होता चला जाता है तथा मज़दूर वर्ग सारा दिन परिश्रम करने के बाद भी ग़रीब ही बना रहता है।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

समय के साथ-साथ मज़दूर वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन बना लेता है तथा यह संगठन पूंजीपतियों से अपने अधिकार लेने के लिए संघर्ष करते हैं। इस संघर्ष का परिणाम यह होता है कि समय आने पर मज़दूर वर्ग पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध क्रान्ति कर देता है तथा क्रान्ति के बाद पूंजीपतियों का खात्मा करके अपनी सत्ता स्थापित कर लेते हैं। पूंजीपति अपने पैसे की मदद से प्रति क्रान्ति की कोशिश करेंगे परन्तु उनकी प्रति क्रान्ति को दबा दिया जाएगा तथा मजदूरों की सत्ता स्थापित हो जाएगी। पहले साम्यवाद तथा फिर समाजवाद की स्थिति आएगी जिसमें हरेक को उसकी ज़रूरत तथा योग्यता के अनुसार मिलेगा। समाज में कोई वर्ग नहीं होगा तथा यह वर्गहीन समाज होगा जिसमें सभी को बराबर का हिस्सा मिलेगा। कोई भी उच्च या निम्न नहीं होगा तथा मज़दूर वर्ग की सत्ता स्थापित रहेगी। मार्क्स का कहना था कि चाहे यह स्थिति अभी नहीं आयी है परन्तु जल्द ही यह स्थिति आ जाएगी तथा समाज में से स्तरीकरण खत्म हो जाएगा।

प्रश्न 2.
वैबर के वर्ग सिद्धान्त का वर्णन करें।
अथवा
वर्ग के वैबर सिद्धान्त की चर्चा कीजिए।
अथवा
वैबर के वर्ग सिद्धान्त की चर्चा करें।
उत्तर-
मैक्स वैबर ने वर्ग का सिद्धान्त दिया था जिसमें उसने वर्ग, स्थिति समूह तथा दल की अलग-अलग व्याख्या की थी। वैबर का स्तरीकरण का सिद्धान्त तर्कसंगत तथा व्यावहारिक माना जाता है। यही कारण है कि अमेरिकी समाजशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त को काफ़ी महत्त्व प्रदान किया है। वैबर ने स्तरीकरण को तीन पक्षों से समझाया है तथा वह है वर्ग, स्थिति तथा दल। इन तीनों ही समूहों को एक प्रकार से हित समूह कहा जा सकता है जो न केवल अपने अंदर लड़ सकते हैं बल्कि यह एक-दूसरे के विरुद्ध भी लड़ सकते हैं। यह एक विशेष सत्ता के बारे में बताते हैं तथा आपस में एक-दूसरे से संबंधित भी होते हैं। अब हम इन तीनों का अलग-अलग विस्तार से वर्णन करेंगे।

वर्ग (Class)-मार्ल मार्क्स ने वर्ग की परिभाषा आर्थिक आधार पर दी थी तथा उसी प्रकार वैबर ने भी वर्ग की धारणा आर्थिक आधार पर दी है। वैबर के अनुसार, “वर्ग ऐसे लोगों का समूह होता है जो किसी समाज के आर्थिक मौकों की संरचना में समान स्थिति में होता है तथा जो समान स्थिति में रहते हैं। “यह स्थितियां उनकी आर्थिक शक्ति के रूप तथा मात्रा पर निर्भर करती है।” इस प्रकार वैबर ऐसे वर्ग की बात करता है जिसमें लोगों की एक विशेष संख्या के लिए जीवन के मौके एक समान होते हैं। चाहे वैबर की यह धारणा मार्क्स की वर्ग की धारणा से अलग नहीं है परन्तु वैबर ने वर्ग की कल्पना समान आर्थिक स्थितियों में रहने वाले लोगों के रूप में की है आत्म चेतनता समूह के रूप में नहीं। वैबर ने वर्ग के तीन प्रकार बताए हैं जोकि निम्नलिखित हैं :

(1) सम्पत्ति वर्ग (A Property Class)
(2) अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)
(3) सामाजिक वर्ग (A Social Class)।

1. सम्पत्ति वर्ग (A Property Class)-सम्पत्ति वर्ग वह वर्ग होता है जिस की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास कितनी सम्पत्ति अथवा जायदाद है। यह वर्ग आगे दो भागों में बांटा गया है-

(i) सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Positively Privileged Property Class)—इस वर्ग के पास काफ़ी सम्पत्ति तथा जायदाद होती है तथा यह इस जायदाद से हुई आय पर अपना गुज़ारा करता है। यह वर्ग उपभोग करने वाली वस्तुओं के खरीदने या बेचने, जायदाद इकट्ठी करके अथवा शिक्षा लेने के ऊपर अपना एकाधिकार कर सकता है।
(ii) नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त सम्पत्ति वर्ग (The Negatively Privileged Property Class)—इस वर्ग के मुख्य सदस्य अनपढ़, निर्धन, सम्पत्तिहीन तथा कर्जे के बोझ नीचे दबे हुए लोग होते हैं। इन दोनों समूहों के साथ एक विशेष अधिकार प्राप्त मध्य वर्ग भी होता है जिसमें ऊपर वाले दोनों वर्गों के लोग शामिल होते हैं। वैबर के अनुसार पूंजीपति अपनी विशेष स्थिति होने के कारण तथा मज़दूर अपनी नकारात्मक रूप से विशेष स्थिति होने के कारण इस समूह में शामिल होता है।

2. अधिग्रहण वर्ग (An Acquisition Class)-यह उस प्रकार का समूह होता है जिस की स्थिति बाज़ार में मौजूदा सेवाओं का लाभ उठाने के मौकों के साथ निर्धारित होती है। यह समूह आगे तीन प्रकार का होता है-

  • सकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Positively Privileged Acquisition Class) इस वर्ग का उत्पादक फैक्टरी वालों के प्रबंध पर एकाधिकार होता है। यह फैक्ट्रियों वाले बैंकर, उद्योगपति, फाईनेंसर इत्यादि होते हैं। यह लोग प्रबंधकीय व्यवस्था को नियन्त्रण में रखने के साथ-साथ सरकारी आर्थिक नीतियों . पर भीषण प्रभाव डालते हैं।
  • विशेषाधिकार प्राप्त मध्य अधिग्रहण वर्ग (The Middle Privileged Acquisition Class)—यह वर्ग मध्य वर्ग के लोगों का वर्ग होता है जिसमें छोटे पेशेवर लोग, कारीगर, स्वतन्त्र किसान इत्यादि शामिल होते हैं।
  • नकारात्मक रूप से विशेष अधिकार प्राप्त अधिग्रहण वर्ग (The Negatively Privileged Acquisition Class)-इस वर्ग में छोटे वर्गों के लोग विशेषतया कुशल, अर्द्ध-कुशल तथा अकुशल मजदूर शामिल होते हैं।

3. सामाजिक वर्ग (Social Class)—इस वर्ग की संख्या काफी अधिक होती है। इसमें अलग-अलग पीढ़ियों की तरक्की के कारण निश्चित रूप से परिवर्तन दिखाई देता है। परन्तु वैबर सामाजिक वर्ग की व्याख्या विशेष अधिकारों के अनुसार नहीं करता। उसके अनुसार मजदूर वर्ग, निम्न मध्य वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, सम्पत्ति वाले लोग इत्यादि इसमें शामिल होते हैं।

वैबर के अनुसार किन्हीं विशेष स्थितियों में वर्ग के लोग मिलजुल कर कार्य करते हैं तथा इस कार्य करने की प्रक्रिया को वैबर ने वर्ग क्रिया का नाम दिया है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर के अनुसार अपनी संबंधित होने की भावना से वर्ग क्रिया उत्पन्न होती है। वैबर ने इस बात पर विश्वास नहीं किया कि वर्ग क्रिया जैसी बात अक्सर हो सकती है। वैबर का कहना था कि वर्ग में वर्ग चेतनता नहीं होती बल्कि उनकी प्रकृति पूर्णतया आर्थिक होती है। उनमें इस बात की भी संभावना नहीं होती कि वह अपने हितों को प्राप्त करने के लिए इकट्ठे होकर संघर्ष करेंगे। एक वर्ग लोगों का केवल एक समूह होता है जिनकी आर्थिक स्थिति बाज़ार में एक जैसी होती है। वह उन चीजों को इकट्ठे करने में जीवन के ऐसे परिवर्तनों को महसूस करते हैं, जिनकी समाज में कोई इज्जत होती है तथा उनमें किसी विशेष स्थिति में वर्ग चेतना विकसित होने की तथा इकट्ठे होकर क्रिया करने की संभावना होती है। वैबर का कहना था कि अगर ऐसा होता है तो वर्ग एक समुदाय का रूप ले लेता है।

स्थिति समूह (Status Group)—स्थिति समूह को साधारणतया आर्थिक वर्ग स्तरीकरण के विपरीत समझा जाता है। वर्ग केवल आर्थिक मान्यताओं पर आधारित होता है जोकि समान बाज़ारी स्थितियों के कारण समान हितों वाला समूह है। परन्तु दूसरी तरफ स्थिति समूह सांस्कृतिक क्षेत्र में पाया जाता है यह केवल संख्यक श्रेणियों के नहीं होते बल्कि यह असल में वह समूह होते हैं जिनकी समान जीवन शैली होती है, संसार के प्रति समान दृष्टिकोण होता है तथा ये लोग आपस में एकता भी रखते हैं।

वैबर के अनुसार वर्ग तथा स्थिति समूह में अंतर होता है। हरेक का अपना ढंग होता है तथा इनमें लोग असमान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी स्कूल का अध्यापक। चाहे उसकी आय 8-10 हज़ार रुपये प्रति माह होगी जोकि आज के समय में कम है परन्तु उसकी स्थिति ऊंची है। परन्तु एक स्मगलर या वेश्या चाहे माह में लाखों कमा रहे हों परन्तु उनका स्थिति समूह निम्न ही रहेगी क्योंकि उनके पेशे को समाज मान्यता नहीं देता। इस प्रकार दोनों के समूहों में अंतर होता है। किसी पेशे समूह को भी स्थिति समूह का नाम दिया जाता है क्योंकि हरेक प्रकार के पेशे में उस पेशे से संबंधित लोगों के लिए पैसा कमाने के समान मौके होते हैं। यही समूह उनकी जीवन शैली को समान भी बनाते हैं। एक पेशा समूह के सदस्य एक-दूसरे के नज़दीक रहते हैं, एक ही प्रकार के कपड़े पहनते हैं तथा उनके मूल्य भी एक जैसे ही होते हैं। यही कारण है कि इसके सदस्यों का दायरा विशाल हो जाता है।

दल (Party) वैबर के अनुसार दल वर्ग स्थिति के साथ निर्धारित हितों का प्रतिनिधित्व करता है। यह दल किसी न किसी स्थिति में उन सदस्यों की भर्ती करता है जिनकी विचारधारा दल की विचारधारा से मिलती हो। परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उनके लिए दल स्थिति दल ही बने। वैबर का कहना है कि दल हमेशा इस ताक में रहते हैं कि सत्ता उनके हाथ में आए अर्थात् राज्य या सरकार की शक्ति उनके हाथों में हो। वैबर का कहना है कि चाहे दल राजनीतिक सत्ता का एक हिस्सा होते हैं परन्तु फिर भी सत्ता कई प्रकार से प्राप्त की जा सकती है जैसे कि पैसा, अधिकार, प्रभाव, दबाव इत्यादि। दल राज्य की सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं तथा राज्य एक संगठन होता है। दल की हरेक प्रकार की क्रिया इस बात की तरफ ध्यान देती है कि सत्ता किस प्रकार प्राप्त की जाए। वैबर ने राज्य का विश्लेषण किया तथा इससे ही उसने नौकरशाही का सिद्धान्त पेश किया।

वैबर के अनुसार दल दो प्रकार के होते हैं। पहला है सरप्रस्ती का दल (Patronage Party) जिनके लिए कोई स्पष्ट नियम, संकल्प इत्यादि नहीं होते। यह किसी विशेष मौके के लिए बनाए जाते हैं तथा हितों की पूर्ति के बाद इन्हें छोड़ दिया जाता है। दूसरी प्रकार का दल है सिद्धान्तों का दल (Party of Principles) जिसमें स्पष्ट या मज़बूत नियम या सिद्धान्त होते हैं। यह दल किसी विशेष अवसर के लिए नहीं बनाए जाते। वैबर के अनुसार चाहे इन तीनों वर्ग, स्थिति समूह तथा दल में काफी अन्तर होता है परन्तु फिर भी इनमें आपसी संबंध भी मौजूद होता है।

प्रश्न 3.
वर्ग, सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक स्तरीकरण में पारस्परिक सम्बन्ध क्या है ? वर्णन करें।
उत्तर-
वर्ग, सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक स्तरीकरण में काफ़ी गहरा सम्बन्ध है परन्तु इस सम्बन्ध का जानने से पहले हमें इसका अर्थ देखना पड़ेगा।

  • वर्ग-वर्ग ऐसे लोगों का समूह है जो किसी-न-किसी आधार पर अन्य समूहों से अलग होता है। वर्ग के सदस्य अपने वर्ग के प्रति चेतन होते हैं तथा अन्य वर्गों के लोगों को अपने वर्ग में आसानी से नहीं आने देते। वर्ग के कई आधार होते हैं जैसे कि धन, सम्पत्ति, व्यवसाय इत्यादि।
  • सामाजिक गतिशीलता-सम्पूर्ण समाज अलग-अलग वर्गों में विभाजित होता है तथा इन वर्गों के लोगों के अपना वर्ग छोड़ कर दूसरे वर्ग में जाने की प्रक्रिया को सामाजिक गतिशीलता कहते हैं। लोग अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अपना वर्ग परिवर्तित कर लेते हैं तथा इस कारण गतिशीलता की प्रक्रिया चलती रहती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण-समाज को अलग-अलग स्तरों अथवा वर्गों में विभाजित करने की प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं। समाज को अलग-अलग आधारों पर विभाजित किया जाता है जैसे कि आय, जाति, लिंग, आयु, शिक्षा, धन इत्यादि।

अगर हम इन तीन संकल्पों के अर्थ को ध्यान से देखें तो हमें पता चलता है कि इन तीनों का आपस में काफ़ी गहरा सम्बन्ध है। समाज को अलग-अलग वर्गों अथवा स्तरों में विभाजित करने की प्रक्रिया को स्तरीकरण कहते हैं तथा लोग अपना वर्ग परिवर्तित करते रहते हैं। लोग अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अपना वर्ग परिवर्तित कर लेते हैं तथा एक वर्ग से दूसरे वर्ग में जाने की प्रक्रिया को गतिशीलता कहते हैं।

आजकल के समय में लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं तथा अलग-अलग व्यवसाय अपना रहे हैं। शिक्षा लेने के कारण उनकी सामाजिक स्थिति ऊँची हो जाती है तथा वह अच्छी नौकरी करने लग जाते हैं। अच्छी नौकरी के कारण उनके पास पैसा आ जाता है तथा वह सामाजिक स्तरीकरण में उच्च स्तर पर पहुँच जाते हैं। धीरे-धीरे वह तरक्की प्राप्त करने के लिए नौकरी ही बदल लेते हैं तथा अधिक पैसा कमाने लग जाते हैं। इस प्रकार वह समय के साथ अलग-अलग वर्गों के सदस्य बनते हैं जिस कारण समाज में गतिशीलता चलती रहती है।

इस व्याख्या को देखने के पश्चात् हम कह सकते हैं कि वर्ग, गतिशीलता तथा स्तरीकरण में काफ़ी गहरा सम्बन्ध होता है। इस कारण ही समाज प्रगति की तरफ बढ़ता है तथा लोग प्रगति करते रहते हैं।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न (OTHER IMPORTANT QUESTIONS)

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इनमें से कौन-सी वर्ग की विशेषता नहीं है ?
(क) अर्जित स्थिति
(ख) मुक्त व्यवस्था
(ग) जन्म पर आधारित
(घ) समूहों में उच्च निम्न स्थिति।
उत्तर-
(ग) जन्म पर आधारित।

प्रश्न 2.
कौन-सी वर्ग की विशेषता है ?
(क) उच्च निम्न की भावना
(ख) सामाजिक गतिशीलता
(ग) उपवर्गों का विकास
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 3.
उस व्यवस्था को क्या कहते हैं जिसमें समाज के व्यक्तियों को अलग-अलग आधारों पर विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है ?
(क) जाति व्यवस्था
(ख) वर्ग व्यवस्था
(ग) सामुदायिक व्यवस्था
(घ) सामाजिक व्यवस्था।
उत्तर-
(ख) वर्ग व्यवस्था।

प्रश्न 4.
वर्ग व्यवस्था का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
(क) जाति व्यवस्था कमजोर हो रही है।
(ख) निम्न जातियों के लोग उच्च स्तर पर पहुँच रहे हैं।
(ग) व्यक्ति को अपनी योग्यता दिखाने का मौका मिलता है।
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 5.
वर्ग तथा जाति में क्या अंतर है ?
(क) जाति जन्म व वर्ग योग्यता पर आधारित होता है।
(ख) व्यक्ति वर्ग बदल सकता है पर जाति नहीं।
(ग) जाति में कई प्रकार के प्रतिबन्ध होते हैं पर वर्ग में नहीं।
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 6.
वर्ग संघर्ष का सिद्धांत किसने दिया था ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) राईट
(घ) वार्नर।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 7.
वर्ग चेतना तथा वर्ग संघर्ष की अवधारणा किसने दी है ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) मैक्स वैबर
(ग) दुर्थीम
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) कार्ल मार्क्स।

B. रिक्त स्थान भरें-

1. वर्ग की सदस्या व्यक्ति की …….. पर निर्भर करती है।
2. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत .. ………………… ने दिया था।
3. मार्क्स के अनुसार संसार में …. …. प्रकार के वर्ग होते हैं।
4. ……………… को बुर्जुआ कहते हैं।
5. ……………….. वर्ग को सर्वहारा कहते हैं।
उत्तर-

  1. योग्यता
  2. कार्ल मार्क्स
  3. दो
  4. पूँजीपति
  5. मज़दूर।

C. सही/ग़लत पर निशान लगाएं-

1. सभी वर्गों में वर्ग चेतना मौजूद होती है।
2. वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है।
3. आय, व्यवसाय, धन तथा शिक्षा व्यक्ति का वर्ग निर्धारित करते हैं।
4. वैबर के अनुसार धन, सत्ता तथा स्थिति असमानता के आधार हैं।
5. वार्नर ने भारत की वर्ग संरचना का अध्ययन किया था।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही
  5. गलत।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. वर्ग की सदस्यता किस पर निर्भर करती है ?
उत्तर-वर्ग की सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 2. आजकल वर्ग का निर्धारण किस आधार पर होता है ?
उत्तर-आजकल वर्ग का निर्धारण शिक्षा, धन, व्यवसाय, नातेदारी इत्यादि के आधार पर होता है।

प्रश्न 3. वर्ग संघर्ष का सिद्धांत किसने दिया था ?
उत्तर-वर्ग संघर्ष का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया था।

प्रश्न 4. धन के आधार पर हम लोगों को कितने वर्गों में बाँट सकते हैं ?
उत्तर-धन के आधार पर हम लोगों को उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा श्रमिक वर्ग में बाँट सकते हैं।

प्रश्न 5. गाँव में मिलने वाले मुख्य वर्ग बताएँ।
उत्तर- गाँव में हमें ज़मींदार वर्ग, किसान वर्ग व मज़दूर वर्ग मुख्यतः मिल जाते हैं।

प्रश्न 6. वर्ग व्यवस्था क्या होती है ?
उत्तर-जब समाज में अलग-अलग आधारों पर कई प्रकार के समूह बन जाते हैं उसे वर्ग व्यवस्था कहते हैं।

प्रश्न 7. वर्ग किस प्रकार का समूह है ?
उत्तर-वर्ग एक मुक्त समूह होता है जिसकी सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 8. वर्ग में किस प्रकार के संबंध पाए जाते हैं ?
उत्तर-वर्ग में औपचारिक, अस्थाई तथा सीमित संबंध पाए जाते हैं।

प्रश्न 9. मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार क्या होता है ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार वर्ग का आधार आर्थिक अर्थात् धन होता है।

प्रश्न 10. मार्क्स के अनुसार संसार में कितने वर्ग होते हैं ?
उत्तर-मार्क्स के अनुसार संसार में दो वर्ग होते हैं-पूँजीपति तथा मज़दूर।

प्रश्न 11. वैबर के अनुसार असमानता का आधार क्या होता है ?
उत्तर-वैबर के अनुसार धन, सत्ता तथा स्थिति असमानता के आधार होते हैं।

प्रश्न 12. बुर्जुआ क्या होता है ?
उत्तर-जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसे बुर्जुआ कहते हैं।

प्रश्न 13. सर्वहारा क्या होता है ?
उत्तर-वह वर्ग जिसके पास उत्पादन के साधन नहीं होते, अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता, उसे सर्वहारा कहते हैं।

प्रश्न 14. वर्गहीन समाज कौन-सा होता है ?
उत्तर-वह समाज जहाँ वर्ग नहीं होते, वह वर्गहीन समाज होता है।

प्रश्न 15. जाति व वर्ग में एक अंतर बताएं।
उत्तर-जाति जन्म पर आधारित होती है परन्तु वर्ग योग्यता पर आधारित होता है।

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III. अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न ।

प्रश्न 1.
वर्ग क्या होता है ?
अथवा
वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
समाज में जब अलग-अलग व्यक्तियों को विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है तो उसे विशेष सामाजिक स्थिति वाले समूह को वर्ग कहते हैं। मार्क्स के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग को उसके उत्पादन के साधनों तथा सम्पत्ति के विभाजन से स्थापित होने वाले संबंधों के संदर्भ में परिभाषित किया जा सकता है।”

प्रश्न 2.
वर्ग की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  • वर्ग के सभी सदस्यों की समाज में स्थिति लगभग समान ही होती है जैसे अमीर वर्ग के सदस्यों को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।
  • वर्गों का निर्माण अलग-अलग आधारों पर होता है जैसे कि शिक्षा, पैसा, व्यवसाय, राजनीति, धर्म इत्यादि।

प्रश्न 3.
वर्ग व्यवस्था के कोई तीन प्रभाव बताएं।
उत्तर-

  • वर्ग व्यवस्था से जाति व्यवस्था कमजोर हो गई है।
  • वर्ग व्यवस्था से निम्न जातियों के लोग उच्च स्तर पर पहुंच रहे हैं।
  • वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति को अपनी योग्यता दिखाने का मौका प्राप्त होता है।

प्रश्न 4.
नगरों में मुख्य रूप से कौन-से तीन वर्ग देखने को मिल जाते हैं ?
उत्तर-

  • उच्च वर्ग-वह वर्ग जो अमीर व ताकतवर होता है।
  • मध्य वर्ग-डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, नौकरी पेशा लोग, दुकानदार इसमें आते हैं।
  • निम्न वर्ग-इसमें वे मज़दूर आते हैं जो अपना परिश्रम बेच कर गुज़ारा करते हैं।

IV. लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रेणी व्यवस्था या वर्ग व्यवस्था।
उत्तर-
श्रेणी व्यवस्था ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी की स्थिति समाज में अपनी ही होती है। इसके अनुसार श्रेणी के प्रत्येक सदस्य को कुछ विशेष कर्त्तव्य, अधिकार तथा शक्तियां प्राप्त होती हैं। श्रेणी चेतनता ही श्रेणी की मुख्य ज़रूरत होती है। श्रेणी के बीच व्यक्ति अपने आप को कुछ सदस्यों से उच्च तथा कुछ से निम्न समझता है।

प्रश्न 2.
वर्ग की दो विशेषताएं।
अथवा सामाजिक वर्ग की विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • वर्ग चेतनता-प्रत्येक वर्ग में इस बात की चेतनता होती है कि उसका पद या आदर दूसरी श्रेणी की तुलना में अधिक है। अर्थात् व्यक्ति को उच्च, निम्न या समानता के बारे में पूरी चेतनता होती है।
  • सीमित सामाजिक सम्बन्ध-वर्ग व्यवस्था में लोग अपने ही वर्ग के सदस्यों से गहरे सम्बन्ध रखता है तथा दूसरी श्रेणी के लोगों के साथ उसके सम्बन्ध सीमित होते हैं।

प्रश्न 3.
मुक्त व्यवस्था।
उत्तर-
श्रेणी व्यवस्था के बीच व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर निम्न या उच्च स्थिति की तरफ परिवर्तन कर सकता है। वह ग़रीब से अमीर तथा अमीर से ग़रीब हो सकता है। खुलेपन से अभिप्राय व्यक्तियों को बराबर अवसर प्राप्त होने से है। वह पूरी तरह अपनी योग्यता का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 4.
धन तथा आय वर्ग व्यवस्था के निर्धारक।
उत्तर-
समाज के बीच उच्च श्रेणी की स्थिति का सदस्य बनने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है। परन्तु पैसे के साथ व्यक्ति आप ही उच्च स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु उसकी अगली पीढ़ी के लिए उच्च स्थिति निश्चित हो जाती है। आय के साथ भी व्यक्ति को समाज में उच्च स्थिति प्राप्त होती है क्योंकि ज्यादा आमदनी से ज्यादा पैसा आता है। परन्तु इसके लिए यह देखना ज़रूरी है कि व्यक्ति की आय ईमानदारी की है या काले धन्धे द्वारा प्राप्त है।

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प्रश्न 5.
जाति तथा वर्ग में कोई चार अन्तर।
उत्तर-

  • जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती है तथा वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसकी योग्यता पर आधारित होती है।
  • जाति व्यवस्था में पेशा जन्म पर ही निश्चित होता है। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति अपनी इच्छा से कोई भी पेशा अपना सकता है।
  • जाति बन्द व्यवस्था है पर वर्ग खुली व्यवस्था है।
  • जाति में कई पाबन्दियां होती हैं परन्तु वर्ग में नहीं।

प्रश्न 6.
जाति-बन्द स्तरीकरण का आधार।
उत्तर-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसके जन्म से सम्बन्धित होती है। जिस जाति में वह पैदा होता है वह उसके घेरे में बंध जाता है। यहां तक कि वह अपनी योग्यता का सम्पूर्ण इस्तेमाल नहीं कर सकता है। उसको न तो कार्य करने की स्वतन्त्रता होती है तथा न ही वह दूसरी जातियों से सम्पर्क स्थापित कर सकता है। यदि वह जाति के नियमों को तोड़ता है तो उसको जाति से बाहर निकाल दिया जाता है। इस कारण जाति को बन्द स्तरीकरण का आधार माना जाता है।

प्रश्न 7.
मार्क्स के अनुसार स्तरीकरण का परिणाम क्या है ?
उत्तर-मार्क्स का कहना है, कि समाज में दो वर्ग होते हैं। पहला वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक होता है तथा दूसरा वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं होता। इस मलकीयत के आधार पर ही मालिक वर्ग की स्थिति उच्च तथा गैर-मालिक वर्ग की स्थिति निम्न होती है। मालिक वर्ग को मार्क्स पूंजीपति वर्ग तथा गैर-मालिक वर्ग को मज़दूर वर्ग कहता है। पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग का आर्थिक रूप से शोषण करता है तथा मजदूर वर्ग अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए पूंजीपति वर्ग से संघर्ष करता है। यह ही स्तरीकरण का परिणाम है।

प्रश्न 8.
वर्गों में आपसी सम्बन्ध किस तरह के होते हैं ?
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार वर्गों में आपसी सम्बन्ध, आपसी निर्भरता तथा संघर्ष वाले होते हैं। पूंजीपति तथा मजदूर दोनों अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। मजदूर वर्ग को रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचना पड़ता है। वह पूंजीपति को अपना परिश्रम बेचते हैं तथा रोटी कमाने के लिए उस पर निर्भर करते हैं। उसकी मजदूरी के एवज में पूंजीपति उनको मज़दूरी का किराया देते हैं। पूंजीपति भी मज़दूरों पर निर्भर करता है, क्योंकि मज़दूर के कार्य किए बिना उसका न तो उत्पादन हो सकता है तथा न ही उसके पास पूंजी इकट्ठी हो सकती है। परन्तु निर्भरता के साथ संघर्ष भी चलता रहता है क्योंकि मजदूर अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए उससे संघर्ष करता रहता है।

प्रश्न 9.
मार्क्स के वर्ग के सिद्धान्त में कौन-सी बातें मुख्य हैं ?
उत्तर-

  • सबसे पहले प्रत्येक प्रकार के समाज में मुख्य तौर पर दो वर्ग होते हैं। एक वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा दूसरे के पास नहीं होते हैं।
  • मार्क्स के अनुसार समाज में स्तरीकरण उत्पादन के साधनों पर अधिकार के आधार पर होता है। जिस वर्ग के पास उत्पादन के साधन होते हैं उसकी स्थिति उच्च होती है तथा जिस के पास साधन नहीं होते उसकी स्थिति निम्न होती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप उत्पादन की व्यवस्था पर निर्भर करता है।
  • मार्क्स के अनुसार मनुष्यों के समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। वर्ग संघर्ष किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक समाज में मौजूद रहा है।

प्रश्न 10.
वर्ग संघर्ष।
उत्तर-
कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो वर्गों की विवेचना की है। उसके अनुसार, प्रत्येक समाज में दो विरोधी वर्गएक शोषण करने वाला तथा दूसरा शोषित होने वाला वर्ग होते हैं। इनमें संघर्ष होता है जिसे मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है। शोषण करने वाला पूंजीपति वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा वह इन उत्पादन के साधनों के साथ अन्य वर्गों को दबाता है। दूसरा वर्ग मज़दूर वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते हैं। इसके पास रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं होता है। यह वर्ग पहले वर्ग से हमेशा शोषित होता है जिस कारण दोनों वर्गों के बीच संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष को ही मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है।

प्रश्न 11.
उत्पादन के साधन।
उत्तर-
उत्पादन के साधन वे साधन हैं जिसकी सहायता से कार्य करके पैसा कमाया जाता है तथा अच्छा जीवन व्यतीत किया जाता है। मनुष्य उत्पादन के साधनों का प्रयोग करके अपने उत्पादन कौशल के आधार पर ही भौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा यह सभी तत्व इकट्ठे मिलकर उत्पादन शक्तियों का निर्माण करते हैं। उत्पादन के तरीकों पर पूँजीपति का अधिकार होता है तथा वह इनकी सहायता से अतिरिक्त मूल्य का निर्माण करके मज़दूर वर्ग का शोषण करता है। इन उत्पादन के साधनों की सहायता से वह अधिक अमीर होता जाता है जिसका प्रयोग वह मजदूर वर्ग को दबाने के लिए करता है।

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प्रश्न 12.
सामाजिक गतिशीलता।
उत्तर-
समाज मनुष्यों के बीच सम्बन्धों से बनता है। समाज में प्रत्येक मनुष्य की अपनी एक सामाजिक स्थिति होती है तथा यह स्थिति कुछ आधारों पर निर्भर करती है। कुछ समाजों में यह जन्म तथा कुछ में यह कर्म पर आधारित होती है। समाज में कुछ परिवर्तन होते रहते हैं। जन्म के आधार पर यह परिवर्तन सम्भव नहीं है क्योंकि जाति जन्म के आधार पर निश्चित होती है जिसमें परिवर्तन सम्भव नहीं है। परन्तु पेशों, कार्य, पैसे इत्यादि के आधार पर वर्ग परिवर्तन मुमकिन है। समाज में किसी भी सदस्य द्वारा अपनी सामाजिक स्थिति के आधार पर परिवर्तन करना ही सामाजिक गतिशीलता है।

प्रश्न 13.
गतिशीलता की दो परिभाषाएं।
उत्तर-
फेयरचाइल्ड के अनुसार, “मनुष्यों द्वारा अपने समूह को परिवर्तित करना ही सामाजिक गतिशीलता है। सामाजिक गतिशीलता का अर्थ व्यक्तियों की एक समूह से दूसरे समूह की तरफ की गति है।”
बोगार्डस के अनुसार, “सामाजिक पदवी में कोई भी परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता है।”

प्रश्न 14.
शिक्षा-सामाजिक गतिशीलता का सूचक।
उत्तर-
शिक्षा को सामाजिक गतिशीलता का महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है। यह कहा जाता है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करेगा उतना ही अधिक जीवन में सफल होगा। शिक्षा व्यक्ति के बजुर्गों द्वारा किए गलत कार्यों को भी ठीक कर देती है। यह माना जाता है कि शिक्षा को नौकरी का साधन नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि शिक्षा प्रत्यक्ष रूप से ऊपर की तरफ की गतिशीलता की तरफ नहीं लेकर जाती। शिक्षा तो व्यक्ति के लिए उस समय मौजूद मौके अर्जित करने के लिए व्यक्ति की योग्यता को बढ़ाती है। शिक्षा वह तरीके बताती है जो किसी भी पेशे को अपनाने के लिए ज़रूरी होते हैं, परन्तु यह उन तरीकों को प्रयोग करने के मौके प्रदान नहीं करती।

प्रश्न 15.
आय-सामाजिक गतिशीलता का सूचक।
उत्तर-
व्यक्ति की आय गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। व्यक्ति की आय उसकी सामाजिक स्थिति को उच्च अथवा निम्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिसकी आय अधिक होती है उसका सामाजिक रुतबा भी उच्च होता है तथा जिसकी आय कम होती है उसका सामाजिक रुतबा भी निम्न होता है। आय बढ़ने से लोग अपनी जीवन शैली बढ़िया कर लेते हैं तथा गतिशील होकर वर्ग व्यवस्था में ऊँचे हो जाते हैं। इस तरह आय गतिशीलता का महत्त्वपूर्ण सूचक है।

V. बड़े उत्तरों वाले प्रश्न-

प्रश्न 1.
वर्ग के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तार से लिखें ।
अथवा
वर्ग क्या होता है ? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-
सामाजिक स्तरीकरण का आधार वर्ग होता है। वर्ग में व्यक्ति की स्थिति उसके वर्ग की भूमिका के अनुसार होती है। मानवीय समाज में सभी मनुष्यों की स्थिति बराबर या समान नहीं होती। किसी-न-किसी आधार पर असमानता पाई जाती रही है व इसी असमानता की भावना के कारण ही वर्ग पहचान में आए हैं। विशेषकर पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण, शिक्षा प्रणाली, आधुनिकीकरण के कारण समाज भारत में वर्ग व्यवस्था आगे आई है। पश्चिमी देशों में भी स्तरीकरण वर्ग व्यवस्था पर आधारित होता है। भारत में भी बहुत सारे वर्ग पहचान में आए हैं जैसे अध्यापक वर्ग, व्यापार वर्ग, डॉक्टर वर्ग आदि।

वर्ग का अर्थ व परिभाषाएं (Meaning & Definitions of Class):

प्रत्येक समाज कई वर्गों में विभाजित होता है व प्रत्येक वर्ग की समाज में भिन्न-भिन्न स्थिति होती है। इस स्थिति के आधार पर ही व्यक्ति को उच्च या निम्न जाना जाता है। वर्ग की मुख्य विशेषता वर्ग चेतनता होती है। इस प्रकार समाज में जब विभिन्न व्यक्तियों को विशेष सामाजिक स्थिति प्राप्त होती है तो उसको वर्ग व्यवस्था कहते हैं। प्रत्येक वर्ग आर्थिक पक्ष से एक-दूसरे से अलग होता है।

  • मैकाइवर (Maclver) ने वर्ग को सामाजिक आधार पर बताया है। उस के अनुसार, “सामाजिक वर्ग एकत्रता वह हिस्सा होता है जिसको सामाजिक स्थिति के आधार पर बचे हुए हिस्से से अलग कर दिया जाता है।”
  • मोरिस जिन्सबर्ग (Morris Ginsberg) के अनुसार, “वर्ग व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो सांझे वंशक्रम, व्यापार सम्पत्ति के द्वारा एक सा जीवन ढंग, एक से विचारों का स्टाफ, भावनाएं, व्यवहार के रूप में रखते हों व जो इनमें से कुछ या सारे आधार पर एक-दूसरे से समान रूप में अलग-अलग मात्रा में पाई जाती हो।”
  • गिलबर्ट (Gilbert) के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग व्यक्तियों की एकत्र विशेष श्रेणी है जिस की समाज में एक विशेष स्थिति होती है, यह विशेष स्थिति ही दूसरे समूहों से उनके सम्बन्ध निर्धारित करती है।”
  • कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के विचार अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग को उसके उत्पादन के साधनों व सम्पत्ति के विभाजन से स्थापित होने वाले सम्बन्धों के सन्दर्भ में भी परिभाषित किया जा सकता है।”
  • आगबन व निमकौफ (Ogburn & Nimkoff) के अनुसार, “एक सामाजिक वर्ग की मौलिक विशेषता दुसरे सामाजिक वर्गों की तुलना में उसकी उच्च व निम्न सामाजिक स्थिति होती है।”

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि सामाजिक वर्ग कई व्यक्तियों का वर्ग होता है, जिसको समय विशेष में एक विशेष स्थिति प्राप्त होती है। इसी कारण उनको कुछ विशेष शक्ति, अधिकार व उत्तरदायित्व भी मिलते हैं। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की योग्यता महत्त्वपूर्ण होती है। इस कारण हर व्यक्ति परिश्रम करके सामाजिक वर्ग में अपनी स्थिति को ऊँची करना चाहता है। प्रत्येक समाज विभिन्न वर्गों में विभाजित होता है। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति निश्चित नहीं होती। उसकी स्थिति में गतिशीलता पाई जाती है। इस कारण इसे खुला स्तरीकरण भी कहते हैं। व्यक्ति अपनी वर्ग स्थिति स्वयं निर्धारित करता है। यह जन्म पर आधारित नहीं होता।

वर्ग की विशेषताएं (Characteristics of Class):

1. श्रेष्ठता व हीनता की भावना (Feeling of Superiority and Inferiority)—वर्ग व्यवस्था में भी ऊँच व नीच के सम्बन्ध पाए जाते हैं। उदाहरणतः उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों से अपने आप को अलग व ऊँचा महसूस करते हैं। ऊँचे वर्ग में अमीर लोग आ जाते हैं व निम्न वर्ग में ग़रीब लोग। अमीर लोगों की समाज में उच्च स्थिति होती है व ग़रीब लोग भिन्न-भिन्न निवास स्थान पर रहते हैं। उन निवास स्थानों को देखकर ही पता लग जाता है कि वह अमीर वर्ग से सम्बन्धित हैं या ग़रीब वर्ग से।

2. सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)—वर्ग व्यवस्था किसी भी व्यक्ति के लिए निश्चित नहीं होती। वह बदलती रहती है। व्यक्ति अपनी मेहनत से निम्न से उच्च स्थिति को प्राप्त कर लेता है व अपने गलत कार्यों के परिणामस्वरूप ऊंची से निम्न स्थिति पर भी पहुंच जाता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी आधार पर समाज में अपनी इज्जत बढ़ाना चाहता है। इसी कारण वर्ग व्यवस्था व्यक्ति को क्रियाशील भी रखती है। उदाहरणतः एक आम दफ़तर में लगा क्लर्क यदि परिश्रम करके I.A.S. इम्तिहान में आगे बढ़ जाता है तो उसकी स्थिति बिल्कुल ही बदल जाती है।

3. खुलापन (Openness)—वर्ग व्यवस्था में खुलापन पाया जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति को पूरी आज़ादी होती है कि वह कुछ भी कर सके। वह अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी व्यापार को अपना सकता है। किसी भी जाति का व्यक्ति किसी भी वर्ग का सदस्य अपनी योग्यता के आधार पर बन सकता है। निम्न वर्ग के लोग मेहनत करके उच्च वर्ग में आ सकते हैं। इसमें व्यक्ति के जन्म की कोई महत्ता नहीं होती। व्यक्ति की स्थिति उसकी योग्यता पर निर्भर करती है। एक अमीर मां-बाप का लड़का तब तक अमीर बना रहेगा जब तक उसके माता-पिता की सम्पत्ति समाप्त नहीं हो जाती। बाद में हो सकता है कि यदि वह मेहनत न करे तो भूखा भी मर सकता है। यह वर्ग व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान आर्थिक मौके भी प्रदान करती है। इस प्रकार इसमें खुलापन पाया जाता है।

4. सीमित सामाजिक सम्बन्ध (Limited Social Relations) वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्ध सीमित होते हैं। प्रत्येक वर्ग के लोग अपने बराबर के वर्ग के लोगों से सम्बन्ध रखना अधिक ठीक समझते हैं। प्रत्येक वर्ग अपने ही लोगों से नज़दीकी रखना चाहता है। वह दूसरे वर्ग से सम्बन्ध नहीं रखना चाहता।

5. उपवर्गों का विकास (Development of Sub-Classes)-आर्थिक दृष्टिकोण से हम वर्ग व्यवस्था को तीन भागों में बाँटते हैं

(i) उच्च वर्ग (Upper Class)
(ii) मध्य वर्ग (Middle Class)
(iii) निम्न वर्ग (Lower Class)।

परन्तु आगे हर वर्ग कई और उपवर्गों में बाँटा होता है, जैसे एक अमीर वर्ग में भी भिन्नता नज़र आती है। कुछ लोग बहुत अमीर हैं, कुछ उससे कम व कुछ सबसे कम। इसी प्रकार मध्य वर्ग व निम्न वर्ग में भी उप-वर्ग पाए जाते हैं। हर वर्ग के उप-वर्गों में भी अन्तर पाया जाता है। इस प्रकार वर्ग, उप वर्गों से मिल कर बनता है।

6. विभिन्न आधार (Different Bases)—जैसे हम शुरू में ही विभिन्न समाज वैज्ञानिकों के विचारों से यह परिणाम निकाल चुके हैं कि वर्ग के भिन्न-भिन्न आधार हैं। प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार को वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है। उसके अनुसार समाज में केवल दो वर्ग पाए गए हैं। एक तो पूंजीपति वर्ग, दूसरा श्रमिक वर्ग। हर्टन व हंट के अनुसार हमें याद रखना चाहिए कि वर्ग मूल में, विशेष जीवन ढंग है। ऑगबर्न व निमकौफ़, मैकाइवर गिलबर्ट ने वर्ग के लिए सामाजिक आधार को मुख्य माना है। जिन्ज़बर्ग, लेपियर जैसे वैज्ञानिकों ने सांस्कृतिक आधार को ही वर्ग व्यवस्था का मुख्य आधार माना है।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि वर्ग के निर्धारण करने का कोई एक आधार नहीं, बल्कि कई अलग-अलग आधार हैं। जैसे पढ़ा-लिखा वर्ग, अमीर वर्ग, डॉक्टर वर्ग आदि। इस प्रकार वर्ग कई आधारों के परिणामस्वरूप पाया गया है।

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7. वर्ग पहचान (Identification of Class)—वर्ग व्यवस्था में बाहरी दृष्टिकोण भी महत्त्वपूर्ण होता है। कई बार हम देख कर यह अनुमान लगा लेते हैं कि यह व्यक्ति उच्च वर्ग का है या निम्न का। हमारे आधुनिक समाज में कोठी, कार, स्कूटर, टी० वी०, वी० सी० आर०, फ्रिज आदि व्यक्ति के स्थिति चिन्ह को निर्धारित करते हैं। इस प्रकार बाहरी संकेतों से हमें वर्ग भिन्नता का पता चल जाता है।
प्रत्येक वर्ग के लोगों का जीवन ढंग लगभग एक सा ही होता है। मैक्स वैबर के अनुसार, “हम एक समूह को तो ही वर्ग कह सकते हैं जब उस समूह के लोगों को जीवन के कुछ ख़ास मौके न प्राप्त हों।” इस प्रकार हर वर्ग के सदस्यों की ज़रूरतें भी एक सी ही होती हैं।

8. वर्ग चेतनता (Class Consciousness)-प्रत्येक सदस्य अपनी वर्ग स्थिति के प्रति पूरी तरह चेतन होता है। इसी कारण वर्ग चेतना, वर्ग व्यवस्था की मुख्य विशेषता है। वर्ग चेतना व्यक्ति को आगे बढ़ने के मौके प्रदान करती है क्योंकि चेतना के आधार पर ही हम एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करते हैं। व्यक्ति का व्यवहार भी इसके द्वारा ही निश्चित होता है।

9. उतार-चढ़ाव का क्रम (Hierarchical Order)-प्रत्येक समाज में भिन्न-भिन्न स्थिति रखने वाले वर्ग पाए जाते हैं। स्थिति का उतार-चढ़ाव चलता रहता है व भिन्न-भिन्न वर्गों का निर्माण होता रहता है। साधारणत: यह देखने में आया है कि समाज में उच्च वर्ग के लोगों की गणना कम होती है व मध्यम व निम्न वर्गों के लोगों की गणना अधिक होती है। प्रत्येक वर्ग के लोग अपनी मेहनत व योग्यता से अपने से उच्च वर्ग में जाने की कोशिश करते रहते हैं।

10. आपसी निर्भरता (Mutual Dependence) समाज के सभी वर्गों में आपसी निर्भरता होती है व वह एकदूसरे पर निर्भर होते हैं। उच्च वर्ग को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए मध्यम वर्ग की ज़रूरत पड़ती है व इसी तरह मध्यम वर्ग को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए निम्न वर्ग की ज़रूरत पड़ती है। इसी तरह उल्टा भी होता है। इस प्रकार यह सारे वर्ग अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।

11. वर्ग एक खुली व्यवस्था है (Class is an open system)-वर्ग एक खुली व्यवस्था होती है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक वर्ग के दरवाजे खुले होते हैं। व्यक्ति अपनी मेहनत, योग्यता व कोशिशों से अपना वर्ग बदल भी सकता है व कोशिशें न करके छोटे वर्ग में भी पहुँच सकता है। उसके रास्ते में जाति कोई रुकावट नहीं डालती। उदाहरणत: निम्न जाति का व्यक्ति भी परिश्रम करके उच्च वर्ग में पहुँच सकता है।

12. वर्ग की स्थिति (Status of Class)—प्रत्येक वर्ग की स्थितियों में कुछ समानता होती है। इस समानता के कारण ही प्रत्येक वर्ग के प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति करने के समान मौके प्राप्त होते हैं। व्यक्ति की शिक्षा, उसके रहने का स्थान, अन्य चीजें आदि उसके वर्ग की स्थिति अनुसार होती हैं।

प्रश्न 2.
वर्ग के विभाजन के अलग-अलग आधारों का वर्णन करो।
अथवा वर्ग के सह-संबंधों की व्याख्या करें।
अथवा आय तथा व्यवसाय की वर्ग निर्धारक के रूप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
वर्ग की व्याख्या व विशेषताओं के आधार पर हम वर्ग के विभाजन के कुछ आधारों का जिक्र कर सकते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया गया है
(1) परिवार व रिश्तेदार (2) सम्पत्ति व आय, पैसा (3) व्यापार (4) रहने के स्थान की दिशा (5) शिक्षा (6) शक्ति (7) धर्म (8) प्रजाति (9) जाति (10) स्थिति चिन्ह।

1. परिवार व रिश्तेदारी (Family and Kinship) परिवार व रिश्तेदारी भी वर्ग की स्थिति निर्धारित करने के लिए जिम्मेवार होता है। बीयरस्टेड के अनुसार, “सामाजिक वर्ग की कसौटी के रूप में परिवार व रिश्तेदारी का महत्त्व सारे समाज में बराबर नहीं होता, बल्कि यह तो अनेक आधारों में एक विशेष आधार है जिसका उपयोग सम्पूर्ण व्यवस्था में एक अंग के रूप में किया जा सकता है। परिवार के द्वारा प्राप्त स्थिति पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। जैसे टाटा बिरला आदि के परिवार में पैदा हुई सन्तान पूंजीपति ही रहती है क्योंकि उनके बुजुर्गों ने इतना पैसा कमाया होता है कि कई पीढ़ियां यदि न भी मेहनत करें तो भी खा सकती हैं। इस प्रकार अमीर परिवार में पैदा हुए व्यक्ति को भी वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है। इस प्रकार परिवार व रिश्तेदारी की स्थिति के आधार पर भी व्यक्ति को वर्ग व्यवस्था में उच्च स्थिति प्राप्त होती है।।

2. सम्पत्ति, आय व पैसा (Property, Income and Money)-वर्ग के आधार पर सम्पत्ति, पैसे व आय को प्रत्येक समाज में महत्त्वपूर्ण जगह प्राप्त होती है। आधुनिक समाज को इसी कारण पूंजीवादी समाज कहा गया है। पैसा एक ऐसा स्रोत है जो व्यक्ति को समाज में बहुत तेज़ी से उच्च सामाजिक स्थिति की ओर ले जाता है। मार्टिनडेल व मोनाचेसी (Martindal and Monachesi) के अनुसार, “उत्पादन के साधनों व उत्पादित पदार्थों पर व्यक्ति का काबू जितना अधिक होगा उसको उतनी ही उच्च वर्ग वाली स्थिति प्राप्त होती है।” प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक कार्ल मार्क्स ने पैसे को ही वर्ग निर्धारण के लिए मुख्य माना। अधिक पैसा होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति अमीर है। उनकी आय भी अधिक होती है। इस प्रकार धन, सम्पत्ति व आय के आधार पर भी वर्ग निर्धारित होता है।

3. पेशा (Occupation)—सामाजिक वर्ग को निर्धारक पेशा भी माना जाता है। व्यक्ति समाज में किस तरह का पेशा कर रहा है, यह भी वर्ग व्यवस्था से सम्बन्धित है। क्योंकि हमारी वर्ग व्यवस्था के बीच कुछ पेशे बहुत ही महत्त्वपूर्ण पाए गए हैं व कुछ पेशे कम महत्त्वपूर्ण। इस प्रकार हम देखते हैं कि डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफैसर आदि की पारिवारिक स्थिति चाहे जैसी भी हो परन्तु पेशे के आधार पर उनकी सामाजिक स्थिति उच्च ही रहती है। लोग उनका आदर-सम्मान भी पूरा करते हैं। इस प्रकार कम पढ़े-लिखे व्यक्ति का पेशा समाज में निम्न रहता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पेशा भी वर्ग व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण निर्धारक होता है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने के लिए कोई-न-कोई काम करना पड़ता है। इस प्रकार यह काम व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार करता है। वह जिस तरह का पेशा करता है समाज में उसे उसी तरह की स्थिति प्राप्त हो जाती है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति गलत पेशे को अपनाकर पैसा इकट्ठा कर भी लेता है तो उसकी समाज में कोई इज्ज़त नहीं होती। आधुनिक समाज में शिक्षा से सम्बन्धित पेशे की अधिक महत्ता पाई जाती है।

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4. रहने के स्थान की दिशा (Location of residence)—व्यक्ति किस जगह पर रहता है, यह भी उसकी वर्ग स्थिति को निर्धारित करता है। शहरों में हम आम देखते हैं कि लोग अपनी वर्ग स्थिति को देखते हुए, रहने के स्थान का चुनाव करते हैं। जैसे हम समाज में कुछ स्थानों के लिए (Posh areas) शब्द भी प्रयोग करते हैं। वार्नर के अनुसार जो परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी शहर के काल में पुश्तैनी घर में रहते हैं उनकी स्थिति भी उच्च होती है। कहने से भाव यह है कि कुछ लोग पुराने समय से अपने बड़े-बड़े पुश्तैनी घरों में ही रह जाते हैं। इस कारण भी वर्ग व्यवस्था में उनकी स्थिति उच्च ही बनी रहती है। बड़े-बड़े शहरों में व्यक्तियों के निवास स्थान के लिए भिन्न-भिन्न कालोनियां बनी रहती हैं। मज़दूर वर्ग के लोगों के रहने के स्थान अलग होते हैं। वहां अधिक गन्दगी भी पाई जाती है। अमीर लोग बड़े घरों में व साफ़-सुथरी जगह पर रहते हैं जबकि ग़रीब लोग झोंपड़ियों या गन्दी बस्तियों में रहते हैं।

5. शिक्षा (Education)-आधुनिक समाज शिक्षा के आधार पर दो वर्गों में विभाजित होता है-

(i) शिक्षित वर्ग (Literate Class)
(ii) अनपढ़ वर्ग (Illiterate Class)।

शिक्षा की महत्ता प्रत्येक वर्ग में पाई जाती है। साधारणतः पर हम देखते हैं कि पढ़े-लिखे व्यक्ति को समाज में इज्जत की नज़र से देखा जाता है। चाहे उनके पास पैसा भी न हो। इस कारण प्रत्येक व्यक्ति वर्तमान सामाजिक स्थिति अनुसार शिक्षा की प्राप्ति को ज़रूरी समझने लगा है। शिक्षा की प्रकृति भी व्यक्ति की वर्ग स्थिति के निर्धारण के लिए जिम्मेवार होती है। औद्योगीकृत समाज में तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति काफ़ी ऊँची होती है।

6. शक्ति (Power)—आजकल औद्योगीकरण के विकास के कारण व लोकतन्त्र के आने से शक्ति भी वर्ग संरचना का आधार बन गई है। अधिक शक्ति का होना या न होना व्यक्ति के वर्ग का निर्धारण करती है। शक्ति से व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिति का भी निर्धारण होता है। शक्ति कुछ श्रेष्ठ लोगों के हाथ में होती है व वह श्रेष्ठ लोग नेता, अधिकारी, सैनिक अधिकारी, अमीर लोग होते हैं। हमने उदाहरण ली है आज की भारत सरकार की। नरेंद्र मोदी की स्थिति निश्चय ही सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह से ऊँची होगी क्योंकि उनके पास शक्ति है, सत्ता उनके हाथ में है, परन्तु मनमोहन सिंह के पास नहीं है। इस प्रकार आज भाजपा की स्थिति कांग्रेस से उच्च है क्योंकि केन्द्र में भाजपा पार्टी की सरकार है।

7. धर्म (Religion)-राबर्ट बियरस्टड ने धर्म को भी सामाजिक स्थिति का महत्त्वपूर्ण निर्धारक माना है। कई समाज ऐसे हैं जहां परम्परावादी रूढ़िवादी विचारों का अधिक प्रभाव पाया जाता है। उच्च धर्म के आधार पर स्थिति निर्धारित होती है। आधुनिक समय में समाज उन्नति के रास्ते पर चल रहा है जिस कारण धर्म की महत्ता उतनी नहीं जितनी पहले होती थी। प्राचीन भारतीय समाज में ब्राह्मणों की स्थिति उच्च होती थी परन्तु आजकल नहीं। पाकिस्तान में मुसलमानों की स्थिति निश्चित रूप से हिन्दुओं व ईसाइयों से बढ़िया है क्योंकि वहां राज्य का धर्म ही इस्लाम है। इस प्रकार कई बार धर्म भी वर्ग स्थिति का निर्धारण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

8. प्रजाति (Race) दुनिया से कई समाज में प्रजाति भी वर्ग निर्माण या वर्ग की स्थिति बताने में सहायक होती है। गोरे लोगों को उच्च वर्ग का व काले लोगों को निम्न वर्ग का समझा जाता है। अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों में एशिया के देशों के लोगों को बुरी निगाह से देखा जाता है। इन देशों में प्रजातीय हिंसा आम देखने को मिलती है। दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद की नीति काफ़ी चली है।

9. जाति (Caste)-भारत जैसे देश में जहां जाति प्रथा सदियों से भारतीय समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही है, जाति वर्ग निर्धारण का बहुत
महत्त्वपूर्ण आधार रही है। जाति जन्म पर आधारित होती है। जिस जाति में व्यक्ति ने जन्म लिया है वह अपनी योग्यता से भी उसे परिवर्तित नहीं सकता।

10. स्थिति चिन्ह (Status Symbol)—स्थिति चिन्ह लगभग हर एक समाज में व्यक्ति की वर्ग व्यवस्था को निर्धारित करता है। आजकल के समय, कोठी, कार, टी० वी०, टैलीफोन, फ्रिज आदि का होना व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करता है। इस प्रकार किसी व्यक्ति के पास अच्छी ज़िन्दगी को बिताने वाली कितनी सुविधाएं हैं। यह सब स्थिति चिन्हों में शामिल होती हैं, जो व्यक्ति की स्थिति को निर्धारित करते हैं।
इस विवरण के आधार पर हम इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि व्यक्ति के वर्ग के निर्धारण में केवल एक कारक ही जिम्मेवार नहीं होता, बल्कि कई कारक जिम्मेवार होते हैं।

प्रश्न 3.
जाति व वर्ग में अन्तर बताओ।
उत्तर-
सामाजिक स्तरीकरण के दो मुख्य आधार जाति व वर्ग हैं। जाति को एक बन्द व्यवस्था व वर्ग को एक खुली व्यवस्था कहा जाता है। पर वर्ग अधिक खुली अवस्था नहीं है क्योंकि किसी भी वर्ग को अन्दर जाने के लिए सख्त मेहनत करनी पड़ती है व उस वर्ग के सदस्य रास्ते में काफ़ी रोड़े अटकाते हैं। कई विद्वान् यह कहते हैं कि जाति व वर्ग में कोई विशेष अन्तर नहीं है परन्तु दोनों का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो यह पता चलेगा कि दोनों में काफ़ी अन्तर है। इनका वर्णन इस प्रकार है-

1. जाति जन्म पर आधारित होती है पर वर्ग का आधार कर्म होता है (Caste is based on birth but class is based on action)-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती थी। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, वह सारी ही उम्र उसी से जुड़ा होता था।
वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता शिक्षा, आय, व्यापार योग्यता पर आधारित होती है। व्यक्ति जब चाहे अपनी सदस्यता बदल सकता है। एक ग़रीब वर्ग से सम्बन्धित व्यक्ति परिश्रम करके अपनी सदस्यता अमीर वर्ग से ही जोड़ सकता है। वर्ग की सदस्यता योग्यता पर आधारित होती है। यदि व्यक्ति में योग्यता नहीं है व वह कर्म नहीं करता है तो वह उच्च स्थिति से निम्न स्थिति में भी जा सकता है। यदि वह कर्म करता है तो वह निम्न स्थिति से उच्च स्थिति में भी जा सकता है। जिस प्रकार जाति धर्म पर आधारित है पर वर्ग कर्म पर आधारित होता है।

2. जाति का पेशा निश्चित होता है पर वर्ग का नहीं (Occupation of caste is determined but not of class) जाति प्रथा में पेशे की व्यवस्था भी व्यक्ति के जन्म पर ही आधारित होती थी अर्थात् विभिन्न जातियों से सम्बन्धित पेशे होते थे। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था, उसको जाति से सम्बन्धित पेशा अपनाना होता था। वह सारी उम्र उस पेशे को बदल कर कोई दूसरा कार्य भी नहीं अपना सकता था। इस प्रकार न चाहते हुए भी उसको अपनी जाति के पेशे को ही अपनाना पड़ता था।

वर्ग व्यवस्था में पेशे के चुनाव का क्षेत्र बहुत विशाल है। व्यक्ति की अपनी इच्छा होती है कि वह किसी भी पेशे को अपना ले। विशेष रूप से व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता था कि वह किसी भी पेशे को अपना लेता है। विशेष रूप से पर व्यक्ति जिस पेशे में माहिर होता है वह उसी पेशे को अपनाता है क्योंकि उसका विशेष उद्देश्य लाभ प्राप्ति की ओर होता था व कई बार यदि वह एक पेशे को करते हुए तंग आ जाता है तो वह दूसरे किसी और पेशे को भी अपना सकता है। इस प्रकार पेशे को अपनाना व्यक्ति की योग्यता पर आधारित होता है।

3. जाति की सदस्यता प्रदत्त होती है पर वर्ग की सदस्यता अर्जित होती है (Membership of caste is ascribed but membership of class is achieved)-सम्बन्धित होती थी भाव कि स्थिति वह खुद प्राप्त नहीं करता था बल्कि जन्म से ही सम्बन्धित होती थी। इसी कारण व्यक्ति की स्थिति के लिए ‘प्रदत्त’ (ascribed) शब्द का उपयोग किया जाता था। इसी कारण जाति व्यवस्था में स्थिरता बनी रहती थी। व्यक्ति का पद वह ही होता था जो उसके परिवार का हो। वर्ग व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति ‘अर्जित’ (achieved) होती है अर्थात् उसको समाज में अपनी स्थिति प्राप्त करनी पड़ती है। इस कारण व्यक्ति शुरू से ही परिश्रम करनी शुरू कर देता है। व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर निम्न स्थिति से उच्च स्थिति भी प्राप्त कर लेता है। इसमें व्यक्ति के जन्म का कोई महत्त्व नहीं होता। बल्कि परिश्रम व योग्यता उसके वर्ग व स्थिति के बदलने में महत्त्वपूर्ण होती है।

4. जाति बन्द व्यवस्था है व वर्ग खुली व्यवस्था है (Caste is a closed system but class is an open system)-जाति प्रथा स्तरीकरण का बन्द समूह होता है क्योंकि व्यक्ति को सारी उम्र सीमाओं में बन्ध कर रहना पड़ता है। न तो वह जाति बदल सकता है न ही पेशा। श्रेणी व्यवस्था स्तरीकरण का खुला समूह होता है। इस प्रकार व्यक्ति को हर किस्म की आज़ादी होती है। वह किसी भी क्षेत्र में मेहनत करके आगे बढ़ सकता है। उसको समाज में अपनी निम्न स्थिति से ऊपर की स्थिति की ओर बढ़ने के पूरे मौके भी प्राप्त होते हैं। वर्ग का दरवाज़ा प्रत्येक के लिए खुला होता है। व्यक्ति अपनी योग्यता, सम्पत्ति, परिश्रम के अनुसार किसी भी वर्ग का सदस्य बन सकता है व वह अपनी सारी उम्र में कई वर्गों का सदस्य बनता है।

5. जाति व्यवस्था में कई पाबन्दियां होती हैं परन्तु वर्ग में कोई नहीं होती (There are many restrictions in caste system but not in any class)-जाति प्रथा द्वारा अपने सदस्यों पर कई पाबन्दियां लगाई जाती थीं। खान-पान सम्बन्धी, विवाह, सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने आदि सम्बन्धी बहुत पाबन्दियां थीं। व्यक्ति की ज़िन्दगी पर जाति का पूरा नियन्त्रण होता था। वह उन पाबन्दियां को तोड़ भी नहीं सकता था। ___ वर्ग व्यवस्था में व्यक्तिगत आज़ादी होती थी। भोजन, विवाह आदि सम्बन्धी किसी प्रकार का कोई नियन्त्रण नहीं होता था। किसी भी वर्ग का व्यक्ति दूसरे वर्ग के व्यक्ति से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित कर सकता था।

6. जाति में चेतनता नहीं होती पर वर्ग में चेतनता होती है (There is no caste consciousness but there is class consciousness) —जाति व्यवस्था में जाति चेतनता नहीं पाई जाती थी। इसका एक कारण तो था कि चाहे निम्न जाति के व्यक्ति को पता था कि उच्च जातियों की स्थिति उच्च है, परन्तु फिर भी वह इस सम्बन्धी कुछ नहीं कर सकता था। इसी कारण वह मेहनत करनी भी बन्द कर देता था। उसको अपनी योग्यता अनुसार समाज में कुछ भी प्राप्त नहीं होता था।

वर्ग के सदस्यों में वर्ग चेतनता पाई जाती थी। इसी चेतनता के आधार पर तो वर्ग का निर्माण होता था। व्यक्ति इस सम्बन्धी पूरा चेतन होता था कि वह कितनी मेहनत करे ताकि उच्च वर्ग स्थिति को प्राप्त कर सके। इसी प्रकार वह हमेशा अपनी योग्यता को बढ़ाने की ओर ही लगा रहता था।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

उपरोक्त विवरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जाति व्यवस्था का केवल एक ही आधार होता है, वह था सांस्कृतिक। परन्तु वर्ग व्यवस्था के कई आधार पाए जाते हैं। हर आधार अनुसार वर्ग विभाजन अलग होता है। आर्थिक कारणों का वर्ग व्यवस्था पर अधिक प्रभाव होता था। व्यक्ति की आर्थिकता में परिवर्तन आने से उसकी सदस्यता बदल जाती है। परन्तु जाति व्यवस्था में आर्थिकता का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक बन्द व्यवस्था थी। भाव कि एक वर्ग व दूसरे वर्ग में जाति प्रथा वाली ही भिन्नता है, लेकिन जाति को व्यक्ति बदल नहीं सकता था जबकि वर्ग व्यवस्था को बदल सकता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक वर्ग के अलग-अलग संकेतकों का वर्णन करें।
उत्तर-
एक सूचक वह वस्तु है, जो किसी लक्षण के अतिरिक्त उस बारे में बताता है, कि वह उसके बारे में पूरी तरह बताता है। सामाजिक गतिशीलता के कई सूचक हैं जिनमें से शिक्षा, व्यवसाय एवं आय प्रमुख हैं। इनका वर्णन निम्न प्रकार का है

1. शिक्षा (Education) शिक्षा को सामाजिक वर्ग का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। यह कहा जाता है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करेगा, वह उतना ही ज़िन्दगी में सफल होगा। शिक्षा व्यक्ति के बुजुर्गों द्वारा किये गये गलत कार्यों को भी ठीक कर देती है। यह माना जाता है कि शिक्षा को केवल नौकरी का साधन मात्र नहीं समझा जाना चाहिए क्योंकि शिक्षा सीधे तौर पर ऊपर की तरफ गतिशीलता को लेकर जाती है। शिक्षा तो व्यक्ति के लिए उस समय उपस्थित अवसर प्राप्त करने के लिए व्यक्ति की योग्यता को बढ़ाती है। शिक्षा वह रास्ता बताती है, जो किसी भी व्यवसाय को अपनाने के लिए आवश्यक होते हैं, परन्तु यह उन रास्तों को प्रयोग करने के अवसर प्रदान नहीं करती है। शिक्षा गतिशीलता के साधन के रूप में कई कार्य करती है जैसे कि

  • शिक्षा व्यक्ति को मज़दूर से मैनेजर तक का रास्ता दिखाती है। कोई भी मज़दूर शिक्षा प्राप्त करने के बाद मैनेजर की पदवी तक पहुंच सकता है।
  • शिक्षा किसी को भी व्यवसाय प्राप्त करने के बारे में बताती है। व्यक्ति को अच्छी आय वाला रोजगार प्रदान करती है।
  • शिक्षा व्यक्ति की अधिक आय और नौकरी वाली पदवियां अर्जित करने में सहायता करती है। साधारणतः सरकारी नौकरी अच्छी शिक्षा द्वारा प्राप्त की जाती है। इसलिए अधिक तनख्वाह (Salary) के लिए अच्छी शिक्षा ग्रहण करना आवश्यक है।

यह माना जाता है कि व्यक्ति जितना अधिक समय पढ़ाई में लगाता है, उसकी अधिक आय एवं सामाजिक गतिशीलता में ऊपर की तरफ बढ़ने के अधिक अवसर आते हैं। शिक्षा व्यक्ति को कई प्रकार के व्यवसाय प्राप्त करने के अवसर प्रदान करती है। कई प्रकार के अध्ययनों से यह पता चला है कि शिक्षा न केवल व्यक्ति को ऊंची पदवी प्राप्त करने का अवसर देती है, बल्कि इसके साथ व्यक्ति समाज के बीच रहने एवं व्यवहार करने के तरीकों के बारे में बतलाती है। ऐसा सीखने से व्यक्ति के लिए सफलता प्राप्ति के अवसर बढ़ जाते हैं। इस तरह शिक्षा व्यक्ति के लिए सामाजिक गतिशीलता में ऊपर बढ़ने के अवसर प्रदान करती है।

शिक्षा एक विद्यार्थी के जीवन में अवसर प्राप्त करने के अवसरों में वृद्धि प्रदान करती है। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् व्यक्ति में धन प्राप्ति हेतु समर्था में वृद्धि होती है। जो बच्चे पढ़ाई की तरफ ध्यान नहीं देते हैं, उनका जीवन काफ़ी कठिनाइयों वाला व संघर्षपूर्ण हो जाता है। परन्तु जो बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं और अपना अधिक समय पढ़ाई में व्यतीत करते हैं वे बड़े होकर अधिक धन की प्राप्ति करते हैं।

बच्चों की पृष्ठभूमि (Background History) भी उनकी वर्तमान प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन बच्चों के माता-पिता अधिक पढ़े-लिखे होते हैं और ऊंची पदवी पर कार्य कर रहे होते हैं उनको घर में ही शिक्षा का अच्छा वातावरण प्राप्त होता है, उन बच्चों के माता-पिता उन बच्चों के लिए आदर्श बन जाते हैं। माता-पिता बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने की महत्ता के बारे में बतला कर उनको शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रेरित करते हैं। इस तरह पढ़ाई के पश्चात् उनमें सामाजिक पदवी प्राप्त करने की लालसा बढ़ जाती है और वे ऊंची पदवी प्राप्त करके समाज में ऊंचा उठ जाते हैं। इस प्रकार शिक्षा गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है।

यहां एक बात साफ कर देनी ज़रूरी है कि व्यक्ति जितनी अधिक शिक्षा प्राप्त करता है, उसको जीवन में उन्नति करने के उतने ही मौके बढ़ जाते हैं। जितना अधिक समय तथा पैसा व्यक्ति शिक्षा में निवेश करता है, उतने ही उसको अच्छी नौकरी अथवा व्यापार करने के अधिक मौके प्राप्त होंगे। उदाहरणत: यदि किसी विद्यार्थी ने बी० कॉम (B.Com.) की डिग्री प्राप्त करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी है तो उसको अच्छी नौकरी मिलने के बहुत ही कम मौके प्राप्त होंगे। परन्तु उसने B.Com. के बाद किसी I.I.M. से M.B.A. कर ली है तो उसको बहुत ही अच्छी नौकरी तथा बहुत ही अच्छा वेतन प्राप्त हो सकता है। इस तरह जितना अधिक समय तथा पैसा शिक्षा पर खर्च किया जाएगा, उतने अधिक मौके बढ़िया नौकरी के लिए प्राप्त होंगे।

अन्त में हम कह सकते हैं कि चाहे शिक्षा गतिशीलता का एक सीधा रास्ता नहीं है परन्तु यह व्यक्ति को उसके पेशे को बदलने तथा उससे लाभ उठाने में बहुत ज्यादा मदद करती है। शिक्षा व्यक्ति को गतिशील होने के लिए प्रेरित करती है तथा जीवन में ऊपर उठने के मौके प्रदान करती है।

2. व्यवसाय (Occupation)-गतिशीलता के कारण ही समाज को पता चलता है कि किस पद पर किस व्यक्ति को बिठाया जाए। इस प्रकार समाज प्रत्येक पद पर योग्य व्यक्ति को ही बिठाता है। इस तरह यह व्यक्ति को उसके लक्ष्य प्राप्ति हेतु सहायता करती है। व्यवसाय के आधार पर समाज को हम दो तरह के समाजों में बांट सकते हैं। (1) बन्द समाज एवं खुला समाज। इन समाजों की गतिशीलता में व्यवसाय का महत्त्व इस प्रकार है

(i) बन्द समाज (Closed Society)-भारत पुराने समाज में बन्द समाजों की उदाहरण है। पुराने समाज में चार प्रकार की जातियां थीं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं निम्न जातियां। प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था।
ब्राह्मणों का कार्य पढ़ाना था, जिस कारण उसकी सामाजिक स्थिति सबसे ऊंची थी। उसके पश्चात् क्षत्रिय आते थे, जिनका कार्य देश की रक्षा करना था और राज्य चलाना था। तीसरे स्थान पर वैश्य थे जिनका कार्य व्यापार एवं कृषि करना था। सबसे निम्न स्थान निम्न जातियों का था, जिनका कार्य उपरोक्त तीनों जातियों की सेवा करना था।

प्रत्येक व्यक्ति का व्यवसाय उसकी जाति एवं जन्म से सम्बन्धित होता था। प्रत्येक जाति के लोग अपने-अपने विशेष कार्य करते थे। जाति अपने सदस्यों को अन्य व्यवसायों को अपनाने के लिए रोकती थी। क्योंकि इसके साथ जाति के आर्थिक एवं धार्मिक बन्धन टूटते थे। यदि कोई जाति के बन्धनों को तोड़ता भी था तो उसे जाति में ही से बाहर निकाल दिया जाता था। इस प्रकार जाति एवं उपजाति अपने-अपने भिन्न-भिन्न कार्यों को करती थी।

हमारे देश में स्वतन्त्रता के पश्चात् आधुनिकीकरण एवं औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। जिस कारण लोगों को अपने व्यवसायों को बदलने के अवसर प्राप्त हुए। लोगों के व्यवसाय से सम्बन्धित बन्धन समाप्त हो गये। उन्होंने अन्य व्यवसाय अपना लिये। इस प्रकार बन्द समाजों में गतिशीलता व्यवसायों के कारण आरम्भ हुई और वह अब भी चल रही है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि बन्द समाजों में पेशा व्यक्ति को अपनी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होता था बल्कि उसको जन्म के आधार पर प्राप्त होता था। व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता था उसको उस जाति से सम्बन्धित पेशा अपनाना ही पड़ता था। चाहे कुछ पेशे जैसे कि सेना में नौकरी करना, कृषि करना, व्यापार इत्यादि में कुछ प्रतिबन्ध कम थे, परन्तु फिर भी व्यक्तियों के ऊपर पेशा अपनाने की बन्दिशें थीं। यदि कोई पेशे से सम्बन्धित जाति के नियमों के विरुद्ध जाता था तो उसको जाति में से निकाल दिया जाता था। इस तरह बन्द समाजों में पेशा व्यक्ति की योग्यता पर नहीं बल्कि जन्म के आधार पर प्राप्त होता था। परन्तु हमारे देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् बहुत से कारणों के कारण गतिशीलता की प्रक्रिया शुरू हुई जैसे कि आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण, शहरीकरण इत्यादि तथा धीरे-धीरे पेशे से सम्बन्धित गतिशीलता शुरू हो गई है। अब तो भारत जैसे बन्द समाजों में भी पेशे पर आधारित गतिशीलता शुरू हो गई है। लोग अब अपनी मर्जी तथा योग्यता के अनुसार पेशा अपनाने लग गए हैं। पेशे से सम्बन्धित पाबन्दियां बहुत ही कम हो गई हैं।

(ii) खुला समाज (Open Society)-खुले समाज के भीतर समूह कट्टर नहीं होते हैं। व्यक्ति को अपना कोई भी व्यवसाय अपनाने की स्वतन्त्रता होती है। वह कोई भी व्यवसाय स्वः इच्छा से अपना सकता है। ऐसे समाजों में ऊंची पदवी वाले व्यवसायों में श्रम की मांग में वृद्धि होने के कारण गतिशीलता भी बढ़ जाती है। परन्तु ऊंची पदवी केवल योग्य व्यक्तियों को ही प्राप्त होती है। यद्यपि अब मशीनों के बढ़ने के कारण मजदूरों की मांग कम हो गई है। परन्तु तकनीकी शिक्षा प्राप्त व योग्य कर्मियों (कर्मचारियों) की मांग अब तक भी है। इस प्रकार तकनीकी शिक्षा प्राप्त योग्य व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर अब बढ़ रहे हैं। लोग अलग-अलग कार्यों को अपना रहे हैं जिस कारण समाजों में गतिशीलता भी बढ़ रही है। इस तरह खुले समाजों में आधुनिकीकरण एवं औद्योगिकीकरण के कारण गतिशीलता भी बढ़ रही है।

खुले समाजों में व्यक्ति की जाति अथवा जन्म नहीं बल्कि उसकी योग्यता की महत्ता होती है। व्यक्ति में जिस प्रकार की योग्यता होती है वह उस प्रकार का पेशा अपनाता है। खुले समाजों में व्यक्ति की जाति का महत्त्व नहीं है कि उसने किस जाति में जन्म लिया है बल्कि महत्त्व इस बात का है कि उसमें किस कार्य को करने की योग्यता है। नाई का पुत्र बड़ा अफ़सर बन सकता है तथा अफसर का पुत्र कोई व्यापार कर सकता है। व्यक्ति अपनी मर्जी का पेशा अपना सकता है, उसके ऊपर किसी प्रकार का कोई बन्धन नहीं होता है कि वह किस प्रकार का पेशा अपनाए। वह अलग-अलग प्रकार की तकनीकी शिक्षा प्राप्त करके अलग-अलग प्रकार के पेशे अपना सकता है। कोई छोटा सा कोर्स करते ही व्यक्ति के लिए नौकरी प्राप्त करने के मौके बढ़ जाते हैं। लोग अलग-अलग पेशे अपना रहे हैं। कंपनियां अधिक वेतन तथा अच्छी स्थिति का प्रलोभन देती हैं जिस कारण लोग पुरानी नौकरी छोड़कर अधिक वेतन वाली नौकरी कर लेते हैं जिस कारण समाज में गतिशीलता बढ़ रही है। आधुनिकीकरण तथा औद्योगीकरण ने तो गतिशीलता को बहुत ही अधिक बढ़ा दिया है। इस तरह खुले समाजों में पेशे के आधार पर गतिशीलता बहुत अधिक बढ़ रही है।

3. आय (Income)—व्यक्ति की आय गतिशीलता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। व्यक्ति की आय उसकी सामाजिक स्थिति को ऊंचा व निम्न रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अपनाती है। जिसकी आय अधिक होती है उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक होती है। परन्तु जिसकी आय कम होती है उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी कम होती है।

आजकल का समाज वर्ग प्रणाली पर आधारित है। इस प्रणाली में धन एवं आय की महत्ता अधिक है। व्यक्ति अपनी योग्यता के कारण सामाजिक स्तरीकरण में ऊंचा स्थान प्राप्त करता है। व्यक्ति अपने आपके साथ, अपनी आर्थिक स्थिति अन्य लोगों के मुकाबले सुधार लेता है और अपनी जीवन शैली भी बदल लेता है। खुले समाजों में अधिक आय वाले को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सामाजिक वर्ग के निर्धारण हेतु आय एक महत्त्वपूर्ण कारक है। आमदनी (आय) के कारण ही व्यक्ति अपनी जीवन शैली बढ़िया कर लेता है। अमीर व्यक्तियों के पास पैसा तो काफ़ी अधिक होता है। परन्तु उनके जीवन शैली भिन्न-भिन्न प्रकार की हो सकती है। नये बने अमीरों को अमीरों की जीवन शैली सीखने में काफ़ी समय लग जाता है। चाहे वह व्यक्ति स्वयं अमीरों की जीवन शैली न सीख सके। परन्तु उसके बच्चे अवश्य अमीरों की शैली सीख जाते हैं। इस प्रकार अमीर व्यक्ति के बच्चों का सामाजिक जीवन स्तर काफ़ी ऊंचा उठ जाता है। धन के कारण उसके बच्चे अमीरों की जीवन शैली अपना लेते हैं और उनके बच्चों को यह शैली विरासत में मिल जाती है।

इस प्रकार आमदनी के तरीकों से ही सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। एक व्यापारी की कमाई को इज्जत प्राप्त होती है। परन्तु एक वेश्या या स्मगलर के द्वारा कमाये धन को इज्ज़त की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। आय में वृद्धि के साथ व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा, वर्ग, रहने-सहने का तरीका बदल लेता है जिस कारण सामाजिक गतिशीलता भी बढ़ती है।

व्यक्ति की आय बढ़ने से उसकी स्थिति में अपने आप ही परिवर्तन आ जाता है। लोग उसको इज्जत की नज़रों से देखना शुरू कर देते हैं। लोगों की नज़रों में अब वह एक अमीर आदमी बन जाता है तथा उसको समाज में प्रतिष्ठा हासिल हो जाती है। परन्तु एक बात ध्यान रखने वाली है कि आमदनी प्राप्त करने के ढंग समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होने चाहिए, गैर-मान्यता प्राप्त नहीं। पैसा आने से तथा आय बढ़ने से व्यक्ति अपने आराम की चीजें खरीदना शुरू कर देता है-जिससे उसके रुतबे तथा सामाजिक स्थिति में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हो जाती है। वह अपना जीवन ऐश से जीना शुरू कर देता है। इस तरह आय बढ़ने से उसकी समाज में स्थिति निम्न से उच्च हो जाती है तथा यह ही गतिशीलता का सूचक है।
इस तरह इस व्याख्या से स्पष्ट है कि शिक्षा, पेशा तथा आय सामाजिक गतिशीलता के प्रमुख सूचक हैं।

PSEB 12th Class Sociology Solutions Chapter 4 वर्ग असमानताएं

वर्ग असमानताएं PSEB 12th Class Sociology Notes

  • हमें हमारे समाज में कई सामाजिक समूह मिल जाएंगे जो अन्य समूहों से अधिक अमीर, इज्ज़तदार तथा शक्तिशाली होते हैं। यह अलग-अलग समूह समाज के स्तरीकरण का निर्माण करते हैं।
  • प्रत्येक समाज में बहुत से वर्ग होते हैं जो अलग-अलग आधारों के अनुसार निर्मित होते हैं तथा यह एक-दूसरे से किसी न किसी आधार पर अलग होते हैं।
  • कार्ल मार्क्स ने चाहे वर्ग की परिभाषा कहीं पर भी नहीं दी है परन्तु उसके अनुसार समाज में दो प्रकार के वर्ग होते हैं। पहला जिसके पास सब कुछ होता है (Haves) तथा दूसरा वह जिसके पास कुछ भी नहीं होता (Have nots)
  • वर्ग की कई विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह प्रत्येक स्थान पर पाए जाते हैं, इसमें स्थिति अर्जित की जाती है, यह खुला समूह होता है, आर्थिकता इसका प्रमुख आधार होता है, यह स्थायी होते हैं इत्यादि।
  • कार्ल मार्क्स का कहना था कि वर्गों में चेतनता होती है जिस कारण समाज के अलग-अलग वर्गों में वर्ग संघर्ष चलता रहता है।
  • मार्क्स के अनुसार अलग-अलग समय में अलग-अलग समाजों में दो प्रकार के समूह पाए जाते हैं। प्रथम वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं जिसे पूँजीपति कहते हैं। दूसरा वर्ग वह है जिसके पास अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता। उसे मज़दूर वर्ग कहते हैं।
  • मैक्स वैबर के अनुसार पैसा, शक्ति तथा प्रतिष्ठा असमानता के आधार हैं। वर्ग कई चीज़ों से जुड़ा होता है जैसे कि आर्थिकता, समाज में स्थिति तथा राजनीति में सत्ता। वैबर के अनुसार एक वर्ग के व्यक्तियों का जीवन जीने का ढंग एक जैसा ही होता है।
  • वार्नर ने अमेरिका में वर्ग व्यवस्था का अध्ययन किया तथा कहा कि तीन प्रकार के वर्ग होते हैं-उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग। यह तीनों वर्ग आगे जाकर उच्च, मध्य तथा निम्न में विभाजित होते हैं। वार्नर ने वर्ग संरचना की आय तथा धन के आधार पर व्याख्या की है।
  • अगर आजकल के समय में देखें तो वर्ग कई आधारों पर बनते हैं परन्तु शिक्षा, पेशा तथा आय इसके प्रमुख आधार हैं।
  • वर्ग तथा जाति एक-दूसरे से काफ़ी अलग होते हैं जैसे कि वर्ग एक खुली व्यवस्था है परन्तु जाति एक बंद वर्ग है, वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है परन्तु जाति में यह प्रदत्त होती है, वर्ग में गतिशीलता होती है परन्तु जाति में नहीं इत्यादि।
  •  वर्ग संघर्ष (Class Struggle)- यह एक प्रकार का तनाव है जो सामाजिक आर्थिक हितों तथा अलग-अलग समूहों के लोगों के हितों के कारण समाज में मौजूद होता है।
  • बुर्जुआ (Bourgeoisie)-यह एक प्रकार का सामाजिक वर्ग है जो उत्पादन के साधनों का मालिक होता है तथा जो अपने साधनों की सहायता से समाज के अन्य समूहों का आर्थिक शोषण करता है।
  • संभ्रांत वर्ग (Elite) यह उच्च विशिष्ट लोग होते हैं जो अपने समूह तथा समाज में नेता की भूमिका तथा रास्ता दिखाने की भूमिका निभाते हैं। उनकी भूमिका या नेतृत्व सामाजिक परिवर्तन को उत्पन्न करता है।
  • सर्वहारा (Proletariat)—पूँजीवादी समाज में इस शब्द को उस वर्ग के लिए प्रयोग किया जाता है जो श्रमिकों व औद्योगिक मजदूरों के लिए प्रयोग किया जाता है। इनके पास अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता।
  • सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)—इस शब्द को व्यक्तियों अथवा समूहों को अलग-अलग सामाजिक आर्थिक पदों पर जाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • दासत्व (Slavery)—यह सामाजिक स्तरीकरण का एक रूप है जिसमें कुछ व्यक्तियों के ऊपर अन्य व्यक्ति अपनी जायदाद की तरह स्वामित्व रखते हैं।
  • छोटे दुकानदार (Petty Bourgeoisie)—यह एक फ्रैंच शब्द है जो एक सामाजिक वर्ग के लिए प्रयोग किया
    जाता है जिसमें छोटे-छोटे पूँजीपतियों जैसे कि दुकानदार तथा वर्कर आ जाते हैं जो उत्पादन, विभाजन तथा वस्तुओं के विनिमय तथा बुर्जुआ मालिकों द्वारा स्वीकृत किए जाते हैं।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 12 सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ

Punjab State Board PSEB 9th Class Home Science Book Solutions Chapter 12 सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Home Science Chapter 12 सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ

PSEB 9th Class Home Science Guide सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी एक सहायक सफाईकारक पदार्थ का नाम लिखें।
उत्तर-
कपड़े धोने वाला सोडा।

प्रश्न 2.
साबुन बनाने के लिए जरूरी पदार्थ कौन-से हैं?
उत्तर-
साबुन बनाने के लिए चर्बी तथा खार आवश्यक पदार्थ हैं। नारियल, महुए, सरसों, जैतून का तेल, सूअर की चर्बी आदि चर्बी के रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। जबकि खार कास्टिक सोडा अथवा पोटाश से प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 3.
साबुन बनाने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?
उत्तर-
साबुन बनाने की दो विधियाँ हैं-(i) गर्म तथा (ii) ठण्डी विधि।

प्रश्न 4.
वस्त्रों में कड़ापन क्यों लाया जाता है?
उत्तर-

  1. वस्त्रों में ऐंठन लाने से यह मुलायम हो जाते हैं तथा इनमें चमक आ जाती है।
  2. मैल भी वस्त्र के ऊपर ही रह जाती है जिस कारण कपड़े को धोना आसान हो जाता
  3. वस्त्र में जान पड़ जाती है। देखने में मज़बूत लगता है।

PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 12 सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ

प्रश्न 5.
वस्त्रों से दाग उतारने वाले पदार्थों को मुख्य रूप से कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-
इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है

  1. ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच-इससे ऑक्सीजन निकलकर धब्बे को रंग रहित कर देती है। हाइड्रोजन पराऑक्साइड, सोडियम परबोरेट आदि ऐसे पदार्थ हैं।
  2. रिड्यूसिंग एजेंट-यह पदार्थ धब्बे से ऑक्सीजन निकालकर उसे रंग रहित कर देते हैं। सोडियम बाइसल्फाइट तथा सोडियम हाइड्रोसल्फेट ऐसे पदार्थ हैं।

प्रश्न 6.
साबुन और साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ में क्या अन्तर है?
उत्तर-

साबुन साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ
(1) साबुन प्राकृतिक तेलों जैसे नारियल, जैतून, सरसों आदि अथवा चर्बी जैसे सूभर की चर्बी आदि से बनता है। (1) साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ शोधक रासायनिक पदार्थों से बनता है।
(2) साबुन का प्रयोग भारी पानी में नहीं किया जा सकता। (2) इनका प्रयोग भारी पानी में भी किया जा सकता है।
(3) साबुन को जब कपड़े पर रगड़ा जाता है तो सफ़ेद-सी झाग बनती है। (3) इनमें कई बार सफ़ेद झाग नहीं बनती।

प्रश्न 7.
वस्त्रों को सफ़ेद करने वाले पदार्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
वस्त्रों को सफ़ेद करने वाले पदार्थ हैं-नील तथा टीनोपॉल अथवा रानीपॉल।
नील-नील दो प्रकार के होते हैं-

  1. पानी में घुलनशील तथा
  2. पानी में अघुलनशील नील। इण्डिगो, अल्ट्रामैरीन तथा प्रशियन नील पहली प्रकार के नील हैं। यह पानी के नीचे बैठ जाते हैं। इन्हें अच्छी तरह से मलना पड़ता है।
    एनीलिन दूसरी तरह के नील हैं। यह पानी में घुल जाते हैं।
    टीनोपॉल-यह भी सफ़ेद वस्त्रों को और सफ़ेद तथा चमकदार करने के लिए प्रयोग किये जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 8.
ठण्डी विधि द्वारा कौन-कौन सी वस्तुओं से साबुन कैसे तैयार किया जा सकता है? इसकी क्या हानियां हैं?
उत्तर-
ठण्डी विधि द्वारा साबुन तैयार करने के लिए निम्नलिखित सामान लोकास्टिक सोडा अथवा पोटाश-250 ग्राम महुआ अथवा नारियल तेल-1 लीटर पानी- 3/4 किलोग्राम मैदा- 250 ग्राम।
किसी मिट्टी के बर्तन में कास्टिक सोडा तथा पानी को मिलाकर 2 घण्डे तक रख दो। तेल तथा मैदे को अच्छी तरह घोल लो तथा फिर इसमें सोडे का घोल धीरे-धीरे डालो तथा मिलाते रहो। पैदा हुई गर्मी से साबुन तैयार हो जाएगा। इसको किसी सांचे में डालकर सुखा लो तथा चक्कियां काट लो।
हानियां-साबुन में अतिरिक्त खार तथा तेल और ग्लिसरॉल आदि साबुन में रह जाते हैं। अधिक खार वाले साबुन कपड़ों को हानि पहुँचाते हैं।

प्रश्न 9.
साबुन किन-किन किस्मों में मिलता है?
उत्तर-
साबुन निम्नलिखित किस्मों में मिलता है

  1. साबुन की चक्की-साबुन चक्की के रूप में प्रायः मिल जाता है। चक्की को गीले वस्त्र पर रगड़कर इसका प्रयोग किया जाता है।
  2. साबुन का पाऊडर-यह साबुन तथा सोडियम कार्बोनेट का बना होता है। इसको गर्म पानी में घोलकर कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसमें सफ़ेद-सफ़ेद सूती वस्त्रों को अच्छी तरह साफ़ किया जाता है।
  3. साबुन का चूरा-यह बन्द पैकटों में मिलता है। इसको पानी में उबालकर सूती वस्त्र कुछ देर भिगो कर रखने के पश्चात् इसमें धोया जाता है। रोगियों के वस्त्रों को भी । कीटाणु रहित करने के लिए साबुन के उबलते घोल का प्रयोग किया जाता है।
  4. साबुन की लेस-एक हिस्सा साबुन का चूरा लेकर पाँच हिस्से पानी डालकर तब तक उबालो जब तक लेस-सी तैयार न हो जाये। इसको ठण्डा होने पर बोतलों में डालकर रख लो तथा ज़रूरत पड़ने पर पानी डालकर धोने के लिए इसे प्रयोग किया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
अच्छे साबुन की पहचान क्या है?
उत्तर-

  1. साबुन हल्के पीले रंग का होना चाहिए। गहरे रंग के साबुन में मिलावट भी हो सकती है।
  2. साबुन हाथ लगाने पर थोड़ा कठोर होना चाहिए। अधिक नर्म साबुन में ज़रूरत से अधिक पानी हो सकता है जो केवल भार बढ़ाने के लिए ही होता है।
  3. हाथ लगाने पर अधिक कठोर तथा सूखा नहीं होना चाहिए। कुछ घटिया किस्म के साबुनों में भार बढ़ाने वाले पाऊडर डाले होते हैं जो वस्त्र धोने में सहायक नहीं होते।
  4. अच्छा साबुन स्टोर करने पर, पहले की तरह रहता है, जबकि घटिया साबुनों पर स्टोर करने पर सफ़ेद पाऊडर-सा बन जाता है। इनमें आवश्यकता से अधिक खार होती है जोकि वस्त्र को खराब भी कर सकती है।
  5. अच्छा साबुन जुबान पर लगाने से ठीक स्वाद देता है जबकि मिलावट वाला साबुन जुबान पर लगाने से तीखा तथा कड़वा स्वाद देता है।

प्रश्न 11.
साबुन रहित प्राकृतिक सफ़ाईकारी पदार्थ कौन-से हैं?
उत्तर-
साबुन रहित प्राकृतिक, सफ़ाईकारी पदार्थ हैं-रीठे तथा शिकाकाई। इनकी फलियों को सुखा कर स्टोर कर लिया जाता है।

  1. रीठा-रीठों की बाहरी छील के रस में वस्त्र साफ़ करने की शक्ति होती है। रीठों की छील उतारकर पीस लो तथा 250 ग्राम छील को कुछ घण्टे के लिए एक लिटर पानी में भिगो कर रखो तथा फिर इन्हें उबालो वस्त्र तथा ठण्डा करके छानकर बोतलों में भरकर रखा जा सकता है। इसके प्रयोग से ऊनी, रेशमी वस्त्र ही नहीं अपितु सोने, चांदी के आभूषण भी साफ़ किये जा सकते हैं।
  2. शिकाकाई-इसका भी रीठों की तरह घोल बना लिया जाता है। इससे कपड़े निखरते ही नहीं अपितु उनमें चमक भी आ जाती है। इससे सिर भी धोया जा सकता है।

प्रश्न 12.
साबुन रहित रासायनिक सफ़ाईकारी पदार्थों से आप क्या समझते हो ? इनके क्या लाभ हैं?
उत्तर-
साबुन प्राकृतिक तेल अथवा चर्बी से बनते हैं जबकि रासायनिक सफ़ाईकारी शोधक रासायनिक पदार्थों से बनते हैं। यह चक्की, पाऊडर तथा तरल के रूप में उपलब्ध हो सकते हैं।
लाभ-

  1. इनका प्रयोग हर तरह के सूती, रेशमी, ऊनी तथा बनावटी रेशों के लिए किया जा सकता है।
  2. इनका प्रयोग गर्म, ठण्डे, हल्के अथवा भारी सभी प्रकार के पानी में किया जा सकता है।

प्रश्न 13.
साबुन और अन्य साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थों के अतिरिक्त वस्त्रों की । धुलाई के लिए कौन-से सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ प्रयोग किये जाते हैं?
उत्तर-
सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ निम्नलिखित हैं

  1. वस्त्र धोने वाला सोडा-इसको सफ़ेद सूती वस्त्रों को धोने के लिए प्रयोग किया जाता है। परन्तु रंगदार सूती वस्त्रों का रंग हल्का पड़ जाता है तथा रेशे कमजोर हो जाते हैं।
    यह रवेदार होता है तथा उबलते पानी में तुरन्त घुल जाता है। इससे सफ़ाई की प्रक्रिया में वृद्धि होती है। इसका प्रयोग भारी पानी को हल्का करने के लिए, चिकनाहट साफ़ करने तथा दाग़ उतारने के लिए किया जाता है।
  2. बोरैक्स (सुहागा)-इसका प्रयोग सफ़ेद सूती वस्त्रों के पीलेपन को दूर करने के लिए तथा चाय, कॉफी, फल, सब्जियों आदि के दाग उतारने के लिए किया जाता है। इसके हल्के घोल में मैले वस्त्र भिगोकर रखने पर उनकी मैल उगल आती है। इससे वस्त्रों में ऐंठन भी लाई जाती है।
  3. अमोनिया- इसका प्रयोग रेशमी तथा ऊनी कपड़ों से चिकनाहट के दाग दूर करने के लिए किया जाता है।
  4. एसिटिक एसिड-रेशमी वस्त्र को इसके घोल में खंगालने से इनमें चमक आ जाती है। इसका प्रयोग वस्त्रों से अतिरिक्त नील का प्रभाव कम करने के लिए भी किया जाता है। रेशमी, ऊनी वस्त्र की रंगाई के समय भी इसका प्रयोग किया जाता है।
  5. ऑग्जैलिक एसिड-इसका प्रयोग छार की बनी चटाइयों, टोकरियों तथा टोपियों आदि को साफ़ करने के लिए किया जाता है। स्याही, जंग, दवाई आदि के दाग उतारने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 14.
वस्त्रों से दागों का रंगकाट करने के लिए क्या प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
कपड़ों से दागों का रंगकाट करने के लिए ब्लीचों का प्रयोग होता है। ये दो प्रकार के होते हैं।

  1. ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच-जब इनका प्रयोग धब्बे पर किया जाता है, इसकी ऑक्सीजन धब्बे से क्रिया करके इसको रंग रहित कर देती है तथा दाग उतर जाता है। प्राकृतिक धूप, हवा तथा नमी, पोटाशियम परमैंगनेट, हाइड्रोजन पराक्साइड, सोडियम परबोरेट, हाइपोक्लोराइड आदि ऐसे रंग काट हैं।
  2. रिड्यूसिंग ब्लीच-जब इनका प्रयोग धब्बे पर किया जाता है तो यह धब्बे से ऑक्सीजन निकालकर इसको रंग रहित कर देते हैं। सोडियम बाइसल्फाइट, सोडियम हाइड्रोसल्फाइट ऐसे ही रंग काट हैं। ऊनी तथा रेशमी वस्त्रों पर इनका प्रयोग आसानी से किया जा सकता है।
    परन्तु तेज़ रंग काट से वस्त्र खराब भी हो जाते हैं।

प्रश्न 15.
वस्त्रों को नील क्यों दिया जाता है?
उत्तर-
सफ़ेद सूती तथा लिनन के वस्त्रों पर बार-बार धोने से पीलापन-सा आ जाता है। इसको दूर करने के लिए वस्त्रों को नील दिया जाता है तथा वस्त्र की सफ़ेदी बनी रहती है।

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प्रश्न 16.
नील की मुख्य कौन-कौन सी किस्में हैं?
उत्तर-
नील मुख्यतः दो प्रकार का होता है

  1. पानी मैं अघुलनशील नील-इण्डिगो, अल्ट्रामैरीन तथा प्रशियन नील ऐसे नील हैं। इसके कण पानी के नीचे बैठ जाते हैं, इसलिए वस्त्रों को देने से पहले नील वाले पानी में अच्छी तरह हिलाना पड़ता है।
  2. पानी में घुलनशील नील-इनको पानी में थोड़ी मात्रा में घोलना पड़ता है तथा इससे वस्त्र पर थोड़ा नीला रंग आ जाता है। इस तरह वस्त्र का पीलापन दूर हो जाता है। एनीलिन नील ऐसा ही नील है।

प्रश्न 17.
नील देते समय ध्यान में रखने योग्य बातें कौन-सी हैं?
उत्तर-

  1. नील सफ़ेद वस्त्रों को देना चाहिए रंगीन कपड़ों को नहीं।
  2. यदि नील पानी में अघुलनशील हो तो पानी को हिलाते रहना चाहिए नहीं तो वस्त्रों पर नील के धब्बे से पड़ जाएंगे।
  3. नील के धब्बे दूर करने के लिए वस्त्र को सिरके वाले पानी में खंगाल लेना चाहिए। (4) नील दिए वस्त्रों को धूप में सुखाने पर उनमें और भी सफ़ेदी आ जाती है।

प्रश्न 18.
नील देते समय धब्बे क्यों पड़ जाते हैं? यदि धब्बे पड़ जायें तो क्या करना चाहिए?
उत्तर-
अघुलनशील नील के कण पानी के नीचे बैठ जाते हैं तथा इस तरह वस्त्रों को नील देने से वस्त्रों पर कई बार नील के धब्बे पड़ जाते हैं। जब नील के धब्बे पड़ जाएं तो वस्त्र को सिरके के घोल में खंगाल लेना चाहिए।

प्रश्न 19.
वस्त्रों में कड़ापन लाने के लिए किन वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए निम्नलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है

  1. मैदा अथवा अरारोट-इसको पानी में घोलकर गर्म किया जाता है।
  2. चावलों का पानी-चावलों को पानी में उबालने के पश्चात् बचे पानी जिसको छाछ कहते हैं का प्रयोग वस्त्र में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  3. आलू-आलू काटकर पीस लिया जाता है तथा पानी में गर्म करके वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  4. गूंद-गूंद को पीसकर गर्म पानी में घोल लिया जाता है तथा घोल को पतले वस्त्र में छान लिया जाता है। इसका प्रयोग रेशमी वस्त्रों, लेसों तथा वैल के वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  5. बोरैक्स (सुहागा)-आधे लीटर पानी में दो बड़े चम्मच सुहागा घोल कर लेसों पर इसका प्रयोग किया जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 20.
वस्त्रों की धुलाई के लिए कौन-कौन से पदार्थ प्रयोग में लाए जा सकते हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 21.
किस प्रकार के वस्त्रों को सफ़ेद करने की आवश्यकता पड़ती है? वस्त्रों में कड़ापन किन पदार्थों के द्वारा लाया जा सकता है?
उत्तर-
सफ़ेद सूती तथा लिनन के वस्त्रों को बार-बार धोने पर इन पर पीलापन सा आ जाता है। इनका यह पीलापन दूर करने के लिए नील देना पड़ता है।

वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए निम्नलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है

  1. मैदा अथवा अरारोट-इसको पानी में घोलकर गर्म किया जाता है।
  2. चावलों का पानी-चावलों को पानी में उबालने के पश्चात् बचे पानी जिसको छाछ कहते हैं का प्रयोग वस्त्र में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  3. आलू-आलू काटकर पीस लिया जाता है तथा पानी में गर्म करके वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  4. गूंद-गूंद को पीसकर गर्म पानी में घोल लिया जाता है तथा घोल को पतले वस्त्र में छान लिया जाता है। इसका प्रयोग रेशमी वस्त्रों, लेसों तथा वैल के वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  5. बोरैक्स (सुहागा)-आधे लीटर पानी में दो बड़े चम्मच सुहागा घोल कर लेसों पर इसका प्रयोग किया जाता है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

रिक्त स्थान भरें

  1. साबुन वसा तथा …………………. के मिश्रण से बनता है।
  2. ………………. के बाहरी छिलके के रस में वस्त्रों को साफ़ करने की शक्ति होती है।
  3. अच्छा साबुन जीभ पर लगाने से ……………….. स्वाद देता है।
  4. सोडियम हाइपोक्लोराइट को …………………. पानी कहते हैं।
  5. सोडियम परबोरेट …………….. काट पदार्थ है।

उत्तर-

  1. क्षार,
  2. रीठों,
  3. ठीक,
  4. जैवले,
  5. आक्सीडाइजिंग।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
एक रिडयूसिंग काट पदार्थ का नाम लिखें।
उत्तर-
सोडियम बाइसल्फाइट।

प्रश्न 2.
पानी में अघुलनशील नील का नाम लिखें।
उत्तर-
इण्डिगो।

प्रश्न 3.
गोंद का प्रयोग किस कपड़े में कड़ापन लाने के लिए किया जा सकता
उत्तर-
वायल के वस्त्रों में।

प्रश्न 4.
रासायनिक साबुन रहित सफाईकारी पदार्थों में से कोई एक नाम बताएं।
उत्तर-
शिकाकाई।

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ठीक/ग़लत बताएं

  1. साबुन बनाने की दो विधियां हैं-गर्म तथा ठण्डी।
  2. हाइड्रोजन पराक्साइड, रिड्यूसिंग ब्लीच है।
  3. साबुन बनाने के लिए चर्बी तथा क्षार आवश्यक पदार्थ हैं।
  4. कपड़ों में अकड़ाव लाने वाले पदार्थ हैं – मैदा, अरारोट, चावलों का पानी आदि।
  5. सफेद कपड़ों को धुलने के बाद नील दिया जाता है।

उत्तर-

  1. ठीक
  2. ग़लत
  3. ठीक
  4. ठीक
  5. ठीक।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साबुन रहित प्राकृतिक, सफ़ाईकारी पदार्थ है
(A) रीठा
(B) शिकाकाई
(C) दोनों ठीक
(D) दोनों ग़लत।
उत्तर-
(C) दोनों ठीक

प्रश्न 2.
पानी में घुलनशील नील नहीं है
(A) इंडीगो
(B) अल्ट्रामैरीन
(C) परशियन नील
(D) सभी।
उत्तर-
(D) सभी।

प्रश्न 3.
कपड़ों में अकड़ाव लाने वाले पदार्थ हैं
(A) चावलों का पानी
(B) गोंद
(C) मैदा
(D) सभी।
उत्तर-
(D) सभी।

प्रश्न 4.
पानी में घुलनशील नील है
(A) एनीलीन
(B) इंडीगो
(C) अल्ट्रामैरीन
(D) परशियन नील।
उत्तर-
(A) एनीलीन

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साबुन बनाने की गर्म विधि के बारे बताओ।
उत्तर-
तेल को गर्म करके धीरे-धीरे इसमें कास्टिक सोडा डाला जाता है। इस मिश्रण को गर्म किया जाता है। इस तरह चर्बी अम्ल तथा ग्लिसरीन में बदल जाती है। फिर उसमें नमक डाला जाता है, इससे साबुन ऊपर आ जाता है तथा ग्लिसरीन, अतिरिक्त खार तथा नमक नीचे चले जाते हैं । साबुन में सुगन्ध तथा रंग ठण्डा होने पर मिलाये जाते हैं तथा चक्कियां काट ली जाती हैं।

प्रश्न 2.
कपड़ों को नील कैसे दिया जाता है?
उत्तर-
नील देते समय वस्त्र को धोकर साफ़ पानी से निकाल लेना चाहिए। नील को किसी पतले वस्त्र में पोटली बनाकर पानी में खंगालना चाहिए। वस्त्र को अच्छी तरह निचोड़कर तथा बिखेरकर नील वाले पानी में डालो तथा बाद में वस्त्र को धूप में सुखाओ।

प्रश्न 3.
वस्त्रों की सफ़ाई करने के लिए कौन-कौन से पदार्थों का प्रयोग किया जाता है? नाम बताओ।
उत्तर-
वस्त्रों की सफ़ाई करने के लिए निम्नलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है साबुन, रीठे, शिकाकाई, रासायनिक साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ (जैसे निरमा, रिन, लिसापोल आदि), कपड़े धोने वाला सोडा, अमोनिया, बोरैक्स, एसिटिक एसिड, ऑग्ज़ैलिक एसिड, ब्लीच, नील, रानीपॉल आदि।

प्रश्न 4.
ठण्डी विधि से साबुन बनाने का लाभ लिखें।
उत्तर-
ठण्डी विधि के लाभ

  1. इसमें मेहनत अधिक नहीं लगती।
  2. साबुन भी जल्दी बन जाता है।
  3. यह एक सस्ती विधि है।

सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ PSEB 9th Class Home Science Notes

  • साबुन चर्बी तथा खार के मिश्रण हैं।
  • साबुन दो विधियों से तैयार किया जा सकता है-ठण्डी विधि तथा गर्म विधि।
  • साबुन कई तरह के मिलते हैं-साबुन की चक्की, साबुन का चूरा, साबुन का पाऊडर, साबुन की लेस।
  • साबुन रहित सफाईकारी पदार्थ हैं-रीठे, शिकाकाई, रासायनिक साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ।
  • सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ हैं-कपड़े धोने वाला सोडा, अमोनिया, बोरेक्स, एसिटिक एसिड, ऑम्जैलिक एसिड।
  • रंग काट दो तरह के होते हैं-ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच तथा रिड्यूसिंग ब्लीच।
  • नील, टीनोपाल आदि का प्रयोग कपड़ों को सफ़ेद रखने के लिए किया जाता है।
  • नील दो तरह के होते हैं-घुलनशील तथा अघुलनशील पदार्थ।
  • कपड़ों में ऐंठन अथवा अकड़न लाने वाले पदार्थ हैं-मैदा अथवा अरारोट, चावलों का पानी, आलू , गोंद, बोरैक्स।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

Punjab State Board PSEB 8th Class Welcome Life Book Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Welcome Life Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

Welcome Life Guide for Class 8 PSEB बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान InText Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
आपका कृतज्ञता से क्या मतलब है?
उत्तर-
इसका अर्थ सम्मान दिखाना।

प्रश्न 2.
क्या हमें अपने बड़ों से विनम्र होना चाहिए जब हमें उनसे कुछ चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हमें हमेशा अपने बुजुर्गों के प्रति विनम्र रहना चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारे दादा-दादी की देखभाल केवल हमारे माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। यह कथन सही है या ग़लत?
उत्तर-
यह ग़लत है क्योंकि दादा-दादी की देखभाल परिवार के सभी सदस्यों की ज़िम्मेदारी है।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

प्रश्न 4.
क्या हमें अपना समय अपने बड़ों के साथ बिताना चाहिए?
उत्तर-
हाँ हमें अपने बुजुर्गों के साथ कुछ समय बिताना चाहिए क्योंकि वे हमें कई अच्छी बातें बता सकते हैं जो हमारे जीवन में हमारी मदद करेंगी।

प्रश्न 5.
हमारे दादा-दादी हमें कैसे उपयोगी बातें बता सकते हैं, भले ही वे जीवन जीने के आधुनिक तरीकों से अवगत न हों?
उत्तर-
जीवन से जुड़ी कई चीजें हैं जो नहीं बदली हैं। हमारे दादा-दादी ऐसी चीज़ों के लिए अधिक अनुभवी हैं। वे हमें अपने अनुभवों के बारे में बता सकते हैं। ये अनुभव हमें समान परिस्थितियों में हमारे कार्यों को तय करने में मदद करेंगे।

प्रश्न 6.
हमारे बुजुर्गों के बारे में ऐसी कौन-सी बातें हैं जो हमें हमेशा अपने दिमाग में रखनी चाहिए?
उत्तर-
आपको हमेशा उनके अनुभवों, कड़ी मेहनत, उनके प्रयासों, बलिदानों, संघर्षों और उनके सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में ध्यान में रखना चाहिए।

प्रश्न 7.
हमें हमेशा अपने बड़ों का आभारी क्यों होना चाहिए?
उत्तर-
हमें हमेशा अपने बुजुर्गों और माता-पिता के अथक प्रयासों के लिए आभारी होना चाहिए, जो कि हमेशा हमारी भलाई के लिए वह करते आए हैं और करते रहेंगे।

प्रश्न 8.
हम अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति अपना सम्मान कैसे दिखा सकते हैं?
उत्तर-
हम अपनी भावनाओं, दयालु शब्दों और प्यार और गर्मजोशी से भरे हमारे भावों के माध्यम से उनके प्रति अपना सम्मान दिखा सकते हैं।

प्रश्न 9.
क्यों हमारे बुजुर्ग हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर-
वे हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमारे लिए सबसे अच्छे मार्गदर्शक हैं।

प्रश्न 10.
क्या हमारे माता-पिता और दादा-दादी हमसे ज्यादा अनुभवी हैं?
उत्तर-
हां,हमारे माता-पिता और दादा-दादी हमसे ज्यादा अनुभवी हैं।

प्रश्न 11.
यदि किसी परिवार के साथ बड़े बुजुर्ग रहते हैं तो वह परिवार भाग्यशाली माना जाता है ऐसा क्यों?
उत्तर-
हां, क्योंकि बुजुर्ग अधिक अनुभवी होने के कारण कठिन परिस्थितियों में हमारी मदद कर सकते हैं और वे हमें उस कठिन परिस्थिति से बाहर आने के लिए हमारी कार्रवाई के बारे में मार्गदर्शन कर सकते हैं।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सी बेहतर स्थिति है? (i) बड़ों बुजुर्गों के साथ रहना। (ii) बड़ों बुजुर्गों के बिना रहना
उत्तर-
बड़ों बुजुर्गों के साथ रहना बेहतर स्थिति है।

प्रश्न 13.
आप अपने बड़ों से प्यार करते हैं यह दिखाने के कुछ तरीके बताएं।
उत्तर-
निम्नलिखित ऐसे तरीके हैं जो यह संकेत करते हैं कि हम अपने बड़ों से प्यार करते हैं

  1. उनके साथ क्वालिटी टाइम बिताकर
  2. उनकी बात मानकर।

प्रश्न 14.
क्या हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभारी होना चाहिए?
उत्तर-
हां, हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभारी होना चाहिए।

प्रश्न 15.
हमें अपने दादा-दादी का आभारी क्यों होना चाहिए?
उत्तर-
हमें अपने दादा-दादी के प्रति आभारी होना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमारे माता-पिता का पालन-पोषण अच्छे तरीके से किया। परिणामस्वरूप हमें ऐसे प्यारे और देखभाल करने वाले माता-पिता मिलते हैं।

प्रश्न 16.
जब हमें समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो तो हमें अपने बड़ों से सलाह लेनी चाहिए?
उत्तर-
हां, हमें अपने बड़ों से सलाह अवश्य लेनी चाहिए क्योंकि वे अधिक अनुभवी होने के कारण निश्चित रूप से जानते होंगे कि ऐसी स्थितियों में क्या किया जाना चाहिए।

प्रश्न 17.
परिवार में परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए सबसे ज्यादा कौन चिंतित होता है?
उत्तर-
परिवार में बुजुर्ग लोग विशेषकर माता-पिता और दादा-दादी परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए अधिक चिंतित होते हैं।

प्रश्न 18.
कक्षा में प्रथम स्थान पर आने के लिए एक छात्र की कौन मदद करता है?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी मुख्य बल हैं जो कक्षा में एक छात्र को प्रथम स्थान पर लाने में मदद करते है।

प्रश्न 19.
बच्चों की भलाई के लिए कौन बलिदान करता है?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी परिवार में बच्चों की बेहतरी के लिए कोई भी त्याग कर सकते हैं।

प्रश्न 20.
हमारा सबसे अच्छा समर्थक कौन है?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी हमारे सबसे अच्छे समर्थक हैं।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
अच्छे गणों का क्या मतलब है? एक अच्छे व्यक्ति का उत्कृष्ट गुण क्या है?
उत्तर-
गुणों (सदाचार) का अर्थ है गुण। अच्छे गुणों का मतलब है अच्छे गुण । एक अच्छे व्यक्ति का उत्कृष्ट गुण परिवार में माता-पिता, दादा-दादी और अन्य बुजुर्ग लोगों का प्यार करना, आदर करना, आभार और देखभाल करना है।

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प्रश्न 2.
अपने माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करने के क्या फायदे हैं?
उत्तर-
अपने माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करने के मुख्य लाभ हैं:

  1. माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करने से हमें इस बात की संतुष्टि मिलती है कि उन्होंने हमें बड़ा करने के लिए जो मेहनत कि हम उसके लिए उनका कुछ हद तक भुगतान कर रहे हैं।
  2. जब वे खुश हो जाते हैं ते वे हमें आशीर्वाद देते हैं और परिवार के सदस्यों का आशीर्वाद खासकर माता पिता और दादा-दादी हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रश्न 3.
हमारे माता-पिता और दादा-दादी का मस्मान करने के क्या फायदे हैं?
उत्तर-
हमारे माता-पिता और दादा-दादी का सम्मान करने से हम अच्छे इंसान बनते हैं। यह एक अच्छे समाज का निर्माण भी करता है। इसके अलावा, अपने माता-पिता का सम्मान करके हम उन्हें बताते हैं कि हम उनके बलिदानों और उनके द्वारा किए गए प्रयासों को जानते हैं और अभी भी हमारे जीवन को आसान और आरामदायक बना रहे हैं।

प्रश्न 4.
हमारे दादा-दादी को यह बताने के तरीके क्या हैं कि हम उनसे प्यार करते हैं?
उत्तर-
ऐसे कई तरीके और साधन हैं जिनके द्वारा हम अपने दादा-दादी को दिखा सकते हैं कि हम उनसे प्यार करते हैं। इनमें से कुछ है :

  1. सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा करके।
  2. हमारी सफलता उन्हें समर्पित करके।
  3. उनके साथ गुणवत्ता समय (क्वालिटी टाइम) बिताकर।
  4. उन्हें ध्यान से सुनने और जीवन में विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने के बारे में उनके निर्देशों का पालन करते हुए।

प्रश्न 5.
हमारे माता-पिता हमारे लिए भगवान के समान हैं। इस कथन को सही साबित करें।
उत्तर-
यह सच है कि माता-पिता हमारे लिए भगवान के समान हैं। यह विश्वास करने के लिए हमें हमेशा उनके अनुभवों, कड़ी मेहनत, उनके प्रयासों, बलिदानों, संघर्षों और उनके सामने आने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखना चाहिए। इन कारणों से हमें सदैव उनके कल्याण के लिए किए गए अथक प्रयासों के लिए उनका आभारी होना चाहिए। उन्हें चुकाने के लिए हम अपनी भावनाओं, दयालु शब्दों और प्यार और गर्मजोशी से भरे भावों के माध्यम से उनके प्रति अपना सम्मान व्यक्त कर सकते हैं।

प्रश्न 6.
माता-पिता जैसे दादा-दादी भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं क्यों?
उत्तर-
हम जानते हैं कि माता-पिता हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे सबसे अच्छे मार्गदर्शक हैं और हमें वे सभी चीजें प्रदान करते हैं, जो कि हमें जीवन जीने के लिए और अपने जीवन में प्रगति करने की आवश्यक है। हालाँकि, दादा-दादी भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। यह सच है क्योंकि सबसे पहले उन्होंने हमारे माता-पिता को जीवन में इस स्तर तक पहुँचने में मदद की है। वे अनुभवी हैं और उन्होंने हमारे माता-पिता को अपने जीवन का आकार देने के लिए मार्गदर्शन किया है। समय के साथ वे अधिक अनुभवी हो गए हैं और वे कठिन परिस्थितियों को जीतने के लिए बेहतर तरीके से मार्गदर्शन कर सकते हैं। उनके पास अधिक समय है और इस तरह वे हमारी बात सुनेंगे और हमारी समस्याओं के समाधान के लिए कई तरह से हमारी मदद करेंगे।

प्रश्न 7.
यदि आपके दादा-दादी बीमार हैं तो आपको क्या करना चाहिए?
उत्तर-
यदि हमारे दादा-दादी बीमार हैं तो हम निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं

  1. हमें उनके पास बैठना चाहिए और उन छोटी-छोटी चीज़ों का ध्यान रखना चाहिए जिनकी उन्हें ज़रूरत थी।
  2. हम उन्हें समय पर पौष्टिक आहार दे सकते हैं।
  3. डॉक्टर द्वारा निर्धारित समय पर हम उन्हें दवा दे सकते हैं।
  4. हम उन्हें शौचालय या बाथरूप जाने में मदद कर सकते हैं।
  5. यदि वे चाहें तो हम उनसे बात कर सकते हैं।
  6. हम उन्हें बाहर बगीचे में घुमाने ले जा सकते हैं ताकि उनका मन बहल जाए।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभार और सम्मान दिखाने के विभिन्न तरीकों का वर्णन करें।
उत्तर-
हमारे माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभार और सम्मान दिखाने के तरीके निम्नलिखित हैं

  1. हमें उन चीजों के लिए उनकी सहायता करनी चाहिए जो वे प्रभावी रूप से नहीं कर सकते हैं।
  2. हम उन्हें घर में मौजूद आधुनिक यंत्रों (गैजेट्स) के बारे में बता सकते हैं।
  3. हमें उनसे सम्मानपूर्वक और विनम्र तरीके से बात करनी चाहिए।
  4. हमें हमेशा नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करनी चाहिए।
  5. हमें उनके साथ कुछ क्वालिटी टाइम (गुणवत्ता समय) बिताना चाहिए। उनके दौरान हमें उनकी बातों को सुनना चाहिए और हमें अपने अनुभव भी उनके साथ साझा करने चाहिए।
  6. हमारे आस-पास, शहर या देश में क्या हो रहा है, इसके बारे में उन्हें अद्यतन (अपडेट) रखने के लिए हम उनके लिए अच्छी कहानियां और समाचार-पत्र पढ़ सकते हैं।
  7. हमें सभी शिष्टाचार में उन्हें सम्मान दिखाना चाहिए।
  8. हमें उनके भोजन और दवाओं का ध्यान रखना चाहिए।
  9. हमें अक्सर उन्हें बताना चाहिए कि जब हमें उनकी ज़रूरत होती है तो हमेशा हमारे साथ वहां रहने के लिए हम उनके आभारी होते हैं।
  10. हमें उनका हमेशा आज्ञाकारी होना चाहिए और उनके आदेशों की अवहेलना करने का कभी प्रयास नहीं करना चाहिए।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

प्रश्न 2.
आप यह कैसे प्रमाणित करेंगे कि हमारे माता-पिता और दादा-दादी हमारे सबसे बड़े सहायक हैं?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी हम सभी के लिए सबसे बड़ा सहारा हैं। यह निम्नलिखित तथ्यों की सहायता से सिद्ध किया जा सकता है:

  1. वे हमारी बुनियादी ज़रूरतों जैसे भोजन, कपड़े, आश्रय आदि का अच्छे से ध्यान रखते हैं।
  2. वे हमारी शिक्षा के लिए आवश्यक धन प्रदान करते हैं।
  3. वे हमारी पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में हमारी मदद करते हैं।
  4. वे हमारी उपलब्धियों के लिए हमारी प्रशंसा करते हैं।
  5. जब हम गलती करते हैं, तो वे हमें न केवल उन्हें दोहराने से हमें रोकते हैं बल्कि हमारा मार्गदर्शन भी करते हैं कि हम इन गलतियों को फिर से करने से कैसे बच सकते हैं?
  6. वे हमें अपना निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं।
  7. वे विभिन्न महत्त्वपूर्ण चीजों के लिए अनुसूची बनाने में हमारी मदद करते हैं और इसका सख्ती से पालन करते हैं।

प्रश्न 3.
माता-पिता और दादा-दादी सभी के जीवन में सबसे सम्मानित व्यक्ति होते हैं। आप इसे कैसे उचित ठहराएंगे?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी सभी के जीवन में सबसे सम्मानित व्यक्ति होते हैं। हम इसे इस आधार पर उचित ठहराएंगे कि हम हर साल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मातृ दिवस, पिता दिवस और दादा-दादी दिवस मनाते हैं हम हर साल 9 मई को मातृ दिवस (मदर्स डे) मनाते हैं। यह दिन हमारे जीवन में माँ की भूमिका के बारे में याद दिलाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन हम एक माँ और उसके बच्चे के बीच के बंधन के बारे में याद करते हैं और हमारे जीवन में उनके प्रभाव और योगदान के प्रति आभार प्रकट करते हैं। हम हर साल 20 मई को पिता दिवस मनाते हैं। इस दिन हम एक पिता और उसके बच्चे के बीच के बंधन के बारे में याद करते हैं और हमारे जीवन में उनके प्रभाव और योगदान के प्रति आभार प्रकट करते हैं।
हम हर साल 13 सितंबर को दादा-दादी दिवस मनाते हैं। सन् 2020 में भारत में यह दिवस 9 सितंबर को मनाया गया। यह दिन हमें अपने जीवन में दादा-दादी की भूमिका के बारे में याद दिलाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन हम दादा-दादी और उनके पोते के बीच के बंधन के बारे में याद करते हैं और हमारे जीवन में उनके प्रभाव और योगदान के लिए आभार प्रकट करते हैं।

प्रश्न 4.
आप यह दिखाने के लिए क्या करते हैं कि आप अपने बड़ों का सम्मान करते हैं और उनके प्रति आभारी हैं?
उत्तर-
मैं यह दिखाने के लिए कि मैं अपने बड़ों की देखभाल और उनका सम्मान करता हूं के लिए निम्नलिखित कार्य करता हूँ। अपने कार्यों से मैं यह दिखाने की कोशिश करता हूँ कि मैं सर्वशक्तिमान का आभारी हैं:

  1. मैं अपने माता-पिता और दादा-दादी को हर रोज़ सुप्रभात और शुभ रात्रि की शुभकामनाएं देता हूँ।
  2. स्कूल से आने के बाद मैं उनके साथ कुछ समय बिताता हूँ और स्कूल में होने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी साझा करता हूं।
  3. हम सभी रात का खाना एक साथ बैठकर खाते हैं और दिन की घटनाओं के बारे में बात करते हैं।
  4. मैं हमेशा सोने से पहले आपने दादा-दादी के साथ बैठता हूँ, उनके साथ वक्त बिताता हूं और भनिष्य में अपने कार्यों के बारे में सलाह लेने के लिए उनकी बातें सुनता और समझता हूँ और उन पर अमल करता हूं।
  5. मैं उनके जीवन के सभी महत्त्वपूर्ण दिन मनाता हूँ जैसे उनके जन्मदिन, उनकी वर्षगांठ आदि।
  6. मैं उनकी दवाओं का रिकॉर्ड रखता हूँ और यह सुनिश्चित करता हूँ कि वे अपनी दवाओं को खाना ना भूलें।
  7. छुट्टियों में मैं अपने दादा-दादी के साथ पास के पार्क में जाता हूँ।
  8. मैं अपने दादा-दादी के साथ कुछ इनडोर गेम भी खेलता हूँ।
  9. मैं उनकी पसंद का संगीत बजाता हूँ और उनके बचपन के दिनों के बारे में बात करना पसंद करता हूँ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
हमें हमेशा
(क) परिवार के बड़े बुजुर्गों से प्यार करना चाहिए
(ख) परिवार के बड़े बुजुर्गों का आदर करना चाहिए
(ग) परिवार के बड़े बुजुर्गों की बात को ध्यान से सुनना चाहिए
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 2.
हमारा बुजुर्गों के प्रति सम्मान दिखाना और उनके प्रति आभारी होना एक …………
(क) ज़रूरी नहीं
(ख) उत्कृष्ट गुण
(ग) समय की बर्बादी
(घ) सभी।
उत्तर-
(ख) उत्कृष्ट गुण।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

प्रश्न 3.
हमें अपने बड़ों के प्रति आभारी होना चाहिए क्योंकि वे हमारे कल्याण के लिए ……… अथक प्रयास करते हैं।
(क) हमेशा
(ख) किसी खास मौके पर
(ग) जब ज़रूरत हो
(घ) कभी नहीं।
उत्तर-
(क) हमेशा।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा हमारे बुजुर्गों के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने का तरीका है?
(क) विनम्रता से बोलना
(ख) दैनिक कार्यों में उनकी मदद करना
(ग) अच्छे से देखभाल करना।
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा हमारे बुजुर्गों के प्रति सम्मान दिखाने का सबसे अच्छा तरीका है?
(क) उनके साथ गुणवत्ता समय बिता कर
(ख) उन्हें बाज़ार ले जाकर
(ग) उन्हें सिनेमा ले जाकर
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) उनके साथ गुणवत्ता समय बिताकर।

प्रश्न 6.
हमें अपने बड़े बुजुर्गों की देखभाल करनी चाहिए क्योंकि-
(क) उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया है।
(ख) वे हमसे बहुत पहले पैदा हुए थे।
(ग) वे उस दौर में पैदा हुए थे जब कोई भी आधुनिक साधन नहीं थे।
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(क) उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया है।

प्रश्न 7.
हमें अपने बड़े बुजुर्गों के लिए ………… महसूस करना चाहिए।
(क) अच्छा
(ख) बुरा
(ग) गर्व
(घ) क तथा ग।
उत्तर-
(घ) (क) तथा (ग)।

प्रश्न 8.
हमारे माता-पिता और बड़ों की सहायता करना उनके लिए हमारे ………. को व्यक्त करने का एक तरीका है।
(क) प्यार
(ख) आदर
(ग) सम्मान
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 9.
अपने बड़ों की अच्छी देखभाल करना, उन्हें प्यार करना तथा उनको सम्मान देना हमारा ………. है।
(क) काम
(ख) कर्त्तव्य
(ग) व्यापार
(घ) शिक्षा।
उत्तर-
(ख) कर्तव्य।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

प्रश्न 10.
कथन (क) हमें अपने माता-पिता के प्रति ईमानदार होना चाहिए।
कथन (ख) जब हमारे माता-पिता बूढ़े व कमजोर हो जाते हैं तब हमें उनका ध्यान रखना चाहिए उपरोक्त लिखे कथनों में से कौन सा कथन सही हैं
(क) कथन क सही और ख गलत है
(ख) कथन क गलत और ख सही है
(ग) दोनों कथन सही हैं
(घ) दोनों कथन गलत हैं।
उत्तर-
(क) कथन क सही और ख गलत है।

प्रश्न 11.
हमें अपने बुजुर्गों के जीवन के विशेष दिन मनाने चाहिए इससे उन्हें …….. मिलेगी।
(क) दुःख
(ख) खुशी
(ग) गुस्सा
(घ) सभी।
उत्तर-
(ख) खुशी।

प्रश्न 12.
हमारे बुजुर्गों ने हमें बड़ा करने व पालन-पोषण में बहुत कष्ट झेले हैं। हम उनका यह ऋण चुका सकते हैं
(क) उन्हें प्यार दिखा कर
(ख) उन्हें सम्मान देकर
(ग) दोनों (क) व (ख) विकल्प
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(ग) दोनों (क) व (ख) विकल्प।

रिक्त स्थान भरो:

  1. अपने बुजुर्गों के प्रति सम्मान दिखाना और उनके प्रति आभारी होना एक ………….. है।
  2. हमें हमेशा अपने बुजुर्गों, अपने दादा-दादी और माता-पिता का …………. करना चाहिए।
  3. हमें अपने दादा-दादी और माता-पिता के प्रति अपने नि:स्वार्थ प्रेम और ……….. को व्यक्त करना चाहिए।
  4. हमें अपने बड़ों के साथ …………… बिताना चाहिए।
  5. हमें हमेशा अपने दादा-दादी और माता-पिता का ………… होना चाहिए।
  6. हमें अपने दादा-दादी और माता-पिता के यादगार बचपन की घटनाओं को ……….. चाहिए।
  7. हमारे ………… ने हमें आगे बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया है।
  8. हमारे …….. ने हमारी भलाई के लिए कई बलिदान दिए हैं।
  9. हमें अपने बड़ों से हमेशा ………… और ………. तरीके से बात करनी चाहिए।
  10. हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी की ………….. नहीं करनी चाहिए।

उत्तर-

  1. उत्कृष्ट गुण
  2. सम्मान
  3. कृतज्ञता
  4. वालिटी टाइम (गुणवत्ता समय)
  5. आभारी
  6. सुनना
  7. माता-पिता
  8. बुजुर्गों
  9. सम्मान, विनम्र
  10. अवज्ञा।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

सही/ग़लतः

  1. हमें अपने बुजुर्गों की बात नहीं माननी चाहिए क्योंकि वे आधुनिक जीवन के बारे में नहीं जानते हैं।
  2. हमारे दादा दादी ने हमारे लिए कुछ नहीं किया है।
  3. बड़ों के प्रति सम्मान दिखाना और उनकी देखभाल करना एक उत्कृष्ट गुण है।
  4. हमें अपने बुजुर्गों की सलाह ज़रूर सुननी चाहिए।
  5. हमें अपने बड़ों के साथ समय बिताकर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।
  6. दोस्तों के साथ खेलना हमारे बड़ों के साथ समय बिताने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
  7. हमारे माता-पिता और बड़ों की अवज्ञा करना अच्छा नहीं है।
  8. हमें अपने माता-पिता से सम्मानपूर्वक बात करनी चाहिए।
  9. हमें सभी बुजुर्गों की मदद करनी चाहिए।
  10. हमारे बुजुर्ग हमसे कम अनुभवी हैं।

उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. सही
  5. ग़लत
  6. गलत
  7. सही
  8. सही
  9. सही
  10. ग़लत।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र का दूसरे सामाजिक विज्ञानों, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र के साथ सम्बन्ध बताएं। (Textual Question)
(Explain the relationship of Political Science with other Social Sciences i.e. History, Economics, Sociology and Ethics.)
उत्तर-
राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य तथा राज्य के अन्दर रहने वाले नागरिक हैं। मनुष्य के जीवन के अनेक पहलू हैं-राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक इत्यादि। इन सब पहलुओं का अध्ययन अनेक शास्त्र करते हैं। जैसे-राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान इत्यादि। परन्तु मनुष्य की आर्थिक अवस्था का उसकी राजनीतिक अवस्था पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार धर्म का राजनीति पर प्रभाव पड़ता है अर्थात् व्यक्ति की विभिन्न अवस्थाओं का एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः राजनीतिशास्त्र का, जो मानव जीवन से सम्बन्धित है तथा समाजशास्त्र है, अन्य समाजशास्त्रों से सम्बन्ध होना स्वाभाविक है। डॉ० गार्नर के अनुसार, “सम्बन्धित विज्ञानों के बिना राजनीतिशास्त्र को समझना उतना ही कठिन है, जितना रसायन विज्ञान (Chemistry) के बिना जीव विज्ञान (Biology) को समझना या गणित (Mathematics) के बगैर यन्त्र विज्ञान (Mechanics) को।” राजनीति शास्त्र का समाज शास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान इत्यादि शास्त्रों से गहरा सम्बन्ध है। एक लेखक के शब्दों में-“ये सब शास्त्र एक फूल की पंखुड़ियों (Petals of flower) के समान हैं।”

राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। सीले (Seeley) ने इन दोनों में सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “बिना राजनीति विज्ञान के इतिहास का कोई फल नहीं। बिना इतिहास के राजनीति विज्ञान की कोई जड़ नहीं।”

बर्गेस (Burgess) ने दोनों के सम्बन्ध के बारे में लिखा है, “इन दोनों को अलग कर दो उनमें से एक यदि मृत नहीं तो पंगु अवश्य हो जाएगा और दूसरा केवल आकाश-पुष्प बनकर रह जाएगा।” (“Separate them and the one becomes a cripple, if not a corpse, the other a will of the wisp.”) फ्रीमैन (Freeman) के अनुसार, “इतिहास भूतकालीन राजनीति है और राजनीति वर्तमान इतिहास है।” (“History is nothing but past politics and politics is nothing but present History.”) इन विद्वानों के कथन से राजनीति तथा इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध का पता लगता है।

इतिहास की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of History to Political Science)—इतिहास से हमें बीती हुई घटनाओं का ज्ञान होता है। राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं। राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए, उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। यदि हम इंग्लैंड की संसद् तथा राजतन्त्र का वर्तमान स्वरूप जानना चाहते हैं तो हमें वहां के इतिहास का गहरा अध्ययन करना पड़ेगा। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीति क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का वर्णन इतिहास से प्राप्त होता है। राजनीति क्षेत्र के ये भूतकालीन कार्य एक प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बतलाने का कार्य करते हैं। भारत के इतिहास से पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। धार्मिक सहिष्णुता की नीति के आधार पर अकबर ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जबकि औरंगज़ेब की धर्मान्ध नीति के कारण मुग़ल साम्राज्य का पतन हो गया। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। भारत आजकल धर्म-निरपेक्ष नीति को अपनाए हुए है। अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आधार इतिहास है।

इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा और बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। भारतीय इतिहास में अकबर की सफलता और औरंगज़ेब की विफलता हमें राजनीतिक शिक्षा देती है। इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय और फ्रांस के लुई चौदहवें के निरंकुश राजतन्त्र हमें यह पाठ पढ़ाते हैं कि निरंकुश राज्य अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

कोई भी राजनीतिक संस्था अकस्मात् पैदा नहीं होती। उसका वर्तमान रूप शनैः-शनैः होने वाले क्रमिक विकास का फल है। किसी समय किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए संस्था का जन्म होता है और समयानुसार उसमें परिवर्तन भी आते रहते हैं और कई बार यह संस्था नया रूप भी धारण कर लेती है। इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन पर्यवेक्षण (Observation) विधि के द्वारा किया जाए जिसके लिए इतिहास का सहारा लेना अनिवार्य है। यह कहना उचित ही है कि इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा। ऐसे अध्ययन का दोष बताते हुए लॉस्की (Laski) कहता है, “हर प्रकार के काल्पनिक राजनीति शास्त्र का परास्त होना अनिवार्य ही है क्योंकि मनुष्य कभी भी ऐतिहासिक प्रभावों से उन्मुक्त नहीं हो सकते।” विलोबी (Willoughby) के शब्दों में “इतिहास राजनीति शास्त्र को तीसरी दिशा प्रदान करता है।” (“History gives the third dimension to Political Science …………”)

इतिहास को राजनीति शास्त्र की देन (Contribution of Political Science to History)—परन्तु इतिहास का ही राजनीति शास्त्र पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि इतिहास भी राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ हासिल करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। इतिहास में केवल युद्ध, विजयों तथा अन्य घटनाओं का ही वर्णन नहीं आता बल्कि इसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक घटनाओं का भी वर्णन आता है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाता है। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद आदि धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अपूर्ण है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य पार्टी, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, केबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन का भारत पर आक्रमण तथा पाकिस्तान के आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। लॉर्ड एक्टन ने राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “राजनीति इतिहास की धारा में उसी प्रकार इकट्ठी हो जाती है जैसे नदी की रेत में सोने के कण।”

राजनीति की इतिहास को एक महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और मॉण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्यक्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का सोवियत रूस की राज्यक्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

दोनों में अन्तर (Differences between the two)-राजनीतिक विकास तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है।

1. इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है (Scope of History is wider than the scope of Political Science)-फ्रीमैन के कथन से समहत होना कठिन है क्योंकि पूर्ण भूतकालीन इतिहास राजनीति नहीं है और वर्तमान राजनीति कल का इतिहास नहीं है। इतिहास में प्रत्येक घटना का वर्णन किया जाता है। इसका क्षेत्र व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी घटनाओं, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक का वर्णन आ जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राजनीतिक घटनाओं से होता है।

2. राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है, जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राजनीतिक संस्थाओं के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। राज्य कैसा था, कैसा है और कैसा होना चाहिए, इन तीनों का उत्तर राजनीति शास्त्र से मिलता है, परन्तु इतिहास में केवल बीती घटनाओं का ही वर्णन आता है।

3. इतिहास वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान विचारशील है- इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में इन घटनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है और इस मूल्यांकन के आधार पर निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रकार इतिहास वर्णनात्मक है परन्तु राजनीति शास्त्र विचारात्मक भी है।

4. इतिहासकार नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान के विद्वानों के लिए नैतिक निर्णय देना आवश्यक है-इतिहासकार केवल बीती हुई घटनाओं का वर्णन करता है। वह घटनाओं की नैतिकता के आधार पर परख करके कोई निर्णय नहीं देता है। उदाहरण के लिए, दिसम्बर 1971 में भारत का पाकिस्तान से युद्ध हुआ। इतिहासकार का कार्य केवल युद्ध की घटनाओं का वर्णन करना है। इतिहासकार का इस बात के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है कि युद्धबन्दियों के साथ कैसा व्यवहार किया गया, असैनिक आबादी पर बम बरसाए गए तो कोई अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। परन्तु राजनीति विज्ञान का विद्वान् युद्ध के नैतिक पहलू पर अपना निर्णय अवश्य देगा।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में अन्तर होते हुए भी घनिष्ठ सम्बन्ध है और इस विचार को सब विद्वान् मान्यता प्रदान करते हैं। गार्नर (Garmer) के शब्दों में, ‘अध्ययन विषय के तौर पर यह एक-दूसरे के सहायक व पूरक हैं।’

सीले (Seeley) ने इन दोनों को पूरक सिद्ध करने के लिए कहा है, “इतिहास के उदार प्रभाव के बिना राजनीति अशिष्ट है और राजनीति से अपने सम्बन्ध को भुला देने से इतिहास साहित्य मात्र रह जाता है।”

राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। प्राचीन काल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ (Political Economy) के नाम से प्रसिद्ध था। विद्वानों ने ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की परिभाषा इस प्रकार की है-“यह राज्य के लिए राजस्व (Revenue) जुटाने की एक कला है।” भारतीय विद्वान् चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया । इसी प्रकार राजनीति विज्ञान के कई मान्य ग्रन्थों जैसे अरस्तु की ‘Politics’ तथा लॉक की ‘नागरिक प्रशासन पर दो लेख’ (Two Treatises on Civil Government) में उन विषयों का विवेचन मिलता है, जिन्हें आजकल अर्थशास्त्र में शामिल किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन काल में दो शास्त्रों को एक माना जाता था, परन्तु 19वीं शताब्दी में एडम स्मिथ ने आर्थिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप को अनुचित बताया। एडम स्मिथ पहला विद्वान् था जिसने अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया। 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। अर्थशास्त्र का सम्बन्ध सम्पत्ति के उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा विनिमय सम्बन्धी मनुष्य की गतिविधियों से है।

यह ठीक है कि 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान माना गया है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में कोई सम्बन्ध नहीं। अब भी दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है और आपस में आदानप्रदान करते हैं।

अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science)-वर्तमान युग में मनुष्य तथा राज्य की मुख्य समस्याएं आर्थिक हैं। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। जब मनुष्य आखेट अवस्था में से गुज़र रहा था अर्थात् जब मनुष्य का पेशा शिकार करना था तब राज्य के उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं होता था क्योंकि उस समय मनुष्य एक स्थान पर नहीं रहता था। जब मनुष्य ने कृषि करना आरम्भ किया, इसके साथ ही मनुष्य को एक निश्चित स्थान पर रहना पड़ा, जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई। पहले सरकार पर बड़ेबड़े ज़मींदारों का प्रभाव होता था, परन्तु यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् सरकार पर उद्योगपतियों का प्रभाव हो गया है। आजकल हमारे देश में भी उद्योगपतियों का ही अधिक प्रभाव है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

व्यक्तिवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त हैं परन्तु इनका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में भी किया जाता है क्योंकि इन आर्थिक सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। चीन में साम्यवाद है। उत्पादन के साधनों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण है। सरकार की समस्त शक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के हाथ में ही हैं। अमेरिका में पूंजीवाद है, जिसके कारण वहां की सरकार संगठन तथा सरकार के उद्देश्य चीन की सरकार से भिन्न हैं। अतः आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार, उत्पादन के साधनों में परिवर्तन होने पर राजनीतिक परिवर्तन होना अनिवार्य है। कार्ल मार्क्स का यह कथन सर्वथा सत्य तो नहीं है परन्तु इतना अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आर्थिक परिवर्तन ही राजनीतिक परिवर्तन का मुख्य कारण भी होता है।

राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुई हैं उनके परिणामस्वरूप ही यूरोप के इन देशों में उपनिवेशवाद और समाजवाद की नीति अपनाई। इस सम्बन्ध में बिस्मार्क और जोज़फ चैम्बरलेन के कथन महत्त्वपूर्ण हैं। बिस्मार्क का कथन था, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं, बल्कि व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।” (“I want outside Europe…not provinces but commerical enterprises.”)

राजनीतिक क्षेत्र की अनेक मत्त्वपूर्ण घटनाएं आर्थिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में आज लोकतन्त्र को इतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि अमेरिका तथा इंग्लैंड में प्राप्त हुई है। भारत में सफलता न मिलने का मुख्य कारण लोगों की आर्थिक दशा है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है, अधिकारों तथा कर्तव्यों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर पाती। लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं। दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात् बहुत से देशों को अमेरिका से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी जिसका परिणाम यह हुआ कि उन देशों की नीतियों पर भी अमेरिका का प्रभाव पड़ा।

अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान की देन (Contribution of Political Science to Economics)-अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति विज्ञान से भी बहुत सहायता मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन-व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। सरकार की कर नीति, आयात-निर्यात नीति, विनिमय की दर, बैंक नीति, व्यापार तथा उद्योग सम्बन्धी कानून, सीमा शुल्क नीति आदि का राज्य की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपना कर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं हैं ताकि लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा किया जा सके। सरकार बड़े-बड़े उद्योगों को अपने हाथों में ले रही है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा।

युद्ध एक सैनिक और राजनीतिक क्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भारी प्रभाव पड़ता है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति में गिरावट होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण वियतनाम युद्ध रहा है। इसी प्रकार 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित किया है।

अतः इस विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में समानताएं (Points of Similarity between Economics and Political Science) अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में निम्नलिखित समानताएं पाई जाती हैं-

दोनों का विषय समाज में रह रहा मनुष्य है-समाज में रह रहा मनुष्य दोनों शास्त्रों का विषय है। दोनों का उद्देश्य मानव कल्याण है और उसी के लिए दोनों कार्य करते हैं।

दोनों ही आदर्शात्मक सामाजिक विज्ञान हैं-दोनों ही भूतकाल के आधार पर वर्तमान का विश्लेषण करके भविष्य के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में मानव जीवन के लिए ऐसे आदर्श स्थापित करते हैं जिनके द्वारा अधिक-से-अधिक मानव हित हो।

दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं- राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं।

दोनों में अन्तर (Difference between the two) राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार है

1. विभिन्न विषय-क्षेत्र (Different Subject Matter) राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इस विज्ञान का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। मनुष्य धन कैसे कमाता है, कैसे उसका उपयोग करता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर अर्थशास्त्र देता है। इस प्रकार दोनों का विषय-क्षेत्र अलग-अलग है।

2. दृष्टिकोण (Approach)—मिस्टर ब्राऊन (Mr. Brown) ने राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में भेद करते हुए लिखा है, “अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से। अर्थशास्त्र वस्तुओं की कीमतों का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान सदाचार सम्बन्धी मूल्यों का।” इस प्रकार अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक विज्ञान है।

3. अध्ययन पद्धति (Method of Study)—दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों तथा अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति विज्ञान के अध्ययन के अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है और इसके निष्कर्ष और सिद्धान्त अधिक सही होते हैं। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्र का सम्बन्ध मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं से है और इन आवश्यकताओं तथा इनकी पूर्ति का उल्लेख अंकों द्वारा दर्शाया जा सकता है। अर्थशास्त्र में मात्रात्मक आंकड़ों का संग्रह राजनीति विज्ञान की अपेक्षा अधिक सम्भव है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में भिन्नता होने के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में दोनों ही अपने उद्देश्यों की प्राप्ति एक-दूसरे के सहयोग और सहायता के बिना नहीं कर सकते। डॉ० गार्नर (Dr. Garner) ने ठीक ही कहा है, “बहुत-सी आर्थिक समस्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।” विलियम एसलिंगर (William Esslinger) के विचारानुसार, “अर्थशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र की एकता का पाठ्यक्रम उपकक्षा में पढ़ाया जाना चाहिए।”

राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन का शास्त्र है। समाज- शास्त्र समाज की उत्पत्ति, विकास, उद्देश्य तथा संगठन का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक इत्यादि का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में मानव जीवन के राजनीतिक पहलू का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की एक शाखा है। प्रसिद्ध विद्वान् रेटजनहाफर ने ठीक ही कहा है, “राज्य अपने विकास के प्रारम्भिक चरणों में एक सामाजिक संस्था ही थी।” हम आगस्ट काम्टे (August Comte) के इस कथन से सहमत हैं, “समाजशास्त्र सभी समाजशास्त्रों की जननी है।” राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान करते हैं। प्रो० कैटलिन (Catline) ने तो यहां तक कहा है, “राजनीति और समाजशास्त्र अखण्ड हैं और वास्तव में एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं।”

राजनीति विज्ञान को समाजशास्त्र की देन (Contribution of Sociology to Political Science) समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। बिना समाजशास्त्र के अध्ययन के राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों को समझना कठिन है। प्रो० गिडिंग्स (Prof. Giddings) ने ठीक ही कहा है, “समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना उसी प्रकार है जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान अथवा ऊष्मा गति की शिक्षा देना।” (“To teach the theory of the state to men who have not learned the first principles of sciology is like teaching Astronomy or Thermodynamics to men who have not learned Newton’s Laws of Motion.”) दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार बिना समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनजान व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। समाजशास्त्रों में समाज के रीति-रिवाजों का अध्ययन किया जाता है। हम जानते हैं कि राज्य के कानून का पालन तभी किया जाता है यदि वह समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार हो।

राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाज शास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मानव की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथसाथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology) राजनीति विज्ञान की एक शाखा पनप रही है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना आवश्यक है। इस प्रकार समाज शास्त्र का राजनीति शास्त्र पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

राजनीति विज्ञान की समाजशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Sociology)-परन्तु दूसरी ओर राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय राज्य हैराज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य का विकास कैसे हुआ, राज्य का उद्देश्य क्या है इन सब प्रश्नों का उत्तर राजनीति विज्ञान में मिलता है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के आपसी सम्बन्ध का एक प्रणाम यह है कि मॉरिस, गिन्सबर्ग, आगस्त काम्टे, लेस्टर वार्ड, समवर आदि समाजशास्त्रियों ने राज्य की प्रकृति और उद्देश्यों में इतनी रुचि दिखाई है, मानो वे समाजशास्त्र की मुख्य समस्याएं हों। इसी प्रकार डेविड ईस्टन, हैरल्ड लासवैल, ग्रेवीज ए० ऑल्मण्ड, पावेल, कोलमेन, मेक्स वेबर और राजनीति शास्त्र के अन्य आधुनिक विद्वानों द्वारा समाज शास्त्र से अधिक-से-अधिक मात्रा में अध्ययन सामग्री और अध्ययन पद्धतियां प्राप्त की गई हैं।

दोनों में अन्तर (Differences between the two) राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है-

दोनों के क्षेत्र अलग हैं-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र के क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीतिक शास्त्र का मुख्य विषय-क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र का मुख्य क्षेत्र समाज है।

राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र के क्षेत्र से संकुचित है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन कराता है जबकि समाजशास्त्र मनुष्य के सभी पहलुओं का अध्ययन कराता है।

राजनीति विज्ञान यह मानकर चलता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसमें हम यह अध्ययन नहीं करते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी क्यों है। परन्तु समाजशास्त्र में इस प्रश्न का भी अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना–राजनीति शास्त्र में समाज बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता जबकि समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन वहीं से शुरू होता है। समाजशास्त्र के अन्तर्गत मानव जाति के दोनों युगों-संगठित तथा असंगठित-का अध्ययन किया जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल संगठित युग का अध्ययन करता है।

समाजशास्त्र केवल भूत और वर्तमान से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि समाज शास्त्र में समाज के अतीत तथा वर्तमान का ही अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है-समाजशास्त्र समाज की उत्पत्ति तथा विकास का विस्तृत रूप से अध्ययन करता है, परन्तु इस अध्ययन के पश्चात् कोई परिणाम नहीं निकलता। यह केवल सामाजिक घटनाओं का वर्णन करता है। उन घटनाओं में अच्छी तथा बुरी घटनाओं की पहचान नहीं कराता। राजनति शास्त्र केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं करता बल्कि परिणाम भी निकालता है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना तथा आदर्श नागरिक पैदा करना है।

समाजशास्त्र में मनुष्य के चेतन (conscious) और अचेतन (unconscious) दोनों प्रकार के कार्यों का अध्ययन किया जाता है परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल चेतन प्रकार के कार्यों का ही अध्ययन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में अन्तर होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध न होकर पूरक हैं। राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं।

राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। नीतिशास्त्र साधारण मनुष्य की भाषा में वह शास्त्र है, जो अच्छे-बुरे में अन्तर स्पष्ट करता है। नीतिशास्त्र वह शास्त्र है जिसके द्वारा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, अहिंसा-हिंसा, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य तथा शुभ-अशुभ में अन्तर का पता चलता है। डीवी (Deewey) के अनुसार, “नीतिशास्त्र आचरण का वह विज्ञान है जिसमें मानवीय आचरण के औचित्य तथा अनौचित्य तथा अच्छाई तथा बुराई पर विचार किया जाता है।” नीतिशास्त्र के द्वारा हम निश्चित करते हैं कि मनुष्य का कौन-सा कार्य अच्छा है और कौनसा कार्य बुरा । यह शास्त्र नागरिकको आदर्श नागरिक बनाने में सहायक है। दूसरी ओर राज्य का मुख्य उद्देश्य भी आदर्श नागरिक बनाना है। इस प्रकार दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन यूनानी लेखकों प्लेटो तथा अरस्तु ने राजनीति शास्त्र को नीतिशास्त्र का ही एक अंग माना है। प्लेटो तथा अरस्तु के अनुसार, “राज्य एक सर्वोच्च नैतिक संस्था है। इसका उद्देश्य नागरिकों के नैतिक स्तर को ऊंचा करना है।” प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ (Republic) में राजनीति ही नहीं बल्कि नैतिक दर्शन भी भरा हुआ है। अरस्तु ने कहा था “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”

इटली के विद्वान् मैक्यावली ने सर्वप्रथम राजनीति तथा नीतिशास्त्र में भेद किया। इसके अनुसार राजा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह नैतिकता के नियमों के अनुसार शासन चलाए। आवश्यकता पड़ने पर अनैतिकता का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। मैक्यावली के अनुसार-राजा के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य राज्य की सुरक्षा है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की परवाह नहीं करनी चाहिए। हाब्स (Hobbes) ने भी मैक्यावली के विचारों का समर्थन किया। बोदीन (Bodin), ग्रोशियस (Grotius) तथा लॉक (Locke) ने भी इन दोनों शास्त्रों को अलग किया, परन्तु रूसो (Rouseau) ने फिर इन दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया। कांट (Kant), ग्रीन (Green) ने भी रूसो के मत का समर्थन किया।

नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Ethics to Political Science)-वर्तमान समय में इन दोनों शास्त्रों में गहरा सम्बन्धा समझा जाता है। महात्मा गांधी ने दोनों शास्त्रों को अभिन्न माना है। उनके अनुसारसरकार को अपनी नीति नैतिकता के सिद्धान्तों पर बनानी चाहिए। सरकार की नीतियों में असत्य, अधर्म, कपट तथा पाप इत्यादि की मिलावट नहीं होनी चाहिए। कॉक्स के मतानुसार, “जो बात नैतिक दृष्टि से गलत है, वह राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं हो सकती।” कोई भी सरकार ऐसे कानून पास नहीं कर सकती जो नैतिकता के विरुद्ध हों। यदि पास किए जाएंगे तो उनका विरोध होगा। इसके अतिरिक्त नैतिक नियम जो स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं, कानून का रूप धारण कर लेते हैं। गैटेल (Gettell) ने लिखा है, “जब नैतिक विचार स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं तो वे कानून का रूप ले लेते हैं।” लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने ठीक ही कहा है, “समस्या यह नहीं है कि सरकार क्या करती है बल्कि यह है कि उन्हें क्या करना चाहिए।” यदि राजनीति विज्ञान को नीतिशास्त्र से पृथक् कर दें तो यह निस्सार और निरर्थक हो जाएगी। उसमें प्रगतिशीलता और आदर्शता नहीं रह पाएगी। इसलिए लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने भी कहा है, “नीतिशास्त्र के अध्ययन के बिना राजनीति शास्त्र का अध्ययन विफल है।” इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान की अनेक शाखाएं आचार शास्त्र की नींव पर खड़ी हैं, जैसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है। आचार शास्त्र से संविधान भी प्रभावित होता है क्योंकि अनेक प्रकार के आदर्शों को संविधान में उचित स्थान देना अनिवार्य है। भारत और आयरलैंड के संविधान में हमें दिए गए राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व’ ही स्पष्ट उदाहरण है।

राजनीति विज्ञान की नीतिशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Ethics)—वर्तमान राज्य कल्याणकारी राज्य है। सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कई प्रकार के कानून बनाती है। इसके साथ ही सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है। भारत सरकार ने सती-प्रथा, दहेज-प्रथा, छुआछूत आदि बुराइयों को कानून के द्वारा रोकने का प्रयत्न किया है और काफ़ी सफलता भी मिली है। भारत सरकार अहिंसा के सिद्धान्तों पर चल रही है और इन्हीं सिद्धान्तों का प्रचार कर रही है। भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील की स्थापना की थी ताकि संसार के दूसरे देशों में भी अहिंसा का प्रचार किया जा सके। सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित हो सकती है। यदि राज्य शान्ति का वातावरण उत्पन्न न करे, तो नैतिक जीवन बिताना असम्भव हो जाएगा। इस प्रकार सरकार कानून द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करती है जिसमें नैतिकता विकसित हो सके। क्रोशे के मतानुसार, “नैतिकता अपनी पूर्णता और उच्चतम स्पष्टता राजनीति में ही पाती है।”

दोनों में अन्तर (Difference between the two)-राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी उन दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार हैं-

नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है जब कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्ध रखता है। नीतिशास्त्र मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है, परन्तु राजनीति विज्ञान मनुष्य के केवल बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।

राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि सरकार के किसी कानून का उल्लंघन कोई मनुष्य करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।

राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान इत्यादि का वर्णन करता है जबकि नीतिशास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।

राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है। नीतिशास्त्र वास्तविकता से बहुत दूर है। यह केवल काल्पनिक है।

राज्य के नियमों तथा नैतिकता के नियमों में सदैव एकरूपता नहीं होती। सड़क के दाईं ओर चलना राज्य के नियम के विरुद्ध है, परन्तु नैतिकता के विरुद्ध नहीं।

राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं, परन्तु इस शास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इस बात से है कि वे क्या हैं परन्तु नीतिशास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इससे है कि वे क्या होने चाहिएं।
राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र के सम्बन्ध और अन्तर दोनों को स्पष्ट करते हुए कैटलिन ने कहा, “नीतिशास्त्र से एक राजनीतिज्ञ यह सीखता है कि अनेक मार्गों में से कौन-सा मार्ग सही है और राजनीति विज्ञान बतलाता है कि व्यावहारिक दृष्टि से कौन-सा मार्ग अपनाना सम्भव होगा।”

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

निष्कर्ष (Conclusion)-नीतिशास्त्र और राजनीति विज्ञान में भले ही कई भिन्नताएं हैं, फिर भी इनकी समीपता से इन्कार नहीं किया जा सकता। नीतिशास्त्र राजनीति विज्ञान के अध्ययन को समृद्ध बनाता है और व्यावहारिक राजनीति को उदात्त बनाने (To ennoble) के लिए प्रेरित करता है। आजकल की व्यावहारिक राजनीति में भ्रष्टाचार के उदाहरण सर्वप्रसिद्ध हैं और इन भ्रष्टाचारी तरीकों ने समाज के हर पक्ष को दूषित कर दिया है। इस भ्रष्टाचार से बचने के साधन नीतिशास्त्र ही सुझा सकता है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान एवं इतिहास में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relation between Political Science and History.)
उत्तर-
राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। सीले (Seeley) ने इन दोनों में सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “बिना राजनीति विज्ञान के इतिहास का कोई फल नहीं। बिना इतिहास के राजनीति विज्ञान की कोई जड़ नहीं।”

बर्गेस (Burgess) ने दोनों के सम्बन्ध के बारे में लिखा है, “इन दोनों को अलग कर दो उनमें से एक यदि मृत नहीं तो पंगु अवश्य हो जाएगा और दूसरा केवल आकाश-पुष्प बनकर रह जाएगा।” (“Separate them and the one becomes a cripple, if not a corpse, the other a will of the wisp.”) फ्रीमैन (Freeman) के अनुसार, “इतिहास भूतकालीन राजनीति है और राजनीति वर्तमान इतिहास है।” (“History is nothing but past politics and politics is nothing but present History.”) इन विद्वानों के कथन से राजनीति तथा इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध का पता लगता है।

इतिहास की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of History to Political Science)—इतिहास से हमें बीती हुई घटनाओं का ज्ञान होता है। राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं। राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए, उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। यदि हम इंग्लैंड की संसद् तथा राजतन्त्र का वर्तमान स्वरूप जानना चाहते हैं तो हमें वहां के इतिहास का गहरा अध्ययन करना पड़ेगा। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीति क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का वर्णन इतिहास से प्राप्त होता है। राजनीति क्षेत्र के ये भूतकालीन कार्य एक प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बतलाने का कार्य करते हैं। भारत के इतिहास से पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। धार्मिक सहिष्णुता की नीति के आधार पर अकबर ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जबकि औरंगज़ेब की धर्मान्ध नीति के कारण मुग़ल साम्राज्य का पतन हो गया। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। भारत आजकल धर्म-निरपेक्ष नीति को अपनाए हुए है। अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आधार इतिहास है।

इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा और बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। भारतीय इतिहास में अकबर की सफलता और औरंगज़ेब की विफलता हमें राजनीतिक शिक्षा देती है। इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय और फ्रांस के लुई चौदहवें के निरंकुश राजतन्त्र हमें यह पाठ पढ़ाते हैं कि निरंकुश राज्य अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

कोई भी राजनीतिक संस्था अकस्मात् पैदा नहीं होती। उसका वर्तमान रूप शनैः-शनैः होने वाले क्रमिक विकास का फल है। किसी समय किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए संस्था का जन्म होता है और समयानुसार उसमें परिवर्तन भी आते रहते हैं और कई बार यह संस्था नया रूप भी धारण कर लेती है। इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन पर्यवेक्षण (Observation) विधि के द्वारा किया जाए जिसके लिए इतिहास का सहारा लेना अनिवार्य है। यह कहना उचित ही है कि इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा। ऐसे अध्ययन का दोष बताते हुए लॉस्की (Laski) कहता है, “हर प्रकार के काल्पनिक राजनीति शास्त्र का परास्त होना अनिवार्य ही है क्योंकि मनुष्य कभी भी ऐतिहासिक प्रभावों से उन्मुक्त नहीं हो सकते।” विलोबी (Willoughby) के शब्दों में “इतिहास राजनीति शास्त्र को तीसरी दिशा प्रदान करता है।” (“History gives the third dimension to Political Science …………”)

इतिहास को राजनीति शास्त्र की देन (Contribution of Political Science to History)—परन्तु इतिहास का ही राजनीति शास्त्र पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि इतिहास भी राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ हासिल करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। इतिहास में केवल युद्ध, विजयों तथा अन्य घटनाओं का ही वर्णन नहीं आता बल्कि इसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक घटनाओं का भी वर्णन आता है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाता है। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद आदि धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अपूर्ण है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य पार्टी, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, केबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन का भारत पर आक्रमण तथा पाकिस्तान के आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। लॉर्ड एक्टन ने राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “राजनीति इतिहास की धारा में उसी प्रकार इकट्ठी हो जाती है जैसे नदी की रेत में सोने के कण।”

राजनीति की इतिहास को एक महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और मॉण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्यक्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का सोवियत रूस की राज्यक्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

दोनों में अन्तर (Differences between the two)-राजनीतिक विकास तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है।
1. इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है (Scope of History is wider than the scope of Political Science)-फ्रीमैन के कथन से समहत होना कठिन है क्योंकि पूर्ण भूतकालीन इतिहास राजनीति नहीं है और वर्तमान राजनीति कल का इतिहास नहीं है। इतिहास में प्रत्येक घटना का वर्णन किया जाता है। इसका क्षेत्र व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी घटनाओं, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक का वर्णन आ जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राजनीतिक घटनाओं से होता है।

2. राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है, जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राजनीतिक संस्थाओं के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। राज्य कैसा था, कैसा है और कैसा होना चाहिए, इन तीनों का उत्तर राजनीति शास्त्र से मिलता है, परन्तु इतिहास में केवल बीती घटनाओं का ही वर्णन आता है।

3. इतिहास वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान विचारशील है- इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में इन घटनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है और इस मूल्यांकन के आधार पर निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रकार इतिहास वर्णनात्मक है परन्तु राजनीति शास्त्र विचारात्मक भी है।

4. इतिहासकार नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान के विद्वानों के लिए नैतिक निर्णय देना आवश्यक है-इतिहासकार केवल बीती हुई घटनाओं का वर्णन करता है। वह घटनाओं की नैतिकता के आधार पर परख करके कोई निर्णय नहीं देता है। उदाहरण के लिए, दिसम्बर 1971 में भारत का पाकिस्तान से युद्ध हुआ। इतिहासकार का कार्य केवल युद्ध की घटनाओं का वर्णन करना है। इतिहासकार का इस बात के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है कि युद्धबन्दियों के साथ कैसा व्यवहार किया गया, असैनिक आबादी पर बम बरसाए गए तो कोई अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। परन्तु राजनीति विज्ञान का विद्वान् युद्ध के नैतिक पहलू पर अपना निर्णय अवश्य देगा।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में अन्तर होते हुए भी घनिष्ठ सम्बन्ध है और इस विचार को सब विद्वान् मान्यता प्रदान करते हैं। गार्नर (Garmer) के शब्दों में, ‘अध्ययन विषय के तौर पर यह एक-दूसरे के सहायक व पूरक हैं।’

सीले (Seeley) ने इन दोनों को पूरक सिद्ध करने के लिए कहा है, “इतिहास के उदार प्रभाव के बिना राजनीति अशिष्ट है और राजनीति से अपने सम्बन्ध को भुला देने से इतिहास साहित्य मात्र रह जाता है।”

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relation between Political Science and Economics.)
उत्तर-
राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। प्राचीन काल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ (Political Economy) के नाम से प्रसिद्ध था। विद्वानों ने ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की परिभाषा इस प्रकार की है-“यह राज्य के लिए राजस्व (Revenue) जुटाने की एक कला है।” भारतीय विद्वान् चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया । इसी प्रकार राजनीति विज्ञान के कई मान्य ग्रन्थों जैसे अरस्तु की ‘Politics’ तथा लॉक की ‘नागरिक प्रशासन पर दो लेख’ (Two Treatises on Civil Government) में उन विषयों का विवेचन मिलता है, जिन्हें आजकल अर्थशास्त्र में शामिल किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन काल में दो शास्त्रों को एक माना जाता था, परन्तु 19वीं शताब्दी में एडम स्मिथ ने आर्थिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप को अनुचित बताया। एडम स्मिथ पहला विद्वान् था जिसने अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया। 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। अर्थशास्त्र का सम्बन्ध सम्पत्ति के उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा विनिमय सम्बन्धी मनुष्य की गतिविधियों से है।

यह ठीक है कि 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान माना गया है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में कोई सम्बन्ध नहीं। अब भी दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है और आपस में आदानप्रदान करते हैं।

अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science)-वर्तमान युग में मनुष्य तथा राज्य की मुख्य समस्याएं आर्थिक हैं। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। जब मनुष्य आखेट अवस्था में से गुज़र रहा था अर्थात् जब मनुष्य का पेशा शिकार करना था तब राज्य के उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं होता था क्योंकि उस समय मनुष्य एक स्थान पर नहीं रहता था। जब मनुष्य ने कृषि करना आरम्भ किया, इसके साथ ही मनुष्य को एक निश्चित स्थान पर रहना पड़ा, जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई। पहले सरकार पर बड़ेबड़े ज़मींदारों का प्रभाव होता था, परन्तु यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् सरकार पर उद्योगपतियों का प्रभाव हो गया है। आजकल हमारे देश में भी उद्योगपतियों का ही अधिक प्रभाव है।

व्यक्तिवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त हैं परन्तु इनका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में भी किया जाता है क्योंकि इन आर्थिक सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। चीन में साम्यवाद है। उत्पादन के साधनों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण है। सरकार की समस्त शक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के हाथ में ही हैं। अमेरिका में पूंजीवाद है, जिसके कारण वहां की सरकार संगठन तथा सरकार के उद्देश्य चीन की सरकार से भिन्न हैं। अतः आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार, उत्पादन के साधनों में परिवर्तन होने पर राजनीतिक परिवर्तन होना अनिवार्य है। कार्ल मार्क्स का यह कथन सर्वथा सत्य तो नहीं है परन्तु इतना अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आर्थिक परिवर्तन ही राजनीतिक परिवर्तन का मुख्य कारण भी होता है।

राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुई हैं उनके परिणामस्वरूप ही यूरोप के इन देशों में उपनिवेशवाद और समाजवाद की नीति अपनाई। इस सम्बन्ध में बिस्मार्क और जोज़फ चैम्बरलेन के कथन महत्त्वपूर्ण हैं। बिस्मार्क का कथन था, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं, बल्कि व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।” (“I want outside Europe…not provinces but commerical enterprises.”)

राजनीतिक क्षेत्र की अनेक मत्त्वपूर्ण घटनाएं आर्थिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में आज लोकतन्त्र को इतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि अमेरिका तथा इंग्लैंड में प्राप्त हुई है। भारत में सफलता न मिलने का मुख्य कारण लोगों की आर्थिक दशा है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है, अधिकारों तथा कर्तव्यों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर पाती। लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं। दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात् बहुत से देशों को अमेरिका से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी जिसका परिणाम यह हुआ कि उन देशों की नीतियों पर भी अमेरिका का प्रभाव पड़ा।

अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान की देन (Contribution of Political Science to Economics)-अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति विज्ञान से भी बहुत सहायता मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन-व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। सरकार की कर नीति, आयात-निर्यात नीति, विनिमय की दर, बैंक नीति, व्यापार तथा उद्योग सम्बन्धी कानून, सीमा शुल्क नीति आदि का राज्य की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपना कर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं हैं ताकि लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा किया जा सके। सरकार बड़े-बड़े उद्योगों को अपने हाथों में ले रही है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा।

युद्ध एक सैनिक और राजनीतिक क्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भारी प्रभाव पड़ता है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति में गिरावट होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण वियतनाम युद्ध रहा है। इसी प्रकार 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित किया है।

अतः इस विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में समानताएं (Points of Similarity between Economics and Political Science) अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में निम्नलिखित समानताएं पाई जाती हैं-

  • दोनों का विषय समाज में रह रहा मनुष्य है-समाज में रह रहा मनुष्य दोनों शास्त्रों का विषय है। दोनों का उद्देश्य मानव कल्याण है और उसी के लिए दोनों कार्य करते हैं।
  • दोनों ही आदर्शात्मक सामाजिक विज्ञान हैं-दोनों ही भूतकाल के आधार पर वर्तमान का विश्लेषण करके भविष्य के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में मानव जीवन के लिए ऐसे आदर्श स्थापित करते हैं जिनके द्वारा अधिक-से-अधिक मानव हित हो।
  • दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं- राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं।

दोनों में अन्तर (Difference between the two) राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार है

1. विभिन्न विषय-क्षेत्र (Different Subject Matter) राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इस विज्ञान का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। मनुष्य धन कैसे कमाता है, कैसे उसका उपयोग करता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर अर्थशास्त्र देता है। इस प्रकार दोनों का विषय-क्षेत्र अलग-अलग है।

2. दृष्टिकोण (Approach)—मिस्टर ब्राऊन (Mr. Brown) ने राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में भेद करते हुए लिखा है, “अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से। अर्थशास्त्र वस्तुओं की कीमतों का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान सदाचार सम्बन्धी मूल्यों का।” इस प्रकार अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक विज्ञान है।

3. अध्ययन पद्धति (Method of Study)—दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों तथा अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति विज्ञान के अध्ययन के अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है और इसके निष्कर्ष और सिद्धान्त अधिक सही होते हैं। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्र का सम्बन्ध मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं से है और इन आवश्यकताओं तथा इनकी पूर्ति का उल्लेख अंकों द्वारा दर्शाया जा सकता है। अर्थशास्त्र में मात्रात्मक आंकड़ों का संग्रह राजनीति विज्ञान की अपेक्षा अधिक सम्भव है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में भिन्नता होने के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में दोनों ही अपने उद्देश्यों की प्राप्ति एक-दूसरे के सहयोग और सहायता के बिना नहीं कर सकते। डॉ० गार्नर (Dr. Garner) ने ठीक ही कहा है, “बहुत-सी आर्थिक समस्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।” विलियम एसलिंगर (William Esslinger) के विचारानुसार, “अर्थशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र की एकता का पाठ्यक्रम उपकक्षा में पढ़ाया जाना चाहिए।”

प्रश्न 4.
राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relations between Political Science and Sociology.)
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन का शास्त्र है। समाज- शास्त्र समाज की उत्पत्ति, विकास, उद्देश्य तथा संगठन का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक इत्यादि का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में मानव जीवन के राजनीतिक पहलू का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की एक शाखा है। प्रसिद्ध विद्वान् रेटजनहाफर ने ठीक ही कहा है, “राज्य अपने विकास के प्रारम्भिक चरणों में एक सामाजिक संस्था ही थी।” हम आगस्ट काम्टे (August Comte) के इस कथन से सहमत हैं, “समाजशास्त्र सभी समाजशास्त्रों की जननी है।” राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान करते हैं। प्रो० कैटलिन (Catline) ने तो यहां तक कहा है, “राजनीति और समाजशास्त्र अखण्ड हैं और वास्तव में एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं।”

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

राजनीति विज्ञान को समाजशास्त्र की देन (Contribution of Sociology to Political Science) समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। बिना समाजशास्त्र के अध्ययन के राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों को समझना कठिन है। प्रो० गिडिंग्स (Prof. Giddings) ने ठीक ही कहा है, “समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना उसी प्रकार है जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान अथवा ऊष्मा गति की शिक्षा देना।” (“To teach the theory of the state to men who have not learned the first principles of sciology is like teaching Astronomy or Thermodynamics to men who have not learned Newton’s Laws of Motion.”) दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार बिना समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनजान व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। समाजशास्त्रों में समाज के रीति-रिवाजों का अध्ययन किया जाता है। हम जानते हैं कि राज्य के कानून का पालन तभी किया जाता है यदि वह समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार हो।

राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाज शास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मानव की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथसाथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology) राजनीति विज्ञान की एक शाखा पनप रही है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना आवश्यक है। इस प्रकार समाज शास्त्र का राजनीति शास्त्र पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

राजनीति विज्ञान की समाजशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Sociology)-परन्तु दूसरी ओर राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय राज्य हैराज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य का विकास कैसे हुआ, राज्य का उद्देश्य क्या है इन सब प्रश्नों का उत्तर राजनीति विज्ञान में मिलता है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के आपसी सम्बन्ध का एक प्रणाम यह है कि मॉरिस, गिन्सबर्ग, आगस्त काम्टे, लेस्टर वार्ड, समवर आदि समाजशास्त्रियों ने राज्य की प्रकृति और उद्देश्यों में इतनी रुचि दिखाई है, मानो वे समाजशास्त्र की मुख्य समस्याएं हों। इसी प्रकार डेविड ईस्टन, हैरल्ड लासवैल, ग्रेवीज ए० ऑल्मण्ड, पावेल, कोलमेन, मेक्स वेबर और राजनीति शास्त्र के अन्य आधुनिक विद्वानों द्वारा समाज शास्त्र से अधिक-से-अधिक मात्रा में अध्ययन सामग्री और अध्ययन पद्धतियां प्राप्त की गई हैं।

दोनों में अन्तर (Differences between the two) राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है-

  • दोनों के क्षेत्र अलग हैं-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र के क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीतिक शास्त्र का मुख्य विषय-क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र का मुख्य क्षेत्र समाज है।
  • राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र के क्षेत्र से संकुचित है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन कराता है जबकि समाजशास्त्र मनुष्य के सभी पहलुओं का अध्ययन कराता है।
  • राजनीति विज्ञान यह मानकर चलता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसमें हम यह अध्ययन नहीं करते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी क्यों है। परन्तु समाजशास्त्र में इस प्रश्न का भी अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना–राजनीति शास्त्र में समाज बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता जबकि समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन वहीं से शुरू होता है। समाजशास्त्र के अन्तर्गत मानव जाति के दोनों युगों-संगठित तथा असंगठित-का अध्ययन किया जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल संगठित युग का अध्ययन करता है।
  • समाजशास्त्र केवल भूत और वर्तमान से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि समाज शास्त्र में समाज के अतीत तथा वर्तमान का ही अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है-समाजशास्त्र समाज की उत्पत्ति तथा विकास का विस्तृत रूप से अध्ययन करता है, परन्तु इस अध्ययन के पश्चात् कोई परिणाम नहीं निकलता। यह केवल सामाजिक घटनाओं का वर्णन करता है। उन घटनाओं में अच्छी तथा बुरी घटनाओं की पहचान नहीं कराता। राजनति शास्त्र केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं करता बल्कि परिणाम भी निकालता है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना तथा आदर्श नागरिक पैदा करना है।
  • समाजशास्त्र में मनुष्य के चेतन (conscious) और अचेतन (unconscious) दोनों प्रकार के कार्यों का अध्ययन किया जाता है परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल चेतन प्रकार के कार्यों का ही अध्ययन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में अन्तर होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध न होकर पूरक हैं। राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relations between Political Science and Ethics.)
उत्तर-
राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। नीतिशास्त्र साधारण मनुष्य की भाषा में वह शास्त्र है, जो अच्छे-बुरे में अन्तर स्पष्ट करता है। नीतिशास्त्र वह शास्त्र है जिसके द्वारा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, अहिंसा-हिंसा, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य तथा शुभ-अशुभ में अन्तर का पता चलता है। डीवी (Deewey) के अनुसार, “नीतिशास्त्र आचरण का वह विज्ञान है जिसमें मानवीय आचरण के औचित्य तथा अनौचित्य तथा अच्छाई तथा बुराई पर विचार किया जाता है।” नीतिशास्त्र के द्वारा हम निश्चित करते हैं कि मनुष्य का कौन-सा कार्य अच्छा है और कौनसा कार्य बुरा । यह शास्त्र नागरिकको आदर्श नागरिक बनाने में सहायक है। दूसरी ओर राज्य का मुख्य उद्देश्य भी आदर्श नागरिक बनाना है। इस प्रकार दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन यूनानी लेखकों प्लेटो तथा अरस्तु ने राजनीति शास्त्र को नीतिशास्त्र का ही एक अंग माना है। प्लेटो तथा अरस्तु के अनुसार, “राज्य एक सर्वोच्च नैतिक संस्था है। इसका उद्देश्य नागरिकों के नैतिक स्तर को ऊंचा करना है।” प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ (Republic) में राजनीति ही नहीं बल्कि नैतिक दर्शन भी भरा हुआ है। अरस्तु ने कहा था “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”

इटली के विद्वान् मैक्यावली ने सर्वप्रथम राजनीति तथा नीतिशास्त्र में भेद किया। इसके अनुसार राजा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह नैतिकता के नियमों के अनुसार शासन चलाए। आवश्यकता पड़ने पर अनैतिकता का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। मैक्यावली के अनुसार-राजा के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य राज्य की सुरक्षा है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की परवाह नहीं करनी चाहिए। हाब्स (Hobbes) ने भी मैक्यावली के विचारों का समर्थन किया। बोदीन (Bodin), ग्रोशियस (Grotius) तथा लॉक (Locke) ने भी इन दोनों शास्त्रों को अलग किया, परन्तु रूसो (Rouseau) ने फिर इन दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया। कांट (Kant), ग्रीन (Green) ने भी रूसो के मत का समर्थन किया।

नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Ethics to Political Science)-वर्तमान समय में इन दोनों शास्त्रों में गहरा सम्बन्धा समझा जाता है। महात्मा गांधी ने दोनों शास्त्रों को अभिन्न माना है। उनके अनुसारसरकार को अपनी नीति नैतिकता के सिद्धान्तों पर बनानी चाहिए। सरकार की नीतियों में असत्य, अधर्म, कपट तथा पाप इत्यादि की मिलावट नहीं होनी चाहिए। कॉक्स के मतानुसार, “जो बात नैतिक दृष्टि से गलत है, वह राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं हो सकती।” कोई भी सरकार ऐसे कानून पास नहीं कर सकती जो नैतिकता के विरुद्ध हों। यदि पास किए जाएंगे तो उनका विरोध होगा। इसके अतिरिक्त नैतिक नियम जो स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं, कानून का रूप धारण कर लेते हैं। गैटेल (Gettell) ने लिखा है, “जब नैतिक विचार स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं तो वे कानून का रूप ले लेते हैं।” लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने ठीक ही कहा है, “समस्या यह नहीं है कि सरकार क्या करती है बल्कि यह है कि उन्हें क्या करना चाहिए।” यदि राजनीति विज्ञान को नीतिशास्त्र से पृथक् कर दें तो यह निस्सार और निरर्थक हो जाएगी। उसमें प्रगतिशीलता और आदर्शता नहीं रह पाएगी। इसलिए लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने भी कहा है, “नीतिशास्त्र के अध्ययन के बिना राजनीति शास्त्र का अध्ययन विफल है।” इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान की अनेक शाखाएं आचार शास्त्र की नींव पर खड़ी हैं, जैसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है। आचार शास्त्र से संविधान भी प्रभावित होता है क्योंकि अनेक प्रकार के आदर्शों को संविधान में उचित स्थान देना अनिवार्य है। भारत और आयरलैंड के संविधान में हमें दिए गए राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व’ ही स्पष्ट उदाहरण है।

राजनीति विज्ञान की नीतिशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Ethics)—वर्तमान राज्य कल्याणकारी राज्य है। सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कई प्रकार के कानून बनाती है। इसके साथ ही सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है। भारत सरकार ने सती-प्रथा, दहेज-प्रथा, छुआछूत आदि बुराइयों को कानून के द्वारा रोकने का प्रयत्न किया है और काफ़ी सफलता भी मिली है। भारत सरकार अहिंसा के सिद्धान्तों पर चल रही है और इन्हीं सिद्धान्तों का प्रचार कर रही है। भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील की स्थापना की थी ताकि संसार के दूसरे देशों में भी अहिंसा का प्रचार किया जा सके। सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित हो सकती है। यदि राज्य शान्ति का वातावरण उत्पन्न न करे, तो नैतिक जीवन बिताना असम्भव हो जाएगा। इस प्रकार सरकार कानून द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करती है जिसमें नैतिकता विकसित हो सके। क्रोशे के मतानुसार, “नैतिकता अपनी पूर्णता और उच्चतम स्पष्टता राजनीति में ही पाती है।”

दोनों में अन्तर (Difference between the two)-राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी उन दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार हैं-

  • नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है जब कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्ध रखता है। नीतिशास्त्र मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है, परन्तु राजनीति विज्ञान मनुष्य के केवल बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।
  • राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि सरकार के किसी कानून का उल्लंघन कोई मनुष्य करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।
  • राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान इत्यादि का वर्णन करता है जबकि नीतिशास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।
  • राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है। नीतिशास्त्र वास्तविकता से बहुत दूर है। यह केवल काल्पनिक है।
  • राज्य के नियमों तथा नैतिकता के नियमों में सदैव एकरूपता नहीं होती। सड़क के दाईं ओर चलना राज्य के नियम के विरुद्ध है, परन्तु नैतिकता के विरुद्ध नहीं।
  • राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं, परन्तु इस शास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इस बात से है कि वे क्या हैं परन्तु नीतिशास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इससे है कि वे क्या होने चाहिएं।
    राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र के सम्बन्ध और अन्तर दोनों को स्पष्ट करते हुए कैटलिन ने कहा, “नीतिशास्त्र से एक राजनीतिज्ञ यह सीखता है कि अनेक मार्गों में से कौन-सा मार्ग सही है और राजनीति विज्ञान बतलाता है कि व्यावहारिक दृष्टि से कौन-सा मार्ग अपनाना सम्भव होगा।”

निष्कर्ष (Conclusion)-नीतिशास्त्र और राजनीति विज्ञान में भले ही कई भिन्नताएं हैं, फिर भी इनकी समीपता से इन्कार नहीं किया जा सकता। नीतिशास्त्र राजनीति विज्ञान के अध्ययन को समृद्ध बनाता है और व्यावहारिक राजनीति को उदात्त बनाने (To ennoble) के लिए प्रेरित करता है। आजकल की व्यावहारिक राजनीति में भ्रष्टाचार के उदाहरण सर्वप्रसिद्ध हैं और इन भ्रष्टाचारी तरीकों ने समाज के हर पक्ष को दूषित कर दिया है। इस भ्रष्टाचार से बचने के साधन नीतिशास्त्र ही सुझा सकता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र, इतिहास के ऊपर निर्भर है ? वर्णन करें।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र और इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजनीति शास्त्र में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए राजनीति शास्त्र को इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। निःसन्देह राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। भारत के इतिहास से हमें पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा।

प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत बड़ी देन है।
राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
प्राचीनकाल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ के नाम से प्रसिद्ध था। 20वीं शताब्दी में अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना अनिवार्य है। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।

राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि सुदृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपनाकर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। निःसन्देह राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 4.
इतिहास, राजनीति शास्त्र के ऊपर कैसे निर्भर है ?
उत्तर-
इतिहास, राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ प्राप्त करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाएगा। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद जैसी धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अधूरा है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य दल, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, कैबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन तथा पाकिस्तान द्वारा आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। राजनीति की इतिहास को महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और माण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्य क्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का रूस की राज्य क्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 5.
राजनीति शास्त्र को इतिहास की देन का वर्णन करें।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर रहना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीतिक क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का पता इतिहास से ही लगता है। राजनीतिक क्षेत्र के ये प्रयोग एक भूतकालीन प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बताने का कार्य करते हैं। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए ही संविधान निर्माताओं ने भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया है। इतिहास, राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा व बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। इतिहास द्वारा बताई गई भूलों के आधार पर राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन करते हैं।

प्रश्न 6.
राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में कोई चार अन्तर बताएं।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में घनिष्ठता होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

  • इतिहास का क्षेत्र राजनीति विज्ञान से अधिक व्यापक है-इतिहास की विषय-वस्तु का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं का वर्णन होता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल राजनीति घटनाओं से सम्बन्धित है।
  • राजनीति शास्त्र भूत, वर्तमान तथा भविष्य से सम्बन्धित है जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के भूतकाल के अलावा उसके वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि इतिहास में केवल बीती घटनाओं का वर्णन होता है।
  • इतिहास वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति शास्त्र विचारशील है-इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में घटनाओं के वर्णन के साथ-साथ उनका मूल्यांकन करके निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं।
  • इतिहास नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान में विद्वानों के लिए नौतिक निर्णय देना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
अथशास्त्र की राजनीति शास्त्र को देन बताइए।
उत्तर-
आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक समस्याओं का ही परिणाम है। व्यक्तिवाद, समाजवाद, पूंजीवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त है परन्तु इनका अध्ययन राजनीति शास्त्र में किया जाता है क्योंकि इन सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है। राजनीतिक परिवर्तनों का मुख्य कारण आर्थिक परिवर्तन होते हैं। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुईं, उनके परिणामस्वरूप ही उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की नीतियां अपनाई गईं। राजनीतिक क्षेत्र की अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाएं, आर्थिक गतिविधियों के फलस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में लोकतन्त्र को अमेरिका और इंग्लैंड के समान सफलता न मिलने का मुख्य कारण इसकी आर्थिक दशा है।

प्रश्न 8.
राजनीति शास्त्र की अर्थशास्त्र को देन का वर्णन करें।
उत्तर-
अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति शास्त्र से भी बहुत सहायक मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि दृढ़ व शक्तिशाली है तो देश की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद और साम्यवाद जैसी नीतियों को अपनाकर देश की अर्थव्यवस्था को बदल सकती है। सरकार द्वारा बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किए जाने से देश की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। युद्ध बेशक एक सैनिक और राजनीतिक प्रक्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 9.
राजनीति शास्त्र तथा अर्थशास्त्र में अन्तर बताएं।
उत्तर-
अर्थशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर हैं

  • विभिन्न विषय क्षेत्र-राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इसका मुख्य विषय राज्य तथा सरकार हैं परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। इस प्रकार दोनों का विषय क्षेत्र अलग-अलग है।
  • दृष्टिकोण-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण में भी अन्तर पाया जाता है। अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति शास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक विज्ञान है।
  • अध्ययन पद्धति में अन्तर-दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों की अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
समाजशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन का वर्णन करें।
उत्तर-
समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का कार्य करता है। बिना समाजशास्त्र के सिद्धान्तों को समझे राजनीति शास्त्र के नियमों को समझना अति कठिन है। दूसरे शब्दों में जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। राज्य के अधिकतर कानून समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मनुष्य की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथ-साथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान की एक शाखा है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत् एवं पूर्ण अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना बहुत आवश्यक है। इस प्रकार समाजशास्त्र राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 11.
राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में किन्हीं चार अन्तरों का वर्णन करें।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में निम्नलिखित मुख्य अन्तर पाए जाते हैं-

  1. दोनों के विषय क्षेत्र अलग-अलग हैं-राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र दोनों के विषय क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र समाज से सम्बन्धित है।
  2. समाजशास्त्र का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा व्यापक है-समाजशास्त्र का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन करता है परन्तु समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
  3. समाजशास्त्र की उत्पत्ति राजनीति शास्त्र से पहले हुई-राजनीति शास्त्र में राज्य बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता परन्तु समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन मानव की उत्पत्ति से शुरू होता है।
  4. समाजशास्त्र वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति शास्त्र आदर्शात्मक है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

प्रश्न 12.
नीतिशास्त्र की राजनीति शास्त्र को चार देनों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. सरकार नैतिकता के सिद्धान्तों के अनुसार कानून बनाती है। कोई भी सरकार नैतिकता के विरुद्ध कानून नहीं बना सकती।
  2. जब राजनीति शास्त्र में हम यह निर्णय करते हैं कि राज्य कैसा होना चाहिए तब नीति शास्त्र हमारी बहुत सहायता करता है।
  3. नैतिक नियम जो स्थायी और लोकप्रिय हो जाते हैं, कुछ समय कानून का रूप धारण कर लेते हैं।
  4. नीति शास्त्र राजनीति शास्त्र को प्रगतिशीलता और आदर्शता प्रदान करती है।

प्रश्न 13.
नीतिशास्त्र किस प्रकार राजनीति शास्त्र से भिन्न है ? चार अन्तर बताइये।
उत्तर-
नीतिशास्त्र अग्रलिखित प्रकार से राजनीति शास्त्र से भिन्न है-

  • नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित है जबकि राजनीति शास्त्र मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्धित है। नीति मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान केवल मनुष्य के बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।
  • राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि कोई मनुष्य सरकार के किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।
  • राजनीति शास्त्र मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान आदि का वर्णन रहता है, जबकि नीतिशास्त्र मुख्यत: आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।
  • राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है, जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत बड़ी देन है।

प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना अनिवार्य है। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।
शासन व्यवस्था यदि सुदृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। निःसन्देह राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 3.
इतिहास, राजनीति शास्त्र के ऊपर कैसे निर्भर है ?
उत्तर-
इतिहास, राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ प्राप्त करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाएगा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र को इतिहास की किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर- इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

प्रश्न 2. इतिहास को राजनीति शास्त्र की किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर-राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं।

प्रश्न 3. राजनीति विज्ञान एवं इतिहास में कोई एक अन्तर बताएं।
उत्तर-इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है।

प्रश्न 4. किस विद्वान् ने सर्वप्रथम अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया ?
उत्तर-एडम स्मिथ ने।

प्रश्न 5. अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर-राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।

प्रश्न 6. अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में एक समानता बताएं।
उत्तर-अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान दोनों का ही विषय समाज में रह रहा मनुष्य है।

प्रश्न 7. अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान की अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं।

प्रश्न 8. राजनीति विज्ञान एवं समाज शास्त्र में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है।

प्रश्न 9. राजनीति विज्ञान एवं नीति शास्त्र में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-नीति शास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित है, जबकि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से संबंध रखता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. शासन व्यवस्था यदि शक्तिशाली है, तो वहां की जनता की आर्थिक दशा ………. होगी।
2. अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान, दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और …………… से सम्बन्धित हैं।
3. ………… का सम्बन्ध वस्तुओं से है, जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से।
4. ………… के अनुसार बहुत-सी आर्थिक सम्स्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।
5. राजनीति शास्त्र समाज शास्त्र की एक ……….. है।
उत्तर-

  1. अच्छी
  2. भविष्य
  3. अर्थशास्त्र
  4. डॉ० गार्नर
  5. शाखा।

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प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. समाज शास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है।
2. राजनीति शास्त्र एवं समाज शास्त्र का मुख्य विषय राज्य है।
3. समाज शास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना।
4. राजनीति शास्त्र का विषय क्षेत्र समाज शास्त्र से व्यापक है।
5. समाज शास्त्र वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
यह कथन किसका है कि, “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”
(क) प्लेटो
(ख) अरस्तु
(ग) हॉब्स
(घ) लॉक।
उत्तर-
(ख) अरस्तु

प्रश्न 2.
नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को क्या देन है ?
(क) जो नैतिक नियम स्थायी एवं प्रचलित होते हैं, वे कानून का रूप धारण कर लेते हैं।
(ख) नैतिकता के कारण राजनीति विज्ञान में प्रगतिशीलता एवं आदर्शता बनी रहती है।
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान की नैतिक शास्त्र को क्या देन है ?
(क) सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कानून बनाती है।
(ख) सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है।
(ग) सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित होती है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र एवं नीति शास्त्र में क्या अन्तर पाया जाता है ?
(क) नीति शास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है, जबकि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पक्ष से सम्बन्धित रहता है।
(ख) राज्य के कानूनों का पालन न करने वाले को दण्ड दिया जाता है, जबकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना केवल पाप माना जाता है।
(ग) राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णात्मक है, जबकि नीति शास्त्र आदर्शात्मक है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र के अर्थ और क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
(Discuss the definition and scope of political science.)
अथवा
राजनीति शास्त्र की परिभाषा दें तथा इसके क्षेत्र का वर्णन करें।
(Define political science and describe its scope.)
उत्तर-
राजनीति शास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में जन्म लेता है और समाज में ही रह कर अपने जीवन का पूर्ण विकास करता है। समाज के बिना वह रह नहीं सकता। संगठित समाज में जब एक ऐसी संस्था की स्थापना हो जाए जिसके द्वारा उस समाज का शासन चलाया जा सके तथा वह समाज सत्ता सम्पन्न हो और एक निश्चित भाग पर निवास करता हो तो वह राज्य बन जाता है।

राज्य के अन्दर रहकर ही मनुष्य अपना विकास कर सकता है। राज्य की एजेंसी सरकार द्वारा राज्य की इच्छा को व्यक्त किया जाता है और वही इस इच्छा को लागू करती है। वह शास्त्र जो राज्य और सरकार की जानकारी देता है, उसे हम राजनीति शास्त्र कहते हैं।

राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में पोलिटिकल साइंस (Political Science) कहते हैं । यह शब्द पोलिटिक्स (Politics) से निकला है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है जिसका अर्थ है नगर-राज्य। ग्रीक लोग नगर-राज्यों में रहते थे, इसलिए उस समय पोलिटिक्स का अर्थ नगर-राज्य के अध्ययन से होता था परन्तु आज बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हो गई है, इसलिए अब हम इसका अर्थ राज्य के अध्ययन से लेते हैं। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में राजनीति शास्त्र वह विषय है जो राज्य का अध्ययन करता है। राजनीति विज्ञान के अर्थ को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं का अध्ययन करना अति आवश्यक है।

राजनीति विज्ञान की परम्परागत परिभाषाएं (Traditional definitions of Political Science)-राजनीति विज्ञान की परम्परागत परिभाषाओं को हम तीन भागों में बांट सकते हैं :-

(क) उन विद्वानों की परिभाषाएं जो राजनीति शास्त्र को केवल राज्य का अध्ययन करने वाला विषय मानते हैं।
(ख) उन विद्वानों की परिभाषाएं जो राजनीति शास्त्र को केवल सरकार से सम्बन्धित विषय मानते हैं।
(ग) उन विद्वानों की परिभाषाएं जो राजनीति शास्त्र को राज्य तथा सरकार दोनों से सम्बन्धित मानते हैं।

(क) राजनीति विज्ञान राज्य से सम्बन्धित है (Political Science is concerned with the state only)कुछ विद्वानों के मतानुसार, राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राज्य से है। ब्लंटशली (Bluntschli), प्रो० गार्नर (Prof. Garner), गैटेल (Gettell), गैरीज़ (Garies) आदि इस विचार के मुख्य समर्थक हैं :-

  • ब्लंटशली (Bluntschli) के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र उस विज्ञान को कहा जाता है जिसका सम्बन्ध राज्य से है और जिसमें राज्य की मूल प्रकृति, उसके रूपों, विकास तथा उसकी आधारभूत स्थितियों को समझने और जानने का प्रयत्न किया जाता है।”
  • प्रो० गार्नर (Prof. Garner) के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।” (“Political Science begins and ends with the State.”)
  • लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) के शब्दों में, “राजनीति शास्त्र और राज्य उसके विकास की आवश्यक अवस्थाओं के साथ सम्बन्धित है।” (Political Science is concerned with the State and with the conditions essential for its development.)

(ख) राजनीति विज्ञान सरकार के साथ सम्बन्धित है (Political Science is concerned with the Government)-कुछ विद्वान् राजनीति विज्ञान को सरकार के अध्ययन तक सीमित मानते हैं। सीले, लीकॉक आदि विद्वान् इसी विचार के समर्थक हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

1. सीले (Seeley) का कहना है कि “जिस प्रकार राजनीतिक अर्थव्यवस्था सम्पत्ति का, प्राणिशास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का और रेखागणित स्थान और इकाई का अध्ययन करता है उसी प्रकार राजनीति शास्त्र शासन-प्रणाली का अध्ययन करता है।” (“Political Science investigates the phenomena of government, or Political Economy deals with wealth, Biology with life, Algebra with number and Geometry with space and magnitude.”)
2. डॉ० लीकॉक (Dr. Leacock) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र केवल सरकार से सम्बन्धित है।” (“Political Science deals with Government only.)”.

(ग) राजनीति विज्ञान राज्य तथा सरकार से सम्बन्धित (Political Science is concerned with State and Government)-कुछ विद्वानों के विचारानुसार राजनीति विज्ञान में राज्य और सरकार दोनों का अध्ययन किया जाता है। गैटेल, गिलक्राइस्ट, पाल जैनेट तथा लॉस्की ने इसी विचार का समर्थन किया है।

  • फ्रांसीसी लेखक पाल जैनेट (Paul Janet) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र समाज शास्त्र का वह भाग है जो राज्य के आधारों तथा सरकार के सिद्धान्तों का अध्ययन करता है।” (“Political Science is that part of Social Science which treats the foundations of the State and principles of government.”)
  • गैटेल (Gettell) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र को राज्य का विज्ञान कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध उन व्यक्तियों के समुदायों से है जो राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं, उनकी सरकारों के संगठन से है और सरकारों के कानून बनाने तथा लागू करने और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों वाली गतिविधियों से है। इसके मुख्य विषय राज्य सरकार तथा कानून हैं।”
  • गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “राजनीति विज्ञान राज्य और सरकार की सामान्य समस्याओं का विवेचन करता है।” (“Political Science deals with the general problems of the State and Government.”)

राजनीति विज्ञान की आधुनिक परिभाषाएं (Modern Definitions of Political Science)-द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद राजनीति शास्त्र की परिभाषा के सम्बन्ध में एक नवीन दृष्टिकोण का उदय हुआ है, जो निश्चित रूप से अधिक व्यापक और अधिक यथार्थवादी है। व्यवहारवादी क्रान्ति ने राजनीति शास्त्र की परिभाषाओं को नया रूप दिया है। कैटलिन, लासवैस, मेरियम, राबर्ट डाहल, डेविड ईस्टन, आल्मण्ड तथा पॉवेल, मैक्स वेबर आदि राजनीति शास्त्र के आधुनिक दृष्टिकोण के प्रतिनिधि विद्वान् हैं।

  • बैन्टले (Bentley) का कहना है कि राजनीति में महत्त्वपूर्ण ‘शासन’ और उसकी संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि शासन के कार्य की प्रक्रिया है और उस पर प्रभाव डालने वाले ‘दबाव समूह’ हैं। अतः राजनीति विज्ञान शासन की प्रक्रिया और दबाव समूहों के अध्ययन का शास्त्र है।
  • लासवैल और कैपलॉन (Lasswell and Kaplan) के अनुसार, “एक आनुभाविक खोज के रूप में राजनीति विज्ञान शक्ति के निर्धारण और सहभागिता का अध्ययन है।” (“Political Science as an empirical inquiry is the study of the shaping and sharing of power.”)
  • डेविड ईस्टन (David Easton) के अनुसार, “राजनीति मूल्यों का सत्तात्मक निर्धारण है जैसा कि यह शक्ति के वितरण और प्रयोग से प्रभावित होता है।” (“Politics is the study of authoritative allocation of values, as it is influenced by the distribution and use of power.”) ईस्टन ने राजनीति शास्त्र के अध्ययन-क्षेत्र में तीन बातों-नीति, सत्ता और समाज (Policy, Authority and Society) को प्रमुख माना है।
  • आलमण्ड और पॉवेल (Almond and Powell) ने कहा है कि आधुनिक राजनीति विज्ञान में हम ‘राजनीतिक व्यवस्था’ का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं।
    स्पष्ट है कि आधुनिक विद्वान् राजनीति शास्त्र की परिभाषा पर एक मत नहीं हैं। कोई उसे मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन का शास्त्र मानता है, कोई उसे शक्ति के अध्ययन का और कोई सत्ता के अध्ययन का। इन समस्त आधुनिक दृष्टिकोणों का समन्वय करते हुए राबर्ट डाहल (Robert Dahl) ने कहा है कि “राजनीतिक विश्लेषण का शक्ति , शासन अथवा सत्ता के सम्बन्ध है।” (“Political analysis deals with power, rule or authority.”)

आधुनिक राजनीतिक विद्वानों में कई मतभेदों के बावजूद भी इस सम्बन्ध में विचार साम्य है कि वे राजनीति शास्त्र को अब राज्य या सरकार का विज्ञान नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार का, शक्ति का, सत्ता का तथा मानव समूह की अन्तः क्रियाओं का विज्ञान है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति शास्त्र की परिभाषा के सम्बन्ध में अपनाया गया यह आधुनिक दृष्टिकोण भी एकांगी ही है। शक्ति राजनीति शास्त्र के विभिन्न अध्ययन विषयों में से केवल एक है, एकमात्र नहीं। अतः राजनीति शास्त्र के कुछ विद्वानों विशेषतया वी० ओ० के (V.0. Key), जे० रोलैण्ड, पिनॉक और डेविड जी० स्मिथ आदि के द्वारा इस विषय की परिभाषा के सम्बन्ध में परम्परागत और आधुनिक दृष्टिकोण में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

पिनॉक और स्मिथ (Penock and Smith) ने पूर्णतया सन्तुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए लिखा है कि, “इस प्रकार राजनीति विज्ञान किसी भी समाज में उन सभी शक्तियों, संस्थाओं तथा संगठनात्मक ढांचों से सम्बन्धित होता है जिन्हें उस समाज में सुव्यवस्था की स्थापना और उसको बनाए रखने, अपने सदस्यों के अन्य सामूहिक कार्यों के उत्पादन तथा उनके मतभेदों का समाधान करने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और अन्तिम सत्ता माना जाता है।”

राजनीति शास्त्र का विषय क्षेत्र (Scope of Political Science)-

राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में तीन विचारधाराएं प्रचलित हैं :

  • पहली विचारधारा के अनुसार, राजनीति शास्त्र का विषय राज्य है।
  • दूसरी विचारधारा के अनुसार, राजनीति शास्त्र का विषय-क्षेत्र सरकार के अध्ययन तक ही सीमित है।
  • तीसरी विचारधारा के अनुसार, राजनीति शास्त्र राज्य तथा सरकार का अध्ययन करता है।

कुछ विद्वानों के अनुसार राजनीति शास्त्र राज्य तथा सरकार का ही अध्ययन नहीं, बल्कि मनुष्य का भी अध्ययन करता है। प्रो० लॉस्की ने ऐसा ही मत प्रकट किया है। उन्होंने लिखा है कि “राजनीति शास्त्र के अध्ययन का सम्बन्ध संगठित राज्यों से सम्बन्धित मनुष्यों के जीवन से है।”
संयुक्त राष्ट्र शौक्षणिक, वैज्ञानिक-सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के नेतृत्व में सितम्बर, 1948 में राजनीतिक वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें उन्होंने राजनीति शास्त्र के क्षेत्र को निम्नलिखित शीर्षकों के अधीन निश्चित किया :

  • राजनीतिक सिद्धान्त (Political Theory)—इसमें राजनीतिक सिद्धान्त और राजनीतिक विचारों के इतिहास का अध्ययन शामिल है।
  • राजनीतिक संस्थाएं (Political Institutions)—इसमें संविधान, प्रान्तीय और स्थानीय सरकार के प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यों का अध्ययन शामिल है।
  • राजनीतिक दल (Political Parties)—इसमें राजनीतिक दलों, समूहों, जनमत इत्यादि का अध्ययन शामिल है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध (International Relation)—इसमें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, अन्तर्राष्ट्रीय संगठन, अन्तर्राष्ट्रीय कानून इत्यादि शामिल हैं।

इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजनीति शास्त्र निम्नलिखित विषयों का अध्ययन करता है :

1. राज्य का अध्ययन (Study of State)-राजनीति शास्त्र राज्य का विज्ञान है और इसमें मुख्यतः राज्य का अध्ययन किया जाता है। गैटल के मतानुसार राजनीति शास्त्र राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करता है।

(क) राज्य के अतीत का अध्ययन (The State as it had been)-राज्य वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द राजनीति शास्त्र घूमता है। परन्तु राज्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए इसमें राज्य की उत्पत्ति, उसके विस्तार, राजनीतिक संस्थाओं, विचारधाराओं के बदलते हुए स्वरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ख) राज्य के वर्तमान का अध्ययन (The State as it is)-राजनीति शास्त्र राज्य के वर्तमान स्वरूप का अध्ययन भी करता है। इसमें राज्य क्या है, राज्य के तत्त्व कौन-से हैं, राज्य की प्रकृति, राज्य के उद्देश्य, राज्य के अपने नागरिकों के साथ सम्बन्ध तथा राज्य अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्या-क्या साधन प्रयोग करता है आदि का अध्ययन किया जाता है। इसके अध्ययन का सीमा क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

(ग) राज्य के भविष्य का अध्ययन (The State as it ought to be)-राज्य का अध्ययन इसके वर्तमान रूप के अध्ययन के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इसलिए राज्य प्रगतिशील है। राज्य का लगातार विकास हो रहा है। राज्य जन-कल्याण के लिए है, इसलिए भविष्य में भी राज्य का ढांचा इस प्रकार का होना चाहिए कि जनता को अधिक-से-अधिक लाभ मिले। राज्य-शास्त्री का यह कर्त्तव्य है कि वह राज्य के अतीत तथा वर्तमान का पूर्ण ज्ञान लेकर भविष्य के लिए सुझाव दे ताकि राज्य की मशीनरी इस ढंग की हो कि जनता का अधिकसे-अधिक कल्याण हो सके। इसमें हम यह देखते हैं कि भविष्य में राज्य कैसा होना चाहिए तथा क्या एक अन्तर्राष्ट्रीय राज्य की स्थापना हो सकेगी कि नहीं।

2. सरकार का अध्ययन (Study of Government)-सरकार राज्य का अभिन्न भाग है। सरकार के बिना राज्य की स्थापना नहीं की जा सकती। सरकार राज्य की ऐसी एजेंसी है जिसके द्वारा राज्य की इच्छा को प्रकट तथा कार्यान्वित किया जाता है। राज्य के उद्देश्यों की पूर्ति सरकार द्वारा ही की जाती है। राजनीति शास्त्र में हम अध्ययन करते हैं किसरकार क्या है, इसके अंग कौन-से हैं, इसके कार्य क्या हैं तथा इसके विभिन्न रूप कौन-से हैं।

3. शासन प्रबन्ध का अध्ययन (Study of Administration)-राजनीति शास्त्र लोक प्रशासन से सम्बन्धित है। शासन प्रबन्ध एक जटिल क्रिया है। राज्य प्रबन्ध में सरकारी कर्मचारी योगदान देते हैं और इन्हीं सरकारी कर्मचारियों से सम्बन्धित शास्त्र को लोक प्रशासन कहा जाता है। कर्मचारियों की नियुक्ति, स्थानान्तरण, अवकाश आदि सभी बातें जोकि लोक प्रशासन में आती हैं, राजनीति शास्त्र से सम्बन्धित होती हैं, अतः उन सबके लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन आवश्यक है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

4. मनुष्य का अध्ययन (Study of Man)-मनुष्यों को मिलाकर राज्य बनता है। राजनीति शास्त्र, जिसमें मुख्यतः राज्य का अध्ययन किया जाता है, मनुष्य का अध्ययन भी करता है। इसमें मनुष्यों का राज्य के साथ क्या सम्बन्ध है, उनके अधिकार और कर्त्तव्य तथा नागरिकता की प्राप्ति तथा लोप इत्यादि बातों का अध्ययन किया जाता है।

5. समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन (Study of Associations and Institutions)-राज्य के अन्दर कई प्रकार के समुदाय और संस्थाएं होती हैं जिनके द्वारा मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। राजनीति शास्त्र इन विभिन्न समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन भी करता है। इसके अतिरिक्त चुनाव प्रणाली, जनमत का संगठन, दबाव गुट, लोक-सम्पर्क की व्यवस्था, प्रसारण के साधन आदि के बारे में भी राजनीति शास्त्र में अध्ययन किया जाता है।

6. राजनीतिक विचारधारा का अध्ययन (Study of Political Thought)-राज्य क्या है, राज्य के पास कौनकौन से अधिकार और शक्तियां हैं और उनकी क्या सीमाएं हो सकती हैं ? राज्य की आज्ञाओं को लोग क्यों माने, किन-किन व्यवस्थाओं में लोगों को राज्य की आज्ञाओं की अवहेलना करने का अधिकार होना चाहिए, राज्य की शक्ति व लोगों के अधिकारों के मध्य कहां लकीर खींची जाए जैसे बहुत-से महत्त्वपूर्ण और मौलिक प्रश्नों के उत्तर समयसमय पर विभिन्न राजनीतिक विद्वान् विचारकों ने दिए हैं। अतः इन सब बातों का अध्ययन हम राजनीति शास्त्र में करते हैं। आदर्शवाद, व्यक्तिवाद, उपयोगितावाद, फासिज्म, गांधीवाद आदि का अध्ययन राजनीति शास्त्र में किया जाता है।

7. राजनीतिक संस्कृति का अध्ययन (Study of Political Culture)-राजनीति शास्त्र में राज्य और सरकार का ही नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति के अध्ययन पर भी विशेष बल दिया जाता है। राजनीति के विद्वान् इन बातों का विश्लेषण करते हैं कि भौगोलिक परिस्थितियों, जातीय और भाषायी विभिन्नताओं, परम्पराओं और जनता के विश्वासों का राजनीतिक प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है।

8. नेतृत्व का अध्ययन (Study of Leadership)-राजनीति शास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण विषय नेतृत्व है। जब लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति और हितों की रक्षा के लिए संगठित होते हैं तब उन्हें नेतृत्व की आवश्यकता अनुभव होती है। कोई भी संगठन अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाता जब तक उस संगठन का अच्छा नेतृत्व नहीं किया जाता। नेतृत्व के बिना कोई संगठन सफल नहीं हो सकता। समाज में सदा कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक योग्यता रखते हैं और दूसरे व्यक्तियों को शीघ्र प्रभावित कर लेते हैं। ऐसे लोगों को नेतागण कहा जाता है। राजनीति शास्त्र में नेतृत्व और अच्छे नेता के गुणों का अध्ययन किया जाता है।

9. राजनीतिक दलों का अध्ययन (Study of Political Parties)-लोकतन्त्रीय प्रणाली बिना राजनीतिक दलों के नहीं चल सकती। राजनीतिक दल क्या हैं, राजनीतिक दलों के प्रकार, राजनीतिक दलों की भूमिका इत्यादि का राजनीति शास्त्र में अध्ययन किया जाता है।

10. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का अध्ययन (Study of International Politics and Organisation) वर्तमान समय में कोई भी राज्य आत्मनिर्भर नहीं है। प्रत्येक राज्य को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए एक राज्य दूसरे राज्यों से सम्बन्ध स्थापित करता है, जिससे कई समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। राजनीति शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का भी अध्ययन करता है। राजनीति शास्त्र में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का भी अध्ययन किया जाता है। राजनीति शास्त्र में युद्ध, शान्ति तथा शक्ति-सन्तुलन की समस्याओं पर विचार किया जाता है। प्रथम महायुद्ध के पश्चात् राष्ट्र संघ और द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी। राजनीति शास्त्र में राष्ट्र संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठन, कार्यों, सफलताओं एवं असफलताओं आदि का अध्ययन किया जाता है।

11. शक्ति तथा सत्ता का अध्ययन (Study of Power and Authority)-मैक्स वैबर, मैरियम, लासवैल, राबर्ट डाहल, डेविड ईस्टन आदि विद्वानों के मतानुसार राजनीति शास्त्र में सभी प्रकार की शक्ति तथा सत्ता का भी अध्ययन किया जाता है। शक्ति तथा सत्ता के क्या अर्थ हैं ? शक्ति तथा सत्ता किस प्रकार प्राप्त होती है, व्यक्ति और व्यक्ति समूह किस प्रकार से शासन संचालन और सार्वजनिक नीतियों के निर्माण को अपनी शक्ति तथा सत्ता से प्रभावित करते हैं इत्यादि ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर राजनीति शास्त्र से ही प्राप्त किया जा सकता है।

12. राजनीति शास्त्र के क्षेत्र के सम्बन्ध में आधुनिक दृष्टिकोण (Scope of Political Science-Most Modern Point of View)-आधुनिक दृष्टिकोण का राजनीतिक क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है। आधुनिक विद्वानों ने राजनीति शास्त्र की नई दिशाएं निर्धारित की हैं। डॉ० वीरकेश्वर प्रसाद सिंह के शब्दों में, “इसे वैज्ञानिकता प्रदान करने के दृष्टिकोण से रूढ़िवादी विषयों, जैसे-राज्य के लक्ष्य, सर्वश्रेष्ठ सरकार, औपचारिक संस्थाओं का अध्ययन, ऐतिहासिक पद्धति आदि को इससे अलग कर दिया गया है। मूल्यों, राज्यों एवं उसकी संस्थाओं के बदले मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार तथा राजनीतिक गतिविधियों का अध्ययन राजनीति शास्त्र के अन्तर्गत किया जाने लगा है।” 1967 में अमेरिकन पोलिटिकल साइंस एसोसिएशन ने राजनीति शास्त्र के विषय क्षेत्र का निर्धारण करते समय इसके 27 उपक्षेत्रों की चर्चा की। जिनमें मुख्य हैं-मनुष्य और उसका राजनीतिक व्यवहार, समूह, संस्थाएं, प्रशासन, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, सिद्धान्त, विचारवाद, मूल्य, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सांख्यिकीय सर्वेक्षण, शोध पद्धतियां आदि।

आर्नल्ड ब्रेश्ट (Arnold Brecht) ने ‘International Encyclopaedia of Social Sciences’ 1968 में राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत अग्र अध्ययन इकाइयां बताई हैं :

(1) समूह (Group), (2) सन्तुलन (Equilibrium), (3) शक्ति, नियन्त्रण एवं प्रभाव (Power, Control and Influence), (4) क्रिया (Action), (5) विशिष्ट वर्ग (Elite), (6) निर्णय (Decision) तथा विनिश्चय-प्रक्रिया, (7) पूर्वाभासित प्रतिक्रिया (Anticipated Action) तथा (8) कार्य (Function)।

13. नई धारणाओं का अध्ययन (Study of New Concepts)-राजनीति शास्त्र में कुछ नई धारणाओं ने जन्म लिया है। इसमें राजनीतिक प्रणाली (Political System), शक्ति की धारणा (Concept of Power), राजनीतिक समाजीकरण (Political Socialization), राजनीतिक सत्ता की धारणा (Concept of Political Authority), उचितता की धारणा (Concept of Legitimacy), प्रभाव की धारणा (Concept of Influence) आदि कुछ नई धारणाएं हैं। इन धारणाओं का अध्ययन राजनीति शास्त्र के अध्ययन क्षेत्र में शामिल है।

इसके अतिरिक्त कुछ समाज-शास्त्र से सम्बन्ध रखने वाली अवधारणाओं का अध्ययन भी इसके अन्तर्गत करते हैं। जैसे-राजनीति, संस्थाएं, सरकार, न्याय, स्वतन्त्रता, समानता आदि। कुछ नवीन अवधारणाएं-समाजीकरण, राजनीतिक विकास, राजनीतिक संचार आदि हैं। अब अत्यधिक वैज्ञानिकता पर बल दिया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति शास्त्र के विषय क्षेत्र के अध्ययन से पता चलता है कि इसका क्षेत्र बहुत विशाल है। इसमें राज्य, सरकार, मनुष्य, समुदाय तथा संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। इसमें कानून तथा विश्व समस्याओं का भी अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र पढ़ने से क्या लाभ हैं?
(What are the advantages of studying Political Science ?)
अथवा
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के महत्त्व की व्याख्या करें। (Discuss the significance of the study of Political Science.)
उत्तर-
कुछ विद्वान् आज के वैज्ञानिक युग में राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों के अध्ययन का कोई मूल्य नहीं समझते, परन्तु उनकी यह धारणा ठीक नहीं है। आइवर ब्राउन (Ivor Brown) ने ठीक ही कहा है कि, “यदि इसे सामाजिक जीवन के यथार्थ मूल्यों के प्रति सहज बुद्धि के दृष्टिकोण से तथा उचित रीति से अध्ययन किया जाए तो राजनीतिक सिद्धान्त ठोस भी हैं और लाभप्रद भी।” प्रत्येक व्यक्ति, व्यक्ति होने के साथ-साथ राज्य का नागरिक भी है। उसका राज्य के साथ अटूट सम्बन्ध है। अतः प्रत्येक के लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना अनिवार्य है। इसके अध्ययन के अनेक लाभ हैं जिनमें से मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

1. राजनीतिक शब्दावली का ठीक ज्ञान प्राप्त होता है (The Knowledge of the Political Terminology)राजनीति शास्र के अध्ययन का पहला लाभ यह है कि इससे राजनीतिक शब्दावली का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त होता है। इसके अध्ययन के बिना राज्य, सरकार, समाज, राष्ट्र, राष्ट्रीयता इत्यादि शब्दों के अर्थों का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त नहीं होता। साधारण मनुष्य राज्य तथा राष्ट्र, राज्य तथा सरकार में कोई अन्तर नहीं करता। राजनीति शास्त्र के अध्ययन से पता चलता है कि इन सब शब्दों में अन्तर है और एक शब्द को दूसरे शब्द के स्थान पर प्रयोग नहीं किया जा सकता। इसके अध्ययन से नागरिकों को स्वतन्त्रता तथा समानता के अर्थों का ठीक-ठीक पता चलता है।

2. राज्य तथा सरकार का ज्ञान (Knowledge of State and Government)-राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। राजनीति शास्त्र के अध्ययन से यह पता चलता है कि राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य के उद्देश्य क्या हैं, इन उद्देश्यों की पूर्ति किस तरह की जा सकती है, सरकार क्या है, सरकार के कौनसे अंग हैं और इन अंगों का आपस में क्या सम्बन्ध है।

3. राज्य का व्यक्ति से सम्बन्ध दर्शाता है (It shows relationship between the State and Man)राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राज्य तथा व्यक्ति के सम्बन्ध का ज्ञान होता है। प्राचीन काल से यह प्रश्न चला आ रहा है कि राज्य तथा व्यक्ति में क्या सम्बन्ध है ? राज्य व्यक्ति के लिए या व्यक्ति राज्य के लिए है? पहले यह समझा जाता था कि राज्य ही सब कुछ है। राज्य व्यक्ति पर मनमाने अत्याचार कर सकता है, इसलिए व्यक्ति पर बहुत अत्याचार किए गए। परन्तु आज हमें राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राज्य तथा व्यक्ति के ठीक सम्बन्ध का ज्ञान होता है।

4. अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान (Knowledge of Rights and Duties)-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य को अपना विकास करने में सहायता देने के लिए राज्य की तरफ से अधिकार दिए तथा उसके कर्त्तव्य निश्चित किए जाते हैं। मनुष्य तभी अपना विकास कर सकता है जब उसे अधिकारों तथा कर्तव्यों का पूरा ज्ञान प्राप्त हो। यह ज्ञान राजनीति शास्त्र से प्राप्त होता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

5. सहनशीलता (Toleration)-आज के युग में नागरिकों के अन्दर सहनशीलता की भावना का होना बहुत आवश्यक है। राजनीति शास्त्र लोगों को सहनशीलता का पाठ सिखाता है। राजनीति शास्त्र यह शिक्षा देता है कि प्रत्येक राज्य एक दूसरे की अखण्डता, प्रभुसत्ता का आदर करे। लोकतन्त्र में तो सहनशीलता की भावना का होना विशेष रूप में अनिवार्य है, क्योंकि लोकतन्त्र में यदि एक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने व भाषण देने की स्वतन्त्रता है तो उसका कर्त्तव्य भी है कि दूसरे के अच्छे न लगने वाले विचारों को भी सहनशीलता से सुने और समझे। अत: यह भावना राजनीति शास्त्र के अध्ययन से उत्पन्न होती है।

6. विभिन्न देशों की शासन-प्रणालियों का ज्ञान (Knowledge of the Governmental Systems of Various countries) राजनीति शास्त्र के अध्ययन से विभिन्न देशों की शासन प्रणालियों का ज्ञान होता है। इसमें विश्व के संविधानों का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार हमें इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका, स्विट्ज़लैण्ड, जर्मनी, जापान, पाकिस्तान इत्यादि देशों के संविधानों का ज्ञान मिलता है। दूसरे देशों के शासन सम्बन्धी ज्ञान से हम अपने देश के शासन में सुधार कर सकते हैं।

7. लोगों में जागरूकता उत्पन्न करता है (Promotes Vigilance among the People)-राजनीति शास्त्र के अध्ययन से नागरिकों के अधिकारों तथा कर्त्तव्य के ज्ञान, विश्व के दूसरे देशों की शासन प्रणाली के ज्ञान, राज्य तथा सरकार के ज्ञान से नागरिकों में जागरूकता उत्पन्न होती है जिससे वे देश के शासन को कार्य कुशल बनाने का प्रयत्न करते हैं। वे शासन कार्यों में दिल से भाग लेते हैं, सरकार की नीतियों की आलोचना करते तथा अपने सुझाव देते हैं। प्रजातन्त्र शासन प्रणाली की सफलता के लिए नागरिकों में जागरूकता होनी अति आवश्यक है। यह सत्य है कि सतत् चौकसी स्वतन्त्रता का मूल्य है (Enternal vigilance is the price of liberty)। यदि नागरिक अपनी स्वतन्त्रता को कायम रखना चाहते हैं तो उन्हें हमेशा ही जागरूक रहना होगा और जागरूकता राजनीति शास्त्र के अध्ययन से आती है।

8. स्वस्थ राजनीतिक दलों की उत्पत्ति (Growth of Healthy Political Parties)–लोकतन्त्र शासन के लिए स्वस्थ राजनीतिक दलों का होना अनिवार्य है। अच्छे व स्वस्थ राजनीतिक दल किसे कहा जा सकता है, इसका पता राजनीति शास्त्र से चल सकता है। हमें राजनीति शास्त्र से ही पता चलता है कि देश के अन्दर स्वार्थ सिद्धि के लिए उत्पन्न हुए छोटे-छोटे गुट व राजनीतिक दल नहीं अपितु इनका ढांचा तो राजनीतिक तथा आर्थिक आधार पर खड़ा होना चाहिए। राजनीति शास्र का ज्ञान रखने वाले नागरिक ही स्वस्थ दलों का निर्माण कर पायेंगे और ऐसे दल सदैव राष्ट्र हित के लिए कार्य करेंगे।

9. राजनीतिज्ञों तथा शासकों के लिए विशेष उपयोगिता (Special advantages to Politicians and Administrators)-राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राजनीतिज्ञों तथा शासकों को विशेष लाभ है। देश के शासन को किस प्रकार चलाया जाए, किस प्रकार के कानून बनाए जाएं कि जनता के लिए अधिक लाभदायक हों? दूसरे देशों के साथ किस प्रकार की नीति को अपनाया जाए? नागरिकों को कौन-से अधिकार दिए जाएं? सरकार के कार्यों में किस प्रकार कुशलता लाई जाए? सार्वजनिक वित्त (Public Finance) के क्या सिद्धान्त हैं ? जनता पर किस प्रकार के टैक्स लगाने चाहिएं? वे कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका सामना प्रत्येक राजनीतिज्ञ तथा शासक को करना पड़ता है और इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर राजनीति शास्र देता है।

10. वर्तमान समस्याओं का हल (Solution of Current Problems)-राजनीति शास्त्र ठोस सिद्धान्तों पर आधारित है और उन सिद्धान्तों को वर्तमान समस्याओं पर लागू करके समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। यदि नागरिकों और शासकों को यह पता है कि अमुक दशा में कौन-से कानून लागू करने चाहिएं तो देश में राजनीतिक प्रगति बड़ी सन्तोषप्रद होगी। यदि शासक अच्छी प्रकार सोच-विचार कर कदम उठाएं तो कोई कारण नहीं कि देश-विदेश की वर्तमान समस्याएं हल न हों।

11. प्रजातन्त्र की सफलता (Success of Democracy)-लोकतन्त्र की सफलता बहुत हद तक राजनीति शास्त्र के अध्ययन पर निर्भर है। लोकतन्त्र जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन होता है। प्रतिनिधियों का सुयोग्य होना अथवा न होना जनता पर निर्भर करता है। जनता को अच्छी सरकार प्राप्त करने के लिए अच्छे प्रतिनिधि चुनने होंगे और यह तभी हो सकता है जब जनता को राजनीतिक शिक्षा मिली हो।

लोकतन्त्र की सफलता में राजनीति शास्त्र का अध्ययन काफ़ी सहयोग देता है, क्योंकि इससे नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कर्त्तव्यों का, सरकार के संगठन कार्यों तथा सरकार के उद्देश्यों का, शासन की विभिन्न समस्याओं का ज्ञान प्राप्त होता है।

12. विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का ज्ञान (Knowledge of Various Political Ideology)राजनीति शास्त्र के अन्तर्गत विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं आदर्शवाद (Idealism), व्यक्तिवाद (Individualism), गांधीवाद (Gandhism), समाजवाद (Socialism), अराजकतावाद (Anarchism), साम्यवाद (Communism) आदि का अध्ययन होता है। इन विचारधाराओं के भिन्न-भिन्न उद्देश्य होते हैं।

13. विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की जानकारी (Knowledge of Various International Organisations)-राजनीति शास्त्र के अन्तर्गत विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं का भी अध्ययन किया जाता है। इन संस्थाओं में संयुक्त राष्ट्र (United Nations), संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organisation), विश्व स्वास्थ्य संघ (World Health Organisation), अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ (I.L.O.) आदि महत्त्वपूर्ण संगठन हैं।

14. छात्र वर्ग के लिए उपयोगी (Useful for Student-Class)-राजनीति शास्त्र विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी तथा अनिवार्य है। आज का छात्र भविष्य का नागरिक व शासक है। अतः छात्र वर्ग को राजनीतिक विचारधाराओं, राजनीतिक प्रणालियों, अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान होना अनिवार्य है।

निष्कर्ष (Conclusion)-अन्त में, हम यह कह सकते हैं कि राजनीति शास्त्र के अध्ययन के अनेक लाभ हैं। भारत में लोकतन्त्र की सफलता तभी हो सकती है जब जनता को शासन के बारे में ज्ञान प्राप्त हो और वे अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का उचित प्रयोग करें। इसके लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन अति आवश्यक है। भारत में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। सरकार भी विद्यार्थियों में राजनीतिक शिक्षा का प्रचार करने के लिए प्रयत्नशील है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र का शाब्दिक अर्थ बताओ।
अथवा
राजनीति (Politics) शब्द की उत्पत्ति तथा इसका अर्थ बताओ।
उत्तर-राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में पोलिटिकल साईंस (Political Science) कहते हैं। यह शब्द पोलिटिक्स (Politics) से निकला है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है जिसका अर्थ है नगरराज्य। ग्रीक लोग नगर-राज्यों में रहते थे, इसलिए उस समय पोलिटिक्स का अर्थ नगर-राज्य के अध्ययन से होता था परन्तु आज बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हो गई है। इसलिए अब हम इसका अर्थ राज्य के अध्ययन से लेते हैं। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में राजनीति शास्त्र वह विषय है जो राज्य का अध्ययन करता है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान की चार परम्परागत परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र की महत्त्वपूर्ण परिभाषाएं निम्नलिखित हैं-

  • प्रो० गार्नर के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।”
  • लीकॉक के अनुसार, “राजनीति शास्त्र केवल सरकार से सम्बन्धित है।”
  • गैटेल के अनुसार, “राजनीति शास्त्र को राज्य का विज्ञान कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध व्यक्तियों के उन समुदायों से है जो राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं, उनकी सरकारों के संगठन से है और सरकारों के कानून बनाने तथा लागू करने और अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों वाली गतिविधियों से है। इसके मुख्य विषय राज्य, सरकार तथा कानून हैं।”
  • गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राजनीति विज्ञान राज्य और सरकार की सामान्य समस्याओं का विवेचन करता है।”

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान की चार आधुनिक परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-

  • बैन्टले का कहना है कि राजनीति में महत्त्वपूर्ण ‘शासन’ और उसकी संस्थाएं नहीं हैं बल्कि शासन के कार्य की प्रक्रिया है और उस पर प्रभाव डालने वाले दबाव समूह हैं। अत: राजनीति विज्ञान शासन प्रक्रिया और दबाव समूहों के अध्ययन का शास्त्र है।
  • लासवैल और कैपलॉन के अनुसार, “एक आनुभाविक खोज के रूप में राजनीति विज्ञान शक्ति के निर्धारण और सहभागिता का अध्ययन है।”
  • डेविड ईस्टन के अनुसार, “राजनीति मूल्यों का सत्तात्मक निर्धारण है जैसे कि यह शक्ति के वितरण और प्रयोग से प्रभावित होता है।”
  • आलमण्ड और पॉवेल के अनुसार, “आधुनिक राजनीति विज्ञान में हम राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं।”

प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र के किन्हीं चार क्षेत्रों का वर्णन करो।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र निम्नलिखित विषयों का अध्ययन करता है

  • राज्य का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में राज्य की उत्पत्ति, उसके विस्तार, राज्य का है, राज्य के तत्त्व, राज्य की प्रकृति और राज्य के भविष्य आदि का अध्ययन किया जाता है।
  • सरकार का अध्ययन–राजनीति शास्त्र में हम अध्ययन करते हैं कि सरकार क्या है ? इसके कौन-कौन से अंग हैं ? इसके कार्य क्या-क्या हैं तथा इसके विभिन्न रूप कौन-से हैं ?
  • शासन प्रबन्ध का अध्ययन-कर्मचारियों की नियुक्ति, स्थानान्तरण, अवकाश सभी बातें जोकि लोक प्रशासन में आती हैं, राजनीति शास्त्र से सम्बन्धित होती हैं।
  • समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में चुनाव प्रणाली, राजनीतिक दल, दबाव समूह, लोक सम्पर्क की व्यवस्था तथा अन्य समुदायों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के चार लाभ बताइये।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान के अध्ययन से अनेक लाभ हैं जिनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं-

  • राजनीतिक शब्दावली का ठीक ज्ञान प्राप्त होता है-राजनीति शास्त्र के अध्ययन का पहला लाभ यह है कि इससे राजनीतिक शब्दावली का ठीक-ठाक ज्ञान प्राप्त होता है। इसके अध्ययन के बिना राज्य, सरकार, राष्ट्र, राष्ट्रीयता आदि शब्दों के अर्थों का सही ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
  • राज्य तथा सरकार का ज्ञान-राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। राजनीति शास्त्र के अध्ययन से यह पता चलता है कि राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई ? राज्य क्या है ? राज्य के उद्देश्य क्या हैं ? इन उद्देश्यों की पूर्ति किस प्रकार की जा सकती है ? सरकार क्या है ? सरकार के कौन-से अंग हैं और उनका आपस में क्या सम्बन्ध है ?
  • अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य को अपना विकास करने में सहायता देने के लिए उसे राज्य की तरफ से अधिकार व कर्त्तव्य दिए गए हैं। मनुष्य तभी अपना पूर्ण विकास कर सकता है जब उसे अपने अधिकारों व कर्त्तव्यों का ज्ञान हो। यह ज्ञान उसे राजनीति शास्त्र से प्राप्त होता है।
  • राजनीति विज्ञान लोगों को सहनशीलता का पाठ सिखाता है।

प्रश्न 6.
राजनीति शास्त्र एक विज्ञान है। इसके पक्ष में चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र के विज्ञान होने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं.-

  • राजनीति शास्त्र में प्रयोग सम्भव है-राजनीति शास्त्र में प्राकृतिक विज्ञानों की तरह प्रयोग, प्रयोगशाला में नहीं होते बल्कि इतिहास राजनीति शास्त्र के लिए एक प्रयोगशाला है। ऐतिहासिक घटनाएं एक प्रयोग हैं जिनसे राज्यशास्त्री अपने परिणाम निकालते हैं।
  • राजनीति शास्त्र में कार्य-कारण का सिद्धान्त-यह ठीक है कि प्राकृतिक विज्ञानों की तरह राजनीति शास्त्र में कार्य-कारण में सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता, परन्तु फिर भी यदि घटनाओं का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जाए तो घटनाओं के ऐसे कारण ढूंढ निकाले जा सकते हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि समान कारणों का काफ़ी सीमा तक समान प्रभाव होता है। विद्वानों ने यह परिणाम निकाला है कि यदि किसी देश की जनता अधिक ग़रीब होती जाएगी तो इसका परिणाम उस देश में क्रान्ति है।
  • तुलनात्मक तथा निरीक्षण पद्धति सम्भव-राजनीति शास्त्र विज्ञान है क्योंकि इसमें भौतिक विज्ञानों की तरह तुलनात्मक प्रणाली का प्रयोग किया जा सकता है। अरस्तु ने 158 संविधानों का अध्ययन करके अपने जो सिद्धान्त प्रस्तुत किए उनमें आज बहत हद तक सच्चाई है।
  • राजनीति विज्ञान में भी भविष्यवाणी की जा सकती है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

प्रश्न 7.
राजनीति शास्त्र एक विज्ञान नहीं है। इस कथन के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र एक विज्ञान नहीं है। इस विषय में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-

  • राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों में एकता नहीं है-रसायन शास्त्र तथा भौतिक शास्त्र के सिद्धान्तों पर वैज्ञानिकों के एक ही विचार होते हैं अर्थात् इनके सिद्धान्तों में एकता पाई जाती है। परन्तु राजनीति शास्त्र में ऐसे सिद्धान्तों की कमी है जिनके विषय में विद्वानों के समान विचार हों।
  • राजनीति शास्त्र में कार्य-कारण सिद्धान्त का न लागू होना-राजनीति शास्त्र को इस आधार पर भी विज्ञान नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान या अन्य किसी विज्ञान की तरह कार्य-कारण का सिद्धान्त पूर्ण रूप से लागू नहीं होता।
  • राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों का प्रयोग असम्भव है-राजनीति शास्त्र विज्ञान नहीं है क्योंकि इसमें उस ढंग से प्रयोग नहीं किए जा सकते जिस ढंग से प्राकृतिक विज्ञानों में किए जाते हैं। राजनीति शास्त्र में रसायन विज्ञान की तरह ऐसे प्रयोग सम्भव नहीं हैं जिनका परिणाम सब समयों पर एक जैसा हो।
  • राजनीति विज्ञान में भविष्यवाणी करने में कठिनाई आती है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में पोलिटीकल साईंस (Political Science) कहते हैं। यह शब्द पोलिटिक्स (Politics) से निकला है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है जिसका अर्थ है नगरराज्य। ग्रीक लोग नगर-राज्यों में रहते थे, इसलिए उस समय पोलिटिक्स का अर्थ नगर-राज्य के अध्ययन से होता था। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में राजनीति शास्त्र वह विषय है जो राज्य का अध्ययन करता है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान की दो परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-

  1. प्रो० गार्नर के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।”
  2. गैटेल के अनुसार, “राजनीति शास्त्र को राज्य का विज्ञान कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध व्यक्तियों के उन समुदायों से है जो राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं, उनकी सरकारों के संगठन से है और सरकारों के कानून बनाने तथा लागू करने और अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों वाली गतिविधियों से है। इसके मुख्य विषय राज्य, सरकार तथा कानून हैं।”

प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र के क्षेत्र की व्याख्या करो।
उत्तर-

  1. राज्य का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में राज्य की उत्पत्ति, उसके विस्तार, राज्य का है, राज्य के तत्त्व, राज्य की प्रकृति और राज्य के भविष्य आदि का अध्ययन किया जाता है।
  2. सरकार का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में हम अध्ययन करते हैं कि सरकार क्या है ? इसके कौन-कौन से अंग हैं ? इसके कार्य क्या-क्या हैं तथा इसके विभिन्न रूप कौन-से हैं ?

प्रश्न 4.
विद्यार्थियों के लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन किस प्रकार महत्त्व रखता है ?
उत्तर-
विद्यार्थियों को राजनीतिक विचारधाराओं, राजनीतिक प्रणालियों और अपने अधिकारों, कर्तव्यों व सरकार की समस्याओं की जानकारी प्राप्त होना आवश्यक है। राजनीति शास्त्र के अध्ययन के द्वारा विद्यार्थियों को इन सभी विषयों की जानकारी प्राप्त होती है। राजनीति शास्त्र विद्यार्थियों को सूझवान व सचेत नागरिक बनने में मदद करता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र का पिता किसे माना जाता है ?
उत्तर-अरस्तु को।

प्रश्न 2. ‘Polis’ किस भाषा का शब्द है ?
उत्तर-ग्रीक भाषा का।

प्रश्न 3. ‘Polis’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर-‘Polis’ का अर्थ है-नगर राज्य (City State)।

प्रश्न 4. ग्रीक लोग कहाँ रहते थे ?
उत्तर-ग्रीक लोग नगर राज्यों में रहते थे।

प्रश्न 5. ‘Political Science’ शब्द किस शब्द से निकला है ?
उत्तर-Politics से ।।

प्रश्न 6. ‘Politics’ शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई है?
उत्तर-Politics शब्द की उत्पत्ति ‘Polis’ से हुई है।

प्रश्न 7. अरस्तु ने कितने संविधानों का अध्ययन किया?
उत्तर-158 संविधानों का।

प्रश्न 8. किसी एक विद्वान् का नाम लिखें, जो राजनीति शास्त्र को विज्ञान मानता है?
उत्तर-अरस्तु।

प्रश्न 9. किसी एक विद्वान् का नाम बताएं, जो राजनीति शास्त्र को विज्ञान नहीं मानता है ?
उत्तर-मैटलैंड।

प्रश्न 10. “जब मैं ऐसे परीक्षा प्रश्नों के समूह को देखता हूँ, जिनका शीर्षक राजनीतिक विज्ञान होता है, तो मुझे प्रश्नों पर नहीं, बल्कि शीर्षक पर खेद होता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर-मैटलैंड।

प्रश्न 11. राजनीति शास्त्र की कोई एक उपयोगिता लिखें।
उत्तर-राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राज्य तथा सरकार का ज्ञान मिलता है।

प्रश्न 12. नगर राज्यों का अध्ययन करने वाले विषय को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-राजनीति शास्त्र।।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. रिपब्लिक पुस्तक के लेखक ………… हैं
2. मैटलैंड राजनीति विज्ञान को विज्ञान ………….. मानता है।
3. राजनीति शास्त्र में राज्य और …………का अध्ययन किया जाता है।
4. अरस्तु ने …………. संविधानों का अध्ययन किया।
उत्तर-

  1. प्लेटो
  2. नहीं
  3. सरकार
  4. 158.

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प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. राजनीति शास्त्र के अध्ययन का मुख्य विषय मशीन को ही समझा जाना चाहिए क्योंकि राजनीति शास्त्र की समस्त मशीनरी मशीन के इर्द-गिर्द ही घूमती है।
2. राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में अर्थशास्त्र (Economics) कहते हैं। यह शब्द पोलिटिक्स से निकला है।
3. पोलिस (Polis) का अर्थ है-नगर-राज्य।
4. गार्नर के अनुसार, “राजनीति शास्त्र केवल सरकार से संबंधित है।”
5. राजनीति शास्त्र के क्षेत्र के संबंध में तीन विचारधाराएं प्रचलित हैं।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
Political Science शब्द किस शब्द से निकला है ?
(क) State से
(ख) Right से
(ग) Politics से
(घ) Freedom से।
उत्तर-
(ग) Politics से।

प्रश्न 2.
यह कथन किसका है, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अंत राज्य के साथ होता है।”
(क) लॉस्की
(ख) गार्नर
(ग) विलोबी
(घ) गैरीज।
उत्तर-
(ख) गार्नर ।

प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र तथा राजनीति विज्ञान में क्या अंतर पाया जाता है ?
(क) राजनीति शास्त्र का जन्म राजनीति से पहले हुआ।
(ख) राजनीति विज्ञान नैतिकता पर आधारित है, जबकि राजनीति सुविधा पर।
(ग) दोनों के लक्ष्य अलग-अलग हैं।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र के विषय-क्षेत्र में शामिल हैं-
(क) राज्य का अध्ययन
(ख) सरकार का अध्ययन
(ग) राजनीतिक विचारधारा का अध्ययन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

Punjab State Board PSEB 8th Class Physical Education Book Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Physical Education Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

PSEB 8th Class Physical Education Guide पौष्टिक और सन्तुलित भोजन Textbook Questions and Answers

नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
भोजन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भोजन एक वस्तु की भान्ति है। मनुष्य हर प्रकार के खाद्य पदार्थों का सेवन करता है। वह मांसाहारी भी है तथा निरामिष भी। मनुष्य लगभग दोनों प्रकार का भोजन खा सकता है; जैसे–अन्न, दालें, सब्जियां, फल, दूध तथा दूध से बने पदार्थ, मांस, मछली, अण्डे आदि। ___ भोजन शरीर का एक आवश्यक अंग है क्योंकि भोजन से शरीर में वृद्धि होती है तथा शरीर के टूटे-फूटे सैलों की मुरम्मत होती है तथा नए सैल बनते हैं। भोजन शरीर को बीमारियों का मुकाबला करने योग्य बनाता है।

प्रश्न 2.
पोष्टिक भोजन किसे कहते हैं ? (From Board M.Q.P.)
उत्तर-
पौष्टिक तत्त्व शरीर का पालन-पोषण करते हैं। खाद्य पदार्थों में कुछ ऐसे तत्त्व पाये जाते हैं जिन्हें खाने के बाद वे शरीर में पचकर शरीर का पोषण करते हैं। जिस भोजन

प्रोटीन के लाभ (Advantages of Proteins)-

  1. यह शरीर में शक्ति पैदा करते हैं।
  2. प्रोटीन शरीर के टूटे-फूटे सैलों की मुरम्मत करते हैं और नए सैलों का निर्माण करते हैं।
  3. ये भोजन को पचाने में सहायता करते हैं।
  4. ये हड़ियों का निर्माण करते हैं।
  5. इनके सेवन से हड्डियां मज़बूत बनती हैं।
  6. यह शरीर का तापमान ठीक रखते हैं।

प्रोटीन की कमी और अधिकता से होने वाली हानियां (Disadvantages of Excess or Less Protein) भोजन में प्रोटीन उचित मात्रा में होनी चाहिए। भोजन में इनकी कमी और वृद्धि दोनों स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। इनकी कमी से शरीर कमजोर हो जाता है, परन्तु इनके बढ़ने से अधिक रक्तचाप, मोटापा, जोड़ों का दर्द (गठिया), जिगर तथा गुर्दे की बीमारियां हो जाती हैं।

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प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट्स क्या है ? शरीर में इसकी कम-से-कम मात्रा की हानियाँ लिखिए।
उत्तर-
कोर्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)—यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। कार्बोहाइड्रेट्स दो प्रकार के होते हैं-शक्कर के रूप में मिलने वाले और स्टॉर्च के रूप में मिलने वाले।
प्राप्ति के स्रोत (Sources) शक्कर के रूप में यह हमें गन्ने के रस, गुड़, चीनी,

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अंगूर, खजूर, शहद, सूखे मेवों, गाजर आदि से मिलते हैं। स्टॉर्च के रूप में यह गेहूँ, मक्की, जौ, ज्वार, शकरकन्द, अखरोट तथा केले आदि से प्राप्त होते हैं।

कार्बोहाइड्रेट्स के लाभ (Advantages of Carbohydrates)-

  1. कार्बोहाइड्रेट्स हमारे शरीर को गर्मी तथा शक्ति प्रदान करते हैं।
  2. ये शरीर में चर्बी पैदा करते हैं।
  3. ये चर्बी से सस्ते होते हैं और ग़रीब व कम आय वाले लोग भी इनका प्रयोग कर सकते हैं।

कार्बोहाइड्रेट्स की कमी और अधिकता से होने वाली हानियाँ (Advantages of Carbohydrates)-

  1. कार्बोहाइड्रेटस की अधिक मात्रा लेने से भोजन शीघ्र हज़म नहीं होता। भोजन का अधिकांश भाग बिना पचे ही शरीर से बाहर निकल जाता है।
  2. इनके अधिक प्रयोग से शरीर में मोटापा आ जाता है तथा पेशाब सम्बन्धी कई रोग लग जाते हैं।
  3. इनका कम मात्रा में प्रयोग करने से शरीर कमजोर हो जाता है।
  4. कार्बोहाइड्रेट्स अधिक मात्रा में लेने से शूगर, ब्लड प्रेशर और जोड़ों का दर्द होने लगता है।

प्रश्न 6.
चर्बी से क्या अभिप्राय है ? यह कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-
चर्बी (Fat)-यह कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का मिश्रण है। यह शरीर में ईंधन का कार्य करती है। चर्बी का मुख्य कार्य शरीर में गर्मी और शक्ति पैदा करना है। एक साधारण व्यक्ति के दैनिक भोजन में चर्बी की मात्रा 50 से 70 ग्राम तक होनी चाहिए।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन 2

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—वनस्पति से प्राप्त होने वाली चर्बी सब्जियों, सूखे मेवों, फलों, अखरोट, बादाम, मूंगफली, बीजों से प्राप्त तेल आदि से प्राप्त होती है। पशुओं से प्राप्त होने वाली चर्बी, घी, दूध, मक्खन, मछली के तेल, अण्डे आदि में पाई जाती है।

चर्बी के अधिक प्रयोग से हानि (Disadvantages of Extra Fat)-

  • पाचनक्रिया बिगड़ जाती है।
  • रक्त-संचार में रुकावट पड़ जाती है।
  • शरीर में मोटापा आ जाता है।
  • हृदय रोग और शूगर का रोग होने का भय रहता है।

चर्बी के कम प्रयोग से हानि (Disadvantages of Less Faty)

  • चर्बी के कम प्रयोग के कारण शरीर दुबला पतला हो जाता है।
  • चर्बी की कमी के कारण शरीर में कमजोरी आ जाती है।

प्रश्न 7.
‘दूध एक सम्पूर्ण आहार है,’ वर्णन करें।
उत्तर-
दूध एक आदर्श तथा सम्पूर्ण भोजन है (Milk is an ideal Food) क्योंकि दूध में हर प्रकार के आवश्यक तत्त्व मिल जाते हैं। इसमें 3.6% चर्बी, 3.4% प्रोटीन, 4.8% कार्बोहाइड्रेट्स, 0.7% नमक तथा 7.5% पानी होता है। – दूध को सम्पूर्ण भोजन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि छोटे बच्चों को केवल दूध ही दिया जाता है। यह बच्चों के लिए भोजन ही है। सामान्यतः घरों में हम रोगी व्यक्तियों के लिए दूध का प्रयोग करते हैं जो खुराक का कार्य करता है।

शरीर की उचित तन्दरुस्ती के लिए दूध एक प्रकार के सन्तुलित भोजन का कार्य करता है। दूध में भोजन के सभी आवश्यक तत्त्व प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, चर्बी, खनिज लवण,पानी तथा विटामिन उचित मात्रा में मिलते हैं। ये भिन्न-भिन्न तत्त्व मानव शरीर में भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं।

दूध में भोजन के सभी आवश्यक तत्त्वों के विद्यमान होने के कारण उसे उचित और आदर्श खुराक माना जाता है। इसलिए दूध को एक सम्पूर्ण भोजन कहा जाता है।

प्रश्न 8.
भोजन पकाने के कौन-कौन से सिद्धान्त हैं ?
उत्तर-
भोजन पकाने के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

  1. भोजन पकाने वाला व्यक्ति साफ़-सुथरा तथा आरोग्य होना चाहिए।
  2. भोजन पकाने वाला स्थान भी साफ़-सुथरा होना चाहिए। इसको जाली लगी हुई होनी चाहिए ताकि मच्छर, मक्खी आदि भीतर न जा सकें।
  3. भोजन पकाने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले बर्तन भी साफ़ होने चाहिएं।
  4. रोटी पकाने से दस-पन्द्रह मिनट पहले आटा अच्छी प्रकार गूंथ कर रख लेना चाहिए। बिना छाने आटे का प्रयोग अति लाभदायक है।
  5. सब्जियां और दालें साफ़ पानी में अच्छी प्रकार दो-तीन बार धो कर पकानी चाहिए ताकि इन पर छिड़की हुई दवायें साफ़ हो जाएं।
  6. भोजन को बहुत ज्यादा नहीं पकाना चाहिए क्योंकि ज़्यादा पकाने से भोजन के तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। भोजन कच्चा भी नहीं होना चाहिए क्योंकि कम पका हुआ भोजन जल्दी हज़म नहीं होता।
  7. भाप द्वारा प्रैशर कुक्कर में तैयार किया हुआ भोजन बहुत लाभदायक होता है। ऐसे भोजन के तत्त्व नष्ट नहीं होते।
  8. भोजन को सदा ढक कर रखना चाहिए।

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प्रश्न 9.
भोजन खाने से सम्बन्धित ज़रूरी नियमों का वर्णन करें।
उत्तर-
भोजन सम्बन्धी जरूरी नियम-जो भोजन हम खाते हैं उसका पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए हमें कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। इन नियमों का विवरण नीचे दिया जाता है-

  1. भोजन सदा नियमित समय पर करना चाहिए।
  2. भोजन करने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोना चाहिए।
  3. भोजन अच्छी तरह चबा कर और धीरे-धीरे खाना चाहिए।
  4. भोजन करते समय न तो पढ़ना चाहिए और न ही बातें करनी चाहिए।
  5. भोजन खाते समय प्रसन्न रहना चाहिए। उस समय किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
  6. भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए।
  7. भोजन सदा आवश्यकतानुसार ही करना चाहिए। बहुत कम या बहुत अधिक खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
  8. तली हुई वस्तुएं शीघ्र नहीं पचतीं इसलिए इनको बहुत थोड़ी मात्रा में खाना चाहिए।
  9. बासी और खराब भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
  10. दोपहर का भोजन करने के उपरान्त कुछ समय के लिए आराम करना लाभदायक होता है।
  11. रात को सोने से दो घण्टे पहले भोजन खाना चाहिए। भोजन खाने के तुरन्त बाद सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
  12. भोजन के शीघ्र बाद व्यायाम आदि करना हानिकारक होता है।
  13. गर्म-गर्म भोजन खाने के बाद ठण्डा पानी नहीं पीना चाहिए।
  14. भोजन खाने के बाद अच्छी तरह कुल्ली करके दाँतों को साफ़ करना चाहिए नहीं तो दाँतों में भोजन के अंश फंसे रहेंगे जिसके कारण मुंह से बदबू आएगी।
  15. भोजन करने वाला स्थान साफ़-सुथरा होना चाहिए।
  16. बहुत चटपटी और मसालेदार वस्तुएं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं।
  17. भोजन ढक कर रखना चाहिए।
  18. भोजन सदा बदल-बदल कर करना चाहिए।
  19. मीठी और खट्टी वस्तुएं अधिक मात्रा में प्रयोग नहीं करनी चाहिए।
  20. पानी सदा भोजन के मध्य में पीना चाहिए।
  21. भोजन ठीक ढंग से पकाया हुआ होना चाहिए।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित पर नोट लिखें।
(क) मोटा आहार
(ख) पानी
(ग) खनिज पदार्थ
(घ) भोजन पकाना।
उत्तर-
(क) मोटा आहार (रेशेदार) (Roughage/Cellulose) मनुष्य के भोजन में विद्यमान रेशेदार कार्बोहाइड्रेट्स को मोटा आहार कहते हैं। हमें मोटा आहार सब्जियों फल, मूली, शलगम, गाजर, खीरा, सलाद तथा अन्य वनस्पति खाद्य-पदार्थों को छिल्के सहित खाने से प्राप्त होता है। इसकी कमी से हमें कब्ज तथा अधिकता से दस्त लग जाते हैं।

(ख) पानी (Water)—यह ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का यौगिक है। शरीर का लगभग 70% भाग पानी है। इसके बिना जीवन असम्भव है। वयस्क व्यक्तियों के लिए प्रतिदिन \(1 \frac{1}{2}\) से \(2 \frac{1}{2}\) लिटर पानी की आवश्यकता होती है, परन्तु जलवायु और कार्य की स्थिति में अन्तर होने से पानी की आवश्यकता घटती-बढ़ती रहती है। गर्मियों में पानी की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

पानी के लाभ (Advantages)-

  1. पानी रक्त को द्रव अवस्था में रखकर संचालन में सहायता प्रदान करता है।
  2. यह भोजन को घोल कर पाचन क्रिया में सहायता देता है।
  3. पानी की प्यास को शान्त करता है।
  4. पानी से शरीर का तापमान एक समान रहता है।
  5. पानी से गंदगी पसीने और मल-मूत्र के रूप में बाहर निकल जाती है।
  6. पानी शरीर में रक्त का दौरा आसान करता है।

(ग) खनिज पदार्थ (Mineral) हमारे शरीर को कैल्शियम, फॉस्फोरस, सोडियम, लोहा, मैग्नीशियम, पोटाशियम, आयोडीन, क्लोरीन और गन्धक जैसे तत्त्वों की अधिक आवश्यकता रहती है। ये तत्त्व लवण के रूप में भोजन से प्राप्त होते हैं। हमारे दैनिक भोजन में खनिज पदार्थों की मात्रा 10 से 15 ग्राम होनी चाहिए।

प्राप्ति के स्रोत (Sources) खनिज पदार्थ हरे पत्ते वाली सब्जियों, ताजे फलों, मांस, मछली, दूध, पनीर आदि पदार्थों से मिलते हैं।

खनिज पदार्थ के लाभ (Advantages of Mineral)-

  1. ये मांसपेशियों के तन्तुओं का विकास करते हैं। . :
  2. रक्त के रंग को लाल करते हैं।
  3. कैल्शियम रक्त को जमने में सहायता देता है।
  4. शरीर के सभी अंगों को ठीक काम करने में सहायता देते हैं।

खनिज पदार्थ की कमी से हानियां (Disadvantages of less Mineral) भोजन में इसकी कमी से निम्नलिखित रोग लग जाते हैं –

  1. शरीर शीघ्र रोगग्रस्त हो जाता है।
  2. हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं।
  3. शरीर में पीलापन आ जाता है।
  4. गिल्लड़ नामक रोग हो जाता है।

(घ) भोजन पकाना (Cooking)-कई खाद्य पदार्थ पकाने के बाद ही खाने योग्य होते हैं; जैसे दालें, अनाज़, सब्जियां आदि। खांद पदार्थों को भिन्न-भिन्न ढंगों से आग पर पका कर खाने योग्य बनाया जाता है। इस प्रक्रिया को भोजन पकाना कहते हैं। अच्छी तरह से पकाया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। भोजन को ठीक विधि से पकाया जाना चाहिए, क्योंकि अधिक देर आग पर रखने से भोजन में विटामिन सी और डी की विशेष हानि होती है।

निम्नलिखित कारणों के कारण भोजन को पकाना अत्यन्त आवश्यक है –

  1. ठीक ढंग से पका हुआ भोजन आसानी से पचने के योग्य बन जाता है।
  2. भोजन को पकाने से रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
  3. पकाया हुआ भोजन स्वादिष्ट होता है, इसलिए उसे खाने को मन करता है।
  4. पकाने से खाद्य पदार्थों को अधिक देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

Physical Education Guide for Class 8 PSEB प्राथमिक सहायता Important Questions and Answers

बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संतुलित भोजन है –
(क) प्रोटीन
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) चर्बी और खनिज लवण
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
प्रोटीन किस से बना है ?
(क) कार्बन
(ख) ऑक्सीजन
(ग) हाइड्रोजन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 3.
प्रोटीन की किस्में हैं
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर-
(क) दो

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट्स कितनी प्रकार के हैं ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर-
(ख) तीन

प्रश्न 5.
चर्बी के स्रोत हैं-
(क) फल और अखरोट
(ख) बादाम, मूंगफली
(ग) तिल
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 6.
सम्पूर्ण भोजन है-
(क) दूध
(ख) फल, दूध, अखरोट
(ग) बादाम
(घ) उपरोक्त कोई नहीं।
उत्तर-
(ख) फल, दूध, अखरोट

प्रश्न 7.
भोजन खाने के नियम –
(क) समय के अनुसार भोजन खाएं
(ख) भोजन खाने से पहले हाथ धो लें
(ग) भूख लगने पर ही भोजन करें
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

बहन छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
खाने की वे चीजें जो हमारी भूख को सन्तुष्ट करें और शरीर का विकास करें, भोजन कहलाती है।

प्रश्न 2.
भोजन में पाए जाने वाले खनिज लवणों के नाम बताएं। .
उत्तर-
कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौ कण, सोडियम, मैग्नीशियम, पोटाशियम, आयोडीन, क्लोरीन और गन्धक खाने के खनिज हैं।

प्रश्न 3.
भाप से पकाया भोजन अच्छा क्यों होता है ?
उत्तर-
भाप से पके भोजन में पौष्टिक तत्त्व खराब नहीं होते हैं ।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर में कितने प्रतिशत तक पानी होता है ?
उत्तर-
हमारे शरीर में 60 प्रतिशत पानी होता है ।

प्रश्न 5.
प्रोटीन कितने प्रकार के होते हैं ? उनके नाम लिखो।
उत्तर-
प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं-पशु प्रोटीन तथा वनस्पति प्रोटीन।

प्रश्न 6.
पशु प्रोटीन के तीन स्रोत बताओ।
उत्तर-
मांस, मछली और दूध।

प्रश्न 7.
वनस्पति प्रोटीन के तीन स्त्रोत बताओ।
उत्तर-
दालें, मटर, सोयाबीन।

प्रश्न 8.
कार्बोहाइड्रेट्स क्या हैं ?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट्स कार्बन और हाइड्रोजन का मिश्रण है।

प्रश्न 9.
विटामिन कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
विटामिन छ: प्रकार के होते हैं-A, B, C, D, E और K।

प्रश्न 10.
अंधराता रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
यह रोग विटामिन A की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 11.
किस विटामिन की कमी के कारण स्कर्वी रोग हो जाता है ?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 12.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी के कारण हो जाता है ?
उत्तर-
विटामिन B की कमी के कारण।

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प्रश्न 13.
पायोरिया रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 14.
बांझपन का रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
विटामिन E की कमी के कारण।

प्रश्न 15.
कौन-से विटामिन पानी में घुलनशील नहीं हैं ?
उत्तर-
विटामिन C, D, E और K।

प्रश्न 16.
छोटे बच्चे के लिए कौन-सा दूध अच्छा होता है ?
उत्तर-
माँ का दूध।

प्रश्न 17.
भोजन पकाने के कौन-कौन से ढंग हैं ? नाम बताओ।
उत्तर-
उबालना, भूनना, तलना और भाप द्वारा पकाना।

प्रश्न 18.
हमारे दैनिक भोजन में प्रोटीन की मात्रा कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर-
70 से 100 ग्राम।

प्रश्न 19.
कार्बोहाइड्रेट्स किन तत्त्वों का मिश्रण है ?
उत्तर-
ऑक्सीजन, हाइड्रोजन तथा कार्बन।

प्रश्न 20.
कार्बोहाइड्रेट्स किन दो रूपों में मिलते हैं ?
उत्तर-
स्टॉर्च तथा शर्करा के रूप में।

प्रश्न 21.
प्रोटीन किन तत्त्वों का मिश्रण है ?
उत्तर-
कार्बन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन तथा गन्धक।

प्रश्न 22.
जीवन तत्त्व किन्हें कहते हैं ?
उत्तर-
विटामिनों को।

प्रश्न 23.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
विटामिन B तथा C।

प्रश्न 24.
हमारे भोजन में चर्बी (वसा) की मात्रा कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर-
50 से 70 ग्राम।

प्रश्न 25.
लोहे की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है ?
उत्तर-
रक्त में हीमोग्लोबिन कम हो जाता है।

प्रश्न 26.
भोजन खाने का स्थान कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
साफ-सुथरा और हवादार।

छोट जत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन हमारे शरीर के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
प्रत्येक मनुष्य को जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। हम प्रतिदिन किसी-न-किसी खेल में भाग लेते हैं अथवा कई अन्य प्रकार के कार्य करते हैं।
इसके साथ ही हम हर समय शारीरिक क्रियाएं करते हैं। इन सभी क्रियाओं को पूरा करने के लिए हमें शक्ति की आवश्यकता होती है। वह शक्ति हमें भोजन से ही मिलती है।

प्रश्न 2.
भोजन से हमें क्या लाभ हैं ?
उत्तर-

  1. भोजन शरीर को शक्ति देता है।
  2. भोजन से शरीर बढ़ता है।
  3. भोजन से शरीर के टूटे-फूटे तन्तुओं की मुरम्मत होती है।
  4. इससे नए तन्तुओं का निर्माण होता है।
  5. भोजन से रोगों का मुकाबला करने के लिए शक्ति मिलती है।

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प्रश्न 3.
सन्तुलित भोजन के मुख्य तत्त्व कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
सन्तुलित भोजन के मुख्य तत्त्व हैं –

  1. प्रोटीन
  2. कार्बोहाइड्रेट्स अथवा कार्बोज़
  3. वसा (चर्बी)
  4. विटामिन
  5. खनिज लवण
  6. जल
  7. फोकट।

प्रश्न 4.
पानी हमारे शरीर के लिए क्यों लाभदायक है ?
उत्तर-
प्रत्येक मनुष्य को जीवित रहने के लिए पानी की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकते। पानी के नीचे लिखे लाभ हैं

  1. पानी शरीर के सभी सैलों के पालन-पोषण में सहायता करता है।
  2. यह भोजन को अच्छी प्रकार से घोलकर पाचन क्रिया में सहायता देता है।
  3. पानी पौष्टिक तत्त्वों को शरीर के सभी भागों तक ले जाता है।
  4. पानी शरीर के व्यर्थ पदार्थों को पसीने द्वारा बाहर निकाल देता है।
  5. पानी शरीर के तापमान को स्थिर रखता है।

प्रश्न 5.
भोजन पकाना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
भोजन पकाने की आवश्यकता-अच्छी तरह पका हुआ भोजन सेहत के लिए लाभदायक होता है। निम्नलिखित कारणों से भोजन को पकाना अत्यन्त आवश्यक है –

1. ठीक ढंग से पका हुआ भोजन आसानी से पचने के योग्य बन जाता है।
2. भोजन के पकाने से रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
3. पकाया हुआ भोजन स्वादिष्ट होता है। इसलिए उसे खाने को मन करता है।
4. पकाने से खाद्य पदार्थों को अधिक देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

बड़े उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-
भोजन पकाने के विभिन्न ढंगों का वर्णन करें।
उत्तर-
भोजन पकाने के ढंग-भोजन पकाने के लिए निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है
1. उबालना (Boiling) 2. भाप द्वारा पकाना (Cooking With Steam) 3. भूनना (Roasting) 4. तलना (Fry)। इन तरीकों का नीचे संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है –

1. उबालना (Boiling)-इस विधि से खाद्य पदार्थों को पानी में उबालकर पकाया जाता है, परन्तु ऐसा करने से खनिज लवण और विटामिन पानी में घुलकर नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों को उबालते समय थोड़े-से पानी का प्रयोग करना चाहिए। यदि अधिक पानी पड़ जाए तो उस पानी को फेंक देना चाहिए। चावल, दालें, मांस और सब्जियां आदि उबाल कर ही पकाए जाते हैं।

2. भाप द्वारा पकाना (Cooking with Steam) भोजन भाप द्वारा भी पकाया जाता है। इस विधि से तैयार किए गए भोजन में से लाभदायक तत्त्व नष्ट नहीं होते। कुकर में पकाया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। इसलिए इस विधि को अन्य विधियों से श्रेष्ठ समझा जाता है।

3. भूनना (Roasting)-इस विधि द्वारा भोजन को सीधे आग पर रख कर भूना जाता है। अधिक भूनने से भी भोजन के तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार भूना हुआ मांस स्वादिष्ट होता है और शीघ्र हज्म हो जाता है।

4. तलना (Fry)-पकौड़े, समोसे और पूरियां आदि तेल में पकाए जाते हैं। तलने से भोजन शीघ्र तैयार हो जाता है तथा स्वादिष्ट भी बन जाता है। इस विधि से भी भोजन के पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। तले हुए खाद्य पदार्थ शीघ्र हज्म नहीं होते और स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होते हैं। सबसे अच्छा ढंग-ऊपर बताई गई चारों विधियों में से भाप द्वारा भोजन पकाने की विधि सबसे उत्तम है। इस विधि से पकाए हुए भोजन में से पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होते हैं। इस प्रकार पकाया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

Punjab State Board PSEB 8th Class Welcome Life Book Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Welcome Life Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

Welcome Life Guide for Class 8 PSEB शारीरिक स्वच्छता InText Questions and Answers

बहत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हम अच्छे स्वास्थ्य को कैसे बनाए रख सकते हैं?
उत्तर-
अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर को साफ-सुथरा रखना चाहिए।

प्रश्न 2.
अच्छे स्वास्थ्य का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
अच्छा स्वास्थ्य खुद को और समाज के अन्य सदस्यों को बीमारी और कई अन्य बीमारियों से बचाने का एक तरीका है।

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प्रश्न 3.
अच्छी आदतों से आपका क्या भाव है?
उत्तर-
अच्छी आदतें वह क्रिया और गतिविधियां हैं जो किसी व्यक्ति और समाज के लिए अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 4.
दो अच्छी आदतों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. खाने से पहले व बाद में हाथ धोना।
  2. खांसते व छींकते समय मुँह को ढकना।

प्रश्न 5.
क्या हमें सड़क के किनारे बिकने वाला खुला भोजन खाना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए हमें सड़क पर बिकने वाला अस्वस्थ भोजन नहीं खाना चाहिए।

प्रश्न 6.
हमें सड़क के किनारे बिकने वाला भोजन क्यों नहीं खाना चाहिए?
उत्तर-
क्योंकि सड़क पर बिकने वाला भोजन हमें बीमार तथा अस्वस्थ बना सकता है।

प्रश्न 7.
हमें नशीले पदार्थों से क्यों दूर रहना चाहिए?
उत्तर-
हमें अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दवाओं और नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए क्योंकि इनके दुरुपयोग से हमारा शरीर बर्बाद और अस्वस्थ होता जाता है।

प्रश्न 8.
क्या हमें कच्ची सब्जियों को बिना धोए खाना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हमें कभी भी कच्ची सब्जियों को बिना धोए नहीं खाना चाहिए।

प्रश्न 9.
क्या हमें रोजाना स्नान करना चाहिए?
उत्तर-
जी हाँ। हमें रोज़ाना स्नान करना चाहिए।

प्रश्न 10.
क्या हमें रोजाना अपने बालों को धोना चाहिए?
उत्तर-
यदि हमारे बाल छोटे हैं तो हमें अवश्य रोज़ धोने चाहिए परन्तु यदि हमारे बाल लम्बे हैं तो हमें कम-सेकम सप्ताह में एक बार जरूर धोने व अच्छे से सखाने चाहिए।

प्रश्न 11.
क्या परिवार के सभी सदस्यों के लिए एक सामान्य तौलिया होना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हर सदस्य का अपना अपना अलग तौलिया होना चाहिए।

प्रश्न 12.
कितने समय बाद हमें अपने नाखुन काटने चाहिए?
उत्तर-
हमें साप्ताहिक तौर पर अपने नाखुन काटने चाहिए।

प्रश्न 13.
क्या हमारे शरीर की स्वच्छता की देखभाल हमारे लिए अच्छी है?
उत्तर-
जी हाँ। शरीर की स्वच्छता की देखभाल हमारे लिए अच्छी है।

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प्रश्न 14.
हमें अपने दांतों को क्यों साफ करना चाहिए?
उत्तर-
दांतों को साफ-सुथरा व चमकदार रखने के लिए रोज़ाना दांतों की सफाई करनी चाहिए।

प्रश्न 15.
क्या परिवार के सभी सदस्यों के लिए एक सामान्य कंघी होनी चाहिए?
उत्तर-
नहीं । हर एक सदस्य की अपनी एक अलग कंघी होनी चाहिए।

प्रश्न 16.
हम खुद को बीमारियों से कैसे दूर रख सकते हैं?
उत्तर-
हम स्वस्थ रहकर खुद को बीमारियों से दूर रख सकते हैं।

प्रश्न 17.
दांतों की रोजाना सफाई करनी क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
दांतों की रोजाना सफाई करने से दांत व मसूड़े साफ तथा मजबूत रहते हैं।

प्रश्न 18.
हमें किस प्रकार के कपड़े पहनने चाहिए?
उत्तर-
हमें हमेशा साफ व सूखे कपड़े पहनने चाहिए।

प्रश्न 19.
हमें अपने नाखुनों को साफ क्यों रखना चाहिए?
उत्तर-
अपने नाखुनों को साफ रखने से हमें हानिकारक वैक्टीरिया के प्रसार से बचने में मदद मिलेगी।

प्रश्न 20.
हमें अपने शरीर को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए?
उत्तर-
शरीर को स्वच्छ रखने से हम बीमारियों के प्रसार को रोकने में सफल होंगे।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हम किस प्रकार अपने बालों को स्वस्थ रख सकते हैं?
उत्तर-
हम अपने बालों को अच्छी तरह धो कर व सुखा कर स्वस्थ रख सकते हैं। छोटे बालों को रोज़ाना धोना चाहिए और यदि बाल लम्बे हैं तो सप्ताह से एक बार धोने चाहिए। हमें अपने बालों को साबुन या शैंपू से अच्छी तरह धोना चाहिए और अच्छी तरह सुखाना चाहिए।

प्रश्न 2.
हम अपने दांतों को किस प्रकार स्वस्थ रख सकते हैं?
उत्तर-
दांतों को स्वस्थ रखने के लिए हमें रोज़ाना दांतों की सफाई करनी चाहिए। दांतों की सफाई के लिए एक अच्छे दन्तमंजन का इस्तेमाल करना चाहिए। दांतों की सफाई के लिए हम दातुन का प्रयोग भी कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
स्वस्थ रहने के लिए हाथ साफ करना सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है सपष्ट करें।
उत्तर-
हमें अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह से साफ करना चाहिए, विशेष रूप से शौचालय जाने के बाद, खाना खाने से पहले और बाद में, खेलने के बाद आदि। बागवानी के बाद या कोई अन्य गतिविधियां जो हमारे हाथों को गंदा करती हैं। यदि हम गन्दे हाथों से खाते हैं तो हमारे बीमार होने की सम्भावना अधिक होती है। इसका कारण यह है कि वायरस और रोगाणु पैदा करने वाले कई रोग सीधा हमारे पेट में प्रवेश करते हैं और हमें बीमार करते हैं।

प्रश्न 4.
मुँह और नाक ढकना क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
खांसते और छींकते वक्त हमारे मुँह तथा नाक से रोगाणु पैदा करने वाली तरल बूंदें निकलती हैं जो कि दूसरे लोगों को बीमार कर सकती हैं। खांसते व छींकते वक्त मुँह और नाक को ढकना ज़रूरी है। क्योंकि ऐसा करने से रोगाणु पैदा करने वाली तरल बूंदों को रोका जा सकता है, जिससे दूसरे लोगों को स्वस्थ तथा रोगाणु मुक्त रखने में मदद मिलती है।

प्रश्न 5.
कुछ आदतें जो हमें स्वस्थ रहने में मदद करती हैं लिखें।
उत्तर-
निम्नलिखित आदतें हमें स्वस्थ रहने में मदद करती हैं

  1. हमें अपने नाखुन साफ रखने चाहिए और साप्ताहिक उन्हें काटना चाहिए।
  2. यदि हम अपने कपड़े दोबारा पहनना चाहते हैं तो हमें उन्हें धूप में रखना चाहिए।
  3. हमें सड़क के किनारे बेचे जाने वाले खुले भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि यह हमें बीमार करता है।
  4. दवाओं का दुरुपयोग हमारे शरीर को बर्बाद कर देता है इसलिए हमें अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दवाओं से दूर रहना चाहिए।

प्रश्न 6.
फलों और सब्जियों का प्रयोग करने से पहले हमें इन्हें क्यों धोना चाहिए?
उत्तर-
बाज़ार से लाए जाने वाले फल और सब्जियां कई हाथों से निकली हुई होती हैं और उनमें बहुत सारे कीटाणु होते हैं। यह कीटाणु हमारे शरीर में जाकर कई प्रकार की जानलेवा बीमारियां पैदा करते हैं। इसलिए ऐसी कई जानलेवा बीमारियों से बचने के लिए हमें फलों और सब्जियों को इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह धो लेना चाहिए।

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प्रश्न 7.
शरीर को साफ रखने के फायदों के बारे में नीचे लिखें।
उत्तर-
शरीर को साफ रखने के फायदे इस प्रकार हैं

  1. यह हमें स्वस्थ, तरोताजा तथा ऊर्जावान बनाए रखता है।
  2. हम शरीर को साफ रखकर बीमारियों में बच सकते हैं और दवाइयों और अस्पताल के खर्चों से बच सकते
  3. शरीर को साफ रखकर हम बीमारियों को फैलने से रोक सकते हैं तथा समाज को स्वस्थ रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
  4. स्वस्थ रहकर हम अधिक काम करेंगे और इस प्रकार हमारे देश के विकास और प्रगति में योगदान कर सकते हैं।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वस्थ रहने के लिए विभिन्न तरीकों व साधनों का वर्णन करें।
उत्तर-
निम्नलिखित आदतें हमें स्वस्थ रहने में मदद करती हैं जोकि इस प्रकार हैं

  1. रोज़ाना स्नान-हमें रोज़ाना साबुन व पानी से स्नान करना चाहिए जिससे शरीर पर लगी धूल मिट्टी धुल जाती है और हम स्वस्थ रहते हैं।
  2. बालों की सफ़ाई-हमें नियमित रूप से अपने बालों की सफाई करनी चाहिए। यदि बाल लम्बे हों तो उन्हें सप्ताह में एक बार साबुन या शैम्पू से अवश्य धोना चाहिए और यदि बाल छोटे हैं तो उन्हें प्रतिदिन साबुन या शैम्पू से धोना चाहिए और बालों को अच्छे से सुखाना चाहिए।
  3. दाँतों की सफाई- हमें नियमित रूप से दांतों की सफाई करनी चाहिए। दिन में दो बार दांतों को दंतमंजन से अच्छी तरह साफ करना चाहिए। ऐसा करने से हमारे दांत मजबूत व चमकदार बनते हैं साथ ही सांसों की बदबू से भी छुटकारा मिलता है।
  4. साबुन से हाथ धोना-हमें अपने हाथों को साबुन व पानी के साथ अच्छी तरह से धोना चाहिए, विशेषरूप से शौचालय जाने के बाद, भोजन करने से पहले व बाद में, खेलने के बाद, बागबानी के बाद तथा ऐसे कार्यों के बाद जिनके कारण हमारे हाथ गन्दे होते हैं। यदि हम बिना हाथों को धोए भोजन करते हैं तो हाथों पर लगे कीटाणु हमारे शरीर में जाकर कई प्रकार की बीमारियां पैदा कर सकते हैं जिससे हम अस्वस्थ हो जाएंगे।
  5. साफ़ कपड़े पहनना-हमें हमेशा ऐसे कपड़े पहनने चाहिए जो अच्छी तरह से साबुन से धुले और सही तरह से धूप में सूखे हों। यदि आप किसी भी वस्त्र को दोबारा पहनना चाहते हैं तो उसे पहले अच्छे से धूप लगवा लें फिर पहनें।
  6. अलग तौलिया और कंघा-परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपना एक अलग तौलिया और कंघा होना चाहिए।
  7. मुँह तथा नाक को ढकना-खांसते व छींकते वक्त हमें अपने नाक और मुंह को रूमाल से ढकना ज़रूर चाहिए। यह नाक व मुंह से निकलने वाली तरल बूंदों को दूसरों के शरीर में जाने से रोकता है जिससे समाज के दूसरे लोग रोगमुक्त रहते हैं।
  8. नाखुनों की सफ़ाई-हमें हमेशा अपने नाखुनों को साफ रखना चाहिए तथा हर सप्ताह नाखुनों को काटना चाहिए।

प्रश्न 2.
सुबह के समय हमारी दिनचर्या क्या होनी चाहिए?
उत्तर-
निम्नलिखित गतिविधियां हमारी सुबह की दिनचर्या का हिस्सा होनी चाहिए:

  1. हमें सुबह उठने के तुरंत बाद अपना चेहरा धोना चाहिए और अपने दांतों को ब्रश करना चाहिए।
  2. टॉयलेट करने के बाद हमें अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  3. हमें व्यायाम या योग करना चाहिए।
  4. हमें साबुन और शैम्पू का उपयोग करके अपने शरीर और बालों को साफ़ करना चाहिए।
  5. हमें अपने शरीर और बालों को साफ़ और सूखे तौलिए से सुखाना चाहिए। हमारे लिए अलग तौलिया और कंघा होना चाहिए और इन्हें किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए।
  6. हमें सही ढंग से साफ़ और ठीक से प्रेस किए हुए कपड़े पहनने चाहिए।
  7. हमें ताज़ा और ठीक से पकाया हुआ नाश्ता लेना चाहिए, नाश्ते से पहले और बाद में हमें अपने हाथ धोने
    चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारी दोपहर में या स्कूल से घर आने के बाद क्या दिनचर्या होनी चाहिए?
उत्तर-
निम्नलिखित गतिविधियाँ दोपहर की और स्कूल से घर आने के बाद दिनचर्या का हिस्सा होनी चाहिए:

  1. हमें अपने चेहरे और हाथों को अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  2. हमें अपने स्कूल की वर्दी बदलनी चाहिए और साफ कपड़े पहनने चाहिए। हमें अपने गंदे कपड़ों को वॉशिंग मशीन या वॉशिंग एरिया में रखना चाहिए।
  3. हमें अपने स्कूल बैग को उचित स्थान पर रखना चाहिए।
  4. हमें थोड़ी देर आराम करना चाहिए और फिर कुछ पीने या खाने के लिए जाना चाहिए। गर्मियों में हमें घर पहुंचने के तुरंत बाद ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए।

प्रश्न 4.
लंच या डिनर के दौरान हमारी दिनचर्या क्या होनी चाहिए?
उत्तर-
दोपहर के भोजन के दौरान निम्नलिखित गतिविधियाँ हमारी दिनचर्या का हिस्सा होनी चाहिए:

  1. हमें ताजा और ठीक से पकाया हुआ लंच या डिनर लेना चाहिए। हमें दोपहर या रात के खाने से पहले और बाद में अपने हाथ धोने चाहिए।
  2. भोजन लेने के लिए हमें उचित रूप से धुले और साफ़ बर्तनों का उपयोग करना चाहिए।
  3. हमें अपनी थाली में खाना नहीं छोड़ना चाहिए। प्लेट में बचा यह कचरा रोगाणु पैदा करने वाली बीमारी को आमंत्रित करता है।
  4. हमें बर्तन धोने वाले स्थान पर या सिंक में बर्तनों को रखना चाहिए। यह अच्छा है यदि हम उन्हें तुरंत धो लें और इन्हें उचित स्थान पर रखें।
  5. हमें सड़क के किनारे से कुछ भी नहीं खाना चाहिए, यदि वह कवर नहीं है या विक्रेता उन्हें गंदे स्थान पर बेच रहा है।
  6. फलों और सब्जियों को खाने से पहले हमें इसे अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  7. हमें धागे की मदद से दांतों के बीच फंसे भोजन को निकालना चाहिए।

प्रश्न 5.
खेलने के बाद खेल के मैदान से घर लौटने पर हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर-
जब हम खेलने के बाद खेल के मैदान से घर लौटते हैं, तो हमें निम्नलिखित कार्य करना चाहिए :

  1. घर वापस आने के बाद कुछ देर आराम करना चाहिए।
  2. आराम करने के बाद हमें अपना चेहरा और हाथ धोने चाहिए। गर्मियों के दौरान स्नान करना अच्छा होता
  3. हमें आपके कपड़े बदलने चाहिए।
  4. हमें जल स्तर की भरपाई के लिए कुछ पीना चाहिए।
  5. हम ऊर्जा के नुकसान की भरपाई के लिए कार्बोहाइड्रेट से भरपूर कुछ स्नैक्स (खाना खाना) खाने चाहिए।

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प्रश्न 6.
सोने से पहले हमारी दिनचर्या क्या होनी चाहिए?
उत्तर-
हमें रात के खाने के लगभग दो घंटे बाद बिस्तर पर जाना चाहिए और सोने से पहले निम्न कार्य करना चाहिए

  1. हमें साफ-सुथरी रात की पोशाक पहननी चाहिए।
  2. हमें अपने हाथों और पैरों को गर्म पानी से धोना और साफ़ करना चाहिए। हमें गर्मियों के दौरान ताजे पानी से और सर्दियों के दौरान गर्म पानी से अपना मुंह अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  3. हमें साफ बिस्तर का उपयोग करके एक बिस्तर बनाना चाहिए।
  4. हमें अपने बिस्तर के पास थोड़ा ताज़ा पानी रखना चाहिए।
  5. हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शयनकक्ष साफ-सुथरा और हवादार हो।

प्रश्न 7.
अपनी दिनचर्या की जाँच करने के बाद बताएं कि वे कौन-सी आदतें हैं जिनका अधिकांश लोगों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है।।
उत्तर-
अपनी दिनचर्या से हम जानते हैं कि अधिकांस लोग यह जानने के बाद भी कुछ आदतों को अनदेखा करते हैं कि यह हमारी दिनचर्या में शामिल होना चाहिएं

  1. हम आमतौर पर सोने से पहले ब्रश नहीं करते हैं।
  2. हम आमतौर पर भोजन लेने के बाद अपने हाथ नहीं धोते हैं।
  3. हम आमतौर पर कपड़े का उपयोग करने से पहले अपने कपड़े धूप में नहीं रखते हैं।
  4. हम आमतौर पर रात का खाना खाते हैं और खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर जाते हैं।
  5. हम नियमित रूप से योग का अभ्यास नहीं करते हैं।
  6. हम रात के खाने के दौरान भारी और गरिष्ठ भोजन खाते हैं।
  7. जब हम भूखे होते हैं तो हमें सड़क के किनारे बिकने वाला खुला खाना खाने से बचना चाहिए।
  8. हम बासी खाना गर्म करने के बाद या बिना गर्म किए खाते हैं।
  9. हम अपने भोजन में विभिन्न प्रकार की चीज़ों को नहीं रखते हैं।
  10. हम ज्यादातर मूल भोजन खाते हैं और नियमित रूप से सलाद और हरी पत्तेदार सब्जियां नहीं खाते हैं।
  11. खांसते या छींकते समय हम अपनी नाक और मुंह नहीं ढंकते।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
“हमारा सबसे अच्छा दोस्त हमारा:
(क) अच्छा स्वास्थ्य
(ख) पैसा
(ग) परिवार
(घ) रिश्तेदार।
उत्तर-
(क) अच्छा स्वास्थ्य।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित कार्यों में से कौन-सा कार्य हमें सेहतमन्द रहने में सहायता करता है?
(क) अधिक पौष्टिक भोजन खाना
(ख) नियमित व्यायाम करना
(ग) पर्याप्त आराम करना
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 3.
हमें अपने नाखुन काटने चाहिए:
(क) रोजाना
(ख) साप्ताहिक
(ग) महीने में एक दिन (मासिक)
(घ) कभी भी नहीं।
उत्तर-
(ख) साप्ताहिक।

प्रश्न 4.
हमें अपने दांतों की सफाई करनी चाहिए:
(क) सोने से पहले और सुबह उठने के बाद
(ख) खेल के मैदान से आने के बाद
(ग) पढ़ने के बाद
(घ) व्यायाम करने के बाद।
उत्तर-
(क) सोने से पहले और सुबह उठने के बाद।

प्रश्न 5.
हमेशा अपने मुंह को अपने हाथों से ढक लेना चाहिए:
(क) छींकने पर
(ख) खांसने पर
(ग) छींकने तथा खांसने पर
(घ) भोजन करते वक्त।
उत्तर-
(ग) छींकने तथा खांसने पर।

प्रश्न 6.
हमें हमेशा अपने पास रखना चाहिए:
(क) एक कलम
(ख) एक किताब
(ग) एक रूमाल
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(ग) एक रूमाल।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित कार्यों में से कौन-सा कार्य हमें रोजाना करना चाहिए?
(क) नहाना
(ख) दांतों की सफाई
(ग) व्यायाम
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 8.
हमें रोज़ सुबह ………….. करना चाहिए।
(क) नाश्ता
(ख) दांतों की सफाई
(ग) व्यायाम
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ग़लत है?
(क) खांसते वक्त रूमाल का इस्तेमाल करना
(ख) हमेशा अपने नाखुनों को दांतों से काटना
(ग) हाथ धोने के बाद नल बन्द करना
(घ) हमेशा कूड़ा कूड़ेदान में फैंकना।
उत्तर-
(ख) हमेशा अपने नाखूनों को दांतों से काटना।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित कथनों को ध्यान में रखते हुए सही विकल्प चुनें। कथन (क) हमें रोजाना सुबह नाश्ता करना चाहिए कथन (ख) हमें रोज़ाना अपने दांतों अथवा बालों की सफाई करनी चाहिए।
(क) कथन क सही तथा
(ख) गलत है
(ख) कथन क गलत तथा ख सही है
(ग) दोनों क व ख सही हैं
(घ) दोनों कथन गलत हैं।
उत्तर-
(ग) दोनों क व ख सही हैं।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौन-सा ज़रूरी नहीं? अपने हाथों को ……… धोना।
(क) खाने से पहले
(ख) खाने के बाद
(ग) खाने से पहले व बाद
(घ) कभी नहीं।
उत्तर-
(ग) खाने से पहले व बाद।

प्रश्न 12.
हमें उबला हुआ पानी पीना चाहिए क्योंकि उबालने से पानी में मौजूद ……… मर जाते हैं।
(क) रोगाणु
(ख) खनिज पदार्थ
(ग) a व b
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) रोगाणु।

प्रश्न 13.
फ्लासिंग (दांतों की साफ करवाना) अनेक प्रकार के कार्य करता है। परन्तु निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य नहीं करता?
(क) दांतों के बीच से खाना हटाना।
(ख) मसूड़ों की कमी को रोकने में मदद करना
(ग) सांसों की बदबू को रोकने में मदद करना
(घ) दांतों की परत को बहाल करने में मदद करना।
उत्तर-
(घ) दांतों की परत को बहाल करने में मदद करना।

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रिक्त स्थान भरो:

  1. हमें हमेशा अपने पास एक ……………… रखना चाहिए।
  2. हमें हमेशा अपने …………….. खाना खाने से पहले अथवा बाद में धोने चाहिए।
  3. हमें हमेशा साफ व सूखे ……………… पहनने चाहिए।
  4. हमें हमेशा खांसते व छींकते वक्त अपना …………….. ढकना चाहिए।
  5. हमें हर सप्ताह अपने …………… काटने चाहिए। 6. हमें दिन में दो बार अपने ……………… साफ करने चाहिए।
  6. हमें हमेशा सड़क पर बिकने वाला …………… खाद्य पदार्थों को खाने से बचना चाहिए।
  7. हमें रोज़ाना ……………. करना चाहिए।
  8. हमें हमेशा अपने …………….. को सुलझे तथा साफ रखना चाहिए।
  9. हमारे ……………… को स्वस्थ रखकर अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है।

उत्तर –

  1. रूमाल
  2. हाथ
  3. कपड़े
  4. मुँह
  5. नाखुन
  6. दांत
  7. अस्वच्छ
  8. स्नान
  9. बालों
  10. शरीर।

सही/ग़लत:

  1. एक परिवार के पास केवल एक कंघी होनी चाहिए।
  2. हमें हमेशा अपने नाखुन साफ रखने चाहिए तथा उनको कभी नहीं काटना चाहिए।
  3. सड़क पर बिकने वाला खुला भोजन हमारी सेहत के लिए हानिकारक होता है।
  4. दांतों की रोज़ाना सफ़ाई हमारे दांतों और मसूड़ों को साफ और कमजोर रखने में मदद करती है।
  5. कीटाणु हमारे पेट में प्रवेश करने पर कई जानलेवा संक्रमण पैदा कर सकते हैं।
  6. फलों और सब्जियों को खाने से पहले अच्छी तरह धोना चाहिए।
  7. सड़क के किनारे बिकने वाले खुले भोजन को खाना एक अच्छी आदत है।
  8. रोज़ाना कसरत और योगा करना हमारे शरीर को कमज़ोर करता है।
  9. लंबे बालों को हफ्ते में कम-से-कम एक बार धोना चाहिए और अच्छी तरह सुखाना चाहिए।
  10. हम अपने आस-पास को गंदा रख अच्छा स्वास्थ्य पा सकते हैं।

उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही
  6. सही
  7. ग़लत
  8. ग़लत
  9. सही
  10. ग़लत।