PSEB 10th Class SST Solutions Geography उद्धरण संबंधी प्रश्न

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Geography उद्धरण संबंधी प्रश्न

PSEB 10th Class Social Science Solutions Geography उद्धरण संबंधी प्रश्न

(1)

नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए
इसी विशालता के कारण ही भारत को एक उप-महाद्वीप (Indian sub-continent) कहकर पुकारा जाता है। उपमहाद्वीप एक विशाल और स्वतंत्र क्षेत्र होता है। जिसके भू-खंड की सीमाएँ विभिन्न प्राकृतिक भू-आकृतियों (Natural Features) द्वारा बनाई जाती हैं, जो उसे आस-पास के क्षेत्रों से अलग करती हैं। भारत को भी उत्तर दिशा में हिमालय के पार अगील (Aghil), मुझतघ (Muztgh), कुनलुन (Kunlun), कराकोरम, हिन्दुकुश और जसकर पर्वत श्रेणियाँ तिब्बत से, दक्षिणी दिशा में पाक-जल ढमरू मध्य और मन्नार की खाड़ी श्रीलंका से, पूर्वी दिशा में अराकान योमा मियांमार (Burma) से और पश्चिमी दिशा. में विशाल थार मरुस्थल, पाकिस्तान से अलग करते हैं। भारत के इतने विशाल क्षेत्र के कारण ही अनेक सांस्कृतिक, आर्थिक व सामाजिक विभिन्नताएं पाई जाती हैं। परन्तु इसके बावजूद भी देश में जलवायु, संस्कृति आदि में एकता पाई जाती है।

(a) भारत को उपमहाद्वीप क्यों कहा जाता है?
(b) देश की अनेकता में एकता’ बनाए रखने में कौन-कौन से तत्त्वों का योगदान है ?
उत्तर-
(a) अपने विस्तार और स्थिति के कारण भारत को उप-महाद्वीप का दर्जा दिया जाता है। उप-महाद्वीप एक विशाल तथा स्वतन्त्र भू-भाग होता है जिसकी सीमाएं विभिन्न स्थलाकृतियों द्वारा बनाई जाती हैं। ये स्थलाकृतियां इसे अपने आस-पास के क्षेत्रों से अलग करती हैं। भारत के उत्तर में हिमालय से पार अगील (Agill), मुझतघ (Mugtgh), कुनलुन (Kunlun), कराकोरम, हिन्दुकुश आदि पर्वत श्रेणियां उसे एशिया के उत्तर-पश्चिमी भागों से अलग करती हैं। दक्षिण में पाक जलडमरू मध्य तथा मन्नार की खाड़ी इसे श्रीलंका से अलग करते हैं। पूर्व में अराकान योमा इसे म्यनमार से अलग करते हैं। थार का मरुस्थल इसे पाकिस्तान के बहुत बड़े भाग से अलग करता है। इतना होने पर भी हम वर्तमान भारत को उपमहाद्वीप नहीं कह सकते। भारतीय उप-महाद्वीप का निर्माण अविभाजित भारत, नेपाल, भूटान तथा बांग्लादेश मिल कर करते हैं।
(b) भारत विभिन्नताओं का देश है। फिर भी हमारे समाज में एक विशिष्ट एकता दिखाई देती है। भारतीय समाज को एकता प्रदान करने वाले मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं —

  1. मानसूनी ऋतु-मानसून पवनें अधिकांश वर्षा ग्रीष्म ऋतु में करती हैं। इससे देश की कृषि भी प्रभावित होती है और अन्य व्यवसाय भी। मानसूनी पवनें पहाड़ी प्रदेशों में वर्षा करके बिजली की आपूर्ति को विश्वसनीय बनाती हैं। वास्तव में मानसूनी वर्षा पूरे देश की अर्थव्यवस्था का आधार है।
  2. धार्मिक संस्कृति-धार्मिक संस्कृति के पक्ष में दो बातें हैं। एक तो यह कि धार्मिक स्थानों ने देश के लोगों को एक सूत्र में बांधा है। दूसरे, धार्मिक सन्तों ने अपने उपदेशों द्वारा भाईचारे की भावना पैदा की है। तिरूपती, जगन्नाथपुरी, अमरनाथ, अजमेर, हरिमन्दिर साहिब, पटना, हेमकुण्ट साहिब तथा अन्य तीर्थ स्थानों पर देश के सभी भागों से लोग आते हैं और पूजा करते हैं। सन्तों ने भी धार्मिक समन्वय पैदा करने का प्रयास किया है।
  3. भाषा तथा कला-लगभग सारे उत्तरी भारत में वेदों का प्रचार संस्कृत भाषा में हुआ। इसी भाषा के मेल से मध्य युग में उर्दु का जन्म हुआ। अंग्रेज़ी सम्पर्क भाषा है और हिन्दी राष्ट्र भाषा है। इन सब ने मिलकर एक-दूसरे को निकट से समझने का अवसर प्रदान किया है। इसी तरह लोकगीतों तथा लोक-कलाओं ने भी लोगों को समान भावनाएं व्यक्त करने का अवसर जुटाया है।
  4. यातायात तथा संचार के साधन-रेलों तथा सड़कों ने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को समीप लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दूरदर्शन तथा समाचार-पत्रों जैसे संचार के साधनों ने भी लोगों की राष्ट्रीय सोच देकर राष्ट्रीय धारा से जोड़ दिया है।
  5. प्रवास-गांवों के कई लोग शहरों में आकर बसने लगे हैं। उनमें जातीय विभिन्नता होते हुए भी वे एक-दूसरे को समझने लगे हैं और इस प्रकार वे एक-दूसरे के निकट आए हैं।
    सच तो यह है कि अनेक प्राकृतिक और सांस्कृतिक तत्त्वों ने हमारे देश को एकता प्रदान की है।

(2)

हिमालय के साथ लगते विशाल उत्तरी मैदान देश की 40% जनसंख्या को निवास व जीवन-यापन प्रदान करते हैं। इनकी उपजाऊ मिट्टी, उपयुक्त जलवायु, समतल धरातल ने दरियाओं, नहरों, सड़कों, रेलों व शहरों के प्रसार व विस्तृत तथा कृषि के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इसीलिए यह मैदानी क्षेत्र देश के अन्न भंडार होने का गौरव रखते हैं। इन मैदानों ने आर्य लोगों से लेकर अब तक एक विशेष प्रकार की सभ्यता व समाज का निर्माण किया है। सारे देश के लोग गंगा को अभी भी एक पवित्र नदी मानते हैं और इसकी घाटी में बसे ऋषिकेश, हरिद्वार, मथुरा, प्रयाग, अयोध्या, कांशी आदि स्थान देश के विभिन्न भागों में रहने वाले सूफी सन्त और धार्मिक लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इन मैदानी भागों में बाद में सिख गुरु, महात्मा बुद्ध, महावीर जैन जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया और अलग-अलग धर्म स्थापित हुए। इसका गहरा प्रभाव हिमालय पर्वत और दक्षिण भारत में भी देखा जा सकता है।

(a) उत्तर के विशाल मैदानों में नदियों द्वारा निर्मित प्रमुख भू-आकृतियों के नाम बताइए।
(b) विशाल उत्तरी मैदानों का देश के विकास में योगदान बताइए।
उत्तर-
(a) उत्तरी मैदानों में नदियों द्वारा निर्मित भू-आकार हैं-जलोढ़ पंख, जलोढ़ शंकु, सर्पदार मोड़, दरियाई सीढ़ियां, प्राकृतिक बांध तथा बाढ़ के मैदान।
(b) हिमालय क्षेत्रों का देश के विकास में निम्नलिखित योगदान है —

  1. वर्षा-हिन्द महासागर से उठने वाली मानसून पवनें हिमालय पर्वत से टकरा कर खूब वर्षा करती हैं। इस प्रकार यह उत्तरी मैदान में वर्षा का दान देता है। इस मैदान में पर्याप्त वर्षा होती है।
  2. उपयोगी नदियां-उत्तरी भारत में बहने वाली सभी मुख्य नदियां गंगा, यमुना, सतलुज, ब्रह्मपुत्र आदि हिमालय पर्वत से ही निकलती हैं। ये नदियां सारा वर्ष बहती रहती हैं। शुष्क ऋतु में हिमालय की बर्फ इन नदियों को जल देती है।
  3. फल तथा चाय-हिमालय की ढलाने चाय की खेती के लिए बड़ी उपयोगी हैं। इनके अतिरिक्त पर्वतीय ढलानों पर फल भी उगाए जाते हैं।
  4. उपयोगी लकड़ी-हिमालय पर्वत पर घने वन पाए जाते हैं। ये वन हमारा धन हैं। इनसे प्राप्त लकड़ी पर भारत के अनेक उद्योग निर्भर हैं। यह लकड़ी भवन-निर्माण कार्यों में भी काम आती है।
  5. अच्छी चरागाहें-हिमालय पर सुन्दर और हरी-भरी चरागाहें मिलती हैं। इनमें पशु चराये जाते हैं।
  6. खनिज पदार्थ-इन पर्वतों में अनेक प्रकार के खनिज पदार्थ पाए जाते हैं।

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(3)

‘जलवाय’ अथवा ‘पवन-पानी’ शब्द से तात्पर्य यह है कि किसी स्थान में लम्बी अवधि की मौसमी स्थितियाँ. जिनमें उस स्थान का तापमान वहाँ से बह रही वायु में जल की कितनी मात्रा है। ये स्थितियाँ मुख्य रूप से उस स्थान की धरातलीय विभिन्नता, समुद्र-तट से दूरी तथा भूमध्य रेखा से दूरी जैसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वों के द्वारा निर्धारित की जाती है। इसका मानव एवम् मानवीय क्रिया-कलापों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
भारत एक विशाल देश है। जिसकी विशाल धरातलीय इकाइयां, प्रायद्वीपीय स्थिति और कर्क रेखा का इसके बीच से होकर गुज़रना इसकी जलवायु पर गहरा प्रभाव डालते हैं। देश की विशालतम धरातलीय विभिन्नताओं के कारण ही इसमें तापमान, वर्षा, पवनों व बादलों आदि की विभिन्नताएं मिलती हैं।

(a) भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले (दो) तत्त्वों को बताइए।
(b) भारतीय जलवायु की प्रादेशिक विभिन्नताएं कौन-कौन सी हैं?
उत्तर-
(a) भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले मुख्य तत्त्व हैं-

  1. भूमध्य रेखा से दूरी,
  2. धरातल का स्वरूप,
  3. वायुदाब प्रणाली,
  4. मौसमी पवनें और
  5. हिन्द महासागर से समीपता।

(b) भारतीय जलवायु की प्रादेशिक विभिन्नताएं निम्नलिखित हैं

  1. सर्दियों में हिमालय पर्वत के कारगिल क्षेत्रों में तापमान-45° सेन्टीग्रेड तक पहुंच जाता है परन्तु उसी समय तमिलनाडु के चेन्नई (मद्रास) महानगर में यह 20° सेंटीग्रेड से भी अधिक होता है। इसी प्रकार गर्मियों की ऋतु में अरावली पर्वत की पश्चिमी दिशा में स्थित जैसलमेर का तापमान 50° सेन्टीग्रेड को भी पार कर जाता है, जबकि श्रीनगर में 20° सेन्टीग्रेड से कम तापमान होता है।
  2. खासी पर्वत श्रेणियों में स्थित माउसिनराम (Mawsynaram) में 1141 सेंटीमीटर औसतन वार्षिक वर्षा दर्ज की जाती है। परन्तु दूसरी ओर पश्चिमी थार मरुस्थल में वार्षिक वर्षा का औसत 10 सेंटीमीटर से भी कम है।
  3. बाड़मेर और जैसलमेर में लोग बादलों के लिए तरस जाते हैं परन्तु मेघालय में सारा साल आकाश बादलों से ढका रहता है।
  4. मुम्बई तथा अन्य तटवर्ती नगरों में समुद्र का प्रभाव होने के कारण तापमान वर्ष भर लगभग एक जैसा ही रहता है। इसके विपरीत राष्ट्रीय क्षेत्र दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में सर्दी एवं गर्मी के तापमान में भारी अन्तर पाया जाता है।

(4)

किसी भी देश या क्षेत्र के आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक विकास में वहां की जलवायु का गहरा प्रभाव होता है। उस क्षेत्र की आर्थिक प्रगति का अनुमान वहाँ की कृषि, उद्योग, खनिज-सम्पदा के विकास से लगाया जा सकता है। भारतीय जीवन लगभग पूरी तरह से कृषि पर आधारित है। जिसके विकास में मानसूनी वर्षा ने एक प्रमुख एवम् सुदृढ़ आधार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। मानसून को देश का केंद्रीय ध्रुव (Pivotal Point) माना जाता है। इस पर कृषि के अलावा समूचा आर्थिक ढाँचा निर्भर करता है। मानसूनी वर्षा जब समय से तथा उचित मात्रा में होती है तो कृषि उत्पादन बढ़ जाता है तथा चारों तरफ हरियाली व खुशहाली होती है। परन्तु इसकी असफलता के परिणामस्वरूप फसलें सूख जाती हैं। देश में सूखा पड़ जाता है तथा अनाज के भंडारों में कमी आ जाती है।

(a) भारत में मानसूनी वर्षा की (कोई तीन) महत्त्वपूर्ण विशेषताएं बताइए।
(b) भारतीय अर्थव्यवस्था (बजट) को मानसून पवनों का जुआ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
(a) भारत में मानसूनी वर्षा मुख्यतः जुलाई से सितम्बर के महीनों में होती है। देश में इसका विस्तार दक्षिणपश्चिमी मानसून पवनों के विस्तार के साथ होता है। मानसूनी वर्षा की तीन महत्त्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित हैं —

  1. अस्थिरता-भारत में मानसून भरोसे योग्य नहीं है। यह आवश्यक नहीं है कि वर्षा एक-समान होती रहे। वर्षा की इसी अस्थिरता के कारण ही भुखमरी और अकाल की स्थिति पैदा हो जाती है। वर्षा की यह अस्थिरता देश के आन्तरिक भागों तथा राजस्थान में अपेक्षाकृत अधिक है।
  2. असमान वितरण-देश में वर्षा का वितरण समान नहीं है। पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलानों और मेघालय तथा असम की पहाड़ियों में 250 सेंटीमीटर से भी अधिक वर्षा होती है। इसके विपरीत पश्चिमी राजस्थान, पश्चिमी गुजरात, उत्तरी कश्मीर आदि में 25 सेंटीमीटर से भी कम वर्षा होती है।
  3. अनिश्चितता-भारत में होने वाली मानसूनी वर्षा की मात्रा निश्चित नहीं है। कभी तो मानसून पवनें समय से पहले पहुंचकर भारी वर्षा करती हैं, परन्तु कभी यह वर्षा इतनी कम होती है या निश्चित समय से पहले ही समाप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप देश में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

(b) “भारतीय अर्थव्यवस्था मानसून पवनों का जुआ है”-यह वक्तव्य इस बात को प्रकट करता है कि भारत की अर्थव्यवस्था की उन्नति या अवनति इस बात पर निर्भर करती है कि किसी वर्ष वर्षा का समय, वितरण तथा मात्रा कितनी उपयुक्त है। यदि वर्षा समय पर आती है और उसका वितरण और मात्रा भी उपयुक्त है, तो कृषि की अच्छी फसल की आशा की जा सकती है। उदाहरण के लिए अच्छी मानसून के कारण फसलें अच्छी होती हैं, तो तीन बातें घटित होती हैं।

  1. कारखानों के लिए उचित कच्चा माल उपलब्ध होता है। कपास, पटसन, तिलहन, ईख इत्यादि की अधिकता से सम्बन्धित उद्योग फलते-फूलते हैं।
  2. अच्छी मानसून से जब कृषि और उद्योगों को बल मिलता है, तो उत्पादकता बढ़ती है। एक ओर निर्यात को बढ़ावा मिलता है, तो दूसरी ओर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार फलता-फूलता है। देश में धन की वृद्धि होती है और लोगों का जीवन स्तर उन्नत होता है।
  3. अच्छी मानसून के कारण नदियों में जल की वृद्धि होती है। बांधों का जलस्तर ऊंचा उठता है। इस जल से जहां जल-विद्युत् के उत्पादन में सहयोग मिलता है, वहां सिंचाई की व्यवस्था में सुधार होता है। इससे देश में आर्थिक गतिविधियों में हलचल पैदा होती है।
    इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आज विज्ञान की उन्नति के कारण हम मानसून के अभाव में भी अच्छी फसल उगा सकते हैं, परन्तु हमें सोचना यह है कि क्या सभी किसान वर्षा के अभाव में या वर्षा के असमान वितरण से लाभ उठा सकते हैं। अच्छी मानसून पूरे देश के प्रत्येक वर्ग तथा प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करती है। यदि मानसून उपयुक्त है, तो देश का आर्थिक विकास सुनिश्चित है। अतः भारतीय अर्थव्यवस्था को मानसून पवनों का जुआ कहना उचित है।

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(5)

कृषि की भारतीय अर्थव्यवस्था में एक अहम् भूमिका है। कृषि क्षेत्र देश के लगभग दो-तिहाई श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। इस क्षेत्र से कुल राष्ट्रीय आय का 29.0 भाग प्राप्त होता है और विदेश निर्यात में भी कृषि उत्पादों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कृषि के अनेकों उत्पादन हमारे कल-कारखानों में कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किये जाते हैं। कृषि के क्षेत्र में तरक्की के कारण ही प्रति व्यक्ति खाद्यान्नों की उपलब्धि जो 1950 के वर्षों में 395 ग्राम थी, 1991 में बढ़कर 510 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन तक पहुंच गयी है। रासायनिक खादों के उपयोग में भी भारत का स्थान, विश्व में चौथा है। हमारे देश में दालों के अन्तर्गत क्षेत्र, विश्व में सबसे अधिक हैं। कपास उत्पाद के क्षेत्र में भारत विश्व में पहला देश है जहां उन्नत किस्म की कपास पैदा करने के प्रयास सबसे पहले किये गये। देश ने झींगा मछली का बीज तैयार करने तथा कीट संवर्धन (pest culture) तकनीकी विकास में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर ली हैं।

(a) भारत में कितने प्रतिशत भूमि कृषि योग्य है?
(b) कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
(a) भारत में 51% भूमि कृषि योग्य है।
(b) कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। कुल राष्ट्रीय उत्पादन में अब कृषि का योगदान भले ही केवल 33.7% है, तो भी इसका महत्त्व कम नहीं है।

  1. कृषि हमारी 2/3 जनसंख्या का भरण-पोषण करती है।
  2. कृषि क्षेत्र से देश के लगभग दो-तिहाई श्रमिकों को रोजगार मिलता है।
  3. अधिकांश उद्योगों को कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है। सच तो यह है कि कृषि की नींव पर उद्योगों का महल खड़ा किया जा रहा है।

(6)

दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि में पंजाब एवं देश के अन्य भागों में इतनी गिरावट चिन्ता का एक विषय है। ऐसा लगता है कि ‘हरित क्रांति’ की लहर, जिसने देश में गेहूँ व चावल के उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है, दालों के उत्पादन को बढ़ाने में कोई विशेष योगदान नहीं कर पाया है। असल में अगर यह कहा जाये कि नुकसान पहुंचाया है तो कोई गलत नहीं होगा। क्योंकि ‘हरित क्रांति’ के बाद के वर्षों में दालों का क्षेत्रफल काफी मात्रा में गेहूँ एवं चावल जैसी अधिक उत्पादन देने वाली फसलों की ओर मोड़ दिया गया है। ऐसा विशेष तौर पर पंजाब जैसे व्यावसायिक कृषि प्रधान राज्यों में काफी बड़े स्तर पर हुआ है।
(a) पंजाब में दाल उत्पादन क्षेत्र में हरित क्रान्ति के बाद किस प्रकार का परिवर्तन आया है? (b) दालों के उत्पादन क्षेत्र में गिरावट के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर-
(a) हरित क्रान्ति के बाद दाल उत्पादन क्षेत्र 9.3 लाख हेक्टेयर से घटकर मात्रा 95 हजार हेक्टेयर रह गया।
(b) पिछले दशकों में दालों के उत्पादन क्षेत्र में कमी आई है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. दालों वाले क्षेत्रफल को हरित क्रान्ति के बाद अधिक उत्पादन देने वाली गेहूं तथा चावल जैसी फसलों के अधीन कर दिया गया है।
  2. कुछ क्षेत्र को विकास कार्यों के कारण नहरों, सड़कों तथा अन्य विकास परियोजनाओं के अधीन कर दिया गया है।
  3. बढ़ती हुई जनसंख्या के आवास के लिए बढ़ती हुई भूमि की मांग के कारण भी दालों के उत्पादन क्षेत्र में कमी आई है।

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(7)

हमारा देश भी खनिज सम्पदा की दृष्टि से काफी सम्पन्न माना जाता है। एक अनुमान के अनुसार देश में विश्व के कुल लौह अयस्क (Iron ore) भण्डार का एक चौथाई भाग है। लौह-इस्पात उद्योग में काम आने वाले प्रमुख खनिज मैंगनीज़ के भी विशाल भण्डार भारत में पाये जाते हैं। देश में कोयला, चूने का पत्थर, बाक्साइट तथा अभ्रक के भी प्रचुर भण्डार हैं। लेकिन अलौह खनिजों (Non-ferrous) जैसे जस्ता, सीसा, तांबा, और सोने के भण्डार बहुत ही सीमित मात्रा में हैं। देश में गंधक का भण्डार लगभग नहीं के बराबर है, जबकि गंधक आधुनिक रासायन उद्योग का प्रमुख आधार है। हमारे यहां जल शक्ति के संसाधन तथा परमाणु खनिज भी काफी हैं। इनका शक्ति साधनों के रूप में उपयोग इनकी शक्ति क्षमता तथा वातावरण के साथ बहुत कम छेड़-छाड़ करने के कारण तेज़ी से बढ़ रहा है। इसी कारण सौर-ऊर्जा भी शक्ति साधन के रूप में इस्तेमाल हो रही है। सौर ऊर्जा ईश्वर की दी अमूल्य शक्ति भंडार है। इसका उपयोग भविष्य में तेज़ी से शक्ति के स्रोत के रूप में बढ़ेगा।

प्रश्न
(a) खनिजों का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है?
(b) सौर ऊर्जा को भविष्य की ऊर्जा का स्त्रोत क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
(a) खनिजों का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बड़ा महत्त्व है। निम्नलिखित तथ्यों से यह बात स्पष्ट हो जाएगी

  1. देश का औद्योगिक विकास मुख्य रूप से खनिजों पर निर्भर करता है। लोहा और कोयला मशीनी युग का आधार हैं। हमारे यहां संसार के लौह-अयस्क के एक-चौथाई भण्डार हैं। भारत में कोयले के भी विशाल भण्डार पाये जाते हैं।
  2. खनन कार्यों से राज्य सरकारों को आय में वृद्धि होती है और लाखों लोगों को रोजगार मिलता है।
  3. कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि खनिज ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।
  4. खनिजों से तैयार उपकरण कृषि की उन्नति में सहायक हैं।

(b) कोयला और खनिज तेल समाप्त होने वाले साधन हैं। एक दिन ऐसा आएगा जब विश्व के लोगों को इनसे पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिलेगी। इनके भण्डार समाप्त हो चुके होंगे। इनके विपरीत सूर्य ऊर्जा कभी न समाप्त होने वाला साधन है। इससे विपुल मात्रा में ऊर्जा मिलती है। जब कोयले और खनिज तेल के भण्डार समाप्त हो जाएंगे तब सौर बिजली घरों से शक्ति प्राप्त होगी और हम अपने घरेलू कार्य और संयन्त्रों से सुगमता से कर लेंगे।

(8)

प्राकृतिक वनस्पति में वह सारे वृक्ष, कंटीली झाड़ियाँ, पौधे व घास आदि शामिल किये जाते हैं जो कि मानव हस्तक्षेप के बिना ही उगते हैं। इसका अध्ययन प्रारम्भ करने से पहले वनस्पति जाति (Flora), वनस्पति (Vegetation) और वन (Forests) जैसे सम्बन्धित शब्दों की जानकारी होना अनिवार्य है। वनस्पति जाति में किसी निश्चित समय तथा निश्चित क्षेत्र में उगने वाले पौधों की भिन्न-भिन्न किस्में (Species) शामिल की जाती हैं। किसी निश्चित वातावरण में किसी स्थान पर पैदा होने वाली झाड़ियों, पौधे, घास आदि को वनस्पति कहा जाता है। जबकि सघन व एक दूसरे पास उगे हुए पेड़, पौधे, कंटीली झाड़ियों आदि से घिरे हुए एक बड़े क्षेत्र को वन कहा जाता है। जंगल शब्द का प्रयोग सबसे अधिक वातावरण वैज्ञानिक और वन रक्षक तथा भूगोलवेत्ता करते हैं। हर एक किस्म की विकसित वनस्पति को अपने वातावरण के साथ एक नाजुक सन्तुलन (Delicate Balance) बना कर एक लम्बे जीवन-चक्र में से निकलना पड़ता है, जो इसके आपसी सामंजस्य और मौसमानुसार ढलने की क्षमता के गुण पर निर्भर करता है। हमारे देश में मिलने वाली सम्पूर्ण वनस्पति जाति (Flora) स्थानीय नहीं है, बल्कि इसका 40% भाग विदेशी जातियों का है जिन को बोरिअल (Boreal) और पेलियो-उष्ण-खण्डीय (Paleo-Tropical) जातियाँ कहा जाता है।

(a) देश में मौजूद विदेशी वनस्पति जातियों के (i) नाम तथा (i) मात्रा बताइए।
(b) पतझड़ या मानसूनी वनस्पति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
(a) देश में मौजूद विदेशी वनस्पति जातियों को बोरिअल (Boreal) और पेलियो-उष्ण खण्डीय (PaleoTropical) के नाम से पुकारते हैं। (ii) भारत की वनस्पति में विदेशी वनस्पति की मात्रा 40% है।
(b) वह वनस्पति जो ग्रीष्म ऋतु के शुरू होने से पहले अधिक वाष्पीकरण को रोकने के लिए अपने पत्ते गिरा देती है, पतझड़ या मानसून की वनस्पति कहलाती है। इस वनस्पति को वर्षा के आधार पर आई व आर्द्र-शुष्क दो उप-भागों में बाँटा जा सकता है।

  1. आई पतझड़ वन- इस तरह की वनस्पति उन चार बड़े क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ पर वार्षिक वर्षा 100 से 200 से०मी० तक होती है। इन क्षेत्रों में पेड़ कम सघन होते हैं परन्तु इनकी ऊँचाई 30 मीटर तक पहुंच जाती है। साल, शीशम, सागौन, टीक, चन्दन, जामुन, अमलतास, हलदू, महुआ, शारबू, ऐबोनी, शहतूत इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं।
  2. शुष्क पतझड़ी वनस्पति- इस प्रकार की वनस्पति 50 से 100 सें०मी० से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है। इसकी लम्बी पट्टी पंजाब से आरम्भ होकर दक्षिण के पठार के मध्यवर्ती भाग के आस-पास के क्षेत्रों तक फैली हुई है। कीकर, बबूल, बरगद, हलदू यहां के मुख्य वृक्ष हैं।

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(9)

हमारे देश में वनस्पति की विविधता के साथ-साथ जीव-जन्तुओं में भी बहुत बड़ी विविधता पायी जाती है। वास्तव में दोनों के बीच गहरा अन्तर्सम्बन्ध है। देश में जीव-जन्तुओं की लगभग 76 हज़ार जातियां मिलती हैं। देश के ताजे और खारे पानी में 2500 जाति की मछलियाँ पायी जाती हैं। इसी प्रकार पक्षियों की भी 2000 जातियां हैं। सांपों की 400 जातियों भारत में मिलती हैं। इसके अतिरिक्त उभयचारी, सरीसृप, स्तनधारी तथा छोटे कीट और कृमि भी पाये जाते हैं।

स्तनधारियों में राजसी ठाठ-बाठ वाले पशु हाथो प्रमुख हैं। यह विषुवतरेखीय उष्म आई वनों का जीव है। हमारे देश में यह असम, केरल तथा कर्नाटक के जंगलों में पाया जाता है। यहां भारी वर्षा होती है तथा जंगल भी बहुत घने हैं। इसके विपरीत ऊंट और जंगली गधे बहुत ही गर्म तथा शुष्क मरुस्थलों में पाये जाते हैं। ऊँट थार मरुस्थल का सामान्य पशु है, जबकि जंगली पौधे केवल कच्छ के रन (Rann of Kuchh) में ही मिलते हैं। इनकी विपरीत दिशा में एक सींग वाला गैंडा रहता है। ये असम और पश्चिमी बंगाल के ऊत्तरी भागों में दलदली क्षेत्रों में रहते हैं। भारतीय जन्तुओं में भारतीय गौर (बाइसन), भारतीय भैंसा तथा नील गाय विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हिरण भारतीय जीव जगत की विशेषता है।

(a) हिमालय में मिलने वाले जीवों के नाम बताओ।
(b) देश में जीव-जन्तुओं की देख-रेख के लिए कौन-कौन में कार्य किये जा रहे हैं?
उत्तर-
(a) हिमालय में जंगली भेड़, पहाड़ी बकरी, साकिन (एक लम्बे सींग वाली जंगली बकरी) तथा टैपीर आदि जीव-जन्तु पाये जाते हैं, जबकि उच्च पहाड़ी क्षेत्रों में पांडा तथा हिमतेंदुआ नामक जन्तु मिलते हैं।
(b)

  1. 1972 में भारतीय वन्य जीवन सुरक्षा अधिनियम बनाया गया। इसके अन्तर्गत देश के विभिन्न भागों में 1,50,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (देश का 2.7 प्रतिशत तथा कुल वन क्षेत्र का 12 प्रतिशत भाग) को राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य प्राणी अभ्याकरण घोषित कर दिया गया।
  2. संकटापन्न (Near Extinction) वन्य जीवों पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है।
  3. पशु-पक्षियों की गणना का कार्य राष्ट्रीय स्तर पर आरम्भ किया गया है।
  4. देश के विभिन्न भागों में इस समय बाघों के 16 आरक्षित क्षेत्र हैं।
  5. असम में गैंडे के संरक्षण की एक विशेष योजना चलायी जा रही है। सच तो यह है कि देश में अब तक 18 जीव आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves) स्थापित किये जाय है।
    योजना के अधीन सबसे पहले जीवन आरक्षण क्षेत्र नीलगिरि में बनाया गया था। इस योजना के अन्तर्गत प्रत्येक. जन्तु का संरक्षण अनिवार्य है। यह प्राकृतिक धरोहर (Natural heritage) भावी पीढ़ियों के लिए है।

(10)

पृथ्वी के धरातल पर मिलने वाले हल्के, ढीले और असंगठित चट्टानी चूरे व बारीक जीवांश के संयुक्त मिश्रण को मृदा/मिट्टी कहा जाता है, जिसमें पौधों को जन्म देने की शक्ति होती है।
इस मिश्रण का जमाव 15-30 सैं०मी० से लेकर कई मीटर तक की गहरी तहों में मिलता है। लेकिन मदा वैज्ञानिक, मिट्टी के रंग, बनावट, कणों के आकार आदि की मात्रा के आधार व गहराई में क्रमवार, ए०बी० व सी० नामक तीन परतों में बाँटा जाता है।’ए’ होराईजन वाली मिट्टियों में गल्लढ़ (ह्यूमस) मात्रा अधिक होने के कारण इनका रंग काला होना शुरू हो जाता है। लेकिन इस परत पर निक्षालय क्षेत्र (Zone of leaching) में स्थित होने के कारण खनिज घुलकर नीचे चले जाते . हैं व रंग हल्का काला होना शुरू हो जाता है। इस परत के नीचे ‘बी’ होराईजन वाली उप-परत का रंग ऊपरी परत से रिस कर आए खनिज पदार्थ के कारण रंग भूरा होता है। लेकिन इसमें ह्यूमस की मात्रा कम हो जाती है। इस परत के नीचे ‘सी’ होराईजन वाली मिट्टी की परत मिलती है। जिसमें उपरोक्त चट्टानों से अलग हुए पदार्थों में कोई खास तबदीली नहीं होती व आगे चलकर मुख्य आधार वाली चट्टान से जा मिलती है। इस उप-चट्टानी सतह का रंग सलेटी या हल्का भूरा होता है।

(a) मिट्टी की परिभाषा बताइए।
(b) मिट्टियों के जन्म में प्राथमिक चट्टानों का क्या योगदान है ?
उत्तर-
(a) पृथ्वी के धरातल पर पाये जाने वाले हल्के, ढीले तथा असंगठित चट्टानी चूरे (शैल चूर्ण) तथा बारीक जीवांश के संयुक्त मिश्रण को मिट्टी अथवा मृदा कहा जाता है।
(b) देश में प्राथमिक चट्टानों में उत्तरी मैदानों की तहदार चट्टानें अथवा पठारी भाग की लावा निर्मित चट्टानें आती हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के खनिज होते हैं। इसलिए इनसे अच्छी किस्म की मिट्टी बनती है।
प्राथमिक चट्टानों से बनने वाली मिट्टी का रंग, गठन, बनावट आदि इस बात पर निर्भर करता है कि चट्टानें कितने समय से तथा किस तरह की जलवायु द्वारा प्रभावित हो रही हैं। पश्चिमी बंगाल जैसे प्रदेश में, जलवायु में रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव तथा ह्यूमस के कारण मृदा अति विकसित होती है। परन्तु राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्र में वनस्पति के अभाव के कारण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। इसी तरह अधिक वर्षा तथा तेज़ पवनों वाले क्षेत्र में मिट्टी का कटाव अधिक होता है। परिणामस्वरूप उपजाऊपन कम हो जाता है।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography उद्धरण संबंधी प्रश्न

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आज के जानकारी एवं सूचना आधारित (knowledge and information based) विश्व में मानव संसाधनों के महत्त्वपूर्ण योगदान का राष्ट्रीय निर्माण एवं विकास में पहले की अपेक्षा ज्यादा बेहतर ढंग से महसूस किया जाने लगा है। आज विश्व के सभी देश, विशेषकर विकासशील देश, मानव संसाधनों के विकास की ओर पहले से ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। बच्चो क्या आप सोच सकते हैं, ऐसा क्यों है ? ‘ऐशियन टाईगर’ के नाम से जाने वाले दक्षिणी कोरिया, ताईवान, हांगकांग, सिंगापुर, मलेशिया आदि देशों में बड़ी तेजी से हो रहे आर्थिक विकास का श्रेय वहाँ पिछले कुछ दशकों में मानव संसाधनों के विकास पर हुए भारी निवेश को दिया जा रहा है। मानव संसाधन विकास में न केवल शिक्षा, तकनीकी कुशलता, स्वास्थ्य एवं पोषण जैसे मापकों को बल्कि मानव-आचार-विचार, सभ्यता-संस्कृति, प्रजाति एवं राष्ट्र-गर्व जैसे मापकों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसके बाद ही मानव संसाधन विकास एक सम्पूर्ण विचारधारा बन सकेगा।

(a) किसी देश का सबसे बहुमूल्य संसाधन क्या होता है?
(b) देश की जनसंख्या की संरचना का अध्ययन करना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
(a) बौद्धिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ नागरिक।
(b) किसी देश की जनसंख्या की संरचना को जानना क्यों आवश्यक है, इसके कई कारण हैं-

  1. सामाजिक एवं आर्थिक नियोजन के लिए किसी भी देश की जनसंख्या के विभिन्न लक्षणों जैसे जनसंख्या की आयु-संरचना, लिंगसंरचना, व्यवसाय संरचना आदि के आंकड़ों की जरूरत पड़ती है।
  2. जनसंख्या की संरचना के विभिन्न घटकों का देश के आर्थिक विकास से गहरा सम्बन्ध है। जहाँ एक और से जनसंख्या संरचना घटक आर्थिक विकास से प्रभावित होते हैं, वहीं वे आर्थिक विकास की प्रगति एवं स्तर के प्रभाव से भी अछूते नहीं रह पाते। उदाहरण के लिए यदि किसी देश की जनसंख्या की आयु संरचना में बच्चों तथा बूढ़े लोगों का प्रतिशत बहुत अधिक है तो देश को शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं पर अधिक-से-अधिक वित्तीय साधनों को खर्च करना पड़ेगा। दूसरी ओर, आयु संरचना में कामगार आयु-वर्गों (Working age-groups) का भाग अधिक होने से देश के आर्थिक विकास की दर तीव्र हो जाती है।

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जनसंख्या वितरण के क्षेत्रीय प्रारूप का अध्ययन, जनसंख्या के सभी जनसांख्यिकीय घटकों को समझने के लिए आधार प्रदान करता है। इस कारण से जनसंख्या के वितरण के क्षेत्रीय प्रारूप को समझना बहुत आवश्यक है। यहां सबसे पहले हमें जनसंख्या वितरण एवं जनसंख्या घनत्व के बीच अन्तर को भी स्पष्ट कर लेना ज़रूरी है।
जनसंख्या वितरण का सम्बन्ध स्थान से तथा घनत्व का सम्बन्ध अनुपात से है। जनसंख्या वितरण से यही अर्थ निकलता है कि देश के किसी एक हिस्से में जनसंख्या का क्षेत्रीय प्रारूप (Pattern) कैसा है, यानि जनसंख्या प्रारूप फैलाव (nucleated) लिए है या एक ही जगह पर इकट्ठा जमाव (agglomerated) है। दूसरी तरफ घनत्व में, जिसका सम्बन्ध जनसंख्या आकार एवं क्षेत्र से होता है, मनुष्य तथा क्षेत्र (area) के अनुपात पर ध्यान दिया जाता है।
भारत में मानव बस्तियों का इतिहास बहुत पुराना है। इसी कारण देश का हर वह भाग जो मानव निवास के योग है जनसंख्या निवास करती है। फिर भी जनसंख्या का वितरण भूमि के उपजाऊपन से बहुत अधिक प्रभावित होता है। भारत एक कृषि प्रधान देश होने के कारण, जनसंख्या वितरण का प्रारूप कृषि-उत्पादकता (agricultural productivity) पर निर्भर करता है। इसी कारण जिन प्रदेशों में कृषि-उत्पादकता अधिक है जनसंख्या का जमाव भी उतना ही अधिक है। कृषि उत्पादकता के अलावा, प्राकृतिक कारकों (physical factors) की विभिन्नता, औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक तत्वों का भी भारत के जनसंख्या वितरण प्रारूप को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

(a) देश के सबसे अधिक और सबसे कम जनसंख्या वाले राज्यों के नाम बताइए।
(b) देश में जनसंख्या वितरण के प्रादेशिक प्रारूप की प्रमुख विशेषताओं को बताते हुए प्रारूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
(a) देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश और सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम
(b) भारत में जनसंख्या वितरण का प्रादेशिक प्रारूप तथा उसकी महत्त्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  1. भारत में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है। नदियों की घाटियों और समुद्र तटीय मैदानों में जनसंख्या बहुत सघन है, परन्तु पर्वतीय, मरुस्थलीय एवं अभाव-ग्रस्त क्षेत्रों में जनसंख्या बहुत ही विरल है। उत्तर के पहाड़ी प्रदेशों में देश के 16 प्रतिशत भू-भाग पर मात्र 3 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, जबकि उत्तरो मैदानों में देश के 18 प्रतिशत भूमि पर 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। राजस्थान में देश के मात्र 6 प्रतिशत भू-भाग पर 6 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।
  2. अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में बसी है। देश की कुल जनसंख्या का लगभग 71% भाग ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 29% भाग शहरों में निवास करता है। शहरी जनसंख्या का भारी जमाव बड़े शहरों में है। कुल शहरी जनसंख्या का दो-तिहाई भाग एक लाख या इससे अधिक आबादी वाले प्रथम श्रेणी के शहरों में रहता है।
  3. देश के अल्पसंख्यक समुदायों का जमाव अति संवेदनशील एवं महत्त्वपूर्ण बाह्य सीमा क्षेत्रों में है। उदाहरण के लिए उत्तर-पश्चिमी भारत में भारत-पाक सीमा के पास पंजाब में सिक्खों तथा जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों का बाहुल्य है। इसी तरह उत्तर-पूर्व में चीन व बर्मा (म्यनमार) की सीमाओं के साथ ईसाई धर्म के लोगों का जमाव है। इस तरह के वितरण से अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कठिनाइयां सामने आती हैं।
  4. एक ओर तटीय मैदानों एवं नदियों की घाटियों में जनसंख्या घनी है तो दूसरी ओर पहाड़ी, पठारी एवं रेगिस्तानी भागों में जनसंख्या विरल है। यह वितरण एक जनसांख्यिकी विभाजन (Demographic divide) जैसा लगता है।

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