PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 22 विज्ञापन युग

Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Chapter 22 विज्ञापन युग Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Hindi Chapter 22 विज्ञापन युग

Hindi Guide for Class 11 PSEB विज्ञापन युग Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-

प्रश्न 1.
‘विज्ञापन युग’ निबन्ध में लेखक ने विज्ञापन कला पर करारा व्यंग्य किया है।
उत्तर:
प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने विज्ञापन कला पर करारा व्यंग्य किया है। लेखक कहते हैं कि उसे गज़लों, गानों और गीतों के साथ-साथ सिर दर्द के विज्ञापन भी सुनने को मिलते हैं। लेखक कहते हैं-पहले बहुत मीठे गले से ‘रहना नहीं देश विराना है’ की लय और उसके तुरन्त बाद-क्या आपके शरीर में खुजली होती है? खुजली का नाश करने के लिए एक ही राम बाण औषधि है-कर लें भगत कबीर क्या करते हैं। खुजली कंपनी उनकी जिस रचना पर चाहे अपनी मोहर चिपका सकती है। _लेखक कहते हैं कि विज्ञापन गीत गज़लों तक ही सीमित नहीं रहते, आज हर चीज़ का विज्ञापन मौजूद है। अजन्ता और एलोरा की मूर्तियों के केश सौन्दर्य लेखक को तेल की एक शीशी के विज्ञापन की याद दिलाता है; उन मूर्तियों की आँखें किसी फॉर्मेसी का विज्ञापन प्रतीत होती हैं तथा उनका समूचा शरीर किसी पेट्रोल कम्पनी का विज्ञापन।

लेखक विज्ञापन कला पर व्यंग्य करते हुए कि देश के कोने में स्थित मन्दिर, पुराने खंडहर स्मारक आदि पर्यटन व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ विज्ञापनों का भी साधन बन सकते हैं। लेखक को डर है कि विज्ञापन कला जिस तेज़ी से उन्नति कर रहा है एक दिन ऐसा आएगा जब शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और साहित्य का प्रयोग केवल विज्ञापन के लिए ही रह जाएगा तथा विज्ञापन का उपयोग एक-दूसरे पर आश्रित जगहों पर किया जाएगा। जैसे दवा की शीशियों में मक्खन के डिब्बों के विज्ञापन और मक्खन के डिब्बों पर दवा की शीशियों के विज्ञापन।

लेखक के अनुसार आज हर जगह विज्ञापन ही विज्ञापन नज़र आते हैं। लेखक को हर चेहरे में एक विज्ञापन नज़र आता है।

PSEB 11th Class Hindi Solutions Chapter 22 विज्ञापन युग

प्रश्न 2.
‘विज्ञापन युग’ निबन्ध का सार लिखें।
उत्तर:
प्रस्तुत निबन्ध एक व्यंग्यपरक निबन्ध है। इसमें लेखक ने विज्ञापन कला के विकसित होने पर उसे सिर दर्द कारण भी बताया गया है। लेखक कहते हैं कि पड़ोसियों की कृपा से उसे दिन रात गज़लों और भजनों के साथ चाय, तेल और सिर दर्द की टिक्कियों के विज्ञापन सुनने पड़ते हैं। यह विज्ञापन लेखक के दिलो-दिमाग़ पर सदा छाए रहते हैं। परिणाम यह हुआ है कि लेखक के लिए गज़ल-गज़ल न रह कर किसी न किसी चीज़ का विज्ञापन बन गए। लेखक को लगता है कि हर चीज़ विज्ञापन बन कर रह गई है। अजन्ता एलोरा की मूर्तियों का केश विन्यास लेखक को एक तेल की शीशी की याद दिलाता है। इसी तरह मूर्तियों की आँखें एवं उनका समूचा कलेवर किसी-न-किसी कम्पनी का विज्ञापन बन कर रह गया है।

लेखक कहते हैं कि देश में जितने भी मन्दिर पुराने किले और स्मारक आदि हैं वे सब पर्यटन व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ एक विशेष ब्रांड के सीमेंट की मजबूती को व्यक्त करने के प्रतीक बन सकें। इसी तरह सफ़ेद रंग के शहद का विज्ञापन और सेब के मुरब्बे का विज्ञापन हो सकता है। लेखक का मत है कि विज्ञापन किसी भी चीज़ का हो सकता है। हम जहाँ भी रहे विज्ञापनों की लपेट से नहीं बच सकते।

लेखक का मत है कि विज्ञापन कला इतनी तेजी से उन्नति कर रही है कि उसे डर है कि आने वाले समय में शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और साहित्य आदि का उपयोग विज्ञापन कला के लिए ही रह जाएगा। लेखक कहते हैं कि अभी तक बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जिनका विज्ञापन के लिए प्रयोग नहीं किया जा सका है जैसे दवा की शीशियों में मक्खन के डिब्बों के विज्ञापन होने चाहिएँ। कम्बलों और दुशालों में चाय और कोको के विज्ञापन दिए जा सकते हैं। अस्पताल की दीवारों पर वैवाहिक विज्ञापन लगाए जा सकते हैं। यह तो भविष्य की बात है, पर आज की स्थिति यह है कि लेखक को हर जगह विज्ञापन ही विज्ञापन दिखाई देता है। लेखक को चाय देने वाला लड़का भी क्लोरोफ़िल मुस्कराहट मुस्करा रहा होता है। तब लेखक को स्त्री कण्ठ की मधुर आवाज़ में यह विज्ञापन सुनाई पड़ता है कि लिवर ठीक रखने के लिए लिवर इमल्शन लीजिए। लेखक को अपने सामने आने वाला हर चेहरा किसी विज्ञापन का रूप नज़र आता है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-

प्रश्न 1.
विज्ञापन ने व्यक्तिगत जीवन में किस प्रकार प्रवेश कर लिया है ? पाठ के आधार पर उत्तर दें।
उत्तर:
विज्ञापन आज व्यक्तिगत जीवन में भी प्रवेश कर गया है। इस बात पर प्रकाश डालते हुए लेखक कहते हैं कि उन्हें गीत, भजन और गज़ल सुनने के साथ-साथ चाय, तेल और सिरदर्द की टिकियों के विज्ञापन भी सुनने पड़ते हैं। परिणामस्वरूप लेखक के लिए कोई गज़ल, गज़ल नहीं रही, गीत-गीत न रहा सब किसी-न-किसी चीज़ का विज्ञापन बन गए हैं। दिन भर यह गीत और विज्ञापन लेखक का पीछा करते रहते हैं।

प्रश्न 2.
लेखक के अनुसार ऐतिहासिक महत्त्व की कलाकृत्तियों को नई सार्थकता कैसे प्राप्त हुई है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार अजन्ता के चित्र और एलोरा की मूर्तियां जो ऐतिहासिक महत्त्व की कलाकृतियां थीं आज विज्ञापन के सहारे उन्हें एक नई सार्थकता प्राप्त हो गई है। आज उन मूर्तियों का सौन्दर्य लेखक को तेल की शीशी की याद दिलाता है, उनकी आँखें एक फॉर्मेसी का विज्ञापन प्रतीत होती हैं, और उनका समूचा कलेवर एक पेट्रोल कम्पनी की कला अभिरुचि को प्रमाणित करता है। उन कलाकृतियों का निर्माण करने वाले हाथ भी आज एक बिस्कुट कम्पनी की विकास योजना के विज्ञापन के रूप में सार्थक हो रहे हैं।

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प्रश्न 3.
हर चीज़, हर जगह अपने अलावा किसी भी चीज़ और किसी भी जगह का विज्ञापन हो सकती है? लेखक के इस कथन में निहित व्यंग्य को स्पष्ट करें।
उत्तर:
लेखक के प्रस्तुत कथन में यह व्यंग्य छिपा हुआ है कि लेखक को हर जगह विज्ञापन ही विज्ञापन दिखाई देता है। लेखक का दिमाग हर चेहरे, हर आवाज़ और हर नाम का सम्बन्ध किसी-न-किसी विज्ञापन के साथ जोड़ देता है। सुबह चाय लाने वाले को जब वह चाय लाने के लिए कहता है तो चाय का नाम लेते ही लेखक को नीलगिरि की सुन्दरी का ध्यान हो जाता है।

प्रश्न 4.
शिक्षा, विज्ञान संस्कृति और साहित्य जैसे क्षेत्रों में विज्ञापन कला में अपनी धाक कैसे जमा ली है?
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में जब विद्यार्थियों को दीक्षान्त समारोह पर डिग्रियां दी जाएंगी तो उनके निचले कोने में एक विज्ञापन छिपा रहेगा। विज्ञान के क्षेत्र में मूर्तियों के नीचे ऐसा विज्ञापन रहेगा कि इस मूर्ति और भवन के निर्माण का श्रेय लाल हाथी के निर्माण वाले निर्माताओं को है। वास्तु-सम्बन्धी अपनी सभी आवश्यकताओं के लिए लाल हाथी का निशान कभी मत भूलिए। इसी तरह किसी उपन्यास की जिल्द पर एक ओर बारीक अक्षरों में छिपा होगा-“साहित्य में अभिरुचि रखने वालों को इक्का मार्का साबुन बनाने वालों की एक ओर तुच्छ भेंट।”

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PSEB 11th Class Hindi Guide विज्ञापन युग Important Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कौन-सी कला तेज़ी से उन्नति कर रही है ?
उत्तर:
विज्ञापन कला।

प्रश्न 2.
लेखक के लिए गज़ल-गजल न होकर क्या थी ?
उत्तर:
विज्ञापन।

प्रश्न 3.
मूर्तियों का समूचा क्लेवर क्या बनकर रह गया था ?
उत्तर:
किसी कम्पनी का विज्ञापन।

प्रश्न 4.
‘विज्ञापन युग’ किसकी रचना है ?
उत्तर:
मोहन राकेश की।

प्रश्न 5.
लेखक को चाय देने वाला लड़का कौन-सी मुस्कराहट मुस्करा रहा होता है ?
उत्तर:
क्लोरोफ़िल मुस्कराहट।

प्रश्न 6.
लेखक को स्त्री कण्ठ की मधुर आवाज में क्या सुनाई पड़ा ?
उत्तर:
विज्ञापन।

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प्रश्न 7.
कम्बलों और दुशालों में किसके विज्ञापन दिए जा सकने के डर हैं ?
उत्तर:
चाय और कोक के।

प्रश्न 8.
खुजली का नाश करने के लिए ……… औषधि है।
उत्तर:
रामबाण।

प्रश्न 9.
लेखक ने विज्ञापन कला पर …….. किया है।
उत्तर:
करारा व्यंग्य।

प्रश्न 10.
आज प्रत्येक चीज़ का ……. मौजूद है।
उत्तर:
विज्ञापन।

प्रश्न 11.
लेखक ने विज्ञापनों के ………… जीवन पर दखल देने पर व्यंग्य किया है।
उत्तर:
व्यक्तिगत।

प्रश्न 12.
हम किसकी लपेट से नहीं बच सकते ?
उत्तर:
विज्ञापन।

प्रश्न 13.
आज हर जगह क्या नजर आते हैं ?
उत्तर:
विज्ञापन ही विज्ञापन ।

प्रश्न 14.
विज्ञापन कला का क्षेत्र ………… है।
उत्तर:
अत्यंत व्यापक।

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प्रश्न 15.
भगवान् की बनाई धरती का आजकल क्या हो रहा है ?
उत्तर:
दुरुपयोग।

प्रश्न 16.
उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक धरती का कोई भी कोना ……. से नहीं बचा।
उत्तर:
विज्ञापन।

प्रश्न 17.
मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व ……. हो गया है।
उत्तर:
विज्ञापनमय।

प्रश्न 18.
किस वस्तु का उपभोग होगा ?
उत्तर:
जिसका विज्ञापन अधिक होगा।

प्रश्न 19.
आने वाले समय में जीवन का प्रत्येक क्षेत्र किससे जुड़ जाएगा ?
उत्तर:
विज्ञापन कला से।

प्रश्न 20.
……… आज व्यक्तिगत जीवन में भी प्रवेश कर गया है।
उत्तर:
विज्ञापन।

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बहुविकल्पी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विज्ञापन युग कैसा निबंध है ?
(क) हास्यपरक
(ख) व्यंग्यपरक
(ग) सामाजिक
(घ) धार्मिक।
उत्तर:
(ख) व्यंग्यपरक

प्रश्न 2.
लेखक के अनुसार विज्ञापन कला का विकास किसका कारण है ?
(क) सिरदर्द का
(ख) द्वन्द्व का
(ग) हास्य का
(घ) सफलता का।
उत्तर:
(क) सिरदर्द का

प्रश्न 3.
लेखक ने इस निबंध में किस कला पर कटु व्यंग्य किया है ?
(क) नृत्य
(ख) गायन
(ग) भजन
(घ) विज्ञापन।
उत्तर:
(घ) विज्ञापन

प्रश्न 4.
‘विज्ञापन युग’ किसकी रचना है ?
(क) धर्मवीर भारती
(ख) मोहन राकेश की
(ग) पंत की
(घ) निराला की।
उत्तर:
(ख) मोहन राकेश का।

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कठिन शब्दों के अर्थ :

स्मारक = यादगार। चस्पा करना = चिपकाना। पार्वतय सुषमा = पर्वतों का प्राकृतिक सौन्दर्य । विधाता = विधाता, ईश्वर। अन्योन्याश्रित = एक दूसरे पर निर्भर। बरीकी बीनी = सूक्ष्म दृष्टि। अन्देशा = डर, चिन्ता। खासा = बहुत।

प्रमुख अवतरणों की सप्रसंग व्याख्या

(1) परिणाम यह है कि अब मेरे लिए कोई गज़ल-गज़ल नहीं रही, कोई गीत-गीत नहीं रहा, सब किसी-न-किसी चीज़ का विज्ञापन बन गए हैं। दिन भर ये गीत और विज्ञापन मेरा पीछा करते रहते हैं। पहले बहुत मीठे गले से रहना नहीं देश विराना है’ की लय और उसके तुरन्त बाद-क्या आपके शरीर में खुजली होती है ? खुजली का नाश करने के लिए एक ही राम बाण औषधि हैं……..कर लें भगत कबीर क्या करते हैं।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री मोहन राकेश द्वारा लिखित निबन्ध ‘विज्ञापन युग’ में से ली गई हैं। इन पंक्तियों में लेखक ने विज्ञापनों के व्यक्तिगत जीवन में दखल देने पर व्यंग्य किया है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि पड़ोसियों की कृपा से उसे दिन रात गीत, भजन और गज़लों के साथ कुछ विज्ञापन सुनने की आदत हो गई जिसका परिणाम यह हुआ कि आज मेरे लिए न कोई गज़ल-गज़ल रह गई और न ही कोई गीत-गीत सभी किसी-न-किसी चीज़ का विज्ञापन बन कर रह गये हैं। विज्ञापनों ने मनुष्य के जीवन को इतना अधिक प्रभावित कर दिया है कि उसे सब जगह विज्ञापन दिखाई और सुनाई देते हैं। दिन भर ये गीत और उनके पीछे दिये जाने वाले विज्ञापन मेरा पीछा करते रहते हैं।

विज्ञापनों के कारण जीवन का आनन्द समाप्त हो गया है, जैसे पहले एक मधुर कण्ठ से कबीर के इस भगत की पंक्ति उभरती है ‘रहना नहिं देश वीराना है उस पंक्ति के तुरन्त बाद खुजली का विज्ञापन प्रसारित होता है-खुजली का नाश करने के लिए एक ही रामबाण औषधि है …. । लेखक कहते हैं कि इस विज्ञापन को सुनकर कबीर भी कुछ नहीं कर सकते हैं अर्थात् ऐसा लगता है जैसे भजन सुनकर खुजली होने वाली है।

विशेष :

  1. विज्ञापनों के व्यक्तिगत जीवन में दखल देने की ओर संकेत किया गया है।
  2. भाषा सरल, सुबोध एवं स्पष्ट है। मिश्रित भाषा शब्दावली का प्रयोग है।
  3. वर्णनात्मक शैली है।

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(2) कोई चीज़ ऐसी नहीं जो किसी-न-किसी चीज़ का विज्ञापन न हो। अजन्ता के चित्र और एलोरा की मूर्तियाँ कभी अछूती कला का उदाहरण रही होंगी, परन्तु आज उस कला को एक नयी सार्थकता प्राप्त हो गई है।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियां श्री मोहन राकेश द्वारा लिखित निबन्ध ‘विज्ञापन युग’ में से ली गई हैं। इनमें लेखक ने ऐतिहासिक कलाकृतियों को नयी सार्थकता प्राप्त होने की बात कही है।

व्याख्या :
लेखक कहता है आज के युग में कोई चीज़ ऐसी नहीं है जिसका विज्ञापन न हो। सभी चीज़ों का विज्ञापन होने लगा है। अजन्ता के चित्र और एलोरा की मूर्तियां कभी अछूती कला का उदाहरण रही होंगी, किन्तु आज के विज्ञापन यग में इन ऐतिहासिक महत्त्व की कलाकृतियों को भी एक नयी सार्थकता प्राप्त हो गई है। मनुष्य अपने लाभ के लिए ऐतिहासिक कलाकृतियों का प्रयोग विज्ञापन के लिए कर सकता है।

विशेष :

  1. विज्ञापन युग में सभी चीज़ों का विज्ञापन सम्भव है।
  2. भाषा सरल, सुबोध स्पष्ट है।
  3. शैली व्यंग्यात्मक है।

(3) कश्मीर की सारी पार्वत्त्य सुषमा, वहां की नव युवतियों का भाव सौन्दर्य और वहां के कारीगरों की दिन रात की मेहनत, ये सब इस बात को विज्ञापित करने के लिए हैं कि सफेद रंग का वह शहद जो बन्द डिब्बों में मिलता है, सबसे अच्छा शहद है।

प्रसंग :
यह अवतरण श्री मोहन राकेश द्वारा लिखित निबन्ध ‘विज्ञापन युग’ से अवतरित हैं। इसमें लेखक ने शहद के विज्ञापन में कश्मीर के प्राकृतिक सौन्दर्य का हवाला दिये जाने की बात कही है।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि मनुष्य किसी भी वस्तु की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए किसी भी चीज़ का प्रयोग कर सकते हैं। कश्मीर की सारी पर्वतीय प्राकृतिक सुन्दरता, वहाँ की नवयुवतियों का भाव-सौन्दर्य और वहाँ के कारीगरों की दिन-रात की मेहनत ये सभी इस बात का विज्ञापन देने में काम आते हैं कि सफेद रंग का शहद जो डिब्बों में बंद मिलता है, सबसे अच्छा शहद है। कश्मीर की सफेद बर्फीली चोटियाँ, वहाँ की नवयुवतियों का सौन्दर्य और मधुमख्यियों की तरह कारीगरों की मेहनत की तुलना शहद से की है।

विशेष :

  1. शहद के विज्ञापन में किस-किस तरह की वस्तुओं से साम्यता दर्शायी जाती है। इस पर व्यंग्य किया गया है।
  2. भाषा सरल, सुबोध एवं स्पष्ट है।
  3. तत्सम शब्दावली है। शैली व्यग्यात्मक है।

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(4) विधाता ने इतनी बारीकबीनी से यह जो धरती बनाई है, और मनुष्य ने विज्ञान के आश्रय से उसमें जो चार चाँद लगाए हैं, वे इसलिए कि विज्ञापन कला के लिए उपयुक्त भूमि प्रस्तुत की जा सके। उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक कोई कोना ऐसा न बचा होगा जिसका किसी-न-किसी चीज़ के विज्ञापन के लिए उपयोग न किया जा रहा हो। हर चीज़ हर जगह अपने अलावा किसी भी चीज़ और किसी भी जगह का विज्ञापन हो सकती है।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री मोहन राकेश द्वारा लिखित निबन्ध ‘विज्ञापन युग’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने दुनिया के कोने-कोने में, हर जगह विज्ञापन लगाने की बात कही है अर्थात् भगवान और मनुष्य ने मिलकर धरती को सुन्दर बनाया है, परन्तु कुछ लोग इसी धरती का दुरुपयोग अपने स्वार्थ के लिए कर रहे हैं।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि विधाता ने इतनी सूक्ष्म दृष्टि से जो धरती बनाई है और जिसे मनुष्य ने विज्ञान का सहारा लेकर सुन्दर बनाया है, स्वार्थी मनुष्य ने धरती को इसीलिए सुन्दर बनाया है कि विज्ञापन चिपकाने के लिए उपयुक्त भूमि तैयार की जा सके। उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक धरती का कोई भी कोना नहीं बचा जिसका किसीन-किसी चीज़ के विज्ञापन के लिए उपयोग न किया गया हो। हर चीज़, हर जगह अपने के अतिरिक्त किसी भी चीज़ और किसी भी जगह का विज्ञापन हो सकती है अर्थात् विज्ञापन के लिए किसी स्थान का सम्बन्ध वस्तु से होना आवश्यक नहीं हैं परन्तु उसका उपयोग वस्तु के साथ जोड़ दिया जाता है।

विशेष :

  1. भगवान की बनाई धरती जिसे मानव ने सुन्दर बनाया आज उसका दुरुपयोग हो रहा है।
  2. भाषा सरल सुबोध एवं स्पष्ट है, मिश्रित शब्दावली है।
  3. व्यग्यात्मक शैली है।

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(5) विज्ञापन-कला जिस तेज़ी से उन्नति कर रही है, उससे मुझे भविष्य के लिए और भी अंदेशा है। लगता है, ऐसा युग आने वाला है जब शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और साहित्य, इनका केवल विज्ञापन कला के लिए ही उपभोग रह जाएगा। वैसे तो आज भी इस कला के लिए इनका खासा उपयोग होता है। मगर आने वाले युग में यह कला, दो कदम और आगे बढ़ जाएगी।

प्रसंग :
यह गद्यांश श्री मोहन राकेश द्वारा लिखित निबन्ध ‘विज्ञापन युग’ में से ली गई हैं। इसमें लेखक ने व्यंग्य से कहा है भविष्य में विज्ञापनों का उपयोग शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और साहित्य में भी होने लगेगा।

व्याख्या :
लेखक कहता है कि जिस तेज़ी से विज्ञापन-कला उन्नति कर रही है, उसे देखते हुए मुझे डर है कि आने वाले समय में ऐसा युग आने वाला है जब शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और साहित्य आदि का केवल विज्ञापन कला के लिए ही उपयोग रह जाएगा। मानव का भविष्य विज्ञापन कला पर निर्भर रह जाएगा। जिस वस्तु के विज्ञापन का अधिक से अधिक प्रचार होगा उसी का उपभोग अधिक होगा चाहे वह किसी क्षेत्र से सम्बन्धित हो। वैसे तो आज भी इस कला के लिए इनका बहुत विशिष्ट उपयोग होता है। मगर आने वाले समय में यह कला, दो कदम आगे बढ़ जाएगी अर्थात् जीवन का हर क्षेत्र विज्ञापन कला से जुड़ जाएगा।

विशेष :

  1. विज्ञापन कला का क्षेत्र इतना व्यापक हो जाएगा जिससे मनुष्य का भविष्य उस पर निर्भर हो जाएगा।
  2. भाषा सरल, सुबोध एवं स्पष्ट है। तत्सम शब्दावली है।
  3. व्यंग्यात्मक शैली है।

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(6) दफ़्तर की नई टाइपिस्ट रोज़ी का समूचा व्यक्तित्व मुझे लाल रंग की लिपिस्टिक का विज्ञापन प्रतीत होता है और किसी को कहिएगा नहीं, पर हालत यहां तक पहुंच गई है कि अब मैं खुद आइने के सामने खड़ा होता हूँ तो लगता है कि अपना चेहरा नहीं सिल्वर सॉल्ट का विज्ञापन देख रहा हूँ।

प्रसंग :
यह अवतरण श्री मोहन राकेश द्वारा लिखित निबन्ध ‘विज्ञापन युग’ से अवतरित है। इसमें लेखक ने विज्ञापन कला पर तीखा व्यंग्य किया है।

व्याख्या :
लेखक विज्ञापन कला पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि अपने दफ्तर की नई टाइपिस्ट रोज़ी को जब मैं लाल वस्त्रों में देखता हूँ तो मुझे उसका समूचा व्यक्तित्व लाल रंग की लिपिस्टिक का विज्ञापन लगता है और किसी से कहिएगा नहीं कि हालत यहां तक पहुंच गई है कि जब मैं स्वयं दर्पण के सामने खड़ा होता हूँ तो मुझे लगता है कि मैं अपना चेहरा नहीं सिल्वर सॉल्ट का विज्ञापन देख रहा हूँ। लेखक को सब जगह, सब चीज़ों में, अपने में तथा दूसरों में, सब में विज्ञापन ही विज्ञापन दिखाई देते हैं।

विशेष :

  1. मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व विज्ञापनमय हो गया है।
  2. भाषा सरल, सुबोध एवं स्पष्ट है। मिश्रित शब्दावली है।
  3. व्यंग्यात्मक शैली है।

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विज्ञापन युग Summary

विज्ञापन युग निबन्ध का सार

प्रस्तुत निबन्ध एक व्यंग्यपरक निबन्ध है। इसमें लेखक ने विज्ञापन कला के विकसित होने पर उसे सिर दर्द कारण भी बताया गया है। लेखक कहते हैं कि पड़ोसियों की कृपा से उसे दिन रात गज़लों और भजनों के साथ चाय, तेल और सिर दर्द की टिक्कियों के विज्ञापन सुनने पड़ते हैं। यह विज्ञापन लेखक के दिलो-दिमाग़ पर सदा छाए रहते हैं। परिणाम यह हुआ है कि लेखक के लिए गज़ल-गज़ल न रह कर किसी न किसी चीज़ का विज्ञापन बन गए। लेखक को लगता है कि हर चीज़ विज्ञापन बन कर रह गई है। अजन्ता एलोरा की मूर्तियों का केश विन्यास लेखक को एक तेल की शीशी की याद दिलाता है। इसी तरह मूर्तियों की आँखें एवं उनका समूचा कलेवर किसी-न-किसी कम्पनी का विज्ञापन बन कर रह गया है।

लेखक कहते हैं कि देश में जितने भी मन्दिर पुराने किले और स्मारक आदि हैं वे सब पर्यटन व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ एक विशेष ब्रांड के सीमेंट की मजबूती को व्यक्त करने के प्रतीक बन सकें। इसी तरह सफ़ेद रंग के शहद का विज्ञापन और सेब के मुरब्बे का विज्ञापन हो सकता है। लेखक का मत है कि विज्ञापन किसी भी चीज़ का हो सकता है। हम जहाँ भी रहे विज्ञापनों की लपेट से नहीं बच सकते।

लेखक का मत है कि विज्ञापन कला इतनी तेजी से उन्नति कर रही है कि उसे डर है कि आने वाले समय में शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और साहित्य आदि का उपयोग विज्ञापन कला के लिए ही रह जाएगा। लेखक कहते हैं कि अभी तक बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जिनका विज्ञापन के लिए प्रयोग नहीं किया जा सका है जैसे दवा की शीशियों में मक्खन के डिब्बों के विज्ञापन होने चाहिएँ। कम्बलों और दुशालों में चाय और कोको के विज्ञापन दिए जा सकते हैं। अस्पताल की दीवारों पर वैवाहिक विज्ञापन लगाए जा सकते हैं। यह तो भविष्य की बात है, पर आज की स्थिति यह है कि लेखक को हर जगह विज्ञापन ही विज्ञापन दिखाई देता है। लेखक को चाय देने वाला लड़का भी क्लोरोफ़िल मुस्कराहट मुस्करा रहा होता है। तब लेखक को स्त्री कण्ठ की मधुर आवाज़ में यह विज्ञापन सुनाई पड़ता है कि लिवर ठीक रखने के लिए लिवर इमल्शन लीजिए। लेखक को अपने सामने आने वाला हर चेहरा किसी विज्ञापन का रूप नज़र आता है।

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